08 मई 2008

हम सब माओवादी हैं!

पहले वे यहूदियों के लिये आये
और मै कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे कम्युनिस्टों को लेने आये
और मै कुछ नहीं बोला
क्योंकि मै कम्युनिस्ट नहीं था

फिर वे ट्रेड युनियनों के लिये आये
और मै कुछ नहीं बोला
क्योंकि मै ट्रेड युनियन मे नहीं था

फ़िर वे मेरे लिये आये
और कोई नहीं था
जो मेरे लिये बोलता


हिट्लर द्वारा प्रताणित एक जर्मन कवि पास्टर निमोलर की कविता. देश में जो स्थितियाँ बन रही हैं इनको देखकर ऎसा लगता है कि या तो हर पत्रकार सरकार कि जुबान बोलेगा या फ़िर प्रशान्त राही बनेगा,हर समाजिक कार्यकर्ता या फ़िर एन.जी ओ. से पैसे खायेगा या फ़िर बिनायक सेन बनेगा, फ़िल्म मेकर अजय टी. जी. को छत्तीसगढ की जेल में जाना होगा क्योंकि कैमरे में कैद छ्त्तीसगढ, रिसालों में छ्पे रमन सिंह के इस्तिहार से मेल नहीं खाता. हाल में छ्त्तीस गढ गया था जहाँ पर बिनायक सेन की रिहाई को लेकर गाँव-गाँव से ढेर सारे आदिवासी आये थे. पुलिस और खुफ़िया तंत्रों के बीच ये गाँव के लोग चिल्ला रहे थे कि यदि बिनायक सेन माओवादी हैं तो हम सब माओवादी हैं. ये वे लोग थे जिनका विनायक सेन मुफ़्त में गाँव जा जा कर चिकित्सा किया करते थे. इनका यह भी कहना था कि यदि बिनायक जैसे नेक इंसान माओवादी है तो मै दुआ करती हूँ कि देश का हर इंसान माओवादी बने। यहाँ हम दि सन्डे पोस्ट से साभार चारू तिवारी की यह रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे है. खासतौर से उत्तरा खन्ड की स्थितियों पर कई पहलुओं को उजागर करती है.

उत्तराखण्ड की तराई में माओवादियों के नाम पर बेकसूर लोगों का उत्पीड़न जारी है। पिछले दिनों वरिष्ठ पत्र्कार प्रशांत राही की गिरफ्तारी ने पुलिसिया कहानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां पुलिस ने उन्हें माओवादी संगठन का कमाण्डर घोषित कर दिया, वहीं मानवाधिकार और पत्र्कार संगठन इसे गलत बता रहे हैं। इससे पहले भी पुलिस पिछले पांच सालों में इस तरह की गिरफ्तारियां कर चुकी है। लेकिन अभी तक वह किसी को भी माओवादी साबित नहीं कर पाई है।
उत्तराखण्ड की तराई में माओवाद के नाम पर पुलिसिया दमन कोई नई बात नहीं है। कानून-व्यवस्था बनाने में जब भी सरकार नाकाम रहती है वह लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस तरह के ऑपरेशन्स को अंजाम दे देती है। पिछले दिनों वरिष्ठ पत्र्कार प्रशान्त राही की गिरफ्तारी को पुलिस ने जिस तरह पेश किया है उससे यह बहस तेज हो गई है कि तराई में फैल रहे माओवाद के नाम पर पुलिस किसी को भी गिरफ्तार कर उसे कानून- व्यवस्था के लिए खतरा बता देती है। पिछले साल नीलकांत,जीवन चन्द्र, अनिल चौड़ाकोटी और प्रताप सिंह पर रासुका लगाकर न केवल उन्हें माओवादी घोषित करने की कोशिश हुई, बल्कि रुद्रपुर के युवा पत्र्कार रूपेश कुमार को भी पुलिस पकड़ ले गई। इनका माओवाद से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। ताजा घटनाक्रम के बाद जन सरोकारों से जुड़े आंदोलनकारी और मानवाधिकार संगठन तराई में पुलिसिया दमन के खिलाफ लामबंद हो गए हैं।
गौरतलब है कि पिछले दिनों पुलिस ने प्रशांत राही को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का जोनल सेक्रेटरी होने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया। पुलिस की कहानी के अनुसार वह तराई में लोगों को सशस्त्र आंदोलन के लिए तैयार कर रहे थे। उनसे जिस लैपटॉप, पैन ड्राइव,सीडी और माओवादी साहित्य की बरामदगी दिखाई गई है उसमें हरिद्वार जेल को उड़ाने जैसी साजिशों की आशंका बताई गई है। पुलिस की यह कहानी किसी के गले नहीं उतर रही है। यह इसलिए भी कि सूत्रों के अनुसार राही को पुलिस ने देहरादून-ऋषिकेश रोड से 17 दिसंबर को उठाया था और 21 दिसंबर को नानकमत्ता के पास हसनपुर खत्ता के जंगलों से गिरफ्तार दिखाया गया।

असल में तराई में जमीन और उद्योगों से पनप रहे जन असंतोष को रोकने में नाकाम रही सरकार ऐसे बहाने ढूंढ़कर उसे यहां भारी खतरे के रूप में पेश करती रही है। जहां तक प्रशांत राही का सवाल है वह पिछले सत्र्ह साल से स्थानीय जनता के संघषोर्ं में साथ रहे हैं। उन्होंने हिमाचल टाइम्स से अपना पत्र्कारिता जीवन शुरू किया। वह अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन में संवाददाता भी रहे। इस दौरान वह जनता के सवालों को प्रमुखता से उठाते रहे। इस तरह के कई अन्य लोग भी हैं जो लंबे समय से तराई के भूमिहीनों और सरकार की नाकामियों से उपजी समस्याओं के खिलाफ अपने स्वर मुखर कर रहे हैं। पत्र्कारिता जगत से जुड़े बहुत सारे लोग समय पर इन बातों को उठाते रहे हैं। लेकिन इन्हें सरकारी दमन से माओवादी कहकर प्रताड़ित करना किसी के समझ में नहीं आ रहा है। माओवाद के नाम पर बार-बार गढ़ी जा रही पुलिसिया कहानी के खिलाफ अब विभिन्न मानवाधिकार संगठन, पत्र्कार संगठन, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया लामबंद होने लगे हैं। यह गोलबंदी इसलिए भी है कि पिछले एक साल में जहां भी सरकार जनप्रतिरोध को रोकने में नाकाम रही है वहां उसने जनसरोकारों से जुड़े लोगों को निशाना बनाया। छत्तीसगढ़ में पीयूसीएल के अध्यक्ष तथा सामाजिक कार्यकर्ता डॉ विनायक सेन और केरल एवं आंधर प्रदेश में भी उन पत्र्कारों पर पुलिसिया दमन हुआ जो जनता की आवाज के साथ खड़े रहे।

उत्तराखण्ड की तराई में माओवाद के बढ़ते प्रभाव और उसे रोकने के लिए सरकार क्या सोचती या करती है वह उसकी नीति का हिस्सा हो सकता है। सरकार पिछले दस सालों से विशेषकर जब से नेपाल में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई और माओवादियों का जनयुद्ध शुरू हुआ, इस क्षेत्र् को संवेदनशील मानती रही है। वह नए फोर्स और नई रणनीतियां बनाती रही। लेकिन अभी तक वह माओवादी संगठनों की कथित गतिविधयों को न तो उजागर कर पाई और न ही उन पर कोई प्रभावी कदम उठा पाई है। यह अलग बात है कि माओवादी उन्मूलन के नाम पर वह जीवन चन्द्र, अनिल चौड़ाकोटी और नीलकांत जैसे लोगों को ही गिरफ्तार कर पाई। इन्हें राज्य सरकार ने खूंखार माओवादी घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

नवंबर 2005 को इन लोगों को पुलिस ने अलग-अलग जगह से गिरफ्तार कर बैक डेट में इनकी गिरफ्तारी दिखाई। इन्हें पुलिस रिमांड पर लेकर यातनाएं दी और 28 नवंबर को इन पर रासुका लगा दी गई। प्रशासन ने न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि 41 वर्षीय नीलकांत के पास माओवादी डायरी मिली जबकि हकीकत यह थी कि वह निरक्षर मजदूर था। यही वाकया 26 वर्षीय अनिल चौड़ाकोटी के साथ हुआ। उसे अल्मोड़ा जनपद के शहर फाटक के पास एक मचान जलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

अल्मोड़ा निवासी जीवन चन्द्र के साथ भी सही हुआ। वह पूर्व छात्र् नेता और मजदूर- किसान संघर्ष समिति का सदस्य था, जो अपने संगठन की बैठकों में भाग लेने तराई में जाता था। इसी दौरान रुद्रपुर में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले 2004 में भी इस तरह की गिरफ्तारियां हुइरं। लेकिन पुलिस इनमें से किसी को भी माओवादी साबित नहीं कर पाई। द्वाराहाट के छत्तगुला गांव निवासी बीकॉम के छात्र् ईश्वर को माओवादी बताकर हल्द्वानी में त्रिलोकनगर से उसके कमरे से पकड़ा गया। उसकी गिरफ्तारी नानकमत्ता डेम से दिखाई गई। चंपावत निवासी 16 वर्षीय हरीश राम के अलावा कल्याण राम, हयात राम, ललित जैसे अनेक गरीब गांववासी हैं जिन्हें पुलिस उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। इतना ही नहीं पुलिस ने अल्मोड़ा जिले से जलना गांव निवासी हरेन्द्र को भी माओवादी के नाम पर उठा लिया। बाद में पता चला कि वह भाजपा कार्यकर्ता है।

प्रसंगवश तराई में माओवाद या असंतोष की पड़ताल के लिए यहां के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को समझना जरूरी है। तराई के मूल निवासी बोक्सा और थारू जनजाति के लोग थे। पहाड़ के भूमिहीनों का यहां से गहरा रिश्ता रहा। साठ के दशक में भूमिहीनों की समस्या तेजी के साथ उठने लगी। इसमें वामपंथी संगठन सकिय हुए। उस समय भारत-चीन युद्ध के बीच सरकार अपनी असफलता से कुण्ठित थी। जमीन पर अधिकार के लिए तराई में आंदोलन तेज हो गया। सरकार ने पहाड़ और तराई में इस तरह की बात करने वाले लोगों को चीन परस्त बताकर गिरफ्तार करना शुरू किया। इसमें गढ़वाल में जहां विद्या सागर नौटियाल जैसे लोग भूमिगत हुए, वहीं प्रसिद्ध रंगकर्मी मोहन उप्रेती को गिरफ्तार किया गया।

तराई का मौजूदा परिदृश्य साठ से अस्सी तक के दशक के जनांदोलनों से अलग नहीं है। 1969 में समाजवादी विचारधशरा के संगठनों ने यहां के जमीन और आम लोगों के अधिकारों की बात को ताकत के साथ उठाया। 1972 में सीलिंग एक्ट आने से यहां के भूमिहीनों पर कब्जा जमाए पूंजीपतियों में बौखलाहट शुरू हुई। अस्सी का पूरा दशक यहां के भूमिहीनों की लड़ाई में गुजर गया। 1989 में कोटखर्रा, पंतनगर, महतोषमोड़ के अलावा पूरी तराई आंदोलित हो उठी।

तराई में राज्य बनने के बाद इसे जिस तरह औद्योगिक मॉडल के रूप में विकसित करने की बात कही गई वह यहां के लोगों को चिढ़ाने वाली रही है। रुद्रपुर, खटीमा, काशीपुर और पंतनगर में उद्योगों के नाम पर पूंजीपतियों के हवाले हुई जमीन के कारण लोगों के लिए नई मुसीबत खड़ी हुई है। सिब्सडी के लिए मात्र् पैकिंग उद्योग के रूप में इंडस्ट्री विकसित हुई। इससे स्थानीय लोग रोजगार से भी वंचित रह गए। रुद्रपुर, हल्द्वानी जैसे शहरों में आ रहे बड़े-बड़े बिल्डर जहां नए शहरों का निर्माण करने में लगे हैं, वहीं भूमिहीन यहां एक रोटी के लिए तरस गए हैं। तराई ही नहीं पहाड़ में सारी जमीनें पर्यटन विकास के नाम पर पूंजीपतियों के हाथों बेची जा चुकी हैं। मजखाली, लमगड़ा, रामगढ़, भीमताल के अलावा भू-माफिया गांव तक पहुंच गए। जब भी लोग अपने हकों के लिए आवाज उठाते हैं उन्हें राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बता दिया जाता है।

पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने केन्द्र सरकार से कानून- व्यवस्था दूरुस्त करने के लिए 208 करोड़ रुपए की मांग की है। इसमें कहा गया है कि माओवादी यहां के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। इससे पहले कांग्रेस के शासनकाल में 90 करोड़ रुपया इसी बात पर खर्च किया गया। यहां गठित की गई स्पेशल टास्क फोर्स को 30 प्रतिशत अधिक वेतन दिया गया। इन भारी आर्थिक पैकेजों की बात इसलिए कही जाती है ताकि इस बहाने वह भारी बजट हड़प सकें। पिछले साल सरकार की योजनामद में राज्य की योजना राशि चार हजार करोड़ थी। सरकार विकास का चेहरा नहीं बदल पाई। अब उत्तराखण्ड भी धीरे-धीरे सरकार की नाकामी से उन क्षेत्रों की तरह असंतोष की ओर बढ़ रहा है जहां नक्सली या माओवादी सकिय हैं। छत्तीसगढ़ में जनता को नक्सलियों के सामने करने के लिए सरकार को सलवा जुडूम जैसी योजनाएं चलानी पड़ीं जो जनविरोध से ही शुरू होती हैं।
उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित सोनभद्र, मिर्जापुर और भदोही में सरकार 15 सौ करोड़ रुपये खर्च कर उन पर काबू पाने की कोशिश कर रही है। अच्छा हो सरकार अब अंधेरे में हाथ-पांव मारने के बजाए तराई की समस्या को समझे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

    एक नया हिन्दी चिट्ठा भी शुरु करवायें तो मुझ पर और अनेकों पर आपका अहसान कहलायेगा.

    इन्तजार करता हूँ कि कौन सा शुरु करवाया. उसे एग्रीगेटर पर लाना मेरी जिम्मेदारी मान लें यदि वह सामाजिक एवं एग्रीगेटर के मापदण्ड पर खरा उतरता है.

    यह वाली टिप्पणी भी एक अभियान है. इस टिप्पणी को आगे बढ़ा कर इस अभियान में शामिल हों. शुभकामनाऐं.

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  2. चारु की रिपोर्ट पढ़ाने के लिए धन्यवाद।

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