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31 दिसंबर 2013

गोरखः प्रेम, करूणा और तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर

लेखक: उर्मिलेश
(नामवर सिंह पर लिखे संस्मरण के बाद जेएनयू के दिनों को याद करते हुए उर्मिलेश का ये दूसरा संस्मरण है। पिछले संस्मरण की तरह आकार में यह भी ब्लॉग के लिहाज से लंबा है, लेकिन हम यहां असंपादित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं: मॉडरेटर)

तारीख और महीना ठीक से याद नहीं, पर यह जेएनयू में सन 1978 की ‘एम.फिल.-पीएच.डी. प्रवेश-परीक्षा’ से पहले की बात है, जब गोरख पांडे से मेरी मुलाकात विश्वविद्यालय के झेलम होस्टल के उनके कमरे में हुई। जेएनयू की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा देने मैं इलाहाबाद से दिल्ली आया था। उनसे मिलने का भले ही पहला मौका था पर मित्रों और शुभचिंतकों के जरिए हम दोनों एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित थे। इलाहाबाद में कृष्ण प्रताप, रामजी राय और बनारस में अवधेश प्रधान से पांडे जी के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। वह एक चर्चित कवि और मार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। अपने आने की उन्हें पहले ही चिट्ठी भेज चुका था क्योंकि उनके कमरे के अलावा दिल्ली में कोई और ठौर-ठिकाना नहीं था। बेहद मुफलिसी का दौर था। दिल्ली के किसी साधारण होटल में भी रूकने की बात सोच नहीं सकता था। स्टेशन से सीधे जेएनयू गया और झेलम होस्टल पहुंचकर उनका कमरा खोजने लगा। 

नीचे से ही किसी ने पांडे जी का कमरा दिखाते हुए कहा, ‘सीढ़ियों से चले जाइए, वो ऊपर जो कमरा खुला हुआ है, वही है पांडे जी का कमरा।’ अपनी दो उंगलियों को टेढ़ा कर मैंने कमरे के दरवाजे पर आवाज की, अंदर बेड के एक कोने में बैठे पांडे जी ने कहा, ‘आ जाइए।’ कमरे के एक कोने में मैंने अपना पुराना सा ट्रैवेल-बैग रखा और उनसे हाथ मिलाया। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘कैसी रही यात्रा, कष्ट तो नहीं हुआ।’ थोड़ी देर की गपशप के बाद वह मुझे गंगा-झेलम लॉन के सामने वाले ढाबे पर ले गए, जहां हम दोनों ने ब्रेड पकौड़े के साथ चाय पी। लगा ही नहीं कि मैं गोरख पांडे से पहली बार मिल रहा हूं। दुनिया भर की बातें होती रहीं। वहीं कुछेक लोगों से परिचय भी हुआ। फिर हम लोग कमरे में लौट आए।

तकरीबन आठ-साढ़े आठ बजे रात को पांडे जी के साथ झेलम होस्टल मेस में खाने के लिए गया। उन दिनों झेलम ‘को-होस्टल’ हुआ करता था, उसके एक हिस्से में लड़के रहते थे और दूसरे में लड़कियां। बीच में होस्टल के साझा भोजनालय (कॉमन-मेस) का बड़ा सा हॉल था। दोनों विंग के बीच कोई दीवार नहीं थी पर लड़के कभी भी लड़कियों वाले विंग में नहीं जाते थे, यदाकदा लड़कियां आ जाती थीं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाहाबादी-माहौल से निकले मेरे जैसे गंवई-छात्र के लिए यह सब अनोखा था। पांडे जी जब पहली बार आए होंगे तो उनके लिए भी यह अनोखा रहा होगा। मेरी तरह वह भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के बनारस से वहां गए थे। इतनी सारी लड़कियों के साथ एक ही कतार में बैठकर भोजन करने का यह मेरा पहला मौका था। लड़कियों में ज्यादातर स्मार्ट और सुंदर थीं। लेकिन उनमें इलाहाबाद की लड़कियों की तरह कस्बाई-शर्मीलापन नहीं था। कइयों को तो खाने के तत्काल बाद सिगरेट सुलगाते देखकर चकित रह गया। 

उस दिन कम खाया। वैसे तो देख रहा था कि पुराने छात्र काउंटर पर जाकर थाली में बार-बार कोई न कोई आइटम भर रहे हैं। पर अपन को वाकई संकोच हो रहा था। पहली बार थाली में जितना निकाला था, उतना ही खाकर उठ गया। पांडे जी तो वैसे भी अल्पाहारी थे। उन्होंने भी मेरे साथ ही खाना खत्म किया। मैंने कहा, ‘पान खाने की इच्छा हो रही है’। उन दिनो मैं जमकर पान खाता था। पांडे जी काशी राम ढाबे के पास की एक पान दुकान पर ले गए। उन्होंने उस रात सिगरेट ली और मैंने 120 नंबर जर्दे वाला पान लिया। साथ में दो पान बंधवा भी लिया। पांडे जी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘पान के मामले में आप भी पूरे बनारसी हैं’।

कमरे में लौटने पर थोड़ी-बहुत गपशप हुई। फिर पांडे जी ने बेड के नीचे से एक फटी-पुरानी सी रजाई निकाल कर नीचे बिछाना शुरू किया और मुझे आदेश दिया, ‘ आप बेड पर सोएंगे। मैं नीचे सोता हूं’। पांडे जी उन दिनों पीएच.डी. स्कॉलर थे, इसलिए सिंगल बेड कमरा मिला था। नए छात्रों, भाषा संकाय (स्नात्तक-स्नातकोत्तर संयुक्त कोर्स) वालों या अन्य सभी संकायों के एम.ए. वाले छात्रों को डबल-बेड वाले कमरे मिलते थे और एक ही कमरे में दो-दो छात्र रहते थे। पांडे जी का आदेश सुनकर मैं परेशानी में पड़ गया। वह मुझसे उम्र, पढ़ाई-समझदारी हर स्तर पर बड़े थे। उनका यह आदेश मानना मेरे लिए कष्टप्रद था। मैंने हिम्मत जुटाई, ‘यह नहीं हो सकता। नीचे मैं ही सोऊंगा।’ फिर उन्होंने समझाना शुरू किया, ‘आपको परीक्षा की तैयारी करनी है, पढ़िए और फिर ठीक से सोइए, मुझे नीचे सोने की पुरानी आदत है’। अंत में मेरी जीत हुई। बड़े भाई को छोटे की जिद्द के आगे झुकना पड़ा। सुबह मैं परीक्षा देने चला गया। वहां से लौटा तो उन्होंने पर्चे वगैरह के बारे में पूछा। मैंने कहा, ‘पेपर तो बहुत आसान सा था। अच्छा हुआ है।‘ उन्होंने कहा, ‘चलिए अच्छी बात है, लिस्ट में नाम ऊपर रहा, तो यूजीसी की फेलोशिप तुरंत मिल जाएगी। आर्थिक समस्या नहीं रहेगी।’

गोरख
कुछेक दिन वहां रहने के बाद मैं इलाहाबाद लौट गया। एम.फिल.-पीएच.डी.(हिन्दी) की प्रवेश परीक्षा का परिणाम आया तो पता चला, मैंने एडमिशन लिस्ट में टॉप किया है। वहां पांडे जी को भी पता चल गया। कुछ समय बाद मैं फिर जेएनयू पहुंचा और फिर पांडे जी का कमरा ही मेरा बसेरा बना। वहां तब तक रहा, जब तक ब्रह्मपुत्र होस्टल (पूर्वांचल) में मुझे अपना कमरा अलॉट नहीं हो गया। अपने कमरे में शिफ्ट होने के बाद भी आए दिन पांडे जी से मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रहा। शुरू में इस कैम्पस में वह मेरे लिए एक बड़े भाई की तरह थे। लेकिन धीरे-धीरे हम दोनों का रिश्ता ज्यादा प्रगाढ़ होता गया। उन दिनों मैं एसएफआई से अलग हो रहा था या कि अलग हो चुका था। हम लोगों ने इलाहाबाद में पहले पीएसए नामक स्वतंत्र किस्म के वामपंथी छात्र संगठन का गठन किया। इसमें तीन तरह के छात्र थे। एक वे जो सीपीआई (एम-एल)-लिबरेशन के समर्थक या उससे प्रेरित थे, दूसरे वे जो एम-एल के ही एसएन सिंह-चंद्रपुल्ला रेड्डी ग्रुप से प्रेरित थे और तीसरे वे जो मेरी तरह माकपा-एसएफआई की लाइन से क्षुब्ध होकर उससे अलग, स्वतंत्र-वाम छात्र संगठन बनाने के नाम पर इसमें शामिल हुए थे। 

पहले वाले समूह में रामजी राय प्रमुख थे। दूसरे में रवि श्रीवास्तव और निशा आनंद आदि। बीच का मैं था, शायद इसीलिए मुझे दोनों गुटों के छात्र-सदस्यों का भरोसा और सद्भाव प्राप्त था। बातचीत से लगा कि गोरख जी को इलाहाबाद के राजनैतिक घटनाक्रम और उसमें मेरी भूमिका के बारे में पूरी जानकारी है। उन दिनों जेएनयू में भाकपा-माकपा से अलग वामपंथी समूह के नाम पर दो ढीले-ढाले छात्र-समूह थे-आरएससी यानी रेडिकल स्टूडेन्ट्स सेंटर और जेसीएम यानी जनवादी छात्र मोर्चा। आरएससी में गोरख के अलावा निशात कैसर, गुमड़ी राव, ए चंद्रशेखर, जे मनोहर राव जैसे जेएनयू के कुछ छात्र शामिल थे, जबकि जेसीएम में त्रिनेत्र जोशी आदि सक्रिय थे। सन 1978 में दोनों संगठनों ने मिलकर छात्र संघ का चुनाव भी लड़ा। उन्होंने सिर्फ कुछ कौंसिलर सीटों पर अपने उम्मीदवार लड़ाए थे। जहां तक मुझे याद आ रहा है, वे सभी हार गए। इस वक्त मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा है कि कैम्पस में पीएसओ की स्थापना जेएनयू में मेरे दुबारा दाखिले के बाद हुई या पहले ही हो गई थी। दुबारा दाखिला इसलिए कह रहा हूं कि सन 78 में मेरा ‘प्रोविजनल एडमिशन’ हुआ था और वह एमए फाइनल का रिजल्ट अक्तूबर, 78 तक न आ पाने के कारण रद्द हो गया। थोड़ी-बहुत सहूलियत मिल सकती थी, जो भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष डॉ. नामवर सिंह और उनके समर्थकों के ‘प्रतिकूल या असहयोगी रवैये’ के चलते नहीं मिली।

एडमिशन रद्द होने के बाद अगले साल यानी 79 में मुझे फिर से प्रवेश-परीक्षा में बैठना पड़ा और इस बार तीसरी पोजिशन आई, अंततः फेलोशिप के साथ दाखिला मिला। नया होस्टल मिलने तक फिर गोरख जी के कमरे में ही रहा। उनसे बहुत कुछ सीखने और समझने का मौका मिला। इमर्जेन्सी के बाद माकपा के पास उभरने का बड़ा मौका था। पर धीरे-धीरे उसके राजनीतिक चिंतन और लाइन की समस्याएं सामने आने लगीं। यूपी में माकपा और उसके छात्र संगठन के सामने ढेर सारी मुश्किलें थीं। सच पूछिए तो एसएफआई से पीएसओ की तरफ मेरा झुकाव ज्ञान से ज्यादा अपने सांगठनिक अनुभव के आधार पर हुआ। माकपा-एसएफआई से निराशा मुख्य कारण बनी। साथ में पढ़ना-लिखना भी होता रहा। जेएनयू में एसएफआई-एआईएसएफ गठबंधन के नेतृत्व के रवैये को देखकर मेरा मोहभंग कुछ ज्यादा तेजी से हुआ। माकपा की राजनीतिक लाइन के कई बिंदुओं पर मेरी असहमति पहले से ही उभर रही थी। अंतरराष्ट्रीय हालात भी भारत के पारंपरिक वामपंथियों के लिए प्रतिकूल साबित हो रहे थे। अफगानिस्तान में रूसी सैन्य घुसपैठ को भाकपा की तरह माकपा के लोग भी जायज बताने लगे। इससे इलाहाबाद एसएफआई में हम जैसों ने असहमति जताई। छात्र-संगठन में बड़ा जबर्दस्त विवाद चला। संगठन के साथी और मेरे प्रिय मित्र व्यासजी से तो बोलचाल भी बंद हो गई थी। कुछ महीने बाद फिर से संवाद शुरू हुआ और तब राजनीतिक मतभेद के बावजूद दोस्ती पुख्ता होती गई, जो आज तक कायम है। 

हालांकि छात्र जीवन के बाद हम दोनों पूरी तरह प्रोफेशनल हैं-वह एक नौकरशाह और मैं एक पत्रकार। एसएफआई से मेरे अलगाव के कुछ समय बाद ही इलाहाबाद में पीएसए का गठन  हुआ। पहली बैठक नवनिर्मित ताराचंद होस्टल के एक कमरे में हुई थी। संभवतः वह अरविन्द या शरद श्रीवास्तव का कमरा था। जहां तक मुझे याद आ रहा है, बैठक में रवि श्रीवास्तव और रामजी राय सहित आठ-दस संस्थापक सदस्य मौजूद थे। इनमें शरद, मंगज, अरविन्द, राकेश और कमलकृष्ण राय जैसे लोग प्रमुख थे, जिनका नाम इस वक्त मुझे याद आ रहा है। अखिलेंद्र प्रताप सिंह और लाल बहादुर कुछ समय बाद इस संगठन से जुड़े। उन दिनों कैम्पस में छात्र-कार्यकर्ता के रूप में मैं खूब सक्रिय था। पर अपने बारे में मुझे कोई भ्रम नहीं था। विचारधारा, अर्थतंत्र, दर्शन , खासतौर पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मसलों की मेरी समझ बहुत प्रारंभिक किस्म की थी। उतनी ही थी, जितना हिन्दी में छपी बुकलेट्स या अन्य पुस्तकों से मिल सकती थी। आज भी कुछ ज्यादा नहीं है। हम जैसे हिन्दी पत्रकारों को उच्च और गंभीर अध्ययन का मौका भी कहां मिलता है! हमारे जैसी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के पत्रकार-लेखक का ज्यादा वक्त रोजी-रोटी और रोजमर्रे के संघर्ष में ही बीत जाता है।

लेकिन छात्र-जीवन में, खासकर जेएनयू में गोरख पांडे से विचार-विमर्श के दौरान मुझे राजनीतिक विचारधारा, दार्शनिक परंपराओं, खासकर मार्क्सवाद के बारे में काफी कुछ समझने को मिला। इलाहाबाद की स्टडी सर्किल में रवि और अन्य वरिष्ठ मित्र भी विचारधारा और अर्थतंत्र जैसे विषय पर काफी असरदार रहते थे। इस स्टडी सर्किल में कभी-कभी जाने-माने वकील, साहित्यकार, कवि-लेखक और कलाकार भी शामिल होते थे। साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में कृष्णप्रताप और रामजी राय काफी जानकार थे। कृष्णप्रताप मीठे स्वभाव के थे, जरूरत के हिसाब से वह विमर्श में कभी-कभी व्यंग्यात्मक तेवर अपनाते थे। रामजी राय में स्पष्टता दिखती थी लेकिन तेवर अक्सर आक्रामक रहता था। उन दिनों वह ‘कन्वीन्स’ करने के बजाय ‘कन्फ्रंट’ करने के अपने खास अंदाज के लिए जाने जाते थे। मेरे मित्र व्यास जी कभी-कभी उनके अंदाज का मजा ले-लेकर वर्णन करते थे। लेकिन जेएनयू में गोरख बिल्कुल अलग ढंग की शख्सियत नजर आए। राजनीति, दर्शन और विचारधारा के अन्य प्रश्नों को समझाने का उनका अंदाज निराला था। बहुत सहज और सजीव। विचारधारा और दर्शन के मामले में मुझ जैसे नवसाक्षर को यह आभास दिए बगैर कि वह सचमुच कितने बड़े विद्वान हैं, मेरे टेढ़े-मेढ़े सवालों का वह बहुत सहजता से जवाब देते रहते थे। बीए में दर्शन मेरा एक विषय रह चुका था। उसमें नंबर भी अव्वल मिले थे। पर सच पूछिए तो जेएनयू के स्तर के हिसाब से उसमें भी मैं नवसाक्षर ही था। 

जहां तक मुझे याद आ रहा है, गोरख जी उन दिनों प्रोफेसर सुमन गुप्ता के निर्देशन में ज्यां पाल सार्त्र के दर्शन में अलगाववाद के तंतुओं जैसे किसी गूढ़ विषय पर शोध कर रहे थे। वह दर्शन के अलावा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मसलों पर भी ज्ञान के सागर थे। लेकिन अर्थशास्त्र पर उतनी पकड़ नहीं थी। जेएनयू में उनसे भी बड़े कई विद्वान और ज्ञानी थे, जो अपने-अपने क्षेत्र के ज्ञान-स्तम्भ कहे जा सकते हैं। लेकिन गोरख में जो एक खास बात थी, वह औरों में मुझे नहीं दिखी। मैंने जितना गोरख को जाना, उसके आधार पर कह सकता हूं कि अपनी अब तक की जिन्दगी में उन जैसा फकीर वामपंथी हिन्दी रचनाकार-दार्शनिक मैंने नहीं देखा, जिसके राजनीतिक सोच में फौलाद जैसी दृढ़ता हो पर जिसके व्यक्तित्व के अंदरूनी आंगन में करुणा, प्रेम और कोमलता का समंदर लहराता हो। (मैंने मुक्तिबोध या पाश को नहीं देखा था)। गोरख के व्यक्तित्व में कहीं कोई पेंच नहीं दिखता था। उन दिनों वह छत्तीस-सैंतीस के रहे होंगे, पर छल-प्रपंच और झूठ-मक्कारी के दांवपेंच से वह वैसे ही दूर थे, जैसे छोटे बच्चे होते हैं, जैसे फूल होते हैं, जैसे हरी-भरी वनस्पतियां, पानी से लबालब नदी या झरने होते हैं। एक पत्रकार के रूप में मैंने बड़े-बड़े धुरंधरों और बौद्धिक-महाबलियों, भूतपूर्व-अभूतपूर्व वामपंथी लेखक-बुद्धिजीवी भी इसमें शामिल हैं, को महत्वपूर्ण एसाइनमेंट, पद-शोहरत, धन-दौलत, बंगला या सुविधा के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचते देखा है। पर जुलाई, सन 79 से मार्च, सन 1986 तक जैसा मैने देखा, गोरख की पूरी निजी सम्पत्ति उनके बेड पर बिछे एक साधारण पुराने से गद्दे के नीचे बिखरी रहती थी। 

कहीं निकलना होता, कुछ खरीदना होता या किसी दोस्त या परिचित की जरूरत होती तो वह गद्दे के नीचे के अपने ‘एटीएम’ से कुछ हिस्सा निकाल लेते। उन्हें यूजीसी की फेलोशिप मिला करती थी। कल्पना कीजिए, वह कमरे से बाहर हैं और उनके किसी दोस्त-परिचित ने उनसे मदद मांगी तो वह फौरन उसे अपने कमरे में जाकर गद्दे के नीचे से मांगी गई राशि ले लेने को कहते। मुझे याद नहीं, उन्होंने किसी भी मित्र या परिचित से कभी दिए हुए रूपयों की मांग की हो। कभी-कभी उनकी अपनी ‘एटीएम मशीन’ भी खाली हो जाती थी, ऐसी स्थिति में वह अपने मित्रों से जरूरत के हिसाब से कुछ मुद्रा मांगने में कोई संकोच नहीं करते। उनका पूछने का अपना ही अंदाज होता, ‘मित्रवर, कुछ मुद्रा है क्या?’ इस तरह, वह सही अर्थों में निजी सम्पत्ति और रक्त-सम्बन्ध आधारित निजी परिवार के व्यामोह से मुक्त हो चुके थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के अपने गांव से उनका रिश्ता बहुत पहले खत्म हो चुका था। जहां तक मुझे लगता है, अपने पिता या घर के अन्य सदस्यों के मुकाबले वह अपनी एक बुआ से ज्यादा प्रभावित रहे होंगे। परिवार की बात हो तो उनका जिक्र वह जरूर करते थे। हालांकि परिवार का जिक्र वह यदाकदा ही करते थे, वह भी सिर्फ बहुत नजदीकी मित्रों के पूछने पर। बचपन में घर वालों ने उनकी शादी कर दी थी। पर वह रिश्ते में नहीं तब्दील हो पाई। जहां तक मुझे याद आ रहा है और जैसा पांडे जी से सुना था, उक्त महिला का बाद के दिनों में किसी बीमारी से निधन हो गया। निशात कैसर ने भी मुझे इसी आशय की जानकारी दी थी।

लेकिन दिल्ली, खासकर जेएनयू में प्रलेस-जलेस या सीपीआई-सीपीएम के छात्र-शिक्षक संगठनों से जुड़े कुछ लोग, पता नहीं क्यों गोरख जैसे निर्दोष किस्म के इंसान से भी बेवजह चिढ़ा करते थे। कुछेक तो उनके खिलाफ दुष्प्रचार-अभियान में जुटे रहते थे। कहा जाता है कि एक ने तो उनका उपहास उड़ाने के लिए कहानी तक लिख मारी। पर मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि ऐसे लोग गोरख को बिल्कुल नहीं जान सके। इसलिए ऐसे साहित्यकारों की कहानियों के काल्पनिक पात्रों में गोरख को खोजना फिजूल है। उन दिनों कई समकालीन लेखक, यहां तक कि जनवादी खेमे के भी, अक्सर उन्हें या उनकी रचनाओं को खारिज करते पाए जाते। वे मानते कि उनमें गुणवत्ता नहीं है। कभी कहते कि उनकी कविताओं-गीतों में स्वाभाविकता नहीं है, ‘अधकचरी या कल्पित क्रांति का बनावटी वर्णन’ है। इनमें कुछ लोग उनकी निजी जिन्दगी की कतिपय समस्याओं और उनके रहन-सहन का मजाक उड़ाते पाए जाते। कुल मिलाकर वे नहीं चाहते थे कि गोरख को किसी तरह की रचनात्मक या बौद्धिक प्रतिष्ठा मिले। लेकिन ऐसे साहित्यकारों को क्या मालूम था कि जेएनयू के होस्टल में रहने वाले उस फकीर-वामपंथी रचनाकार की रचनाएं बनारस से बरौनी, अररिया से आरा और कलकत्ता से कानपुर, लगभग संपूर्ण हिन्दी क्षेत्र के आम जनजीवन मे जगह बना रही हैं।
आज का जेएनयू

गोरख अपनी रचनाओं या अपनी साहित्यिक शख्सियत के प्रचार या शोहरत के लिए किसी तरह का तिकड़म या फॉर्मूला नहीं खोजते थे। वह आलोचकों को पटाने या प्रभावित करने की बात तो दूर रही, उनसे मिलने-जुलने जैसी सामान्य व्यावहारिकता से भी बहुत दूर रहने वाले इंसान थे। उनका होस्टल डा. नामवर सिंह के फ्लैट के बिल्कुल पास था पर मुझे नहीं मालूम, उनके यहां वह कभी गए होंगे या नहीं, गए होंगे तो कितनी बार गए होंगे! हां, आते-जाते नामवर जी आमने-सामने होते तो गोरख जी का उनसे दुआ-सलाम जरूर होता था। गोरख जी की दुनिया में उनके अपने लोग ही शामिल थे, वह जनता, जिसके लिए वह लिखते थे और उनके समानधर्मा राजनीतिक-साहित्यिक सोच के लोग। यहां गोरख जी के बारे में एक और बात बताना बहुत जरूरी है। वह कई मामलो में सचमुच अप्रतिम थे। आज के भारतीय समाज में जातिवादी-वर्णवादी या दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी तत्वों की बात कौन करे, महाबली-मार्क्सवादी आलोचकों, प्रगतिकामी-जनवादी लोगों के बीच भी जात-पात जैसी विकृति नीचे से ऊपर तक पसरी दिखती है, लेकिन गोरख के लिए सिर्फ एक ही जाति थी-मनुष्यता। 

इसमें सिर्फ वर्ग-विभाजन की स्थिति को वह मंजूर करते थे। भारत की खास वस्तुस्थिति में दलित-आदिवासियों और अन्य उत्पीड़ितों के खिलाफ सदियों से जारी शोषण-उत्पीड़न को भी वह एक असलियत मानते थे। इसीलिए वह समता और सामाजिक न्याय के पक्षधर थे। दिल्ली के मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, नरेला और कंझावला जैसे पास के गावों में भी वह आंदोलन, सभा या रैली के वक्त अपने राजनीतिक मित्रों के साथ आते-जाते रहते। मंच से अपनी कविताओं, खासकर भोजपुरी गीतों का पाठ करते और फिर आम गरीब लोगों के बीच घुल-मिलकर बातें करते। उनके साथ खाते-पीते और कार्यक्रम खत्म होने के बाद डीटीसी की भीड़ भरी बस में सवार होकर देर रात जेएनयू पहुंचते। बस में वह हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहते कि कोई उनका पैर न कुचले। गोरख की एक और खास बात, जो उन्हें अपने अन्य समकालीन रचनाकारों से अलग करती है। उन्हें अपनी किसी रचना पर मूर्धन्य आलोचकों या टिप्पणीकारों के लेखों या शाबासियों का कभी इंतजार नहीं रहता था। शहर के काफी हाउस या मंडी हाउस की तरफ, कोई जाना-माना आलोचक या बुद्धिजीवी अगर कभी उनकी प्रशंसा करता भी तो इसका उन पर बहुत ज्यादा असर मैंने कभी नहीं देखा। 

लेकिन मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, नरेला या दिल्ली के आसपास की किसी दलित, मजदूर बस्ती या ऐसी ही किसी जगह आयोजित किसान-सभा, रैली या किसी राजनीतिक कार्यक्रम में उन्हें कविता सुनाने या गीत गाने का मौका मिलता या उनकी अनुपस्थिति में उनके गीत गाये जाते तो उसकी सूचना मात्र पाकर वह चहक उठते थे। एक बार मैं पटना मे आयोजित एक बड़ी रैली में भाग लेकर दिल्ली लौटा था। उन्हें पहले ही मालूम हो चुका था कि वहां उनके और विजेंद्र अनिल के दो-तीन गीत सभा मंच से गाए गए। उन्होंने मिलते ही इस बारे में मुझसे पूछा और रैली का पूरा ब्योरा सुनकर अपनी खुशी जाहिर की।

कुछ समय साथ रहने की वजह से गोरख की अनेक कविताओं और भोजपुरी गीतों का पहला श्रोता होने का मुझे गौरव मिला। सिर्फ सुनने का ही नहीं, कई सार्वजनिक मौकों पर उनके भोजपुरी गीतों को गाने का भी। उनके भोजपुरी गीत दिल्ली, बिहार, बंगाल, यूपी, राजस्थान, पंजाब-हरियाणा आदि के दोस्तों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों को तो पसंद थे ही, दक्षिण के हमारे कई छात्र-साथी भी बार-बार सुनने की मांग करते थे। कई बार हमलोग पीएसओ की बैठकों के बाद होस्टल के कमरे में ही उनके गीतों का समवेत गायन करने लगते। जेएनयू की गोष्ठियों से लेकर ट्रेडयूनियन के सभा मंचों से भी हमने ‘गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले’ या ‘समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई’ के अनगिनत सस्वर पाठ किए होंगे। गोरख के भोजपुरी गीतों का पहला संकलन ‘हिरावल’ के संपादक-संचालक शिवमंगल सिद्धांतकर ने छापा। शिवमंगल जी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में हिन्दी पढ़ाते थे और जनवादी विचारधारा और आंदोलनों के प्रखर प्रवक्ता थे। सत्तर-पार बाद भी वह आज उसी तरह सक्रिय हैं। 

संभवतः वह पुस्तिका 78-79 में आई थी। दिल्ली ही नहीं, पूरे हिन्दी क्षेत्र में वह लोकप्रिय हुई। दूर-दूर से लोग इसकी मांग करते। हिन्दी के कई मठाधीशों, खासकर नकली-प्रगतिकामियों को गोरख के गीतों-कविताओं की बढ़ती लोकप्रियता कत्तई पाच्य नहीं थी। कइयों ने तो यहां तक कहना शुरू किया कि गोरख भोजपुरी में गाने लिखें, वह हिन्दी कविता में बेवजह टांग अड़ाते हैं। उनके पास आधुनिक प्रगतिशील कविता की न तो भाषा है, न संस्कार है। लेकिन गोरख जमे रहे। बाद में उनका पहला कविता संकलन भी आ गया-‘जागते रहो’। हिन्दी में उनकी कई कविताएं संपूर्ण हिन्दी क्षेत्र में पोस्टरों पर उतर आईं। जनता ने कवि और उसकी कविता को पहचाना। अभी कुछ ही दिनों पहले, मुजफ्फरनगर दंगे पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए जब मैने फेसबुक पर और ‘गुलेल डॉट कॉम’ के अपने कॉलम में गोरख की इस कविता को उद्धृत किया तो ‘द हिन्दू’ के (पूर्व) यशस्वी संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने दंगों के ‘राजनीतिक-खेल’ पर उसे बेहतरीन अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने स्वयं अपने फेसबुक टाइमलाइन पर भी उसे दर्ज किया। कविता यहां फिर प्रस्तुत है-
‘ इस बार दंगा बहुत बड़ा था
खूब हुई थी
खून की बारिश
अगले साल अच्छी होगी
फसल मतदान की।‘

गोरख की एक छोटी सी कविता मैं जब कभी उद्धृत करता हूं, कम शब्दों में बड़ी बात कहने की उनकी रचनात्मक-क्षमता पर लोग चकित होते हैं-

‘ वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद, पुलिस-फौज के बावजूद
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे।’

महत्वपूर्ण कथ्य को किस तरह बेहद सहज भाषा और अंदाज में पेश किया गया है! पांडे जी की यह अपनी खास शैली है। मुझे गोरख की रचना प्रक्रिया को भी नजदीक से देखने-समझने का मौका मिला। कई बार वह एक झटके में कोई कविता या गीत पूरा कर लेते थे। कई बार लंबे समय तक किसी एक कविता या गीत पर काम करते। बार-बार सुनाते और सुधारते भी। सुनने-सुनाने के नाम पर एक बार मैंने उनके साथ शरारत भी की थी। उन दिनों मैं यदा-कदा कविताएं भी लिखता था (उन दिनों हमारी उम्र और पृष्ठभूमि के ज्यादा युवक ऐसा करते थे)। पांडे जी को जब कभी अपनी कविताएं सुनाता, वह बहुत उत्साह नहीं दिखाते। एक बार तो उन्होंने बड़े निष्ठुर ढंग से कहा, ‘उर्मिलेश जी, बुनियादी तौर पर आप में राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लिखने-पढ़ने की क्षमता-संभावना ज्यादा प्रबल है। कविता की नहीं।’ उन दिनों मेरी कुछ कविताएं लघु पत्रिकाओं में छपी भी थीं। यदाकदा कविता लिखता रहता था। 

एक बार शरारत सूझी। एक दिन, तीन-चार छोटी-छोटी कविताएं उनके सामने पेश कीं। मैंने बताया कि बर्तोल्त ब्रेख्त की कुछ छोटी कविताओं का पिछले दिनों मैंने अनुवाद किया है। कविताएं कैसी हैं और अनुवाद कैसा है?  ब्रेख्त और नेरूदा पांडे जी के प्रिय कवि थे। उन्होंने कहा, पढ़कर सुनाइए। मैंने सुनाया। उन्होंने छूटते ही कहा, ‘मजा आ गया। आप अनुवाद अच्छा करते हैं।’। कमरे में एक-दो और मित्र थे, जिन्हें मालूम था कि उर्मिलेश आज पांडे जी के साथ कुछ मजाक करने वाला है। थोड़ी देर के बाद मैंने खुलासा किया, ‘पांडे जी, यह कविताएं मेरी हैं।’ पांडे जी थोड़ी देर के लिए झेंपे फिर मुस्कराते हुए बोले- ‘कॉमरेड, आप कभी-कभी अच्छी शरारत कर लेते हैं।‘ पांडे जी ने बुरा नहीं माना। इसे छोटे भाई की शरारत के तौर पर लिया। जबकि कई बार वह कुछेक क्षण के लिए बात-बात में ‘दुर्वासा’ भी हो जाया करते थे। मुझे नहीं लगता कि उनकी यह मनोदशा बहुत पहले से ऐसी रही होगी। संभवतः यह जेएनयू में बाद के दिनों में उभरी। इसके कुछ खास तरह के लक्षण थे। मसलन—कहीं चलते हुए उनके पैर से अगर आपका पैर छू गया, तो वह अचानक आग-बबूला हो जाया करते थे। डीटीसी की बसों में कई बार किसी अनजान व्यक्ति को भी वह कड़ाई से टोक देते थे। लेकिन हमेशा ही ऐसा करेंगे, ऐसा भी नहीं था। 

कई बार अनजाने में कोई छोटा बच्चा भी उनके पैर को हल्के से छू दे तो वह तिलमिला उठते थे। ऐसे हालात में कई बार मैंने उन्हें बेहद आक्रामक प्रतिक्रिया करते देखा। विकासपुरी इलाके में भोजन के बाद टहलते वक्त उन्होंने एक बार ऐसा कर दिया कि हम सब हतप्रभ रह गए। लेकिन हर समय वह ऐसा नहीं करते थे। निशात कैसर और मैं, कई बार उनकी इस समस्या पर आपस में बातचीत करते रहते थे। आईपीएफ (उन दिनों बना एक मोर्चा नुमा संगठन) और भाकपा (माले) के दिल्ली स्थित सदस्यों को भी गोरख जी की इन समस्याओं की थोड़ी-बहुत जानकारी जरूर थी। ऐसे भी बहुत मौके आए, जब वह बाद के दिनों में अपने नजदीकी मित्रों से कहा करते थे, ‘ दिस रीगन (उन दिनों के अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन) वांटेंड टू गेट मी किल्ड’, या ‘सीआईए मुझे खत्म कराना चाहती है। केजीबी भी लगी है--वो लोग कभी भी आ सकते हैं।’ कभी वह किसी भारतीय सत्ताधारी नेता या किसी अन्य विदेशी ताकत के बारे में भी इसी तरह की बातें किया करते थे। 

कैम्पस या मंडी हाउस या किसी अन्य स्थान पर भी वह अचानक सड़क चलते किसी हृष्ट-पुष्ट अनजान व्यक्ति की तरफ इशारा करके अपने किसी मित्र से कहते थे, ‘कॉमरेड, उसे आप देख रहे हैं न, ये लोग ‘उसी’ के भेजे हुए हैं। मुझ पर नजर रखी जा रही है।’ उन दिनों हम लोग छात्र थे और अपन जैसों के पास बहुत संपर्क या संसाधन भी नहीं थे। पर जहां तक मुझे याद आ रहा है कि मैंने, निशात कैसर ने या पीएसओ के अन्य कई मित्रों ने गोरख पांडे को अनेक बार समझाने की कोशिश की कि उन्हें यह सब नहीं सोचना चाहिए, यह सब उनकी परिकल्पना है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। पर वह मुस्करा कर रह जाते। बाद के दिनो में हममे कइयों ने भाकपा (माले)के नेताओं को इन सारी बातों की जानकारी दी और इसका सही ढंग से इलाज कराने का सुझाव दिया। शायद, उनमें कुछेक लोगों ने इस दिशा में कोशिश की होगी। मई, 1983 के बाद मैं कैम्पस से बाहर रहने लगा था। पांडे जी संभवतः 1984 में विकासपुरी के एक घर में, जहां संदीप पहले से रहते थे, कुछ दिनों के लिए रहने आए तो वहां फिर से हमारी नियमित मुलाकातें होने लगीं। उन दिनों उसी मुहल्ले में मैं सपरिवार रहने लगा था। 

अलग फ्लैट में रहने वाले संदीप भाकपा (माले) के युवा कार्यकर्ता थे। इससे पहले वह मेरे साथ पीएसओ की दिल्ली इकाई में काम कर चुके थे। मुझे नहीं मालूम कि पार्टी में वह किस स्तर के कार्यकर्ता थे। पर वह पूर्णकालिक हो चुके थे। पार्टी के तीन प्रमुख नेताओं प्रकाश, स्वपन मुखर्जी और बाद के दिनों में बृज बिहारी पांडे से उनकी अक्सर मुलाकात होती रहती थी। सभी उनका सम्मान करते थे। बृजबिहारी जी का रुख उन्हें लेकर काफी सहयोगपूर्ण और संवेदनशील था। जब भी मौका मिलता, वह गोरख के साथ  बैठते थे। उनकी रचनाओं से लेकर उनकी निजी समस्य़ाओं पर भी गौर करते थे। मुझे लगता है कि पार्टी की तरफ से ही गोरख जी के लिए कुछ दिनों विकासपुरी में व्यवस्था की गई होगी। पर उन दिनों भी उनकी मनोदशा में कोई बड़ा सुधार नहीं था। सात-आठ दिनों में एकाध बार शाम को वह मेरे कमरे पर जरूर आते थे और खीर खाने की फरमाइश करते। उन्हें मेरी पत्नी का बनाया भोजन, खासकर खीर बेहद पसंद था।

यह सही है कि गोरख की कुछ निजी समस्याएं और परेशानियां थीं, जो काफी समय से उनका पीछा कर रही थीं। जेएनयू में बाद के दिनों में वे बेहद जटिल और खतरनाक हो गईं। लेकिन निजी समस्याओं के बावजूद राजनीतिक-वैचारिक सोच के स्तर पर उनमें कोई उलझाव नहीं था। विचारों के क्षेत्र में उनका परिवार बहुत बड़ा था। साम्राज्यवादियों की साजिशों के चलते लैटिन अमेरिका, फिलीपीन्स या फिलीस्तीन में किसी जनयोद्धा या आम निर्दोष नागरिकों की जान जाती तो सचमुच वह अंदर से विलाप करते नजर आते, मानो उनके अपने परिवार, उनके अपने समाज पर हमला हुआ है। लेकिन संयोगवश गोरख के पास अपना कोई निजी परिवार नहीं था। एक निर्दयी समाज-व्यवस्था में निजी तौर पर वह परिवार-विहीन थे। मुझे बार-बार लगता था कि वह किसी मनपसंद स्त्री का प्रेम चाहते थे, जिसे वह जी भरकर प्रेम कर सकें। पर ऐसा अवसर उन्हें कभी नहीं मिला। यहां एक और सच का बयां करना जरूरी है। यह बात सही है कि एक समय गोरख जी जेएनयू की एक छात्रा को प्रेम करते थे, एकतरफा प्रेम। 

संभवतः वह पंजाब के किसी शहर से आई थी और समृद्ध परिवार से थी। जहां तक मुझे याद आ रहा है, वह झेलम होस्टल में ही रहती थी। शुरू में शायद उन्हें भ्रम था कि वह लड़की उन्हें पसंद करती है और एक न एक दिन उनके प्रेम का जवाब सकारात्मक प्रतिक्रिया के साथ देगी। पर ऐसा नहीं हुआ और न होना था। बाद के दिनों में उसे मालूम हो गया कि दर्शनशास्त्र में पीएच.डी. करने वाले पांडे जी उसे चाहने लगे हैं। पर वह इससे बिल्कुल प्रभावित नहीं थी। दिलचस्प बात है कि गोरख जी की उससे शायद ही कभी बात हुई हो। पर देखा-देखी अक्सर हो जाया करती थी। मेरा अनुमान है, पांडे जी या उसने एक दूसरे को कभी ‘हैलो’ भी नहीं किया होगा। एक दिलचस्प वाकया बताऊं। इससे पांडे जी के मासूम मानस को समझने मे मदद मिल सकती है। उन दिनों जेएनयू में छात्रसंघ के चुनाव के लिए प्रचार-अभियान जोरशोर से चल रहा था। पदाधिकारियों के पैनल में पीएसओ की तरफ से मैं इकलौता उम्मीदवार था। पीएसओ, जिसके पांडे जी भी एक सदस्य थे, ने आरएसएफआई (एसएफआई का विद्रोही गुट) और कुछ स्वतंत्र वामपंथी छात्र-समूहों के साथ मिलकर डीएसएफ नामक एक मोर्चा बनाया था। 

इस मोर्चे की तरफ से मैं छात्र-संघ के महासचिव पद के लिए चुनाव लड़ रहा था। अध्यक्ष पद के लिए राजन जी जेम्स और उपाध्यक्ष के लिए सीताराम सिंह (आरएसएफआई नेता) प्रत्याशी थे। डीएसएफ के दो संयोजक थे-हमारे संगठन पीएसओ की तरफ से निशात कैसर और स्वतंत्र वाम छात्र-समूह की तरफ से आर. दिवाकरन। निशात उन दिनों सेंटर फॉर सोशल सिस्टम में पीएच.डी. कर रहे थे, जबकि दिवाकरन सेंटर फॉर साइंस पॉलिसी में पीएच.डी. कर रहे थे। वह भी गुमड़ी राव और जैकब की तरह गोरख पांडे के मित्रों में थे। संभवतः यह सन 80 या 81 की बात है। गंगा-झेलम की लॉन में एक दिन पांडे जी ने मुझे अन्य प्रत्याशियों के साथ कुछ छात्र-छात्राओं से मिलते-जुलते देखा। वह शायद ढाबे पर चाय पी रहे थे। जब अगले दिन की सुबह उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने छूटते ही पूछा, ‘ बंधु, आप तो बड़े स्मार्ट हैं। लड़कियों से खूब बतियाते हैं। गुरु, आपको वोट ठीक-ठाक मिलेंगे।’ मैंने पूछा, ‘क्यों ऐसा कैसे लगा आपको’?  जवाब दिए बगैर उन्होंने अगला सवाल पूछा, ‘अच्छा, ये बताइए, ‘उन्होंने’ क्या कहा आपको’? यह ‘उन्होंने’ संबोधन उसी लड़की के लिए था, जिसे वह (एकतरफा) प्रेम करते थे। सचमुच, उस दिन हम लोगों की उस लड़की और उसके साथ की कई अन्य लड़कियों से झेलम-गंगा लान में मुलाकात हुई थी। 


हमारे साथ जेम्स, सीता और श्याम आदि भी थे। हम लोगों ने उन लड़कियों को समझाने की कोशिश की कि हमारा पैनल अतिवादी नहीं है, जैसा कि एसएफआई-एआईएसएफ वाले प्रचारित कर रहे हैं। लेकिन इसके अलावा किसी से कोई निजी बातचीत नहीं हुई। मैंने पांडे जी को साफ-साफ बता दिया कि हां, मेरी ‘उनसे’(उस लड़की से) बातचीत हुई। पर मुझे नहीं लगता कि वह हम लोगों को वोट देगी। शायद लड़कियों का वह ग्रुप ‘फ्रीथिंकर्स’(उन दिनों जेएनयू में सक्रिय एक छात्र-समूह, जो ‘अराजनीतिक या स्वतंत्र विचारों’ का होने का दावा करता था) को वोट देगा। फिर पांडे जी ने धीरे से पूछा, ‘उन्होंने आपसे मेरे बारे में तो कुछ नहीं पूछा’? उन दिनों हम बच्चे ही तो थे, ज्यादा समझ नहीं थी। पांडे जी के इस सवाल पर हम हंस भी सकते थे, उनका मजाक उड़ा सकते थे लेकिन उस वक्त पांडे जी को देखकर मैं रूआंसा हो गया। लगा मैं रो पड़ूंगा। पांडे जी के अंदर उस लड़की के लिए प्रेम का यह कितना कोमल और पवित्र भाव था! 

उसे लेकर कितनी धैर्यभरी उत्सुकता थी! पर यह सब बिल्कुल एकतरफा! वह बार-बार उस लड़की को ‘उन्होंने’ या उसके नाम में ‘जी’ जोड़कर संबोधित कर रहे थे। सम्मान से भरपूर थे उनके भाव। वैसे भी महिलाओं के प्रति मैंने उनमें हमेशा बहुत सम्मान भाव देखा। उक्त घटना के बाद मैंने उन्हें दो-तीन बार समझाने की कोशिश की कि उस लड़की की दुनिया अलग है। यह बात सही है कि वह बेहद संजीदा और समझदार लड़की लगती है। पर समृद्ध परिवार से आती है। उसके सोच और सपने अलग हैं। आपको कोई गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। पर वह मानने को कहां तैयार थे! मेरी तरह कुछ अन्य मित्रों, खासकर निशात ने भी उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की। पर बात नहीं बनी। वह अपने प्रेम के प्रति विश्वास से भरे हुए थे।

मैंने एक बार उनसे एक गंभीर बात, मजाकिया लहजे में कही, ‘पांडे जी, आपको अब ‘अरेंज मैरिज’ या आपसी सहमति से किसी समझदार लड़की से शादी कर लेनी चाहिए। अगर आप इजाजत दें तो मैं अपने इलाके के एक ऐसे परिवार से बात कर सकता हूं, जिसके घर की एक बेटी तीस-बत्तीस की उम्र की है। वह कुंवारी है और शायद किसी पढ़े-लिखे योग्य वर की तलाश में है। शायद, वह आप जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति के साथ शादी करना मंजूर कर ले। पर वह साधारण कस्बाई लड़की है, जिसे राजेश खन्ना की फिल्में देखना और कैरम खेलना बहुत पसंद है। वह मार्क्सवादी क्या राजनीतिक भी नहीं है।‘ मेरी बात सुनकर पांडे जी मुस्कराए। उन्होंने फिर गंभीरतापूर्वक कहा, ‘क्या बात करते हैं उर्मिलेश जी। ऐसे थोड़े होता है। प्रेम बहुत व्यक्तिगत मामला है।’ उनकी बात सही थी। मैंने तो समझौते का एक रास्ता भर सुझाया था। निशात भी कहा करते थे, ‘पंडित, अब हम तुम्हारी शादी रचा देंगे।’ उन दिनों निशात स्वयं भी अपेक्षाकृत अधिक उम्र में अपने से कुछ कम उम्र की एक पढ़ी-लिखी लड़की से मुहब्बत कर रहे थे। शायद, शादी की योजना थी। पर वह अपनी हर बात बहुत गोपनीय रखते थे। उस लड़की से हम लोगों का परिचय भी बहुत बाद में कराया।

मुझे लगता है, बहुत बुरे समय में जिन लोगों को पांडे जी के निजी परिवार का विकल्प बनना था या उनकी समस्याओं को सहानुभूतिपूर्वक संबोधित करना था, कहीं न कहीं उनसे कुछ चूक हुई या लगातार जटिलता की तरफ बढ़ती समस्याओं की अनदेखी हुई। अंततः ऐसी ही कुछ समस्याओं से जूझने में निजी तौर पर असमर्थ होते जाने और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य की परेशानियों के चलते उन्होंने अपने जीवन का अंत किया होगा। इस बारे में मैं ठोस तौर पर कुछ नहीं कह सकता। मैं तो सिर्फ अपने जेएनयू और दिल्ली के दिनों (जुलाई, 1979--मार्च 1986) तक ही गोरख के बारे में थोड़ी-बहुत बातें बता सकता हूं। अप्रैल, 1986 के पहले सप्ताह में ही मैं पटना चला गया था। नवभारत टाइम्स में पत्रकार बनकर। उसके बाद पांडे जी से संपर्क कट गया। ऐसा नहीं कि गोरख की निजी समस्याएं या स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ खास किस्म की मुश्किलें 78-86 के दौर में नहीं थीं।

तब भी वे थीं। पर उन दिनों जेएनयू में उनके इर्दगिर्द बहुत सारे समान सोच या पृष्ठभूमि के छात्र थे। उनमें निशात कैसर, जैकब, गुमड़ी राव, राजू, जे मनोहर राव, अशोक टंकशाला, ए चंद्रशेखर, कोदंड रामारेड्डी और मेरे अलावा तुलसी राम, राजेश राहुल, शशिभूषण उपाध्याय, मदन, उज्जवल आदि प्रमुख हैं। ऐसे लोगों के साथ राजनीतिक-सांस्कृतिक और निजी मसलों पर अक्सर चर्चाएं होती रहती थीं। पीएसओ के बाहर के भी कई छात्रों से उनकी खूब पटती थी। कैम्पस में उनके अनेक प्रशंसक और चाहने वाले थे। भाई-बहन संजय और सुजाता प्रसाद उनके भोजपुरी गीतों के भारी प्रशंसक थे। तुलसी राम उन दिनों पीएच.डी. कर रहे थे और भाकपा-लाइन के साथ थे, जबकि अजय कुमार समाजवादी सोच के। यह लोग भी उनकी रचनाओं के बड़े प्रशंसक थे। गोदावरी के पास वाले ढाबे के सामने की सीढ़ियों पर वह पीएसओ के साथियों के अलावा जिन अन्य लोगों के साथ बैठते थे, उनमें इस वक्त मुझे तुलसी राम, जैकब, गुमड़ी राव, नागेंद्र प्रताप, अजय कुमार और दिवाकरन आदि के नाम याद आ रहे हैं। लगातार संवाद, गंभीर विचार-मंथन, गपशप, हंसी-मजाक और सैर-सपाटे का सिलसिला चलता रहता था। 

मुझे नहीं मालूम, सन 85-86 के बाद पांडे जी को जेएनयू या बाद के दिनों में जहां भी वह रहे, कैसा माहौल मिला। उनके नजदीक कौन और कैसे लोग थे! मुझे गलत न समझा जाय, मैं किसी पर गैर-जिम्मेदार होने का आरोप नहीं लगा रहा हूं। इस संसार में हर इंसान को अपनी जिन्दगी का बचाव स्वयं भी करना होता है। लेकिन मन में उभरते कुछ प्रश्नों का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा हूं। क्यों नहीं, उन्हें बचाया जा सका? जिस समय उन्हें ज्यादा देखरेख, बेहतर चिकित्सा, प्रेम, करुणा और सकारात्मक माहौल की जरूरत थी, शायद वह उन्हें नहीं मिला? इनमें कुछ चीजें, मसलन, चिकित्सा उन्हें उपलब्ध कराई गई। पर शायद काफी देर हो गई थी। उनकी मनोदशा नहीं बदली जा सकी। मुझे बताया गया कि पांडे जी जब डाउन कैम्पस वाले अपने कक्ष में रहते थे और उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती तो देखरेख के लिए उनके कुछ साथी समय-समय पर उनके साथ भी रहे।
 
लंबे अंतराल के बाद, एक दिन वह बुरी खबर मिली। पांडे जी चले गए। बाद के दिनों में जब मैंने निशात से पूछा तो उन्होंने बताया कि डाऊन कैम्पस स्थित अपने कक्ष में उस दिन वह अकेले थे। पता नहीं, क्या मनोदशा रही होगी, जब उन्होंने अपने जीवन का अंत किया। इस आत्महत्या के कुछ दिनों बाद जेएनयू स्थित गंगा होस्टल में एक गोरख जी की स्मृति में एक सभा का आयोजन किया गया। जन संस्कृति मंच के उत्तरी क्षेत्र के तत्कालीन सचिव निशात कैसर ने अपने अनुभवों की रोशनी में वहां एक बड़ी बात कही, ‘हमें जरूर सोचना चाहिए कि एक समान वैचारिकता के बावजूद हम लोगों के बीच सामुदायिकता क्यों नहीं विकसित हो सकी है? इस तरह की सामुदायिकता होती तो क्या गोरख का अकेलापन इस कदर बढ़ा होता?  बीते एक-डेढ़ साल से वह जिस तरह लगातार अकेलेपन और भयानक त्रासदी की तरफ बढ़ते गए। ऐसे में यह सवाल बना रहेगा कि हमारी वैचारिकता आगे सामुदायिकता की तरफ क्यों नहीं बढ़ती!’ निशात की यह टिप्पणी गोरख की आत्महत्या की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों पर रोशनी डालती है।

आत्महत्या की खबर मिलते ही पटना में भी उनके पाठकों-श्रोताओं, राजनीति और विचार के स्तर पर उनसे जुड़े दोस्तों, प्रशंसकों और शुभचिंतकों में मातम सा छा गया। उस दिन पटना स्थित मेरे घर में खाना नहीं बना। बच्चों को कुछ भी नहीं बताया। वे रात में केला-दूध लेकर सो गए। हम दोनों देर तक गोरख जी के बारे में सोचते और बतियाते रहे-‘अगर ऐसा हुआ होता तो ऐसा नहीं होता’ या ‘उन्होंने वह बात मान ली होती तो ऐसा क्यों होता।’ अब बेमतलब हो चुकीं ऐसी बहुत सी बातें मेरे और मेरी पत्नी के दिमाग में उमड़ती-घुमड़ती रहीं। इस घटना के बाद कई पत्र-पत्रिकाओं की तरफ से मुझे उन पर कुछ लिखने को कहा गया। कइयों ने बार-बार जोर डाला। पर पता नहीं क्यों, मैं नहीं लिख सका। जैसे ही लिखने के वास्ते पुरानी चीजें याद करने की कोशिश करता, पांडे जी सामने आकर खड़े हो जाते, मुस्कराते हुए, ‘कॉमरेड, चलिए चाय पीते हैं।’ मैं कहता, ‘पान भी खिलाएंगे न।’ वह ‘हां’ में सिर हिलाते और हम दोनों कभी गंगा ढाबे, कभी गोदावरी के सामने वाले ढाबे या कभी कमल काम्प्लेक्स की तरफ चल पड़ते। ऐसे में संस्मरण क्या लिखता! अंत में उनकी छोटी सी एक कविता के साथ अपनी बात खत्म कर रहा हूः

‘ये आंख हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुंदर
इस दुनिया को
जितना जल्दी हो सके
बदल देना चाहिए।‘

(इस आलेख में कुछ खास अवसर, वर्ष और घटनाओं का उल्लेख याददाश्त के आधार पर किया गया है, उनमें कुछ मामूली हेरफेर हो सकता है। पर इससे संस्मरण के मूल अंतर्वस्तु पर असर नहीं पड़ता: लेखक)

09 नवंबर 2013

जेएनयू में नामवर सिंहः जैसा देखा, जैसा पाया

एक ‘अयोग्य छात्र’ के नोट्स

उर्मिलेश
(उर्मिलेश ने यह लेख मूलत: समयांतर के नए अंक में लिखा है। ब्लॉग पर शीर्षक और लेख, दोनों ही असंपादित तौर पर पाठकों से सामने हम रख रहे हैं। पहले लगा दो-तीन भागों में इसे ब्लॉग पर लगाया जाए, लेकिन आखिर में इतने लंबे लेख को एकसाथ ही ब्लॉग पर प्रकाशित करने की जुर्रत कर रहा हूं। पढ़ने वाले लंबा भी पढ़ लेंगे: मॉडरेटर)

पिछले दिनों एक किताब आई है-‘जेएनयू में नामवर सिंह।’ इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है। संपादन किया है- जेएनयू की पूर्व छात्रा सुमन केशरी ने, जो अब एक वरिष्ठ अधिकारी व कवयित्री हैं। किताब की योजना जब बन रही थी तो राजकमल प्रकाशन के संचालक अशोक माहेश्वरी और सुमन ने इस किताब के लिए मुझसे भी लेख मांगा। उस वक्त, मैं लिख नहीं सका। नामवर जी के संदर्भ में जेएनयू दिनों के अनुभवों को मैं लिखना तो चाहता था पर मुझे लगा, यह एक अभिनंदनात्मक ग्रंथ होगा और उसमें लेख देकर मैं अपने अनुभवों की प्रस्तुति के साथ शायद न्याय नहीं कर सकूंगा। हालांकि किताब छपकर आई तो मुझे अच्छा लगा कि सुमन का संचयन कुल मिलाकर ठीक-ठाक है, उसमें सिर्फ अभिनंदन ही नहीं है। 

निस्संदेह, डा. नामवर सिंह एक प्रभावशाली वक्ता और समकालीन हिन्दी समाज एवं उसकी सांस्कृतिक राजनीति में दबदबा रखने वाले प्रतिभाशाली बौद्धिक व्यक्तित्व हैं। वह समय-समय पर अपनी टिप्पणियों और फैसलों से विवाद भी पैदा करते रहते हैं। जैसे हाल ही में उन्होंने आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ टिप्पणी करके सबको स्तब्ध कर दिया। प्रगतिशील लेखक संघ की 75 वीं वर्षगांठ पर लखनऊ में आयोजित एक विशेष समारोह में 8 अक्तूबर, 2011 को उन्होंने कहा, ‘आरक्षण के चलते दलित तो हैसियतदार हो गए हैं लेकिन बाम्हन-ठाकुर के लड़कों की भीख मांगने की नौबत आ गई है।‘(दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, 9 और 10 अक्तूबर, 2011, लखनऊ  संस्करण)। अपने समय के एक बड़े ‘प्रगतिशील’ लेखक-आलोचक-शिक्षक की इस टिप्पणी पर समारोह में बैठे लेखक-प्रतिनिधि हैरत में रह गए। कइयों ने लिखकर इसका प्रतिवाद किया। (‘शुक्रवार’, 28 अक्तूबर-3 नवम्बर, 2011 अंक, दिल्ली)। 

पुस्तक में नामवर जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं को कमोबेश कवर किया गया है। पर कुछेक पहलू छूट गए हैं। उनके एक छात्र (अयोग्य ही सही)और हिन्दी का एक अदना सा पत्रकार होने के नाते मेरे मन में हमेशा एक सवाल कुलबुलाता रहा है, ‘नामवर सिंह ने इतने लंबे समय तक देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्षता की, उसका मार्गदर्शन किया, इसके बावजूद यह केंद्र (उनके कार्यकाल के दौर में)देश में भारतीय भाषाओं के साहित्य व भाषा के अध्ययन-अध्यापन और शोध क्षेत्र में कोई वैसा बड़ा योगदान क्यों नहीं कर सका, जिसकी इससे अपेक्षा की गई थी! 

अपने लंबे कार्यकाल के बावजूद वह इसे सही अर्थों में भारतीय भाषाओं का केंद्र क्यों नहीं बना सके?’ चूंकि इस विषय पर मेरा कोई विशद अध्ययन और शोध नहीं है, इसलिए सवाल का कोई ठोस जवाब भी नहीं दे सकता। लेकिन केंद्र के छात्र के तौर पर तकरीबन चार-सवा चार साल जेएनयू में रहने का मौका मिला, उसके नाते यहां सिर्फ अपने कुछ अनुभव बांट सकता हूं।
नामवर सिंह

आज इस लेख के जरिए मैं जेएनयू में अपने जीवन के भी सबसे अहम और निर्णायक समय को याद कर रहा हूं। लेकिन यह कोई मेरी निजी कहानी नहीं है। भारत के शैक्षणिक जगत, खासकर उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी असंख्य कहानियां भरी पड़ी हैं। मेरे विश्लेषण से किसी को असहमति हो सकती है पर तथ्यों और उससे जुड़े घटनाक्रमों से नहीं। यह सिर्फ मेरा, नामवर जी या जेएनयू के ‘प्रगतिकामी’ हिन्दी प्राध्यापकों-प्रोफेसरों का ही सच नहीं है, संपूर्ण हिन्दी क्षेत्र में व्याप्त बड़े बौद्धिक सांस्कृतिक संकट, कथनी-करनी के भेद, हमारे शैक्षणिक जीवन, खासकर विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के हिन्दी विभागों की बौद्धिक-वैचारिक दरिद्रता का भी सच है। कुछेक को मेरी यह टिप्पणी गैर-जरूरी या अप्रिय भी लग सकती है। ऐसे लोगों से मैं क्षमाप्रार्थी हूं। पर मुझे लगा, हिन्दी विभागों, हिन्दी विद्वानों और हम जैसे छात्रों का यह सच सामने आना चाहिए।

शुरुआत जेएनयू में अपने एडमिशन से करता हूं। बात सन 1978 की है। मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए(अंतिम वर्ष) की परीक्षा दी। प्रथम वर्ष में प्रथम श्रेणी के नंबर थे। फाइनल में भी प्रथम श्रेणी आने की उम्मीद तो थी पर अपनी पोजिशन को लेकर आश्वस्त नहीं था। अपने विश्वविद्यालय में उन दिनों पीएच.डी. के लिए सिर्फ एक ही यूजीसी फेलोशिप थी। पहली पोजिशन वाले को ही फेलोशिप मिल सकती थी। डा. रघुवंश के रिटायर होने के बाद विभाग में डा. जगदीश गुप्त का ‘राज’ चल रहा था। वह मुझे पसंद नहीं करते थे। शायद मेरी दो बातें उन्हें नागवार गुजरती रही हों-एक, विश्वविद्यालय की वामपंथी छात्र-राजनीति में मेरी सक्रियता और दूसरी, डा. रघुवंश और दूधनाथ सिंह आदि जैसे शिक्षकों से मेरी बौद्धिक-वैचारिक निकटता। 

फेलोशिप के बगैर पीएच.डी. करना मेरे लिए बिल्कुल संभव नहीं था। मेरी पारिवारिक स्थिति बहुत खराब थी। ऐसे में मित्रों ने सलाह दी कि इलाहाबाद के अलावा मुझे जेएनयू में भी एडमिशन की कोशिश करनी चाहिए। वहां फेलोशिप भी ज्यादा हैं,  इसलिए एडमिशन मिल गया तो फेलोशिप पाने की संभावना भी ज्यादा रहेगी। मित्रों की सलाह पर जेएनयू में एडमिशन के लिए ‘आल इंडिया टेस्ट’ में बैठा। रिजल्ट आया तो पता चला, मैंने सन 1978 बैच में टाप किया है। यूजीसी फेलोशिप मिलना तय। लेकिन अभी तक एमए अंतिम वर्ष का मेरा रिजल्ट नहीं आया था। 

सन 1975-77 के दौर में इमर्जेन्सी-विरोधी आंदोलनों का हमारे कैम्पस पर भी प्रभाव पड़ा था। परीक्षाएं विलम्ब से हुई थीं, इसलिए रिजल्ट में भी देरी हो रही थी। जेएनयू प्रवेश परीक्षा नियमावली के तहत एमए फाइनल का रिजल्ट आए बगैर भी कोई अभ्यर्थी प्रवेश पा सकता था। लेकिन एडमिशन के बाद एक निश्चित अवधि के अंदर उसे अपना रिजल्ट जमा करना होता था। जेएनयू में एम.फिल. की पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई। मेरे नाम यूजीसी की फेलोशिप भी घोषित हो चुकी थी। भारतीय भाषा केंद्र के उस बैच में जिन अन्य लोगों को फेलोशिप मिली, उनमें रवि श्रीवास्तव, अरुण प्रकाश मिश्र आदि प्रमुख थे। यह सभी मित्र आज किसी न किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष हैं।

दर्शनशास्त्र में शोध कर रहे गोरख पांडे का कमरा(संभवतः 356, झेलम होस्टल) मेरा पहला पड़ाव बना। अभी होस्टल नहीं मिला था। वह जितने तेजस्वी दार्शनिक थे, उतने ही सृजनशील कवि और गीतकार थे। फकीराना ढंग से रहते थे। किसी बात की परवाह नहीं करते थे। पूरे जेएनयू में अपने किस्म के अकेले छात्र थे, बिल्कुल फकीर-वामपंथी। उनकी सारी ‘प्राइवेट-प्रापर्टी’ छोटे से तख्त पर बिछे मैले गद्दे के नीचे फैली रहती थी। चाय पीने या कहीं बाहर जाना होता था तो वह गद्दा हटाते और तख्त पर बिखरे रूपयों में कुछ रकम निकाल कर चल देते थे। पांडे जी के जरिए ही जेएनयू स्थित रेडिकल स्टूडेंड्स सेंटर(आरएससी) के छात्रों-कार्यकर्ताओं से परिचय हुआ। आरएससी एक ढीला-ढाला संगठन था, उसमे कार्यकर्ता कम, बुद्दिजीवी ज्यादा थे। पर काफी पढ़े लिखे थे। 

उनके कमरों में मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, चे और कास्ट्रो के अलावा क्रिस्टोफर काडवेल, रेमंड विलियम्स, राल फाक्स, गुन्नार मिरडल, ज्यां पाल सात्र, सिमोन, राल्फ मिलीबैंड, समीर अमीन, रजनी पामदत्त, रोमिला थाफर और इरफान हबीब आदि की किताबें भरी रहती थीं। इनमें कुछ हमारे सीनियर थे और कुछ समकक्ष। जल्दी  ही इनसे मैत्री हो गई। इनमें ज्यादातर को मेरे बारे में मालूम था कि इलाहाबाद में मैं एसएफआई से और बाद के दिनों में पीएसए नामक स्वतंत्र किस्म के वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा था। बाद के दिनों में यही पीएसए प्रगतिशील छात्र संगठन(पीएसओ) बना। इलाहाबाद के अलावा जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय में भी यह सक्रिय रहा। पीएसओ से मेरी सम्बद्धता के बावजूद जेएनयू स्थित एसएफआई के दो-तीन नेताओं से मेरा सम्बन्धी अपेक्षाकृत ठीकठाक था। 

इनमें प्रवीर पुरकायस्थ प्रमुख थे। वह अपने इलाहाबाद के ‘सीनियर’ थे। अपना कमरा मिलने के बाद मैं गोरख के झेलम वाले कमरे से ब्रह्मपुत्र(पूर्वांचल) होस्टल चला गया। लेकिन मुलाकात हमेशा होती रहती थीं। कैम्पस में वह मेरे लिए एक बड़े भाई की तरह थे। पर उनकी कुछ समस्याएं भी थीं। निशात कैसर उनके समकक्ष और मैं बहुत जूनियर था। पर कैंपस में सिर्फ हम दोनों ही किसी बात पर उन्हें डांट-फटकार सकते थे। अनेक मौकों पर वह हमारी बात मान भी जाते थे।

केंद्र में एमफिल कक्षाओं और सेमिनार पेपर आदि का दौर शुरू हो चुका था। डा. नामवर सिंह को केंद्र का चेयरमैन पाकर हम जैसे दूर-दराज से आए छात्र गौरवान्वित महसूस करते थे। उन्हें पहले भी(इलाहाबाद और बनारस में) देखा-सुना था। पर यहां तो वह साक्षात् हमारे प्रोफेसर के रूप में सामने थे। निस्संदेह, वह बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। साहित्यिक आलोचना और साहित्येतिहास जैसे विषयों पर उन्हें सुनना एक अनुभव था। इलाहाबाद में मेरे लिए सबसे आदरणीय अध्यापक डा. रघुवंश थे और सबसे अच्छे व दोस्ताना अध्यापक दूधनाथ सिंह। मेरी नजर में पहला एक आदर्शवादी-मानववादी था तो दूसरा सृजनशील यथार्थवादी। पर जेएनयू में डा. नामवर सिंह को सुनने के बाद लगा कि हिन्दी और साहित्येतिहास के मामले में वह ज्ञान के सागर हैं। यूरोपीय साहित्य आदि की भी उनकी जानकारी बहुत पुख्ता है। पर उनके व्यक्तित्व का एक पहलू मुझे बहुत परेशान करता था। वह रहन-सहन और आचरण-व्यवहार में किसी सामंत(फ्यूडल) की तरह नजर आते थे। 

केंद्र के कुछेक छात्र उनका पैर छूते थे। कुछ छात्र तो उनके घर के रोजमर्रे के कामकाज में जुटे रहते थे। वह जब चलते, कुछ छात्र और नए शिक्षक उनके पीछे-पीछे चलने लगते। कुछ लोग उनकी बिगड़ी चीजें बनवाने में लगते तो कुछेक ऐसे भी थे, जो नियमित रूप से कैम्पस स्थित उनके फ्लैट जाकर गुरुवर का आशीर्वाद ले आया करते थे। हमारे एक मित्र सुरेश शर्मा ने तो बाकायदा लेख  लिखकर बताया है कि नामवर जी  की एक खास घड़ी जब खराब हुई तो उसे बनवाने में उन्होंने दिल्ली की खाक छान मारी पर नामवर जी ने सुयोग्य होने के बावजूद जामिया सहित कई जगहों पर हुई नियुक्तियों में उनकी कोई मदद नहीं की। उनसे काफी जूनियर और योग्यता में नीचे के लोगों की नियुक्तियां करा दीं(अभी कुछ ही दिनों पहले पता चला कि उक्त लेख के छपने के कुछ समय बाद सुरेश जी (इस समय उनकी उम्र 57-58 से कम नहीं होगी) वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो गए। संयोगवश, नामवर जी ही विश्वविद्यालय के चांसलर हैं। अगर उनकी पहल पर सुरेश जी नियुक्त हुए तो इसे ‘गुरुवर’ का प्रशंसनीय प्रायश्चित कहा जा सकता है। लेकिन विश्वविद्यालय के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक उनकी नियुक्ति की पहल कुलपति वीएन राय की ओर से हुई।

अपने नामवर जी की तरह इलाहाबाद के डा. रघुवंश ‘मार्क्सवादी’ नहीं, पर छात्रों-शिक्षकों के प्रति नजरिए में वह ज्यादा सहज और लोकतांत्रिक थे। दूधनाथ सिंह तो खैर वामपंथी रहे हैं। दिल्ली के नामीगिरामी मार्क्सवादी(हिन्दी) आलोचकों-शिक्षकों के मुकाबले निजी और प्रोफेशनल जीवन में वह भी ज्यादा सुसंगत और लोकतांत्रिक नजर आते थे। मुझे आज भी याद है। उन दिनों मेरा एक छोटा सा सर्जिकल-आपरेशन हुआ था और मैं डायमंड जुबिली होस्टल के कमरा नंबर 38 में लेटा रहता था। एक दिन अचानक देखा, दूधनाथ और डा. मालती तिवारी मुझे देखने मेरे कमरे में आ गए।

ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं था, दूसरे छात्रों के साथ भी रघुवंश, दूथनाथ या मालती तिवारी जैसे शिक्षकों का व्यवहार आमतौर पर ज्यादा मानवीय और उदार था। कम से कम वे ‘साइकोफैंसी’ को रिश्तों का आधार नहीं बनाते थे। मेरा उनसे विधिवत परिचय एमए प्रथम वर्ष के परीक्षाफल आने के बाद ही हुआ। इसके पहले वह मुझे ठीक से जानते भी नहीं थे। प्रथम वर्ष में जो पेपर वह पढ़ाते थे, उसमें मुझे सर्वोच्च अंक मिले थे। फिर उनसे क्लास के बाहर भी संवाद का सिलसिला बन गया। पर जेएनयू के जनवादी माहौल के बावजूद मुझे कम से कम भारतीय भाषा केंद्र में इस तरह के माहौल का अभाव दिखा।

नामवर जी अपने कुछ ‘खास शिष्यों’ से ही ज्यादा संवाद करते थे। ऐसे लोगों ने गुरुदेव की सेवा का मेवा खूब खाया। इनमें कुछ नामी विश्वविद्यालयों-संस्थानों में हैं तो कुछेक सरकारी सेवा में भी। लेकिन हमारे सीनियर्स में कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें प्रतिभाशाली माना जाता था, पर गुरूदेव का शायद उन्हें उतना समर्थन-सहयोग नहीं मिला। इनमें एक, मनमोहन को रोहतक में अध्यापकी से संतोष करना करना पड़ा। उदय प्रकाश ने कुछ समय पूर्वोत्तर में अध्यापकी की, फिर दिल्ली लौट आए। स्वतंत्र लेखन, पत्रकारिता और फिल्मनिर्माण के जरिए उन्होंने हिन्दी रचना जगत में अपनी खास पहचान बनाई। सुभाष यादव को बिहार के किसी कालेज में जगह मिली। 

राजेंद्र शर्मा माकपा के अखबार ‘लोकलहर’ के संपादकीय विभाग से जुड़ गए। सुरेश शर्मा ने मेरी तरह पत्रकारिता का रास्ता चुना। विजय चौधरी सृजनशील थे और एक समय नामवर जी के करीबी भी पर बाद में पता नहीं क्या हुआ?  जेएनयू से बाहर आकर वह वृत्तचित्र निर्माण से जुड़े। चमनलाल को भी जेएनयू आने के लिए बरसों इंतजार करना पड़ा। संभवतः वह नामवर जी के निष्प्रभावी होने के बाद ही जेएनयू में नियुक्ति पा सके। लंबे समय तक वह पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में पढ़ाते रहे। शुरुआती दिनों में उन्होंने बैंक की नौकरी और फिर जनसत्ता की उप संपादकी की। हमारे समकालीन या बाद के छात्रों में जो केंद्र में समझदार या संभावनाशील समझे जाते थे, उनमें कुलदीप कुमार, नागेश्वर यादव, मदन राय, जगदीश्वर चतुर्वेदी, संजय चौहान, सुधीर रंजन, अजय ब्रह्मात्मज जैसे कई लोग थे। पर इनमें ज्यादातर शायद गुरुदेव को पसंद नहीं थे।

भारतीय भाषा केंद्र में हमारे दूसरे प्रतिभाशाली अध्यापक थे-डा. मैनेजर पांडे। क्लासरूम में ‘चिचिया’ कर पढ़ाने के उनके अंदाज का हम लोग खूब मजा लेते थे। अपने लेखन और अध्यापन के लिए वह मेहनत करते थे। डा. केदारनाथ सिंह काव्य साहित्य ठीकठाक पढ़ाते थे। नामवर जी उन्हें पूर्वी उत्तरप्रदेश के पडरौना के एक डिग्री कालेज से सीधे जेएनयू ले आए थे। दोनों सिंह-बंधु बाद में समधी बने। हमारी एक अध्यापिका थीं-डा. सावित्री चंद्र शोभा। वह नामवर सिंह की अध्यक्षता वाले भारतीय भाषा केंद्र की वाकई शोभा थीं। देश के हिन्दी विभागों के चेहरे का वह प्रतिनिधित्व करती थीं। अगर आपका रसूख वाले लोगों से संपर्क है तो रचनात्मकता, समझ और ज्ञान के बगैर हिन्दी विभागों में नियुक्त होना कितना आसान है, शोभा जी इसका साक्षात उदाहरण थीं। जेएनयू में सभी बताते थे कि शोभा जी को नामवर सिंह ने ही नियुक्त कराया। उनके पति जाने-माने इतिहासकार और यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन डा. सतीश चंद्र के नामवर पर कई तरह के एहसान थे। स्वयं नामवर जी ने इस बारे में अपने एक इंटरव्यू में आधा-अधूरा इसका खुलासा किया है—“ मुझे ठीक से याद नहीं है, हिन्दी की नियुक्ति(शोभा जी और सुधेश जी की) मेरे सेंटर में आने के बाद हुई थी या फिर मैं विशेषज्ञ के रूप में आया था। क्योंकि जो चयन समिति हुई थी, संभवतः मेरे मेरे आने के बाद हुई थी क्योंकि डा. नगेंद्र विशेषज्ञ थे, एक विशेषज्ञ देवेंद्र नाथ शर्मा थे और मैं अध्यक्ष था। 

रीडर और लेक्चरर की दो नियुक्तियां हुईं, जिसमें सुधेश जी और शोभा जी आए।--------शोभा जी चूंकि यूजीसी चेयरमैन की पत्नी थीं तो लगभग तय सा था---विनय राय से मैंने कहा कि भाई, मुसीबत में फंस गया हूं। उन्होंने कहा, यूजीसी रूपया देती है, चेयरमैन की बीवी को नहीं रखेंगे तो किसको रखेंगे? किसी तरह निभाइए---बीएम चिंतामणि के पिता जी और हमारे नागचौधरी साहब के पिता जी मित्र थे, पारिवारिक सम्बन्ध थे। इस नाते नागचौधरी जी(जेएनयू के तत्कालीन कुलपति) ने मुझे बुलाकर चिंतामणि जी को टेम्पोरेरी रखने की बात की। द्विवेदी जी के नाते भी चिंतामणि जी को मैंने ले लिया।”(जेएनयू में नामवर सिंहः संपादक-सुमन केशरी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 26-27 और 31)।

जिन लोगों ने उस दौर में जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में अध्ययन-अध्यापन किया या विभाग के बारे में जिनकी तनिक भी जानकारी है, वे आज भी बता सकते हैं कि चिंतामणि जी और शोभा जी की कक्षाओं में जाना या अध्ययन से जुड़े किसी विषय पर उनसे बातचीत करना किस तरह एक दुर्दांत-दुष्कर यात्रा करने जैसा था।----इस तरह नामवर जी ने जेएनयू जैसे एकेडेमिक एक्सलेंस वाले संस्थान में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की आधारशिला रखी। हां, मैनेजर पांडे के आने के बाद हालात जरूर बदले। वह योग्य-समर्थ शिक्षक साबित हुए। जब मैने एडमिशन लिया तो हिन्दी में नामवर जी, पांडे जी और केदार जी ही केंद्र के तीन स्तम्भ थे। नामवर जी के सुयोग्य-संरक्षण में शोभा-चिंतामणि जी जैसी नियुक्तियां आखिरी नहीं साबित हुईं। डीयू, जेएनयू, जामिया और इग्नू सहित भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में अगर आज शोभा-चिंतामणि जी जैसी प्रतिभाएं हिन्दी विभागों की शोभा बढ़ा रही हैं तो इसमें हिन्दी के अन्य करतबी मठाधीशों के साथ अपने आदरणीय गुरुदेव का भी कम योगदान नहीं है।

जेएनयू में मेरा सब कुछ ठीक चल रहा था। शुरुआती झिझक के बाद मुझे अच्छा लगने लगा। वहां का माहौल, समृद्ध पुस्तकालय, सीनियर छात्रों की बौद्धिक तेजस्विता, बहस-मुबाहिसे का उच्च स्तर, बड़े कुलीन या उच्च मध्यवर्गीय घरों से आए सोशस साइसेंज या इंटरनेशनल स्टडीज के प्रतिभाशाली लड़के-लड़कियों के बीच पिछड़े इलाकों से आए दलित व पिछड़े वर्ग के अपेक्षाकृत अभावग्रस्त जीवन के आदी रहे प्रखर छात्रों की अच्छी-खासी संख्या, अपेक्षाकृत सहिष्णु माहौल, सस्ता बढ़िया खाना, सात या बारह रूपए में महीने भर का डीटीसी की बसों का रियायती पास, हर रोज तीनमूर्ति होते हुए सप्रू हाउस (मंडी हाउस)जाने वाली जेएनयू की मुफ्त बससेवा, झेलम लान और गोदावरी के पास वाले टी-स्टाल की शामें, रात को होने वाली छात्र-सभाएं, संगोष्ठियां और बहस-मुबाहिसे, सबकुछ मुझे अच्छा लगने लगा। अलग-अलग होस्टल में होने के बावजूद पांडे जी, निशात कैसर, चमनलाल, मदन राय, आनंद कुशवाहा, कोदंड रामा रेड्डी, अशोक टंकशाला, वी मोहन रेड्डी, जे मनोहर राव, डी रविकांत और ए चंद्रशेखर जैसे समान सोच के मित्रों से अक्सर ही मुलाकात होती रहती थी। थोड़ी-बहुत छात्र-राजनीति की गतिविधियां भी शुरू हो गईं।

हमारे केंद्र में पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई थी। एम फिल के शुरुआती दिनों में कक्षाएं भी चलती हैं। फिर सभी छात्र सेमिनार पेपर-टर्म पेपर की तैयारी में जुट जाते हैं और अंत में डिसर्टेशन पर काम शुरू करते हैं। मैं नामवर जी, केदार जी और पांडे जी की कक्षाएं या सेमिनार आदि कभी नहीं छोड़ता था। लेकिन नामवर जी के मुकाबले पांडे जी से मेरी निकटता बढ़ रही थी। डा. शोभा की क्लास में जाना और लगातार बैठे रहना दर्द के दरिया से गुजरने जैसा था। एक दिन मैं किसी क्लास से निकलकर जा रहा था कि चेयरमैन आफिस के एक क्लर्क ने आकर कहा कि डा. नामवर सिंह आपको चैम्बर में बुला रहे हैं। मैं अंदर दाखिल हुआ तो देखा कि नामवर जी के साथ केदार जी भी वहां बैठे हुए हैं। नामवर जी ने बड़े प्यार से बैठने को कहा। पहले थोड़ी बहुत भूमिका बांधी, ‘ आप तो स्वयं वामपंथी हो और यह जानते हैं कि आप और हमारे जैसे लोगों के लिए जाति-बिरादरी के कोई मायने नहीं होते। पर भारतीय समाज में सब किसी न किसी जाति में पैदा हुए हैं। आप तो ठाकुर हो न?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ एक शब्द का मेरा जवाब सुनकर नामवर जी और केदार जी शांत नहीं हुए। अगला सवाल था, ‘फिर क्या जाति है आपकी, हम यूं ही पूछे रहे हैं, इसका कोई मतलब नहीं है।’ 

मैंने कहा, मैं एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुआ हूं। पर दोनों को इससे संतोष नहीं हुआ तो मुझे अंततः अपने किसान परिवार की जाति बतानी पड़ी। आखिर गुरुओं को कब तक चकमा देता! जाति-पड़ताल में सफल होने के बाद नामवर जी ने कहा, ‘ अच्छा, अच्छा, कोई बात नहीं। जाइए, अपना काम करिए।’ बीच में केदार जी ने भी कुछ कहा, जो इस वक्त वह मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा है। ऐसा लगा कि दोनों गुरुदेवों का जिज्ञासु मन शांत हो चुका है। इस घटनाक्रम से मैं स्तब्ध था। जेएनयू में अब तक किसी ने भी मेरी जाति नहीं पूछी थी। अपने बचपन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में लोगों को किसी अपरिचित से उसका नाम, गांव और जाति आदि पूछते देखा-सुना था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरी जाति पूछकर या जानकारी लेकर किसी को क्या मिल जाएगा या उसका कोई क्या उपयोग कर सकेगा? मैं चकित था कि जेएनयू के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों की अचानक मेरी जाति जानने में ऐसी क्या दिलचस्पी हो गई!

मैं इस वाकये को भुलाने की कोशिश करता रहा। दूसरे या तीसरे दिन गोरख पांडे से जिक्र किया तो किसी विस्मय के बगैर उन्होंने कहा, ‘अरे भाई, इसे लेकर आप इतना परेशान क्यों हैं?  नामवर जी को लेकर कोई भ्रम मत पालिए। वह ऐसे ही हैं।‘ पर मुझे लगा----और आज भी लगता है कि नामवर जी निजी स्वार्थवादी और गुटबाज ज्यादा हैं। जहां तक जाति-निरपेक्षता का सवाल है, हिन्दी क्षेत्र के अनेक ‘प्रगतिकामियों’ की तरह उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाय! पिछले दिनों, लखनऊ और दिल्ली में उन्होंने दलित-पिछड़ा आरक्षण के खिलाफ जिस तरह की टिप्पणियां कीं, उससे भी उनके मिजाज का खुलासा होता है। लेकिन जेएनयू में एआईएसएफ वाले उन्हें अपना ‘फ्रेंड-फिलास्फर-गाइड’ मानते थे। जेएनयू की छात्र-राजनीति में एआईएसएफ वालों की हालत आज बहुत पतली है। एक छात्र के तौर पर मैं नामवर जी को जितना समझ पाया, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उन्हें दो तरह के लोग पसंद हैं—वे, जो किसी विचार के हों या न हों, उनके चाटुकार हों, उनका निजी कामकाज कर दें और जरूरी चीजें लाते रहें और दूसरे, वे जो कुछ पढ़े-लिखे हों, जो उनका गुणगान करें या उनके बौद्धिक-साहित्यिक प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ अपने लेखन या संगोष्ठी-सेमिनार आदि में तलवारें भांज सकें। 

चूंकि, मैं उनके ‘गुट’ का कभी हिस्सा नहीं था और इन दोनों श्रेणिय़ों में फिट नहीं बैठता था, इसलिए शायद उन्होंने मेरी जाति जानने में दिलचस्पी दिखाई होगी। वह स्वयं भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही तो हैं, जहां गांव-कस्बों में किसी की जाति पूछना सामान्य सी बात मानी जाती रही है। अगर नामवर जी सिर्फ भाकपावादी होते तो प्रतिबद्ध और ईमानदार भाकपाई और समर्थ कवि डा. रामकृष्ण पांडे को जेएनयू में लेक्चरशिप मिल जानी चाहिए थी। पर पांडे जी को वहां नौकरी नहीं मिली, उन्होंने ताउम्र न्यूज एजेंसी ‘वार्ता’ में डेस्क पर काम किया और असमय ही दिवंगत हो गए। कई अन्य छात्र, जो एआईएसएफ से सम्बद्ध थे, ठीकठाक होने के बावजूद जेएनयू में नौकरी नहीं पा सके। सिर्फ उन्हीं भाकपाई-छात्रों को उन्होंने दिल्ली या बाहर के विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में नौकरियां दिलवाईं, जो थोड़े-बहुत प्रभावशाली या उनके किसी काम के थे या फिर ‘चंगू-मंगू’ की तरह उनके आगे-पीछे लगे रहते थे। 

केंद्र की ‘एडमिशन-लिस्ट’ देखकर भी उनकी पसंद को समझा जा सकता है। एक उदाहरण देखिए, सन 1980 की एम फिल एडमिशन-लिस्ट में पहली से पाचवीं पोजिशन पर एक से बढ़कर एक आए। पर कुलदीप कुमार को कुल 20 छात्रों की सूची में 14वीं पोजिशन पर रखा गया ताकि उन्हें फेलोशिप कभी न मिल सके। वह सृजनशील थे। अंततः उन्हें जेएनयू छोड़कर जाना पड़ा। कई साल वह जर्मन रेडियो मे रहे। अब वह ‘द हिन्दू’ सहित देश के कई प्रमुख अखबारों में सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर स्तम्भ लिखते हैं।

यह बताना यहां जरूरी है कि मैंने अपना लेखन ‘उर्मिलेश’ नाम से शुरू किया पर स्कूल रजिस्टर में मेरा नाम ‘उर्मिलेश सिंह’ था, जो विश्वविद्यालय के समय तक हर आधिकारिक रिकार्ड में बना रहा। मेरे पासपोर्ट में भी यही नाम रहा है। पर मुझे विश्वविद्यालय या बाहर, हर कोई उर्मिलेश नाम से ही पुकारता रहा है, कोई उर्मिलेश सिंह या मिस्टर सिंह नहीं कहता रहा है। सरनेम के तौर पर यह ‘सिंह’ मेरे नाम के साथ कैसे आ चिपका, इसकी भी एक कहानी है। गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिले के वक्त पिता जी मुझे स्कूल लेकर गए थे। वह अद्भुत व्यक्ति थे, गरीब, निरक्षर पर ज्ञानवान। स्कूल के हेडमास्टर संभवतः उन दिनों ताड़ीघाट के पास के गांव मेदिनीपुर के मिसिर जी थे। वह हमारे गांव के पिछड़े समुदाय के लोगों से बहुत चिढ़ते थे। कहा भी करते थे, ‘अबे, अहीर-गड़ेरी पढ़ाई करके क्या करेंगे, जाकर भैंस, गाय, भेड़ चराएं!’ लेकिन गरीब किसान होने के बावजूद मेरे पिता और मेरे परिवार की आसपास के इलाके में प्रतिष्ठा थी। पिता जी राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय थे, गांव के दलितों-पिछड़ों के बीच उनकी अच्छी पकड़ थी। 

बड़े भाई पढ़ने में तेज थे और पूरे क्षेत्र में हाकी के जाने-माने खिलाड़ी भी। मिसिर जी हमारे परिवार वालों को बाकी यादवों से ज्यादा ‘सभ्य’ समझते थे। शायद , कुछ अलगाने के लिए ही उन्होंने मेरे नाम में ‘सिंह’ सरनेम जोड़ दिया। पिता जी को भी नहीं बताया, उनसे सिर्फ यही पूछा कि बच्चे का क्या नाम रखा है, पिता जी ने कहा, उर्मिलेश। सिर्फ मेरे नाम के साथ ही उन्होंने खेल नहीं किया, मेरे पिता का नाम था-सरजू सिंह यादव तो उन्होंने लिख दिया-सूर्य सिंह। नामों का संस्कृतीकरण! मेरा उर्मिलेश नामकरण भी दिलचस्प ढंग से हुआ था। मेरे बड़े भाई जब ग्यारहवीं या बारहवीं में पढ़ते थे तो मेरा जन्म हुआ। वह मां-पिता की पहली संतान थे और मैं आखिरी। बीच में मेरे दो-तीन भाई-बहन हुए पर वे जिंदा नहीं रह सके। कुछ तो पैदाइश के वक्त ही मरे थे। मेरी पैदाइश से पहले एक भाई, जिसका नाम मुसाफिर था, कुछ बड़ा होकर मरा। उन दिनों गांव में डाक्टर या अस्पताल आदि की सुविधा नहीं थी। उससे भी बड़ी समस्या परिवार की गरीबी थी। 

मैं जब पैदा हुआ तो बचने की उम्मीद कम थी। मां ने बचपन में बताया था कि मेरा वजन बहुत कम था, जो भी देखता, कहता, यह भी शायद ही बचे। पर मैं बच गया। उधर, मेरे बड़े भाई साहब, इस बार बहन पाने की उम्मीद लगाए थे पर मिल गया भाई। उन्होंने अपनी संभावित बहन का नाम भी तय कर रखा था-उर्मिला। वह साहित्य खूब पढ़ते थे। उन दिनों मैथिलीशरण गुप्त की किताब ‘साकेत’ पढ़ रहे थे, जिसमें उर्मिला का चरित्र बहुत उभरकर सामने आता है। जब भाई पैदा हुआ तो उन्होंने नाम रख दिया-उर्मिलेश। स्कूल में नामांकन के वक्त हेडमास्टर मिसिर जी की कृपा से मैं उर्मिलेश सिंह हो गया। नामांकन के वक्त पिता जी के साथ भाई साहब होते तो शायद मिसिर जी को मेरे और पिता जी के नाम के साथ मनमानी करने का मौका नहीं मिला होता। मेदिनीपुर वाले मिसिर जी की यही खुराफात शायद वर्षों बाद डा. नामवर सिंह जैसे ‘दिग्गज मार्क्सवादी आलोचक’ के ‘कन्फ्यूजन’ का कारण बनी।

जेएनयू मे दाखिले के कुछ ही समय बाद, मुझे बैरंग इलाहाबाद लौटना पड़ा, जहां मित्रों के सहयोग से मैंने सत्र के शेष दिन बिताए। मेरा ज्यादा वक्त अपनी निजी पढ़ाई-लिखाई और पीएसओ की गतिविधियों को समर्पित रहा। दाखिला रद्द होने की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं। पहले वाकये की तरह, एक दिन अचानक नामवर जी ने मुझे अपने चैम्बर में बुलवाया। इस बार वह अकेले थे। मैं डरते-डरते गया, इस बार पता नहीं क्या पूछेंगे?  चैम्बर  में दाखिल होते ही उन्होंने पूछा, उर्मिलेश जी, आपका एमए फाइनल का रिजल्ट अभी आया कि नहीं? मैंने कहा, नहीं सर। बस आने वाला है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन छात्रों की सूची मांगी है, जिन्होंने अब तक अपना फाइनल रिजल्ट नहीं जमा किया है। भारतीय भाषा केंद्र से उसमें आपका नाम जा रहा है। नियमानुसार, आपका एडमिशन रद्द हो जाएगा। 

मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। उनके चैम्बर से उदास मन लौटा। कुछ दिनों पहले, नामवर जी से उनके चैम्बर में हुई पिछली मुलाकात याद आने लगी। उस दिन मैं बेहद परेशान रहा। उन दिनों बाहर से फोन आदि करके सारी जानकारी ले पाना कठिन था, इसलिए मैं अगले ही दिन मैं अपर इंडिया एक्सप्रेस से इलाहाबाद के लिए रवाना हो गया। विभाग में सबसे मिला। रजिस्ट्रार से भी बातचीत हुई। सबने कहा, रिजल्ट जल्दी ही आ जाएगा। मैंने विभाग से एक परिपत्र भी ले लिया, जिसमें लिखा था कि उर्मिलेश सिंह फाइनल के छात्र हैं और इनका परीक्षाफल आने वाला है। कृपया इन्हें अपेक्षित सहयोग और मोहलत दी जाय। लेकिन दिल्ली में नामवर सिंह पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने मेरे एडमिशन को रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू करा दी। केंद्र की स्टूडेंट्स फैक्वल्टी कमेटी(एसएफसी) के कुछ छात्र-सदस्य भी चाहते थे कि मेरा एडमिशन जल्दी रद्द हो जाय। इसके दो फायदे थे। एडमिशन के लिए ‘वेटिंग’ में पड़े किसी एक छात्र का एडमिशन हो जाता और किसी एक एडमिशन ले चुके छात्र को मेरी वाली यूजीसी फेलोशिप मिल जाती। 

इनमें कुछेक एसएफसी सदस्य नामवर जी के पटु शिष्य थे। कोशिश की गई कि मेरे एडमिशन रद्द किए जाने के मामले में छात्र संघ (एसएफआई-एएसएफआई नियंत्रित) की तरफ से कोई पंगा न हो। जहां तक मुझे याद आ रहा है कि सितम्बर के अंतिम सप्ताह से ही मेरे एडमिशन पर खतरे के बादल मंडराने लगे। कुछ छात्र नेताओं ने प्रवीर दा के कहने पर मेरे मामले में विश्वविद्यालय-उच्चाधिकारियों से बातचीत भी की। कुछ दिनों की मोहलत मिली लेकिन मेरा रिजल्ट उस वक्त तक नहीं आया और जहां तक मुझे याद आ रहा है, अंततः अक्तूबर में मुझे केंद्र से बोरिया-बिस्तर बांधने को कह दिया गया। हालांकि एडमिशन रद्द करने सम्बन्धी औपचारिक परिपत्र नवम्बर,1978 में जारी किया गया। बाद में पता चला कि जेएनयू के कुछ अन्य केंद्रों में भी ऐसे मामले सामने आए। रूसी अध्ययन केंद्र में कम से कम दो छात्रों को, जिनका रिजल्ट मेरी तरह लंबित था, उन्हें जनवरी, 79 के पहले सप्ताह तक की मोहलत दी गई। केंद्र के छात्र रह चुके डा. कैसर शमीम ने बाद के दिनों में इस बात की पुष्टि की। वह उन दिनों केंद्र और भाषा संकाय की कई शैक्षणिक-प्रशासनिक इकाइयों में छात्र-प्रतिनिधि के तौर पर शामिल थे। जिनको मोहलत मिली, वे भाग्यशाली रहे। उनका मेरी तरह एक साल बर्बाद नहीं हुआ। पर इसके लिए मैं नामवर जी पर कोई दोषारोपण नहीं कर रहा हूं। 

उन्होंने तो बस ‘नियमों का पालन करते हुए’ मेरा एडमिशन रद्द करा दिया।----और मोहलत पाने की उनसे अपेक्षा भी नहीं थी। कुछ ही दिनों बाद, मैं इलाहाबाद लौट आया। छात्र-राजनीति में सक्रियता के अलावा ‘वर्तमान’ नाम से हम लोगों ने एक पत्रिका भी निकाली थी। इसके संपादक मंडल में मेरे अलावा रामजी राय और राजेंद्र मंगज थे। कृष्ण प्रताप सिंह(दिवंगत केपी सिंह) और विभूति नारायण राय(तब तक आईपीएस हो चुके थे) पर्दे के पीछे से हमारी पत्रिका के प्रमुख संसाधक थे। पत्रिका का दफ्तर मेरे कमरे से चलता था। इसके अलावा एक स्टडी सर्किल भी हम लोग चलाते थे, जिसमें विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों के अलावा बीच-बीच में कुछ तरक्कीपसंद वकील, पत्रकार, कवि-लेखक और अन्य प्रोफेशनल्स भी आते रहते थे। इसके कुछेक हिस्सेदार आज देश के जाने-माने न्यायविद्, नौकरशाह, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक-कवि हैं।
अगले साल, यानी 1979 में जेएनयू में एम.फिल्.-पीएचडी के दाखिले के लिए फिर से फार्म भरा। 

परीक्षाफल आया तो ज्यादा निराशा नहीं हुई। मेरा एडमिशन हो गया, इस बार कुल 20 छात्रों की सूची में तीसरी पोजिशन थी। फेलोशिप मिलना तयशुदा था। उन दिनों भारतीय भाषा केंद्र में कम से कम तीन या चार फेलोशिप आसानी से मिल जाती थीं। शुरू में लगा था कि पता नहीं, इस बार मेरा एडमिशन होगा कि नहीं, पर कई लोगों ने सही ही कहा कि पिछले साल के अपने टापर को केंद्र एडमिशन से वंचित कैसे रखता? मेरा पेपर और इंटरव्यू भी अच्छे हुए थे। एमए फाइनल का परीक्षाफल भी आ चुका था, 65.5 फीसदी अंकों के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने विभाग में मेरी दूसरी पोजिशन थी। इधर, जेएनयू में तीसरी पोजिशन मिली। जहां तक मुझे याद आ रहा है कि पहली पोजिशन इस बार पुरुषोत्तम अग्रवाल की थी। दूसरे स्थान पर संभवतः पटना विश्वविद्यालय से आए रामानुज शर्मा रहे। पुरुषोत्तम ने जेएनयू से ही एमए किया था और नामवर जी के प्रिय शिष्य के अलावा एएसएफआई के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। पढ़ने-लिखने और बोलने में भी तेजतर्रार थे। पुरुषोत्तम पहले डीयू और फिर जेएनयू में कई साल शिक्षण करने के बाद संघ लोकसेवा आयोग के सदस्य बने। उन्होंने कबीर पर अच्छा काम किया। नामवर जी के प्रिय और समझदार शिष्यों में उनके अलावा कुछ और नाम याद करना चाहें तो वीरभारत तलवार का नाम लिया जा सकता है। 

वीरभारत अच्छे रिसर्चर रहे लेकिन व्यक्ति, शिक्षक-प्रशासक, दोनों स्तर पर उन्होंने जेएनयू को निराश ही किया। रामानुज जी मितभाषी थे और नंद किशोर नवल के करीबी थे, बातचीत में अक्सर उनका उल्लेख किया करते थे। नवल जी संगठन और विचार के स्तर पर नामवर जी के सहयोगी और बहुत करीबी रहे। रामानुज और मुझे एक ही होस्टल में आसपास कमरा मिला था। बाद में मुझे महानदी(मैरिड होस्टल) मिल गया तो पत्नी के साथ रहने लगा। इसी होस्टल में दिग्विजय सिंह(अब दिवंगत), बाबूराम भट्टराई(नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री) और हिसिला यमी, विमल और सुखदेव थोरट भी रहा करते थे।  बहरहाल, नए सत्र में मैंने एमफिल डिसर्टेशन के लिए राहुल सांकृत्यायन पर काम करने का फैसला किया। मेरे गाइड थे-डा. मैनेजर पांडे। फरवरी, 1982 में मुझे एमफिल एवार्ड हो गई। पीएचडी के लिए डा पांडे के ही निर्देशन में ‘प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में वैचारिक संघर्ष(सन 1946-54)’ विषय पर काम शुरू कर दिया था। 

फेलोशिप के पैसों से हम लोगों का काम यहां आराम से चल जाता था। कभी-कभी मां को भी मनीआर्डर से पैसे गांव भेजा करता था। पढ़ाई के साथ छात्र-राजनीति में भी मेरी सक्रियता बढ़ चुकी थी। जेएनयू में पीएसओ का मैं संयोजक या सचिव भी रहा। कुछ समय के लिए पीएसओ की दिल्ली राज्य कमेटी का भी पदाधिकारी था। सन 80 या 81 में मैंने डीएसएफ(पीएसओ-आरएसएफआई का मोर्चा) के बैनर तले जेएनयू छात्रसंघ के महासचिव पद का चुनाव भी लड़ा। एसएफआई-एआईएसएफ गठबंधन की नमिता सिन्हा से चुनाव तो मैं हार गया पर एक नया रिकार्ड भी बना। नौ सौ या एक हजार की छात्र संख्या वाले जेएनयू में संभवतः मुझे 289 वोट मिले। सीपीआई-सीपीएम धारा से बाहर के स्वतंत्र वामपंथी खेमे के किसी उम्मीदवार को जेएनयू में अब तक इतना वोट कभी नहीं मिला था।

सन 1983 की गर्मियों में जेएनयू की पहाडियां नारों से गूंजने लगीं। डाऊन से अप कैम्पस तक, पूरा विश्वविद्यालय पोस्टरों-बैनरों से पट चुका था। केंद्र सरकार के दबाव में विश्वविद्यालय प्रशासन ने जेएनयू की प्रगतिशील और सामाजिक न्याय-पक्षी प्रवेश नीति को बदलने का एलान कर दिया। छात्रों की तरफ से इसकी जबर्दस्त मुखालफत हुई। छात्रसंघ के नेतृत्व ने शुरू में थोड़ी ना-नुकूर की पर बड़ा आंदोलन छेड़ने की छात्रों की भावना को देखते हुए वह भी समर्थन में आ गया। जेएनयू के इतिहास में वैसा आंदोलन न पहले कभी हुआ और न आज तक देखा गया। इसमें तीन सौ से ज्यादा छात्र तिहाड़ जेल भेज दिए गए। इनमें नब्बे फीसदी देश के विभिन्न राज्यों से आकर जेएनयू में पढ़ रहे प्रथम श्रेणी के प्रतिभाशाली छात्र थे। इनमें कइयों ने तो आईएएस जैसी सिविल सर्विस परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कर ली थीं। 

राजनीतिक हस्तक्षेप और बहुदलीय दबाव के बाद प्रशासन ने छात्रों पर लंबित मामलों को बिना शर्त वापस कर लिया पर आंदोलन की नेतृत्वकारी टीम के संभवतः 17 छात्रों को कुछ समय के लिए (एक साल से तीन साल) के लिए कैम्पस से बाहर कर दिया गया। इनमें मैं भी शामिल था। आंदोलन छिड़ने से पहले मैं अपनी पीएच.डी. थीसिस जमा करने की तैयारी कर रहा था। एनसीईआरटी के पास एक टाइपिस्ट से शोध-प्रबंध के अध्यायों को क्रमवार टाइप करने को लेकर बात भी हो चुकी थी। अब पीएचडी भी लटक गई। खाने-पीने और रहने के लाले पड़ गए। फेलोशिप से वंचित हो चुके थे। पत्नी घर चली गईं। कुछ दिनों बाद मैं भी घर गया।  लेकिन वहां क्या करता, जल्दी ही दिल्ली लौट आया। विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने हम जैसों के हालात पर चिंता जताई। सहयोग का आमंत्रण भी दिया। लेकिन इस घटना के बाद गुरुदेव नामवर ने मुझसे कभी नहीं पूछा कि तुम क्या कर रहे हो या आगे की जिन्दगी के लिए क्या योजना है? जेएनयू के डाउन कैम्पस के एक कर्मचारी फ्लैट में ईश, शशिभूषण और राहुल जैसे कुछ दोस्त रह रहे थे। मैंने भी वहीं डेरा डाला। 

एक दिन अचानक विश्वविद्यालय के एक शीर्ष अधिकारी की तरफ से मुझे उनके एक परिजन ने संदेश दिया कि आप अगर एक पंक्ति में लिख कर दे दें कि ‘9 मई, 83 को जो कुछ हुआ, उसके लिए मुझे खेद है’ तो आपको फिर से कैम्पस में इंट्री मिल जाएगी, फेलोशिप जारी रहेगी और आप अपनी पीएच.डी. थीसिस जमा करा सकेंगे। जिन सज्जन ने मुझे यह संदेश दिया, वह उन दिनों राजस्थान में काम करते थे। मैंने विनम्रतापूर्वक कहा कि ऐसा मैं नहीं कर सकता। हम लोगों ने अन्याय के विरोध में आंदोलन किया था, उस पर खेद प्रकट करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अगर विश्वविद्यालय प्रशासन मेरे परिवार की खराब आर्थिक स्थिति और मेरे कथित उज्ज्वल एकेडेमिक भविष्य के प्रति इतना संवेदनशील है तो उसे इस तरह की कोई शर्त ही नहीं रखनी चाहिए।

कुछ समय बाद, मैं दिल्ली में सामाजिक-राजनीतिक कामकाज करते हुए लेखन-अनुवाद आदि से अपनी आर्थिक जरुरतें पूरा करने में जुट गया। लेकिन यह आसान नहीं था। मैं किसी पार्टी का होलटाइमर तो था नहीं। आय या गुजारे का कोई और स्रोत भी नहीं दिख रहा था। घर चलाने के लिए जितनी जरूरत थी, वह हिन्दी में फ्रीलांसिंग से संभव नहीं  दिख रही थी। मई, 83 के ‘भूचाल’ से पहले भी मैं लेक्चरशिप पाने की कोशिश करता आ रहा था, सन 81-82 से ही लगातार रिक्तियां देखकर आवेदन कर देता। पर कभी इंटरव्यू में छंट जाता तो कभी काल-लेटर ही नहीं आता। जहां तक मुझे याद आ रहा है, तब मैं जेएनयू में पीएचडी कर रहा था और एमफिल एवार्ड हो चुकी थी। एक दिन मैनेजर पांडे डाउन कैम्पस बस स्टैंड पर मिल गए। उन्होंने पूछा, ‘ अरे भाई, आपने कुमायूं विश्वविद्यालय में अप्लाई किया है न!’ मैंने कहा, ‘किया है सर।’ उन्होंने बताया कि ‘डा. नामवर सिंह ही वहां एक्सपर्ट के रूप में जा रहे हैं। 

मैने उनसे काफी कहा है कि आपको नौकरी की बहुत जरूरत हो। शुरू में तो उन्होंने ज्यादा रूचि नहीं दिखाई पर मेरे जोर देने के बाद अब वह तैयार हो गए हैं। आप जरूर जाइए वहां, इस बार आपकी नौकरी हो जाएगी।‘ नैनीताल आने-जाने और रहने के खर्च आदि का इंतजाम कर मैं इंटरव्यू देने नैनीताल चला गया। वहां गिर्दा, पीसी तिवाड़ी और प्रदीप टाम्टा जैसे मित्रों के सहयोग से एक यूथ होस्टल में कमरा भी मिल गया था। इंटरव्यू शानदार हुआ। नामवर जी के अलावा दक्षिण के किसी विश्वविद्यालय से कोई पांडे या शर्मा जी वहां एक्सपर्ट बनकर आए थे। आधुनिक साहित्य में विशेषज्ञता वाले अभ्यर्थी के लिए यह पद था। इस नाते भी मेरा पलड़ा भारी दिख रहा था। पर सारा अंदाज गलत साबित हुआ। कुछ दिनों बाद पता चला कि कुंमायूं में भी मेरा नहीं हुआ। किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति हुई, जिसका काम मध्यकालीन साहित्य पर था। इसके बाद मैं बेहद दुखी और निराश हो गया।

सन 83 की घटना के बाद लेक्चरशिप पाने की कोशिश एक बार फिर शुरू की। मेरे साथ के कई मित्रों को लेक्चरशिप मिल गई थी। उनमें कई मेरिट के हिसाब से मुझसे नीचे थे। उनमें कइयों के अंदर शिक्षक बनने की कोई बलवती इच्छा भी नहीं दिखती थी, जबकि मेरे अंदर इलाहाबाद के दिनों से ही एक समर्थ शिक्षक बनने का सपना पलता आ रहा था। इसी सपने के चलते मैंने सिविल सर्विसेज(आईएएस-आईपीएस) की परीक्षा में बैठने की अपने बड़े भाई की सलाह मानने से इंकार कर उनकी नाराजगी मोल ली थी। वैसे भी मेरे वाम मन-मानस को सरकारी सेवा में जाना गवारा नहीं था। विश्वविद्यालय से निकलने के बाद भी मुझे कुछ समय तक लगता था कि कहीं न कहीं मुझे लेक्चरशिप मिल जाएगी। नामवर जी की ताकत से मैं वाकिफ था। विश्वास था कि मैनेजर पांडे जरूर उन पर दबाव बनाएंगे। दिल्ली के हर कालेज, विश्वविद्यालय, यहां तक कि बाहर के संस्थानों के हिन्दी विभागों में स्थानीय प्रबंधन, सत्तारूढ़ राजनेताओं या नामवर जी की मंडली के प्रोफेसरों का ही दबदबा था। मैं चारों तरफ से गोल था। सिर्फ मैनेजर पांडे ही एक थे, जो जमा-जुबानी समर्थन करते थे। मेरे सामने अस्तित्व का संकट था। एक बच्चा भी अब परिवार से जुड़ चुका था। डाउन कैम्पस के उस कर्मचारी फ्लैट से हटने के बाद विकासपुरी के ए ब्लाक में एक कमरे का एक सेट किराए पर लिया। गांव से परिवार भी ले आया। 

सन 1985 आते-आते मुझे लगने लगा कि अब लेक्चरशिप के लिए ज्यादा इंतजार ठीक नहीं। मुझे विकल्प तलाशने होंगे। नियमित रोजगार के नाम पर कुछ ठोस नहीं दिखा तो जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, प्रतिपक्ष, युवकधारा, शान-ए-सहारा, अमर उजाला, और अमृत प्रभात जैसे पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित ढंग  से लिखना शुरू कर दिया। जनसत्ता, नभाटा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमृत प्रभात आदि के काम से घर के किराए की राशि निकालने की कोशिश करता, जबकि प्रतिपक्ष के नियमित भुगतान से महीने भर के दूध का भुगतान हो जाया करता था। उन दिनों प्रतिपक्ष के संपादक विनोद प्रसाद सिंह थे और उसका दफ्तर था, तुगलक क्रीसेंट स्थित जार्ज फर्नांडीस का सरकारी बंगला। विनोद बाबू से मेरी मुलाकात संभवतः जेएनयू के एक मेरे मित्र अजय कुमार ने कराई थी, जो आजकल बड़े आयकर अधिकारी हैं। प्रतिपक्ष के आखिरी पेज पर एक कालम छपता था, फू-नुआर का बैंड। वह खाली हो गया था। 

उसके लेखक शायद पत्रिका से अलग हो गए थे। उसके बाद लगभग दो साल मैंने वह कालम लिखा, जिसका मुझे नियमित भुगतान मिल जाता था। इस दौर में जनसत्ता के मैगजीन संपादक मंगलेश डबराल, पत्रकार और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता आनंदस्वरूप वर्मा, प्रख्यात कवि व पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रो. डी प्रेमपति, सुरेश सलिल और विनोद प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ लोगों से मुझे सहयोग-समर्थन मिला। जनसत्ता में लगातार लिखने के बावजूद प्रभाष जोशी ने मुझे वहां नौकरी नहीं दी। शायद, उन्हें मेरे बारे में जो सूचनाएं मिली होंगी, उससे उन्होंने मुझे जनसत्ता में नौकरी के लायक नहीं समझा होगा। मेरी अर्जी खारिज हो गई पर उन्हें मेरे वहां छपने से शायद कोई एतराज नहीं था। ‘खोज खबर’, ‘खास खबर’ और ‘रविवारी जनसत्ता’ के लिए लगातार लिखा। मेरे घर में पहला ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी सेट ‘जनसत्ता’ के पारिश्रमिक के पैसे से ही आया।

कुछ समय मैं पीयूसीएल की दिल्ली कमेटी में भी सक्रिय रहा। तब इंदर मोहन उसके महासचिव थे। राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष वी एम तारकुंडे थे। बाद में गोबिन्द मुखौटी की अगुवाई में पीयूडीआर बना। बेरोजगारी और फ्रीलांसिंग के शुरुआती दिनों में मैं विकासपुरी के बाद पुष्प विहार और लोधी रोड कांप्लेक्स के सरकारी आवासों में किराए पर रहा। फ्रीलांसिंग के इस दौर में भी जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, वाराणसी, इलाहाबाद, जयपुर, जोधपुर, उदयपुर या जामिया जैसे विश्वविद्यालयों या सम्बद्ध कालेजों के हिन्दी विभागों में नियुक्तियों की कहानियां सुनता रहता था। मुझे लगता है, नामवर सिंह ने यूरोपीय और अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों के तर्ज पर योग्य छात्रों को आगे कर जेएनयू या अपने प्रभाव के अन्य संस्थानों में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन को सुदृढ़ आधार देने की कोशिश की होती तो हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान हो सकता था।

पत्रकारिता की उबड़खाबड़ जमीन पर पांव बढ़ाते हुए सन 1986 के मार्च महीने में मेरी नियुक्ति टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप के हिन्दी अखबार नवभारत टाइम्स में हो गई। इसके लिए अखिल भारतीय लिखित परीक्षा हुई थी। बहुत सारे युवक-युवतियां उसमें शामिल हुए थे। बताया गया कि उस लिखित परीक्षा में मुझे दूसरा स्थान मिला। वहां किसी ने मुझसे जाति आदि के बारे में पूछताछ नहीं की। अखबार के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे पटना संस्करण में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी। 1 अप्रैल को दिल्ली से पटना के लिए रवाना हो गया। तब तक एसपी सिंह भी मुंबई से दिल्ली नभाटा में कार्यकारी संपादक बनकर आ चुके थे। शुरू में ही उन्होंने नभाटा के संपादकीय पृष्ठ पर ‘बिहार के कृषि संकट’ पर दो किस्तों का लेख छापकर मेरा उत्साहवर्धन किया। लेकिन बाद के दिनों में उनका मुझे ज्यादा समर्थन नहीं मिला। मेरी पहली किताब ‘बिहार का सच’ सन 1991 में छपी। पुस्तक का बिहार और बाहर भी स्वागत हुआ। 

एसपी ने भी पसंद किया। उन्होंने नभाटा में तुरंत समीक्षा छपवाई। कई प्रमुख हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षाएं आईं। एक दिन टीवी(दूरदर्शन) देख रहा था। पहले से मुझे कत्तई नहीं मालूम था। अचानक, देखा दूरदर्शन पर मेरी किताब की चर्चा चल रही थी। बाद में पता चला कि इस कार्यक्रम का निर्माण दूरदर्शन के जाने-माने प्रोड्यूसर कुबेर दत्त(अब दिवंगत) ने किया था। सन 1993 में मुझे मीडिया जगत में (उन दिनों की) प्रतिष्ठित ‘टाइम्स फेलोशिप’ मिली। इसके इंटरव्यू बोर्ड में उस समय के बड़े संपादक और विचारक निखिल चक्रवर्ती, योजना आयोग के सदस्य पी एन धर, टी एन चतुर्वेदी, टाइम्स के तत्कालीन संपादक दिलीप पडगांवकर और टाइम्स ग्रुप के चेयरमैन अशोक जैन सहित कई गणमान्य लोग बैठे थे। शोध के मेरे प्रस्तावित विषय पर कई सवाल पूछे गए। किसी ने मुझसे मेरी जाति आदि के बारे में नहीं पूछा। कुछ ही दिनों बाद परिणाम निकला, पता चला किश्वर अहलूवालिया, मारूफ रजा, शैलजा वाजपेयी और मुझे इस फेलोशिप के लिए चुना गया है। बीते साल यह फेलोशिप जेएनयू के ही एक पूर्व छात्र पी. साईनाथ को मिली थी। टाइम्स आफ इंडिया सहित ग्रुप के सभी अखबारों में हम लोगों के चित्र के साथ फेलोशिप की उद्धोषणा हुई थी। इस फेलोशिप के तहत मैंने झारखंड के संदर्भ में क्षेत्रीय विषमता पर काम किया, जो सन 1999 में ‘झारखंडः जादुई जमीन का अंधेरा’ नाम से पुस्तकाकार छपा। शोध-लेखन के लिए बाद में कुछ और फेलोशिप भी मिलीं।

नामवर जी, केदार जी और पांडे जी के जेएनयू स्थित ‘हिन्दी के दिव्यलोक’ से पत्रकारिता की उबड़खाबड़ दुनिया मुझे बेहतर लगने लगी। लेकिन पत्रकारिता में 26 साल से ज्यादा के अपने अनुभव के बाद जब पेशे में ‘ऊपर की दुनिया’ के करीब आया तो पता चला कि यहां का अंदरुनी सच भी कुछ कम विकराल नहीं है। नामवर जी से भी ज्यादा महाबलियों की इसमें भरमार है। ज्यादा पेंचदार लोग हैं। जात-गोत्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक सोच के अलावा बड़े राजनेताओं, कारपोरेट-कप्तानों से किसके कितने रिश्ते हैं, आज के मीडिया में ऊंचे पदों तक पहुंचने में इन चीजों का खासा महत्व हो गया है। भारत में पत्रकारिता वाकई चौथा स्तम्भ है पर हमारे समाज और लोकतंत्र का नहीं, राजव्यवस्था का चौथा स्तम्भ बनती गई है। 

हम लोग जिस समय पत्रकारिता में दाखिल हुए, वह इमर्जेन्सी के बाद का जमाना था और प्रोफेशन में जबर्दस्त उथलपुथल थी। हिन्दी में पहली बार नए ढंग के प्रयोग हो रहे थे और नए सोच को जगह मिल रही थी। जनपक्षी सोच के ढेर सारे नौजवान पत्रकारिता में दाखिल हुए थे। लेकिन कुछ ही बरस बाद चीजें तेजी से बदलती नजर आईं। सन 95-97 के आसपास पत्रकारिता पर आर्थिक सुधार और उदारीकरण की प्रक्रिया का असर साफ-साफ दिखाई देने लगा था। सन 2000 के बाद उसने ठोस रूप ले लिया। अब पत्रकारिता का चेहरा बिल्कुल बदल चुका है। बड़े मीडिया संस्थानों के मालिक आज खुलेआम कहते हैं कि वे खबर के नहीं, विज्ञापन के धंधे में हैं। मुख्यधारा की हिन्दी पत्रकारिता तो और पिचक रही है। वह कूपमंडूकता, सरोकारहीनता, समाचार-विचार की दरिद्रता, चाटुकारिता, जातिवाद और गुटबाजी से बेहाल है। बेहतर की बात कौन करे, राहुल बारपुते, रघुवीर सहाय और राजेद्र माथुर के जमाने की पत्रकारिता के निशान भी मिट रहे हैं। पत्रकारिता के इस मौजूदा सच से जब टकराता हूं तो छात्रजीवन के दौरान देखा एक सजग-समर्थ शिक्षक बनने का सपना याद आता है। फिर देखता हूं, मेरे सच और सपने के ठीक बीच में खड़े हैं-हिन्दी के महाबली डा. नामवर सिंह। 

आशा-निराशा और सफलता-असफलता भरी दिल्ली से पटना, पटना से दिल्ली वाया चंडीगढ़ की 26 साल लंबी अपनी यात्रा पर नजर डालता हूं तो कुल-मिलाकर अच्छा लगता है। इस पेशे में आने का अफसोस नहीं होता। हिन्दी क्या, संपूर्ण शैक्षणिक जगत के बड़े-बड़े महाबलियों को जो लोग इधर से उधर पदारूढ़ करते-कराते हैं, बड़े ओहदे या सम्मान देते-दिलाते हैं, एक पत्रकार के रूप में उन लोगों को भी बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला। कैसे अचानक अपने बीच से ही कोई जुगाड़ और रिश्तों के सहारे बड़ा ओहदेदार, वाइसचांसलर, निदेशक या सीधे प्रोफेसर बन जाता है!  कैसे कोई रातोंरात चैनल हेड, प्रधान संपादक, किसी कारपोरेट संस्थान में उपाध्यक्ष या कारपोरेरट-कम्युनिकेशन का चीफ, कहीं निजी या सरकारी क्षेत्र में बड़ा अधिकारी, सलाहकार या विदेश में कोई अच्छी सरकारी पोस्टिंग पा लेता है! पत्रकारिता के इस दिलचस्प-रोमांचक रास्ते का हरेक सच मुझे उन वजहों से रू-ब-रू कराता है कि बड़ी संभावनाओं और प्रतिभाओं के बावजूद हमारा समाज क्यों दुनिया के नक्शे पर आज तक इतना फिसड्डी बना हुआ है! प्रतिभा-पलायन क्यों हो रहा है या कि एक खास मुकाम के बाद प्रतिभा-विकास का रास्ता अवरुद्ध क्यों हो जाता है! सचमुच हम ‘अतुल्य भारत’ हैं!