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13 मार्च 2012

काज़मी की रिहाई को लेकर आंदोलन तेज


-दिलीप ख़ान

मैंने उम्मीद की थी कि यही कोई सौ-दो सौ लोग जुटेंगे, लेकिन इंडिया गेट पर शाम के सात बजते-बजते सात-आठ सौ लोग इकट्ठा हो चुके थे और आधे घंटे के भीतर लखनऊ और बाकी जगहों से आने वाले लोग भी इसमें शामिल हो गए। जुलूस जब घूमकर गेट के ठीक सामने पहुंचा तो मैंने अनुमान लगाया कि दो हज़ार से ज़्यादा लोग सैयद मोहम्मद अहमद काज़मी की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे। छोटे वाले लाउडस्पीकर, जोकि बीच में काम करना बंद कर दिया, के सहारे बारी-बारी से लोगों को संबोधित करने वाले नेता, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार जब लोगों से मुखातिब हो रहे थे तो इसके समानांतर अलग-अलग कोनों में अमरीका मुर्दाबाद और इज़रायल मुर्दाबाद के नारे भी साथ-साथ अपनी उपस्थिति दिखा रहे थे। कह लीजिए कि लोगों के भीतर आक्रोश को साफ़ पढ़ा जा सकता था। एकदम बीच में बैठकर या किनारे खड़े होकर। असर बराबर का पड़ रहा था।

जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई कर रहे खुर्शीद अंसारी के चेहरे पर आक्रोश और पीड़ा का मिला-जुला भाव था, ‘‘देश में किसी भी घटना के बाद मुसलमानों को उठाकर ये साबित क्या करना चाहते हैं? कई ऐसे वारदात हैं जिसमें आतंक [वादी] के नाम पर पकड़े गए लोग बाद में बेकसूर साबित हुए। मालेगांव से लेकर अभी हाल में रिहा हुए मो. आमिर तक का नाम इस कड़ी में गिनाया जा सकता है, लेकिन जो नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है वो ये कि अब हाई-प्रोफाइल लोगों को गिरफ़्तार कर पूरी कौम के भीतर ख़ौफ़ को और गहरा किया जा रहा है।’’
इंडिया गेट पर काज़मी के समर्थन में प्रदर्शन करते लोग

हाल के महीनों में आतंकवादी के नाम पर गिरफ़्तार हुए लोगों के छूटने से लोगों के भीतर संघर्ष और लड़ाई का भाव ज़्यादा मज़बूत हुआ है। ऐसी गिरफ़्तारियों से भारतीय राज्य का सांप्रदायिक चेहरा तो उभर कर सामने आया ही है साथ ही इसने सांप्रदायिकता को दो स्तर पर मज़बूत करने का भी काम किया है। पहला, हर दाढी-टोपी वाले लोगों को गैर-मुस्लिम धार्मिक लोगों के बीच शक की निगाह से देखा जा रहा है और प्रगतिशील बनते-बनते चूक जाने वाले लोग ये सवाल उठाते फिरते हैं कि अगर मुस्लिम कौम ठीक-ठाक है तो आखिरकार क्यों तकरीबन हर केस में मुसलमान ही गिरफ़्तार होते हैं। दूसरा, ऐसी हर गिरफ़्तारी के बाद पूरे मुस्लिम समुदाय में धर्म के नाम पर एकजुट होने की संभावना लगातार बढ़ती जाती है। इंडिया गेट पर काज़मी की रिहाई की मांग करने वाले लोगों को भी दो अलग-अलग खांचों में बांटकर साफ़ देखा जा सकता है। एक तो वे थे जो धर्मनिरपेक्ष, तरक्कीपसंद, फ़ासीवाद-विरोधी और राजकीय दमन के ख़िलाफ़ बोलने में यक़ीन करते हैं। दूसरे वो थे, जो काज़मी की गिरफ़्तारी को धर्म की ज़मीन पर खड़े होकर देख रहे थे और इस तरह धार्मिक गोलबंदी के जरिए सरकार पर दबाव बनाने की तैयारी में हैं।

इमाम बुखारी के बेटे ने इंडिया गेट से आवाज़ लगाई कि यदि काज़मी को जल्द ही नहीं छोड़ा जाता है तो देश भर के मुसलमान इस सवाल पर प्रदर्शन करेंगे और जामा मस्जिद से इसकी नई शुरुआत होगी। दूरदर्शन और ईरानी रेडियो सहित कई जगहों पर काम कर चुके एम.ए. काज़मी की गिरफ़्तारी को लेकर पुलिस ने जो वजहें बताईं हैं वो बेहद कमज़ोर है। पुलिस के मुताबिक काज़मी के घर से ‘लावारिस’ स्कूटी बरामद हुई है। परिवार वालों का कहना है कि वो स्कूटी काज़मी के भाई की है और उनके यहां साल भर से पड़ी हुई थी। पुलिस ने जो दूसरी वजह बताई है वो ये कि काज़मी के नंबर से ईरान फोन किया गया। काज़मी इराक युद्ध कवर करने के अलावा ईरानी रेडियो के लिए काम कर चुके हैं तो जाहिर है कि उस इलाके में वो लगातार बात करते रहते हैं। तीसरा तर्क पुलिस का ये है कि काज़मी ने बम फोड़ने वाले को अपने घर में शरण दी है। पुलिस का सबसे हास्यास्पद तर्क यही है क्योंकि अब तक बम फोड़ने वाले शख्स की न तो शिनाख्त हुई है और न ही उसके बारे में कुछ भी स्पष्ट विवरण ही पुलिस दे पाई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब बम फोड़ने वाले का ही पता नहीं है तो उसको शरण देने वाले को किस बिनाह पर गिरफ़्तार किया गया। ये कुछ उस तरह की कवायद है गोया टायर हाथ लगने की वजह से कोई साईकिल खरीदने की सोचे!

 राज्यसभा सांसद मो. अदीब ने ये आश्वासन दिया है कि वो संसद के भीतर इस सवाल को उठाएंगे और पूरी कोशिश करेंगे कि काज़मी को पूरे सम्मान के साथ रिहा किया जाए। इससे दो दिन पहले 100 से ज़्यादा पत्रकारों और समाजिक कार्यकर्ताओं ने काज़मी की गिरफ्तारी की भर्त्सना की। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी सहित कई नेताओं को भी चिट्ठी लिखी गई है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी ने काज़मी को तत्काल रिहा करने और मामले की जांच कराने की अपील की है। इंडिया गेट पर लोगों के भीतर जिस तरह की बातचीत चल रही थी और नारों का जो शक्ल था उससे ये साफ़ लग रहा था कि मुस्लिमों को ज़्यादा लंबे समय तक वोट का स्रोत मानने वाली पार्टियों से उनका मन बिल्कुल उखड़ा हुआ है कि मुस्लिम अब देश के भीतर आतंकवाद के नाम पर हो रही फ़र्ज़ी गिरफ़्तारियों के प्रति न सिर्फ़ सतर्क हो रहे हैं बल्कि एक सूत्र में ये आपस में बंध भी रहे हैं कि अमरीका के ‘वार ऑन टेरर’, नाटो के ‘रेसपांसिबिलिटी टू प्रोटेक्ट’ और इज़रायल की इराक़-ईरान विरोधी नीतियों को न सिर्फ यहां के मुसलमान समझ रहे हैं बल्कि वैश्विक मामलों में खुद को ग्लोबल आइडेंटिटी के बतौर भी देख रहे हैं।

काज़मी की गिरफ़्तारी कई मायनों में नई किस्म की है और आतंकवाद को लेकर देश (दुनिया) के खुफिया विभाग के नए प्रचलन की तरफ़ भी इशारा कर रही है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हेडक्वार्टर रखने वाले आतंकी संगठनों के साथ पहले ही कई भारतीयों के नाम नत्थी किए जा चुके हैं। आंतरिक आतंकवादी वाला फॉर्मूला भी बीते कई सालों से चल रहा है लेकिन ये पहला वाकया है जब सीधे-सीधे ईरान और अरब के साथ ‘भारतीय आतंकवाद’ का लिंक जोड़ा जा रहा है। इस मामले में काज़मी की गिरफ़्तारी का जितना असर भारत के लोगों पर पड़ेगा उससे ज़्यादा असर ईरान पर पड़ने वाला है।

मुझे ठीक-ठीक याद है कि इज़रायली दूतावास के सामने हुए बम विस्फ़ोट के बाद और गिरफ़्तीर से पहले जब राज्यसभा टीवी के लिए हमने एमए काज़मी को ‘मीडिया और आतंकवाद’ पर बात करने बुलाया था तो शो रिकॉर्ड होने के बाद मुझसे बातचीत करते हुए वो भी आतंकवाद के नाम पर होने वाली गिरफ़्तारियों को ईरान की तरफ़ शिफ्ट करने को लेकर इशारा कर रहे थे। उस समय मैंने दूर-दूर तक ये कयास नहीं लगाया था कि जिस व्यक्ति से इज़रायली दूतावास के सामने हुए बम विस्फ़ोट पर मैं बात कर रहा हूं उसी को हफ़्ते भर बाद उसी मामले के साजिशकर्ता के तौर पर गिरफ़्तार कर लिया जाएगा! मैं काज़मी की समझदारी का कायल हूं और जिस मामले को लेकर उनकी गिरफ़्तारी हुई है उसके नाकाफ़ी, अस्पष्ट और फ़र्ज़ी सबूतों की वजह से इस बात की संभावना और ज़्यादा देख रहा हूं कि इफ़्तिख़ार गिलानी की तरह काज़मी भी जल्द ही रिहा होंगे। सांसद मो. अदीब ने जुलूस में लोगों के सामने भारतीय राज्य की बर्बरता पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘जब काज़मी जैसे लोग पकड़े जा सकते हैं तो समझ लीजिए कि हमे और आपको कभी भी पकड़ कर जेल में ठूंसा जा सकता है।’   
    
आतंकवाद को लेकर दुनिया भर में वैश्विक राजनीति का चेहरा देश के लोगों और ख़ासकर मुसलमानों के बीच अब उघड़ने लगा है और यही वजह है कि इंडिया गेट पर जो नारे सबसे तेज़ आवाज़ में सबसे ज़्यादा बार लगाए जा रहे थे वो थे- अमेरिका मुर्दाबाद, इज़रायल मुर्दाबाद और विदेशी इशारों पर देश चलाना बंद करो।

04 मार्च 2012

मध्य-पूर्व: पश्चिमी युद्धाभ्यास का नया अड्डा


-दिलीप ख़ान
“देशों केबीच नए गठजोड़ बनने लगे हैं और हम इस वक्त इतिहास के बेहतरीन और अद्भुत दौर मेंहैं। खाड़ी का संकट एक तरह से हमें आपस में ऐतिहासिक सहयोग की ओर ले जा रहा है। इसकठिन घड़ी से एक नई विश्व व्यवस्था झांक रही है: एक ऐसी दुनिया जो आतंक से मुक्त है, ज़्यादा न्यायपूर्ण है और शांति केलिए ज़्यादा प्रयासरत है। एक ऐसा समय जहां उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम चारों दिशाओंके देश खुशहाली और भाईचारे से एक साथ रह रहे हैं।“

--प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद की स्थिति पर जॉर्जबुश सीनियर।


ये बयान बुश उस दौर में दे रहे थे जबसोवियत रूस के विघटन और शीत युद्ध के औपचारिक खात्मे के बाद अमेरिका के सामने कोईमज़बूत चुनौती नहीं रह गई थी और अमेरिका ने दुनिया को ‘दुरूस्त’ करने का साराजिम्मा अपने माथे ले लिया था। बीते दो दशक को भू-राजनैतिक तौर पर देखें तो ‘शांति बहाली’ के लिए सबसे ज़्यादा प्रयास जिन इलाकों में हुआ है वो ठीकवही इलाके हैं जहां से उत्पन्न संकट के दरवाज़े से जॉर्ज बुश सीनियर बेहतर विश्वका अक्स देख रहे थे। और नई विश्व व्यवस्था के देखे गए सपने के एक दशक बाद उनकेबेटे जॉर्ज बुश (जू) ने ‘शांति बहाली’ की नई तालीम कीशुरुआत भी इसी इलाके में की। ‘वार ऑन टेरर’ के ‘मानवतावादी’ नारे के साथ।पश्चिमी एशिया की इस पूरी पट्टी में उसके बाद बम की आवाज़ के बिना कोई शाम नहींगुज़री है। क्या बीते दो दशक में मध्य-पूर्व वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है? क्या सोवियत संघके तौर पर अपने चिह्नित दुश्मन के टूट जाने के बाद अमेरिका मध्य-पूर्व के इलाके कोआजमाईश के लिए तैयार कर रहा है? क्या एक-ध्रुवीय शक्ति समीकरण के बाद अमेरिकी हुक्म को पूरा करना आज केवैश्विक राजनीति का अंतर्निहित अर्थ है? क्या अमेरिका स्वभावत: एक आतंकी राज्य है? ऐसे कई सवाल है जो अरब दुनिया के मौजूदा हालात को देखते हुए दुनिया केसामने उपस्थित होते हैं।


नाभिकीय हथियार के बहाने ईरान पर अमेरिकी नज़र
मध्य-पूर्व की राजनीति को यदि 9/11 के बाद परखा जाएतो उस इलाके के लिए बीते कई दशकों का ये सबसे खतरनाक दौर साबित हुआ है। 9/11 एक तरह से अमेरिकाऔर उनके सहयोगियों के लिए हमला करने का बहाना साबित हुआ है। असल में एक हमले केबाद उकी क्षतिपूर्ति के लिए जवाबी हमला करना अमेरिकी रणनीति का पुराना हिस्सा रहाहै। 1898 में हवाना हार्बर पर हमले के बाद अमेरिकी-स्पेनिश युद्ध शुरू हुआ, लुसिटानियाकी घटना को लेकर पहले विश्वयुद्ध में अमेरिका शामिल हुआ। पर्ल हार्बर हमले के बादअमेरिका ने जापान पर नाभिकीय बम बरसाए। हालांकि कई शोधकर्ता ये मानते हैं कि पर्लहार्बर के बारे में पेंटागन को पहले से जानकारी थी और अमेरिका ने जान-बूझकर इसेनज़रअंदाज किया। 1964 में टांकिन खाड़ी की घटना के बाद वियतनाम को अमेरिका नेतहस-नहस करने की कोशिश की और फिर 9/11 आया, जिसपर ‘कार्रवाई’ फिलवक्त जारी है।

अफ़गानिस्तान और इराक पर ‘फ़तह’ पाने के बादअमेरिका सहित तमाम पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों का मध्य-पूर्व में कौन सा देशनिशाने पर है, ये बेहद अहम सवाल है। जैविक हथियार के बहाने, जो बाद में झूठे साबितहुए, अमेरिका लगभग एक दशक से इराक को कब्जाया हुआ है। वहां इराकी सेना की बराबरसंख्या में अमेरिकी सैन्य अड्डे बने हुए हैं। सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर प्रचारितसद्दाम हुसैन को फांसी दी जा चुकी है लेकिन अमेरिकी सेना को वहां पर और ज़्यादा ‘शांति’ की दरकार है।इसलिए वो अभी वहां अपने पैर भविष्य में भी जमाए रखना चाहता है। अफ़गानिस्तान मेंभी ‘आतंकियों’ को पूरी तरहनिर्मूल करने के बाद ही अमेरिका वहां से हटेगा, चाहे इसमें शताब्दियां लग जाए। 2012 तक नाटो फ़ौज कीवापसी के बारे में जो बयान पहले जारी हो रहे थे उस पर संशोधन शुरू हो गया है।बताया जाने लगा है कि काबुल की स्थिति अभी ‘स्वतंत्र’ रहने की नहीं है।और अब ईरान को लेकर दुनिया भर में माहौल बनाया जा रहा है।

एनबीसी न्यूज़ के साथ बात करते हुए बराकओबामा ने फ़रवरी की शुरुआत में कहा था कि ईरान पर इजरायल के साथ गठजोड़ कर हमलाकरने की सारी तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है। इसके बाद ईरान को लेकर इजरायल ने जिसतरह का वैश्विक (कु)प्रचार अभियान की शुरुआत की उसका सिरा भारत में इज़रायलीदूतावास के सामने कार में हुए धमाके से लेकर उसके ठीक अगले दिन बैंकॉक में हुए तीनसिलसिलेवार धमाकों से जाकर मिलता है। दिल्ली पुलिस की खोजबीन से पहले ही तेल अवीवने ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स के जरिए ये घोषित कर दिया कि दोनों धमाकों केपीछे ईरानी हाथ है।

ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह सेपश्चिमी देशों के निशाने पर है। पश्चिमी देशों ने कभी भी परमाणु मुक्त दुनिया कासवाल नहीं उठाया है बल्कि उनका ज़ोर हमेशा इस दिशा मे रही है कि उनकी इजाजत के साथदुनिया के देश परमाणु कार्यक्रम में आगे बढ़े। जिस परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिएइज़रायल-अमेरिका सबसे ज़्यादा ज़ोर लगा रहा है उसे अब तक आईएईए ने ग़लत करार नहींदिया है। लेकिन अमेरिका और इज़रायल सहित यूरोपीय संघ ईरान पर लगातार दबाव बनाने कीकोशिश में हैं। यूरोपीय संघ ने ईरान की मौजूदा हालात के मद्देनज़र 23 जनवरी कोविदेश मंत्री स्तरीय बैठक की और उसमें ये तय किया कि ईरान से तेल का आयात वो जुलाईसे बंद कर देंगे। यूरोपीय संघ को ये भरोसा था कि आयात रुकने से ईरानी अर्थव्यवस्थाकी हालत बिगड़ेगी और आर्थिक नाकेबंदी के जरिए अंतत: ईरान को पश्चिमी फांस में दबोच लिया जाएगा। लेकिनइस बैठक के तुरंत बाद ईरान ने घोषणा की कि वो ब्रिटेन और फ्रांस को तेल आयात करनाबंद कर रहा है। ईरान ने जुलाई का इंतज़ार किए बगैर खुद ही पांच देशों के आयात पर16 फरवरी से पाबंदी लगा दी। ईरानी समाचार एजेंसी एफएनए के मुताबिक़ यूरोपीय संघ केजवाब में ईरान ने ये फैसला लिया है। इस फैसले की हिम्मत ईरान ने एशियाई बाज़ार केप्रति जाहिर भरोसे से पाई है। चीन और भारत जैसे देश इस मौके का सबसे ज्यादा फ़ायदाउठाने की स्थिति में है ..और शायद यही वजह है कि दिल्ली धमाके के बाद भारतीय विदेशमंत्रालय ने इज़रायल की घोषणा के तुरंत बाद कोई उत्साही बयान नहीं दिया।

अमेरिका सहित यूरोपीय संघ के देशों नेबेतुके तर्क के साथ ईरानी केंद्रीय बैंक को सील करने का फैसला लेकर अंतरराष्ट्रीयमौद्रिक व्यवस्था से उसे बिल्कुल अलग-थलग करने का भरपूर प्रयास किया है। ईरान कीमुद्रा की कीमत 35 फ़ीसदी से ज़्यादा कम हो गई। आज के हिसाब से ‘आर्थिक युद्ध’ एक तरह से पूरेदेश को पंगु बनाने का कारगर हथियार है। अमेरिका-इजरायल-यूरोपीय संघ ने अपने इसअभियान में दुनिया भर के देशों को जोड़ने की कोशिश की। मिसाल के तौर पर ईरान ने जबपश्चिमी देशों को तेल आयात करना बंद किया और पश्चिमी देशों ने ईरान पर आर्थिकपाबंदियां लगाई तो अमेरिका ने भारत पर बेतरह दबाव बनाया कि भारत भी ईरानी तेल काआयात कम करे और ईरान पर आर्थिक पाबंदी लगाए, लेकिन बीते साल वैश्विक आर्थिक संकटसे बचने वाला भारत जानता है कि विश्व बाज़ार की बिगड़ती हालात का भारत पर यदि कमअसर हुआ तो उसकी बड़ी वजह यही एशियाई देश थे। जब सारी कूटनीतिक और रणनीतिक दांव हीअर्थव्यवस्था के इर्द-गिर्द खेले जा रहे हों तो ऐसी स्थिति में ईरान के साथ खड़ारहने में ही भारत का फ़ायदा है। असल में ये भारत की मजबूरी है। और ईरान के लिएभारतीय और चीनी बाज़ार विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत! इस तरह ईरान के साथ भारत और चीन का संबंधपारस्परिक हितों में बंधा है। कुछ महीने पहले ही बराक ओबामा ने कहा था कि वैश्विकबाज़ार में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी चीन है। और तथ्य ये है कि चीन इससमय ईरान का लगभग 20 फीसदी तेल आयात कर उस इलाके में अपना वर्चस्व पुख्ता कर रहाहै। चीनी वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ईरान में पैर फैलाना अमेरिका के लिए बेहदज़रूरी हो गया है।


200 से ज़्यादा परमाणु हथियार रखने वाला इज़रायल किस आधार पर ईरान के
हथियार का विरोध कर रहा है, ये समझ से परे है।
30 जनवरी को राष्ट्रपति बराक ओबामा नेजॉर्जिया के राष्ट्रपति से लंबी बात की। जॉर्जिया ईरान का पड़ोसी मुल्क है और आकारऔर आबादी में छोटा होने के बावजूद वह अमेरिका से वित्तीय सहायता पाने वाला तीसरासबसे बड़ा देश है। इस बैठक को लेकर कई पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान केसाथ किसी भी संभावित युद्ध के दौरान जॉर्जिया की ज़मीन इस्तेमाल करने को लेकरओबामा ने बात की। हालांकि ईरान को लेकर अमेरिका से ज़्यादा तत्परता इज़रायल दिखारहा है और इज़रायली सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बेनी गांट्ज ने तो यहां तक कहदिया कि अगर बाकी देश ईरान को लेकर सख्ती नहीं दिखाते तो वो अकेले ही ईरान पर हमलाकरने को तैयार है। हालांकि इज़रायल अपनी इस धमकी को ज़मीन पर उतारने मेंहिचकिचाएगा और ईरान पर हमला करने के लिए वह निश्चित तौर पर अमेरिका और नाटो देशोंका सहयोग चाहेगा, क्योंकि इज़रायल ने जब 2006 में लेबनान पर हमला किया था तोहिजबुल्लाह जैसे गुट ने इज़रायल की हालत ख़राब कर दी थी। इसलिए पूरे ईरान केख़िलाफ़ अकेले लड़ने की हिम्मत इज़रायल अकेले नहीं करेगा। इज़रायल के इस मनोभाव कोईरान अच्छी तरह जानता है और इसलिए अपनी सैन्य मज़बूती दिखाने के लिए वो सीरिया,लेबनान और जॉर्डन को सैन्य मदद पहुंचा रहा है। लेकिन इसके बावजूद अगर भविष्य मेंईरान पर अमेरिका, इजरायल और नाटो देश हमला करते हैं तो उसके लिए वो इस तरह केबहाने दुनिया के सामने रखेंगे-

· ईरान नाभिकीय हथियार बना रहा है और ये दुनिया के लिए ख़तरनाक है।

· ईरान जिद्दी देश है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की वो बात नहीं सुनता है।

· ईरान के भीतर तानाशाही पसर रही है और जनता की आवाज़ को कुचला जा रहा है।

· ईरान दुनिया भर में इजरालयी लोगों और प्रतीकों पर बम बरसा रहा है।

इसलिए नाटो को ‘बचाव की जिम्मेदारी’ के तहत ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करनाचाहिए। परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने की अमेरिका जोमांग कर रहा है उसकी फ़ेहरिश्त अंतहीन है। कई देशों के साथ कई दौर की बातचीत केबाद अमेरिका ने आईएईए के मानकों को सबसे अहम बताया, जिसके दायरे में ईरान कोनाभिकीय कार्यक्रम चलाना था। 29-31 जनवरी को आईएईए के अधिकारियों ने ईरान का दौराकिया और उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है लेकिन उस दौरे के ठीक बादपश्चिमी मीडिया तेहरान पर ग़ैरज़िम्मेदार होने और इस तरह की जांच-पड़ताल के जरिएसमय ख़राब करने के आरोप लगाना शुरू कर दिया। ईरान पर अगला कदम बढ़ाने को लेकरइजरायल और अमेरिका बेहद उतावले हैं। यह महज संयोग नहीं है कि आईएईए ने 5 मार्च कोईरान पर बैठक बुलाई है और इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन न्टान्याहू उसी दिनअमेरिका में एआईपीएसी (अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी) की मीटिंग में अमेरिकाके साथ मध्य-पूर्व की रणनीति पर बात करेंगे। दरअसल किसी भी संभावितमौके को देखते हुए हमला करने की तैयारी में अमेरिका काफ़ी पहले से मुश्तैद है।अमेरिका ने हाल ही में अपने पूर्वी तट पर भारी-भरकम युद्धाभ्यास किया। बोल्डएलीगेटर 2012 नाम के इस अभ्यास को दक्षिणपंथी इज़रायली प्रकाशन ‘डेबकैफिल’ ने पश्चिम का बीतेएक दशक का सबसे जबर्दस्त दृश्य बताया।

सीरिया और लीबिया में अमेरिकी मनसूबों को जिस तरह कामयाबी मिली है ईरान कोलेकर उसका उत्साह उतना ही बढ़ गया है। लीबिया में गद्दाफी के ख़िलाफ़ ऑपरेशन मेंनाटो ने ये हास्यास्पद दावा किया कि उनके बरसाए गए तकरीबन 2 लाख से ज़्यादा बमों कीवजह से कोई भी सिविलियन नहीं मारा गया। गद्दाफी को बागी सेना द्वारा मारने और फिरमांस बेचने वाली फ्रिज में बंद कर खुला प्रदर्शन के जो दृश्य लाईव रिपोर्टिंग केजरिए पश्चिमी मीडिया ने दुनिया भर में पहुंचाई, उसके साथ एक तरह से ये संदेश नत्थीथा कि लीबिया में अब पश्चिम की हितैषी सरकार बनेगी। ठीक उसी तरह जैसे सऊदी अरब,इराक, तुर्की या फिर जॉर्जिया में हैं। सत्ता परिवर्तन के लिए नाटो देश इस पूरी पट्टी में अपने सारे दांव खेल रहेहैं। सीरिया में लड़ रही फ्री सीरियन आर्मी को अमेरिका और नाटो ने खड़ा किया है।बंदूक और बम के अलावा टैंकों से सीरिया की गलियां पाट दी गई है। और नाटो का तर्कहै कि वो ये सब “सुरक्षा की ज़िम्मेदारी” के तहत कर रहा है। मध्य-पूर्व के नक्शे पर एक नज़र दौड़ाने पर आप पाएंगेकि ईरान के चारों तरफ हर देश में अमेरिकी सैन्य अड्डे बड़ी संख्या में बने हुएहैं। सऊदी अरब, इराक, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान, बहरीन औरकुवैत। इसके अलावा ज़ॉर्जिया और इजरालय उसके निकट सहयोगी देश है। सीरिया में सत्तापरिवर्तन के बाद अपने मुताबिक माहौल ढालने की कोशिश में पूरी ताकत के साथ वो लगाहुआ है। जाहिर है इस पट्टी में ईरान ही एकमात्र बड़ा ऐसा देश है जो अमेरिकी रणनीतिमें फिट नहीं बैठ रहा है। इसके अतिरिक्त अन्य कई देशों के मुकाबले समृद्ध तेलभंडार होने के बावजूद अमेरिका न केवल इसका दोहन करने में नाकामयाब साबित हो रहा हैबल्कि ईरान ने अमेरिकी सलाह को ताक पर रखते हुए परमाणु कार्यक्रम पर काम लगातारजारी रखा है। इसके एवज में ईरान ने बीते 2 साल में 5 बड़े वैज्ञानिकों की जानगंवाई है। ईरानी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मुस्तफ़ा अहमदी रोशन की हत्या इसकीआखिरी कड़ी है। मुस्तफ़ा की हत्या के तरीके को हू-ब-हू दिल्ली में इजरायली दूतावासके पास कार बम विस्फोट में उतारा गया। और इसके बाद ये स्थापित करने को कोशिश हुईकि मुस्तफ़ा के बदले में ईरान ये कार्रवाई कर रहा है।


निशान में मध्य-पूर्व के उन जगहों को दिखाया गया है जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं।
ईरान, जॉर्डन, सीरिया और लेबनान अमेरिकी दख़लअंदाजी से अब तक अछूते हैं।
बार-बार ईरान ने ये स्पष्टीकरण दिया है किवो शांतिपूर्ण उद्देश्य की खातिर नाभिकीय कार्यक्रम चला रहा है लेकिन इज़रायल कोईरान के परमाणुयुक्त होने पर सबसे ज़्यादा आक्रोश है। इज़रायल का कहना है कि ईंधनकी ओट में ईरान नाभिकीय बम बना रहा है। हालांकि मोटे अनुमान के मुताबिक़ 200 सेज़्यादा परमाणु बम रखने वाला इज़रायल किस नैतिक आधार पर ईरान में परमाणु बम काविरोध कर रहा है इसका उत्तर न तो अमेरिका देगा और न ही पश्चिमी मीडिया।

ईरान के पास वैश्विक प्राकृतिक गैस कालगभग 10 फीसदी भंडार है और इराक व सऊदी अरब के बाद सबसे बड़ा तेल भंडार। अगर ईरानकाबू में आता है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गाड़ी में इन तीनों देश के तेल भरे जासकेंगे। अमेरिका और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ये मजबूरी है कि ईरान को वो इराकमें तब्दील करें क्योंकि अमेरिका के भीतर वैश्विक तेल भंडार का महज 2 फीसदी हिस्साही है।

ईरान को लेकर अमेरिका लंबे समय से अपनीरणनीति बना रहा है। इसके अलावा बीते दिनों नाटो, तुर्की और सऊदी अरब के बीच भी इसपर महीनों बातचीत चली है कि सीरिया में उनके हस्तक्षेप का स्वरूप क्या होगा? ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने ये साफ़ किया था कि सीरिया को लेकर संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद में वो पहले ज़ोर लगाएंगे। हालांकि पश्चिमी मीडिया ने ही येखुलासे किए कि ब्रिटिश और फ्रांसीसी विशेष सैन्य बल फ्री सीरियन आर्मी को तुर्कीके सैन्य अड्डे में प्रशिक्षण दे रहे हैं। इस प्रशिक्षण के क्या मायने हैं? क्या सीधा हमला करना ही हमला कहलाएगा, क्या सीरिया के भीतर सैन्य प्रदर्शनकरने वाले गुटों को प्रशिक्षण देना हमले का दूसरा रूप नहीं है? असद सरकार से असहमत बड़ी आबादी सीरिया में चल रहे प्रदर्शन से नाराज हैंऔर उन्हें लगता है कि इस तरह सीरिया के भीतर पश्चिमी दख़लअंदाजी बढ़ जाएगी। सीरियामें सत्ता परिवर्तन को जिस तरह अमेरिका और इजरायल अपने मुताबिक मोड़ना चाहते हैंवो ईरान के लिए भी बराबर चिंता का विषय है, क्योंकि उस इलाके में सीरिया, जॉर्डनऔर लेबनान ही दो ऐसे देश हैं जिनके साथ ईरान के दोस्ताना संबंध हैं और जोमध्य-पूर्व की राजनीति में पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ साझी रणनीति रखते हैं।

सीरिया में अमेरिकी राजदूत कोफिर से बहाल किया जाना और इसके लिए रॉबर्ट एस फोर्ड को चुना जाना अमेरिकी मंसूबेको उनके बीच बेहद स्पष्ट कर देता है जो फोर्ड की पृष्ठभूमि जानते हैं। फोर्ड 2004 से2005 के बीच इराकी जनसंहार के दौरान अमेरिका की तरफ़ से बग़दाद में नंबर दो कीपोजीशन में थे। सीरिया में फोर्ड के अनुभव का अमेरिका लाभ उठाना चाहता है! बग़दाद के सारे ‘अनुभवियों’ को अमेरिका आजकल महत्वपूर्णजिम्मेदारी दे रहा है। जनरल डेविड पेट्रॉस को ओबामा ने हाल ही में सीआईए का प्रमुखबनाया है। पेट्रॉस का 2004 के बग़दाद दमन में प्रदर्शन बेहद ‘शानदार’ था। सीआईए प्रमुख कीजिम्मेवारी संभालने के बाद ही पेट्रॉस ने सीरिया और ईरान को सबसे प्रमुख मुद्दाबताते हुए ये साफ कर दिया था कि अमेरिका की प्राथमिकता में अभी कौन सा इलाका सबसेअहम है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी निशाने पर रहे साम्यवाद समर्थक देशोंके बजाए बीते दो दशक में इस्लामिक देश अमेरिका के निशाने पर सबसे आगे है। सैम्युअलहटिंगटन जैसे सिद्धांतकारों ने अपने सिद्धांत के जरिए अमेरिका के इस चाल को अवश्यंभावीकरार देते हुए वैश्विक शक्ति समीकरण के लिए ज़रूरी बताया था। लेकिन सभ्यताओं का टकराव जैसे सिद्धांत के जरिएहटिंगटनने आलोचनात्मक चिंतन को गलत दिशा में मोड़ दिया। असल मेंमसला कभी भी इस्लाम बनाम ईसाईयत का नहीं रहा है। वास्तव में मध्य-पूर्व के संदर्भमें भी लड़ाई साम्यवाद बनाम पूंजीवाद का ही है और चरमराती पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाकी लगाम को मज़बूत करने के लिए ही अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी पूंजीवादी देशमध्य-पूर्व के देशों के संसाधन का ओट ले रहे हैं। यदि मध्य-पूर्व केसंसाधन का दोहन करने में अमेरिका नाकामयाब रहा तो पूंजीवाद की हालत ज़्यादा जर्जरहो जाएगी और स्वाभाविक रूप से विकल्प के तौर पर लोग साम्यवाद की ओर मुंह करेंगे।इस स्थिति को रोकने के लिए अमेरिका मध्य-पूर्व में ज़ोर लगा रहा है और विरोध करनेवाले देशों पर बम बरसा रहा है। ऐसे में विरोध करने वाला देश यदि अमेरिका के सामनेतनकर खड़ा होता है तो इसे इस्लाम बनाम पश्चिमी देश के तौर पर नहीं देखा जानाचाहिए। अगर मामला ऐसा होता तो अमेरिका उन गुटों को समर्थन ही नहीं देता जो सत्तापरिवर्तन के लिए इन देशों में लड़ रहे हैं और अपने पूरे मिजाज में इस्लामी कट्टरपंथीहैं।

असल में अमेरिकाऔर नाटो मध्य-पूर्व की राजनीति को पुरातन विचारधारा की आगोश में डालने की पूरीकोशिश में हैं। मिस्र के जिस आंदोलन को अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों का समर्थनहासिल था उसकी परिणति सैन्य और फिर इस्लामी राजनीतिक पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड केउभार के रूप में हुई। लीबिया में तालिबान समर्थित संगठनों ने सत्ता परिवर्तन कीलड़ाई लड़ी और पूरे इलाके के एक मात्र बचा धर्मनिरपेक्ष राज्य सीरिया के सत्तापरिवर्तन के लिए भी ऐसी ही शक्ति को अमेरिका, इज़रायल और नाटो देश समर्थन दे रहे हैं।क्याअद्भुत संयोग है कि सीरिया के भीतर दुनिया में अल-कायदा को अपना सबसे बड़ा दुश्मनमानने वाले अमेरिका और अलकायदा दोनों का लक्ष्य एक ही है। बीते दिनों अलकायदा नेताअयमान अल-जवाहरी ने एक वीडियो जारी कर सीरिया के पड़ोसी मुल्कों से ये आह्वान कियाथा कि सीरिया के असद सरकार के ख़िलाफ़ वो संगठित हो। अगरसीरिया में भविष्य में सत्ता (या व्यवस्था) परिवर्तन होता है तो उसका स्वरूप या तोइस्लामी गणतंत्र का होगा या फिर अमेरिकापरस्त लोकतंत्र का।

मध्य-पूर्व को अमेरिका अपनेसैन्य अड्डे के तौर पर इस रूप में विकसित करना चाहता है जो रणनीतिक तौर पर अमेरिकीहित में सबसे ज़्यादा मुफीद हो और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संवर्धित करने मेंमददगार हो। हमले के बाद इन देशों में कठपुतली सरकार बनाकर अमेरिकाअपनी रणनीति में काफी हद तक कामयाब भी हो रहा है। जो देश हमला नहीं झेलना चाहते वोसीधे-सीधे अमेरिकी दोस्ती को अमेरिकी शर्त पर निभा रहे हैं। हाल ही में सऊदी अरबद्वारा इतिहास में अब तक का सबसे ज़्यादा मूल्य यानि 50 अरब डॉलर के हथियार खरीदनेको इसी रूप में देखा जाना चाहिए। सीरिया में यदि सत्ता परिवर्तन होता है तो यह ईरान को उस इलाके में बिल्कुल अलग-थलग कर देगा। और एक तरह से ईरान के लिए यह बड़ी हार होगी। ईरान पर सीधे हमला करने से पहले अमेरिका और इजरायल की कोशिश यही होगी कि सीरिया को पहले अपने अनुकूल बना लिया जाए।

22 जनवरी 2011

स्थाई सदस्यता के लिए राजनीतिक भटकाव


-दिलीप खान
(जनसत्ता में प्रकाशित आलेख का असंपादित रूप)
पिछले कुछ वर्षों से किसी भी महत्त्वपूर्ण देश के राष्ट्राध्यक्ष के साथ औपचारिक अथवा अनौपचारिक बातचीत में भारत की तरफ़ से एक मुद्दे को बेहद प्रमुखता से रखा जाता है, वह है संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता. एकदम हालिया तौर पर इस स्वर को हमने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ़्रांसिसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और चीनी प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ के भारत यात्रा के दौरान सुना. इस मांग को भारत न सिर्फ़ किसी देश विशेष के साथ पारस्परिक बातचीत में उठाता रहा है बल्कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गुटों और संगठनों के मंच से भी अपने पक्ष में समर्थन हासिल करने की अपील करता रहा है. फिलवक़्त ठीक इसी तरह की मांग कुछ अन्य देश भी कर रहे हैं. ख़ास तौर पर जर्मनी, ब्राज़ील और जापान. भारत सहित इन तीन देशों ने मिलकर जी-4 नाम से एक संगठन भी बना रखा है जिसका मुख्य लक्ष्य ही संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता हासिल करना है. आम तौर पर जब इस तरह के अंतरराष्ट्रीय गुट बनते हैं तो आर्थिक और सामरिक संबंध इनके केंद्र में होते हैं. जी-4 का केंद्रीय उद्देश्य यह साबित करता है कि दुनिया के ऐसे देश, जो संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्य नहीं हैं और किसी न किसी तरह एक शक्ति के रूप में अपने उभार को देख रहे हैं, वे ’वीटोधारी रेखा’ के अंदर आने के लिए कितने बैचैन हैं! साथ ही, इन उपक्रमों के जरिए ये देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य देशों को प्राप्त ’अमोघ हथियार’ वीटो को सैद्धांतिक रूप से वैधता भी दे रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पिछले 60 से भी अधिक वर्षों से सबसे बड़े संस्था के बतौर मान्य संयुक्त राष्ट्र में ढ़ांचागत परिवर्तन को लेकर अब कोई सवाल ही नहीं है. हालांकि यह सवाल कभी था भी नहीं. बस ढांचागत समायोजन की मांग इस रूप में होती रही है कि अधिक शक्ति बटोरने की जुगत में कुछ ऐसे देश जो दुनिया में अपना एक प्रभाव रखते हैं वे शक्तिशाली क्लब में शामिल होना चाहते हैं.
मौजूदा वैश्विक राजनीतिक लक्ष्य और ज़िम्मेदारियों के संबंध में इन देशों की चर्चा को तत्काल यहां छोड़ देते हैं. फिर भी, ऐसे उठने वाले मांगों और इसके पक्ष-विपक्ष में दिए जाने वाले तमाम दलीलों को स्थाई सदस्यता की संरचना के साथ ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समीक्षा करने पर ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में इन देशों की मांग ग़लत दिशा में हैं. स्थाई सदस्यता चंद देशों की परस्पर-सहमति पर आधारित व्यवस्था है. दरअसल फरवरी 1945 में येल्त्रा सम्मेलन, जिसे क्रीमिया सम्मेलन भी कहा जाता है, में जब स्थाई सदस्यता की बीज बोई गई तो इसके निहितार्थ बहुत गूढ़ नहीं थे. क्रीमिया में युद्धोत्तर स्थिति में यूरोप के भीतर एक सांगठनिक ढांचा निर्मित करने को लेकर यह प्रयास था, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के राष्ट्राध्यक्ष एक साथ उपस्थित थे. इन राजनीतिक समीकरणों के बीच रूजवेल्ट ने सोवियत संघ को संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के लिए मना लिया, जिसे सोवियत संघ ने वीटो जैसी किसी शक्ति हासिल होने के शर्त पर स्वीकार किया. सोवियत संघ की इस मांग के पीछे तत्कालीन भू-राजनैतिक परिस्थितियां थीं कि किसी भी अनचाहे प्रस्ताव को पश्चिमी पूंजीवादी देश एक जुट होकर अपने पक्ष में न करवा ले. सोवियत संघ के राष्ट्र संघ से अलग होने के बाद इसकी अप्रासंगिकता ने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी संगठन को अंतरराष्ट्रीय होने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि सोवियत संघ उसमें शामिल हो. इस बिनाह पर स्थाई सदस्यता की व्यवस्था की गई. हालांकि अमेरिका और ब्रिटेन अपने भीतर असीमित अधिकार रखने की मंशा पहले से बनाए हुए थे, उन्हें इस तरह एक और बेहतर बहाना मिल गया था. फ़्रांस को इसमें शामिल किए जाने के पीछे जर्मनी के ख़िलाफ़ फ्री फ़्रेंच बलों का बेहद शानदार प्रदर्शन था. इसके अतिरिक्त औपनिवेशिक शक्ति के रूप में फ्रांस यूरोप के भीतर के एक बड़ा बल था.
अब यहां से लेकर आगे की स्थिति को देखें तो यह साफ़ जाहिर होता है कि इन चार-पांच देशों द्वारा लिए गए फैसले को कभी भी इस तरह चुनौती नहीं दी गई कि उनके असीमित अधिकार को न्यून करके अन्य देशों के स्तर पर लाया जाए. अलबत्ता यह ज़रूर हुआ है कि इन शक्तियों को हासिल करने की दावेदारी बढ़ गई है. दबे-खुले स्वरों में यह मांग कुछ समय से हो रही है कि संयुक्त राष्ट्र की पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए जिसमें बलाघात इस बात पर है कि सुरक्षा परिषद के भीतर जितने स्थाई सदस्य हैं वे दुनिया को ठीक तरह से प्रतिनिधित्व नहीं दे रहे हैं. यह सिर्फ़ कुछ क्षेत्र विशेष के ही देश हैं. मसलन दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया महादेश से एक भी देश इस समूह में शामिल नहीं हैं. या फिर एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले देश भारत को एशिया से एक सदस्य चीन के होने के बावजूद स्थाई किया जाए. दावेदारी साबित करने के लिए पैमाना बनाना बहुत मुश्किल नहीं हैं. अर्थव्यवस्था, क्षेत्र, जनसंख्या, क्षेत्रफल, लोकतंत्र सबकुछ इसके लिए खोला जा सकता है. लेकिन, असली सवाल यह है कि कुछ देशों द्वारा बनाए गए इस सुरक्षा कवच सरीखे व्यवस्था को चुनौती दी जानी चाहिए अथवा राजनीतिक तौर पर इस व्यवस्था के लिए उन देशों को प्रोटेक्ट करते हुए उसमें शामिल होने की गुहार लगाना चाहिए?
भारत जैसे देशों के पास फिलहाल वह क्षमता है कि वे तमाम ऐसे देशों का जो इस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं, उनकी अगुवाई कर सके. इस काम के लिए भारत स्वाभाविक तौर पर ’तीसरी दुनिया’ के देशों का पसंद भी बन सकता है. जी-77 जैसे समूह में भारत अपनी मज़बूत हैसियत रखता है. यदि इस जगह पर भारत बल लगाता है तो इसे इसमें अधिक स्वीकृति भी मिलेगी और अधिक सम्मान भी. इससे पहले भी ग़रीब मुल्कों ने साथ मिलकर ऐसे कई ढांचों के विरुद्ध लड़ाईयां लड़ी हैं. शीत युद्ध के समय भारत समेत ’तीसरी दुनिया’ के कई ’विकासशील’ देशों ने उसमें शामिल दो गुटों से अलग अपना एक स्वतंत्र गुट बनाया था. इस ज़मीन से साम्राज्यवाद और घटाटोप पूंजीवाद के ख़िलाफ़ कई लड़ाईयां लड़ी गई जिनमें से कुछ में ये जीते औए कुछ में हारे. गुटनिरपेक्ष देशों ने एक समय में यूनेस्को पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि वे तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था को बदलें और सत्तर के दशक में दुनिया के सामने ’नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ पेश की गई. इस व्यवस्था से ऐसा नहीं था कि ’तीसरी दुनिया’ के देशों को कोई बड़ी सफ़लता हासिल हुई. फिर भी इसके सांकेतिक महत्त्व बड़े दूरगामी थे. मसलन इसी के आस-पास इन देशों ने दुनिया भर में असंतुलित सूचना प्रवाह को दुरूस्त करने के लिए ठीक उसी तर्ज पर ’नई विश्व सूचना और संचार व्यवस्था’ बनाने की मांग की. और इसी के मद्देनज़र यूनेस्को ने मैकब्राइड आयोग का गठन किया था, जिसकी संस्तुतियों से खफ़ा होकर अमेरिका ने यूनेस्को की सदस्यता त्याग दी थी.
मौजूदा संकट यह है कि ये तमाम देश अपनी इन इतिहासों से दूर निकल आए हैं. शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही सैद्धांतिक रूप से गुटनिरपेक्षता का औचित्य भी खत्म हो गया और इन देशों के भीतर पल रहे उदार बुर्जुआओं ने पूंजीवाद के नए संस्करण ’वैश्वीकरण’ को अपने-अपने देशों में पैबस्त कराया. अब ये बुर्जुआ ही सही अर्थों में शासक हैं. जाहिर है किसी भी ऐसे ढांचे को चुनौती देने में इन देशों की सत्ता (शासक) हिचकिचाएंगी जो किसी ऐसी ही व्यवस्था की पैदाइश हो जिससे वे खुद फल-फूल रहे हैं.
सोवियत संघ के विघटन के बाद यह साफ़ जाहिर हो गया है कि दुनिया में शक्ति केंद्रण एक खास देश के पास है. लेकिन इन वर्षों में यह भी बेहद स्पष्टता के साथ प्रकट हुआ है कि दुनिया के प्रत्येक हिस्से में कुछ देशों ने आपस में अधिक दुश्मनाना भाव विकसित किए हैं. शीत युद्ध के दौरान गुटबाजी में वैचारिकी अधिक महत्त्वपूर्ण था. वैचारिकी अब गौण हो रहा है. और दुनिया में शत्रुता का पैमाना वापस 20वीं सदी के पूर्वार्ध की तरह हो रहा है. हर देश अपने क्षेत्र विशेष में शक्तिशाली होकर उभरना चाह रहा है. इसे समूचे ग्लोब पर महसूस किया जा सकता है कि अधिकांश देशों के पड़ोसी ही उसके सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर चिह्नित है. वे एक-दूसरे से आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि सैन्य क्षेत्र में आगे निकलने को और प्रत्येक दूसरे को ’कुचलने’ को बेताब नज़र आते है. ऐसे में यह तर्क कितना खोखला लगता है कि सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करने के लिए हर क्षेत्र से कुछ देशों को इसमें शामिल किए जाने की ज़रूरत है. क्या भारत को स्थाई सदस्यता मिल जाने से यह पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व कर पाएगा? या फिर जापान को स्थाई सदस्यता मिलने से वह उत्तर और दक्षिण कोरिया का प्रतिनिधित्व कर पाएगा? अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े पेंचोखम हैं. जिस जी-4 का भारत सदस्य है और स्थाई सदस्यता के लिए हाथ-पांव मार रहा है, उसके विरोध में दुनिया के कुछ देशों ने एक संगठन बना रखा है जिसे ’सहमति के लिए एकता आंदोलन’ अथवा कॉफी क्लब कहा जा रहा है. जिस तरह जी-4 का केंद्रीय एजेंडा स्थाई सदस्यता हासिल करना है उसी तरह कॉफी क्लब का स्थाई एजेंडा इन्हें ऐसा करने से रोकना है. इसमें स्पेन, इटली, कनाडा, दक्षिण कोरिया, पाकिस्तान, अर्जेंटीना जैसे देश शामिल हैं. तस्वीर बेहद स्पष्ट है. जैसा ऊपर जिक्र किया गया है ठीक उसी तर्ज पर जर्मनी को रोकने के लिए स्पेन, इटली, नीदरलैंड्स जैसे देश हैं, ब्राजील के लिए मैक्सिको और अर्जेंटीना है, भारत के लिए पाकिस्तान है, और जापान के लिए दक्षिण कोरिया. ऐसे में प्रतिनिधित्व की बात कैसे की जा सकती है? क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को और अधिक ’ईमानदार’ बनाने के लिए जी-4 देशों ने यह भी सलाह दी है कि दो अफ्रीकी देशों को भी इसमें शामिल किया जाए लेकिन जब अफ्रीकी संघ में इसके लिए कोशिश हुईं तो मिस्र, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका में से दो को चुनने में संघ असमर्थ रहा. आपसी होड़ कहीं अधिक तीव्र है.

भारत समेत कुछ अन्य देशों को यदि स्थाई सदस्यता मिल जाती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में क्या फर्क आएगा? अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जिस स्तर की है उसमें इस बात की प्रबल संभावना है कि कुछ और देश इसके लिए कतार में खड़े हो जाएंगे और अपनी दावेदारी के लिए कोई ठोस बहाना भी ढूंढ लेंगे. लामबंदी का एक लंबा दौर चलेगा. यह लामबंदी और प्रतिस्पर्धा उसी तरह की होगी जैसी नाभिकीय हथियारों के मामले में अब तक देखने को मिली है. उत्तरी कोरिया इसलिए बम बना रहा है क्योंकि अमेरिका दक्षिणी कोरिया के साथ सामरिक अभ्यास करता है और अमेरिका के पास नाभिकीय बम है तथा उत्तरी कोरिया अपने को ’सुरक्षित’ बनाए रखना चाहता है! पाकिस्तान के पास इसलिए नाभिकीय बम है क्योंकि वह भारत के पास भी है! जिस तरह सुरक्षा की परिभाषा बदली है और नाभिकीय हथियार के ख़िलाफ़ नाभिकीय हथियार को सुरक्षा माना जा रहा है उसी तरह वीटो शक्ति को लेकर भी इसी तरह की प्रतिस्पर्धा देखने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं.
ऐसी मांगों के बाद मूल समस्या ढंक जाती है. या यूं कहे कि वह वैध हो जाती है. असल मसला सिर्फ़ यह रह जाता है कि वो शक्ति किसके पास हो. जबकि वास्तव में इसी शक्ति को चुनौती दी जानी चाहिए. यदि वीटो धारी देशों की संख्या बढ़ती है तो इसके दुरुपयोग और भी बढ़ेंगें. वीटो इस्तेमाल के पीछे प्रत्येक स्थाई सदस्य देशों के अपने हित रहे हैं. सोवियत गणराज्य से संबंधित मामले में मोटोलोव ने इतनी दफ़ा वीटो किया कि उन्हें ’मि. वीटो’ कहा जाने लगा. 1970 में अपना पहला वीटो इस्तेमाल करने के बाद से अमेरिका ने 80 से अधिक बार इसे दोहराया है. दसियों बार अंतरराष्ट्रीय मतों को धता बताते हुए उसने इजराइल के मसले पर बेशर्मी से अपने इस अधिकार का इस्तेमाल किया है. मध्य-पूर्व के मामले में अमेरिका पिछले बीस-पच्चीस सालों से बेतरह इसे भांजता रहा है और स्थाई कोटे से बाहर खड़े देशों ने अधिकांश समय इसकी निंदा की है. कई देशों ने इसे इस रूप में भी देखा कि यह दुनिया के चुनिंदा देशों को हासिल अलोकतांत्रिक अधिकार है. ऐसे में वे देश अब यदि खुद वीटो हासिल करने की मुहिम में लग जाए तो जाहिर है कि वे अलोकतांत्रिक होड़ में अपने को न सिर्फ़ शामिल कर रहे हैं बल्कि और आगे के लिए इसकी राह भी खोल रहे हैं.
इज़राइल में सामरिक और युद्ध कारणों से अमेरिकी वीटो ने यह स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना जिस संकल्पना के साथ की गई थी कि युद्धोत्तर समय में यह अंतरराष्ट्रीय शांति और सद्भावना के लिए काम करेगी, अब यह कई मामलों में उसके उलट जा रही है. संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया की तमाम बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को वास्तविक रूप से अमेरिका ही नियंत्रित कर रहा है इसलिए उसे अपने किसी भी फैसले पर इन संस्थाओं की रज़ामंदी की ज़रूरत नहीं मालूम पड़ती. इराक पर हमले की घोषणा करते हुए अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र को यह जानकारी दी थी कि वह चाहे तो अमेरिका के आदेशों का पालन करें या ’अप्रासंगिक’ बन कर रह जाए. संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए चुप्पी बेहतर समझा!
ऐसी स्थिति में यदि कुछ देशों को स्थाई सदस्यता मिल भी जाती है तो यह बहुत साफ़ है कि वे उसी अधिकारभाव और ताकत के साथ वीटो का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे जैसे कुछ ’बड़े’ देश कर रहे हैं. मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य इसके लिए बेहद दुस्साहसी देशों की मांग करता है. इतिहास में देखें तो मंगोलिया के मुद्दे पर सोवियत संघ रिपब्लिक ऑफ चाइना पर दबाव बना चुका है जिसके बाद चीन को अपने वीटो से मुकड़ना पड़ा था. फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जो समीकरण हैं उसमें ऐसे दबाव की संभावना पहले की तरह सुरक्षित है. यदि कोई देश अमेरिका की इच्छा के विरुद्ध सुरक्षा परिषद में वीटो करता है तो बहुत संभव है कि वह विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संघ के जरिए उस ख़ास देश पर आर्थिक दबाव बनाए. दरअसल दुनिया में नियंत्रण का असली संस्था संयुक्त राष्ट्र रह ही नहीं गई है. अब नियंत्रण इन्हीं आर्थिक संगठनों के जरिए कायम हो रही है. इन तमाम संस्थाओं का सबसे बड़ा वित्तपोषक और शेयरधारक अमेरिका है. विश्व बैंक का अध्यक्ष पारंपरिक तौर पर कोई अमेरिकी नागरिक ही बनता है. इस संस्था में अमेरिका के पास सबसे अधिक वोटिंग शक्ति है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में किसी भी फैसलों के लिए अमेरिका अकेले पर्याप्त है. संयुक्त राष्ट्र का भी सबसे बड़ा वित्तपोषक अमेरिका है. इन अधिकारों से वह कोई भी कदम उठाने के लिए आज़ाद है. वह इराक का तेल कब्जा कर संयुक्त राष्ट्र का ’सबसे बड़ा वित्तपोषक’ बना रहेगा और इसके जरिए वह फिर ’इराक’ का तेल कब्जाता रहेगा. यह दिलचस्प है कि किसी संस्था के समानांतर कुछ ऐसी संस्थाओं को खड़ा कर दिया जाए कि वह उनके सामने बौनी साबित हो और इन समानांतर संस्थाओं पर मज़बूती से नियंत्रण कायम कर असली संस्था को बिल्कुल पंगु बना दिया जाए.
यदि कोई देश स्थाई सदस्य बन कर भी अपने वीटो का इस्तेमाल आज़ादी से नहीं कर सकता तो स्थाई सदस्यता की इतनी तीव्र मांग बेकार है. इस एक ध्रुवीय युग में वीटो अंततः अमेरिका के पक्ष में ही जाएगा. कई देशों को वीटो मिल जाने के बाद भी विद्रोही साहसिक रवैया दिखाने की कूव्वत उनमें नहीं होगी और साम्राज्यवादी देश यह कहकर अपने को और उदार साबित कर लेंगे कि उन्होंने कुछ अन्य देशों को भी स्थाई सदस्य बनाया. यह अमेरिकी ’लोकतंत्र’ के प्रसार के अभियान को भी प्रमुखता से स्थापित करेगी.
लेकिन एक प्रमुख सवाल यह है कि जो देश पिछले कुछ सालों से स्थाई सदस्यता की मांग कर रहे हैं उनकी प्रकृति किस तरह की है? संयुक्त राष्ट्र की स्थापना को साठ साल से अधिक हो गए हैं लेकिन यह मांग बमुशिल एक दशक पुरानी है. इन वर्षों में भारत और ब्राज़ील ने तेजी से ’आर्थिक विकास दर’ हासिल किया है जबकि जर्मनी और जापान आर्थिक मामलों में पहले से संपन्न माने जाते हैं. यह मतलब निकाला जा सकता है कि आर्थिक मज़बूती इसमें एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व के तौर पर शामिल है. इन देशों के भीतर जो आर्थिक विकास का पूरा ढांचा है वह पूंजीवादी विकास के डॉमिनेंट पैराडाइम मॉडल के जरिए तैयार हुआ है और इसमें वित्तीय क्षेत्र का प्रमुख योगदान रहा है. दुनिया में वित्तीय पूंजी के जरिए ही शक्ति का आभास कराया जा रहा है. भारत वित्तीय अर्थव्यवस्था के क़रीब अपने को पा रहा है. अगर भारत स्थाई सदस्य बनता है तो इसका झुकाव भी ऐसे ही देशों के प्रति अधिक होगा. मतलब स्थाई सदस्य बनने की मांग जिन परिस्थितियों और पैमानों के आधार पर हो रही है वह पूंजीवाद समर्थक माहौल बनाने का ही काम करेगी और यही इनकी राजनीति का भी हिस्सा बनेगी. ये मज़बूत अर्थव्यवस्था वाले देश किनके पक्ष में खड़े होंगे यह पता लगाना मुश्किल नहीं रह गया.

’तीसरी दुनिया’ के देशों के साथ एक बड़ी समस्या जो पिछली सदी से ही देखने को आ रही है कि वे कई महत्त्वपूर्ण मामलों में अपना मॉडल तैयार करने में विफल रहे हैं और पश्चिमी देशों के मॉडल द्वारा फैलाए गए गोट पर ही अपना गोट फेंकते रहे हैं. यदि लोकतांत्रिक कहे जाने वाले देश खुद ही विशेषाधिकार इस्तेमाल करने की इच्छा रखने लगे तो जाहिर है वे उस विशेषाधिकार की राजनीतिक जाल में फंस गए हैं. किसी भी संस्था का जब तक हिस्सा बनकर और उसके नियमों को परम सत्य मानकर कोई योजना बनाई जाएगी तब तक मौलिक ढांचा और विचार प्रस्तुत करने में समस्याएं आती रहेंगी. स्थाई सदस्यता के मामले में भी यही बात देखने को मिल रही है और कोई भी देश इस नियम को चुनौती देने को अभी तैयार ही नहीं दिख रहा है, गोया तमाम कोशिशों के बावज़ूद यह नियम अपरिवर्तनीय हो.

पूंजीवाद में ’देयर इज नो अल्टरनेटिव’ का प्रचार जिस रूप में किया गया उसकी पृष्ठभूमि इस बिसात पर बनी थी कि पूंजीवाद के भीतर ही लोगों को इतने विकल्प दे दिए जाए कि वे उससे बाहर निकल कर सोचने की जहमत ही न उठाए. जिस सांस्कृतिक प्रभुत्व में भारत अभी है और जिस ओर यह जा रहा है उससे साफ़ प्रतीत हो रहा है कि यह अधिकांश मामलों में पश्चिमी देशों द्वारा बनाए गए ढांचों को अपनाएगा और उसी में अपनी जगह तलाशेगा. अमेरिकी समर्थन हासिल करने के लिए भारत जितनी कोशिशें कर रहा है, और जितनी परस्पर-विरोधी बातें वाशिंगटन कैंप से देखने-सुनने को आ रही है, उसके बावजूद बहुत संभव है कि अमेरिका निकट भविष्य में भारत के पक्ष में खुलकर खड़ा हो जाए, क्योंकि हाल-फिलहाल भारत अमेरिका का अच्छा सहयोगी है और अमेरिका को भी सबप्राइम मॉर्गेज संकट के समय मंदी से उबरने के लिए भारत और चीन जैसे देशों की ओट की ज़रूरत महसूस हुई थी. इसके अतिरिक्त यह भी साफ़ जाहिर हो रहा है कि जिस तरह की वैचारिक वर्चस्व (हेजेमनी) क़ायम करने की पश्चिमी देशों की मंशा थी उसमें वे बेहद सफल रहे हैं. इस तरह की मांगें उस हेजेमनी की सफलता को दर्शाती हैं.
पूंजीवादी साम्राज्यवादी देशों के मॉडल के साथ यह चालाकी जुड़ी हुई है कि वे अपने हित में स्पेस बनाए रखते हैं. मसलन विश्व व्यवस्था के लिए वैश्वीकरण के साथ जब वे नया मॉडल पेश कर रहे हैं तो द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के इस साठ साल पुराने मॉडल, संयुक्त राष्ट्र, में फेरबदल करने को तैयार क्यों नहीं दिखते? वैश्वीकरण की स्थिति में तो फ़िर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए संगठनों को खड़ा किया जाना चाहिए था. लेकिन अपने द्वारा प्रस्तुत वैश्वीकरण के दौरान वे ऐसी नकली बहसों में लोगों को उलझाकर रख देते हैं कि असल सवाल ढंका रह जाता है. परिवर्तन के बदले समायोजन होता है. ऐसे ही किसी समायोजन के तहत भविष्य में यदि भारत सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य बनता है तो यह इसका एक झटके में एक पाले से दूसरे पाले में पलायन होगा जो किसी संस्था के भीतर हैसियत बदलने से अधिक वैचारिक पलायन को रेखांकित करेगा.

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10 दिसंबर 2010

गोपनीयता बरतने का अमेरिकी करतब



- देवाशीष प्रसून
आख़िरकार विकिलिक्स के संस्थापक जूलियन असांज को गिरफ़्तार कर ही लिया गया। उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप हैं। सवाल यह है कि क्या सच में यह मामला यौन-उत्पीड़न का है या विकिलिक्स द्वारा किए गए पर्दाफ़ाशों से संयुक्त राज्य अमरीका ही नहीं उसके तमाम पिट्ठू देश सकते में आ गए हैं? इस बात में कोई शक नहीं है कि जूलियन को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि उसने दुनिया की सबसे बड़ी सत्ता की गोपनीयता की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। वर्ना, देखने वाली बात है कि दुनिया भर में यौन मामलों में अंतरराष्ट्रीय पुलिस और न्याय व्यवस्था की हरकत देखने को कितनी बार मिली है? आस्ट्रेलियाई नागरिक जूलियन को ब्रिटिश पुलिस ने लंडन में हिरासत में लिया है और उन पर न्यायिक मामला स्वीडन में लंबित है। गौरतलब है कि दुनिया भर में अपना रुतबा रखने वाले फ़िल्मकार केन लोच और पत्रकार जॉन पिल्जर जैसे विश्व विख्यात शख्सियतों के कुल एक लाख अस्सी हज़ार डॉलर के मुचलके पर भी जूलियन को जमानत पर नहीं छोड़ा जा रहा है। यौन-मामलों में इस तरह की सजगता क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। पर सोचने वाली बात है कि क्या सचमुच जूलियन पर न्यायिक कार्रवाई यौन अपराधों के मद्देनज़र हो रही है? जाहिर सी बात है कि विकिलिक्स ने खोजी पत्रकारिता का जो इतिहास रचा है, इसके लिए जूलियन को अमरीकी सत्ता अपने काबू में नहीं ले सकती थी, तो उन्हें दूसरे बहाने से कब्ज़े में लिया गया।

हालाँकि माहौल तो यह भी बनाया गया कि अल क़ायदा की तर्ज पर विकिलिक्स को भी आधिकारिक तौर पर एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जाए, पर अब तक यह हो नहीं सका है। इस बाबत द हाऊस होमलैंड सुरक्षा समिति के अध्यक्ष पीटर किंग ने इसके लिए बहुत प्रयास किए। किंग ने अमरीका की राज्य सेकरेटरी हिलेरी क्लिंटन को एक आधिकारिक ख़त में लिखा था कि विकिलिक्स से देश की सुरक्षा को ख़तरा है, इसलिए विकिलिक्स को आतंकवादी संगठन घोषित कर देना चाहिए। दरअसल गोपणीय सूचनाओं के पर्दाफ़ाश के बाद अमरीका की स्थिति दुनिया भर में किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं बची है। यह जाहिर हो गया है कि अमरीकी सरकार अन्य देशों और उसके प्रमुख के बारे में कितनी ओछी सोच रखती है। अब यह बात भी खुल-ए-आम हो गई है अमरीका की विदेश नीति किस तरह से अंतरराष्ट्रीय सौहार्द्य को ठेंगे पर रखती है और कैसे-कैसे उसने इराक को युद्ध में नेस्तोनाबूद कर दिया। विकिलिक्स ने अमरीका के अंतरराष्ट्रीय साख को धुँआ कर दिया है। अब इसके बाद मारे शर्म और जिल्लत के अमरीका और उसकी दुनिया भर फैली एजेंसियाँ जवाबी कार्रवाई कर विकिलिक्स को सबक सिखाना चाहती हैं। जब कूटनीतिक तरीकों से विकिलिक्स दवाब में नहीं आया तो इस सिलसिले में इन ताक़तों ने विकिलिक्स के वेबसाइट पर तकनीकी हमलों का बौछार कर दिया। इंटरनेट के क़ानूनों और नैतिकताओं को ताक पर रख कर विकिलिक्स पर बड़े जोरदार तरीके से वाइरसों के हमले हुए। इससे भी मामला क़ाबू में नहीं आया तो विकिलिक्स को वेबसाइट चलाने की सेवा जो कंपनी दे रही थी, उसे खोपचे में लेते हुए विकिलिक्स के कामकाज को ठप्प किया गया। बेचारी कंपनी ने बहाना यह बनाया कि विकिलिक्स पर होने वाले वाइरस हमले इतने तीव्र हैं कि अगर उसे बंद न किया जाता हो पूरी इंटरनेट व्यवस्था ही मटियामेट हो जाती। इसे कहते हैं, मना करने पर भी कोई आपकी बात न मानें तो उसे मज़बूर कर देना कि वह चाह कर भी कुछ कर न सके। और अमरीका इसमें माहिर है।

और याद होगा कि किस तरह से पहली बार जब विकिलिक्स ने कई आँखें खोलने वाली सूचनाओं की गोपनीयता को खत्म किया था तो स्वीडन की सत्ता उसे पहले ही तमाम तरह की धमकियाँ दे चुकी थी। लेकिन विकिलिक्स बिना किसी दवाब में आए गुप्त सूचनाओं का पर्दाफ़ाश करते रहा। दरअसल गौर करें तो अमरीका हमेशा से ही सूचनाओं की गोपनीयता को लेकर संवेदनशील रहा है। सन चौरासी की बात है कि अमरीका ने इसी तरह से यूनेस्को पर भी यों कूटनीतिक हमला किया था। यूनेस्को के साथ अमरीका के तू तू-मैं मैं का सबब मैकब्राइड समिति के सुझावों के तहत बनाए जाने वाली नई विश्व सूचना व संचार व्यवस्था को तवज्जो देना था। तब आलम यह था कि सूचना व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण से अमरीका इतना बौखला गया कि उसने यूनेस्को के अपने सारे संबंध तोड़ लिए। विश्व सामंजस्य की लफ़्फ़ाजी करने वाला अमरीका इतना ज़िद्दी है कि वह अंतरराष्ट्रीय शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति को समर्पित संयुक्त राष्ट्र के इस उपांग से उन्नीस साल तक मुँह फैलाए रहा, जब तक कि यूनेस्को ने अपनी संचार नीतियों में अमूलचूल बदलाव नहीं लाए।

अमरीका ही नहीं, दुनिया में मौज़ूद तमाम साम्राज्यवादी ताक़तों के इस फ़ितरत पर गौर करें। वह गोपनीयता को लेकर बड़े संवेदनशील रहे हैं। भारत में भी देखिए मीडिया और सियासत के बंदरबाट से जुड़े बड़े-बड़े खलीफ़ाओं की गद्दियाँ नीरा राडिया के टेप्स के बेपर्द होने से हिल गईं हैं। सीधे-सीधे यह मामला सत्ता पर क़ाबिज़ लोगों के भ्रष्टाचार और गोरखधंधा को उन लोगों से छुपा के रखने का है, जो उन्हें इन सत्ता के सिंहासन पर बैठाते हैं और इस तरह के खुलासे सत्तासीनों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देते हैं।
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संप्रति: पत्रकार व मीडिया स्टडीज़ ग्रुप, नई दिल्ली व जर्नलिस्ट यूनियन फ़ॉर सिविल सोसायटी के लिए सक्रिय
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