महताब आलम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महताब आलम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 सितंबर 2012

बटला हाउस: गुजरे चार साल और खड़े कई सवाल.

महताब आलम
बटला हाउस ‘इनकाउंटर’ के चार साल पूरे हो गये। 19 सितंबर 2008 की सुबह, दिल्ली के जामिया नगर इलाके में बटला हाउस स्थित एल 18 फ्लैट में एक कथित पुलिस ‘इनकाउंटर’ के दौरान दो मुस्लिम नौजवान, जिनका नाम आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद, मारे गये थे। पुलिस के मुताबिक इन दोनों का संबंध आतंकी संगठन “इंडियन मुजाहिदीन” से था और इन्‍हीं लोगों ने 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सीरियल धमाकों की घटना भी अंजाम दी थी। इस विवादित इनकाउंटर में पुलिस द्वारा कथित दो आतंकी के अलावा दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का एक इंस्पेक्टर, जो ‘इनकाउंटर स्‍पेशलिस्‍ट’ के नाम से मशहूर था, मोहन चंद शर्मा और एक हवालदार भी घायल हुए थे। बाद में शर्मा की नजदीकी अस्पताल होली फेमिली में मौत हो गयी थी, जबकि हवालदार बच गया। पुलिस के दावे के अनुसार इस मौके पर दो आतंकी घटनास्थल से भागने में कामयाब हो गये जबकि उनके एक साथी मुहम्मद सैफ को वहीं से गिरफ्तार किया गया।
मारे जाने वाले दोनों नौजवानों का संबंध उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से था और ये लोग यहां पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में आये थे। आतिफ अमीन की उम्र लगभग 24 साल थी और वो जामिया में एम ए (मानवाधिकार) प्रथम वर्ष का छात्र था, वहीं साजिद जिसकी उम्र 14 साल थी, दसवीं की पढ़ाई करके यहां ग्यारहवी में दाखिले के लिए आया था। उनके कुछ साथी जामिया नगर में भी रहते थे। फलस्वरूप, इस घटना के बाद जामिया नगर और आजमगढ़ से पुलिस द्वारा उनके साथियों, जानने वालों और दूसरे मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी का सिलसिला चल पड़ा। बहुत सारे लोग उठाये गये, जामिया नगर और आजमगढ़ को ‘आतंक की नर्सरी’ कह कर बुलाया जाने लगा।
लेकिन स्थानीय लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं/संगठनों और कुछ पत्रकारों द्वारा इस ‘इनकाउंटर’ की सच्‍चाई पर पहले दिन से ही सवाल कायम है, जिसका जवाब आज तक नहीं मिल पाया है। इन व्यक्तियों ने पुलिस द्वारा जारी किये हुए विरोधाभासी बयानों को नकारते हुए पूरे मामले की न्यायिक जांच करने की मांग की, जिसे आज तक सरकार ने नहीं माना है। इसीलिए, आज भी, चार साल गुजर जाने के बावजूद इस मांग को लेकर जामिया नगर, लखनऊ और आजमगढ़ में कार्यक्रम हुए और हो रहे हैं। लोगों मानना है कि जब तक इस मांग को स्वीकार नहीं किया जाता हमारी लड़ाई जारी है।
क्या हैं वो सवाल?
पहला सवाल ये था कि क्या पुलिस को पहले से पता था कि उस जगह पर ‘खूंखार-आतंकी’ छिपे हैं? अगर हां, तो पुलिस ने अपने शुरुआती बयानों में क्यूं कहा कि वो तो सिर्फ रेकी करने गये थे। लेकिन क्यूंकि ‘आतंकियों’ ने गोली चला दी, इसलिए जवाबी कार्यवाही करनी पड़ी। और अगर नहीं, तो घटना के दो-तीन घंटे के अंदर ही कैसे पुलिस ने ये घोषित कर दिया कि मारे जाने वाले आतंकी थे? और यही नहीं, अहम सवाल ये है कि अगर पुलिस को पता था, जैसा कि पुलिस ने आतीफ अमीन के मोबाइल को 26 जुलाई 08 से सर्विलांस पर रखे होने का दावा किया था, तो इन लोगों 13 सितंबर का सीरियल ब्लास्ट कैसे किया? पुलिस ने उन्हें पहले गिरफ्तार क्यूं नहीं किया, क्या पुलिस उनके बम धमाकों के इंतजार में थी?
दूसरा अहम सवाल : क्या इस मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी ने बुलेट-प्रूफ जैकेट पहन रखा था? और अगर पहन रखा था तो मोहन चंद शर्मा और बलवंत कैसे घायल हुए? और अगर नहीं, जैसा कि पुलिस के दावा किया था, तो इतने अहम मामले में इतनी असावधानी क्यूं बरती गयी और क्या उन्हें मालूम नहीं था कि वो ‘खूंखार-आतंकी’ उन पर गोली चला सकते हैं और ऐसे में रिस्क लेना उचित नहीं होगा? पुलिस का एक बयान ये भी कहता है कि पुलिस पार्टी बुलेट प्रूफ जाकेट इसलिए पहन कर नहीं गयी क्यूंकि बात फैल जाती और आतंकी भांप लेते और फरार हो जाते। लेकिन उसी समय इस घटना की एफआईआर में कहा गया है कि पुलिस ने रेड करने से पहले दो स्थानीय लोगों को अपने साथ लेना चाहा, पर वो नहीं आये, क्या ऐसा करने बात नहीं फैलती?
तीसरा अहम सवाल : साजिद और आतिफ के शरीर पर मिली चोट, जख्म और गोलियों के निशान क्या बताते हैं? दोनों को दफनाने से पहले, उनके शरीर की ली गयी तस्वीरों से पता चलता है कि वो किसी मुठभेड़ में नहीं मारे गये हैं। साजिद के सर में ऊपर से चार गोलियों के निशान हैं, ये कैसे संभव हुआ? क्या ये निशान ये नहीं दर्शाता कि उसे बिठाकर, उसके सर पर ऊपर से गोली मारी गयी है? या फिर पुलिस वालों ने छत से चिपक कर ऊपर से गोली मारी? इसी प्रकार सवाल ये भी है कि आतिफ की पीठ की चमड़ी पूरी तरह कैसे छिली? उसके पैर पर भी ताजे जख्म के निशान पाये गये, ये सब कैसे मुमकिन हुआ?
चौथा सवाल : एक अहम सवाल ये भी है कि दो ‘आतंकी’ कैसे भागे? जबकि पुलिस का खुद का दावा है कि उन्होंने कार्यवाही से पहले उस गली को पूरी तरह से जाम कर दिया था। यहां पर एक उल्लेखनीय बात ये भी है कि जिस बिल्डिंग में ये घटना हुई, उसमें अंदर जाने और बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है, और ये घटना चौथी मंजिल पर हुई थी, जहां से भागने का भी कोई रास्ता नहीं है। क्या वो वहां से जिन्न या भूत बनकर भाग गये?
पांचवा सवाल : पुलिस ने दावा किया कि साजिद, जिसकी उम्र 14 साल थी, बम बनाने में माहिर था। सवाल ये उठता है कि अगर ऐसा था तो वहां से ऐसी कोई चीज बरामद क्यूं नहीं हुई? आपको जानकर हैरानी होगी कि पुलिस ने जिन चीजों की बरामदगी दिखायी है, उसमें पंचतंत्र की कहानियों की किताब भी है! आखिर सवाल ये है कि पुलिस क्या साबित करना चाहती है? सवाल ये भी है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइंस के अनुसार प्रत्येक अप्राकृतिक मौत की तरह इस घटना की भी न्‍यायिक जांच क्यूं नहीं करवायी गयी? क्यों लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इस पर रोक लगा दी? कुल मिलाकर सवाल बहुत हैं और इन्‍हीं सवालों ने इस घटना के फर्जी होने पर, या कम से कम इसकी वास्तविकता पर सवालिया निशान खड़ा किया हुआ है। और पूरी घटना की न्यायिक जांच की मांग अभी तक जारी है। लेकिन सरकार है कि उसके कान पर जूं ही नहीं रेंगती।
सरकार का जांच न कराने के पीछे बुनियादी तर्क ये है कि वो इस मसले की जांच इसलिए नहीं करवा सकती क्यूंकि इससे पुलिस का ‘मोरल डाउन’ हो जाएगा! सरकार ये भी तर्क देती है क्यूंकि एनएचआरसी जांच कर चुकी है इसलिए मामला साफ हो चुका है। कभी-कभी सरकार ये भी तर्क देती है कि क्यूंकि इस घटना में एक पुलिस वाला भी मारा गया, इसलिए ये साबित होता है कि मामला वास्तविक था और इस पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता!
तो क्या सरकारी दावे सही हैं?
पहला दावा कि इसकी जांच कराने से पुलिस का ‘मोराल डाउन’ हो जाएगा। आखिर सरकार किस पुलिस से मोराल की बात कर रही है, जिसकी करतूतें जगजाहिर है। और इस केस के संदर्भ में बात करें, तो मामला और साफ है कि सरकार जिस स्पेशल सेल को बचाना चाह रही है, अब सब जानते हैं कि उनका असल काम मासूम लोगों को फंसाना, वाहवाही बटोरना और पैसे कमाना है। कल ही प्रकाशित हुई जामिया टीचर्स सॉलिडरिटी असोसिअशन (JTSA) की रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि ये लोग फर्जी केस बनाने और फर्जी मुठभेड़ करने में माहिर हैं। JTSA की ये रिपोर्ट कोई हवाबाजी या बयानों का पुलिंदा नहीं है बल्कि कोर्ट द्वारा दिये गये फैसलों पर आधारित एक शोध है, जो स्पेशल सेल की करतूतों को उजागर कर देता है। दूसरा दावा, कि एनएचआरसी ने इस मामले की जांच की है, बिलकुल झूठा है। एनएचआरसी ने इस मामले में कोई खोजबीन नहीं की है, बस रुटीन कार्यवाही की है। और वो कार्यवाही ये है कि आयोग ने उसी पुलिस डिपार्टमेंट को नोटिस भेज दिया, जिसने ये सब कुछ किया। सो जवाब जो मिलना था सो मिला।
यही नहीं, आयोग ने न ही घटनास्थल कर दौरा किया, न संबंधित व्यक्तियों से मुलाकात की, न उन लोगों से मिले जो लगातार सवाल उठा रहे थे, बावजूद इसके आयोग के अध्यक्ष से हमने समय भी मांगा था। और बिना ये सब किये, पुलिस के जवाब के आधार पर इस पूरे मामले को सही घोषित कर दिया! अगर आपको यकीन नहीं आता हो आज भी आप ये रिपोर्ट देख सकते हैं। क्या इसी को मामले की जांच कहते हैं? और बाद में RTI एक्टिविस्ट अफरोज आलम साहिल द्वारा सूचना के अधिकार के तहत इसी आयोग से निकाली गयी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने और कई सारे सवाल खड़े दिये।
रही बात इंस्‍पेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत की, तो हम भी ये जानना चाहते हैं कि उसकी मौत कैसे और किन हालत में हुई? आखिर उसे हॉस्पिटल पहुंचाने में उतनी देर क्यूं लगी ताकि वह पहुंचते ही मर जाए? जबकि साक्ष्य बताते हैं कि जब उसको ले जाया जा रहा था, तो वह पूरे होशो-हवास में था। साथ ही यहां पर इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि यही मोहन चंद शर्मा कम से कम 8 ऐसे केस में लिप्त है, जिसमें इसने मासूम लोगों को फंसा कर उनकी जिंदगियां बर्बाद कर दी हैं। और ये सारे केस किसी बाटला हाउस ‘इनकाउंटर’ से कम नहीं हैं। फलतः ऐसे व्यक्ति द्वारा अंजाम दी गयी कार्रवाई पर शक का गहराना और लाजिम है।
इसीलिए सरकार को चाहिए, कुछ पुलिस वालों की नौकरी बचने के चक्कर में न्यायिक जांच की मांग कर रहे हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों का मोराल डाउन न करें क्यूंकि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है और उसकी मांग को ठुकराना लोकतंत्र की हत्या है। और इस वक्‍त जनता की मांग बटला हाउस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच है।

09 नवंबर 2011

मुसलमान होने का बोझ

मालेगांव बम विस्फोट केस में फर्जी गिरफ्तारी के बाद 5 साल
 तक जेल में इन 9 लोगों को बंद रखा गया।
अभी-अभी इनको बरी किया गया है। 
------महताब आलम

“दिल्ली में क्रमिक बम धमाके, तुम कहाँ हो?, क्या तुम सुरक्षित हो?” दिल्ली से एक मित्र का मेरे मोबाइल पर एक संदेश मिला। 13 सितम्बर 2008 की देर शाम का समय था। “यह तो भयानक है। मै ठीक हूँ, और बिहार में हूँ। उम्मीद है  तुम और तुम्हारे परिवार के सभी लोग ठीक होगे।” मैंने दिल्ली के दूसरे मित्रों को सूचित करने से पहले ये उत्तर (रिप्लाई) भेजा। मैं बिहार में था और उस साल कोशी क्षेत्र में भयानक बाढ़ से हुई तबाही के दुश्परिणामों का सर्वे और एक वेबपोर्टल के लिए रिपोर्टिंग का कम कर रहा था।

दिल्ली में 13 सितम्बर 2008 को क्रमिक बम धमाकों के साथ सूरज अस्त हुआ, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी और उससे ही कहीं ज़यादह लोग घायल हो गए थे। 30 मिनट के दौरान हुए सभी पाँच बम धमाकों ने तबाही का मंजर पैदा कर दिया था। जब मेरे भेजे हुए सभी संदेशो का सकारात्मक उत्तर मुझे मिला तो मुझे राहत की सांस मिली। मेरे एक सीनियर सहकर्मी ए आर अगवान का अन्तिम उत्तर मुझे आधी रात के बाद मिला, जो पर्यावरण -विज्ञान के पूर्व सहायक प्रोफेसर हैं और जिनके साथ मैंने देश के कई हिस्सों में मानवाधिकारकर्मियों के लिए अनेक वर्कशॉप करवाई है। उन्होंने मुझे संदेश भेजा कि वह सही हैं  और सो रहे थे, इसलिए देर में उत्तर दे पाये।

धमाको खबर से आहत, यह सोचकर कि अब सबसे बीत हो चुका है  मैंने खुद को काम में व्यस्त करने की कोशिश की । लेकिन मैं गलत साबित हुआ। दूसरे दिन दोपहर में दिल्ली के एक सिविल राइट्स ग्रुप, एसोसियेशन फाँर प्रोटेक्शन आँफ सिविल राइट्स (ए पी सी आर) के सचिव की कॉल के बाद मैं बेचैन हो गया। वह परेशान लग रहे थे और खराब नेटवर्क ने समस्या को और बड़ा दिया था। कुल मिलाकर मुझे यह समझ में आया कि दिल्ली में स्थिति खराब है, और प्रमुख रूप से दक्षिणी दिल्ली के जामिया नगर इलाके में, जहाँ मुसमानों की बहुसंख्या रहती है। पूरे इलाके में भय का माहौल व्याप्त था। प्रत्येक धमाके के बाद की तरह पुलिस बिना सोचे मुस्लिम युवाओं की धरपकड़ कर रही थी। मुझसे जितना जल्दी हो सके दिल्ली आने के लिए कहा गया।

मिली जानकारी संतोषजनक नहीं थी, इसलिए मैंने ए आर अगवान को काल करने की कोशिश की क्योंकि वह उसी क्षेत्र के थे। लेकिन मेरे लगातार और पुरे दिन में  20 से ज़यादह कालों का जवाब न मिलने पर मुझे चिन्ता हुई.  उनके ऐसा करना असामान्य था। रमजान का महीना होने के कारण इफ्तार के तुरन्त बाद मैं पास के साइबर कैफे मे दिल्ली का टिकट बुक करने चला गया । टिकट बुक करने से पहले मैंने अपना ईमेल चेक करने के दौरान एक मेल मिला जिससे मै पूरी तरह हिल गया और कुछ मिनटों के लिए अवाक् रह गया. खबर है थी कि  ए आर अगवान को गिरफ्तार कर लिया गया था! उन्हें दिल्ली पुलिस की विशेष सेल (आतंकवाद-विरोधी दस्ते)  द्वारा गिरफ्तार किया गया था

ए आर अगवान एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हैं और कई सामाजिक और मानवाधिकार आंदोलनों  से जुड़े हुए हैं। उन्‍हें साफ छवि वाले, और सरल व्‍यक्ति के रूप में जाना जाता है। इसलिए उनकी गिरफ्तारी पूरे समुदाय के लिए आश्चर्य का विषय थी। जहाँ एक ओर मुसलमान समुदाय इस गिरफ़्तारी को लेकर  सकते में था वही उनके पड़ोसियों को समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हुआ और वो लोग सहमे हुए थे । लेकिन मामला सिर्फ अगवान का नहीं था,  दूसरे कार्यकर्ताओं से बात करने पर पता चला कि सिर्फ अगवान ही नहीं बल्कि उसी क्षेत्र से तीन और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया था। समुदाय के नेताओ सहित सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं की ओर से दबाव बनाने के बाद ही अगवान और दुसरे दो लोगों  को देर शाम रिहा  कर दिया गया। रिहा किए गए लोगों में अदनान फहद नामक नौजवान  भी था जो एक डी टी पी आँपरेटर है और एक छोटे प्रकाशन का व्यवसाय करता है। उन्हें सुबह 11 बजे के लगभग गिरफ्तार किया गया था और देर शाम को लगभग 7.30 बजे रिहा किया गया। इस दरमयान उन से गहन पूछताछ की गई . उनका मानना था, यदि समुदाय के नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं नें दिल्ली पुलिस पर दबाव न बनाया होता तो उनकी अवैध हिरासत और लम्बी रही होती और शायद अभी जेल में होते ।

17 सितम्बर को दिल्ली लौटते ही मैं अगवान से मिलने गया। वह अभी सदमे से उबर रहे थे, उनका कहना था वो उनकी जिन्दगी के सबसे खराब और दुखदायी  छन थे । उन्हे बिल्कुल अन्दाज़ नहीं था कि उन्हे गिरफ्तार क्यों किया गया। "उन्होंने मुझसे धमाके वाले दिन मेरे ठिकाने और उस दिन शाम को मेरी गतिविधियों के बारे में पूछा। मैंने बताया कि मैं घर पर था और दो गैर -मुस्लिम  मित्रों से मुलाकात कर रहा था। वे एक एन जी ओ शुरू करने के लिए चर्चा करने आये थे। इसके बाद उन्होंने मुझसे स्टूडेंट स्लामिक मूवमेंट आँफ इण्डिया (सिमी) और उसके लोगों के बारे में सवाल किये। उन्होंने मुझसे अपने क्षेत्र से कुछ सिमी के लोगों के नाम देने का दबाव डाला, और मैंने उन्हें बताया कि मैं कुछ नहीं जानता। लेकिन वो दवाब डालते ही रहे । " 

 पूछताछ करने वालों ने अबुल बशर के बारे में बार- बार पूछा, जिसे एक महीने पहले ही आज़मगढ़ से गिरफ्तार किया गया था और जिस पर कतिथ रूप से अहमदाबाद के क्रमिक धमाकों का सरगना होने का आरोप था। "मैंने उन्हें बताया कि मैं अबुल बशर के बारे में इससे अधिक और कुछ नहीं जानता जितना कि मीडिया में पढ़ा  है, " अगवान ने उन्हें बताया I   इस उत्तर से संतुष्ट न होकर पूछताछ करने बालों नें उनपर यह आरोप लगाया कि बशर के पास उनका नम्बर था और वह उनके घर पर रुका था। अगवान ने दृढ़तापूर्वक आरोप को खारिज़ किया। "लेकिन उन्हें मुझपे विश्वास नहीं हुआ और वो मुझ पर दवाब डाल रहे थे कि उनकी बात को मान लूं जिसमे थोड़ी हकीक़त भी नहीं थी.  वह मुझसे एक न किये गए 'अपराध' को स्वीकार करवाने की कोशिश कर रहे थे जिससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था। ऐसा लग रहा था कि कोई कानून नहीं है और पुलिस अपने आप में कानून बन चुकी है।" 

अगवान ने मुझसे बताया, "जब उन्हें लगा कि मुझे हिरासत में रखना मुश्किल होगा क्योंकि समाज के कई हिस्सों से मुझे छोड़नें का दबाव बन रहा था, तो उन्होंने मुझे घर छोड़ने के लिए कहा । लेकिन मैंने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। मैंने उनसे कहा कि मुझे डर है कि वह किसी और जगह लेजाकर मुझे प्रताड़ित करेंगे ताकि मैं उनके द्वारा लगाये गये अभियोगों को 'स्वीकार' कर लूँ, जैसा कि पूरे देश के सैकड़ों मुसलमानों के साथ किया जा चुका है। मैंने उनसे अपने परिवार से किसी बुलाकर  मुझे लेने जाने लिये  बोला।"  अवान ने जिस डर का अनुभव किया था उसे सुनकर  मुझे हैदराबाद में 'आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमानों) के खिलाफ अत्याचार' पर हुए एक जन सुनवाई  मे सुनी गईं कहानियाँ याद आ गईं।

वहां हमने दिल दहला देने वाली मनमानी गिरफ्तारियों और प्रताड़ना की कहानियाँ सुनी थी जो कि तथाकथित 'आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध' के पीड़ितों, जेल में बंद अभियुक्तों के परिवारों के सदस्यों और सामाजिक कार्यकर्ताओं नें सुनाई थीं। सब सामान्य शिकायते यह थीं कि उन्हें मुक्कों से, लोतों से बुरी तरह पीटा गया। उन्होंने बताया था कि उन्हें अपमानित करने के लिए और तोड़ने के लिए पूछताछ करने बाले उन्हें घण्टों खड़ा रखते थे और उल्टा लटका देते थे। उन्हें हिरासत में कोई सुविधा नहीं दी गई और उनसे शौचालय का पानी पीने के लिए दबाव डाला गया। कुछ को बिजली के झटके दिये जाते थे पुलिस वाले द्वारा कही जाने वाली बातों को दोहराने के लिए बोला जाता था। एक ने ब्योरा दिया: "पूछताछ करने वाले मेरे साथ लगातार गालियों और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल  कर रहे थे। और ये सब आधी रात के लगभग 1 बजे से सुबह तक प्रताड़ित करने का काम चलता रहता था ।" ज्यादातर लोगों से पहला सवाल पूछा था: "तुम लोग राष्ट्र-विरोधी क्यों बन गये हो? तुम सभी खूनी पाकिस्तानी हो।"

प्रताड़ना सिर्फ उन्हीं तक सीमित नहीं थी जिन्हे गिरफ्तार किया गया था, पुलिस उनसे 'अपराध' स्वीकार करवाने के सभी हथकंडो का स्तेमाल कर रही थी। और इसका एक तरीका था परिवार के लोगो को भी प्रताड़ित करना । अतुर रहमान, जिनकी उम्र 60 साल से ज़यादह थी अपने परिवार के साथ मुंबई में रहते थे और  जुलाई 2006  के मुंबई धमाकों के सम्बन्ध में  उनके एक इन्जीनियर बेटा को भी अभियुक्त बनाया गया है ! उन्होंने हमें बताया था,  "मेरे घर पर रात में छापा मारा गया और मुझे किसी अनजान जगह पर ले जाया गया। सात दिनो तक मुझे गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के बाद, 27 जुलाई 2006 को मुझे औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया, और मेरे खिलाफ एफ आई आर दर्ज की गई। मैं, मेरी पत्नी, मेरी बेटियों और मेरी बहू से मेरे गिरफ्तार बेटों के सामने परेड करवाई गई और पुलिस अधिकारियों द्वारा लगातार अभद्र-व्यवहार किया गया। मुझे और मेरे बेटों को एक दूसरे के सामने पीटा गया। ए टी एस वाले परिवार की महिलाओं को हर दिन बुलाते थे और मेरे गिरफ्तार बेटों के सामने उनसे बुर्का उतारने को कहते थे। उनके अपमान के साथ मेरे बेटों को महिलाओं के सामने अपमानित किया जाता था। एक अधिकारी ने मुझे पीटा और धमकी दी कि मेरे परवार की महिलायें बाहर हैं और यदि मैंने अपने बेटों और पुलिस के सामने अपने कपड़े न उतारे तो उन्हें नंगा कर दिया जायेगा । उन्होंने दूसरे गिरफ्तार अभियुक्तों को बुलाया और मैं उनके सामने कपड़े उतारकर नंगा हो गया.... "

19 सितम्बर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके के  बटला हाउस में हुई कथित  'मुठभेड़', जिसके फर्जी होने के बहुत सारे सबूत हैं, मुस्लिम नौजवानों कि गिरफ्तारियों में बढ़ोतरी हुई। उसी साल 23 सितम्बर को हम लोग पुलिस के बढ़ रहे दमन और समुदाय विशेष के लोगों खास तौर पर युवाओं को निशाना बनाये जाने और उन्हें प्रताड़ित किये जाने निति से निपटने के लिए,  वकीलों, सामाजिक- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, शिक्षाशास्त्रियों और सामुदायिक नेताओं कि एक मीटिंग चल रही थी. अभी मीटिंग ख़तम भी नहीं हुई थी कि  हमे खबर मिली कि एक जामिया नगर से  17 साल के लड़के साकिब को उठा लिया गया है। क्यूंकि खबर ये थी कि कुछ 'अनजान'  व्यक्ति ने लड़के को उठाया था इसलिए हमने क्षेत्रीय पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने का फैसला किया।

जब हम थाना पहुंचे तो पहले-पहल पुलिस वालों ने टाल -मटोल करना शुरू किया ।  वह हमसे मिलने तक के लिए अनिच्छुक थे लेकिन बाद में वरिष्ठ वकीलो, जामिया के शिक्षकों और पत्रकारों के दबाव के चलते हमारी शिकायत दर्ज कर ली गई। लेकिन हमें थोड़ी ही देर बाद सूचना दी गई कि दिल्ली पुलिस की विशिष्ट सेल ने सकीब को 'पूछताछ' के लिये  उठाया है । पर मामला इतना असं नहीं था, बल्कि मामला यूं था कि वो सकीब के घर उसके बड़े भाई को उठाने के लिए गए थे लेकिन उसके न मिलने की वजह से (सौभाग्यवश उस वक़्त वो हमारे साथ उस मीटिंग में था) उसे नंगे पांव टीशर्ट और पजामा पहने हुए ले गए. जिस गाड़ी पर बिठा कर ले गए थे उसमे नंबर प्लेट नहीं था और सारे के सारे लोग सदा कपडे में थे । जब उच्चतम न्यायालय के वकील कोलिन गोनाज़ाल्वेस और लड़के के रिश्तेदार विशिष्ट सेल के पास गये तो पुलिसवालों साफ-साफ बल्कि निर्लाजता पूर्वक कहना था : "उसके भाई को सौप दो और इसे लो जाओ!"

अफ़सोस ये है कि ये सिर्फ एक  साकिव की कहानी नहीं है. पिछले दस वर्षो में  लोगों को लगभग हर दिन अंधाधुंध उठाया जाता है और परेशान किया जाता है, कुछ को बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाता है। ज्यादातर शिकार ज्यादा परेशानी से बचने के लिये चुप रहते है। वे इससे भी डरते हैं कि अगर लोग ये जान जायेंगे कि उनके साथ ऐसा कुछ हुआ है तो, 'संदिग्ध व्यक्ति' को कोई भी काम नहीं देगा या घर किराये पर नहीं देगा और यहाँ तक कि शादी में भी परेशानी होगी. उनका शक ग़लत नहीं है कईयों के साथ ऐसा हो चुका है,  कई भीख मांगने पर मजबूर हैं ।

दिल्ली में बम धमाकों और बटला हाउस 'मुठभेड़' के तीन साल बाद भी जामिया नगर और दुसरे मुस्लिम इलाकों  के निवासी डर मे जी रहे हैं। एक ऐसी स्थिति बना दी गई है कि हर मुसलमान को, आतंकवादी नहीं तो कम से कम  तो संदिग्ध  या आतंकी समर्थक के रूप में देखा  जाता है। एक बदनाम एस एम एस भी है कि: "हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान है।"  जो पहली बार जुलाई 2006 के मुंबई धमाके के बाद लोगों ने एक दुसरे को भेजना शुरू किया था आज भी प्रचारित किया जा रहा है. जनता के एक बड़े हिस्से में एक अवधारणा बन गयी है या कम से कम बनाने कि कोशिश की जा रही  कि मुसलमान संभावित आतंकवादी होते हैं, चाहे वह इस्लाम में विश्वास करने वाला हो, अनीश्वरवादी हो और नास्तिक हो।
शाहीना के केस को ही ले लीजिये, जो एक पत्रकार और घोषित अनीश्वरवादी भी । उन्होंने इसी वर्ष , एक पुरस्कार लेते समय, घोषणा की थी: "देखिये मैं मुसलमान पृष्ठभूमि से आती हूँ, लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूँ।" उसे इस स्पस्तीकरन की ज़रुरत इस लिए पड़ी क्यूंकि अगर आप अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं तो आपको स्वतः एक खाके में डाल दिया जायेगा. शाहीना को इसका व्यक्तिगत अनुभव है इस लिए वो भली-भांति जानती है, उस पर  अब्दुल नासिर मदानी केस में गवाहों को 'डराने-धमकाने'  झूठा आरोप लगाया गया है । उसका  एकमात्र 'अपराध' यह है  कि उसने  केरल के पीपुल्स डेमोक्रेटिक  पार्टी के नेता नासिर मदानी के केस की छान-बीन की थी, जो कि बंगलौर के बदनाम बिस्फोटों के अभियुक्त थे ! तहलका पत्रिका ( जिसकी वो वरिष्ट संवाददाता थी)   में छपे एक रिपोर्ट  के रूप में, जो तथ्यों पर आधारित था, और ये  सवाल पूछा था कि: "यह व्यक्ति अभी तक जेल में क्यों है?"  याद रहे की मदानी 1997 के कोयंबटूर विस्फोट के केस में विचाराधीन कैदी के रूप में 10 साल पहले ही बिता चुके हैं और 2007 मे वो रिहा कर दिये गये थे।

मैं भी व्यक्तिगत रूप से यह पक्षपात झेल चुका हूँ। लेकिन शुक्र कि बात है है कि दूसरो कि तरह उतना कुछ नहीं झेलना पड़ा जितना आम तौर पर झेलना पड़ता है. घटना  जुलाई 2008  की है हम झारखण्ड में जेलों और कैदीओं की स्तिथि जानने के किये  एक  फेक्ट-फाइन्डिंग के लिए गिरिडीह जेल में दौरे पर थे कि मुझे और मेरे दो मित्रों को माओवादी होने का आरोप लगा कर हमें पांच घंटों तक अवैध हिरासत में रखा गया.   बाद में पी यू सी एल के झारखण्ड के महासचिव शशी भूषण पाठक, जो कि पूरे दौरे के आयोजक थे और जिन्होंने छुड़ाने के लिए अधिकारियों से बात की थी, ने मुझे बताया कि गिरिडीह के एस पी मुरारी लाल  मीना ( जो अब झारखण्ड पुलिस का इंटेलिजेंस चीफ है )   ने उनसे कहा था: "यह आदमी (यानि मैं) क्यूंकि बिहार के सीमांत इलाके सुपौल  का रहने वाला है जो नेपाल की सीमा पर है और जामिया मिलिया स्लामिया, नई दिल्ली, में पढ़ा हुआ है, इसीलिए वह पक्का आतंकवादी है!" उसने हमे उसी जेल की सलाखों के पीछे कैद करने की धमकी दी थी, कम से कम एक साल तक जमानत की किसी उम्मीद के बिना।

इसी  साल जुलाई में हुए  मुंबई बिस्फोट से कुछ ही दिनो पहले, मिड-डे ग्रुप के एक मुसलमान फोटो-पत्रकार, साईद समीर आबिदी  को यातायात जंक्शन और एक हवाई जहाज के सामान्य फोटो खींचने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था। उसे धमकाया गया, अभद्र व्यवहार किया गया और उसके मुस्लिम नाम के कारण उसे आतंकवादी कहा गया। मिड-डे की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस स्टेशन पर उसके केस के जांच अधिकारी सब-स्पेक्टर अशोक पार्थी ने जब घटना के बारे मे पूछा और उसने सब बता दिया, और कहा मैंने कुछ ग़लत नहीं किया है. इस पर अधिकारी गुस्से में आ गया और उसने कहा, : "ज्यादा बातें मत करो। चुप रहो और जो हम कह रहे हैं उसे सुनो। तुम्हारा नाम साईद है, तुम एक आतंकवादी और एक पकिस्तानी हो सकते हो।"

दुर्भाग्य से यह पक्षपात सिर्फ पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों तक ही सीमित नहीं है। जन साधारण भी सोचते हैं कि हर आतंकी हमले के लिए मुसलमान जिम्मेदार है। और ये यह कोई नई बात नहीं है। वास्तव में हर दिन यह स्थिति और बिगड़ती जा रही है।  वर्ष 2001 की बात है, में ट्रेन से पटना जाते समय मेरा ध्यान एक बूड़े आदमी की तरफ गया जो टोपी पहने बैठे एक कम उम्र के मुसलमान नौजवान से अंग्रेजी की कोई पत्रिका बार-बार माँग रहा था जिसे वह नौजवान अत्यंत एकाग्रता के साथ पढ़ रहा था। इस नौजवान ने शिष्टतापूर्वक बूड़े व्यक्ति से उसे पूरा लेख पढ़ लेने तक इन्तजार करने के लिए कहा। नौजवान के ऐसा करने पर उस नौजवान को गालीयाँ देने लगा और उसे और दूसरे मुसलमानो पर आतंकवादी होने का आरोप लगाने लगाने लगा जो कि उसके मुताबिक अमेरिका को तबाह करने के बाद अब भारत की सुरक्षा को नष्ट कर रहे है। वह कहता रहा, सभी मुसलमान पाकिस्तानी हैं, और उन्हे वहीं चले जाना चाहिए। उस समय मेरी उम्र  15 साल थी और एक मुसलमान की तरह पहचाने जाने से बच रहा था, इसलिए मैंने कोइ टिपण्णी  करना उचित नहीं समझा। आगे मामला तब और थम गया जब उस नौजवान ने बूड़े आदमी को वह पत्रिका दे दी (जिसे उस बूड़े व्यक्ति ने बेशरमी से यह कहकर वापस कर दिया कि उसे अंग्रेजी पढ़ना नही आता)।

एक किशोर के रूप में, मैंने इस बात पर बहुत ज्यादा ध्यान न देने की कोशिश की| लेकिन  पिछले तीन वर्षों में, मैंने अक्सर अपने आप से यह प्रश्न पूछा है: क्या मैं सुरक्षित हूँ? ईमानदारी से कहूँ तो, मुझे इस पर शक है| और मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि साधारण मुसलमान युवा, जो अगवान या मेरे जैसेलोगों की तरह एक बड़े एक नेटवर्क से नहीं जुड़े है |  आज की  हकीक़त ये है किसी भी विस्फोट के बाद हर मुसलमान (खास तौर पर नौजवान, जिसमे लडकिया भी शामिल हैं क्यूंकि वो इशरत का हाल देख चुकी हैं )  अपने को असुरक्षित महसूस करने लगता है| चाहे ये बात कितनी ही कडवी हो, आज भारत में मुसलमान होने का मतलब, मुठभेड़ों के डर में रहना है, लगातार आतंकवादी होने का डर, ये पता होना कि कभी भी अवैध तरीके से पकड़ा जा सकता है, कठोर अत्याचार किया जा सकता है, यहाँ तक कि जान से भी मारा जा सकता है| कब तक भारत के मुसलमानों को मुसलमान होने का बोझ सहन करना होगा? असुरक्षा की यह भावना हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है| मेरे पास अभी भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है, 'क्या यह कभी खत्म नहीं होगा?' जो कि एक बार मेरी शिक्षिका ने पूछा था, जब मैंने उन्हें आजमगढ़ के मोहम्मद अरशद नाम के एक विद्दार्थी के अवैध रूप से पकडे जाने के बारे में बताया था. में आशा करता हूँ कि उनके सवाल का सकारात्मक जवाब मैं जल्द ही दे पाऊँगा ।

(नागरिक अधिकार एक्टिविस्ट और स्वतंत्र पत्रकार, महताब आलम मानवाधिकार आंदोलनों से जुड़े हुए हैं । उनसे पर activist.journalist @gmail.com संपर्क किया जा सकता है ।)
अनुवाद: राजकुमार