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08 नवंबर 2012

आफ़्सपो से आफ़्सपा और इरोम शर्मिला

-दिलीप खान
जब कोई चीज़ चर्चा से बाहर होने लगे तो उसे सामान्यत: अप्रासंगिक मान लेना चाहिए। कम से कम जिनके बीच होने लगे उस गलियारे से अप्रासंगिक मान लेना चाहिए। 4 तारीख़ राजनीतिक हलकों के लिए काफ़ी कसरती दिन था। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तोरण द्वार खोलने के कैबिनेट के फ़ैसले पर सफ़ाई दे रही थी और बता रही थी कि कांग्रेस देश के लिए कितनी ज़रूरी है। पटना के गांधी मैदान में नीतीश कुमार बिहारियों के भीतर बिहारीपने को ललकार कर हवा भर रहे थे और बता रहे थे कि कि 2014 के लिए जद(यू) क्यों ज़रूरी है। हिमाचल में भाजपा और कांग्रेस, दोनों सुबह से कतारबद्ध मतदाताओं की ओर टकटकी बांधकर हवा का रुख भांप रही थीं कि कुर्सी किसको मिलने वाली है। मुरली मनोहर जोशी सहित भाजपा के कई नेता गधे के आगे बीन बजाकर ये दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि भाजपा करिश्माई पार्टी है लिहाजा दूसरे दलों के बहकावे में आने से बचे! पहली लाठी के लिए जेपी को भी दो-तीन बार याद किया गया लेकिन उस दिन 12वें साल में पहुंचने वाले इरोम शर्मिला के अनशन का ज़िक्र कहीं नहीं आया। राजनीतिक पार्टियां तटस्थ बनी रहीं। 12 सेकेंड भी ख़र्च नहीं किया किसी पार्टी ने। चर्चा-कुचर्चा कुछ नहीं। विरोध-समर्थन कुछ नहीं। यानी इरोम के होने-न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है। अप्रासंगिक होना और क्या होता है?

इरोम शर्मिला
इस लेख में तीन-चार बिंदुओं पर चर्चा की जाएगी। पहला, संसदीय राजनीति में आंदोलन का असर और मुद्दे। दूसरा इरोम शर्मिला की राजनीति और तीसरा आफ़्सपा और भारतीय राज्य। इसमें कोई संदेह नहीं कि पहले साथ-साथ फिर अलग हुए अन्ना हज़ारे और अरविंद केजरीवाल ने बीते दो सालों में देश में सबसे ज़्यादा सुर्खियां बटोरी है। इन दो वर्षों में भ्रष्टाचार सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर देश के सामने पेश हुआ है। संसद से लेकर मीडिया तक सबसे ज़्यादा इन्हीं मुद्दों पर बहस करते नज़र आए। हालांकि बीच-बीच में क्षेपक के तौर पर काला धन और महंगाई ने भी अपनी अहमियत दिखाई है, लेकिन भ्रष्टाचार इन पर इक्कीस पड़ा है। अन्ना और केजरीवाल अपने आंदोलन को गांधीवादी बताते हैं और इरोम शर्मिला चानू भी खुद को ऐसा ही कहती हैं। दोनों का एकसूत्रीय एजेंडा है जो एक क़ानून और विधेयक के बनने-हटाने की मांग करता है। अन्ना-केजरीवाल (एक साथ नाम ले रहा हूं) जनलोकपाल विधेयक लाना चाहते हैं और इरोम शर्मिला सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (आफ़्सपा) हटाना चाहती हैं। लेकिन, मध्यवर्ग और भारतीय संसद के लिए दोनों के असर का आयतन अलग-अलग है। पूरे देश का मध्यवर्ग भ्रष्टाचार को अपना मुद्दा मानता है, जबकि उत्तर-पूर्व और कश्मीर से बाहर रहने वाले लोगों को सामान्यत: आफ़्सपा से कोई मतलब नहीं है। यह किसी भी तरह उनको परेशान नहीं करने जा रहा। दिल्ली के जंतर-मंतर  और इंफाल से संसद और समाचार चैनल के दफ़्तर की दूरी बराबर नहीं है लिहाजा असर भी बराबर नहीं होगा। यह बात बाकी लोगों की तरह इरोम भी जानती है। वह जानती है कि उनका अनशन मिसाल बनने तक तो ठीक है लेकिन बेअसर है। मणिपुर के सेव शर्मिला सोलिडैरिटी कैंपेन (SSSC) के कार्यकर्ताओं ने रामलीला मैदान में उस दिन पर्चा भी बांटा था जिस दिन अन्ना हज़ारे 13 दिनों के बहुचर्चित अनशन का ख़ात्मा कर रहे थे। हालांकि उन पर्चों का इंडिया अगेंस्ट करप्शन पर कोई असर नहीं पड़ा। लेकिन बरास्ते मीडिया मणिपुर में अन्ना का असर पड़ रहा था। इरोम ने अन्ना से गुजारिश की कि वो मणिपुर आएं। फ़ौजी पृष्ठभूमि वाले अन्ना आफ़्सपा का विरोध करने क्योंकर मणिपुर जाते?

अन्ना हज़ारे और इरोम शर्मिला में आफ़्सपा के मुद्दे पर अंतर होने के बावज़ूद राजनीतिक साम्यता है। सांगठनिक मामले में तो इरोम का अनशन और ज़्यादा व्यक्तिवादी है। मणिपुर में जो संगठन आफ़्सपा के मुद्दे पर बने भी हैं उनमें इरोम को लेकर हमदर्दी ज़्यादा आफ़्सपा का विरोध कम है। सेव शर्मिला सोलिडैरिटी कैंपेन जैसे दसियों संगठन वहां पर हैं जो इरोम को केंद्र में रखकर बने हैं। इरोम निश्चित तौर पर दमनकारी भारतीय सेना के विरोध की एक बड़ी प्रतीक है, लेकिन अंतत: वह समाधान कहां तलाश रही है, ये एक अहम सवाल है।  

आफ़्सपा जैसे राजनीतिक सवालों को वो ईश्वर के भरोसे हल करना चाहती हैं। एक राजनीतिक अनशन में वो आध्यात्मिकता-जैसा-अहसास क्यों तलाशती है? सितंबर 2011 में उन्होंने अपने अनशन की सफ़लता की उम्मीद जाहिर करते हुए कहा, हमें ईश्वर में गहरी आस्था है और वो शीघ्र ही न्याय करेगा। सबसे लंबे अनशन के रिकॉर्ड से क्या भारतीय राज्य आफ़्सपा हटा देगा? राज्य भी इस अनशन को उसी रूप में देख रहा है। 10 साल होने पर याद किया गया था। 12 साल पर याद नहीं किया गया। संभव है 20 या फिर सिल्वर जुबली 25 में राज्य उन्हें फिर से याद करे। मनमोहन सिंह, चिदंबरम या फिर आडवाणी, सोनिया और सुषमा की नींद क्यों किसी इरोम के भूखे रहने से उड़ेगी, जबकि ये सब जानते हैं कि देश में रोज़ भूखे रहने वालों की संख्या लाखों में हैं! अन्ना के 13 दिनों में इन सबको बेचैनी थी क्योंकि वो लाख-दो लाख लोगों को लेकर रामलीला में बैठे थे और अलग-अलग राज्यों में कुछेक हज़ार लोग तैयार बैठे रहते थे।

बारह साल पहले जिस 2 नवंबर की घटना को देखकर इरोम ने 4 नवंबर को अनशन का फ़ैसला लिया था तब से लेकर अब तक क्या बदला? कई लोग 2 नवंबर से ही अनशन गिनते हैं जबकि दो नवंबर को इरोम शर्मिला हमेशा की तरह वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थीं। दर्शन की धुरी सचमुच अन्ना और गांधी के पास ही है उनकी! इरोम को समर्थन देने वाले मणिपुर के कई लोगों से निजी बातचीत में मैंने पाया है कि उनकी तुलना करने की दृष्टि ग़लत दिशा में होती है। मसलन मणिपुर में आफ़्सपा है लेकिन छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं है? छत्तीसगढ़ में तो माओवादी ज़्यादा उत्पाद करते हैं!
इरोम को लेकर धरना-प्रदर्शन

इस सवाल को दूसरे तरीके से देखने पर लगता है कि मणिपुर की पूरी लड़ाई सचमुच यही है। इसके लिए मणिपुर में आफ़्सपा के इतिहास को देखा जाना चाहिए और समझा जाना चाहिए कि एक समूची राष्ट्रीयता तो दबाने के लिए ही वहां आफ़्सपा लाया गया था। छत्तीसगढ़ के साथ ये बात लागू नहीं होती थी लिहाजा वहां आफ़्सपा नहीं है। वहां दूसरे क़ानून है। जनसुरक्षा आदि के नाम पर बने क़ानून जोकि भारतीय राज्य के लिए उस समय की ज़रूरत थी। लेकिन ये इरोम का सवाल नहीं है। इरोम चाहती हैं कि आफ़्सपा के बग़ैर भारत मणिपुर में रहे। नतीजतन हो ये रहा है कि लगातार सत्ताधारी लोग मणिपुर को ठग रहे हैं। जब मांग पर आकर सुई टिक जाती है कि सरकार से ये हमारी मांग है तो सरकार का कद बहुत बढ़ जाता है। वह निर्णय लेने की स्थिति में होती है कि मांग को माने या फिर ठुकराए। बहुत दिन नहीं हुए जब इसी साल विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने कहा था कि दोबारा सत्ता में आने पर वो मणिपुर से आफ़्सपा ख़त्म करेंगे। (ज़ोर इस पर था कि केंद्र में भी अपनी सरकार है इसलिए वो मेरी सुनेगी।) अब तक कुछ नहीं हुआ, उल्टे बाद में उनका बयान आया कि मणिपुर में अभी ऐसी स्थिति नहीं हुई है। 11 अगस्त 2004 को जब ग्रेटर इंफाल से आफ़्सपा हटाया गया उससे पहले तक इंफाल को भी हटाने की स्थिति में नहीं गिना जाता था। अब वहां सब ठीक-ठाक है, लेकिन बाक़ी इलाक़ा उस योग्य नहीं हुआ है! 2004 में आफ़्सपा को लेकर मणिपुर में तेज आंदोलन चले थे। लगातार। कुछ इलाकों से हटाकर राज्य ने उन्हें शांत कर दिया। राजधानी को दुरूस्त करने के बाद तलछट पर ज़्यादा हल्ला नहीं होता। एक रस्मी मामला चलता रहता है। मणिपुर को अलग राष्ट्र बनाए जाने के मुद्दे पर जो दिल्ली वाले नाक-भौंह सिकोड़ते हैं उनको मणिपुर के बारे में चार घटनाओं की जानकारी नहीं होती हैं। मुख्यमंत्री का नाम भी नहीं जानते होंगे! सिर्फ़ हिस्सेदारी पर सीना तान खड़े हो जाते हैं। ये सच है कि भ्रष्टाचार की तरह मणिपुर ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ नहीं है बल्कि यह राष्ट्रीयता का मुद्दा है। इसमें कश्मीर भी जुड़ा है, मेघालय भी और नागालैंड भी।

उत्तर-पूर्व और कश्मीर में लगे आफ़्सपा को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रूरत है। मणिपुर या फिर असम भारत का हिस्सा कैसे बने इसे भी समझा जाना चाहिए। कई राज्यों को खुद में समेटे असम पर अंग्रेज़ों ने जब अधिकार जमाया था तो उसमें भारत की भूमिका शून्य थी। इतिहास में सब दर्ज़ है। 1826 में यांदबू की संधि अंग्रेज़ और बर्मा के बीच हुई थी और इसी संधि के बाद असम ब्रिटिश भारत के कब्जे में आया। यानी मूल रूप से बर्मा ने असम को अंग्रेज़ को सौंपा। जब भारत से अंग्रेज़ गए तो उस समय भी मणिपुर या फिर त्रिपुरा भारत का हिस्सा नही था। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में साफ़ कहा गया है कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत रहने वाले सभी प्रिंसली स्टेट अब आज़ाद रहेंगे। यानी मणिपुर को एक अलग राष्ट्र के तौर पर अंग्रेज़ों से आज़ादी मिली। 1947 में मणिपुर ने अपने संविधान के मुताबिक़ आम चुनाव करवाया। 1949 में जाकर भारत ने मणिपुर पर दावा ठोका। तब से लेकर अब तक मणिपुर में भारत की स्वीकृति कभी भी बड़े स्तर पर नहीं रही।

आफ़्सपा क्या अंग्रेज़ों के जाने के बाद का विचार है? जवाब है- नहीं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए लॉर्ड लिनलिथगो ने आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर ऑर्डिनेंस (आफ्सपो) लागू किया था। अंग्रेज़ों ने जाते-जाते भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में इसे रद्द कर दिया। फिर बाद में ‘आज़ाद भारत’ में इसे उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए 1958 में पुनर्जीवित किया गया। एक छोटा सवाल है? क्या भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लागू हुए आफ़्सपो को हटाने के लिए कोई अलग आंदोलन चला था? अपने इतिहास की अब तक की जानकारी में मैंने ऐसे किसी आंदोलन को नहीं देखा-सुना है। आंदोलन जब भी हुआ अंग्रज़ों को भारत से भगाने के लिए हुआ। इरोम का आंदोलन आफ़्सपो (आफ़्सपा) को हटाने के लिए है।
ओह! आई सी..सो दिस इज़ आफ़्सपा!
आफ़्सपा लागू करने के लिए 1958 में तात्कालिक कारण के तौर पर असम के नगा हिल्स में जातीय संघर्षों से निपटना बताया गया। अब तक भारतीय राज्य उससे नहीं निबट पाई। लगातार ऐसे संघर्ष भी बढ़े हैं और प्रतिबंधित संगठनों की सूची में नए नाम भी। नाभिकीय श्रृंखला प्रतिक्रिया-जैसा-कुछ हो रहा है देश में। माओवाद को राज्य ख़त्म करना चाहता है, मुंआ बढ़ जाता है। दो राज्य, तीन राज्य से 18 राज्य! हे ईश्वर!! 1958 में आफ़्सपा लागू करने में भारतीय संसद इतनी जल्दबाजी में थी कि दो घंटे की बहस में ही यह फ़ैसला ले लिया गया। अब लोकपाल पर दो-दो, तीन-तीन दिन ‘अनिर्णीत बहस’ चलती है! यही प्राथमिकता दिखाता है। 18 अगस्त 1958 को इसे पारित करते समय मणिपुर के अलावा दूसरे प्रांत के भी कई सांसदों ने इसका विरोध किया था, लेकिन बहुमत का मतलब लोकतंत्र होना होता है, संसद ने इसे साबित किया।

“यह काला क़ानून है...हम कैसे यह सोच भी सकते हैं कि एक सैनिक अधिकारी के पास किसी को गोली मारने या फिर बिना वारंट किसी को गिरफ़्तार करने का अधिकार होगा? यह ग़ैरक़ानूनी क़ानून है।” - श्री एल. अचाव सिंह

“हथियारबंद सैनिकों से समस्या का समाधान नहीं होगा।”- रुंगसुंग सुइसा

“यह मार्शल लॉ है। हमें कनसंट्रेशन कैंप से भरा आज़ाद भारत नहीं चाहिए जहां एक हवलदार के पास ये हक़ हो कि वह किसी नागरिक को शक की बिनाह पर गोली से उड़ा दे।”- श्री महंती

संसद में बहस के दौरान ऐसे कई मुद्दे उभरे, लेकिन वो आफ़्सपा को लागू होने से रोकने के लिए नाकाफ़ी रहे। बिना आपातकाल लागू किए इसे लागू नहीं करने की बात भी उठी। लोकसभा उपाध्यक्ष सरदार हुकम सिंह ने कड़ी निंदा की। फिर भी आफ़्सपा लागू हुआ। बेहद जल्दबाजी में भारतीय राज्य ने इसे मणिपुर सहित समूचे उत्तर-पूर्व पर थोपा। कश्मीर तो बहुत बाद में 1990 में इसकी जद में आया। फिर गाहे-बगाहे थोथेबाज़ी की तरह संसद में आफ़्सपा उठता रहा और सांसदों की ज़ुबान से यह शब्द फिसलता रहा। 11 दिसंबर 2006 को शून्यकाल में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इसे दमनकारी बताते हुए हटाने की मांग की थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे हटाने की मांग उठी। इसी साल 6 मार्च को संयुक्त राष्ट्र में यह मांग उठी। फिर संयुक्त राष्ट्र की तरफ़ से मामले की तहकीकात के लिए क्रिस्टॉफ हेन्स भारत आए थे जिन्हें मणिपुर जाने की इजाजत ही नहीं मिली। यानी भारतीय राज्य ने हेन्स को मणिपुर जाने देने की इजाजत दिए बग़ैर आफ़्सपा को समझने का स्पेस दिया। हेन्स साहब कश्मीर और असम होकर लौट गए। बहरहाल, आफ़्सपा को उन्होंने दमनकारी काला क़ानून बताया। इंटरनेशनल कोवेनैंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (ICCPR) के हस्ताक्षरी होने के कारण भी भारत आफ़्सपा लागू नहीं रख सकता। उसके अनुच्छेद 6, 9 और 14 से आफ़्सपा का भाग 4 टकराता है। लेकिन फिर भी लागू है।

 
इसे लागू रखने के समर्थकों की तरफ़ से मूर्खतापूर्ण दलीलों में कमी नहीं आती। राष्ट्र की सुरक्षा से लेकर पता नहीं क्या-क्या! 1991 में भारत के अटॉर्नी जनरल जी रामास्वामी ने कहा कि आफ़्सपा उन-उन इलाकों में लागू है (और इसे लागू रहना भी चाहिए) जिनकी सीमाएं विदेशों से सटती है। यह एहतियातन है। विदेशी लोग स्थानीय लोगों में घुल-मिलकर राष्ट्र के बारे में भड़काते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि मणिपुर चीन से उतनी ही दूर है जितना चंडीगढ़! आफ़्सपा के लागू होने के बाद से उन इलाकों में क्या-क्या हुआ यह अब छिपा हुआ सत्य नहीं है। यह देश पहले वीरता पुरस्कार देता है और बाद में ‘देश के जवान’ पुरस्कार पाने वाले को गोली मारते हैं। ‘देश के जवान’ बलात्कार करते हैं और फिर उसके निशान मिटाने के लिए गुप्तांग में गोली मारते हैं। पूछे जाने पर ‘जवानों’ का तर्क होता है कि भागने पर उन्होंने गोली चलाई। ओह! निशाना देखिए भारतीय सैन्य बलों का! ...और भारतीय राज्य इन सबको जारी रखना चाहता है। वह चाहता है कि जवानों को इस तरह की करतूत को अंजाम देने के लिए क़ानूनी संरक्षण हासिल हो।

मणिपुर में भारतीय राज्य के रवैये को लेकर नाराजगी रही है और ये सिर्फ़ आफ़्सपा तक सीमित मामला नहीं है। आफ़्सपा के बग़ैर भारत को स्वीकारना आर्य समाजी राजनीति जैसा है जिसमें धर्म के खर-पतवार को बीनकर शुद्धता में इसे अपनाने को कहा जाता है। जब फ़ौजी पृष्ठभूमि (और पुख़्ता फ़ौज प्रेम) वाले अन्ना को चिट्ठी लिखकर फ़ौज के अधिकार छीनने के लिए शर्मिला चिट्ठी लिखती हैं तो वो किस राजनीतिक ज़मीन पर खड़ी हैं? अपनी चिट्ठी में इरोम कहती हैं कि भ्रष्टाचार हर समस्या की जड़ है, आइए मणिपुर से इसे भगाने के लिए आंदोलन कीजिए। मणिपुर के राजनीतिक हालात को देखते हुए अगर पूछे तो ये किस तरह की समझदारी है? पुरस्कार लेने से हाल में इरोम ने मना किया है लेकिन इससे पहले शिक्षा बाज़ार में पैसा पीटने वाले अरिंदम चौधरी की संस्था आईआईपीएम से उन्होंने ‘रविन्द्रनाथ टैगोर शांति पुरस्कार-2010’ लिया। आईआईपीएम अब देश में शांति की परिभाषा तय करने में लगा है और इरोम उसको वैधता दे रही हैं!

मनोरमा देवी की हत्या के बाद जब भारत सरकार द्वारा गठित जीवन रेड्डी समिति ने आफ़्सपा को हटाने की सिफ़ारिश की। पी चिदंबरम ने हाल की अपनी एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि रिपोर्ट पर विचार चल रहा है। यानी 2005 से लेकर अब तक मामला विचाराधीन ही है! हालांकि रेड्डी समिति ने वहां पर ‘थोड़े नरम’ क़ानून की वकालत की है। ये नरमी आफ़्सपो से आफ़्सपा होना या फिर पोटो से पोटा होने जैसा ही है! यदि आफ़्सपा का नरम रूप मणिपुर में लागू होता है तो क्या इरोम अनशन तोड़ देंगी? उनकी मांग तो यही है!

न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसी हफ़्ते मणिपुर के बाबत सरकार को लताड़ लगाई है कि वो जल्द इस पर कुछ करें क्योंकि मणिपुर में रोज़-रोज़ बेकसूर मारे जा रहे हैं। कुछ नहीं रुका है। सब समानांतर चल रहा है। हत्याएं चल रही हैं, अनशन चल रहा है। मीडिया की अपनी रिपोर्टिंग चल रही हैं। अन्ना के आंदोलन के पहले अध्याय यानी 2011 के वक्त मीडिया इरोम के निजी ताल्लुकात पर ख़बरें छापता रहा। टेलीग्राफ़ को मणिपुर में जलाया गया। कुछ संगठनों ने पाबंदी लगा दी। मीडिया पर इस लेख में कुछ नहीं कहा जाएगा। कभी बाद में चर्चा।   

30 जुलाई 2012

घर के आगे कार चाहिए हड़ताल नहीं!


-दिलीप ख़ान

बंबई में 1918 में जब आम हड़ताल हुई थी तो उसमें 1,20,000 से ज़्यादा मज़दूरों ने हिस्सा लिया था और हड़ताल को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने लगभग 200 मज़दूरों को पुलिसिया गोली से उड़ा दिया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी नेता ने उस समय तक मज़दूरों के मामले पर गंभीरता से काम करना शुरू नहीं किया था। मज़दूरों की गोलबंदी स्थानीय स्तर पर स्थानीय नेताओं द्वारा शुरू हुई और देश में लगातार फैलती गई। बंबई से लेकर असम के चाय बगान तक और मद्रास से लेकर कानपुर के चमड़ा उद्योग तक। अप्रैल-जून 1921 तक अकेले बंबई 33 हड़तालों का गवाह बना और इसमें लगभग ढाई लाख मज़दूरों ने हिस्सा लिया। इसी आस-पास कानपुर में चमड़ा और सूती वस्त्र उद्योग के मज़दूरों ने हड़ताल की और प्रबंधन से मज़दूरी दर बढ़ाने, काम के तौर-तरीकों को बेहतर बनाने तथा मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग की। कानपुर में आज से लगभग 90 साल पहले, जब मज़दूर आंदोलन और औद्योगिक समाज के भीतर भारत में मज़दूर चेतना आकार ही ले रही थी, उत्पादन में हिस्सेदारी की मांग के साथ मज़दूर सड़क पर उतर गए थे। कांग्रेस सहित कई अन्य पार्टियों ने उस वक्त इस मांग को ठीक बताया था। आज अगर मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग मज़दूरों की तरफ़ से उठे तो कॉरपोरेट घरानों के अलावा समूचा भारतीय मध्यवर्ग और सरकारी मशीनरी मज़दूरों पर पिल पड़ेंगे। मानेसर में जब बीते साल मारुति सुज़ुकी के कामगारों ने प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की बजाए वास्तविक यूनियन बनाने सहित काम-काज की स्थितियों को दुरुस्त करने और वेतन कटौती के त्रासद नियमों (1 मिनट देरी से आने पर आधे दिन का वेतन और तीन दिन काम पर नहीं आने पर आधे महीने के वेतन में कटौती) में परिवर्तन लाने की मांग की तो प्रबंधन को इसमें विकास-विरोधी नज़रिया दिखा था और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा मज़दूरों का पक्ष सुनने के बदले सुज़ुकी कंपनी का भरोसा जीतने टोक्यो पहुंच गए थे। कंपनी में तालाबंदी थी और प्रबंधन इस बात को लेकर मज़दूरों पर लगातार दबाव बना रहा था कि गुड कंडक्ट फॉर्म भरने वाले मज़दूर ही कारखाने के अंदर जा सकते हैं। गुड कंडक्ट फॉर्म का मतलब था- मज़दूरों की बुनियादी मांग की हत्या।
मानेसर का मारुति-सुज़ुकी प्लांट

बीते साल तीन बार हड़ताल हुई, काम से निकाले गए कई मज़दूरों को वापस लेने के वायदे से प्रबंधन मुकर गया और हड़ताल की अगुवाई करने वाले दोनों नेता खुद को कंपनी से अलग कर लिए। लेकिन, लंबी मशक्कत के बाद मारुति सुज़की इंपल्वाइज यूनियन को मान्यता मिल गई। प्लांट के भीतर उन्हीं सवालों पर संघर्ष अब भी जारी था जो बीते साल उठ रहे थे। इस पूरे वाकये को दौरान मारुति सुज़ुकी कंपनी को गुजरात सरकार लगातार यह प्रलोभन देती रही कि वो उसे हरियाणा से ज़्यादा फ्रेंडली माहौल दे सकती है। नरेंद्र मोदी और सुज़ुकी की बातचीत जारी थी और सुज़ुकी महोदय भी बीच-बीच में मीडिया के जरिए यह बात उछाल रहे थे कि वो प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे। मानेसर के मज़दूरों में उस समय एक जुमला प्रचलित था कि प्लांट कोई लोटा-थाली नहीं है कि जब मन करे कहीं भी उठा ले चलेंगे! सुज़ुकी के इसी फैसले को टालने के लिए भूपेंदर हुड्डा जापान गए थे ताकि सरकार की तरफ़ से कंपनियों को अब तक मिले प्रोत्साहन में बट्टा न लगे। इस तरह मारुति-सुज़ुकी के पास दो अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्री मनुहार लगा रहे थे। कंपनी प्रबंधन के पास मज़दूरों की मांग नहीं मानने के लिए ज़रूरी आत्मविश्वास बरास्ते सरकार जमा हो रहा था। इसके बाद हड़ताल, प्रदर्शन और किसी भी तरह के जमावड़े को रोकने के लिए प्रबंधन ने बड़ी संख्या में बाउंसरों की भर्ती की। मतलब खाए-पिए-अघाए लोग फ्रेश होने के लिए जब डांस क्लब में जाते हैं, तो छेड़खानी या फिर हंगामा वगैरह को नियंत्रित करने के लिए जिन बाउंसरों का इस्तेमाल होता है उन्हीं बाउंसरों को बुनियादी मांग उठा रहे मज़दूरों के सामने खड़ा कर दिया गया। कंपनी में काम-काज बाउंसरों की पृष्ठभूमि में होने लगा। अगजनी या फिर प्रबंधक की मौत निश्चित तौर पर एक दुखद चित्र हमारे सामने पेश करता है लेकिन ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा इसके कारणों का पता लगाना। जातिसूचक गाली देने वाले व्यक्ति की पिटाई एक तरह से जातिगत वर्चस्व की संरचना को तोड़ता है और इस वजह से मैं इसे सकारात्मक ही मानूंगा। मध्यवर्गीय समाज हिंसा-अहिंसा की बहस को सुविधानुसार समय में उठाता है। किसान-मज़दूरों का प्रदर्शन जब कभी उग्र हो जाए तो सरकार से लेकर मीडिया तक के दिमाग में औचक विचार आता है कि ये तो हिंसा का रास्ता है और इसलिए ग़ैर-संवैधानिक है! पिछले साल हुड्डा के जापान से लौटने के बाद जब मज़दूरों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठी भांजी तो उस समय संवैधानिक और ग़ैर-संवैधानिक वाली बहस नहीं उठी। संविधान के दायरे में मिले अधिकारों को तो कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद सरकार मटियामेट कर रही है। नौकरी की ठेका प्रथा पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और देश के संविधान में जो बातें कही गई हैं क्या उसे भारत के किसी भी कोने में सरकार लागू करवा रही है?  
मानेसर में मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट लगभग 3000 एकड़ में फैला है। 2002 में चौटाला सरकार ने 2.25 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से स्थानीय लोगों से ज़मीन ली थी। उस वक्त राज्य सरकार ने वादा किया था था कि ज़मीन देने वाले हरेक घर से एक व्यक्ति को नौकरी दी जाएगी। काम शुरू होने के बाद कंपनी ने नौकरी देने से इनकार कर दिया। जो लोग नौकरी की आस लगाए बैठे थे उन लोगों ने चाय की भट्टी और छोले-भटूरे की दुकान खोल ली। कुछ लोग रिक्शा और टैम्पो चलाने लगे। उनकी कमाई का जरिया मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट ही है। यहां काम करने वाले लोग ही उनके ग्राहक हैं। इसलिए उनका संकट ये है कि अगर प्लांट मानेसर से कहीं और शिफ्ट होता है तो उनमें से ज़्यादातर लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। प्रबंधन, सरकार और मीडिया से जिस तरह की बातें छन कर उन लोगों तक पहुंची उसका अर्थ यही था कि प्लांट के मज़दूर नहीं चाहते कि प्लांट चले! इस भाव को अगल-बगल के गांव के सरपंचों (हरियाणा के सरपंच को आप किस रूप में जानते हैं? संदर्भ- खाप) ने और स्थाई बना दिया। सरपंचों ने मिलकर महापंचायत बैठाई और फैसला किया कि लाल झंडे वालों को सबक सिखाने में वो दूसरे पक्ष का साथ देंगे। समाज का जिस तरह से (अ)राजनीतिकरण हो रहा है उसमें तत्कालिक आवेश ज़्यादा अहम हो चला है। दुनिया के किसी भी कारखाने में काम करने वाला कोई भी मज़दूर यह कभी नहीं चाहेगा कि वह कारखाना ठप्प हो जाए और यह बेहद सामान्य-सी बात है। हां, अपने अधिकार के लिए वो लड़ेगा ज़रूर। अगर प्लांट के चारों तरफ के गांव वाले इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं तो जाहिर है कंपनी के प्रोपेगैंडा के बीच यह पक्ष उन तक नहीं पहुंच रहा है। जिस बेरोज़गारी के डर से गांव वाले पंचायत बैठा रहे हैं उस आधार पर तो वो मज़दूरों के ज़्यादा करीब है। प्लांट बंद होने पर उनकी तरह मज़दूर भी बेरोजगार हो जाएंगे। अधिकारों के लिए लड़ रहे मज़दूरों को कंपनी धोखा दे रही है और गांव वालों को नौकरी नहीं देकर वो पहले ही धोखा दे चुकी है। सवाल ये है कि बीते साल हड़ताल को अंदरुनी मामला बताने वाला तटस्थ समाज आखिरकार कंपनी के पक्ष में अचानक कैसे चला जाता है? क्या तटस्थता का पूरा मामला अंतत: शक्तिशाली के पांत में ही खड़ा होना है? दिल्ली से लेकर बंबई तक के कॉलेज में पढ़ रहे फंकी युवाओं की हमदर्दी कंपनी के साथ क्यों रहती है? उदारीकृत आर्थिक व्यवस्था में समाज में निरपेक्ष दिखने वाले तबके का राजनीतिकरण किस दिशा में हो रहा है। यह व्यवस्था की चौहद्दी में हुई मानसिक बुनावट है या फिर पक्षधरता तय कर ली है समाज ने?
बाइक पर अन्ना समर्थक युवा-शहरी-मध्यवर्ग

25 जुलाई 2005 को होंडा मोटरसाइकिल के कामगारों पर लाठी चार्ज हुआ था। उस वक्त लगभग 800 मज़दूर होंडा सिटी के कारखाने में जमा होकर यूनियन बनाने और निकाले गए मज़दूरों की पुनर्बहाली को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रबंधन उनकी यूनियन को मान्यता नहीं दे रहा था और मज़दूरों को बहाल करने में आना-कानी बरत रहा था। 2005 में होंडा कंपनी से लेकर 2011-12 में मारुति-सुज़ुकी तक जो लकीर खिंची है उसमें बहुत फ़र्क़ कहां है? मारुति में भी शुरुआती आंदोलन इन्हीं दो सवालों से पैदा हुआ था। यह संयोग है कि 25 जुलाई को उस घटना की सालगिरह थी और इसी दिन प्रणब मुखर्जी ने देश के नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली और अन्ना हज़ारे एंड कंपनी ने जंतर-मंतर पर मोर्चा खोला। 2005 के बाद से हर साल मानेसर और गुड़गांव की ऑटोमोबाइल कंपनियों के मज़दूर इस दिन लाठी चार्ज के विरोध में प्रदर्शन करते हैं। इनमें मारुति सुज़ुकी, हीरो मोटोकॉर्प, रिको, सोना कोया, एफसीसी रिको, सुज़ुकी पावरट्रेन, सुज़ुकी मोटरसाइकिल और मार्क एक्झॉस्ट के मज़दूर अमूमन हर साल शामिल होते रहे हैं, लेकिन इस बार 24 जुलाई को गुड़गांव पुलिस ने यह घोषणा की कि 25 तारीख़ को मानेसर में धारा 144 लागू कर दी गई है और पांच से ज़्यादा व्यक्ति एक साथ इकट्ठा नहीं हो सकते। मज़दूरों के मार्च को रोक दिया गया। फिर भी कंपनी के भीतर लगभग 8,000 मज़दूर जमा हुए। जो मीडिया सौ लोगों की महापंचायत को दिखा रहा था उसने आठ हज़ार मज़दूरों के प्रदर्शन को नहीं दिखाया।
इस बीच मीडिया में इस तरह की ख़बरें लगातार आती रही कि मानेसर बंद होने से कौन सी कार बाज़ार में आउट-ऑफ-स्टॉक हो जाएगी, डीज़ल कार की क़ीमत पर इससे क्या असर होगा और मारुति-सुज़ुकी को इस तालाबंदी से कितना घाटा होने वाला है! वगैरह, वगैरह। मारुति सुज़ुकी के सीओओ मयंक पारीख ने 25 जुलाई को ही घोषणा की कि उनका दो सबसे ज़्यादा बिकने वाला मॉडल स्विफ्ट और डिज़ायर आउट ऑफ स्टॉक हो गया है। अगले दिन इस मुद्दे पर कुछ चैनलों ने लोगों की रायशुमारी ली जिसमें मध्यवर्ग छाती कूटता दिख रहा था। यह चर्चा लगातार ज़ोर पकड़ने लगी कि मारुति-सुज़ुकी में हुई हिंसा से भारत की छवि धूमिल हुई है। सार्क चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष विक्रमजीत सिंह साहनी ने देश की छवि पर पड़ने वाले असर पर भारी चिंता जताई। बंगाल चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष हर्ष झा ने कहा कि मानेसर के दोषियों पर आपराधिक क़ानून के तहत मुकदमा चलना चाहिए और इसे औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत नहीं देखा जाना चाहिए। झा ने दावा किया कि पूरा मामला पूर्वनियोजित मालूम पड़ता है! औद्योगिक घराना उस वक़्त आपराधिक क़ानून का जुमला नहीं उछालता जब सेज़ के लिए ज़मीन अधिग्रहण के वास्ते फ़ौजी बंदूक का सहारा लेकर गांव वालों को वो खदेड़ता है। उस समय उन्हें निजी कंपनियों की सुरक्षाकर्मी की तरह चाक-चौबंद होकर गांव खाली कराने वाली सरकार चाहिए।
कंपनी के अध्यक्ष आर सी भार्गव ने यह बार-बार जताया है कि कंपनी मानेसर में ही रहेगी लेकिन तालाबंदी के बाद मौका ताड़कर इस बार सुज़ुकी से मिलने के लिए नरेंद्र मोदी ने जापान का रास्ता नापा। वे अपनी तईं पूरा ज़ोर लगा रहे हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले मारुति-सुज़ुकी को अपने राज्य में खींचकर ले जाने में वो सफल हो पाएं। आख़िरकार वो कौन-सी शर्तें होंगी जिनके बिना पर मारुति-सुज़ुकी गुजरात जाने का फैसला करेगी। मज़दूरों की हड़ताल के अलावा मारुति-सुज़ुकी को अब तक मानेसर में कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। तो क्या हड़ताल को क्रश करने का भरोसा दिलाने मोदी जापान पहुंचे? विकसित राज्य तक पहुंचने का रास्ता इन्हीं वायदों से होकर गुजरता है। मध्यवर्ग को सिर्फ़ इससे मतलब है कि उनके घर के सामने स्विफ्ट और डिज़ायर पहुंचने में देर नहीं होनी चाहिए। उनके लिए कंपनी कार की जननी है और मज़दूर अड़ंगा डालने वाला प्राणी। यही मध्यवर्ग गाल पर तिरंगा छापकर अन्ना हज़ारे के साथ भ्रष्टाचार पर आवाज़ बुलंद करने पहुंचता है। इनका मुद्दा सिर्फ़ वहीं तक सीमित है जो सीधे-सीधे इनसे टकराता हो। मज़दूरों के मामले से इनको कोई लेना-देना नहीं है, अल्पसंख्यक-दलित-आदिवासियों का मामला इनको आउटसाइडर जैसा मालूम पड़ता है। सरकार इनको साफ़ सुथरी चाहिए, कोई भ्रष्टाचार नहीं चाहिए और सुज़ुकी के साथ गलबहियां डालने वाले नेता को उनके जनसंहार के लिए क्लीन चिट देते हुए यह पूरा वर्ग उसमें विकास के अक्स ढूंढता है।



01 सितंबर 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार- आनंद स्वरूप वर्मा

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उद्धारक की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।
अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिद्धि के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।
अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।
क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उद्धारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्तारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फिल्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।
अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।

समकालीन तीसरी दुनिया / अगस्त- सितम्बर 2011 का संपाद्कीय

09 अप्रैल 2011

लोकपाल बिल और देश का समर्थन





अन्ना अचानक लोहिया हो गये, अन्ना अचानक गाँधी हो गये, पूरे देश की आंधी हो गये और जाने क्या-क्या हो गये. यह सब होने की जरूरत थी शायद. पूरे देश के मध्यम वर्ग जो रोज-बरोज मंहगी होती चीजों से झूझ रहा है. उसे एक ऐसा वर्ग दिख रहा है जो काले धन और घोटालों के बदौलत मौज कर रहा है. दरअसल उसे इस वर्गीय श्रेष्ठता या रौब जो छोटे से उच्च वर्ग में मौज मस्ती के साथ विराज है, से कोफ्त है और वह इस सबके निचोड़ के रूप में महज भ्रष्टाचार को ही देख पा रहा है. उसे लग रहा है कि इस जनलोकपाल बिल के आ जाने से भ्रष्टाचार मिट सा जाएगा. वह शायद इसलिए भी सामने आ रहा है कि इस आंदोलन को एक गैरराजनीतिक रूप में पेश करने का प्रयास किया जा रहा है. इस लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण बात देखी जा सकती है कि आज भारतीय जन मानस राजनीति से कितना परहेज सा करने लगा है. वह अब अपने जुमलों में ही महज राजनीति को गाली नहीं देता बल्कि गैरराजनीति के समर्थन में उतर रहा है. अफसोस की बात यह भी है कि इस आंदोलन के कई अगुवा और खुद अन्ना हजारे भी इसे गैर राजनीतिक ही मानते है. अलबत्ता यह जरूर है कि यहाँ कुछ भी गैरराजनीतिक नहीं हो रहा. यह एक ऐसा मंच बन गया है जिसे भ्रष्टों द्वारा भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध अभियान कहा जा सकता है. खुद अपने विरुद्ध खड़े हो जाना और अपने को बचा लेना. कुछ व्यक्तिगत इमानदारों को छोड़ दिया जाए तो आलम यही है. एन.जी.ओ., ए.बी.वी.पी. और कार्पोरेट का समर्थन इस बात को ही पुख्ता करता है. मनमोहन सिंह अगर वोट चाहिए तो जन लोकपाल बिल लाइए यहाँ कांग्रेस के अगले चुनाव की तैयारी भी है, नये और कुटिल तरीके से. बेशक लोकपाल बिल आ जायेगा, शायद थोड़ी देर में या बहुत जल्द.
लोगों का अराजनीतिक होना महज इस व्यवस्था की राजनीति से ही अराजनीतिक होना है. ऐसी संसदीय राजनीति, जिसकी बुराईयां करने से भी लोग ऊब चुके हैं. ऐसे में विकल्पों के चुनाव के तौर पर यह वड़ी संभावना बनती है कि वे कुछ नया तलाशें. इस रूप में जिस अराजनीति के तहत वे देश में नैतिक जिम्मेदारी को अपनाते हुए विकल्प की तलाश कर रहे हैं वह गैर संसदीय राजनीति है न कि गैर राजनीतिक. सरकार को इस वैकल्पिक चुनाव का भय है और वह केवल अन्ना नहीं हो सकते. यदि लोग अन्ना के साथ आते हैं तो बेशक यह किसी भी रूप में तंत्र और देश की सरकार के साथ ही आना होगा. जबकि भ्रष्टाचार का मसला कुछ कानूनों से नहीं इस तंत्र से जुड़ा हुआ है. अन्ना इस तंत्र के अंदर की एक लड़ाई लड़ रहे हैं. जिसकी जीत अंततः एक झांसे के तहत कुछ दिन के लिए तंत्र में एक नई आस्था ही पैदा करेगी. इसके अलावा सत्ता को सबसे बड़ा खतरा उनसे है जो इस तंत्र में यकीन ही नहीं करते और देश के सबसे बड़े खतरे के रूप में राज्य उन्हें देख रही है. जिन्हें शायद भ्रष्टाचार के तहत ढांचे के पूरे पुर्जे खोलने व लोगों के सामने रखने में मदद मिले. एक बड़ा युवा वर्ग जो देश के प्रति नैतिक भक्ति रखता है और विश्वविद्यालयों में पढ़ता है वह जंतर मंतर को तहरीर चौक बनाने की बात इसलिए कर रहा है कि हाल के दिनों में अरब जगत के आंदोलनों और वहाँ की जन भागीदारी ने जो बदलाव दिखाए हैं यही उसमें एक मानसिकता को निर्मित कर रहा है.
देश के अंदर पिछले वर्षों में घटे शायद वे बहुत कम भ्रष्टाचार और घोटाले रहे होगें जो अभी हाल में सामने आये, एक के बाद एक लगातार. प्रधानमंत्री के उस मीडिया सम्बोधन के बाद अचानक घोटालो का आना बंद भी हो गया. यह बात थोड़ा शक पैदा करती है. जो घोटाले पूर्व में उजागर हुए थे उनमे मीडिया ने महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई थी, दोनों तरफ से. पहले करने-कराने में फिर सामने लाने में. यहाँ कानूनी प्रक्रिया को लेकर देश के सानने एक महत्वपूर्ण सवाल है कि बिल लाने या संवैधानिक होने से यदि समस्यायें निपट जाती तो शायद देश को अब तक समाजवादी हो जाना था, गैरबराबरी मिट जानी थी, लोगों को धर्मनिरपेक्ष हो जाना था पर ऐसा नहीं हो सका. आने वाले वर्षों मे कुछ लोग ऐसा होने की उम्मीद रख सकते हैं. जबकि इस संविधान के साथ संसदीय लोकतंत्र और संविधान निर्माण की वह सदी बीत गयी, जब नरेन्द्र मोदी अपने असली रूप में निखरे, अंबानी और देश के कई कार्पोरेट इस सदी में ही दुनिया के अमीरों की सूची में आये, किसानों ने ज्यादा आत्महत्या करना इसी सदी में शुरु किया, यह सब समानता आधारित संविधान बनने के ५० वर्षों के बाद हुआ. लिहाजा कानून की किताब उलटबांसी हो गयी. बस्तर के आदिवासी और आडवानी के साथ इस देश के न्यायालय तक का सुलूक अलग-अलग रहा. शायद यह बिल पास हो जाए तो मध्यम वर्ग की नौकरी करने वाला और महंगाई की मार से पेट न भर पाने के कारण भ्रष्टाचार करने वाला अब सजा के लिये भी तैयार रहे. उसकी जिंदगी जीने की शर्त के रूप में भ्रष्टाचार जुड़ा है उसका स्वरूप छोटा और बड़ा हो सकता है. ऊपरी स्तर पर गलतियां पकड़ा जाना मुश्किल है. यदि ऐसा हो भी गया तो उसे सामने लान शायद और मुश्किल. इस भ्रष्टता का मामला तंत्र से बनता है. पूजी केन्द्रीयता तमाम अपराधियों को मिली सजाओं के बाद भी घोटालों को नहीं रोक सकती, उच्च स्तर से निम्न स्तर तक. क्योंकि उच्च स्तर वाले को अपनी उच्चता बनाये रखने के लिए यह जरूरी है और निम्न स्तर वाले को अपनी जिंदगी व जीवन शैली के लिए. भ्रष्टाचार देश में नहीं बल्कि उसके तंत्र में होता है जो उसे चला रहा होता है. लोकपाल बिल इसी तंत्र में आयेगा. काजल की कोठरी में एक सफेद कपड़े की तरह. सम्पर्क- chandrika.media@gmail.com, mo- 09890987458