फांसी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फांसी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 अप्रैल 2017

फांसी को हत्या माना जाना चाहिए

चन्द्रिका
(मूल रूप से जागरण में प्रकाशित)
जासूस समाज में कभी अच्छे मूल्य का शब्द नहीं बन पाया. कभी भी नहीं बन पाया. वह संदिग्ध रहा. घर से लेकर राष्ट्र तक. पर उसका होना बचा रहा. उसकी जरूरत बची रही. इसलिए यह राज्य के लिए एक गुप्तचर और वैध सी चीज बना रहा. आज भी बना हुआ है. जो जितने बड़े राष्ट्र हैं उनके पास उतने ज्यादा जासूस हैं. कहा यह भी जा सकता है कि उनकी जासूसी ने उन्हें बड़े राष्ट्र होने में मदद की है. किसी मुल्क की आंतरिक सूचनाएं जुटाना और उससे वाकिफ होना उस मुल्क को कमजोर बनाता है. इस दौर और पहले के दौर की बड़ी लड़ाईयां जासूसों की मजबूती और उनकी जासूसी कामयाबी से जीती गई हैं. इसलिए इस बात में कोई शक़ नहीं किया जाना चाहिए कि दो पड़ोसी मुल्क जिनकी सरकारों ने लगभग दुश्मनाना रिश्ता रखा हुआ है उनके जासूस एक दूसरे मुल्क में नहीं हैं या नहीं रहेंगे. वे रहेंगे, जब तक राज्य रहेगा. जब तक राज्य और राज्य के बीच लड़ाईयां रहेंगी. जब तक भेदों और भीतर की सूचनाओं को जानने की जरूरत रहेगी. वे जब गैर मुल्कों में पकड़े जाएंगे उनको सजाएं दी जाएंगी. इसकी परवाह किए बगैर दूसरे जासूस फिर तैयार किए जाएंगे. कुलभूषण जाधव के बाद कोई और जासूस होगा. क्योंकि कुलभूषण जाधव के पहले दसियों भारतीय जासूसों को पाकिस्तान में पकड़ा गया है. उन्हें सज़ा हुई है. कुछ को मौत की भी सज़ा सुनाई गई है. सज़ा सुनाने के बावजूद किसी को फांसी नहीं हुई है. उनमे से ज़्यादातर जेल में आजीवन कारावास काटते हुए मर गए हैं.
फांसी की सजा उसे नहीं होनी चाहिए. यह बात सिर्फ कुलभूषण के लिए नहीं कही जानी चाहिए. बल्कि मौत की सज़ा लोकतंत्र में किसी को नहीं होनी चाहिए. यह बात यहां से शुरू की जानी चाहिए. किसी का जीवन लेने के बाद उसे वापस लाने का सामर्थ्य अगर मनुष्य और राज्य के पास नहीं है तो उसे जीवन लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए. यह कानून इंसान में सुधार होने की गुंजाइश को ख़त्म करता है. एक कल्याणकारी और लोकतांत्रिक राज्य को हमेशा अपने इंसान में सुधार की उम्मीद रखनी ही पड़ती है. ऐसी बहुत सी दलीलें और भी हैं. दुनिया के ज्यादातर राष्ट्रों ने सज़ा-ए-मौत को प्रतिबंधित कर दिया है. इसलिए कुलभूषण की सज़ा-ए-मौत के खिलाफ हमे होना चाहिए. लेकिन उससे पहले हमे किसी भी अपराधी की मौत के ख़िलाफ होना चाहिए. पर मुल्कों के अपने कायदे हैं. भारत और पाकिस्तान दोनों सज़ा-ए-मौत के कानून को मानते हैं. इस आधार पर दोनों यह भी मानते हैं कि अपराधियों को सुधारा नहीं जा सकता उन्हें खत्म करना ही एक मात्र उपाय है. एक मात्र उपाय तानाशाही के अलावा और कहीं नहीं हो सकता. 
जबकि हमारी सरकार यह कह रही है कि अगर जाधव को सज़ा दी गई तो वह उसे हत्या मानेगी. हमे इसे किस रूप में देखना चाहिए. जो सरकार अपने राज्य के कानून में हत्या करने का प्रावधान रखती है उसे किसी भी मुल्क में अपराधी को हत्या की सज़ा देने से रोकने का हक़ तबतक नहीं बनता जबतक वह अपने कानून से हत्या और मौत को ख़ारिज न कर दे. जबकि इसको लेकर दोनों मुल्कों की सरकारों के एक मत हैं. अपराध के बदले हत्या पर वे दोनों सहमत हैं. हत्या के बदले हत्या एक लोकतांत्रिक कानून नही हो सकता. यह एक मध्य-युगीन मूल्य है. जिसे लोकतंत्र के ढांचे में नहीं होना चाहिए. 
कुलभूषण के जासूस होने और संगीन अपराधों में शामिल होने का पाकिस्तान दवा कर रहा है. वह दावा कर रहा है कि कुलभूषण के पास उसके दो पासपोर्ट थे. एक उसके अपने नाम से और एक किसी मुस्लिम नाम से. वह दावा कर रहा है कि उसके पास कई हमले कराने में कुलभूषण का हाथ होने के सुबूत हैं. उसका दावा है कि जिस कोर्ट में सज़ा हुई है वहां तीस दिन के भीतर फैसले का प्रावधान है पर उसने एक बरस से ज़्यादा वक्त लेकर इसकी जांच की है. वह ढेर सारे सबूत देने के लिए तैयार है. सारी जांच पड़ताल के बावजूद, अपराध होने के बावजूद सज़ा-ए-मौत को खारिज किया जाना चाहिए. 
अगर कुलभूषण को सज़ा दी जाती है तो इसे हत्या माना जाना चाहिए. पर भारत सरकार के दोहरे चरित्र की वजह से नहीं. राष्ट्रप्रेम की वजह से नहीं. इसे हत्या मानने के कारण और हैं. इस हत्या के ज़िम्मेदार वे सब होंगे जो नागरिक अधिकारों के ख़िलाफ हैं. जो मानवाधिकारों के ख़िलाफ हैं. जो हर घटना के बाद सड़कों पर उन्मादी भीड़ की तरह निकल आते हैं और फांसी पर लटका देने की मांग करते हैं. वही अपने दोहरे चरित्र को दिखाते हुए इसे रोकने की बात कर रहे हैं. उन्हें अपने विचारों का आकलन करना चाहिए. पाकिस्तान का जासूस यदि भारत के लिए आतंकवादी है तो भारत का जासूस पकिस्तान के लिए आतंकवादी ही होगा. अतंकवाद और देशभक्ति किसी भी राष्ट्र के लिए एक सापेक्ष चीज है. 
एक उन्मादी भीड़ है पाकिस्तान में भी. एक उन्मादी भीड़ है हिन्दुस्तान में भी. लंबे वक्त में राज्य और सरकारों के द्वारा पैदा की गई दुश्मनी ने ही इस भीड़ को भी पैदा किया है. यह हिन्दुस्तान की वही भीड़ जो पाकिस्तान का जासूस कहकर 2015 में कानपुर में एक आदमी की हत्या कर देती है. वही भीड़ जो वकीलों के भेष में यह फैसला करती है कि आतंकवाद के आरोपी का कोई केस नहीं लड़ेगा. वही भीड़ जो कोर्ट परिसर में जे.एन.यू. के कन्हैया कुमार पर हमला करती है. वही भीड़ जो आलोचकों को पाकिस्तान भेजने के लिए उतावली रहती है. वैसी ही भीड़ पाकिस्तान के वकीलों में भी है. जिसने कुलभूषण के केस को न लड़ने का एलान किया है. यहां की भी बार काउंसिल ने ऐसे कई फैसले लिए हैं. हमारे लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि जो हम खुद नही कर पाते उसकी अपेक्षा दूसरों से कैसे करें. नफरत के जो बीज राज्य बोता है. उसकी फसल हमारे यहां ही क्यों तैयार होगी. वह दोनों मुल्कों में बराबर तैयार की जाती रही है. जब तक इस नफरत को बोने के कारण को हम नहीं समझेंगे. हम विचार के आधार पर अपने फैसले नहीं लेंगे. हमारे फैसले उन्माद और अवसरपरस्त होंगे. हम कुलभूषण को बचा भी लें तो इंसान के बतौर जो एक आरोपी या फिर अपराधी का हक़ है उसे खो देंगे.    

23 दिसंबर 2014

मृत्यदंड के बारे में: रोबेस्पिया

(मृत्युदंड का विरोध किस तरह आज से ही नहीं बल्कि फ्रांस की क्रांति के समय से ही समाज के जनवादीकरण से जुडा हुआ है. और यह भाषण आज भी किस तरह प्रासंगिक बना हुआ है. यह 22 जून 1791 को महान क्रांतिकारी रोबस्पेरे द्वारा फ़्रांस की संविधान सभा में दिये गए भाषण का हिंदी अनुवाद है.)

एथेंस में जब खबर पहुंची कि अर्गोस नगर के नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया है तो वहां के लोग भाग कर देवालयों में गए और उन्होंने देवताओं को आह्वान किया कि वे एथेंस के लोगों को ऐसे भयानक और क्रूर विचारों से बचाएं. मेरा आह्वान देवताओं से नहीं कानून निर्माताओं से है, उनसे जो देवत्व के शाश्वत नियमों के संचालक और भाष्यकार हैं, कि ऐसे खूनी कानूनों को फ़्रांस की संहिता से मिटा दे जो न्यायिक हत्याओं को निर्देशित करते हैं और जिनको उनकी नैतिकता और नया संविधान ख़ारिज करते हैं. मैं उनके समक्ष साबित करना चाहता हूँ : 1. कि मृत्युदंड सारतः अन्याय है. और 2. कि यह दण्डो में से सबसे दमनकारी नहीं है और यह अपराधों को रोकने से ज्यादा उन्हें संगुणित करता है.

नागरिक समाज के दायरे से बाहर यदि एक कटु शत्रु मेरा जीवन ख़त्म करने की कोशिश करता है, या बीसियों बार धकेलने पर भी मेरे द्वारा उगाई गई फसल को नष्ट करने वापस आ जाता है. तो क्योंकि मेरे पास विरोध के लिए केवल मेरी व्यक्तिगत शक्ति का ही सहारा है इसलिए मुझे उसे अनिवार्यतः नष्ट करना होगा या उसे ख़त्म कर देना होगा और प्राकृतिक रक्षण का नियम मुझे औचित्य और स्वीकृति प्रदान करता है. लेकिन समाज में, जब सभी की शक्ति केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लामबंद है तो न्याय का कौन सा सिद्धांत उसकी हत्या की स्वीकृति दे सकता है? कौन सी अनिवार्यता इसे दोषमुक्त कर सकती है? एक विजेता जो अपने बंदी शत्रु की हत्या करता है बर्बर कहलाता है! एक प्रौढ़ जो किसी बालक को शक्तिहीन कर उसे दंड देने की सामर्थ्य रखता है यदि उसकी हत्या कर दे तो राक्षस समझा जाता है! एक अभियुक्त जिसे समाज द्वारा सजा दी गई है एक पराजित और शक्तिहीन शत्रु के सिवा कुछ भी नहीं है और वह एक प्रौढ़ के सामने बालक से भी ज्यादा असहाय है.

अतः, सत्य और न्याय की नज़र में मौत के ये नज़ारे जिन्हें यह अनुष्ठानपूर्वक आदेशित करता है, कायराना कत्लों के सिवा कुछ भी नहीं है, ये केवल कुछ व्यक्तियों के बजाय समूचे राष्ट्र के द्वारा कानूनी तरीको से किये गये गंभीर अपराध है. कानून चाहे कैसे भी निर्मम और वैभवशाली क्यों न हों, हैरान मत होइए, ये चंद उत्पीड़कों के कारनामों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. ये ऐसी काराएं हैं जिनसे मानव जाति को अधोपतित किया जाता है. ये ऐसी भुजाएं हैं जिनसे उसे पराधीन किया जाता है,
ये कानून खून से लिखे गए हैं. किसी भी रोमन नागरिक को मौत की सजा देना वर्जित था. यह जनता द्वारा बनाया गया कानून था. लेकिन विजयी स्काईला ने कहा : वे सभी जिन्होंने मेरे विरुद्ध अस्त्र उठाये मृत्यु के भागी हैं. ओक्टावियन और अपराध में उसके सहभागियों ने इस नए कानून की पुष्टि की.

तिबेरियस की अधीनता में ब्रूटस की प्रशंसा करना मृत्युयोग्य अपराध था. कालिगुला ने उन सबको मृत्युदंड दिया जिन्होंने भी सम्राट के चित्र के समक्ष नग्न होने की धृष्टता की. एक बार जब आतताई शासकों द्वारा राजद्रोह के अपराध – जो अवज्ञापूर्ण या नायकोचित कृत्य हुआ करते थे – का आविष्कार कर लिया गया तो फिर कौन बिना स्वयं को राजद्रोह का भागी बनाए यह सोचने की हिम्मत कर सकता था कि इनकी सजा मृत्युदंड से थोड़ी कम होनी चाहिए?

अज्ञानता और निरंकुशता के राक्षसी मिलन से पैदा हुए उन्माद ने जब दैवीय राजद्रोह के अपराध का आविष्कार कर लिया, जब इसने अपने मतिभ्रम में स्वयं ईश्वर का प्रतिशोध लेने का बीड़ा उठा लिया, तब क्या यह जरुरी नहीं हो गया था कि यह उन्हें रक्त अर्पित करे, और स्वयं को ईश्वर का ही रूप मानने वाले, उसे दरिन्दे की श्रेणी में पहुंचा दें?

पुरातन बर्बर कायदे के समर्थक कहते है कि मृत्युदंड अनिवार्य है, बिना इसके अपराध पर लगाम लगाना संभव नहीं है. यह आपसे किसने कहा? क्या आपने उन सभी अंकुशों का आकलन कर लिया है जिनके द्वारा दंडविधान मनुष्य की संवेदना पर काम करता है? अफ़सोस, मृत्यु से पहले मनुष्य कितना शारीरिक और नैतिक कष्ट सहन कर सकता है?

जीने की इच्छा उस आत्मसम्मान के सामने नतमस्तक हो जाती है, जो ह्रदय पर शासन करने वाले आवेगों में सबसे प्रबल होता है. एक सामजिक मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक सजा अपमानित होना है, सार्वजनिक निंदा का पात्र बन जाना है. यदि कानून निर्माता नागरिक को इतनी सारी नाजुक जगहों पर चोट पहुंचा सकता है तो उसे मृत्युदंड के इस्तेमाल करने की हद तक क्यों गिर जाना चाहिए? दंड दोषी को यातना देने के लिए नहीं होता है, वरन वह उसके भय से अपराध को रोकने के लिए दिया जाता है.

जो कानून निर्माता मृत्यु और उत्पीड़नकारी सजाओं को अन्य तरीकों के ऊपर वरीयता देता है वह जनभावनाओं को आहत करता है और शासितों के बीच अपनी नैतिक साख को कमजोर करता है. एक ऐंसे ढोंगी गुरु की तरह जो बार बार की क्रूर सजाओं से अपने शिष्य की आत्मा को जड़ और अपमानित बना देता है. वह कुछ ज्यादा ही जोर से दबाकर सरकार की स्प्रिंगों को ढीला और कमजोर कर देता है.

जो कानून निर्माता म्रत्युदंड का विधान स्थापित करता है वह इस उपयोगी सिद्धांत का निषेध करता है कि किसी अपराध को दबाने का सबसे सही तरीका उन आवेगों की प्रकृति के अनुसार दंड तय करना है जोकि उसको पैदा करते हैं. मृत्युदंड का विधान इन सभी विचारों को धूमिल कर देता है यह सभी अन्तःसम्बन्धों को विघटित कर देता है और इस प्रकार दंडात्मक कानून के उद्देश्य का ही खुलेआम निषेध करता है.

आप कहते हैं कि मृत्युदंड अनिवार्य है. यदि यह सत्य है तो क्यों बहुत सारे लोगों को इसकी जरुरत नहीं पड़ी. विधि के किस विधान के तहत ऐसे लोग ही सबसे बुद्धिमान, सबसे खुश और सबसे स्वतंत्र थे? यदि मृत्युदंड ही बड़े अपराधों को रोकने के लिए सबसे उचित है तो ऐसे अपराध वहां सबसे कम होने चाहिए जहाँ इसे अपनाया और प्रयोग किया गया. किन्तु तथ्य एकदम विपरीत हैं. जापान को देखिये: वहां से ज्यादा मृत्युदंड और यातनाएं और कहीं नहीं दी जाती परन्तु वहां से अधिक संख्या में और वहां से अधिक जघन्य अपराध और कहीं नहीं होते. कोई कह सकता है कि जापानी लोग भीषणता में उन बर्बर कानूनों को चुनौती देना चाहते हैं जो उन्हें आहत और परेशान करते हैं. क्या यूनानी गणतन्त्रों -जहाँ सजाएँ नरम थी और जहां मृत्युदंड या तो बहुत कम थे या थे ही नहीं- में खूनी कानूनों द्वारा शासित देशों से ज्यादा अपराध और कम अच्छाइयां थी? क्या आपको लगता है की रोम में पोर्सियाई ज़माने में जब इसके वैभवशाली दिन थे, जब सारे कड़े कानूनों को हटा दिया गया था, स्काईला जो अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था, के जमाने की तुलना में ज्यादा अपराध होते थे, जब सभी कठोर कानूनों को वापस ले आया गया था? क्या रूस के निरंकुश शासक ने जब से मृत्युदंड को ख़त्म कर दिया है वहां किसी प्रकार का संकट आ खड़ा हुआ है? ऐसा लगता है कि इस तरह की मानवता और दार्शनिकता का प्रदर्शन करके वह लाखों लोगों को अपनी निरंकुश सत्ता के अधीन रखने के जुर्म से दोषमुक्त होना चाहते हैं.

न्याय और विवेक की बात सुनिए. ये आपको चिल्ला कर कह रहे हैं कि मानवीय निर्णय कभी भी इतने निश्चित नहीं होते कि वे कुछ मनुष्यों द्वारा जो कि गलतियाँ कर सकते हैं, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु के बारे में तय करने के औचित्य का प्रतिपादन कर सकें. यदि आप सबसे सम्पूर्ण न्यायिक फैसले की भी कल्पना कर लें, यदि आप सबसे ज्यादा ज्ञानी और ईमानदार जजों की भी व्यवस्था कर लें तब भी गलतियों की संभावना बची रहती है. आप इन गलतियों को सुधारने के औजारों से स्वयं को क्यों वंचित कर देना चाहते हैं? स्वयं को किसी उत्पीडित निर्दोष की मदद करने में अक्षम क्यों बना देना चाहते हैं? क्या किसी अदृश्य छाया के लिए, किसी अचेतन राख के लिए आपके बाँझ पाश्चाताप का, आपकी भ्रामक भूलसुधार का कोई अर्थ है? वे आपके दंड विधान की बर्बर तत्परता के त्रासद साक्ष्य हैं. अपराध को पाश्चाताप और अच्छे कार्यों के द्वारा सुधार सकने की संभावना को किसी व्यक्ति से छीन लेना, अच्छाई की तरफ उसके लौट आने के सारे रास्ते निर्ममता से बंद कर देना, उसके पतन को शीघ्रता से कब्र तक पहुंचा देना जो अब भी उसके अपराध से दागदार है, मेरी नज़र में क्रूरता का सबसे भयावह परिष्करण है.

एक कानून निर्माता का सबसे पहला कर्तव्य उन सार्वजनिक नैतिक मूल्यों की स्थापना करना और उन्हें बचाए रखना है, जो सभी आज़ादियों और सभी सामाजिक खुशियों के मूल स्रोत हैं. किसी विशिष्ट उद्देश्य को पाने के प्रयास में यदि वह सामान्य और आवश्यक उद्देश्यों को भूल जाता है तो वह सबसे भौंडी और भयानक गलती करता है. अतः राजा को लोगों के सामने न्याय और विवेक का सबसे आदर्श उदहारण पेश करना चाहिए. यदि इस को परिभाषित करने वाली शक्तिशाली, संयत, और उदार सख्ती की जगह क्रोध और प्रतिशोध से काम लेते हैं, यदि वे बिना वजह के खून बहाते हैं, जिसको बचाया जा सकता था और जिसे बहाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. और वे लोगों के सामने निर्मम दृश्य, और यातना से विकृत लाशों को प्रस्तुत करते हैं तो यह नागरिकों के जेहन में न्याय और अन्याय के विचार को बदल देता है. वे समाज में ऐसे तीखे दुराग्रहों के बीज बो देते हैं जो उतरोतर बढ़ते जाते हैं. मनुष्य, मनुष्य होने की गरिमा खो देता है जब उसके जीवन को इतनी आसानी से जोखिम में डाला जा सकता है. हत्या का विचार तब इतना डरावना नहीं रह जाता जब कानून खुद ही इसे एक मिसाल और तमाशे की तरह पेश करता है. अपराध की भयावहता तब कम हो जाती है जब उसे एक और अपराध के जरिये दण्डित किया जाता है. किसी दंड की प्रभावपूर्णता को उसकी कठोरता की मात्रा से मत आंकिये: ये दोनों एक दूसरे के एकदम उलटी बाते हैं. हर कोई उदार कानूनों की सहायता करता है. हर कोई कठोर कानूनों के खिलाफ षड्यंत्र करता है.

यह देखा गया है की स्वतंत्र देशों में अपराध कम हैं और दंडात्मक कानून ज्यादा उदार हैं. कुल मिलाकर, स्वतंत्र देश वे हैं जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाता है और इसके फलस्वरूप जहाँ के कानून न्यायपूर्ण हैं. जहाँ अतिशय कष्ट देकर मानवता का उल्लंघन किया जाता है यह इस बात का प्रमाण है कि वहां मनुष्यता की गरिमा को अभी पहचाना नहीं गया है, यह इस बात का प्रमाण है कि वहां कानून निर्माता स्वामी है जो दासों को चलाता है और अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे उन्हें सजाएं देता है. अतः मेरा निष्कर्ष है कि मृत्युदंड को समाप्त कर देना चाहिए.

अनुवाद: कुलदीप प्रकाश साभार

06 मार्च 2014

. मीडिया का फांसी-वाद

बलात्कार के मामले और फांसी का विकल्प

[बलात्कार की मीडिया कवरेज को लेकर दुनिया भर में कई अहम शोध और अध्ययन हो चुके हैं। इस लेख में हम दक्षिणी दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद के हफ़्ते में हुई मीडिया कवरेज के सबसे प्रमुख पक्ष पर सैद्धांतिक बात करेंगे।] 

समाजशास्त्र और मीडिया स्टडीज़ में हुए कुछ अध्ययन हमें बताते हैं कि बलात्कार और महिला सुरक्षा के मसले पर मीडिया के तेवर काफ़ी हद तक महिला आज़ादी के पक्ष में नहीं रहे हैं। ये बात भी काफ़ी प्रमुखता से स्पष्ट हुई है कि रिपोर्टिंग में वीभत्सता, रोमांच और हिंसा के अलावा महिलाओं को लेकर मौजूद सामाजिक धारणाओं को प्राथमिक तौर पर उभारा जाता रहा है।1  इससे पहले कि हम 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए बलात्कार की मीडिया कवरेज पर बात करें, हम दूसरे देश की एक घटना का मिसाल लेते हैं। 6 मार्च 1983 को अमेरिका के न्यू बेडफोर्ड, मैसाचुसेट्स शहर में रात के 9 बजे एक युवती 'बिग डैन्स' नामक बार में सिगरेट और ड्रिंक के लिए अंदर गई। 

लेकिन, कई घंटों बाद उसे किसी राहगीर ने अर्धनग्न हालात में रोते हुए सड़क पर पाया। उसके साथ बार में सामूहिक बलात्कार हुआ था और वहां से किसी तरह भागकर वो बाहर निकलने में कामयाब रही। बार में पूल टेबल के पास लड़कों के समूह ने उसके साथ बलात्कार किया और बाकी लोग उसे देखकर जाम टकराते रहे। किसी ने पुलिस को फोन नहीं किया। 14 मार्च 1983 को 12 महिला संगठनों ने मिलकर विरोधस्वरूप एक जुलूस निकाला, जिसकी संख्या न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2,500 और न्यू ब्रेडफोर्ड स्टैंडर्ड टाइम्स ने 4,000 बताई। 

इसके बाद महीनों तक छपने वाली मीडिया सामग्रियों को लेकर कई अध्ययन हुए। एक अध्ययन में ये पाया गया कि शुरुआत में तो मीडिया का ज़ोर हमलावरों और तमाशबीनों पर था, लेकिन जैसे ही मामला अदालत में पहुंचा अख़बारों का फोकस भी शिफ़्ट होने लगा। अख़बारों की रिपोर्ट इस पर ज़्यादा तवज्जो देने लगी कि देर रात को महिला बार में क्यों गई थी, क्या वो वहां जाकर शराब पीती थी और वह अपने बच्चों को घर में छोड़कर बार कैसे जा सकती है? 3 
हिंसा मीडिया का पसंदीदा उत्पाद है

रिपोर्टिंग के यह नज़रिया कई सवाल उठाता है। क्या किसी राष्ट्र-राज्य के भीतर महिलाओं को सिर्फ़ इस आधार पर घूमने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए कि उसके साथ बलात्कार हो सकता है? क्या बार जैसी जगह पर महिलाओं के जाने पर पाबंदी होनी चाहिए? क्या पारिवारिक ज़िम्मेदारी को बलात्कार के पक्ष में ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है? किसी देश के भीतर लोकतांत्रिक दायरे को मजबूत करने के लिए मीडिया को पहल करनी चाहिए या फिर महिलाओं को लेकर समाज में बनी यथास्थितिवादी धारणाओं को पुष्ट करना चाहिए? एकबारगी ऐसी रिपोर्टिंग ये एहसास दिलाती हैं कि बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय को लेकर प्रचलित पुरुषवादी धारणा मीडिया के भीतर भी मौजूद है। 

क्या मीडिया अपनी संरचना में पुरुषवादी है और समाज के जिस वर्ग को वो लक्ष्य कर रहा है उनकी मानसिकता भी रिपोर्टिंग की भाषा और कथ्य के दायरे में फिट बैठती है? ज़्यादातर माध्यम अपने कार्यक्रम को पुरुष दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाते और पेश करते हैं। कई दफ़ा ये नियोजित होते हैं और कई दफ़ा अवचेतन में दर्शकों को लेकर बनी पुरुष छवि के चलते ऐसा होता है। इसके अलावा एक प्रमुख कारण ये भी है कि कार्यक्रम निर्माण से जुड़े लोगों में पुरुष बहुसंख्यक है, लिहाजा अपनी पूरी सामाजिकता और संस्कृति के साथ पुरुषवादी मानसिकता ऐसे कार्यक्रमों के जरिए उभरकर सामने आता है। 

मीडिया स्टडीज़ ग्रुप के एक सर्वे में जाहिर हुआ है कि देश में जिला स्तर पर महिला पत्रकारों की भागीदारी महज 2.7 फ़ीसदी है। देश के छह राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में ज़िला स्तर पर महिला पत्रकारों की भागीदारी शून्य है। 4  किसी तबके को लेकर रिपोर्टिंग की भाषा और कथ्य में संवेदनशीलता के अभाव का बड़ा कारण उसकी हिस्सेदारी भी है। जिस मीडिया में महिलाओं की भागीदारी ही बेहद कम हो, उसमें महिलाओं को लेकर पुरुषवादी नज़रिए का हावी होना बहुत चौंकाता नहीं है। बलात्कार की रिपोर्टिंग पर अगर हम सतही नज़र दौड़ाए तो कई दफ़ा जो तस्वीर हमारे बीच उभरकर सामने आती है उसमें पीड़िता 'गंदी लड़की', "सामाजिक मान्यताओं को नकारने वाली', "बदचलन' और 'इस अंजाम के लायक' नज़र आती है। 

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड में हालांकि ये धारणा प्रमुखता से नहीं उभरी, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा ये सवाल पूछने में पीछे नहीं रहा कि लड़की देर रात अपने ब्वायफ्रेंड के साथ सिनेमा देखने क्यों जा रही थी? ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग में शहर, समाज और समय की संस्कृति को देखते हुए मीडिया अपना स्टैंड चुनता है। दिल्ली जैसे महानगर में मीडिया के लिए ब्वायफ्रेंड के साथ रात को सिनेमा देखने जाना इसलिए सबसे प्रमुख सवाल नहीं बना क्योंकि यहां के समाज के लिए वो बहुत असहज करने वाला मसला नहीं है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारतीय और ख़ासकर दिल्ली का मीडिया महिला मुद्दों को लेकर ज़्यादा उदार है। 

हां, देश के बाकी शहरों से ये अलग हो सकता है लेकिन ऐसे कई मामले हैं जब पीड़िता पर मीडिया ने उसी तरह के प्रहार किए जैसे उदाहरण ऊपर दिए गए हैं। आरुषि तलवार हत्याकांड में बलात्कार होने और न होने की कहानी के साथ-साथ आरुषि के चरित्र को लेकर मीडिया ने जिस तरह कयासों के आधार पर रिपोर्टिंग की वो तकरीबन न्यू बेडफोर्ड मामले में पीड़िता पर लगाए गए तमाम तरह के लांछणों से कम नहीं था। साल दर साल आरुषि का मामला मीडिया की सुर्खियां बटोरता रहा। रोज़ाना घटना में रोमांच, हिंसा, सेक्स और नैतिकता के अलग-अलग मसालों के ज़रिए रिपोर्टिंग के एंगल बनते रहे। 

                                                  ***************************

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार का मसला निश्चित तौर पर बेहद अमानवीय और क्रूर घटना थी और इसके खिलाफ़ लोगों ने जिस तरह का प्रदर्शन किया उसके बाद मीडिया के लिए विस्तृत कवरेज ज़रूरी था। लेकिन पूरी घटना के बाद दो-तीन अहम सवाल उभरते हैं। पहला, किसी घटना को मीडिया पहले बड़ा बनाता है या फिर लोग आकर उससे पहले जुटते हैं और फिर मीडिया उसको फॉलो करता है? दूसरा, स्वत:स्फूर्त विरोध-प्रदर्शन में मीडिया किस आधार पर जनता की मांग को एक रंग में रंग देता है? तीसरा, यौन हिंसा और बलात्कार की कवरेज के दौरान मीडिया देश-समाज के सामने लोकतांत्रिक चेतना को बढ़ाता है या फिर लोगों के गुस्से को हवा देकर हिंसक फौरी निपटारे के पक्ष में मुहिम को समर्थन देता है? एल रॉवेल ह्यूसमैन और लैरामी डी टेलर ने अपने शोध अध्ययन द रोल ऑफ मीडिया वायलेंस इन वायलेंट बिहैवियर में ये बताया है कि टीवी समाचार चैनलों में हिंसक घटनाओं की ख़बरों के प्रसारण से समाज में हिंसा की मानसिकता और ज़्यादा फैलती है। 5  

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो बीते कुछ वर्षों के अनुभव हमें साफ बताते हैं कि संगठनात्मक ढांचे के बगैर कोई आंदोलन स्वत:स्फूर्त तरीके से बिना मीडिया कवरेज के नहीं चल सकता। अण्णा आंदोलन का मीडिया ने जिस तरह मिशनरी भूमिका में साथ दिया, उसको लेकर विश्लेषकों के बीच कई तरह के पक्ष उभरकर सामने आए, लेकिन इस बात पर तकरीबन सहमति है कि मीडिया ने अण्णा आंदोलन को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया। कई टीवी चैनलों के लिए यह टीआरपी का मामला था। 6   इस लेख में बलात्कार के खिलाफ़ होने वाले प्रदर्शनों के मीडिया कवरेज पर आपत्ति नहीं जताई जा रही है, बल्कि लेखक का मानना है कि ऐसे हर प्रदर्शन को अनिवार्य तौर पर मीडिया में जगह मिलनी चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक चेतना का विकास हो। लेकिन, 16 दिसंबर के बाद मीडिया ने विरोध प्रदर्शन को जिस रंग में रंगा उसमें आरोपितों को फांसी देने की मांग सबसे प्रमुख हो गई।7  
16 दिसंबर 2012 की घटना के बाद फांसी के पक्ष में नारे

फांसी के पक्ष में लगातार मीडिया ने रिपोर्टिंग की। कई टीवी चैनलों के पत्रकार बार-बार इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच जाकर ये सवाल उछालते कि ‘आप फांसी चाहते हैं कि नहीं?’ लिहाजा प्रदर्शन के माहौल के बीच लोगों का गुस्सा ज़्यादातर मामलों में नकार के रूप में सामने नहीं आया और तक़रीबन हर सवाल के जवाब में ‘हां’ का उत्तर टीवी स्क्रीन पर सामने आता रहा। इंडिया टीवी के एक पत्रकार ने तो यहां तक पूछ दिया कि ‘आप तालिबानी अंदाज़ में सज़ा चाहते हैं कि नहीं?’ प्रदर्शन में जिस तरह सनसनी और फांसी के तत्व पर ज़ोर देकर टीवी हमारे ड्रॉइंग रूम में पहुंच रहा था, उसमें ये अंतर स्पष्ट करना मुश्किल था कि ये रिपोर्टिंग और स्टूडियो कमेंट्री क्राइम रिपोर्टिंग और क्राइम शो से किस तरह अलग है? 

मिसाल के तौर पर हिंदी में दूसरा सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बार दैनिक भास्कर की रिपोर्टिंग पर ग़ौर करे तो ये साफ़ हो जाएगा कि फांसी अख़बार की आधिकारिक लाइन थी। भास्कर ने पीड़िता के पक्ष में ‘महाअभियान” की शुरुआत की। दैनिक भास्कर ने अगले दिन से इस महाअभियान का स्लग रखा- ‘देश को इस ग़ुस्से का अंजाम चाहिए’। अंजाम के तौर पर दैनिक भास्कर ने फांसी को विकल्प बनाया। जगह-जगह से भास्कर की रिपोर्टिंग में ये बातें स्पष्ट हो रही थीं। इंदौर में विरोध प्रदर्शन पर भास्कर ने शीर्षक रखा- “फांसी से कम बर्दाश्त नहीं, देश को गुस्से का अंजाम चाहिए!- युवाओं ने लगाए भारत सरकार हाय-हाय के नारे” 8  

23 दिसंबर को दैनिक भास्कर ने रविवार को छपने वाले जैकेट पेज की पहली स्टोरी का उपशीर्षक दिया : सबकी बस एक ही मांग- आरोपियो को फांसी दे सरकार। नीचे ख़बर में लिखा था- यह प्रदर्शन पूरी तरह अप्रत्याशित और स्वत:स्फूर्त था। कई मायनों में अभूतपूर्व भी। जत्थों में सुबह 7 बजे से इंडिया गेट पर एकत्र हो रहे इन नौजवानों का न कोई नेता था, न ही वे अपनी मांगों को लेकर एकमत और स्पष्ट थे। यानी रिपोर्टिंग ये कह रही है कि आंदोलन कर रही जनता के बीच सज़ा को लेकर आम-सहमति नहीं है, लेकिन शीर्षक में भास्कर ये बता रहा है कि सारे लोग फांसी मांग रहे हैं! जाहिर है ये विरोधाभास इसलिए पैदा हो रहा था क्योंकि सज़ा के तौर पर फांसी की मुहिम को दैनिक भास्कर ने सांस्थानिक तौर पर स्वीकृत कर लिया था। उसी दिन पहले पन्ने पर दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संपादक कल्पेश याज्ञनिक ने ‘धोखा’ शीर्षक से विशेष संपादकीय लिखा। इस संपादकीय का निचोड़ ये है कि जब तक आरोपितों को फांसी नहीं दी जाती, तब तक कोई भी वादा या दावा जनता के साथ विश्वासघात है। 

23 दिसंबर को ही पहले पन्ने पर भास्कर में गृहमंत्री के बयान के हवाले से जो ख़बर छापी है, उसका शीर्षक है- कड़े क़ानून की बात कही, पर फांसी का ज़िक्र नहीं। 9वें पेज पर एक फोटो छपी है। हिंदू सिख जागृति सेना से जुड़ी महिलाओं की ये फोटो है जो सामूहिक बलात्कार मामले के विरोध सड़क पर प्रदर्शन कर रही हैं। अख़बर ने फोटो का कैप्शन लगाया है- महिलाओं ने आरोपियों को जल्द से जल्द फांसी देने की मांग की। फोटो में कोई प्लेकार्ड नहीं, कोई पोस्टर नहीं है और न ही कोई बैनर है जिसमें इस तरह की एक भी मांग हो, लेकिन अख़बार ने फांसी को कैप्शन बनाया। फोटो में महिलाओं के हाथ में सैंडिल है और सैंडिल को किस तरह अख़बार ने फांसी के रूप में डिकोड किया इसपर संचार के दृष्टिकोण से शोध किया जाना चाहिए। 
प्रदर्शनकारियों का बड़ा हिस्सा अपराधियों को सज़ा दिलाने के पक्ष में था। मीडिया ने पढ़ा- फांसी दिलाने के पक्ष में।

इससे पहले इसी अख़बार ने 109 सांसदों और 9 मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था जिसमें फांसी की वकालत की गई थी। बाद में अख़बार ने आह्वान किया है कि वो अपने पाठकों से सांसदों को चिट्ठी लिखवाएगा जो फांसी के समर्थन में होंगी और सांसदों पर दबाव बनाने का काम करेगी। वाकई, कई नेताओं ने इसके बाद फांसी की पुरज़ोर वकालत की। लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने खुलकर फांसी के पक्ष में बयान दिया।9  भास्कर के साथ-साथ और भी कई हिंदी अख़बारों ने इस पूरी मुहिम को हवा दी। पंजाब केसरी, नवभारत टाइम्स के साथ-साथ 'दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला अख़बार' दैनिक जागरण भी ख़बर की पूरी एंगल को इसी तरफ़ मोड़ रहे थे। जागरण ने ख़बर चलाई – रेप के सभी आरोपियों को मिलेगी फांसी। यह ख़बर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग पर आधारित थी। यानी फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का अनुवाद फांसी में हो रहा था। इस मुहिम में तकरीबन हर बड़ा अख़बार शामिल था। नवभारत टाइम्स ने नारे की शक्ल में शीर्षक लगाया- रेप के आरोपियों को फांसी दो10  

सवाल ये है कि ऐसे मामलों को कवर कर रहा मीडिया ख़बरों के बीच अपना नज़रिया यदि पैबस्त करता है तो उसकी दिशा क्या होनी चाहिए? समाज के भीतर भी यदि ‘लिंग काट लेने’, ‘चौराहे पर फ़ांसी देने’, ‘सामूहिक रूप से पीट-पीट कर मार डालने’ की बात उठती है तो क्या मीडिया को उन्हें लगातार उछालते रहना चाहिए? दूसरा सवाल ये है कि बलात्कार और महिला सुरक्षा के मसले को मीडिया घटना के तौर पर रिपोर्ट क्यों करता है? 16 दिसंबर से कुछ हफ़्ते पहल ही अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू ने दिल्ली में छेड़छाड़ और यौन शोषण के मुद्दे पर श्रृंखला में स्टोरी की। इनमें पत्रकारों के निजी अनुभवों को भी शामिल किया गया। लेकिन ज़्यादातर अख़बारों में सामाजिक विश्लेषण और यौनिकता को बड़े संदर्भ में देखने की कोशिश नज़र नहीं आती। फांसी को लेकर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि सामाजिक विकास के पायदान के साथ इसका गहरा संबंध है। अमेरिका में वक़्त के साथ-साथ समाज और मीडिया, दोनों में मृत्युदंड को लेकर अस्वीकृति का भाव बढ़ा है। 

दुनिया के कई देशों में मृत्युदंड के प्रावधान को ख़त्म कर दिया गया है। पश्चिमी यूरोप के ज़्यादातर देशों का अनुभव यह बताता है कि मृत्युदंड के प्रावधान ख़त्म होने के बाद वहां अपराधों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। अलबत्ता दुनिया के सबसे शांत और मानव विकास सूचकांक में हमेशा शीर्ष स्थान हासिल करने वाले स्कैंडेनेवियन देशों में मृत्युदंड के प्रावधान नहीं है। अमेरिका में मृत्युदंड और टेलीविज़न पर इसके तीव्र कवरेज के दौरान कई लोगों की ये दलील थी कि वहां हत्या जैसे अपराधों पर ये लगाम कसने में कारगर साबित होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अपराध के लिए मृत्युदंड और टीवी पर इसके पक्ष में अभियान साथ-साथ चलता रहा लेकिन अपराध कम नहीं हुए।11   कहने का मतलब ये कि जिस तरह मृत्युदंड को अपराध ख़त्म करने के लिए ज़रूरी कदम के तौर पर भारतीय मीडिया पेश कर रहा है उसे सामाजिक और राजनीतिक विज्ञान के अलावा मीडिया स्टडीज़ में भी सैद्धांतिक तौर पर नकारा जा चुका है। अगर बलात्कारियों को फांसी देने से इस अपराध में कमी आती तो धनंजय चटर्जी की फांसी के बाद दिल्ली में इतनी बड़ी घटना न घटी होती और न ही उस दौरान दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बलात्कार के और मामले सामने आते जब 16 दिसंबर की घटना को लेकर दिल्ली की सड़कों पर मीडिया में उबाल मचा हुआ था। 

                                                  ***************************                          

हिंसा और रोमांच के प्रति मीडिया के लगाव के चलते ही ये मुमकिन होता है कि मृत्युदंड को मीडिया अभियान के तौर पर चलाता है। मृत्युदंड के हर मामले की पृष्ठभूमि में या तो हत्या होती है या फिर अन्य जघन्यतम अपराध। जाहिर है मीडिया मृत्युदंड पर बात करते वक्त मामले को उस पृष्ठभूमि से काटकर नहीं देखता, इसलिए मृत्युदंड की कवरेज का मतलब है उस हिंसा की कवरेज। फांसी जैसी सज़ा में मीडिया दोहरे स्तर पर हिंसा को लोगों के सामने पेश करता है। पहला, आरोपी द्वारा अंजाम दी गई वास्तविक घटना की रिपोर्टिंग और उसका कथ्य और दूसरा, फांसी की हिंसक घटना की उम्मीद और उसके विवरण। इसलिए फांसी कवरेज में ज़्यादातर दो-तीन बातों पर ज़ोर दिया जाता है। अपराध का अलहदापन, अपराधी की आख़िरी भंगिमा, आख़िरी रात, आख़िरी मुलाकात, आख़िरी चाहत और फांसी की प्रक्रिया की नाटकीयता के साथ-साथ अपराधी के मूल कृत्य का विवरण मीडिया में प्रमुखता पाते हैं। दूसरी तरफ़ मृत्युदंड की कतार में खड़े आरोपितों की दलील तक को मीडिया उचित जगह नहीं देता। अगर किसी की क्षमा याचना को मंजूरी मिल जाए या फिर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए तो मीडिया में रोष का स्तर काफी बढ़ जाता है। 
जितनी हिंसा, उतना हिट वीडियो गेम

असल में हिंसा और यौनिकता मीडिया के टिकाऊपन और लोकप्रियता की बड़ी धुरी है और किसी भी तरह मीडिया इन मामलों को लंबे समय तक स्पेस देना चाहता है। मीडिया के जरिए जब हिंसा लोगों तक पहुंचती है तो मीडिया और हिंसा, दोनों टिकाऊ हो जाते हैं। डगलस ए जेंटिल और क्रेग ए एंडरसन ने बच्चों पर मीडिया हिंसा को रेखांकित करते हुए ‘वायलेंट वीडियो गेम्स: द न्यूएस्ट मीडिया वायलेंस हजार्ड’ में ये बताया कि समाज में मीडिया और नई तकनीक लोगों के भीतर हिंसा का पुट पैबस्त कराने में मदद कर रहे हैं।12   ख़ासकर बच्चों पर किए गए अध्ययन में उन्होंने पाया कि हिंसक वीडियो का उनके ऊपर ज़्यादा गहरा असर पड़ता है। इसी किताब में सिल्वर्न और विलियमसन के हवाले से उन्होंने ये बात भी बताई कि हिंसक वीडियो गेम के मुकाबले टीवी के हिंसक दृश्य लोगों पर टिकाऊ और गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। 

तर्क ये है कि ज़्यादातर वीडियोगेम के ग्राफिक्स गुणवत्ता के मामले में बहुत सजीव नहीं होते। लिहाजा, उनके पात्रों के भीतर लोग वास्तविक दुनिया के पात्रों के अक्स नहीं देख पाते। इसके अलावा वीडियो गेम में कई दफ़ा काल्पनिक चरित्र और काल्पनिक हमलों को अंजाम दिया जाता है। मिसाल के लिए दानवाकार चरित्र पर गोली बरसाना या फिर अंतरिक्ष से आ रहे हमलावरों को मिसाइल से उड़ाना। टेलीविजन के मामले में परिदृश्य बिल्कुल अलहदा हो जाता है। हिंसक फ़िल्मों और धारावाहिकों में किए जाने वाले स्टंट कहीं ज़्यादा सजीव और वास्तविक होते हैं। ये हमारे आस-पास के वातावरण की कहानियां समेटे होते हैं, लिहाजा हिंसा और हिंसा के कारणों के साथ लोगों को तादात्म्य बैठाने में असहजता नहीं होती। 

असल में यह माध्यम की विश्वसनीयता से जुड़ा मसला भी है। जिस माध्यम की कहानियां दर्शकों को जितनी वास्तविक लगेगी वो उसी शिद्दत के साथ उससे निकलने वाले संदेश को स्वीकार करेगा। इस कड़ी को विस्तार दें तो जिस आधार पर वीडियो गेम से ज़्यादा विश्वसनीयता फ़िल्मों और धारावाहिकों को हासिल है, ठीक उसी तर्ज पर फ़िल्मों और धारावाहिकों से ज़्यादा विश्वसनीय समाचार चैनल हैं। समाचार चैनलों में रोज़ाना दिखने वाले दृश्यों को लोग एकबारगी चुनौती देने के पक्ष में नहीं होते। वो मानकर चलते हैं कि जो टीवी पर दिख रहा है वो सच है और उसी मात्रा और नज़रिए से सच है जैसा कि दिखाया जा रहा है। समाचार चैनलों को ये विश्वसनीयता देश-दुनिया में मीडिया की अब तक की लंबी विरासत से हासिल हुई है। ऐसे में अगर मीडिया के जरिए फांसी की पुरज़ोर मांग अगर श्रोताओं तक पहुंचती है तो वो उसे उसी रूप में आत्मसात करने की स्थिति में होते हैं। 

फांसी और बलात्कार के बीच मीडिया के लिए जो साझी चीज़ है वो हिंसा और यौनिकता का मिश्रण। मीडिया में जब बलात्कार जैसे मसले पर बात होती है तो उसे महज एक घटना के तौर पर पेश करना और अपराध रिपोर्टिंग की तर्ज पर उसके निपटारे का आग्रह कई सवाल छोड़ते हैं। आज से तीन दशक पहले, 1981 में, महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले हिंसात्मक फ़िल्मी दृश्यों को लेकर नील एम मलामथ और जेम्स वीपी चेक ने अपने शोध में दिखाया कि पुरुष दर्शकों को उनमें ज़्यादातर दृश्यों पर कोई ख़ास आपत्ति नहीं थी। कई दृश्यों पर उन्होंने बेहद सकारात्मक करार दिया। यौन हिंसा में उन्हें कोई ग़लती नज़र नहीं आई।13   यानी ऐसे दृश्य और ख़बरों को दर्शक-पाठक अपने मुताबिक़ डिकोड करता है और उसका किसी रूप में दर्शकों पर असर पड़ेगा, ये उनके डिकोड करने की दिशा पर निर्भर करता है। 
फांसी और 'अपराध में कमी' का कोई संबंध नहीं

नील एम मलामथ ने ही बलात्कार को लेकर एक दूसरा शोध किया- ‘रेप प्रोक्लिविटी एमंग मेल्स’14   इसमें शोध में कॉलेज के छात्रों को लक्ष्य बनाया गया। शोधकर्ता ने छात्रों से पूछा कि अगर नहीं पकड़े जाने की गारंटी हो तो बलात्कार के बारे में उनका क्या रुझान होगा? 35 फ़ीसदी छात्रों ने ये जवाब में कहा कि ऐसी स्थिति में वो बलात्कार की कोशिश करेंगे। जाहिर है बलात्कार को एक बड़े तबके के बीच जिस तरह की सामाजिक या यों कहे कि मनोवैज्ञानिक स्वीकृति मिली हुई है उसे हमलावर तरीके से फांसी की मांग के जरिए मिटाया नहीं जा सकता। इसे हमारे सामाजिक संरचना में जेंडर मुद्दों पर लोगों को संवेदनशील बनाने के दीर्घकालीन लेकिन सतत कार्यक्रम के जरिए दूर किया जा सकता है। 24x7 मीडिया के दौर में समाज में गति और रोमांच को जिस तरह पेश किया गया है उसमें किसी भी दीर्घकालीन कार्यक्रम को उबाऊ और बासी की श्रेणी में डाल दिया गया है। सबकुछ फास्ट मोड में है। दो मिनट में नास्ता तैयार हो रहा है और चार घंटे में क्रिकेट मैच ख़त्म हो जा रहा है। नतीजों की हड़बड़ी का ये दौर है। लिहाजा गंभीर और संवेदनशील मुद्दे भी जल्दबाज़ी के शिकार में ग़लत अंजाम हासिल कर रहे हैं। 

आख़िरकार 16 दिसंबर बलात्कार कांड के बाद मीडिया ने क्यों फांसी को ही समाधान के तौर पर पेश किया? क्या फांसी और बलात्कार के बीच कोई सैद्धांतिक जुड़ाव भारतीय मीडिया स्थापित करना चाहता है? मृत्युदंड और अपराध की कमी वाला सिद्धांत बहुत कारगर नहीं रह गया है।15   लिहाजा पश्चिम के कई देशों में इस मुद्दे पर मीडिया का स्टैंड बदला है। साल 2000 में न्यूयॉर्क टाइम्स में मृत्युदंड पर 235 सामग्रियां छपीं और इनमें से ज़्यादातर मृत्युदंड की आलोचना में थीं। 16 

1990 के दशक के आखिर और 21वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी मीडिया में मृत्युदंड को लेकर आलोचनात्मक स्वर मुखरता से उठने लगे। 1960 से लेकर 2000 के बीच मीडिया के बड़े हिस्से की रिपोर्टिंग का न सिर्फ़ स्टैंड बदला बल्कि मृत्युदंड संबंधी ख़बरों को लेकर चौकसी, निगरानी और विमर्श भी तेज हुए। 1960 में न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पेज पर मृत्युदंड को लेकर सिर्फ़ 1 ख़बर, 1970 में दो, 1980 में चार, 1990 में 8 और 2000 में 19 ख़बरें छपीं।17  जाहिर है मृत्युदंड को लेकर आलोचनात्मक होने के बावजूद इस मसले को बड़ी ख़बर के तौर पर अख़बार ने जगह दी। 

मोटे तौर पर अमेरिका में पिछले 50 साल की बहस मृत्युदंड के जिन आयामों पर केंद्रित रही उनमें दंड के कौशल, नैतिकता, वस्तुनिष्ठता, संवैधानिकता, लागत, मृत्युदंड के तरीके और अंतरराष्ट्रीय मानदंड के अलावा इसके बाद अपराध की तादाद में होने वाली कमी-बेसी प्रमुख हैं। 1960 से लेकर 2005 के बीच मृत्युदंड के पक्ष में सबसे ज़्यादा 48 फीसदी लेखों और समाचारों में नैतिकता को सबसे मजबूत आधार माना गया जबकि 52 फीसदी लेखों/समाचारों में माना मृत्युदंड के तरीके बदलकर इसे कायम रखने की वकालत की गई। इसी दौरान 84 फीसदी सामग्रियों में अंतरराष्ट्रीय क़ानून और 81 फीसदी स्टोरीज़ में वस्तुनिष्ठता के आधार पर मृत्युदंड को चुनौती दी गई। 18  

स्कैंडिनेविया के देश दुनिया के सबसे शांत इलाकों में से हैं।
अब सवाल ये है कि बलात्कार मामले की रिपोर्टिंग में मीडिया की दिशा क्या होती है? कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी ख़बरों में यौनिकता के पहलू को जानने की पाठकों की जिज्ञासा बेहद तेज़ होती है। लिहाजा बलात्कार के तरीकों का विवरण मीडिया में प्रमुखता पाते हैं। इसे सैक्सुअलिटी और कई दफ़ा सैक्सुअल प्लेज़र तक खींच दिया जाता है। डब्लू विल्सन की ये स्थापना है कि मीडिया उद्योग का मनोरंजन पक्ष सेक्स और हिंसा की बदौलत ही स्थायित्व हासिल कर रहा है।19  बलात्कार और फांसी के एक साथ मीडिया में पेश होते ही दोनों लक्ष्य हासिल होते दिखते हैं। टीवी एक बड़े माध्यम के तौर पर दुनिया भर में उभरा है। 

एल स्टॉसेल ने 1997 में अपने शोध में पाया कि अमेरिकी व्यक्ति अपने खाली समय का एक तिहाई हिस्सा टीवी देखने में ख़र्च करता है। दुनिया भर में खाली समय में टीवी देखने की मात्रा को लेकर इसके बाद भी कई शोध और सर्वेक्षण हुए हैं। भारत में टीवी की बढ़ती संख्या के कारण इसकी शक्ति भी लगातार मज़बूत होती जा रही है। लिहाजा इससे निकलने वाले संदेश जिस संस्कृति को बढ़ावा देते हैं उसको नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। फ्रैंकफर्ट स्कूल से जुड़े नवमार्क्सवादी थियोडोर एडर्नों ने संस्कृति उद्योग की अवधारणा में ये जाहिर किया कि पॉपुलर माध्यमों में दिखनी वाली चीज़ों ने संरचनागत उद्योग की शक्ल ले ली है और ये एक ख़ास तरह की संस्कृति निर्मित करने की क्षमता रखने लगी हैं।20  इस लिहाज से देखें तो मीडिया से जो आउटपुट बाहर निकल रहा है वो फांसी को सामाजिक बदलाव के टूल्स के तौर पर हमारे बीच स्थापित कर रहा है, जबकि सामाजिक बदलाव और फांसी के बीच के संबंध हमें बताते हैं कि इनमें सच्चाई नहीं है। 
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------

 1. Sarah N Keller and Jane D Brown, Media Interventions to Promote Responsible Sexual Behavior, The Journal of Sex Research, Vol, 39, No.-1. Page 67-72 और Jana Bufkin and Sarah Eschholz, Images of Sex and Rape: A Content Analysis of Popular Film, http://www.d.umn.edu/cla/faculty/jhamlin/3925/4925HomeComputer/Rape%20myths/Images%20of%20Sex%20and%20Rape.pdf (आख़िरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 2.  New Bedford, Massachusetts, March 6, 1983- March 22, 1984: The "Before and after" of a Group Rape Author(s): Lynn S. Chancer,  Gender and Society, Vol. 1, No. 3 (Sep., 1987), pp. 239-260

 3. k bumiller, 1990, fallen angels: the representation of violence against women in legal culture, International Journal of the sociology of low, 18, page- 125-142

 4.   Conspicuous by her absence, 13 november 2013, Media Studies group, Web link- http://mediastudiesgroup.org.in/msginnews/detailmsginnews.aspx?TID=15 (आख़िरी बार 10-02-2014 को देखा गया)
 5.     वेब लिंक- http://www.thepci.org/articles/The%20Role%20of%20Media%20Violence%20in%20Violent%20Behavior.pdf (आख़िरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 6.   Rahul Bhatia, Fast and furious, 1 December 2012, The Caravan, Web link- http://www.caravanmagazine.in/reportage/fast-and-furious (आख़िरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 7.   Arnika Thakur, Delhi Gang rape: A case for the death penalty, December 21, 2013, India insight, Web link- http://blogs.reuters.com/india/2012/12/22/delhi-gang-rape-a-case-for-the-death-penalty/ (आख़िरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 8.   वेब लिंक- http://www.bhaskar.com/article/MP-OTH-c-8-747892-NOR.html (आखिरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 9.   http://www.dnaindia.com/india/report-delhi-gang-rape-sushma-swaraj-demands-capital-punishment-for-all-four-rapists-1886961 (आखिरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 10.   वेब लिंक- http://navbharattimes.indiatimes.com/condemning-accused-of-rape/articleshow/17722458.cms (आख़िरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 11.   William C Bailey:  Murder, Capital Punishmenta and Television: Execution Publicity and Homicide Rates, American Sociological Review, Vol. 55, No. 5, PP. 628-633

 12.   Douglas A Gentile and Craig A Anderson, Violent video games: The newest media violence hazard, 2003, वेब लिंक- http://www.psychology.iastate.edu/faculty/caa/abstracts/2000-2004/03GA.pdf (आखिरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 13.   Neil M. Malamuth and James V P Check, The Effects f Mass Media exposure on acceptance of violence against women: A field Experiment, Journal of Research in Personlaity, 1981, page- 15

 14.   Neil M Malamuth, Rape proclivity among males, journal of social issues, vol- 37, 4 November, 1981 

 15.   http://dakhalkiduniya.blogspot.in/2013/03/20.html (आखिरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 16.   Frank R Baumgartner, Suzanna Linn, Amber E Boydstun, वेब लिंक- http://www.unc.edu/~fbaum/Innocence/Winning_with_words_ch9.pdf (आखिरी बार 10-02-2014 को देखा गया)

 17.   वही

 18.   वही

 19.   W Wilson, 1994, Sexuality in the Land of Oz : searching for safer sex at the movies, university press of America, page-3 

 20.   Theodor W. Adorno, The Culture industry: Selected essays on mass culture, 1991, Routledge publication

(दिसंबर 2012 में लिखे गए लेख को रोहित जोशी के कहने पर सुधारा गया।)

08 मार्च 2013

क्योंकि मृत्युदंड टी20 का मैच नहीं है


-युग मोहित चौधरी*
युग मोहित चौधरी ने 9 फरवरी 2013 को दूसरे शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान में जो भाषण दिया उसका ये संपादित रूप है। मृत्युदंड की अवधारणा पर करारा चोट करता यह भाषण उन सबके लिए  हैं जो देश 
को कम हिंसक और कम प्रतिक्रियावादी जगह के तौर पर देखना चाहते हैं। लेख लंबा है लेकिन किस्तों की बजाए एक बार में इसलिए छाप रहे हैं ताकि लयात्मकता बरकरार रहे। मूल रूप से  अंग्रेज़ी में 
दिए गए भाषण का लिप्यांतरण  दीप्ती स्वामी, धीरज पांडेय और अनुराग सेठी ने किया।  
(महताब आलम के लगातार आग्रह पर हिंदी अनुवाद : दिलीप ख़ान)

अधिवक्ता युग मोहित चौधरी

फरमन वनाम जॉर्जिया (1972) केस में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदंड की मुखालफत की। न्यायाधीश मार्शल ने कहा कि अगर नागरिकों को इस बात की पूरी जानकारी हो कि लोगों को किस तरह मृत्युदंड सुनाए जाते हैं तो उन्हें लगेगा कि मौत की सजा स्तब्धकारी, ग़लत और अस्वीकार्य है। हालांकि भारत में मृत्युदंड उन्मूलन अभियान में ऐसे शोध और लोगों के बीच जागरुकता अभियान जैसे काम को सर्वाधिक नज़रंदाज किया गया है। भारत में मृत्युदंड की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले अंतिम तीन बिंदुओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया, क्योंकि उन्मूलन के दावों को समर्थन देने के लिए कोई अनुभवजन्य आंकड़ें (empirical data) नहीं थे। अफ़सोसजनक ये है कि परिस्थिति में अब भी कोई बदलाव नहीं आया है। अब भी इस मामले पर शायद ही कोई शोध हुआ है। इसलिए मृत्युदंड के ऊपर अनुभवजन्य शोध करना उन्मूलन अभियान की प्राथमिकता में शीर्ष पर होना चाहिए। हरेक प्रस्तावित मृत्युदंड को रोकने की हरसंभव कोशिश में विफल रहने के बाद हमें कम-से-कम राज्य को उस स्थिति तक पहुंचाना चाहिए कि अगले मामले में मृत्युदंड देना उसके लिए मुश्किल भरा काम बन जाए। इसके लिए हरसंभव क़ानूनी, राजनीतिक और सामाजिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। मृत्युदंड का उन्मूलन कभी भी एक झटके में नहीं हुआ है और न ही ऐसा होगा। इस दिशा में होने वाली प्रगति की रफ़्तार सुस्त होगी और ये हम पर निर्भर करता है कि हम सरकार, अदालत, संसद और लोगों को ये समझा सके कि इससे हमें कुछ भी हासिल नहीं होता, अलबत्ता हमारे मानवीय स्तर को ये नीचे ज़रूर गिराता है। 

आज मृत्युदंड का विरोध करने के अनेक कारण हैं। लोग यह आसानी से महसूस सकते हैं कि किसी को मारना नैतिक तौर पर ग़लत है, कि सजा के तौर पर एक हत्यारे की हत्या करना पाखंड है, कि आजीवन कारावास की बजाय मृत्युदंड देने से अपराध की मात्रा में कोई कमी नहीं आती। मृत्युदंड की मुख़ालफ़त के पीछे जो एक और कारण हैं वो ये कि इस सजा को वापस नहीं लिया जा सकता। ऐसे कई मामले हैं जब अदालती फ़ैसले ग़लत साबित हुए और जिन्हें दुरुस्त करने का कोई मौका नहीं बचा। एक बार जिसे मौत दे दी गई, उसे ठीक करने का कोई तरीका नहीं होता। मौत के घर से वापसी नहीं होती। चलिए हम तीन सामाजिक संस्थाओं के संदर्भ में मृत्युदंड की चर्चा करते हैं, ताकि इसके उन्मूलन के लिए तर्क निकल सके। ये तीन संस्थाएं हैं, पुलिस, जोकि सबूत इकट्ठा करने वाली इकाई है; अदालत, जोकि दोष तय करने और उपयुक्त सजा सुनाने वाली इकाई है और कार्यपालिका, जोकि क्षमा याचिका पर विचार करने वाली ईकाई है।  

इस बात को बहुत ज़ोर देकर उभारने की ज़रूरत नहीं है कि हमारे यहां, भारत में, पुलिस बल बदमाश, भ्रष्ट, बेईमान और आपराधिक है। अदालत में जो सबूत पेश होते हैं उसे यही पुलिस जमा करती है। हम इन्हीं सबूतों के बिनाह पर ये तय करते हैं कि किसी को मौत की सजा सुनाई जाए या नहीं। यह अपने-आप में सोचने वाली बात है कि जिस पुलिस के बारे में हम जानते हैं कि वो भ्रष्ट और बेईमान है, उसके द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर सजा तय होती है। इसके मुतल्लिक मैं कुछ उदाहरण पेश करता हूं :- मुंबई में कुछ साल पहले एक आदमी को एक बच्चे की हत्या और बलात्कार के मामले में दोषी पाते हुए सजा सुनाई गई। अर्जी उच्च न्यायालय में अटकी थी और इसी दरम्यान पुलिस अधिकारियों को जांच-पड़ताल के बाद ये पता चला कि वो मामला आत्महत्या का है और पुलिस ने आत्महत्या नोट बरामद करते हुए माना कि उस आदमी को उन लोगों ने ख़ामख़्वाह पकड़ लिया था। अब रिकॉर्ड में जो सबूत हैं उसके आधार पर उस आदमी को निर्दोष नहीं माना जा सकता क्योंकि सबूत काफी मज़बूत थे। सुसाइड नोट सबूत का हिस्सा नहीं था और उसके बग़ैर वो आदमी मौत के पार पहुंच सकता था। बंबई उच्च न्यायालय ने अपारंपरिक तौर पर उस सुसाइड नोट पर ग़ौर करते हुए उस आदमी को बरी कर दिया। अगर मामला इस तरह हल नहीं हुआ होता तो कल्पना कीजिए क्या घटित हो चुका होता? 

मैं आपको कुछ दूसरे उदाहरण दूंगा। जिन मामलों को शाहिद (शाहिद आज़मी**) देख रहे थे उन्हें आज-कल मैं देख रहा हूं। वो मामला है, 2006 का मालेगांव बम धमाका। शब-ए-बरात की पवित्र रात या बड़ी रात को मुस्लिम बाहुल्य शहर मालेगांव में मस्जिद के बाहर बम धमाके हुए। नौ लड़कों को इस मामले में पकड़ा गया और उनपर उन धमाकों के आरोप लगाए गए। नौ स्वीकृतियां (कनफेसन) रिकॉर्ड में दर्ज हैं। पुलिस का दावा है कि उसने उन लोगों के घर से आरडीएक्स सहित अन्य विस्फोटक सामग्रियां जब्त की। पुलिस ने ये भी दावा किया कि उन नौ में से एक लड़के का जमीर जाग गया और वो अपने सहयोगियों के ख़िलाफ़ राज्य के लिए गवाह बनने को तैयार हो गया। मामले में आरोप पत्र दायर किया गया। मुंबई में पूरे मामले पर गर्माहट के बाद केस सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने एक पूरक आरोप पत्र दायर किया जोकि मुंबई पुलिस द्वारा किए गए जांच-पड़ताल से संबंधित था। और फिर, एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी), जोकि समझौता एक्सप्रेस धमाकों की जांच कर रही थी, उसने स्वामी असीमानंद को गिरफ़्तार किया। असीमानंद ने बाद में ये स्वीकारा कि उसने ही मालेगांव के तीन धमाकों को अंजाम दिया। उसने बताया कि उसके हिंदूवादी दक्षिणपंथी आतंकी समूह ने मालेगांव में धमाका किया है। तो, उन तमाम सबूतों का क्या हुआ, उन स्वीकृतियों का क्या हुआ और उस आरडीएक्स का? कहां से वो आरडीएक्स आया था और कहां ग़ायब हो गया?

अब आप खुद को वकील की जगह रखकर देखें, एक केस में पुलिस कोर्ट के सामने आरडीएक्स ये कहते हुए पेश कर रही है कि उसने आरोपियों के घर से उसे जब्त किया है। बचाव पक्ष का वकील कह रहा है कि सबूत गढ़ा गया है। जज पूछता है, "पुलिस ने इसे फिर कहां से बरामद किया?" आप इस सवाल का जवाब कैसे देंगे? जज अपने सामने पेश किए गए उस सबूत पर यकीन करेगा और ये मानेगा कि वाकई आरडीएक्स जब्त किया गया होगा क्योंकि लोगों के पास आखिरकार कहां से आरडीएक्स आएगा? सामान्य लोगों के पास आरडीएक्स नहीं होता। लेकिन स्वामी असीमानंद की स्वीकृति जाहिर होने से पहले इन नौ लोगों के सर पर तलवार लटकी थी। सबके ऊपर। ये कोई अलग-थलग मामला नहीं है। 

11 जुलाई 2006 को आधे घंटे के दरम्यान मुंबई की ट्रेन में सात धमाके हुए। पुलिस ने सिमी (स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) के तेरह लड़कों को ये कहते हुए गिरफ़्तार किया कि उन्हीं लोगों ने इन धमाकों को अंजाम दिया है। गिरफ़्तारी के समय उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए। मजिस्ट्रेट के सामने रिमांड आवेदन पेश करते हुए पुलिस ने लिखित तौर पर कहा कि उनके मोबाइल फोन को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है और मोबाइल सेवा प्रदाता से मिलकर उनकी कॉल का विवरण भी खंगाला जा रहा है। कॉल रिकॉर्ड के बिनाह पर पुलिस ने दावा किया कि षडयंत्र को तय करने की खातिर वो तेरहों लड़के आपस में संपर्क में थे। इसके अतिरिक्त पुलिस ने ये भी कहा कि उनका पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा से भी संपर्क था और वे लोग नौजवानों को आतंकवादी प्रशिक्षण के लिए सीमा पार पाकिस्तान भी भेजते थे। ये सब पुलिस ने महज रिमांड आवेदन में ही नहीं कहा बल्कि हफ़्तों तक बार-बार इस बात को दोहराते रहे ताकि उन लड़कों की बढ़ी हुई हिरासत अवधि को वैधता दे सके। 189 लोग उन धमाकों में मारे गए। कोई भी मजिस्ट्रेट या जज ऐसे मामलों में बेल नहीं देगा, ख़ासकर तब जब पुलिस इतने मज़बूत फॉरेंसिक सबूत पेश कर रही हो। लश्कर-ए-तैयबा के साथ संपर्क में रहना और आतंकवादी प्रशिक्षण के लिए लोगों को उनके पास भेजना बेहद गंभीर मामला है। 
  
बहरहाल, कुछ समय बाद, मुंबई पुलिस की दूसरी शाखा ने कुछ अन्य लोगों को पकड़ा जो यह मान रहे थे कि उन्होंने मुंबई की रेलों में धमाके किए। उनके पास आत्मस्वीकृति के रिकॉर्ड थे। जब सिमी वाले मामले में आरोपपत्र दाखिल किए गए थे तो उन लड़कों ने अपने मोबाइल रिकॉर्ड की प्रतियां मांगी क्योंकि पुलिस ने आरोपपत्र के साथ उसे नत्थी नहीं किया था। यह बहुत अचंभित करने वाला तथ्य है कि पुलिस ने उन्हीं फोन रिकॉर्ड के आधार पर ये दावा किया था कि उन लड़कों का लश्कर के साथ ताल्लुक है और बाद में उन्हीं मोबाइल फोन रिकॉर्ड को सार्वजनिक नहीं कर रही! पुलिस ने आरोपपत्र के साथ उन रिकॉर्ड को नत्थी क्यों नहीं किया?
मौत के घर से वापसी नहीं होती।
उन लड़कों ने हमेशा कहा कि अगर अदालत के सामने उन रिकॉर्ड को पेश किया जाता है तो घटना में उनकी निर्लिप्तता साबित हो जाएगी। लोग जान जाएंगे कि वे निर्दोष हैं। तथ्य ये है कि बम धमाकों के समय वे सब किसी दूसरी जगह पर मौजूद थे। (मोबाइल) टावर का लोकेशन ये साफ़ बता रहा था कि पुलिस के दावों के विपरीत वे चर्च गेट स्टेशन के पास नहीं थे। उनमें से एक तो मुंबई से बाहर बिहार में कहीं था। कुछ चर्च गेट स्टेशन से बिल्कुल उल्टे छोर पर उत्तरी मुंबई में थे। इसलिए उन लड़कों ने लगातार ये कहा कि उनके बचाव के लिए वो फोन रिकॉर्ड्स अहम दस्तावेज़ है। बचाव पक्ष के वकील द्वारा छह साल के भीतर उन रिकॉर्ड्स की प्रतिलिपि मांगने के लिए छह बार आवेदन दिया गया जिन्हें पुलिस ने (कथित तौर पर) अपने पास जमा रखा था। लेकिन पुलिस ये कहकर रिकॉर्ड्स देने से लगातार मना करती रही कि चूंकि आरोप पत्र में उन्होंने उन रिकॉर्ड्स को चस्पां नहीं किया है इसलिए आरोपित को दस्तावेज़ देने के लिए वो बाध्य नहीं है। लेकिन जैसा कि आतंकवाद से जुड़े मुक़दमें में ज़्यादातर होता है, चौतरफ़ा दबाव के चलते अभियोजन पक्ष द्वारा रखी गई दलीलों पर जज सिर्फ़ मुहर लगाता चलता है, उन फोन रिकॉर्ड्स के लिए छह साल में किए गए छह आवेदनों को जज ने खारिज कर दिया। 

पुलिस लगातार उन रिकॉर्ड्स को देने से इनकार करती रही, लेकिन उस मामले के मुतल्लिक और कुछ भी कहने से बचती रही। आख़िरकार हमने उच्च न्यायालय का रुख किया और वहां उन रिकॉर्ड्स को मांगने के लिए अपील की। उच्च न्यायलय ने उन रिकॉर्ड्स को प्रासंगिक और ज़रूरी माना और पुलिस को निर्देश दिया कि वो दस्तावेज़ हमें सौंपे। छह साल बाद और आख़िरी बार जब पुलिस ने हमें रिकॉर्ड्स देने से मना किया था उसके तीन महीने बाद उच्च न्यायालय में पहली बार पुलिस ने मुंह खोला और कहा कि उसने उन रिकॉर्ड्स को नष्ट कर दिया है! जबकि पुलिस बीच-बीच में ये दावा कर रही थी कि उन दस्तावेज़ों के आधार पर कुछ आरोपितों को अभी पकड़ा जाना बाकी है, वो कैसे उन रिकॉर्ड्स को नष्ट कर सकती है? 
सामान्य अपराध के मामलों में आत्म-स्वीकृति को बतौर सबूत मामूली भाव मिलता है, क्योंकि एक पुलिस अधिकारी की कही गई बातों पर कोई किस तरह भरोसा कर ले? न्यायिक सिद्धांत में इसी आधार पर आत्म-स्वीकृति को सबूत से अलग कर दिया गया। लेकिन, गंभीर अपराधों में आत्म-स्वीकृति को सबूत के तौर पर लिया जाता है। ये हैरतअंगेज़ व्यवस्था है। अगर आत्म-स्वीकृति को सामान्य अपराध में सबूत के तौर पर मान्य नहीं ठहराया जाता तो फिर गंभीर क़िस्म के अपराध में आरोपियों के ऊपर इसे क्यों लादा जाता है? लेकिन हमारे यहां क़ानूनन यह व्यवस्था है। आतंकवाद के मामले में यह विशेष व्यवस्था लागू होती है। इसलिए 2006 के मालेगांव मामले में पुलिस ने अदालत के सामने हमेशा नौ आत्म-स्वीकृतियों को सबूत के तौर पर पेश किया। हां, साथ में आरडीएक्स बरामदगी की मनगढंत कहानी ज़रूर चस्पां की। कोई भी वास्तविक सबूत नहीं पेश हुआ। एक आत्म-स्वीकृति को अपने मुताबिक ढालने में ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती जब उसका सत्यापन भी ख़ुद पुलिस अधिकारियों को ही करना हो!

इंदिरा गांधी हत्याकांड में उनके सुरक्षा दस्ते में से एक सुरक्षाकर्मी बलवंत सिंह को फौरन गिरफ़्तार कर लिया गया। हत्या के तुरंत बाद, ग़ैरक़ानूनी तरीके से। हालांकि उनकी गिरफ़्तारी को दिखाया नहीं गया लेकिन यमुना वेलोड्रम के छोर से ग़ैरक़ानूनी तरीके से उसको उठाकर कई दिनों तक रखा गया। उस दौरान हिरासत में उसको भीषण यातनाएं दी गईं और बाद में छोड़ दिया गया। उसके एक या दो दिन बाद जब वो आईएसबीटी में बस में चढ़ने जा रहा था तो उसकी गिरफ़्तारी गिखाई गई। पुलिस ने दावा किया कि उसकी जेब से चिट्ठी की शक्ल में पूरा का पूरा आत्म-स्वीकृति नोट बरामद हुआ है, जिसमें विस्तार से उसके बयान दर्ज़ थे। पुलिस के दावों पर यक़ीन करें तो वो अपनी जेब में आत्म-स्वीकृति नोट लेकर दिल्ली की सड़कों पर घूम रहा था! यह इंदिरा गांधी हत्याकांड का सच है! ट्रायल कोर्ट ने इस क़िस्से पर अपना भरोसा जताया और बलवंत सिंह को मौत की सजा सुना दी। हाई कोर्ट ने भी भरोसा का इजहार किया और बलवंत सिंह की मौत की सजा को बरकरार रखा। 
इसलिए मैं वापस उसी सवाल पर आना चाहता हूं: क्या ऐसे सबूत के आधार पर लोगों को मौत की सजा सुनाना जायज है? 
******************

मृत्युदंड में संलिप्त दूसरी संस्था है- न्यायपालिका, और न्यायपालिका की ग़लती करने की क्षमता उतनी ही है जितनी भारत में किसी दूसरी संस्था की। इसमें उसी तरह के लोग शामिल हैं जैसे समाज के अन्य दूसरी संस्थाओं में होते हैं। ग़लतियां लोगों से होनी अवश्यंभावी हैं। मृत्युदंड के संदर्भ में ख़ास तौर पर इसे परखा जाना चाहिए क्योंकि 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' का समूचा मसला इतना व्यक्तिकेंद्रित होता है कि इसकी पड़ताल में नज़रियों का फर्क आसानी से पाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार ये माना है कि मृत्युदंड के उसके फैसले भी चुनिंदा होते हैं और इसके नियम में कोई स्थिरता या फिर सामान्यता नहीं है। इस आधार पर देखें तो न्याय हासिल करने में समानता के अधिकार का लगातार उल्लंघन होता रहा है। बच्चन सिंह (1982) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भगवती ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट 'मनमौजी और सनकनपन' में मृत्युदंड सुनाता है। क्या वो ग़लत थे? 


फरमन बनाम जॉर्जिया मामले में जस्टिस स्टीवर्ट ने कहा था कि मृत्युदंड मनमाने और क्रूर तरीके से सुनाया जाता है। किसी को पता नहीं होता कि अगली बारी किसकी है। जिसको सजा सुनाई गई, उसे उसका दुर्भाग्य ही समझा जाना चाहिए! हरबन सिंह (1982) के मामले में इसे हम स्पष्ट तौर पर देख सकते हैं। हत्या के एक ही तरह के तीन मामलों में तीन लोगों को मौत की सजा सुनाई गई और सुप्रीम कोर्ट की तीन अलग-अलग खंडपीठ ने उन मामलों पर नाटकीय तौर पर तीन अलग-अलग फैसले सुनाए। कश्मीरा के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया, जीता की अपील ठुकरा दी गई और उसे फांसी हुई और हरबन को राष्ट्रपति के यहां से क्षमादान मिली, जबकि कोर्ट ने उसकी शुरुआती अपील और पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया था। 

मृत्युदंड के फैसले में ये उदाहरण 'भ्रम, विचलन और विरोधाभास' की तस्वीर पेश करते हैं। एकसमान मामलों पर अलग-अलग फैसले पर्याप्त संख्या में मौजूद है और ये चिंता का विषय है। इन मामलों में जिनको मौत मिली और जिनको आजीवन कारावास मिली उनके बीच सिवाय अलग खंडपीठ के और कोई बड़ा अंतर नहीं था। जहां न्यायमूर्ति बालाकृष्णन और सिन्हा ने बच्चों के बलात्कार और हत्या के सारे मामलों में मिले मृत्युदंड को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया, वहीं जस्टिस पसायत ने लगभग हर मामले में मृत्युदंड को या तो बरकरार रखा या फिर नए सिरे से यह सजा सुनाई, यहां तक कि उन मामलों में भी जिनमें निचली अदालतों ने आरोपी को मुक्त कर रखा था। मृत्युदंड ऐसे में इस पर निर्भर हो जाता है कि आख़िरकार उसको सुनाने वाला जज कौन है। यह ऐसा जुआ बन जाता है जिसमें यह देखना सबसे ज़्यादा दिलचस्प होता है कि किसी ख़ास जज की मौजूदगी से मृत्युदंड की सांख्यिकी में कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक फ़र्क़ पैदा होता है। यानी जीने और मरने की संभावना सबूतों की बजाय जज पर निर्भर करता है! तीन जजों की तुलना से यह साफ़ हो जाएगा कि किस तरह मृत्युदंड को लेकर जजों का निजी नजरिया फैसलों में जाहिर होता है। 

क्रिकेट की छोटी शैली में इस्तेमाल होने वाली भाषा के सहारे कहें तो जस्टिस पसायत का "स्ट्राइक रेट" लगभग 73 फीसदी है, जोकि उनके कार्यकाल में रहने वाले बाकी सारे जजों के सम्मिलित स्ट्राइक रेट (19 फ़ीसदी) से काफ़ी ज़्यादा है। इस तरह जो मामला जस्टिस पसायत की खंडपीठ को नहीं सौंपा गया, उसमें मृत्युदंड से बचने की संभावना चौगुनी बढ़ जाती है। मृत्युदंड के एक मामले की सुनवाई जस्टिस पसायत और जस्टिस सिन्हा के पास होने की संभावना लगभग बराबर का है, लेकिन आरोपी के ज़िंदा रहने की संभावना 100 फ़ीसदी हो जाती है अगर वो केस जस्टिस सिन्हा के पास पहुंचा हो। एक कैदी के ज़िंदा रहने की संभावना 50 फ़ीसदी बढ़ जाती है अगर वो केस जस्टिस पसायत की खंडपीठ की बजाय जस्टिस बालाकृष्णन के पास पहुंचे। क्या मृत्युदंड की अपील करने वाले एक व्यक्ति को यह सवाल नहीं पूछना चाहिए, "मैं जिंदा रहूंगा या नहीं यह मेरे केस में मौजूद सबूत से तय होगा या फिर गठित होने वाली खंडपीठ से?" इससे भयावह नहीं तो कम से कम फैसलों में ऐसा ही अंतर ब्लैकशील्ड (1972-1976) के अध्ययन में भी जाहिर होता है। भगवती के इस बयान पर शक की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए कि "कोई व्यक्ति जिएगा या मरेगा यह बहुत कुछ खंडपीठ में शामिल जजों के समिश्रण पर निर्भर करता है और यही बात मृत्युदंड को मनमाना मामला बना देता है"। जीवन की पवित्रता, बदतर अपराधियों के भीतर ‘पापमुक्ति’ की हमेशा मौजूद रहने वाली संभावना और मृत्युदंड की बर्बरता पर जस्टिस कृष्णा अय्यर की टिप्पणी के बाद इस पर कोई प्रमाण देने की ज़रूरत नहीं रह जाती। बच्चन सिंह के फैसले के बाद खेद जताते हुए कुछ जजों का ये सोचना था कि “दुर्भाग्य” से उस फैसले ने और अधिक मृत्युदंड देने से उन्हें रोक दिया!  
जस्टिस पसायत को फांसी की सजा सुनाने में
विशेषज्ञता हासिल है!

भारत में मृत्युदंड की नींव बच्चन सिंह (के फ़ैसले) से रखी गई और उसके बाद के फ़ैसले से ये उम्मीद रखी गई कि वो उसके अनुरूप ही रहे। बच्चन सिंह मामले में ये साफ़ हो गया कि जजों को अपराध के जुड़ी परिस्थितियां और अपराधियों से जुड़ी परिस्थितियां, दोनों तरफ देखनी चाहिए। हालांकि कुछ जघन्य अपराधों और आतंकवाद के मामलों में न्यायिक सतर्कता थोड़ी दूसरी तरफ़ डिग जाती है जोकि अपराध से पैदा हुई तब्दीली के कारण ज़्यादा होती है। एक व्यक्ति रावजी ने अपने परिवार का क़त्ल किया क्योंकि उसे शक था कि उसकी पत्नी उसके प्रति वफ़ादार नहीं है और उसके बच्चे नाजायज़ हैं। अब इस मामले में वो अगर अपराध की परिस्थितियों को देखें तो निश्चित तौर पर अपराधी को फांसी की सजा सुना देंगे, लेकिन अगर अपराधी की परिस्थिति पर वो ग़ौर करें तो वो उसे शायद मानसिक तौर पर विक्षिप्त करार दें और उसके बाद बहुत संभव है कि उसे क्षमादान मिल जाए या फिर फांसी का फंदा। लेकिन अपराध इतना भयानक और स्तब्धकारी है कि इसे आगे घटित नहीं होना चाहिए! इसलिए एक क़ानून बना कि ऐसे जघन्य मामलों में अपराधियों से जुड़ी परिस्थितियों पर हमें विचार करने की ज़रूरत ही नहीं है। इन मामलों में सिर्फ़ अपराध के इर्द-गिर्द की परिस्थितियों को परखा जाना चाहिए! और इस तरह रावजी को फांसी के तख़्त पर भेज दिया गया। 

बच्चन सिंह के मामले में तय किए गए सिद्धांत के मुताबिक़ क़ानून चलने लगा। इसी तरह सुरजा राम को फांसी हुई। और इसके अगले एक दशक में 12 लोगों को फांसी पर झुलाया गया। लगभग 15 लोगों को इस ग़लत सिद्धांत के आधार पर मौत की सजा मुकर्रर हुई। 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने रावजी के अलावा सात और मामलों को ग़लत बताया और कहा कि इसमें क़ानूनी चूक हुई थी। इसके बाद दो और खंडपीठों ने यही निष्कर्ष निकाले। लेकिन तब तक फांसी के फंदे पर झूल चुके रावजी सहित बाकी कैदियों के लिए बहुत देर हो चुकी थी। उसके बाद एक क़ैदी को किशोर घोषित किया गया और बाक़ी चार के मृत्युदंड को सरकार ने माफ़ कर दिया। सात क़ैदी मृत्युदंड की कतार में खड़े रहे, इसके बावज़ूद कि सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में ये माना कि उनके फ़ैसलों में चूक हुई है। 

जब उच्च और उच्चतम न्यायलय के 14 जजों ने राष्ट्रपति से लिखकर इन मृत्युदंडों को माफ़ करने की अपील की तो उसके बाद एक सघन अभियान चलाया गया। इनमें सायबाना का मामला भी शामिल था। गृह मंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति ने हाल ही में सायबाना की दया याचिका ख़ारिज कर दी है। सायबाना को अब कभी भी फांसी के तख़्ते पर भेजा जा सकता है। बाकी छह क़ैदियों की दया याचिका पर फैसले अभी लंबित हैं। 
सायबाना केस के बारे में मैं कुछ जानकारी देता हूं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 303 में एक उपबंध हुआ करता था कि अगर आजीवन कारावास काट रहा कोई व्यक्ति उसी दौरान दूसरी हत्या करता है तो उसे निश्चित तौर पर मौत की सजा मिलेगी। यह अनिवार्य मृत्युदंड था। 1983 में क़ानून के इस खंड को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। क़ानून में इस संशोधन के 20 साल बाद सायबाना पर 303 के तहत आरोप लगाए गए। यानी जिस समय विधि संहिता से उस उपबंध को हटा दिया गया उसके बाद उस विलुप्त क़ानूनी धारा के तहत उसे 'अनिवार्य मृत्युदंड' सुनाया गया। उसके वकील ने ट्रायल कोर्ट में जज के सामने यह बात रखी कि उनके मुवक्किल को जिस सेक्शन के तहत मौत की सजा दी गई है वो क़ानून में मौजूद ही नहीं है। यहां अनिवार्य मृत्युदंड और विवेकाधीन मृत्युदंड में फर्क़ को समझना ज़रूरी हो जाता है। विवेकाधीन मृत्युदंड में आरोपी के पास ये अधिकार होता है कि वो कोर्ट के सामने उन परिस्थितियों को जाहिर करें जिनके तहत उसने घटना को अंजाम दिया। कोर्ट उस पर विचार करने के बाद ये तय करता है कि मामले में सही सजा क्या मुकर्रर की जाए, क्योंकि ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह कह रखा है कि सुनवाई के वक़्त अपराध और अपराधी दोनों की परिस्थितियों को संज्ञान में लिया जाना चाहिए। इसलिए ऐसे मौक़े पर यह सुनवाई निर्णायक हो जाती है। 

सायबाना केस में चूंकि जज ने धारा 303 के तहत कार्यवाही की, जहां अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान है, इसलिए वहां सजा सुनाने के बीच किसी भी तरह की सुनवाई का या फिर परिस्थितिजन्य सबूत पेश करने का कोई मौका ही नहीं था। इस तरह सायबाना पर आरोप तय हुए। मामला जब उच्च न्यायालय में पहुंचा तो ग़लती की पड़ताल हुई कि आरोपित को धारा 303 के तहत दोषी ठहराया गया। धारा 303 को विधि संहिता से हटाने के 23 साल बाद की ये घटना है। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने ये पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सायबाना पर धारा 303 के तहत आरोप तय किया है और उच्च न्यायालय ने धारा 302 के तहत फ़ैसले को बरक़रार रखा है। मामले में चूंकि रिकॉर्ड पर शमन परिस्थितियां दर्ज़ नहीं थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने धारा 302 के तहत मृत्युदंड को बरकार रखा। केस में धारा 302 कहीं से भी परिदृश्य में नहीं था और रिकॉर्ड भी उतना ही साफ़ था। जब मामले की कोई सुनवाई ही नहीं हुई तो शमन परिस्थितियां कैसे मौजूद हो सकती है? इसके बावज़ूद कि सुप्रीम कोर्ट ने बाद में मामले को PER INCURIAM (यानी जिस मामले का कोई वैधानिक प्रावधान न हो और नही किसी पुराने फैसले से उसके तार जुड़ते हो) बताया और 14 जजों ने राष्ट्रपति से लिखकर क्षमादान का समर्थन किया, राष्ट्रपति ने उसकी क्षमाचायना को अस्वीकार कर दिया। 

फांसी किसको मिलती है, ज़रा अमेरिका के आंकड़े देखिए।
भारत के मामले में ब्लैक को दलित-अल्पसंख्यक-
आदिवासी-ग़रीब पढ़िए
अब राजीव गांधी हत्याकांड पर आते हैं। ट्रायल कोर्ट में 26 लोगों पर राजीव गांधी की हत्या का मुकदमा चला। सभी 26 लोगों को दोषी पाया गया और सबको मौत की सजा सुनाई गई। उनपर टाडा के तहत आरोप तय किए गए, जहां से हाई कोर्ट में अपील का कोई प्रावधान नहीं था क्योंकि वो फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह काम कर रहा था। इसलिए मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड की सजा पाए 26 में से 19 लोगों को बरी कर दिया। पहले सुनाए गए फैसले और बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच के विशाल अंतर को देखिए! न्यायव्यवस्था में कुछ तो भयानक गड़बड़ी है कि पहले यह 26 लोगों के नाम मौत की सजा का फरमान जारी करती है और पहली चुनौती में ही 19 को दोषमुक्त बताती है। बचे हुए सात लोगों में से चार को सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक उनमें से एक लड़के का दोष महज इतना है कि उसने उन लोगों के लिए 14 वोल्ट की बैटरी लाने का काम किया जिन्होंने धानू में बम प्लांट किया था। 

मैंने पहले ही ये कहा है कि सामान्य क़ानून के तहत आत्म-स्वीकृति को सबूत के तौर पर नहीं स्वीकारा जाता लेकिन टाडा जैसे विशेष क़ानून के तहत आरोपी की स्वीकृति को सबूत समझा जाता है। राजीव गांधी हत्या मामले में इन सात लोगों की आत्म-स्वीकृति को रिकॉर्ड किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को माना कि वहां पर टाडा के तहत गिने जाने वाले अपराध को नहीं माना जाएगा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें टाडा से मुक्त कर दिया। अब अगर टाडा उन पर लागू ही नहीं होता तो उनकी आत्म-स्वीकृतियों को भी बतौर सबूत ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा 'नहीं'। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि चूंकि उन्हें टाडा के तहत पकड़ा गया है और टाडा यह कहता है कि आत्म-स्वीकृति को दोष साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है इसलिए उसे पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता। तो कल को आप एक ऐसे चोर को टाडा के तहत दोषी मानते हुए पकड़ते हैं, जिनपर और कोई दूसरे आरोप न हो, तो टाडा के अलावा चोरी के तहत दोषी पाए जाने पर उनका क्या करेंगे? इस तरह के जजों की तर्क पद्धति यही है कि उन्हें आतंकवाद के मामलों से तो बरी कर दिया जाए लेकिन चोरी की सजा मिले!

मनमाना होने के अलावा मृत्युदंड भेदभाव से भी भरा हुआ है। जस्टिस कृष्णा ने राजेंद्र प्रसाद के मामले में ये महसूस किया कि मृत्युदंड में वर्गीय नज़रिया शामिल था। जिन 12 निर्दोष क़ैदियो को फांसी हुईं उनमें से 12 का मुकदमा सरकारी ख़र्चे पर लड़ा जा रहा था। आम तौर पर मृत्युदंड वाला मामला 6-9 महीनें तक खिंचता है। ज़्यादातर जगहों पर सरकारी वक़ीलों को एक मृत्युदंड के मामले में 500 से 2000 रुपए भुगतान किए जाते हैं, ट्रायल और हाई कोर्ट में यही दर है। सुप्रीम कोर्ट में अपील जाने पर उन्हें 4000 रुपए दिए जाते हैं। दशकों से यह फीस यहीं पर अटकी हुई है और इसमें आने-जाने और विविध मदों में होने वाले ख़र्चों को शामिल नहीं किया जाता। क़ानूनी सहायता के नियम के मुताबिक़ मृत्युदंड के हर मामले में किसी वरिष्ठ वकील को केस लड़ने का प्रावधान है, लेकिन विरले ही ऐसा हो पाता है। नए अनुभवहीन रण बांकुड़ों को केस की लगाम थमाकर अनुभवी अहाते से बाहर खड़े रहते हैं। इसमें कोई हैरत की बात नहीं कि जिस कोर्ट में अपील होती है वो ज़्यादातर ऐसे मामलों को वापस ट्रायल कोर्ट में भेज देती है, क्योंकि वहां पर क़ैदी का ठीक तरीके से बचाव ही नहीं होकर आता। लेकिन इनमें से ज़्यादातर मामलों में जहां-तहां दरार पड़ी होती है। इसलिए ये चौंकाने वाला तथ्य नहीं है कि फैसलों में लापरवाही, ग़लत तरीके से आरोप तय करने से लेकर फ़ांसी तक की सजा को (सरकारी) क़ानूनी सहायता से नहीं लड़ा जा सकता। मृत्युदंड के ऐसे क़ैदी जो ग़रीबी की मार झेल रहे हो उन्हें मामूली सरकारी चंदे वाली क़ानूनी सहायता देकर फिर से उस चक्र में झोंक दिया जाता है।  

संविधान में हरेक नागरिक को क़ानून से सामने समानता का अधिकार हासिल है, जिसका मतलब है कि किसी की वित्तीय क्षमता को ध्यान में रखे बग़ैर मुकदमा में सबको समान फ़ैसला मिलेगा। अदालत को इस वायदे का निर्वाह करना चाहिए क्योंकि न्यायिक वैधानिकता की वो जड़ है। चूंकि मृत्युदंड में अब तक ऐसी समानता, स्थिरता और साफ़गोई देखने को नहीं मिली है, इसलिए इसका उन्मूलन होना चाहिए। नहीं तो, ईर्ष्या के एवज में हुई हत्या और न्यायिक हत्या में क्या फ़र्क रह जाएगा?   

***************

अब तीसरे भाग की तरफ़ चलते हैं। फांसी देने के तरीकों पर बात करते हैं। ऐतिहासिक तौर पर क्षमादान की शक्ति प्रभु वर्ग के हाथ में निहित है। इस शक्ति को बनाए रखने का यह बेहतर तरीका है। ये एक जरिया है ताकि न्यायिक प्रशासन की ग़लतियों को भी दुरुस्त किया जा सके। ग़ुस्सैल फ़ैसले पर ठंडा पानी छिड़कने के लिए यह प्रावधान है। न्याय के अर्थ का दायरा जिस हद तक व्यापक है वहां तक क़ानून नहीं पहुंच सकता। इसलिए इस शक्ति को बनाए रखना ज़रूरी भी है। यही वजह है कि लगभग सारे देशों के पास क्षमादान की व्यवस्था है। लेकिन अगर क्षमादान की शक्ति के इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर नज़र दौड़ाएं तो आप पाएंगे कि सरकार के लिए अलग-अलग तात्कालिक मुद्दों से मुंह चुराने के लिए यह हथकंडे के तौर पर उभरी है। आप अजमल कसाब की फांसी के समय को देखिए। आप सिर्फ़ समय को देखते रहिए। अजमल, अफ़जल सबके समय को। 2001 में संसद पर हुआ, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया, 2013 में अफ़जल को फांसी पर लटकाया गया। आठ साल बाद और संयोग से आज ही (9 फरवरी)। मैं यह कह सकता हूं कि संसद भवन पर हमले के जुर्म में उसे फांसी नहीं दी गई है। आठ साल से क्षमा चायिका को लंबित रखा गया और आज उस समय, जब यूपीए सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध सहित कई मोर्चों पर बीजेपी पीछे धकेल रही है, अचानक उसे फांसी चढ़ा दी गई। संसद का सत्र इस बार भी जल्द ही शुरू होने वाला है, ठीक वैसे ही जैसे कसाब की फांसी के बाद हुआ था।  
मृत्युदंड-विरोधी आंदोलन दुनिया के कई देशों में लंबे समय से चल रहा है।

फांसी के तरीकों और निहितार्थ पर सवाल ज़रूर उठने चाहिए। संविधान की धारा 21 अपरिहार्य रूप से सारे मनुष्य पर लागू होती है, उन पर भी जो भारत का नागरिक नहीं है। अनुच्छेद 21 कहता है कि क़ानूनी रूप से स्थापित प्रक्रियाओं के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसकी ज़िंदगी और निजी आज़ादी से बेदख़ल नहीं किया जा सकता। और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ वो क़ानूनी प्रक्रिया निष्पक्ष, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए। अगर आप किसी व्यक्ति की ज़िंदगी लेने जा रहे हैं तो आप इन क़ानूनी प्रक्रियाओं के तहत ही ऐसा कर सकते हैं। क़ानूनी तौर पर ये प्रक्रिया क्या है? इस मुद्दे पर सरकारी नियम कहता है कि जब कोई क्षमा याचिका दायर की जाती है तो उस याचिका को ख़ारिज करने के बाद उस व्यक्ति को सूचित किया जाना चाहिए जिसने वो याचिका दायर की है। क़ैदी और परिवार के सदस्यो को याचिका ख़ारिज किए जाने और फांसी की तारीख़ के बारे में पहले से सूचित किया जाना चाहिए।  

कसाब के मामले में जब याचिका ख़ारिज की गई तो एक पत्रकार ने इस मामले पर आरटीआई किया और ख़ारिज किए जाने के एक दिन बाद उन्हें लिखित में जवाब आया कि वो मामला अभी भी लंबित है! ऐसे झूठ बोलने की ज़रूरत क्यों है? एक सरकार को झूठ नहीं बोलना चाहिए। ख़ुद सरकार द्वारा तय की गई प्रक्रिया का उल्लंघन करने की ज़रूरत क्यों आन पड़ती है? सरकार के पास पहले से जब कसाब को फांसी देने के न्यायिक वारंट मौजूद है तो बिना उसके परिवार को इत्तला किए और दुनिया को अंधेरे में रखकर वो क्यों फांसी दे रही है? उसके पास उसके परिवार का पता मौजूद है। बड़ी तादाद में लोगों ने कसाब के लिए क्षमादान की याचिका लगाई। उन्हें इस बात की कोई भनक तक नहीं है कि उनकी याचिका ख़ारिज की जा चुकी है। नियम के मुताबिक़ याचिकाकर्ता को ये सूचना अनिवार्य तौर पर दी जानी चाहिए। नियम ऐसा क्यों कहता है? क्योंकि अंतिम सांस तक किसी व्यक्ति को न्यायिक उपचार का अधिकार हासिल है और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ अगर दया याचिका को ख़ारिज किए जाने में लंबा वक़्त लगता है तो वह फिर से सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने मृत्युदंड को माफ़ करने के लिए अर्जी लगा सकता है। अगर अधिकार मौजूद है तो उसका इस्तेमाल होने देना चाहिए। इसलिए याचिका ख़ारिज किए जाने और फांसी की तारीख़ के बीच के खंड में आरोपी इस अधिकार का इस्तेमाल करता है। लेकिन अजमल कसाब और अफ़जल गुरु, दोनों को यह मौका नहीं दिया गया। कसाब की फांसी के बाद केंद्रीय गृह मंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने आधिकारिक तौर पर ये कहा कि उन्होंने कसाब को गुपचुप फांसी इसलिए दी क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि लोग कोर्ट का रुख करे।    
   
अफ़जल गुरु की फांसी के बाद गृह मंत्री ने इसे फिर दोहराया। लोकतंत्र के लिए यह एक हैरतअंगेज़ कथन है। देश के गृह मंत्री द्वारा विधि सम्मत नियम की यह बेशर्म उपेक्षा है। क्या हम पुलिस राज्य में नहीं तब्दील होते जा रहे हैं? अफ़जल गुरु के पास पत्नी थी, परिवार था और वो भी दिल्ली से बहुत दूर नहीं। विधि संहिता द्वारा एक क़ैदी को उनसे मिलने का जो अधिकार प्राप्त है उससे उनको वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पहले कसाब के साथ उन्होंने ऐसा किया और अब अफज़ल गुरु के साथ।    

हाल ही में ये दिखाने के लिए कि वो महिला अधिकार को लेकर कितने सचेत और अपराध पर कितने अड़ियल है, भूतपूर्व सब इंस्पेक्टर और हमारे मौजूदा गृहमंत्री ने गौरवान्वित भाव से ये कहा कि वे किसी भी बलात्कारी के मृत्युदंड की क्षमा चायिका को कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। जाहिर है, इससे महिलाओं के लिए सड़कें ज़्यादा महफ़ूज हो जाएंगी, ठीक वैसे ही जैसे कसाब को फांसी चढ़ाने से भारत पर आतंकवादी हमले बंद हो गए और जिस तरह सायबाना और दास को फांसी चढ़ाने से दोहरी हत्याकांड देश से विलुप्त हो जाएंगी! फांसी और इसके समर्थन में उठी आवाज़ें राजनेताओं के लिए रंगमंच की सामग्री का काम करती है और इस बिनाह पर वो दावा करते हैं कि अपराध पर वो बेहद सख़्त हैं। अपराध के कारणों की तह तक पहुंचने और भविष्य में किसी भी तरह के हमलों से बचने के लिए सुरक्षा के जो अनिवार्य, लेकिन मुश्किल और जटिल, तरीके हो सकते हैं उनपर तवज्जों देने और उसे सुलझाने के बजाए एक व्यक्ति के जीवन का दांव लगाकर बेहद आसान और सस्ते तरीके से लोगों के ग़ुस्से को ये कहकर शांत कर दिया जाता है कि इन समस्याओं से निजात दिलाने के लिए ऐसे कदम की सरकार को दरकार है! 

वास्तव में मृत्युदंड ध्यान भटकाव का एक ठोस तरीका है ताकि सरकार ऐसे मुद्दों से लोगों का ध्यान हटा सके जिनपर चर्चा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। यह लोगों के भीतर अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जो ख़ून की भूख उठती है उसे तुष्ट करने का जरिया है। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि एक व्यक्ति की मौत से मौजूदा समस्या शांत नहीं होती और न ही स्थाई तौर पर किसी भी मामले का निदान होता है, अलबत्ता इससे मामला ढंक-छिप ज़रूर जाता है। राज्य-समर्थित फांसी विपत्ति के समय ख़ून की हमारी प्यास को बुझाने के अलावा और कुछ नहीं करती। ख़ून के इस प्यास को बुझाने की कवायद और राज्य द्वारा किसी अपराधी को बधिया करने जैसे सजा के नए ख़यालात हमारे समाज से हिंसा ख़त्म करने की बजाए हमें और ज़्यादा हिंसक समाज में तब्दील कर देगा। अगर हमें नैतिक और करुणादायक समाज के रूप में ख़ुद को विकसित करना है और अपने बच्चों के सामने कम हिंस्र समाज का मॉडल ले जाना है तो हमें अपने भीतर से ऐसे ख़ूनी प्रतिकार के भाव को तजना होगा। 

एक फांसी के पीछे के सच हैं: न्यायिक चूक, मनगढ़ंत सबूत और कार्यान्वयन में हेरा-फेरी। इन्हीं तीन के मिश्रण से फांसी संपन्न होती है। मौत की सजा आम तौर पर रहस्यमयी क़ानूनी जिरह के बाद मटमैले कोर्टरूम में सुनाई जाती है जिन्हें समझना आम आदमी के लिए बेहद मुश्किल है। फिर ऊंची दीवारों से घिरे जेल परिसर में इसे अंजाम दिया जाता है। हालांकि व्यक्ति को मारकर सजा देने के राज्य के अधिकार पर ख़ूब चर्चा हुई हैं, लेकिन क़ैदी को जेल की खोली से फांसी के चबूतरे तक ले जाने की प्रक्रिया अभी भी गुप्त है। चूंकि हमारे नाम पर फांसी दी जाती है, इसलिए इसे जानने और अपनी पसंद तय करने का हमें पूरा हक़ है 
   
*युग मोहित चौधरी मुंबई उच्छ न्यायालय में अधिवक्ता हैं और भारत में मृत्युदंड के ख़िलाफ़ सक्रिय तौर पर अभियान चलाने वाले गिने-चुने लोगों में शुमार हैं।

**शाहिद आज़मी की 11 फरवरी 2010 को 32 साल की उम्र में उसके दफ़्तर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस वक़्त शाहिद आतंकवाद से जुड़े मसलों का केस लड़ रहे थे, जिनमें मालेगांव धमाकों में झूठे आरोप लगाकर पकड़े गए और 26/11 मुंबई हमलों के आरोप में गिरफ़्तार किए गए लोगों के मामले शामिल थे।   

13 फ़रवरी 2013

उसने 'सत्‍यमेव जयते' कहा, और उसका परिवार बच गया!

अफज़ल गुरु को हुई फांसी के बाद अब तक उठी तमाम बहसों में उसके द्वारा अपने वकील सुशील कुमार को लिखी गई चिट्ठी का जि़क्र बार-बार आया है। यह चिट्ठी अब एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है, क्‍योंकि इसमें एक आत्‍मसमर्पित आतंकवादी समूची राज्‍य व्‍यवस्‍था पर कुछ सवाल खड़े करता है, उसके काम करने के तरीकों को उजागर करता है और आखिरकार यह स्‍वीकार करता है कि उसकी नियति दरअसल अपने परिवार को बचाने की उसकी सदिच्‍छा का परिणाम थी। यह चिट्ठी अक्‍टूबर 2006 में दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा रखी गई एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सार्वजनिक की गई थी जिसके आधार पर मैंने साप्‍ताहिक पत्रिका 'सहारा समय' के आखिरी अंक (8 अक्‍टूबर 2006) में एक स्‍टोरी भी की थी। अफज़ल के मामले पर खर्च किए गए लाखों शब्‍दों पर यह इकलौती चिट्ठी भारी पड़ती है। विडंबना यह है कि अक्‍टूबर 2006 से लेकर अब फांसी दिए जाने के बीच सात साल के दौरान हालांकि यह चिट्ठी मीडिया में तकरीबन दबी ही रही, आज भले इसकी चर्चा हो रही हो लेकिन उसका शायद कोई मोल नहीं है। साथ में उस वक्‍त की कुछ तस्‍वीरें भी हैं। (अभिषेक श्रीवास्‍तव)

[जनपथ से इंट्रो सहित साभार]
अंग्रेज़ी में यह पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


  
माननीय श्री सुशील कुमार,
नमस्कार

मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं और अहसानमंद महसूस करता हूं कि आपने मेरे मुकदमे को अपने हाथ में लेकर मेरा बचाव करने का फैसला लिया। इस मुकदमे की शुरुआत से ही मेरी उपेक्षा की गई है और कभी भी मुझे मीडिया या न्यायालय के समक्ष सचाई उजागर करने का मौका नहीं दिया गया। तीन अर्जियों के बावजूद अदालत ने मुझे वकील मुहैया नहीं करवाया। उच्च न्यायालय में एक मानवाधिकार अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अफज़ल की इच्छा फांसी से लटकने की बजाय नशीला इंजेक्शन लेने की है। यह बात सरासर गलत है। मैंने अपने वकील को कभी ऐसा कुछ नहीं बताया था। चूंकि वह वकील मेरे या मेरे परिवार का चुनाव नहीं था, बल्कि मेरी असहायता और एक उपयुक्त वकील तक पहुंच न हो पाने का नतीजा था। उच्च सुरक्षा वाली जेल में कैद किए जाने और उस मानवाधिकार अधिवक्ता से कोई संवाद न होने की स्थिति में मैं उसे बदल नहीं सका या उच्च न्यायालय के सामने अपनी मृत्यु इच्छा संबंधी आपत्तियों को दर्ज नहीं करा सका चूंकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही यह बात मुझे पता चली।

संसद पर हमले वाले मामले में मुझे कश्मीर की स्पेशल टास्क फोर्स ने गिरफ्तार किया था। यहां दिल्ली में निर्धारित न्यायालय ने विशेष पुलिस के उस बयान के आधार पर मुझे फांसी की सजा सुनाई जो एसटीएफ के साथ मिलकर काम करती है और जिस पर मीडिया का खासा प्रभाव था जिसके समक्ष मुझे विशेष पुलिस एसीपी राजबीर सिंह के दबाव और खौफ के चलते अपराध कबूल करवाया गया। इस खौफ और दबाव की पुष्टि न्यायालय के समक्ष 'आज तक' के साक्षात्कर्ता शम्स ताहिर ने भी की।

जब मुझे श्रीनगर बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया तो मुझे एसटीएफ के मुख्यालय ले जाया गया। यहां से एसटीएफ और विशेष पुलिस मुझे दिल्ली ले आई। श्रीनगर के पारमपोरा पुलिस स्टेशन पर मुझसे मेरी सभी चीजें छीन ली गईं, मेरी पिटाई की गई और मुझे धमकी दी गई कि यदि मैंने किसी के भी सामने सचाई बयान की तो मेरी पत्नी और परिवार के लिए नतीजे बुरे होंगे। यहां तक कि मेरे छोटे भाई हिलाल अहमद गुरु को भी बगैर किसी वारंट इत्यादि के गिरफ्तार कर लिया गया और 2-3 महीनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया। यह बात सबसे पहले मुझे राजबीर सिंह ने बताई थी। विशेष पुलिस ने मुझसे कहा कि यदि मैं उनके मुताबिक बयान देता हूं तो मेरे परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और यह झूठा आश्वासन भी दिया कि वे मेरे मुकदमे को कमजोर कर देंगे जिससे कुछ दिनों बाद मैं रिहा हो जाऊंगा।

अफ़ज़ल का बेटा
मेरी प्राथमिकता मेरे परिवार को सुरक्षित रखने की थी क्योंकि पिछले सात साल से मैं देख रहा हूं कि किस तरह एसटीएफ के लोग कश्मीरियों की हत्या कर रहे हैं, उन्होंने युवाओं को गायब किया है और उसके बाद पुलिस हिरासत में उन्हें मार डाला है। इन तमाम प्रताड़नाओं और हिरासत में मौतों का मैं एक जीता-जागता प्रत्यक्षदर्शी हूं और खुद एसटीएफ के खौफ और प्रताड़ना का शिकार हूं। चूंकि, मैं पहले जेकेएलएफ का आतंकवादी था और मैंने आत्मसमर्पण कर दिया था, मुझे विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों जैसे सेना, बीएसएफ और एसटीएफ ने मिलकर उत्पीड़ित, प्रताड़ित और खौफज़दा किया है। लेकिन, चूंकि एसटीएफ असंगठित बल है और राज्य सरकार द्वारा संरक्षित लुटेरों का एक गुट है, वे कश्मीर के किसी भी घर और किसी भी परिवार में किसी भी वक्त घुस जाते हैं। अगर एसटीएफ ने किसी को भी उठा लिया और उसके परिवार को इसकी जानकारी मिल जाती है, तो फिर परिजन सिर्फ लाश की ही उम्मीद रखते हैं और उसका इंतजार करते हैं। लेकिन अमूमन वे यह कभी नहीं जान पाते कि अपहृत व्यक्ति का ठिकाना क्या है। छह हजार जवान लड़के इस तरीके से गायब हो चुके हैं।

इन्हीं परिस्थितियों और भयपूर्ण वातावरण में मेरे जैसे लोग एसटीएफ के हाथों कोई भी गंदा खेल खेलने को तैयार हो जाते हैं जिससे कम से कम जान बची रहे। जो लोग पैसे खिलाने की क्षमता रखते हैं, उन्हें मेरी तरह बुरे काम करने को मजबूर नहीं किया जाता चूंकि मैं पैसे देने में अक्षम रहा था। यहां तक कि पारमपोरा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी अकबर ने तो मुझसे 5 हजार रुपए फिरौती की मांग की थी। यह बात संसद पर हमले से बहुत पहले की है। उसने मुझे धमकी दी थी कि फिरौती की रकम न मिलने पर वह मुझे नकली दवाएं और चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लेगा। मैं 2000 में सोपोर में इनका व्यापार करता था। वह भी यहां निर्धारित न्यायालय के समक्ष पेश हुआ था और उसने मेरे खिलाफ बयान दिया था। संसद पर हमले से बहुत पहले से वह मुझे जानता था। अदालत के कक्ष में उसने मुझे कश्मीरी में बताया कि मेरा परिवार सही सलामत है। दरअसल, यह एक छुपी हुई धमकी थी जिसे अदालत समझ नहीं पाई थी, नहीं तो मैंने जरूर अदालत के समक्ष उससे सवाल पूछा होता जब उसने अपना बयान दर्ज कराते वक्त यह बात मुझे बताई थी। पूरे मुकदमे के दौरान मैं मूक और असहाय दर्शक बना रहा जबकि सभी गवाह, पुलिस और यहां तक कि जज भी मिलकर मेरे खिलाफ एक हो गए थे। मैं अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित और असमंजस में रहा। अब मैंने अपने परिवार को बचा लिया है, भले ही यह झूठ बोलने के लिए मुझे मौत दी जा रही है तो क्या!

1997-98 में मैंने दवाइयों और चिकित्सीय उपकरणों का एक व्यापार कमीशन के आधार पर चालू किया, चूंकि एक आत्मसमर्पित आतंकवादी होने के नाते मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। आत्मसमर्पित आतंकवादियों को नौकरियां नहीं मिलतीं। उन्हें या तो एसटीएफ के साथ विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के तौर पर काम करना होता है या सुरक्षा बलों और पुलिस के संरक्षण में लुटेरों की मंडली में शामिल होना होता है। रोज ही ये विशेष पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के हाथों मारे जाते थे। ऐसी स्थिति में मैंने अपना कमीशन आधारित व्यापार शुरू किया जिससे महीने में 4-5 हजार की कमाई हो जाती थी। चूंकि, एसपीओ अक्सर उन आत्मसमर्पित आतंकवादियों को प्रताड़ित करते हैं जो एसटीएफ के साथ काम नहीं करते, लिहाजा 1998 से 2000 के बीच मुझे अमूमन 300 से 500 रुपए स्थानीय एसपीओ को देने पड़ते जिससे मैं अपना काम-धंधा जारी रख सकता था। नहीं तो ये एसपीओ मुझे सुरक्षा एजेंसियों के सामने ले जाते। एक एसपीओ ने तो मुझे एक दिन बताया भी था कि उसे अपने अधिकारियों को पैसे देने पड़ते हैं। मैंने मेहनत से काम किया और मेरा व्यापार चमक गया। एक दिन सुबह 10 बजे मैं दो महीने पहले ही अपने नए खरीदे स्कूटर से जा रहा था। मुझे एसटीएफ के लोगों ने घेर लिया और एक बुलेटप्रूफ जिप्सी में पलहल्लन शिविर ले गए। वहां डीएसपी विनय गुप्ता ने मुझे प्रताड़ित किया, बिजली के झटके दिए, ठंडे पानी में डाला, पेट्रोल और मिर्च का इस्तेमाल भी किया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास हथियार हैं। शाम को उनके एक इंस्पेक्टर फारुक ने मुझे कहा कि यदि मैं उन्हें 10 लाख रुपए दे देता हूं तो मुझे छोड़ दिया जाएगा अन्यथा वे मुझे जान से मार देंगे। इसके बाद वे मुझे हमहामा एसटीएफ शिविर में ले गए जहां डीएसपी दरविंदर सिंह ने भी मुझे प्रताड़ित किया। उन्हीं के एक इंस्पेक्टर शैंटी सिंह ने नंगा करके मुझे तीन घंटों तक मुझे बिजली के झटके दिए और उसी दौरान जबर्दस्ती पानी भी पिलाया।

अफज़ल गुरु की पत्नी
आखिरकार मैं उन्हें दस लाख रुपए देने को तैयार हो गया जिसके लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के गहने बेचने पड़े। इसके बावजूद केवल 80 हजार का ही इंतजाम हो पाया। इसके बाद वे मेरा स्कूटर ले गए जो मैंने 2-3 महीने पहले ही 24 हजार रुपए में खरीदा था। एक लाख रुपए पाने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा लेकिन अब मैं पूरी तरह टूट चुका था। उसी हमहामा एसटीएफ शिविर में तारिक नाम का एक और शिकार था उसने मुझे सलाह दी थी कि मैं हमेशा एसटीएफ का सहयोग करूं, नहीं तो वे मुझे प्रताड़ित करेंगे और सामान्य जिंदगी नहीं जीने देंगे। यह मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। मैंने वैसे ही जीने का फैसला कर लिया जैसे मुझे तारिक ने बताया था। 1990 से 1996 तक मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और विभिन्न कोचिंग सेन्टरों और घरों पर जाकर ट्यूशन पढ़ाता था। यह जानकारी बड़गाम के एसएसपी अशफ़ाक हुसैन के साले अल्ताफ़ हुसैन को थी, चूंकि इसी ने मेरे परिवार और हमहामा के डीएसपी दरविंदर सिंह के बीच दलाल की भूमिका निभाई थी। अल्ताफ़ ने मुझे कहा कि मैं उसके दो बच्चों को पढ़ाऊं चूंकि आतंकवादियों के खौफ़ की वजह से वे ट्यूशन पढ़ने नहीं जा पाते। इनमें एक दसवीं में था, दूसरा बारहवीं में। इस तरह अल्ताफ से मेरी नजदीकियां बढ़ीं। एक दिन अल्ताफ मुझे डीएसपी दरविंदर सिंह के पास ले गया और बताया कि मुझे उनके लिए एक छोटा सा काम करना पड़ेगा।

काम यह था कि एक आदमी को दिल्ली ले जाना था और उसे वहां एक किराए का घर दिलवाना था, चूंकि मैं दिल्ली को बेहतर तरीके से जानता था। मैं उस व्यक्ति को नहीं जानता था, लेकिन मुझे संदेह था कि वह कश्मीरी नहीं है क्योंकि वह कश्मीरी नहीं बोलता था। लेकिन मैं असहाय था और मुझे दरविंदर का काम करना ही था। मैं उसे दिल्ली ले गया। एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह एक कार खरीदना चाहता है। मैं उसे करोलबाग लेकर गया। उसने कार खरीदी। दिल्ली में वह तमाम लोगों से मिलता था और हम दोनों को दरविंदर सिंह के फोन कॉल आते रहते थे। एक दिन मोहम्मद ने मुझे बताया कि अगर मैं कश्मीर जाना चाहूं तो जा सकता हूं। उसने मुझे पैंतीस हजार रुपए भी दिए और कहा कि यह मेरे लिए एक उपहार है।

छह या आठ दिन पहले मैंने इंदिरा विहार में अपने परिवार के लिए एक किराए का कमरा ले लिया था। चूंकि मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब दिल्ली में ही रहूंगा क्योंकि मैं अपने इस जीवन से संतुष्ट नहीं था। मैंने किराए के मकान की चाबियां अपनी मकान मालकिन को थमा दीं और उसे बताया कि मैं ईद के बाद 14 दिसंबर को लौटूंगा क्योंकि संसद पर हमले के बाद वहां काफी तनाव था। मैंने श्रीनगर में तारिक से संपर्क किया। शाम को उसने मुझसे पूछा कि मैं कब वापस आया। मैंने बताया कि मुझे आए हुए सिर्फ एक घंटा हुआ है। अगली सुबह जब मैं सोपोर जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था, श्रीनगर पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गई। तारिक वहां एसटीएफ के साथ मौजूद था। उन्होंने मेरी जेब से 35000 रुपए निकाल लिए, मेरी पिटाई की और सीधे मुझे एसटीएफ मुख्यालय ले गए। वहां से मुझे दिल्ली लाया गया। मेरी आंखों को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यहां मैंने खुद को विशेष पुलिस के उत्पीड़न कक्ष में पाया।

...और उसने अपना परिवार बचा लिया : अफज़ल के परिजन और अधिवक्ता एनडी पंचोली (सबसे दाएं)
 विशेष सेल की हिरासत में मैंने उन्हें मोहम्मद इत्यादि के बारे में सब कुछ बताया लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि मैं, शौकत, उसकी पत्नी नवजोत (अफशां) और गिलानी ही संसद पर हमले के पीछे हैं। उन्होंने मेरे परिवार को लेकर मुझे धमकाया और उनमें से एक इंस्पेक्टर ने बताया कि मेरा छोटा भाई हिलाल अहमद गुरु भी एसटीएफ की हिरासत में हैं और यदि मैंने उनका सहयोग नहीं किया तो वे मेरे दूसरे परिजनों को भी उठवा लेंगे। इसके बाद उन्होंने मेरे ऊपर दबाव डाला कि मैं शौकत, उसकी पत्नी और गिलानी को दोषी ठहराऊं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उन्हें बताया कि यह असंभव है। फिर उन्होंने मुझे कहा कि मुझे गिलानी के निर्दोष होने के बारे में चुप रहना है। कुछ दिनों बाद मुझे मीडिया के सामने पेश किया गया। वहां एनडीटीवी, आज तक, जी न्यूज, सहारा टीवी आदि थे। एसीपी राजबीर सिंह भी वहां थे। जब एक साक्षात्कर्ता ने मुझे बताया कि संसद पर हमले में गिलानी की क्या भूमिका है, तो मैंने भी ऐसे ही कह दिया कि गिलानी निर्दोष हैं, ठीक इसी वक्त एसीपी राजबीर सिंह अपनी घूमती हुई कुर्सी से उठे, मेरे ऊपर चिल्लाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे पहले ही हिदायत दी गई थी कि मीडिया के सामने गिलानी के बारे में कुछ नहीं बोलना है। राजबीर के व्यवहार ने मेरी असहायता को प्रदर्शित कर दिया और कम से कम मीडिया के लोग यह जान गए कि अफजल जो भी बयान दे रहा है वह दबाव और खौफ में दे रहा है। इसके बाद राजबीर सिंह ने टीवी के लोगों से अनुरोध किया कि गिलानी वाला सवाल दिखाया न जाए।

शाम के वक्त राजबीर सिंह ने मुझसे पूछा कि क्या मैं परिवार से बात करना चाहता हूं। मैंने हां में जवाब दिया। फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। फोन करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि यदि मैं अपनी पत्नी और परिवार को जिंदा देखना चाहता हूं तो हर कदम पर उनका सहयोग करूं। वे मुझे दिल्ली में तमाम जगहों पर ले गए। वहां उन्होंने मुझे वे जगह दिखाईं जहां से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। वे मुझे कश्मीर ले गए और हम वहां से बगैर कुछ किए वापस आ गए। उन्होंने मुझसे कम से कम 200-300 कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए।

मुझे निर्धारित कोर्ट में अपनी कहानी सुनाने का मौका ही नहीं दिया गया। जज ने मुझे बताया कि मुकदमे के अंत में मुझे बोलने का पूरा मौका दिया जाएगा, लेकिन आखिरकार न तो उन्होंने मेरे बयानों को दर्ज किया और न ही अदालत ने दर्ज किए गए बयान मुझे मुहैया कराए। यदि ध्यान से रिकॉर्ड किए गए फोन नंबरों को देखा जाता तो अदालत यह जान जाती कि वे एसटीएफ के फोन नंबर थे।

अब मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय मेरी असहाय स्थिति और उस सचाई को समझ सकेगा जिससे मैं गुजरा हूं। एसटीएफ ने अपने और कुछ अन्य अज्ञात लोगों द्वारा निर्मित और निर्देशित इस आपराधिक गतिविधि में मुझे बलि का बकरा बना दिया। इस पूरे खेल में विशेष पुलिस निश्चित तौर पर एक हिस्सा है चूंकि हर वक्त उन्होंने मेरे ऊपर चुप रहने का दबाव डाला। मुझे भरोसा है कि मेरी इस चुप्पी को सुना जाएगा और मुझे न्याय मिलेगा।

मैं एक बार फिर आपको दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने मेरा बचाव किया।

सत्यमेव जयते।

मोहम्मद अफज़ल
पुत्र हबीबुल्ला गुरु
वार्ड न. 6 (उच्च सुरक्षा वार्ड)
जेल न. 1, तिहाड़
नई दिल्ली-110064