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28 मार्च 2013

जेल से भेजी मारुती मजदूरों ने अपील


समर्थन में आज से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू 

मारुती कंपनी प्रबंधन, सरकार और प्रशासन के दमन के खिलाफ 24 मार्च से हरियाणा के कैथल जिले में चल रहा अनिश्चितकालीन धरना आज से आमरण अनशन में बदल गया है. संघर्षरत मज़दूरों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के पक्ष में व्यापक समर्थन की अपील की है. इस मौके पर हम जेल में बंद 147 मजदूरों की और से जारी पत्र को प्रसारित कर रहे हैं...
हम मारुति सुजुकी के वो मजदूर है जिनको 18-7-2012 की दुर्घटना का इल्जाम लगाकर बिना किसी न्यायिक जांच के जेल में डाल दिया गया हैं. हम 147 मजदूर अभी भी गुडगाँव सेंट्रल जेल के सलाखों के पीछे बंध हैं. जुलाई के बाद लगभग 2500 पक्के और कच्चे कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया. पिछले 8 महीनों से हम हरियाणा और केन्द्रीय सरकार के बहुत सारे उच्च अधिकारियों, हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री जी को भी कई बार अपील कर चुके हैं.
लेकिन न तो हमारी कहीं सुनाई हो रही है, न ही हमें जमानत दी जा रही है. और तो और, जो हरियाणा पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में पेश की है, उसमें किसी गवाह का नाम नही है और वह आधी अधूरी है. हमारा लोकतान्त्रिक अधिकारो का हनन लगातार हो रहा हैं, और कानून को कंपनी मालिकों के स्वार्थ में व्यवहार किया जा रहा हैं. इस दौरान बहत से कर्मचारियों ने अपने परिवार के सदस्य के साथ-साथ बहत कुछ खो दिया है. काफी मजदूर ऐसे भी है जिनके माता-पिता नहीं हैं और पुरे परिवार का पालन पोषण का भार उन्ही पर है.
काफी ऐसे भी साथी हैं, जब उन्हें जेल में डाला गया, तब उनकी पत्नियाँ गर्भवती थी. उनकी डिलीवरी के समय भी कर्मचारियों को न तो जमानत दी गयी, न ही पे-रोल पे छुट्टी दी गयी और न ही पे-रोल कस्टडी में ही भेजा गया. परिवार में अकेली होने के कारण व पति के जेल में होने के कारण, पता नहीं किन परिस्थितियों में उनकी डिलीवरी हुई है. इसके हम निचे कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है:-
हमारे एक साथी सुमित S/O स्वर्गीय श्री छत्तर सिंह के घर में सुमित और उनकी पत्नी के अलावा कोई अन्य पारिवारिक सदस्य नहीं है. लेकिन फिर भी दिनांक 6.12.2012 को उनकी पत्नी की डिलीवरी गुडगाँव के एक अस्पताल में हुई और उनकी देखभाल के लिए सुमित को कोई भी राहत प्रदान नहीं की गई.
हमारे एक साथी विजेंद्र S/O स्वर्गीय श्री दलेल सिंह अपने परिवार का पालन पोषण करनेवाला अकेला सदस्य है. उसके घर में उसकी पत्नी व बिमार माँ है. उसकी पत्नी की डिलीवरी 10.01.2013 को झज्जर के एक अस्पताल में हुई. विजेंद्र के माँ के बिमार होने के कारण उसकी पत्नी कि डिलीवरी के समय देखभाल करनेवाला कोई नहीं था. लेकिन फिरभी विजेंद्र को पत्नी के देखभाल के लिए डिलीवरी के समय कोई राहत नहीं दी गई.
हमारे साथी रामबिलास S/O स्वर्गीय श्री सीलक राम की दादीमा 26.02.2013 को रामबिलास के वियोग में बिमार हो कर स्वर्ग सिधार गई, क्योकि वह उसकी दादीमा का बहुत लाडला था. और तो और उसे दाह-संस्कार में सामिल होने या दादीमा के अंतिम दर्शन करने के लिए पेरोल कस्टडी में भी नहीं ले जाया गया. कुछ ही दिनों के बाद जब उसकी पत्नी कि डिलीवरी होनी थी तो उसकी जमानत या छुट्टी के लिए याचिका लगाई गई तब भी उसे कोई राहत नहीं दी गई. इससे उसके ऊपर बड़ा मानसिक आघात हुआ है.
हमारे एक साथी प्रेमपाल S/O श्री छिद्दीलाल के उपर पुरे परिवार के पालन पोषण का भार है, वह जब जेल में आया था तब उसके परिवार की रोजी-रोटी उसी के बलबूते पर टिकी हुई थी. परन्तु उसके जेल में आने के बाद उसकी इकलौती बेटी जो मात्र दो साल की थी, जो अपने पापा के वियोग में बीमार होकर पापा-पापा करते हुए भगवान को प्यारी हो गई. ये जख्म अभी हरा ही था कि तभी कुछ दिन बाद प्रेमपाल की माँ बेटे के वियोग में व अपनी लाडली पोती के वियोग में बीमार होकर स्वर्ग सिधार गई. हद तो तब हो गई जब उसकी एक सप्ताह कि छुट्टी भी ख़ारिज कर दी गई व उसे मात्र एक घंटे के लिए दाह-संस्कार होने के अगले दिन पे-रोल कस्टडी में भेजा गया. जबकि गुडिया व माताजी के देहांत के दुःख में घर में अकेली उसकी पत्नी भी बीमार होने के कारण अस्पताल में दाखिल करवानी पड़ी जो अभी भी बिमार है तथा उसकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं है. और इस कारण प्रेमपाल बहुत अधिक मानसिक दबाव में है.
हमारे एक साथी राहुल S/O श्री विनोद रतन जो घर में अपने माँ-बाप का एक इकलौता बेटा है व उसकी एक ही बहन है. उसकी बहन कि शादी दिनांक 16.11.2012 को हुई. परन्तु उसे कस्टडी में भी अपनी बहन के शादी के कन्यादान के लिए नहीं भेजा गया जिसके कारण घर की इकलौती बेटी की शादी होते हुए भी घर में मातम जैसा माहौल रहा और राहुल मानसिक दबाव में है.
हमारे एक साथी सुभाष S/O श्री लाल चंद जो कि अपनी दादीमा का बहुत लाडला था. जब वह जेल में आया तो उसके वियोग में उसके दादीमा खाना-पीना छोड़ दिया व कुछ दिन में ही अपने पोते को याद करते हुए स्वर्ग सिधार गई. परन्तु सुभाष को दाहसंस्कार या अंतिम दर्शन के लिए पे-रोल कस्टडी में भी नहीं भेजा गया.
ऐसी और कितनी ही दुख भरी घटनाएँ है, जिन्हें लिखते लिखते एक पूरी किताब बन जाये .

हमारे बारे में: परिचय, परिवार, नौकरी

हम सभी किसान या मजदूरों के बच्चे हैं. माँ-बाप ने हमे बड़ी मेहनत से खून-पसीना एक करके 10वी-12वी या ITI शिक्षा दिलवाई व इस लायक बनाया कि इस जीवन में कुछ बन सके व अपने परिवार का सहारा बन सके.
हम सभी ने कंपनी द्वारा भर्ती प्रक्रिया में लिखित व् मौखिक परीक्षायों को पास करके व् कंपनी की जो जो भी नियम व शर्ते थी, उनपर खरे उतर कर मारुति कंपनी को ज्वाइन किया. जोइनिंग करने से पहले, कंपनी ने सभी प्रकार से हमारी जांच करवाई थी, जैसे- घर की थाने तहसील की व क्रीमिनल जांच करवाई गई थी! पिछले समय का हमारा कोई क्रिमिनल रिकार्ड नहीं हैं.
जब हमने कंपनी को ज्वाइन किया तब, कंपनी का मानेसर प्लांट निर्माणाधीन था. हमने अपने कड़ी मेहनत व लगन से अपने भविष्य को देखते हुए, कंपनी को एक नयी उचाई पर ले गए. जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छायी हुई थी, तब हमने प्रतिदिन दो घंटे एक्स्ट्रा टाइम देकर साल में 10.5 लाख गाड़ियों का निर्माण किया था. कंपनी की लगातार बढ़ते मुनाफा का हम ही पैदावार रहे हैं, जबकि आज हमे अपराधी और खूनी ठहराया जा रहा हैं.
हम लगभग सभी मजदूर गरीब मजदूर-किसान परिवारों से हैं जिनकी जीविका हमारी नौकरी पर ही निर्भर हैं. हमनें अपने व अपने परिवार के भविष्य के सपने बुन रखे थे, कि हमारा भी अपना घर होगा. भाई-बहन व बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलाएंगे, ताकि उनका भविष्य भी उज्जवल हो सके व माता-पिता जिन्होंने इतने कष्ट उठाकर हमें इस लायक बनाया कि हम अपने पैरों पे खड़े हो सकें, उनका जीवन आरामदायक बनायेंगे.

कंपनी में हमारा हर प्रकार से शोषण हो रहा था, जैसे कि-

किसीको भी तबियत ख़राब होने पर डिस्पेंसरी न जाने देना व बिमारी की हालत में भी पूरा काम करवाना.

यहाँ तक कि टॉयलेट भी नहीं जाने दिया जाता था. केवल लांच या टि-टाइम में ही जाने दिया जाता था.

अधिकारीयों का कर्मचारियों के साथ भद्दा व्यवहार व गालिया देना और कभी कभी तो दंड देने के लिए थप्पड़ मारना व मुर्गा बना देना.

यदि किसी कर्मचारी के साथ या उसके परिवार के किसी सदस्य के साथ दुर्घटना या कोई समस्या होने पर या यहाँ तक की किसी सम्बन्धी की मृत्यु होने पर यदि कर्मचारी दो या चार दिन की छुट्टी लेता था, तो उसकी सेलरी का आधा भाग, लगभग नौ हज़ार रुपये काट लिया जाता था.

इस प्रकार शोषण के कारण कर्मचारियों को यूनियन कि जरूरत महसूस हुई. कंपनी यूनियन के खिलाफ थी, जिनके कारण हमारी साल 2011 में तीन हड़ताल हुई, जिसमे हमारे तीस साथियों को नौकरी से निकाल दिया गया. लेकिन आख़िरकार हमने फरवरी 2012 में यूनियन का रजि. करवाया, जिसमे हमारी मदद एच.आर. मैनेजर स्वर्गीय श्री अवनिश कुमार देव ने कि थी. हमारी मदद करने के कारण कंपनी देव जी से बहुत खफा हो गई थी, जिसके चलते देव जी ने नौकरी से अपना इस्तीफा दे दिया था. कंपनी ने पोल खुलने के डर से उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया था. यूनियन को तोडवाने व देव जी को रास्ते से हटाने के लिए एक योजनाबंध तरीके से बाउन्सरों व गुंडों को बुलाकर 18 जुलाई 2012 की ‘दुर्घटना’ को अंजाम दिया.

अबकी स्थिति

हम 147 मजदूरों को बिना किसी न्यायिक जाँच किये जेल में डाल दिया गया. हमारा जेल में बंध रहते 8 महीनें से ज्यादा समय हो चुका है. यहाँ जेल में हम बहुत मानसिक दबाव झेल रहे है. कई लोगों को टी. बी., पिलिया व किसीको दौरे पड़ रहे है. और बहुत सारे कर्मचारियों को अन्य काफी बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है.

हमारे लगभग सभी परिवारों में कमाने वाले केवल हम थे जो जेल में बंध हैं. जिसके कारण परिवारों को भूखे मरने की नोबत आ गई है. औरोतों और बच्चों कि शिक्षा तक भी छुट गई है जो कि उनका मौलिक अधिकार है. हमारा और हमारे परिवार का भविष्य अंधकार हो गया है. हमारे परिवार के सभी सदस्य भी मानसिक तौर पर बहुत परेशान है. हमे डर हैं कि वो परेशानी के कारण कोई गलत कदम न उठाये.

जेल से बाहर कर्मचारियों कि मौजूदा स्थिति 

147 कर्मचारियों को जेल में डालने के साथ साथ कंपनी ने लगभग 2500 कच्चे और पक्के कर्मचारियों की बिना किसी न्यायिक जाँच के नौकरी से निकाल दिया और वह बेरोजगार हो गए. उनकी परिवारों की स्थिति भी गंभीर है. यहा तक कि उनके पास कोई एक्सपीरियंस डोकुमेंट प्रूफ नहीं है और उनका पूरा कैरियर बर्बाद हो चूका है और उनमे से जो भी कोई हमारी पैरवी करने के लिए आगे आता है, उसे भी उठाकर जेल में डाल दिया जाता है (जैसे साथी ईमान खान के साथ किया गया, जिसका नाम कोई एफ.आई.आर., चार्जशीट या एस.आई.टी. रपट में नहीं था; 65 मजदूरों के ऊपर अभी भी गैर-जमानती वारंट जारी हैं). जेल में बंध कर्मचारियों और बाहर बेरोजगार कर्मचारियों के पास अपनी जीविका चलाने का कोई भी साधन नहीं है, जिसके चलते सभी मानसिक दबाव में है. लेकिन इन हालातों के बीच भी जेल के बहार के हमारे साथी जो न्याय के लिए संघर्ष जारी रखे हैं, उससे हमे इन सलाखों के पीछे भी आशा और उर्जा मिलती हैं. आठ महीने के उपर चल रहे इस संघर्ष में हमे देश के अलग अलग प्रान्त से मजदूर, मेहनतकश और आम जनता के समर्थन के खबरे आती रही हैं, जो भी हमे उम्मीद देती रही हैं.

हम अपनी जाँच की मांगों को लेकर सरकार के लगभग सभी मंत्रियों से मिल चुके हैं. राज्य उद्योग मंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री से भी न्याय की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन सरकार हरियाणा के मजदूर-कर्मचारियों की बजाये कंपनी मालिकों की ही तरफ झुकी हुई है. हम अंतिम बार सरकार से अपील करते है कि मरने या मारने के इस मुकाम तक पहुचने से पहले हमारे साथ न्याय हों. साभार- जनज्वार.

19 सितंबर 2012

कोयला के बदले पावर प्लांट मिले तो क्या दिक्कत!


-दिलीप खान

खुदरा क्षेत्र में एफ़डीआई, डीज़ल में मूल्यवृद्धि और रियायती दर पर रसोई गैस सिलेंडर हासिल करने का कोटा तय करने के बीच कोयला का मामला दब गया सा लगता है। मुद्दे आधारित राजनीति में नया मुद्दा आते ही पुराना मुद्दा किसी झाड़ी तले ढंक जाता है। लेकिन कोयला ब्लॉक की समीक्षा कर रही अंतर-मंत्रालयी समूह में जिस तरह की पड़ताल हो रही है और जैसे नतीजे सामने आ रहे हैं वो कई दफ़ा चौंकाते भी हैं। जिन 58 कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी हुए थे, उनमें से महज 29 की जांच हो पाई है और इनमें से आईएमजी ने सिर्फ़ 8 कंपनियों के आवंटन रद्द करने की कोयला मंत्रालय से सिफ़ारिश की है। शुरुआत में 142 में से 58 को जांच पड़ताल के बाद सिर्फ़ इस आधार पर कारण बताओ नोटिस भेजा गया था कि इन सबकी प्रगति काफ़ी ढीली थी।

आईएमजी ने जिन 8 कंपनियों के आवंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की
ब्लॉक का नाम
राज्य
कंपनी का नाम
क्षमता
आवंटन वर्ष
चिन्होरा
महाराष्ट्र
फ़ील्ड माइनिंग एंड इस्पात
2 करोड़ टन
2003
बरोरा
महाराष्ट्र
फ़ील्ड माइनिंग एंड इस्पात
1.8 करोड़ टन
2003
लालगढ़ उत्तरी
झारखंड
डोमको स्मोकलेस फ्यूल्स
3 करोड़ टन
2005
ब्रह्मडीह
झारखंड
कैस्ट्रॉन माइनिंग
20 लाख टन
1996
रावणवाड़ा उत्तरी कोयला ब्लॉक
मध्य प्रदेश
एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड

2006
नई पात्रापाड़ा कोयला ब्लॉक
उड़ीसा
भूषण स्टील लिमिटेड एंड अदर्स
31.6 करोड़ टन
2006
गौरंगडीह एबीसी कोयला ब्लॉक
प. बंगाल
हिमाचल ईएमटीए पावर लिमिटेड और जेएसडब्लू स्टील लिमिटेड
6.15 करोड़ टन
2009
मचेरकुंडा ब्लॉक
झारखंड
बिहार स्पॉन्ज आयरन एंड स्टील

2008

आईएमजी की अगुवाई कर रही अतिरिक्त सचिव ज़ोहरा चटर्जी 21 तारीख़ को अमेरिका दौरे पर जा रही हैं और ऐसे में ये साफ़ लग रहा है मंगलवार को मचेरकुंडा ब्लॉक रद्द करने का फ़ैसला इस चरण का लगभग आख़िरी फ़ैसला है। निर्भीक और निष्पक्ष आईएमजी रिलायंस, टाटा, आर्सेलर-मित्तल और हिंडालको (बिड़ला समूह की कंपनी) से सवाल-जवाब करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि इनके खदानों को बरकरार रखा जाय। सारे बड़े घरानों के ब्लॉक बच गए। अंबानी, टाटा, मित्तल, बिड़ला। सबके। राजनीतिक गलियारे में जिन नेताओं के घर में कोयले का धुंआ उठ रहा था, उनपर पानी गिराया गया ताकि धुंए का गुबार शांत हो जाए। जाहिर है इसके लिए कुछ आवंटन रद्द भी करने पड़े। मिसाल के लिए पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय की चारों ओर थू-थू हो रही थी कि उन्होंने यह जानकारी छुपाते हुए प्रधानमंत्री (तत्कालीन कोयला मंत्री) मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड को खदान देने की सिफ़ारिश की थी कि उनका भाई सुधीर कुमार सहाय इस कंपनी का मानद निदेशक है। मंत्रालय ने अभूतपूर्व तेजी दिखाते हुए इस ब्लॉक को हरी झंडी दी थी। इसी तरह जायसवाल समूह के नाम पर घिरे मौजूदा कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी मंत्रालय से इतर कुछ कार्रवाई के चलते अपने दाग को मलिन होते देख रहे हैं। अभिजीत समूह की तीन कंपनियों जेएएस इंफ्रास्ट्रक्चर, जेएलडी यवतमाल और एएमआर आयरन एंड स्टील के मालिक भाइयों अरविंद जायसवाल और मनोज जायसवाल को सीबीआई ने पूछताछ की। इसी कंपनी के साथ कांग्रेस सांसद विजय दर्डा का नाम जुड़ा है। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि इन दोनों जायसवाल भाइयों ने विजय दर्डा को 26 फ़ीसदी हिस्सेदारी इस आधार पर देने की पेशकश की थी कि वो मंत्रालय से हरी झंडी दिलवाने में जायसवाल की मदद करें।

लेकिन खेल का मैदान काफ़ी चौड़ा है। इधर कोयला मंत्रालय इन कंपनियों के आवंटन रद्द कर रही है और उधर ऊर्जा मंत्री वीरप्पा मोइली इन कंपनियों को भविष्य में पावर प्लांट देने की बात कहकर ये यक़ीन दिला रहे हैं कि देश में कंपनियों द्वारा बरती गई अनियमितताओं को जुर्म के खांचे में रखने की मांग करने वाले लोग निरा बेवकूफ़ है। कंपनियों को किस तरह का घाटा होगा? मान लीजिए किसी सुबोधकांत सहाय के भाई को कोयला ब्लॉक के बदले पावर प्रोजेक्ट मिल जाए तो इसमें उन्हें क्या हर्ज हो सकता है? बड़ी बात यह कि राजनीतिक सफ़ेदी बरकरार रहते हुए ऐसा हो जाए तो क्यों नहीं कोयला खदान रद्द करावाए कोई? 10 ब्लॉकों के लिए अब तक 8 कंपनियों को बैंक गारंटी जमा करने या बैंक गारंटी रद्द करने की भी आईएमजी ने सिफ़ारिश की है।

कांग्रेस महकमे में आईएमजी की सिफ़ारिश को शो-रूम के बाहर सजे-धजे मॉडल्स की तरह पेश किया जा रहा है। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि आईएमजी के जरिए सरकार ही कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में पारदर्शिता बरतने की पहलकदमी कर रही है। उनके मुताबिक सरकार हमेशा धांधली के ख़िलाफ़ रही है और इसीलिए कंपनियों के आवंटन रद्द हो रहे हैं। लेकिन शर्मा ने यह नहीं बताया कि उनकी ईमानदार सरकार ने कैग की रिपोर्ट से पहले यह कदम क्यों नहीं उठाया? पहले दिन यानी 13 सितंबर को आईएमजी ने जिन चार कंपनियों को रद्द करने (टेबल में ऊपर की चार कंपनियां) की सिफ़ारिश की उनमें से सिर्फ़ एक कंपनी को यूपीए के शासनकाल में ब्लॉक आवंटित किया गया और बाकी तीन कंपनियां एनडीए के जमाने वाली थीं। यहां दो बातें साफ़ होती हैं। पहली, जो बीजेपी 17 अगस्त को संसद में कैग की रिपोर्ट पेश होने के बाद पूरे मानसून सत्र में सदन के भीतर नारेबाजी करके गला ख़राब करती रही, उसके जमाने में भी ऐसे ही कोयला खदान बांटे जाते रहे हैं। जाहिर है बीजेपी का मौजूदा विरोध किसी कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ न होकर यूपीए सरकार के साथ लगभग नत्थी हो चले घोटालों की श्रृंखला को लपककर राजनीतिक लाभ लूटने की है। दूसरी, आईएमजी ने पहले दिन ज़्यादातर एनडीए के जमाने में आवंटित हुए  कोयला खदानों को रद्द करने की सिफ़ारिश कर यूपीए सरकार को ये मौका दिया कि अब वो डीज़ल, रसोई गैस और एफ़डीआई पर खेल खेल सकती है क्योंकि कोयला पर एनडीए को आईना दिखाने वाली रिपोर्ट सामने है। यह महज संयोग नहीं है कि ठीक उसी दिन (13 सितंबर को) यूपीए ने डीज़ल और रसोई गैस वाला फ़ैसला लिया और अगले दिन, 14 सितंबर (जब हिंदी पट्टी के बुद्धिजीवी हिंदी दिवस मनाने में मशगूल थे) को खुदरा बाज़ार में 51 फ़ीसदी एफडीआई का।

सवाल अपनी जगह कायम है। कॉरपोरेट लूट और इसमें राजनीतिक सहभागिता पर लगाम कसने की कोशिश जिस संरचना के जरिए की जा रही है उसमें पार्टियों के बीच ज़्यादा फर्क नहीं है। भाजपा अथवा कांग्रेस सिर्फ़ विपक्ष में आने पर ही विरोध का स्वर अलापते हैं वरना नीतिगत स्तर पर दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। इसके कई उदाहरण अतीत में देखे गए हैं। गुजरे साल दिल्ली में कुछ किलोमीटर के अंतर में ही एक जगह भाजपा के लोग आदर्श सोसाइटी में हुए भ्रष्टाचार को लेकर धरने पर बैठे थे तो दूसरी जगह कर्नाटक में येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच उनके इस्तीफ़े की मांग कर रही कांग्रेस बैठी थी। मुद्दे और जगह में पाए जाने वाले अंतर को दरअसल सैद्धांतिक अंतर के तौर पर पेश करने की शातिराना राजनीति की जब परत उघड़ने लगती है तो नया शिगूफ़ा छोड़कर उसे शांत कर दिया जाता है। वरना इस नीति के साथ कोयला आवंटन पहली बार यूपीए ने तो किया नहीं। 1993 से यही नीति अमल में लाई जा रही है। और घोटाला अगर है तो सिर्फ़ 2004 से ही नहीं है...और अगर नहीं है तो फिर कोई सवाल ही नहीं है।  



08 नवंबर 2011

जी-20 सम्मेलन और यूरोज़ोन संकट


------दिलीप ख़ान

यूरोज़ोन संकट के थपेड़े से जूझते यूरोप में इससे पार पाने की कवायदें पिछले कई महीनों से जारी है। हालात ये है कि यूरोपीय संघ के भीतर यूरोज़ोन को ढहने से बचाने की कोशिश करने वाले देशों की स्थिति भी ख़राब होती जा रही है। ग्रीस के बाद इटली की खस्ताहाल हालात सिर्फ़ एक कैलेंडर वर्ष की आर्थिक नीतियों का न तो परिणाम है और न ही इससे कुछ महीनों में पार पाया जा सकता है। जब ग्रीस को घोषित मोटे बेलआउट के बाद भी वहां की स्थिति में सुधार महसूस नहीं किया तो यह जाहिर हो गया कि जिस स्थिति की कल्पना की जा रही है यह उससे कहीं बदतर है। जी-20 के लिए जब यूरोप के भीतर ऐसी आर्थिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि मौजूद थी और यूरोज़ोन मामले में महीनों से सक्रिय रहने वाले फ्रांस को जब इसकी मेजबानी करनी थी, तो पहले से ही यह तक़रीबन स्पष्ट लग रहा था कि बातचीत का ताना-बाना यूरोज़ोन संकट के इर्द-गिर्द ही बुना जाएगा।

जी-20 की स्थापना जब 1999 में की गई तो इसका एजेंडा था कि कैसे 1997 में पैदा हुए एशियाई आर्थिक संकट से निपटा जाए। इस तरह अपने स्थापना के समय से ही यह समूह आर्थिक संकटों के आस-पास की बातचीत पर केंद्रित रहा है बल्कि यह कहना ज़्यादा मुनासिब होगा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से उभरने वाले आर्थिक संकटों की रोक-थाम ही इसका उद्देश्य बन गया। दुनिया के 20 सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थों को एक मंच पर लाकर वैश्विक आर्थिक विकास का जो ख्वाब बुना गया था उसकी सारी ऊर्जा वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने में खप रही है। इसलिए मौजूदा यूरोज़ोन संकट की बहस अपने चरित्र में जी-20 के देशों के लिए नई नहीं है। 2008 के वाशिंगटन सम्मेलन, 2009 के लंदन और पीट्सबर्ग सम्मेलन और 2010 के टोरंटो और सियोल सम्मेलन का ज़्यादातर हिस्सा तेजी से बढ़ती आर्थिक मंदी पर खरचा गया। 

हर साल इस समूह के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों की बैठक बुलाने के पीछे यह मक़सद काफ़ी मज़बूती के साथ नत्थी रहता है कि वैश्विक वित्तीय प्रवाह को बरक़रार रखने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाए। कांस में संपन्न हुई मौजूदा बैठक जी-20 के राष्ट्रध्यक्षों की छठी बैठक थी जोकि वित्तीय अर्थव्यवस्था और आर्थिक संकटों की तात्कालिक वजहों के पड़ताल पर केंद्रित थी। ग्रीस के संकट की भयावहता उसके भूगोल से बाहर निकल आई है और यूरोपीय देशों के साथ-साथ दुनिया के ज़्यादातर शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं की यह चिंता बन गई है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे को किस तरह बचाया जाए। वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो की मुहिम दर्ज़नों देशों में फैल गई है। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि वॉल स्ट्रीट की जगह पर स्थानीय आर्थिक प्रतीकों का इस्तेमाल हो रहा है।

जिस तरह वॉल स्ट्रीट आंदोलन को अमरीकी हुक्मरान छोटा करके दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं ठीक उसी तरह यूरोज़ोन संकट को भी यूरोपीय देश कमतर करके वैश्विक मंच पर पेश कर रहे हैं। लेकिन आपसी बातचीत और बैठक में यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है। जी-20 बैठक के दौरान प्रेस कांफ्रेंस में जब ग्रीस के प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंड्रू और इटालवी प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी यह कह रहे थे कि वे अपने-अपने देश को इस संकट से उबारने में सफल होंगे तो शायद उन्हें यह पता नहीं था कि उनकी इस प्रचार सामग्री को उनके देश के लोग ही खारिज करने में जुट जाएंगे। जी-20 को ख़त्म हुए हफ्ता भर भी नहीं हुआ है और यह चर्चा ज़ोरो पर है कि पापेंद्रू और बर्लुस्कोनी इस्तीफ़ा देने वाले हैं। अर्थव्यवस्था की चरमराहट की मिसाल यह है कि ग्रीस में पापेंद्रू की जगह प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर जिनका नाम सामने आ रहा है उनमें यूरोपीय केंद्रीय बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष लुकास पापाडेमोस और वित्त मंत्री इवांजेलोस वेनीज सबसे प्रमुख हैं। बर्लुस्कोनी यह तो कह रहे हैं कि स्थिति ज़्यादा गंभीर नहीं है लेकिन इस्तीफे की ख़बर के बीच सफाई देने से नहीं चूक रहे हैं कि इससे इटली की प्रतिभूति बाज़ार भारी दबाव में आ गया है। ये विरोधाभासी वक्तव्य फिलवक्त यूरोज़ोन और बेलगाम वैश्वक वित्तीय अर्थव्यवस्था की विफलता को छुपाने और पूंजीवाद की नीति में आई बड़ी दरार को भरने की असफल कोशिश को दर्शा रहे हैं। 

जी-20 की हालिया बैठक के बाद जो विज्ञप्ति जारी की गई उसमें यह प्रमुखता से माना गया कि पिछले बैठक के बाद से इन देशों में बेरोज़गारी और इकोनॉमिक रिकवरी का स्तर पहले से भी ज़्यादा पिछड़ा है। इससे पार पाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए गए कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं की पहलकदमी को किस तरह इस संकट से उबरने में इस्तेमाल किया जाए और संकट में फंसे अर्थव्यवस्थाओं को दिए जाने वाले मदद का स्वरूप कैसा हो, लेकिन वैश्वीकरण के जिस बिंदु पर ज़ोर दिया गया वह ग़ौरतलब है। जी-20 ने माना कि वैश्वीकरण के मौजूदा स्वरूप में सामाजिक पहलू पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है। रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा को हासिल करने को लक्ष्य बनाया गया है। एक जी-20 कार्यबल बनाने की बात कही गई है जो युवाओं को रोज़गार के अवसर मुहैया कराने की दिशा में काम करेगी। फ्रांस में बेरोज़गारी को लेकर बीते साल लंबे समय तक चले छात्र आंदोलन ने वैश्वीकरण के उत्पाद के तौर पर बेरोज़गारी को सरकार के सामने खोलकर रख दिया था, ऐसे में फ्रांस में हुई बैठक में रोज़गार पर एक्शन लेना ज़रूरी हो गया था। वित्तीय फर्म की विशालता को उस हद तक कतरने की बात कही गई जहां तक यह विफल साबित न हो जाए।

इस सम्मेलन में छिटपुट तरीके से कृषि विकास, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार पर भी बात की गई लेकिन इन मामलों में कोई उल्लेखनीय पहलकदमी नहीं ली गई। बैठक के दौरान कई ग़ैर-सरकारी संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए वित्त से पहले आदमी का नारा लगाया। द्वितीय वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से जी-20 के हर बैठक ने विरोध झेला है। इसमें आमंत्रित किए गए चार देशों में इथियोपिया के शामिल होने की वजह से हॉर्न अफ्रीकी देशों में खाद्यान्न संकट और भुखमरी के सवाल उठे जोकि काफी महत्वपूर्ण है। बीते कुछ सालों में पूर्वी अफ्रीकी देशों में हज़ारों लोगों ने भूख की वजह से जान दी है। इस पर काबू पाने के लिए चावल भंडारण की एक योजना भी बनाई गई है जिसमें जी-20 एशियान+3 की मदद करेगा।

हालांकि बीते साल की बैठक में जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे कांस सम्मेलन में भी थोड़े फेरबदल के साथ उन्हीं बिंदुओं को ताजे लक्ष्य के तौर पर सामने रखा गया है। हालिया बैठक में यह साफ नज़र आ रहा था कि एजेंडों और उपायों को लेकर सदस्य देशों के बीच काफी मतांतर है। अमरीका और ब्रिटेन ने यूरोज़ोन संकट में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। असल में अमरीका की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ सालों से जिस तरह खुद संकट के चक्र में फंसी हुई है उससे किसी भी तरह का वित्तीय पैकेज देना अमरीका के लिए अभी मुश्किल नज़र आ रहा है। अमरीकी कांग्रेस के दबाव में ओबामा ने कांस से उठ रही इस आवाज़ को कि आईएमएफ के फंड को बड़ा कर यूरोज़ोन संकट से उबरने में खर्च किया जाए, यह कहकर थामा कि पहले यूरोज़ोन खुद इस पर लगाम कसने की कोशिश करें। ओबामा ने यूरोज़ोन देशों से अपील की कि पहले उनकी सरकारें यह पता लगाने की कोशिश करें कि कहां से इस संकट की मनोवैज्ञानिक शुरुआत हुई थी। ब्रिटेन ने भी बेलआउट पैकेज के विस्तार में उदासीनता दिखाई। यूरोपीय संघ का सदस्य होने के बावज़ूद ब्रिटेन यूरोज़ोन में शामिल नहीं है और मौजूदा संकट शुरू होने के बाद ब्रिटेन के भीतर यह आवाज़ भी तेजी से उठनी शुरू हो गई कि ब्रिटेन को मानवाधिकार और माइग्रेशन मामलों में भी खुद को यूरोपीय संघ से अलग कर लेना चाहिए। ब्रिटेन की बड़ी आबादी यह मानती है कि उनका देश इसलिए बच गया क्योंकि वह यूरोज़ोन में शामिल नहीं है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री केमरॉन ने यूरोज़ोन के देशों को यह चेतावनी भी दी कि मौजूदा संकट महज एक बानगी भर है और इससे भयानक स्थिति पैदा हो सकती है। ब्राज़ील ने भी यूरोपीय देशों को अपने स्तर पर संकट से निपटने की सलाह दी। जी-20 की बैठक पर यूरोज़ोन के देशों ने जिन उम्मीदों से निगाहें टिकाईं थीं उस अर्थ में तो यह राहत पहुंचाने वाली बिल्कुल साबित नहीं हुई। 

आर्थिक संकट से घिरे यूरोप के देशों के लिए आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद बहुत क्षीण नज़र आ रही है। इटली पर अपनी जीडीपी से 120 फीसदी ज्यादा का कर्ज़भार है। बेलआउट पैकेज के भरोसे इटली भविष्य की ओर मुंह ताक रहा है, लेकिन यूरोज़ोन के दो सबसे शक्तिशाली देश, फ्रांस और जर्मनी की भीतरी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति भी बहुत सुकूनदेह नहीं है। फ्रांस ने ऐहतियातन बड़े सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के वेतनवृद्धि पर रोक लगाने की योजना बनाई है। 

12 सितंबर 2011

लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाए




----मानेसर से लौटकर दिलीप खान
पिछले 14 दिनों से लगातार (लगातार को लगातार ही पढ़ें) चल रहे भाषणों के बीच जब एकरसता-सी आ रही थी तो सड़क के उस पार एक बस से ज़ोर-ज़ोर से आ रही क्रांतिकारी नारों की आवाज़ ने मज़दूरों में कौतूहल जगा दी. पहले बस से उतरते कुछ पैर नीचे दिखे, फिर दो-एक चेहरे और फिर 50 से ज़्यादा ऐसे चेहरे जिसे देखकर मज़दूरों ने किलकारी मारनी शुरू कर दी. उनके हाथ में तख़्तियां थीं जिनमें मज़दूरों के समर्थन वाले हर्फ़ लिखे थे. सड़क के इस पार अब यह साफ़ हो गया था कि जेएनयू से यह बस आई है और मज़दूरों के इस सवाल पर वे उनका साथ देने आए हैं. बहुत देर तक तालियां बजती रही. फिर छात्र-मज़दूर एकता ज़िदाबाद के नारे. डीयू और जामिया से भी छात्र-छात्राओं के कुछ समूह वहां मौजूद थे. नौजवान से दिखने वाले मज़दूरों के उत्साही नेता सोनू गुज्जर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, जिस आंदोलन में स्टूडेंट घुस जाए. समझो वो लड़ाई जीत ली गई.मानेसर और गुड़गांव के बाकी कंपनियों के मज़दूर यूनियनों से मिलने वाले समर्थन के बाद दिल्ली के विश्वविद्यालयों से आ रहे विद्यार्थियों ने सबके भीतर उत्साह और जीत की नई उमंग भर दी.
सफ़ेद और लाल रंग के पंडाल के नीचे पिछले 14 दिनों से जमा मज़दूरों के लिए दिन के मायने ख़त्म हो गए हैं. 15, 16 या 17 महज एक संख्या है और वे इन्हें जीत के रास्ते में आने वाले पड़ाव की तरह देख रहे हैं. आईएमटी मानेसर में 750 एकड़ में फैले मारुति-सुजुकी के प्लांट के गेट संख्या 2 के ठीक सामने मज़दूरों के जमावड़े के बीच आप जाएंगे तो यक़ीन मानिए आप अपनी उस दकियानूसी धारणा से मुक्त हो जाएंगे कि दिन गुजरने के साथ उत्साह में गिरावट आती है. कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठानों ने पिछले कुछ वर्षों में इग्नोर करने को बड़े हथियार के तहत भांजा है. मारुति-सुजुकी भी उसी रास्ते मज़दूरों को हतोत्साहित करने की फिराक़ में है. प्रबंधन की तरफ़ से अब तक बातचीत की कोई पहल नहीं हुई है. लेकिन आईटीआई करने के बाद ऑटोमोबाइल कारखाना में नौकरी बजाने वाले सारे मज़दूर यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें इग्नोर नहीं किया जा रहा. वे ब्रांड, विज्ञापन और मार्केटिंग के फंडे को समझते हैं. पिछले चार सालों से कंपनी में काम करने वाले अजय कहते हैं, हां यह ज़रूर है कि वो (प्रबंधन) सीधे-सीधे हमसे बात करने अब तक नहीं आए हैं, लेकिन अख़बारों में वो लगातार अपना विज्ञापन बढ़ा रहे हैं. इससे यह साबित होता है कि उन पर दबाव है.
अजय की बात को बीच में ही काटते हुए विजय कहते हैं, ज़्यादातर मीडिया के जरिए ही हम कंपनी का पक्ष जान पाते हैं. दैनिक जागरण ने हमे बताया है कि सोमवार तक यदि हम लोगों ने प्रबंधन की मांग नहीं मानी तो स्थाई तौर पर हमें अंदर जाने से रोक दिया जाएगा. प्रबंधन की इन धमकियों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा और मज़दूरों के बीच तक़रीबन एक तयशुदा सहमति है कि यदि उनकी मौजूदा एकता क़ायम रही तो प्रबंधन उनका कुछ नहीं कर सकता. वे यह जानते हैं कि मालिक सिर्फ़ पूंजी के बदौलत उत्पादन नहीं कर सकते. उत्पादन के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ मेहनत और मज़दूरी होती है और वो मज़दूरों के पास है.
अगर आप कई सारे अख़बारों में आ रही ख़बरों के सहारे मानेसर को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो मानेसर को समझना छोड़ दीजिए. अख़बारों ने तो बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखा है कि मारूति-सुजुकी प्लांट में मज़दूरों का हड़ताल चल रहा है, लेकिन यह ख़बर पूरी तरह झूठी है. यहां कोई हड़ताल नहीं चल रहा. मज़दूर अपने लोकतांत्रिक शर्तों के साथ काम करने को तैयार हैं, लेकिन मारूति ने ख़ुद तालाबंदी कर रखी है. मारूति का कहना है कि गुड कंडक्ट फॉर्म को जो-जो मज़दूर भरेगा वो अंदर आकर काम शुरू करें और जो नहीं भरेगा उनके लिए यह दरवाज़ा बंद है. मज़दूर प्राथमिक तौर पर इसी गुड कंडक्ट फॉर्मके ख़िलाफ़ है और सड़क पर डटे हुए हैं.
इस गुड कंडक्ट फॉर्म के साथ-साथ मारूति-सुजुकी मज़दूर आंदोलन की संक्षिप्त कहानी से पहले मज़दूरों के उन मांगों को आप देख लीजिए जिनको पूरी करवाने के लिए वो आधे महीने से कंपनी के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और जिनको तोड़ने-मरोड़ने के लिए कंपनी मालिक से लेकर ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार तक के सुर एक हैं. ये चार मांगें हैं.-
11. 1. मारुति सुजुकी इंप्लाइज यूनियन बहाल की जाए
2.22. निकाले गए मज़दूरों को वापस लिया जाए
3. 33. सभी चार्ज शीट वापस लिए जाए
4.44 ग़ैरक़ानूनी तालाबंदी ख़त्म की जाए
पहली मांग काफी पुरानी है और मौजूदा गतिरोध की सबसे मज़बूत वजह है. दूसरी, तीसरी और चौथी मांग कंपनी द्वारा पहली मांग को ध्वस्त करने के लिए की गई कार्रवाई से उपजी हुई है. जून में जब यूनियन बनाने के लिए मज़दूरों ने अपनी मांग शुरू की तो मारुति सुजुकी प्रबंधन के कान खड़े हो गए. प्रबंधन एक-एक मज़दूर को अलग-अलग बुलाकर अनुशासन के नाम पर नौकरी छीनने की धमकी देने लगा. मज़दूरों से प्रबंधन का कहना था कि वो पहले से मौजूद यूनियन को ही वास्तविक यूनियन माने. असल में प्रबंधन चालित एक यूनियन कंपनी में पहले से अस्तित्व में थी/है, जिसमें चुनिंदा मज़दूरों को शामिल किया गया था और वे मज़दूर नीतियों का कम और प्रबंधन की नीतियों का ज़्यादा प्रचार करते है. फ़िलवक़्त चल रहे आंदोलन के बारे में भी मलाई काट रहे वास्तविक यूनियन से जुड़े नेताओं का मानना है कि कंपनी में अनुशासनहीनतानहीं चल सकती.
रेवाड़ी के रहने वाले मज़दूर आनंद हमें बताते हैं, उस वक़्त मज़दूरों से एक पेपर पर हस्ताक्षर करने कहा गया जिसमें यह लिखा था कि मज़दूरों की तरफ़ से किसी नई यूनियन की कोई मांग नहीं है और भविष्य में भी उनकी इस तरह की कोई मांग नहीं होगी. प्रबंधन के उस बाध्यकारी हस्ताक्षर अभियान के ख़िलाफ़ मारूति कामगारों ने मोर्चा खोल दिया. मज़दूरों ने सोनू गुज्जर को अपना नेता मानते हुए प्रबंधन की नीतियों का विरोध किया. परिणामस्वरूप कंपनी ने 11 लोगों को नौकरी से बाहर निकाल दिया. मज़दूरों के इस दमनकारी निष्काषण के विरोध में मज़दूरों ने बेहतरीन एकता का प्रमाण देते हुए हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया और 13 दिनों तक चली उस हड़ताल के बाद समझौता हुआ. सभी 11 लोगों को वापस लिया गया. कंपनी ने उस समय यह भरोसा दिलाया कि अब वो किसी मज़दूर को नहीं धमकाएगी और न ही किसी को बाहर का रास्ता दिखाएगी. ये सब जून की कहानी है. एक तरह से शुरुआती लड़ाई में मज़दूर जीत चुके थे, लेकिन सवाल जहां से शुरू हुआ था वह वहीं पर ठहरा हुआ था. सवाल था- मज़दूर हितों की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाली यूनियन का निर्माण! जून की टकराहट का नतीजा यह हुआ कि अब तक मशीन से बनी जली-कच्ची रोटियों और पतली दाल पहले के मुकाबले कुछ बेहतर हुई. हालांकि जेएनयू के एक छात्र से मज़दूर दिनेश सेठी का कहना था, आप विद्यार्थी लोग आज भी उस रोटी को ताकेंगे नहीं. आपके कॉलेज (विश्वविद्यालय) में उस तरह की रोटियां एक दिन भी बन जाए तो आप लोग ऐसी कैंटीन वाले को बाहर कर देंगे.’
यूनियन की मांग जारी रही और साथ में कंपनी प्रबंधन की तरफ से मिलने वाली धौंस भी. हमेशा की तरह एक दिन 7 बजे जब मज़दूर काम करने कंपनी पहुंचे तो कंपनी पूरी तरह बदली हुई दिख रही थी. भीतर-बाहर पुलिस और निजी सुरक्षा गार्ड से अटी हुई कंपनी. बाहर गेट पर एक फॉर्म के साथ तैनात सुरक्षा गार्ड- जो मज़दूरों को यह हिदायत दे रहा है कि जो इस गुड कंडक्ट फॉर्मको भरेगा वही काम करने अंदर जाएगा. मज़दूरों ने वह फॉर्म भरने से इंकार कर दिया. बैठक हुई और सोनू गुज्जर के नेतृत्व में सबने यह फैसला किया कि न तो यूनियन की मांग छोड़ेंगे और न ही यह फॉर्म भरेंगे और न ही कंपनी छोड़ के जाएंगे. यशवंत प्रजापति कहते हैं, वह फॉर्म मज़दूर हितों के साथ बड़ा धोखा है. उसमें कंपनी कहती है कि मज़दूर कोई कंपनी विरोधी काम नहीं करेगा. प्रबंधन के साथ सही आचरण रखेगा......हां सही आचरण क्या है यह कंपनी ही तय करेगी.
मारुति सुज़ुकी इस तालाबंदी के लिए पहले से माहौल बना रही थी. कुछ दिन पहले से ही वह लगातार मज़दूरों को धमका रही थी कि वो जानबूझकर काम ठीक से नहीं कर रहे हैं और सुपरवाइजर उनके कामों में लगातार खोट निकाल रहे थे. मज़दूरों का दावा है कि कंपनी जान-बूझ कर मैटिरियल में कमी लाई और मज़दूरों पर यह आरोप लगाया कि वे सुस्त गति से और सोच-समझकर ख़राब उत्पादन कर रहे हैं. इसी को आधार बनाते हुए कंपनी धीरे-धीरे मज़दूरों को बाहर करने लगी. निकाले गए मज़दूरों की संख्या अब तक 57 हो गई है. तालाबंदी के बाद भी कंपनी द्वारा मज़दूरों का निकाला जाना जारी है.
प्रदर्शन स्थल पर जिला प्रशासन और लेबर कमीशन के लोग स्थिति का जायजा लेने आए, लेकिन उनकी पक्षधरता साफ़ थी. सोनू गुज्जर ने लेबर कमिश्नर के साथ हुई बातचीत का मजमून रखते हुए कहा कि उन्होंने निकाले गए 57 मज़दूरों को पहले बिल्कुल भूल जाने को कहा, लेकिन बाद में कहा कि छह माह बाद निकाले गए मज़दूरों को वापस लिए जाने पर विचार किया जाएगा. उन्होंने यह भी समझाइश दी कि यूनियन बनाकर क्या होगा, पहले से मौजूद यूनियन के बैनर तले ही वे अपनी मांगों को मज़बूती से रखे. सोनू गुज्जर के साथ बातचीत से पहले लेबर कमिश्नर को शायद यह तथ्य पता नहीं होगा कि बीते 16 जुलाई को पुरानी यूनियन का चुनाव हुआ था और 2500 मज़दूर संख्या वाली इस कंपनी में 20 से भी कम लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया. प्रबंधन वाली यूनियन की असलियत ऊघर के सामने आ गई है.
राज्य सरकार को मारुति ने धमकाया है कि अगर समाधान उनके पक्ष में नहीं रहता है तो वे प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे. मुख्यमंत्री हुड्डा साहब इस धमकी से घबराए हुए हैं. लेकिन, मारुति सुज़ुकी की पिछली कुछ घोषणाओं और कामों पर नज़र दौड़ाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि उनकी धमकी में बहुत दम नहीं है. मारुति ने मानेसर में इस प्लांट के अलावा दो और नए प्लांट पर काम करना शुरू कर दिया है. कुछ दिन पहले तक गुड़गांव वाले प्लांट को भी वे मानेसर लाने की बात कह रहे थे. वह सिर्फ मज़दूर हड़ताल की वजह से गुजरात नहीं भाग सकती. यह दबाव बनाने का प्रोपगैंडा है. सोनू गुज्जर इस प्रचार की असलियत जानते हैं, कंपनी कोई थाली नहीं है कि हाथ में उठाए और बस में सवार होकर गुजरात चल दिए. कंपनी कंपनी होती है.
यूनियन बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मारुति के भीतर जो स्थिति थी उससे निजात पाने के लिए इसका गठन होना बहुत ज़रूरी हो चला था. चार्ली चैपलिन की मॉडर्न टाइम्स जिसने देखी है वो कंपनी के भीतर काम करने के तरीके को बेहतर समझ पाएंगे. एक मज़दूर अपना पसीना पोछने के लिए हाथ उठाए तो चलती पट्टी के दो नट-वोल्ट कसने बच जाएंगे और उस दो-तीन सेकेंड की भरपाई में उसे तेजी से हाथ-पैर मारने होंगे. मारुति सुजुकी हर 45 सेकेंड में एक कार तैयार करती है. दिनभर में यहां 1200 कारें बनती हैं. मज़दूरों को दो बार चाय पीने के लिए 7-7 मिनट का वक़्त मिलता है, जिसमें उन्हें हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और मशीनी औज़ार स्टोर में रखने भी होते हैं, फिर पंचिंग कार्ड के जरिए कैंटीन भी जाना होता है फिर कतार में खड़े होकर चाय भी लेनी होती है, पीनी भी होती है और फिर हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और तमाम लाव-लश्कर से लैश होकर काम शुरू कर देना होता है. इसमे एक सेकेंड की भी देरी बर्दाश्त नहीं है. याद कीजिए कि मॉडर्न टाइम्स में जब चार्ली को बीड़ी पीने की तलब होती है और वो छुपकर बीड़ी सुलगाता है तो सामने स्क्रीन पर उसका मैनेजर उसे रंगे हाथों पकड़ लेता है और ज़ोर से फटकारता है. बिल्कुल यही माहौल मारुति के भीतर भी है. लंच के लिए आधा घंटा दिया जाता है.
काम दो शिफ्ट में होता है. सुबह 7.30 से शाम 3.45 तक पहला शिफ्ट और शाम 3.45 से लेकर रात 12.30 तक दूसरा शिफ्ट. अगर मज़दूर 7.31 बजे सुबह पहुंचा तो उसका हाफ डे लग जाएगा. रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति मज़दूरों को बताता है कि चूंकि पंचिंग कार्ड के जरिए अंदर आने और जाने का वक़्त नोट किया जाता है इसलिए एक सेकेंड की भी देरी होने पर कंप्यूटर उसे पकड़ लेता है और देरी से आने का खामियाजा मज़दूरों को भुगतना पड़ता है. कितनी मासूम दलील है! मशीन का अपने पक्ष में इस्तेमाल की इस बानगी के क्या कहने! एक दूसरा पक्ष सोचते हैं. पिछले कुछ महीनों की लड़ाई के बाद कंपनी में यह नियम बना कि मज़दूरों को ला रही बस में अगर देरी होती है तो उस देरी को कन्सीडर नहीं किया जाएगा. बस लेट होने पर भी मज़दूर पंचिंग कार्ड के जरिए ही अंदर जाते हैं और कंप्यूटर में ही वो समय भी दर्ज होता है. कंप्यूटर इस देरी को नहीं पकड़ता? प्रबंधन की बेईमान व्याख्या की यह एक नज़ीर मात्र है. बस में होने वाली देरी का भी कंपनी खामियाजा वसूलती है, लेकिन भुक्तभोगी पहले शिफ्ट में काम कर रहे मज़दूर बनते हैं. अगर बस लेट हो गई तो पहले वाली शिफ्ट को उस समय तक काम करना पड़ेगा जब तक बस नहीं आ जाती और इसका कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा. ओवरटाइम सिर्फ तब मिलेगा जब बस आने के बाद भी मज़दूरों से कंपनी काम जारी रखे.
एक छुट्टी पर मज़दूरों के 1200 रुपए कट जाते हैं और तीन-चार छुट्टियों पर आधे महीने का पैसा. कोई सिक लिव नहीं. बीमार होने पर कुछ अस्पताल तय किए गए है सिर्फ उन्हीं में इलाज कराने के एवज में कुछ फ़ीसदी भुगतान किए जाते हैं. बाक़ी अस्पतालों में ईलाज पर कोई भुगतान नहीं होता. फिर अस्पताल बिल की गहरी जांच होती है कि बिल का पैसा कितना वास्तविक है कितना नहीं. मारुति को अगर लगे कि टायफाइड 1500 रुपए में ठीक हो सकता है तो डॉक्टरी चक्कर में 15,000 लुटाने के बावज़ूद मज़दूरों को 1500 रुपए का ही आधा या आधे से ज़्यादा पैसों का भुगतान किया जाएगा.
मज़दूरों को शुरुआती तीन साल प्रशिक्षण में गुजारने होते हैं और इस दौरान क्रमश: 7, 8 और 9 हज़ार का वेतन दिया जाता है. प्रशिक्षण ख़त्म होने पर वेतन 16,000 रुपए है. इसके बाद ही मज़दूरों को मतदान का अधिकार मिल पाता है. मौजूदा प्रतिरोध को हतोत्साहित करने के लिए मारुति ने यह दावा किया है कि यदि सोमवार तक सारे मज़दूर गुड कंडक्ट फॉर्म भरने को तैयार नहीं होते तो सारे मज़दूरों को बर्खास्त कर दिया जाएगा और कंपनी नए मज़दूरों को बहाल करेगी. 2500 मज़दूरों में से अब तक सिर्फ 20-30 लोगों ने ही यह फॉर्म भरा है और अंदर जाने के हक़दार बने हैं. जाति-धर्म के आधार पर भी मज़दूरों को बांटने की कोशिश हो रही है. प्रबंधन के लोग ऐसे मज़दूरों की तलाश में रहते हैं जो समान जाति और धर्म वाले हों. उन्हें जाति का हवाला देकर पक्ष में करने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन मज़दूरों ने नारा बुलंद किया है कि वे ऐसी हर कोशिश को नाकाम करेंगे. उनका मानना है कि उनकी एक ही जाति और धर्म है और वो है उनका मज़दूर होना. मारुति ने दावा किया है कि बीते 1 सितंबर को उसने कुछ नए लोगों के सहारे 80 कार बनाकर बाज़ार में उतारा है. मज़दूरों का मानना है कि अव्वल तो यह मुश्किल है कि बिना ट्रेंड मज़दूरों के सहारे कंपनी इतनी कारें बना लें. दूसरा अगर कंपनी ने रिस्क लेते हुए यह काम किया भी है तो सड़क पर वे गाड़ियां दुर्घटना की बारंबारता को और बढ़ाने में मदद करेगी क्योंकि सही गुणवत्ता को परख पाना नए लोगों के लिए टेढ़ी खीर है. सड़क दुर्घटना की गंभीरता को दिखाती एक रिपोर्ट का मैं ज़िक्र करना चाहूंगा जिसमें कहा गया है कि बीती सदी में सबसे ज़्यादा मौत ऑटोमोबाइल से होने वाली दुर्घटनाओं से हुई है (रिपोर्ट मिलने पर उपलब्ध कराउंगा).
इस समय मानेसर का यह पंडाल मज़दूर आंदोलन का सबसे गरम पंडाल है. यहां के मज़दूरों में ग़ज़ब की ऊर्जा है. जब नारे लगते हैं और सड़क के उस पार मारुति-सुजुकी के प्लांट की भीतरी दीवारों से टकराकर आवाज़ वापस लौटती है तो उस गूंज को सुनकर मज़दूर और ज़ोर का हुंकार भरते हैं. एक थकता है तो दूसरा माइक थाम लेता है. इस तरह दो शिफ्ट में लोग लगातार जमे रहते हैं. कंपनी की तरह यहां भी एटैंडेंस लगता है ताकि मज़दूरों को पता चल सके कि कितने लोग सक्रिय तौर पर उनके साथ हैं और कितने टूट रहे हैं और कितने दलाल बन रहे हैं, बिक रहे हैं. यहां सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक एक शिफ्ट और शाम 7 से सुबह 7 तक दूसरी शिफ्ट में मज़दूर मोर्चा संभाले रहते हैं. यहां सोनू नाम के कई मज़दूर हैं. कम से कम तीन से तो मैं ही मिला. जो दूसरा सोनू है वह सोनू गुज्जर के भाषणों के बीच में लोगों के बीच जोश भरने के लिए जोरदार नारे लगाता रहता है. लगातार. बिना थके.
सोनू गुज्जर ने बताया है कि मानेसर और गुड़गांव के 40-50 कंपनियों की लीडरशिप ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है और गुड़गांव चक्का जाम में वे उनके साथ आएंगे. कुछ सांसदों का भी उन्हें समर्थन हासिल है. सोनू ने कहा कि उन लोगों ने 14 दिनों तक गांधी बन कर देख लिया है, अब ज़रूरत पड़ेगी तो भगत सिंह भी बनेगे. मज़दूरों को उन्होंने याद दिलाया कि भगत सिंह को 23 साल की उम्र में फांसी हो गई थी और उनके यहां तक़रीबन सारे मज़दूर 23 वर्ष से ज़्यादा के हैं. इसलिए इतिहास को यदि दोहराना होगा तो दोहराएंगे. झुकेंगे नहीं.
सोनू गुज्जर ने मज़दूरों और मज़दूर हित में रहने वाले सभी लोगों से यह आह्वान किया है - लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाएं.