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04 फ़रवरी 2013

विश्वरूपम बवालिया नहीं सवालिया फ़िल्म है


-दिलीप खान
आतंकवाद के मसले पर जिस ट्रीटमेंट के साथ देश में फ़िल्में बनती रही हैं, विश्वरूपम उससे अलग नहीं है। हमें एक अदद अभिनेता की दरकार होती है जो पहले दूसरे रूप धड़कर अपनी मासूमियत से लोगों को मोहे और फिर अचानक फुर्तीले, गठीले और बहादुर बनते हुए हमें अपनी ग़लती का एहसास वो हॉल में ताली बजवाकर करवाएं। किसी देश के इंटेलिजेंस अधिकारी के किरदार को फ़िल्मों ने ज़्यादातर इसी रूप में हमारे सामने पेश किया है। ऐसी फ़िल्मों को देखते हुए दर्शकों की जो कुल भावना विकसित होती है उसकी दिशा अभिनेता के मायावी होने की ओर केंद्रित रहती है, राजनीतिक विषयों पर ध्यान नहीं जाता। मार-धाड़-एक्शन से भरपूर थ्रिलर फ़िल्मों में तो दर्शक चकित-चौकन्ने होकर अभिनेता के करतब देखता है। मसलन उनका अभिनेता कठिनतम क्षणों में भी हार नहीं मानेगा, वो 50-60 लोगों को कभी भी चित्त कर सकता है और ख़ासकर अगर फ़िल्मों में दक्षिण भारतीय टच ज़रा-सी भी रह जाए तो हीरो का फ़ौलाद में तब्दील होना लाजिमी है। 
विश्वरुपम फ़िल्म का एक दृश्य
बॉलीवुड में ये गौरव सन्नी देओल और उनके पिताश्री धर्मेंद्र सहित बहुत कम लोगों को हासिल है। कमल हासन इस फ़िल्म के भीतर रॉ के अधिकारी हैं और हिंदी के अलावा मूल रूप से फ़िल्म तमिल में बनाई गई है तो ऊपर के सारे गुणों को अपने भीतर समेटे पर्दे पर वो नमूदार होते हैं। स्त्रैण व्यवहार के साथ कृष्ण और गोपी वाले गाने में नाचते हुए वो जब पहली बार फ़िल्म में दिखते हैं तो तालियां बजती हैं। डॉ निरुपमा (पूजा कुमार) का ऑफ़िस में अफ़ेयर है और उसको शक रहता है कि उनके पति विश्वनाथ (कमल हासन) की ज़िंदगी भी बिना किसी अफ़ेयर के नहीं चलती होगी, चाहे वो औरत के साथ हो या फिर किसी मर्द के साथ।  

तो, सबकुछ पारिवारिक नोंक-झोंक व शक-सुबहा के इर्द-गिर्द चलता रहता है और इसी क्रम में पत्नी एक प्राइवेट जासूस कमल हासन के पीछे लगा देती है। होता कुछ ख़ास नहीं है बुद्धू से दिखने वाले विश्वनाथ को पता चल जाता है कि पत्नी ने उसके पीछे जासूस छोड़ रखा है जो खोजी कुत्ते की तरह उसके पीछे चिपका हुआ है। शेखर कपूर की सलाह पर कमल हासन उससे पीछा छुड़ाने के लिए तेज दौड़ लगाता है और एक दीवार की ओट से चकमा देकर उसी दिशा में वापस भाग लेता है। अब एक नौसिखिए की तरह वो जासूस सामने की इमारत में ताक-झांक करता है और फिर जो कुछ होता है, फ़िल्म की असल शुरुआत भी वहीं से होती है। इमारत से निकलने वाला आदमी जासूस के सर पर ज़ोर से लोहे का सरिया दे मारता है और बाद में पड़े कुछ और चोटों से उसकी मौत हो जाती है। असल में वो इमारत उमर (राहुल बोस) की प्रयोगशालानुमा जगह है जहां आतंकी गतिविधियों को उनके शागिर्द अंजाम देने का हुनर सीखते हैं। 

अब यहां से घटनाओं की कड़ियां जुड़ती चली जाती हैं। जासूस की डायरी से क्लाइंट का नाम पता हासिल करने के बाद अंतत: पत्नी के बॉस-कम-प्रेमी दीपक के रास्ते विश्वनाथ  और डॉ निरुपमा आतंकियों के कब्जे में आते हैं। और यहीं पर निरुपमा के साथ-साथ दर्शकों को पहली बार पता चलता है कि कमल हासन असल में है कुछ और ही बला। वो सिर्फ़ घूंघरू बांध के नाचता नहीं है बल्कि दर्ज़नों लोगों को अकेले मारकर बिल्कुल हीरो की माफिक पिछले दरवाज़े से पत्नी के साथ भाग लेता है। उमर (राहुल बोस) कमल हासन को पहचानता है और यही पहचान दिखाने के लिए फ़िल्म फ्लैशबैक में चली जाती है। फिर अमेरिका से निकलकर फ़िल्म सीधे अफ़गानिस्तान में आ गिरती है। फ़िल्म में भारत कहीं नहीं है। है तो सिर्फ़ अमेरिका और अफ़गानिस्तान। ज़िक्र में भारत भी है, पाकिस्तान भी, नाइजीरिया भी और कुछ और देश भी। भारतीय ज़मीन पर तो विश्वरूपम-2 उतरेगी जिसकी मुनादी फ़िल्म के बिल्कुल आखिर में की जाती है। ख़त्म होने के बाद। तो, रहस्योद्घाटन ये होता है कि कमल हासन ने उमर (राहुल बोस) के साथ अल-क़ायदा में साथ-साथ काम किया है।  
कश्मीर के मुजाहिद के तौर पर कमल हासन का नया परिचय हमें मालूम होता है और नया नाम भी- विसाव अहमद कश्मीरी। ये भी पता चलता है कि उसके पिताजी उससे भी बड़े मुजाहिद थे। विसाव अहमद कश्मीरी (हासन) के नाम पर 5 लाख रुपए (शायद रुपए ही) का ईनाम भारत सरकार ने घोषित कर रखा है ये पोस्टर पूरी फ़िल्म में दो-तीन बार स्क्रीन पर चमकता है। और कहानी यही कहती है कि ईनामी आतंकवादी होने की वजह से भारत छोड़कर वो अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के साथ जुड़कर कुछ अलग करना चाहता है। राहुल बोस अल-क़ायदा से जुड़ा है। हासन उसके पास पहुंचता है और पहली मुलाक़ात में ही ये साबित करता है कि वो न सिर्फ़ शानदार लड़ाका है बल्कि लोगों को जानने-पहचानने का भी उसमें बेहद बारीक हुनर है। अल-क़ायदा के लड़ाकों को प्रशिक्षित करने के क्रम में ही वो उमर यानी राहुल बोस के काफ़ी करीब हो जाता है। वो उमर से अमेरिकी बंधकों का ठिकाना जानना चाहता है, अल-क़ायदा के लड़ने के तरीके जानना चाहता है और ये भी जानना चाहता है कि अफ़गानी उमर को हिंदी बोलना कैसे आता है? इस दौरान छोटी-छोटी घटनाओं के आइने से ये दिखाया गया कि हासन के भीतर बर्बरता का एलिमेंट मुजाहिद बनने के हिसाब से कम है। 
अल-क़ायदा के मुजाहिद उमर की भूमिका में राहुल बोस

बहरहाल, मैं यहां पूरी कहानी लिखने की बजाय फ़िल्म से निकल रहे संदेश पर बात करना पसंद करूंगा। फ़्लैशबैक से तीन-चार इस्तेमाल से अलग-अलग सेगमेंट में बंटे विश्वरूपम में दर्शकों के सामने खुलासा होता है कि कमल हासन न तो सामान्य गृहस्थ है और न ही आतंकवादियों के गुट का कोई लड़ाका, बल्कि वो भारतीय खुफ़िया एजेंसी का कोई अधिकारी है। एक जांबाज अधिकारी! और अल-क़ायदा के भीतर सेंधमारी कर वो उसे भीतर से नष्ट करने की तैयारी में था। उसी क्रम में जब हासन सा’ब उमर से सवाल पूछते हैं कि उसने हिंदी कहा सीखी, तो जवाब मिलता है- अयोध्या, मुंबई, कश्मीर और मालेगांव के दौरे से। फ़िल्म को विशुद्ध मनोरंजन मानने वाले लोगों को ऐसे डॉयलॉग से कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन जब फ़िल्मों में किसी वास्तविक जगह और घटनाओं का ज़िक्र होता है तो उसे पेश करने में राजनीतिक ईमानदारी बरतनी चाहिए। उमर के जवाब से ये ध्वनित होता है कि इन जगहों पर अल-क़ायदा ने आतंकी वारदातों को अंजाम दिया और उसी मिशन को पूरा करने के लिए वो गलियों की खाक छानते रहे और हिंदी सीख ली। यानी अयोध्या में जब-कभी (याद है न कब?) जो-कुछ हुआ उसके लिए अल-क़ायदा और मुस्लिम ज़िम्मेदार है और मालेगांव में भी। विश्वरूपम के रिलीज होने से महीनों पहले कोर्ट का (जिस पर लोग यक़ीन करते हैं) फ़ैसला आ गया कि मालेगांव धमाके में पकड़े गए 9 मुस्लिम निर्दोष हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एंड कंपनी ने उस धमाके में संलिप्तता पर अपनी सहमति जाहिर की है। फ़िल्म में कई जगह ऐसी चालाकियां बरती गई हैं।

फ़िल्म साल 2011 आस-पास चलती है, जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और अफ़गानिस्तान पर हमले को जायज ठहराने वाला सबसे बड़ा प्रमाणपत्र ओसामा-बिन-लादेन मारा जाता है। फ़िल्म के शुरुआती कुछ दृश्यों में ओबामा को टीवी पर भाषण देते दिखाया जाता है और विश्वरूपम इसी से काल को भी स्थापित करता है। फ़िल्म के भीतर ये दिखाया गया है कि दुनिया भर के मुस्लिम आतंकवादी एक-दूसरे से गहरे नेटवर्क के साथ जुड़े हैं और अफ़गानिस्तान में लगभग हर घर में बम-बारूद-बंदूक का जखीरा है और लोग धर्म के नाम पर ही मर-मिटने को तैयार हैं। वे बंदूक चलाते हैं धर्म के नाम पर, हत्या करते हैं धर्म के नाम पर और धर्म के नाम पर खुद को उड़ा लेना चाहते हैं। सबकुछ धर्म तय कर रहा है। 9/11 कब का बीत चुका है और लादेन को ढूंढने के लिए अमेरिका और नाटो ने अफ़गानिस्तान को गर्द में तब्दील कर दिया है। लेकिन नहीं, वे सिर्फ़ लादेन को ही नहीं ढूंढ रहे हैं बल्कि अपने बंधक सैनिकों को बचाने के लिए वो बम फोड़ते हैं। नाटो की ज़्यादातर कोशिश ‘निर्दोषों’ को गुफा से बाहर निकालकर दुनिया की रोशनी दिखाने की है। और, भारत उसका सक्रिय सहयोगी है। अफ़गानिस्तान का मिशन नाटो ने भारतीय मदद से जारी रखी है। 

फ़िल्म ये भी दिखाती है कि अफ़गानिस्तान में अभी नाटो के रहने की कितनी ज़रूरत है! [अब ये तथ्य दिमाग में मत लाइए कि 2014 तक सैन्य वापसी की बात अमेरिका सहित नाटो कर रहे हैं क्योंकि फ़िल्म ने शुरुआत में ही घोषणा कर दी है कि वो काल्पनिकता की डोर थामे हैं। ये भी दिमाग़ में मत लाइए कि हॉलीवुड की कई फ़िल्में सिर्फ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद को लोकप्रिय संस्कृति के जरिए वैधता देने के लिए बनाई गईं।] फ़िल्म की माने तो ये वापसी वैश्विक शांति के लिए ग़लत साबित होगी। संक्षेप में कहें तो विश्वरूपम ‘वॉर ऑन टेरर’ की अमेरिकी मुहिम को जायज ठहराने के लिए मनोरंजक तरीके से जनमत निर्माण करती है। 

राहुल बोस एक अच्छे अभिनेता हैं इस स्थापना को इस फ़िल्म के मार्फ़त कुछ और अंक हासिल कर उन्होंने मज़बूत किया है। डॉ. निरुपमा की भूमिका में पूजा कुमार को देखकर बरबस चक्रव्यूह फ़िल्म की रिया मेनन (एशा गुप्ता) याद आएगी जिन्हें पता ही नहीं कि भोलेपन को भी किस भोलेपन के साथ निभाना होता है। शेखर कपूर और कमल हासन बड़े नाम हैं और एक्टिंग के जरिए उन्होंने निराश भी नहीं किया। फ़िल्म में ख़र्चा हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि बुढ़ाते कमल हासन को स्टंट कराते दिखाने में ही काफ़ी मेहनत और धन जेब से निकल गया होगा। एडिटिंग बहुत अच्छी नहीं है, दो-तीन जगह तो जर्क साफ़-साफ़ पता चल रहा था और हिंदी का जो प्रिंट हमने देखा वो शायद बिना कट के रिलीज हुई फ़िल्म थी, तो वास्तविक एडिटिंग में ही कोई गड़बड़ी है। 

ये फ़िल्म मिक्स फ्रूट चाट है। इसमें दबंग भी है, ए वेडनसडे भी, रोजा भी और द हीरो भी। रिलीज होने पर बवाल उन लोगों ने काटा होगा जिन्हें इससे पहले की फ़िल्मों के बारे में कोई जानकारी नहीं रही होगी। जो भारतीय फ़िल्म परंपरा से परिचित हैं वो काहे को बवाल काटे भई! नमाज अता कर बम फोड़ना है, फोड़ो। फ़िल्म देखने आप जाएंगे तो पाएंगे कि रॉ के अधिकारी विश्वनाथ (कमल हासन) इतने जांबाज हैं कि समूची एफ़बीआई को अकेले हैंडल करते हैं, अपने इशारों पर नचाते हैं और पूरी फ़िल्म में हैरान-परेशान रहने वाली अपनी पीएच.डी पत्नी के साथ मिलकर अमेरिका को नाभिकीय बम (सिसमिक बम) के प्रकोप से बचा डालते हैं। जाहिर है इतने बहादुर प्रोटैगोनिस्ट अगर निर्माता-निर्देशक और कहानीकार की जेब में हो तो फ़िल्म का सीक्वल ज़रूरी है। तो, अमेरिका को बचाने की अपार सफ़लता के बाद अगली फ़िल्म में विश्वरूपम साहब भारत में होंगे और भारत को बचाएंगे। इंतज़ार कीजिए विश्वरूपम-2 का दबंग-2, रेस-2, जिस्म-3 के माफ़िक। 

04 मई 2011

ओसामा बिन लादेन की दूसरी मौत: एक नाटक की गंध

ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबरें अनेक सवालों पर फिर से ध्यान खींचती हैं. इनमें सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश में अवैध-अनैतिक-अमानवीय फौजी कार्रवाइयों का अधिकार है. ऐसे हमले के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लादेन, कथित तौर पर, उन हमलों के लिए जिम्मेदार था, जिनमें 3 हजार से अधिक लोगों की मौतें हुईं. इन हमलों और हमलावरों की वास्तविकताओं पर किये जानेवाले मजबूत संदेहों को छोड़ भी दें तब भी अगर बेगुनाह लोगों की हत्याओं का जिम्मेदार होना ही ऐसे हमलों के लिए वाजिब कारण है तब तो सारे हत्यारे बुशों और ओबामाओं को सैकड़ों बार गोलियों से मारना पड़ेगा. यूनियन कार्बाइड के मुखिया और भोपाल गैस जनसंहार में मारे गये बीसियों हजार लोगों और दो दशकों में इसकी पीड़ा अब भी भुगत रहे लाखों लोगों के अपराधी वारेन एंडरसन को किसने पनाह दी है ? उसे कौन बचा रहा है? 2009 से लेकर अब तक श्रीलंका में लाखों तमिल निवासियों के कत्लेआम के दोषी राजपक्षे की मदद किसने की और अब भी उसकी पीठ पर किसका हाथ है? विदर्भ में पिछले 15 वर्षों में 2.5 लाख से अधिक किसानों की (आत्म)हत्याओं के लिए जो (निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की) नीतियां जिम्मेदार हैं, उन्हें किसने बनाया और उन्हें कौन लागू कर रहा है? इराक में पिछले दो दशकों में प्रतिबंधों और युद्ध में जो 14 लाख 55 हजार से अधिक लोग मारे गये हैं, उनके लिए कौन जिम्मेदार है? पूरी दुनिया में लगातार युद्ध, प्रतिबंधों और सरकारी नीतियों के जरिए लोगों की जिंदगियों में संस्थागत हिंसा घोल रही साम्राज्यवादी नीतियां आखिर कौन लोग बनाते और थोपते हैं. अमेरिकी साम्राज्यवादी और उसके सहयोगी देश. इनके द्वारा की गयी हत्याएं 11 सितंबर को मारे गए लोगों की संख्या से सैकड़ों गुना अधिक हैं. इन्हें क्यों नहीं सजा मिलती? कब मिलेगी इन्हें सजा? फिर इन्हें क्या अधिकार है दूसरों को आतंकवादी कहने और मारने का?

इन सब सवालों के जवाब दुनिया की जनता खोज भी रही है और दे भी रही है. साम्राज्यवाद का ध्वस्त होना लाजिमी है. अपने इन हताशा में उठाये कदमों के जरिए ही वह अपने अंत के करीब भी आ रहा है. उसकी जीत का एक-एक जश्न, उसकी कामयाबी का एक-एक ऐलान उसकी कमजोरी और भावी अंत की ओर भी संकेत कर रहा है. ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबर को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए. अमेरिकी अर्थशास्त्री, वाल स्ट्रीट जर्नल और बिजनेस वीक के पूर्व संपादक-स्तंभकार, अमेरिका की ट्रेजरी फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी के सहायक सचिव पॉल क्रेग रॉबर्ट्स बता रहे हैं कि कैसे हत्या की इस खबर का सीधा संबंध विदेशी मुद्रा और व्यापार बाजार में डॉलर की पतली होती हालत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल होती जा रही स्थिति से है. इन्फॉर्मेशन क्लियरिंग हाउस की पोस्ट. हाशिया का अनुवाद.


 अगर आज 2 मई के बजाय 1 अप्रैल होता तो हम ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने और तत्काल समुद्र में बहा दिये जाने को अप्रैल फूल के दिन के मजाक के रूप में खारिज कर सकते थे. लेकिन इस घटना के निहितार्थों को समझते हुए हमे इसे इस बात के सबूत के रूप में लेना चाहिए कि अमेरिकी सरकार को अमेरिकियों की लापरवाही पर बेहद भरोसा है.

जरा सोचिए. एक आदमी जो कथित रूप से गुरदे की बीमारी से पीड़ित हो और जिसे साथ में डायबिटीज और लो ब्लड प्रेशर भी हो, और उसे डायलिसिस की जरूरत हो, उसकी एक दशक तक खुफिया पहाड़ी इलाकों में छुपे रह सकने की कितनी गुंजाईश है? अगर बिन लादेन अपने लिए जरूरी डायलिसिस के उपकरण और डाक्टरी देख-रेख जुटा लेने में कामयाब भी हो गया था तो क्या इन उपकरणों को जुटाने की कोशिशें इस बात का भंडाफोड़ नहीं कर देतीं कि वह वहां छुपा हुआ है? फिर उसे खोजने में दस साल कैसे लग गए?

बिन लादेन की मौत का जश्न मना रहे अमेरिकी मीडिया के दूसरे दावों के बारे में भी सोचें. उनका दावा है कि बिन लादेन ने अपने दसियों लाख रुपए खर्च करके सूडान, फिलीपीन्स, अफगानिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर खड़े किए, ‘पवित्र लड़ाकुओं’ को उत्तरी अफ्रीका, चेचेन्या, ताजिकिस्तान और बोस्निया में कट्टरपंथी मुसलिम बलों के खिलाफ लड़ने और क्रांति भड़काने के लिए भेजा. इतने सारे कारनामे करने के लिए यह रकम तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है (शायद अमेरिका को उसे पेंटागन का प्रभार सौंप देना चाहिए था), लेकिन असली सवाल है कि बिन लादेन अपनी रकम भेजने में सक्षम कैसे हुआ? कौन-सी बैंकिंग व्यवस्था उनकी मदद कर रही थी? अमेरिकी सरकार तो व्यक्तियों और पूरे के पूरे देशों की संपत्तियां जब्त करती रही है. लीबिया इसका सबसे हालिया उदाहरण है. तब बिन लादेन की संपत्ति क्यों जब्त नहीं की गयी? तो क्या वह 100 मिलियन डॉलर की अपनी रकम सोने के सिक्कों के रूप में लेकर चलता था और अपने अभियानों को पूरा करने के लिए दूतों के जरिए रकम भेजता था?

मुझे इस सुबह की सुर्खियों में एक नाटक की गंध आ रही है. यह गंध जीत के जश्न में डूबी अतिशयोक्तियों से भरी खबरों में से रिस रही है, जिनमें जश्न करते लोग झंडे लहरा रहे हैं और ‘अमेरिका-अमेरिका’ का मंत्र पढ़ रहे हैं. क्या ऐसी कोई घटना सचमुच हो रही है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा को जीत की बेतहाशा जरूरत है. उन्होंने अफगानिस्तान में युद्ध को फिर से शुरू करके मूर्खतापूर्ण गलती की और अब एक दशक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका अगर हार नहीं रहा तो अपने आप को गतिरोध में फंसा हुआ जरूर पा रहा है. बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं.

पिछली अनेक सरकारों द्वारा ‘व्यापक संहार के हथियारों’ जैसे तरह-तरह के झूठों और हथकंडों का नतीजा अमेरिका और दुनिया के लिए बहुत भयानक रहा है. लेकिन सभी हथकंडे एक तरह के नहीं थे. याद रखें, अफगानिस्तान पर हमले की अकेली वजह बतायी गयी थी- बिन लादेन को पकड़ना. अब ओबामा ने ऐलान किया है कि बिन लादेन अमेरिकी विशेष बलों द्वारा एक आजाद देश में की गयी एक कार्रवाई में मारा गया है और उसे समुद्र में दफना दिया गया है, तो अब युद्ध को जारी रखने की कोई वजह नहीं रह गयी है.

शायद दुनिया के विदेश विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट ने कुछ वास्तविक बजट कटौतियों के लिए मजबूर किया है. यह सिर्फ तभी मुमकिन है जब अंतहीन युद्धों को रोका जाए. ऐसे में जानकारों की राय में बहुत पहले मर चुके ओसामा बिन लादेन को डॉलर के पूरी तरह धूल में लोट जाने से पहले एक उपयोगी हौवे के रूप में अमेरिकी फौजी और सुरक्षा गठजोड़ के मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया गया.

10 फ़रवरी 2011

मूल निवास की राजनीति का दूसरा चेहरा

अनुज शुक्ला-
अमेरिका में पिछले हफ्ते इमिग्रेशन अधिकारियों ने वीज़ा क़ानून के उल्लंघन के आरोप में वैली विश्वविद्यालय के 18 भारतीय छात्रों के पैरों में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिए थे ताकि उनकी हरकत पर नज़र रखी जा सके। यह दुर्व्यहार संबंधी एक नया मामला है जो मध्य पूर्व एशिया में जारी गतिरोध के कारण मीडियाई बहसों में नहीं उभर पाया। बहरहाल इसे यूरोप में जारी अमानवीयता की श्रृंखला की नई कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए । एशिया और अफ्रीका जैसे तीसरी दुनिया के नागरिकों के साथ यूरोपीय देशों में ऐसा व्यावहार होता आया है। अमेरिका वैश्वीकरण की प्रक्रिया को स्थापित करने वाला बड़ा संवाहक है जो विश्वग्राम की सोच को तो जरूर स्थापित कर रहा है, बावजूद इसके कि रेसलिज़्म सोच अभी तक परिवर्तित नहीं की जा सकी। दुनिया में किसी दूसरे देश के मुक़ाबिल फ्रांस को ज्यादा प्रगतिशील माना जाता है । फिर भी यह बार- बार देखने में आता है कि फ्रांस में गैर फ्रांसीसी धार्मिक और क्षेत्रीय प्रतीकों को लेकर हमेशा तनाव का माहौल बना रहता है। अमेरिका, कनाडा, इग्लैंड और आस्ट्रेलिया में दाढ़ी, पगड़ी, और बुर्का जैसे सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक महत्त्व के प्रतीक हमेशा ही संदेहास्पद स्थिति में देखे जाते हैं। जबकि ‘लोकतान्त्रिक पूंजीवादी व्यवस्था में इंडीजेनस से अलगाव को लेकर ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को मौजूद रखने की परंपरा का निर्वहन किया जाता है’। ऐसा नहीं है कि यह 9\11 के तथाकथित इस्लामिक आतंकी हमले के बाद होता आया है, बल्कि यूरोप में धार्मिक अस्मिता के करिश्माई प्रभाव को लेकर अतीत में कई प्रकार के संघर्ष होते रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध की विभीषिका के आधार में तो क्षेत्रीय, नस्लीय और धार्मिक प्रभुसत्ता एक बड़ा कारक साबित हो चुकी है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या वाकई मौजूदा मामला भी इन्हीं कारकों के मूल से जुड़ा हुआ है या इसके तार कहीं और जाकर जुड़ते हैं? मौजूदा मामला अन्य दूसरे पक्षों की पड़ताल की अपेक्षा करता है।
दरअसल वैली विश्वविद्यालय जैसे प्रकरणों के मूल में पहली दुनिया और तीसरी दुनिया को परस्पर देखने, समझने के दृष्टिकोण की है। अपने खुद के हित के टकराव की भी। जाहिर है राजनीति के अलावे आर्थिक हित भी होंगे। उदारीकरण के बाद यूरोप में एशियाईयों के साथ होने वाले दुर्व्यहार को, डायस्पोरा में व्याप्त अंतरसंघर्ष से जोड़कर देखा जाता है। तर्क दिया जाता है कि यूरोप में शिक्षाटन के लिए कौन लोग जाते हैं? जाहिर सी बात है कि इसमें वे अधिकांश लोग महानगरों के उस समाज से होते हैं जो काले शीशे वाली गाड़ियों में महिलाओं के साथ बदसलूकी के लिए चिन्हित हैं। यानी वहाँ जाने वाले लोगों की अंतर्दृष्टि, भौगोलिक अंतर के बावजूद ठस कस्बाई ही रहती है। एक हद तक कुछ मामलों में इसे सही भी माना जा सकता है। लेकिन क्या इसे तार्किक कसौटी पर कसते हुए सही कहा जा सकता है? दुनिया की आर्थिक और सामाजिक रूपरेखा प्रस्तुत करने वाले कार्ल मार्क्स ने पूंजी और श्रम का विभाजन करते हुए ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा दिया। आज की पूंजी की राजनीति कहती है कि श्रमिक को हमेशा बाहरी होना चाहिए। यह इसलिए ताकि श्रमिकों का व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव न पड़े। यानी ऐसी व्यवस्था हो जिसमें प्रवासी श्रमिक लोकल मिल मालिक और राज्य पर दबाव न बना पायें। पूंजी का चरित्र होता है समकेंद्रित करना। यानी लगातार यह कोशिश कि पूंजी परिधि के तरफ नहीं फैले। नेटिव इंडीजीनियस- जो यह नहीं समझते कि हम उनके खिलाफ क्यों हैं? अगर देखा जाये तो विकसित देशों का व्यापार, उत्पादन से लेकर विपणन तक तीसरी दुनिया के देशों पर आश्रित है। ठीक उसी तरह जैसे मुंबई, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों का उत्पादन हिन्दी पट्टी के श्रमिकों पर आधारित है। और इन महानगरों में भी नेटिव इंडीजीनियस द्वारा वैसी ही घटनाएँ देखने को मिलती हैं जैसाकि यूरोपीय देशों में एशियाइयों के साथ होता आया है। विशेषज्ञों ने पूंजी के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण यह आशंका व्यक्त की थी की 2005 से 2020 के बीच में दुनिया के कई हिस्सों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव होंगे। इसकी शुरूआत आस्ट्रेलिया की नस्ली वारदातों से मानी जा सकती है। मध्य पूर्व एशिया में मिश्र में राजनीतिक परिवर्तन के मौजूदा संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अरब वर्ल्ड में अवश्यंभावी राजनीतिक बदलाव होंगे। ट्यूनीशिया की आग बाहर तक फैल चुकी है। आर्थिक परिवर्तन में 2007 में शुरू हुई मंदी ने तीसरी दुनिया पर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। जबकि आर्थिक विशेषज्ञों का मत था कि भारत इसके प्रभाव से मुक्त रहेगा। भारत पर यह दूसरे तरीके से अपना प्रभाव डाल रहा है। पहले-पहल यूरोपीय राज्यों ने श्रम की आउटसोर्सिंग को बंद किया। और अब यूरोप में रह रहे भारतीयों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मंदी के कारण बर्बाद हुए अय्याश यूरोपीय मध्य वर्गीय समाज ने अपनी चल-अचल संपत्ति को धड़ल्ले से बेचा। जाहिर सी बात है कि खरीददारों में बड़ी संख्या बचत करने वाले भारतीयों की रही। एशियश की उत्तरोतर प्रगति उस समाज की आँखों में चुभ गई। यह अकारण नहीं है बल्कि यूरोप में इमिग्रेशन टैग जैसे मामले मंदी के बाद ही बढ़े हैं। आने वाले समय में सिर्फ यूरोप में ही नहीं, लगभग दुनिया के हर हिस्से में, भारत में भी इस अव्यवस्थित पूंजीवादी व्यवस्था के कारण मूल निवासियों और प्रवासियों के बीच अंतरसंघर्ष और तेज होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
anuj4media@gmail.com

22 जनवरी 2011

स्थाई सदस्यता के लिए राजनीतिक भटकाव


-दिलीप खान
(जनसत्ता में प्रकाशित आलेख का असंपादित रूप)
पिछले कुछ वर्षों से किसी भी महत्त्वपूर्ण देश के राष्ट्राध्यक्ष के साथ औपचारिक अथवा अनौपचारिक बातचीत में भारत की तरफ़ से एक मुद्दे को बेहद प्रमुखता से रखा जाता है, वह है संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता. एकदम हालिया तौर पर इस स्वर को हमने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ़्रांसिसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और चीनी प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ के भारत यात्रा के दौरान सुना. इस मांग को भारत न सिर्फ़ किसी देश विशेष के साथ पारस्परिक बातचीत में उठाता रहा है बल्कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गुटों और संगठनों के मंच से भी अपने पक्ष में समर्थन हासिल करने की अपील करता रहा है. फिलवक़्त ठीक इसी तरह की मांग कुछ अन्य देश भी कर रहे हैं. ख़ास तौर पर जर्मनी, ब्राज़ील और जापान. भारत सहित इन तीन देशों ने मिलकर जी-4 नाम से एक संगठन भी बना रखा है जिसका मुख्य लक्ष्य ही संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता हासिल करना है. आम तौर पर जब इस तरह के अंतरराष्ट्रीय गुट बनते हैं तो आर्थिक और सामरिक संबंध इनके केंद्र में होते हैं. जी-4 का केंद्रीय उद्देश्य यह साबित करता है कि दुनिया के ऐसे देश, जो संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्य नहीं हैं और किसी न किसी तरह एक शक्ति के रूप में अपने उभार को देख रहे हैं, वे ’वीटोधारी रेखा’ के अंदर आने के लिए कितने बैचैन हैं! साथ ही, इन उपक्रमों के जरिए ये देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य देशों को प्राप्त ’अमोघ हथियार’ वीटो को सैद्धांतिक रूप से वैधता भी दे रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पिछले 60 से भी अधिक वर्षों से सबसे बड़े संस्था के बतौर मान्य संयुक्त राष्ट्र में ढ़ांचागत परिवर्तन को लेकर अब कोई सवाल ही नहीं है. हालांकि यह सवाल कभी था भी नहीं. बस ढांचागत समायोजन की मांग इस रूप में होती रही है कि अधिक शक्ति बटोरने की जुगत में कुछ ऐसे देश जो दुनिया में अपना एक प्रभाव रखते हैं वे शक्तिशाली क्लब में शामिल होना चाहते हैं.
मौजूदा वैश्विक राजनीतिक लक्ष्य और ज़िम्मेदारियों के संबंध में इन देशों की चर्चा को तत्काल यहां छोड़ देते हैं. फिर भी, ऐसे उठने वाले मांगों और इसके पक्ष-विपक्ष में दिए जाने वाले तमाम दलीलों को स्थाई सदस्यता की संरचना के साथ ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समीक्षा करने पर ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में इन देशों की मांग ग़लत दिशा में हैं. स्थाई सदस्यता चंद देशों की परस्पर-सहमति पर आधारित व्यवस्था है. दरअसल फरवरी 1945 में येल्त्रा सम्मेलन, जिसे क्रीमिया सम्मेलन भी कहा जाता है, में जब स्थाई सदस्यता की बीज बोई गई तो इसके निहितार्थ बहुत गूढ़ नहीं थे. क्रीमिया में युद्धोत्तर स्थिति में यूरोप के भीतर एक सांगठनिक ढांचा निर्मित करने को लेकर यह प्रयास था, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के राष्ट्राध्यक्ष एक साथ उपस्थित थे. इन राजनीतिक समीकरणों के बीच रूजवेल्ट ने सोवियत संघ को संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के लिए मना लिया, जिसे सोवियत संघ ने वीटो जैसी किसी शक्ति हासिल होने के शर्त पर स्वीकार किया. सोवियत संघ की इस मांग के पीछे तत्कालीन भू-राजनैतिक परिस्थितियां थीं कि किसी भी अनचाहे प्रस्ताव को पश्चिमी पूंजीवादी देश एक जुट होकर अपने पक्ष में न करवा ले. सोवियत संघ के राष्ट्र संघ से अलग होने के बाद इसकी अप्रासंगिकता ने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी संगठन को अंतरराष्ट्रीय होने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि सोवियत संघ उसमें शामिल हो. इस बिनाह पर स्थाई सदस्यता की व्यवस्था की गई. हालांकि अमेरिका और ब्रिटेन अपने भीतर असीमित अधिकार रखने की मंशा पहले से बनाए हुए थे, उन्हें इस तरह एक और बेहतर बहाना मिल गया था. फ़्रांस को इसमें शामिल किए जाने के पीछे जर्मनी के ख़िलाफ़ फ्री फ़्रेंच बलों का बेहद शानदार प्रदर्शन था. इसके अतिरिक्त औपनिवेशिक शक्ति के रूप में फ्रांस यूरोप के भीतर के एक बड़ा बल था.
अब यहां से लेकर आगे की स्थिति को देखें तो यह साफ़ जाहिर होता है कि इन चार-पांच देशों द्वारा लिए गए फैसले को कभी भी इस तरह चुनौती नहीं दी गई कि उनके असीमित अधिकार को न्यून करके अन्य देशों के स्तर पर लाया जाए. अलबत्ता यह ज़रूर हुआ है कि इन शक्तियों को हासिल करने की दावेदारी बढ़ गई है. दबे-खुले स्वरों में यह मांग कुछ समय से हो रही है कि संयुक्त राष्ट्र की पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए जिसमें बलाघात इस बात पर है कि सुरक्षा परिषद के भीतर जितने स्थाई सदस्य हैं वे दुनिया को ठीक तरह से प्रतिनिधित्व नहीं दे रहे हैं. यह सिर्फ़ कुछ क्षेत्र विशेष के ही देश हैं. मसलन दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया महादेश से एक भी देश इस समूह में शामिल नहीं हैं. या फिर एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले देश भारत को एशिया से एक सदस्य चीन के होने के बावजूद स्थाई किया जाए. दावेदारी साबित करने के लिए पैमाना बनाना बहुत मुश्किल नहीं हैं. अर्थव्यवस्था, क्षेत्र, जनसंख्या, क्षेत्रफल, लोकतंत्र सबकुछ इसके लिए खोला जा सकता है. लेकिन, असली सवाल यह है कि कुछ देशों द्वारा बनाए गए इस सुरक्षा कवच सरीखे व्यवस्था को चुनौती दी जानी चाहिए अथवा राजनीतिक तौर पर इस व्यवस्था के लिए उन देशों को प्रोटेक्ट करते हुए उसमें शामिल होने की गुहार लगाना चाहिए?
भारत जैसे देशों के पास फिलहाल वह क्षमता है कि वे तमाम ऐसे देशों का जो इस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं, उनकी अगुवाई कर सके. इस काम के लिए भारत स्वाभाविक तौर पर ’तीसरी दुनिया’ के देशों का पसंद भी बन सकता है. जी-77 जैसे समूह में भारत अपनी मज़बूत हैसियत रखता है. यदि इस जगह पर भारत बल लगाता है तो इसे इसमें अधिक स्वीकृति भी मिलेगी और अधिक सम्मान भी. इससे पहले भी ग़रीब मुल्कों ने साथ मिलकर ऐसे कई ढांचों के विरुद्ध लड़ाईयां लड़ी हैं. शीत युद्ध के समय भारत समेत ’तीसरी दुनिया’ के कई ’विकासशील’ देशों ने उसमें शामिल दो गुटों से अलग अपना एक स्वतंत्र गुट बनाया था. इस ज़मीन से साम्राज्यवाद और घटाटोप पूंजीवाद के ख़िलाफ़ कई लड़ाईयां लड़ी गई जिनमें से कुछ में ये जीते औए कुछ में हारे. गुटनिरपेक्ष देशों ने एक समय में यूनेस्को पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि वे तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था को बदलें और सत्तर के दशक में दुनिया के सामने ’नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ पेश की गई. इस व्यवस्था से ऐसा नहीं था कि ’तीसरी दुनिया’ के देशों को कोई बड़ी सफ़लता हासिल हुई. फिर भी इसके सांकेतिक महत्त्व बड़े दूरगामी थे. मसलन इसी के आस-पास इन देशों ने दुनिया भर में असंतुलित सूचना प्रवाह को दुरूस्त करने के लिए ठीक उसी तर्ज पर ’नई विश्व सूचना और संचार व्यवस्था’ बनाने की मांग की. और इसी के मद्देनज़र यूनेस्को ने मैकब्राइड आयोग का गठन किया था, जिसकी संस्तुतियों से खफ़ा होकर अमेरिका ने यूनेस्को की सदस्यता त्याग दी थी.
मौजूदा संकट यह है कि ये तमाम देश अपनी इन इतिहासों से दूर निकल आए हैं. शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही सैद्धांतिक रूप से गुटनिरपेक्षता का औचित्य भी खत्म हो गया और इन देशों के भीतर पल रहे उदार बुर्जुआओं ने पूंजीवाद के नए संस्करण ’वैश्वीकरण’ को अपने-अपने देशों में पैबस्त कराया. अब ये बुर्जुआ ही सही अर्थों में शासक हैं. जाहिर है किसी भी ऐसे ढांचे को चुनौती देने में इन देशों की सत्ता (शासक) हिचकिचाएंगी जो किसी ऐसी ही व्यवस्था की पैदाइश हो जिससे वे खुद फल-फूल रहे हैं.
सोवियत संघ के विघटन के बाद यह साफ़ जाहिर हो गया है कि दुनिया में शक्ति केंद्रण एक खास देश के पास है. लेकिन इन वर्षों में यह भी बेहद स्पष्टता के साथ प्रकट हुआ है कि दुनिया के प्रत्येक हिस्से में कुछ देशों ने आपस में अधिक दुश्मनाना भाव विकसित किए हैं. शीत युद्ध के दौरान गुटबाजी में वैचारिकी अधिक महत्त्वपूर्ण था. वैचारिकी अब गौण हो रहा है. और दुनिया में शत्रुता का पैमाना वापस 20वीं सदी के पूर्वार्ध की तरह हो रहा है. हर देश अपने क्षेत्र विशेष में शक्तिशाली होकर उभरना चाह रहा है. इसे समूचे ग्लोब पर महसूस किया जा सकता है कि अधिकांश देशों के पड़ोसी ही उसके सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर चिह्नित है. वे एक-दूसरे से आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि सैन्य क्षेत्र में आगे निकलने को और प्रत्येक दूसरे को ’कुचलने’ को बेताब नज़र आते है. ऐसे में यह तर्क कितना खोखला लगता है कि सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करने के लिए हर क्षेत्र से कुछ देशों को इसमें शामिल किए जाने की ज़रूरत है. क्या भारत को स्थाई सदस्यता मिल जाने से यह पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व कर पाएगा? या फिर जापान को स्थाई सदस्यता मिलने से वह उत्तर और दक्षिण कोरिया का प्रतिनिधित्व कर पाएगा? अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े पेंचोखम हैं. जिस जी-4 का भारत सदस्य है और स्थाई सदस्यता के लिए हाथ-पांव मार रहा है, उसके विरोध में दुनिया के कुछ देशों ने एक संगठन बना रखा है जिसे ’सहमति के लिए एकता आंदोलन’ अथवा कॉफी क्लब कहा जा रहा है. जिस तरह जी-4 का केंद्रीय एजेंडा स्थाई सदस्यता हासिल करना है उसी तरह कॉफी क्लब का स्थाई एजेंडा इन्हें ऐसा करने से रोकना है. इसमें स्पेन, इटली, कनाडा, दक्षिण कोरिया, पाकिस्तान, अर्जेंटीना जैसे देश शामिल हैं. तस्वीर बेहद स्पष्ट है. जैसा ऊपर जिक्र किया गया है ठीक उसी तर्ज पर जर्मनी को रोकने के लिए स्पेन, इटली, नीदरलैंड्स जैसे देश हैं, ब्राजील के लिए मैक्सिको और अर्जेंटीना है, भारत के लिए पाकिस्तान है, और जापान के लिए दक्षिण कोरिया. ऐसे में प्रतिनिधित्व की बात कैसे की जा सकती है? क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को और अधिक ’ईमानदार’ बनाने के लिए जी-4 देशों ने यह भी सलाह दी है कि दो अफ्रीकी देशों को भी इसमें शामिल किया जाए लेकिन जब अफ्रीकी संघ में इसके लिए कोशिश हुईं तो मिस्र, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका में से दो को चुनने में संघ असमर्थ रहा. आपसी होड़ कहीं अधिक तीव्र है.

भारत समेत कुछ अन्य देशों को यदि स्थाई सदस्यता मिल जाती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में क्या फर्क आएगा? अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जिस स्तर की है उसमें इस बात की प्रबल संभावना है कि कुछ और देश इसके लिए कतार में खड़े हो जाएंगे और अपनी दावेदारी के लिए कोई ठोस बहाना भी ढूंढ लेंगे. लामबंदी का एक लंबा दौर चलेगा. यह लामबंदी और प्रतिस्पर्धा उसी तरह की होगी जैसी नाभिकीय हथियारों के मामले में अब तक देखने को मिली है. उत्तरी कोरिया इसलिए बम बना रहा है क्योंकि अमेरिका दक्षिणी कोरिया के साथ सामरिक अभ्यास करता है और अमेरिका के पास नाभिकीय बम है तथा उत्तरी कोरिया अपने को ’सुरक्षित’ बनाए रखना चाहता है! पाकिस्तान के पास इसलिए नाभिकीय बम है क्योंकि वह भारत के पास भी है! जिस तरह सुरक्षा की परिभाषा बदली है और नाभिकीय हथियार के ख़िलाफ़ नाभिकीय हथियार को सुरक्षा माना जा रहा है उसी तरह वीटो शक्ति को लेकर भी इसी तरह की प्रतिस्पर्धा देखने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं.
ऐसी मांगों के बाद मूल समस्या ढंक जाती है. या यूं कहे कि वह वैध हो जाती है. असल मसला सिर्फ़ यह रह जाता है कि वो शक्ति किसके पास हो. जबकि वास्तव में इसी शक्ति को चुनौती दी जानी चाहिए. यदि वीटो धारी देशों की संख्या बढ़ती है तो इसके दुरुपयोग और भी बढ़ेंगें. वीटो इस्तेमाल के पीछे प्रत्येक स्थाई सदस्य देशों के अपने हित रहे हैं. सोवियत गणराज्य से संबंधित मामले में मोटोलोव ने इतनी दफ़ा वीटो किया कि उन्हें ’मि. वीटो’ कहा जाने लगा. 1970 में अपना पहला वीटो इस्तेमाल करने के बाद से अमेरिका ने 80 से अधिक बार इसे दोहराया है. दसियों बार अंतरराष्ट्रीय मतों को धता बताते हुए उसने इजराइल के मसले पर बेशर्मी से अपने इस अधिकार का इस्तेमाल किया है. मध्य-पूर्व के मामले में अमेरिका पिछले बीस-पच्चीस सालों से बेतरह इसे भांजता रहा है और स्थाई कोटे से बाहर खड़े देशों ने अधिकांश समय इसकी निंदा की है. कई देशों ने इसे इस रूप में भी देखा कि यह दुनिया के चुनिंदा देशों को हासिल अलोकतांत्रिक अधिकार है. ऐसे में वे देश अब यदि खुद वीटो हासिल करने की मुहिम में लग जाए तो जाहिर है कि वे अलोकतांत्रिक होड़ में अपने को न सिर्फ़ शामिल कर रहे हैं बल्कि और आगे के लिए इसकी राह भी खोल रहे हैं.
इज़राइल में सामरिक और युद्ध कारणों से अमेरिकी वीटो ने यह स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना जिस संकल्पना के साथ की गई थी कि युद्धोत्तर समय में यह अंतरराष्ट्रीय शांति और सद्भावना के लिए काम करेगी, अब यह कई मामलों में उसके उलट जा रही है. संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया की तमाम बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को वास्तविक रूप से अमेरिका ही नियंत्रित कर रहा है इसलिए उसे अपने किसी भी फैसले पर इन संस्थाओं की रज़ामंदी की ज़रूरत नहीं मालूम पड़ती. इराक पर हमले की घोषणा करते हुए अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र को यह जानकारी दी थी कि वह चाहे तो अमेरिका के आदेशों का पालन करें या ’अप्रासंगिक’ बन कर रह जाए. संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए चुप्पी बेहतर समझा!
ऐसी स्थिति में यदि कुछ देशों को स्थाई सदस्यता मिल भी जाती है तो यह बहुत साफ़ है कि वे उसी अधिकारभाव और ताकत के साथ वीटो का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे जैसे कुछ ’बड़े’ देश कर रहे हैं. मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य इसके लिए बेहद दुस्साहसी देशों की मांग करता है. इतिहास में देखें तो मंगोलिया के मुद्दे पर सोवियत संघ रिपब्लिक ऑफ चाइना पर दबाव बना चुका है जिसके बाद चीन को अपने वीटो से मुकड़ना पड़ा था. फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जो समीकरण हैं उसमें ऐसे दबाव की संभावना पहले की तरह सुरक्षित है. यदि कोई देश अमेरिका की इच्छा के विरुद्ध सुरक्षा परिषद में वीटो करता है तो बहुत संभव है कि वह विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संघ के जरिए उस ख़ास देश पर आर्थिक दबाव बनाए. दरअसल दुनिया में नियंत्रण का असली संस्था संयुक्त राष्ट्र रह ही नहीं गई है. अब नियंत्रण इन्हीं आर्थिक संगठनों के जरिए कायम हो रही है. इन तमाम संस्थाओं का सबसे बड़ा वित्तपोषक और शेयरधारक अमेरिका है. विश्व बैंक का अध्यक्ष पारंपरिक तौर पर कोई अमेरिकी नागरिक ही बनता है. इस संस्था में अमेरिका के पास सबसे अधिक वोटिंग शक्ति है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में किसी भी फैसलों के लिए अमेरिका अकेले पर्याप्त है. संयुक्त राष्ट्र का भी सबसे बड़ा वित्तपोषक अमेरिका है. इन अधिकारों से वह कोई भी कदम उठाने के लिए आज़ाद है. वह इराक का तेल कब्जा कर संयुक्त राष्ट्र का ’सबसे बड़ा वित्तपोषक’ बना रहेगा और इसके जरिए वह फिर ’इराक’ का तेल कब्जाता रहेगा. यह दिलचस्प है कि किसी संस्था के समानांतर कुछ ऐसी संस्थाओं को खड़ा कर दिया जाए कि वह उनके सामने बौनी साबित हो और इन समानांतर संस्थाओं पर मज़बूती से नियंत्रण कायम कर असली संस्था को बिल्कुल पंगु बना दिया जाए.
यदि कोई देश स्थाई सदस्य बन कर भी अपने वीटो का इस्तेमाल आज़ादी से नहीं कर सकता तो स्थाई सदस्यता की इतनी तीव्र मांग बेकार है. इस एक ध्रुवीय युग में वीटो अंततः अमेरिका के पक्ष में ही जाएगा. कई देशों को वीटो मिल जाने के बाद भी विद्रोही साहसिक रवैया दिखाने की कूव्वत उनमें नहीं होगी और साम्राज्यवादी देश यह कहकर अपने को और उदार साबित कर लेंगे कि उन्होंने कुछ अन्य देशों को भी स्थाई सदस्य बनाया. यह अमेरिकी ’लोकतंत्र’ के प्रसार के अभियान को भी प्रमुखता से स्थापित करेगी.
लेकिन एक प्रमुख सवाल यह है कि जो देश पिछले कुछ सालों से स्थाई सदस्यता की मांग कर रहे हैं उनकी प्रकृति किस तरह की है? संयुक्त राष्ट्र की स्थापना को साठ साल से अधिक हो गए हैं लेकिन यह मांग बमुशिल एक दशक पुरानी है. इन वर्षों में भारत और ब्राज़ील ने तेजी से ’आर्थिक विकास दर’ हासिल किया है जबकि जर्मनी और जापान आर्थिक मामलों में पहले से संपन्न माने जाते हैं. यह मतलब निकाला जा सकता है कि आर्थिक मज़बूती इसमें एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व के तौर पर शामिल है. इन देशों के भीतर जो आर्थिक विकास का पूरा ढांचा है वह पूंजीवादी विकास के डॉमिनेंट पैराडाइम मॉडल के जरिए तैयार हुआ है और इसमें वित्तीय क्षेत्र का प्रमुख योगदान रहा है. दुनिया में वित्तीय पूंजी के जरिए ही शक्ति का आभास कराया जा रहा है. भारत वित्तीय अर्थव्यवस्था के क़रीब अपने को पा रहा है. अगर भारत स्थाई सदस्य बनता है तो इसका झुकाव भी ऐसे ही देशों के प्रति अधिक होगा. मतलब स्थाई सदस्य बनने की मांग जिन परिस्थितियों और पैमानों के आधार पर हो रही है वह पूंजीवाद समर्थक माहौल बनाने का ही काम करेगी और यही इनकी राजनीति का भी हिस्सा बनेगी. ये मज़बूत अर्थव्यवस्था वाले देश किनके पक्ष में खड़े होंगे यह पता लगाना मुश्किल नहीं रह गया.

’तीसरी दुनिया’ के देशों के साथ एक बड़ी समस्या जो पिछली सदी से ही देखने को आ रही है कि वे कई महत्त्वपूर्ण मामलों में अपना मॉडल तैयार करने में विफल रहे हैं और पश्चिमी देशों के मॉडल द्वारा फैलाए गए गोट पर ही अपना गोट फेंकते रहे हैं. यदि लोकतांत्रिक कहे जाने वाले देश खुद ही विशेषाधिकार इस्तेमाल करने की इच्छा रखने लगे तो जाहिर है वे उस विशेषाधिकार की राजनीतिक जाल में फंस गए हैं. किसी भी संस्था का जब तक हिस्सा बनकर और उसके नियमों को परम सत्य मानकर कोई योजना बनाई जाएगी तब तक मौलिक ढांचा और विचार प्रस्तुत करने में समस्याएं आती रहेंगी. स्थाई सदस्यता के मामले में भी यही बात देखने को मिल रही है और कोई भी देश इस नियम को चुनौती देने को अभी तैयार ही नहीं दिख रहा है, गोया तमाम कोशिशों के बावज़ूद यह नियम अपरिवर्तनीय हो.

पूंजीवाद में ’देयर इज नो अल्टरनेटिव’ का प्रचार जिस रूप में किया गया उसकी पृष्ठभूमि इस बिसात पर बनी थी कि पूंजीवाद के भीतर ही लोगों को इतने विकल्प दे दिए जाए कि वे उससे बाहर निकल कर सोचने की जहमत ही न उठाए. जिस सांस्कृतिक प्रभुत्व में भारत अभी है और जिस ओर यह जा रहा है उससे साफ़ प्रतीत हो रहा है कि यह अधिकांश मामलों में पश्चिमी देशों द्वारा बनाए गए ढांचों को अपनाएगा और उसी में अपनी जगह तलाशेगा. अमेरिकी समर्थन हासिल करने के लिए भारत जितनी कोशिशें कर रहा है, और जितनी परस्पर-विरोधी बातें वाशिंगटन कैंप से देखने-सुनने को आ रही है, उसके बावजूद बहुत संभव है कि अमेरिका निकट भविष्य में भारत के पक्ष में खुलकर खड़ा हो जाए, क्योंकि हाल-फिलहाल भारत अमेरिका का अच्छा सहयोगी है और अमेरिका को भी सबप्राइम मॉर्गेज संकट के समय मंदी से उबरने के लिए भारत और चीन जैसे देशों की ओट की ज़रूरत महसूस हुई थी. इसके अतिरिक्त यह भी साफ़ जाहिर हो रहा है कि जिस तरह की वैचारिक वर्चस्व (हेजेमनी) क़ायम करने की पश्चिमी देशों की मंशा थी उसमें वे बेहद सफल रहे हैं. इस तरह की मांगें उस हेजेमनी की सफलता को दर्शाती हैं.
पूंजीवादी साम्राज्यवादी देशों के मॉडल के साथ यह चालाकी जुड़ी हुई है कि वे अपने हित में स्पेस बनाए रखते हैं. मसलन विश्व व्यवस्था के लिए वैश्वीकरण के साथ जब वे नया मॉडल पेश कर रहे हैं तो द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के इस साठ साल पुराने मॉडल, संयुक्त राष्ट्र, में फेरबदल करने को तैयार क्यों नहीं दिखते? वैश्वीकरण की स्थिति में तो फ़िर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए संगठनों को खड़ा किया जाना चाहिए था. लेकिन अपने द्वारा प्रस्तुत वैश्वीकरण के दौरान वे ऐसी नकली बहसों में लोगों को उलझाकर रख देते हैं कि असल सवाल ढंका रह जाता है. परिवर्तन के बदले समायोजन होता है. ऐसे ही किसी समायोजन के तहत भविष्य में यदि भारत सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य बनता है तो यह इसका एक झटके में एक पाले से दूसरे पाले में पलायन होगा जो किसी संस्था के भीतर हैसियत बदलने से अधिक वैचारिक पलायन को रेखांकित करेगा.

मो. - +91 9555045077
E-mail - dilipk.media@gmail.com

10 दिसंबर 2010

गोपनीयता बरतने का अमेरिकी करतब



- देवाशीष प्रसून
आख़िरकार विकिलिक्स के संस्थापक जूलियन असांज को गिरफ़्तार कर ही लिया गया। उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप हैं। सवाल यह है कि क्या सच में यह मामला यौन-उत्पीड़न का है या विकिलिक्स द्वारा किए गए पर्दाफ़ाशों से संयुक्त राज्य अमरीका ही नहीं उसके तमाम पिट्ठू देश सकते में आ गए हैं? इस बात में कोई शक नहीं है कि जूलियन को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि उसने दुनिया की सबसे बड़ी सत्ता की गोपनीयता की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। वर्ना, देखने वाली बात है कि दुनिया भर में यौन मामलों में अंतरराष्ट्रीय पुलिस और न्याय व्यवस्था की हरकत देखने को कितनी बार मिली है? आस्ट्रेलियाई नागरिक जूलियन को ब्रिटिश पुलिस ने लंडन में हिरासत में लिया है और उन पर न्यायिक मामला स्वीडन में लंबित है। गौरतलब है कि दुनिया भर में अपना रुतबा रखने वाले फ़िल्मकार केन लोच और पत्रकार जॉन पिल्जर जैसे विश्व विख्यात शख्सियतों के कुल एक लाख अस्सी हज़ार डॉलर के मुचलके पर भी जूलियन को जमानत पर नहीं छोड़ा जा रहा है। यौन-मामलों में इस तरह की सजगता क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। पर सोचने वाली बात है कि क्या सचमुच जूलियन पर न्यायिक कार्रवाई यौन अपराधों के मद्देनज़र हो रही है? जाहिर सी बात है कि विकिलिक्स ने खोजी पत्रकारिता का जो इतिहास रचा है, इसके लिए जूलियन को अमरीकी सत्ता अपने काबू में नहीं ले सकती थी, तो उन्हें दूसरे बहाने से कब्ज़े में लिया गया।

हालाँकि माहौल तो यह भी बनाया गया कि अल क़ायदा की तर्ज पर विकिलिक्स को भी आधिकारिक तौर पर एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जाए, पर अब तक यह हो नहीं सका है। इस बाबत द हाऊस होमलैंड सुरक्षा समिति के अध्यक्ष पीटर किंग ने इसके लिए बहुत प्रयास किए। किंग ने अमरीका की राज्य सेकरेटरी हिलेरी क्लिंटन को एक आधिकारिक ख़त में लिखा था कि विकिलिक्स से देश की सुरक्षा को ख़तरा है, इसलिए विकिलिक्स को आतंकवादी संगठन घोषित कर देना चाहिए। दरअसल गोपणीय सूचनाओं के पर्दाफ़ाश के बाद अमरीका की स्थिति दुनिया भर में किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं बची है। यह जाहिर हो गया है कि अमरीकी सरकार अन्य देशों और उसके प्रमुख के बारे में कितनी ओछी सोच रखती है। अब यह बात भी खुल-ए-आम हो गई है अमरीका की विदेश नीति किस तरह से अंतरराष्ट्रीय सौहार्द्य को ठेंगे पर रखती है और कैसे-कैसे उसने इराक को युद्ध में नेस्तोनाबूद कर दिया। विकिलिक्स ने अमरीका के अंतरराष्ट्रीय साख को धुँआ कर दिया है। अब इसके बाद मारे शर्म और जिल्लत के अमरीका और उसकी दुनिया भर फैली एजेंसियाँ जवाबी कार्रवाई कर विकिलिक्स को सबक सिखाना चाहती हैं। जब कूटनीतिक तरीकों से विकिलिक्स दवाब में नहीं आया तो इस सिलसिले में इन ताक़तों ने विकिलिक्स के वेबसाइट पर तकनीकी हमलों का बौछार कर दिया। इंटरनेट के क़ानूनों और नैतिकताओं को ताक पर रख कर विकिलिक्स पर बड़े जोरदार तरीके से वाइरसों के हमले हुए। इससे भी मामला क़ाबू में नहीं आया तो विकिलिक्स को वेबसाइट चलाने की सेवा जो कंपनी दे रही थी, उसे खोपचे में लेते हुए विकिलिक्स के कामकाज को ठप्प किया गया। बेचारी कंपनी ने बहाना यह बनाया कि विकिलिक्स पर होने वाले वाइरस हमले इतने तीव्र हैं कि अगर उसे बंद न किया जाता हो पूरी इंटरनेट व्यवस्था ही मटियामेट हो जाती। इसे कहते हैं, मना करने पर भी कोई आपकी बात न मानें तो उसे मज़बूर कर देना कि वह चाह कर भी कुछ कर न सके। और अमरीका इसमें माहिर है।

और याद होगा कि किस तरह से पहली बार जब विकिलिक्स ने कई आँखें खोलने वाली सूचनाओं की गोपनीयता को खत्म किया था तो स्वीडन की सत्ता उसे पहले ही तमाम तरह की धमकियाँ दे चुकी थी। लेकिन विकिलिक्स बिना किसी दवाब में आए गुप्त सूचनाओं का पर्दाफ़ाश करते रहा। दरअसल गौर करें तो अमरीका हमेशा से ही सूचनाओं की गोपनीयता को लेकर संवेदनशील रहा है। सन चौरासी की बात है कि अमरीका ने इसी तरह से यूनेस्को पर भी यों कूटनीतिक हमला किया था। यूनेस्को के साथ अमरीका के तू तू-मैं मैं का सबब मैकब्राइड समिति के सुझावों के तहत बनाए जाने वाली नई विश्व सूचना व संचार व्यवस्था को तवज्जो देना था। तब आलम यह था कि सूचना व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण से अमरीका इतना बौखला गया कि उसने यूनेस्को के अपने सारे संबंध तोड़ लिए। विश्व सामंजस्य की लफ़्फ़ाजी करने वाला अमरीका इतना ज़िद्दी है कि वह अंतरराष्ट्रीय शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति को समर्पित संयुक्त राष्ट्र के इस उपांग से उन्नीस साल तक मुँह फैलाए रहा, जब तक कि यूनेस्को ने अपनी संचार नीतियों में अमूलचूल बदलाव नहीं लाए।

अमरीका ही नहीं, दुनिया में मौज़ूद तमाम साम्राज्यवादी ताक़तों के इस फ़ितरत पर गौर करें। वह गोपनीयता को लेकर बड़े संवेदनशील रहे हैं। भारत में भी देखिए मीडिया और सियासत के बंदरबाट से जुड़े बड़े-बड़े खलीफ़ाओं की गद्दियाँ नीरा राडिया के टेप्स के बेपर्द होने से हिल गईं हैं। सीधे-सीधे यह मामला सत्ता पर क़ाबिज़ लोगों के भ्रष्टाचार और गोरखधंधा को उन लोगों से छुपा के रखने का है, जो उन्हें इन सत्ता के सिंहासन पर बैठाते हैं और इस तरह के खुलासे सत्तासीनों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देते हैं।
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संप्रति: पत्रकार व मीडिया स्टडीज़ ग्रुप, नई दिल्ली व जर्नलिस्ट यूनियन फ़ॉर सिविल सोसायटी के लिए सक्रिय
दूरभाष: 09555053370 ई-मेल: prasoonjee@gmail.com