26 जुलाई 2011

दूसरे दर्जे की नागरिकता का दर्द.

शबनम हाशमी
हमारे देश का मुस्लिम समुदाय लोकतंत्र में विश्वास करता है . इसके बावजूद उनके मन में भय और उससे पैदा हुई निराशा की एक सार्वभौमिक भावना मौजूद है। एक प्रक्रिया में सत्ता से इनका मोहभंग हुआ है। यह मोहभंग सिर्फ पुलिस और न्यायपालिका के साथ ही हुआ हो, ऐसा भी नहीं है; राजनीतिक दलों के साथ और कुछ हद तक मीडिया पर भी उनका भरोसा धीरे-धीरे कम हुआ है। मीडिया ने मुसलमानों को आतंकवादी चेहरा पहनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। हमारे मुल्क में आज भी मुसलमानों को बेवजह लंबे समय तक हिरासत में रखना, गिरफ्तारी के बाद जमानत न मिलना, न्यायिक कार्रवाई में उनके प्रति पक्षपातपूर्ण जांच और परीक्षण एक आम बात है। दूसरी ओर शिक्षा, रोजगार, आवास और सार्वजनिक सेवाओं से यह समुदाय कमोवेश वंचित ही है। सत्ता आमतौर पर मुसलमानों के प्रति असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करती है, यही वजह है कि उनके मन में दूसरे दर्जे की नागरिकता का दर्द गहरे बैठता जा रहा है।
संवैधानिक और वैधानिक गारंटी के बावजूद हकीकत तो यही है कि मुस्लिमों के ऊपर सत्ता की ओर से होने वाले हमलों में इजाफा ही हुआ है। मुसलमानों के बीच आधुनिक शिक्षा का प्रसार न होने के कारण भी आज इनके बीच का एक बड़ा हिस्सा देश की मुख्यधारा की शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से कटा हुआ है। सरकार की ओर से इनके लिए जो योजनाएं बनती हैं, वे दरअसल रस्म अदायगी भर हैं। इन योजनाओं का लाभ भी इस तबके के जरुरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाता।
जहां तक भारत के मुसलमानों के आतंकवाद से जुड़ने का मामला है वह एक सफेद झूठ है। अमेरिकी तक इस बात को मानता है कि भारत के मुसलमानों का आतंकवादी शक्तियों से कोई लेना देना नहीं है। यह बात विकीलीक्स द्वारा अमेरिकी दस्तावेजों के खुलासे के बात सामने आयी। भारत का मुसलमान न सिर्फ आतंकवाद से दूर है वरन वह अपने देश के प्रति पूरी तरह इमानदार है। अगर कोई इस प्रमाण को देखना चाहे तो गार्जियन के अंकों में इसकी छानबीन कर सकता है। पूर्व अमेरिकी राजनयिक डेविड मलफोर्ड ने इस मसले पर तो यहां तक कहा है कि भारत के मुसलमानों के ऊपर न तो अलगाववाद और न ही धार्मिक चरमंपथियों का ही कोई प्रभाव है। जहां तक देश में कट्टर इस्लामिक शक्तियों की पैठ का मामला है, यह बात भी आज दिन के उजाले की तरह साफ है कि भारत में मुसलमानों का बड़ा हिस्सा किसी भी धार्मिक संगठन से जुड़ा नहीं है। वह लोकतंत्र में कम ही सही, लेकिन विश्वास करता है। हकीकत तो यह है कि उसकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला आज न तो कोई धार्मिक संगठन है और न ही राजनीतिक संगठन। यानी समग्रता में देखा जाए तो वह आज एक ऐसी विकल्पहीन दुनिया में जी रहा है, जहां धार्मिक और राजनीतिक शक्तियां उसकी हितैषी बनकर उसे ठगने का काम करती हैं। यही हाल हिंदुओं का भी है, जिनका आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे सांप्रदायिक संगठन अपने हितों के हिसाब से उपयोग करते हैं।
2008-09 में संघ के नापाक इरादों का भंडाफोड़ करने के लिए अनहद, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, फाउंडेशन आफ सिविल सोसाइटीज, इंसाफ, जामिया टीचरर्स सालिडरिटी एसोसिएशन, संदर्भ और सियायत से जुड़े सदस्यों ने देश भर के करीब 300 बुद्धिजीवियों, राजनेताओं ने एक बैठक की थी। इस बैठक में यह तय किया गया था कि देश में मुस्लिम समुदाय की स्थिति पर गम्भीर शोध करके सच्चाई को बाहर लाया जायेगा। देश भर में मुसलमानों के बीच काम करने वाले स्वयं सेवी संगठनों ने भी इस बात को गहराई से एहसास किया कि इस तरह का प्रयास बेहद जरुरी है। इस बैठक में एबी बर्धन, बिलाल काजी, दिग्विजय सिंह, इफ्खिर गिलानी, प्रशांत भूषण, सीताराम येचुरी और तरुण तेजपाल जैसे सैकड़ों गणमान्य लोग मौजूद थे। इसी का परिणाम था कि ‘मुस्लिम इन इंडिया टूडे’ रिपोर्ट सामने आयी। यह रिपोर्ट मुसलमानों की वास्तविक जिंदगी की जद्दोजहद को काफी हद तक सामने लाने में कामयाब हुई। इस रिपोर्ट में ऐसे सैकड़ों परिवारों की व्यथा दर्ज है, जो आज भी आजाद मुल्क में एक समुदाय विशेष से ताल्लुक रखने का दर्द झेलने के लिए अभिशप्त हैं। आज इस तरह के प्रयासों की और भी ज्यादा जरुरत है। साभार-100फ्लावर ब्लाग।

18 जुलाई 2011

जरूरी अपील

जन कलाकार जीतन को न्याय चाहिए !

वो जो कल तक आम लोगों के बीच मेहनतकश समुदाय के दुःख-दर्द और उनकी जिन्दगी के जद्दो-जहद को अपना सांस्कृतिक स्वर देता था... खेत-खलिहानकारखाने-खदान से लेकर गांव, देहात, कस्बों, शहरों में अपनी सांस्कृतिक मण्डली के साथ घूम-घूमकर, पतनशील व मानव विरोधी संस्कृति के बरखिलाफ जन संस्कृति के गीत गाता है... जल-जंगल-जमीन तथा जीवन पर अधिकार के लिए हूल-उलगुलान के सपनों को शोषित-वंचित आदिवासी एवं मेहनतकश जन समुदाय के बीच जगाता रहा तथा लूट-झूठ की सत्ता से हताश, निराश और परेशान  दिलों में अपनी धन-धरती पर अधिकार और मर्यादापूर्ण जीवन के लिए परिवर्तन  का जोश भरता रहा... और रात के विरुद्ध प्रात के लिए, भूख के विरुद्ध भात के लिए नये राज-समाज गढ़ने के अभियान में चेतना का संगीत सजाता रहा..... उस जन कलाकार जीतन मरांडी को झूठे केस में फंसाकर कलाकर से कातिल ठहराया गया और फांसी का हुक्म सुनाया गया। जीतन मरांडी ने अपसंस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृति के लिए सदैव मांदर, ढोल, नगाड़ाबांसुरी और कलम-कूची को अपना हथियार बनाया। लेकिन उसे झूठे गवाहों के बल पर उग्रवादी साबित किया गया। एक जन कलाकार के रूप में उसने संस्कृतिकर्म की वही राह अपनायी जिसे कबीर, भारतेन्दू हरिश्चन्द्र से लेकर मुंशी प्रेमचन्द और नागार्जुन की रचना-सांस्कृतिक परम्परा ने दिखलायी। वही संकल्प रखा जिसे सिद्धू-कानू, बिरसा मुण्डा और भगत सिंह के आदर्शों ने सिखलाया। जो यही काली ताकतों को नहीं भाया। प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने वर्षों पूर्व लिखा था –

"
भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की"

आज जीतन मरांडी के साथ यही चरितार्थ हो रहा है। उसने देश की
सम्प्रभुता-स्वतंत्रता और लोकतंत्र  का अपहरण करनेवाली शासन-व्यवस्था और
सत्ता-संस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृतिकर्म की मशाल जलायी। आईये, जन कलाकार जीतन
मरांडी को सही न्याय दिलाने तथा उसे फांसी की सजा से मुक्त कराने के जन अभियान
में हर स्तर पर सक्रिय भूमिका में हम सब आगे आयें!

निवेदक

जन कलाकार जीतन रिहाई मंच
अनिल अंशुमन,
संयोजक

संदर्भ: विभिन्न जनान्दोलनों में सक्रिय रहने वाले जनकलाकार जीतन मरांडी पर यों तो कई झूठे मुकदमे सरकार-प्रशासन द्वारा पहले ही लादे जाते रहे हैं। 2008 में गिरिडीह जिले के चिलखारी जनसंहार कांड के प्रमुख अभियुक्तों में स्थानीय
प्रशासन व भ्रष्ट राजनेता-बिचौलियों    ने साजिश कर जीतन मरांडी को फंसा दिया। 2009 में रांची से जीतन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। गिरीडीह की निचली अदालत में एकतरफा एवं झूठी गवाही दिलवाकर 23 जून 2011 को फांसी की सजा सुनायी गयी। चूंकि जीतन मरांडी झारखण्ड में कोरपोरेट लूट और झूठ की सरकारों की जनविरोधी नीतियों संघर्ष की सांस्कृतिक आवाज बुलंद करते थे और ग्रामीण-आदिवासी जनता में लोकप्रिय थे। इसलिए वे लूट-झूठ की शक्तियों की आंखों की किरकिरी बन गये थे।

प्रचारित-प्रसारित:
झारखण्ड जन संस्कृति मंच, संपर्क: 09939081850,
anshuman.anil@gmail.com

विज्ञप्ति ई-मेल द्वारा प्राप्त- दख़ल

09 जुलाई 2011

माओवादी पार्टी लेगी एस.पी.ओ. के पुनर्वास का जिम्मा.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार को माओवादियों और नक्सलियों के ख़िलाफ़ एसपीओ यानि विशेष पुलिस अधिकारियों के इस्तेमाल को रोकने का आदेश देते हुए इसे असंवैधानिक क़रार दिया. न्यायालय का कहना था कि कम पढ़े-लिखे, बिना सही प्रशिक्षण और हथियार के माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान में लगाए गए जनजातीय युवकों के इस्तेमाल को रोका जाना चाहिए क्योंकि ये संविधान के प्रावधानों के ख़िलाफ़ है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों से सभी हथियार और गोलाबारूद तुरंत वापस लेने का भी निर्देश दिया है. अदालत का कहना था कि अगर ये सशस्त्र जनजातीय युवक राज्य के ख़िलाफ़ खड़े हो गए तो ख़तरनाक स्थिति पैदा हो सकती है. इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों के चयन के लिए राज्यों को दिए जानेवाले पैसे को रोकने का भी आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि कोया कमांडो और सलवा जुडूम का गठन भी संविधान के ख़िलाफ़ है. - bbchindi

अदालत के इस फैसले के बाद माओवादी पार्टी ने विषेश पुलिस अधिकारियों से अपील की है जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.


भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
प्रेस विज्ञप्ति
7 जुलाई 2011

विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) से माओवादियों की अपील
अपनी ही उंगली से अपनी आंख फोड़वाने की सरकारी साजिशों को हरा दें!
शोषक-लुटेरों के लिए लड़ना बंद कर अपने-अपने गांवों में लौट आएं!!

सामाजिक कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ई.ए.एस. शर्मा की याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च अदालत ने 4 जुलाई 2011 को छत्तीसगढ़ सरकार को यह आदेश दिया है कि वह माओवादियों से लड़ने के नाम पर आदिवासियों को एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारियों) के रूप में नियुक्त करना और उन्हें हथियारों से लैस करना बंद करे। सर्वोच्च अदालत की खण्डपीठ ने एसपीओ की नियुक्ति को असंवैधानिक माना है। इसके पहले भी सलवा जुडूम, एसपीओ और कोया कमाण्डो के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार इस तरह की टिप्पणियां की थीं।
दरअसल, 2005 में जब केन्द्र व राज्य सरकारों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत सलवा जुडूम के नाम से एक फासीवादी दमन अभियान शुरू किया था, उसी समय से आदिवासी नौजवानों को एसपीओ के रूप में नियुक्त करना शुरू किया गया। तबसे लेकर पहले सलवा जुडूम और बाद में ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से लगातार जारी दमन अभियानों में करीब 700 गांवों को तबाह किया गया। एक-एक गांव को अनेक बार किश्तों में जलाया गया। 1200 से ज्यादा लोगों की हत्या की गई। सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जिनमें से कइयों को बाद में मार डाला गया। अनाज जलाया गया। सम्पत्ति लूटी गई। मुरगा, सुअर, बकरे जैसे पालतू जानवरों को लूटकर खा डाला गया। इन सभी आतंकी कार्रवाइयों में आदिवासियों में से भर्ती किए गए एसपीओ को ही सामने रखा जाता रहा। पुलिस व अर्धसैनिक बलों को रास्ते दिखाने और गांवों में हमलों के दौरान लोगों और घरों की पहचान करने में भी इन्हीं लोगों को आगे किया जाता रहा। बाद में एसपीओ को बड़े पैमाने पर भर्ती करने का फैसला लिया गया जिससे उनकी संख्या अब करीब पांच हजार की हो गई। एसपीओ में से कुछ लोगों को चुनकर ग्रेहाउण्ड्स और सेना की राष्ट्रीय रायफल्स से प्रशिक्षण दिलवाकर कोया कमाण्डो के रूप में एक दूसरी फोर्स भी तैयार की गई। चूंकि इन सभी सशस्त्र बलों की तमाम दमनकारी कार्रवाइयों के बावजूद भी माओवादी आंदोलन खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसका विकास और विस्तार की प्रक्रिया लगातार जारी है, इसलिए शोषक सरकारों ने अपने आखिरी दांव के रूप में सेना को उतार दिया है। भले ही फिलहाल ‘प्रशिक्षण’’ के बहाने सेना की तैनाती हो रही हो, लेकिन सच यह है कि ‘जनता पर युद्ध’ में सेना का सीधे तौर प्रयोग शुरू हो चुका है।
दण्डकारण्य में छिपी हुई असीम प्राकृतिक सम्पदाओं को बहुराष्ट्रीय व बड़े पूंजीपतियों के कॉर्पोरेट घरानों के हवाले कर इस पूरे क्षेत्र को उनकी लूटखसोट के चारागाह में तब्दील करने के मंसूबों के साथ ही शोषक सरकारों ने जनता के खिलाफ एक अन्यायपूर्ण युद्ध शुरू किया। इसी मंशा से जनता को बड़े पैमाने पर गांवों और जंगलों से खाली करवाने की नीति अपनाई गई। स्थानीय आदिवासियों में से कुछ नौजवानों को एसपीओ और कोया कमाण्डो के रूप में नियुक्त कर उनके हाथों से अनगिनत अत्याचारों को अंजाम दिलवाया गया।
हमारी पार्टी का मानना है कि एसपीओं में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो जानबूझकर नहीं, बल्कि तरह-तरह के दबावों और मजबूरियों के चलते ही एसपीओ बन गए। कई लोगों को गिरफ्तार कर या बलपूर्वक ‘राहत’ शिविरों में ले जाकर मारपीटकर और जान से मार डालने की धमकियां देकर एसपीओ बनने पर मजबूर किया गया। पहले सरकारी आतंक से डरकर एसपीओ बनने वाले भी बाद में धीरे-धीरे उसका हिस्सा बनकर जनता के खिलाफ किए गए जघन्य अपराधों में भागीदार हो गए। हमें पता है कि कई एसपीओ ऐसे हैं जो न चाहते हुए भी जनता पर किए गए घोर अत्याचारों में शामिल हो गए जिस पर वे खुद भी पछता रहे हैं। कई एसपीओं को यह मालूम नहीं था कि महेन्द्र कर्मा, रमन सिंह, विश्वरंजन, ननकीराम जैसे सफेदपोश और खाकीवर्दीधारी दलालों ने ‘शांति’ अभियान के नाम पर दसियों हजार की संख्या में पुलिस, अर्धसैनिक बलों और नागा-मिज़ो बलों को उतारकर आतंक और हिंसा का जो तांडव मचाया उसमें उन्हें प्यादों की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के आलोक में केन्द्रीय गृहमंत्री चिदम्बरम, जो जनता पर जारी युद्ध - ऑपरेशन ग्रीन हंट का सीईओ है, माओवाद-प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई है ताकि ऐसी कोई तरकीब निकाली जा सके कि कैसे इन एसपीओ और कोया कमाण्डो की व्यवस्था बरकरार रखी जा सके। दिल्ली से लेकर रायपुर तक सभी राजनेता, पुलिस के आला अधिकारी और नौकरशाह जुगत भिड़ा रहे हैं ताकि जैसे-तैसे एसपीओं को जनता के खिलाफ जारी इस अन्यायपूर्ण युद्ध में बनाया रखा जा सके।
हम सभी एसपीओ और कोया कमाण्डों को अवगत करवाना चाहते हैं कि दरअसल यह लड़ाई आप और हमारे बीच की नहीं है। यह लड़ाई देश के समूचे मेहनतकश अवाम और मुठ्ठी भर शोषक-लुटेरों के बीच है। एक तरफ 95 प्रतिशत उत्पीड़ित जनता है, जिसमें मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग, दलित, आदिवासी और निम्न और राष्ट्रीय पूंजीपति आते हैं, तो दूसरी तरफ बड़े सामंत और दलाल नौकरशाह पूंजीपति हैं जिनकी संख्या आबादी का महज 5 प्रतिशत है और जिन्हें साम्राज्यवादियों का समर्थन प्राप्त है। इस लड़ाई में शोषक शासक वर्ग आप लोगों को अपनी राज मशीनरी में शामिल कर आपको मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बलि का बकरा बना रहे हैं। वे अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत जनता के बीच से एक तबके को आगे कर इसे जनता के बीच ‘गुहयुद्ध’ के रूप में भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। आपको ठीक उन लोगों के खिलाफ खड़ा किया गया है जिनके बीच से आप पैदा हुए हैं। जायज मांगों से जारी जन आंदोलनों के खिलाफ आपको उकसाने के लिए शासक वर्ग ‘देशभक्ति’, ‘देश की रक्षा’ आदि झूठी बातों को गढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने आपको इस लड़ाई में घसीट दिया, दरअसल वे ही देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं। हजारों, लाखों करोड़ के घोटाले करने वाले; दलाली के एवज में देश की सम्पदाओं को क्या, देश की सम्प्रभुता तक को गिरवी रखने वाले; देश की मेहनतकश जनता को दो-दो हाथों से लूटकर स्विस बैंकों में कालाधन छुपाने वाले सब वही लोग हैं जिनके कारण देश की 77 प्रतिशत जनता को दो जून की रोटी तक नसीब न हो पा रही है और गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, बीमारी, भुखमरी, कुपोषण आदि समस्याएं हमारे हिस्से में आ गईं। इसलिए आप अपने असल दुश्मनों को पहचानें। आप यह मत भूलें कि अपनी बंदूक जिनके सीने पर तान रहे हैं वो सब आपके अपने लोग हैं।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी तमाम एसपीओ और कोया कमाण्डों का यह आह्वान करती है कि वे अपनी नौकरियां छोड़कर अपने-अपने गांवों में लौट आएं। जो अपने गांवों में आकर अपने द्वारा किए गए अपराधों को स्वीकारकर जनता से माफी मांगने को तैयार होंगे और सरकारी तंत्र से पुरी तरह नाता तोड़ लेंगे, उनके पुनर्वास का जिम्मा हम, यानी पार्टी और जनता ले लेंगी। जनता की अपनी सरकार जनताना सरकार उन्हें खेती के लिए जमीन और अन्य साधन उपलब्ध करवाएगी। उनकी रोजी-रोटी की गारंटी रहेगी। अतः हम तमाम एसपीओं से अपील करते हैं कि वे शोषक सरकारों के झूठे प्रचार और षड़यंत्रकारी दुष्चक्र से बाहर निकल आएं। उनके जूठन के टुकड़ों के लालच में न फंसें और अपने पैरों पर खड़े होकर अपने गांव में और अपनों के बीच सिर उठाकर जीने के लिए आगे आएं। असुरक्षा और अशांति के माहौल में घुट-घुटकर मत जिएं। जल-जंगल-जमीन पर अधिकार के लिए तथा अपनी अनमोल प्राकृतिक सम्पदाओं की कार्पोरेट लूटखसोट के खिलाफ जारी दण्डकारण्य जनता के न्यायपूर्ण संघर्षों का समर्थन करें।


(गुड्सा उसेण्डी)
प्रवक्ता,
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)