बहस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बहस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 अक्टूबर 2017

प्रो. विवेक कुमार ने सफ़ेद झूठ बोला है, वे संघ के कार्यक्रम में युवाओं में देशप्रेम जगाने गए थे!

दिलीप ख़ान
पहले एक तस्वीर आई। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार ने फेसबुक पर लिखा, “मेरी फोटो शेअर करने वाले ने यह क्यों नही बताया की प्र. विवेक कुमार किस विषय पर भाषण दे रहे थे और इस कार्यक्रम का शीर्षक क्या था. ना ही सामने बैठे श्रोताओं को दिखाया ? ना ही यह बताया इसी संगठन के एक विंग ने ग्वालियर में मेरे उपर हमला करवाया था. केवल फोटो शेयर करके लोगो को गुमराह न करे…आज मुझे अहसास हो रहा है की मै बहुत बड़ी परसोनालिटी बन गया हूँ…क्योंकि बहुत बड़े बड़े लोग इस फोटो को शेयर कर रहे है. मुझे आशा है की मेरा समाज मेरी आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता एवं सत्य-निष्ठा को अवश्य समझेगा..प्रो. विवेक कुमार.”



फिर दूसरी फोटो आई, जिसमें श्रोता दिख रहे थे। फिर तीसरी आई जिसमें विवेक कुमार चंद लोगों के साथ मंच पर बैठे गप लड़ाते दिख रहे हैं।



विवेक कुमार ने पहले पहली तस्वीर को झूठा कहा, फिर सारी तस्वीरों को। इस प्रकरण पर मैंने फ़ेसबुक पर जब लिखा तो कई लोगों ने कहा कि विवेक कुमार फोटो को नकली बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे उस कार्यक्रम में गए ही नहीं। बीते कुछ साल से दक्षिणवर्ती दुनिया द्वारा स्थापित फोटोशॉप के भयंकर दौर में पहली नज़र में मुझे कुछ भी मुमकिन नज़र आता है। मैंने पोस्ट डिलीट कर दी। लेकिन इसी दौर ने हमें यह भी सिखाया है कि हम अपने सीमित ज्ञान के बूते असली फोटो और फोटोशॉप्ड फोटो में अंतर पहचान जाएं! मुझे एक भी तस्वीर फोटोशॉप्ड नहीं लगी। अलबत्ता, विवेक कुमार के दावे को गंभीरता से लेते हुए यह ज़रूर लगा कि प्रामाणिक जानकारी के साथ इस पर लिखा जाना चाहिए क्योंकि जिस व्यक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है वह ऐसे किसी कार्यक्रम के होने की दावेदारी को ही नकार रहा था/है।



तस्वीर में मौजूद जिस एक व्यक्ति को मैं निजी-सार्वजनिक तौर पर जानता हूं वह व्यक्ति अगर समूचे कार्यक्रम और वहां अपनी भागीदारी को झुठला रहा हो तो कोई वजह नहीं बनती थी कि विवेक कुमार की बातों को न माना जाए। लेकिन बातों को मानने के दौरान आंखों में पानी का छींटा मारकर थोड़ा चौकन्ना हुआ तो विवेक कुमार की तरफ़ से परस्पर विरोधी दावों का मैंने पता लगाना शुरू किया। शुरुआत में कार्यक्रम के बारे में जो जानकारियां हाथ लगीं वो हैं-

स्थान- संजय वन, भारतीय जनसंचार संस्थान के बगल में 

तारीख़-  8 अक्टूबर 2017

टाइम-  सुबह के 8-9 बजे

आयोजक- RSS का आरके पुरम खंड

ये सब आसानी से पता चल गया लेकिन विवेक कुमार और उनके तरफ़दार ‘कार्यक्रम का विषय’ पूछते रहे। संघ के कई लोगों से मैंने पता किया। कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों से भी मैंने जानना चाहा कि विवेक कुमार ने क्या बोला? आम तौर पर चकल्लस में रहने वाले 12वीं से ऊपर के संघपरस्त छात्रों का ध्यान बहुत ज़्यादा भाषणों पर नहीं टिकता और तब तो और भी नहीं जब भाषण पार्क में हो। सो, एक ने बताया कि विवेक सर ने अपने जीवन संघर्षों और उपलब्धियों पर भाषण दिया।

यह संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं था। 12वीं से ऊपर के छात्रों के लिए आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में विवेक कुमार के सिर्फ़ जीवन संघर्षों और उपलब्धियों को सुनने के लिए संघ क्यों उन्हें न्यौता देगा? फिर संघ के कुछ और लोगों से बात हुई और अंत में संघ के राजीव तुली से। राजीव तुली से पता चला कि राष्ट्रनिर्माण में युवा की भादीदारी और उनके भीतर देशप्रेम जगाने जैसे किसी मुद्दे पर विवेक कुमार ने भाषण दिया, जिसमें प्रसंगवश उन्होंने अपने जीवन के भी कुछ किस्से भी सुनाए।



मंच पर हरे रंग के कुर्ते में जो सज्जन बैठे हैं उनका नाम जतिन है, जिन्हें संघ के लोग पारंपरिक तरीके से जतिन जी कहते हैं। वे दिल्ली RSS के सह प्रांत प्रचारक हैं। जिस फोटो में विवेक कुमार कुछ लोगों के साथ बैठकर गप मार रहे हैं उनमें बैठा एक व्यक्ति जेएनयू में ही कंप्यूटर साइंस जैसा कुछ पढ़ाते हैं।

संघ के लोगों से जब मैंने इस बाबत जानकारी चाही तो उनमें से एक ने इस बात पर हैरानी जताई कि विवेक कुमार इस बात से कैसे मुकर सकते हैं कि वे कार्यक्रम में शरीक हुए। राजीव तुली ने कहा विवेक जी को ऐसा नहीं करना चाहिए। वे गए थे और उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐसा स्वीकार करना चाहिए। हालांकि राजीव तुली ने इस मामले को तूल देने की कोशिश करने वाले हम जैसे लोगों की सहिष्णुता पर भी सवाल उठाए कि विवेक कुमार अगर संघ के कार्यक्रम में चले गए तो बाक़ी लोग इसमें क्यों इतना उतावलापन भरी रुचि दिखा रहे हैं।

संघ का मानना है कि वह हर विचारधारा के लोगों को बुलाने के लिए मंच मुहैया कराने की कोशिश में जुटा है। ज़ाहिर है कि संघ का मंच इस मायने में विलग विचारधारा के लोगों के लिए बेहद सुरक्षित और मुफ़ीद है क्योंकि दूसरे मंच से अगर यही लोग बोलने जाते हैं तो संघ के लोग उन पर हमला तक कर बैठते हैं। विवेक कुमार जब ग्वालियर गए थे तो ABVP के लोगों ने उन पर हमला किया था। TISS प्रशासन ने आख़िरी मौक़े पर कार्यक्रम रद्द कर दिया था या फिर विवेक कुमार को आने से मना कर दिया था।

RSS रह-रह कर इन दिनों आंबेडकर को को-ऑप्ट करने की कोशिश में जुटा है। बहुत मुश्किल काम ले लिया है RSS ने। उससे न तो आंबेडकर पकड़ा जा रहा है और न छोड़ा। इसलिए हो सकता है वो आंबेडकर पर बिल्कुल अपनी लाइन से उलट वालों को भी बुलाकर लोगों को लामबंद कर रहे हों। मज़दूरों-किसानों-दलितों का विंग तो पहले से ही मौजूद है। इनमें वो कई बार जेनुइन मुद्दे उठाकर फिर उसकी भोंडी व्याख्या कर नकली और अश्लील चेतना का विकास करते हैं, जो लोगों के वर्गीय-जातीय हितों के उलट होता है।

संघ और विवेक कुमार दोनों का पक्ष सुनने के बाद मुझे अब सच में यक़ीन हो गया है कि दुनिया बेहद लोकतांत्रिक हो गई है और भारतीय समाज लोकतंत्र की पराकाष्ठा को छू चुका है। जाहिर तौर पर संघ की पताका लोकतंत्र के टीले पर उदार विचारधारा के सबसे बड़े नुमाइंदे के तौर पर अपना नाम दर्ज़ करा रही है। विवेक कुमार भी बेहद लोकतांत्रिक हो चुके हैं कि उन्हें बाएं-दाएं-ऊपर-नीचे हर मंच पर ‘अपनी बात’ रखने में कोई परेशानी नहीं होती। कथ्य और विषयवस्तु ही अहम है, मंच गौण। कथ्य नाम के आदर्शवादी शब्द ने मंच नाम के भौतिकवादी शब्द पर जीत हासिल कर ली है। विवेक कुमार इतने लोकतांत्रिक हो गए हैं कि हमलावर (पूरे दलित समुदाय पर हमलावर) के मंच पर जाने में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। हो सकता है कि वे सच में इतने ही लोकतांत्रिक हों, लेकिन उनके इस ‘जाने’ को RSS ख़ुद के लोकतांत्रिक होने की दावेदारी और चिह्न को मज़बूती से पेश करने की कोशिश कर रहा है। किसका फ़ायदा हुआ?

दिलचस्प यह है कि विवेक कुमार की फोटो इंटरनेट पर सबसे पहले संघ के लोगों ने शेयर की क्योंकि कार्यक्रम में शरीक श्रोतागण उसी खित्ते के थे। या तो हम इस शेयर करने को सामान्य तौर पर फेसबुकिया परिघटना के दायरे में अनिवार्यत: ‘एटैंडिंग ए प्रोग्राम विद मुन्ना एंड 48 अदर्स’ नामक ललक का नतीजा मान लें, या फिर इसे ‘लीक’ मान लें। लीक करने से संघ का कोई नुकसान नहीं है। नुकसान विवेक कुमार और संघविरोधी खित्ते में हैं, जिसमें लोग विवेक कुमार से सवाल पूछेंगे, उनकी राजनीति पर सवाल पूछेंगे, इसी बहाने दलित आंदोलन और आंबेडकरवाद पर सवाल उठेगा, लेफ़्ट के लोग चपेट में आएंगे कि संघ के मंच पर किसी के पहुंच भर जाने से वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठता है? संघ का तो सब कुछ बम-बम है। आप देखिए न कि विवेक कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में भी फोटो शेयर करने वाले ग़ैर-संघी लोगों को ही निशाना बनाया है।

अगर विवेक कुमार गए, तो उन्हें मान लेना चाहिए था। झूठ बोलना अच्छी बात नहीं है। ख़ासकर तब, जब आप शिक्षक हों। झूठ क्यों बोले? इसका मतलब आप मानते हैं कि वहां जाना ‘ठीक’ नहीं था। यानी आप ख़ुद संघ के मंच पर जाने को ‘ग़लत’ मानते हैं और जब ख़ुद वहां चले गए और लगा कि एक वैचारिक ज़मीन पर रहने वाले लोग आपसे पूछेंगे तो आपने झूठ बोलना शुरू कर दिया। कम्यूनिकेशन और साइकोलॉजी में इसे ‘कॉग्निटिव डिजोनेंस’ कहते हैं, जिसमें लोग वो करते हैं जिसे वो करना ठीक नहीं समझते। और जब वो कर लेते हैं तो उसे ढंकने के लिए ऐसा तर्क गढ़ने की कोशिश करते हैं जिससे उनका कृत्य छुप जाए। लेकिन इस मामले में विवेक कुमार ने ढंकने के लिए तर्क के बजाय झूठ का सहारा लिया। इससे फौरी तौर पर उनका वहां जाना कई लोगों को काल्पनिक लगा, लेकिन जब सच्चाई सामने आ ही गई है तो उनके चरित्र में झूठ नाम की अतिरिक्‍त चीज़ भी जुड़ गई। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमें दुख हुआ है और दुखी होने के चलते ही यह सब लिखा। उम्मीदों का क्या है, पता नहीं किस गली में टूट जाए। जो लोग उम्मीद बचा लेते हैं, उन्हें बचा लेनी चाहिए। 

बाक़ी संघ का क्या है। कई आंदोलनों और आंदोलनकारियों को अपने कार्यक्रम में बुला-बुलाकर सम्मानित कर-कर के पूरी लीगेसी को शून्य कर देने की उसकी पुरानी ट्रेनिंग है। लोग बताते हैं कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उत्‍तराखण्‍ड क्रांति दल के ज़्यादातर लोगों को संघ गांव-कस्बों में किसी भी कार्यक्रम में बुलाकर फूल-माला पहना देता था। उन्हें अच्छा लगता था कि कोई तो पूछ रहा है। फिर, धीरे-धीरे और अच्छा लगने लगा। जब उससे भी और अच्छा लगा तो फूल-माला की उन्हें आदत पड़ गई और फिर संघ ने बाहें फैलाकर कहा कि आओ, समाहित हो जाओ। फिर आधे समाहित हो गए और जो बचे, उनमें से ज़्यादातर कब दाएं मुड़ेंगे और कब बाएं और कब बीच में खड़े रहेंगे, कोई नहीं जानता।

02 जनवरी 2016

महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं और क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं

पुरानी बहसों और आलोचनाओं के जरिए क्रांतिकारी आलोचनाओं ने अपने को आगे बढ़ाया। आंदोलन के भीतर दलित मुद्दोंं को लेकर जो बहस हुई उससे कई लोगों को पार्टी से विमुख होना पड़ा, पर उन बहसों ने आंदोलन के भीतर दलित एकजुटता के लिए बाद में एक नई दिशा तय की। जेंडर मुद्दों पर ये एक ज़रूरी बहस है जिसपर विचार-विमर्श की ज़रूरत है।


जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-1

सन 2004 में महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा क्रांतिकारी एजेंडे में महिलाओं के लिए जगह को लेकर क्रांतिकारी आंदोलन की बढ़ती हुई आलोचना के मद्देनजर क्रांतिकारी आंदोलन की ओर से इस मुद्दे पर एक बातचीत की पहल की गई (इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 6 नवंबर, 2004). यह बातचीत जहां रखी गई, वहां दो बैनर लगाए गए थे, जिन पर यह नारा लिखा हुआ था: मजदूर वर्ग की मुक्ति के बिना औरतों की आजादी नहीं हो सकती.इसका मतलब यह है कि क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं होगी. दूसरे बैनर पर लिखा था औरतों के बिना क्रांति नहीं”. इन नारों को सरसरी नजर से देखने पर शायद शब्दों में बारीक बदलाव पर नजर न जाए, लेकिन असल में ये नारे ऐसे होने चाहिए थे: महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहींऔर क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं”. इनमें से कोई भी एक नारा, दूसरे के बिना बेमानी है. क्रांति एक प्रक्रिया है जिसमें पितृसत्ता और उत्पीड़नकारी लैंगिक रिश्तों के खिलाफ लड़ाई समाज के क्रांतिकारी बदलाव का ऐसा हिस्सा है, जिसको अलग नहीं किया जा सकता है. लेकिन हम पाते हैं कि इस सवाल पर क्रांतिकारी आंदोलन का रवैया ऐसा है कि इसने ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझदारी को ही पलट दिया है. यहां क्रांति अपने आप में ही एक मकसद हो गई है, जिसको अगर एकबार हासिल कर लिया गया तो इसके नतीजे में अपने आप ही महिलाओं की मुक्ति हो जाएगी. जबकि इसके उलट, असल में पितृसत्ता, या जाति व्यवस्था, के खिलाफ लड़ाई क्रांति की प्रक्रिया के दौरान हमेशा चलती रहती है और ऐसे संघर्षों के जरिए ही यह बात तय होती है कि क्रांति और उसके बाद आने वाले समाज की शक्ल क्या होगी. लेकिन जब कोई यह कहे कि क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहींऔर औरतों के बिना क्रांति नहीं”, तो उसका मतलब यह होता है कि पितृसत्ता एक ऐसा सवाल है जिसपर सिर्फ तभी गौर किया जाएगा, जब एक बार क्रांति हासिल कर ली जाएगी. और जब तक ऐसा नहीं हो जाता, महिला कैडरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे एक औरत के रूप में जिस उत्पीड़न का सामना करती हैं, उसके बारे में सवाल उठाने के बजाए इस क्रांति को कामयाब बनाने के लिए अहम भूमिका अदा करें. मानो, उनके द्वारा अपने उत्पीड़न के बारे में सवाल उठाना, सिर्फ ध्यान बंटाने वाली एक चीज हो. मानो यह क्रांति की मौजूदा जरूरतों से सिर्फ एक भटकाव हो. क्रांति के बारे में ऐसी समझदारी इन दोनों संघर्षों को अलग अलग करके देखती है, मानो पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष सामाजिक बदलाव के क्रांतिकारी संघर्ष का हिस्सा न हो.

रोजाना के संघर्ष और क्रांति के व्यापक सवाल के बीच इस गलत और झूठे अलगाव ने जो स्थिति पैदा कर दी है, उसमें ऐसा दिखता है कि दशकों से महिला आंदोलन और कार्यकर्ता द्वारा हिंसा, शादी, तलाक, यौनिकता (सेक्सुअलिटी) वगैरह के बारे में जो सवाल उठाते रहे हैं, उन पर सिर्फ तभी गौर किया जाएगा, जब एक बार क्रांति हासिल कर ली जाए. पिछले तीन बरसों से हम क्रांति के व्यापक सवाल से महिलाओं के सवालों को अलगा कर उन्हें परदे के पीछे धकेले जाने की ठीक इसी समझदारी पर सवाल करते रहे हैं. हमारा संघर्ष एक सामंती-नैतिकतावादी पितृसत्तात्मक समझदारी से है, जो दशकों से महिला आंदोलनों द्वारा उठाए गए विभिन्न सवालों पर गौर करने के बजाए सिर्फ औरतों पर नियंत्रण और संरक्षण (पैट्रनाइज) करने के काम आती है. हम पाते हैं कि यहां क्रांति को एक प्रक्रिया के रूप में देखने के बजाए और इतिहास को इस तरह समझने के बजाए कि विभिन्न संघर्ष इस इतिहास को गढ़ते हैं, इस सवाल को लेकर एक तरह का कामचलाऊ रवैया है, जो मुख्यत: आम समझ (कॉमन सेंस) पर टिका हुआ है. हमारे समाज के संदर्भ में यह आम समझ मुख्यत: सामंती नैतिकता की पैदाइश है. इस समझदारी को लेकर हमारी जो असहमतियां हैं, उनके अहम पहलुओं का एक खाका हमने अपने इस्तीफे में दिया था. इसलिए हम यहां उनमें से कुछ पहलुओं पर विस्तार में चर्चा करने की कोशिश करेंगे और यह बताएंगे कि हमारे ऐसा कहने के पीछे क्या आधार था.

दुनिया के किसी भी समाज की तरह भारतीय उपमहाद्वीप में भी पितृसत्ता का चरित्र इसकी अपनी ऐतिहासिक खासियतों और उत्पादन के तरीके (मोड ऑफ प्रोडक्शन) के जरिए तय होता है. यहां के समाज में पितृसत्ता की बुनियाद अभी भी मजबूती से ब्राह्मणवादी सामंतवाद पर टिकी हुई है, और इसका साम्राज्यवादी बड़ी पूंजी के साथ गंठजोड़ पितृसत्ता को और मजबूती देता है. यहां तक कि जाति व्यवस्था को कायम रखने में महिलाओं तथा उनकी यौनिकता पर नियंत्रण को लेकर एक ऊपरी समझदारी भी इसको उजागर करती है कि कैसे पितृसत्ता के सवाल को प्रभुत्वशाली अर्ध-औपनिवेशिक सामाजिक संबंधों के दायरे से बाहर रख कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यही संबंध अलग अलग लिंगों के बीच में गैर बराबर शक्ति संबंधों को तय करते हैं. और इसलिए, जिस तरह अर्ध औपनिवेशिक भूमि संबंधों को ठीक ही वर्ग संघर्ष का हिस्सा माना जाता है, उसी तरह महिलाओं की मुक्ति की लड़ाई और जाति के खात्मे की लड़ाई को भी वर्ग संघर्ष का ही हिस्सा मानना जरूरी है. इतिहास गवाह है कि जाति या पितृसत्ता के ढांचों को हमेशा ही चुनौती मिलती रही है. मार्क्सवाद हमें समाज को गति में देखना सिखाता है. अपनी अंतिम अवस्था से गुजर रहा पूंजीवाद, यानी साम्राज्यवाद के दौर का पूंजीवाद, बाजार के जरिए आजादी या चुनाव के जिन विचारों और मूल्यों को बढ़ावा देता है, उनका असली मतलब कभी भी आजादी या चुनाव की आजादी नहीं होता. इस दशा में आते आते, पूंजी अपना प्रगतिशील और लोकतांत्रिक चरित्र खो चुकी है और सामंतवाद के साथ गठबंधन करके वजूद में है. लेकिन, एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी होने के नाते हमारे लिए यह अहम है कि हम अंतिम अवस्था वाले पूंजीवाद द्वारा परोसे जा रहे बुर्जुआ मूल्य/नैतिकता और जाति तथा पितृसत्ता के ढांचों के खिलाफ संघर्षों से जन्म ले रहे लोकतांत्रिक मूल्यों/नैतिकता के बीच फर्क को अलग अलग करके देखें और समझें. हमारे लिए यह पहचानना जरूरी है कि हमारे समाज के संदर्भ में, हमारी चेतना अकेले सामंती और बुर्जुआ मूल्यों/नैतिकताओं के मेल से ही नहीं बनती है, बल्कि यह विभिन्न संघर्षों से और उनके जरिए पैदा होने वाले जनवादी और प्रगतिशील मूल्यों से भी बनती और विकसित होती है - जैसे कि तेभागा व तेलंगाना के संघर्ष, नक्सलवादी आंदोलन, मजदूर वर्ग के विभिन्न संघर्ष, महिला आंदोलन, दलित आंदोलन, एलजीबीटीआईक्यू आंदोलन, राष्ट्रीयताओं के संघर्ष या फिर विभिन्न व्यक्तियों के संघर्ष आदि. ऐसी अनगिनत मांगें, जिनके बारे में कुछ दशकों पहले तक सोचा तक नहीं जा सकता था, वे आज पैदा हो रही हैं तो सिर्फ इसी वजह से कि उनके लिए इन आंदोलनों ने जगह बनाई. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन में इतिहास के दौरान लैंगिकता और पितृसत्ता के सवालों पर हुए इस विकास को कबूल करने और उनके साथ एक संवाद बनाने में लगातार एक हिचक दिखाई दे रही है, जो दिखाता है कि इस मुद्दे पर इतिहास से आंख मूंद ली गई है और दोतरफा तरीके से संवाद करने के बजाए चीजों को सिर्फ ऊपर से लाकर लागू करने का रुझान दिखाई दे रहा है.

लेनिन ने कहा था कि एक क्रांतिकारी सिद्धांत के बगैर क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता.लेकिन लैंगिक पहलू को समझने के लिए इतिहास और सामाजिक संबंधों को लेकर जो समझ की कमी पाई गई है, उसका नतीजा यह है कि क्रांतिकारी आंदोलन यौन हिंसा और पितृसत्तात्मक उत्पीड़न से निबटने के मामलों में तथा इस लड़ाई में दखल देने और अपनी एक जगह बनाने के लिहाज से गलत तरीकों से काम ले रहा है. इसकी मिसाल के लिए हम अलग अलग ऐसे संगठनों के लिखे हुए दस्तावेजों, बयानों या फिर दर्ज किए गए विचारों को पेश करेंगे, जो एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद को मानते और क्रांतिकारी राजनीति पर अमल करते हैं. नारी मुक्ति संघ ऐसा ही एक संगठन है, जिसके राजनीतिक अनुभवों, काम-काज और महिलाओं की विभिन्न समस्याओं को लेकर उनके संघर्षों का एक छोटा सा इतिहास रिवॉल्यूशनरी वुमन्स मूवमेंट इन इंडिया नाम की एक किताब में दिया हुआ है. झारखंड में आदिवासी महिलाओं के संघर्षों और विभिन्न मुद्दों पर नारी मुक्ति संघ के हस्तक्षेप का एक छोटा सा ब्योरेवार इतिहास देने के बाद, यौन हिंसा के सवाल पर इसका विश्लेषण इस तरह शुरू होता है: एनएमएस के इलाकों में यौन उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है. जब भी बलात्कार की घटना होती है, एनएमएस जन अदालत बुलाती है. वह जांच करती है और अगर वह पाती है कि लड़का एक गरीब परिवार से है और टीवी, सिनेमा की साम्राज्यवादी सांस्कृतिक के प्रभाव में आ गया है और अगर वह अपना अपराध कबूल कर लेता है, तो उसे कड़ी चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है.” (रिवॉल्यूशनरी वुमन्स मूवमेंट इन इंडिया, न्यू विस्टास पब्लिकेशंस, पृ.31) यहां भी, यौन हिंसा की वजहें चेतना के दायरेमें देखी गई हैं, जिसको टीवी, सिनेमा की साम्राज्यवादी संस्कृतितय करती है (यह एक ऐसी बात है जो विभिन्न लेखों में आजिज कर देने की हद तक दोहराई गई है). इसका नतीजा सिर्फ यही नहीं है कि बलात्कार के अपराधियों को कड़ी चेतावनीदेकर छोड़ दिया जाता है, बल्कि यौन हिंसा की वजहों को भी गलत तरीके से समझा जाता है. इस संदर्भ में, साम्राज्यवादी संस्कृति की इतने जोर-शोर से की गई आलोचना खतरनाक तरीके से उस प्रतिक्रियावादी समझदारी के बेहद करीब आ गई है, जो कहती है कि एक बाहरी बुराई (इस मामले में साम्राज्यवादी संस्कृति) हमारे एकसार और आदर्श समाज को भ्रष्ट कर रही है और यौन हिंसा को बढ़ावा दे रही है.

जब मामला शहरों से जुड़ा हो, तब तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जन्म देने वाली साम्राज्यवादी संस्कृतिका यह विचार और जोर पकड़ लेता है, क्योंकि ऐसा माना गया है कि इस संस्कृति का असर निम्न-पूंजीपति तबके पर कहीं ज्यादा है. मिसाल के लिए रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट द्वारा अक्तूबर 2013 में लाए गए एक हिंदी बयान को देखें, जो तरुण तेजपाल द्वारा एक पत्रकार पर किए गए यौन हमले के बारे में है. शुरू में इसकी निंदा करने के बाद यह बयान निम्नलिखित विश्लेषण पर उतरता है:

वैश्वीकरण और नवउदारवादी संस्कृति का जिस तेजी से हमारे सामने एक मॉडल खड़ा हुआ है उसे हम कारपोरेट, संसद व विधायिका, मीडिया और साम्राज्यवादी गिरोहों के गठजोड़ में देख सकते हैं। इस गठजोड़ में अहम हिस्सा है महिला को बाजार में सेक्स ऑब्जेक्टके रूप में उतारना। यह साम्राज्यवादी संस्कृति है जिसका गठजोड़ अपने देश में सामंतवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति के साथ हुआ है। मीडिया संस्थानों के मालिकों, प्रबंधकों, संपादकों...में मुनाफे की होड़, संपदा निर्माण और सत्ताशाली होने का लोभ-लालच पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति, आधुनिकता, जीवनशैली आदि आवरण में खतरनाक रूप से ऐसी संस्कृति को पेश कर रहा है जो पूरे समाज और महिला के लिए भयावह स्थिति बना रहा है।

इस समझदारी ने यौन हिंसा को ताकत और सत्ता के अपराध के रूप में देखने के बजाए, इसे महज सेक्स और लालसा तक सीमित कर दिया है. यौन हिंसा को गैर बराबर सामाजिक रिश्ते में निहित ताकत के अपराध के रूप में देखने वाले यह मांग करेंगे कि घर से लेकर काम की जगहों तक सभी जगहों का जनवादीकरण किया जाए, जबकि ऊपर दिया गया आरडीएफ का विश्लेषण आखिर में औरतों के ऊपर मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण को बढ़ावा देता है और अपने ऊपर होने वाले हमलों के लिए खुद औरतों को ही दोष देने की हद तक चला जाता है. इस तरह आरडीएफ के विश्लेषण ने, उन औरतों को एक तरह से खुद अपने पर होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेदार बना दिया है, जो अपनी भ्रमित चेतनाके कारण जीवन शैली/संस्कृति/आधुनिकता/लोकतंत्रके नाम पर परोसी जाने वाली चीजों को अपनाती हैं और कॉरपोरेट मीडिया घरानोंमें काम कर रही हैं. हालांकि हम यहां ये भी जोड़ना चाहेंगे, कि यह आलोचना पेश करते हुए हम यह नहीं कह रहे हैं कि साम्राज्यवाद द्वारा परोसी जा रही संस्कृति या उपभोक्तावाद की हिमायत की जाए, बल्कि हम इस बात की तरफ ध्यान दिला रहे हैं कि जब साम्राज्यवादी संस्कृति या उपभोक्तावाद को अधकचरे तरीके से यौन हिंसा के मामलों की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो यह समस्याजनक हो जाता है.

यह समझदारी कॉमरेड अनुराधा गांधी जैसी वरिष्ठ क्रांतिकारी नेता के लेखन में भी चली आई है. जब उनसे एक इंटरव्यू में शहरी महिलाओं द्वारा झेले जा रहे उत्पीड़न की प्रकृति के बारे में पूछा गया, तो वे जवाब देती हैं कि दूसरी समस्याओं के साथ साथ, “शहरी महिलाओं पर साम्राज्यवादी संस्कृति का असर बहुत ज्यादा है. शहरी जनता न सिर्फ उपभोक्तावाद से प्रेरित है, बल्कि इसकी शिकार भी है, जो इंसानी मूल्यों के बजाए फैशन और सौंदर्य उत्पादों को ज्यादा अहमियत देती है. इस साम्राज्यवादी संस्कृति के नतीजे में, शहरी इलाकों में अत्याचारों और यौन दुर्व्यवहारों की वजह से असुरक्षा का माहौल है.” (स्क्रिप्टिंग द चेंज, पृ.276). दक्षिणपंथी विचारकों और सभी रंगों के संसदीय दलों के नेता यौन हिंसा में इजाफे के लिए टीवी, सिनेमा, फैशन, सौंदर्य उत्पादनों वगैरह पर इल्जाम लगाते हैं, लेकिन जब मौजूदा सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से बदलने के लिए लड़ने वाले आंदोलन भी उनसे मिलता जुलता विश्लेषण करें, तब यह भारी चिंता और खतरे का विषय है. इसलिए हमने इस पर सवाल उठाए, और जब भी हमने ऐसे सवाल उठाए, तो यह सुनने में आया कि हमें अनुराधा गांधी जैसी हस्ती पर सवाल करने या आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है. सवाल है कि यह अधिकार क्यों नहीं है? आखिर वह कौन सी बात है, जो हमें कुछ सवालों और चिंताओं को उठाने से रोकती है, यहां तक कि उन्हें अंदरूनी तौर पर भी नहीं उठाया जा सकता? ऐसे सवाल उठाने पर अगर कोई नाराज होता है, तो यह और कुछ भी नहीं बल्कि मतांधता और पोंगापंथ है. मार्क्सवादी व्यवहार हमेशा ही आलोचनाओं और उन आलोचनाओं के जवाबों से होकर विकसित हुआ है. खुद अनुराधा गांधी भी उन मुट्ठी भर लोगों में से थीं, जिन्होंने जाति के सवाल पर जड़ समझदारी के ऊपर सवाल करना शुरू किया. आखिरकार उनके सवालों ने इस मुद्दे पर मा-ले-मा की समझ को और धारदार ही बनाया. लेकिन यह विडंबना ही है कि जब हमने जेंडर और पितृसत्ता पर उनके कुछ विचारों पर सवाल उठाए तो कुछ लोगों ने कहा कि हमारी सफाईहोना जरूरी है.

पिछले तीन बरसों में हमने बस इस समस्याग्रस्त समझदारी पर एक बहस की मांग की है. लेकिन इसके बदले में हमने सिर्फ और सिर्फ यही देखा कि हमारे द्वारा उठाए गए सवालों को अवैध घोषित करने के लिए हमें बेईमान करार देने की बार-बार कोशिशें की कईं. लगातार इस बेशर्म निरंकुशता का सामना करते हुए, आखिर में हम 21 नवंबर को अपना इस्तीफा सौंपने पर मजबूर हुए, हालांकि विडंबना यह थी कि हम संगठन की एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) और जेनेरल बॉडी दोनों जगहों पर बहुमत में थे. हमारे इस्तीफे के बाद डीएसयू की तथाकथित ईसी एक जवाब लेकर आई. हमारे द्वारा उठाए गए राजनीतिक सवालों और आलोचनाओं पर गौर करने के बजाए, उम्मीद के मुताबिक इस जवाब में भारी लफ्फाजी और तोहमतों (स्लैंडरिंग) की भरमार है. अगर हमारा इरादा किसी को बचाने का था, जैसा कि इस बयान में दावा किया गया है, तो हमारे लिए भारी बहुमत के साथ संगठन में बने रह कर ऐसा करना कहीं आसान था. हमने इसलिए इस्तीफा दिया, क्योंकि हमने यह महसूस किया कि इस संगठन में रहते हुए इस बहस को रचनात्मक रूप से आगे बढ़ाने की कोई जगह और गुंजाइश नहीं बची थी. हमने यह पूरी तरह जानते हुए इस्तीफा दिया कि ऐसा करने के बाद हम पर घिनौने पलटवार होंगे और उससे भी घिनौनी तोहमतों के साथ हमला किया जाएगा. और अगर पिछले महीने भर में डीएसयू के कथित ईसी और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के रवैए को आधार माना जाए, तो इन्होंने असल में हमें सही साबित किया है. जेंडर और पितृसत्ता पर कोई भी बहस, जो मौजूदा हालात और ढांचे को जस का तस बनाए रखने वाली किसी भी पिछड़ी हुई समझदारी पर सवाल करे और उसे चुनौती दे, उसको हमेशा ही घसीट कर व्यक्तियों पर हमलों में बदल दिया जाता है. और फिर तोहमतें, हमेशा ही इस पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथ का ऐसा हथियार रही हैं, जिसे वे खुद को चुनौती देने और सवाल उठाने वाले लोगों के खिलाफ इस्तेमाल करती हैं. और इस मामले में यह रवैया जेंडर और पितृसत्ता पर आंदोलन की सामंती-नैतिकतावादी समझदारी के साथ साफ-साफ मेल भी खाता है. लेकिन यह शोरशराबा, भारी लफ्फाजी, कानाफूसियों के अभियान, तोहमतें और अलग-अलग लोगों के चरित्र के बारे में कही जा रही बातें उन सवालों को दफना नहीं सकतीं, जो हमने उठाए हैं. और हम अभी भी यह उम्मीद करते हैं कि आखिर में क्रांतिकारी आंदोलन इन अहम सवालों पर गौर करेगा, जो इस समाज के क्रांतिकारी बदलाव और समाज के जनवादीकरण के मकसद के साथ इतने करीबी रूप से जुड़े हुए हैं कि उसका हिस्सा हैं.

जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-2


मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की पहचान इतिहास को आगे बढ़ाने वाली ताकत के रूप में की थी. उत्पादन के पूंजीवादी तौर-तरीके के अपने विस्तृत अध्ययन के नतीजे में उन्होंने यह भरोसा जाहिर किया था कि इतिहास की दूसरी क्रांतियों (जैसे बुर्जुआ लोकतांत्रिक क्रांति) के उलट सर्वहारा के नेतृत्व में, जिनके पास खोने के लिए सिर्फ जंजीरें हैं, समाजवादी क्रांति न सिर्फ सर्वहारा को बल्कि पूरी मानवता को ही मुक्ति दिलाएगी. लेकिन मार्क्स ने यह भी दिखाया था कि वर्ग संघर्ष एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जो इतिहास के दौरान अलग अलग सामाजिक व्यवस्था में अलग अलग शक्ल में सामने आता है. इसलिए हर ठोस स्थिति, वर्ग संघर्ष के ठोस विश्लेषण की मांग करती है. पश्चिमी यूरोप में पूंजीवाद ने सामंती सामाजिक संबंधों को खत्म करने में और बुर्जुआ लोकतंत्र को कायम करने में एक प्रगतिशील भूमिका निभाई, जो औपचारिक बराबरी और आजादी के उसूलों पर आधारित था. मार्क्स ने जहां इसके प्रगतिशील चरित्र को कबूल किया, वहीं बुर्जुआ आजादी और बराबरी की सीमाओं को भी उजागर किया था. उन्होंने बताया कि कैसे व्यवस्था की बुनियाद में ही निहित अंतर्विरोध ऐसे हालात को पैदा करेंगे, जिनके बूते पर सर्वहारा एक सामाजिक क्रांति की रहनुमाई करेगा और हर तरह के शोषण को खत्म करके सच्ची आजादी और लोकतंत्र को कायम करेगा. aलेकिन जब उपनिवेशवाद के दौरान पूंजी ने भारतीय उपमहाद्वीप में कदम रखा, इसने वही प्रगतिशील भूमिका नहीं निभाई जो इसने पश्चिमी यूरोप में निभाई थी. सामंतवाद को खत्म करने के बजाए, पूंजीवाद ने उसके साथ गठबंधन कर लिया और उसको सहारा देते हुए एक अर्ध-सामंती संबंध विकसित किया. हालांकि उपनिवेशवाद आखिरकार 1947 में औपचारिक रूप से खत्म हो गया, लेकिन सामंती ताकतों, साम्राज्यवाद और अंबानी, टाटा व बिड़ला जैसे दलाल बड़े पूंजीपतियों द्वारा जन समुदाय का शोषण जारी रहा.

ऐसे जटिल अर्ध-सामंती अर्ध औपनिवेशिक संदर्भ में वर्ग संघर्ष की किसी भी मशीनी समझदारी और उसके इस्तेमाल को नाकाम ही होना है, जैसा कि संशोधनवादी संसदीय वाम की दुर्गति ने बहुत साफ साफ साबित किया है. संशोधनवादी वामपंथ जिस वर्ग संघर्ष की मशीनी और अनगढ़ समझदारी की पैरवी करता रहा है, बरसों से भारत का क्रांतिकारी आंदोलन उसको चुनौती देता आया है. चाहे वह मजदूर वर्ग के संघर्षों, नव जनवादी क्रांति में किसानों की भूमिका, जाति-विरोधी संघर्षों, अल्पसंख्यक सवाल या फिर राष्ट्रीयताओं के आत्म निर्णय के संघर्षों की बात हो, इन सभी पर क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी में इस चुनौती की झलक मिलती है. लेकिन जब पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के उतने ही अहम सवाल की बात आती है, तब हम देखते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी पर एक कामचलाऊ और अनगढ़ सा वर्ग विश्लेषण हावी है. यह समझदारी पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ बड़ेक्रांतिकारी कार्यभार में महिलाओं की भागीदारी तक सीमित कर देती है. जहां क्रांतिकारी आंदोलन की सैद्धांतिक समझ शराबबंदी आंदोलन, विस्थापन विरोधी आंदोलन, सलवा-जुडूम विरोधी आंदोलन या अफ्स्पा विरोधी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका की तारीफ करती है, वहीं वो लैंगिक सवाल को परदे के पीछे धकेल देती है. और बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. असल में यह दशकों से महिला आंदोलनों द्वारा उठाए गए विभिन्न सवालों को असलीक्रांतिकारी वर्ग संघर्ष से भटकाने वाला मानता है.

भारतीय उपमहाद्वीप में पितृसत्ता और जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई वर्ग संघर्ष का अंदरूनी हिस्सा है. बड़ी पूंजी के साथ मिल कर जनता की व्यापक बहुसंख्या का उत्पीड़न और शोषण करने वाले ये अर्ध-सामंती सामाजिक संबंध जाति व्यवस्था और पितृसत्ता से मिल कर बने भी हैं और इसी के साथ उन्हें बनाते भी हैं. एंगेल्स ने यह देखने की कोशिश की कि इतिहास में परिवार और शादी जैसे संस्थान किस तरह विकसित हुए. इस क्रम में उन्होंने यह दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति से होने वाली शादी (मोनोगेमस मैरिज), एक महिला को महज एक यौन शरीर (सेक्सुअल बॉडी) मानते हुए उस पर नियंत्रण का औजार है और इसने ऐतिहासिक रूप से किस तरह निजी संपत्ति और मर्दों के प्रभुत्व को स्थापित करने में एक निर्णायक भूमिका अदा की थी. लेकिन हमारे संदर्भ में, महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण सिर्फ संसाधनों पर नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए ही अहम नहीं रहा है, बल्कि यह जाति व्यवस्था को कायम रखने और उसे चलाते जाने के लिए भी अहम रहा है. दूसरे शब्दों में अगर आज जाति व्यवस्था बनी हुई है और साथ ही जमीन और श्रम पर अर्ध सामंती नियंत्रण भी बना हुआ है तो इसकी वजह यही है कि वे अभी भी अपने अस्तित्व के लिए महिलाओं और उनकी यौनिकता के ऊपर पितृसत्तात्मक नियंत्रण पर बड़े पैमाने पर निर्भर हैं, जिसको जाति के भीतर शादियों की सामाजिक बंदोबस्त के जरिए मुमकिन बनाया जाता है. इस तरह महिलाओं और उत्पीड़ित जातियों के श्रम पर गैर आर्थिक जोर जबरदस्ती और महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण भारतीय उपमहाद्वीप के अर्ध-सामंती संबंधों को कायम रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. और इसलिए जिस तरह अर्ध सामंती भूमि संबंधों के खिलाफ लड़ाई को वर्ग संघर्ष का हिस्सा माना गया है, उसी तरह महिलाओं की मुक्ति के लिए लड़ाई और जाति के खात्मे की लड़ाई को भी वर्ग संघर्ष का अंदरूनी हिस्सा मानना होगा. लेकिन महिला आंदोलन से पैदा होने वाले मुद्दों मसलन यौन हिंसा, शादी, तलाक और अंतरंगता के मुद्दों पर गौर करने, उनके साथ बहस करने और उनकी गहराई में जाने के बजाए क्रांतिकारी आंदोलन इन सवालों को साम्राज्यवादी संस्कृति के असर में जन्म ले रहे एलीट’ (अभिजात) महिलाओं के सरोकार कह कर खारिज कर देता है.

यह व्यवहार अपनी सबसे बदतरीन शक्ल के रूप में इस तरह सामने आता है कि यौन हिंसा, शादी, तलाक और अंतरंगता से जुड़े सरोकारों को उठाने वाली नारीवादियों और महिला कार्यकर्ताओं को फ्री सेक्स थ्योरीके पैरोकार कह कर प्रचारित किया जाता है. आंदोलन नारीवादियों पर साम्राज्यवादी हमले के एक हिस्से के रूप में फ्री सेक्स थ्योरीको बढ़ावा देने का आरोप लगाता है. ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इसको बिना किसी व्याख्या के, एक तथ्य के रूप में पेश किया गया. हम पूछना चाहेंगे- क्रांतिकारी आंदोलन जिसे फ्री सेक्स थ्योरीकहता है, आखिर उसका मतलब क्या है? हम देखते हैं कि किस तरह प्रतिक्रियावादी ताकतें यौन हिंसा और पितृसत्तात्मक नियंत्रण पर सवाल उठाने वाली और परिवार और शादी जैसे संस्थानों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली नारीवादियों और महिला कार्यकर्ताओं पर इसी भाषा में हमला करती हैं (मिसाल के लिए सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा जेएनयू को फ्री सेक्स नक्सलाइटों और जिहादियोंका गढ़ बताने वाली टिप्पणी देखें). फिर ऐसे  कल्पित शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या क्रांतिकारी आंदोलन भी उन्हीं प्रतिक्रियावादी ताकतों जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है? बेशक, ऊपर बताए गए अनेक सरोकारों को दशकों से अलग अलग धाराओं के महिला आंदोलन और नारीवादी उठाती रही हैं. यह भी सच है कि उनमें से अनेक का बहुत सीमित एजेंडा है और नारीवाद खुद अलग अलग धाराओं में बंटा हुआ है. लेकिन एक अर्ध-सामंती अर्ध-औपनिवेशिक संदर्भ में जहां क्रांति की अवस्था अभी नव जनवादी ही है, हर उस संघर्ष को अपना सहयोगी मानना चाहिए जो उत्पीड़नकारी सामाजिक संबंधों और संस्थानों को निशाने पर लेता हो या उसे चुनौती देता हो, न कि उसके साथ अपने दुश्मन के रूप में व्यवहार करना चाहिए. एक क्रांतिकारी पार्टी या क्रांतिकारी आंदोलन की भूमिका इन सवालों को समग्रता में उठाने और उन्हें दूसरे सामंतवाद विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों के साथ जोड़ कर अपने मोर्चे को और व्यापक बनाने की होनी चाहिए. हालांकि इस मामले में, हम यह पाते हैं कि पेश किया गया नजरिया और व्यवहार दोनों ही यह है कि ये सवाल अपने आप में ही भटकाने वाले हैं और उनमें ऐसे एलीट सरोकारों की झलक मिलती है, जिनको खास वर्गीय नजरिए जन्म देते हैं. इससे भी बढ़कर वे एक साम्राज्यवादी साजिशका हिस्सा हैं. खारिज कर देने और बदनाम करने का ऐसा रवैया और कुछ नहीं बल्कि घमंड और अहंकार है. यह सही है कि शासक वर्ग हमेशा ही सभी किस्म के लोकतांत्रिक आंदोलनों और उनके नेताओं को अपने में मिला लेने की कोशिश करते हैं. यह भी सच हो सकता है कि महिला आंदोलन आंशिक रूप से शासक वर्गों से जाकर मिल गए हों. लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आंदोलनों द्वारा उठाए गए मुद्दे और सरोकार अप्रासंगिक या कम महत्वपूर्ण हो गए हैं? तब तो हमारे पास कम्युनिस्ट आंदोलनों/पार्टियों के शासक वर्ग के साथ मिल जाने की भी अनेक मिसालें हैं चाहे वह सोवियत संघ हो या चीन या फिर नेपाल में हाल में माओवादी पार्टी की मिसाल. लेकिन इन पार्टियों या आंदोलनों के शासक वर्ग का हिस्सा बन जाने से यह नतीजा निकालना एक विडंबना ही होगी कि समाजवादी क्रांति या नव जनवादी क्रांति के लिए संघर्ष अब अप्रासंगिक हो गए हैं. इसलिए, मुद्दा यह है कि चाहे वो शासक वर्ग का हिस्सा बन गए हों या नहीं, क्रांतिकारी आंदोलन को महिला आंदोलनों या फिर जाति-विरोधी संघर्षों द्वारा उठाए गए मुद्दों और सरोकारों को जरूर ही गंभीरता से उठाना चाहिए, क्योंकि वे हमारे समाज के क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव का हिस्सा हैं.

आइए, यह देखते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन ने शादी, तलाक और अंतरंगता के सवालों पर क्या  नजरिया पेश किया है. हमारे समाज का प्रगतिशील तबका, जिसमें क्रांतिकारी आंदोलन भी शामिल है, व्यक्तियों द्वारा आजादी से शादी के लिए अपना पार्टनर चुनने के लोकतांत्रिक अधिकार का समर्थन करता है. यह अधिकार और साथ में तलाक का अधिकार विभिन्न प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संघर्षों के नतीजे में मंजूर और कबूल किए गए. खास कर इसमें महिला अंदोलनों और जाति-विरोधी संघर्षों की अहम भूमिका रही है. लेकिन जैसे ही दो व्यक्ति बिना शादी किए साथ में रहने का एक सचेत फैसला करते हैं, क्रांतिकारी आंदोलन फौरन उसे अपराध ठहरा देता है. क्रांतिकारी आंदोलन का यह लिखित नजरिया है: जब शादी की उनकी इच्छा हो तब साथ में रहना और जब महसूस हो कि उसकी जरूरत नहीं रह गई है तब अलग हो जाना और कुछ नहीं बल्कि गैरजिम्मेदारी और अराजकता है. ...इसलिए जब एक दूसरे को पसंद करने वाले सदस्य साथ में रहना चाहते हैं तो उन्हें संबद्ध यूनिट को सूचित करना होगा और शादी के लिए इजाजत हासिल करनी होगी. शादी के पहले सेक्स संबंधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.और वे इस मामले में गंभीरहैं. इस मोर्चे पर गंभीरता इतनी भारी है कि इससे किसी भी भटकाव को, यानी मिसाल के लिए शादी के पहले सेक्स या फिर लिव इन संबंधों को एक पराई वर्ग प्रवृत्ति’, ‘गैर सर्वहारा रुझानऔर एक गंभीर उल्लंघनमाना जाता है. जहां तक व्यापक समाज का मामला है, यह इन दोनों तरह के रिश्तों का ही विरोध करता है और उन्हें अपराध ठहराता है, क्योंकि उनमें अर्ध-सामंती सामाजिक संबंधों और नैतिकता में गड़बड़ी पैदा करने की क्षमता होती है. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन इतिहास के गलत पाले में क्यों है? जब एक व्यक्ति आजादी के साथ अपना साथी चुनता है, तो क्रांतिकारी आंदोलन इसे उस इंसान का जनवादी अधिकार मानता है, लेकिन जब एक इंसान बिना शादी किए साथ रहने का फैसला करता है, तो यह इस रिश्ते को ऐसा अराजक व्यवहार कह कर उसे अपराध घोषित कर देता है, जो जहरीली साम्राज्यवादी संस्कृतिऔर पराए वर्ग व्यवहार से प्रभावित है. इस रवैए में सिर्फ इतिहास की अनदेखी ही नहीं की गई है, बल्कि यह सेक्स और यौनिकता के बारे में सामंती नैतिकता से सराबोर है. इससे बस औरतों को मर्दों के संरक्षण में रखने और औरतों पर नियंत्रण की इच्छा की ही झलक मिलती है और यह विचार इस समझ पर आधारित है कि सेक्स और सेक्सुअलिटी को लेकर सारे फैसले और पहलकदमी मर्द करते हैं, जबकि औरतें तो निष्क्रिय होती हैं और हमेशा ही शिकार बनती हैं. यह समझ यौनिकता (खास कर महिलाओं की यौनिकता) और यौन अंतरंगता के बारे में जड़ें जमाए गहरी बेचैनी से पैदा होती है, जो इन्हें किसी तरह की एक ऐसी प्राकृतिक इच्छा के रूप में देखती है, जिसे अगर काबू में नहीं किया गया तो इसका अंजाम यौन अराजकता’, अफरा-तफरी और यौन कमजोरीके रूप में सामने आएगा. सेक्स को, बस धर्म, नशे और जहरीले मादक द्रव्योंकी तरह एक औजार के रूप देखा गया, जिसका इस्तेमाल शोषक वर्ग नौजवानों को क्रांति से भटकानेके लिए करते हैं.

क्रांतिकारी आंदोलन के यहां हालांकि तलाक को स्वीकार किया गया है, लेकिन यह इसको पसंद नहीं करता. क्रांतिकारी आंदोलन को इस जनवादी अधिकार को स्वीकार करने तक से इतनी हिकारत है इसने औरतों को ऐसी चेतावनी तक दे दी है कि अगर वो कई बार अलग हुईं और कई बार शादी की तो वे वेश्या के रूप में पतितहो जाएंगी. ऐसा करते हुए, यह नजरिया शादी को महज सेक्स तक सीमित कर देता है, और उसमें भी मान लिया गया है कि महिलाओं की कोई चाहत, अहसास या इच्छा नहीं होती. एक दूसरी जगह पर, सबसे आमफहम तरीके से यह दलील दी गई है कि सेक्स पर बहुत ज्यादा जोर पश्चिम में यौन हिंसा और तलाक की दरों में इजाफा कर रहा है! एक बार फिर से यह बात भुला दी गई है कि शोषणकारी रिश्तों और शादियों से अलग होने और तलाक के अधिकारों को महिलाओं ने एक मुश्किल लड़ाई लड़कर और जीतकर हासिल किया है. ऐसा लगता है कि क्रांतिकारी आंदोलन के लिए सारी समस्याओं की जड़ सेक्स में है, जिसकी उन्मुक्तताके खिलाफ अगर एक बार लड़ाई लड़ ली गई तो समाज एक सेहतमंदसमाज बन जाएगा (मार्क्स अपनी कब्र में कसमसा रहे होंगे और गांधी को यकीनन फख्र हो रहा होगा). इसी तरह, क्रांतिकारी आंदोलन, शहीदों की पत्नियों को फिर से शादी करने की इजाजत देता है, लेकिन यहां भी उन्हें मातम से उबरने के नाम पर एक साल की मुद्दत अकेले और बिना किसी के साथ गुजारने के बाद ही इसकी इजाजत मिलती है. और दलील दी गई है कि ऐसा न करने पर वे लोगों और साथी कॉमरेडों के बीच मजाक का विषय बन जाएंगी’. तो अगर उस महिला ने, मान लीजिए एक साल पूरा होने से पहले किसी को पसंद करना शुरू कर दिया तो क्या आप इसको एक मुद्दा बना कर उसके बारे में फैसले लेंगे? चाहे यह मुद्दत अवधि छह महीने की हो या चार साल की, इसका फैसला महिला के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. अगर कोई ऐसा कहता है कि यह पाबंदी महिला की खातिर ही लगाई गई है, ताकि उसे मर्दों से बचाया जा सके, तब भी ऐसी नियंत्रण और संरक्षण वाली समझदारी पक्के तौर पर मर्दों के ही प्रभुत्व को जाहिर करती है, क्योंकि महिला की भावनाओं और अहसासों को इस पूरी बहस में रत्ती भर भी जगह नहीं दी गई है. अगर उस महिला को अनुचित तरीकों से परेशान किया जा रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार मर्दों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन औरत पर पाबंदी लगाना आखिर में और कुछ नहीं बल्कि उसको नियंत्रित करना है और अगर वह इस पाबंदी को नहीं मानती है तो जाहिर है कि उसके बारे में नैतिकता के आधार पर राय कायम की जाएगी. क्या हम प्रगतिशीलता की ओट में असल में औरतों को नियंत्रित नहीं कर रहे हैं, ताकि सदस्यों और व्यापक समाज के बीच में एक निश्चित व्यवस्थाको कायम रखा जा सके जबकि जरूरत उनको राजनीतिक रूप से अधिक संजीदा, परिपक्व और समझदार बनाने तथा किसी उल्लंघन को गंभीरता से लेने की है?

जब क्रांतिकारी आंदोलन, संभवत: बिना शादी किए साथ रह रहे लोगों पर चुन चुन कर हमले करने, बदनाम करने या झूठी तोहमतें लगाने को अपनी जिम्मेदारी बना लेता है, तो इस रवैए की जड़ और कहीं नहीं बल्कि सामंती नैतिकतावादी नजरिए में है, जिनको यह आंदोलन कम्युनिस्ट मूल्यकह कर प्रचारित कर रहा है. हम यहां भविष्य में शादी के रूपों, या उनको बनाए रखने या खत्म करने पर चर्चा (या गर्मागरम बहस’) नहीं कर रहे हैं. कोई भी इस स्थिति में नहीं हो सकता है कि वह इस पर राय दे सके या भविष्यवाणी कर सके कि भविष्य में आने वाले बदलावों का स्वरूप क्या होगा या संपूर्ण बदलाव कैसे होंगे जिनकी अनदेखी संभावनाओं को वर्ग संघर्ष (जिसमें भौतिक और विचारधारा दोनों स्तरों पर पितृसत्ता और जाति के खिलाफ संघर्ष अनिवार्य रूप से शामिल है) लाजिमी तौर पर मुमकिन बनाता है. लेकिन जब हम आज की किसी संस्था के पक्ष में या उसको बनाए रखने की दलील देते हैं, तो इसका मतलब यही होता है कि हम भविष्य के बदलावों के स्वरूप की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जिसमें हम इतिहास को मद्देनजर रखने के बजाए आज की नैतिकता और नैतिक तेवर के आधार पर फैसले ले रहे हैं. इसलिए क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए का नैतिक चश्मा पहनने की जगह, हमें एक मार्क्सवादी की तरह इस पर यकीन करना चाहिए कि इतिहास में हमेशा बनी रहने वाली अकेली चीज बदलाव है. एक सचेत राजनीतिक कर्ता के रूप में हमसे यही उम्मीद की जाती है कि हम आज हर जगह पर ज्यादा से ज्यादा जनवादी बनें, और इसमें लैंगिक संबंध भी शामिल हैं. ऐसा मुमकिन है कि एक कम्युनिस्ट पार्टी जिन इलाकों में काम कर रही है, वहां जनवादीकरण की प्रक्रिया उतनी आगे नहीं बढ़ पाई है, जिसकी वजह से पार्टी को इन सवालों पर ऐसे कार्यनीतिक नजरिए अपनाने पड़ते हैं (मिसाल के लिए जो कैडर लिव इन में रह रहे हों, उन्हें खुद को शादीशुदा के रूप में पेश करने जैसी सलाह). लेकिन जब हमारा कार्यनीतिक नजरिया ही हमारा रणनीतिक नजरिया बन जाए और हमारी राजनीतिक समझदारी की बुनियाद के रूप में काम करने लगे, तब यह दिखाता है कि हमने उन्हीं सामंती मूल्यों को अपने भीतर उतार लिया है, जिनके खिलाफ लड़ने का हम दावा कर रहे हैं.

जब हम कम्युनिस्ट मूल्यों की बात करते हैं तो यह समझना जरूरी है कि यह ऐसी कोई आध्यात्मिक अवधारणा नहीं हो सकती, जो इतिहास से ऊपर और परे हो. ऐसे मूल्य आसमान से नहीं टपकते और यकीनन पिछली दो सदियों के दौरान वे जस के तस नहीं बने रहे हैं. वे विभिन्न संघर्षों के जरिए विकसित हुए हैं और मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझदारी से लैस एक क्रांतिकारी पार्टी से यह उम्मीद की जाती है कि उसमें समाज में सबसे आगे बढ़ी हुई चेतना का प्रतिनिधित्व होगा. वह जन समुदाय से पीछे रहने का जोखिम नहीं मोल ले सकती और न ही उसे जन समुदाय के आगे बढ़ जाना चाहिए. कम्युनिस्ट पार्टी मेहनत करने वाले वर्ग को संगठित करती है और सबसे उत्पीड़ित अवाम के बीच काम करती है और समाज के क्रांतिकारी बदलाव के संघर्ष के दौरान उनकी चेतना को विकसित करने की कोशिश करती है. लेकिन यह एकतरफा प्रक्रिया नहीं है, जिसमें चीजें ऊपर से नीचे की तरफ आती हैं, बल्कि आंदोलन अवाम से भी सीखता है. यह संघर्ष के दौरान हासिल किए गए अपने अनुभवों का मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के उसूलों की रोशनी में विश्लेषण करता है और एक बेहतर समझदारी तक पहुंचता है. यह जनता से लेकर जनता को सौंपने की हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है. जिस दिन यह प्रक्रिया रुक जाती है, समझदारी के नाकारा बन जाने का जोखिम पैदा हो जाता है. साम्राज्यवाद के दौर में मरणासन्न पूंजीवाद आजादी और चुनाव की जो झूठी और लुभानेवाली अवधारणाएं फैला रहा है, उनके बारे में जनता और कैडरों को राजनीतिक शिक्षा देना जरूरी है, लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन के लिए यह उतना ही जरूरी है कि वह अपने विस्तृत विश्लेषण के जरिए इसको दिखाए कि कैसे सामंतवाद के साथ सांठ-गांठ में मरणासन्न पूंजी पितृसत्तात्मक उत्पीड़न को बढ़ावा दे रही है. लेकिन ऐसे जटिल सवाल के प्रति कोई भी चोर गली या कामचलाऊ तरीके का अंजाम सिर्फ यह होगा कि आंदोलन ऐसे सरल नतीजों पर पहुंचेगा, जिसमें पितृसत्ता के खिलाफ जनवादी संघर्षों से पैदा होने वाली उपलब्धियों, उम्मीदों या मांगों को एक ही झटके में जहरीली’ ‘फूहड़’ ‘साम्राज्यवादी संस्कृतिकी उपज बता कर खारिज कर दिया जाएगा. और ऐसा करते हुए, हम वापस हर जगह पर हावी सामंती-नैतिकतावादी सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) के फंदे में जा गिरेंगे, और इसी आम समझ को कम्युनिस्ट मूल्योंके रूप में पेश करने लगेंगे, जैसा कि क्रांतिकारी आंदोलन द्वारा पेश किए गए नजरिए में जाहिर होता है.


जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की आलोचना-3


हैदराबाद में महिला संगठनों और क्रांतिकारी आंदोलन के प्रतिनिधियों के बीच 2004 में आयोजित बातचीत में अनेक कार्यकर्ताओं ने क्रांतिकारी आंदोलन में राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी का मुद्दा उठाया (ईपीडब्ल्यू, 6 नवंबर, 2004). उनका कहना था कि हालांकि आदोलन में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व चिंताजनक ढंग से कम है. जवाब में आंदोलन के प्रतिनिधियों ने पार्टी में पितृसत्तात्मक नजरिएकी मौजूदगी को खुल कर कबूल किया. उनके मुताबिक इसकी बड़ी वजह यह है कि सदस्य ऐसी चेतना लेकर आते हैं, जिस पर उनकी पृष्ठभूमि का भारी असर होता है. उन्होंने इस संदर्भ में एक दूसरी समस्या की पहचान करते हुए यह बताया कि औरतें पारिवारिक विचारधारासे पार पाने के नाकाबिल होती हैं, जो उन्हें राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व की भूमिकाएं अपनाने से रोकती है. उन्होंने यह भी कहा कि साम्राज्यवाद और सामंतवाद को मिटाना, पितृसत्ता को मिटाने से आसान है.’ (ईपीडब्ल्यू, 6 नवंबर, 2004). लेकिन ऐसा क्यों है? क्या पितृसत्ता हमारे दिमाग पर हावी वह भूत है, जिसको झाड़ कर उतारा तो जा सकता है, लेकिन जिससे लड़ा और हराया नहीं जा सकता? क्या असल में पितृसत्ता इतिहास की उपज नहीं है, जिसको हमारे मौजूदा समय और संदर्भ में सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों ने गढ़ा है और साथ ही साथ जिसने सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों को भी गढ़ा है? यहां यह मान लिया गया है कि औरतें क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करने के काबिल राजनीतिक कर्ता (पोलिटिकल एजेंट) नहीं हो सकतीं क्योंकि पितृसत्तात्मक विचारधारा उन्हें अपने आसपास के माहौल से बाहर आने की इजाजत नहीं देती. इसलिए आइए, नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर आने से पहले इंसानी एजेंसी और खास कर महिलाओं की एजेंसी के विवादास्पद और जटिल सवाल पर बात करते हैं.

लुई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रूमेर में मार्क्स ने लिखा है, ‘जनता अपना इतिहास खुद बनाती है, लेकिन वह इसे अपने मनचाहे तरीके से नहीं बनाती; वह इसे अपने चुने हुए हालात के तहत नहीं बनाती बल्कि वह यह इतिहास उन हालात के तहत बनाती है, जिनसे वो सीधे-सीधे मुठभेड़ करती है, जो उसे सौंपे गए हैं, जिन्हें अतीत ने उसके हवाले किया है. मरी हुई सब पीढ़ियों की परंपराएं जिंदा लोगों के दिमाग पर बुरे सपने की तरह लदी रहती हैं.’ (https://www.marxists.org/archive/marx/works/1852/18th-brumaire/ch01.htm). इतिहास ने तरक्की नहीं की होती अगर जनता के पास एजेंसी नहीं होती. लेकिन जनता की एजेंसी हमेशा ही उन विचारधाराओं, राजनीतिक और भौतिक हालात के दायरे में और उनसे होकर बनती है, जिसमें वह जीती है. इतिहास के दौरान, जनता ने सामूहिक रूप से और अलग-अलग भी, शासक वर्गों के शोषण और उत्पीड़न का हमेशा ही विरोध किया है और उसके खिलाफ लड़ती आई है. लेकिन ये संघर्ष हमेशा ही जटिल रहे हैं और अनेक स्तरों पर चलते हैं, क्योंकि हरेक दौर में शासक वर्गों का न सिर्फ भौतिक उत्पादन के साधनों पर बल्कि वैचारिक उत्पादन के साधनों पर भी कब्जा रहा है. इस तरह हरेक सामाजिक बनावट में प्रभुत्वशाली विचार, मूल्य और नैतिकता, अपने समय में मौजूद उत्पीड़नकारी और शोषणकारी सामाजिक संबंधों को ऐसे पेश करती है कि वे प्राकृतिक हैं और उनका होना लाजिमी है. इस तरह वे उन्हें जायज ठहराते हुए शासक वर्गों के हितों की सेवा करती है. हालांकि हिंसा या हिंसा की धमकी शासक वर्ग के हाथों में नियंत्रण और प्रभुत्व को बनाए रखने का सबसे बड़ा जरिया होती है, लेकिन किसी भी सामाजिक व्यवस्था की मजबूती और उसका जारी रहना इस बात पर भी निर्भर करता है कि उत्पीड़ित वर्गों ने प्रभुत्वशाली विचारों, मूल्यों और नैतिकताओं को कितना अपने भीतर उतारा है. वर्ग संघर्ष हमेशा ही भौतिक और विचारधारात्मक स्तरों पर लड़े जाते हैं जो मूल्यों और नैतिकताओं के एक नए ढांचे को आगे बढ़ाते हैं, जिसका शासक वर्ग की विचारधारा से टकराव होता है. इंसानी एजेंसी सिर्फ मौजूदा भौतिक हालात से ही तय नहीं होती, बल्कि उसको आपस में लड़नेवाले वर्गों के परस्पर विरोधी विचार, मूल्य और नैतिकताएं भी तय करती हैं. इसलिए इंसानी एजेंसी हमेशा ही वर्ग संघर्ष की या दूसरे शब्दों में कहें तो इतिहास की उपज होती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में जनता की चेतना सामंती और साम्राज्यवादी मूल्यों की खिचड़ी से ही नहीं बनती है, बल्कि तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी आंदोलन, मजदूर वर्ग के संघर्ष, दलित आंदोलन, महिलाओं के आंदोलन, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष, एलजीबीटीआईक्यू आंदोलन और रोजमर्रा के अनगिनत संघर्ष और आंदोलन भी इसको गढ़ते हैं. लेकिन असल में आपस में टकरानेवाले इन मूल्यों और नैतिकताओं के अलग अलग समूह जनता में एक साथ पाए जाते हैं और उसकी कार्रवाइयों और व्यवहार को अहम तरीकों से प्रभावित करते हैं. इसके अलावा, प्रभुत्वशाली मूल्य और नैतिकता उत्पीड़ित जनता की चेतना पर भारी असर डालती है, जो कहीं न कहीं अपने शोषण और उत्पीड़न के ही तर्क को कबूल कर लेती है. भारत में ब्राह्मणवादी सामंती पितृसत्ता की व्यवस्था भी इससे अलग नहीं है, जो बड़ी पूंजी के साथ सहयोग करते हुए अस्तित्व में है. फिर अपने समाज के संदर्भ में हम महिलाओं की एजेंसी को कैसे देखते हैं? क्या सचमुच उनकी कोई एजेंसी है? हां, महिलाओं की एजेंसी है. उनमें अलग अलग तरह की एजेंसियां होती हैं, जिनको वे विचारधारात्मक, राजनीतिक और भौतिक हालात तय करते हैं, जिनमें वे रहती हैं. यहां, इस मुद्दे पर बात को आगे बढ़ाने के लिए, हम महिलाओं की एजेंसियों को दो अलग अलग श्रेणियों में बांट कर देखेंगे, हालांकि असलियत में वे कभी भी अलग अलग नहीं पाई जातीं. पहली तरह की एजेंसी यथास्थितिवादी एजेंसीहोती है, जिसमें सचेत रूप से या अनजाने में प्रभुत्वशाली सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे को कबूल करने का रुझान होता है. हालांकि इस तरह की एजेंसी उत्पीड़ित और शोषित बनी रहती है, लेकिन इसको पितृसत्तात्मक ढांचे से कई तरह के दिखावटी इनामभी हासिल होते हैं और इसको एक सीमित ताकत और शरीफ या गुणवान महिला’, ‘त्याग करने वाली मां’ ‘समर्पित पत्नीवगैरह जैसे रुतबे भी हासिल होते हैं. दूसरी, ‘प्रगतिशील एजेंसीहै, जो सचेत रूप से गैरबराबर लैंगिक रिश्तों और पितृसत्ता पर सवाल करती है और उसके खिलाफ लड़ती है. हमेशा ही इसको प्रभुत्वशाली सामंती और पितृसत्तात्मक ताकतों की ओर से पलटवार का सामना करना पड़ता है. इस तरह की एजेंसी के खिलाफ हिंसा या हिंसा की धमकी इस पलटवार का सबसे आम चेहरा है. हालांकि इस पलटवार के उतने ही हिंसक, दूसरे छुपे हुए और बारीक चेहरे भी होते हैं जिनकी जानबूझ कर अनदेखी कर दी जाती है या उन्हें वाम जनवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों में गंभीरता से नहीं लिया जाता. जो महिलाएं पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाती हैं और अपना अधिकार जताने के लिए बराबरी और आजादी की मांग करती हैं, उनको अक्सर ही बदचलनऔर अनैतिककह कर प्रचारित किया जाता है. इन महिलाओं को सबसे बदतरीन किस्म की तोहमतों और अफवाहों का सामना करना पड़ता है. इसलिए महिलाओं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों के खिलाफ होने वाले प्रचार, उन पर लगाई जाने वाली तोहमतों और अफवाहों को समझना जरूरी है, जो उनकी सामाजिक जगहों (स्पेस) को खत्म करते हैं और उनकी तरक्की और मन:स्थिति पर असर डालते हैं और जो खुद यौन हिंसा/उत्पीड़न के गंभीर रूप हैं. लेकिन सबसे परेशान करनेवाली बात यह है कि हिंसा के इन रूपों पर सिर्फ दक्षिणपंथी ताकतों का ही कब्जा नहीं है, बल्कि वाम जनवादी और क्रांतिकारी हलकों में भी इनकी उतनी ही भरमार है.

क्रांतिकारी आंदोलन में, उन महिलाओं को फ्री सेक्स सिद्धांतकारया बुर्जुआ नारीवादीकह बदनाम करने का रुझान है, जो पितृसत्ता, गैरबराबर लैंगिक संबंधों, यौन हिंसा, शादी और परिवार के संस्थानों के खिलाफ सवाल खड़े करती हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वे साम्राज्यवादी संस्कृति को बढ़ावा देकर जानबूझ कर वर्ग संघर्ष को भोथरा कर रही हैं. क्रांतिकारी आंदोलन जिसे फ्री सेक्स सिद्धांतकहता है, उसका झूठा और घिनौना इस्तेमाल, नेताओं (जो हमेशा ही मर्द होते हैं) और कैडरों को इसमें सक्षम बनाता है कि वे मुश्किल सवाल खड़े करनेवाली महिलाओं के खिलाफ तोहमतें लगाएं (स्लैंडर करें) और उनके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलाएं. अब तक हमारे इस्तीफे पर जो जवाब आए हैं (डीएसयू-बिहार, इन्कलाबी छात्र मोर्चा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भगत सिंह छात्र मोर्चा-बीएचयू) वे इसको बखूबी जाहिर करते हैं. इन जवाबों में, हमारे द्वारा उठाए गए सवालों पर ठीक से गौर करने की कोशिश किए बगैर, हमें स्वच्छंद प्रेमऔर स्वच्छंद यौन सम्बन्धको बढ़ावा देने वाला कह कर प्रचारित किया गया है और कहा गया है कि हमने जो सवाल उठाए हैं उनसे यौन अराजकताफैलेगी. हमारे कैंपस में, छात्रों के आंदोलनों से होने वाले एक तुलनात्मक जनवादीकरण को पचा पाने में नाकाम दक्षिणपंथी संगठन अक्सर ही प्रगतिशील-जनवादी संगठनों और खासकर महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ ऐसे ही प्रचार, तोहमतों और अफवाहों का सहारा लेते हैं. लेकिन डीएसयू-बिहार, आईसीएम और बीसीएम भी ठीक उसी सामंती-नैतिकतावादी बेचैनियों के शिकार कैसे बने हुए हैं? जैसे मिसाल के लिए आईसीएम-बीसीएम के जवाब की निम्नलिखित पंक्तियों पर गौर करें:
गांवों से शहरों में पढ़ने आये या कॉलेज में पहुंच चुके लड़के-लड़कियां अपने सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों को लेकर जब यहां पहुंचते हैं तो वहां वे नये तरह के मूल्यों से टकराते हैं ये हैं साम्राज्यवादी उपभोक्तावादी मूल्य। वे पहले को न तो पूरी तरह छोड़ पाते हैं और नये को अपनाने लगते हैं। दोनों का मेल उनके व्यक्तित्व को विकसित होने से रोक देता है और वे अजीब से मूल्यों के साथ अपनी इस आजादी का इस्तेमाल करना शुरू करते हैं। लड़के-लड़कियां को उनके घरों में जहां देखने की भी मनाही होती है यहां वे साथ में घूम सकते हैं, रह भी सकते हैं। इसका परिणाम अन्य बातों के अलावा स्वच्छंद यौन सम्बन्धों के रूप में सामने आ रहा है, और कई जगहों पर ये संगठनों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। इन जगहों पर संगठन में जुडने वाले लड़के -लड़कियां अपने कामों से ज्यादा आपसी संबन्ध बनाने में या साथ में नशा करने में लगे रहते हैं।’ (https://web.facebook.com/inqalabichhatra.morchaicm/posts/1701916596760293)

इसमें और इस जैसे अनेक बयानों और नजरियों में दो कॉमरेडों के साथ रहने की संभावना को बार-बार खारिज किया गया है, कहा गया है कि ऐसे रिश्तों को कबूल नहीं किया जा सकता!

हमने विभिन्न जेंडरों के बीच यौन हिंसा को शादी के पहले या शादी के बाद के गलत और झूठे बंटवारे के भीतर देखने के बजाए उन गैरबराबर शक्ति संबंधों के भीतर देखने की कोशिश की है, जिनकी जड़ें सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे में हैं. हमारी इन कोशिशों पर उन्होंने यह आरोप लगाया है कि हम पूंजीवादी वेश्यालयों’ (यानी लिव इन संबंधों) को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमें, उनका कहना है कि, औरतों का शोषण हर हालत में लाजिमी है. वे कहते हैं कि एलीटमहिलाएं अपनी भ्रमित चेतना की शिकार हैं, क्योंकि आईसीएम-बीसीएम के मुताबिक मध्यवर्ग और मेहनतकश वर्ग की महिलाओं के उलट एलीट औरतेंशादी के पहले सहमति से बनाए गए संबंधों को पुरुषों की प्राकृतिक यौन आकांक्षाद्वारा अपने शोषण के रूप में नहीं देखतीं! हिंसा, नियंत्रण, मोरल पुलिसिंग और प्रभुत्व के इन सारे सवालों को चंद मुट्ठी भर लोगों के जीवन में आए बदलाव से उपजा हुआ एक वर्गीय सवाल’ (https://www.facebook.com/dawa.sherpa.7543653/posts/1261264183899787) और निजी संबंधों की समस्याएंबता दिया गया है, जिनका मेहनतकश महिलाओं की व्यापक आबादी से कोई लेना देना नहींहै (जबकि वे मर्दों के नियंत्रण की तरफदारी करने वाले अपने नजरिए को औरतों के हित में बताते हैं). अक्सर ऐसा होता है कि गहराई तक धंसी पितृसत्ता और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे के शक्ति संबंधों पर सवाल करने की किसी भी कोशिश पर रूढ़िवादी ताकतें यौन अराजकताके ऐसे ही डर से कांपने लगती हैं. नारीवादियों को हिंसा, शादी, तलाक, यौनिकता वगैरह से जुड़े सवालों को उठाने के लिए अक्सर ही प्रतिक्रियावादी ताकतों की तरफ से ऐसे हमलों और दुष्प्रचारों का सामना करना पड़ता है. लेकिन जब खुद को प्रगतिशील और यहां तक कि क्रांतिकारी कहनेवाली ताकतें भी वही तरकीबें अपनानें लगती हैं, तब विडंबना और भी गहरी हो जाती है. डीएसयू-बिहार, आईसीएम, बीसीएम ने जो कहा है, उस तरह के आक्षेपों और महिलाओं से नफरत तथा पितृसत्तात्मक प्रचार का असर यह पड़ता है कि न सिर्फ इससे मुश्किल सवाल किनारे कर दिए जाते हैं, बल्कि साथ ही साथ यह सवाल उठाने वालों को भी अलग थलग कर देता है. खास कर ऐसा महिला कार्यकर्ताओं के साथ होता है, जिनको बिगड़े चरित्र की, पतित, बदचलन और फ्री सेक्स के सिद्धांत को बढ़ावा देने वाली बुर्जुआ नारीवादीके रूप में चित्रित किया जाता है! यह एक आम बात है कि किसी भी संगठन में आनेवाले कार्यकर्ता अपने साथ अपने समाज की अवधारणाएं और नजरिए लेकर आते हैं, लेकिन एक क्रांतिकारी आंदोलन से यह उम्मीद की जाती है वह उन्हें इन समस्याग्रस्त बातों को छोड़ना सिखाएगा. लेकिन इस सवाल पर, आंदोलन न सिर्फ सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) के विचारों को ही मजबूत करता है, बल्कि सक्रिय रूप से उन नेताओं और कैडरों को इसका साहस भी देता है कि वे सवाल उठाने वालों के खिलाफ तोहमतें लगाकर, बदनाम करके, अफवाहें फैलाकर और उनका चरित्र हनन करके या फिर मोरल पुलिसिंग का सहारा लेकर उनको अलग-थलग कर दें. सिद्धांत में जब ऐसी पितृसत्तात्मक और अलोकतांत्रिक समझदारी हो तो व्यवहार में इसका नतीजा एक ऐसे रवैए के रूप में सामने आएगा, जो मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण वाला और महिला विरोधी हो. और खास कर जब यह समझदारी खुद को मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के मुखौटे में मार्क्सवादी लफ्फाजी और शब्दजाल के साथ खुद को पेश करे, तब तो दुष्प्रचार और तोहमतों (स्लैंडर) की एक ऐसी जबरदस्त और घिनौनी मिसाल बनती है कि उसको महिला विरोधी के रूप में पहचानने की बात कौन कहे, उसको ज्यादातर बढ़ावा ही दिया जाता है.

2004 में क्रांतिकारी आंदोलन के नेतृत्व ने यह कबूल किया कि आंदोलन में पितृसत्तात्मक नजरिया भी है. हालांकि क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी बेहद कम बना हुआ है. ऐसा है, तो फिर क्या यह मुमकिन नहीं है कि जिस तरह व्यापक समाज महिलाओं पर नियंत्रण और प्रभुत्व बनाने की कोशिश करता है, वैसा क्रांतिकारी आंदोलन में भी पाया जाता हो? क्या यह मुमकिन नहीं है कि क्रांतिकारी आंदोलन पितृसत्ता के बारे में अपनी सामान्य बुद्धि/सामंती नैतिकतावादी समझदारी की वजह से सिर्फ उन्हीं महिलाओं को जगह देता हो जो उसके अपने नजरिए के साथ सहमत हों और दोयम दर्जे की मातहत जगहों को कबूल कर लेती हों? क्या यह मुमकिन नहीं है कि मध्यवर्ती कतारों में या कुछ अहम जगहों पर एकाध महिलाओं का होना सिर्फ गहराई तक धंसी पितृसत्ता के साथ लड़ाई की कीमत पर मुमकिन हो पाया हो? कम्युनिस्ट आंदोलनों में नेतृत्व में अपने शुरुआती दौर हमेशा ही निम्न-पूंजीपति तबके से आता है. और हम इसकी ऐतिहासिक जरूरत को समझते हैं. हमने देखा है कि किस तरह पिछले कुछ दशकों में निम्न-पूंजीपति पृष्ठभूमि से आई हजारों महिलाओं ने क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी की है. तब एकाध अपवादों को छोड़ कर वे नेतृत्व के पदों तक पहुंचने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई हैं? क्या ऐसा है कि निम्न-पूंजीपति पृष्ठभूमि से आने वाले मर्द तो फौरन खुद को डी-क्लासकर लेते हैं और सच्चे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन जाते हैं, जबकि महिलाएं अपनी पारिवारिक विचारधारासे पार पाने में नाकाम रहती हैं? या ऐसा इसलिए है कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं फ्री सेक्स सिद्धांतकारऔर इसलिए साम्राज्यवादी एजेंटबन जाती हैं? या फिर इसकी वजह आंदोलन के भीतर के महिलाओं से नफरत करने वाले, सामंती, पितृसत्तात्मक तत्व हैं, जो दुष्प्रचारों, तोहमतों और अफवाहों की मदद से उन महिलाओं के लिए जगहों को खत्म कर देते हैं, जो पितृसत्ता और मर्दों के प्रभुत्व के खिलाफ सवाल करती हैं? वे कोई भी तरीका अपनाएं, चाहे सवाल करने वालों की सफाईकरें या फिर अपना मुंह बंद रखने वालों को बढ़ावा दें, इससे आखिरकार नुकसान तो पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई को ही होता है.

असली जनवादीकरण की प्रक्रिया में न्याय अहम मुद्दा है. नियंत्रण और संरक्षण कभी भी क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों की सचमुच में राजनीतिक भागीदारी को यकीनी नहीं बना सकता. आंदोलन को यह कबूल करना होगा और इस पर अमल भी करना होगा कि महिलाएं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडर भी राजनीतिक कर्ता हैं. क्रांतिकारी आंदोलन का जनवादीकरण भी एक प्रक्रिया है, जो समाज के जनवादीकरण के व्यापक संघर्ष के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है. और यह जनवादीकरण अपने आप नहीं होता. इस दिशा में सचेत कदम उठाने पड़ते हैं. व्यापक समाज की और अपने भीतर की पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई के संदर्भ में, क्रांतिकारी आंदोलन को सबसे पहले महिलाओं तथा दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों के खिलाफ दुष्प्रचारों, तोहमतों और अफवाहों को यौन हिंसा/उत्पीड़न के गंभीर रूपों के रूप में पहचानना होगा और जो लोग इसके जिम्मेदार हों, उनके खिलाफ कार्रवाई करनी होगी. क्रांतिकारी आंदोलन का असली जनवादीकरण, अकेले राजनीति शिक्षा के जरिए ही हासिल नहीं किया जा सकता; न्याय भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. जब औरतें और दूसरे उत्पीड़ित जेंडर यौन उत्पीड़न/हिंसा का सामना करते हैं, तो इसका इल्जाम सिर्फ साम्राज्यवादी संस्कृति पर थोप कर और यह कह कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि इसको राजनीतिक (यानी नैतिक) शिक्षा से ठीक किया जा सकता है. यौन उत्पीड़न/हिंसा, सत्ता और ताकत के अपराध होते हैं, जो उत्पीड़नकारी और शोषणकारी सामाजिक संबंधों से जुड़े हुए हैं और न्याय को यकीनी बनाने के लिए उनपर इसी रोशनी में गौर किया जाना चाहिए.

तब पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई और जेंडर संबंधों के जनवादीकरण की दिशा में बढ़ने का सही तरीका क्या हो सकता है? हमने अब तक इस मुद्दे पर क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी में गंभीर कमियों की आलोचना की है. दूसरे शब्दों में हमने अब तक इसी पर गौर किया है कि इस सही तरीके के दायरे में कौन कौन सी चीजें नहीं हो सकती हैं. और हमने इसकी वजह भी बताई है. हमने किसी भी सार्थक संवाद पर जोर दिया है, और यह अहम बात है कि हम पितृसत्ता की लड़ाई को एक अलग-थलग लड़ाई नहीं मानते बल्कि हम मानते हैं कि यह वर्ग संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है. हमने एक विस्तृत वैकल्पिक नजरिए को पेश नहीं किया और न ही हमारे लिए यह मुमकिन है कि एक विश्वविद्यालय में बैठ कर हम ऐसा एक नजरिया पेश करें. बल्कि इस दिशा में एक अच्छी शुरुआत इस तरह हो सकती है कि राजनीतिक मतभेदों को मंजूर किया जाए और राजनीति पर आधारित बहस के लिए एक जनवादी स्पेस बनाया जाए. लेकिन ऐसी किसी बहस में शामिल होना तो दूर, विचारों के मतभेदों को जगह देना तो दूर, हमने अब तक बस यही देखा है कि किस तरह तोहमतों, दुष्प्रचारों और हमलों की एक आक्रामक लहर ने जो जगह थी, उसको भी तेजी से खत्म किया है. इसी ने आखिरकार डीएसयू से इस्तीफा देने के लिए हमें मजबूर किया. यहां तक कि अब तक हमारे सवालों का जो भी जवाब देने की कोशिश की गई है, उनमें न सिर्फ उसी सामंती-नैतिकतावादी नजरिए को मजबूती से पेश किया गया है, बल्कि इन सवालों और उन्हें उठाने वालों के खिलाफ दुष्प्रचार भी घिनौने रूप में जारी है. इन सबके बावजूद हमने अब तक अपने राजनीतिक मतभेदों को इस यकीन के साथ पेश किया है और आगे भी इसे जारी रखेंगे कि ये बहुत अहम सवाल हैं, जिन पर क्रांतिकारी आंदोलन को ईमानदारी से विचार करना चाहिए. उसे इन पर विचार करना ही चाहिए, क्योंकि पितृसत्ता और जेंडर के अहम सवाल पर ऐसी एक पितृसत्तात्मक, सामंती-नैतिकतावादी, मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण वाली समझदारी के साथ न तो समाज का जनवादीकरण हो सकता है और न ही उसका क्रांतिकारी रूपांतरण हो सकता है.

-अनिर्बाण, अनुभव, आश्वथी, उफक, उमर, गोगोल, प्रिय धर्शिनी, बनोज्योत्सना, रेयाज, रुबीना, स्रीरूपा