टूडे इज हिन्दी दिवसः लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
टूडे इज हिन्दी दिवसः लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

15 सितंबर 2008

हिन्दी दिवसः

संग्रहालय में गांधी प्रतिमा के नीचे दीमक लगी हुई लकडी़ की एक प्लेट टंगी हुई है.जिस पर ११ माह २९ दिन की गर्द जमी हुई है.पिछले १४ सितम्बर को साफ हुई थी आज फिर से साफ हो रही है. सफेद पेंट से लिखे हुए हर्फ़ मिट चुके हैं पर चश्मा लगाकर पढा़ जा सकता है कि हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है-महात्मा गांधी. हिन्दी दिवस हिन्दी के लिये रोने का दिवस है,हिन्दी का गुणगान करने का दिवस है और दिवस है ढेर सारे सवाल खडे़ करने का,हिन्दी के अशुद्धता का सवाल, हिन्दी और तकनीक का सवाल,हिन्दी प्रचार का सवाल आदि-आदि. पर इन सबके बीच एक और महत्वपूर्ण सवाल है १० राज्यों की राज्य भाषा का,या वहाँ के आधिकांश जन की भाषा का, और एक अरब से अधिक लोगों की राजभाषा का सवाल.हिन्दी को आज इस रूप में ज्यादा समझने की जरूरत है कि हिन्दी का भाषा से ही नहीं बल्कि मानवीय उत्पीड़न के भाषा की उस शैली में निहित है जिसके भीतर हम और दूसरे लोग भाषायी रूप से परिभाषित करते हैं. इस रूप में यह भाषा का वर्ग विभाजन है जहाँ भाषायी आधार पर समाज का स्तरीकरण हुआ है और वह एक स्तर पर नहीं बल्कि कई स्तर पर विखण्डित हो चुका है.अंग्रेजी के बढ़्ते प्रभाव के कारण हिन्दी के लिये खतरे देखने की जरूरत नहीं है जबकि इसका आधार भाषा की वर्गीय सवर्णता जिसे भारत जैसे बहुभाषी देश में अन्य भाषाओं व बोलियों में भी देखा जा सकता है और वे अपनी अस्मिता के लिये जूझ रही हैं. दरअसल हिन्दी के बहाने भाषा की उस प्रक्रिया को समझने की जरूरत है जो नवौदारवादी नीति लागू होने के बाद और तेजी से शुरू हुई. नव उदारवादी नीति लागू होने के बाद समाज के सभी तत्वों का केन्द्रीकरण शुरू हुआ और यहाँ से एकाधिकार की प्रक्रिया और तेज हुई जिससे भाषा को अछूता नहीं रखा जा सकता था बल्कि भाषा का संप्रेषणियता से सीधा संबन्ध है इसलिये राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक भाषा का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी अन्य भाषा का एकाधिकार होना लाजमी था.अतः हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा तो नहीं बन सकी बल्कि राजभाषा के रूप में भी इसे लागू किया जाना कठिन काम बन गयाक्योंकि अब राष्ट्र के द्वारा किये गये काम काज को सिर्फ राष्ट्र के अंदर तक सीमित नहीं रखा जा सकता था, इसका लेखा जोखा वर्ल्ड बैंक को देना है,डब्लू.टी.ओ. को देना है, व दुनिया के उन आकाओं को जो हमारे खाने तक पर नजर रखते हैं, आर्थिक व अपरिक्ष रूप से जो देश दुनिया पर शासन कर रहे हैं उनको आप हिन्दी में लेखा जोखा नहीम दे सकते, अतः अंतर्राष्ट्रीय रूप से भाषा का भी साम्राज्यीकरण हुआ है. भारत के प्रतिनिधि व वर्चस्वशाली वर्ग को अपने अस्तित्व को बचाने व पूजी की व्यवस्था को मजबूत करने के लिये अंग्रेजी सीखना जानना जरूरी है.पिछले वर्ष हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर न्युयार्क के हिन्दी सम्मेलन में जोरदार आवाज उठी यह मांग १९७५ नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से उठ रही है.देर सबेर यह मांग पूरी भी कर दी जायेगी क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में वर्चस्व शाली देशों को भारतीय व अन्य हिन्दी भाषी देशों में बाजार की संभावना पता है.जिसकोलेकर अमेरिका व अन्य कई देश अपने यहाँ हिन्दी के पठन-पाठन की तरफ तत्पर हैं. ताकि वे बेहतर ढंग से न सिर्फ भारत बल्कि मारिसस,शूरीनाम, फ़िजी,गयाना आदि में प्रवेश कर सकें. आज यदि कुछ वर्चस्व शाली देश अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन की संस्कृति को विकसित कर रहे हैं तो उनका मकसद दो सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित करना नहीं है बल्कि इस दूसरे या तीसरे स्थान पर सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के जरिये उन लोगों तक पहुंचना है जहाँ हिन्दी बोलकर वे सहजता से अपना माल बेंच सकें. हिन्दी भाषा एक बडे़ समाज,संस्कृति, इतिहास, राष्ट्र, की अस्मिता और उसके भाषायी लक्ष्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है. किसी भाषा का विकास दिवस मनाने, प्रचार समिति गठित करने,विश्वविद्यालय खोलने व शिक्षण संस्थान चलाने से नहीं होती है. उसके लिये जरूरत है मौलिक शोध की और यह शोध समाज, विज्ञान, तकनीक व उन सभी क्षेत्रों में होनी चाहिये जो वर्तमान दौर में समाज में कायम हैं या होते जा रहे हैं.इस रूप में हिन्दी में मौलिक शोध व चिंतन की प्रक्रिया उतनी नहीं हुई जितनी की यह लोगों के बीच में बोली जाती है.यदि यह तीसरी या दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है तो यह दुनिया का एक बडा़ समुदाय होगा,होना यह चाहिये था कि तकनीक,चिकित्सा, विज्ञान के क्षेत्रों में इसी अनुपात में या कमोबेस मौलिक शोध व अनुसंधान होते पर इस बडे़ वर्ग ने कोई खास मौलिक शोध नहीं किया यदि किया भी तो वह हिन्दी के माध्यम से न होकर अंग्रेजी के माध्यम में हुआ. एक और मामला हिन्दी के साथ जुडा़ हुआ लगता है कि वह क्षेत्र जहाँ हिन्दी पढी़, बोली समझी जाती रही है उस क्षेत्र में चिंतन का आधार भौतिकवादी नहीं था और आज भी नहीं है.वह समाज आध्यात्मवादी चिंतन का समाज है जहाँ समस्याओं की खोज आध्यात्म में की जाती रही है.इसलिये यहाँ मौलिक शोध का विकास नहीं हि सका. पर भाषायी आधार पर जब अन्य भाषायी समाज की निर्मित चीजों का अनुवाद तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा किया गया तो उसे जनस्वीकृति उस तरह से नहीं मिल सकी भले ही वे कम्प्यूटर को संगणक व माउस को चूहा कहते रहें पर वह अपने प्रचलित शब्दावली में ही सहज ग्राह्य हो चुका था.इस रूप में यह आवश्यकता है कि हिन्दी में वैज्ञानिक चिंतन के जरिये मौलिक शोध व विमर्श को स्थापित किया जाय. १९७५ में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में जो कि नागपुर में हुआ था इस बात को लेकर एक अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की अवधारणा रखी गयी थी जहाँ पर नये मानवकी विषय व तकनीक के जरिये हिन्दी में शोध व विकास की बात सोची गयी थी. १९९७ में जो वर्धा में स्थापित हुआ और २००२ से अध्ययन-अद्यापन का कार्य भी चालू किया गया, पर वर्तमान में स्थिति ये है कि वह ५ सालों में ही मौलिक शोध और विमर्श को छोड़ चुका है भाषा प्रौद्योगिकी व मीडिया जैसे विभाग शोध व विमर्श के बजाय यहाँ के छात्रों को चैनल व अन्य संबन्धित संस्थानों का नौकर बना रहें है.

14 सितंबर 2007

बाजारवाद की गिरफ्त में हिन्दी:-



आज हिन्दी दिवस है,अन्य ढेर सारे दिवसों की ही तरह......
विवेक जी महत्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र है, हिन्दी को बाजार में किस तरह से यूज किया जा रहा है? उसके क्या कारण है? हिन्दी के विकास की क्या संभावना है? कुछ गहरी चिन्ताओं के साथ इन्होंने अपनी सोच दखल के पाठकों तक रखनी चाही है, आज जब इंटरनेट से ब्लाग की दुनियाँ के लोग क्राति कर रहे है. हिन्दी में बहुत सारे ब्लाग प्रकाशित हो रहे है तो इनकी चिन्ता उन जमीन के लोगों से है जो इंटरनेट को दुनियाँ का अजूबा मानते है....
विवेक जायसवाल
बाजारवाद और ग्लोबल विषय के इस दौर में जब अंग्रेजी का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है तो एक सवाल शिद्दत से उठ रहा है, कि आखिर हिन्दी की जरूरत किसे है? आज से दस साल पहले जवान हुई, वह पीढ़ी जिसने गांवों में जन्म लिया और गांव के टाट-पट्टी वाले स्कूलों में शिक्षा ग्रहण की, परन्तु आज भी वह अंग्रेजी व उसके साम्राज्यवादी जंजीरों से मुक्त नहीं हो पाई है। जिस देश की राजभाषा हिन्दी हो, वहां ऐसी कुंठाएं उस पीढ़ी को तो चिन्तित करती हैं, लेकिन देष परेशान नहीं होता, देश के रहनुमा परेशान नहीं होते। उनके परेशान होने की वजह भी नहीं है, क्योंकि उदारवादी संरक्षण में देश लगातार विकास कर रहा है।
भारत का जनसंख्या आयोग भले ही यह कहता रहे कि अगले दो दशकों में भारत गांवो का देश नहीं रहेगा, लेकिन इस देश की अधिकतर जनसंख्या आज भी गांवों में ही रहती है और विकास की जो गति है उससे अधिकांस लोग गांवों में ही रहते रहेंगें। जनसंख्या आयोग के अनुसार 65 प्रतिशत लोग आज भी गांवों में रहते हैं, वहां टाट-पटि्टयों वाले स्कूल आज भी हैं, लेकिन अधकचरी अंग्रेजी सिखाने वाले स्कूलों में काफी इजाफा हो गया है। इसके बावजूद वहां आज भी हिन्दी आम जन-जीवन की आशा नहीं बन पाई है। वहां बाजार हाट से लेकर आपसी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति भी हिन्दी या कई बार कहें तो अपनी स्थानीय बोलियों में ही की जाती है। यह सच है कि बाजारवादी घुसपैठ के बाद हमारे यहां अग्रेजी का बोलबाला कुछ ज्यादा ही बढ़ा। वैसे तो इस देश में अंग्रेजी का वर्चस्व पहले से ही रहा है, लेकिन बाजारवाद अमेरिकी कारपोरेट जगत को अब पता चल गया है कि महानगरों में पैठ के बावजूद गांवों में उनकी पहुच अंग्रेजी के जरिये नहीं हो सकती। आज खुदरा व्यापार की दुनिया में कदम रखने वाली अमेरिकी कम्पनी वालमार्ट, बालिया अंग्रेजी में अपना व्यापार करने जा रही है। भारत जैसे देश के लिए यह सच है कि अगर आपको यहां गांवों तक पैठ जमानी है, तो आपको हिन्दी और दूसरी क्षेत्रीय बोलियों के सहारे ही यह राह तय करनी होगी। विदेशी कम्पनियों को इसकी जरूरत महसूस होने लगी है।
पिछले दिनों एक कम्पनी को अपने प्रोडक्ट का प्रचार हिन्दी भाषी राज्यों में कराना था। उस कम्पनी ने अपनी जनसंपर्क फर्म को साफ बता दिया कि उसकी प्रोडक्ट लांचिंग में अंग्रेजी के पत्रकार नहीं चाहिए, बल्कि खालिस हिन्दी के वे पत्रकार दिखने चाहिए जिनके अखबार उस क्षेत्र विषेश में निकलते हों। विदेषी मीडिया संस्थानों को हिन्दी की इस ताकत का पूरा अहसास है, आजादी के आंदोलन के दौरान हिन्दी अखबार और पत्रिकाएं निकालने वाले अधिकांष लोगों का मकसद देश सेवा थी। इसके साथ ही छिपी थी हिन्दी को ताकतवर बनाने की मंशा, लेकिन आज हिन्दी सिर्फ बाजार की भाषा है। वैसे भाषाएं बाजार का विषय नहीं होती, वे बाजार से कहीं ज्यादा संस्कृति और सामाजिक विकास की सतत धारा से जुड़ी होती है। संस्कृति के विकास के साथ भाषा समृद्ध होती है, लेकिन कुछ वक्त के लिए हिन्दी को बाजार का विषय मान भी लें तो हिन्दी पर बाजार के नियम लागू नहीं किये जा रहे है। बाजार का भी एक नियम होता है- अपने उत्पाद को निरन्तर बेहतर बनाकर पेश करना। आज के मीडिया बाजार के लिए अगर हिन्दी एक उत्पाद भी है, तो बाजार को चाहिए कि वह अपने इस उत्पाद को निरन्तर बेहतर बनाता रहे, लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दी के साथ बाजार के इस नियम का भी पालन नहीं हो रहा है। दरअसल, हिन्दी के साथ सिर्फ छेड़-छाड़ हो रही है और यह सब हो रहा है आम जन के नाम पर। एक जुमला खूब सुनाई देता है-``भाषा ऐसी हो जिसे रिक्सावाला भी समझ सके।´´ ऐसा कहने वाले लोग भूल जाते हैं कि हिन्दी बेल्ट में गरीबी के तमाम आंकड़ों के बावजूद हिन्दी दषZक और पाठक की दुनिया बदल गई है। षिक्षा के जरिए जो लक्ष्य हासिल किये जाने थे वे भले ही हासिल न किये जा सके हों पर इसका मतलब यह भी नहीं है कि हिन्दी अनपढ़ों और गंवारों की भाशा है। सवाल यह उठता है कि आप किस बैरोमीटर पर हिन्दी पाठक या दर्शक की समझ को नाप कर उसे संकुचित कर देते हैं? आज जिस हिन्दी का इस्तेमाल मीडिया में हो रहा है वह हिन्दी नहीं बल्कि अधकचरी हिन्दी है। ऐसे में यह प्रश्न उठाना गलत भी नहीं है कि आखिर हिन्दी का विकास क्या इसी तरह होगा? दुर्भाग्य की बात यह है कि बाजार और कारपोरेट के नियमों से जितना पश्चिमी दुनियां और उनके संस्थान बंधे हुए हैं उतना हम भारतीय नहीं। आज मीडिया अपने व्यावसायिक साम्राज्यवाद के लिए अपने अराजक होने की हद तक, भाषा, संस्कृति और समाज को विखण्डित करने से भी संकोच नहीं करेगी। उसके लिए समाज मात्र उपभोक्ता भर है। समाज उसके प्रोडक्ट की ग्राहक है। इसके साथ विडम्बना यह भी है कि सम्पूर्ण हिन्दी भाषा-भाषी समाज भी भाषा के साथ किए जा रहे ऐसे विराट छल को गूंगा बन कर देख रहा है।