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30 नवंबर 2013

कम्युनिस्ट कम्युनिस्ट होता है, परिवार परिवार!

 
समीक्षक
(मिथिलेश प्रियदर्शी ने फेसबुक के लिए यह एक्सक्लूसिव रिव्यू लिखा। हमने वहां से उड़ा लिया।)
 
ऐसा है कि बेजोड़ 'कौन्फ़िडेंस' में तो हम सब रहते हैं. सबको लगता है कि हमारे सीन में आने से गर्मी बढ़ जाएगी, अब ये उतना ही भाजपा को लगता है, उतना ही कांग्रेस को, उतना ही 'आप' को और उतना ही 'बुलेट राजा' को भी. और गर्मी और तापमान है कि बढ़ता जा रहा है. अब ये तापमान बढने-बढ़ाने की ज़िम्मेदारी न अमेरिका स्वीकार रहा है न उसके जिगरी दोस्त. तो शुक्र है कि ऐसे ही भयानक जलवायविक परिवर्तनों के दौर में 'बुलेट राजा' आए हैं, जिन्होंने खुलेआम इसका ठिकरा कुबूल किया है कि हम आएंगे तो गर्मी बढ़ जाएगी. अब शायद आगे आने वाले जलवायु संबन्धित अंतराष्ट्रीय सेमिनारों में यह बहस थम जायेगी.
 
तो 'बुलेट राजा' की कहानी है, एक ब्राह्मण घर में पैदा हुए एक लंठ लड़के की, जिसे इस कुल में पैदा होने के सारे मतलब अच्छे से मालूम हैं, जो खुद को ब्राह्मण कुल का होने की वजह से पैदाइशी समझदार मानता है, जो अब तक 155 लड़कियों के भीतर जानवर जगा चुका है, (और महिलाओं की इज्जत करता है), जो चलाता तो तमंचा झन्नाटेदार है, पर आर्ट की महता को भी समझता है और अंत में एक जरूरी बात ये कि वह कहानी के शुरू में बेरोजगार है, पर तमंचा संभालने के बाद नहीं.
 
तो जाहिर है, ऐसे दिमाग के आदमी को अगर राजनीतिक 'सपोर्ट' मिल जाये और कहानी में उसी के तेवर के आसपास का अगर उसका एक जिगरी दोस्त हो तो वो आग तो मूतेगा ही, और फिर गर्मी भी बढ़ेगी. पहले गलती से अपराध, फिर मजबूरी में, फिर राजनीतिक जरूरतों के लिए और अंत में व्यक्तिगत बदले के लिए. अपराध जगत पर बनी फिल्मों में इस किस्म की कहानियों की एक लंबी फेहरिस्त है. 'हीरोइन जो हीरो को देखते ही उस पर मर मिटती है और जिसका काम कहानी में केवल इठलाना और गाना गाने के लिए प्रस्तुत होना होता है' उसका या उसके परिवार का इस कहानी में अपहरण तो नहीं होता, पर हीरो का जिगरी दोस्त बीच में जरूर हीरोइन को बचाते हुये मर जाता है, फिर इसके बाद श्मशान में अर्जुन टाइप शपथ खाना भी बनता है और 21वीं सदी है तो हालत के मद्देनजर शपथ को थोड़ा 'एडजस्ट' करना भी. बाद में राजनीतिक समीकरणों का बनना-बिगड़ना स्वाभाविक तरीके से चलता है और अंत में 'गौडफादर' का हाथ खींच लेने के बाद उसके साज़िशों का अंत कर हाथ और कपड़े झाड़ते हुए सकुशल निकल जाना भी. अब जब सब निपट गया तो बाहर मुस्कुराती, बाँहें फैलाये हीरोइन खड़ी ही है, तब तक, जब तक पर्दे पर टेक्स्ट लिखाने-पढ़ाने न शुरू हो जाएँ.
 
अब अगर कोई लापरवाह सिनेमा प्रेमी, जो तिग्मांशु धूलिया के फिल्म व्याकरण को अच्छे से जानता हो, पर इस फिल्म के बारे में जानने से रह गया हो (मान लीजिये न, कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गया था), 'बुलेट राजा' देखता है और पूछता है, किसकी फिल्म थी, आप उसे 'सहर' वाले कबीर कौशिक का नाम बता देते हैं या 'अपहरण' वाले प्रकाश झा का या विशाल भारद्वाज या अपने गली के किसी लौंडे का ही, तो तय जानिए वो लंबी गर्दन वाले किसी मुर्गे की माफिक हौले से सिर हिला के 'अच्छा' कह कर हामी दे देगा और सवाल नहीं करेगा. ( हाँ, पर ध्यान रहे अनुराग कश्यप का नाम मत ले लीजिएगा, उनके यहाँ 'डिटेलिंग' बहुत होती है. वहाँ बाप के मरने की खबर सुनकर बेटा बदहवास भागता तो है, पर चट्टी पहिनने वापस आता है).
 
2012 में अनुराग कश्यप की देखरेख में समीर शर्मा की एक फिल्म आयी थी 'लव शव ते चिकन खुराना', उसमें प्रसिद्ध चिकन खुराना की रेसिपी जानने के लिए प्रतिद्वंदी ढाबे का मालिक लाला जब कई तिकड़मों के बाद इसके एवज में एक करोड़ रुपए तक की पेशकश भी खुशी से करता है तो नायक लाला को रेसिपी की जगह एक मुफ्त का नुस्खा देते हुए कहता है, '' जिस बंदे का चिकन खाके पूरी दुनिया उँगलियाँ चाट जाती थीं, उसे चस्का था आप की दाल मखनी का. लेकिन पैसा आते ही आपकी सब्जी में से स्वाद गायब हो गया, प्यार गायब हो गया.''
बस यही बात कहनी थी, अपनी जो विशेषता है, जिसमें महारत है, जिस बात के लिए दुनिया आपके हाथों का बोसा लेती है, उस पर यकीन बनाए रखिए बस, बाकी रविश जी वाला, बात जो है सो तो हइए है.
(अब जाते-जाते एक मजेदार प्रसंग, लड़का यूपी का ब्राह्मण है, लड़की बंगालन. शादी के लिए बाप राजी नहीं है, लड़की उम्मीद से भरकर अपने चाचा को कहती है,''आप तो कम्यूनिस्ट हैं, आप कुछ बोलिए.'' चाचा का त्वरित जवाब,'' कम्यूनिस्ट कम्यूनिस्ट होता है, परिवार परिवार.'' )

04 फ़रवरी 2013

विश्वरूपम बवालिया नहीं सवालिया फ़िल्म है


-दिलीप खान
आतंकवाद के मसले पर जिस ट्रीटमेंट के साथ देश में फ़िल्में बनती रही हैं, विश्वरूपम उससे अलग नहीं है। हमें एक अदद अभिनेता की दरकार होती है जो पहले दूसरे रूप धड़कर अपनी मासूमियत से लोगों को मोहे और फिर अचानक फुर्तीले, गठीले और बहादुर बनते हुए हमें अपनी ग़लती का एहसास वो हॉल में ताली बजवाकर करवाएं। किसी देश के इंटेलिजेंस अधिकारी के किरदार को फ़िल्मों ने ज़्यादातर इसी रूप में हमारे सामने पेश किया है। ऐसी फ़िल्मों को देखते हुए दर्शकों की जो कुल भावना विकसित होती है उसकी दिशा अभिनेता के मायावी होने की ओर केंद्रित रहती है, राजनीतिक विषयों पर ध्यान नहीं जाता। मार-धाड़-एक्शन से भरपूर थ्रिलर फ़िल्मों में तो दर्शक चकित-चौकन्ने होकर अभिनेता के करतब देखता है। मसलन उनका अभिनेता कठिनतम क्षणों में भी हार नहीं मानेगा, वो 50-60 लोगों को कभी भी चित्त कर सकता है और ख़ासकर अगर फ़िल्मों में दक्षिण भारतीय टच ज़रा-सी भी रह जाए तो हीरो का फ़ौलाद में तब्दील होना लाजिमी है। 
विश्वरुपम फ़िल्म का एक दृश्य
बॉलीवुड में ये गौरव सन्नी देओल और उनके पिताश्री धर्मेंद्र सहित बहुत कम लोगों को हासिल है। कमल हासन इस फ़िल्म के भीतर रॉ के अधिकारी हैं और हिंदी के अलावा मूल रूप से फ़िल्म तमिल में बनाई गई है तो ऊपर के सारे गुणों को अपने भीतर समेटे पर्दे पर वो नमूदार होते हैं। स्त्रैण व्यवहार के साथ कृष्ण और गोपी वाले गाने में नाचते हुए वो जब पहली बार फ़िल्म में दिखते हैं तो तालियां बजती हैं। डॉ निरुपमा (पूजा कुमार) का ऑफ़िस में अफ़ेयर है और उसको शक रहता है कि उनके पति विश्वनाथ (कमल हासन) की ज़िंदगी भी बिना किसी अफ़ेयर के नहीं चलती होगी, चाहे वो औरत के साथ हो या फिर किसी मर्द के साथ।  

तो, सबकुछ पारिवारिक नोंक-झोंक व शक-सुबहा के इर्द-गिर्द चलता रहता है और इसी क्रम में पत्नी एक प्राइवेट जासूस कमल हासन के पीछे लगा देती है। होता कुछ ख़ास नहीं है बुद्धू से दिखने वाले विश्वनाथ को पता चल जाता है कि पत्नी ने उसके पीछे जासूस छोड़ रखा है जो खोजी कुत्ते की तरह उसके पीछे चिपका हुआ है। शेखर कपूर की सलाह पर कमल हासन उससे पीछा छुड़ाने के लिए तेज दौड़ लगाता है और एक दीवार की ओट से चकमा देकर उसी दिशा में वापस भाग लेता है। अब एक नौसिखिए की तरह वो जासूस सामने की इमारत में ताक-झांक करता है और फिर जो कुछ होता है, फ़िल्म की असल शुरुआत भी वहीं से होती है। इमारत से निकलने वाला आदमी जासूस के सर पर ज़ोर से लोहे का सरिया दे मारता है और बाद में पड़े कुछ और चोटों से उसकी मौत हो जाती है। असल में वो इमारत उमर (राहुल बोस) की प्रयोगशालानुमा जगह है जहां आतंकी गतिविधियों को उनके शागिर्द अंजाम देने का हुनर सीखते हैं। 

अब यहां से घटनाओं की कड़ियां जुड़ती चली जाती हैं। जासूस की डायरी से क्लाइंट का नाम पता हासिल करने के बाद अंतत: पत्नी के बॉस-कम-प्रेमी दीपक के रास्ते विश्वनाथ  और डॉ निरुपमा आतंकियों के कब्जे में आते हैं। और यहीं पर निरुपमा के साथ-साथ दर्शकों को पहली बार पता चलता है कि कमल हासन असल में है कुछ और ही बला। वो सिर्फ़ घूंघरू बांध के नाचता नहीं है बल्कि दर्ज़नों लोगों को अकेले मारकर बिल्कुल हीरो की माफिक पिछले दरवाज़े से पत्नी के साथ भाग लेता है। उमर (राहुल बोस) कमल हासन को पहचानता है और यही पहचान दिखाने के लिए फ़िल्म फ्लैशबैक में चली जाती है। फिर अमेरिका से निकलकर फ़िल्म सीधे अफ़गानिस्तान में आ गिरती है। फ़िल्म में भारत कहीं नहीं है। है तो सिर्फ़ अमेरिका और अफ़गानिस्तान। ज़िक्र में भारत भी है, पाकिस्तान भी, नाइजीरिया भी और कुछ और देश भी। भारतीय ज़मीन पर तो विश्वरूपम-2 उतरेगी जिसकी मुनादी फ़िल्म के बिल्कुल आखिर में की जाती है। ख़त्म होने के बाद। तो, रहस्योद्घाटन ये होता है कि कमल हासन ने उमर (राहुल बोस) के साथ अल-क़ायदा में साथ-साथ काम किया है।  
कश्मीर के मुजाहिद के तौर पर कमल हासन का नया परिचय हमें मालूम होता है और नया नाम भी- विसाव अहमद कश्मीरी। ये भी पता चलता है कि उसके पिताजी उससे भी बड़े मुजाहिद थे। विसाव अहमद कश्मीरी (हासन) के नाम पर 5 लाख रुपए (शायद रुपए ही) का ईनाम भारत सरकार ने घोषित कर रखा है ये पोस्टर पूरी फ़िल्म में दो-तीन बार स्क्रीन पर चमकता है। और कहानी यही कहती है कि ईनामी आतंकवादी होने की वजह से भारत छोड़कर वो अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के साथ जुड़कर कुछ अलग करना चाहता है। राहुल बोस अल-क़ायदा से जुड़ा है। हासन उसके पास पहुंचता है और पहली मुलाक़ात में ही ये साबित करता है कि वो न सिर्फ़ शानदार लड़ाका है बल्कि लोगों को जानने-पहचानने का भी उसमें बेहद बारीक हुनर है। अल-क़ायदा के लड़ाकों को प्रशिक्षित करने के क्रम में ही वो उमर यानी राहुल बोस के काफ़ी करीब हो जाता है। वो उमर से अमेरिकी बंधकों का ठिकाना जानना चाहता है, अल-क़ायदा के लड़ने के तरीके जानना चाहता है और ये भी जानना चाहता है कि अफ़गानी उमर को हिंदी बोलना कैसे आता है? इस दौरान छोटी-छोटी घटनाओं के आइने से ये दिखाया गया कि हासन के भीतर बर्बरता का एलिमेंट मुजाहिद बनने के हिसाब से कम है। 
अल-क़ायदा के मुजाहिद उमर की भूमिका में राहुल बोस

बहरहाल, मैं यहां पूरी कहानी लिखने की बजाय फ़िल्म से निकल रहे संदेश पर बात करना पसंद करूंगा। फ़्लैशबैक से तीन-चार इस्तेमाल से अलग-अलग सेगमेंट में बंटे विश्वरूपम में दर्शकों के सामने खुलासा होता है कि कमल हासन न तो सामान्य गृहस्थ है और न ही आतंकवादियों के गुट का कोई लड़ाका, बल्कि वो भारतीय खुफ़िया एजेंसी का कोई अधिकारी है। एक जांबाज अधिकारी! और अल-क़ायदा के भीतर सेंधमारी कर वो उसे भीतर से नष्ट करने की तैयारी में था। उसी क्रम में जब हासन सा’ब उमर से सवाल पूछते हैं कि उसने हिंदी कहा सीखी, तो जवाब मिलता है- अयोध्या, मुंबई, कश्मीर और मालेगांव के दौरे से। फ़िल्म को विशुद्ध मनोरंजन मानने वाले लोगों को ऐसे डॉयलॉग से कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन जब फ़िल्मों में किसी वास्तविक जगह और घटनाओं का ज़िक्र होता है तो उसे पेश करने में राजनीतिक ईमानदारी बरतनी चाहिए। उमर के जवाब से ये ध्वनित होता है कि इन जगहों पर अल-क़ायदा ने आतंकी वारदातों को अंजाम दिया और उसी मिशन को पूरा करने के लिए वो गलियों की खाक छानते रहे और हिंदी सीख ली। यानी अयोध्या में जब-कभी (याद है न कब?) जो-कुछ हुआ उसके लिए अल-क़ायदा और मुस्लिम ज़िम्मेदार है और मालेगांव में भी। विश्वरूपम के रिलीज होने से महीनों पहले कोर्ट का (जिस पर लोग यक़ीन करते हैं) फ़ैसला आ गया कि मालेगांव धमाके में पकड़े गए 9 मुस्लिम निर्दोष हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एंड कंपनी ने उस धमाके में संलिप्तता पर अपनी सहमति जाहिर की है। फ़िल्म में कई जगह ऐसी चालाकियां बरती गई हैं।

फ़िल्म साल 2011 आस-पास चलती है, जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और अफ़गानिस्तान पर हमले को जायज ठहराने वाला सबसे बड़ा प्रमाणपत्र ओसामा-बिन-लादेन मारा जाता है। फ़िल्म के शुरुआती कुछ दृश्यों में ओबामा को टीवी पर भाषण देते दिखाया जाता है और विश्वरूपम इसी से काल को भी स्थापित करता है। फ़िल्म के भीतर ये दिखाया गया है कि दुनिया भर के मुस्लिम आतंकवादी एक-दूसरे से गहरे नेटवर्क के साथ जुड़े हैं और अफ़गानिस्तान में लगभग हर घर में बम-बारूद-बंदूक का जखीरा है और लोग धर्म के नाम पर ही मर-मिटने को तैयार हैं। वे बंदूक चलाते हैं धर्म के नाम पर, हत्या करते हैं धर्म के नाम पर और धर्म के नाम पर खुद को उड़ा लेना चाहते हैं। सबकुछ धर्म तय कर रहा है। 9/11 कब का बीत चुका है और लादेन को ढूंढने के लिए अमेरिका और नाटो ने अफ़गानिस्तान को गर्द में तब्दील कर दिया है। लेकिन नहीं, वे सिर्फ़ लादेन को ही नहीं ढूंढ रहे हैं बल्कि अपने बंधक सैनिकों को बचाने के लिए वो बम फोड़ते हैं। नाटो की ज़्यादातर कोशिश ‘निर्दोषों’ को गुफा से बाहर निकालकर दुनिया की रोशनी दिखाने की है। और, भारत उसका सक्रिय सहयोगी है। अफ़गानिस्तान का मिशन नाटो ने भारतीय मदद से जारी रखी है। 

फ़िल्म ये भी दिखाती है कि अफ़गानिस्तान में अभी नाटो के रहने की कितनी ज़रूरत है! [अब ये तथ्य दिमाग में मत लाइए कि 2014 तक सैन्य वापसी की बात अमेरिका सहित नाटो कर रहे हैं क्योंकि फ़िल्म ने शुरुआत में ही घोषणा कर दी है कि वो काल्पनिकता की डोर थामे हैं। ये भी दिमाग़ में मत लाइए कि हॉलीवुड की कई फ़िल्में सिर्फ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद को लोकप्रिय संस्कृति के जरिए वैधता देने के लिए बनाई गईं।] फ़िल्म की माने तो ये वापसी वैश्विक शांति के लिए ग़लत साबित होगी। संक्षेप में कहें तो विश्वरूपम ‘वॉर ऑन टेरर’ की अमेरिकी मुहिम को जायज ठहराने के लिए मनोरंजक तरीके से जनमत निर्माण करती है। 

राहुल बोस एक अच्छे अभिनेता हैं इस स्थापना को इस फ़िल्म के मार्फ़त कुछ और अंक हासिल कर उन्होंने मज़बूत किया है। डॉ. निरुपमा की भूमिका में पूजा कुमार को देखकर बरबस चक्रव्यूह फ़िल्म की रिया मेनन (एशा गुप्ता) याद आएगी जिन्हें पता ही नहीं कि भोलेपन को भी किस भोलेपन के साथ निभाना होता है। शेखर कपूर और कमल हासन बड़े नाम हैं और एक्टिंग के जरिए उन्होंने निराश भी नहीं किया। फ़िल्म में ख़र्चा हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि बुढ़ाते कमल हासन को स्टंट कराते दिखाने में ही काफ़ी मेहनत और धन जेब से निकल गया होगा। एडिटिंग बहुत अच्छी नहीं है, दो-तीन जगह तो जर्क साफ़-साफ़ पता चल रहा था और हिंदी का जो प्रिंट हमने देखा वो शायद बिना कट के रिलीज हुई फ़िल्म थी, तो वास्तविक एडिटिंग में ही कोई गड़बड़ी है। 

ये फ़िल्म मिक्स फ्रूट चाट है। इसमें दबंग भी है, ए वेडनसडे भी, रोजा भी और द हीरो भी। रिलीज होने पर बवाल उन लोगों ने काटा होगा जिन्हें इससे पहले की फ़िल्मों के बारे में कोई जानकारी नहीं रही होगी। जो भारतीय फ़िल्म परंपरा से परिचित हैं वो काहे को बवाल काटे भई! नमाज अता कर बम फोड़ना है, फोड़ो। फ़िल्म देखने आप जाएंगे तो पाएंगे कि रॉ के अधिकारी विश्वनाथ (कमल हासन) इतने जांबाज हैं कि समूची एफ़बीआई को अकेले हैंडल करते हैं, अपने इशारों पर नचाते हैं और पूरी फ़िल्म में हैरान-परेशान रहने वाली अपनी पीएच.डी पत्नी के साथ मिलकर अमेरिका को नाभिकीय बम (सिसमिक बम) के प्रकोप से बचा डालते हैं। जाहिर है इतने बहादुर प्रोटैगोनिस्ट अगर निर्माता-निर्देशक और कहानीकार की जेब में हो तो फ़िल्म का सीक्वल ज़रूरी है। तो, अमेरिका को बचाने की अपार सफ़लता के बाद अगली फ़िल्म में विश्वरूपम साहब भारत में होंगे और भारत को बचाएंगे। इंतज़ार कीजिए विश्वरूपम-2 का दबंग-2, रेस-2, जिस्म-3 के माफ़िक। 

27 अक्टूबर 2012

चक्रव्यूह: एक चालाक फ़िल्म

-दिलीप खान
प्रकाश झा एक चालाक फ़िल्मकार है और चालाक आदमी भी। चक्रव्यूह पर बात करने से पहले दी इंडियन एक्सप्रेस की साप्ताहिक पत्रिका ‘आई’ (सप्लिमेंट) और द हिंदू को दिए गए दो अलग-अलग साक्षात्कारों की दो बातें मुझे याद आ रही है। आई में प्रकाश झा ने कहा कि जिस दौर में वो अपहरण बना रहे थे उस दौर में वो बिहार का सच था, नीतीश जी के आने के बाद बिहार की तस्वीर बदल गई है। (पूरा साक्षात्कार पढ़ेंगे तो आप समझ जाएंगे कि नीतीश ‘जी’ का ज़िक्र प्रकाश झा ने बेहद चालाकी से किया है और मॉल वगैरह खोलने देने का बदला चुकता कर रहे हैं।) द हिंदू में प्रकाश झा ने कहा कि ओम पुरी का किरदार कोबाड गांधी से प्रेरित है। यानी उन्होंने इशारा दिया कि न सिर्फ़ प्लॉट बल्कि फ़िल्म के पात्र भी देश के वास्तविक लोगों को ध्यान में रखकर बुने गए हैं। फ़िल्मांकन में यह दिखता भी है...गमछे से चेहरा ढंककर जब राजन (मनोज वाजपेयी) आज तक को साक्षात्कार देते हैं तो साफ़ लगता है कि वो माओवादी नेता किशन जी की भूमिका में हैं। इसके अलावा महंता का नाम देखते ही आपको वेदांता याद आ जाएगी और नंदीघाट का नाम देखकर नंदीग्राम। दूसरे हाफ में जब कबीर (अभय देओल) के भीतर माओवादी बीज पनपता है तो उसका भी नाम बदलकर कॉमरेड आज़ाद कर दिया जाता है। तो आप कहिए कि प्रकाश झा ने पात्र, घटना और स्थान के मामले में थोड़ी-बहुत भी ख़बर से ताल्लुक रखने वालों को ये मौका दिया है कि वो फ़िल्म देखते ही उन नामों को देश की हालिया घटनाओं से जोड़ ले। लेकिन वास्तविकता की डोर थामेंगे तो आप गच्चा खा जाएंगे। मसलन नंदीघाट जगह देखकर अगर आप ये समझे कि फ़िल्म में बंगाल का प्लॉट है तो अगले ही पल महंता विश्वविद्यालय की बात कहकर फ़िल्म आपको उड़ीसा ले जाएगी। फिर जंगलों में फ़िल्म रह जाती है और यदि बोली की थोड़ी सी भी पकड़ आपको है तो पता चल जाएगा कि छत्तीसगढ़ी ज़मीन पर फ़िल्म आगे बढ़ती है। जाहिर है प्रकाश झा ने स्थान को बहुत तवज्जो नहीं दी है, अलबत्ता ये ज़रूर है कि काल के मामले में यह फ़िल्म खुद को बीते पांच साल की घटनाओं तक ही सीमित करती है। तो, एक तरह से घटनाओं का कोलाज है फ़िल्म में।  
दो दोस्तों की कहानी में पार्श्व में माओवाद
ये ज़रूर है कि फ़िल्म देखकर निकलने के बाद नक्सलियों (या फिर माओवादियों- टीवी और प्रिंट मीडिया की तरह फ़िल्म ने भी इनको समानार्थी के तौर पर इस्तेमाल किया है।) को शुद्ध आतंकवादी मानने वाले लोग एक बार सोचेंगे कि ये बंदे सिर्फ़ हथियारबंद गिरोह भर नहीं है, बल्कि इनका कुछ राजनीतिक मकसद भी है। (हालांकि इतना तो लोग जानते ही हैं।) सोचने को ये भी सोच सकते हैं कि या तो ब्रेन वॉश से या फिर राज्य से एकाध घटनाओं में पीड़ित होने के बाद लोग माओवादी बन जाते हैं जैसे कि जूही (अंजलि पाटिल) बनी। लाल सलाम को ‘ऑल इज़ वेल’ की तरह जुमला भी बना सकते हैं।
बहरहाल, अभय देओल को आज़ाद ख़याल पात्र के तौर पर शुरू से फ़िल्म में दिखाया गया है। पुलिस में रहता है, लेकिन कायदा नहीं मानता। सही लग रहा है तो ठीक है वरना बग़ावत कर देगा। भविष्य की बिना कोई ठोस योजना रखने वाला इनसान है कबीर। इमोशनल क़िस्म का। इसी इमोशन की वजह से माओवादियों के बीच पुलिस की मुखबिरी करने पहुंचा कबीर, थोड़े-बहुत कनफ़्यूजन के साथ माओवादी बन जाता है। बहुत बाद तक वो तय नहीं कर पाता कि असल में है वो किस ओर! मामले को इस रूप में दिखाया गया है कि देश के ज़्यादातर लोग चूंकि माओवादियों से बावस्ता नहीं है तो ‘टच’ में जाने के बाद ही वो उनसे प्रभावित हो सकते हैं। यानी राजनीति को ऐसी सब्जेक्टिविटी का मामला बनाया गया है कि जहां समय गुजारो वहीं का होकर रह जाओ! कबीर की पूरी बनावट ही फ़िल्म में इसी तरह की है। रोमेंटिसिज़्म वाली।
फ़िल्म में जबरन महंगाई वाले गाने को डाला गया लगता है
अभय देओल ने अभिनय अच्छा किया है लेकिन अंजलि पाटिल ने कमाल का काम किया है। मनोज बाजपेयी भी जमे हैं और ओम पुरी भी। अर्जुन रामपाल (एसपी आदिल ख़ान) अभिनय नहीं सीख पाएंगे इस स्थापना को उन्होंने चक्रव्यूह में पुख़्ता किया है। रिया मेनन (ऐशा गुप्ता) नामक पात्र की ज़रूरत नहीं थी, ग्लैमर के लिए प्रकाश झा ने उसे रच लिया, ठीक उसी तरह जैसे कुंडा खोल आइटम सॉन्ग रचा। स्क्रिप्ट में कई जगह ऐसी व्यावसायिक मजबूरी झलकती है गोया बाद में बीच-बीच में कुछ जोड़ा-घटाया गया हो। गानों के मामले में ख़ास तौर से ये बात कही जा सकती है। अभय देओल पर महंगाई वाला गाना फ़िल्माना था तो उससे ठीक पहले वाले दृश्य में तिरपाल के नीचे रात में उसे ‘राग भैरवी’ गाते दिखा दिया। कैलाश खेर की जगह किसी नई आवाज़ को जगह देते तो गाने में रंग आता। कैलाश खेर की आवाज़ में कहीं से उस मिट्टी की खुशबू नहीं आ रही है जहां पर इसे फ़िल्माया गया है। टाटा-बिड़ला, अंबानी-बाटा वाला यह गाना प्रचार के लिए बेहद ज़रूरी था, सो एक तरह से इसे ‘फिट’ कर दिया गया। शहरी कबीर अचानक माओवादियों के बीच पहुंचने के अगले ही दिन लोकगीत की शैली में गाने लगता है। फ़िल्म यह बताती है कि कबीर के रखने से कम से कम गाने-बजाने वाला कोई मिल जाएगा। यानी कबीर मुख्य गायक की ज़िम्मेदारी निभाता है। उसके गले से ऑटोमैटिक फूटता लोकगीत गले नहीं उतरता।  
एक लाइन में कहें तो फ़िल्म ‘सैंडविच थ्येरी’ का विस्तार है। माओवादियों और राज्य के बीच पिसती जनता पर मध्यांतर से पहले सबसे ज़्यादा ज़ोर है। लेकिन, कुछ तथ्यों को फ़िल्म में इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि लोग गफ़लत में पड़ सकते हैं। मिसाल के लिए नाम की साम्यता बैठाने के लिए अभय देओल को कॉमरेड आज़ाद बना दिया गया है। यानी कबीर ने पुलिस की मुखबिरी से कॉमरेड आज़ाद तक का सफ़र तय किया। वास्तविक दुनिया में जिन लोगों ने आज़ाद का नाम सुन रखा है उनके मन में यह धारणा पुख़्ता होगी। शुरुआती दृश्य में ओम पुरी के वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर जिस व्यक्ति को दिखाया जाता है बाद में उसी से कॉमरेड राजन (मनोज वाजपेयी) को सलाह लेते दिखाया जाता है। यानी मानवाधिकार कार्यकर्ता और माओवाद जैसे मामले का केस लड़ने वाले लोग असल में फेस सेविंग प्रोफ़ेशन के तौर पर ऐसा काम करते हैं लेकिन होते हैं पार्टी कैडर ही!
कमज़ोरी और चालाकी के कई और उदाहरण हैं। मसलन, एसपी स्तर का पुलिस अधिकारी ईमानदार और सच्चाई व वर्दी की मांग को पूरा करने वाले होते हैं।(छत्तीसगढ़ के कल्लूरी और राष्ट्रपति पदक विजेता अंकित गर्ग को याद कीजिए)। माओवादी नेता के बदले व्यवसायी बच्चे की अदला-बदली महज पुल के इस पार-उस पार वाला मामला है! फ़िल्म में माओवाद पर कुछ बेसिक रिसर्च छूटता दिखता है। फ़िल्म बताती है कि स्थानीय पुलिस बंद दरवाज़ों के भीतर रहने वाली जीव है और माओवादियों के नाम पर मुठभेड़ में कभी-कभार ‘निर्दोष लोग’ सिर्फ़ मारे जाते हैं वरना फ़र्जी गिरफ़्तारियां तो होती ही नहीं। सल्वा जुडूम कॉरपोरेट समर्थित संगठन है और राज्य का इससे कोई वास्ता नहीं है! फ़िल्म तो आपको यही बताती है कि सल्वा जुडूम को महंता ने पैदा किया और मुख्यमंत्री महोदय की इसमें कोई भूमिका नहीं है। (..लगे हाथों सल्वा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला याद कीजिए)। फ़िल्म के आख़िर में ओम पुरी (प्रकाश झा के मुताबिक़ कोबाड गांधी से प्रभावित पात्र) माओवादियों का सबसे बड़ा (मेंटर) नेता बन जाता है। आजतक और दैनिक भास्कर फ़िल्म में बार-बार आते हैं और शायद इसलिए फ़िल्म में कहीं भी उन इलाकों में मीडिया के कॉरपोरेट हितों को नहीं दिखाया गया है। मीडिया पार्टनर बनकर भास्कर ने अच्छा किया...पूरा मामला महंता तक ही सीमित रह गया और फ़िल्म में डीबी कॉर्प जैसे पावर प्लांट लगाने वाली कंपनियों का नामोनिशान तक नहीं दिखा। अंत तो बेहद नाटकीय है। रिया मेनन कबीर को गोली मारती है...आदिल ख़ान रोता है, फ़िल्म ख़त्म हो जाती है। फिर दो लाइन का वॉयस ओवर उभरता है कि देश में कितने लोग ग़रीब है और कितने लोग अमीर!
....लेकिन इन सबके बावजूद अगर पांच-दस ऐसी फ़िल्में बनती हैं, तो माओवाद को लेकर मध्यवर्ग की जमी-जमाई धारणा डिगेगी। सिनेमा हॉल में फ़िल्म ख़त्म होते ही कुछ लोग अपने विश्वास की डोर को मांझा देने के लिए आपस में गुफ़्तगू करने लगे, यू नो, कुछ भी हो बट कम्युनिज़्म इज़ ए फ़्लॉप शो। तो ये ज़रूर है कि दिल्ली वालों को छत्तीसगढ़ की एक (अधूरी, तोड़ी-मरोड़ी ही सही) झलक मिली, सिर्फ़ इस लिहाज़ से फ़िल्म को देखने की सलाह दूंगा। प्रकाश झा की यही चालाकी है। आप आलोचनात्मक भले ही हो जाइए लेकिन देखने की सलाह भी लगे हाथों ठोक जाइए।