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26 सितंबर 2013

फांसी की सजा क्यों ?

सुनील कुमार

16 दिसम्बर, 2012 के सामूहिक बलात्कार के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था। खासकर मध्यमवर्गीय महिलायें, जो ऑफिस, स्कूलों और कॉलेजों में जाती हैं, काफी संख्या में सड़क पर आकर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। वर्मा कमेटी को सुझाव देने में पक्ष-विपक्ष एकमत था कि बलात्कार की घटना में फांसी की सजा होनी चाहिए। यह मीडिया पर दिन-रात चर्चा का विषय बना हुआ था। लोगों के गुस्से पर सरकार ने लाठी के बल पर काबू किया। एक पुलिसकर्मी की मौत में झूठे बेगुनाह युवकों को फंसाया गया। लोगों के गुस्से को देखते हुए वर्मा कमिटी का गठन किया गया और वर्मा कमेटी ने बलात्कार कानून में काफी कुछ बदलाव किया और बलात्कार की परिभाषा को भी बदला। 10 सितम्बर, 2013 को जब इस केस का फैसला आना था, मीडिया में यह मुद्दा गर्म हो गया और मीडिया द्वारा लोगों का ओपीनियन (फैसला) दिखाया जाने लगा। मीडिया पार्क में, चौराहों पर, ऑफिस के बाहर जाकर लोगों की बाइट ले रही थी, जिसमें अधिकांश लोगों का मत था कि फांसी की सजा दी जानी चाहिये। कुछ का तो यह भी मानना था कि इन्हें बीच चौराहे पर फांसी दी जानी चाहिए जिससे कि लोगों में भय पैदा हो। पीड़ित परिवार के बार-बार बयान दिखाये जा रहे थे कि बलात्कारियों को फांसी की सजा हो ताकि उनको न्याय मिल पाये।
16 दिसम्बर के बाद जब लोग दिल्ली के इंडिया गेट और रायसिना हिल पर जमे हुए थे उसी 72 घंटे के दौरान देश में 150 बलात्कार की घटनाएं हुईं (दैनिक भास्कर, 25 दिसम्बर 2012)। इस घटना के बाद भी लगातार देश में बलात्कार की घटनाएं हुई हैं और हो रही हैं। दिल्ली में ही एक छोटी बच्ची के साथ गैंग रेप हुआ। मुम्बई में एक फोटोग्राफर  लड़की के साथ गैंग रेप हुआ। ज्यादातर केसों में आरोपी 24 घंटे में पकड़ लिये गये और केस को सुलझा लिया गया। फिर भी उनको कई दिनों तक पुलिस रिमांड पर रखा गया। प्रभावशाली लोग, जो कि एक संगठित गिरोह की तरह काम करते हैं, जब किसी के साथ बलात्कार करते हैं तो उन पर केस दर्ज नहीं होता, और होता भी है तो उनको बचाव का पूरा समय दिया जाता है। आसाराम के केस में देखा जा सकता है कि एक नाबालिग लड़की से सोच-समझकर षड़यंत्रपूर्वक बलात्कार किया जाता है और केस दर्ज होने के बाद भी आसाराम को बचाव का पूरा समय दिया जाता है। पूछ-ताछ के लिये उनके दरवाजे पर पुलिस जाकर नोटिस देने के लिये घंटों इंतजार करती रहती है और आदरपूर्वक उनको नोटिस देकर आती है। विपक्ष की नेता, जो चिल्ला-चिल्ला कर बलात्कारियों की फांसी की मांग करती हैं, उन्हीं की पार्टी के लोग आसाराम को निर्दोष बताने में लगे हुए थे। म.प्र. के एक बीजेपी नेता ने तो यहां तक मांग कर दी कि लड़की के घर वालों पर केस दर्ज होना चाहिए क्योंकि वे आसाराम बापू को झूठे फंसा रहे हैं। पुलिस आसाराम को पकड़ती है और एक दिन की पुलिस के रिमांड में ही पूछ-ताछ पूरी कर लेती है! जो मीडिया 16 दिसम्बर के सामूहिक बलात्कार के केस की अदालती कार्रवाई को इतनी रूचि से दिखा रही है और पहले भी दिखा रही थी; उस मीडिया का (दो-तीन चैनल को छोड़कर) आसाराम केस में उतनी दिलचस्पी नहीं है। सामूहिक बलात्कार केस में फांसी की मांग करने वाली भीड़ में आसाराम के कई भक्त भी होंगे जो कि आसाराम को निर्दोष बता रहे थे।
10 दिसम्बर, 2013 को दोषियों (मुकेश (26), पवन (19), विनय (20) व अक्षय (28)) को फांसी की सजा देते हुए जज योगेश खन्ना ने कहा ‘‘अदालत ऐसे अपराधों की तरफ आंख नहीं मूंद सकता। इस हमले ने समाज की अंतरात्मा की आवाज को स्तब्ध कर दिया था। ये मामला सचमुच अपवाद का है और इसमें मृत्युदंड ही दिया जाना चाहिए।’’  क्या जज साहब की इन बातों से उन सभी महिलाओं को न्याय मिल जायेगा जो सामाजिक संरचना की भय से बालात्कार जैसी घटना को छुपाती हैं? क्या इस फांसी की सजा से जेल मंे बंद सोनी-सोरी को न्याय मिल गया, जिनके गुप्तांगों में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारी अंकित गर्ग को सजा देने के बदले राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया? मनोरमा और शोपिया के बलात्कारियों का क्या हुआ? गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि ‘‘दामिनी और उसके परिवार को न्याय मिला है। न्यायदेवता ने एक नया उदाहरण रखा है कि इस तरह के अपराध करोगे तो इसके सिवा दूसरी सजा नहीं हो सकती है। मैं इसका स्वागत करता हूं।’’ गृहमंत्री जी उन महिलाओं को कब न्याय मिलेगा जो कि राष्ट्रीयता व अपनी जीविका के संसाधनों, जल-जंगल-जमीन के लिए संघर्ष कर रही हैं और आपके ‘बाहदूर सिपाही/अधिकारी’ उनके साथ बालात्कार करते आ रहे हैं? आपके ही पार्टी के राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन पर सूर्यनेल्ली नामक लड़की ने जो आरोप लगाये थे क्या उस लड़की को न्याय मिल गया? प्रियदर्शनी मट्टू, रूचिका गिरहोत्रा जैसे कांड का क्या हुआ? जनदबाव के कारण अगर कोई बड़ा बलात्कारी पकड़ा भी जाये तो आप ऐसे बलात्कारियों को तो जेल में अतिथि बनाकर रखते हैं, जैसा कि अभी-अभी आसाराम को घर का बना हुआ दलिया खिलाया। इससे आसाराम का मनोबल इतना बढ़ गया कि वे जेल में महिला वैद्य से इलाज कराने की मांग करने लगे।
दिल्ली सामूहिक बलात्कार के दोषियों को 9 माह में फांसी की सजा सुना दी गई क्योंकि इन दोषियांे में कोई भी अरबपति, राजनेता, नौकरशाह या शासक वर्ग से ताल्लुक रखने वाले नहीं थे। ये सभी समाज के उस निचले पायदान से थे जिसको हम चलती-फिरती भाषा में ‘नाली के कीड़े’ की संज्ञा देते हैं। इन दोषियों को सजा देकर भारत का शासक वर्ग यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत में न्याय जिन्दा है। वह लोगों की भावनाओं को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहा है, जैसा कि गृहमंत्री का बयान है। वहीं बचाव पक्ष के वकील ए.पी. सिंह ने इस फैसले को पक्षपातपूर्ण निर्णय बताया है और राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा है कि ‘‘अगर फांसी देने से बलात्कार रूक जाएगा तो हम इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेंगे। गृह मंत्री ने इस मामले में दखल दिया है। अगर इस फैसले के बाद दो महीने के अंदर कोई बलात्कार या हत्या नहीं होती है तो हम अभियुक्त के लिए ऊपरी अदालत में नहीं जांएगे।’’
बलात्कार सामंती युग की बर्बरता है। किसी से बदला लेना हो, किसी को नीचा दिखाना हो तो उसके घर की महिलाओं के साथ बलात्कार करो। सामंती युग की इस बर्बरता को पूंजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति और बढ़ावा देती है। गुजरात के दंगों में विशेष समुदाय के महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, उनके पेट को चीर कर भ्रूण को काट दिया गया- यह किस सभ्य समाज की निशानी है? हमें शासक वर्ग को सरलीकरण का रास्ता दिखाते हुए उसे और दमनकारी बनाने की मांग नहीं करनी चाहिए। बलात्कार पुरुषवादी मानसिकता में है जो इस समाज के जड़ में निहित है। सत्ता के शीर्ष पर हों या कानून के रखवाले हों, उनकी सोच में यह रची-बसी है कि महिला उपभोग की वस्तु है। पंजाब के पुलिस महानिदेशक के.पी.एस. गिल द्वारा भारतीय महिला प्रशासनिक अधिकारी को एक पार्टी में छेड़ना हो या राजस्थान में महिला पुलिस का उसके सहकर्मियों द्वारा थाने में बलात्कार किया जाना बाप द्वारा अपनी बेटी का बलात्कार या भाई द्वारा बहन का बलात्कार। सभी इस पुरुषवादी मानसिकता को दर्शाते हैं। भाजपा शासित गुजरात हो या सपा-बसपा शासित उत्तर प्रदेश या कांग्रेस शासित प्रदेश हो, हर राज्य में बलात्कार जैसा संगठित अपराध नौकरशाहों, सत्ताधीशों या उनके संरक्षण में पलने वाले लोगों द्वारा किया जाता है। अपने को सर्वहारा का हितैषी बताने वाली सीपीएम के राज्य बंगाल के सिंगूर में सीपीएम के कार्यकर्ताओं द्वारा सिंगूर आन्दोलन की नेत्री तापसी मलिक का बलात्कार, फिर उसकी हत्या हो या नन्दीग्राम में सीपीएम नेताओं, कार्यकर्ताओं द्वारा महिलाओं के बलात्कार, सभी इसी श्रेणी में आते हैं।
बहुसंख्यक महिलाओं की मानसिकता भी पुरुषवादी सोच से कोई अलग नहीं है जैसा कि म.प्र. के सेमिनार में एक महिला वैज्ञानिक डॉ. अनिता शुक्ला द्वारा ये कहा जाना कि ‘‘लड़की आधी रात में ब्वाय फ्रेंड के साथ क्या कर रही थी, क्यों घूम रही थी।’’ यहां तक कि उन्होंने लड़की को आत्मसमर्पण कर देने की बात भी कह डाली। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा महिलाओं को अकेले न निकलने और कपड़े ठीक से पहनने की नसीहत दी जाती है। यहां तक की सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात द्वारा नन्दीग्राम बलात्कार में पीड़िता की मद्द करने के बजाय अपने पार्टी को बचाने वाला बयान दिया गया कि दस के साथ नहीं चार औरतों के साथ बलात्कार हुआ है।
बलात्कार के कारण के रूप में लड़कियों के भड़काऊ कपड़े पहनना, ब्वाय फ्रेंड या दोस्तों के साथ घूमना, लड़कों से हंस-हंस कर बात करना (जैसा कि हंसने पर केवल पुरुष का ही एकक्षत्र राज्य हो) इत्यादि माना जाता है। ऐसे में यह कैसे माना जा सकता है कि फांसी देने से बलात्कार कम होगा। 132 देशों में फांसी की सजा नहीं है। क्या वहां पर ज्यादा अपराध होते हैं? आंकड़े तो यह बताते हैं कि जिस देश में फांसी की सजा नहीं है वहां पर बलात्कार और अपराध के मामले मृत्यु की सजा देने वाले देशों से कम होते हैं।
हमारे देश में अलग-अलग वर्ग हैं। एक ही तरह के अपराध के लिए यहां सजा भी अलग-अलग होती है। 16 दिसम्बर की बलात्कार की घटना में फांसी की सजा प्राप्त विनय के पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने बीबीसी संवादाता से कहा ‘‘सजा तो जितने भी बलात्कारी हैं, सबको मिलनी चाहिए। जो भी सजा इन गरीब बच्चों को अदालत देगी वो सभी को मिलनी चाहिए। चाहे वे कोई बाबा हो या फिर नेता या अमीरों के बच्चें हों।’’ क्या यह वर्गीय समाज में मुमकिन है?
जब किसी अरबपति-खरबपति, माफिया सरगना, अफसरशाह, नेता या उसके परिवार के किसी भी पुरुष सदस्य द्वारा ऐसी काली करतूत की जाती है तो पीड़िता के ही चरित्र पर सवाल उठाये जाते हैं। प्रताड़ित लड़की या महिला  का चरित्र ही गलत है, वह पैसा चाहती है, सुर्खियां बटोरने के लिए यह सब कर रही है, डॉक्टरी रिपोर्ट का इंतजार करो, मीडिया पर ध्यान मत दो, बेचारे को झूठा फंसा रही है, आदि, आदि कह कर लोगों को दिगभ्रमित किया जाता है ताकि आम जनता पीड़िता को ही दोषी मानने लगे।
जिस देश में लोगों के अपने मौलिक-कानूनी अधिकारों को पाने के लिये संघर्ष करना पड़ता है; शासक वर्ग जेलों-लाठियों-गोलियों के बल पर इन संघर्षों को क्रूर तरीके से दमन करता है क्या किसी की जान लेने का वैधानिक अधिकार देना शासक वर्ग को और क्रूर नहीं बनाता है? क्या किसी भी सभ्य-जनवादी-लोकतांत्रिक समाज में फांसी की सजा होनी चाहिए?
sunilkumar102@gmail.com

28 मार्च 2013

जेल से भेजी मारुती मजदूरों ने अपील


समर्थन में आज से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू 

मारुती कंपनी प्रबंधन, सरकार और प्रशासन के दमन के खिलाफ 24 मार्च से हरियाणा के कैथल जिले में चल रहा अनिश्चितकालीन धरना आज से आमरण अनशन में बदल गया है. संघर्षरत मज़दूरों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के पक्ष में व्यापक समर्थन की अपील की है. इस मौके पर हम जेल में बंद 147 मजदूरों की और से जारी पत्र को प्रसारित कर रहे हैं...
हम मारुति सुजुकी के वो मजदूर है जिनको 18-7-2012 की दुर्घटना का इल्जाम लगाकर बिना किसी न्यायिक जांच के जेल में डाल दिया गया हैं. हम 147 मजदूर अभी भी गुडगाँव सेंट्रल जेल के सलाखों के पीछे बंध हैं. जुलाई के बाद लगभग 2500 पक्के और कच्चे कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया. पिछले 8 महीनों से हम हरियाणा और केन्द्रीय सरकार के बहुत सारे उच्च अधिकारियों, हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री जी को भी कई बार अपील कर चुके हैं.
लेकिन न तो हमारी कहीं सुनाई हो रही है, न ही हमें जमानत दी जा रही है. और तो और, जो हरियाणा पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में पेश की है, उसमें किसी गवाह का नाम नही है और वह आधी अधूरी है. हमारा लोकतान्त्रिक अधिकारो का हनन लगातार हो रहा हैं, और कानून को कंपनी मालिकों के स्वार्थ में व्यवहार किया जा रहा हैं. इस दौरान बहत से कर्मचारियों ने अपने परिवार के सदस्य के साथ-साथ बहत कुछ खो दिया है. काफी मजदूर ऐसे भी है जिनके माता-पिता नहीं हैं और पुरे परिवार का पालन पोषण का भार उन्ही पर है.
काफी ऐसे भी साथी हैं, जब उन्हें जेल में डाला गया, तब उनकी पत्नियाँ गर्भवती थी. उनकी डिलीवरी के समय भी कर्मचारियों को न तो जमानत दी गयी, न ही पे-रोल पे छुट्टी दी गयी और न ही पे-रोल कस्टडी में ही भेजा गया. परिवार में अकेली होने के कारण व पति के जेल में होने के कारण, पता नहीं किन परिस्थितियों में उनकी डिलीवरी हुई है. इसके हम निचे कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है:-
हमारे एक साथी सुमित S/O स्वर्गीय श्री छत्तर सिंह के घर में सुमित और उनकी पत्नी के अलावा कोई अन्य पारिवारिक सदस्य नहीं है. लेकिन फिर भी दिनांक 6.12.2012 को उनकी पत्नी की डिलीवरी गुडगाँव के एक अस्पताल में हुई और उनकी देखभाल के लिए सुमित को कोई भी राहत प्रदान नहीं की गई.
हमारे एक साथी विजेंद्र S/O स्वर्गीय श्री दलेल सिंह अपने परिवार का पालन पोषण करनेवाला अकेला सदस्य है. उसके घर में उसकी पत्नी व बिमार माँ है. उसकी पत्नी की डिलीवरी 10.01.2013 को झज्जर के एक अस्पताल में हुई. विजेंद्र के माँ के बिमार होने के कारण उसकी पत्नी कि डिलीवरी के समय देखभाल करनेवाला कोई नहीं था. लेकिन फिरभी विजेंद्र को पत्नी के देखभाल के लिए डिलीवरी के समय कोई राहत नहीं दी गई.
हमारे साथी रामबिलास S/O स्वर्गीय श्री सीलक राम की दादीमा 26.02.2013 को रामबिलास के वियोग में बिमार हो कर स्वर्ग सिधार गई, क्योकि वह उसकी दादीमा का बहुत लाडला था. और तो और उसे दाह-संस्कार में सामिल होने या दादीमा के अंतिम दर्शन करने के लिए पेरोल कस्टडी में भी नहीं ले जाया गया. कुछ ही दिनों के बाद जब उसकी पत्नी कि डिलीवरी होनी थी तो उसकी जमानत या छुट्टी के लिए याचिका लगाई गई तब भी उसे कोई राहत नहीं दी गई. इससे उसके ऊपर बड़ा मानसिक आघात हुआ है.
हमारे एक साथी प्रेमपाल S/O श्री छिद्दीलाल के उपर पुरे परिवार के पालन पोषण का भार है, वह जब जेल में आया था तब उसके परिवार की रोजी-रोटी उसी के बलबूते पर टिकी हुई थी. परन्तु उसके जेल में आने के बाद उसकी इकलौती बेटी जो मात्र दो साल की थी, जो अपने पापा के वियोग में बीमार होकर पापा-पापा करते हुए भगवान को प्यारी हो गई. ये जख्म अभी हरा ही था कि तभी कुछ दिन बाद प्रेमपाल की माँ बेटे के वियोग में व अपनी लाडली पोती के वियोग में बीमार होकर स्वर्ग सिधार गई. हद तो तब हो गई जब उसकी एक सप्ताह कि छुट्टी भी ख़ारिज कर दी गई व उसे मात्र एक घंटे के लिए दाह-संस्कार होने के अगले दिन पे-रोल कस्टडी में भेजा गया. जबकि गुडिया व माताजी के देहांत के दुःख में घर में अकेली उसकी पत्नी भी बीमार होने के कारण अस्पताल में दाखिल करवानी पड़ी जो अभी भी बिमार है तथा उसकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं है. और इस कारण प्रेमपाल बहुत अधिक मानसिक दबाव में है.
हमारे एक साथी राहुल S/O श्री विनोद रतन जो घर में अपने माँ-बाप का एक इकलौता बेटा है व उसकी एक ही बहन है. उसकी बहन कि शादी दिनांक 16.11.2012 को हुई. परन्तु उसे कस्टडी में भी अपनी बहन के शादी के कन्यादान के लिए नहीं भेजा गया जिसके कारण घर की इकलौती बेटी की शादी होते हुए भी घर में मातम जैसा माहौल रहा और राहुल मानसिक दबाव में है.
हमारे एक साथी सुभाष S/O श्री लाल चंद जो कि अपनी दादीमा का बहुत लाडला था. जब वह जेल में आया तो उसके वियोग में उसके दादीमा खाना-पीना छोड़ दिया व कुछ दिन में ही अपने पोते को याद करते हुए स्वर्ग सिधार गई. परन्तु सुभाष को दाहसंस्कार या अंतिम दर्शन के लिए पे-रोल कस्टडी में भी नहीं भेजा गया.
ऐसी और कितनी ही दुख भरी घटनाएँ है, जिन्हें लिखते लिखते एक पूरी किताब बन जाये .

हमारे बारे में: परिचय, परिवार, नौकरी

हम सभी किसान या मजदूरों के बच्चे हैं. माँ-बाप ने हमे बड़ी मेहनत से खून-पसीना एक करके 10वी-12वी या ITI शिक्षा दिलवाई व इस लायक बनाया कि इस जीवन में कुछ बन सके व अपने परिवार का सहारा बन सके.
हम सभी ने कंपनी द्वारा भर्ती प्रक्रिया में लिखित व् मौखिक परीक्षायों को पास करके व् कंपनी की जो जो भी नियम व शर्ते थी, उनपर खरे उतर कर मारुति कंपनी को ज्वाइन किया. जोइनिंग करने से पहले, कंपनी ने सभी प्रकार से हमारी जांच करवाई थी, जैसे- घर की थाने तहसील की व क्रीमिनल जांच करवाई गई थी! पिछले समय का हमारा कोई क्रिमिनल रिकार्ड नहीं हैं.
जब हमने कंपनी को ज्वाइन किया तब, कंपनी का मानेसर प्लांट निर्माणाधीन था. हमने अपने कड़ी मेहनत व लगन से अपने भविष्य को देखते हुए, कंपनी को एक नयी उचाई पर ले गए. जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छायी हुई थी, तब हमने प्रतिदिन दो घंटे एक्स्ट्रा टाइम देकर साल में 10.5 लाख गाड़ियों का निर्माण किया था. कंपनी की लगातार बढ़ते मुनाफा का हम ही पैदावार रहे हैं, जबकि आज हमे अपराधी और खूनी ठहराया जा रहा हैं.
हम लगभग सभी मजदूर गरीब मजदूर-किसान परिवारों से हैं जिनकी जीविका हमारी नौकरी पर ही निर्भर हैं. हमनें अपने व अपने परिवार के भविष्य के सपने बुन रखे थे, कि हमारा भी अपना घर होगा. भाई-बहन व बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलाएंगे, ताकि उनका भविष्य भी उज्जवल हो सके व माता-पिता जिन्होंने इतने कष्ट उठाकर हमें इस लायक बनाया कि हम अपने पैरों पे खड़े हो सकें, उनका जीवन आरामदायक बनायेंगे.

कंपनी में हमारा हर प्रकार से शोषण हो रहा था, जैसे कि-

किसीको भी तबियत ख़राब होने पर डिस्पेंसरी न जाने देना व बिमारी की हालत में भी पूरा काम करवाना.

यहाँ तक कि टॉयलेट भी नहीं जाने दिया जाता था. केवल लांच या टि-टाइम में ही जाने दिया जाता था.

अधिकारीयों का कर्मचारियों के साथ भद्दा व्यवहार व गालिया देना और कभी कभी तो दंड देने के लिए थप्पड़ मारना व मुर्गा बना देना.

यदि किसी कर्मचारी के साथ या उसके परिवार के किसी सदस्य के साथ दुर्घटना या कोई समस्या होने पर या यहाँ तक की किसी सम्बन्धी की मृत्यु होने पर यदि कर्मचारी दो या चार दिन की छुट्टी लेता था, तो उसकी सेलरी का आधा भाग, लगभग नौ हज़ार रुपये काट लिया जाता था.

इस प्रकार शोषण के कारण कर्मचारियों को यूनियन कि जरूरत महसूस हुई. कंपनी यूनियन के खिलाफ थी, जिनके कारण हमारी साल 2011 में तीन हड़ताल हुई, जिसमे हमारे तीस साथियों को नौकरी से निकाल दिया गया. लेकिन आख़िरकार हमने फरवरी 2012 में यूनियन का रजि. करवाया, जिसमे हमारी मदद एच.आर. मैनेजर स्वर्गीय श्री अवनिश कुमार देव ने कि थी. हमारी मदद करने के कारण कंपनी देव जी से बहुत खफा हो गई थी, जिसके चलते देव जी ने नौकरी से अपना इस्तीफा दे दिया था. कंपनी ने पोल खुलने के डर से उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया था. यूनियन को तोडवाने व देव जी को रास्ते से हटाने के लिए एक योजनाबंध तरीके से बाउन्सरों व गुंडों को बुलाकर 18 जुलाई 2012 की ‘दुर्घटना’ को अंजाम दिया.

अबकी स्थिति

हम 147 मजदूरों को बिना किसी न्यायिक जाँच किये जेल में डाल दिया गया. हमारा जेल में बंध रहते 8 महीनें से ज्यादा समय हो चुका है. यहाँ जेल में हम बहुत मानसिक दबाव झेल रहे है. कई लोगों को टी. बी., पिलिया व किसीको दौरे पड़ रहे है. और बहुत सारे कर्मचारियों को अन्य काफी बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है.

हमारे लगभग सभी परिवारों में कमाने वाले केवल हम थे जो जेल में बंध हैं. जिसके कारण परिवारों को भूखे मरने की नोबत आ गई है. औरोतों और बच्चों कि शिक्षा तक भी छुट गई है जो कि उनका मौलिक अधिकार है. हमारा और हमारे परिवार का भविष्य अंधकार हो गया है. हमारे परिवार के सभी सदस्य भी मानसिक तौर पर बहुत परेशान है. हमे डर हैं कि वो परेशानी के कारण कोई गलत कदम न उठाये.

जेल से बाहर कर्मचारियों कि मौजूदा स्थिति 

147 कर्मचारियों को जेल में डालने के साथ साथ कंपनी ने लगभग 2500 कच्चे और पक्के कर्मचारियों की बिना किसी न्यायिक जाँच के नौकरी से निकाल दिया और वह बेरोजगार हो गए. उनकी परिवारों की स्थिति भी गंभीर है. यहा तक कि उनके पास कोई एक्सपीरियंस डोकुमेंट प्रूफ नहीं है और उनका पूरा कैरियर बर्बाद हो चूका है और उनमे से जो भी कोई हमारी पैरवी करने के लिए आगे आता है, उसे भी उठाकर जेल में डाल दिया जाता है (जैसे साथी ईमान खान के साथ किया गया, जिसका नाम कोई एफ.आई.आर., चार्जशीट या एस.आई.टी. रपट में नहीं था; 65 मजदूरों के ऊपर अभी भी गैर-जमानती वारंट जारी हैं). जेल में बंध कर्मचारियों और बाहर बेरोजगार कर्मचारियों के पास अपनी जीविका चलाने का कोई भी साधन नहीं है, जिसके चलते सभी मानसिक दबाव में है. लेकिन इन हालातों के बीच भी जेल के बहार के हमारे साथी जो न्याय के लिए संघर्ष जारी रखे हैं, उससे हमे इन सलाखों के पीछे भी आशा और उर्जा मिलती हैं. आठ महीने के उपर चल रहे इस संघर्ष में हमे देश के अलग अलग प्रान्त से मजदूर, मेहनतकश और आम जनता के समर्थन के खबरे आती रही हैं, जो भी हमे उम्मीद देती रही हैं.

हम अपनी जाँच की मांगों को लेकर सरकार के लगभग सभी मंत्रियों से मिल चुके हैं. राज्य उद्योग मंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री से भी न्याय की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन सरकार हरियाणा के मजदूर-कर्मचारियों की बजाये कंपनी मालिकों की ही तरफ झुकी हुई है. हम अंतिम बार सरकार से अपील करते है कि मरने या मारने के इस मुकाम तक पहुचने से पहले हमारे साथ न्याय हों. साभार- जनज्वार.

11 जनवरी 2011

पहचान निर्मिति की राजनीति

-दिलीप ख़ान
किसान आत्महत्या को रोकने के जितने प्रयास किए गए हैं वे अब तक नाकाफ़ी साबित हुए हैं और आत्महत्याओं के आंकड़े साल-दर-साल बढ़े ही है. विदर्भ क्षेत्र में कई गांवों की पहचान किसान आत्महत्या वाले गांव के तौर पर होती है और समेकित रूप से देश के भीतर विदर्भ की पहचान “सुसाइड बेल्ट” के तौर पर. देश में ऐसी अलग-अलग पहचान के कई क्षेत्र हैं जिसको किसी एक ख़ास विशेषता के साथ जोड़ दिया गया है. नक्शे पर एक रेखा खींचकर कुछ पट्टियों को चिह्नित किया गया है जिसका नामकरण ’समस्या’ अथवा ’गौरवशाली प्रतीक’ के साथ किया गया है. जेहन में ऐसे क्षेत्रों को किसी ख़ास शब्द के साथ जोड़कर संरक्षित किए जाने से अन्य कई सवालों और पेंचोखम से निजात मिलती है. बीते दशक में कई साल विदर्भ के मुकाबले छत्तीसगढ़ में अधिक किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन किसान आत्महत्या जैसे विषय के साथ छत्तीसगढ़ स्वाभाविक तौर पर चर्चा में नहीं रहता. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नक्शे पर खींचे गए कई पट्टियों के दायरे में छत्तीसगढ़ आता है और इनमें से किस पट्टी के साथ छत्तीसगढ़ के नाम को नत्थी किया जाए इसे सत्ता अपनी सुविधानुसार अपने प्रचार तंत्र के जरिए स्थापित करती है. छत्तीसगढ़ को “रेड कोरिडोर” के सबसे प्रतिनिधि चेहरे के बतौर जाना जाता है।
गृह मंत्रालय द्वारा आधिकारिक-अनाधिकारिक तौर पर हर साल यह दावा किया जाता है कि देश के भीतर ’रेड कोरिडोर’ लगातार अपना विस्तार कर रहा है. इसको विस्तार देने से न सिर्फ़ देश के भीतर किसी विकास परियोजना के नाम पर हो रहे विस्थापन विरोधी आंदोलन को रोकने में सहूलियत होती है बल्कि एक ऐसे प्रदेश, जो आत्महत्या के मामले में शिखर पर पहुंच कर किसान आत्महत्या जैसे बेहद संवेदनशील विषय पर राज्य की असफ़लता को और अधिक प्रमाणित करने का जरिया बनती, उसे उस पहचान से विमुख किया जाता है. इससे फायदा यह होता है कि ’सुसाइड बेल्ट’ से इस क्षेत्र को ग़ायब मान लिया जाता है और इस एहसास को प्रमुखता दी जाती है कि आत्महत्या रोकने में राज्य सफ़ल हो रहा है। ’रेड कोरिडोर’ को लंबा करने और ’सुसाइड बेल्ट’ को छोटा करने के साथ ही राज्य और सरकार की सफ़लता-असफ़लता जुड़ी हुई है और इसकी लंबाई-चौड़ाई तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों के मुताबिक बदलती रहती है.
पहचान निर्मिति एक बड़े राजनीतिक योजना के साथ होती है और इसका न सिर्फ़ प्रतीकात्मक महत्त्व है बल्कि इसमें किसी एक पूरी राजनीतिक विरासत को बिल्कुल भिन्न लबादे में उतारने की भी कोशिश रहती है. मसलन 1 मई सारी दुनिया में मज़दूर दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है और इसकी शुरूआत अमेरिका से हुई, जहां के मज़दूरों ने प्रतिदिन आठ घंटे को कार्यदिवस के रूप में मानने-मनवाने के लिए लंबा संघर्ष किया. लेकिन, 1984 में रोनाल्ड रीगन ने यह कहते हुए इस दिन को क़ानून दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया कि दो सौ साल पहले इस दिन ’मुक्ति और क़ानून’ के बीच साझेदारी का आरंभ हुआ था. बकौल चोम्सकी, इस कदम के बाद मज़दूर दिवस की पूरी राजनीतिक संघर्ष रीगन की नई उद्‍घोषणा के साथ ही राष्ट्रवाद के प्रतीक के तौर पर परिवर्तित हो गई.
राष्ट्रवाद का प्रतीक गढना और इसे स्थापित करना जनांदोलनों के जरिए गढे गए प्रतीको के मुकाबले सरल है. यह अलग बात है कि इसे स्थापित करने में एक अरसा लग जाए, लेकिन आरामदायक स्थिति हासिल करने के लिए राज्य अक्सर ऐसा करता है. नर्मदा में पिछले 25 सालों से बड़े बांधों के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के कारण स्थानीय जनता और मानवाधिकार कार्यकर्ता ’नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के बैनर तले संघर्ष कर रहे हैं. इस संघर्ष के दौरान कई ऐसे मौंके आए जब राज्य की कमज़ोरिया साफ़ नमूदार हुई। नर्मदा घाटी की एक ऐसी पहचान निर्मित हुई जिसमें लोग अथक आंदोलन करते हुए सरकारों और कॉरपोरेटों से जूझ रहे हैं. सरदार सरोवर बांध पूरी घाटी में बन रहे बांधों में सबसे विशालकाय और चर्चित है. अब नरेंद्र मोदी ने यह घोषणा की है कि वे सरदार पटेल की ऐसी प्रतिमा बनाएंगे जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी. इस प्रतिमा को बनाने के साथ ही इस घाटी की पहचान और राजनीतिक संघर्ष को झटके में बदलने की यह कोशिश है. सरदार पटेल की पहचान को सरदार सरोवर बांध के साथ मोदी देख रहे हैं और सबसे ऊंचा, सबसे लंबा, सबसे पहले जैसे सामान्य ज्ञान के प्रश्नों के साथ ही गुजरात और नर्मदा घाटी की पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
राज्य की सहभागिता के बगैर किसी ऐसी पहचान का स्थानांतरण मुश्किल होता है. देश में ’सुसाइड बेल्ट’ जैसी अवधारणा के तहत आने वाले कई नए क्षेत्र उभर रहे हैं जो भविष्य में विदर्भ को पछाड़ने वाले हैं. मसलन तमिलनाडु के तिरुपुर में पिछले दो सालों में एक हज़ार से अधिक कपड़ा मज़दूरों ने आत्महत्या की. तिरुपुर अभी तक डॉलर सिटी, कॉटन सिटी जैसे नामों से जाना जाता रहा है लेकिन अब इसे तमिलनाडु की आत्महत्या राजधानी कहा जा रहा है. मज़दूरों की आत्महत्या देश में इस अर्थ में नया है कि आत्महत्या को किसान के साथ जोड़ दिया गया है, इसलिए तिरुपुर को ’सुसाइड बेल्ट’ में आने में वक़्त लग सकता है.
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