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18 फ़रवरी 2016

तीन रंग वाली आज़ादी

-हिमांशु पंड्या
मैं सबसे संवेदनशील मुद्दे नारे-पोस्टर-सभा पर ही बात करूंगा. उसके बहाने कई बातें आयेंगी.

पहली बात, मैं अब यह दावे से कह सकता हूँ कि 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा वहां लगाया ही नहीं गया था.यह जी टीवी था जिसने 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' को बड़ी कुशलता से वॉइस ओवर के जरिये 'पाकिस्तान जिंदाबाद' में बदला और फिर जब उसमें एबीवीपी के लोग ही फंसने लगे तो मूल वीडियो प्रस्तुत कर दिया लेकिन तब तक वह 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का हौव्वा खडा कर चुका था जो लोगों की स्मृति में बस गया. वैसे यह सबसे कम आपत्तिजनक नारा है मेरी निगाह में, पर आपकी में है तो ये आपकी जानकारी के लिए है.

जो जीटीवी एक बार धोखा कर सकता है, उसके बाकी वीडियोज को भी शक की निगाह से देखिये. वॉइस ओवर से कुछ का कुछ बनाया जा सकता है. दूसरा वीडियो जो काफी अँधेरे में था, जिसमें 'भारत की बर्बादी' वाला नारा दिया गया, मैं उसके सन्दर्भ में खास तौर पर ये बात कह रहा हूँ. बहरहाल, यह नारा सर्वाधिक आपत्तिजनक है. इसका बचाव कोई भी नहीं कर सकता, सबको इसकी निंदा करनी चाहिए. सबने की भी, सभी दलों ने की, लिखित में भी पर्चे जारी कर की, फ़ौरन की. पर उसे किस किसने दिखाया ? 

जेएनयू में छात्र-छात्राओं की एकजुटता
'इंशा अल्लाह' का नारा कोई वामपंथी लगा ही नहीं सकता. डीएसयू ( -वह संगठन, जिससे कभी जुड़े रहे विद्यार्थियों ने यह कार्यक्रम रखा था) में तो सबसे 'कड़े' वामपंथी होते हैं, चौबीस कैरेट वाले ! ( मजाक कर रहा हूँ, हालांकि उस संगठन में भी मेरे अच्छे दोस्त रहे हैं. लडाइयां बहसें भी हुईं पर जब मेरे राज्य राजस्थान में 'सूचना के अधिकार' के तहत स्टैच्यू सर्किल, जयपुर पर चल रहे धरने में भागीदारी के लिए जेएनयू के साथियों से मैंने कहा तो जो छ दोस्त मेरे साथ जयपुर चले, उसमें तीन डीएसयू वाले ही थे.और वह कोई वामपंथी आन्दोलन नहीं था.) उसी तरह ( कन्हैया कुमार के संगठन ) एआईएसऍफ़ वाले राष्ट्रवाद को प्रश्नचिह्नित करने वाला कोई नारा नहीं लगा सकते. सबके नारे और उनकी राजनीति स्पष्ट है. 'न हिन्दू राष्ट्र न नक्सलवाद/ एक रहेगा हिन्दुस्तान' यह एसएफआई का नारा है, इसे आइसा कभी नहीं लगाएगी. दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि संयुक्त मोर्चे/जुलूस में यह नारा एसएफआई भी नहीं लगाएगी. आप शायद समझ रहे होंगे.




बहरहाल, अब वो नारे जिनसे मुझे कोई दिक्कत नहीं है. और जो इस घटाटोप में बुरे मान लिए गए हैं. सबसे पहले 'आज़ादी' का नारा. आपने देखा होगा, उसमें एक के बाद एक कई आजादियों की मांग की जाती है. यह एक बहुत सुन्दर नारा है और यह अनेक मौकों पर दिया जाता है. यह हमारी आज़ादी को व्यापक अर्थों में ले जाने की मांग करता है.खुद बाबा साहब आंबेडकर ने राजनीतिक आज़ादी को नाकाफी कहते हुए सामाजिक आज़ादी के लिए लम्बी लड़ाई की जरूरत बतायी थी.हमारे दोस्त पंकज श्रीवास्तव ने इसका एक रूप प्रस्तुत किया है, मैं उसे साभार ले रहा हूँ : 

मैं भी माँगूँ आज़ादी
तुम भी माँगो आज़ादी
सामंतवाद से आज़ादी,
पूँजीवाद से आज़ादी,
साम्राज्यवाद से आज़ादी
कारपोरेट से आज़ादी,
जातिवाद से आज़ादी,
ब्राह्मणवाद से आज़ादी
मर्दवाद से आज़ादी..
राम भी माँगे आज़ादी
रहमान भी माँगे आज़ादी
सांप्रदायिकता से आज़ादी
दंगाइयों से आज़ादी
फ़ासीवाद से आज़ादी
लूटपाट से आज़ादी
लड़ के लेंगे आज़ादी
छीन के लेंगे आज़ादी..
आज़ादी भाई आज़ादी
हमें चाहिए आज़ादी...


तस्वीर-1. कश्मीर की अर्ध-विधवाएं
इस नारे ने निर्भया/ज्योति के आन्दोलन के समय एक नया आयाम और लोकप्रियता पायी. जिस समय निर्भया के निर्मम बलात्कार-हत्या के बाद पितृसत्ता द्वारा लड़कियों पर पाबंदियां बढ़ने और उनके कपड़ों-आचरण-घूमने-दोस्ती वगैरह को दोष देने का खतरा मंडरा रहा था, उस समय बहुत जागरूक ढंग से प्रमुख स्त्री संगठनों और जेएनयू के विद्यार्थियों ने इसे पितृसत्ता से लड़ाई पर फोकस करने में काम में लिया. उन मूल्यों से लड़ाई में काम लिया जो स्त्री को कमजोर और संरक्षणीय मानते थे,उनकी हिफाजत का जिम्मा मर्दों को देते थे और इस नाते स्त्री के हितैषी होने की छवि प्रस्तुत करते थे लेकिन दरअसल उसकी गुलामी की जंजीरें तैयार करते थे. ( कोई चैनल उन् नारों को न समझ पाने के कारण 'अनऑडिबल' कह रहा था, मुझे हंसी आ गयी.मुझसे पूछ लेते, पर नहीं , वह आपको नहीं समझ आयेगा, आपको सिर्फ 'कश्मीर मांगे आज़ादी' सुनाई देगा.) 'बाप से मांगे आज़ादी/ खाप से मांगे आज़ादी/ सुनसान सड़क पर आज़ादी/रात में घूमने की आज़ादी ...' इस तरह यह नारा बढ़ता जाता है, इसमें कई आयाम लोगों ने अपनी समझ और सूझ से जोड़े. इसी क्रम में यह समझना जरूरी है कि जब निर्भया आन्दोलन चल रहा था, तब इसकी मध्यवर्गीय सीमाओं को लांघने की कोशिश की गयी. इसमें सोनी सोरी ( एक आदिवासी बहन, जिसे बिना सबूतों के नक्सलवादी कहकर जेल में डाला गया, जिनकी योनि में दंतेवाडा एस पी अंकित गर्ग ने पत्थर भर दिए थे और इस वीर एस पी को भारत सरकार ने गैलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया.) या मनोरमा ( मणिपुर की बहन, जिसे आसाम राइफल्स के जवानों ने 10 जुलाई, 2004 को उठा लिया और अगले दिन उसका बलात्कृत क्षत विक्षत शव सड़क पर मिला और जिसके पांच दिन बाद मणिपुर की कुछ स्त्रियों ने भारत का सर्वाधिक मार्मिक झकझोर देनेवाला प्रतिरोध करते हुए नग्न होकर इस भारतीय राष्ट्र के सामने एक पोस्टर दिखाया जिस पर लिखा था - "इंडियन आर्मी, रेप अस". ) या कुनन पोश्पोरा की महिलाओं( कश्मीर के कुपवाड़ा का एक गाँव जहां 23 फरवारी ,1991 की रात फोर्थ राज राइफल्स के जवानों ने वहां की अनगिनत महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया,पूरी रात.) के सवाल क्यों नहीं शामिल होंगे. इसमें खैरलांजी के दलित परिवार की सुरेखा और प्रियंका भोटमांगे क्यों नहीं आयेंगी. 

29 सितम्बर,2006 को भोटमांगे परिवार के चार लोगों की नृशंस हत्या की गयी. दोनों मां-बेटी को गाँव भर में नग्न परेड और बलात्कार के बाद मारा गया. महिला आन्दोलन का मानना था कि जाति,धर्म,राष्ट्र के भाले सबसे पहले महिलाओं के ही शरीर में घोंपे जाते हैं और इसलिए कोई भी महिला मुद्दा इन सब पर हमला किये बिना,इकलौता नहीं लड़ा जा सकता.इस तरह इस लड़ाई में जातिगत शोषण से लेकर AFSPA जैसे कानूनों के विरोध ने भी जगह ली. छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को भी आज़ादी चाहिए, कॉर्पोरेट लूट से. कश्मीर को आज़ादी चाहिए आफ्सपा जैसे घोर मानव विरोधी क़ानून से. पूरे मुल्क को आज़ादी चाहिए हमारी नसों में घुस चुके जातिवाद के जहर से.

कश्मीर में फौज
यह सिर्फ एक लंबा उदाहरण था यह समझाने के लिए कि अधिकारों के लिए चल रही सारी लडाइयां आज़ादी की ही लडाइयां हैं. और ये आपस में जुडी हुई भी हैं. ‘आज़ादी’ – यह दुनिया का सबसे खूबसूरत लफ्ज़ है. बराबरी और भाईचारा इसका हाथ पकडे बिना नहीं आ सकते. आपको इससे डर क्यों लगता है ? आप नहीं चाहते कि इस मुल्क के सभी भाई बहन आज़ाद हों ? आपकी बेटियाँ देर रात घर आयें तो आपको चिंता न हो. यदि किसी के साथ उसके रंग या जन्म या लिंग या भाषा या क्षेत्र किसी भी आधार पर भेदभाव होता है तो सबसे पहले उसकी आज़ादी का हनन होता है, उन अधिकारों का हनन होता है, जो इस आज़ाद मुल्क ने अपने आज़ाद नागरिकों को देने का वादा किया था. क्यों यह मुल्क डेढ़ दशक से आमरण अनशन पर बैठी एक महिला की आवाज़ नहीं सुनना चाहता ? ( और जानकारी के लिए, यह पूरी दुनिया में सबसे लंबा आमरण अनशन बन चुका है. हैट्स ऑफ़ टू नेशन व्हिच डू नॉट वांट टू नो!)

और आपकी जानकारी के लिए, मैं हर साल जब साहित्य की अपनी कक्षा में आधुनिक काल पर आता हूँ तो सबसे पहले ‘आधुनिकता’ क्या है, इसी पर बात करता हूँ और आधुनिकता के सबसे जरूरी तत्त्व के रूप में इसी आज़ादी का मोल और अर्थ समझाता हूँ. ( दूसरा तत्त्व है – तर्क ) अब क्या आप मेरी कक्षा को भी देशद्रोही साबित करेंगे ? क्या उन किताबों को भी जला देंगे, जिनसे मैंने यह सीखा है ? 

अब रहा आख़िरी नारा – ‘तुम कितने अफज़ल मारोगे / हर घर से अफज़ल निकलेगा’. यदि मेरी अब तक की बातों का सिरा पकडके आप यहाँ तक पहुंचे तो इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि इसका सीधा मतलब यही है कि राज्य की हिंसा सिर्फ प्रतिहिंसा को जन्म देती है. वैसे चर्चा तो इसकी भी की जा सकती है कि जब सामने से नारा लग रहा हो ‘जो अफज़ल की बात करेगा / वो अफज़ल की मौत मरेगा’ तो वो कौनसा यार्डस्टिक या पैमाना है, जो एक को राष्ट्र समर्थक और दूसरे को राष्ट्रद्रोही घोषित करता हो. दूसरी ओर का दूसरा नारा तो जगत्प्रसिद्ध है ही जिसमें दूध मांगने पर खीर देने की बात कही गयी है और खीर मुझे बचपन से ही बहुत पसंद है इसलिए मैं इस नारे का अर्धांश बचा लेना चाहता हूँ सभी खीर प्रेमियों की ओर से. मैं ‘दूसरी ओर’ यह भाषा काम में नहीं लेना चाहता था पर जब दो छोर हैं ही और आप एक छोर की बात सुन चुके हैं तो मेरा फ़र्ज़ है कि अनसुने छोर की ही बात बताऊँ. इसमें लगे हाथ यह भी जोड़ लीजिये कि अफज़ल को कश्मीर में लाखों लोग शहीद मानते हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने अपने निर्णय में उसके खिलाफ षड्यंत्र में प्रत्यक्ष भागीदारी के ठोस सबूत न होने की बात को स्वीकारा है और लिखा है कि उसे इस देश के ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए फांसी दी जाए. इसका क्या मतलब होता है ? क्या इसे कोई न्यायिक हत्या कहे तो वह दोषी है इस मुल्क का ? इस आयोजन के आयोजकों ने अपने पर्चे में यही कहा था. इस कार्यक्रम का नाम था –‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफिस’. यह आगा शाहिद अली के 1997 में आये कविता संग्रह का नाम है. 

1990 में कश्मीर में सात महीनों तक डाक नहीं बंटी थी, यह इसका सन्दर्भ है. क्या उनकी तकलीफ को बाकी मुल्क को जानने का अधिकार नहीं है ? अपने को इस पूरे राष्ट्र का ठेकेदार मानने वाले पत्रकार का वह क्लिप आपने देखा होगा जिसमें उसने उमर खालिद को हनुमंथप्पा का नाम लेकर चुप करवा दिया था. चुप क्या करवा दिया था, माइक निकाल दिया था. आपको लगा ऐसा करके उसने भारतीय राष्ट्र की तरफ से उमर को चुप करवा दिया था. लांसनायक हनुमंथप्पा ने इस मुल्क के लिए जान दी थी तो इस मुल्क के लोगों की बात को, उन लोगों की बात को – जिसे यह मुल्क नहीं सुन पा रहा, पहुंचाने की कोशिश करने वाला उनकी विरासत का उत्तराधिकारी है या उस आवाज़ को चुप कराने वाला ? और क्या उसका अपने मुल्क के अभागे भाइयों से प्यार , देशद्रोह है ? ठीक से सोचिये, कहीं हमारी राष्ट्रवाद की अवधारणा में कोई बुनियादी कमी तो नहीं है ? 

इस चित्र को फिर ध्यान से देखिये, जिसे देखकर आपका खून खौल रहा था. इसमें एक चित्र कश्मीर की अर्धविधवाओं का है, वे मजलूम औरतें जिनके शौहर लापता हैं, जो बरसों से इस उम्मीद में जी रही हैं कि किसी दिन वे वापिस आ जाएंगे, वे उन कहानियों के सहारे जीवित हैं कि फलां का शौहर-बेटा-बाप तेरह साल बाद अचानक मिल गया था.दूसरा चित्र उनके यहाँ बरसों से स्थायी रूप से रह रही फ़ौज का है और तीसरा अफज़ल गुरु का है, जिसे वे अपने साथ हुए अन्याय का प्रतीक मानते हैं. ये तस्वीरें बर्बादी की कामना नहीं बल्कि जो बर्बाद हो रहा है, उसकी ओर आपका ध्यान दिलाने के लिए हैं.

अफ़ज़ल गुरु
वापिस नारों पे आईये. ‘बर्बादी’ वाला वह नारा कितनी देर का है ? बीस सैकंड ? तीस सैकंड ? जो मुल्क पंद्रह साल से गूँज रही अपनी बेटी की पुकार नहीं सुन रहा, उसने तीस सेकंड्स के नारे इतनी फुर्ती से कैसे सुन लिए ? इस सारी बहस को तो खैर जाने ही दीजिये कि उस केऑस में कोई नारा कितनी जल्दी रुकवाया जा सकता था, पर यह जान लीजिये कि इस मुल्क ने फिलहाल इतनी ‘सहिष्णुता’ दिखा रखी है कि वह इन इलाकों में उठने वाले आक्रोश के स्वरों की आसानी से ‘उपेक्षा’ कर देता है. यहाँ तक कि ऐसी आवाजों के साथ केंद्र , राज्य संचालन के दायित्त्व भी बाँट लेता है. जेएनयू इस देश का , कम से कम मानविकी, सामाजिक विज्ञान और गैर तकनीकी अनुसंधान में अकेला विश्वविद्यालय है जो अखिल भारतीय चरित्र का है. इसकी प्रवेश परीक्षा आनेवाली 16-19 मई को देश के बावन शहरों में होगी. यह विश्वविद्यालय एक छोटा भारत है. बड़ा भारत जब अपने दूरदराज के कोनों की आवाज़ दूरी के कारन सुन नहीं पा रहा होता, तब इस छोटे भारत में ये आवाजें पास पास आती हैं, कई बार केरल का लड़का, बिहार के लड़के का रूम पार्टनर बनता है. इस छोटे भारत में एक वे एक दूसरे की बातें सुनना-समझना-लड़ना-झगड़ना सब सीखते हैं. तब थोड़ा हौसला आता है, दूरियां मिटती हैं और यह छोटा भारत उस सपने को पाने की कोशिश करता है, जिसे दरअसल बड़े भारत को एक न एक दिन पाना ही है.

आपने जिन नौ दस बच्चों के चित्र टीवी पर देखे हैं ना, वे सब अलग अलग प्रान्तों के हैं, उनका साथ आना इस मुल्क को कमजोर नहीं, मजबूत बनाता है, शब्द के वास्तविक अर्थ में मजबूत. दबाव की एकता नहीं, साथ की एकता, प्यार की एकजूटता. कम से कम इस छोटे भारत में तो यह प्रयोग होना चाहिए. किसी दिन बड़े भारत में भी हम इस सपने को पा लेंगे.

और अब आखिर में मैं यह बता ही दूं – यह आज़ादी का नारा मूलतः कश्मीर का ही है और अब अगर मैं हिचकते हुए यह भी बता दूं कि यह नारा सबसे पहले कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़नेवालों ने ही लगाया था तो अब तो आप मेरे मुंह से ‘आज़ादी’ इस लफ्ज़ का उच्चारण सुनकर मुझे देशद्रोही तो नहीं कहेंगे ना ? मैं इस मुल्क से बहुत प्यार करता हूँ , अपने अल्मा मैटर से प्यार करता हूँ जिसने मुझे पूरे मुल्क से प्यार करना सिखाया.

इसलिए लिखता हूँ – “असली नारे लगानेवाले को ढूंढो !” यह नारा भी दरअसल जेएनयू को बचा नहीं रहा है. एक नौजवान – जिसका नाम उमर खालिद है, उसे आपने बिना सबूत के आतंकवादी बनाकर पूरे मुल्क को उसकी तस्वीर दिखा दी है. दिल्ली की सड़कों पर उसके चित्र वाले पोस्टर लगा दिए हैं. बजरंग दल नामक सांस्कृतिक दल के कार्यकर्ता उसके खून से तिलक करके अपना अनुष्ठान पूर्ण करना चाहते हैं. यदि आज उसे कुछ हो गया ना, तो इस छोटे भारत में तो सम्वाद के सारे रास्ते बंद हो ही जायेंगे , पर आपकी कमीज़ पर जो खून के दाग लगेंगे,उनका क्या होगा ? माना,अखलाक का मारा जाना हम नहीं रोक सकते थे पर रोहित का मारा जाना एक क्रमबद्ध हत्या थी. उसका निष्कासन, उसका बहिष्कार, उसकी प्रताड़ना सब धीरे धीरे घटित हुआ था. उसे भी ‘राष्ट्र विरोधी’ ही घोषित किया गया था. ठीक है, आपको तब पता नहीं चला, पर इस बार तो आपकी आँखों के सामने सब हो रहा है.कन्हैया कुमार, उमर खालिद, रामा नागा, श्वेता राज,आशुतोष कुमार,अनंत प्रकाश नारायण ये सब नाम नहीं हैं,आपके विवेक की कसौटी हैं. अभी हम एक रोहित की हत्या का पश्चाताप भी नहीं कर पाए हैं, दूसरे रोहित को खुदसे बिछड़ने देंगे ? 







01 अगस्त 2013

हंस की गोष्‍ठी पर वरवर राव का खुला पत्र

प्रेमचंद जयंती पर हंस के सालाना कार्यक्रम में आए कई लोग जानते थे कि अरुंधति राय की सहमति के बगैर उनका नाम आमंत्रण में छपा था इसलिए वे नहीं आ रही हैं। कुछ लोगों को यह भी पता था कि वरवर राव दिल्‍ली आ चुके हैं लेकिन यहां आने पर उन्‍हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करने के बारे में पता चला है, इसलिए उन्‍होंने कार्यक्रम का बहिष्‍कार किया है। इतना जानने के बावजूद जानने वाले चुप रहे और हंस के संपादक राजेंद्र यादव अंत तक जनता को झूठ बोलकर बरगलाते रहे। आखिरकार कार्यक्रम खत्‍म होने के बमुश्किल घंटे भर बाद वरवर राव की ओर से कार्यक्रम में न शामिल होने पर एक खुला पत्र जारी किया गया जिसे हम पूरा नीचे चिपका रहे हैं। पढि़ए और समझिए कि सफेद हंस के काले चश्‍मे से आखिर सच्‍चाई कैसी दिखती है, कैसी दिखाई जाती है और इस चश्‍मे के भीतर कितने झूठ पैबस्‍त हैं।  जनपथ से साभार 

मुक्तिबोध की हजारों बार दुहराई गई पंक्ति को एक बार फिर दुहरा रहा हूं: ''उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे/ तोड़ने ही होंगे/ गढ़ और मठ/सब।''

कुछ साल पहले की बात है जब मेरे साथ अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक समिति और अखिल भारतीय जनप्रतिरोध मंच में काम करने वाले क्रांतिकारी उपन्यासकार और लेखक विजय कुमार ने आगरा से लेकर गोरखपुर तक हिंदी क्षेत्र में प्रेमचंद की जयंती पर एक सांस्कृतिक यात्रा आयोजित करने का प्रस्ताव दिया था। यह हिंदुत्व फासीवाद के उभार का समय था, जो आज और भी भयावह चुनौती की तरह सामने खड़ा है। उस योजना का उद्देश्‍य उभर रही फासीवाद की चुनौती से निपटने के लिए प्रेमचंद को याद करना और लेखकीय परम्परा को आगे बढ़ाकर इसके खिलाफ़ एक संगठित सांस्कृतिक आंदोलन को बनाना था।

जब ‘हंस’ की ओर से प्रेमचंद जयंती पर 31 जुलाई 2013 को ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' विषय पर बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया तो मुझे लगा कि अपनी बात रखने का यह अच्छा मौका है। प्रेमचंद और उनके संपादन में निकली पत्रिका ‘हंस’ के नाम के आकर्षण ने मुझे दिल्ली आने के लिए प्रेरित किया। इस आयोजन के लिए चुना गया विषय ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' ने भी मुझे आकर्षित किया। जब से मैंने नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के प्रभाव में लेखन और सांस्कृतिक सक्रियता में हिस्सेदारी करनी शुरू की तब से मेरी अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगता ही रहा है। यह स्वाभाविक था कि इस पर विस्तार से अपने अनुभवों को आपसे साझा करूं।

मुझे ‘हंस’ की ओर से 11 जुलाई 2013 को लिखा हुए निमंत्रण लगभग 10 दिन बाद मिला। इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेंद्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण कार्ड में डाल देने की घोषणा कर रखी थी। बहरहाल, मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन, क्यों और किस मंशा से बुला रहा है? मेरे साथ मंच पर इस विषय पर बोलने वाले कौन हैं?

आज दोपहर में दिल्ली में आने पर ''हंस'' की ओर से भेजे गए व्यक्ति के पास छपे हुए निमत्रंण कार्ड को देखा तब पता चला कि मेरे अलावा बोलने वालों में अरुंधति राय के साथ अशोक वाजपेयी व गोविंदाचार्य का भी नाम है। प्रेमचंद जयंती पर होने वाले इस आयोजन में अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य का नाम वक्ता के तौर पर देखकर हैरानी हुई। अशोक वाजपेयी प्रेमचंद की सामंतवाद-फासीवाद विरोधी धारा में कभी खड़े  होते नहीं दिखे। वे प्रेमचंद को औसत लेखक मानने वालों में से हैं। अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कारपोरेट सेक्टर के साथ जुड़ाव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी तरह क्या गोविंदाचार्य के बारे में जांच पड़ताल आप सभी को करने की जरूरत बनती है? हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति और साम्राज्यवाद की जी हूजूरी में गले तक डूबी हुई पार्टी, संगठन के सक्रिय सदस्य की तरह सालों साल काम करने वाले गोविंदाचार्य को प्रेमचंद जयंती पर ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' विषय पर बोलने के लिए किस आधार पर बुलाया गया!


मंच पर बाएं से संचालक अजय नावरिया, राजेंद्र यादव और अशोक वाजपेयी और के.एन. गोविंदाचार्य (खड़े) भाषण देने के बाद

मैं इस आयोजन में हिस्सेदारी कर यह बताना चाहता था कि अभिव्यक्ति पर सिर्फ प्रतिबंध ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का खतरा उठा रहे लोगों की हत्या तक की जा रही है। आंध्र प्रदेश में खुद मेरे ऊपर, गदर पर जानलेवा हमला हो चुका है। कितने ही सांस्कृतिक, मानवाधिकार संगठन कार्यकर्ता और जनसंगठन के सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया गया। हजारों लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। अभी चंद दिनों पहले हमारे सहकर्मी गंटि प्रसादम् की क्रूर हत्या कर दी गई। गंटी प्रसादम् जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा-आरडीएफ के उपाध्यक्ष, शहीद बंधु मित्र में सक्रिय सहयोगी और विप्लव रचियता संघम् के अभिन्न सहयोगी व सलाहकार और खुद लेखक थे। विरसम ने उनकी स्मृति में जब एक पुस्तक लाने की योजना बनाई और इस संदर्भ में एक वक्तव्य जारी किया तब हैदराबाद से कथित ''छत्तीसगढ चीता'' के नाम से विरसम सचिव वरलक्ष्मी को जान से मारने की धमकी दी गई। इस धमकी भरे पत्र में वरवर राव, प्रो. हरगोपाल, प्रो. शेषैया, कल्याण राव, चेलसानी प्रसाद सहित 12 लोगों को जान से मारने की चेतावनी दी गई है। लेखक, मानवाधिकार संगठन, जाति उन्मूलन संगठनों के सक्रिय सदस्यों को इस हमले में निशाना बनाकर जान से मारने की धमकी दी गई। इस खतरे के खिलाफ हम एकजुट होकर खड़े हुए और हमने गंटी प्रसादम् पर पुस्तक और उन्हें लेकर सभा का आयोजन किया। इस सभा के आयोजन के बाद एक बार फिर आयोजक को जान से मार डालने की धमकी दी गई। अभिव्यक्ति का यह भीषण खतरा साम्राज्यवादी-कारपोरेट लूट के खिलाफ अभियान, राजकीय दमन की खिलाफत और हिंदुत्व फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के चलते आ रहा है। यह जन आंदोलन की पक्षधरता और क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा को आगे ले जाने के चलते हो रहा है।

हैदराबाद में अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ एक सभा को संबोधित करने के समय हिंदुत्व फासीवादी संगठनों ने हम पर हमला किया और इसी बहाने पुलिस ने हमें गिरफ्तार किया। इसी दिल्ली में जंतर-मंतर पर क्या हुआ, आप इससे परिचित होंगे। अफजल गुरू के शरीर को ले जाने की मांग करते हुए कश्‍मीर से आई महिलाओं और अन्य लोगों को न तो जंतर-मंतर पर एकजुट होने दिया गया और न ही मुझे और राजनीतिक जेल बंदी रिहाई समिति के सदस्यों को प्रेस क्लब, दिल्ली में बोलने दिया गया। प्रेस क्लब में जगह बुक हो जाने के बाद भी प्रेस क्लब के आधिकारिक कार्यवाहक, संघ परिवार व आम आदमी पार्टी के लोग और पुलिस के साथ साथ खुद मीडिया के भी कुछ लोगों ने हमें प्रेस काफ्रेंस नहीं करने दिया और वहां धक्कामुक्की की।

मैं जिस जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा का अध्यक्ष हूं, वह संगठन भी आंध्र प्रदेश, ओडिशा में प्रतिबंधित है। इसके उपाध्यक्ष गंटी प्रसादम् को जान से मार डाला गया। इस संगठन के ओडिशा प्रभारी दंडोपाणी मोहंती को यूएपीए सहित दर्जनों केस लगाकर जेल में डाल दिया गया है। इस संगठन का घोषणापत्र सबके सामने है। पिछले सात सालों से जिस काम को किया है वह भी सामने है। न केवल यूएपीए बल्कि गृह मंत्रालय के दिए गये बयानों व निर्देशों में बार-बार जनआंदोलन की पक्षधरता करने वाले जनसंगठनों, बुद्धिजीवितयों, सहयोगियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, प्रतिबंधित करने, नजर रखने का सीधा अर्थ हमारी अभिव्यक्ति को कुचलना ही है। हम ‘लोकतंत्र’ की उसी हकीकत की आलोचना कर रहे हैं जिससे सारा देश वाकिफ है। जल, जंगल, जमीन, खदान, श्रम और विशाल मध्यवर्ग की कष्टपूर्ण बचत को लूट रहे साम्राज्‍यवादी-कारपोरेट सेक्टर और उनकी तानाशाही का हम विरोध करते हैं। हम वैकल्पिक जनवादी मॉडल की बात करते हैं। हम इस लूट और तबाही और मुसलमान, दलित, स्त्री, आदिवासी, मेहनतकश पर हमला करने वाली और साम्राज्यवादी विध्वंस व सामूहिक नरसंहार करने वाली हिंदुत्व फासीवादी राजनीति का विरोध करते हैं।

हम ऐसे सभी लोगों के साथ हैं जो जनवाद में भरोसा करते हैं। हम उन सभी लोगों के साथ हैं जो अभिव्यक्ति का खतरा उठाते हुए आज के फासीवादी खतरे के खिलाफ खड़े हैं। हम प्रेमचंद की परम्परा का अर्थ जनवाद की पक्षधरता और फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के तौर पर देखते है। प्रेमचंद की यही परम्परा है जिसके बूते 1930 के दशक में उपनिवेशवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी लहर की धार इस सदी में हमारे इस चुनौतीपूर्ण समय में उतनी ही प्रासंगिक और उतनी ही प्रेरक बनी हुई है।

अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य इस परम्परा के मद्देनजर किसके पक्ष में हैं? राजेन्द्र यादव खुद को प्रेमचंद की परम्परा में खड़ा करते हैं। ऐसे में सवाल बनता है कि वे अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य को किस नजर से देखते हैं? और, इस आयोजन का अभीष्‍ट क्या है? बहरहाल, कारपोरेट सेक्टर की संस्कृति और हिंदूत्व की राजनीति करने वाले लोगों के साथ मंच पर एक साथ खड़ा होने को मंजूर करना न तो उचित है और न ही उनके साथ ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' जैसे विषय पर बोलना मौजूं है।

प्रेमचंद जयंती पर ‘हंस’ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में जो भी लोग मुझे सुनने आए उनसे अपनी अनुपस्थिति की माफी दरख्वास्त कर रहा हूं। उम्मीद है आप मेरे पक्ष पर गौर करेंगे और अभिव्यक्ति के रास्ते आ रही चुनौतियों का सामना करते हुए हमसफर बने रहेंगे।

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
वरवर राव
31 जुलाई 2013, दिल्ली

24 जनवरी 2013

वैकल्पिक राजनीति की टूटती उम्मीदें


-अभिनव श्रीवास्तव
अगर कुछ हद तक सरलीकरण का जोखिम उठाकर यह मान लिया जाये कि प्रत्येक आंदोलन राज्य व्यवस्था के प्रति कायम किसी असंतोष की उपज होता है और इसी की अभिव्यक्ति होता है, तो बीते एक साल में राष्ट्र स्तर पर उभरे आन्दोलनों और जनअसंतोष की उपलब्धियों और उसके देश की राजनीति पर इसके चलते पड़े प्रभावों पर एक सार्थक बहस करने की गुंजाइश बराबर बनी हुई दिखायी पड़ती है। इन आन्दोलनों और विमर्शों के साथ जुड़ी हुयी सबसे खास बात यह थी कि देश की जनतांत्रिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति उदासीन रहने वाले शहरी मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इनके इर्द-गिर्द गोलबंद हुआ और सार्वजनिक दायरों की बहसों में प्रतिभाग करता नजर आया। वाम धारा के राजनीतिक दलों और प्रगतिशील जमात के लिए इन आन्दोलनों का उभार उलझन और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति पैदा करने वाला रहा। 

आम तौर पर जल, जंगल जमीन की लड़ाइयों और वंचित तबकों की आवाजों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिनिधित्व प्रदान करने का दावा करने वाले वाम दलों के बीच आरंभ में इन मुहिमों को राजनीतिक समर्थन देने के लिए हिचकिचाहट का भाव रहा, लेकिन इन आन्दोलनों की तीव्रता और धमक बढ़ने के साथ ही सभी दल इन आन्दोलनों के साथ खड़े नजर आये। मुख्य धारा में और इससे इतर कई छोटे-बड़े औपचारिक वाम संगठनों ने इन मौकों अपनी स्थिति को सुरक्षित रखने को विकल्प के तौर पर चुना और लगातार इन आन्दोलनों से जुड़े अंतर्विरोधों की ओर ध्यान दिलाया और उनके प्रति आलोचनात्मक रुख अख्तियार किया। चूंकि मुख्य धारा के वामपंथी दलों ने मध्य वर्ग की भीतर अपनी राजनीति तलाशने की कोशिश की इसलिये इन दलों के भीतर खुद एक तरह की बेचैनी और उथल-पुथल का माहौल दिखा, लेकिन इन दलों का नेतृत्व अपनी दृष्टि और समझ के आधार पर आंदोलनों के साथ खड़े रहने के फैसले पर कायम रहा. 

इस दौरान इन मुहिमों के अंतर्विरोधों और इनके प्रति आलोचनात्मक रवैये को इन आन्दोलनों को कमजोर करने वाली कोशिशों के रूप में देखा गया। ऐसा आग्रह उन सभी वामपंथी दलों की राजनीति पर हावी दिखता है जो इन मुहिमों के साथ खड़ी थीं। लेकिन क्या किसी आंदोलन की दिशा और उसकी राजनीति पर किसी भी किस्म के आलोचना की गुंजाइश को खत्म कर देना ठीक है? ये स्थिति खतरनाक है  और इस तरह के आग्रह पर बातचीत करना इस वक्त की एक बड़ी जरुरत है। रायसीना हिल पर जुटा आंदोलन कई वजहों से सार्थक था क्योंकि इसने कई मायनों में राज्य द्वारा किये जा रहे दमन के प्रति चुपचाप और अवसरवादी नजरिये के बरक्स एक प्रतिसंस्कृति और प्रतिरोध का माहौल पैदा किया। कई विश्लेषकों ने इस बात को रेखांकित किया कि इस आन्दोलनों में गोलबंद होने वाले युवा वर्ग ने किसी नेतृत्व को नहीं तलाशा। इस आंदोलन में वास्तव में कई ऐसी संभावनाये तलाशी जा सकती थीं और उन संभावनाओं को सही दिशा देकर न सिर्फ सरकार को उसकी जवाबदेही की भूमिका के दायरे में अधिक जिम्मेदार बनाया जा सकता था बल्कि उसकी वैधता पर कई तरह के बुनियादी सवाल भी लगाए जा सकते थे। 

उदाहरण के तौर पर सामूहिक बलात्कार के इस घटना के बाद उपजे विमर्श में महिलाओं के यौनिकता के शोषण की चर्चा बहुत हुयी और यह होनी भी चाहिये, लेकिन इसके साथ-साथ श्रम के स्तर पर जारी महिलाओं के शोषण की बहस को भी आगे बढ़ाया जा सकता था। इस बात को उठाने का मकसद यहां किसी भी तरह से यौनिकता के जारी शोषण की बहस को धुंधला बनाना नहीं है लेकिन जब तक इस बहस में महिलाओं के श्रम के स्तर पर जारी शोषण को नहीं जोड़ा जायेगा, तब तक महिला शोषण के खिलाफ राष्ट्र स्तर पर बने विमर्श के उस माहौल को व्यापक रंग प्रदान नहीं किया जा सकेगा और न ही ऐसे मामलों का सन्दर्भ लेने की कोई गुंजाइश बचेगी जिसमें स्वयं राज्य व्यवस्था दोषी पायी गयी हो। ठीक इसी तरह जब गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दिल्ली में हुई घटना के बाद निजी बस चालकों पर निगरानी रखने और उनके संबंध में जानकारी रखने जैसी घोषणा की तो बसों के बढ़ते निजीकरण पर सवाल उठाकर सरकार द्वारा अबाध गति से आगे बढ़ायी जा रही निजीकरण की नीति पर भी सवाल उठाये जाने चाहिये थे। इस तरह की कई संभावनायें इस मुहिम में तलाशी जा सकती थीं। लेकिन इस स्तर पर इस आंदोलन से हासिल हुयीं उपलब्धियों का मूल्यांकन करें तो यह लगता है कि इस मौके पर भी इन आंदोलनों में अपने राजनीतिक विस्तार की संभावनाएं तलाश रहे वामपंथी दल अपनी भूमिका का सही तरह से निर्वाह करने से चूक गये हैं। 

इस भूमिका का सही तरह से निर्वाह नहीं कर पाने के चलते सरकार जहां एक तरफ अपने आपको आंतरिक वैधता के संकट से बचा पाने में सफल हो गयी है वहीं दूसरी तरफ कई किस्म की प्रतिक्रियावादी धाराओं और ताकतों को भी खुद को मजबूती से स्थापित और संगठित हो जाने का मौका मिल गया है। यहां यह रेखांकित करना जरूरी हो जाता है कि शुरुआत से ही इन प्रतिक्रियावादी मांगों के पक्ष में बनते चले गये माहौल और कानूनी दायरों में पूरे विमर्श को धकेल देने की कोशिशों ने सरकार को कई तरह के कानूनों में मन-मुताबिक़ फेरबदल करने का मौका उपलब्ध करा दिया है। पिछले दिनों बाल विकास मंत्री कृष्ण तीरथ ने सामूहिक बलात्कार में शामिल सत्रह वर्षीय किशोर को सामान्य अपराधी की तरह सजा दिलवाने के लिये किशोर न्याय बाल सुरक्षा अधिनियम 2000 में संशोधन करने की जो बात कही, वह ऐसी ही कोशिशों का नतीजा है। अगर सरकार इस अधिनियम में संशोधन करने में सफल हो जाती है तो यह देश में बाल अधिकारों के लिये लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गयी उपलब्धि को नुकसान पहुंचाने वाला होगा। 

यह आश्चर्य की बात है कि इन आंदोलनों से जुड़े वामपंथी दल अपनी राजनीतिक स्थिति और अपनी राजनीति की दिशा का संतुलित मूल्यांकन नहीं कर पाने के चलते यह नहीं देख पा रहे हैं कि इन कोशिशों में उनकी राजनीतिक स्थिति का फर्क धुंधला होता जा रहा है और कई मौकों पर वह कई किस्म की प्रतिक्रियावादी धाराओं के साथ गुथा हुआ नजर आता है। ऐसे में न तो वे मौजूदा जनतांत्रिक राजनीति के विकास क्रम को आगे ले जाने में सहयोगी नजर आते हैं और न ही वर्तमान व्यवस्था के बुनियादी संकटों पर कोई निर्णायक सवाल खड़े करते नजर आते हैं। सच तो यह है कि न सिर्फ इन आंदोलनों में और बल्कि मुख्य धारा से अलग चल रहे जल, जंगल जमीन के आंदोलनों और संघर्षों में भी वामपंथी राजनीतिक दलों ने जैसे अवस्थिति अपनायी है, वह उनकी ऐतिहासिक छवि से एकदम मेल नहीं खाती है। 

ऐसे में यह सवाल बहुत अहम हो जाता है कि मुख्य धारा से कटे हुए वर्गों और समूहों के संघर्षों को प्रतिनिधित्व देने का दावा करने वाले इन राजनीतिक दलों की जवाबदेही कैसे तय की जाये? दरअसल बीते वर्षों में मुख्य धारा के वामपंथी दलों की राजनीति पर देश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर कोई प्रभावी हस्तक्षेप कर अवसर पैदा करने से ज्यादा अवसरों को पकड़ने और उनके फौरी परिणामों को ध्यान में रखकर अपनी स्थिति तय करने का नजरिया हावी होता चला गया है। यह बदलाव अपने आप में वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदों को तोड़ने वाला साबित हो रहा है।
(अभिनव से abhinavas30@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

20 मई 2011

क्या पब्लिक सब जानती है?

गुंजेश
समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने भारतीय राजनीति की स्थितियों पर चिंता जताते हुए लिखा था कि नये विचारों और नये शास्त्रों का आना रुक सा गया है। "शास्त्र और विचार निर्माण का नियामक जब से अमेरिका हो गया है। इसमें पहले का औध्दत्य तो रह गया है लेकिन उसकी गंभीरता ख़त्म हो गई है"। क्या यही बात हम पत्रकारिता और अन्य ऐसे कार्यों, जिनका सीधा संबंध सामाजिक बदलाव को पहचानने और समाज को सचेत करने से है, के बारे में नहीं कह सकते हैं। पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज कुछ खास तरह के बदलावों से होकर गुज़रा है। इन बदलावों ने समाजों में एक सहमति की एकता का निर्माण किया है और असहमति के अवसरों को लगातार कम किया है। क्या हम ऐसा कोई क्षण याद कर सकते हैं जब पत्रकारों और समाज विज्ञानियों ने असहमति के इन कम होते क्षणों पर गंभीर चिंता जाहीर की हो? ईक्का- दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। एक ज़माने में हम अपनी विभिन्नताओं के लिए जाने जाते थे, मतांतर हमारी राजनीति की खासियत हुआ करती थी, पर पिछले कुछ समय में यह परिदृश्य बदला है। हमारे यहाँ मुद्दों में जो एकता आई है क्या वह किसी भी लोकतान्त्रिक समाज के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए?
अगर हम बिहार विधानसभा चुनावों से लेकर हाल ही में संपन्न हुए सभी पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो हम देखेंगे की सभी राज्यों में चुनावी मुद्दों में बेहद समानता है, मुद्दों की एकता ने राज्यों के भौगोलिक और सामाजिक सीमाओं को तो तोड़ा ही है अपनी परंपरागत विचारधारा को भी छोड़ा है, न सिर्फ छोड़ा है विचारधाराओं का जो संघर्ष कभी भारतीय राजनीति में देखा गया है वह अब लगभग समाप्ती की ओर है। विश्लेषक इसे विकास की सामूहिक चाह के रूप में देख और दिखा रहे हैं। अभी तक हम इस दिशा में नहीं सोच पायें हैं की विकास की इस समूहिक चाहत का निर्माण कैसे हुआ, इस समूहिक चाहत का लाभ किसे मिलेगा और राय में इस एकता के क्या निहितार्थ हैं। हमें यह भी सोचना चाहिए की अगर एक बहुमत विकास के इस माडल से सहमत है तो क्या विकास का यही माडल हमारे समाजों के लिए सबसे उपयुक्त है? समय समय पर आने वाले सर्वेक्षणों के आंकड़े और रिपोर्ट हमें यह लगातार बताते रहे हैं कि विकास के इस माडल में आबादी का एक बड़ा हिस्सा उपेक्षित रह जाता है। इस समय किसान आत्महत्याओं को लेकर चल रहे पूरे विमर्श का लब्बो-लुबाब यही है। फिर क्या यह एक पैदा की गई चाहत है, जिसके भ्रम के टूटने का इंतज़ार हमें करना चाहिए?
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम क्या आने वाले हैं इससे कहीं न कहीं हम सभी वाकिफ थे, और इसी तरह के परिणाम के अंदाज़ भी लगा रहे थे। मीडिया और ममता ने मिलकर एक स्वर में कहा था कि बहुमत दीदी के साथ ही हाथ मिलाएगा। इस बहुमत के निर्माण में जिसकी भी जो भी भूमिका रही हो बहुमत आ चुका है। हारने और जीतने वाले पक्षों ने इसे विनम्रता से स्वीकार किया है। यही लोकतन्त्र का तक़ाज़ा भी है। पर ममता के जीत के साथ कई और घोषणायें भी हो रही है। एक बात जिसे भयानक तरीके से प्रचारित किया जा रहा कि यह वामपंथ की हार है, वास्तव में यह पश्चिम बंगाल के वामपंथियों की हार है इसमें कोई शक नहीं की वहाँ की सरकार ने बहुत सारे ऐसे काम किए थे जिनका खामियाजा संसदीय लोकतन्त्र में किसी भी पार्टी को भुगतना पड़ता और वह वाम दलों को भी पड़ा। जिस बात पर वामपंथियों और राजनीति से सहानुभूति रखने वाले लोगों को चिंता होनी चाहिए वह है युवा वोटरों का नीतिगत राजनीति के प्रति झुकाव नहीं होना।
दरअसल, उदारवादियों ने पिछले 20 सालों में देश भर के स्कूलों और विश्वविध्यालयों में जिस तरह से ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया को अपने कब्जे में लिया है यह उसकी जीत है। विश्वविध्यालय और स्कूल वह पहली जगह है जहां व्यक्ति समाज और उसकी तरक्की का ब्लू प्रिंट समझता है। क्या हम बहुत आश्वस्त होकर कह सकते हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में वे सारे तत्व मौजूद हैं जो व्यक्ति को स्वतंत्र राय बनाने में मदद करते हैं? या फिर इस पूरी व्यवस्था का भरपूर इस्तेमाल समाजों के गैर राजनीतिकरण में हुआ है। जिसके द्वारा खास तरह की वर्चस्व वाली ताकतों को बढ़ावा मिला है। ये वे ताक़तें हैं जिनको विचारों की विविधता से खतरा है, और समाजों के गैर राजनीतिकरण से फायदा। अगर बुद्धिजीवी इससे नहीं चेते, और विश्वविध्यालयों और स्कूलों को इस गैर राजनीतिकरण से मुक्त नहीं कराया गया तो जल्द ही हम हमारा लोकतन्त्र विपक्ष विहीन हो जाएगा। हमें मानना होगा की केरला और बाँकी देश के ज्ञान के निर्माण की जो व्यवस्था जिससे एक पीढ़ी बन कर तैयार हुई है उसमें फर्क है और यही फर्क आज बंगाल में उभर कर सामने आया है .....
ममता ने माना है कि जो नये वोटर हैं उन्हें रिझाने में वामपंथ नाकामयाब रहा हमें इस नकामयाबी के कारणों को क्षणों में नहीं बल्कि वर्षों में ढूँढना चाहिए। नये वोटर एक खास तरह की शिक्षण पद्धति से ढल कर निकले हैं जिस पद्धति में साम्यवाद या कोई भी विचारधारा इतिहास की सिर्फ एक घटना है। इस पूरे समय में जो नया 'मैनेजर' और 'प्रोफेशनल' पैदा हुआ है उसका परिचय सिर्फ लाभ कमाने के उद्योग से है किसी विचारधारा से नहीं। और अगर वह इस व्यवस्था के द्वारा निर्मित, अधिक से अधिक पैसा कमाने की इच्छा रखने वाले 'व्यक्ति' से अलग कुछ है तो वह या तो 'हिन्दू' है या 'मुसलमान' या इसी तरह की कोई धार्मिक अस्मिता। इसलिए अगर हम ममता की जीत पर शंखनाद सुनते हैं तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। राजनीतिक चेतना में आयी यह गिरावट खतरे की निशानी है इसे हमने बिहार में भी देखा है और अब बंगाल भी इसका उदाहरण है।
'माँ', 'माटी' और 'मानुष' के जिस नारे को ममता ने बुलंद किया है वह निश्चित रूप से वामपंथ की प्रेरणा ही है। जिसकी ज़रूरत उन्हें ठेठ बंगाली वोटरों को रिझाने के लिए पड़ी लेकिन ममता ने जीत के बाद कहा कि वो बंद और बुलेट की राजनीति नहीं करेगी, बुलेट की राजनीति को इस देश की जनता ने कई बार नकारा है पर बंद की राजनीति का विरोध ममता जैसी नेत्री को शोभा देता है क्या? क्या ममता यह नहीं समझती हैं कि बंद और बंद की राजनीति के भी लोकतंत्र में अपने मायने होते हैं जिसे नकारा नहीं जाना चाहिए, यदि नहीं तो क्या मीडिया को इस बात की आलोचना नहीं करनी चाहिए थी कि जिस बंद और हड़ताल की रणनीति से ममता ने बंगाल को फतह किया है अचानक ममता उससे मुंह कैसे मोड सकती है? सिर्फ बंगाल ही नहीं अगर देश के अन्य राज्यों में हुए चुनावों में जीत कर आए मुख्यमंत्रियों को देखें तो हमें पता चलेगा की उनकी कोई विचारधारात्मक छवि राजनीतिक तौर से नहीं है बल्कि वह अपने-अपने क्षेत्रों में पार्टी के मैनेजर के रूप में ही कार्य करते रहे हैं। क्या राजनीति में विचारकों की कमी खतरे की ओर सूचित नहीं करता है।
हमें यह समझना होगा की वर्तमान समय में विकास और शोषण के बीच बहुत महीन रेखा रह गई है। इस महीन रेखा को पहचान कर, जमीनी विकास के पक्ष में और शोषण के प्रतिपक्ष में खड़े रहने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी हमारे समय के बुद्धिजीवियों और मीडिया की है। हमें यह भी समझना होगा की संविधान के लक्ष्यों में राष्ट्र के नागरिकों के लिए न केवल रोजगार उपलब्ध करना शामिल है बल्कि रोज़गार की स्वतन्त्रता उसके मूल में है। यह महत्वपूर्ण नहीं है की सरकार कितनी कम कीमत में किसानों गरीबों को अनाज उपलब्ध करा रही है महत्वपूर्ण यह है कि कितने गरीब और किसान प्रचलित दरों पर अपनी आजीविका चलाने में सक्षम हो रहे हैं। हमें मायकोव्स्की के इन पंक्तियों में लोकतन्त्र के संदर्भों को देखना होगा कि “कलम और बेनट खड़े हों एक ही कतार में/ और बराबर का दर्ज़ा दिया जाय दोनों को”।