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28 जनवरी 2013

बौद्धिक अतिवाद या ब्राह्मणवाद का जनतंत्र विरोधी चेहरा

सफ़दर इमाम कादरी
 
शीर्ष समाजशास्त्री प्रोफेसर आशीष नंदी का जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच से दिया गया बयान सम्पूर्ण देश में बहस का मुद्दा बन गया है। उन्होंने देश में भ्रष्टाचार की जड़ तलाश करते हुए यह निष्कर्ष निकल कि पिछडे और दलित समुदाय आदि के लोग ज्यादा भ्रष्ट हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां साफ सुथरी राजव्यवस्था इस कारन विद्यमान है क्योंकि पिछले 100 वर्षों में वहां पिछड़े तथा दलित वर्ग के लोग सत्ता से दूर रखे जा सके।

प्रोफेसर आशीष नंदी इतने प्रबुद्ध विचारक हैं कि यह नहीं कहा जा सकता कि उनका बयान जुबान की फिसलन है या किसी तरंग में आ कर उन्होंने ये शब्द कहे। अपनी तथाकथित माफ़ी में उन्होंने जो सफाई दी तथा उनके सहयोगियों ने प्रेस सम्मलेन में जिस प्रकार मजबूती के साथ उनका साथ दिया, इस से देश के बौद्धिक समाज का ब्राह्मणवादी चेहरा और अधिक उजागर हो रहा है। सजे धजे ड्राइंग रूम में अंग्रेजी भाषा में पढ़कर तथा अंग्रेजी भाषा में लिख कर एक वैश्विक समाज के निर्माण का दिखावा असल में संभ्रांत बुद्धिवाद को चालाकी से स्थापित करते हुए समाज के कमज़ोर वर्ग के संघर्षों पैर कुठाराघात करना है।

अभी कल की बात है कि गृह मंत्री ने भारत में आतंकवाद को एक धार्मिक समूह या राजनीतिक -सांस्कृतिक समूह से जोड़ कर दिखने की कोशिश की थी। बटला हाउस कांड के कारकों को पहचानने में भी एक धार्मिक समूह का नाम उछला था। अमेरिका के जुड़वां स्तंभों पैर आतंकी हमलों को भी विश्व स्तर पर मुस्लिम समुदाय से जोरने में देर नहीं लगी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांघी की हत्या के बाद सिख समाज को भी लक्ष्य किया गया। इसी कड़ी में आशीष नंदी के बयान को समझने की ज़रुरत है।

जाति व्यवस्था की मनुवादी जकड़न से भारतीय राजनीति अभी निकल भी नहीं सकी है लेकिन नए -नए तरीकों से बौद्धिक और राजनीतिक खिलाड़ियों के दिल का चोर रह-रह कर बहार आ ही जाता है। लम्बे राजनितिक-सामाजिक संघर्षों के बाद हज़ार कुर्बानियों के साथ हमें जो आज़ादी मिली उसके फलस्वरूप कमज़ोर तबकों की हकमारी के बदले न्याय और थोरे अवसरों में आरक्षण प्राप्त हुआ। सृष्टि की रचना के साथ जो बे-इंसाफी और शोषण का दौर शुरू हुआ था, आज़ादी के थोड़े वर्षों में उसका एक प्रतिशत भी निवारण सम्भव नहीं हो सका। इसके बावजूद संवैधानिक अधिकार और आरक्षण ब्राह्मणवादी शक्तियों की आँखों में शहतीर बना हुआ है।

डॉ राम मनोहर लोहिया ने राजनितिक स्तर पर भारत के पिछड़े और दलित समाज को एकजुट करने में सफलता पाते हुए कांग्रेस तथा अन्य राजनितिक दलों के संभ्रांत तथा ब्राह्मणवादी चरित्र को बेनकाब किया था। उत्तर भारत के कुछ राज्यों में मुख्यमंत्री तथा कुछ शक्तिशाली राजनेता यदि दलित तथा पिछड़े वर्ग से आने क्या लगे, एक बौद्धिक तबका ये समझने लगा कि उस समाज का उत्थान हो गया। क्या बाबा साहेब आम्बेडकर की बौद्धिक शक्ति से यह निष्कर्ष निकल जा सकता है कि सभी दलितों को इच्छित श्रेष्ठ बौद्धिक शक्ति हासिल हो गई है? क्या भारत का बौद्धिक समाज इस तर्क को स्वीकार कर सकता है? शायद, हरगिज़ नहीं।

क्या प्रोफेसर आशीष नंदी जैसे महान बौद्धिक व्यक्ति को नहीं मालूम कि ज्ञान, बुद्धि, कार्य-क्षमता, अच्छाई-बुराई, कर्मठता या निकम्मेपन आदि गुण तथा अवगुण व्यक्तिगत होते हैं? इनसे समाज, वर्ग अथवा नस्ल का क्या रिश्ता? मशहूर सूक्ति है- औलिया के घर में शैतान। अगर ये कोई समझता है कि भ्रष्टाचार या आतंकवादी बुद्धि किसी एक वर्ग, जाति या धर्म और समुदाय से पहचाना जा सकता है तो वह जनतंत्र की अवधारणाओं में स्पष्ट आस्था नहीं रखता।

हमारे देश में जनतंत्र ज़रूर कायम है लेकिन संविधान के प्रावधानों की आत्मा को देश का प्रभु वर्ग दिल से नहीं मानता। इसलिए शोषणविहीन -समतामूलक समाज की स्थापना अभी भी असम्भव लगता है। थोड़े विधायक, कुछ सांसद, चंद मंत्री या एक-दो मुख्यमंत्री, कुछ ऊँचे मकान या दो-चार-दस चमचमाती गाड़ियाँ यदि दलित या पिछड़े समुदाय के पास आ गईं तो क्यों प्रभु वर्ग के पेट में मरोड़ होने लगता है? संभ्रांत तबका इसे उस समाज के उत्थान से जोड़कर देखे और संवैधानिक अधिकारों का फलाफल माने तो किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि इसे प्रभु वर्ग अपना प्रतिद्वंदी समझता है। दिक्क़त यह है कि ब्राह्मणवादी शक्तियों को हजारों साल से दूसरों को बढ़ता हुआ या बराबरी पर महसूस करने या देखने की आदत ही नहीं रही।

प्रोफेसर आशीष नंदी का वक्तव्य हमारे समाज में मौजूद ब्राह्मणवाद का स्वाभाविक उद्गार है। इतने बौद्धिक व्यक्ति को कैसे माना जाये कि वो डी-क्लास नहीं है। गौर करने की बात यह है कि ऐसी साजिशी और मारक टिप्पणियां उन समुदायों के विरुद्ध की जाती हैं जो अक्सर अपने अस्तित्व का संघर्ष कर रही होती हैं। भारत में दलित और पिछड़ा वर्ग ही नहीं, अल्पसंख्यक और महिला समाज के बारे में अनेक षड्यंत्रकारी मत व्यक्त किए जाते हैं। इनके निहितार्थ को समझना ज़रूरी है। एक समूह को सार्वजनिक तौर पर लांछित कर दिया जाए तह बाकी समाज में उसके बारे में गलतफहमियां फैला कर समर्थक भूमिका से तटस्थ कर देना ही प्रभु वर्ग की जीत है। कमज़ोर तबका आगे बढ़ने के बजाय लोगों को सफाई देने में अपना समय और शक्ति बर्बाद करता है।
पिछले दो दशकों में जबसे दलित तथा पिछड़े समुदाय के मुट्ठी भर लोग राजसत्ता में अपना हक लेने में कामयाब हुए हैं। इसीलिए अनेक स्तरों पर तरह-तरह की साजिशें चल रहीं हैं। कृत्रिम मुद्दों पर बहुत जोर है लेकिन वृहत सामाजिक मुद्दों को सार्वजनिक एजेंडा से हटाया जा रहा है। तू डाल -डाल, मैं पात -पात का खेल चल रहा है। कमज़ोर तबकों की हकमारी की कुछ बानगियाँ देखिये जिनपर संभ्रांत लोग बारे खामोश बैठे हैं :

1. मंडल कमीशन की सिफारिशों को अप्रभावी बनाने के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान। आजतक उसमें अत्यंत पिछड़े वर्ग के लिए कोई कोटा नहीं बना।

2. निजी क्षेत्रों में आरक्षण के लिए आजतक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। अर्थात वहां संभ्रांत तबके को शत प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है।

3. न्यायपालिका में निम्न स्तर पर तो कुछ प्रदेशों में आरक्षण मिलता है लेकिन उच्चतर न्यायपालिका ने आज तक आरक्षण की व्यस्था से खुद को निरपेक्ष रखा है।

4. अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का अस्तित्व इसलिए नहीं है कि न्यायपालिका का जनतांत्रिक रूप आकर लेने लगेगा तथा 500 परिवारों की मुट्ठी में क़ैद देश की न्यायिक व्यवस्था का चरित्र बदलने लगेगा।

5. महिला आरक्षण में जातीय आरक्षण क्यों नहीं होना चाहिए? सामान्य आरक्षण में जब जाति आधार है तो महिलाओं के लिए किसी दूसरे आधार को सिर्फ इसलिए बनाना चाहिए की महिलाओं के रस्ते संभ्रांत तबका थोड़ी सेंधमारी कर सके।

6. बिहार के प्रमुख पत्रकार-समाजकर्मी श्री प्रभात कुमार शांडिल्य ने एक समय में बिहार के सजायाफ्ता लोगों की सूची प्रकाशित की थी जहाँ सभी दलित और वंचित समुदाय के लोग थे। उन्होंने व्यंग्य के साथ शीर्षक बनाया था- फांसी में सौ प्रतिशत आरक्षण। यह सच्चाई भी संभ्रांत तबके को जग नहीं पाई.

7. सच्चर समिति ने अल्पसंख्यक समाज तथा पिछड़े अल्पसंख्यक वर्ग की स्थिति को अति दयनीय सिद्ध किया था। सरकार की ओर से कुछ पैसों के बाँट देने के अलावा क्या हुआ?

8. देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनितिक पार्टी भाजपा से एक भी पिछड़ा-अल्पसंख्यक संसद नहीं है।

9. बिहार सरकार में एक भी पिछड़ा अल्पसंख्यक मंत्री नहीं।

लेकिन इस हकमारी के खिलाफ सार्वजनिक मंच पर कभी भी प्रभु वर्ग में कोई चिंता नहीं दिखाई देती। कमजोरों के साथ जितनी बे-इंसाफी हो, इस पर प्रभु वर्ग को आंसू नहीं बहाना है। तब समता मूलक समाज कैसे कायम होगा? आशीष नंदी कोई अपनी बात नहीं कह रहे हैं बल्कि वह ब्राह्मणवाद के षड्यंत्रकारी आक्रोश का एक बौद्धिक प्रतिरूपण हैं। उन्हें गंभीरता से इसलिए भी लेना चाहिए क्योंकि वह समाजशास्त्र के शिक्षक, शोधार्थी तथा एक बौद्धिक के रूप में नहीं बल्कि ब्राह्मणवाद की एक असहिष्णु तथा अनुदार पीढ़ी के प्रवक्ता के तौर पर सामने आये हैं। उनके विचारों का समाजशास्त्रीय आधार होता तो ज्यादा चिंता की बात नहीं थी। लेकिन दुखद यह है कि ज्ञान-बुद्धि तथा उम्र के चरम पर पहुँच कर वे वंशभेदी और जनतंत्र विरोधी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं जो भारत के भविष्य के लिए खतरनाक है। समाज को ऐसे चिंतकों से होशियार रहना चाहिए।

23 सितंबर 2012

कोलगेट : भूतपूर्व एयर मार्शल और भूतपूर्व मंत्रीजी की जुगलबंदी

-दिलीप खान

गांधी शांति प्रतिष्ठान में भारत-नेपाल संबंधों को लेकर महीने की शुरुआत में एक कार्यक्रम था। उमस भरी गर्मी में मंच से जो व्यक्ति नेपाली में लगातार बोले जा रहा था, पता चला कि वो नेपाल के भूतपूर्व विदेशमंत्री हैं। हॉल में कोई ताम-झाम, कोई डेकोरम नहीं था। भारत में एक बार जो मंत्री बन गया, वो मरते-मरते अपने भीतर मंत्री वाली शक्ति को टटोलते रहता है। हर पहर सुरक्षा वगैरह चाक-चौबंद। रसूख बरकरार रहता है। संन्यास लेने के बाद भी लोग मंत्रीजी ही बुलाते हैं। इस लिहाज से देखें तो राज्य सभा सांसद प्रेमचंद गुप्ता ने तो सिर्फ़ पद ही खोया है, राजनीति में तो वो बरकरार है। एक समय वो कॉरपोरेट मामलों के कैबिनेट मंत्री थे। वर्षों से लालू प्रसाद (यादव) के काफ़ी करीब रहे हैं। प्रेमचंद गुप्ता के दो बेटे -मयूर गुप्ता और गौरव गु्प्ता- व्यवसायी हैं। इन दोनों में हालांकि गौरव गुप्ता को ज़्यादा तेज माना जाता है, लेकिन यहां उनकी प्रतिभा का हम तुलनात्मक अध्ययन करने नहीं जा रहे। कोलगेट से इनका क्या ताल्लुक है, इसपर बात करेंगे लेकिन उससे पहले एक और सज्जन से आपका परिचय करा देते हैं।  

नाम है डेंजल कीलोर। भूतपूर्व एयर मार्शल डेंजल कीलोर। युद्ध में डटकर लड़ने वाला - जैसा कि अमूमन हर फौजी होता है! (अन्ना हज़ारे बुरा न मानें)। थर्मामीटर से शूरता, वीरता और पराक्रम वगैरह को मापने पर बढ़िया नतीजे पर पहुंचा जा सकता है क्योंकि पाकिस्तान के साथ युद्ध में उन्होंने खूब वाहवाही लूटी थी। 1965 के युद्ध में। पदोन्नति भी मिली थी। आज भी अतीत में गोता लगाए रखते हैं। हमने दुश्मनों को ऐसे धूल चटाई तो वैसे धूल चटाई! बताया जाता है कि अपनी बातचीत में बरबस ही युद्ध की तान छेड़ने में उनको महारत हासिल है। हालांकि ये फौजदोष बेहद सामान्य है, फिर भी इसके जरिए अपने व्यक्तित्व में भूतपूर्व के एहसास को वे ताजेपन से ढंकना चाहते हैं। मंत्रीजी की तरह ही। 
कॉरपोरेट मामलों के पूर्व मंत्री प्रेमचंद गुप्ता

17 जून 2009 को कोयला मंत्रालय ने महाराष्ट्र का दहेगांव माकरधोकरा-IV कोयला खदान संयुक्त रूप से तीन कंपनियों को आवंटित करने की घोषणा की। गुजरात अंबुजा सीमेंट, लाफ़ार्ज इंडिया और आईएसटी स्टील एंड पावर लिमिटेड। इस खदान की कुल क्षमता 4.88 करोड़ टन है। इसका 53 फ़ीसदी हिस्सा आईएसटी स्टील एंड पावर लिमिटेड की झोली में आया। मयूर गुप्ता और गौरव गुप्ता इसके मालिक हैं। गौरव गुप्ता ही इसके निदेशक हैं और डेंजल कीलोर साहब अध्यक्ष।
 
जोहरा चटर्जी की अध्यक्षता वाला अंतर-मंत्रालयी समूह ने पहले चरण के अंत में जिन दो खदानों (इनको मिलाकर अब तक कुल 13 खदानों का अवंटन रद्द हुआ है) का आवंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की उनमें एक ब्लॉक दहेगांव माकरधोकरा-IV भी है। दूसरा खदान छत्तीसगढ़ का भास्करपारा है जिसे 21 नवंबर 2008 को संयुक्त रूप से ग्रासिम इंडस्ट्रीज (मिस्टर इंडिया जैसे सौंदर्य प्रतियोगिता के प्रायोजक बिड़ला समूह की कंपनी) और मुकेश भंडारी की कंपनी इलेक्ट्रोथर्म (इंडिया) लिमिटेड को दिया गया था। इसकी क्षमता 1.86 करोड़ टन है। इसमें इलेक्ट्रोथर्म की हिस्सेदारी 52 फीसदी और ग्रासिम इंडस्ट्रीज की 48 फ़ीसदी है। भास्करपारा के इस खदान में तो आदित्य मंगलम बिड़ला का पैसा लगा ही है लेकिन गुप्ता और डेंजल कीलोर को जो खदान आवंटित हुआ उसमें भी बिड़ला की सेंधमारी है क्योंकि लाफार्ज सीमेंट (फ्रांसीसी जोड़ीदार के साथ) बिड़ला का ही उत्पाद है। कोयला खदान आवंटन के समय बिड़ला ने जान-बूझकर अलग-अलग कंपनियों से दांव खेला, ताकि ज़्यादा खदान हासिल कर सके। हिंडालको तो खैर है ही। आप कहिए कि दहेगांव माकरधोकरा-IV खदान में नेता, फौजी और कॉरपोरेट तीनों की जुगलबंदी थी।
 
आरोप ये है कि खदान हासिल करने के लिए कंपनियों ने मंत्रालय को ग़लत जानकारी देकर गुमराह किया। कहा ये भी जा रहा है कि इसके लिए मंत्री जी का व्यक्तित्व भी बड़ा सहारा बना। हालांकि प्रेमचंद गुप्ता इससे लगातार इनकार कर रहे हैं। लेकिन कोयला खदान मामले में राजनीतिक टिप्पणियों पर नज़र दौड़ाएं तो आप देखेंगे कि कांग्रेस पर उठने वाली उंगली के बचाव में जितना कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के गले से आवाज़ नहीं निकली होगी उससे ज़्यादा ज़ोर से लालू प्रसाद (यादव) ने चीख़ निकाली है। यूपीए सरकार को देने वाले सिर्फ़ राजनीतिक समर्थन का मामला भर नहीं है ये! जब प्रेमचंद गुप्ता का नाम सार्वजनिक हुआ तो लालूजी थोड़ा मलिन पड़े। राजनीतिक दबाव के चलते प्रेमचंद बाबू के बेटे का खदान हो या फिर पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय के मानक निदेशक पद पर रहने वाले भाई सुधीर कुमार सहाय का खदान, सबको रद्द करना राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भी ज़रूरी था, लिहाजा सरकार और ख़ास तौर पर कांग्रेस यह कोशिश कर रही है कि विपक्ष को वो ऐसा मौका न दें कि सीधे-सीधे राजनीतिक परिवारवाद वाले मामले पर सरकार को वो लंबी दूरी तक घसीट ले जाए। सीबीआई ने भी जायसवाल समूह (अभिजीत समूह की सिस्टर कंपनी) के घसीटे में अरविंद और मनोज जायसवाल सहित कांग्रेस सांसद विजय दर्डा (लोकमत मीडिया समूह के मालिक) के बेटे देवेंद्र दर्डा पर पकड़ बनाई है। यह जांच से ज़्यादा राजनीतिक मजबूरी भी है। वरना सीबीआई की कार्यशैली तो सब जानते ही हैं।
 
लेकिन नेताओं और कॉरपोरेट के भ्रष्ट होने पर लगभग समहत हो चुके मध्यवर्ग को एयर मार्शल वाला तथ्य थोड़ा परेशान कर सकता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देशभक्ति और ईमानदारी के शब्दकोश में फौजी शब्द बेहद महत्वपू्र्ण है। यह ट्रेंड दुनिया भर में लगभग एक जैसा है। अभी हाल ही में अपने चुनाव प्रचार में बराक ओबामा ने देशभक्ति साबित करने के लिए यह जोर देकर कहा कि उनके दादा अमेरिकी सेना में रह चुके हैं। फौज की पात्रता पूरी नहीं करने वाले लोग एनसीसी वगैरह से ही काम चला लेते हैं। अन्ना हज़ारे ने अपने साल भर वैलिडिटी वाले आंदोलन में कई-कई बार अपनी फौजी पृष्ठभूमि और अविवाहित बने रहने कीख़ासियत पर ज़ोर दिया। लेकिन भारत में यह सर्वे का एक मजेदार विषय है कि सेना से रिटायर होने वाले अधिकारी बाद के दिनों में करते क्या हैं? निजी सुरक्षा एजेंसी खोलने से लेकर ट्रांसपोर्ट के धंधे में उतरने और खनन के काम में बड़ी संख्या में इन भूतपूर्व फौजियोंका दख़ल है। रियायती दरों पर कई पट्टे इन्हें हासिल होते हैं। कई धंधों में इन्हें ख़ास सहूलियत दी जाती है, लिहाजा पैसे वाली पार्टी के साथ सांठ-गांठकर कर ये गेम करते हैं। फ़ायदा दोनों का होता है। सामान्य ज्ञान के इस प्रश्न का उत्तर सब जानते हैं कि सफ़ेद सोना कपास को और काला सोना कोयला को कहते हैं।
मोर्चे पर जाते हुए डेंजल कीलोर की जवानी की तस्वीर
 
फ़ौजियों की गड़बड़ी, धोखाधड़ी को अमूमन ढंक दिया जाता है। मोराल डाउन होने जैसी भविष्यवाणियों के तले। संयोग देखिए कि इस कोलगेट में डेंजल कीलोर साहब का नाम सामने आया (टीवी चैनलों, अख़बारों में मत ढूंढिए, नहीं मिलेगा) और सबने देखा कि संसद संत्र में गतिरोध पैदा करने के साथ-साथ मनमोहन सिंह के इस्तीफ़े पर बीजेपी किस तरह अड़ी। इससे पहले 2जी को लेकर बीजेपी ने लगातार चिदंबरम का बहिष्कार किया, लेकिन दशक भर पहले फ़ौजियों के ताबूत घोटाला (कोफिनगेट) मामले में जब तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस का नाम आया था तो कांग्रेस ने संसद नहीं चलने दी थी और दो साल तक फ़र्नांडीस का बहिष्कार किया था। बहिष्कार-बहिष्कार बराबर। संसद ठप्प-संसद ठप्प बराबर। कोयला खदान तब भी बंट रहे थे, अब भी बंट रहे हैं।  
 
लोहा, स्टील, सीमेंट और सबसे ज़्यादा बिजली बनाने के नाम पर जो कोयला खदान हासिल किए गए उनमें से ज़्यादातर खदानों का कंपनियों ने इस्तेमाल नहीं किया। चूंकि जिन उद्देश्यों के लिए खदान लिए जा रहे थे, उनमें कई दिक्कतें थीं। मसलन, पावर प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए कंपनी को मध्यप्रदेश में ज़मीन मिली ही नहीं है लेकिन महाराष्ट्र का कोयला खदान कंपनी ने अपने नाम करवा लिया। बाद में पता चला कि मध्यप्रदेश में कंपनी को पर्यावरण लायसेंस नहीं मिला। अब खदान पड़ा हुआ है। फ़ौजी, कॉरपोरेट और नेताजी को सस्ता खदान मिल गया। कभी-न-कभी खोद ही डालेंगे। दशक भर पहले लक्ष्य बनाया गया था कि सन 2012 तक हर गांव में बिजली पहुंच जाएगी, लेकिन कुछ हफ़्ते पहले देश का तीन बिजली ग्रिड फेल होने के बाद पूरा उत्तरी और पूर्वी हिस्सा अंधेरे में डूब गया था। न बिजली, न सीमेंट का उत्पादन, सिर्फ़ कोयला खदान का हुआ आवंटन!   

20 सितंबर 2012

बटला हाउस: गुजरे चार साल और खड़े कई सवाल.

महताब आलम
बटला हाउस ‘इनकाउंटर’ के चार साल पूरे हो गये। 19 सितंबर 2008 की सुबह, दिल्ली के जामिया नगर इलाके में बटला हाउस स्थित एल 18 फ्लैट में एक कथित पुलिस ‘इनकाउंटर’ के दौरान दो मुस्लिम नौजवान, जिनका नाम आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद, मारे गये थे। पुलिस के मुताबिक इन दोनों का संबंध आतंकी संगठन “इंडियन मुजाहिदीन” से था और इन्‍हीं लोगों ने 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सीरियल धमाकों की घटना भी अंजाम दी थी। इस विवादित इनकाउंटर में पुलिस द्वारा कथित दो आतंकी के अलावा दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का एक इंस्पेक्टर, जो ‘इनकाउंटर स्‍पेशलिस्‍ट’ के नाम से मशहूर था, मोहन चंद शर्मा और एक हवालदार भी घायल हुए थे। बाद में शर्मा की नजदीकी अस्पताल होली फेमिली में मौत हो गयी थी, जबकि हवालदार बच गया। पुलिस के दावे के अनुसार इस मौके पर दो आतंकी घटनास्थल से भागने में कामयाब हो गये जबकि उनके एक साथी मुहम्मद सैफ को वहीं से गिरफ्तार किया गया।
मारे जाने वाले दोनों नौजवानों का संबंध उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से था और ये लोग यहां पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में आये थे। आतिफ अमीन की उम्र लगभग 24 साल थी और वो जामिया में एम ए (मानवाधिकार) प्रथम वर्ष का छात्र था, वहीं साजिद जिसकी उम्र 14 साल थी, दसवीं की पढ़ाई करके यहां ग्यारहवी में दाखिले के लिए आया था। उनके कुछ साथी जामिया नगर में भी रहते थे। फलस्वरूप, इस घटना के बाद जामिया नगर और आजमगढ़ से पुलिस द्वारा उनके साथियों, जानने वालों और दूसरे मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी का सिलसिला चल पड़ा। बहुत सारे लोग उठाये गये, जामिया नगर और आजमगढ़ को ‘आतंक की नर्सरी’ कह कर बुलाया जाने लगा।
लेकिन स्थानीय लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं/संगठनों और कुछ पत्रकारों द्वारा इस ‘इनकाउंटर’ की सच्‍चाई पर पहले दिन से ही सवाल कायम है, जिसका जवाब आज तक नहीं मिल पाया है। इन व्यक्तियों ने पुलिस द्वारा जारी किये हुए विरोधाभासी बयानों को नकारते हुए पूरे मामले की न्यायिक जांच करने की मांग की, जिसे आज तक सरकार ने नहीं माना है। इसीलिए, आज भी, चार साल गुजर जाने के बावजूद इस मांग को लेकर जामिया नगर, लखनऊ और आजमगढ़ में कार्यक्रम हुए और हो रहे हैं। लोगों मानना है कि जब तक इस मांग को स्वीकार नहीं किया जाता हमारी लड़ाई जारी है।
क्या हैं वो सवाल?
पहला सवाल ये था कि क्या पुलिस को पहले से पता था कि उस जगह पर ‘खूंखार-आतंकी’ छिपे हैं? अगर हां, तो पुलिस ने अपने शुरुआती बयानों में क्यूं कहा कि वो तो सिर्फ रेकी करने गये थे। लेकिन क्यूंकि ‘आतंकियों’ ने गोली चला दी, इसलिए जवाबी कार्यवाही करनी पड़ी। और अगर नहीं, तो घटना के दो-तीन घंटे के अंदर ही कैसे पुलिस ने ये घोषित कर दिया कि मारे जाने वाले आतंकी थे? और यही नहीं, अहम सवाल ये है कि अगर पुलिस को पता था, जैसा कि पुलिस ने आतीफ अमीन के मोबाइल को 26 जुलाई 08 से सर्विलांस पर रखे होने का दावा किया था, तो इन लोगों 13 सितंबर का सीरियल ब्लास्ट कैसे किया? पुलिस ने उन्हें पहले गिरफ्तार क्यूं नहीं किया, क्या पुलिस उनके बम धमाकों के इंतजार में थी?
दूसरा अहम सवाल : क्या इस मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी ने बुलेट-प्रूफ जैकेट पहन रखा था? और अगर पहन रखा था तो मोहन चंद शर्मा और बलवंत कैसे घायल हुए? और अगर नहीं, जैसा कि पुलिस के दावा किया था, तो इतने अहम मामले में इतनी असावधानी क्यूं बरती गयी और क्या उन्हें मालूम नहीं था कि वो ‘खूंखार-आतंकी’ उन पर गोली चला सकते हैं और ऐसे में रिस्क लेना उचित नहीं होगा? पुलिस का एक बयान ये भी कहता है कि पुलिस पार्टी बुलेट प्रूफ जाकेट इसलिए पहन कर नहीं गयी क्यूंकि बात फैल जाती और आतंकी भांप लेते और फरार हो जाते। लेकिन उसी समय इस घटना की एफआईआर में कहा गया है कि पुलिस ने रेड करने से पहले दो स्थानीय लोगों को अपने साथ लेना चाहा, पर वो नहीं आये, क्या ऐसा करने बात नहीं फैलती?
तीसरा अहम सवाल : साजिद और आतिफ के शरीर पर मिली चोट, जख्म और गोलियों के निशान क्या बताते हैं? दोनों को दफनाने से पहले, उनके शरीर की ली गयी तस्वीरों से पता चलता है कि वो किसी मुठभेड़ में नहीं मारे गये हैं। साजिद के सर में ऊपर से चार गोलियों के निशान हैं, ये कैसे संभव हुआ? क्या ये निशान ये नहीं दर्शाता कि उसे बिठाकर, उसके सर पर ऊपर से गोली मारी गयी है? या फिर पुलिस वालों ने छत से चिपक कर ऊपर से गोली मारी? इसी प्रकार सवाल ये भी है कि आतिफ की पीठ की चमड़ी पूरी तरह कैसे छिली? उसके पैर पर भी ताजे जख्म के निशान पाये गये, ये सब कैसे मुमकिन हुआ?
चौथा सवाल : एक अहम सवाल ये भी है कि दो ‘आतंकी’ कैसे भागे? जबकि पुलिस का खुद का दावा है कि उन्होंने कार्यवाही से पहले उस गली को पूरी तरह से जाम कर दिया था। यहां पर एक उल्लेखनीय बात ये भी है कि जिस बिल्डिंग में ये घटना हुई, उसमें अंदर जाने और बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है, और ये घटना चौथी मंजिल पर हुई थी, जहां से भागने का भी कोई रास्ता नहीं है। क्या वो वहां से जिन्न या भूत बनकर भाग गये?
पांचवा सवाल : पुलिस ने दावा किया कि साजिद, जिसकी उम्र 14 साल थी, बम बनाने में माहिर था। सवाल ये उठता है कि अगर ऐसा था तो वहां से ऐसी कोई चीज बरामद क्यूं नहीं हुई? आपको जानकर हैरानी होगी कि पुलिस ने जिन चीजों की बरामदगी दिखायी है, उसमें पंचतंत्र की कहानियों की किताब भी है! आखिर सवाल ये है कि पुलिस क्या साबित करना चाहती है? सवाल ये भी है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइंस के अनुसार प्रत्येक अप्राकृतिक मौत की तरह इस घटना की भी न्‍यायिक जांच क्यूं नहीं करवायी गयी? क्यों लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इस पर रोक लगा दी? कुल मिलाकर सवाल बहुत हैं और इन्‍हीं सवालों ने इस घटना के फर्जी होने पर, या कम से कम इसकी वास्तविकता पर सवालिया निशान खड़ा किया हुआ है। और पूरी घटना की न्यायिक जांच की मांग अभी तक जारी है। लेकिन सरकार है कि उसके कान पर जूं ही नहीं रेंगती।
सरकार का जांच न कराने के पीछे बुनियादी तर्क ये है कि वो इस मसले की जांच इसलिए नहीं करवा सकती क्यूंकि इससे पुलिस का ‘मोरल डाउन’ हो जाएगा! सरकार ये भी तर्क देती है क्यूंकि एनएचआरसी जांच कर चुकी है इसलिए मामला साफ हो चुका है। कभी-कभी सरकार ये भी तर्क देती है कि क्यूंकि इस घटना में एक पुलिस वाला भी मारा गया, इसलिए ये साबित होता है कि मामला वास्तविक था और इस पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता!
तो क्या सरकारी दावे सही हैं?
पहला दावा कि इसकी जांच कराने से पुलिस का ‘मोराल डाउन’ हो जाएगा। आखिर सरकार किस पुलिस से मोराल की बात कर रही है, जिसकी करतूतें जगजाहिर है। और इस केस के संदर्भ में बात करें, तो मामला और साफ है कि सरकार जिस स्पेशल सेल को बचाना चाह रही है, अब सब जानते हैं कि उनका असल काम मासूम लोगों को फंसाना, वाहवाही बटोरना और पैसे कमाना है। कल ही प्रकाशित हुई जामिया टीचर्स सॉलिडरिटी असोसिअशन (JTSA) की रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि ये लोग फर्जी केस बनाने और फर्जी मुठभेड़ करने में माहिर हैं। JTSA की ये रिपोर्ट कोई हवाबाजी या बयानों का पुलिंदा नहीं है बल्कि कोर्ट द्वारा दिये गये फैसलों पर आधारित एक शोध है, जो स्पेशल सेल की करतूतों को उजागर कर देता है। दूसरा दावा, कि एनएचआरसी ने इस मामले की जांच की है, बिलकुल झूठा है। एनएचआरसी ने इस मामले में कोई खोजबीन नहीं की है, बस रुटीन कार्यवाही की है। और वो कार्यवाही ये है कि आयोग ने उसी पुलिस डिपार्टमेंट को नोटिस भेज दिया, जिसने ये सब कुछ किया। सो जवाब जो मिलना था सो मिला।
यही नहीं, आयोग ने न ही घटनास्थल कर दौरा किया, न संबंधित व्यक्तियों से मुलाकात की, न उन लोगों से मिले जो लगातार सवाल उठा रहे थे, बावजूद इसके आयोग के अध्यक्ष से हमने समय भी मांगा था। और बिना ये सब किये, पुलिस के जवाब के आधार पर इस पूरे मामले को सही घोषित कर दिया! अगर आपको यकीन नहीं आता हो आज भी आप ये रिपोर्ट देख सकते हैं। क्या इसी को मामले की जांच कहते हैं? और बाद में RTI एक्टिविस्ट अफरोज आलम साहिल द्वारा सूचना के अधिकार के तहत इसी आयोग से निकाली गयी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने और कई सारे सवाल खड़े दिये।
रही बात इंस्‍पेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत की, तो हम भी ये जानना चाहते हैं कि उसकी मौत कैसे और किन हालत में हुई? आखिर उसे हॉस्पिटल पहुंचाने में उतनी देर क्यूं लगी ताकि वह पहुंचते ही मर जाए? जबकि साक्ष्य बताते हैं कि जब उसको ले जाया जा रहा था, तो वह पूरे होशो-हवास में था। साथ ही यहां पर इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि यही मोहन चंद शर्मा कम से कम 8 ऐसे केस में लिप्त है, जिसमें इसने मासूम लोगों को फंसा कर उनकी जिंदगियां बर्बाद कर दी हैं। और ये सारे केस किसी बाटला हाउस ‘इनकाउंटर’ से कम नहीं हैं। फलतः ऐसे व्यक्ति द्वारा अंजाम दी गयी कार्रवाई पर शक का गहराना और लाजिम है।
इसीलिए सरकार को चाहिए, कुछ पुलिस वालों की नौकरी बचने के चक्कर में न्यायिक जांच की मांग कर रहे हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों का मोराल डाउन न करें क्यूंकि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है और उसकी मांग को ठुकराना लोकतंत्र की हत्या है। और इस वक्‍त जनता की मांग बटला हाउस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच है।

19 सितंबर 2012

कोयला के बदले पावर प्लांट मिले तो क्या दिक्कत!


-दिलीप खान

खुदरा क्षेत्र में एफ़डीआई, डीज़ल में मूल्यवृद्धि और रियायती दर पर रसोई गैस सिलेंडर हासिल करने का कोटा तय करने के बीच कोयला का मामला दब गया सा लगता है। मुद्दे आधारित राजनीति में नया मुद्दा आते ही पुराना मुद्दा किसी झाड़ी तले ढंक जाता है। लेकिन कोयला ब्लॉक की समीक्षा कर रही अंतर-मंत्रालयी समूह में जिस तरह की पड़ताल हो रही है और जैसे नतीजे सामने आ रहे हैं वो कई दफ़ा चौंकाते भी हैं। जिन 58 कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी हुए थे, उनमें से महज 29 की जांच हो पाई है और इनमें से आईएमजी ने सिर्फ़ 8 कंपनियों के आवंटन रद्द करने की कोयला मंत्रालय से सिफ़ारिश की है। शुरुआत में 142 में से 58 को जांच पड़ताल के बाद सिर्फ़ इस आधार पर कारण बताओ नोटिस भेजा गया था कि इन सबकी प्रगति काफ़ी ढीली थी।

आईएमजी ने जिन 8 कंपनियों के आवंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की
ब्लॉक का नाम
राज्य
कंपनी का नाम
क्षमता
आवंटन वर्ष
चिन्होरा
महाराष्ट्र
फ़ील्ड माइनिंग एंड इस्पात
2 करोड़ टन
2003
बरोरा
महाराष्ट्र
फ़ील्ड माइनिंग एंड इस्पात
1.8 करोड़ टन
2003
लालगढ़ उत्तरी
झारखंड
डोमको स्मोकलेस फ्यूल्स
3 करोड़ टन
2005
ब्रह्मडीह
झारखंड
कैस्ट्रॉन माइनिंग
20 लाख टन
1996
रावणवाड़ा उत्तरी कोयला ब्लॉक
मध्य प्रदेश
एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड

2006
नई पात्रापाड़ा कोयला ब्लॉक
उड़ीसा
भूषण स्टील लिमिटेड एंड अदर्स
31.6 करोड़ टन
2006
गौरंगडीह एबीसी कोयला ब्लॉक
प. बंगाल
हिमाचल ईएमटीए पावर लिमिटेड और जेएसडब्लू स्टील लिमिटेड
6.15 करोड़ टन
2009
मचेरकुंडा ब्लॉक
झारखंड
बिहार स्पॉन्ज आयरन एंड स्टील

2008

आईएमजी की अगुवाई कर रही अतिरिक्त सचिव ज़ोहरा चटर्जी 21 तारीख़ को अमेरिका दौरे पर जा रही हैं और ऐसे में ये साफ़ लग रहा है मंगलवार को मचेरकुंडा ब्लॉक रद्द करने का फ़ैसला इस चरण का लगभग आख़िरी फ़ैसला है। निर्भीक और निष्पक्ष आईएमजी रिलायंस, टाटा, आर्सेलर-मित्तल और हिंडालको (बिड़ला समूह की कंपनी) से सवाल-जवाब करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि इनके खदानों को बरकरार रखा जाय। सारे बड़े घरानों के ब्लॉक बच गए। अंबानी, टाटा, मित्तल, बिड़ला। सबके। राजनीतिक गलियारे में जिन नेताओं के घर में कोयले का धुंआ उठ रहा था, उनपर पानी गिराया गया ताकि धुंए का गुबार शांत हो जाए। जाहिर है इसके लिए कुछ आवंटन रद्द भी करने पड़े। मिसाल के लिए पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय की चारों ओर थू-थू हो रही थी कि उन्होंने यह जानकारी छुपाते हुए प्रधानमंत्री (तत्कालीन कोयला मंत्री) मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड को खदान देने की सिफ़ारिश की थी कि उनका भाई सुधीर कुमार सहाय इस कंपनी का मानद निदेशक है। मंत्रालय ने अभूतपूर्व तेजी दिखाते हुए इस ब्लॉक को हरी झंडी दी थी। इसी तरह जायसवाल समूह के नाम पर घिरे मौजूदा कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी मंत्रालय से इतर कुछ कार्रवाई के चलते अपने दाग को मलिन होते देख रहे हैं। अभिजीत समूह की तीन कंपनियों जेएएस इंफ्रास्ट्रक्चर, जेएलडी यवतमाल और एएमआर आयरन एंड स्टील के मालिक भाइयों अरविंद जायसवाल और मनोज जायसवाल को सीबीआई ने पूछताछ की। इसी कंपनी के साथ कांग्रेस सांसद विजय दर्डा का नाम जुड़ा है। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि इन दोनों जायसवाल भाइयों ने विजय दर्डा को 26 फ़ीसदी हिस्सेदारी इस आधार पर देने की पेशकश की थी कि वो मंत्रालय से हरी झंडी दिलवाने में जायसवाल की मदद करें।

लेकिन खेल का मैदान काफ़ी चौड़ा है। इधर कोयला मंत्रालय इन कंपनियों के आवंटन रद्द कर रही है और उधर ऊर्जा मंत्री वीरप्पा मोइली इन कंपनियों को भविष्य में पावर प्लांट देने की बात कहकर ये यक़ीन दिला रहे हैं कि देश में कंपनियों द्वारा बरती गई अनियमितताओं को जुर्म के खांचे में रखने की मांग करने वाले लोग निरा बेवकूफ़ है। कंपनियों को किस तरह का घाटा होगा? मान लीजिए किसी सुबोधकांत सहाय के भाई को कोयला ब्लॉक के बदले पावर प्रोजेक्ट मिल जाए तो इसमें उन्हें क्या हर्ज हो सकता है? बड़ी बात यह कि राजनीतिक सफ़ेदी बरकरार रहते हुए ऐसा हो जाए तो क्यों नहीं कोयला खदान रद्द करावाए कोई? 10 ब्लॉकों के लिए अब तक 8 कंपनियों को बैंक गारंटी जमा करने या बैंक गारंटी रद्द करने की भी आईएमजी ने सिफ़ारिश की है।

कांग्रेस महकमे में आईएमजी की सिफ़ारिश को शो-रूम के बाहर सजे-धजे मॉडल्स की तरह पेश किया जा रहा है। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि आईएमजी के जरिए सरकार ही कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में पारदर्शिता बरतने की पहलकदमी कर रही है। उनके मुताबिक सरकार हमेशा धांधली के ख़िलाफ़ रही है और इसीलिए कंपनियों के आवंटन रद्द हो रहे हैं। लेकिन शर्मा ने यह नहीं बताया कि उनकी ईमानदार सरकार ने कैग की रिपोर्ट से पहले यह कदम क्यों नहीं उठाया? पहले दिन यानी 13 सितंबर को आईएमजी ने जिन चार कंपनियों को रद्द करने (टेबल में ऊपर की चार कंपनियां) की सिफ़ारिश की उनमें से सिर्फ़ एक कंपनी को यूपीए के शासनकाल में ब्लॉक आवंटित किया गया और बाकी तीन कंपनियां एनडीए के जमाने वाली थीं। यहां दो बातें साफ़ होती हैं। पहली, जो बीजेपी 17 अगस्त को संसद में कैग की रिपोर्ट पेश होने के बाद पूरे मानसून सत्र में सदन के भीतर नारेबाजी करके गला ख़राब करती रही, उसके जमाने में भी ऐसे ही कोयला खदान बांटे जाते रहे हैं। जाहिर है बीजेपी का मौजूदा विरोध किसी कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ न होकर यूपीए सरकार के साथ लगभग नत्थी हो चले घोटालों की श्रृंखला को लपककर राजनीतिक लाभ लूटने की है। दूसरी, आईएमजी ने पहले दिन ज़्यादातर एनडीए के जमाने में आवंटित हुए  कोयला खदानों को रद्द करने की सिफ़ारिश कर यूपीए सरकार को ये मौका दिया कि अब वो डीज़ल, रसोई गैस और एफ़डीआई पर खेल खेल सकती है क्योंकि कोयला पर एनडीए को आईना दिखाने वाली रिपोर्ट सामने है। यह महज संयोग नहीं है कि ठीक उसी दिन (13 सितंबर को) यूपीए ने डीज़ल और रसोई गैस वाला फ़ैसला लिया और अगले दिन, 14 सितंबर (जब हिंदी पट्टी के बुद्धिजीवी हिंदी दिवस मनाने में मशगूल थे) को खुदरा बाज़ार में 51 फ़ीसदी एफडीआई का।

सवाल अपनी जगह कायम है। कॉरपोरेट लूट और इसमें राजनीतिक सहभागिता पर लगाम कसने की कोशिश जिस संरचना के जरिए की जा रही है उसमें पार्टियों के बीच ज़्यादा फर्क नहीं है। भाजपा अथवा कांग्रेस सिर्फ़ विपक्ष में आने पर ही विरोध का स्वर अलापते हैं वरना नीतिगत स्तर पर दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। इसके कई उदाहरण अतीत में देखे गए हैं। गुजरे साल दिल्ली में कुछ किलोमीटर के अंतर में ही एक जगह भाजपा के लोग आदर्श सोसाइटी में हुए भ्रष्टाचार को लेकर धरने पर बैठे थे तो दूसरी जगह कर्नाटक में येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच उनके इस्तीफ़े की मांग कर रही कांग्रेस बैठी थी। मुद्दे और जगह में पाए जाने वाले अंतर को दरअसल सैद्धांतिक अंतर के तौर पर पेश करने की शातिराना राजनीति की जब परत उघड़ने लगती है तो नया शिगूफ़ा छोड़कर उसे शांत कर दिया जाता है। वरना इस नीति के साथ कोयला आवंटन पहली बार यूपीए ने तो किया नहीं। 1993 से यही नीति अमल में लाई जा रही है। और घोटाला अगर है तो सिर्फ़ 2004 से ही नहीं है...और अगर नहीं है तो फिर कोई सवाल ही नहीं है।  



15 सितंबर 2012

क्या है कोयला घोटाला

-दिलीप खान
 (उन लोगों के लिए जो कोयला घोटाले को अब तक समझ नहीं पाए और उन लोगों के लिए भी जिनके पास अपडेट तो है लेकिन मामले की पृष्ठभूमि जिन्हें मालूम नहीं है—दख़ल की दुनिया)  

पी चिदंबरम ने शुरुआत में कहा कि कोयला के मामले में न तो कोई घोटाला हुआ है और ही देश को कोई नुकसान, क्योंकि कई कंपनियों ने तो कोयला खदान से कोयला निकाला ही नहीं। यानी जब ज़मीन से कोयला निकालकर बेचा ही नहीं गया तो नुकसान कैसे हो गया? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब कई लोगों को अब भी समझ में नहीं आ रहा है और शुरुआती दौर में चिदंबरम सहित कांग्रेस को भी नहीं आया होगा। शायद इसलिए 22-23 दिन पहले कांग्रेस ने कोयला नहीं खोदने की बात उछाली थी, लेकिन इस बात को दफ़्न करने में पार्टी ने दो दिन-तीन से ज़्यादा का वक़्त नहीं लगाया और इसके बाद कांग्रेस लगातार विपरीत पहलू पर सक्रियता दिखाने की कोशिश कर रही है कि जिन कंपनियों ने खनन नहीं किए उनको घेरा जाए। कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने अंतर-मंत्रालयी समूह यानी आईएमजी के माध्यम से 29 निजी कंपनियों को सवाल-जवाब करने के लिए 6-7-8 सितंबर को मंत्रालय बुलाया भी था। (विस्तृत ब्यौरा यहां देखें)।

आईएमजी के भीतर की मौजूदा स्थितियों की पड़ताल करने से पहले ऊपर उठाए गए सवाल को समझना ज़रूरी है। असल में कोयला ब्लॉक आवंटन की जो प्रक्रिया यूपीए-1 और यूपीए-2 ने अपनाई वो नई नहीं है। सन 1993 से यही प्रक्रिया अपनाई जा रही है। अलबत्ता यूपीए-1 ने नियम को बदलने की बात करते हुए कंपनियों के बीच कोयला ब्लॉक की नीलामी का नियम बनाया था। ये अलग बात है कि इसे अपनाया कभी नहीं गया। जिस बीजेपी ने इस मुद्दे पर संसद नहीं चलने दी, उसके भी किसी मुख्यमंत्री ने इसे नहीं अपनाया। कैग की जिस हालिया रिपोर्ट को लेकर हंगामा शुरू हुआ है उसमें सन 2004-2009 के बीच आवंटित कोयला खदानों की समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आवंटन में हुई गड़बड़ियों की वजह से कंपनियों को 1.86 लाख करोड़ रुपए का औचक लाभ हासिल हुआ और जाहिर है इस लाभ के ऐवज में देश को उतना ही नुकसान उठाना पड़ा।

विशुद्ध तकनीकी तौर पर देखें तो सवाल निजी कंपनियों को खदान आवंटित करने-नहीं करने का नहीं है। हर सरकार की अपनी नीति होती है जिसमें वो फेर-बदल करके तत्कालीन ज़रूरतों के लिहाज से फ़ैसला लेती है। 2004 के आस-पास सीमेंट की कीमतों में हुई बढ़ोतरी और ऊर्जा की ज़्यादा मांगों के बीच सरकार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इसके उत्पादन को बढ़ाए जाने की ज़रूरत है। (हालांकि सीमेंट और ऊर्जा परियोजनाओं के उस समय का विश्लेषण करेंगे तो कुछ अलग निष्कर्ष पर आप पहुंच सकते हैं, लेकिन विषयांतर की वजह से मैं इस पर नहीं जा रहा।) लिहाजा सरकार का मानना था कि ऐसी कंपनियों को प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सरकारी कंपनियों की क्षमता को नाकाफ़ी मानते हुए सरकार ने इस काम के लिए निजी कंपनियों के लिए भी दरवाज़ा चौड़ा किया। किसी भी सीमेंट या ताप ऊर्जा परियोजना को चालू करने के लिए कोयला सबसे बुनियादी संसाधन है। जाहिर है निजी कंपनियों ने कोयला खदानों के लिए मंत्रालय के पास अर्जी दाख़िल की। सवालों और आपत्तियों का सिलसिला यहीं से शुरू होता है।

पहला सवाल ये है कि आवंटन के दौरान यूपीए-1 ने अपनी बनाई नीति यानी नीलामी की प्रक्रिया को लागू क्यों नहीं किया? दूसरी आपत्ति इस बात पर जताई जा रही है कि कुछ कंपनियों को रातों-रात खदान आवंटित कैसे हो गए? इसके अलावा कई कंपनियां ऐसी हैं जिनमें मालिकाने ओहदे पर नेताओं के रिश्तेदार काबिज हैं। कुछ कंपनियां मीडिया घरानों की हैं। केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय के भाई सुधीर कुमार सहाय एसकेएस इस्पात एंड पावर में मानद निदेशक के पद पर हैं। जायसवाल नेको कंपनी के तार कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से जुड़े बताए जा रहे हैं। कांग्रेस के समर्थन से झारखंड में मुख्यमंत्री बने निर्दलीय मधु कोड़ा के कई करीबियों को कोयला खदान हासिल हुआ। विनी आयरन एंड स्टील उद्योग लिमिटेड का नाम ख़ास तौर पर सामने आ रहा है। इस कंपनी के मालिक विजय जोशी को कोडा के करीबियों में गिना जाता है। झारखंड राज्य में कोडा ने 13 निजी कंपनियों को खदान बांटे। सीबीआई के मुताबिक इनमें कई कंपनियों की स्थापना ही आवंटन से ठीक पहले हुई, यानी कह सकते हैं कि आवंटन के लिए ही कंपनी बनाई गई। महाराष्ट्र में मनोज जायसवाल से साथ मिलकर राजेंद्र दर्डा और उनके भाई व कांग्रेस सांसद एवं लोकमत मीडिया समूह के मालिक विजय दर्डा ने जस इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल प्राइवेट लिमिटेड में दांव खेला। व्यवसायी नवीन जिंदल के बारे में सब जानते हैं कि वो कांग्रेस सांसद है और कोयला आवंटन में उनके जिम्मे भी खदान आए। कोयला के इस खेल में कंपनियों और नेताओं के साथ सांठ-गांठ के और भी उदाहरण हैं, लेकिन फिलहाल हम तीसरे सवाल पर आते हैं।

तीसरा सवाल है कि इन कंपनियों को किस दर में ये खदान आवंटित हुए? क्या क़ीमत में कटौती की गई? सरकार के पास जमा करने के लिए कंपनियों ने कैसे रुपए जमा किए? कंपनियों ने कर्ज़ कहां से और कैसे लिए? भारतीय कॉरपोरेट लूट के मॉडल को समझने के लिए इस सवाल को समझना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। एक उदाहरण लेते हैं- मान लीजिए आपको ऊर्जा परियोजना की कंपनी खोलनी है और आपके पास पैसे नहीं हैं तो आप क्या करेंगे? सबसे पहले आप बैंक से चिरौड़ी करेंगे कि वो आपको कर्ज़ दे दें, लेकिन सैंकड़ों या हज़ारों करोड़ रुपए रवां-दवां तरीके से तो बैंक आपको देगा नहीं। फिर आपके पास क्या विकल्प बचता है? आप जमा के तौर पर बैंक को कुछ दिखाइए, बैंक आपके घर तक पैसे पहुंचा जाएगा! कंपनियों ने दांव खेला। कुछ पैसे लगाकर कोयला खदान ख़रीद लिया और फिर बैंक को जमा के तौर पर वो खदान दिखा दिया। तापीय ऊर्जा परियोजना के वास्ते जो सबसे ज़रूरी चीज़ होती है वो है कोयला। ....और अब वो आपके पास है। यानी बैंक का भरोसा जीतने के लिए इससे ज़्यादा आपको कुछ चाहिए भी नहीं! इस आधार पर अब हज़ारों करोड़ रुपए सरकारी बैंक आपको बतौर कर्ज दे देगी। आपने पैसे लगाए, सरकार से कोयला ख़रीदा। बदले में सरकार ने बैंक से आपको पैसे दे दिए। जितने का आपने कोयला खदान ख़रीदा उससे ज़्यादा पैसे दे दिए।

अब चौथे और सबसे अहम सवाल की तरफ़ चलते हैं कि आख़िरकार जब कंपनियों ने कोयला खदान ख़रीदा तो कोयला निकाला क्यों नहीं? कोयला नहीं निकालना घोटाला कैसे हो गया? अंतर-मंत्रालयी समूह ने खनन का काम शुरू नहीं करने वाली कंपनियों को नोटिस क्यों जारी किया? क्यों आख़िरकार रिलायंस से लेकर टाटा और आर्सेलर मित्तल जैसी कंपनियां काम शुरू नहीं कर पाईं? और क्यों आख़िरकार सारी कंपनियां सफ़ाई के मोड पर आ गई है और वो अगले साल या फिर अगले कुछ महीनों में काम शुरू करने का वादा कर रही है? कोयला खदान ख़रीदने के बाद परती छोड़ देने से कंपनियों का कौन सा हित सधता है? एक बार फिर उदाहरण का सहारा लेते हैं- मान लीजिए आपको अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए पैसों की दरकार है और कोयला खदान दिखाकर आपने बैंक से पैसे हासिल भी कर लिए। कोयला खदान जिस उद्देश्य से आपने लिया वो किसी अन्य वजह से अटका हुआ है, तो आप क्या करेंगे? जाहिर है एक व्यवसायी की तरह बैंक से हासिल पैसों को दूसरे खेल में लगाएंगे। आपके पास पैसा है और बाज़ार आपके सामने है। पैसे को बाज़ार में आपने फ़ेंक दिया। बाज़ार के इस खेल से आपको फुरसत नहीं हुई कि कोयला खदान पर भी काम करना है। आपको बाज़ार वाले काम में ज़्यादा मुनाफ़ा मिल रहा है। बाज़ार में पैसा लगाने के लिए बैंक कोयला खदान के आलावा और किसी भी आधार पर आपको इतने कर्ज़ नहीं देता। सरकार ने आपको कोयला खदान दिया कि आप ऊर्जा परियोजना शुरू करेंगे या फिर सीमेंट उत्पादन शुरू करेंगे। यानी सरकार के मुताबिक देश की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करेंगे। आपने अगले 5-7 साल में कुछ किया ही नहीं!

सरकार ने एक ऐसी कंपनी को ऊर्जा ज़रूरत पूरा करने का ज़िम्मा दिया जिसने ऊर्जा की पूर्ति के लिए एक अदद खंभा भी नहीं गाड़ा। चिदंबरम यहीं घिर जाते हैं। वित्त मंत्री हैं और पहले भी रह चुके हैं, सब कुछ जानते हैं। वेदांता में काम कर चुके हैं, सब कुछ जानते हैं। बस्स कभी-कभी भोले और नादान बनकर बचकाना मुद्दा उछाल देते हैं। ..और कंपनियों का क्या है चरम केस में वो चाहे तो खुद को दिवाला घोषित कर सकती है। कोर्ट में पेशी होगी तो ज़्यादा से ज़्यादा किश्तों पर पैसे चुकाने पर राजी हो जाएगी। रियल इस्टेट में ये खेल खूब खेला जाता है। कोयला में खेलने का सुनहरा मौका है कंपनियों के पास। खेलकर देश लूटने का मौका!