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10 नवंबर 2012

हम किससे डरें नेल्सन मंडेला! (पहला भाग)

 मंडेला के देश में चार दिन

-उर्मिलेश
हल्की बारिश थमने के बाद जोहान्सबर्ग की पहली रात और खुशनुमा हो गई थी। होटल की खिड़की से देखा, आसमान बिल्कुल साफ था। खूब सारे तारे दिखाई दे रहे थे, जैसे बचपन में अपने गांव वाले घर के आंगन में सोते  वक्त अक्सर दिखाई देते थे। याद नहीं, मैंने दिल्ली में कभी ऐसी तारों भरी रात देखी हो। सोचा, सोने से पहले क्यों न होटल के सामने वाली सड़क पर टहलते हुए आसमान और मंडेला स्क्वायर के पास के इलाके का नजारा करें। बाहर थोड़ी ठंड़ थी इसलिए जैकेट डाल लिया। कमरा बंद कर फौरन नीचे आया। बाहर जाने लगा तो होटल-स्टाफ की एक महिलाकर्मी ने मुझे रोकते हुए समझाया, ‘ सर, यहां रात में बाहर निकलना ‘सेफ’ नहीं है। अच्छा होगा, दिन में भी अकेले न निकलें। आपने तो अभी कुछ ही देर पहले ‘चेक-इन’ किया। हिन्दी कांफ्रेंस के लिए इंडिया से आए हैं। आपका सम्मेलन कल सुबह सैंडटन कन्वेंशन सेंटर में शुरू होगा। 

वह सेंटर भी इसी इलाके में है और वहां तक पहुंचने के लिए आपको होटल से बाहर जाने की जरुरत नहीं है। होटल के अंदर से वहां तक जाने का हवाई-गलियारा (स्काई वाक) बना हुआ है।’ इन हिदायतों को सुनकर थोड़ी देर के लिए वाकई अचरज हुआ। सन 1998-2002 के दौरान न जाने कितनी बार कश्मीर गया। भोजन के बाद रात को श्रीनगर के आ-दूश होटल से बाहर निकलकर रेजीडेंसी  रोड पर मजे से टहलता था। सड़क पर कई बार सैनिकों या अर्धसैनिक बल के जवानों से आमना-सामना होता तो ‘खाने के बाद टहल रहा हूं’ कहते हुए आगे निकल जाता। कई बार वे पूछताछ भी करते। दहशत और आतंक भरे माहौल के बावजूद कभी किसी होटल में हमे बाहर जाने से नहीं रोका गया। दुखी-मन रिसेप्शन के पास पड़े सोफे पर बैठ गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर-मित्र की बात याद आई, जिन्होंने कुछ माह पहले दक्षिण अफ्रीका के दौरे से लौटने के बाद कहा था, ‘जोहान्सबर्ग के हालात अच्छे नहीं। किसी बाहरी आदमी के लिए सड़कों पर आजाद ढंग से चलना मुश्किल हो गया है।‘
जोहन्सबर्ग का मंडेला चौराहा (स्क्वेयर)
भव्य सितारा होटल की चौदहवीं मंजिल पर मुझे कमरा मिला था। जाने के लिए लिफ्ट को भी अपने कमरे की खास इलेक्ट्रॉनिक चाभी से चलाना था। दो-तीन बार लिफ्ट के सिस्टम में कार्डनुमा चाभी को अंदर-बाहर करता रहा तब जाकर लिफ्ट चली और कुछ सेकेंड्स में सीधे चौदहवीं मंजिल जाकर रुकी। कमरा खोलने में जो मशक्कत करनी पड़ी वह कुछ कम नहीं। लिफ्ट से ज्यादा वक्त इसमें लगा। बहरहाल, एक बार अनुभव हो जाने के बाद यह प्रक्रिया कठिन नहीं रही। कुछ देर बाद दिल्ली से ही अपने साथ आए एक सज्जन का कमरे में फोन आया। इसी होटल में ऊपर की किसी अन्य मंजिल पर उन्हें कमरा मिला था। उन्होंने मेरे कमरे में आकर गपशप करते हुए चाय पीने की इच्छा जाहिर की। मैंने कहा—‘आ जाइए, इसमें पूछने की क्या बात ?’ वह कहने लगे- ‘लेकिन आउंगा कैसे, लिफ्ट तो आपकी मंजिल पर रूक ही नहीं रही है। मैं वहां जाने के लिए अधिकृत नहीं हूं, ऐसी आवाज आ रही है। मैं रास्ते में अटका हूं।‘ मैंने कहा, ‘आपके और हमारे बीच ज्यादा ऊंचाई नहीं है, आप सीढ़ी से आ जाइए।’ मेरे इस सुझाव पर उन्होंने कहा कि ‘कोई सीढ़ी नहीं है, इस होटल में। चारों तरफ देख आया हूं।‘ मैंने कहा, ‘ऐसा कैसे हो सकता है, यह तो फायर-फाइंटिंग नियमावली का उल्लंघन  होगा।’ उन्होंने मायूसी जाहिर करते हुए कहा, ‘ऐसा ही है।’ तब मुझे उपाय सूझा,  मैंने कहा, ‘आप भू तल पर जाइए, वहां मैं आता हूं। वहां से फिर आपको लेकर चौदहवीं मंजिल आ जाऊंगा।’ अपनी कार्डनुमा चाभी को लेकर मैं नीचे गया और फिर उन्हें लेकर अपने कमरे में आया। 

सबसे पहले रिसेप्शन को फोन कर जानना चाहा कि नीचे से ऊपर या ऊपर से नीचे के फ्लोर पर किसी मित्र के कमरे में जाना हो तो लिफ्ट को किस तरह चलाएं?’ दूसरी तरफ से जो जवाब मिला वह हैरत में डालने वाला था—‘सर, अपने कमरे से आप सिर्फ नीचे (ग्राउंड फ्लोर) या छठीं मंजिल (जहां से रेस्तरां या स्काईवाक के लिए रास्ता जाता है) पर आ सकते हैं। अन्य मंजिलों पर नहीं। यह सुरक्षा बंदोबस्त हमने अपने होटल में रहने वाले गेस्ट्स की सुरक्षा के मद्देनजर किया है।’  लगभग घंटे भर गपशप के बाद जब वह अपने कमरे की तरफ जाने लगे तो मैने पूछा, ‘जाएंगे कैसे?’ उन्होंने कहा, ‘वही तरीका अपनाएंगे, नीचे जाकर फिर अपनी मंजिल पर आने का।’ मैं उन्हें छोड़ने लिफ्ट तक गया। वहां अचानक मेरी नजर बाईं तरफ एक ऐसे दरवाजे पर गई, जिसमें कोई लाक-सिस्टम नहीं नजर आ रहा था। मेंने उनकी तरफ इशारा किया, वो देखिए। फिर हम दोनों वहां गए। पता चला, यह सीढ़ियों का दरवाजा है। लेकिन उस पर न तो कुछ लिखा था और न ही निकास या सीढ़ी होने का कोई संकेत दिया हुआ था। मैंने कहा, ‘महाशय, इतनी मेहनत से खोजे रास्ते का अब आप उपयोग करें।’ वह सज्जन सीढियों के रास्ते अपने कमरे की तरफ गए और मैं अपने कमरे में आकर दक्षिण अफ्रीकी मुक्ति संग्राम के बारे में एक पुराना लेख पढ़ने लगा, जो घर से रवाना होते समय पुरानी पत्रिकाओं के मेरे घटते-बढ़ते कलेक्शन में मिल गया था।

अपने छात्र-जीवन और फिर पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में हमने दक्षिण अफ्रीका के बारे में काफी कुछ पढ़ा था। दुनिया के पैमाने पर उन दिनों की तरक्कीपंसद युवा पीढ़ी के जो कुछ बड़े महानायक थे, उसमें नेल्सन मंडेला एक महत्वपूर्ण नाम था। दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रावासों के कमरों में हमारे कई मित्रों ने तो लेनिन, चे या कास्त्रो के साथ मंडेला की तस्वीर भी लगा रखी थी। एक योद्धा, जिसने अपने जीवन के सर्वोत्तम 27 साल दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी-नस्लभेदी सरकार की जेल में बिता दिए। सच पूछिए तो विश्व हिन्दी सम्मेलन में शामिल होने का भारत सरकार का जब निमंत्रण मिला तो मैं थोड़े असमंजस में रहा क्योंकि महज चार दिन पहले ही डेनमार्क के सात-दिवसीय दौरे से लौटा था। पर जोहान्सबर्ग जाने की मन में इच्छा भी थी। सम्मेलन के बहाने हमें मंडेला का देश देखने का मौका मिलेगा। 

एक ऐसा देश, जहां रंग व नस्ल आधारित भेदभाव और जुल्म से लड़ते हुए मोहनदास करमचंद गांधी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के महात्मा गांधी बने। अस्वस्थ चल रहे बुजुर्ग मंडेला को देखने का सौभाग्य तो शायद न मिले पर उस महान योद्धा की निशानियां जरूर दिखेंगी। और यही सब सोचते हुए मैंने जोहान्सबर्ग जाने की तैयारी शुरू कर दी। दो दिन के अंदर ही यात्रा की सरकारी-औपचारिकताएं पूरी हो गईं। 21 सितम्बर की सुबह अमीरात-एयरलाइंस की उड़ान से दुबई होते हुए जोहान्सबर्ग के लिए रवाना हुआ। विमान में सम्मेलन के कई लेखक-प्रतिनिधि सवार थे। राजनेता और अफसर शायद पहले ही जा चुके थे। दुबई से हमें उसी एयरलाइंस के दूसरे विमान से जोहान्सबर्ग के लिए उड़ना था। बीच में लगभग डेढ़ घंटे का अंतराल था। इस दौरान हम लोग दुबई हवाई अड्डे के विशाल शापिंग कांप्लेक्स में घूमते-फिरते रहे। शापिंग कांप्लेक्स की एक खास बात है कि यहां सिर्फ शराब, चाकलेट और कपड़े की ही दुकानें नहीं हैं, सोना, चांदी, हीरे और अत्याधुनिक इलेक्टानिक सामान भी यहां बिकते हैं। योजना बनाकर आए कुछ सम्पन्न लोग सोने की दुकानों पर मोल-भाव करते दिखे। कुछ ने खरीदा भी।

जोहन्सबर्ग का गांधी चौराहा 
दुबई से लगभग आठ घंटे लंबी उड़ान के बाद हम जोहान्सबर्ग हवाई अड्डे पर उतरे तो वहां रात हो गई थी। हल्की बारिश से माहौल में थोड़ी ठंड थी। प्रिटोरिया स्थित भारतीय उच्चायोग की तरफ से हवाई अड्डे पर जूनियर अधिकारियों की एक टीम आई थी। उस फ्लाइट से लगभग पचास-साठ डेलीगेट आए थे। कौन-किस होटल में रुकेगा, इसका चार्ट पहसे से बना हुआ था। उसे देखकर हम लोगों को बसों में बैठाया जा रहा था। मेरा अलाटमेंट सैंडटन इलाके के एक सितारा होटल में था। लगभग चालीस मिनट के इंतजार के बाद हमें बस से होटल ले जाया गया। बारिश में धुली सड़कें और चमक रही थीं। रास्ते में साधाऱण मकानों से लेकर आलीशान बिल्डिंगें थीं। हरियाली कम थी पर महानगर साफ-सुथरा दिख रहा था। दक्षिण अफ्रीका के बारे में पढ़ रखा है कि वह सोना, हीरा, प्लैटिनम और कोयला सहित तरह-तरह के बेशकीमती खनिजों से भरा देश है। पर वहां के ज्यादातर लोग भारत की तरह ही गरीब और बदहाल हैं। लेकिन हवाई अड्डे से होटल के रास्ते में हमें विपन्नता की तस्वीर नहीं दिखी, जैसी आमतौर पर अपने भारत  में नगरों-महानगरों की चकाचौंध के बावजूद इधर-उधर दिख ही जाती है। दूसरे-तीसरे दिन जोहान्सबर्ग के अंदरुनी हिस्से में और सोवैटो जाते वक्त यहां के समाज की जो तस्वीर हमने देखी, वह उतनी गुलाबी नहीं थी। कई तस्वीरें तो डरावनी थीं। इसकी शुरुआत पहले ही दिन होटल के रिसेप्शन से हो गई थी। प्रवास के दूसरे दिन पता चला कि सम्मेलन में दिल्ली से आए सरकारी अधिकारियों के एक समूह पर हमला हुआ। हमलावरों ने उनके पास जो भी पाया, लूट लिया। यह सब नेल्सन मंडेला स्क्वायर के आसपास ही घटित हुआ। जो बातें अब तक सुनते आए थे, वह हमारे सामने दर्ज हो रही थीं। छीना-झपटी में कुछ लोगों को चोट भी लगी। गनीमत कि उनके पासपोर्ट और बेशकीमती सामान नहीं गए। लेकिन इस तरह की बुरी खबरों से हम ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। सुबह की सैर का सिलसिला हमने जारी रखा।

दक्षिण अफ्रीका में कानून व्यवस्था, लूटपाट और संगठित अपराध की हकीकत अपने विकराल चेहरे के साथ 23 सितम्बर को हमारे सामने आई। बीती रात, ब्रीट्स में देश के मशहूर खेल-शख्सियत और पूर्व विश्वविजेता हेवीवेट मुक्केबाज कोर्री सैंडर्स को एक रेस्तरां में अपने भतीजे का 21वां जन्मदिन मनाते समय गोलियों से भून दिया गया। रेस्तरां से बाहर निकलते वक्त तीन हमलावर वहां मौजूद सभी लोगों के बैग, सेलफोन और पर्स आदि लेते गए। गोलियों से छलनी होने के बावजूद सैंडर्स अपनी बेटी, भतीजे और अन्य बच्चों को बचाने में लगा रहा। अंततः 23 सितम्बर की सुबह चार बजे प्रिटोरिया के एक अस्पताल में सैंडर्स ने दम तोड़ दिया। अगले दिन जोहान्सबर्ग के अखबारों में छपी इस खबर में दक्षिण अफ्रीका का लहूलुहान चेहरा झांकता रहा। यह दीगर बात है कि खबर को उतनी प्रमुखता नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थी। देश के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ने तो उसे अपने दूसरे पेज पर छापा।
जोहन्सबर्ग: विहंगम दृश्य
 अभी एक दिन पहले ही मैं शहर के पुराने इलाकों में गया था। मेरा टैक्सी डाइवर बार-बार मुझे हिदायत देता था, गाड़ी से उतरो नहीं, सारी चीजें अंदर से ही देखते जाओ। तब मुझे उसकी यह सतर्कता कुछ ज्यादा ही लग रही थी। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के बाद मैं शहर घूमने निकल गया था। मुझे लगा, बाहर जाकर असली शहर का जायजा लेना चाहिए ताकि पंचसितारा होटलों और जोहान्सबर्ग के अमेरिकी अंदाज में बने नए व्यावसायिक इलाके से दूर पुराने शहर का चेहरा और आम जिन्दगी की जद्दोजहद दिखे। इसके लिए एक भरोसेमंद टैक्सी वाले की जरुरत थी। होटल के बिल्कुल सामने एक टैक्सी वाले से मुलाकात हो गई। वह किसी गेस्ट को होटल छोड़कर लौट रहा था और मैं दोपहर के भोजन के बाद नीचे आया हुआ था। 

मैंने उससे पूछा, ‘ मैं एक इंडियन जर्नलिस्ट हूं। शहर, उसके अंदर की कालोनियों और साधारण लोगों की बस्तियों को देखना चाहता हूं। क्या आप मुझे ले चलेंगे?‘  किराए और यात्रा की समय-सीमा पर संक्षिप्त बातचीत के बाद वह फौरन तैयार हो गया। मैं अपने कमरे में गया और पंद्रह मिनट में तैयार होकर नीचे आ गया। साथ चलने के लिए एक अन्य गैर-पत्रकार मित्र तैयार हो गए। शहर के पाश इलाकों से गुजरते हुए हम डाउन-टाउन और फिर गरीब लोगों की बस्तियों की तरफ गए। अपने देश के इंदिरा आवास के नाम पर बने दरबे-नुमा आवासों की तरह के कुछ मकान भी देखे। हालांकि इन मकानों की गुणवत्ता अपने देश के इंदिरा आवासों से बेहतर थी। इनमें यहां के साधारण गरीब लोग रहते हैं। यहां बेहाली और गुरबत का साया था। कई घरों में हमने देखा, बूढ़े-बुढियां लाचार पड़े थे। उनके जवान बेटे-बेटियां कुछ कमाने के नाम पर बाहर निकले हुए थे। इस तरह की बदहाल-जिन्दगियों से कुछ ही दूरी पर नए-पुराने धनिकों की चमकीली दुनिया थी, कांटेदार तारों से घिरी ऊंची अट्टालिकाएं, अत्याधुनिक सामानों से भरे शापिंग काम्पलेक्स, सिनेमा, नाचघर और न जाने क्या-क्या! डाउन-टाउन में हमें कई नाच-घर या मनोरंजन केंद्र दिखे।

बाकायदा उनके बैनर-पोस्टर भी टंगे थे। मेरे टैक्सी-वाले ने बताया कि इनमें हर तरह का धंधा होता है। टैक्सी वाले और मेरे बीच इस यात्रा के दौरान काफी कुछ बातें हो चुकी थीं। हम दोनों ने एक दूसरे को थोड़ा-बहुत समझ लिया था। उसे भरोसे में लेकर मैंने पूछा, ‘आप बार-बार मुझे गाड़ी से उतरकर सड़क या फुटपाथ पर चलते लोगों से बातचीत करने से रोक रहे हो, क्या वजह है। ये लोग तो अच्छे मालूम होते हैं, फिर क्या डर है?’ उसने मुझे समझाने के अंदाज में कहा, ‘असल में आप समझ नहीं सकते कि उनमें कौन क्या और कैसा है, जबकि वो समझ रहे हैं कि आप कौन हो। उन्हें इस बात से मतलब नहीं कि आप अमेरिकन हो या इंडियन, ज्यादा अमीर हो या साधारण। उनके लिए यही पर्याप्त है कि आप पर्यटक हो, किसी बाहरी देश के पासपोर्ट वाले हो और आपकी जेब में कुछ रैंड (दक्षिण अफ्रीकी मुद्रा) या डॉलर होंगे। यह सब हासिल करने के लिए खुराफाती लोग आपको पकड़ सकते हैं, आप पर हमला कर सकते हैं और जरुरत के हिसाब से चाकू भी चला सकते हैं। 
जोहन्सबर्ग- खेल का बड़ा केंद्र 
सब जगह यह समस्या नहीं है पर इन इलाकों में है। आप प्रिटोरिया जाइए, वहां ऐसा माहौल नहीं है।’ मैंने वेबसाइट पर पढ़ी एक खबर का हवाला देते हुए पूछा, ‘लेकिन कुछ ही दिनों पहले प्रिटोरिया के बाहरी इलाके में एक पैतीस वर्षीय गोरा दक्षिण-अफ्रीकी नागरिक ‘श्वेत-विरोधी घृणा अभियान’ का शिकार हो गया। उसका बच्चा अपने बाप को मरते हुए देखता रहा। ऐसा क्यों है?’ डाइवर भले ही कम पढ़ा-लिखा रहा हो पर मैने महसूस किया, वह बेहद संजीदा और समझदार था। उसने कहा, ‘ आप किस खबर की बात कर रहे हैं, मुझे नहीं मालूम। लेकिन यह बात सही है कि सन 1994 में सत्ता बदलने के बाद हम अश्वेत लोगों के कुछ हिस्सों में गोरों से बदला लेने की मानसिकता पैदा हुई है। यह बहुत बुरी बात है। एक जमाना था, जब हम कालों को वोट का अधिकार तक नहीं था। हमने जुल्म के खिलाफ लड़ाई जीती। संकल्प लिया गया कि रंगभेद-नस्लभेद का शासन खत्म होने के बाद दोनों तरह के लोगों-काले और गोरों को अब साथ रहना है और देश को मजबूत बनाना है। पर ऐसा नहीं हो पा रहा है। यह बहुत बड़ी समस्या है, हमारे देश की।’ उसकी आत्मस्वीकृति में ईमानदारी थी।

दक्षिण अफ्रीका की यह समस्या विकट होती गई है। राजनीतिक-भाषणबाजी के अलावा इसे संभालने की ठोस कोशिश नहीं की जा रही है। दोनों समुदायों के बीच इतनी लंबी खाई पैदा हो चुकी है कि उसे पाटना फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है। इसके पीछे निश्चय ही तमाम तरह के निहित स्वार्थ सक्रिय हैं। नेल्सन मंडेला सहित सभी प्रमुख विचारक पहले से कहते आ रहे हैं कि दक्षिण अफ्रीकी राष्टवाद के विकास का रास्ता अब अश्वेत और गोरे अफ्रीकियों की एकता की जमीन से ही गुजरेगा। दोनों को एक होकर आगे बढ़ना होगा। पर इसे अमलीजामा पहनाने की बड़ी चुनौतियां हैं। मंडेला-कार्यकाल में जिन आर्थिक-नीतियों की बुनियाद पड़ी, वह आगे जाकर समस्याओं का समाधान करने की बजाय स्वयं समस्या बन गई। 

अब तो उनके कई पक्के समर्थक भी कहने लगे हैं कि पहले गरीबी और असमानता खत्म करने पर जोर दिया जाना चाहिए था। सामाजिक, जातीय और नस्लीय अतंर्विरोधों को तब बेहतर ढंग से हल किया जा सकता था। अर्थव्यवस्था में अत्यधिक निजीकरण पर जोर ने धन-सम्पत्ति के संकेद्रण को और बढ़ा दिया है। राजनीतिक सत्ता मुट्ठी भर लोगों के हाथों में केंद्रित है। तेजी से बढ़ रही आर्थिक गैर-बराबरी ने सामाजिक अंतर्विरोधों को तीखा किया है। पहले बड़े स्तर पर राष्टीयकरण की प्रक्रिया चलनी चाहिए थी। इससे दरिद्रता और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को हल किया गया होता। पर सरकार ने यहां निजीकरण-आधारित पूंजीपरस्ती का रास्ता चुना। गरीबों के लिए कुछ योजनाएं लाई गईं। पर ये कथित कल्याणकारी योजनाएं ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं। दक्षिण अफ्रीका में इस वक्त बेरोजगारी 24 फीसद की दर से बढ़ रही है। 

नक्शे में जोहन्सबर्ग 
लगभग साढ़े पांच करोड़ आवादी वाले देश के 90 फीसद अश्वेत गरीब हैं। सरकार दावा करती है कि गरीबों की बड़ी आबादी शासन द्वारा शुरु की गईं कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पा रही है और उसका जीवन स्तर बेहतर हुआ है। लेकिन अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अपेक्षाकृत रेडिकल युवा नेता, सहयोगी गुट और विपक्षी दल सरकार के दावे को खारिज करते हैं। पिछले दिनों अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की यूथ लीग के अध्यक्ष जूलियस मलेमा को पार्टी से निकाल दिया गया। यूथ लीग और कई अन्य समूहों के रेडिकल नेताओं का कहना है कि सरकार जब तक खदानों का राष्टीयकरण करके बड़े नीतिगत फैसले नहीं करती तब तक बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी और गैरबराबरी जैसी बड़ी समस्याओं से निजात नहीं मिलेगा। कई गुटों और नेताओं ने मांग की है कि सरकार 60 फीसदी खदानों का मुआवजा दिए बगैर राष्टीयकरण करे। इनमें यूथ लीग नेता भी शामिल हैं। जूलियस स्वयं भी कम विवादास्पद नहीं हैं। उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं। पर एएनसी में जूमा-विरोधी खेमे के कई प्रमुख नेता इन दिनों उनका साथ दे रहे हैं। कम्युनिस्टों का खेमा शुरू से यह मांग करता रहा है। इन दिनों इस खेमे का समर्थन बढ़ रहा है। उधर, सरकार खदानों के राष्ट्रीय़करण की मांग को नकारात्मक विचार मानती है। उसका कहना है कि इससे आर्थिक सुधारों का सिलसिला थम जाएगा। देश में सक्रिय ज्यादातर थिंक-टैंक और एनजीओ भी सरकार की हां में हां मिला रहे हैं। इस तरह के संगठनों को अमेरिका और यूरोपीय देशों से काफी मोटे अनुदान मिलते हैं। (साप्ताहिक शुक्रवार में प्रकाशित) 
...जारी
(लेखक से urmilesh218@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)    

02 नवंबर 2012

क्रिस्टिनिया, मेरी जान!


   डेनमार्क---यात्रा-वृत्तांत

                                                                        - उर्मिलेश
उर्मिलेश
(नौकरी से फ़ारिग होने के बाद उर्मिलेश ने हाल में लगातार अंतराल पर देश-विदेश की यात्राएं की हैं। स्कैन्डेनेवियाई देशों से लौटकर उन्होंने ये यात्रा वृत्तांत लिखा, जिसे हम दख़ल की दुनिया पर आपसे साझा कर रहे हैं। अगले हिस्से में हम आपको दक्षिण अफ्रिका के संस्मरण सुनाएंगे)
  
कोपनेहैगन से बाल्टिक की तरफ जाने वाली रोड पर शहर से कुछ दूर आगे बढ़ने पर क्रिस्टियन-हार्बर इलाके में एक साधारण सा गेट दिखाई देता है, उसके उपर बड़े कलात्मक ढंग से  लिखा है---‘वेलकम इन क्रिस्टिनिया’। पास में ही चटक लाल रंग का झंडा लहरा रहा है, जिस पर पीले रंग के तीन निशान हैं। गेट खुला हुआ है। यहां कोई सुरक्षा प्रहरी नहीं, किसी तरह का कोई इलेक्टानिक सेक्युरिटी तामझाम  नहीं। कोई भी अंदर जा सकता है। किसी की इजाजत की जरुरत नहीं। अंदर दाखिल होने पर लगता है, हम किसी अलग ‘रिपब्लिक’ (गणतंत्र) में आ गए हैं। अपने साथ चल रहे डीसीआई के परियोजना-सलाहकार येस्पर से पूछता हूं, ‘किधर जाना है’?  ‘बस चलते जाइए, चारों तरफ क्रिस्टिनिया ही है। सारे रास्ते क्रिस्टिनिया जाते हैं।’, वह मुस्कराते हुए समझाते हैं।

----और अब हम क्रिस्टिनिया में हैं---फ्री-टाउन, क्रिस्टिनिया! क्रिस्टिनिया के लोग अपनी बस्ती को ‘फ्री-टाउन’ कहना नहीं भूलते। बाहर वाले इसे ‘अराजकतावादियों (एनार्किस्ट) का द्वीप’ कहते हैं। यहां आस्तिक, नास्तिक, शालीन, सभ्य, शरारती और फक्कड़ सभी तरह के लोग रहते हैं। इनमें कवि-लेखक, चित्रकार, कला की अन्य विधाओं से जुड़े लोग, तकनीशियन और प्रोफेशनल्स भी शामिल हैं। पूरे यूरोप में शायद ही ऐसी दूसरी कोई बस्ती होगी। यहां न तो आलीशान इमारतें हैं, न बड़े होटल-रेस्तरां, न चमचमाती सड़कें, न मॉल-बाजार और ना ही एफडीआई वाले बड़े आलीशान रिटेल स्टोर। यूरोपीय परिवेश के चलते इसकी तुलना किसी भारतीय कस्बे से तो नहीं की जा सकती लेकिन यहां मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बड़ी आबादी वाले कस्बे-नुमा अपने गांव जैसी कुछ गलियां भी दिख रही हैं, ऐसी मटमैली गलियां, जिन पर दूब जैसी कोई घास उगी है। कहीं-कहीं चलते वक्त जूते पर धूल भी आ जा रही है। यूरोप के किसी शहर में ऐसी सड़कें-गलियां कहां मिलेंगी! अगल-बगल कुछ दुकानें भी हैं। अपने गांव के रामप्रसाद तेली के परचून की दुकान जैसा जनरल स्टोर, जहां लेमनचूस से लेकर दारू तक सबकुछ मिल जाता था। बचपन का वह दृश्य आज भी याद है, रामप्रसाद की दुकान के सामने संतरा (स्थानीय शराब की एक किस्म, जिसमें संतरे की खुशबू के साथ महुए का इस्तेमाल किया जाता है) लेने वालों की भीड़ लगी रहती थी। एक तरफ परचून का सामान बिकता था, जहां रामप्रसाद की पत्नी या घर के अन्य सदस्य बैठा करते थे और संतरे की बोतलों से सजी आलमारी के पास बिछी एक चौकी पर स्वयं रामप्रसाद बैठते थे। क्रिस्टिनिया के इस जनरल स्टोर के सामने खड़ा होते ही यूरोप में मुझे किसी भारतीय कस्बे की ऐसी दुकानें याद आईं। लेकिन और सारी चीजें यहां बिल्कुल अलग हैं। स्टोर करीने से सजे हैं, खाने-पीने की ढेर सारी चीजों से भरे हुए। इनमें किसी तरह की मिलावट नहीं है। फलों-सब्जियों, सलाद की सामग्री, पनीर-चीज़, दूध-दही या कोई भी खाद्य-पदार्थ खरीदते समय यहां किसी को उसकी शुद्धता के बारे में नहीं सोचना पड़ता। दुकान पर आने वाले या यहां से सामान लेकर लौटने वाले नौजवान, अधेड़ और बच्चे, सभी चहकते नजर आ रहे हैं। कोई तनाव में नहीं नजर आ रहा है।

यहां से हम कुछ और अंदर दाखिल होते हैं। अंदरुनी परिवेश और मोहक है। बस्ती के बीच बहती साफ-सुंदर झील, एक सिनेमा हाल, हस्तकला के सामानों से भरी आकर्षक दुकानें, साठ-सत्तर लोगों को एक साथ बैठने की जगह वाले खास किस्म के ओपेन-एयर रेस्तरां, बिल्कुल चंडीगढ़-अमृतसर सड़क मार्ग के बड़े ढाबों की तरह। लेकिन सर्दियों में ये अपने मेहमानों के बचाव के लिए अलग से बेहतरीन व्यवस्था करते हैं। एक और अंतर है यहां, हर तरह के यूरोपीय खाने के अलावा पीने के लिए अच्छी वाइन, बियर और सॉफ्ट डिंक भी इनमें उपलब्ध हैं। बगल की सड़क पर दुकानों के समानांतर फुटपाथी दुकानें। सॉफ्ट डिंक के साथ गांजा, हशीश और न जाने किस-किस तरह के मादक द्रव्यों की धंधेबाजी। यहां मुझे अपने बनारस की याद आ रही है। घाटों के पास के मुहल्लों में कुछ ऐसा ही दृश्य होता है। बनारस और क्रिस्टिनिया में वाकई एक समानता है। दोनों अलमस्त हिप्पियों के पसंदीदा अड्डे रहे हैं। दोनों जगह घाटों के आसपास अलग अंदाज और मस्त मिजाज वाले अमीर और सर्वहारा एक जैसी हालत में मिल सकते हैं।
क्रिस्टिनिया की एक झलक
सत्रहवीं सदी की शुरुआत में डेनमार्क के राजा क्रिस्टियन-चतुर्थ ने हार्बर के तौर पर इस इलाके को विकसित किया था। स्वीडेन के हमलों के दौरान यह इलाका डैनिश नौसेना की तैनाती का सबसे बड़ा अड्डा था। शहर के इस बाहरी इलाके में रायल डैनिश नैवल म्युजियम, नार्थ एटलांटिक हाउस और डैनिश आर्चिटेक्चर सेंटर जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। ऐतिहासिक महत्व के पुराने इलाके में क्रिस्टिनिया एक नया बंदोबस्त है। यहां सब कुछ अचानक हुआ। ठीक वैसे ही जैसे अपने देश के किसी महानगर में बाहर से आए गरीब लोग खाली जगह देखकर अपनी झुग्गियां और फिर खपरैल डाल लेते हैं। थोड़ा-बहुत सियासी-समर्थन मिल जाए तो वहां पक्के मकान भी खड़े हो जाते हैं और इस तरह नेहरू नगर, इंदिरा पार्क, संजय नगर, राजीव नगर या सोनिया विहार जैसी नई बस्तियां बस जाती हैं। ये लोग रोजी-रोटी की तलाश में महानगर में दाखिल होने वाले लाचार लोग होते हैं। वोट की लालच में चुनावी दलों के स्थानीय नेता इनकी दुनिया बसा देते हैं। पर क्रिस्टिनिया के साथ ऐसा नहीं है। यह काफी कुछ एक ‘कम्यून’ की तरह रहा है। यहां बदहाल-अपढ़ मजदूर नहीं हैं, ज्यादातर पढ़े-लिखे कलाकार या समझदार प्रोफेशनल्स हैं। हाल के दिनों में इसका रूप जरूर बदला है, पहले के मुकाबले थोड़ा व्यावसायिक और मतलबी भी हुआ है। पर यह एक चमत्कार है- कम्यून-नुमा इस इलाके में कलाकार, बुद्धिजीवी, कवि, नशा और कई अलग-अलग तरह के कारोबार में लगे खुराफाती किस्म के लोग, सभी एक साथ रहते हैं। सब एक-दूसरे को जानते-पहचानते हैं और अपने ढंग से जीने के उनके हक का सम्मान करते हैं।

क्रिस्टिनिया में बसने वालों में साधारण लेकिन रचनात्मक लोगों की संख्या अच्छी खासी रही है। यूरोप के इस इलाके में भारत जैसी बदहाली नहीं है, न हमारे यहां जैसी गरीबी है पर किसी न किसी वजह से परेशान और हताश लोग तो हर जगह हैं।---और डेनमार्क इसका अपवाद नहीं है। क्रिस्टिनिया पहले से था पर यहां नए बसाव की कहानी सन 1971-72 के आसपास शुरू होती है। डेनमार्क की सेना द्वारा खाली किए बैरकों और स्थानों पर कोपेनहैगन और अन्य जगहों से आए लोग बसने लगे। इनमें ज्यादातर वे थे, जिनके पास रहने को कायदे के घर नहीं थे या जो अपने-अपने परिवेश से तंग थे और खुली हवा में जीना चाहते थे या फिर जीवन के साथ कुछ नया प्रयोग कर रहे थे। इनमें कुछ लेखक, पत्रकार, कवि, चित्रकार और संवेदनशील कलाकार भी थे। जैकब लुडविग्सेन नामक एक लेखक-पत्रकार ने यहां डेरा जमाया और बाकायदा पत्रिका निकाली। इसका नाम था—‘द मेन पेपर’। स्थानीय लोग बताते हैं कि जैकब ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘फ्री-सिटी क्रिस्टिनिया’ की आधारशिला रखने वालों में वह एक उल्लेखनीय नाम है।  जैकब ने अपने एक संपादकीय लेख में क्रिस्टिनिया को ‘सेना की खाली जगह पर आम लोगों की फतह का मुकाम’ बताया। उसने इसे एक कम्यून के तौर पर देखा और उसी तरह इसे विकसित करने की कोशिश भी की। क्रिस्टिनिया वालों ने बार-बार दोहराया कि यह एक ऐसा अद्वितीय स्वाशासित-स्वसंचालित समाज है, जहां रहने वाले एक-दूसरे की जरुरतों का ध्यान रखते हैं।

हिप्पी-आंदोलन के दौरान फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, स्वीडेन, नार्वे, लक्जमबर्ग, डेनमार्क, अमेरिका, कनाडा, स्वीट्जरलैंड और दुनिया के अनेक मुल्कों के हिप्पी-कवियों-कलाकारों को क्रिस्टिनिया ने आकर्षित किया। वे भी आकर बसने लगे। गांजा, हशीश, चरस और डग का चलन इन्हीं दिनों बढ़ा। इसी तरह की गतिविधियों के चलते अवैध तौर पर बसे क्रिस्टिनिया पर शासन की नजर भी तनने लगी। कई बार इलाके को खाली कराने की कोशिश हुई। लेकिन क्रिस्टिनियाई समाज ने इसका जमकर विरोध किया। उन्हीं दिनों टॉम लुंडेन का लिखा डैनिश गीत—‘यू कैन नाट किल अस’, क्रिस्टिनिया का सामुदायिक-गीत बन गया। जब भी यहां कुछ अच्छा या बुरा हो, किसी राष्टगान की तरह यह गीत गाया जाने लगा। क्रिस्टिनिया ने सिर्फ अपना गीत ही नहीं, अपना झंडा भी बनाया। यह लाल रंग का है, जिसमें पीले रंग के तीन निशान हैं। क्रिस्टिनिया के मुख्य़द्वार पर यह हमेशा लहराता रहता है।
कोपनहेगन में नदी किनारे बसे होटल
क्रिस्टिनिया को खाली कराने की सबसे जोरदार कोशिश सन 2007 में हुई, जब डैनिश पुलिस के समर्थन से कोपेनहैगेन के नगर-प्रशासन का विशेष दस्ता यहां जमीन खाली कराने के लिए आ धमका। लेकिन क्रिस्टिनिया वालों ने फिर मुकाबला किया और वे अंततः जीत गए। पुलिस और प्रशासन को पीछे हटना पड़ा। बस्ती के 50 लोगों को पुलिस गिरफ्तार करके ले गई। बाद में छोड़ा गया। इस घटना के बाद शासन की तरफ से क्रिस्टिनिया को फिर ज्यादा नहीं छेड़ा गया। लेकिन क्रिस्टिनिया सिटी फाउंडेशन इसके वजूद को वैधता दिलाने के लिए लगातार सक्रिय रही। हाल ही में इसे बड़ी सफलता मिली है। मौजूदा डैनिश सरकार ने क्रिस्टिनिया के लिए खास नियम बनाकर इसे वैध बंदोबस्त करार देने जा रही है। यहां के 900 लोग इससे बेहद खुश हैं। इन दिनों बस्ती वाले एक नया साप्ताहिक अखबार निकाल रहे हैं--‘वीकली मिरर’।  इसकी 1600 प्रतियां छपती हैं और मुफ्त बंटती हैं।  

येस्पर और उनकी मित्र मे वार्नर के साथ हम क्रिस्टिनिया की सड़क और गलियों से होते हुए एक निर्मल झील से मुखातिब होते हैं। वार्नर एक विजुअल-आर्टिस्ट हैं। झील-किनारे घास के मैदान में पर्यटकों की भीड़ है। झील पर एक पुल है। उसे पार कर हम एक अपेक्षाकृत नीरव इलाके में दाखिल होते हैं। पीले रंग की एक पुरानी सी इमारत के सामने हम रुकते हैं। आवाज देने पर एक अधेड़ उम्र के सज्जन आते हैं और बड़ी गर्मजोशी से हमसे मिलते हैं। यह डैनिश चित्रकार हेनरी शूट्ज हैं। किसी आम कस्बाई-हिन्दुस्तानी की तरह वह हमें अपने घर के अंदर ले जाते हैं। यूरोप में ऐसा आम नहीं है। आमतौर पर यूरोपीय लोग अपने घर पर अपरिचित लोगों से मिलना-जुलना नहीं पसंद करते। इसके लिए किसी होटल, रेस्तरॉं, माल या क्लब जैसी जगह तय की जाती है। पर हेनरी बेहद सरल और अनौपचारिक हैं। यह घर क्या, चित्र-दीर्घा या कोई कला-संग्रहालय लग रहा है। नीचे एक बड़ा कमरा, जिसे डाइंगरूम कहा जा सकता है, फिर बेड रूम और बगल में किचन, टायलेट और फिर एक बरामदा। बड़े कमरे से ही ऊपर जाने का जीना। ऊपर सिर्फ एक बड़ा कमरा, जिसमें साठ-सत्तर पेंटिग, कुछ व्यवस्थित तो कुछ बेतरतीब ढंग से रखी हुई हैं। मदुरै के मीनाक्षी मंदिर और चेन्नई की मजदूर औरतों पर केंद्रित अपनी दो कलाकृतियों को दिखाते हुए वह कहते हैं, ’मेरे पास भारत-दौरे की गहरी स्मृतियां हैं। मेरी इन पेंटिग्स में वो छन-छन कर उतरती रहती हैं।’ फिर हम नीचे उतरते हैं। डाइनिंग टेबुल नुमा एक बड़ी मेज पर एक प्लेट में खरबूज के टुक़ड़े काटकर रखे हैं। बेहद मीठे हैं। तीस-चालीस साल पहले अपने गांव में खाए खरबूजों की तरह।

हेनरी के घर के सामने घास का मैदान है और फिर झील शुरू हो जाती है। आगे कहीं दूर जाकर यह बाल्टिक सागर में मिलती होगी। हेनरी हमें आसपास का इलाका दिखाते हैं। ‘आप यहां कब से हैं?  मुस्कराते हुए कहते हैं. ’सदियों से’। फिर हम दोंनों ठहाका मारकर हंस पड़ते हैं। आसपास की पुरानी इमारतों, झील और घास का मैदान दिखाते हुए वह कहते हैं, ‘मेरी कला को यहां से जमीन मिली है। मेरे लिए यह सिर्फ एक पता भर नहीं है, मेरी जान है यह---क्रिस्टिनिया, मेरी जान!’
क्रिस्टिनिया का एक विहंगम दृश्य
हेनरी से विदा लेकर हम क्रिस्टिनिया के मुख्य चौराहे की तरफ लौट रहे हैं। सामने के एक मकान की छत से नीचे फर्श तक एक बड़ा सा पेंटिग-पोस्टर लटका है। मैंने पूछा-‘क्या यह किसी पेंटर का घर है?’  येस्पर की मित्र वार्नर यहां सबको जानती हैं। क्रिस्टिनिया के दौरे में वह हम लोगों के साथ-साथ चल रही हैं। मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए वह बताती हैं, ‘अपने घरों को सजाने का यह एक तरीका है। कोई जरूरी नहीं कि इस घर में कोई पेंटर रहता हो और यह उसी की पेंटिगं हो।‘

क्रिस्टिनिया के एक अन्य कलाकार ओले ल्यूके पिछले 30 सालों से यहां हैं। वह बताते हैं कि कलाकारों और साधारण लोगों ने कैसे क्रिस्टिनिय़ा को बचाया है! वह बड़े गर्व से बताते हैं कि डेनमार्क के एक बड़े चित्रकार विलियम स्काटो ओलान भी क्रिस्टिनिया में ही रहते थे। अब वह नहीं हैं, उनका निधन हो गया। ओले कहते हैं, ‘कोपेनहैगन प्रशासन की चली होती और यहां के लोगों ने प्रतिरोध न किया होता तो क्रिस्टिनिया कब का खत्म हो चुका होता।‘ बस्ती की अंदरुनी प्रशासनिक व्यवस्था से ओले लंबे समय तक जुडे रहे हैं। वह बताते हैं कि इस बस्ती का अंदरुनी प्रशासन क्रिस्टिनिया फाउंडेशन नामक एक संस्था देख रही है। यही संस्था सरकार या शासन से जटिल मसलों पर वार्ता करती है। यहां के बाशिदों से चंदा लेकर यही संस्था कोपेनहैगेन शासन को हर साल 6 मिलियन डैनिश मुद्रा का टैक्स जमा कराती है।

हम क्रिस्टिनिया के हर कोने से गुजरना चाहते हैं ताकि उसका कोई रंग हमारी नजर से छूटा न रहे। इस बीच, एक प्रस्ताव आता है—क्रिस्टिनिया की वाइन जरूर पीना है। येस्पर हमें दुकान तक ले जाते हैं। सिनेमा हाल के सामने है यह दुकान। वाइन यहां अपेक्षाकृत सस्ती है। हमने अपनी-अपनी बोतल बैग में डाल ली है। गाड़ी में चलते हुए पिएंगे। फिलहाल, हम क्रिस्टिनिया की उस बदनाम गली(अपेक्षाकृत पतली सड़क है) में दाखिल हो रहे हैं, जहां हर तरह के नशे की सामग्री आसानी से मिल जाती है। येस्पर ने पहले ही बता दिया है कि इस सड़क पर किसी भी वक्त कोई फोटो नहीं लेना है। इस गली के नशा-व्यापार में लगे गिरोह की तरफ से फोटो लेने पर प्रतिबंध है। इसका उल्लंघन करने वालों या अनजाने में फोटो खींचने वालों पर कई बार हिंसक-हमले हो चुके हैं। इस गली को लेकर हमें इस कदर डरा दिया गया है कि फोटो लेने की बात तो दूर रही, हम यहां चहलकदमी करते वक्त इधर-उधर ज्यादा नजर भी नहीं मार रहे हैं। पर यहां की एक खास चीज ने हमें जरूर आकर्षित किया---शाकाहारी रेस्तरां-सह स्टोर। यहां चारों तरह फल-फूल, जूस, सब्जियां और शाकाहारी ब्रेड-चाकलेट्स आदि सजे हुए हैं। हमारे पास वक्त कम है, वरना यहां रूककर कुछ खाने का मन था। बहरहाल, रुके बगैर हम आगे बढ़ जाते हैं।
अब हम क्रिस्टिनिया के मुख्य इलाके से बाहर की तरफ निकल रहे हैं। इसके कैम्पस से बाहर निकलने के पहले हमारी मुलाकात क्यू-एस्मेडियन नामक फैक्टरी चलाने वाली यहां की दो युवतियों से होती है। इनके नाम हैं-ड़ोटे एलनबर्गर और गिट्टे क्रिस्टेंसन। दरअसल, तीन औरतें मिलकर इस फैक्टरी नुमा स्टोर को चलाती हैं, जिनमें दो पार्टनर आज मौजूद हैं, एक पार्टनर कहीं गई हुई है। ये पार्टनर सिर्फ बिजनेस-वुमेन नहीं हैं, अपनी फैक्टरी की इंजीनियर-मिस्त्री-मजदूर, सब यही हैं। सहयोगी के तौर पर दो-तीन और लोग फैक्टरी में दिख रहे हैं। एक प्यारा-शालीन सा कुत्ता भी फैक्टरी की फर्श पर लेटा हुआ है, जो किसी के यहां आने-जाने पर भोंकता नहीं दिखा। यहां से विदा लेते समय अपनी दो मालकिनों के साथ वह  भी हमें छोड़ने फैक्टरी-सह-विक्रय केंद्र के दरवाजे तक आता है। क्रिस्टिनिया को सलाम करते हुए हम इसिनोर स्थित रोनबर्ग यानी ‘कैसेल आफ हैमलेट’ देखने बाल्टिक के आखिरी छोर की तरफ निकल पड़ते हैं। यह डेनमार्क-स्वीडेन सरहद पर है। कैसेल से महज तीन-चार कि.मी. बाद उस पार स्वीडेन शुरू हो जाता है। किंग फ्रेडरिक—द्वितीय ने इसे सन 1574-85 के दौरान बनवाया। बाल्टिक से डेनमार्क होकर स्वीडेन या किसी भी और देश की तरफ जाने वाले जलपोतों के लिए इस किले में टैक्स देना उन दिनों अनिवार्य था। कहते हैं कि विलियम शेक्सपियर को भी इस कैसेल की जानकारी थी। सत्रहवीं शताब्दी के शुरुआती दिनों में जब वह महान त्रासदी की रचना कर रहा था तो हैमलेट के लिए उसे यह कैसेल खूब जंचा। थिएटर की दुनिया में हैमलेट के छा जाने के बाद पूरे यूरोप और फिऱ शेष दुनिया के लिए यह भव्य किला ‘हैमलेट कैसेल’ के नाम से विख्यात हो गया। भव्य किले के बुर्ज के ठीक नीचे विशाल समतल मैदान है। इसमें पुराने जमाने की दर्जन भर से ज्यादा तोपें लगी हैं, सबके मुंह बाल्टिक की तरफ हैं। शायद, ये डेनमार्क और स्वीडेन के बीच पुराने जमाने में लड़ी गईं कई-कई लड़ाइयों की निशानियां हैं। लेकिन अब इन देशों के आपसी रिश्ते कितने सामान्य हैं, इसका संकेत इनके साझा वीजा-सिस्टम से भी मिलता है।  

बाल्टिक के दूसरे छोर पर स्वीडेन की छोटी-बड़ी नौकाएं, कुछ पोत और कस्वाई इलाके दिखाई दे रहे हैं। सूरज ढलने को है। हम यहां से सिर्फ अंदाज ही लगा सकते हैं, क्रिस्टिनिया में  इस वक्त बत्तियां जल चुकी होंगी, झील-किनारे घास के मैदान में धूप सेकते लोग अब अपने घरों या बाजार की तरफ लौट रहे होंगे और फ्री-सिटी के ओपेन-एयर रेस्तरां मेहमानों से भर गए होंगे। उम्दा स्थानीय वाइन और डैनिश संगीत माहौल को नशीला बना रहे होंगे। क्रिस्टिनिया को याद करते हुए हमने भी बाल्टिक किनारे अपने बैग से वहां की खास वाइन निकाली। सूरज दूर-बहुत-दूर बाल्टिक की लहरों में कहीं खो चुका था। (साप्ताहिक ‘शुक्रवार’, नई दिल्ली, अक्तूबर, 2012 में प्रकाशित)

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