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12 अक्टूबर 2017

प्रो. विवेक कुमार ने सफ़ेद झूठ बोला है, वे संघ के कार्यक्रम में युवाओं में देशप्रेम जगाने गए थे!

दिलीप ख़ान
पहले एक तस्वीर आई। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार ने फेसबुक पर लिखा, “मेरी फोटो शेअर करने वाले ने यह क्यों नही बताया की प्र. विवेक कुमार किस विषय पर भाषण दे रहे थे और इस कार्यक्रम का शीर्षक क्या था. ना ही सामने बैठे श्रोताओं को दिखाया ? ना ही यह बताया इसी संगठन के एक विंग ने ग्वालियर में मेरे उपर हमला करवाया था. केवल फोटो शेयर करके लोगो को गुमराह न करे…आज मुझे अहसास हो रहा है की मै बहुत बड़ी परसोनालिटी बन गया हूँ…क्योंकि बहुत बड़े बड़े लोग इस फोटो को शेयर कर रहे है. मुझे आशा है की मेरा समाज मेरी आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता एवं सत्य-निष्ठा को अवश्य समझेगा..प्रो. विवेक कुमार.”



फिर दूसरी फोटो आई, जिसमें श्रोता दिख रहे थे। फिर तीसरी आई जिसमें विवेक कुमार चंद लोगों के साथ मंच पर बैठे गप लड़ाते दिख रहे हैं।



विवेक कुमार ने पहले पहली तस्वीर को झूठा कहा, फिर सारी तस्वीरों को। इस प्रकरण पर मैंने फ़ेसबुक पर जब लिखा तो कई लोगों ने कहा कि विवेक कुमार फोटो को नकली बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे उस कार्यक्रम में गए ही नहीं। बीते कुछ साल से दक्षिणवर्ती दुनिया द्वारा स्थापित फोटोशॉप के भयंकर दौर में पहली नज़र में मुझे कुछ भी मुमकिन नज़र आता है। मैंने पोस्ट डिलीट कर दी। लेकिन इसी दौर ने हमें यह भी सिखाया है कि हम अपने सीमित ज्ञान के बूते असली फोटो और फोटोशॉप्ड फोटो में अंतर पहचान जाएं! मुझे एक भी तस्वीर फोटोशॉप्ड नहीं लगी। अलबत्ता, विवेक कुमार के दावे को गंभीरता से लेते हुए यह ज़रूर लगा कि प्रामाणिक जानकारी के साथ इस पर लिखा जाना चाहिए क्योंकि जिस व्यक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है वह ऐसे किसी कार्यक्रम के होने की दावेदारी को ही नकार रहा था/है।



तस्वीर में मौजूद जिस एक व्यक्ति को मैं निजी-सार्वजनिक तौर पर जानता हूं वह व्यक्ति अगर समूचे कार्यक्रम और वहां अपनी भागीदारी को झुठला रहा हो तो कोई वजह नहीं बनती थी कि विवेक कुमार की बातों को न माना जाए। लेकिन बातों को मानने के दौरान आंखों में पानी का छींटा मारकर थोड़ा चौकन्ना हुआ तो विवेक कुमार की तरफ़ से परस्पर विरोधी दावों का मैंने पता लगाना शुरू किया। शुरुआत में कार्यक्रम के बारे में जो जानकारियां हाथ लगीं वो हैं-

स्थान- संजय वन, भारतीय जनसंचार संस्थान के बगल में 

तारीख़-  8 अक्टूबर 2017

टाइम-  सुबह के 8-9 बजे

आयोजक- RSS का आरके पुरम खंड

ये सब आसानी से पता चल गया लेकिन विवेक कुमार और उनके तरफ़दार ‘कार्यक्रम का विषय’ पूछते रहे। संघ के कई लोगों से मैंने पता किया। कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों से भी मैंने जानना चाहा कि विवेक कुमार ने क्या बोला? आम तौर पर चकल्लस में रहने वाले 12वीं से ऊपर के संघपरस्त छात्रों का ध्यान बहुत ज़्यादा भाषणों पर नहीं टिकता और तब तो और भी नहीं जब भाषण पार्क में हो। सो, एक ने बताया कि विवेक सर ने अपने जीवन संघर्षों और उपलब्धियों पर भाषण दिया।

यह संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं था। 12वीं से ऊपर के छात्रों के लिए आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में विवेक कुमार के सिर्फ़ जीवन संघर्षों और उपलब्धियों को सुनने के लिए संघ क्यों उन्हें न्यौता देगा? फिर संघ के कुछ और लोगों से बात हुई और अंत में संघ के राजीव तुली से। राजीव तुली से पता चला कि राष्ट्रनिर्माण में युवा की भादीदारी और उनके भीतर देशप्रेम जगाने जैसे किसी मुद्दे पर विवेक कुमार ने भाषण दिया, जिसमें प्रसंगवश उन्होंने अपने जीवन के भी कुछ किस्से भी सुनाए।



मंच पर हरे रंग के कुर्ते में जो सज्जन बैठे हैं उनका नाम जतिन है, जिन्हें संघ के लोग पारंपरिक तरीके से जतिन जी कहते हैं। वे दिल्ली RSS के सह प्रांत प्रचारक हैं। जिस फोटो में विवेक कुमार कुछ लोगों के साथ बैठकर गप मार रहे हैं उनमें बैठा एक व्यक्ति जेएनयू में ही कंप्यूटर साइंस जैसा कुछ पढ़ाते हैं।

संघ के लोगों से जब मैंने इस बाबत जानकारी चाही तो उनमें से एक ने इस बात पर हैरानी जताई कि विवेक कुमार इस बात से कैसे मुकर सकते हैं कि वे कार्यक्रम में शरीक हुए। राजीव तुली ने कहा विवेक जी को ऐसा नहीं करना चाहिए। वे गए थे और उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐसा स्वीकार करना चाहिए। हालांकि राजीव तुली ने इस मामले को तूल देने की कोशिश करने वाले हम जैसे लोगों की सहिष्णुता पर भी सवाल उठाए कि विवेक कुमार अगर संघ के कार्यक्रम में चले गए तो बाक़ी लोग इसमें क्यों इतना उतावलापन भरी रुचि दिखा रहे हैं।

संघ का मानना है कि वह हर विचारधारा के लोगों को बुलाने के लिए मंच मुहैया कराने की कोशिश में जुटा है। ज़ाहिर है कि संघ का मंच इस मायने में विलग विचारधारा के लोगों के लिए बेहद सुरक्षित और मुफ़ीद है क्योंकि दूसरे मंच से अगर यही लोग बोलने जाते हैं तो संघ के लोग उन पर हमला तक कर बैठते हैं। विवेक कुमार जब ग्वालियर गए थे तो ABVP के लोगों ने उन पर हमला किया था। TISS प्रशासन ने आख़िरी मौक़े पर कार्यक्रम रद्द कर दिया था या फिर विवेक कुमार को आने से मना कर दिया था।

RSS रह-रह कर इन दिनों आंबेडकर को को-ऑप्ट करने की कोशिश में जुटा है। बहुत मुश्किल काम ले लिया है RSS ने। उससे न तो आंबेडकर पकड़ा जा रहा है और न छोड़ा। इसलिए हो सकता है वो आंबेडकर पर बिल्कुल अपनी लाइन से उलट वालों को भी बुलाकर लोगों को लामबंद कर रहे हों। मज़दूरों-किसानों-दलितों का विंग तो पहले से ही मौजूद है। इनमें वो कई बार जेनुइन मुद्दे उठाकर फिर उसकी भोंडी व्याख्या कर नकली और अश्लील चेतना का विकास करते हैं, जो लोगों के वर्गीय-जातीय हितों के उलट होता है।

संघ और विवेक कुमार दोनों का पक्ष सुनने के बाद मुझे अब सच में यक़ीन हो गया है कि दुनिया बेहद लोकतांत्रिक हो गई है और भारतीय समाज लोकतंत्र की पराकाष्ठा को छू चुका है। जाहिर तौर पर संघ की पताका लोकतंत्र के टीले पर उदार विचारधारा के सबसे बड़े नुमाइंदे के तौर पर अपना नाम दर्ज़ करा रही है। विवेक कुमार भी बेहद लोकतांत्रिक हो चुके हैं कि उन्हें बाएं-दाएं-ऊपर-नीचे हर मंच पर ‘अपनी बात’ रखने में कोई परेशानी नहीं होती। कथ्य और विषयवस्तु ही अहम है, मंच गौण। कथ्य नाम के आदर्शवादी शब्द ने मंच नाम के भौतिकवादी शब्द पर जीत हासिल कर ली है। विवेक कुमार इतने लोकतांत्रिक हो गए हैं कि हमलावर (पूरे दलित समुदाय पर हमलावर) के मंच पर जाने में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। हो सकता है कि वे सच में इतने ही लोकतांत्रिक हों, लेकिन उनके इस ‘जाने’ को RSS ख़ुद के लोकतांत्रिक होने की दावेदारी और चिह्न को मज़बूती से पेश करने की कोशिश कर रहा है। किसका फ़ायदा हुआ?

दिलचस्प यह है कि विवेक कुमार की फोटो इंटरनेट पर सबसे पहले संघ के लोगों ने शेयर की क्योंकि कार्यक्रम में शरीक श्रोतागण उसी खित्ते के थे। या तो हम इस शेयर करने को सामान्य तौर पर फेसबुकिया परिघटना के दायरे में अनिवार्यत: ‘एटैंडिंग ए प्रोग्राम विद मुन्ना एंड 48 अदर्स’ नामक ललक का नतीजा मान लें, या फिर इसे ‘लीक’ मान लें। लीक करने से संघ का कोई नुकसान नहीं है। नुकसान विवेक कुमार और संघविरोधी खित्ते में हैं, जिसमें लोग विवेक कुमार से सवाल पूछेंगे, उनकी राजनीति पर सवाल पूछेंगे, इसी बहाने दलित आंदोलन और आंबेडकरवाद पर सवाल उठेगा, लेफ़्ट के लोग चपेट में आएंगे कि संघ के मंच पर किसी के पहुंच भर जाने से वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठता है? संघ का तो सब कुछ बम-बम है। आप देखिए न कि विवेक कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में भी फोटो शेयर करने वाले ग़ैर-संघी लोगों को ही निशाना बनाया है।

अगर विवेक कुमार गए, तो उन्हें मान लेना चाहिए था। झूठ बोलना अच्छी बात नहीं है। ख़ासकर तब, जब आप शिक्षक हों। झूठ क्यों बोले? इसका मतलब आप मानते हैं कि वहां जाना ‘ठीक’ नहीं था। यानी आप ख़ुद संघ के मंच पर जाने को ‘ग़लत’ मानते हैं और जब ख़ुद वहां चले गए और लगा कि एक वैचारिक ज़मीन पर रहने वाले लोग आपसे पूछेंगे तो आपने झूठ बोलना शुरू कर दिया। कम्यूनिकेशन और साइकोलॉजी में इसे ‘कॉग्निटिव डिजोनेंस’ कहते हैं, जिसमें लोग वो करते हैं जिसे वो करना ठीक नहीं समझते। और जब वो कर लेते हैं तो उसे ढंकने के लिए ऐसा तर्क गढ़ने की कोशिश करते हैं जिससे उनका कृत्य छुप जाए। लेकिन इस मामले में विवेक कुमार ने ढंकने के लिए तर्क के बजाय झूठ का सहारा लिया। इससे फौरी तौर पर उनका वहां जाना कई लोगों को काल्पनिक लगा, लेकिन जब सच्चाई सामने आ ही गई है तो उनके चरित्र में झूठ नाम की अतिरिक्‍त चीज़ भी जुड़ गई। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमें दुख हुआ है और दुखी होने के चलते ही यह सब लिखा। उम्मीदों का क्या है, पता नहीं किस गली में टूट जाए। जो लोग उम्मीद बचा लेते हैं, उन्हें बचा लेनी चाहिए। 

बाक़ी संघ का क्या है। कई आंदोलनों और आंदोलनकारियों को अपने कार्यक्रम में बुला-बुलाकर सम्मानित कर-कर के पूरी लीगेसी को शून्य कर देने की उसकी पुरानी ट्रेनिंग है। लोग बताते हैं कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उत्‍तराखण्‍ड क्रांति दल के ज़्यादातर लोगों को संघ गांव-कस्बों में किसी भी कार्यक्रम में बुलाकर फूल-माला पहना देता था। उन्हें अच्छा लगता था कि कोई तो पूछ रहा है। फिर, धीरे-धीरे और अच्छा लगने लगा। जब उससे भी और अच्छा लगा तो फूल-माला की उन्हें आदत पड़ गई और फिर संघ ने बाहें फैलाकर कहा कि आओ, समाहित हो जाओ। फिर आधे समाहित हो गए और जो बचे, उनमें से ज़्यादातर कब दाएं मुड़ेंगे और कब बाएं और कब बीच में खड़े रहेंगे, कोई नहीं जानता।

08 अप्रैल 2017

लोकतंत्र की नाकामी से उपजता उन्माद



अब तक भेदभाव खत्म हो जाने थे. धर्म और रेस के आधार पर हत्याएं बंद हो जानी थी. तीन सौ बरस से भी पहले दुनिया में आए लोकतंत्र की प्रेक्टिस को इतना तो करना ही था. पर हत्याएं बढ़ गई हैं और नफरत कई गुना ज्यादा उभर कर सामने आ रही है. यह सिर्फ हमारे अपने देश की हालात नहीं हैं, यह पूरी दुनिया में हो रहा है. अमेरिका में भी जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबसे पहली भागीदारी हुई थी वहां भी लोग इसी तरह की नफरत दिखा रहे हैं. इतने लम्बे वक्त के बाद इस तरह की घटनाओं का होना कहीं न कहीं उस नाकामयाबी को दिखा रहा है जो लोकतंत्र से मिलनी थी. जिन मूल्यों के साथ लोकतंत्र आया था वह घटता जा रहा है. सबके लिए सब बराबर नहीं हो पा रहा. हमें तलाशी लेनी चाहिए. अपने देश के राजनीतिक विकास की, दुनिया के राजनीतिक विकास की. शायद पूरे लोकतंत्र के प्रणाली की ही तलाशी लेनी चाहिए. हमे यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों समता, समानता और बंधुत्व दुनिया में कमजोर पड़ रहा है.  

अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं. पर समग्रता में देखें तो लोगों में असहिष्णुता सब जगह बढ़ी है. हाल ही में ट्रंप सरकार आने के बाद अमेरिका में नस्लीय हमले बढ़े हैं. गैर-अमेरिकियों में एक असुरक्षाबोध पैदा हुआ है. जो एक मॉडर्न राष्ट्र के रूप में देखा जाता है और जहां लोग बेहतर जीवन और नौकरियों के लिए जाते रहे हैं रेस आधारित हिंसा और घटनाओं ने वहां लोगों में भय पैदा कर दिया है. ट्रंप जब चुनाव लड़ रहे थे तो उनके चुनावी अभियान में भी यह विभेद उनके भाषणों के तहत देखने में आ रहा था. अमेरिकी और गैर-अमेरिकी को मुद्दा बनाया जा रहा था. शायद वहां के लोगों ने इसे स्वीकार किया और उन्हें अपना मत दिया. जीतने के बाद जिसका प्रतिफल हम देख रहे हैं. लोगों के द्वारा इस तरह की नफरत को स्वीकार किया जाना ही इस बात को दिखाता है कि संरचना के तौर पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का होना और लोगों में लोकतंत्र के मूल्य का स्थापित हो पाना दोनों अलग-अलग चीजें हो गई हैं. लोगों में वे लोकतांत्रिक मूल्य नहीं निर्मित हो पा रहे हैं जो रेस, जाति, धर्म को बराबरी से देख सकें. सबके साथ समानता का बर्ताव कर सकें.  

अमेरिका में जब दिन्दुस्तानियों पर हमला होता है तो हिन्दुस्तानियों के लिए यह शोक और दुख की बात होती है. उन्हें लगता है कि यह ग़लत हुआ. पर जब हिन्दुस्तान में नाइजिरिया और साउथ अफ्रीकन देशों के लोगों पर हमले होते हैं तो वे इन घटनाओं को ठीक वैसे नहीं देख पाते जैसे कि अमेरिका में गैर-अमेरिकी पर हुए हमले को देखते हैं. महाराष्ट्र में मनसे और शिवसेना बिहारियों के नाम पर उत्तर भारतीयों पर हमले करती रही है. मद्रासी कह के दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाया जाता रहा है. नेपाली के नाम पर नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को प्रताड़ित किया जाता रहा है. मुसलमानों को तो पूरी दुनिया में अलग-अलग तरह से हमले किए जा रहे हैं. उनके कई मुल्कों को तबाह कर दिया गया. इन सारे हमलों को हम अलग-अलग देशों और अलग-अलग संदर्भों के साथ देख सकते हैं. जबकि हम इसके मूल में जाएंगे तो एक ही कारण समझ में आएगा. बदले हुए अर्थतंत्र ने जो असुरक्षा पैदा की है उस असुरक्षा ने लोगों को उन्मादी बना दिया है. उसी असुरक्षा ने मुल्क की सरकारों को भी उन्मादी बना दिया है. बड़े मुल्क छोटे मुल्कों पर हमले कर रहे हैं और स्थानीय और ताकतवर लोग गैर-स्थानीय और कम ताकतवर पर हमले कर रहे हैं. यह बड़े पैमाने से लेकर छोटे पैमाने पर हितों की लड़ाई है.  

इन हमलों की वजह कई बार बहुत साफ तौर पर दिखती है. कई बार ये हमले बहुत अपरोक्ष होते हैं. कारण कोई और गिनाया जाता है लेकिन उसके पीछे की वजह कोई और ही होती है. इसे हमे समझने की कोशिश करनी चाहिए. पूरे दुनिया के स्तर पर अर्थव्यावस्था इस तरह से गड़बड़ हुई है कि राज्य अपने लोगों को रोजगार देने की स्थिति में नहीं है. दो करोड़ प्रति वर्ष नौकरियों का दावा करने के बाद भी हमारी केन्द्र सरकार कुछ हजार नौकरियां देने में भी असफल रही है. तकनीकी विकास ने कई प्राइवेट संस्थानों व अन्य संस्थाओं में भी नौकरियां कम कर दी हैं. ऐसे में लोग बेरोजगार और बेहाल स्थिति में हैं. कम से कम लोगों द्वारा ज्यादा से ज्यादा काम कराना ही इस मुनाफे की व्यवस्था के लिए लाभकारी है. यह वित्तिय व्यवस्था जितना ज्यादा और बढ़ेगी बड़ी पूजी और कम लोगों के हाथों में सिमटती जाएगी. रोजगार और कम होते जाएंगे. पूजी का डिस्ट्रीब्यूशन भी और कम होता जाएगा.

इस बेहाली के लिए राजनैतिक पार्टियां अलग-अलग तरह के वायदे लेकर आती हैं पर उनके लिए बेरोजगारी को दूर करना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में वे बेरोजगारी की वजहों को बदल देती हैं और लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करती हैं. वे यह बताने के बजाय कि राज्य अपनी नीतियों के कारण रोजगार देने में असफल हो रहा है यह बताती हैं कि स्थानीय की नौकरियां गैर-स्थानीय के हाथों में जा रही हैं. इस तरह से स्थानीय और गैर-स्थानीय के बीच एक नफरत को पैदा किया जाता है. सरकार खुद हमले न करके लोगों के भीतर इस तरह का भाव पैदा करती है कि वे ख़तरनाक हो जाते हैं. उन्हें उनका हित जाता हुआ दिखता है. वे सरकार की नीतियों पर सोचने के बजाय दूसरों के लिए नफरत की रणनीतियां तैयार करने लगते हैं. वे उन्मादी हो जाते हैं.
भारत के संदर्भ में यदि हम देखें तो जो उन्माद दिख रहा है वह सिर्फ भाजपा के सत्ता में आने का उन्माद नहीं है. कांग्रेस के वक्त भी वे उन्मादी थे. बस यह उन्माद थोड़ा और बढ़ गया है. अमेरिका से लेकर नोएडा तक और दादरी से लेकर बाबरी तक जो लकीर खींची जा रही है. वह हमारे इतिहास के पन्नों से कई लाइने काट रही है. वह लोकतंत्र और संविधान की लाइन को भी काट रही है जिसके तहत हमे धर्मनिर्पेक्षता और बंधुत्व का एक मूल्य मिला हुआ है. अमरीका में भारतीय महफूज नहीं हैं. यह हमे अपने मुल्क में रहते हुए दिखता है. जबकि अमेरिका से कई देश महफूज नहीं हैं. क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था को बनाना और उसे टिकाए रखने के लिए जरूरी हो गया है कि किसी न किसी तरीके से गैर मुल्कों पर कब्जेदारी बनी रहे. वहां के संसाधनों को अपने लिए उपयोग किया जा सके.

लोकतंत्र और उसके बाद ग्लोबलाइजेशन का यह परिणाम तो नहीं सोचा गया था कि अमेरिका में गैर अमरीकी मारा जाएगा. अस्ट्रेलिया में भारतीय मारा जाएगा. और भारत में नाइजीरियन और साउथ अफ्रीकन मारा जाएगा. यह सब कबीलाई समाजों के इतिहास सा हो रहा है. जो अपने कबीले में दूसरे कबीले को नहीं घुसने देते थे. पर फिर से हमारे समाजों में हत्या और नफरत के जो आधार बन रहे हैं वे ऐसा समाज बना रहे हैं जहां ग्लोबलाइजेशन भी है और कबीले का पुरानापन भी है.

26 मार्च 2015

युद्ध-क्षेत्र में आदिवासी जिंदगियाँ : बीजापुर के गावों में सुरक्षा कैंप के बीच असुरक्षित जीवन

26 से 31 दिसंबर 2014 के बीच पी.यू.डी.आर. का एक जांच दल छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के 9 गावों में गया | जांच दल ने इन क्षेत्रों में माओवादियों से लड़ने के लिए तैनात सुरक्षा बलों के द्वारा की जा रही गिरफ्तारियों, धमकियों, एवं उत्पीड़न के साथ-साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाओं को दर्ज़ किया | मुख्यतः आदिवासी, इन गावों (सार्केगुड़ा, राजपेटा, कोट्टागुड़ा, पुसबाका, तीमापुर, लिंगागिरी, कोरसागुड़ा, बासागुड़ा, कोट्टागुडेम) के निवासियों ने सुरक्षा कैम्पों में रह रहे सशस्त्र बलों द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले अपराधों तथा हिंसक गतिविधियों के तथ्य बयान किये | सुरक्षा बलों द्वारा लगातार इन 'क्षेत्रों में प्रभुत्व' स्थापित करने के प्रयास के दस्तावेज़ीकरण के अलावा, यह रिपोर्ट निम्न बिन्दुओं पर विशेष ध्यान आकर्षित करती है -
1. आबादी की एक बड़ी संख्या के खिलाफ 'स्थाई वारंट' जारी किये गए हैं और इनमें से एक बड़ी संख्या को 'फरार' घोषित कर दिया गया है | एक मोटा आंकलन यह दिखाता है की केवल बीजापुर में ही कम से कम 15 से 35 हज़ार लोग 'स्थाई वारंट' के आतंक और भय के साये में जी रहे हैं |
2. सशस्त्र बल और स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एस.पी.ओ.) बेलगाम तरीके से अवैध बर्ताव करते हैं जैसे की नियमतः आदिवासी ग्रामीणों के घरों पर छापा मारना, पिटाई करना, लूट-पात, हवालात में बंद करना तथा उनको सुरक्षा कैम्पों में 'बेगार' (मुफ्त श्रम) करने के लिए बाध्य करना | यौन-उत्पीड़न के मामले भी सामने आये |
3. एक ओर सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज़ करने की असंभवता और दूसरी ओर जेलों में बंद ग्रामीणों की गिरफ्तारियों की बढ़ती संख्या |
4. कैम्पों में आपूर्ति-प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु सेना द्वारा बढ़ते स्तर पर सड़क-निर्माण कार्यों की वजह से सशस्त्र बलों की उपस्थिति में अधिक्यता | सड़कों को खोलने का काम सशस्त्र बलों द्वारा सड़क उदघाटन अभ्यास के बाद ही किया जाता है और तत्पश्चात सड़क-अवरोधकों तथा चेक पोस्टों पर बार-बार यात्रियों को रोका जाता है | यह रोज़ाना का सिलसिला है |
5. बीजापुर और बासागुड़ा के बीच चलने वाली सार्वजनिक बसों में सशस्त्र बलों के जवानों के होने के कारण ग्रामीणों को यात्रा के दौरान उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है | अंतर्राष्ट्रीय नियमों की घोर अवहेलना करते हुए, सुरक्षा बल जान-बूझकर संभाव्य मुठभेड़ों के खिलाफ यात्रियों को 'मानवीय कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं |
6. आदिवासी ग्रामीणों की जीवन-स्थिति पर कैम्पों ने बहुत बुरा प्रभाव डाला है | कृषि-कार्यों में कमी और परिणामस्वरुप पारिवारिक आय और वेतनों में गिरावट इस उत्पीड़न का निश्चित परिणाम है | ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही वर्तमान स्कूल व्यवस्था (जिसके तेहत स्थानीय ग्रामीण सहायकों की सेवाएं ली जा रही थी) को अब इरादतन 'आश्रम स्कूलों' में बदला जा रहा है और इसका मकसद आदिवासी बच्चों को उनके घरों और ग्रामीण परिवेश से खींच लेना है |
7. वर्तमान परिस्थिति की प्रबलता सलवा जुडूम की गतिविधियों (2005 से 2009 के बीच ग्रामीणों के बेदखली और सामूहिक विस्थापन) से तुलनीय है और उसको आगे बढ़ाती है | वर्तमान परिस्थिति केवल विस्थापन और यतित पुनर्वास की दुर्गति को रेखांकित करती है जिसके तेहत पहले भी ग्रामीणों को गुज़रने के लिए बाध्य किया गया था |
8. माओवादियों द्वारा बारम्बार किये जा रहे बम विस्फोटों तथा सड़कों को निशाना बनाये जाने के बावजूद, ग्रामीण सुरक्षा कैम्पों से डरते हैं क्योंकि वे सशस्त्र बल ही है जो उन्हें प्रताड़ित करते हैं और उनके खिलाफ नृशंस व्यवहार करते हैं |
9. क्रमबद्ध आवधिक जनसंहारों के साथ-साथ इस क्षेत्र में दैनिक उत्पीड़न राज्य द्वारा चलाए जा रहे युद्ध की दोहरी रणनीति का हिस्सा है |
10. वर्तमान सैन्य उपक्रम के पीछे यही मंसूबा है की खनन गतिविधियों को और अधिक बढ़ाने के लिए क्षेत्र को साफ कर दिया जाए | उद्देश्य यह भी है की आदिवासियों की राज्य का विरोध करने की इच्छशक्ति को ख़त्म कर दिया जाये और उन्हें आधिकारिक प्रयासों को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाये|

23 दिसंबर 2014

मृत्यदंड के बारे में: रोबेस्पिया

(मृत्युदंड का विरोध किस तरह आज से ही नहीं बल्कि फ्रांस की क्रांति के समय से ही समाज के जनवादीकरण से जुडा हुआ है. और यह भाषण आज भी किस तरह प्रासंगिक बना हुआ है. यह 22 जून 1791 को महान क्रांतिकारी रोबस्पेरे द्वारा फ़्रांस की संविधान सभा में दिये गए भाषण का हिंदी अनुवाद है.)

एथेंस में जब खबर पहुंची कि अर्गोस नगर के नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया है तो वहां के लोग भाग कर देवालयों में गए और उन्होंने देवताओं को आह्वान किया कि वे एथेंस के लोगों को ऐसे भयानक और क्रूर विचारों से बचाएं. मेरा आह्वान देवताओं से नहीं कानून निर्माताओं से है, उनसे जो देवत्व के शाश्वत नियमों के संचालक और भाष्यकार हैं, कि ऐसे खूनी कानूनों को फ़्रांस की संहिता से मिटा दे जो न्यायिक हत्याओं को निर्देशित करते हैं और जिनको उनकी नैतिकता और नया संविधान ख़ारिज करते हैं. मैं उनके समक्ष साबित करना चाहता हूँ : 1. कि मृत्युदंड सारतः अन्याय है. और 2. कि यह दण्डो में से सबसे दमनकारी नहीं है और यह अपराधों को रोकने से ज्यादा उन्हें संगुणित करता है.

नागरिक समाज के दायरे से बाहर यदि एक कटु शत्रु मेरा जीवन ख़त्म करने की कोशिश करता है, या बीसियों बार धकेलने पर भी मेरे द्वारा उगाई गई फसल को नष्ट करने वापस आ जाता है. तो क्योंकि मेरे पास विरोध के लिए केवल मेरी व्यक्तिगत शक्ति का ही सहारा है इसलिए मुझे उसे अनिवार्यतः नष्ट करना होगा या उसे ख़त्म कर देना होगा और प्राकृतिक रक्षण का नियम मुझे औचित्य और स्वीकृति प्रदान करता है. लेकिन समाज में, जब सभी की शक्ति केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लामबंद है तो न्याय का कौन सा सिद्धांत उसकी हत्या की स्वीकृति दे सकता है? कौन सी अनिवार्यता इसे दोषमुक्त कर सकती है? एक विजेता जो अपने बंदी शत्रु की हत्या करता है बर्बर कहलाता है! एक प्रौढ़ जो किसी बालक को शक्तिहीन कर उसे दंड देने की सामर्थ्य रखता है यदि उसकी हत्या कर दे तो राक्षस समझा जाता है! एक अभियुक्त जिसे समाज द्वारा सजा दी गई है एक पराजित और शक्तिहीन शत्रु के सिवा कुछ भी नहीं है और वह एक प्रौढ़ के सामने बालक से भी ज्यादा असहाय है.

अतः, सत्य और न्याय की नज़र में मौत के ये नज़ारे जिन्हें यह अनुष्ठानपूर्वक आदेशित करता है, कायराना कत्लों के सिवा कुछ भी नहीं है, ये केवल कुछ व्यक्तियों के बजाय समूचे राष्ट्र के द्वारा कानूनी तरीको से किये गये गंभीर अपराध है. कानून चाहे कैसे भी निर्मम और वैभवशाली क्यों न हों, हैरान मत होइए, ये चंद उत्पीड़कों के कारनामों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. ये ऐसी काराएं हैं जिनसे मानव जाति को अधोपतित किया जाता है. ये ऐसी भुजाएं हैं जिनसे उसे पराधीन किया जाता है,
ये कानून खून से लिखे गए हैं. किसी भी रोमन नागरिक को मौत की सजा देना वर्जित था. यह जनता द्वारा बनाया गया कानून था. लेकिन विजयी स्काईला ने कहा : वे सभी जिन्होंने मेरे विरुद्ध अस्त्र उठाये मृत्यु के भागी हैं. ओक्टावियन और अपराध में उसके सहभागियों ने इस नए कानून की पुष्टि की.

तिबेरियस की अधीनता में ब्रूटस की प्रशंसा करना मृत्युयोग्य अपराध था. कालिगुला ने उन सबको मृत्युदंड दिया जिन्होंने भी सम्राट के चित्र के समक्ष नग्न होने की धृष्टता की. एक बार जब आतताई शासकों द्वारा राजद्रोह के अपराध – जो अवज्ञापूर्ण या नायकोचित कृत्य हुआ करते थे – का आविष्कार कर लिया गया तो फिर कौन बिना स्वयं को राजद्रोह का भागी बनाए यह सोचने की हिम्मत कर सकता था कि इनकी सजा मृत्युदंड से थोड़ी कम होनी चाहिए?

अज्ञानता और निरंकुशता के राक्षसी मिलन से पैदा हुए उन्माद ने जब दैवीय राजद्रोह के अपराध का आविष्कार कर लिया, जब इसने अपने मतिभ्रम में स्वयं ईश्वर का प्रतिशोध लेने का बीड़ा उठा लिया, तब क्या यह जरुरी नहीं हो गया था कि यह उन्हें रक्त अर्पित करे, और स्वयं को ईश्वर का ही रूप मानने वाले, उसे दरिन्दे की श्रेणी में पहुंचा दें?

पुरातन बर्बर कायदे के समर्थक कहते है कि मृत्युदंड अनिवार्य है, बिना इसके अपराध पर लगाम लगाना संभव नहीं है. यह आपसे किसने कहा? क्या आपने उन सभी अंकुशों का आकलन कर लिया है जिनके द्वारा दंडविधान मनुष्य की संवेदना पर काम करता है? अफ़सोस, मृत्यु से पहले मनुष्य कितना शारीरिक और नैतिक कष्ट सहन कर सकता है?

जीने की इच्छा उस आत्मसम्मान के सामने नतमस्तक हो जाती है, जो ह्रदय पर शासन करने वाले आवेगों में सबसे प्रबल होता है. एक सामजिक मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक सजा अपमानित होना है, सार्वजनिक निंदा का पात्र बन जाना है. यदि कानून निर्माता नागरिक को इतनी सारी नाजुक जगहों पर चोट पहुंचा सकता है तो उसे मृत्युदंड के इस्तेमाल करने की हद तक क्यों गिर जाना चाहिए? दंड दोषी को यातना देने के लिए नहीं होता है, वरन वह उसके भय से अपराध को रोकने के लिए दिया जाता है.

जो कानून निर्माता मृत्यु और उत्पीड़नकारी सजाओं को अन्य तरीकों के ऊपर वरीयता देता है वह जनभावनाओं को आहत करता है और शासितों के बीच अपनी नैतिक साख को कमजोर करता है. एक ऐंसे ढोंगी गुरु की तरह जो बार बार की क्रूर सजाओं से अपने शिष्य की आत्मा को जड़ और अपमानित बना देता है. वह कुछ ज्यादा ही जोर से दबाकर सरकार की स्प्रिंगों को ढीला और कमजोर कर देता है.

जो कानून निर्माता म्रत्युदंड का विधान स्थापित करता है वह इस उपयोगी सिद्धांत का निषेध करता है कि किसी अपराध को दबाने का सबसे सही तरीका उन आवेगों की प्रकृति के अनुसार दंड तय करना है जोकि उसको पैदा करते हैं. मृत्युदंड का विधान इन सभी विचारों को धूमिल कर देता है यह सभी अन्तःसम्बन्धों को विघटित कर देता है और इस प्रकार दंडात्मक कानून के उद्देश्य का ही खुलेआम निषेध करता है.

आप कहते हैं कि मृत्युदंड अनिवार्य है. यदि यह सत्य है तो क्यों बहुत सारे लोगों को इसकी जरुरत नहीं पड़ी. विधि के किस विधान के तहत ऐसे लोग ही सबसे बुद्धिमान, सबसे खुश और सबसे स्वतंत्र थे? यदि मृत्युदंड ही बड़े अपराधों को रोकने के लिए सबसे उचित है तो ऐसे अपराध वहां सबसे कम होने चाहिए जहाँ इसे अपनाया और प्रयोग किया गया. किन्तु तथ्य एकदम विपरीत हैं. जापान को देखिये: वहां से ज्यादा मृत्युदंड और यातनाएं और कहीं नहीं दी जाती परन्तु वहां से अधिक संख्या में और वहां से अधिक जघन्य अपराध और कहीं नहीं होते. कोई कह सकता है कि जापानी लोग भीषणता में उन बर्बर कानूनों को चुनौती देना चाहते हैं जो उन्हें आहत और परेशान करते हैं. क्या यूनानी गणतन्त्रों -जहाँ सजाएँ नरम थी और जहां मृत्युदंड या तो बहुत कम थे या थे ही नहीं- में खूनी कानूनों द्वारा शासित देशों से ज्यादा अपराध और कम अच्छाइयां थी? क्या आपको लगता है की रोम में पोर्सियाई ज़माने में जब इसके वैभवशाली दिन थे, जब सारे कड़े कानूनों को हटा दिया गया था, स्काईला जो अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था, के जमाने की तुलना में ज्यादा अपराध होते थे, जब सभी कठोर कानूनों को वापस ले आया गया था? क्या रूस के निरंकुश शासक ने जब से मृत्युदंड को ख़त्म कर दिया है वहां किसी प्रकार का संकट आ खड़ा हुआ है? ऐसा लगता है कि इस तरह की मानवता और दार्शनिकता का प्रदर्शन करके वह लाखों लोगों को अपनी निरंकुश सत्ता के अधीन रखने के जुर्म से दोषमुक्त होना चाहते हैं.

न्याय और विवेक की बात सुनिए. ये आपको चिल्ला कर कह रहे हैं कि मानवीय निर्णय कभी भी इतने निश्चित नहीं होते कि वे कुछ मनुष्यों द्वारा जो कि गलतियाँ कर सकते हैं, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु के बारे में तय करने के औचित्य का प्रतिपादन कर सकें. यदि आप सबसे सम्पूर्ण न्यायिक फैसले की भी कल्पना कर लें, यदि आप सबसे ज्यादा ज्ञानी और ईमानदार जजों की भी व्यवस्था कर लें तब भी गलतियों की संभावना बची रहती है. आप इन गलतियों को सुधारने के औजारों से स्वयं को क्यों वंचित कर देना चाहते हैं? स्वयं को किसी उत्पीडित निर्दोष की मदद करने में अक्षम क्यों बना देना चाहते हैं? क्या किसी अदृश्य छाया के लिए, किसी अचेतन राख के लिए आपके बाँझ पाश्चाताप का, आपकी भ्रामक भूलसुधार का कोई अर्थ है? वे आपके दंड विधान की बर्बर तत्परता के त्रासद साक्ष्य हैं. अपराध को पाश्चाताप और अच्छे कार्यों के द्वारा सुधार सकने की संभावना को किसी व्यक्ति से छीन लेना, अच्छाई की तरफ उसके लौट आने के सारे रास्ते निर्ममता से बंद कर देना, उसके पतन को शीघ्रता से कब्र तक पहुंचा देना जो अब भी उसके अपराध से दागदार है, मेरी नज़र में क्रूरता का सबसे भयावह परिष्करण है.

एक कानून निर्माता का सबसे पहला कर्तव्य उन सार्वजनिक नैतिक मूल्यों की स्थापना करना और उन्हें बचाए रखना है, जो सभी आज़ादियों और सभी सामाजिक खुशियों के मूल स्रोत हैं. किसी विशिष्ट उद्देश्य को पाने के प्रयास में यदि वह सामान्य और आवश्यक उद्देश्यों को भूल जाता है तो वह सबसे भौंडी और भयानक गलती करता है. अतः राजा को लोगों के सामने न्याय और विवेक का सबसे आदर्श उदहारण पेश करना चाहिए. यदि इस को परिभाषित करने वाली शक्तिशाली, संयत, और उदार सख्ती की जगह क्रोध और प्रतिशोध से काम लेते हैं, यदि वे बिना वजह के खून बहाते हैं, जिसको बचाया जा सकता था और जिसे बहाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. और वे लोगों के सामने निर्मम दृश्य, और यातना से विकृत लाशों को प्रस्तुत करते हैं तो यह नागरिकों के जेहन में न्याय और अन्याय के विचार को बदल देता है. वे समाज में ऐसे तीखे दुराग्रहों के बीज बो देते हैं जो उतरोतर बढ़ते जाते हैं. मनुष्य, मनुष्य होने की गरिमा खो देता है जब उसके जीवन को इतनी आसानी से जोखिम में डाला जा सकता है. हत्या का विचार तब इतना डरावना नहीं रह जाता जब कानून खुद ही इसे एक मिसाल और तमाशे की तरह पेश करता है. अपराध की भयावहता तब कम हो जाती है जब उसे एक और अपराध के जरिये दण्डित किया जाता है. किसी दंड की प्रभावपूर्णता को उसकी कठोरता की मात्रा से मत आंकिये: ये दोनों एक दूसरे के एकदम उलटी बाते हैं. हर कोई उदार कानूनों की सहायता करता है. हर कोई कठोर कानूनों के खिलाफ षड्यंत्र करता है.

यह देखा गया है की स्वतंत्र देशों में अपराध कम हैं और दंडात्मक कानून ज्यादा उदार हैं. कुल मिलाकर, स्वतंत्र देश वे हैं जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाता है और इसके फलस्वरूप जहाँ के कानून न्यायपूर्ण हैं. जहाँ अतिशय कष्ट देकर मानवता का उल्लंघन किया जाता है यह इस बात का प्रमाण है कि वहां मनुष्यता की गरिमा को अभी पहचाना नहीं गया है, यह इस बात का प्रमाण है कि वहां कानून निर्माता स्वामी है जो दासों को चलाता है और अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे उन्हें सजाएं देता है. अतः मेरा निष्कर्ष है कि मृत्युदंड को समाप्त कर देना चाहिए.

अनुवाद: कुलदीप प्रकाश साभार

11 जून 2014

खेल शुरू हो चुका है: आनंद तेलतुंबड़े


गरीबों-उत्पीड़ितों की हिमायत के ऐलान के साथ मोदी सरकार के बनते ही भगाणा के आंदोलनकारी दलित परिवारों को जंतर मंतर से बेदखल करने की कोशिशों और पुणे में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या में आनंद तेलतुंबड़े ने आने वाले दिनों के संकेतों को पढ़ने की कोशिश की है. अनुवाद: रेयाज उल हक.

अब इस आधार पर कि लोगों ने भाजपा की अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा वोट उसे दिया है और नरेंद्र मोदी ने ‘अधिकतम प्रशासन’ की शुरुआत कर दी है, बहुत सारे लोग यह सोच रहे थे कि हिंदुत्व के पुराने खेल की जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने हाव-भाव और भाषणों के जरिए मोदी ने बड़ी कुशलता से ऐसा भ्रम बनाए भी रखा है. इसके नतीजे में मोदी के सबसे कट्टर आलोचक तक गलतफहमी के शिकार हो गए हैं. यहां तक कि जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है, उनमें से भी कइयों को ऐसा लगने लगा है कि मोदी शायद कारगर साबित हों. लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में, भावनाओं में लिपटी हुई लफ्फाजी से भरे ऐलान के आधार पर यह यकीन करना बहुत जल्दबाजी होगी कि मोदी सरकार गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति समर्पित होगी. तब भी कइयों को लगता है कि चूंकि वे एक साधारण पिछड़ी जाति के परिवार से आते हैं और पूरी आजादी से काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों. नहीं भी तो वे मुसलमानों (जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया है) और दलितों (जिन्होंने भारी तादाद में उन्हें वोट दिया है) के प्रति संवेदनशील होंगे. यही वे दो मुख्य समुदाय हैं जिनसे मिल कर वह गरीब और उत्पीड़ित तबका बनता है, जिसके प्रति मोदी समर्पित होने की बात कह रहे हैं. 

लेकिन इस हफ्ते हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने इन उम्मीदों को झूठा साबित कर दिया. दलितों के बलात्कारों और हत्याओं की लहर तो चल ही रही थी, उनके साथ साथ घटी इन दो घटनाओं ने ऐसे संकेत दिए हैं कि शायद पुराना खेल शुरू हो चुका है.

दलितों की नामुराद मांगें

भगाणा की भयानक घटना देश को शर्मिंदा करने के लिए काफी थी: घटना ये है कि हरियाणा में 23 मार्च को 13 से 18 साल की चार लड़कियों को नशा देकर रात भर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के ये अपराधी उन्हें ले जाकर भटिंडा रेलवे स्टेशन के पास झाड़ियों में फेंक आए. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक घिनौना और शर्मनाक है. लड़कियों को मेडिकल जांच के दौरान अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ा, जिसका बलात्कार के मामले में इस्तेमाल करने पर आधिकारिक पाबंदी लगाई जा चुकी है. हालांकि पुलिस को दलित समुदाय के दबाव के चलते शिकायत दर्ज करनी पड़ी, लेकिन उसने अपराधियों को पकड़ने में पांच हफ्ते लगाए. जबकि हिसार अदालत में उनको रिहा कराने की न्यायिक प्रक्रिया फौरन शुरू हो गई. और यह गिरफ्तारी भी तब हुई जब भगाणा के दलितों को उन लड़कियों के परिजनों के साथ इंसाफ के लिए धरने पर बैठना पड़ा. ये दलित परिवार अपने गांव वापस लौटने में डर रहे हैं क्योंकि उन्हें जाटों के हमले की आशंका है. भगाणा के करीब 90 दलित परिवार, जिनमें बलात्कार की शिकायतकर्ता लड़कियों के परिवार भी शामिल हैं, दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके अलावा 120 दूसरे परिवार हिसार के मिनी सचिवालय पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान ही नाबालिग लड़कियों के बलात्कारों की अनेक भयानक खबरें निकल कर सामने आई हैं. जैसा कि एक हिंदी ब्लॉग रफू ने प्रकाशित किया है, पास के डाबरा गांव की 17 साल की एक दलित लड़की का जाट समुदाय के ही लोगों ने 2012 में सामूहिक बलात्कार किया था जिसके बाद उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. एक और 10 वर्षीय बच्ची का एक अधेड़ मर्द ने बलात्कार किया था. इसके अलावा एक और लड़की का एक जाट पुरुष ने बलात्कार किया जो आज भी सरेआम घूम रहा है और उल्टे पुलिस ने लड़की को ही गिरफ्तार करके उसे यातनाएं दीं. ये सारी लड़कियां इंसाफ के लिए निडर होकर लड़ रही हैं और इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं.

जंतर मंतर पर 6 जून को सुबह करीब 6 बजे, जब ज्यादातर प्रदर्शनकारी सो रहे थे, पुलिसकर्मियों का एक बड़ा समूह आया और उसने प्रदर्शनकारियों के तंबू गिरा दिए. उन्होंने उनके तंबुओं को जबरन वहां से हटा दिया और चेतावनी दी कि वे लोग दोपहर 12 बजे तक वहां से चले जाएं. हिसार मिनी सचिवालय में भी विरोध करने वाले इसी तरह हटाए गए. दोनों जगहों पर पुलिस ने उन्हें तितर बितर कर दिया और उनका सामान तोड़ फोड़ दिया. छोटे-छोटे बच्चों समेत ये निर्भयाएं (बलात्कार से गुजरी लड़कियों के लिए मीडिया द्वारा दिया गया नाम) सड़कों पर फेंक दी गई, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां भी नहीं रहने दिया. वहां पर जुटे महिला, दलित और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों तथा दो शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं को साथ लेकर प्रदर्शनकारी दोपहर 2 बजे संसद मार्ग थाना के प्रभारी अधिकारी को यह ज्ञापन देने गए कि उन्हें जंतर मंतर पर रुकने की इजाजत दी जाए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन इस समूह को थाना के सामने बैरिकेड पर रोक दिया गया. जब महिलाओं ने जाने देने और थाना प्रभारी से मिलने की इजाजत देने पर जोर दिया तो पुलिसकर्मी उन्हें पीछे हटाने के नाम पर उनके साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे. वुमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन की कल्याणी मेनन सेन के मुताबिक, जो प्रदर्शनकारियों का हिस्सा थीं, पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के गुप्तांगों को पकड़ा और उनके गुदा को हाथ से दबाया. शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं और अनेक महिला कार्यकर्ताओं (समाजवादी जन परिषद की वकील प्योली स्वातीजा, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की सुमेधा बौद्ध और एनटीयूआई की राखी समेत) पर इसी घटिया तरीके से हमले किए गए. बताया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी चिल्ला रहा था, ‘अरे ये ऐसे नहीं मानेंगे, लाठी घुसाओ.’ इस घिनौने हमले के बाद अनेक कार्यकर्ताओं को पकड़ कर एक घंटे से ज्यादा हिरासत मे रखा गया.

इस नवउदारवादी दौर में जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक जगहें सुनियोजित तरीके से खत्म कर दी गई हैं और इन जगहों को राज्य की राजधानियों के छोटे से तयशुदा इलाके और दिल्ली में जंतर मंतर तक सीमित कर दिया गया है. लोग यहां जमा हो सकते हैं और पुलिस से घिरे हुए वे अपने मन की बातें कह सकते हैं, लेकिन वहां उनकी बातों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता. यह भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है. इस बदतरीन मामले में गांव के पूरे समुदाय को दो महीने तक धरने पर बैठना पड़ा है, अपने आप में यही बात घिनौनी है. उनकी जायज मांग की सुनवाई करने के बजाए – वे अपने पुनर्वास के लिए एक सुरक्षित जगह मांग रहे हैं क्योंकि वे भगाणा में नहीं लौट सकते – सरकार लोकतंत्र की इस सीमित और आखिरी जगह से भी उन्हें क्रूरतापूर्वक बेदखल कर रही है. यह बात यकीनन इसे दिखाती है कि ये दलितों के लिए वे ‘अच्छे दिन’ तो नहीं हैं, जिनका वादा मोदी सरकार ने किया था. दिल्ली पुलिस सीधे सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आता है और यहां पुलिस तब तक इतने दुस्साहस के साथ कार्रवाई नहीं करती जब तक उसे ऐसा करने को नहीं कहा गया हो. यह बात भी गौर करने लायक है कि हरियाणा और दिल्ली की पुलिस ने, जहां प्रतिद्वंद्वी दल सत्ता में हैं, समान तरीके से कार्रवाई की है. तो संदेश साफ है कि विरोध वगैरह जैसी बातों की इजाजत नहीं दी जाएगी. क्योंकि अगर जंतर मंतर और आजाद मैदान जैसी जगहें आबाद रहीं तो फिर कोई ‘अच्छे दिनों’ का नजारा कैसे कर पाएगाॽ

पहला विकेट गिरा

ऊपर की कार्रवाई तो सरकार की सीधी कार्रवाई थी, लेकिन कपट से भरी ऐसी अनेक कार्रवाइयां ऐसे संगठनों ने भी की हैं, जिनके हौसले भाजपा की जीत के बाद बढ़े हुए हैं. भगाणा के प्रदर्शनकारियों को उजाड़े जाने से ठीक दो दिन पहले 2 जून को पुणे में एक मुस्लिम नौजवान को हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. दशक भर पुराना यह हिंदू दक्षिणपंथी गिरोह फेसबुक पर शिव सेना के बाल ठाकरे और मराठा प्रतीक छत्रपति शिवाजी की झूठी तस्वीरें लगाए जाने का विरोध कर रहा था. पुणे पुलिस के मुताबिक, इन झूठी तस्वीरों वाला फेसबुक पेज पिछले एक साल से मौजूद था और उसको 50,000 लाइक मिली थीं. भीड़ को उकसाने के लिए हिंदू राष्ट्र सेना के उग्रवादियों ने इस बहुप्रशंसित पेज के लिंक को चैटिंग के जरिए तेजी से फैलाया. उनका कहना था कि यह पेज एक मुसलमान ‘निहाल खान’ द्वारा बनाया गया और चलाया जाता है, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह असल में एक हिंदू नौजवान निखिल तिकोने द्वारा चलाया जाता है, जो काशा पेठ के रहने वाले हैं. फिर इस गड़बड़ी का अहसास होते ही इस पेज को शुक्रवार को सोशल नेटवर्किंग साइटों से हटा लिया गया और तब इस मुद्दे पर विरोध को हवा देने की जरूरत नहीं रह गई थी. लेकिन हिंदू राष्ट्र सेना और शिव सेना के गुंडे सोमवार को प्रदर्शन करने उतरे. पुणे के बाहरी इलाके हदसपार में शाम उन्होंने एक बाइक रोकी, इसके सवार को उतारा और उसके सिर पर हॉकी स्टिक और पत्थरों से हमला किया और दौरे पर ही उसे मार डाला. मार दिया गया वह व्यक्ति मोहसिन सादिक शेख नाम का एक आईटी-प्रोफेशनल था और उसका उन तस्वीरों से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन चूंकि उसने दाढ़ी रख रखी थी और हरे रंग का पठानी कुर्ता पहन रखा था हमलावरों ने उसे मार डाला. शेख के साथ जा रहे उनके रिश्ते के भाई बच गए जबकि दो दूसरे लोगों अमीन शेख (30) और एजाज युसूफ बागवान (25) को चोटें आईं. पुलिस ने पहले हमेशा की तरह इस रटे रटाए बहाने के नाम पर इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की कि हमलावर शिवाजी की मूर्ति का अपमान किए जाने और एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़कों द्वारा बलात्कार किए जाने की अफवाह के कारण वहां जमा हुए थे. मानो इससे एक बेगुनाह नौजवान की हत्या जायज हो जाती हो.

शेख की हत्या के फौरन बाद, आनेवाले दिनों के बारे में बुरे संकेत देता हुआ एक एसएमएस पर भेजा गया जिसमें मराठी में कहा गया था: पहिली विकेट पडली (पहला विकेट गिरा है). इस संदेश को मद्देनजर रखें और शेख को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियारों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि यह एक योजनाबद्ध कार्रवाई थी. पुलिस ने रोकथाम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं. हालांकि उसको बस इसी का श्रेय दिया जा सकता है, खास कर संयुक्त आयुक्त संजय कुमार का, कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र सेना के प्रमुख धनंजय देसाई समेत 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनमें से 17 पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. देसाई पर शहर के विभिन्न थानों में पहले से ही दंगा करने और रंगदारी वसूलने के 23 मामले दर्ज हैं. लेकिन इस फौरी कार्रवाई को इसके मद्देनजर भी देखना चाहिए कि आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार अपना धर्मनिरपेक्ष मुखौटा दिखाने की कोशिश करेगी. लेकिन चूंकि मोदी सरकार इस पर चुप है, इसलिए संकेत अच्छे नहीं दिख रहे हैं.

ऐसा लगता है कि खेल शुरू हो गया है. देखना यह है कि नरेंद्र मोदी इस खेल में किस भूमिका में उतरते हैं.

17 फ़रवरी 2014

दलित आंदोलन के बुनियादी सिद्धांत - एक नजरिया

dakhalkiduniya
भारत की उत्पीड़ित जनता के संघर्ष आज जिस मुकाम पर खड़े हैं, यहां से समाज एक बड़े, स्थायी और क्रांतिकारी बदलाव की तरफ जा सकता है या फिर साम्राज्यवाद परस्त, ब्राह्मणवादी शासक वर्ग अपने संकट को अपने आजमाए हुए तरीकों से टाल कर अपने शोषणकारी अस्तित्व को बनाए रख सकता है, जैसा यह करता आया है. हालात कौन से रुख लेंगे, इसको आखिरी रूप से तय करने वाली बात यह है कि उत्पीड़ित जनता का संघर्षरत हिस्सा कैसे और कितनी कुशलता से व्यापक, उत्पीड़ित जनता को अपने साथ ले आ पाता है, कैसे वह अपने दोस्तों और दुश्मनों की सही पहचान कर पाता है और उनके साथ इस आधार पर अपने संबंध और व्यवहार को तय कर पाता है. उत्पीड़ित जनता के इस संघर्षरत तबके में आदिवासी हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, स्त्रियां हैं. लेकिन इससे बाहर भी, इन्हीं समुदायों से आनेवाली उत्पीड़ित जनता की एक विशाल आबादी है, जो अभी इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बनी है. इनमें से दलित एक मुख्य तबका हैं और भारतीय समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन की कोई भी योजना दलितों की सीधी और नेतृत्वकारी भूमिका के बगैर संभव नहीं है. जैसा कि अक्सर कहा गया है, बिना क्रांति के दलितों की मुक्ति नहीं होगी और बिना दलितों की भागीदारी के क्रांति नहीं होगी. आज दलित और पिछड़े वर्गों के मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, निजीकरण वगैरह के पक्ष में दलीलें देते हुए कह रहा है दलितों की मुक्ति इन्हीं में निहित है. बाबासाहेब के जाति के उन्मूलन के एजेंडे को भुला दिया गया है. ऐसे में आनंद तेलतुंबड़े का यह लंबा लेख, दलित आंदोलन की ऐतिहासिक पड़ताल करते हुए, दलित आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन के आपसी रिश्तों पर, उनकी कमियों और उपलब्धियों पर और उनकी भावी एकता की संभावनाओं पर बात करता है. अनुवाद सुधीर कुमार कटियार का है. मूल अंग्रेजी लेख के लिए यहां जाएं.

प्रस्तावना 

अछूत समझी जाने वाली जातियों द्वारा संगठित विरोध को हम दलित आंदोलन के तौर पर पहचानते हैं। इस अर्थ में यह आंदोलन औपनिवेशिक शासन के दौरान पनपा। लेकिन यदि इसे ब्राह्मणवादी विचारधारा के प्रभुत्व के खिलाफ कथित निचली जातियों के संघर्ष के रूप में देखा जाए तो इसका इतिहास जाति व्यवस्था जितना ही पुराना है। भारतीय सामाजिक ढांचे में जाति के बरकरार रहने के चलते, दलित आंदोलन को भी उसके पुराने रूपों की ऐतिहासिक निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है। कहा जा सकता है कि दलित आंदोलन का वर्तमान स्वरूप सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़े गये गुमनाम संघर्षों का साकार रूप है। किसी भी लिहाज से देखें तो आंदोलन ने अपने दोस्तों और दुश्मनों को पहचानने में, अपनी रणनीतियों को स्थापित करने में तथा सबसे अहम बात यह कि हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। औपनिवेशिक शासन के दौरान आंदोलन सामाजिक-राजनैतिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाने में सफल रहा और इसने महत्वपूर्ण सबक हासिल किए। लेकिन आजादी के बाद जब उपलब्धियों को मजबूत करने का समय था, यह महत्वपूर्ण बदलावों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाया।

ऐसा लगता है कि इस अवधि में दलित आंदोलन की पहले की उपलब्धियों को ग्रहण लग गया। यह लेख इसे स्थापित करता है कि वर्तमान दलित आंदोलन की खासियतें उन सब परिस्थितियों को जाहिर करती हैं जिन्होंने इसे जन्म दिया। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो आंदोलन ने आजादी के बाद आए परिस्थितियों में बदलावों पर गंभीरता से विचार नहीं किया। फलस्वरूप आंदोलन का पतन हुआ और इसे उन्हीं ताकतों ने कब्जे में कर लिया जिनसे लड़ने के लिए इसका जन्म हुआ था। उन सामाजिक वास्तविकताओं पर रोशनी डालते हुए, जिनसे यह आंदोलन घिरा हुआ है, यह दस्तावेज उन मुद्दों को रेखांकित करेगा जिन पर साफ नजरिया आंदोलन की सफलता के लिए जरूरी है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत के प्रचलित इतिहास में शोषित जनता द्वारा दमन के प्रतिरोध की बहुत सारी मिसालें नहीं मिलतीं। लेकिन यह मुमकिन नहीं है कि 2000 वर्षों के दमनकारी इतिहास के दौरान ऐसे विद्रोह न हुए हों। जाति व्यवस्था की सफलता के पीछे न केवल इसको मिली दैवीय स्वीकृति थी, बल्कि वह ढांचा था, जिसने शोषित तबकों को एकजुट नहीं होने दिया। सामाजिक वर्गीकरण की इस व्यवस्था की अभूतपूर्व सफलता न केवल इसकी बनावट में निहित है जिसने शोषित जातियों को संगठित नही होने दिया और उनके ऊपर वैचारिक प्रभुत्व कायम किया बल्कि इसकी दैवीय स्वीकृति में भी निहित है। विद्रोह का अर्थ था दैवीय प्रकोप को बुलावा देना और अगले जन्म में मुक्ति न मिलना। भौतिक तौर पर इसने प्रत्येक जाति के लिए निश्चित काम निर्धारित कर भौतिक सुरक्षा प्रदान की तथा मनोवैज्ञानिक तौर पर इसने प्रत्येक जाति को (यहां तक कि तथाकथित अछूतों को भी) किसी दूसरी जाति से ऊपर होने का संतोष प्रदान किया। चूंकि यह पूरा ढांचा धर्म की बुनियाद पर आधारित था, इसके विरोधियों ने भी धर्म का सहारा लिया। बुद्व तथा जैन धर्मों से लेकर भक्ति आंदोलन तक - जाति व्यवस्था का विरोध धार्मिक शब्दावली में ही सामने आया। यह चलन अब तक जारी है। इस प्रकार जाति विरोधी सभी आंदोलन-पुराने समय से लेकर अब तक-ब्राह्मणवाद के साथ धार्मिक आधारों पर बहस करते नजर आते हैं।

इस प्रकार सभी जाति विरोधी आंदोलनों में धार्मिकता का पुट हैं। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में चमार जाति का सतनामी आंदोलन एक अलग धार्मिक संप्रदाय बन गया (रसेल 1916)। पेरियार के द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने राम का पुतला जलाकर और रावण की तारीफ कर सार्वजनिक सनसनी पैदा कर दी। तमिलनाडु में नाडार महासभा व केरल में नारायण गुरु के ऐझवा आंदोलन के नतीजे में श्री नारायण धर्म प्रतिपालन योगम के नाम से एक नया धार्मिक पंथ बना। (थामस 1965, ऐवप्पन 1944, सैमुएल 1973)। यहां तक कि बाबासाहेब अंबेडकर के नेतृत्व वाले सबसे बड़े दलित आंदोलन की परिणति भी बौद्ध धर्म में सामूहिक धर्म परिवर्तन के साथ हुई (जीलियट 1969)। ये सभी आंदोलन मनु के सिद्धांतों के प्रति तीखी नफरत जाहिर करते हुए अपने अनुयायियों के लिए एक अलग मत की स्थापना करते हैं। ये ब्राह्मणवाद को अपने दुखों की मूल वजह मान कर इसको ठुकराते हैं। अंबेडकर ने अपने विश्लेषण में इसको सबसे सटीक तरीके से समझाया है, जहां उन्होंने हिंदू धार्मिक विचारधारा के प्रभुत्व को खत्म करने को दलितों की मुक्ति के लिए जरूरी बताया है (ओमवेट 1994)। 

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि जाति व्यवस्था कठोर नहीं थी तथा इसमें जातियों के बीच आवाजाही पर पाबंदी नहीं थी, लेकिन यह तथ्य है कि जाति व्यवस्था के चलते उत्पादन की ताकतों और उत्पादन संबंधों में ब्रिटिश राज के आने तक कोई बदलाव नहीं हुआ। अर्धस्वायत्त गांवों की व्यवस्था ने समाज को सदियों तक एक ही स्तर पर बनाए रखा। भारतीय समाज की इसी व्यवस्था के चलते मार्क्स ने कहा कि भारत में इतिहास नहीं है और भारतीय समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने और इसे पश्चिम की आधुनिकता से जोड़ने के लिए ब्रिटिश शासन की तारीफ की। भारतीय समाज को पहला सांस्कृतिक धक्का मुस्लिम हमलावरों ने दिया। भारतीयों का सामना पहली बार एक दूसरी धार्मिक व्यवस्था से हुआ। समानतावादी इस्लाम ने शुरू में सभी भारतीयों के साथ एक जैसा व्यवहार किया। लेकिन जल्दी ही राजनीतिक रणनीतियों ने उन्हें न केवल भारतीय समाज में व्याप्त अंदरूनी विभाजन का इस्तेमाल करना सिखा दिया बल्कि उनकी अपनी सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद का जहर दाखिल हो गया। 

भगवान दास (1983) महमूद गजनवी के साथ आए एक मुस्लिम अध्ययनकर्ता इब्न बतूता के हवाले से कहते हैं कि मुस्लिम हमलावरों ने पहले सभी भारतीयों के साथ एक जैसा व्यवहार किया लेकिन बाद में सामाजिक विभाजन का फायदा उठाया। राजनीतिक जरूरतें धार्मिक सिद्धांतों पर भारी पड़ीं। इसके नतीजे में, मुस्लिम शासन के दौरान ब्राह्मणवाद पर आधारित जाति व्यवस्था में न केवल कोई बदलाव नहीं आया बल्कि धर्म बदलने वाले हिंदुओं के जरिए इसने नए उभरते मुस्लिम समाज पर भी असर डाला। फिर भी इस प्रक्रिया ने गांवों और शहरों के बाहर रह रहे अछूतों को एक भारी मौका मुहैया किया। मुस्लिम शासकों ने पहली बार शहरों के दरवाजे अछूतों के लिए खोले। बहुत सी अछूत और तथाकथित नीची जातियों ने उत्पीड़न से बचने तथा बेहतर जीवन की आकांक्षा में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। जो लोग इस्लाम धर्म स्वीकार कर मुस्लिम हमलावरों की फौज में शामिल हुए, उन्होंने अपने नए मालिकों के रीति रिवाजों की नकल की। अपनी इच्छा से या दबाव में औपचारिक रूप से इस्लाम स्वीकार करने वालों के अलावा बुनकर, राजगीर, बढ़ई, लोहार, जूता बनाने वाली, टोकरी बनानेवाली, कुम्हार, रंगरेज़ वगैरह कारीगर जातियों के दसियों लाख लोग धीरे-धीरे मुसलमान बन गए। 

अलग अलग कारणों से कुछ ऊंची जातियों के लोग भी मुसलमान बने। अलग अलग जातियों से मुसलमान बने लोग नए उभरते मुस्लिम समाज में अपनी सांस्कृतिक परंपराएं तथा जातिगत विभाजन लेकर गए। इस तरह धर्म परिवर्तन से अछूतों को अपनी जातिगत स्थिति से पूरा छुटकारा तो नहीं मिला लेकिन फिर भी उत्पीड़न की तीव्रता कम हुई और इससे यकीनन उन्हें भारी राहत महसूस हुई होगी। सबसे पहले तो धर्म परिवर्तन से उनके लिए अपने जातिगत पेशे को बदलना मुमकिन हो गया। यही उनकी निम्न सामाजिक स्थिति का आधार था। दूसरे धर्म को छोड़ते हुए उन्हें अपने ऊपर किए गए अपमानों का बदला लिए जाने का एहसास हुआ तथा मोटे तौर पर शासक वर्ग से जुड़ने का अहसास भी आया। तीसरा, हथियार रखने व चलाने की इजाजत मिलने से उनकी जातीय स्थिति में इजाफा हुआ। वे अछूत से क्षत्रिय की स्थिति में आ गए जो कि जाति पायदान की दूसरी सीढ़ी है। इससे पहली बार उनमें इंसान होने का भाव जगा, जिसका मतलब है कि उनमें विश्वास कायम हुआ और सबसे अहम बात यह हुई कि इसका मतलब था आर्थिक बेहतरी का आना।

यह कहना मुश्किल है कि इन धर्म परिवर्तनों को सामाजिक आंदोलन कहा जा सकता है। क्योंकि तकनीकी रूप से सामाजिक आंदोलन एक ऐसे संगठन पर जोर देता है जो सामाजिक बदलाव के सामूहिक उद्देश्य को हासिल करने की कोशिश करे। धर्म परिवर्तन निश्चित रूप से निजी स्तर पर जातिगत नियमों को तोड़ने और भिन्न आस्था अपनाने के लिए विद्रोह की भावना को दर्शाता है। चूंकि तब तक जातीय समाज में जातियों के बुनियादी संगठन रहे थे, जो जातियों के व्यवहार को निर्धारित करते थे और जातीय ढांचे के भीतर सामुदायिक जीवन की देखरेख करते थे, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि यह विद्रोह बिना सांगठनिक मदद के संभव हुआ था। जातीय समाज में अपने जातीय आदेशों के पार जाने के लिहाज से व्यक्ति एक बहुत छोटी इकाई है। सारी संभावना ये है कि धर्म परिवर्तन, विशेषकर बड़ी संख्या में हुए धर्म परिवर्तन, सिर्फ सामाजिक स्वीकृति के साथ ही हुए होंगे। जैसा कि बाद के (तमिलनाडु में मीनाक्षीपुरम में तथा दलितों के बौद्व मत में) धर्म परिवर्तन दिखलाते हैं, बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तनों के पीछे हमेशा सामाजिक आंदोलन का योगदान रहा है। हम अछूत जातियों के इस्लाम धर्म स्वीकारने के पीछे भी ऐसे ही किसी आंदोलन की उपस्थिति मान सकते हैं। 

ऊपर जो जायजा लिया गया है उसके मुख्य बिंदु हैं: 
भारतीय समाज ने कभी भी सीढ़ीदार विभाजन को एक मूल्य के रूप में आत्मसात नहीं किया।
जाति विरोधी आंदोलन मूल रूप से अन्यायी सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करने वाले ब्राह्मणवाद के खिलाफ था।
ये आंदोलन हिंदू धर्म के दमनकारी पक्ष के विरोधी सिद्धांत के रूप में व्यक्त हुए।
इन्होंने हिंदू धर्म के दमनकारी पक्षों की आलोचना की तथा एक दूसरे विश्वास/धर्म का प्रतिपादन किया।
ये आंदोलन बाहरी सहायता विशेषकर सहायक राजनैतिक वातावरण में फलीभूत हुए।

एक स्वायत्त दलित आंदोलन का जन्म

मुस्लिम शासकों ने भारत पर अपने विकसित सामंतवाद के दम पर राज किया जो कि भारत की पुरोहिती-जजमानी आधारित व्यवस्था से बहुत बेहतर था। लेकिन अंग्रेज़ों की भारत पर विजय उत्पादन की बेहतर तकनीक और सामाजिक स्वरूप (बुर्जुआ) पर आधारित थी जो सामंतवाद की तकनीकों से ज्यादा सक्षम थी। एक बुर्जुआ उदारवादी विचारधारा तथा शासन करने की जरूरतों के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अब तक दबी हुई निचली पहचानों को उभरने के लिए जगह प्रदान की, खासकर जाति और धर्म के स्तर पर। संस्थागत बदलाव (न्याय तंत्र, नागरिक प्रशासन, माल बाजार), सांस्कृतिक परिवर्तन (आधुनिकता, पश्चिमी तरीके का रहन सहन, अंग्रेजी शिक्षा, पश्चिमी ज्ञान भंडार के साथ संपर्क), आर्थिक बदलाव (जजमानी, बलूतेदारी प्रथा के स्थान पर जमींदारी, रैयतवाड़ी व्यवस्था) और उभरते सामाजिक बदलावों ने निचली जातियों की आकांक्षाओं को बल दिया। इन बदलावों के फलस्वरूप विकास के जो अवसर पैदा हुए उनका जाति व्यवस्था में जकड़े पारंपरिक सामाजिक संबंधों से टकराव पैदा हुआ।

किसी भी समुदाय में सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत के लिए एक निश्चित स्तर के संसाधनों की आवश्यकता होती है। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था ने वंचित समुदायों को विभिन्न अवसर प्रदान कर उन्हें इस स्तर तक पहुचने में मदद की। यह स्वाभाविक था कि सामाजिक विरोध के आंदोलन शूद्र जातियों में पहले प्रारंभ हुए। ये मेहनतकश जातियां जाति पायदान में ऊपर की परजीवी जातियों के एक दम नीचे आती हैं और इनके पास शोषित अछूतों से बेहतर साधन थे। शूद्र जातियों के आंदोलन ने मुख्यतः धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा रचे गए पाखंड का भंडाफोड़ किया। इन्होंने अपने ऊपर हो रहे शोषण की भर्त्सना की और दुश्मन का दुश्मन होने की वजह से ब्रिटिश राज की तारीफ की। दलित जातियों को भी शोषित होने की वजह से साथी घोषित किया गया। लेकिन शीघ्र ही दलित अछूत जातियों के साथ अंतरविरोधों के चलते इन आंदोलनों की ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना कुंद हो गई। हालांकि दलित आंदोलन पिछड़ी जातियों के ब्राह्मण विरोधी आंदोलन से काफी प्रभावित हुआ, लेकिन यह धीरे धीरे इससे अलग हो गया। अंबेडकर के आगमन के साथ यह राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया।

लगभग इसी समय रूस की 1917 बोल्शेविक क्रांति के चलते पूरी दुनिया में क्रांतिकारी भावनाओं का ज्वार था। यह आंदोलन कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित था। रूसी क्रांति ने वंचित व शोषित तबकों में मुक्ति की आशा भर दी। भारत में भी इस आंदोलन ने जड़ें पकड़ीं और यह एक राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गया। खास कर शहरी क्षेत्रों के फैक्टरी मजदूरों में। इस कम्युनिस्ट आंदोलन का नेतृत्व शहरी मध्यमवर्ग के तबके का था, जो ऐतिहासिक कारणों से मुख्यतः ऊपर की जातियों से आया था। इनमे भी सर्वाधिक ब्राह्मण थे। इस तबके की साम्यवाद के क्रांतिकारी सिद्धांतों की समझ कुछ तो व्यवस्थित राजनैतिक शिक्षण के अभाव में और कुछ इसकी वर्गीय व जातिगत चेतना के चलते सीमित रही। वर्ग संघर्ष, सर्वहारा की तानाशाही, आधार व ऊपरी संरचना जैसे क्रांतिकारी सिद्धांतों की समझ बिना अंदरूनी द्वंद्वों की पहचान के अधूरी थी। यह आंदोलन मुख्यतः ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में था जिसके चलते यह राष्ट्रवादी आंदोलन के करीब आया। इसमें जाति को ऊपरी ढांचे का हिस्सा मानकर ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई। कम्युनिस्ट आंदोलन के नए उभरते स्वायत्त दलित आंदोलन के साथ संबंध असहज रहे। साम्यवादियों का मानना था कि दलित आंदोलन मजदूरों में विभाजन पैदा करता है, उपनिवेश विरोधी संघर्ष को कमजोर करता है, और वैज्ञानिक नहीं है। दूसरी तरफ दलित आंदोलन को कम्युनिस्ट आंदोलन में न केवल विशिष्ट जातीय शोषण का हल नजर नहीं आया बल्कि एक तरह की दूरी व उदासीनता नजर आई। उनकी रणनीति से कम्युनिस्ट आंदोलन का राज्य विरोधी रुख भी मेल नहीं खाया।

जैसा कि गेल ओमवेट ने साफ तौर से आकलन किया है, उपनिवेशवादी समाज में दलित आंदोलन को तीन ताकतों से मुकाबला करना थाः
समाज में ऐतहासिक रूप से गहरी पैठ जमाए ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के प्रभुत्व के विरोध में
राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रभुत्व से, जो कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में दलित शोषित जनता के बहुत से आंदोलनों का अपने में समावेश कर इनके प्रजातांत्रिक तथा समतावादी एजेंडा को कुंद करने का प्रयास कर रहा था
कम्युनिस्ट आंदोलन से, जिसे प्राकृतिक रूप से इसका साथी होना चाहिए था लेकिन जिससे इसके संबंध असहज थे

ब्राह्मणवादी प्रभुत्व का विरोध

ब्राह्मणवादी प्रभुत्व का विरोध करते हुए दलित आंदोलन ने पिछड़ी जातियों को स्वाभाविक सहयोगी के रूप में देखा। कई मायनों में दलित आंदोलन महाराष्ट्र में महात्मा फुले के ब्राह्मण विरोधी आंदोलन से प्रेरित था (उदाहरण के लिए दलित आंदोलन के शुरुआती जनक शिवराम जनाबा कांबले फुले के अनुयायी थे)। फुले और अंबेडकर में समय की भिन्नता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में फर्क के बावजूद दोनों द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों द्वारा किए गए सामाजिक ढांचे के विश्लेषण में समानताएं हैं। दोनों ने मृतप्राय भारतीय समाज में आधुनिकता का प्रवेश कराने के लिए ब्रिटिश शासन की सराहना तो की लेकिन दोनों ने सामाजिक ढांचे के आमूलचूल परिवर्तन में इसकी सीमाओं को भी पहचाना। दोनों ने राष्ट्रवादियों के इस दावे को नकारा कि भारत एक राष्ट्र है, दोनों का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विश्वास नहीं था तथा दोनों ने इसका समान चित्रण तथा विरोध किया। दोनों ने ब्राह्मणवाद का कड़ा विरोध किया लेकिन ब्राह्मणों से घृणा नहीं की। दोनों तर्कवाद में यकीन रखते थे। दोनों ने परजीवी पुरोहितों, सूदखोरों, जमीदारों और पूंजीपतियों का विरोध कर इनके द्वारा उत्पीड़ित तबकों को संगठित किया। दोनों ने दलितों और पिछड़े वर्ग की मुक्ति में शिक्षा की भूमिका पर जोर दिया। फुले और कुछ हद तक अंबेडकर की योजना अछूतों और शूद्र जातियों को ब्राह्मणवाद के विरोध में एक साथ लाने की थी। लेकिन इन्होंने पिछड़ी शूद्र जातियों और अछूत जातियों के अंतर्विरोधों का पूरा आकलन नहीं किया। खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां जाति व्यवस्था ज्यादा मजबूत है, शूद्र जातियां अछूतों के लिए ब्राह्मणवाद का बाना ओढ़ लेती हैं। यह अंतर्विरोध आर्थिक कारणों से पनपता हैं जहां शूद्र जातियां किसान हैं और भूमिहीन अछूतों को उनकी जमीन पर मजदूरी करनी है। मनु की इस परंपरा को न तो फुले का शक्तिशाली ब्राह्मण विरोधी आंदोलन तोड़ पाया और न ही अंबेडकर का दलित आंदोलन। महात्मा फुले की मृत्यु के तुरंत बाद उनका सत्य शोधक आंदोलन जाति विरोधी धारा खो बैठा। कोल्हापुर के शाहूजी महाराज द्वारा 1920 में इसके पुनरुत्थान के प्रयास भी निष्फल साबित हुए और यह शासक वर्ग की राजनीतिक व्यवस्था का अंग बन गया।

जजमानी-बलुतेदारी व्यवस्था में शूद्र जातियों का बहुमत लघु, सीमांत कृषक है या कारीगर है और इनका कई प्रकार से शोषण होता हैं। इनमें से कुछ जो बड़े और मध्यम किसान है, संपन्न हैं। ये लोग पारंपरिक रूप से गांव की व्यवस्था भी संभालते थे। गांवों में ये लोग शोषण की भूमिका में हैं। आजादी के बाद चुनावी राजनीति के चलते मध्यम जातियों का ध्रुवीकरण हुआ। इन लोगों ने आजादी के बाद के सरकारी विकास कार्यक्रमों से भरपूर फायदा उठाया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे, भूमि सुधार जिसके तहत बंटाईदारों को जमीन का मालिकाना हक प्राप्त हुआ। और फिर हरित क्रांति जिसके तहत गांवों में भारी निवेश हुआ और खेती की उत्पादकता में सुधार हुआ। भूमि सुधारों का वास्तविक जमीन जोतने वालों को फायदा नहीं हुआ क्योंकि ये अक्सर ही दलित होते थे। सरकारी मशीनरी को यह मालूम नहीं था कि बंटाईदारों को भी श्रेणियां हैं। दलित जोतदारों का भू स्वामियों से सीधा सम्बन्ध नहीं था। अतः सरकार ने बिचैलियों को असली बंटाईदार माना जो कि मुख्यतः मध्यम जातियों से थे। ज्यादातर बेनामी हस्तांतरण भी इन्हीं के नाम हुआ क्योंकि ये पुराने जमींदारों के विश्वास पात्र थे। हरित क्रांति का ज्यादा फायदा बड़े किसानों को ही पहुंचा।

शूद्र जातियों के एक हिस्से के सशक्तीकरण से इस वर्ग ने पूंजीपति वर्ग के साथ मिलकर एक सशक्त पक्ष का निर्माण किया और राजनैतिक सत्ता में हिस्सा बांटा। उनके और ब्राह्मणों के बीच जो अंतर्विरोध थे जिन्होंने अंग्रेजी शासन के दौरान ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों को जन्म दिया, वे इस दौरान छिप गए और गांवों में यह वर्ग प्रभुत्वशाली भूमिका अदा करने लगा।

शूद्र वर्ग में आने वाली सब जातियां आर्थिक रूप से संपन्न नहीं थीं और न ही उनकी सामाजिक स्थिति एक जैसी थी। इनमें से कई कारीगर और सेवा करने वाली जातियां दलित जितनी ही गरीब थीं और जाति व्यवस्था के अलग-अलग पायदानों पर थीं। सीढ़ीदार जातिगत ढांचे में ये समकक्ष थीं। दलितों के मुकाबले ये सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप में एकदम भिन्न थीं। दलितों के मुकाबले इनकी श्रेष्ठता की भावना को गांव के शासक वर्ग द्वारा शह दी गई। शासक वर्ग यह नहीं चाहता था कि यह तबका दलितों के साथ मिल जाए। इस प्रकार सभी शूद्र जातियां दलितों के मुकाबले के लिए दो कारणों से एकजुट हुईं। प्रथम तो जातिगत श्रेष्ठता के चलते वे दलितों का आसानी से आर्थिक शोषण कर सकती थीं और द्वितीय दलित जातियों में दलित आंदोलन के चलते आई राजनैतिक चेतना और आरक्षण से मिली आर्थिक उन्नति से इन जातियों को खतरा महसूस हुआ। इस प्रक्रिया से ग्रामीण संपन्न शासक वर्ग को दो फायदे हुए। उनका अपनी जाति के साथ शोषण का व्यवहार छिपा और उन्हें राजनैतिक सत्ता के लिए जनाधार उपलब्ध हुआ। 

जहां एक तरफ जातिगत पहचान का उपयोग मध्यम जातियों का एक मजबूत गठजोड़ खड़ा करने के काम आया, दूसरी तरफ इसी जातिगत पहचान का उपयोग दलितों को विभिन्न जातियों में बांटने के लिए किया गया। ऐतिहासिक रूप से सभी दलित जातियां आर्थिक रूप से एक समान नहीं थीं। सभी के अपने जाति विशेष व्यवसाय थे। लेकिन एक जाति ऐसी थी जो गांव के छोटे मोटे कार्य करती थी। वहां विशेष दक्षता की जरूरत नहीं होती। यह संख्या में बड़ी हो गई और आर्थिक रूप से कमजोर। ये लोग गांव और शहर के बीच पुल का काम करते थे और इसी कारण से ब्रिटिश राज्य में इन्हें अपनी हैसियत का अहसास हुआ। सबसे पहले इन्होंने जाति व्यवसाय के खिलाफ विद्रोह किया। इस बात के सबूत हैं कि शुरू में अन्य दलित जातियों ने जाति विरोधी आंदोलन का साथ दिया। लेकिन संसदीय चुनावी राजनीति के चलते शासक वर्ग ने इनको दलित आंदोलन की मुख्यधारा से अलग कर दिया। बाद में मध्य जातियों के प्रभुत्व और दलित संघर्ष के अंतर्विरोधों ने इस मुखालिफत को हवा दी और दलित एकता की संभावनाओं को खत्म किया।

इस घटना ने वर्ग बनाम जाति की बहस को जन्म दिया। प्रश्न यह है कि कैसे वर्ग संघर्ष के साथ जाति को भी खत्म किया जाए। जहां तक भारत में मजदूर वर्ग प्रमुखतः दलित और शूद्र जाति से आते हैं, यह जरूरी है कि ये दोनों मिल कर एक वर्ग बनें। इसी प्रकार जाति का विनाश तभी संभव है जब दलित और निचले स्तर की शूद्र जातियां मिलकर सत्ता के सभी क्षेत्रों में उच्च जातियों के प्रभुत्व को चुनौती दें। वर्ग की धारणा आर्थिक शोषण पर आधारित है जिसे भारतीय गांवों की अर्धसामंती व्यवस्था में सामाजिक श्रेणियों में अलग नहीं किया जा सकता, अतः यह जाति की अवधारणा से गुंथी हुई है। लेकिन वर्ग संघर्ष के पक्षकारों ने वर्ग को सीमित नजरों से देखा और वे जाति को पकड़ नहीं पाए जो भारतीय सर्वहारा की जिंदा हकीकत है। उन्होंने इसकी लगातार उपेक्षा की जब तक कि सच्चाई के थपेड़ों ने उन्हें मजबूर नहीं कर दिया। फुले और अंबेडकर के पक्ष में कहा जाना चाहिए कि उन्होंने समस्या की जड़ को पहचाना, जाति को शोषण की धुरी के तौर पर पहचान कर आंदोलन के केंद्र में स्थापित किया और भारतीय समाज के जनवादीकरण के लिए एक स्थानीय एजेंडा निर्धारित किया। 

अफसोसजनक रूप से यह वर्ग विरोधी, जाति विरोधी एजेंडा साम्यवादियों के वर्ग विश्लेषण के मुकाबले में आ गया और इसने जाति बनाम वर्ग की एक फिजूल बहस को जन्म दिया जो आज भी जारी है। यदि देश में जारी वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था को खत्म करना है तो जाति और वर्ग दोनों ही श्रेणियों को अपनी सीमाओं को फैलाना होगा। यह प्रक्रिया इन दोनों को पास लाएगी। लेकिन यह जाति और वर्ग चेतना पर आधारित जमीनी संघर्षों द्वारा ही संभव है, न कि किसी बुद्धिजीवी के दिमाग में उपजे विचारों से।

शूद्र जातियां दलितों के साथ मिलकर वंचित वर्ग बनाती हैं। लेकिन साथ ही ब्राह्मणवाद का प्रतिनिधित्व भी करती हैं और शोषणकारी भी हैं। अतः इन पर वर्गीय पैमाना लागू करना जरूरी है। इसी प्रकार जहां तक दलित जातियों में भी वर्ग निर्माण हुआ है, यहां पर भी वर्गीय पैमाना लागू करना होगा। यह समझने की आवश्यकता है कि मात्र जातीय पहचान न केवल नाकाफी है बल्कि नुकसानदायक भी। जाति के इस्तेमाल से चुनावी राजनीति में कोई फायदा तो हो सकता है, लेकिन क्रांतिकारियों द्वारा चाहा गया सामाजिक परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इसके लिए जरूरत है एक ऐसे मजबूत दलित आंदोलन की जो ब्राह्मणवाद के अवशेषों से लड़ते हुए दूसरी सभी जातियों के मेहनतकश और शोषित वर्गों को भी साथ ले सके। दूसरी तरफ जरूरत है एक ऐसे कम्युनिस्ट आंदोलन की जो वर्गीय संघर्ष में सामाजिक व सांस्कृतिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष को शामिल करे। शोषण की दोनों ही धुरियों के खिलाफ एक साथ संघर्ष की आवश्यकता है। सबसे ज्यादा शोषित होने के कारण दलितों को इन दोनों तरह के संघर्षों में अगुवा होना पड़ेगा। ब्राह्मणवादी हिंदुत्व का विरोध कर दलितों ने इसे त्यागा लेकिन धर्म को नहीं। उल्टे दलितों में अभी भी, जब धर्म की सामाजिक आचार विचार में मुख्य भूमिका नहीं रही, धर्म के प्रति एक आकर्षण बरकरार है।

जैसा कि हम जानते हैं, धर्मों का उदय विशेष सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों में कुछ विशेष समस्याओं का उस समय मौजूद ज्ञान के आधार पर हल करने के लिए हुआ। ज्यादातर धर्मों ने मनुष्य की भावनाओं को दबा कर अगले जन्म में बेहतर जीवन का आश्वासन दिया। मार्क्स ने धर्म को अंधविश्वास बता कर खारिज किया था, कि इसका आम जनता को गुलाम बनाने के लिए सामाजिक नियंत्रण के औजार के रूप में इस्तेमाल होता है। मार्क्स के अनुसार धर्म सहारा नहीं देता बल्कि वह नियंत्रण करता है। यह जनता के लिए अफीम की तरह है जो शोषण की जंजीरों को तोड़ने की उनकी इच्छा को कुंद करता है। जब दलितों ने हिंदू धर्म का त्याग किया तो इससे उपजे खालीपन को भरने के लिए कुछ जरूरी था। लेकिन यह जरूरी नहीं था कि यह भरपाई एक और संगठित धर्म से की जाए। बुद्ध धर्म अपने प्राचीन अवतार में कितना भी क्रांतिकारी रहा हो लेकिन धीरे धीरे इसमें आख्यान, कर्मकाड, तंत्र मंत्र शामिल होते गए और यह अन्य धर्मों से भिन्न नहीं रह गया। अब यह दलितों को अपनी समस्याओं का हल भौतिक जगत में ढूंढ़ने की जगह उन्हें भ्रमित करता है।

राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभुत्व के मुद्दे

यह लग सकता है कि राष्ट्रीय आंदोलन अब बीती हुई बात है, जो कि अतीत के एक बीते हुए पल से जुड़ा हुआ है। लेकिन यह प्रसंग कुछ ऐसे वैचारिक प्रश्नों को सामने लाता है, जो भारत में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए अभी भी प्रासंगिक हैं।

राष्ट्र

सबसे पहला प्रश्न है राष्ट्र का। दलित आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन की इस प्रस्थापना को खारिज किया कि भारत एक राष्ट्र है। मिसाल के लिए अंबेडकर ने जातीय समाज में राष्ट्र के विचार को खारिज कर दिया और कहा कि प्रत्येक जाति एक राष्ट्र है। फुले ने कहा कि बलिस्थान (भारत के लिए फुले द्वारा प्रयोग किया जाने वाला शब्द) में जब तक शूद्र, अति शूद्र, भील, कोली आदि शिक्षित होकर एक नहीं होते, वे एक राष्ट्र नहीं बन सकते। अंबेडकर ने लिखा है कि यह मान कर कि हम एक राष्ट्र हैं, हम अपने आपको भुलावा दे रहे है। उन्होंने कहा कि जब हम हजारों जातियों में विभाजित हैं, तो हम एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं। जाति राष्ट्र विरोधी है। एक दूसरी जगह पर उन्होंने कहा जब तक तुम अपनी सामाजिक व्यवस्था को नहीं बदलोगे, तुम तरक्की नहीं कर सकते। आप समुदाय को न रक्षा के लिए प्रेरित कर सकते हैं और न आक्रमण के लिए। न आप एक राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं और न नैतिकता का। जाति की नींव पर आप जो भी निर्माण करेंगे उसमें दरार आ जाएगी और वह पूरा नहीं होगा। इन चेतावनियों के बावजूद और राष्ट्रीयताओं के खूनी आंदोलन के बावजूद शासक वर्ग अभी भी भारत के बहुराष्ट्रीय स्वरूप को स्वीकार नहीं कर रहा है। वह अभी भी भोली जनता को राष्ट्र के लिए कुरबानियां देने को उकसाता है और जनता के वास्तविक संघर्षों को राष्ट्र विरोधी करार देता है। विरोधाभास यह है कि इसके बावजूद पूंजीवादी विकास में मजबूत होती असमानताओं के चलते भारत में राष्ट्रीयताओं का प्रश्न और जटिल हो रहा है।

राष्ट्र की अवधारणा पूंजीवादी विकास से उपजी है, पूंजीवाद से पूर्व की जाति राष्ट्र की अवधारणा के विरोध में है। दलित आंदोलन ने इस प्रश्न को उठाकर भारत के राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को बल दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिसने आजादी के राष्ट्रीय संघर्ष को नेतृत्व दिया, उभरते हुए बुर्जुआ वर्ग की प्रतिनिधि थी, जो राजनैतिक व आर्थिक नियंत्रण करने का प्रयास कर रहा था। अंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन ने समाज के संबसे वंचित तबकों को मजबूत कर राष्ट्र के अंदरूनी सृदृढ़ीकरण की प्रक्रिया शुरू की।

अंबेडकर के संविधान निर्माण में मुख्य भूमिका में आने और नेहरू के मंत्रीमंडल में शामिल होने से वे ऊंचे सिद्धांत जो दलित आंदोलन के आधार बनते, पृष्ठभूमि में चले गए। हालांकि अंबेडकर का अपने लोगों के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ, लेकिन उद्देश्यों की प्राप्ति में समझौता करना पड़ा। अंबेडकर के सारे विरोधों के बावजूद दलित आंदोलन शासक वर्ग की संसदीय राजनीति के भंवर में फंस कर कमजोर हो गया। शुरू के दौर की कानून व्यवस्था का पालन करने की रणनीति संविधानवाद में बदल गई जिसने दलित आंदोलन को सीमाओं में जकड़ दिया। इस प्रकार अंबेडकर के जाति के विनाश (annihilation of caste) के कार्यक्रम को शासक वर्ग ने पूरी तरह राह से भटका दिया।

राष्ट्र के संदर्भ में यहां प्रश्न यह है कि दलित आंदोलन और राष्ट्रीयताओं के आंदोलन में क्या संबंध हो? राष्ट्रीयता आंदोलन अपनी विशिष्टता साबित करने के लिए पुरानी जातीय पहचानों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इसपर जोर डालने के लिए बुनियादी रूप से एक तबके के शोषण के अनुभव का इस्तेमाल किया जाता है। अंबेडकर का तर्क था कि दलित आंदोलन में राष्ट्रीयता के संघर्ष के सभी चरित्र मौजूद थे। इस प्रकार यह पूरी दुनिया की वंचित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष के साथ जुड़ जाता है। लेकिन राष्ट्रीयता के विचार का इस्तेमाल शासक वर्ग द्वारा एक दूसरे के खिलाफ हिसाब बराबर करने के लिए किया जाता है। अतः यह आवश्यक है कि संघर्ष को जन्म देने वाले मूल मुद्दों का विश्लेषण किया जाए। दलित आंदोलनों का दूसरे वंचित समुदायों के संघर्षों के साथ जुड़ाव इसको सांस्कृतिक समृद्धता देगा और मजबूत करेगा।

साम्राज्यवाद

दूसरा प्रश्न ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ संघर्ष को लेकर है। जाति विरोधी आंदोलनों ने स्वतंत्रता संघर्ष का समर्थन नहीं किया बल्कि कुछ हद तक साम्राज्यवादी शासन को जातीय अत्याचारों को समाप्त करने और सत्ता में भागीदारी हासिल करने के उद्देश्यों में सहायक की तरह देखा। यह एक तथ्य है कि दलित और दूसरी पिछड़ी जातियों ने बिना किसी सकारात्मक अपेक्षा के दमनकारी ब्राह्मणवादी शासक के मुकाबले विदेशी शासन को पसंद किया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद को देश में स्थापित करने के लिए जो निर्णायक लड़ाइयां हुईं उनमें दलित सिपाही बहादुरी से लड़े। कोरेगांव के निर्णायक युद्ध में पेशवा की पराजय के बाद जब ब्राह्मण शोक मना रहे थे, दूसरी जातियों ने पुणे में मिठाइयां बांट कर जश्न मनाया। यह शोषक के पतन पर शोषित द्वारा स्वाभाविक हर्षोल्लास था। अंग्रेजों ने दलितों के पक्ष में कई सकारात्मक कदम उठाए। दलितों को फौज में भर्ती किया, उनको शिक्षा दी, एक आधुनिक कानूनी व्यवस्था लागू की जिसमें कम से कम सैद्धांतिक रूप में जाति को न्याय के आधार के रूप में मान्यता नहीं दी। यूरोपीय परिवारों में, फैक्टरियों में, रेलवे में रोजगार के नए अवसर प्रदान किए, और बाद में राजनीतिक आरक्षण दिया। इन सब कदमों से अछूतों की जिंदगी में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। (एलिनवुड 1978, गैलेंटर 1972, कनानाइकिल 1981)। फुले ने इन भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा, ‘हमें अंग्रेजों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने मनु के कानून का पालन नहीं किया’ (कीर 1968)। 

ऐसा नहीं था कि साम्राज्यवादी शासकों ने दलितों के प्रति प्रेम के चलते ये कदम उठाए। ये कदम उनकी रणनीतिक आवश्यकताओं और विजेता के रूप में श्रेष्ठ होने की भावनाओं से प्रेरित थे। अगर कहीं इन सुधारों से उनको साम्राज्यवादी हितों को नुकसान होता नजर आया तो उन्होंने कदम वापस खींचे। जहां तक जाति विरोधी आंदोलनों का सवाल है, ऐसा नहीं था कि ये साम्राज्यवादी शासन के जारी रहने के पक्ष में थे। फुले, जिन्होंने आधुनिकता से परिचित कराने और कानून का राज स्थापित करने के लिए अंग्रेज शासन की तारीफ की, वहीं यह भी रेखांकित किया कि साम्राज्यवादी राज्य में वंचितों के उत्थान की पूरी कोशिश नहीं की जा रही है। उनको विदेशी शासन की सीमाओं का एहसास था। अंबेडकर ने साम्राज्यवादी व्यवस्था के शोषणकारी चरित्र को न केवल अपने अध्ययन ग्रंथों में बल्कि सार्वजनिक रूप से उजागर किया। उदाहरण के लिए दलितों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘आप बेहतर सड़कों, रेलवे, सिंचाई की नहरों, स्थायी प्रशासन देने और अंदरूनी शांति स्थापित करने के लिए बैठ कर अंग्रेजी नौकरशाही की तारीफ के पुल बांधते नहीं रह सकते...मैं इस बात पर सहमत होने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा कि अंग्रेजों की यह तारीफ फौरन दूर हो जाएगी, अगर हम जमीदारों और पूंजीपतियों द्वारा इस देश के गरीबों और आम जनता से मुनाफे की जबरन वसूली को देखें’ (अंबेडकर 1930)। एक दूसरे स्थान पर उन्होंने कहा, ‘हमें शासन में ऐसे लोग चाहिए जो विरोध की परवाह किए बगैर समाज के सामाजिक आर्थिक नियमों में ऐसे बदलाव लाएं जो न्याय और औचित्य के लिहाज से अनिवार्य हैं। अंग्रेजी शासन कभी भी यह भूमिका नहीं अदा करेगा’ (क्षीरसागर 1992)।

इस प्रकार जाति विरोधी आंदोलनों और विशेष कर दलित आंदोलनों ने अंग्रेजी शासन के सकारात्मक पक्ष को स्वीकारते हुए बुर्जुआ राष्ट्रवादी नेतृत्व के साथ अपने अंतर्विरोधों के मद्देनजर सामाजिक सुधार और सत्ता में निचले तबकों की हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाया। लेकिन इनको इस बात का पूरा एहसास था कि इनका भी हित साम्राज्यवादी शासन के समाप्त होने में है।

आज अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा प्रोत्साहित वैश्वीकरण के नाम पर साम्राज्यवाद के खतरे ने पूरी दुनिया को अपनी आगोश में ले लिया है। इनके कार्यक्रमों के आर्थिक दर्शन की जड़ में है बाजार की ताकतों पर निर्भरता, नियंत्रण को समाप्त करना, राज्य की भूमिका को कम करना और सार्वजनिक क्षेत्र की जगह निजी क्षेत्र को लाना। इन कार्यक्रमों के परिणाम होंगे सरकारी इकाइयों का निजीकरण, अतिरिक्त श्रम शक्ति को हटाना, अर्थव्यवस्था में निर्यात आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिए ढांचागत बदलाव, विदेशी पूंजी व तकनीक का बेरोकटोक आगमन, वित्तीय तथा सेवा प्रदाता विदेशी इकाइयों के आने व जाने की स्वतंत्रता, पूंजी व दूसरी राशियों का राष्ट्रीय सीमाओं के पार आना जाना, बौद्धिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी बदलाव, कानूनी अनुबंधों को लागू करने के लिए समुचित कानूनी वातावरण तैयार करना, निजी संपत्ति का अधिकार, और जनता को संगठित होने और विरोध करने के अधिकारों में कटौती। पूरी दुनिया का अनुभव है कि ये कार्यक्रम जन विरोधी हैं और वंचितों को और वंचित करते हैं। सबसे वंचित समुदाय होने के नाते दलितों के आंदोलन का इस कार्यक्रम से सीधा संबंध है। यह मानते हुए कि वैश्वीकरण का गरीब लोगों पर खराब असर होता है, कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि इससे दलितों की सामाजिक अक्षमता दूर करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है लेकिन यह देश में पूंजीवाद के पिछले एक सदी के अनुभवों के सही सबक पर आधारित नहीं है। जिस प्रकार से पूंजीवाद ने कुशलता के साथ जाति का इस्तेमाल किया है, वैश्वीकरण जो वर्तमान सूचना संचार के युग में पूंजीवाद का ही स्वरूप है, इस पर कोई सकारात्मक असर नहीं डालने वाला है। बल्कि जब आम लोगों की तकलीफें बढ़ रही है, नौकरियां कम हो रही हैं, महंगाई बढ़ रही है, उपभोक्तावाद असंतोष पैदा कर रहा है, सार्वजनिक सेवाओं में कमी हो रही है, होड़ बढ़ रही है, शासक वर्ग लोगों को बांटने और उनके असंतोष को दबाने के लिए जाति का इस्तेमाल करेगा। दलितों के लिए इस मुक्त बाजार आधारित विकास के कुछ विशेष निहितार्थ हैं।

एक तो तुलनात्मक फायदे के आधार पर किया गया निवेश खेती और खेती पर आधारित व्यापार का कॉरपोरेटीकरण करेगा। इसके नतीजे में कृषि के क्षेत्र में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का खेतों पर कब्जा मजबूत होगा जो भूमि सुधारों की संभावना को खत्म कर देगा। दूसरे, सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण और वैश्वीकरण द्वारा फैलाए जा रहे न्यूनतम सरकार के सिद्धांत से होने वाली सरकारी नौकरियों में कमी दलितों के रोजगार के अवसर कम करेगी। अभी भी इन नीतियों द्वारा प्रायोजित मुक्त व्यापार वातावरण, जिसका ऊंची जाति के नौकरशाहों द्वारा भरपूर समर्थन किया जा रहा है, से दलित हितों को नुकसान पहुंच रहा है। इससे दलित महिलाओं, दलित संस्कृति तथा सबसे महत्वपूर्ण अपनी आजादी के लिए होने वाले संघर्ष पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे। दलित आंदोलन को साम्राज्यवादी एजेंडे और अपने बीच के भारी अंतर्विरोधों को समझना होगा और अपने आंदोलन में इसका मुकाबला करने की रणनीति बनानी होगी।

राज्य

दलित आंदोलन के संबंध में तीसरा महत्वपूर्ण प्रश्न राज्य से इसका संबंध है। दलित आंदोलन का रवैया ऐसा रहा है कि यह राज्य को जाति और वर्ग के झगड़ों में एक निष्पक्ष निर्णायक की भूमिका अदा करने वाले के रूप में देखता है। कई बार राज्य को पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए ईमानदार, परोपकार करनेवाली इकाई की तरह देखा गया है। राज्य के प्रति यह सहृदय नजरिया समझा जा सकता है, क्योंकि दलित, आंदोलन का उदय ही राज्य द्वारा निर्मित वातावरण से हुआ। यदि औपनिवेशिक राज्य ने सबके लिए समान न्याय व्यवस्था और समान शिक्षा अवसर नहीं प्रदान किए होते, दलित आंदोलन का उदय मुश्किल था। महाड में सार्वजनिक तालाब में दलितों के अधिकार का संघर्ष राज्य के नियम कानून लागू करने के लिए ही था। बाद के संघर्ष भी कानूनी दायरे में ही किए गए ताकि राज्य का समर्थन मिलता रहे।

एक तरफ राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन के आधिपत्य और दूसरी तरफ ब्राह्मणवादी आधिपत्य का विरोध करते हुए दलित आंदोलन को परिस्थितिजन्य संभावनाओं और साधनों का इस्तेमाल करना था। महाड सत्याग्रह के समय अंबेडकर ने अपनी रणनीति स्पष्ट की कि मजबूत दुश्मन के साथ कई मोर्चों पर नहीं लड़ा जा सकता। उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि वे कानून का उल्लंघन नहीं करें। यह राज्य ही है जिसने लोगों को अपने मानव अधिकारों के हनन के विरोध में आवाज उठाने के लिए मौका दिया है। आंदोलन की रणनीति थी राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों का इस्तेमाल कर दलित अधिकारों की रक्षा की जाए और नए कानून बनाए जाएं।

बाद के राजनीतिक सुधारों के साथ दलित आंदोलन ने जन संघर्ष का रास्ता छोड़ दिया और राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए चुनावी रास्ता पकड़ा। लेकिन राजनीतिक सत्ता की सीमाएं राज्य के ढांचे के तहत सीमित थीं। यह एक सोची समझी रणनीति थी कि राज्य द्वारा हासिल संरक्षण का इस्तेमाल करते हुए प्रतिद्वंद्वी गुटों से दलितों के लिए फायदे प्राप्त किए जाएं। लेकिन यह तथ्य है कि दलित आंदोलन का संचालन करने वाली उदार लोकतांत्रिक सोच के पास न तो कोई वैकल्पिक रणनीति थी और न ही सत्ता की कोई वैकल्पिक समझ। नतीजे में दलित आंदोलन, जिसे शुरुआत में अपनी मजबूरियों का एहसास था, शासक वर्ग के जाल में फंस गया। इसने औपनिवेशिक शासन के हाथों से देशी बुर्जुआ और भूस्वामी गठजोड़ के हाथों में सत्ता के संक्रमण को भुला दिया। बराबरी के संघर्ष में औपनिवेशिक राज्य को निर्णायक की भूमिका में देखना एक रणनीति हो सकती है, लेकिन जब खुद राजसत्ता ही विरोधी पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हो तब अपने पुराने रवैए पर बने रहने को उचित तो नहीं ही ठहराया जा सकता, यह खुद को हार की तरफ ले जाने वाला है।

दलित आंदोलन ने राज्य की ताकत की अवधारणा को इसके बराबरी के दावे के साथ जोड़ा। आरक्षण की असल में शुरुआत यहीं से हुई। यह माना गया कि यदि दलितों को राज्य की नौकरियों में उनकी आबादी के बराबर का हिस्सा मिल जाए तो यह माना जा सकता है कि सत्ता में उनकी बराबर हिस्सेदारी है। लेकिन इस योजना में खामी राज्य के चरित्र को लेकर है। राज्य कैसा भी हो, कल्याणकारी हो या किसी और किस्म का, निर्विवाद रूप से यह शासन करने वाले वर्ग के हाथ में शासित वर्गों का दमन करने का औजार है। अतः यदि शासित वर्ग अपनी मर्जी से इस औजार का हिस्सा होना स्वीकार करते हैं तो इससे शासक वर्ग का ही फायदा होगा। आमतौर पर शासक वर्ग यदि किसी विरोधी वर्ग को सीधे टकराव में काबू में नहीं कर पाते हैं तो वे हमेशा समायोजित करने की रणनीति अपनाते हैं। यह मानी हुई बात है कि समायोजित किए गए लोग बहुसंख्यकों द्वारा दबा दिए जाएंगे। साफ शब्दों में यह संभावित विरोधियों को एक तरह की रिश्वत है। इस तरह अंतिम तौर पर अपनी मर्जी से इस शोषणकारी व्यवस्था का हिस्सा बनने की दलित रणनीति, शासक वर्गों के हित में है।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि राज्य सत्ता में भागीदारी की रणनीति से दलितों को उल्लेखनीय फायदे हुए। शिक्षा, रोज़गार व राजनीति में आरक्षण के चलते बहुत से दलित ऐसे पदों पर पहुंचे जहां वे पहुंचने की सोच भी नहीं सकते। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ हमेशा समझौता भी जुड़ा हुआ था। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि इस प्रक्रिया से दलित राजनैतिक रूप से शक्तिहीन हुए और उनमें लाभार्थियों के एक ऐसे अलग वर्ग का उदय हुआ जिसका सामान्य दलित जनता से बहुत कमजोर रिश्ता था। इस वर्ग ने दलित मुक्ति की विचारधारा को पूरी तरह से तोड़-मरोड़ दिया। स्थानीय सर्वहारा वर्ग के तौर पर दलितों का उत्थान जेल में कुछ उपहार बांट कर नहीं किया जा सकता। यह आजादी तभी संभव है जब इस जेल को ही बारूद से उड़ा दिया जाए और इसकी जगह उनकी जरूरत के मुताबिक एक नए आसरे का निर्माण किया जाए। 

आजादी के बाद किए गए समझौतों के कारण आए बदलावों के बावजूद आज भी एक आम दलित व्यक्ति अनपढ़ कुपोषित भूमिहीन मजदूर है जो जीविकोपार्जन के लिए कई तरह के शोषकों के जाल में फंसा है। वह सैकड़ों सालों से विकसित तंत्र का शिकार है। दलित आंदोलन ने शुरू में फौरी रणनीति के तहत राज्य का सहारा जरूर लिया लेकिन लंबी रणनीति इस राज्य को खत्म कर इसकी जगह दलित मजदूर राज्य स्थापित करने की होनी चाहिए।

कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ संबंध

तीसरा कारक है दलित आंदोलन के कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ असहज संबंध। यह कारक आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण विरोधाभास है। यह विरोधाभास सैद्धांतिक मतभेदों से उतना पैदा नहीं हुआ, हालांकि दलित आंदोलन के जनक अंबेडकर के दिमाग में कुछ अस्पष्ट सैद्धांतिक साम्यवाद विरोधी धारणाएं थीं, जितना कि कम्युनिस्ट नेताओं के दलित आंदोलन के प्रति रुख से पैदा हुआ। बंबई के श्रम संगठनों में कार्यरत इन नेताओं ने रूढ़िवादी नजरिए से जाति के प्रश्न को ऊपरी ढांचे का एक मसला माना जो क्रांति के साथ अपने आप दूर हो जाएगा। दलित आंदोलन ने इस पर जवाब दिया कि जाति के रहते क्रांति ही कैसे होगी। इन श्रम संगठनों के कम्युनिस्ट नेता बंबई की कपड़ा मिलों में दलितों के साथ हो रहे भेदभाव या ज्यादा कमाने वाले विभागों जैसे बुनाई में दलितों को काम नहीं दिए जाने पर खामोश रहे। दलित मजदूरों की आर्थिक स्थिति उनके सवर्ण साथियों से बहुत ज्यादा खराब थी। अंबेडकर का मानना था कि कम्युनिस्टों ने श्रम संगठनों का उपयोग राजनैतिक उद्देश्यों के लिए किया न कि कामगार वर्ग के कल्याण के लिए। जब भी उन्होंने हड़ताल जैसे कदम उठाए, दलित मजदूरों का ज्यादा नुकसान हुआ, क्योंकि वे ज्यादा गरीब थे। 

श्रम संगठनों के इस गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर अंबेडकर को दो कारणों से आपत्ति थीः (1) मजदूर वर्ग की राजनैतिक चेतना बढ़ाने के स्थान पर संकीर्ण आर्थिक फायदे प्राप्त करना (2) अपने राजनैतिक मंसूबों की प्राप्ति के लिए कामगार वर्ग का इस्तेमाल करना। मार्क्सवाद पर अंबेडकर का लेखन बंबइया कम्युनिस्टों के प्रति उनकी नाराजगी से प्रभावित है। मार्क्सवाद को इसके कुछ स्वयंभू अनुयायियों से पहचानने की ये विरासत दलितों में अभी भी है। वे मार्क्सवाद की कमियां दिखाने के लिए संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों का उदाहरण देते हैं। उनको यह समझना होगा कि मार्क्सवादी विचारधारा खुद अपनी आलोचना की मांग करती है लेकिन सावधानीपूर्ण अध्ययन के बाद।

बहुत सारी गलतफहमियां दलित आंदोलन के पेटी बुर्जुआकरण (निम्न मध्यमवर्गीय नियंत्रण) से पैदा हुई हैं। निहित स्वार्थों ने अंबेडकर के इधर उधर बिखरे विचारों का इस्तेमाल कम्युनिज़्म को नीचा दिखाने के लिए किया। यह जान बूझ कर अर्थ का अनर्थ करने वाली बात है। हालांकि अंबेडकर ने कम्युनिस्ट सिद्धांत की इतने विस्तार से चर्चा नहीं की जितनी जरूरत थी, लेकिन वे इसके विरोध में नहीं थे। बल्कि उन्होंने कम्युनिस्ट सिद्धांत की सराहना की और इसे खुद के करीब बताया। दलित मुक्ति में व्यस्त रहते हुए उन्होंने मार्क्स के तर्क पर कहा कि किसी भी दर्शन की सफलता इसको अमली जामा पहनाने में ही साबित होती है। उनका विचार था कि यदि कम्युनिस्ट इस नजरिए से काम करें तो रूस से पहले भारत में सफलता मिल सकती है (जनता, 15 जनवरी 1938)। उनके लिए कम्युनिज्म उनके सबसे उंचे आदर्श बौद्ध मत के लिए एक कसौटी था। कम्युनिस्टों के कट्टरवाद से हुए कड़वे अनुभवों के चलते उन्होंने कम्युनिज्म के विरोध में भी तर्क दिए और इसकी असफलता की भविष्यवाणी भी की। लेकिन यह कम्युनिस्टों के क्रियाकलापों में व्याप्त कट्टरवाद की प्रतिक्रिया थी। सोवियत यूनियन और पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्टों के पतन के बाद कुछ लोग उनके कम्युनिस्ट विरोधी विचारों का खुशी हवाला देकर कहते हैं कि अंबेडकर सही थे। हां वह सही थे, लेकिन इस परिघटना पर खुशी जाहिर करना दुर्भाग्यपूर्ण हैं। यह सिर्फ अंबेडकर और कम्युनिज्म, दोनों के प्रति अज्ञानता को ही उजागर करता है। साथ ही इस तरह का नजरिया दलितों को उस विचारधारा से दूर ले जाता है जो पूरी दुनिया के वंचितों के प्रति समर्पित है। दलित आंदोलन को अपने सबसे महत्वपूर्ण संभावित सहयोगी के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करना होगा।

निष्कर्ष

दलित आंदोलन को राज्य, धर्म, शोषण के दूसरे तरीकों और संस्कृति पर अपनी राय पर दोबारा विचार करना होगा। इसे अपने उद्देश्यों को दोबारा परिभाषित करना होगा - क्या उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित एक नया समाज बनाता है या फिर शोषणकारी समीकरणों में पक्षों को पलट भर देता है। इस परिप्रेक्ष्य में इसे अपने दोस्तों और दुश्मनों के बारे में पुनर्विचार करना होगा। वैश्वीकरण का युग यह मांग करता है कि विभिन्न वर्ग अपने पक्ष स्पष्ट करें। ऐसा लगता है कि आंदोलन में उर्जा कम हो गई है और यह अतीत में बंधा हुआ है। इस पतन से दलित जनता को नुकसान हुआ है। अब इसे अपनी आलोचना करनी चाहिए।

जहां दलित आंदोलन में सख्त स्वयं आलोचना की जरूरत है, इसके सकारात्मक पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा। ये बहुत सारे हैं। दलित आंदोलन ने स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के मूल्यों की स्थापना की, शोषण और अन्याय के खिलाफ संघर्ष में राजनीतिक चेतना विकसित की, वैज्ञानिक तर्कवाद को प्रोत्साहन दिया और किसी भी प्रकार के आडंबर और ढकोसले का विरोध किया। यदि उपलब्धियों की बात करें तो इससे शिक्षा, सांगठनिक क्षमता और प्रतिरोधी ढांचे के साथ काम करने की क्षमता के क्षेत्र में एक आधार खड़ा किया हैं। इतने छोटे समय में यह उपलब्धि हासिल करना आसान नहीं है। दुख की बात यह है कि आंदोलन इन उपलब्धियों पर पकड़ खो रहा है और दुश्मन के बनाए रास्ते पर भटक रहा है। यह अपनी उपलब्धियों को मजबूत करने और लंबे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपने सभी सहयोगियों को एकजुट नहीं रख पाया। यह तभी संभव है जब यह निम्न मध्यवर्गीय प्रभुत्व से आजाद हो और दलित जनता की तरफ रुख करे। इसके लिए कुछ नियम बनाए जा सकते हैं - जैसे कि उन मुद्दों को पहले लेना जो बहुसंख्यक दलित वर्ग को छूते हैं, फैसला लेने की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी के लिए संरचनात्मक स्पेस पैदा करना, जनता में क्रांतिकारी संस्कृति को प्रोत्साहन देना, किसी भी तरफ के अन्याय के खिलाफ संघर्ष के मूल्य को स्थापित करना, और किसी भी प्रकार की संकीर्णता के परे जाकर संपूर्ण मानव जाति की स्वतंत्रता के लिए काम करना। इसके लिए एक संपूर्ण बदलाव जरूरी है। ऐसा लगता है कि दलित आंदोलन की चेतना और नजरिया इसके जन्म के समय से ही वैसे ही बने हुए हैं। इसको यह अहसास करना होगा कि स्वतंत्रता के बाद की स्थिति औपनिवेशिक समय से ज्यादा उलझी हुई है। 

अनुवादकीय टिप्पणी:

1. भौतिकवाद: वह विचारधारा जिसके अनुसार सामाजिक घटनाओं का कारण वैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा पता करना चाहिए। यह विचारधारा किसी भी स्वरूप में ईश्वर के अस्तित्व को नकारती है।
2. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद: प्रकृति में (तथा इसी प्रकार समाज में) परस्पर विरोधी प्रक्रियाएं चलती रहती हैं और एक नए स्तर पर उसके विकास को मुमकिन बनाती हैं। उदाहरण के लिए शरीर में विकास तथा क्षरण दोनों प्रक्रियाएं एक साथ चलती हैं।
3. बुर्जुआ: मध्यम वर्ग, वह वर्ग जिसका उत्पादन के साधनों जैसे मशीनों, कारखानों, जमीन आदि पर कब्जा होता है और जो जीवन यापन करने के लिए शारीरिक श्रम नहीं करता है।
4. राष्ट्रीयता: एक क्षेत्र विशेष में रहने वाली एक बड़ी जाति जिसकी भाषा, खानपान एक जैसा है। एक राष्ट्र में बहुत सारी राष्ट्रीयताएं संभव हैं, जैसे भारत में नागा, गोरखा, तमिल आदि।
5. वैज्ञानिक समाजवाद: वैज्ञानिक सिद्धांतों पर टिका समाजवाद।
6. साम्राज्यवाद: एक राष्ट्र द्वारा दूसरे देशों का आर्थिक शोषण करने की प्रवृत्ति। वर्तमान में अमेरिका एक साम्राज्यवादी राष्ट्र है।
7. आधार व ऊपरी संरचना: मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार किसी भी समाज की आर्थिक गतिविधियां (अर्थतंत्र) उसका आधार है। इसी आधार पर सामाजिक ढांचा (वर्ग/जाति आदि) और संस्कृति आदि खड़े होते हैं। अतः बदलाव के लिए जरूरी है कि आधार (अर्थतंत्र) पर प्रहार किया जाए न कि ऊपरी संरचना पर। 
8. सर्वहारा की तानाशाही: बदलाव लाने के लिए मजदूरों (सर्वहारा) की तानाशाही जरूरी है। इसका अर्थ है कि एक पार्टी का शासन जैसा रूस, चीन आदि समाजवादी देशों में हुआ।
9. उपनिवेशवाद: उन्नीसवीं व बीसवीं सदी की वह व्यवस्था जिसमें पश्चिमी यूरोप के देशों ने तीसरी दुनिया के देशों को अपने अधीन कर उनका आर्थिक शोषण किया।

संदर्भ

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25 अगस्त 2013

नियमगिरि: लूट के ताबूत में आखिरी कील.

अभिषेक श्रीवास्‍तव
(रायगढ़ा की आखिरी ग्रामसभा से लौटकर)


नियमगिरि के कोंध
सोमवार 19 अगस्‍त,2013 का दिन उस गांव के लिए शायद उसके अब तक के इतिहास में सबसे खास था। आंध्र प्रदेश की सीमा से लगने वाले ओडिशा के आखिरी जिले रायगढ़ा से 60 किलोमीटर उत्‍तर में नियमगिरि के जंगलों के बीच ऊंघता सा गांव जरपा- जो पहली बार एक साथ करीब पांच सौ से ज्‍यादा मेहमानों के स्‍वागत के लिए रात से ही जगा था। सबसे पहले आए कुछ आदिवासी कार्यकर्ता और उनकी सांस्‍कृतिक टीम। फिर दो-चार पत्रकार और कैमरामैन। और पीछे-पीछे सीआरपीएफ के जवानों की भारी कतार। एक के बाद एक इनसास राइफलों से लेकर क्‍लाशनिकोव और मोर्टार व लॉन्‍चर कंधे पर लादे हुए, गोया कोई सैन्‍य ऑपरेशन शुरू होने जा रहा हो। घने जंगलों के बीच झाडि़यों में इन जवानों ने अपनी पोज़ीशन ले ली थी। ओडिशा पुलिस अलग से आबादी के बीच घुली-मिली सब पर निगाह रखे हुए थी। सरकार द्वारा तैनात ठिगने कद का एक जिला न्‍यायाधीश प्‍लास्टिक की कुर्सी पर टिका था और उसके कारकुन आगे के आयोजन के लिए तंबू गाड़ रहे थे। टीवी कैमरे डोंगरिया कोंध के विचित्र चेहरों और साज-सज्‍जा को कैद करने में चौतरफा दौड़ रहे थे जबकि नौजवान आदिवासी लड़कियां बची-खुची खाली कोठरियों में अपना मुंह छुपा रही थीं। यह ''जरपा लाइव'' था, फिल्‍म से बड़ा यथार्थ और फिल्‍म से भी ज्‍यादा नाटकीय। और ये सब कुछ किसके लिए हो रहा था? एक विशाल बहुराष्‍ट्रीय कंपनी के लिए, जिसे यहां के जंगल चाहिए, पहाड़ चाहिए और उनके भीतर बरसों से दबा हुआ करोड़ों टन बॉक्‍साइट चाहिए।

वेदांता- यह नाम सुनते ही नियमगिरि पर्वत में रहने वाले दस हज़ार डोंगरिया, झरनिया और कुटिया कोंध आदिवासी अपनी ''ट्रेडमार्क'' टांगिया (कुल्‍हाड़ी) चमकाने लगते हैं। शायद पीढि़यों के अपने अस्तित्‍व में इन डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने अनास्‍था के पर्याय के तौर पर कोई इकलौता शब्‍द चुना है तो वो है वेदांता। इस दुश्‍मन से विरोध जताने के लिए और हमखयालों की पहचान के लिए इनकी ''कुई'' भाषा को पिछले कुछ वर्षों में एक और शब्‍द मिला है ''जिंदाबान'' (ये जिंदाबाद नहीं बोलते)। कुल मिलाकर मामला ये है कि लंदन की कंपनी वेदांता को यहां से कुछ किलोमीटर नीचे लांजीगढ़ में अपनी अलुमीनियम रिफाइनरी चलानी है जिसके लिए बॉक्‍साइट उसे नियमगिरि के पहाड़ों से निकालना है। नियमगिरि की श्रृंखला कोरापुट, कालाहांडी, बोलांगीर और रायगढ़ा नाम के निर्धनतम जिलों को पालती है। इससे यहां के लोगों को पानी मिलता है, फल-फूल मिलते हैं, लकड़ी, वनोत्‍पाद, धान, मक्‍का, औषधियां सब कुछ मिलता है। खेतों की कुदरती सिंचाई जिस तरह यहां के पहाड़ों से होती है, ऐसा उदाहरण शायद देश में कहीं और न मिले। इन पहाड़ों को आज तक किसी ने नहीं छुआ। यहां जिंदगी बेरोकटोक अपनी गति से ठीकठाक चलती रही है, बावजूद इसके कि मुख्‍यधारा के समाज की तुलना में इसे हमेशा से सबसे गरीब कहा जाता रहा। कभी सरकार ने केबीके (कोरापुट, कालाहांडी, बोलांगीर) प्रोजेक्‍ट चलाया तो कभी इंटिग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी ने अपने पैर पसारे, लेकिन इन सब योजनाओं की परिणति दरअसल आज वेदांता बनाम नियमगिरि के इकलौते संघर्ष में आकर सिमट गई है।

यह संघर्ष जितना अंतरराष्‍ट्रीय है उतना ही ज्‍यादा स्‍थानीय भी है। एक ओर समरेंद्र दास नाम के एक्टिविस्‍ट हैं जो लंदन में नियमगिरि के आदिवासियों की आवाज़ को लगातार उठाते रहे हैं, तो दूसरी ओर रायगढ़ा जिले के मेकैनिकल इंजीनियर राजशेखर हैं जिन्‍हें नियमगिरि के आदिवासियों के बारे में कुछ भी पता नहीं है, सिवाय इसके कि यहां वेदांता का एक प्‍लांट लगाया जाना है और इसी से इस क्षेत्र के विकास की राह निकलनी है। रायगढ़ा के लोगों को बिल्‍कुल अंदाजा नहीं है कि 40,000 करोड़ रुपये के इस निवेश के खिलाफ़ महज़ 112 गांवों के आदिवासियों की आवाज़ इतनी अहम क्‍यों है। कभी आंध्र के पड़ोसी कस्‍बे पार्वतीपुरम से उजड़ कर रायगढ़ा में बसे और अब जयपुर की एक बहुराष्‍ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे 26 साल के युवा इंजीनियर राजशेखर कहते हैं, ''शहर में कोई इस बारे में बात नहीं करता। सब चाहते हैं कि बस कंपनी का काम शुरू हो ताकि लोगों को रोज़गार मिल सके। वैसे भी, वेदांता ने कितना सामाजिक काम इस इलाके में किया है। पता नहीं आदिवासियों को क्‍या दिक्‍कत है इससे?'' राजशेखर जिस सामाजिक काम का हवाला दे रहे हैं, वह वेदांता के सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्‍पॉन्सिबिलिटी) का हिस्‍सा है जिसके तहत प्रोजेक्‍ट एरिया लांजीगढ़ में डीएवी वेदांता पब्लिक स्‍कूल, वेदांता अस्‍पताल और ऐसे ही कई काम शुरू किए गए हैं। करीब से देखने पर हालांकि सच्‍चाई कुछ और जान पड़ती है।

जरपा: अंतिम ग्रामसभा
वेदांता के स्‍कूल में पढ़ने वाले बच्‍चे या तो उसके कर्मचारियों के हैं या फिर उन गैर-आदिवासियों के, जो कंपनी के ठेके-पट्टे पाकर लाभार्थी की श्रेणी में आ गए हैं। वेदांता के अस्‍पताल के बारे में स्‍थानीय आदिवासी नेता कुमटी मांझी बताते हैं, ''यहां जाने से आदिवासी को डर लगता है।'' अस्‍पताल बाहर से देखने पर सुनसान और उजाड़ दिखता है। सिर्फ एक सिक्‍योरिटी वाला तैनात है, न तो मरीज़ और न ही डॉक्‍टर। लांजीगढ़ के बाज़ार में ईंटों का एक परिसर है जिस पर वेदांता मार्केट कॉम्‍प्‍लेक्‍स खुदा हुआ है। यह जगह खाली और गंदी है। भीतर मुर्गियों का बसेरा है। दरअसल, पहाड़ों में खनन के लिए जिन्‍हें उजाड़ा जाना है उनके लिए वेदांता के पास कोई योजना नहीं। जिन्‍हें वेदांता के आने से लाभ मिला है, उनके उजड़ने का कोई सवाल न पहले था और न ही आज है। लांजीगढ़ में प्रवेश करते ही आप अचानक चमचमाती नई मोटरसाइकिलों की भारी संख्‍या और उस पर बैठे आत्‍मविश्‍वासी नौजवानों को देखकर हतप्रभ रह जाएंगे। यह नज़ारा दस किलोमीटर पीछे तक नहीं था। वहां सिर्फ साइकिलें थीं और कंधे पर टांगियां लटकाए ग्रामीण आदिवासी। यह फर्क नियमगिरि की तलहटी में बसे राजिरगुड़ा गांव से लांजीगढ़ के बीच 20 किलोमीटर के सफ़र में बिल्‍कुल साफ दिखता है। लंबे समय तक गरीबी झेलने और वेदांता के आने से अचानक पैदा हुई विकास की आकांक्षा ने यहां के लोगों में एक मानसिक फांक पैदा कर दी है।नियमगिरि की तलहटी में बसे पात्रागुड़ा गांव के निवासी और साइकिल मरम्‍मत की दुकान चलाने वाले सूरत के शब्‍दों में इसे आसानी से समझा जा सकता है, ''नियमगिरि के जाने का दुख हमें भी है। यह हमारी मां है। लेकिन क्‍या करें। कंपनी खुलेगी तो ज्‍यादा साइकिल पंचर होगी, ज्‍यादा धंधा आएगा।''

इस बयान में कितनी संवेदना है और कितनी चालाकी, इसे समझने में शायद वक्‍त लगे। बहरहाल, 19 अगस्‍त की पल्‍लीसभा का नतीजा इस देश में विकास को लेकर लोकल बनाम ग्‍लोबल की बहस में एक नई लकीर खींच रहा है। जरपा गांव के कुल सात परिवारों के 12 वोटरों ने वेदांता के प्रोजेक्‍ट को जिला जज एस.सी. मिश्रा और सैकड़ों सीआरपीएफ जवानों की मौजूदगी में सिरे से खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल में आए निर्देश पर 112 गांवों की राय प्रोजेक्‍ट पर ली जानी थी। राज्‍य सरकार ने आदिवासी मंत्रालय और कानून मंत्रालय को ठेंगा दिखाते हुए वेदांता के जमा किए हुए हलफनामे के मुताबिक सबसे कम आबादी वाले सिर्फ 12 गांव इसलिए चुने थे कि उन्‍हें प्रभावित किया जा सके और फैसला कंपनी के पक्ष में करवाया जा सके। खुद आदिवासी मामलों के मंत्री किशोर चंद्र देव ने अपने साक्षात्‍कार में इस पर रोष जताया है। लेकिन सच्‍चाई किसी भी हेरफेर की मोहताज नहीं होती। पासा उलटा पड़ा। वेदांता को 12-0 से हार का मुंह देखना पड़ा है।
वेदांता को खदेड़ने के बाद

फिलहाल तो सारी मोर्टारें और सारे लॉन्‍चर एक सहज लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सामने ध्‍वस्‍त होते दिख रहे हैं। जरपा में उत्‍सव का माहौल है। पल्‍लीसभा के बाद से ही आदिवासियों के नियम राजा बरसे जा रहे हैं और फिसलन भरी घाटियों में उत्‍सव के नगाड़े गूंज रहे हैं। डोंगरिया जानते हैं कि यह जीत अधूरी है। यह महज एक पड़ाव है। ज़रूरी नहीं कि वेदांता चला जाए। मामला अरबों के निवेश का है। नियमगिरि सुरक्षा समिति के नेता लिंगराज आज़ाद इसीलिए कहते हैं, ''नियमगिरि को छूने के लिए कंपनी को हज़ारों लोगों का कत्‍ल करना होगा और हम अपने देवता, अपनी मां को बचाने के लिए खून बहाने से परहेज़ नहीं करेंगे।'' जवाब में सैकड़ों चमकदार कुल्‍हाडि़यां हरे-भरे अकाल को चीरते हुए हवा में लहरा उठती हैं और सबके मुंह से एक ही स्‍वर फूटता है, ''नियमगिरि जिंदाबान''। 

अभिषेक श्रीवास्‍तव: जनपथ ब्लाग, मेल-guru.abhishek@gmail.com, फेसबुक- यहां