28 जुलाई 2009

जनसंस्कृति मंच की बयानबाज़ी पर टिप्पणी - कृष्णमोहन (आलोचक)

प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान कार्यक्रम (रायपुर, 10-11 जुलाई, 09) के बारे में जनसंस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (दिल्ली, 11-12 जुलाई) द्वारा पारित प्रस्ताव तथ्यहीन लफ़्फ़ाजी का नमूना भर है। यह इस बात का उदाहरण है कि कोई सांस्कृतिक संगठन रचनात्मकता से कटकर जब नौकरशाही प्रवृत्तियों के चंगुल में फँस जाता है तो उसका रवैया कैसा गरिमाहीन, अलोकतांत्रिक और ग़ैरज़िम्मेदार हो जाता है। दिनोदिन स्मृतिहीन होते जा रहे हमारे समाज में एक लगभग भुलाए जा चुके लेखक की स्मृति को संरक्षित करने के कार्यक्रम को यह ‘साज़िश’ करार देता है, क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने भी शिरकत की। छत्तीसगढ़ और देश के तमाम संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी को भी इसी तर्ज पर यह उनका ‘शर्मनाक पतन’ मानता है। यही नहीं, इस आरोप से बचने का एक ‘पापमोचक’ नुस्खा भी यह सुझाता है कि ये संस्कृतिकर्मी इसे अपनी ‘नादानी’ मान लें। इस उद्यण्ड प्रस्ताव के मुताबिक शिवकुमार मिश्र, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर, अशोक वाजपेई, प्रभाकर श्रोत्रिय, नन्दकिशोर आचार्य, चन्द्रकांत देवताले, प्रभात त्रिपाठी जैसे तमाम वरिष्ठ लेखक अपने पतन अथवा नादानी के कारण ही उस कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। इसकी कोई जायज वजह उनके पास नहीं हो सकती। वैसे भी, इन बौने तानाशाहों का गुट जिसे नहीं मानता वह कोई वैध वजह कैसे हो सकती है।
बहरहाल, यह रवैया एक ऐसे संगठन के सर्वथा अनुरूप है, जो खुद तो कहीं जवाबदेह नहीं लेकिन पूरी दुनिया को अपने सामने जवाबदेह मानता है। किसी कार्यक्रम से सैकड़ों मील दूर लगभग उन्हीं तिथियों पर बैठे इसके कर्ता-धर्ता उसके ‘स्वरूप की कल्पना’ कर लेते हैं, जो वैसे भी कुछ मुश्किल नहीं, और फिर उसे अंतिम सत्य की तरह पेश करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि उस ‘खास समय’ की राजनीतिक ज़रूरत के मुताबिक़ यह कार्यक्रम सरकार की मदद के लिए कर लिया गया होगा। उन्हें इससे क़तई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इस अवसर की तैयारी वर्षों से चल रही थी। ‘प्रमोद वर्मा समग्र’ की लगभग ढाई हजार पृष्ठों की सामग्री के संकलन, संपादन और प्रकाशन के अलावा ‘स्मृति-सम्मान’ के निर्णय की प्रक्रिया, जिससे केदारनाथ सिंह, विजय बहादुर सिंह, धनंजय वर्मा और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे वरिष्ठ लेखक जुड़े हुए थे, से गुज़रकर यह आयोजन संभव हुआ। ‘समग्र’ के संपादक विश्वरंजन को प्रस्ताव में हर जगह ‘पुलिस महानिदेशक’ के रूप में याद करने की वजह भी यही है कि शब्दों की सत्ता से इस संगठन पर हाॅवी गुट का नाता टूट चुका है। इसीलिए गोरख पाण्डेय से लेकर चन्द्रशेखर तक, अपने लेखकों की विरासत को सहेजने की इसके अंदर न तो इच्छा बची है, न दूसरों के श्रम का सम्मान करने की तमीज।
जहाँ तक पुलिस महानिदेशक होने का सवाल है तो इस पद अथवा अन्य प्रशासनिक पदों से जनसंस्कृति मंच को कभी कोई समस्या नहीं रही। राज्यसत्ता का चरित्र समूचे देश में एक जैसा है और शासन-तंत्र उसकी नीतियों को लागू करने का औजार है। न इससे कम, न इससे ज़्यादा। इसलिए इस मामले में भी, अन्य मामलों की तरह, दुहरे मानदंड नहीं चल सकते। पुलिस महानिदेशक होने से किसी के व्यक्तिगत अथवा लेखकीय अधिकार कम नहीं हो जाते। दूसरों की ही तरह सत्ता से जुड़े लोगों की भी अन्य सामाजिक भूमिकाओं का वस्तुगत मूल्यांकन किए बिना उन भूमिकाओं के बारे में कही गई कोई बात निरर्थक बकवास से अधिक महत्व नहीं रखती।
इस अहंकारग्रस्त प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘वहाँ जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था।’ नैतिकता के ऊँचे पायदान पर खड़े इन महानुभावों को अगर रत्ती भर भी ज़िम्मेदारी का एहसास होता तो उन लेखकों के वक्तव्यों का भी पता करते, जिनके प्रतिनिधित्व का वे दम भरते हैं। चन्द्रकांत देवताले, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर और शिवकुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ लेखकों के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने भी अपने वक्तव्य में स्पष्ट शब्दों में मुख्यमंत्री की बात का खण्डन करते हुए विचारधाराओं के संघर्ष की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। इस प्रतिवाद को सभा ने कई बार उत्साहपूर्ण समर्थन भी दिया था। जसम के इन अधिकारियों से यही कहना है कि मुख्यमंत्री की बात सुनने में कोई ज़िल्लत नहीं थी, क्योंकि हम उनके विरोधी हैं और उनको जवाब दे सकते हैं। लेकिन आपके श्रीमुख से इन उपदेशों को सुनना सचमुच ज़िल्लत भरा है, क्योंकि आपसे हम किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं। वसीम बरेलवी की पंक्तियाँ याद आती हैं -

तुम्हारे हाथ गरेबाँ तक आ गए बढ़कर
कोई बताए कि ये वार टाल दें कैसे
जो होता पाँव में काँटा निकाल सकते थे
तुम्हारी अक्ल का काँटा निकाल दें कैसे।

सच तो यह है कि देश की जनता और राज्यसत्ता में युद्ध छिड़ा हुआ है जो आगे और तीखा होने वाला है। लेखकों और बुद्धिजीवियों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्वजनिक मंचों पर कई बार उन्हें सत्ता के नुमाइंदों की मौजूदगी के बावजूद उपस्थित होना पड़ता है। हम ऐसे मौक़ों पर अपनी जनता के सम्मान की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी के साथ जाते हैं, और किसी को ये हक़ नहीं देते कि वो हमारी इस भूमिका पर अनर्गल टिप्पणी करे। हाँ, अगर किसी को सचमुच कोई सार्थक राजनीतिक बहस चलानी हो तो वो ऐसा कर सकता है। दूसरों को नसीहत देने वाले अगर अपने गिरेबान में झाँकने को तैयार हों तो उनका स्वागत है।

32 टिप्‍पणियां:

  1. Krishna mohan ne jo kuchh kaha hai, wah itna hasyaprad hai ki, kya kaha jaye. Hindi mein vichar, pratibadhdhata, sarokaron aadi ka naash ho chuka hai. Yah ab ek samapt bhasha hai. Samapt karne walon mein KM ka naam awwal hai.

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  2. कृष्ण मोहन के बारे में सबको यह पता है कि यह परदे के पीछे से षड्यंत्रों में लगे रहते हैं. व्योमेश शुक्ल पर परिचय पत्रिका में लिखा गया सम्पादकीय इनका ही था. उसमे इतनी गन्दी भाषा थी कि शर्म को भी शर्म आ जाये. किसी को सम्मान मिले यह इन्हें बर्दाश्त नहीं होता. खुद टुच्चे सम्मानों के लिए हजारों किलो मीटर दूर तक भाग भाग कर जाते हैं. यूनिवेर्सिटी में वहां कि घटिया राजनीति और जोड़ तोड़ में लगे रहते हैं. नामवर जी की चमचागिरी कर के BHU में रीडर हो गए हैं. इनकी पहचान अब यही रह गयी हैं की नामवर जी के चमचे हैं. उनके इशारों पर उठते बैठते हैं. ऐसा शख्स जब लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर लफ्फाजी झाड़ता है तो - - -

    मनोहर "मनु"

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  3. मनोहर जी के जबाव देने का तरीका बेहद शानदार है !

    उनके अंदाज से यह जाहिर होता है कि सब कुछ उनके सामने घटित हुआ. वो उस मेज पर बैठे थे जब परिचय पत्रिका वाला सम्पादकीय कृष्णमोहन लिख रहे थे.
    वो सम्पादकीय लिखते हुए जब कृष्णमोहन के कलम की स्याही सूख गयी थी तब मनोहर जी ने ही, उतावलेपन के वसीभूत हो, अपना पेन दिया था. ऐसा उनके जबाव से जान पड़ता है.

    मनोहर जी अगर आपमें साहस होता तो आप उन बातो का जबाव लिखते जो कृष्णमोहन ने अपने जबावी पत्र में लिखा है.

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  4. श्री कृष्ण मोहन से पूर्णतः सहमत होना चाहिए । दरअसल जन संस्कृति मंच नक्सलवाद के आगे घुटना टेक दिया है । संभवतः वे बिक चुके हैं इस लिए कृष्ण मोहन को इस तरह से बकवास करके हतोत्साहित कर रहे हैं । कहाँ प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान और कहाँ जसम ।

    मुझे तो ऐसा लगता है कि जसम, प्रलेस और जलेस को लगता है कि उनके बाद दुनिया में कोई है ही नहीं । इस लिए अपने अलावा सबको वे दुश्मन की तरह देखते हैं । यह जड़़ता है, मन की कटुता है ।

    जसम को कोई अधिकार नहीं कि वे लेखक के साथ इस तरह प्रतिबंध लगायें ।

    तपेश जैन
    रायपुर, छत्तीसगढ़

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  5. कृष्ण मोहन की बातों का ज़वाब तो हमने नहीं दिया लेकिन आपकी बात का ज़वाब ज़रूर देना चाहेंगे. क्या कोई भी कुछ भी कह दे तो हम ज़वाब देने को बाध्य हैं ? क्या यह न देखें कि प्रश्न करने वाला उस प्रश्न को उठाने का कोई नैतिक अधिकार भी रखता है या नहीं ?

    हाँ आपकी यह बात हम मानते हैं कि कृष्ण मोहन के द्वारा परिचय का सम्पादकीय लिखे जाने का हमारे पास ऐसा कोई सबूत नहीं जो किसी कोर्ट ऑफ़ ला में स्वीकार हो सके. लेकिन साहित्य और विचारों की दुनिया में कानूनी सबूतों की मांग होने लगे तब तो कुछ भी कहना संभव न होगा. यह जानकारियाँ सबको पता हैं. खुद कृष्ण मोहन भी इनकार नहीं कर सकते.

    मनोहर "मनु"

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  6. मैं जसम के द्वारा कृष्ण मोहन को निकाले जाने का घोर विरोध करता हूँ. यह ठीक नहीं हुआ है. इस तरह जसम ने साबित कर दिया है कि वे लोग कितने घमंडी हैं. वे अनपढ़ लोग साहित्य संस्कृति और विचारों को स्तालिन की तर्ज़ पर नियंत्रित करना चाहते हैं. ये लेखकों को अपना चाकर बनाना चाहते हैं. ये न लेखक का कोई सम्मान करते हैं, न विचारों का. इनके लिए बस इनका कहा ही अंतिम है और वही प्रमाण है. किसी बहस की या विचार विमर्श की कोई ज़रुरत नहीं. ये मार्क्सवाद की अपनी अधूरी और अनपढ़ समझ का घमंड करते हैं और अपने सिवा सबको सूली चढाने को तैयार रहते हैं. मार्क्स की विनयशीलता इनको किसी दुसरे ग्रह की चीज़ लगेगी. मुझे बोरिस पास्तरनाक और उनके उपन्यास डॉ. जिवागो की याद आ गयी. ऐसा लेफ्ट की हिस्ट्री में बार बार हुआ है. इसीलिये बुध्धिजीवियों की लेफ्ट सत्ताओं से कभी नहीं पटी. ज्दानोव रूस में बाकायदा कविता कंट्रोलर के राजकीय पद पर थे. उन्होंने अन्ना अख्मातोवा जैसी प्रतिभाशाली कवियत्री का जीवन नष्ट कर दिया. तमाम उदाहरण हैं. कल को ये लोग सत्ता में आ गए तो साहित्य का क्या हाल करेंगे, सोच कर ही डर लगता हैं.

    नरेश निझावन

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  7. महावीर जैन14 अगस्त 2009 को 7:06 pm

    कृष्ण मोहन को जसम से निकाल देना शर्मनाक है. बहुत भयानक. इसे इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा. कृष्ण मोहन एक काबिल साहित्य साधक हैं. अगर कोई गलती हो गयी थी तो समझाना चाहिए था. इस तरह बदनाम और अपमानित करना बहुत बहुत गलत है. यह किसी भी के लिए एक जालिमाना सुलूक है.

    क्या गुनाह कर दिया कृष्ण मोहन ने. कि मुक्ति बोध पर एक अच्छी किताब क्यों लिखी ?

    "या" नाम के कविता संग्रह पर नहीं लिखा, यह उनका गुनाह है ?

    जसम के नेताओं की जीहुजूरी न करना क्या यह उनका गुनाह है ?

    रिश्वत के पैसों से जसम को चन्दा नहीं दिया होगा. इसलिए निकाल दी गए.

    महावीर जैन

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  8. কৃষ্ণা মহান জী ক জাসম সে নিকাল কার জাসম নে আচ্ছা নাহীন কিয়া

    সীতা

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  9. ہمیں تو پورا یکین ہے کی من ہی من کرشنا موہن کو خوشے اور سکوں ہوگا کی ایک جہلم اور تنشاه چیز سے پیچھا چھوٹا.

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  10. Aisa lagta hai ki Krishna Mohan apne paksh mein khud apne mitron aur samathakon se pratikriyaein likhwa rahe hain.

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  11. जमाल आज़मी17 अगस्त 2009 को 8:02 pm

    कृष्ण मोहन को जसम से निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने जसम के लिए कोई विकल्प नहीं छोडा था. ऐसा लगता है कि वे स्वयं वहां से निष्कासन चाहते थे. बेहतर होता कि वे चुपचाप त्यागपत्र दे देते बजाय इस बात का सार्वजनिक तमाशा बनाने के.

    जमाल आज़मी

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  12. Expulsion of a person from an organisation, is it such a big issue ? I fail to understand why there is so much noise and acrimony on this. Have bloggers run out of real and important issues. It does not deserve so much time and attention. Sheer wastage of cyberspace. Let us not waste anymore time on it.


    Tapan Das

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  13. bhai krishnamohanji ji mai aapka samman isliye karta tha ki maiene muktibodh par aapki kitab padhi hai. nischay hi isme aapne shram kiya hai. lekin is poori parighatna ka bad mujhe kafi dhakka laga kya apne hi dwada likhe huye shabdon ke prati apni koi pratibadhhata honi hi nahi chahiye. aaj mujhe muktibodh ki kavita 'kahne do unhen jo yah kahte hain' bar-bar yaad aa rahi hai-
    mujhko dar lagta hai,
    maibhi to safalta ke chandra ki chaya main
    ghughhu ya siyar ya
    bhoot nahin kahin ban jaun.
    ..............
    isiliye,
    isiliye,
    unka aur mera yah virodh
    chirantan hai, nitya hai, shashwat hai.
    unki us tathakathit
    jeevan-safalta ke
    khapraile chedon se
    khidki ki dararon se
    aati jab kirnen hain
    to sajjan ve, ve log
    achambhit hokar, un dararon ko, chedon ko
    band kar dete hain;
    isiliye ki ve kirnen
    unke lekhe hi aaj
    communism hai... gundagardi hai... virodh hai,

    aapke vaktavya main sabse adhik aahat karne wali baat hai gorakh ka ullekh. kya bhool gaye 'bhadua basant' kavita. khair aapka rasta aapko mubaraq. namwar se ladte huye unke sipahsalar ho gaye ab bjp se ladne ke is naye tareeke ki parinati 'lazim hai ki hum bhi dekhenge'. waise udai prakash aur aap morcha banayen to kafi dilchasp hoga.
    - dilip

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    • A copy of “Your rights and responsibilities”
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  28. With the increasing use of internet for daily activities, the chances of websites being attacked by malicious content such as malware, spyware or hackers has increased. As a business, one may need to take extra precautions to determine if the website is secure from different threats, and select a web hosting plan which comes with many security options.

    Website owners generally believe hacking as the worst kind of attack to business security as it puts at risk important customer information such as credit card numbers and contact details. This is why website managers running online stores should consider the following things while finding a hosting plan.

    1. Select a Secure Hosting Option:

    If your website is prone to security threats, you might end up losing valuable customers as people do not like to shop from places which do not offer maximum protection of their credit card information. Therefore, while making a selection, conduct a thorough research on available web hosting options and their advantages. For example, shared hosting is affordable, yet prone to security threats. On the other hand, dedicated hosting is secure to the extent you may select your own software, however, it is expensive.

    2. Look for SSL Certification:

    Look for a hosting plan which offers SSL Certification as it will allow you to encrypt all cost related data, such that the credit card information of customers will be protected from hackers.

    3. Be Aware of the OS:

    While selecting a web hosting plan, find out what operating system the hosting plan will run on. If you are looking for the most secure hosting, you need to be aware of every little detail of the operating system offered by the hosting company. Know the differences between security options offered by Linux operating system and Windows operating system. Even if you run a small online store, you will still manage databases and the security of these databases is very important.

    4. Look for Firewalls:

    While finding a hosting plan for your website, you will have to ensure the company has in place a reliable firewall system to protect their servers and your website from security threats.

    5. Get Automatic Software Updates:

    Make sure you get automatic software updates as these updates or patches allow you to protect the software or your website from potential bugs. Also, when you run your website on open source software, you risk the security of the website. Since open source software such as Joomla is free, hackers can easily find methods to breach the security of websites running on such software. However, these breaches might be avoided by using latest versions of the software. Similarly, if your web hosting plan is based on Windows operating system, make sure it gets automatic software updates from Microsoft.

    Therefore, if you run an online store, it is highly imperative you find a secure web hosting plan which comes not only with the above mentioned things but also includes spam protection. It is always wise to look for hosting companies which promise to monitor your data and the website to ensure maximum security.

    Also gather more details on [url=http://webhostingreview.info/linux-hosting/]Linux Hosting Reviews[/url] and Best Linux Hosting. Visit http://webhostingreview.info/linux-hosting/ for more details.

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  29. Craigpress.com is the new business microblogging online , where you share your business with other people

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  30. Security in all walks of life is essential for peace of mind. Security on the Internet is becoming more and more critical every day because of the increased amount and intelligence of ‘newborn’ hackers. Web hosting security is essential, especially if you have a website that sells products, and logs people’s details on your system. Remember, if your login details are compromised, then all of the login details that have been entered into your site are compromised. If this happens, all of their financial details will be compromised.

    Hackers target [url=http://webhostingreview.info/]web hosts[/url] because there is huge money in the industry if the hackers compromise the right person’s details. Hundreds of login details can hold thousands of websites, thousands of websites have millions of people’s details on them, and millions of peoples details are worth billions of pounds, therefore, when there are billions of pounds involved, there will always be people that try and gain a highly illegal advantage.

    Understanding the potential problems with security and viruses for your [url=http://webhostingreview.info/]web hosting[/url] system is essential to stopping any problems. This is an element that you need to make sure you read up on, as not reading up on this information can lead to your downfall.

    One of the ways to stop leaving a trace of your actions on your system is to buy some secure third party software that safely gets rid of your information you no longer require. Many companies and individuals alike think that wiping your cookies and your hard drive may be enough to stop potential hackers. Hackers have advanced techniques that can recover your information even if you have wiped it from your system, therefore, having the best third party software is essential to block out even the most advanced of hackers.

    Viruses are one of the few downfalls of the computer and the Internet industry. Trojans are one of the most circulated viruses and one of the most dangerous to your system. Not only are they the most dangerous but they are one of the hardest to eliminate. A Trojan installs on your system, and allows the hacker to have access to your computer; this can then allow them to install a keylogger which is dangerous to a web host. A keylogger allows the hacker to see every key that you are pressing; this means your web hosting login details will be seen the next time you login to your system. Remember, this is just one of the viruses that can compromise your web host, there are plenty of others, and they are not terribly pleasant either.

    To make sure none of the above takes place, you need to protect your system. In life if you are in danger, then you do not just sit back and do nothing. Buying third party software to protect your web hosting package is a must, especially if you take card details as a form of payment. Also, making sure you use a web host that has some of the best security features online is another must for your web host company.

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  31. I had been browsing this forum for the past couple times and lastly decided to sign up for. In order to adhere to discussion board rules I decided introducing personally. I live in Montenegro I have a fantastic family of 5 that I plan on getting to Kuwait over the subsequent fourteen days. I will post some pictures for you to see from your trip. Talk to you quickly as well as thank you in advance for that warm welcomes.
    __________
    [url=http://wzmocnione.pr4.waw.pl/buty-s307.html]buty[/url]

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