18 मई 2017

वैकल्पिक मीडिया की भ्रामक अवधारणा


सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ने के बाद इसे वैकल्पिक मीडिया करार देने की बहस भी तेज़ी से बढ़ी है। जब भी वैकल्पिक मीडिया की बात होती है तो समान्य तौर पर लोग इसे सोशल मीडिया से जोड़ देते हैं। कुछ वर्ष पहले तक वैकल्पिक मीडिया का पर्याय लघु पत्रिकाओं या फिर छोटे-मझोले अख़बारों को माना जाता था। वक़्त बदला, तकनीक बदली तो फेसबुक, ब्लॉग्स और वेबसाइट्स ने इस अवधारणा को बदल डाला, लेकिन इससे बुनियादी नहीं बदल जाते। वो सवाल आज भी यही है कि असल में वैकल्पिक मीडिया कहा किसे जाए?

 18 मई 2017 के दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित
वैकल्पिक शब्द आते ही ये साफ़ हो जाता है कि किसी संरचना/विचार या फिर किसी ईकाई के बरअक्स कोई ऐसा ढांचा, जो उससे अलग और कई अर्थों में उलट तौर पर हमारे बीच पेश आएं। जब वैक्लपिक मीडिया नाम का शब्द सामने आता है तो इसे कथित मुख्यधारा मीडिया के समानांतर पेश किया जाता है। लेकिन क्या कोई मीडिया अपने-आप में वैकल्पिक या समानांतर होता है? मीडिया अपने-आप में कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो हमारी ‘वैकल्पिकता’ की मंशा के मुताबिक़ व्यवहार करे। 

मीडिया किसी विचार/ख़बर या मुद्दे को पेश करने का ज़रिया भर है। यह एक माध्यम है। विचार और ख़बर किसी भी मीडिया के ज़रिए हम तक पहुंच सकते हैं। मिसाल के लिए जिसे लोग मुख्यधारा का मीडिया कहते हैं उसमें प्रिंट भी शामिल है और टीवी भी। यानी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के दो अलग-अलग खांचों में बंटे होने के बावजूद वो “मुख्यधारा” बना रहता है। लेकिन, उसी के बरअक्स लघु पत्रिकाओं और छोटे अख़बारों को जब वैकल्पिक मीडिया के तौर पर हम चिह्नित करते हैं तो हम किस बिंदु पर उसे अलग कह रहे होते हैं? क्या माध्यम के बिंदु पर? माध्यम के लिहाज से देखें तो लघु पत्रिका और छोटे अख़बार प्रिंट की श्रेणी में गिने जाएंगे। ज़ाहिर है फर्क मीडियम का नहीं है, फर्क है विषयवस्तु का।

विषय-वस्तु से ही लोग तय करते हैं कि समानांतर या फिर वैकल्पिक किसे कहा जाए। यानी नैरेटिव ही वैकल्पिक होने का मूल है, मीडिया नहीं। इसलिए वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा बुनियादी तौर पर भ्रामक है। बढ़ते ऑनलाइन यूजर्स के बाद ऐसा ज़रूर हुआ है कि कई ख़बरों और मुद्दों को सोशल मीडिया में उछलने के बाद ही बड़े मीडिया घरानों में जगह मिल पाई। इसे सोशल मीडिया की सफ़लता के तौर पर भी पेश किया गया। लेकिन, ‘बड़े मीडिया घरानों’ में जगह दिलाने को उपलब्धि के तौर पर क्यों पेश किया जाए? 


क्या सोशल मीडिया सच में वैकल्पिक मीडिया है?
ऐसी कई घटनाओँ की दर्जन भर से ज़्यादा लोकप्रिय मिसालें पिछले दो-तीन वर्षों के दरम्यान ही गिनाईं जा सकती हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया मोबलाइज़ेशन इतना कारगर रहा कि कई मुल्कों में सियासत की तस्वीर तक बदल गई। कई जगहों पर सोशल मीडिया के ज़रिए ही लोग साझे मुद्दे और साझे संघर्ष में एकजुट हुए। इसे सोशल मीडिया की बड़ी ताक़त के तौर पर पेश किया जाता रहा है। लेकिन ये विमर्श का दूसरा मुद्दा है। सोशल मीडिया मोबलाइजेशन का बड़ा टूल बनकर उभरा है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन क्या जिन मुद्दों को एक पक्ष अपनी ताक़त के तौर पर पेश करता है वो संपूर्णता में ताक़तवर है? क्या सोशल मीडिया की ये ताक़त सच में उन्हीं विचारों को हासिल है, जिन्हें ‘मुख्यधारा के मीडिया’ में जगह नहीं मिल पाती?

अगर बड़े मीडिया घरानों में ‘जगह दिलाने में क़ामयाब होने’ को हम ताक़त मान लें, तो इसकी एकमात्र वजह उस ख़ास मुद्दे को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाए जाने के भाव से जुड़ा है। अब अगर किसी स्थापित मीडिया से ज़्यादा पहुंच किसी निजी वेबसाइट या फिर निजी सोशल मीडिया एकाउंट की हो तो क्या उसे ‘मुख्यधारा’ कहा जाएगा? ये कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जिनपर वैक्लपिक बनाम ‘मुख्यधारा’ की बहस के दरम्यांन फिर से सोचा-देखा जाना चाहिए।

मीडियम से ज़्यादा महत्वपूर्ण है मीडियम पर पकड़ और स्वामित्व। यही नैरेटिव को भी तय करता है और कंटेंट को भी। फ़ेसबुक अगर किसी सामाजिक बदलाव का मंच साबित हो रहा है तो इसी फेसबुक पर भड़काऊ, झूठे और आधारहीन ख़बरें भी चलाई जा रही हैं। बंगलुरू में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के ख़िलाफ़ जिस तरह ऑनलाइन अभियान चला, वो ज़मीन पर उतरकर और भी ज़्यादा हिंसक हो गया था। फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे मंचों ने तथ्य को कई चेहरों में बांट दिया है। जिसके हाथ में जो ‘तथ्य’ है, वो उसी को ‘असली’ तथ्य मान रहा है। अफ़वाह/झूठ की भी फ़सल यहां लहलहा रही है। पूरा मामला इस पर निर्भर करता है कि फ़ेसबुक या किसी भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस लिहाज से कौन कर रहा है। अगर वो वर्चस्वशाली विचारधारा के समानांतर कोई नैरेटिव खड़ा कर रहा है तो वो वैकल्पिक पत्रकारिता का मंच हो सकता है, लेकिन वो महज मंच ही है, वैकल्पिक मीडिया नहीं।

फ़ेसबुक एक कंपनी है, जिसपर सारा नियंत्रण मार्क ज़करबर्ग है। यूजर के पास सिर्फ़ अपना कंटेंट तय करने का अधिकार है। मीडियम के गणित और सॉफ्टवेयर को अपने मुताबिक़ ढालने का नहीं। पिछले कुछ वर्षों में इसमें भी कई बदलाव देखने को मिले हैं। फ़ेसबुक के एल्गोरिद्म को इस तरह बदल दिया गया है कि एक यूजर जिन यूजर्स के साथ जितना परस्पर संवाद करेगा, उनकी न्यूज़ फीड में उतनी ही ज़्यादा उन व्यक्तियों का लिखा हुआ कंटेंट दिखेगा। अगर परस्पर संवाद कम हुआ, तो दिखना भी कम। ऐसे में ‘वैकल्पिक मीडिया’ के तौर पर इसे अगर पेश किया जाए और फॉलो करने वाले यूजर्स की संख्या को एक मानक मान लें, तो भी इस एल्गोरिद्म के चलते एक ख़ास विचारधारा वालों के बीच ही वो बातें अटककर रह जाती हैं, या फिर उस विचारधारा से इतर उन लोगों के बीच, जो सच में उस कंटेंट में रुचि रखते हों।

वैक्लपिक नैरेटिव के बिना वैक्लपिक मीडिया कुछ नहीं है
फ़ेसबुक अपने-आप में कंपनी के बतौर किसी भी कंटेंट का उत्पादन नहीं करता। ये यूजर्स जेनेरेटेड कंटेंट का एक मंच है। लेकिन, वो मुनाफ़ा कमाने में दुनिया के बड़े अख़बारों को बहुत पीछे छोड़ चुका है। 2016 के आख़िरी चौथाई में फ़ेसबुक ने 3600 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा कमाया, तो वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसी दौरान पिछली चौथाई के मुक़ाबले तीन करोड़ का नुकसान सहा। अब अगर न्यूयॉर्क टाइम्स को ‘मुख्यधारा का मीडिया’ मान लें और फ़ेसबुक को ‘वैकल्पिक मीडिया’ तो किसी भी पैमाने पर ये मुफ़ीद नहीं बैठता। 

जिस तरह कोई आम यूजर अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने के लिए फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स भी फ़ेसबुक के ज़रिए अपनी बात और ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में जुटा है। यानी ये सबके लिए खुला मंच है। वैकल्पिक मीडिया के बदले इसलिए वैकल्पिक पत्रकारिता की अवधारणा पर ज़ोर दिया जाना चाहिए क्योंकि ‘मीडिया और तकनीक’ पर नियंत्रण किसी भी आम व्यक्ति से ज़्यादा आसानी से कोई स्थापित ‘मुख्यधारा मीडिया घराना’ कर सकता है। वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा तकनीकी तौर पर भ्रामक है, वैकल्पिक अगर कुछ है तो सिर्फ़ नैरेटिव, राजनीति और विचारधारा।

20 अप्रैल 2017

फांसी को हत्या माना जाना चाहिए

चन्द्रिका
(मूल रूप से जागरण में प्रकाशित)
जासूस समाज में कभी अच्छे मूल्य का शब्द नहीं बन पाया. कभी भी नहीं बन पाया. वह संदिग्ध रहा. घर से लेकर राष्ट्र तक. पर उसका होना बचा रहा. उसकी जरूरत बची रही. इसलिए यह राज्य के लिए एक गुप्तचर और वैध सी चीज बना रहा. आज भी बना हुआ है. जो जितने बड़े राष्ट्र हैं उनके पास उतने ज्यादा जासूस हैं. कहा यह भी जा सकता है कि उनकी जासूसी ने उन्हें बड़े राष्ट्र होने में मदद की है. किसी मुल्क की आंतरिक सूचनाएं जुटाना और उससे वाकिफ होना उस मुल्क को कमजोर बनाता है. इस दौर और पहले के दौर की बड़ी लड़ाईयां जासूसों की मजबूती और उनकी जासूसी कामयाबी से जीती गई हैं. इसलिए इस बात में कोई शक़ नहीं किया जाना चाहिए कि दो पड़ोसी मुल्क जिनकी सरकारों ने लगभग दुश्मनाना रिश्ता रखा हुआ है उनके जासूस एक दूसरे मुल्क में नहीं हैं या नहीं रहेंगे. वे रहेंगे, जब तक राज्य रहेगा. जब तक राज्य और राज्य के बीच लड़ाईयां रहेंगी. जब तक भेदों और भीतर की सूचनाओं को जानने की जरूरत रहेगी. वे जब गैर मुल्कों में पकड़े जाएंगे उनको सजाएं दी जाएंगी. इसकी परवाह किए बगैर दूसरे जासूस फिर तैयार किए जाएंगे. कुलभूषण जाधव के बाद कोई और जासूस होगा. क्योंकि कुलभूषण जाधव के पहले दसियों भारतीय जासूसों को पाकिस्तान में पकड़ा गया है. उन्हें सज़ा हुई है. कुछ को मौत की भी सज़ा सुनाई गई है. सज़ा सुनाने के बावजूद किसी को फांसी नहीं हुई है. उनमे से ज़्यादातर जेल में आजीवन कारावास काटते हुए मर गए हैं.
फांसी की सजा उसे नहीं होनी चाहिए. यह बात सिर्फ कुलभूषण के लिए नहीं कही जानी चाहिए. बल्कि मौत की सज़ा लोकतंत्र में किसी को नहीं होनी चाहिए. यह बात यहां से शुरू की जानी चाहिए. किसी का जीवन लेने के बाद उसे वापस लाने का सामर्थ्य अगर मनुष्य और राज्य के पास नहीं है तो उसे जीवन लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए. यह कानून इंसान में सुधार होने की गुंजाइश को ख़त्म करता है. एक कल्याणकारी और लोकतांत्रिक राज्य को हमेशा अपने इंसान में सुधार की उम्मीद रखनी ही पड़ती है. ऐसी बहुत सी दलीलें और भी हैं. दुनिया के ज्यादातर राष्ट्रों ने सज़ा-ए-मौत को प्रतिबंधित कर दिया है. इसलिए कुलभूषण की सज़ा-ए-मौत के खिलाफ हमे होना चाहिए. लेकिन उससे पहले हमे किसी भी अपराधी की मौत के ख़िलाफ होना चाहिए. पर मुल्कों के अपने कायदे हैं. भारत और पाकिस्तान दोनों सज़ा-ए-मौत के कानून को मानते हैं. इस आधार पर दोनों यह भी मानते हैं कि अपराधियों को सुधारा नहीं जा सकता उन्हें खत्म करना ही एक मात्र उपाय है. एक मात्र उपाय तानाशाही के अलावा और कहीं नहीं हो सकता. 
जबकि हमारी सरकार यह कह रही है कि अगर जाधव को सज़ा दी गई तो वह उसे हत्या मानेगी. हमे इसे किस रूप में देखना चाहिए. जो सरकार अपने राज्य के कानून में हत्या करने का प्रावधान रखती है उसे किसी भी मुल्क में अपराधी को हत्या की सज़ा देने से रोकने का हक़ तबतक नहीं बनता जबतक वह अपने कानून से हत्या और मौत को ख़ारिज न कर दे. जबकि इसको लेकर दोनों मुल्कों की सरकारों के एक मत हैं. अपराध के बदले हत्या पर वे दोनों सहमत हैं. हत्या के बदले हत्या एक लोकतांत्रिक कानून नही हो सकता. यह एक मध्य-युगीन मूल्य है. जिसे लोकतंत्र के ढांचे में नहीं होना चाहिए. 
कुलभूषण के जासूस होने और संगीन अपराधों में शामिल होने का पाकिस्तान दवा कर रहा है. वह दावा कर रहा है कि कुलभूषण के पास उसके दो पासपोर्ट थे. एक उसके अपने नाम से और एक किसी मुस्लिम नाम से. वह दावा कर रहा है कि उसके पास कई हमले कराने में कुलभूषण का हाथ होने के सुबूत हैं. उसका दावा है कि जिस कोर्ट में सज़ा हुई है वहां तीस दिन के भीतर फैसले का प्रावधान है पर उसने एक बरस से ज़्यादा वक्त लेकर इसकी जांच की है. वह ढेर सारे सबूत देने के लिए तैयार है. सारी जांच पड़ताल के बावजूद, अपराध होने के बावजूद सज़ा-ए-मौत को खारिज किया जाना चाहिए. 
अगर कुलभूषण को सज़ा दी जाती है तो इसे हत्या माना जाना चाहिए. पर भारत सरकार के दोहरे चरित्र की वजह से नहीं. राष्ट्रप्रेम की वजह से नहीं. इसे हत्या मानने के कारण और हैं. इस हत्या के ज़िम्मेदार वे सब होंगे जो नागरिक अधिकारों के ख़िलाफ हैं. जो मानवाधिकारों के ख़िलाफ हैं. जो हर घटना के बाद सड़कों पर उन्मादी भीड़ की तरह निकल आते हैं और फांसी पर लटका देने की मांग करते हैं. वही अपने दोहरे चरित्र को दिखाते हुए इसे रोकने की बात कर रहे हैं. उन्हें अपने विचारों का आकलन करना चाहिए. पाकिस्तान का जासूस यदि भारत के लिए आतंकवादी है तो भारत का जासूस पकिस्तान के लिए आतंकवादी ही होगा. अतंकवाद और देशभक्ति किसी भी राष्ट्र के लिए एक सापेक्ष चीज है. 
एक उन्मादी भीड़ है पाकिस्तान में भी. एक उन्मादी भीड़ है हिन्दुस्तान में भी. लंबे वक्त में राज्य और सरकारों के द्वारा पैदा की गई दुश्मनी ने ही इस भीड़ को भी पैदा किया है. यह हिन्दुस्तान की वही भीड़ जो पाकिस्तान का जासूस कहकर 2015 में कानपुर में एक आदमी की हत्या कर देती है. वही भीड़ जो वकीलों के भेष में यह फैसला करती है कि आतंकवाद के आरोपी का कोई केस नहीं लड़ेगा. वही भीड़ जो कोर्ट परिसर में जे.एन.यू. के कन्हैया कुमार पर हमला करती है. वही भीड़ जो आलोचकों को पाकिस्तान भेजने के लिए उतावली रहती है. वैसी ही भीड़ पाकिस्तान के वकीलों में भी है. जिसने कुलभूषण के केस को न लड़ने का एलान किया है. यहां की भी बार काउंसिल ने ऐसे कई फैसले लिए हैं. हमारे लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि जो हम खुद नही कर पाते उसकी अपेक्षा दूसरों से कैसे करें. नफरत के जो बीज राज्य बोता है. उसकी फसल हमारे यहां ही क्यों तैयार होगी. वह दोनों मुल्कों में बराबर तैयार की जाती रही है. जब तक इस नफरत को बोने के कारण को हम नहीं समझेंगे. हम विचार के आधार पर अपने फैसले नहीं लेंगे. हमारे फैसले उन्माद और अवसरपरस्त होंगे. हम कुलभूषण को बचा भी लें तो इंसान के बतौर जो एक आरोपी या फिर अपराधी का हक़ है उसे खो देंगे.    

08 अप्रैल 2017

लोकतंत्र की नाकामी से उपजता उन्माद



अब तक भेदभाव खत्म हो जाने थे. धर्म और रेस के आधार पर हत्याएं बंद हो जानी थी. तीन सौ बरस से भी पहले दुनिया में आए लोकतंत्र की प्रेक्टिस को इतना तो करना ही था. पर हत्याएं बढ़ गई हैं और नफरत कई गुना ज्यादा उभर कर सामने आ रही है. यह सिर्फ हमारे अपने देश की हालात नहीं हैं, यह पूरी दुनिया में हो रहा है. अमेरिका में भी जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबसे पहली भागीदारी हुई थी वहां भी लोग इसी तरह की नफरत दिखा रहे हैं. इतने लम्बे वक्त के बाद इस तरह की घटनाओं का होना कहीं न कहीं उस नाकामयाबी को दिखा रहा है जो लोकतंत्र से मिलनी थी. जिन मूल्यों के साथ लोकतंत्र आया था वह घटता जा रहा है. सबके लिए सब बराबर नहीं हो पा रहा. हमें तलाशी लेनी चाहिए. अपने देश के राजनीतिक विकास की, दुनिया के राजनीतिक विकास की. शायद पूरे लोकतंत्र के प्रणाली की ही तलाशी लेनी चाहिए. हमे यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों समता, समानता और बंधुत्व दुनिया में कमजोर पड़ रहा है.  

अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं. पर समग्रता में देखें तो लोगों में असहिष्णुता सब जगह बढ़ी है. हाल ही में ट्रंप सरकार आने के बाद अमेरिका में नस्लीय हमले बढ़े हैं. गैर-अमेरिकियों में एक असुरक्षाबोध पैदा हुआ है. जो एक मॉडर्न राष्ट्र के रूप में देखा जाता है और जहां लोग बेहतर जीवन और नौकरियों के लिए जाते रहे हैं रेस आधारित हिंसा और घटनाओं ने वहां लोगों में भय पैदा कर दिया है. ट्रंप जब चुनाव लड़ रहे थे तो उनके चुनावी अभियान में भी यह विभेद उनके भाषणों के तहत देखने में आ रहा था. अमेरिकी और गैर-अमेरिकी को मुद्दा बनाया जा रहा था. शायद वहां के लोगों ने इसे स्वीकार किया और उन्हें अपना मत दिया. जीतने के बाद जिसका प्रतिफल हम देख रहे हैं. लोगों के द्वारा इस तरह की नफरत को स्वीकार किया जाना ही इस बात को दिखाता है कि संरचना के तौर पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का होना और लोगों में लोकतंत्र के मूल्य का स्थापित हो पाना दोनों अलग-अलग चीजें हो गई हैं. लोगों में वे लोकतांत्रिक मूल्य नहीं निर्मित हो पा रहे हैं जो रेस, जाति, धर्म को बराबरी से देख सकें. सबके साथ समानता का बर्ताव कर सकें.  

अमेरिका में जब दिन्दुस्तानियों पर हमला होता है तो हिन्दुस्तानियों के लिए यह शोक और दुख की बात होती है. उन्हें लगता है कि यह ग़लत हुआ. पर जब हिन्दुस्तान में नाइजिरिया और साउथ अफ्रीकन देशों के लोगों पर हमले होते हैं तो वे इन घटनाओं को ठीक वैसे नहीं देख पाते जैसे कि अमेरिका में गैर-अमेरिकी पर हुए हमले को देखते हैं. महाराष्ट्र में मनसे और शिवसेना बिहारियों के नाम पर उत्तर भारतीयों पर हमले करती रही है. मद्रासी कह के दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाया जाता रहा है. नेपाली के नाम पर नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को प्रताड़ित किया जाता रहा है. मुसलमानों को तो पूरी दुनिया में अलग-अलग तरह से हमले किए जा रहे हैं. उनके कई मुल्कों को तबाह कर दिया गया. इन सारे हमलों को हम अलग-अलग देशों और अलग-अलग संदर्भों के साथ देख सकते हैं. जबकि हम इसके मूल में जाएंगे तो एक ही कारण समझ में आएगा. बदले हुए अर्थतंत्र ने जो असुरक्षा पैदा की है उस असुरक्षा ने लोगों को उन्मादी बना दिया है. उसी असुरक्षा ने मुल्क की सरकारों को भी उन्मादी बना दिया है. बड़े मुल्क छोटे मुल्कों पर हमले कर रहे हैं और स्थानीय और ताकतवर लोग गैर-स्थानीय और कम ताकतवर पर हमले कर रहे हैं. यह बड़े पैमाने से लेकर छोटे पैमाने पर हितों की लड़ाई है.  

इन हमलों की वजह कई बार बहुत साफ तौर पर दिखती है. कई बार ये हमले बहुत अपरोक्ष होते हैं. कारण कोई और गिनाया जाता है लेकिन उसके पीछे की वजह कोई और ही होती है. इसे हमे समझने की कोशिश करनी चाहिए. पूरे दुनिया के स्तर पर अर्थव्यावस्था इस तरह से गड़बड़ हुई है कि राज्य अपने लोगों को रोजगार देने की स्थिति में नहीं है. दो करोड़ प्रति वर्ष नौकरियों का दावा करने के बाद भी हमारी केन्द्र सरकार कुछ हजार नौकरियां देने में भी असफल रही है. तकनीकी विकास ने कई प्राइवेट संस्थानों व अन्य संस्थाओं में भी नौकरियां कम कर दी हैं. ऐसे में लोग बेरोजगार और बेहाल स्थिति में हैं. कम से कम लोगों द्वारा ज्यादा से ज्यादा काम कराना ही इस मुनाफे की व्यवस्था के लिए लाभकारी है. यह वित्तिय व्यवस्था जितना ज्यादा और बढ़ेगी बड़ी पूजी और कम लोगों के हाथों में सिमटती जाएगी. रोजगार और कम होते जाएंगे. पूजी का डिस्ट्रीब्यूशन भी और कम होता जाएगा.

इस बेहाली के लिए राजनैतिक पार्टियां अलग-अलग तरह के वायदे लेकर आती हैं पर उनके लिए बेरोजगारी को दूर करना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में वे बेरोजगारी की वजहों को बदल देती हैं और लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करती हैं. वे यह बताने के बजाय कि राज्य अपनी नीतियों के कारण रोजगार देने में असफल हो रहा है यह बताती हैं कि स्थानीय की नौकरियां गैर-स्थानीय के हाथों में जा रही हैं. इस तरह से स्थानीय और गैर-स्थानीय के बीच एक नफरत को पैदा किया जाता है. सरकार खुद हमले न करके लोगों के भीतर इस तरह का भाव पैदा करती है कि वे ख़तरनाक हो जाते हैं. उन्हें उनका हित जाता हुआ दिखता है. वे सरकार की नीतियों पर सोचने के बजाय दूसरों के लिए नफरत की रणनीतियां तैयार करने लगते हैं. वे उन्मादी हो जाते हैं.
भारत के संदर्भ में यदि हम देखें तो जो उन्माद दिख रहा है वह सिर्फ भाजपा के सत्ता में आने का उन्माद नहीं है. कांग्रेस के वक्त भी वे उन्मादी थे. बस यह उन्माद थोड़ा और बढ़ गया है. अमेरिका से लेकर नोएडा तक और दादरी से लेकर बाबरी तक जो लकीर खींची जा रही है. वह हमारे इतिहास के पन्नों से कई लाइने काट रही है. वह लोकतंत्र और संविधान की लाइन को भी काट रही है जिसके तहत हमे धर्मनिर्पेक्षता और बंधुत्व का एक मूल्य मिला हुआ है. अमरीका में भारतीय महफूज नहीं हैं. यह हमे अपने मुल्क में रहते हुए दिखता है. जबकि अमेरिका से कई देश महफूज नहीं हैं. क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था को बनाना और उसे टिकाए रखने के लिए जरूरी हो गया है कि किसी न किसी तरीके से गैर मुल्कों पर कब्जेदारी बनी रहे. वहां के संसाधनों को अपने लिए उपयोग किया जा सके.

लोकतंत्र और उसके बाद ग्लोबलाइजेशन का यह परिणाम तो नहीं सोचा गया था कि अमेरिका में गैर अमरीकी मारा जाएगा. अस्ट्रेलिया में भारतीय मारा जाएगा. और भारत में नाइजीरियन और साउथ अफ्रीकन मारा जाएगा. यह सब कबीलाई समाजों के इतिहास सा हो रहा है. जो अपने कबीले में दूसरे कबीले को नहीं घुसने देते थे. पर फिर से हमारे समाजों में हत्या और नफरत के जो आधार बन रहे हैं वे ऐसा समाज बना रहे हैं जहां ग्लोबलाइजेशन भी है और कबीले का पुरानापन भी है.

05 अप्रैल 2017

गांव बचेगा तो गाय बचेगी


 चन्द्रिका
 (मूलरूप से द वायर में प्रकाशित)

वे गाय को बचा रहे हैं और गांव को खत्म कर रहे हैं. गांव बचेगा तो गाय खुद ही बच जाएगी. वैसे यह कहना भी ख़तरनाक हो गया है. फिलहाल कुछ भी कहना ख़तरनाक हो गया है. सुनने के लिए दो लोगों के नाम बचे हैं और इसी के उन्माद में जाने कितने लोग फंसे हैं. फंसे हैं कि उन्हें लगता है कि यही है जो उन्हें उबार देगा. उन्हें उनके दुख और डर से निकाल लेगा. वे भीतर से डरे हुए लोग हैं जो उन्मादी हो गए हैं. हत्या और उन्माद के लिए उन्हें वहीं से ताकत मिल रही है. जबकि एक को दूसरे से शोहरत मिल रही है.

जहां कोई नाम बहुत बड़ा बना दिया जाता है. उसकी मान्यता बढ़ा दी जाती है और एक समूह भक्त बन जाता है. धर्म, राजनीति, ब्यूरोक्रेसी कहीं भी इसे देखा जा सकता है. वे एक अदृश्य ताकत के बल पर फलते-फूलते हैं और तलवार की तरह समाज के चेहरे पर झूलते हैं. वे, जो गाय की रट लगाए हुए हैं. वे जो कोई भी मांस न खाने की हठ लगाए हुए हैं. वे गाय प्रेमी नहीं हैं. अगर होते तो गाय और गांव के संबध को समझते. कि वह गांव खत्म हो रहा है जहां गाय रह पाती थी. गांव वह बच रहा है जहां गाय की जगह दो गऊ जैसे बूढ़े ही बच पा रहे हैं. इसी विकास की प्रक्रिया ने गाय पालने वाले लोगों को गांव से बाहर कर दिया है. खेतीबाड़ी तबाह कर उन्हें शहर में भर दिया है. शहरों और शहरों के बीच अथाह भरे हुए इलाकों के बीच जो रिक्त स्थान है, वही गांव है. इन रिक्त स्थानों को गाय से नही भरा जा सकता. गाय से कोई भी रिक्त स्थान नहीं भरा जा सकता. फिलहाल जहां-जहां गाय लिखा जा रहा है, जहां-जहां गाय बोला जा रहा है. नफरत का कोई और ही चीज घोला जा रहा है. दो समुदायों के बीच जो बना हुआ, बचा हुआ रिश्ता था उसका धागा खोला जा रहा है.

गाय के बहाने वे उससे अपनी नफरत जता रहे हैं. सुअर (बाराह) जो उनके मिथक में ईश्वर था उसके खाए जाने, मारे जाने पर सवाल तक नहीं उठा रहे हैं. सवाल नहीं उठना चाहिए. न गाय पर न सुअर पर. खानपान के अलग-अलग भौगोलिक, सांस्कृतिक कारण हैं. वैसे उन्हें किसी की संस्कृति का सम्मान नहीं है. उन्हें किसी से प्यार नहीं है. न मुल्क से, न गाय से, न गांव से, न गोरू से. क्योंकि गांव और गाय वाले मुल्क का बचना एक अलग तरह से बसना है. पूरी तरह से एक अलग अर्थव्यवस्था को रचना है. जिसे उजाड़ा गया और उजाड़ा जा रहा है. गाय से प्यार बगैर चरागाहों के नहीं हो सकता. गाय से प्यार बिना बैलों और हरवाहों के नहीं हो सकता. शहर चरागाह नहीं बना सकते. वहां हम हल बैल नहीं चला सकते. वहां तो हम खुद ही हर रोज कातिक के बैल बने हुए हैं. शहर जितने बड़े हैं हम उतना ज्यादा मिट्टी में सने हैं. इन घनी बस्तियों की बहुतायत आबादी जमीन से ऊपर सीढ़ियों वाले छतों की है. जानवरों ने अभी अपने को इस मुताबिक नहीं बनाया. सीढ़ियों पर चढ़ने और छतों पर रहने के लायक खुद को नहीं ढाला. हम हैं कि यह सब नहीं सोचते. अपनी ज़िंदगी और अपनी आंख से न देखकर गाय और गोबर में अड़े हुए हैं.

वन बीएचके में कोई कैसे गाय बसाएगा. बस वह अपनी दौड़ती-फिरती ज़िंदगी में जब भी गाय का नाम सुनेगा भावुक हो जाएगा. उसके लिए वन बीएचके की भी जरूरत नहीं. ट्रेन की सीट पर भी बैठकर गाय को लेकर भावुक हुआ जा सकता है. गाय को पालने और बचाने की बात वहीं पर ठहरी हुई है और हररोज ट्रेन हमे शहर की तरफ लिए जा रही है. शहर की भीड़ हररोज और बढ़ रही है. आसपास के गांव को अपने भीतर कर रही है. इंसान का ही रहना यहां मुहाल है. यह तो गाय को बचाने और बसाने का सवाल है.

सारे रोजगार, सारे संस्थान शहर में हैं. सारी मुफलिसी, सारी तंगी घर में है. एक को तो छोड़ देना पड़ेगा. या इस विकास के रास्ते को ही मोड़ देना पड़ेगा. शहर टूटेंगे गांव तभी बस पाएगा. गाय तभी बस पाएगी. जब गाय सिर्फ धरम के लिए नहीं होगी. जब गोमूत्र सिर्फ पीने के लिए नहीं होगा. जब गोबर सिर्फ हवन के लिए नहीं होगा. वह खेतों में खाद के लिए होगा, उपजाऊं अनाज के लिए होगा. हमारे जीवन की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होगा. होंगे सारे जानवर. गाय जैसा होगा उनका भी होना.

पर ऐसा नहीं होगा इस सरकार से. इससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा और उससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा. क्योंकि इस मुल्क के विकास के लिए उनके पास वही खाका है. जिससे बना न्यूयार्क है, जिससे बना ढाका है. मुल्क हमारे अलग हैं पर उनका विकास, हमारा विकास एक है. गाय के मामले में वे हमसे ज्यादा नेक हैं. हम बड़ी आबादी वाले देश को बगैर गांव के नहीं जीना था. हमारे कपड़े अलग थे हमे अपने तरीके से सीना था. हम न्यूयार्क नहीं हो सकते, हम जापान नहीं हो सकते. कई मुल्कों की लाशों पर चमकता हुआ शहर दुनिया में बहुत कम बन सकता है. अमेरिका बनना कई मुल्कों के इतिहास, भूगोल को निगल जाना है. अमरीका बनना कई मुल्कों का पड़ोसी मुल्कों से युद्ध कराते रहना है. अमेरिका होना दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार तैयार करना है. हथियार तैयार करना भविष्य में तबाही और भय की उम्मीद को ज़िंदा रखना है. दुनिया में हम सबको असुरक्षित रखने का ही नाम है सबसे विकसित देश का नाम. हम उसी का पीछा करते हुए कुछ दशक पीछे हैं. शायद हम हमेशा पीछा करने वाले देश ही रहेंगे. हम आगे तभी जा सकते हैं जब वह पीछे जाए. इस एक लाइन वाली दुनिया की व्यवस्था में ऐसे ही सबको खड़े होना है. आगे जाने के लिए कोई और रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि अपने से आगे वाले को पीछे छोड़ा जाए, इसके लिए उसकी बांह मरोड़ा जाए.

हमे भारत बनाना था. जहां सबको बसना था. जहां इतिहास में सबके हिस्से थे. जहां जातीयों के जुल्म के भी किस्से थे. हमे उसे खतम करना था. हमने वह नहीं किया. हमने वह नहीं सोचा. दुनिया के उन मुल्कों के उधारी विकास को हमने अपनी मिल्कियत बना ली. अब जो है वह भयावह है. उनके विकास का ही मॉडल शहर है कि हमे भी उसे ज़हर की तरह पीना पड़ रहा है. मौत के पहले हर रोज की मौत को जीना पड़ रहा है. युवा उम्र के लोग अफवाह की तरह फैल गए हैं, इन शहरों में. निराधार, हर रोज बदल दिए जाने वाली ख़बर की तरह. पहले उन्हें नौकरी न पाने के ख़तरे हैं, नौकरी पाने के बाद इसके छिन जाने के ख़तरे हैं. इन खतरों से जो बचा हुआ मोहलत का वक्त होता है उसमे वे खुद भी खतरनाक हो जाते हैं. कहीं उन पर ख़तरा है तो कहीं वे उससे उबरने के लिए खुद खतरा बन रहे हैं. उन्माद यहीं से पैदा होता है. व्यवस्था उन्हें खतरे में डालती है और उससे उबरने के लिए उन्हें खतरनाक बनाती है. तब गाय ही सबसे बड़ा सवाल बना दिया जाता है. गांव वहां से फिर भी हट जाता है.

जिन्हें इतनी असुरक्षाओं के बीच ज़िंदा रहना और बचे रहना है उन्हें नैतिकता नहीं सिखाई जा सकती. नैतिकता उस ढांचे से पनपती है जहां आप जीवन जी रहे होते हैं. अर्थतंत्र पर टिकी इस दुनिया में आर्थिक तंगी के बीच आप किसी को ईमानदार नहीं बना सकते. ईमानदार बनाने की धारणा बना सकते हैं. इस आधार पर एक राजनैतिक पार्टी बना सकते हैं. सदी के सबसे बड़े झूठ को सच बना सकते हैं. और भी बहुत कुछ बना सकते हैं पर ईमानदार इंसान नहीं बना सकते. क्योंकि इंसान अपने समाज की जरूरतों और ढांचों से अपने मूल्य बनाता है. न कि उसके मूल्य के आधार पर ढांचा बन पाता है. बहते हुए नाले का पानी अगर साफ हो तो सारी चीजें अपने मूल रंग में दिख सकती हैं. एक-एक चीज को निकालकर उसे धुलकर उसका रंग दिखाना सिर्फ बहकावा है. ऐसे बहकावे में ही उन्माद भी है, हिंसा भी है और वह सबकुछ है जो पूर्णता में किसी चीज को देखने से रोक देगा. गाय दिखेगी, गांव नहीं दिखेगा. विकास सुनाई पड़ेगा और हर कोई परेशान रहेगा.       

03 अप्रैल 2017

स्किल इंडिया; एक विकास विरोधी अभियान


चन्द्रिका
(मूलरूप से जागरण में प्रकाशित)

हर वक्त के अपने मूल्य होते हैं. वक्त बदलता है और मूल्य बदल जाते हैं. विकास हमारे वक्त का ऐसा मूल्य बन चुका है जिसे फिलहाल सामूहिक तौर पर लोगों में स्वीकृति मिली हुई है. जबकि विकास के कई आयाम हैं और इसके कई परिणाम. परिणाम वर्तमान के भी हैं और भविष्य के भी हैं. जिसे विकास कहकर आज बढ़ावा दिया जा रहा है जरूरी नहीं कि आने वाले भविष्य में उसको उसी तरह स्वीकार किया जाए. भाजपा द्वारा स्किल इंडिया की अवधारणा भी इसी विकास की बात से निकल कर आई है. लोगों में स्किल पैदा कर सरकार उन्हें बेहतर बनाने का दावा पेश कर रही है. उसे हमारे एजुकेशन का एक नया पैटर्न बताया जा रहा है. फिर वह क्या फर्क है जो स्किल और एजुकेशन को अलग कर रहा है. क्या एजुकेशन के बजाय सिर्फ स्किल पैदा करना एक विकसित समझ है.  
दरअसल यह हमारी शिक्षा और ज्ञान के मायने को बदलने की एक कवायद है. उसके स्वरूप को बदला जा रहा है. इस तरह से बदला जा रहा है कि जिसके तात्कालिक असर भले न दिखें पर आने वाले वक्त में हम एक मूढ़ समाज बनाने की तैयारी कर रहे हैं. एक ऐसा समाज जो एक ही दिशा में सोचने वाला हो, एक ही जैसा सोचने वाला हो. एक यूनीलीनियर दुनिया बनाने की परियोजना का यह एक हिस्सा है. जो उस ज्ञान परंपरा को ख़त्म कर दे जिसके तहत बहुआयामी और आलोचनात्मक सोच विकसित होती है. जो लोकतंत्र के विचार को और मजबूत बनाती है.
शिक्षा के बजट में लगातार कटौती की जा रही है. शोध करने और विमर्ष करने के दायरे भी कम किए जा रहे हैं. यूजीसी नोटीफिकेशन 2016 के तहत सभी विश्वविद्यालयों में शोध को सीमित कर दिया गया है. जे.एन.यू. जैसे शोध आधारित देश के अग्रणी संस्थानों में 80% से ज्यादा सीटें इस वर्ष कम कर दी गई हैं. देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के भी हालात कुछ ऐसे ही है. यह सरकार के विकास की नई दिशा है. जो ज्ञान के उस दायरे को कमजोर करना चाहती है जहां असहमति और मतभिन्नता का स्पेस निर्मित होता है. वह अपनी अलग-अलग योजनाओं के जरिए उस कल्याणकारी राज्य की परियोजना को ख़त्म कर रही है जिसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य को नागरिक अधिकार बनाया जाना था. वर्तमान सरकार और इसके पहले की सरकारें दोनों में ही इस योजना को लेकर कोई अंतर नहीं दिखता. वे निजीकरण को बढ़ावा और राज्य द्वारा लोगों को दी जाने वाली सुविधाओं में कटौती कर रही हैं. जब सरकार शिक्षा के बजट कम करेगी तो संस्थानों के लिए अपने संसाधन सीमित करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. शोधार्थियों को शोध के लिए दी जाने वाली सीमित राशि भी देना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा. लिहाजा वे संस्थानों के लिए कुछ इस तरह के नियम बनाएंगे कि शोध और अध्ययन में कम लोग दाख़िला पा सकें. इसलिए शिक्षा में बजट की कटौती लोगों के ज्ञान की कटौती भी है. यहां मूल समस्या सरकार की मंसा में है. निजीकरण को बढ़ावा देने वाली उस प्रक्रिया में है. पब्लिक संसाधनों का सीमित होना या उच्च शिक्षा में सीटों का कम होना तो बस इसका उत्पाद भर है. जो निजीकरण के ख़िलाफ नहीं हैं, जिन्हें शिक्षा में बजट कटौती से परेशानी नहीं है. उन्हें केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में और कम पैसों में अपने बच्चों के न पढ़ पाने का कोई मलाल नहीं होना चाहिए.
जबकि पढ़ने वाली आबादी बढ़ रही है. शिक्षा के संस्थान भी बढ़े हैं पर संस्थानों की यह बढ़ोत्तरी निजी क्षेत्रों में हुई है. दुनिया के बड़े निवेशक व्यापारी एक नए निवेश के रूप में शिक्षा को देख रहे हैं और उसमे निवेश कर रहे हैं. जबकि उनके पास कोई कल्याणकारी योजना नहीं है कि वे समाज के लोगों को शिक्षित करना चाहते हैं. उनका यह भी उद्देश्य नहीं है कि वे दुनिया में ज्ञान की कोई परंपरा विकसित करना चाहते हैं. वे इसे एक लाभ के क्षेत्र के रूप में ही देख रहे हैं. उनके लाभ दोहरे हैं. आर्थिक लाभ के अलावा वे अपने मुताबिक मानव संसाधन को निर्मित कर रहे हैं. एक वर्ग के बच्चे, एक तरह के मूल्य, एक तरह का माहौल, एक खास तरह के कंक्रीट, जैसा कि निजी संस्थानों में दिखता है. शिक्षा के संस्स्थानों में किताबों के अलावा हमारे ज्ञान निर्माण में इस परिवेश की भी भूमिका होती है. यह एक मशीन सा है जो एक सांचे से एक ही तरह का पुर्जा पैदा करती है. वह वहीं फिट होगा जहां उसकी जगह है. वहां आलोचनात्मक समझदारी या संवेदनशीलता नहीं पनप सकती. वे बहुआयामी नहीं हो सकते. निजी क्षेत्र को इसकी जरूरत भी नहीं है कि सवाल और आलोचना पैदा हो. यह उसकी व्यवस्था के लिए ही परेशानी बनती है. तो राज्य लोगों के लिए शिक्षा की जो क्राइसिस पैदा कर रहा है वह निजी क्षेत्र के लिए लाभदायक बन रहा है.
इसलिए सरकार के द्वारा शिक्षा के बजट में कटौती और निजी संस्थानों के बढ़ने का सीधा संबंध है. जब सरकार शिक्षा मुहैया नहीं कराएगी तो व्यवसायी उसे अपना नया क्षेत्र बनाएंगे. यह योजना हमारे समाज के ज्ञान को भी कमजोर करेगी. क्योंकि समाज विज्ञान के विषयों के अध्ययन अध्यापन में भी कमी आएगी. ये ऐसे विषय हैं जो रोजगार से ज्यादा अपने समाज को समझने और उसे नई दिशा में आगे बढ़ाने के चिंतन को विकसित करते हैं. इनका प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता. व्यवसायिक शिक्षा में ऐसे विषय संस्थानों के दायरे से बाहर होंगे. केवल कम्पनियों और फैक्ट्रियों की जरूरत के मुताबिक स्किल्ड लोग तैयार किए जाएंगे.
नए विकास में ज्ञान और शिक्षा देने के बजाय स्किल्ड बनाने की घोषणा सरकार ने कर ही दी है. यह वर्तमान सरकार के विकास की योजनाओं में से एक है. अंग्रेजी का यह स्किल्ड हिन्दी का कारीगर है. भाषा कई बार हमारे भीतर भ्रम पैदा करती है और चीजें उलट-पुलट जाती हैं. जाहिर सी बात है कि सरकारी उपक्रम कम होते गए हैं तो सरकार जो कारीगर तैयार कर रही है वह भी व्यवसायियों के लिए ही है. ऐसे में ज्ञान का मायने यही बन रहा है कि राज्य हमे व्यवसायियों के हाथो में सौंप रहा है. शिक्षित होने के लिए और शिक्षित होने के बाद भी. क्योंकि स्किल्ड बनाने के जरिए हमारे शिक्षा और ज्ञान की अवधारणा को ही बदला जा रहा है. शिक्षित होने और स्किल्ड होने के मायने एक जैसे नही हैं. कारीगर बनाना और ज्ञान अर्जित करना दोनों एक चीज नहीं है. ज्ञान का संबंध सीधे-सीधे नौकरियां पाने से ही नहीं था. बल्कि वह अपने समाज को समझना और सीखना था. आगे आने वाली पीढ़ी को अपने सीखे अनुभवों से और उन्नत करना था. इसे बदला जा रहा है. यह विकास के नाम पर दिया जाने वाला एक झांसा है. अपनी जरूरत के मुताबिक लोग स्किल्ड हो ही जाते हैं. किसी स्किल का होना कोई बुरी बात भी नहीं है. जरूरी सवाल यह है कि हमें क्यों स्किल्ड बनाया रहा है? हम किसके लिए स्किल्ड हो रहे हैं? क्या हमारे पढ़ने-लिखने और ज्ञान को इस स्किल्ड के जरिए अपदस्त तो नहीं किया जा रहा है.
इसलिए एक तरफ विकास की बात करना और दूसरी तरफ स्किल इंडिया के जरिए लोगों से ज्ञान को छीनकर उनको कारीगर बनाना एक विकसित समझ नहीं है. यह एक तरह से ज्ञान और तार्किक सोच समझ को रोकना है. जहां हम अपने समाज में एक विषय पर विभिन्न मत रखते थे और वे मतभेद के अन्तर्विरोध ही थे जो हमारे समाज और ज्ञान को और आगे बढ़ाते थे. उसे ख़त्म करने की कवायद का ही नाम है स्किल इंडिया. जिसका असर हमारे समाज को लंबे समय में दिखेगा. फिलहाल तो जो चमक रहा है उसे हर कोई सोना ही कहने को आतुर दिख रहा है.


26 मार्च 2017

सोसल मीडिया की मजदूरी

मूलरूप से दैनिक जागरण में प्रकाशित
चन्द्रिका

सोसल मीडिया: दुनिया की बड़ी आबादी इस पब्लिक मीडिया के लिए काम कर रही है. बगैर वेतन का काम. यह शायद इतिहास में पहली बार हो रहा है कि इतनी बड़ी आबादी बेगार कर रही है. इस काम के लिए उन्हें कुछ भी नहीं मिलता. उनकी चेतना को इस तरह से विकसित किया गया है कि उन्हें इस तरह बेगार खटने का एहसास भी नहीं है. राजशाहियों में भी इतनी बड़ी बेगारी का इतिहास हमे देखने को नहीं मिलता. बंधुआ प्रथा भी काम के बदले कुछ अनाज तो देती ही थी. पर हम उन कम्पनियों के लिए काम कर रहे हैं जो हमे कुछ भी नहीं देती. इस अप्रत्यक्ष काम का सारा मुनाफा सिर्फ उनका है. हम उनके लिए काम कर रहे हैं जिनके बारे में हमे ठीक-ठीक कुछ भी पता नहीं है कि वे कौन हैं और हमारी किस तरह की भलाई वे चाहते हैं. क्या सच में इन कम्पनियों की चिंता और सरोकार हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े हुए हैं. हमको यह स्पेस मुहैया कराना उनका सरोकार है. या यह कुछ और है जिसके लिए हम सब अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे विज्ञापन अपनी जुबान में लिए फिरते रहते हैं. जबकि अब यह एक नशे सरीखा हो गया है जिसकी लत बेचैन करती है. दुनिया की इतनी बड़ी आबादी को इस तरह की मजदूरी की लत पहली बार लगी है और उन्हें यह काम मजदूरी या मजदूर कह कर नहीं दिया जा रहा है. क्योंकि मजदूर के साथ मजदूरी जुड़ी हुई होती है. तो उसके नाम बदल दिए गए हैं. हम इसे आज़ादी का नाम देते हैं. हम इसे अभिव्यति की स्वतंत्रता कहते हैं. हम इसे वह स्पेस कहते हैं जो हमे लोकतंत्र ने दिया है. इन सारे बड़े मूल्यों के साथ हम गौरवान्वित हैं और तकनीक के इस विकास के आभारी बने हुए हैं. पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के स्तर पर ऐसे कई मंच तैयार हुए हैं जो हमे अपने विचार साझा करने की जगह उपलब्ध करा रहे हैं. ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, ह्वाट्सप, यूट्यूब जैसी सोसल साइट्स ने हमे यह स्पेस मुहैया कराया है. बहुत कम दिनों में ही ये कम्पनियां पब्लिक का मीडिया बन चुकी है. जो सांस्थानिक मीडिया की खबरों को भी निर्धारित कर रही हैं. ये ऐसी कम्पनियां हैं जो सबसे कम वक्त में दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनियों में सुमार हो गयी हैं. तकनीकी विकास की बदलती संरचनाओं के साथ हमे इसे दूसरे रूप में देखना चाहिए. मसलन जब कोई कम्पनी अपने संसाधन जुटाती है और उसके उत्पाद बनाने के लिए जो काम करता है उसे मजदूरी मिलती है. इन कम्पनियों की कमाई में भी हमारा हिस्सा बनना चाहिए क्योंकि हम इनके लिए काम कर रहे हैं. इनके उत्पाद हमारी मेहनत से तैयार हो रहे हैं. हमारे लिखे हुए शब्द हमारी तस्वीरें और हमारे विडियोज ही हैं जो उनके उत्पाद हैं.
सोसल साइट्स का बड़ा हिस्सा पब्लिक प्रोडक्सन से भरा हुआ है. हमारा लेखन, हमारा विडियो और हमारी तस्वीरों ने ही इसे इतना बड़ा और विस्तृत बनाया है. लोगों की रुचि भी इसी वजह से बनती और बढ़ती गई है कि यहां बहुतायत की मौजूदगी है. हर रोज कितने पृष्ठ लिखे जा रहे हैं और कितने विडियोज लोगों के द्वारा अपलोड किए जा रहे हैं इसके आंकड़े अनुप्लब्ध हैं पर हम एक अंदाजा लगा सकते हैं और यह हमारे अंदाजे से बहुत अधिक भी हो सकता है. यह सब हम इस तौर पर करते हैं कि इन कम्पनियों ने हमे अभिव्यक्त करने, अपने विचार रखने की आज़ादी का स्पेस मुहैया कराया हुआ है. जबकि सच इससे इतर है. हम इनके अघोषित मजदूर हैं जो इनके उत्पादों को हर रोज बढ़ाने के लिए कई-कई घंटे काम करते हैं. यदि यह अभिव्यक्ति की अज़ादी का मसला है तो समाज में बोलने की आज़ादी, असहमत होने की आज़ादी और कम हुई है. असहमतियों को हम सुन नहीं रहे हैं और अपने तरह के विचारों से अपने में गदगद हैं. अमेरिका में ट्रंप के आने के बाद बाहरी लोगों पर हुई हिंसा की घटनाओं से लेकर जे.एन यू, रामजस कॉलेज आदि मामलों में हम देख सकते हैं कि समाज में किस तरह की भीड़ पैदा हुई है. जिसने असहमति को स्पेस देना बंद कर दिया है. तो क्या सोसल मीडिया में जो जगह, जो आज़ादी, जो स्पेस मिला है समाज की जमीन और समाज के लोगों के विचार उससे अलग बल्कि यह कहें कि उसके विपरीत होते गए हैं. अभिव्यक्त करने के वर्चुअल मंच भले ही बढ़े हों पर जमीनी हकीकत यह है कि लोगों में असहमत होने के स्पेस कम हुए हैं. इसलिए यह एक गुमराही सी लगती है. अग्रेंजों के वक्त में जब लोगों ने पुरजोर तरीके से बोलना शुरू किया तो अखबार बंद किए गए, इमरजेंसी में भी प्रतिबंध लगे और आज इतने वर्षों बाद कश्मीर में, मणिपुर में और छोटे स्तर पर संस्थानों में वही हो रहा है. जब आप असहमत होकर बोलना शुरू करते हैं तो आपके माध्यमों को बंद कर दिया जाता है. अगर आप उनके दायरे में हैं तो फिर उन्हें क्या आपत्ति. ऐसे में यह सोचने की बात है कि क्या इस दायरे में रहने की मानसिकता पर कोई फर्क आया है. शायद यह फर्क दायरे की मानसिकता पर नहीं आया है.

हम जिस स्पेस को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी और तकनीक के विकास के साथ जोड़ते हैं उसके मायने बहुत अलग हैं. निश्चय ही इस वर्चुअल स्पेस ने एक अलग तरीके की सामुदायिकता खड़ी की है. ऐसी सामुदायिकता जो शब्दों से बन रही है. व्यवहार, फिजिकल अपीयरेंस के मायने भी ख़त्म हो गए हैं. पब्लिक के जरिए मुद्दे यहां से बनते और तय होते हैं और जीत उसकी है जिसकी जितनी ज्यादा उपलब्धता है. एक शोर पैदा कर देना और उसे बड़े फलक पर सामने लाना यही कोशिश हो रही है. ऐसे में यह वर्चुअल स्पेस एक साथ इकट्ठा होने या किसी तरह की एकजुटता के फिलाफ भी है. यानि किसी प्रतिरोध या किसी आयोजन का जो सामुदायिकता बोध था वह महज यह नहीं था कि कौन क्या बोल रहा है बल्कि उसका मिलना, उसके व्यवहार के तरीके यह सब उसमे शामिल थे. जो ज्यादा प्रभावित करते थे. पुरानी पीढ़ी से आने वाली पीढ़ी उनके फिजिकल अपियरेंस से भी सीखती थी. यह जरूरी था क्योंकि अगर शब्दों से सीखा जा सकता तो विश्वविद्यालय और विद्यालय दुनिया में उसी वक्त बंद हो जाने थे जब छापाखाना आया. जबकि छापाखाना आने के बाद इनके महत्व और बढ़े. जो अभी भी बने हुए हैं. ऐसे में यह जो स्पेस है वह हमको हमारे सरोकारों से संतुष्ट करता है. हम अपना योगदान देते हुए लगते हैं. हम मेहनत करते हैं और अपनी छोटी-छोटी डिवाइसेज के इश्तेमाल से और अपने आइडियाज से इस स्पेस को समृद्ध करते हैं. बदले में हम इस बात से संतुष्ट होते हैं कि हमने समाज के सामने यह रखा और योगदान दिया है. इसे योगदान कहा जा सकता है पर यह हमने किसी कम्पनी के लिए उत्पाद तैयार किया यह भी हमारा दावा होना चाहिए. जैसे चप्पल की कम्पनी में चप्पल बनाने वाले का सामाजिक योगदान भी है और वह कम्पनी का उत्पाद भी जिसके लिए उसे कम्पनी अपने मुनाफे का एक हिस्सा तो देती ही है. हम उनके मजदूर हैं जो हमे कोई वेतन तक नहीं दे रहे हैं

20 फ़रवरी 2017

चुनावतंत्र में लोकतंत्र की खोज



(मूल रूप से दैनिक जागरण में प्रकाशित)
बहुत कम बरस ही बीते हैं कि हमने लोगों के द्वारा चुनी सरकारों को वैधता दी है. हमारे इतने लंबे इतिहास में सत्तर साल ज़्यादा नहीं होते. इसके पहले ईश्वर प्रदत्त मानी जाने वाली परिवारवादी राजशाहियों का इतिहास काफी लंबा रहा है. धीरे-धीरे वे खत्म हुए और अब कहीं भी बचे. राजशाही ख़त्म होने से पहले लोगों के ज़ेहन से वह मूल्य गया जिसमे यह माना जाता था कि राजा ईश्वर का दूत है. उसकी जगह नया मूल्य लोकतंत्र बना. लोगों का चुनाव ही सर्वोपरि माना जाने लगा. अब कम--बेस पूरी दुनिया ने इसे अपना लिया है. चुनाव की व्यवस्था लोकतंत्र की व्यवस्था हो गयी है. जबकि मूल्य के बतौर लोकतंत्र हम अपने समाज में आज भी नहीं स्थापित कर पाए हैं. भारत में लोकतंत्र का आना सामाजिक संघर्षों, आंदोलनों और क्रांतियों के तहत नहीं हुआ. बल्कि यह सत्ताहस्तांतरण के क्रम में अपना लिया गया. ऐसी कई व्यवस्थाएं अपना ली गई जो सामाजिक मांग से पैदा नहीं हुई थी. इसलिए समाज की मानसिकता सामंती रही और केवल व्यवस्था का ढांचा बदल गया. जब भी चुनाव का वक्त आता है लोकतंत्र के उत्सव के तौर पर इसे पेश किया जाता है. लोगों में यह भावना भर दी गई है कि वोट करना उनका अधिकार है. जनता सर्वोपरि है और जनता सत्ता को बदल सकती है. पिछले कुछ वर्षों में हम यह देख सकते हैं कि कांग्रेस जैसी पार्टी का एकाधिकार खत्म हुआ है. स्थानीय स्तर पर अन्य पार्टियां भी सक्रिय हुई हैं और उन्हें जीत भी हासिल हुई है. पर लोगों का मत और मताधिकार लोकतंत्र को तब तक मजबूत नहीं करता जबतक उनकी अपनी चेतना विकसित हो. उनका अपना कोई मत या विचार बने. समाज में हर व्यक्ति के भीतर लोकतांत्रिक चेतना को विकसित किए बगैर हम लोगों से उनके मत और विचार देने की अपेक्षा नहीं कर सकते. भारत जैसी सघन आबादी वाले देश में लोगों के द्वारा अपना नेता चुना जाना एक मुश्किल काम है. कई लाख की आबादी से तीन या चार की संख्या में कोई उठता है और लोगों को उनमे से किसी एक को चुन लेना होता है. उनमे से बहुत कम लोग अपने द्वारा चुने जाने वाले नेता को ठीक-ठीक जान रहे होते हैं. ऐसे में उनके मत देने का आधार यह नहीं होता कि वह उनका प्रतिनिधि है और वे एक दूसरे से परिचित हैं. वे अपने नेता को भलिभांति पहचान रहे होते हैं. बल्कि उसके आधार बहुत अलग होते गए हैं. ऐसे में भले ही मतदान के प्रतिशत बढ जाएं पर लोकतंत्र अपने सही मायने में कमजोर होता गया है. लोग जिसे वोट करते हैं वह उसकी शोहरत के कारण उससे वाकिफ होते हैं. तो शोहरत वह चीज होती है जो मत के निर्धारण में सहायक होती है. जबकि शोहरत मिलने और शोहरत पाने के बहुत से कारण हो सकते हैं. अपराध और पैसा शोहरत के लिए एक जरूरी चीज बन गया है. आपराधिक प्रवृत्ति भले ही बदनामी की शोहरत देती हो. जबकि ज्यादातर लोग अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति के खिलाफ होते हैं बावजूद इसके आपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं का लोगों के द्वारा चुनकर आना लगातार बढ़ा है. तो किसी भी तरह की शोहरत समाज में एक नायक खड़ा कर देती है. इस शोहरत को बढ़ाने के लिए यह जरूरी होता है कि एक बड़ा प्रचारतंत्र खड़ा किया जाए. जिसके पास जितना बड़ा प्रचारतंत्र होगा उसे उतनी ज़्यादा शोहरत हासिल होगी और वह उतने बड़े नेता के तौर पर उभर कर अएगा. ऐसे में लोगों के पास चुनने के विकल्प के तौर पर वही लोग मिलते हैं जिनके पास शोहरत और पैसा होता है. क्योंकि लोग उन्हीं को जान पाते हैं और पार्टियां उन्हें अपना समर्थन देती हैं. लिहाजा यह सैद्धांतिक बात ही बनकर रह जाती है कि लोकतंत्र में कोई भी चुनाव लड़ सकता है और लोग किसी को भी चुन सकते हैं. व्यवहारिकता में अमीरियत और शोहरत वाले तीन या चार लोगों में से जनता को किसी को चुनना होता है. लोगों के पास यह बहुत छोटा विकल्प होता है. लोगों के मत का निर्धारण यहां इसी आधार पर होता है. आबादी और इलाके इतने बड़े होते हैं कि लोगों की पहुंच अपने नेताओं से नहीं हो पाती बल्कि नेताओं के अपने गिरोह होते हैं जो उनके प्रचारतंत्र को स्थानीय स्तर पर मजबूत बनाते हैं. यह नेताओं द्वारा अघोषित चुना गया प्रतिनिधि मंडल है जो जमीन पर उसकी साख को बनाने और मजबूत करने का काम करता है. लिहाजा इतना बड़ा इलाका होना और लोगों के साथ उनके संपर्क होना एक दुरूह सी चीज हो जाती है. जिसे लोग शिकायत के तौर पर इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उनका नेता चुनाव के बाद नहीं दिखाई पड़ता.

दूसरी बात समाज के हर व्यक्ति में लोकतांत्रिक मूल्य विकसित होने की है. जिस समाज में मूल्य के तौर पर लोकतंत्र बन पाया हो वहां राज्य के तौर पर लोकतंत्र का बन पाना एक मुश्किल काम है. परिवार और गांव की छोटी इकाई के स्तर पर इसे बेहतर रूप में देखा जा सकता है. निर्णय लेने की आज़ादी, व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं, अपने जीवन के हक़ हमारे समाज में नहीं बन पाए हैं. परिवार का मुखिया परिवार के सभी निर्णयों को निर्धारित करता है. औरतों के निर्णय भी वहीं से तय होते हैं. औरतों की आधी आबादी का मत उनके घर के मुखिया का मत होता है. जबकि घर के मुखिया का मत निर्धारण किन्हीं अन्य वर्चस्वों के आधार पर होता है. गांव में विचारों का निर्धारण जातिगत या इसी तरह के वर्चस्वों के आधार पर होता है. ऐसे में लोग जिनके मातहत होते हैं उनका मत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में मताधिकार का मायने वर्चस्व के मताधिकार है. लोगों का यह आत्मनिर्णय नहीं होता बल्कि यह वर्चस्व के निर्णयों का मतदान बन जाता है. यानि जब समाज में और परिवार में लोकतंत्र और उसके मूल्य नहीं होंगे तो राज्य के चुनाव प्रक्रिया या व्यवस्था निर्धारण में इसका होना असंभव होगा. एक बड़े पैमाने पर औरतों को जिनकी आबादी आधी आबादी के बराबर हैं इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सच में हिस्सा बनाना और उनके मत का निर्धारण उनकी अपनी चेतना और विचार के आधार पर होना तभी संभव है जब उनके भीतर लोकतंत्र और बराबरी के मूल्य विकसित हो पाएं. जब लोकतंत्र में जनता द्वारा जनता के साशन की बात कही गयी थी तो वह एक पुराना दौर था जब बहुत सी चीजों की मौजूदगी नहीं थी. लोगों का एकमत बनने का जो प्रस्ताव रहा होगा शायद उसके मूल में उनकी चेतना रही होगी. तब हमारे प्रचारतंत्र के दायरे कम होते थे और अपने इर्दगिर्द की चीजों पर सोचना और उसे समझना और उसके अनुसार मत करने को ही जनमत के तौर पर देखा गया होगा. पर अब जबकि मीडिया आपके मत को तय कर रहा है तो क्या जो चुनाव या पार्टी या नेताओं को लेकर लोगों तक जानकारी पहुंच रही है वह हमारे नजदीकी सरोकारों से जुड़ी हुई है. इसलिए चुनाव और मत तैयार करना अब मीडिया का काम हो गया. वह हमारी चेतना और हमारे इर्दगिर्द से नहीं बन रहा है. बल्कि वह बन रहा है पड़ोसी मुल्क पर हमले करने और आतंकवाद और साम्प्रदायिकता, मिशाइल और देशभक्ति को खड़े करने और फिर उस पर एक राय बनाने से. इसलिए जो पुरानी अवधारणा जनमत से लोकतंत्र की थी वह टूटती हुई दिखती है. क्योंकि जनमत को बनाने के टूल बदल गए हैं और जिनके पास धन का बल है वे जनमत तैयार कर सकते हैं.