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08 सितंबर 2017

ये जो भक्त हैं ये उनका ही वक्त है

चन्द्रिका

(द वायर हिंदी में प्रकाशित)
गौरी लंकेश की हत्या को वे जायज ठहरा रहे हैं
वे उनकी हत्या का जश्न मना रहे हैंहत्यारों को बधाई तक दे रहे हैंउन्हें यह ठीक लग रहा है कि उनसे असहमत एक आवाज़ को किसी ने चुप करा दियाउन्हें यह जायज लग रहा कि किसी ने उस आवाज़ की हत्या कर दी जो उनकी जुबान नहीं बोल रही थीउनकी बातों में हत्या करने वालों को हौसला देना शामिल हैहत्या और नफरत को उकसाना शामिल हैयह सब देखकर ऐसा लगता है कि वे बहुतायत में हैं जो ऐसी हत्या किए जाने की मंशा रखते हैंपिछले कुछ बरसों में जैसे बहुत से हत्यारे तैयार हुए हैंसब अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैंऊपर बैठकर चुप रहकर वह अपनी भूमिका निभा रहा हैकुछ हत्या को जायज ठहराने की भूमिका में हैंकुछ हत्या कर रहे हैं और कुछ हत्यारों को बधाईयां दे रहे हैंउन्होंने एक पूरी संरचना बना ली हैअलग-अलग तरह की भक्ति और उन्माद ने अब उन्हें यहां ला खड़ा किया है कि वे अपराधी से बन गए हैंऐसे अपराधी जिनके हाथों में हथियार भले ही न होउनके ज़ेहन अपराध से भरे हुए हैंयहां किसी भी तरह की नैतिकता भुरभुरी सी हो गई हैयह ख़तरनाक है और दुख़द भीयह उनकी राजनीति के लिए भी ख़तरनाक है जिन्होंने उन्हें उभारा है और जो लगातार उन्हें उभार रहे हैंवे जो समाज बना रहे हैं उसके भीतर से वह चीज ख़त्म की जा रही है जो इंसान के भीतर बची रहनी चाहिए थीइंसान और इंसानियत के बाद ही हम किसी भी राजनीति की कल्पना कर सकते हैं

जिनके विचार अपराध से भर गए हैं उन्हें भी हत्या के बाद चुप हो जाना चाहिए थाउन्हें कुछ नही बोलना चाहिए थाकिसी की हत्या पर उन्हें दुख न भी हो तो भीशायद उन्हें उस चीज को बचा लेना चाहिए था जिसकी जरूरत हमे और उन्हें भी हैऔर वह जरूरत हमेशा बनी रहेगीवे उस इंसानियत को बचा लेतेउस मानवता को बचा लेते जो किसी भी पार्टी से पुरानी हैजो किसी भी संगठन की भक्ति से पुरानी हैजो किसी राजनीति से भी पुरानी हैजो उनकी देशभक्ति से बहुत ही पुरानी हैउन्हें उसे बचाने के लिए चुप होना चाहिए थापर वे चुप नहीं हुएवे हत्या के पक्ष में दलीलें देने लगेवे हत्यारों को बधाईयां देने लगेउन्होंने गौरी लंकेश की हत्या को सिर्फ जायज नहीं ठहरायावे हत्या के बाद ठंडी पड़ चुकी उस लाश को गालियां देने लगेजैसे वे उस पर और गोलियां चलाना चाहते होंवे कितनी हद तक नफरत करने वाले लोग हैंयह हत्या के बाद फैलाई जा रही उनकी बातों में देखा जा सकता हैजैसे वे एक हत्या के बाद और हत्याओं के लिए खुद को तैयार कर रहे होंअपने भीतर और उन्माद भर रहे होंऔर असहमति की सारी हत्याओं को जायज ठहराने का रास्ता बना रहे होंजैसे उनकी गोलियां और चलना चाहती होंवे और बींधना चाहते हों उस लाश को और उस लाश के आसपास कोवे उन सबको ख़त्म करना चाहते हों जो इस तरह की हत्याओं के खिलाफ हैंजो उनसे असहमत हैंउनके भीतर की नफरत उन तीन गोलियों से ख़त्म नहीं हुई हो जैसेउनके हाथ और भी आतुर से लग रहेऐसा उनकी जुबान कह रही हैजो हत्या के पक्ष में अलग-अलग तरह से लिख रहे हैंवे गौरी लंकेश को इसाई बता रहे हैंउन्हें दफनाए जाने को लेकर तरह-तरह का झूठ फैला रहे हैंवे दशहरे के पहले लंकेश की हत्या बता कर इसका जश्न मना रहे हैंवे और भी बहुत कुछ कह रहे हैंवे सब इस हत्या के साझीदार से बनने को तैयार हैंउसे जायज ठहराने की बिनाह परवे उस विचार की पैरोकारी निबाह रहे हैंजहां उनसे कोई असहमत न हो.  
उन्हें यह साहस कहां से मिल रहा हैवह कौन सी राजनैतिक भक्ति है जो उन्हें यह ताकत दे रही हैशायद पुरानी हत्याओं पर न होने वाले इंसाफ उन्हें उत्साह दे रहे हैंकलबुर्गीदाभोलकर और पंसारे का हत्यारा अभी तक कोई नही हैक्योंकि किसी को अभी तक कोई सज़ा नहीं मिली हैकिसी को पकड़ा नहीं गया हैउन्हें अभी तक खोजा भी नहीं गया हैवर्तमान सत्ता की नाकामी या नाचाही ने ही उन्हें यह साहस दिया हुआ हैसत्ता के संस्थानों ने हत्यारों को न खोज पाने की नाकामी से उन्हें मोहलत दी हुई हैयह मोहलत ही उन्हें और हत्याओं का साहस दे रही है.
जरूरी नहीं कि वह कोई एक इंसान हो जिसने इन सारी हत्याओं को अंज़ाम दियायह भी जरूरी नहीं कि ये सारे लोग किसी एक संगठन के होंपर ये ऐसे सभी विचारों के हत्यारे हैं जो उनके विचारों से मेल नहीं खातेइस लिहाज से ये एक विचार के लोग हैंसब के सब हत्याएं नहीं कर सकतेहत्या का जश्न मना सकते हैंये हत्यारों के लिए ताकत की तरह हैंउन्हें हत्या करने के विचार यहीं से मिल रहे हैंजहां एक देश में एक विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार बनाया जा रहायह लोकतंत्र का विचार नहीं हैलोकतंत्र का विचार और ज़्यादा विचारों को जगह देने और फलने-फूलने का विचार हैउन्हें सुन लेने का विचार है जो आपसे असहमत हैंवह कहने का विचार है जिसे आप मानते हैंइसलिए इन हत्याओं को शह देने वाले लोकतंत्र के खिलाफ के लोग हैंवे यह सबकुछ कहते हुएइतने सारे झूठ को फैलाते हुए सिर्फ हत्या को सही बताना चाहते हैं.
वह एक अलग विचार है जो इन सारी हत्याओं से दुखी हैवह ऐसी हर हत्या के फिलाफ आवाज़ उठा रहा हैजबकि हत्यारा पकड़ा जाए इससे पहले एक और हत्या कर दी जा रही हैकिसी की गिरफ्तारी संभव नहीं हो पा रहीक्योंकि इसे पकड़ने और सज़ा देने वाले संस्थानों को इसी विचार के मुखियाओं ने जकड़ रखा हैइसलिए हत्या पर जश्न मनाने वाले ही नहीं बल्कि हमारी सत्ता इन हत्याओं को उकसा रही हैवह हर रोज नए तरह की हत्याएं करवा रही है.    
गौरी लंकेश पर गोलियां किसी एक ने चलाई होंगीगालियां देने वालों की पूरी फौज सी आ गई हैयह वंदेमातरम और तिरंगे की फौज़ हैयह उन भक्तों की फौज हैजो असहमति की एक आवाज़ के चुप करने का जश्न मना रही हैवह देश और लोकतंत्र दोनों को एक संकरी गली में ले जा रही हैवह इससे पहले गौरी लंकेश को नही जानती थीवे जो गालियां दे रहे हैंजो हत्या को जायज ठहरा रहे हैं उनके कोई व्यक्तिगत मतभेद नहीं हैंमतभेद विचारों का ही था कि गौरी भक्त पत्रकार नहीं थीगौरी किसी और विचार को मानती थीयह वक्त ऐसा बना दिया गया हैजहां गैर विचार रखना ही अपराध बनता जा रहा हैयही वह ख़तरा है जो लोकतंत्र को कमजोर कर रहा हैयही वह चीज है जो उससे भी हमारा भरोसा उठा रहा है जो लोकतंत्र और किसी भी तंत्र के पहले की चीज हैइंसानियत के बाद कोई भी तंत्र पैदा हुआ हैफिलवक्त वे सारी चीजें मिटाई जा रही हैंजिसे हमे बचाना थाजिसे हमे समाज में और बढ़ाना थाउनकी राजनैतिक भक्ति इंसानियत तक पर भारी पड़ रही हैये जो भक्त हैं ये उनका ही वक्त हैहमारा वक्त हमे लाना हैहमे उसे बचाना है जो इस भक्ति के पहले की चीज हैजो किसी भी राजनैतिक शक्ति के पहले की चीज है.

08 अप्रैल 2017

लोकतंत्र की नाकामी से उपजता उन्माद



अब तक भेदभाव खत्म हो जाने थे. धर्म और रेस के आधार पर हत्याएं बंद हो जानी थी. तीन सौ बरस से भी पहले दुनिया में आए लोकतंत्र की प्रेक्टिस को इतना तो करना ही था. पर हत्याएं बढ़ गई हैं और नफरत कई गुना ज्यादा उभर कर सामने आ रही है. यह सिर्फ हमारे अपने देश की हालात नहीं हैं, यह पूरी दुनिया में हो रहा है. अमेरिका में भी जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबसे पहली भागीदारी हुई थी वहां भी लोग इसी तरह की नफरत दिखा रहे हैं. इतने लम्बे वक्त के बाद इस तरह की घटनाओं का होना कहीं न कहीं उस नाकामयाबी को दिखा रहा है जो लोकतंत्र से मिलनी थी. जिन मूल्यों के साथ लोकतंत्र आया था वह घटता जा रहा है. सबके लिए सब बराबर नहीं हो पा रहा. हमें तलाशी लेनी चाहिए. अपने देश के राजनीतिक विकास की, दुनिया के राजनीतिक विकास की. शायद पूरे लोकतंत्र के प्रणाली की ही तलाशी लेनी चाहिए. हमे यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों समता, समानता और बंधुत्व दुनिया में कमजोर पड़ रहा है.  

अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं. पर समग्रता में देखें तो लोगों में असहिष्णुता सब जगह बढ़ी है. हाल ही में ट्रंप सरकार आने के बाद अमेरिका में नस्लीय हमले बढ़े हैं. गैर-अमेरिकियों में एक असुरक्षाबोध पैदा हुआ है. जो एक मॉडर्न राष्ट्र के रूप में देखा जाता है और जहां लोग बेहतर जीवन और नौकरियों के लिए जाते रहे हैं रेस आधारित हिंसा और घटनाओं ने वहां लोगों में भय पैदा कर दिया है. ट्रंप जब चुनाव लड़ रहे थे तो उनके चुनावी अभियान में भी यह विभेद उनके भाषणों के तहत देखने में आ रहा था. अमेरिकी और गैर-अमेरिकी को मुद्दा बनाया जा रहा था. शायद वहां के लोगों ने इसे स्वीकार किया और उन्हें अपना मत दिया. जीतने के बाद जिसका प्रतिफल हम देख रहे हैं. लोगों के द्वारा इस तरह की नफरत को स्वीकार किया जाना ही इस बात को दिखाता है कि संरचना के तौर पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का होना और लोगों में लोकतंत्र के मूल्य का स्थापित हो पाना दोनों अलग-अलग चीजें हो गई हैं. लोगों में वे लोकतांत्रिक मूल्य नहीं निर्मित हो पा रहे हैं जो रेस, जाति, धर्म को बराबरी से देख सकें. सबके साथ समानता का बर्ताव कर सकें.  

अमेरिका में जब दिन्दुस्तानियों पर हमला होता है तो हिन्दुस्तानियों के लिए यह शोक और दुख की बात होती है. उन्हें लगता है कि यह ग़लत हुआ. पर जब हिन्दुस्तान में नाइजिरिया और साउथ अफ्रीकन देशों के लोगों पर हमले होते हैं तो वे इन घटनाओं को ठीक वैसे नहीं देख पाते जैसे कि अमेरिका में गैर-अमेरिकी पर हुए हमले को देखते हैं. महाराष्ट्र में मनसे और शिवसेना बिहारियों के नाम पर उत्तर भारतीयों पर हमले करती रही है. मद्रासी कह के दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाया जाता रहा है. नेपाली के नाम पर नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को प्रताड़ित किया जाता रहा है. मुसलमानों को तो पूरी दुनिया में अलग-अलग तरह से हमले किए जा रहे हैं. उनके कई मुल्कों को तबाह कर दिया गया. इन सारे हमलों को हम अलग-अलग देशों और अलग-अलग संदर्भों के साथ देख सकते हैं. जबकि हम इसके मूल में जाएंगे तो एक ही कारण समझ में आएगा. बदले हुए अर्थतंत्र ने जो असुरक्षा पैदा की है उस असुरक्षा ने लोगों को उन्मादी बना दिया है. उसी असुरक्षा ने मुल्क की सरकारों को भी उन्मादी बना दिया है. बड़े मुल्क छोटे मुल्कों पर हमले कर रहे हैं और स्थानीय और ताकतवर लोग गैर-स्थानीय और कम ताकतवर पर हमले कर रहे हैं. यह बड़े पैमाने से लेकर छोटे पैमाने पर हितों की लड़ाई है.  

इन हमलों की वजह कई बार बहुत साफ तौर पर दिखती है. कई बार ये हमले बहुत अपरोक्ष होते हैं. कारण कोई और गिनाया जाता है लेकिन उसके पीछे की वजह कोई और ही होती है. इसे हमे समझने की कोशिश करनी चाहिए. पूरे दुनिया के स्तर पर अर्थव्यावस्था इस तरह से गड़बड़ हुई है कि राज्य अपने लोगों को रोजगार देने की स्थिति में नहीं है. दो करोड़ प्रति वर्ष नौकरियों का दावा करने के बाद भी हमारी केन्द्र सरकार कुछ हजार नौकरियां देने में भी असफल रही है. तकनीकी विकास ने कई प्राइवेट संस्थानों व अन्य संस्थाओं में भी नौकरियां कम कर दी हैं. ऐसे में लोग बेरोजगार और बेहाल स्थिति में हैं. कम से कम लोगों द्वारा ज्यादा से ज्यादा काम कराना ही इस मुनाफे की व्यवस्था के लिए लाभकारी है. यह वित्तिय व्यवस्था जितना ज्यादा और बढ़ेगी बड़ी पूजी और कम लोगों के हाथों में सिमटती जाएगी. रोजगार और कम होते जाएंगे. पूजी का डिस्ट्रीब्यूशन भी और कम होता जाएगा.

इस बेहाली के लिए राजनैतिक पार्टियां अलग-अलग तरह के वायदे लेकर आती हैं पर उनके लिए बेरोजगारी को दूर करना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में वे बेरोजगारी की वजहों को बदल देती हैं और लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करती हैं. वे यह बताने के बजाय कि राज्य अपनी नीतियों के कारण रोजगार देने में असफल हो रहा है यह बताती हैं कि स्थानीय की नौकरियां गैर-स्थानीय के हाथों में जा रही हैं. इस तरह से स्थानीय और गैर-स्थानीय के बीच एक नफरत को पैदा किया जाता है. सरकार खुद हमले न करके लोगों के भीतर इस तरह का भाव पैदा करती है कि वे ख़तरनाक हो जाते हैं. उन्हें उनका हित जाता हुआ दिखता है. वे सरकार की नीतियों पर सोचने के बजाय दूसरों के लिए नफरत की रणनीतियां तैयार करने लगते हैं. वे उन्मादी हो जाते हैं.
भारत के संदर्भ में यदि हम देखें तो जो उन्माद दिख रहा है वह सिर्फ भाजपा के सत्ता में आने का उन्माद नहीं है. कांग्रेस के वक्त भी वे उन्मादी थे. बस यह उन्माद थोड़ा और बढ़ गया है. अमेरिका से लेकर नोएडा तक और दादरी से लेकर बाबरी तक जो लकीर खींची जा रही है. वह हमारे इतिहास के पन्नों से कई लाइने काट रही है. वह लोकतंत्र और संविधान की लाइन को भी काट रही है जिसके तहत हमे धर्मनिर्पेक्षता और बंधुत्व का एक मूल्य मिला हुआ है. अमरीका में भारतीय महफूज नहीं हैं. यह हमे अपने मुल्क में रहते हुए दिखता है. जबकि अमेरिका से कई देश महफूज नहीं हैं. क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था को बनाना और उसे टिकाए रखने के लिए जरूरी हो गया है कि किसी न किसी तरीके से गैर मुल्कों पर कब्जेदारी बनी रहे. वहां के संसाधनों को अपने लिए उपयोग किया जा सके.

लोकतंत्र और उसके बाद ग्लोबलाइजेशन का यह परिणाम तो नहीं सोचा गया था कि अमेरिका में गैर अमरीकी मारा जाएगा. अस्ट्रेलिया में भारतीय मारा जाएगा. और भारत में नाइजीरियन और साउथ अफ्रीकन मारा जाएगा. यह सब कबीलाई समाजों के इतिहास सा हो रहा है. जो अपने कबीले में दूसरे कबीले को नहीं घुसने देते थे. पर फिर से हमारे समाजों में हत्या और नफरत के जो आधार बन रहे हैं वे ऐसा समाज बना रहे हैं जहां ग्लोबलाइजेशन भी है और कबीले का पुरानापन भी है.

15 दिसंबर 2016

बिना डाकघरों वाला देश

हम डरे हुए हैं. डरे हुए वे भी हैं. हमारा यह वक्त डरे हुओं का वक्त है. वे डरे हुए हैं कि अब भी हम बचे हुए हैं. हम, जो उनके झूठ को सच कहने से इनकार कर रहे हैं. वे जिसे नायक और नायक से महानायक कह रहे हैं. हम उसे अपराधी और हत्यारा लिख रहे हैं. उनकी बढ़ी हुई ताकतें हमारे साहस को कम न पर पा रहीं. वे हमारी यादों से गुजरात और गुजरात जैसी कई रात की कालिख़ मिटाना चाहते हैं और हम उस कालिख़ को अपने दवात की स्याही बनाना चाहते हैं.  
हम जो हमारी उम्र में राष्ट्रद्रोही होने की सोच में ऊब रहे हैं. हम जो जाने कितनी फाजिल की बहसों में हर रोज डूब रहे हैं. हम जिनकी डायरियों में कुछ और लिखा जाना था. कुछ और कहा जाना था. जहां पुरानी प्रेमिकाओं की यादें उतरनी थी. उन डायरियों में उनके फैलाए जा रहे झूठ से फैली परेशानियां उतर रही हैं. ऐसे ही वक्त की यह डायरी है. जिसे दोस्त मिथिलेश प्रियदर्शी ने लिखा है. जेएनयू वाली ‘एन्टीनेशनल’ डायरी. जे.एन.यू. के उन दिनों को बयान करती हुई जब अपने दोस्तों को जेएनयू का सच बताना ‘पाकिस्तान’ हो जाना था. जिसका एक छोटा हिस्सा यहां पढ़ सकते हैं. बाकी पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 
डायरी का एक हिस्सा
कैलेंडर की हर तारीख के पास बताने के लिए बहुत कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता. पर जेएनयू के 9 फरवरी के हिस्से कुछ ऐसा आया था, जिसके बारे में सभी जानना चाहते थे.    
यह साबरमती ढाबे की घटना थी. ‘ढाबा संस्कृति’ जेएनयू की जान है. जेएनयू से अगर ढाबों को हटा दिया जाए तो जेएनयू उतना ही बचेगा जितना गीत हटा देने के बाद बिहार की शादियां. बहसों-मुबाहिसों के केंद्र ये ढाबे शाम होते ही जीवंत हो उठते हैं, जो देर रात तक गतिशील रहते हैं. बैठकें, पोस्टर-प्रदर्शनी, विरोध प्रदर्शन, नुक्कड़-नाटक, गीत-संगीत आदि कई सारे कार्यक्रम इन्हीं ढाबों पर होते हैं. खुले आसमान के नीचे अच्छी संख्या में चाय-पकौड़ियां टूंगते विद्यार्थी इन कार्यक्रमों में हमेशा मौजूद होते हैं.     
9 फरवरी को साबरमती ढाबे पर कश्मीर को लेकर एक कार्यक्रम था, ‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफिस’. यह शीर्षक आगा शाहिद अली के 1997 में आये कविता संग्रह से लिया गया था. 1990 में कश्मीर में करीब सात महीनों तक कोई चिट्ठी नहीं बांटी गयी थी. यह ठीक आज के उन हालातों की तरह था, जब मोबाईल और इंटरनेट की सुविधा घाटी में कभी भी बंद कर दी जाती है, व्हाट्सअप ग्रुप रजिस्टर करवाने के लिए थाने को बताना पड़ता है, मोबाईल से सामूहिक संदेशों का भेजा जाना रोक दिया जाता है और कश्मीर पूरी दुनिया से कटकर एक टापू में तब्दील हो जाता है. उस रोज़ उस कार्यक्रम में कश्मीर में मौजूदा नारकीय जीवन से मुक्ति के लिए गीत गाए जा रहे थे. घाटी के गायब हुए उन युवाओं को याद किया जा रहा था, जो अपने पीछे एक अंतहीन और बेहद दर्दीला इंतज़ार छोड़ अनुपस्थित हो गए हैं. उन आधी विधवाओं को याद किया जा रहा था, जिन्हें यह तक नहीं मालूम कि उनके पति ज़िंदा भी हैं या नहीं. सेना द्वारा कश्मीरियों पर किये जा रहे अत्याचारों, बलात्कार और छद्म मुठभेड़ों पर बात हो रही थी, जो इस कदर आम है कि यह बच्चों के खेल में शामिल हो गया है. साथ ही, अफ़जल की फांसी पर बात हो रही थी, जिसे इस देश के ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए मार दिया गया. आफ्सपा पर बात हो रही थी, जिसके अमानवीय कानूनों ने कश्मीरियों का जीवन सीमित कर दिया है. इस कार्यक्रम में कई लोग आफ़्सपा, सेना की ज्यादतियों, बलात्कार के मामले, अफ़जल आदि के मसलों पर सहमति की वजह से इसमें शामिल हुए थे जो जेएनयू की जनवादी राजनीतिक परम्परा के अनुरूप था. इस मामले में जेनयू की एक 'वाल्तेयराना' परम्परा रही है कि तमाम असहमतियों के बावज़ूद किसी के अपनी बात रखने के अधिकार की रक्षा के लिए लोग खड़े होते हैं. खासकर, किसी भी कार्यक्रम में एबीवीपी की गुंडई से होने वाले व्यवधानों से बचाने की एक ज़िम्मेदारी के तहत भी दूसरे छात्र संगठन घेरा बनाकर उसमें शामिल होते हैं. इस कार्यक्रम में भी वाम संगठनों की भागीदारी की मुख्य वज़ह जेएनयू की यही 'वाल्तेयराना' परम्परा थी. पिछले साल 'मुज़फ्फरनगर बाकी है' डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन भी इसी वजह से हो पाया था. अन्यथा एबीवीपी की संघी मानसिकता जेएनयू में इस किस्म का एक कार्यक्रम न होने दे.
इधर गीत गाये जा रहे थे, गिटार बजाया जा रहा था, उधर एबीवीपी के सदस्य इस कार्यक्रम के ख़िलाफ़ ढाबे के बगल की सड़क पर बैठकर प्रदर्शन कर रहे थे. वे बेहद आक्रामक अंदाज़ में 'खून बहेगा सड़कों पर, जो अफ़जल की बात करेगा, वो अफ़जल की मौत मरेगा, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’ जैसे नारे लगा रहे थे. पर इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि जेएनयू पर हमले के लिए तैयार बैठे लोगों को मौक़ा मिल गया.
अब तक ढाबे पर झुटपुटा सा अंधेरा उतर गया था. अचानक कार्यक्रम में चार-पांच लोगों का एक समूह नमूदार होता है. उनके चेहरे रूमाल से ढंके होते हैं. वो एक छोटा सा घेरा बनाते हैं और नारे लगाने लगते हैं. कश्मीर की आज़ादी के लिए नारे लगाता वह समूह अचानक भारत की बर्बादी के नारे लगाने लगता है. बस यहीं से सब कुछ बदल जाता है. वहां मौजूद लोग असहज हो उठते हैं. उन्हें रोका जाता है. सब एक दूसरे से उनकी बाबत पूछ रहे होते हैं. उनके किसी अन्य विभाग/सेंटर से होने का अनुमान लगा रहे होते हैं पर उनके बारे में ठीक-ठीक कोई नहीं जानता. बाद में स्पष्ट होता है, वो यहाँ किसी सेंटर के नहीं थे. तब सवाल आता है, वो कौन थे और कहां से आये थे और कहाँ गायब हो गए?
इस बीच कार्यक्रम एक जुलूस में तब्दील हो जाता है, जिसे गंगा ढाबा पर समाप्त होना होता है. देखादेखी एबीवीपी के लोग भी ‘मार देंगे, काट देंगे, गोलियों से आरती करेंगे’ जैसी धमकियों वाले नारे लगाते हुए सामानांतर जुलूस निकालते हैं. जुलूस के दौरान बार-बार टकराव की स्थिति आती है. जुलूस के समापन के साथ ही उस वक्त तो यह मामला ख़त्म हो जाता है. यही जेएनयू की संस्कृति भी है. यहाँ हर कोई अपनी बात रखने को स्वतन्त्र है. लोग धैर्य से सुनते हैं, अगर सहमत हुए तो तालियाँ बजाकर उत्साहवर्धन करते हैं, अन्यथा मुस्कुराकर चल देते हैं. और मामला खत्म हो जाता है. पर इस बार यह महज़ जेएनयू के भीतर की बात नहीं थी. दिलचस्पी लेने वाले लोग बाहर के थे. इस पूरे प्रकरण में जी न्यूज का एक रिपोर्टर वहां शुरू से ही मौजूद होता है, जो एबीवीपी के आमंत्रण पर आता है. दिलचस्प सवाल यह कि इन्हें कैसे पता होता है कि जेएनयू में कुछ बिल्कुल अलग घटने जा रहा है? दिल्ली के एक भाजपा नेता जेएनयू में हुए कार्यक्रम को लेकर तुरंत एक मुकदमा लिखवा देते हैं. और कार्रवाई के मामले में ‘सेलेक्टिव कैरेक्टर’ वाली पुलिस फ़ौरन से पेश्तर जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लेती है.

11 अक्टूबर 2015

मोदी जी को क्या मतलब!

-दिलीप खान
 
संसद मार्ग थाने के भीतर
घटना-1. दिल्ली के मंडी हाऊस में सौ-डेढ़ सौ लोग बिसाड़ा की घटना के बाद देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए जमा हुए। मंडी हाऊस से नरेन्द्र मोदी के आवास तक प्रदर्शन होना था। पुलिस ने हिरासत में लिया और उसके बाद संसद मार्ग थाने की चारदीवारी के भीतर ही नारे लगते रहे, भाषण होते रहे। बाहर सड़क पर लोग अपने दैनिक काम के लिए हमेशा की तरह जाते रहे। गाड़ियां चलती रहीं, चाय बिकती रहीं, थाने के बाहर पुलिस वाले खैनी मलते रहे, रजनीगंधा खाते रहे। जो दृश्य अंदर था उसका छटांक भी छनकर बाहर नहीं आ पा रहा था। बाहर का पूरा नजारा उसी तरह शांत, चुप और असरहीन दिख रहा था, जिस तरह बिसाड़ा की घटना के बाद प्रधानमंत्री दिख रहे थे। नरेन्द्र मोदी थाने के बाहर कण-कण में मौजूद दिख रहे थे। बाहर का भारत बिल्कुल शांत था, चुप था। बिसाड़ा से कोई फर्क नहीं पड़ने का हलफ़नामा भरने को तैयार था।


घटना-2. लगातार कहा जा रहा है कि दादरी अब एक जगह नहीं है। दादरी के पैरों में पहिए लग गए हैं और वो देश भर में तेज़ी से घूम रहा है। बहुत कम समय में मैनपुरी होते हुए दादरी दोबारा जम्मू-कश्मीर पहुंच चुकी है। पहले एमएलए इंजीनियर राशिद की बीजेपी विधायकों द्वारा पिटाई हुई, फिर कुछ लोगों को जलाने की कोशिश। गाय लगातार राजनीतिक और हिंसक जानवर में तब्दील होती जा रही है। इस बार गाय पर सवार लोगों का जत्था उधमपुर के एक होटल के बाहर पहुंचा और ट्रक फूंककर रास्ते से निकल गया। कोयले से भरा ट्रक धू-धूकर जल उठा और साथ में दो लोग भी। एक चालीस फ़ीसदी जला और दूसरा सत्तर फ़ीसदी। ड्राईवर बच गया। गाय ने ख़ुद पर सवार लोगों से ये कहा होगा कि नहीं, ट्रक में मेरा मांस नहीं, कोयला है, लेकिन सवारों ने अनसुनी की और फिर से कोरी अफ़वाह पर एक घटना और घटी। बीजेपी की सहयोगी पीडीपी ने बढ़ रही सांप्रदायिक तनाव पर चिंता जताते हुए कहा कि 'मोदी जी विकास के नाम पर जीतकर आए हैं, लेकिन सांप्रदायिक तनाव का विकास कर रहे हैं, जिसमें भारत टिक नहीं पाएगा'. मुझे ठीक-ठीक पता नहीं कि भारत कितना टिकेगा, कितना नहीं, लेकिन ये ज़रूर है कि ऐसी घटनाएं अब टिकाऊ होने वाली हैं। ट्रक जलाने की घटना कोई नई नहीं है। 2013 में धारूहेड़ा में एक साथ लगभग पचास ट्रकों को बजरंग दल वालों ने 'गोमांस' की अफ़वाह के आधार पर जला दिया था। बाद में कस्टम के अधिकारियों ने जांच की तो आरोप ग़लत साबित हुआ।

घटना-3. साहित्य अकादमी में उदय प्रकाश ने पुरस्कार लौटाने की शुरुआत की और अब नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी, शशि देशपांडे, कृष्णा सोबती और सारा जोसफ़ ने भी अकादमी को पुरस्कार लौटा दिया।  (अब तो 9 और लेखकों ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है) सच्चिदानंदन ने सभी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी नाम के व्यक्ति को इनसे कोई फर्क़ पड़ता नहीं दिख रहा। वो कर्नाटक में हुई एक गोष्ठी को अकादमी की तरफ़ से पर्याप्त कदम मान रहे हैं जोकि एमएम कलबुर्गी की 'मौत' (हत्या नहीं) के बाद उठाया जाना चाहिए था। लेखकीय स्वतंत्रता, स्वायत्तता और आलोचना का पूरा स्वर तिवारी जी के साउंडप्रूफ़ चैंबर में नहीं पहुंच पा रही। तिवारी जी राजनीतिक बयान नहीं दे पाएंगे, हो सकता है पान की गिलौरी मुंह को ये इजाजत ना देती हो! दीनानाथ बतरा पान नहीं खाते, लिहाजा वे आगामी अध्यक्ष के तौर पर बेहतर साबित होंगे!!

इन घटनाओं का आपस में रिश्ता आप तलाशिए, ये आपका काम है, मोदी जी का नहीं। वो फिर कभी एक स्टेटमेंट देकर देश की अखंडता बचा लेंगे। अखंड भारत वैसे भी उनका ऑरिजिनल नक्शा है। फिलहाल वो बिहार बना रहे हैं.

06 सितंबर 2015

धर्म की कोख हत्याओं से भरी है

प्रो. मालेशप्पा मादिवलप्पा कलबुर्गी पर प्रणय कृष्ण
अपने समय के समाज के बारे में बसवेश्वर अपनी बहन नागलम्बिका से कहते हैं,“….बहन, ऐसा प्रतीत होता है कि बुरे लोगों के समाज में जो निकृष्टतम होते हैं , वे ही नेता होते हैं. इन्हें लगता है कि वे धर्म के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं , यदि उनके पास थोड़ा पैसा हो और कुछ दुष्ट अनुयायी हों. लेकिन वे दिन दूर नहीं जब ये पैसा , ये पुजारी और उनके अनुयायी इस मठ की मृत्यु का कारण बनेंगे. ” (श्री कलबुर्गी के नाटककेट्टिटू कल्याण’ (कल्याण का पतन) के बसवराज नायकर कृत अंग्रेजी अनुवाददि फॉल ऑफ़ कल्याण’, पृष्ठ २९ से उद्धृत)
जान पड़ता है कि ३० अगस्त के दिनधर्म के नाम परकुछ भी कर गुजरने का हौसला रखने वालों ने पैसे और दुष्ट अनुयायियों के बल पर भाड़े के हत्यारों से प्रो. कलबुर्गी की ह्त्या करा दी. ‘मूर्ति पूजा की निंदा के चलते ही संभवतः प्रो.कलबुर्गी की ह्त्या हुई’- ऐसा समाचार पाकर ३० अगस्त की रात एक साथी ह्त्या से आक्रोशित होकर मुझे फोन पर कह रहे थे, “आज दयानंद होते या बिल्ले-सुर बकरिहा लिखनेवाले निराला, तो उन्हें भी ये लोग मार डालते.”

श्री कलबुर्गी का जीवन-दर्शन
जो जड़ है वह नष्ट हो जाता है, जो गतिमान है, वह नष्ट नहीं होता’ , यह पंक्ति प्रो. कलबुर्गी के लिखे बसवन्ना के जीवन पर आधारित नाटककेट्टितू कल्याण’ (कल्याण का पतन) में बार-बार टेक की तरह दोहराई जाती है. इन पंक्तियों में श्री कलबुर्गी का जीवन-दर्शन गूंजता है, जो सर्वाधिक १२ वीं सदी के क्रांतिकारी संत बसवेश्वर से प्रभावित रहा. इस नाटक में केवल बसवेश्वर का क्रांतिकारी जीवन और दर्शन , बल्कि श्री कलबुर्गी द्वारा उसकी समकालीन प्रासंगिकता की अद्यतन व्याख्या भी सुरक्षित है. जड़ता और यथास्थितिवाद की ताकतों ने भले ही उनकी ह्त्या कर दी, लेकिन उनके जीवंत और गतिमान विचार नष्ट नहीं किए जा सकते. बसवन्ना और उनके अद्भुत व्याख्याकार कलबुर्गी के जीवन और दर्शन की उल्लेखनीय समानताओं को ध्यान में रखते हुए ही शायद उनकी मृत्यु पर बंगलुरु के टाउन हॉल पर आयोजित विरोध-प्रदर्शन में एक प्रदर्शनकारी ने तख्ती पर लिख रखा था, ‘कल बसवन्ना थे, आज कलबुर्गी.” बसवन्ना भी अपने विचारों के लिए ही जिए और मरे.
कल्याण का पतननाटक तीन हिस्सों में बसव के जीवन और दर्शन के तीन सोपानों को प्रस्तुत करता है. कर्मकांड से अच्छे धर्म की ओर यात्रा बागेवाड़ी में, भौतिक प्रकृति से आध्यात्म की ओर कूडल संगम में और आध्यात्मिक संस्कृति से सामाजिक संस्कृति की ओर यात्रा कल्याण में पूरी हुई. बसव के जीवन-दर्शन की प्रो. कलबुर्गी द्वारा नाट्य-रूप में प्रस्तुत यह गतिमानता एक तरह से समूचे लिंगायत आदोलन की अंतिम परिणति के रूप में सामाजिक क्रान्ति के उद्देश्य को प्रस्थापित करती है.

सच के लिए सत्ता से टकराने वाले इतिहासकार
कलबुर्गी कन्नड़ साहित्य की दुनिया के उन महत्वपूर्ण लोगों में से थे जिन्होंने कर्नाटक क्षेत्र के इतिहास को प्रशिक्षित इतिहासकारों से भी अधिक दक्षता के साथ वैज्ञानिक ढंग से उद्घाटित किया. श्री कलबुर्गी, रहमत तारिकेरे, डी.आर.नागराज, एम. चिदानंदमूर्ति, एन. पी. शंकरनारायण आदि कन्नड़ साहित्यकारों का वैज्ञानिक इतिहास-लेखन में जैसा योगदान है, वैसा किसी आधुनिक भारतीय भाषा के साहित्य में नहीं मिलता. इसी साल जून में श्री कलबुर्गी ने एक भाषण में अपनी इतिहास-दृष्टि का मानो सार प्रस्तुत करते हुए कहा, “ ऐतिहासिक तथ्यों पर दो तरह के शोध-कार्य होते हैं . एक वह होता है जो सत्य की खोज पर समाप्त हो जाता है , दूसरा उसके आगे जाकर वर्तमान का पथ-प्रदर्शक बनता है.. जहाँ पहले किस्म का शोध-कार्य महज अकादमिक होता है , वहीं दूसरे वाले में वर्तमान का मार्ग-दर्शन होता है .वक्त का तकाज़ा है कि इन दूसरे किस्म के शोध-कार्यों पर जोर दिया जाए जो वर्तमान के सवालों से इतिहास से मिलने वाली सीख की रोशनी में रू--रू होते हैं.” वर्तमान की चुनौतियों से इतिहास के सम्बन्ध पर जोर देने के चलते ही वे समय समय पर धर्मसत्ता और राजसत्ता के प्रतिष्ठानों से टकराते रहे. अपने तार्किक और वस्तुवादी दृष्टिकोण के कारण खुद लिंगायत धर्म-प्रतिष्ठान से भी उनका टकराव होता रहा. बसवन्ना (जिनके जीवन और दर्शन के वे सबसे श्रेष्ठ व्याख्याता थे) के जीवन और रिश्तों के बारे में प्रचारित मिथकों की छानबीन और व्याख्या के ज़रिए उनके पीछे के ऐतिहासिक यथार्थ के उदघाटन के प्रयास में १९८९ में उन्हें लिंगायत समुदाय के रूढ़िवादियों का कोप झेलना पडा. उस समय भी उन्हें मार डालने की धमकियां दी गयी. मार्ग शृंखला की पुस्तकें जिनमें कन्नड़ साहित्य, इतिहास और संस्कृति से सम्बंधित उनके शोधपरक निबंध संकलित हैं, उसकी पहली पुस्तकमार्ग से उन्हें दो अध्याय लिंगायत मठाधीशों के दबाव में वापस लेने पड़े . इस घटना पर व्यथित होकर उन्होंने कहा था कीमैंने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए यह किया, लेकिन इसी दिन मेरी बौद्धिक मृत्यु हो गयी.” क्षोभ में उन्होंने जो भी उस समय कहा ,लेकिन उनकी निर्भीक बौद्धिक यात्रा जारी रही. इसी शृंखला की पुस्तकमार्ग पर उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड २००६ में मिला. १९८९ में उनको मिली धमकियों के विरोध में भी अखिल भारतीय प्रतिवाद के स्वर उठे थे. इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के २० मई, १९८९ के अंक में सम्पादक के नाम पत्र में इस घटना पर प्रतिवाद जताते हुए सर्वश्री बिश्वरूप दास, सुधीर चन्द्र, लैसी लोबो, घनश्याम शाह, अर्जुन पटेल, एस.एस. पुणलेकर, सोनल श्रॉफ, परमजीत सिंह, अचिन विनायक, किरण देसाई, सत्यकाम जोशी, के.एस. रमण आदि बौद्धिकों ने लिखा था, “राजनीतिक निरंकुशता अकादमिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है. धार्मिक मतान्धता की तानाशाही और रूढ़िवाद के साथ मिलकर इसने हमारेआधुनिकऔरसभ्ययुग में बौद्धिक कर्म को वैसा बना दिया है जैसा वह सुकरात और गैलीलियो के समय हो उठा था. फिर, श्री कलबुर्गी की प्रताड़ना की इस क्रूर विडम्बना से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि उनके खिलाफ अभियान चलानेवाले महान क्रान्तिकारी संत बसव के अनुयायी हैं. क्या वे भूल गए हैं कि ये विचार की ही ताकत थी जिस के बल पर बसव ने अपने समय के रूढ़िवाद के आडम्बरों और गड़बड़ियों को बेनकाब किया था ? क्या वे खुद उसी रूढ़िवाद की स्थापना में लग गए हैं, जिसके खिलाफ बसव ने अपने समय में लड़ाई की थी और सुधारने की कोशिश की थी? अन्यथा उन्हें कलबुर्गी के साथ ईमानदार तार्किकता की भावना के साथ बहस करनी चाहिए थी, कि उन्हें संस्थाबद्ध धर्म की ताकत से खामोश करने की कोशिश.” १९८९ से २०१५ का भारत बहुत अलग है. अब धर्म की ताकत से खामोश करने से आगे जाकर बन्दूक के बल पर बौद्धिकों और तर्कनिष्ठ लोगों को खामोश करने का अभियान संचालित है. श्री दाभोलकर, कामरेड पानसारे और कलबुर्गी महोदय को पिछले तीन सालों में इसी तरह से खामोश किया गया. वह इतिहास कैसा होगा जिसमें तथ्य का ही गला घोंट दिया जाए? वह विज्ञान कैसा होगा जिससे तर्क गायब हो? वह अकादमी कैसी होगी जिसमें विचारों की सरे-राह ह्त्या हो? यह सवाल आज के भारत में जिस तरह विकराल मुंह बाए खड़े हैं, वैसे कभी थे.
सन २०१२ में कर्नाटक सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने प्रो. कलबुर्गी को उस समिति का प्रमुख बनाया जिसे आदिलशाही वंश के अधीन रचे गए समस्त साहित्य को कन्नड़ में लाने का कार्यभार सौंपा गया. उर्दू, फारसी और अरबी में उपलब्ध इस प्रभूत साहित्य का संरक्षण इसलिए भी आवश्यक है कि बीजापुर के इतिहास की बेशुमार जानकारियों इनमें मौजूद हैं. इनका साहित्यिक मूल्य भी कुछ कम नहीं. भाषाविद, संस्कृति के अध्येता, लोक साहित्य के विशेषग्य और शिलालेखों, ताम्रपत्रों आदि के पाठ में महारत प्राप्त अग्रणी इतिहासकार होने के कारण ही उन्हें यह जिम्मा दिया गया. श्री कलबुर्गी आदिलशाही वंश को दक्कन के पठार में सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अलमबरदार मानते थे और इब्राहीम आदिलशाह को उन्होंनेदक्षिण भारत का अकबरबताया था. उन्होंने मुहम्मद कासिम फ़रिश्ता कीगुलैन- - इबाहिमीऔर काजी नूरुल्ला कीतारीख--आदिलशाहीसहित २० पुस्तकों का अनुवाद पहले चरण में पूरा करने का जिम्मा लिया था और जीवन के अंतिम दिनों में इस काम में लगे हुए थे. प्रो. कलबुर्गी के अनुवादों का सम्पादन कर रही लेखिका एम. एस. आशा का कहना है कि उनकी अगली रचना १२ वीं सदी से १६ वीं सदी के बीच कन्नड़ में स्त्री लेखन के विलुप्त होने के कारणों की खोज पर केन्द्रित थी, जिस दौर में लिंगायतों के बीच उभरे पुरोहित वर्ग ने वचन परम्परा के साहित्य का दमन किया था.

शरणों की विवेकवादी परम्परा के वाहक
४५० से भी ज्यादा संतों की वाणियों को अथक शोध के माध्यम से १५ खण्डों मेंसमग्र वचन सम्पुटमें संकलित किया गया है. प्रो. कलबुर्गी के सम्पादन से इन खण्डों की शुरुआत हुई. जिसवचन साहित्यके महान अध्येता प्रो. कलबुर्गी थे, उसमें क्या कहा गया है? क्या इन संतों ( शरण और शरणियों) ने वेदों पर व्यंग्य नहीं किया, कर्मकांडों का उपहास नहीं किया? क्या देवी- देवताओं की उपासना का तिरस्कार नहीं किया? उनकी ह्त्या के बाद भी जिस तरह विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधि टी.वी. चैनल पर श्री कलबुर्गी पर देवीदेवताओं के तिरस्कार का आरोप लगा रहे थे और प्रकारांतर से लोगों के विक्षोभ के बहाने उनकी हत्या के औचित्य का संकेत कर रहे थे, क्या वे बसवन्ना, अक्क महादेवी, अल्लम प्रभू, चेन्न बसवन्ना, दोहर काकय्या, चेन्नैया, सिद्धरमा, गणचार और सैकड़ों शरणों और शरणियों से अतीत में जाकर बदला लेंगे? नीचे हम प्रतिष्ठित ग्रंथों से शरणों के वचन साहित्य के कुछ उद्धरण दे रहे हैं. इन्हें पढ़कर कोई बताए कि कर्मकांड, मूर्तिपूजा और पाखंड के खिलाफ इससे अधिक क्या कुछ कहा जा सकता है? क्या श्री कलबुर्गी इससे इतर या इससे बढ़ कर कुछ कहते हैं?
. बसवेश्वर कहते हैं, ” गोबर के गणेश को चम्पा के फूल से पूजें तो भी वो अपनी बदबू नहीं छोड़ता” ( . श्री. मुगलि, कन्नड़ साहित्य का इतिहास, नयी दिल्ली, १८७१, पृष्ठ ९३, भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश भाग -, ले. रामविलास शर्मा पृष्ठ ११९ से उद्धृत, किताबघर, नयी दिली, २००९)
. बसवेश्वर के काफी बाद संभवतः १५ वीं सदी के कवि वेमना का कहना है , “क्या बार बार स्नान करने से मुक्ति प्राप्त हो जाती है? तो उस हालत में सब मछलियाँ मुक्तिप्राप्त हैं. अगर माथे पर राख मलने से मुक्ति मिलती हो तो गधा राख में ही लोटता है. अगर शाकाहार से ही शारीरिक पूर्णता मिलती हो तो बकरी तुमको मात देगी. यदि शूद्र का लड़का शूद्र ही हो तो ब्राह्मणोत्तम के रूप में वशिष्ठ की कैसे पूजा कर सकते हो? क्या वह शूद्र स्त्री उर्वशी के पुत्र नहीं थे?.. अगर अछूत स्त्री के पति को भी अछूत समझा जाए, तो वशिष्ठ के बारे में तुम कैसे गर्व कर सकते हो?क्या उनकी पत्नी अरुंधती अछूत नहीं थी? जब तुम कोई वैदिक कर्मकांड करते हो, या तीर्थस्थान पर जाते हो, तो मुंडन करने के लिए नाई सर पर पानी छिड़कता है. कोई नहीं कह सकता कि पुरोहित के पानी ने चमत्कार किया या नहीं पर नाई के पानी ने काम किया, यह दिखने के लिए मुड़ा सर गवाही दे रहा है .” ( . श्री. मुगलि, कन्नड़ साहित्य का इतिहास, नयी दिल्ली, १८७१, पृष्ठ ५२ , भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश भाग -, ले. रामविलास शर्मा पृष्ठ १२२ से उद्धृत, किताबघर, नयी दिली, २००९) -
. शिवशरणी काळव्वे अपने एक पद में पूछती हैं-
मुर्गी-बकरी छोटी मछली
खाने वालों को कुलश्रेष्ठ कहते हो,
शिवजी को पंचामृत दूध देनेवाली
गाय खानेवालों को हीन जाति कहते हो,
कैसे वे हीन जाति, कैसे ये कुलश्रेष्ठ हैं?”
(‘बारहवीं सदी की कन्नड़ कवयित्रियाँ और स्त्री- विमर्श’- ले. काशीनाथ अम्बलगे, पृष्ठ ७३)
इन्हीं वचनकारों और शरणियों की विवेकवादी परंपरा के वाहक थे श्री कलबुर्गी. आश्चर्य है कि वीरशैव आन्दोलन से काफी पहले से लिखे जा रहे सूत्रों और स्मृतियों में शूद्रों, अन्त्यजों, स्त्रियों के बारे में जो कुछ कहा गया, अंतरजातीय विवाह करनेवालों को भीषण प्रताड़ना के जैसे निर्देश वहां दिए गए हैं, उन्हें लेकर कोई धर्मध्वजावाहक आज भी आहत नहीं होता, जबकि शरण परम्परा के वचनों के व्याख्याता को सहना इन लोगों के लिए आज भी मुश्किल हो रहा है.
लिंगायत मत ने एक हजार साल से भी पहले वैदिक प्राधिकार, जाति-भेद, चार आश्रमों और चार वर्णों की व्यवस्था, बहुदेववाद, पुरोहितवाद, पशु-बलि, आत्म-बलि, सती-प्रथा, कर्मों के बंधन, ईश्वर और आत्मा के द्वैत, मंदिर- पूजा, छूत- अछूत, स्वर्ग और नरक की धारणाओं का खंडन किया. इस आन्दोलन की ऊर्जा और प्रेरणा आज भीवचन साहित्ययाशरण साहित्यमें सुरक्षित है, जिसे श्री कलबुर्गी किसी भी धर्म-ग्रन्थ या पूजा-पद्धति के मुकाबले आज भी सामाजिक प्रगति के लिए प्रासंगिक पाते हैं. गद्य-पद्यमय शरण साहित्य के रचयिताओं ने संगठित धर्मों कोसत्ता-प्रतिष्ठानमाना. उनकी निगाह में ये जड़ संस्थाएं थीं जो मनुष्य को सुरक्षा और सुनिश्चित भविष्य का वायदा करती थी, जबकि शरणों के लिए धर्म गतिमान, स्वतःस्फूर्त और मुक्ति के सौदों से मुक्त था. अल्लम प्रभू के अनुसार, “गरीबों को भोजन दो, सत्य बोलो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, नगर के लिए पानी की टंकियां बनवाओ. तुम मृत्यु के बाद स्वर्ग चले जाओगे, लेकिन हमारे परमात्मा के सत्य के नज़दीक भी नहीं पहुँच पाओगे. जो मनुष्य हमारे इष्ट को जानता है, उसे बदले में कुछ मिलता नहीं. ”
दुर्भाग्य से समय बीतने के साथ जैसा कि बहुत से क्रांतिकारी धार्मिक आन्दोलनों के साथ इतिहास में होता रहा है, वीरशैव मत में अनेक ऐसी चीज़ों का दाखिला होता गया जिनका बसवेश्वर ने निषेध किया था. मंदिर-पूजा बहाल हुई जिसके बारे में बसवेश्वर ने कहा था
धनवान शिवमन्दिर बनवाते हैं,
मैं गरीब मैं क्या कर सकता हूं।
मेरे पैर ही मिनार, शरीर ही मन्दिर,
सिर ही सोने का मुकुट है,
कूडल संगमदेव ! जड़ नाशमय है चेतन अविनाश है।
( ‘बसवेश्वर’- ले. काशीनाथ अम्बलगे, पृष्ठ १६)
कर्मकांड वापस आए, गुरु को शिष्य द्वारा भेंट देने की परम्परा वापस आई, सामाजिक स्तर-भेद पैदा हुए और जंगम वरीयताक्रम के अंतर्गत गुरु-शिष्य सम्बन्ध का नितांत व्यक्तिगत होना संस्थाबद्ध हुआ. जिस लिंगायत आन्दोलन के तहत बसवन्ना ने ब्राह्मण युवती और मोची युवक की शादी कराई क्योंकि दोनों ही लिंगायत थे, वह आन्दोलन रह कर बाद में स्वयं एक जाति बन गया. लिंगायत आन्दोलन और विचार का धर्म के रूप में संस्थाबद्ध होना तो मध्यकाल से ही चली आती परिघटना है, लेकिन वर्तमान समय में भारतीय लोकतंत्र की प्रतियोगी राजनीति ने जिस तरह जातियों को वोट में तब्दील किया उसके चलते विचारों पर आधारित सामाजिक समूहों ने भी वोटों का संख्याबल एकत्रित करने के लिए जाति के रूप में नयी आत्म-परिभाषा रची. लिंगायत आन्दोलन का जातिकरण इसी रास्ते हुआ जो आधुनिक परिघटना ही है. श्री कलबुर्गी ने गैर-बराबरी और शोषण पर आधारित राजसत्ता और धर्मसत्ता के द्वारा वीरशैव मत के आत्मसातीकरण का विरोध करना जारी रखा. उनके अनुसार वीरशैव मत में वैयक्तिक साधना या मुक्ति अथवा वैयक्तिक उन्नति के लिए जगह नहीं थी, बल्कि सामाजिक मुक्ति ही उसका मुख्य ध्येय है. अपनी इस धारणा के चलते वीरशैव मत के जंगम सम्प्रदाय जहां वैयक्तिक मुक्ति पर बल है, उसके पञ्च पीठों से भी उनका विरोध का रिश्ता रहा. ‘कल्याण का पतननाटक में बसवेश्वर का संवाद है, “ सार्वभौम अनुभव और कुछ नहीं, बल्कि अध्यात्मिक अनुभव का सामाजीकरण है. हर व्यक्ति को सार्वभौम अनुभव होना चाहिए लेकिन यह जनता के लिए तब तक संभव नहीं जब तक वह पुरानी व्यवस्था को नष्ट करके नयी व्यवस्था कायम नहीं करती. (‘दि फॉल ऑफ़ कल्याण’, पृष्ठ ३३ ) सामाजिक मुक्ति की धारणा पर बल देने के लिए श्री कलबुर्गी १२ वीं सदी के शरण आन्दोलन को भक्ति आन्दोलन से भी भिन्न बताते हैं. इसी साल जून महीने में (पहले भी उद्धृत) एक भाषण में उन्होंने कहा, “ भक्ति आन्दोलन ने वैयक्तिक मुक्ति और व्यक्ति के दैवीकरण पर जोर दिया. लेकिन शरण आन्दोलन ने सामाजिक बदलाव पर बल दिया. भक्ति आन्दोलन व्यक्ति की बेहतरी तक सीमित रहा जबकि शरण आन्दोलन ने सामाजिक प्रगति के लिए प्रयास किया.” संभव है कि उनका यह कथन हम में से भी कुछ को अटपटा लगे, क्योंकि हम हिन्दी-उर्दू भाषी क्षेत्र के लोग कबीर के सामाजिक विचारों से परिचित हैं. लेकिन बसवेश्वर कबीर से भी दो शताब्दी पहले पैदा हुए थे और सैकड़ों शरणों, शरणियों का समूचा वचन साहित्य सामाजिक क्रान्ति के विचार से ओत-प्रोत है. भक्ति आन्दोलन से उनकी भिन्नता और समानता के बिंदु हम तब तक ठीक से नहीं समझ पाएंगे जब तक हम इस पूरे साहित्य का अवगाहन करें. यह वचन साहित्य अधिकाँश में अछूत, शूद्र आदि कही जानेवाली जातियों के संतों और स्त्री संतों द्वारा रचा गया, जबकि उसके आदि-प्रणेता बसवन्ना स्वयं ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे. श्री कलबुर्गी ने पारंपरिक धर्मसत्ता और पूंजीवादी राजसत्ताओं द्वारा वीरशैव आन्दोलन को उसकी सामाजिक क्रान्ति की चेतना और विवेकवादी परम्परा से काट कर अपने हित में आत्मसात किए जाने के विरुद्ध जो संघर्ष छेड़ रखा था, उसी संघर्ष में लगे उनके एक सहयोगी जाने-माने लेखक और पत्रकार लिंगानासत्यमपेटे की करीब तीन महीने पहले गुलबर्गा में हत्या कर उनके शव को गटर में फेंक दिया गया. पिछले साल १२ जून को संघ परिवार के नेताओं आर.एस.मुतलिक, एस. एल. कुलकर्णी, प्रमोद कट्टी, मुकुंद कुलकर्णी, अनिल पोतदार आदि ने बंगलुरु में श्री कुल्बर्गी के मूर्ति-पूजा के खिलाफ दिए गए बयानों को हिन्दू भावनाओं को आहत करनेवाला बताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी. हाल ही में उन्होंने लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग बताया जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को और भी नाराज़ किया. नाराजगी सिर्फ आस्था और ज्ञान की व्याख्या को लेकर नहीं थी, बल्कि उसका ठोस राजनीतिक परिप्रेक्ष्य यह था कि भाजपा का कर्नाटक में बड़ा आधार ब्राह्मणों के अलावा लिंगायत समुदाय से आता है. भाजपा के मुख्यमंत्री २००४ में येदुरप्पा ही बनाए गए जो लिंगायत समुदाय से आते हैं.
लेकिन श्री कुलबर्गी ने किसी तात्कालिक राजनीतिक कारणों से यह वक्तव्य नहीं दिया था. यह उनका मत पहले से ही था जिसके ठोस ऐतिहासिक और तार्किक सन्दर्भ हैं. वचन साहित्य के संग्रहसमग्र वचन सम्पुटके पहले पांच खण्डों में ही वेदों और यहाँ तक कि वेदान्त के विरोध में शरण और शरणियों के बहुतेरे पद मिल जाएंगे, जिनका स्वर तीखा है. डा. एन. जी. महादेवप्पा ने वैदिक प्राधिकार, बहुदेववाद, वैदिक कर्मकांड, ब्राह्मण पुरोहितों, जाति-प्रथा, संन्यास, तीर्थाटन, मंदिर पूजा आदि का निषेध करने के चलते वीरशैव मत को हिन्दू धर्म से अलग माना है.
(देखें http://lingayatreligion.com/Lingayat/Lingayatism_An_Independent_Religion.htm) महज ब्रहम और जीव की एकता के सिद्धांत के चलते अनेक लोग वीरशैव मत को व्रेदांत के विशिष्टाद्वैत मत के अधीन रखते हैं, लेकिन अद्वैत मत का सिर्फ एक ही स्रोत या परम्परा हो, यह आवश्यक नहीं. महादेवप्पा के अनुसार, ” यह एक आम गलतफहमी है कि लिंगायत मत उस शैव मत की ही एक उप-धारा है, जो शैव मत स्वयं हिन्दू धर्म का ही एक सम्प्रदाय है और यह भी कि लिंगायत शूद्र होते हैं. लेकिन पाठगत साक्ष्य और तर्क पर आधारित सत्य यही है कि लिंगायत मत हिन्दू धर्म का सम्प्रदाय या उप-सम्प्रदाय नहीं, बल्कि एक स्वतन्त्र धर्म है.”
वास्तव में भारत में हिन्दू धर्म के भीतर भी सुधार आन्दोलन बार-बार चले और उसके बाहर भी. मध्य-युग का भक्ति आन्दोलन और आधुनिक युग में आर्यसमाज, ब्रहम-समाज आदि भीतर चले आन्दोलनों के उदाहरण हैं. लेकिन अनेक बार समाज-सुधारक इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे कि रूढ़ियाँ इतनी बलबती हैं कि भीतर सुधार की गुंजायश नहीं है. आचार-रीति आदि ही नहीं बल्कि दर्शन के स्तर पर भी हिन्दू मुख्यधारा से भिन्न आन्दोलन चार्वाक, लोकायत, बौद्ध, जैन आदि हैं. कलबुर्गी और महादेवप्पा आदि विद्वान लिंगायत को भी इसी श्रेणी में रखते हैं. आधुनिक युग में पेरियार और आम्बेडकर के आन्दोलन भी स्वघोषित रूप से इसी श्रेणी के हैं. यह एक बहुत बड़ी परम्परा है जो हिंदुत्व की मुख्यधारा में पड़ते हुए भी भारतीय है. आज प्रो. कलबुर्गी की शहादत के अवसर पर उनकी प्रेरणा को स्थायी बनाने के लिए नए किस्म की भारतीयता को आकार देने का सांस्कृतिक- सामाजिक संघर्ष भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक बराबरी का. आज भी जब हम अंतरजातीय और अंतर-धार्मिक प्रेम और विवाह करनेवाले युवक-युवतियों की ह्त्या होते देखते हैं तो गौतम, वशिष्ठ और मनु के वे सूत्र याद आते हैं ( देखें – ‘धर्मशास्त्र का इतिहास- पी. वी काणे) जिनमें नीचे और ऊंचे कुल के बीच होनेवाले विवाहों के लिए विवाह करनेवाले स्त्री या पुरुष को मृत्युदंड देने के भयावह तरीकों का विधान किया गया है. वहीं बसवेश्वर को याद कीजिए जो ब्राह्मणी युवती और मोची युवक का विवाह कराते हैं और स्वयं उसका परिणाम भुगतते हैं. खुद सोचिए किस रास्ते आप नए भारत को ले जाना चाहेंगे.

मातृभाषा में मौलिक चिंतन का प्रतिमान
प्रो. कलबुर्गी १९८० के दशक के कन्नड़ भाषा आन्दोलन ( गोकाक आन्दोलन) के अग्रणी लोगों में थे. कन्नड़ अभिनेता डा. राजकुमार उसके सर्वमान्य नेता थे और शायद ही कोई महत्वपूर्ण कन्नड़ लेखक उस समय ऐसा रहा हो जो आन्दोलन में शामिल रहा हो. श्री कल्बुर्गी आन्दोलन के प्रथम सत्याग्रहियों में थे. उन्होंने १०३ पुस्तकें लिखीं और यह साबित किया कि आज के समय में भी मातृभाषाओं में चिंतन और शोध के उच्चतम शिखर छुए जा सकते हैं. ख़ास कर उनकी रचनाएं अंग्रेज़ी में नहीं मिलतीं, अनूदित रूप में भी बहुत कम मिलती हैं. उन्होंने अपने कई यशस्वी समकालीन कन्नड़ लेखकों जैसे .के. रामानुजन की तरह मातृभाषा और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एकसाथ नहीं लिखा. प्रायः रचनात्मक साहित्य तो मातृभाषाओं में रचा जाता है लेकिन वैदुषिक साहित्य को अंग्रेज़ी जैसी विश्व-भाषा में रचने का भारत में चलन है, ख़ास कर शिखर विद्वानों के बीच. श्री कलबुर्गी ने इसे स्वीकार नहीं किया. वे मातृभाषाओं में शिक्षा देने के प्रबल हिमायती थे और हाल ही में उन्होंने कर्नाटक सरकार से मांग की थी कि वह केंद्र सरकार से अपनी भाषा नीति स्पष्ट करने को कहे.
मित्रों, प्रो.कुलबर्गी, कामरेड गोवेंद पानसारे और डा. दाभोलकर की हत्याएं तथा पाकिस्तान और बांग्लादेश में परिपाटी से हट कर मुक्त विचार रखनेवालों की हत्याएं यह बताती हैं कि सही और सच्चे विचारों से क़ानून, राजनीति और विचारधारा के स्तर पर निपट पाना धर्मसत्ता, राजसत्ता, पितृसत्ता, पूंजी की सत्ता और वर्ण-व्यवस्था की सत्ता के व्यापक गठजोड़ के बावजूद इन ताकतों के लिए मुश्किल पड़ रहा है. इसीलिए व्यक्तिगत हत्याओं का सहारा लिया जा रहा है. नए भारत की खोज के लिए शहीद हुए इन अग्रजों के उसूलों और विचारों को आम जनता के बीच रचनात्मक प्रयासों से लोकप्रिय बनाना ही वह कार्यभार है जो उस लोकजागरण के लिए ज़रूरी है जिस के लिए वे जीवन भर संघर्षरत रहे और जो भारत के भविष्य की एकमात्र आशा है.