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30 नवंबर 2013

कम्युनिस्ट कम्युनिस्ट होता है, परिवार परिवार!

 
समीक्षक
(मिथिलेश प्रियदर्शी ने फेसबुक के लिए यह एक्सक्लूसिव रिव्यू लिखा। हमने वहां से उड़ा लिया।)
 
ऐसा है कि बेजोड़ 'कौन्फ़िडेंस' में तो हम सब रहते हैं. सबको लगता है कि हमारे सीन में आने से गर्मी बढ़ जाएगी, अब ये उतना ही भाजपा को लगता है, उतना ही कांग्रेस को, उतना ही 'आप' को और उतना ही 'बुलेट राजा' को भी. और गर्मी और तापमान है कि बढ़ता जा रहा है. अब ये तापमान बढने-बढ़ाने की ज़िम्मेदारी न अमेरिका स्वीकार रहा है न उसके जिगरी दोस्त. तो शुक्र है कि ऐसे ही भयानक जलवायविक परिवर्तनों के दौर में 'बुलेट राजा' आए हैं, जिन्होंने खुलेआम इसका ठिकरा कुबूल किया है कि हम आएंगे तो गर्मी बढ़ जाएगी. अब शायद आगे आने वाले जलवायु संबन्धित अंतराष्ट्रीय सेमिनारों में यह बहस थम जायेगी.
 
तो 'बुलेट राजा' की कहानी है, एक ब्राह्मण घर में पैदा हुए एक लंठ लड़के की, जिसे इस कुल में पैदा होने के सारे मतलब अच्छे से मालूम हैं, जो खुद को ब्राह्मण कुल का होने की वजह से पैदाइशी समझदार मानता है, जो अब तक 155 लड़कियों के भीतर जानवर जगा चुका है, (और महिलाओं की इज्जत करता है), जो चलाता तो तमंचा झन्नाटेदार है, पर आर्ट की महता को भी समझता है और अंत में एक जरूरी बात ये कि वह कहानी के शुरू में बेरोजगार है, पर तमंचा संभालने के बाद नहीं.
 
तो जाहिर है, ऐसे दिमाग के आदमी को अगर राजनीतिक 'सपोर्ट' मिल जाये और कहानी में उसी के तेवर के आसपास का अगर उसका एक जिगरी दोस्त हो तो वो आग तो मूतेगा ही, और फिर गर्मी भी बढ़ेगी. पहले गलती से अपराध, फिर मजबूरी में, फिर राजनीतिक जरूरतों के लिए और अंत में व्यक्तिगत बदले के लिए. अपराध जगत पर बनी फिल्मों में इस किस्म की कहानियों की एक लंबी फेहरिस्त है. 'हीरोइन जो हीरो को देखते ही उस पर मर मिटती है और जिसका काम कहानी में केवल इठलाना और गाना गाने के लिए प्रस्तुत होना होता है' उसका या उसके परिवार का इस कहानी में अपहरण तो नहीं होता, पर हीरो का जिगरी दोस्त बीच में जरूर हीरोइन को बचाते हुये मर जाता है, फिर इसके बाद श्मशान में अर्जुन टाइप शपथ खाना भी बनता है और 21वीं सदी है तो हालत के मद्देनजर शपथ को थोड़ा 'एडजस्ट' करना भी. बाद में राजनीतिक समीकरणों का बनना-बिगड़ना स्वाभाविक तरीके से चलता है और अंत में 'गौडफादर' का हाथ खींच लेने के बाद उसके साज़िशों का अंत कर हाथ और कपड़े झाड़ते हुए सकुशल निकल जाना भी. अब जब सब निपट गया तो बाहर मुस्कुराती, बाँहें फैलाये हीरोइन खड़ी ही है, तब तक, जब तक पर्दे पर टेक्स्ट लिखाने-पढ़ाने न शुरू हो जाएँ.
 
अब अगर कोई लापरवाह सिनेमा प्रेमी, जो तिग्मांशु धूलिया के फिल्म व्याकरण को अच्छे से जानता हो, पर इस फिल्म के बारे में जानने से रह गया हो (मान लीजिये न, कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गया था), 'बुलेट राजा' देखता है और पूछता है, किसकी फिल्म थी, आप उसे 'सहर' वाले कबीर कौशिक का नाम बता देते हैं या 'अपहरण' वाले प्रकाश झा का या विशाल भारद्वाज या अपने गली के किसी लौंडे का ही, तो तय जानिए वो लंबी गर्दन वाले किसी मुर्गे की माफिक हौले से सिर हिला के 'अच्छा' कह कर हामी दे देगा और सवाल नहीं करेगा. ( हाँ, पर ध्यान रहे अनुराग कश्यप का नाम मत ले लीजिएगा, उनके यहाँ 'डिटेलिंग' बहुत होती है. वहाँ बाप के मरने की खबर सुनकर बेटा बदहवास भागता तो है, पर चट्टी पहिनने वापस आता है).
 
2012 में अनुराग कश्यप की देखरेख में समीर शर्मा की एक फिल्म आयी थी 'लव शव ते चिकन खुराना', उसमें प्रसिद्ध चिकन खुराना की रेसिपी जानने के लिए प्रतिद्वंदी ढाबे का मालिक लाला जब कई तिकड़मों के बाद इसके एवज में एक करोड़ रुपए तक की पेशकश भी खुशी से करता है तो नायक लाला को रेसिपी की जगह एक मुफ्त का नुस्खा देते हुए कहता है, '' जिस बंदे का चिकन खाके पूरी दुनिया उँगलियाँ चाट जाती थीं, उसे चस्का था आप की दाल मखनी का. लेकिन पैसा आते ही आपकी सब्जी में से स्वाद गायब हो गया, प्यार गायब हो गया.''
बस यही बात कहनी थी, अपनी जो विशेषता है, जिसमें महारत है, जिस बात के लिए दुनिया आपके हाथों का बोसा लेती है, उस पर यकीन बनाए रखिए बस, बाकी रविश जी वाला, बात जो है सो तो हइए है.
(अब जाते-जाते एक मजेदार प्रसंग, लड़का यूपी का ब्राह्मण है, लड़की बंगालन. शादी के लिए बाप राजी नहीं है, लड़की उम्मीद से भरकर अपने चाचा को कहती है,''आप तो कम्यूनिस्ट हैं, आप कुछ बोलिए.'' चाचा का त्वरित जवाब,'' कम्यूनिस्ट कम्यूनिस्ट होता है, परिवार परिवार.'' )

27 अक्टूबर 2012

चक्रव्यूह: एक चालाक फ़िल्म

-दिलीप खान
प्रकाश झा एक चालाक फ़िल्मकार है और चालाक आदमी भी। चक्रव्यूह पर बात करने से पहले दी इंडियन एक्सप्रेस की साप्ताहिक पत्रिका आई (सप्लिमेंट) और द हिंदू को दिए गए दो अलग-अलग साक्षात्कारों की दो बातें मुझे याद आ रही है। आई में प्रकाश झा ने कहा कि जिस दौर में वो अपहरण बना रहे थे उस दौर में वो बिहार का सच था, नीतीश जी के आने के बाद बिहार की तस्वीर बदल गई है। (पूरा साक्षात्कार पढ़ेंगे तो आप समझ जाएंगे कि नीतीश जी का ज़िक्र प्रकाश झा ने बेहद चालाकी से किया है और मॉल वगैरह खोलने देने का बदला चुकता कर रहे हैं।) द हिंदू में प्रकाश झा ने कहा कि ओम पुरी का किरदार कोबाड गांधी से प्रेरित है। यानी उन्होंने इशारा दिया कि न सिर्फ़ प्लॉट बल्कि फ़िल्म के पात्र भी देश के वास्तविक लोगों को ध्यान में रखकर बुने गए हैं। फ़िल्मांकन में यह दिखता भी है...गमछे से चेहरा ढंककर जब राजन (मनोज वाजपेयी) आज तक को साक्षात्कार देते हैं तो साफ़ लगता है कि वो माओवादी नेता किशन जी की भूमिका में हैं। इसके अलावा महंता का नाम देखते ही आपको वेदांता याद आ जाएगी और नंदीघाट का नाम देखकर नंदीग्राम। दूसरे हाफ में जब कबीर (अभय देओल) के भीतर माओवादी बीज पनपता है तो उसका भी नाम बदलकर कॉमरेड आज़ाद कर दिया जाता है। तो आप कहिए कि प्रकाश झा ने पात्र, घटना और स्थान के मामले में थोड़ी-बहुत भी ख़बर से ताल्लुक रखने वालों को ये मौका दिया है कि वो फ़िल्म देखते ही उन नामों को देश की हालिया घटनाओं से जोड़ ले। लेकिन वास्तविकता की डोर थामेंगे तो आप गच्चा खा जाएंगे। मसलन नंदीघाट जगह देखकर अगर आप ये समझे कि फ़िल्म में बंगाल का प्लॉट है तो अगले ही पल महंता विश्वविद्यालय की बात कहकर फ़िल्म आपको उड़ीसा ले जाएगी। फिर जंगलों में फ़िल्म रह जाती है और यदि बोली की थोड़ी सी भी पकड़ आपको है तो पता चल जाएगा कि छत्तीसगढ़ी ज़मीन पर फ़िल्म आगे बढ़ती है। जाहिर है प्रकाश झा ने स्थान को बहुत तवज्जो नहीं दी है, अलबत्ता ये ज़रूर है कि काल के मामले में यह फ़िल्म खुद को बीते पांच साल की घटनाओं तक ही सीमित करती है। तो, एक तरह से घटनाओं का कोलाज है फ़िल्म में।  
दो दोस्तों की कहानी में पार्श्व में माओवाद
ये ज़रूर है कि फ़िल्म देखकर निकलने के बाद नक्सलियों (या फिर माओवादियों- टीवी और प्रिंट मीडिया की तरह फ़िल्म ने भी इनको समानार्थी के तौर पर इस्तेमाल किया है।) को शुद्ध आतंकवादी मानने वाले लोग एक बार सोचेंगे कि ये बंदे सिर्फ़ हथियारबंद गिरोह भर नहीं है, बल्कि इनका कुछ राजनीतिक मकसद भी है। (हालांकि इतना तो लोग जानते ही हैं।) सोचने को ये भी सोच सकते हैं कि या तो ब्रेन वॉश से या फिर राज्य से एकाध घटनाओं में पीड़ित होने के बाद लोग माओवादी बन जाते हैं जैसे कि जूही (अंजलि पाटिल) बनी। लाल सलाम को ऑल इज़ वेल की तरह जुमला भी बना सकते हैं।
बहरहाल, अभय देओल को आज़ाद ख़याल पात्र के तौर पर शुरू से फ़िल्म में दिखाया गया है। पुलिस में रहता है, लेकिन कायदा नहीं मानता। सही लग रहा है तो ठीक है वरना बग़ावत कर देगा। भविष्य की बिना कोई ठोस योजना रखने वाला इनसान है कबीर। इमोशनल क़िस्म का। इसी इमोशन की वजह से माओवादियों के बीच पुलिस की मुखबिरी करने पहुंचा कबीर, थोड़े-बहुत कनफ़्यूजन के साथ माओवादी बन जाता है। बहुत बाद तक वो तय नहीं कर पाता कि असल में है वो किस ओर! मामले को इस रूप में दिखाया गया है कि देश के ज़्यादातर लोग चूंकि माओवादियों से बावस्ता नहीं है तो टच में जाने के बाद ही वो उनसे प्रभावित हो सकते हैं। यानी राजनीति को ऐसी सब्जेक्टिविटी का मामला बनाया गया है कि जहां समय गुजारो वहीं का होकर रह जाओ! कबीर की पूरी बनावट ही फ़िल्म में इसी तरह की है। रोमेंटिसिज़्म वाली।
फ़िल्म में जबरन महंगाई वाले गाने को डाला गया लगता है
अभय देओल ने अभिनय अच्छा किया है लेकिन अंजलि पाटिल ने कमाल का काम किया है। मनोज बाजपेयी भी जमे हैं और ओम पुरी भी। अर्जुन रामपाल (एसपी आदिल ख़ान) अभिनय नहीं सीख पाएंगे इस स्थापना को उन्होंने चक्रव्यूह में पुख़्ता किया है। रिया मेनन (ऐशा गुप्ता) नामक पात्र की ज़रूरत नहीं थी, ग्लैमर के लिए प्रकाश झा ने उसे रच लिया, ठीक उसी तरह जैसे कुंडा खोल आइटम सॉन्ग रचा। स्क्रिप्ट में कई जगह ऐसी व्यावसायिक मजबूरी झलकती है गोया बाद में बीच-बीच में कुछ जोड़ा-घटाया गया हो। गानों के मामले में ख़ास तौर से ये बात कही जा सकती है। अभय देओल पर महंगाई वाला गाना फ़िल्माना था तो उससे ठीक पहले वाले दृश्य में तिरपाल के नीचे रात में उसे राग भैरवी गाते दिखा दिया। कैलाश खेर की जगह किसी नई आवाज़ को जगह देते तो गाने में रंग आता। कैलाश खेर की आवाज़ में कहीं से उस मिट्टी की खुशबू नहीं आ रही है जहां पर इसे फ़िल्माया गया है। टाटा-बिड़ला, अंबानी-बाटा वाला यह गाना प्रचार के लिए बेहद ज़रूरी था, सो एक तरह से इसे फिट कर दिया गया। शहरी कबीर अचानक माओवादियों के बीच पहुंचने के अगले ही दिन लोकगीत की शैली में गाने लगता है। फ़िल्म यह बताती है कि कबीर के रखने से कम से कम गाने-बजाने वाला कोई मिल जाएगा। यानी कबीर मुख्य गायक की ज़िम्मेदारी निभाता है। उसके गले से ऑटोमैटिक फूटता लोकगीत गले नहीं उतरता।  
एक लाइन में कहें तो फ़िल्म सैंडविच थ्येरी का विस्तार है। माओवादियों और राज्य के बीच पिसती जनता पर मध्यांतर से पहले सबसे ज़्यादा ज़ोर है। लेकिन, कुछ तथ्यों को फ़िल्म में इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि लोग गफ़लत में पड़ सकते हैं। मिसाल के लिए नाम की साम्यता बैठाने के लिए अभय देओल को कॉमरेड आज़ाद बना दिया गया है। यानी कबीर ने पुलिस की मुखबिरी से कॉमरेड आज़ाद तक का सफ़र तय किया। वास्तविक दुनिया में जिन लोगों ने आज़ाद का नाम सुन रखा है उनके मन में यह धारणा पुख़्ता होगी। शुरुआती दृश्य में ओम पुरी के वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर जिस व्यक्ति को दिखाया जाता है बाद में उसी से कॉमरेड राजन (मनोज वाजपेयी) को सलाह लेते दिखाया जाता है। यानी मानवाधिकार कार्यकर्ता और माओवाद जैसे मामले का केस लड़ने वाले लोग असल में फेस सेविंग प्रोफ़ेशन के तौर पर ऐसा काम करते हैं लेकिन होते हैं पार्टी कैडर ही!
कमज़ोरी और चालाकी के कई और उदाहरण हैं। मसलन, एसपी स्तर का पुलिस अधिकारी ईमानदार और सच्चाई व वर्दी की मांग को पूरा करने वाले होते हैं।(छत्तीसगढ़ के कल्लूरी और राष्ट्रपति पदक विजेता अंकित गर्ग को याद कीजिए)। माओवादी नेता के बदले व्यवसायी बच्चे की अदला-बदली महज पुल के इस पार-उस पार वाला मामला है! फ़िल्म में माओवाद पर कुछ बेसिक रिसर्च छूटता दिखता है। फ़िल्म बताती है कि स्थानीय पुलिस बंद दरवाज़ों के भीतर रहने वाली जीव है और माओवादियों के नाम पर मुठभेड़ में कभी-कभार निर्दोष लोग सिर्फ़ मारे जाते हैं वरना फ़र्जी गिरफ़्तारियां तो होती ही नहीं। सल्वा जुडूम कॉरपोरेट समर्थित संगठन है और राज्य का इससे कोई वास्ता नहीं है! फ़िल्म तो आपको यही बताती है कि सल्वा जुडूम को महंता ने पैदा किया और मुख्यमंत्री महोदय की इसमें कोई भूमिका नहीं है। (..लगे हाथों सल्वा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला याद कीजिए)। फ़िल्म के आख़िर में ओम पुरी (प्रकाश झा के मुताबिक़ कोबाड गांधी से प्रभावित पात्र) माओवादियों का सबसे बड़ा (मेंटर) नेता बन जाता है। आजतक और दैनिक भास्कर फ़िल्म में बार-बार आते हैं और शायद इसलिए फ़िल्म में कहीं भी उन इलाकों में मीडिया के कॉरपोरेट हितों को नहीं दिखाया गया है। मीडिया पार्टनर बनकर भास्कर ने अच्छा किया...पूरा मामला महंता तक ही सीमित रह गया और फ़िल्म में डीबी कॉर्प जैसे पावर प्लांट लगाने वाली कंपनियों का नामोनिशान तक नहीं दिखा। अंत तो बेहद नाटकीय है। रिया मेनन कबीर को गोली मारती है...आदिल ख़ान रोता है, फ़िल्म ख़त्म हो जाती है। फिर दो लाइन का वॉयस ओवर उभरता है कि देश में कितने लोग ग़रीब है और कितने लोग अमीर!
....लेकिन इन सबके बावजूद अगर पांच-दस ऐसी फ़िल्में बनती हैं, तो माओवाद को लेकर मध्यवर्ग की जमी-जमाई धारणा डिगेगी। सिनेमा हॉल में फ़िल्म ख़त्म होते ही कुछ लोग अपने विश्वास की डोर को मांझा देने के लिए आपस में गुफ़्तगू करने लगे, यू नो, कुछ भी हो बट कम्युनिज़्म इज़ ए फ़्लॉप शो। तो ये ज़रूर है कि दिल्ली वालों को छत्तीसगढ़ की एक (अधूरी, तोड़ी-मरोड़ी ही सही) झलक मिली, सिर्फ़ इस लिहाज़ से फ़िल्म को देखने की सलाह दूंगा। प्रकाश झा की यही चालाकी है। आप आलोचनात्मक भले ही हो जाइए लेकिन देखने की सलाह भी लगे हाथों ठोक जाइए। 

14 जून 2011

‘बहती हवा’ में ‘ताजा गिरे पत्तों’ से बदलते गीत


अहा! ज़िंदगी के फिल्म विशेषांक में प्रकाशित लेख

-दिलीप ख़ान


हिंदी फ़िल्मी गीतों के मौजूदा स्वरूप पर बात करते समय कई बातें दिमाग में कौंधती है। पहले के मुकाबले इसकी गति तेज हुई है, ज्यादातर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जगह कंप्यूटर ने ले ली है, गायक होने के लिए एक ख़ास तरह की आवाज़ होने की शर्त टूटी है, ज्यादातर गाने एक महीने में ही पुराना नज़र आने लगता है, कुछ निर्देशक आज-कल गीत-संगीत में भी हाथ आजमाने लगे हैं और मुन्नी बदनाम.. जैसे गीत लिखे तथा अंग्रेज़ी शब्दों को गीत के बीच में जबरन ठूंसे जाने के बावजूद समग्र रूप से गानों के बोल में सुधार आया है। अंतिम स्थापना से कई लोगों की असहमति हो सकती है, लेकिन जांच-पड़ताल के बाद लोग इससे इत्तेफाक भी रखना शुरू कर सकते हैं।

नए गानों की दुनिया कुछ अलग-सी है। अंग्रेजी मिश्रित भाषा के बीच में उभरते देशज बिंब और गीतों की नई तमीज ने तेज तर्रार धुनों में भी भाषाई तौर पर गानों को मजबूत किया है। मस्ती में सराबोर करने वाले कुछ ऐसे गीत रचे गए हैं कि श्रोताओं को वह अपनी आगोश में लेकर दूर तलक बहा ले जाते हैं। प्रसून जोशी के गीत अपनी तो पाठशाला.. इसकी एक मजबूत बानगी है। युवाओं के बीच कॉलेज की खालिस मस्ती बयां करने वाला इससे बेहतर गीत शायद ही कोई और हो! इस गाने में रोजमर्रा की आवारगर्दी को युवाओं के बीच की भाषा से सामने लाने की सफल चेष्टा की गई है। यह एक बड़ी वजह है कि आमिर खान अभिनीत 3 इडियट्स में जब स्वानंद किरकिरे ऑल इज वेललिखते हैं तो अपने को पाठशालाकी शैली से मुक्त नहीं कर पाते। पाठशाला युवा जीवन और पॉपुलर कल्चर के लिए एक मॉडल के तौर पर प्रस्तुत हुआ है। विस्तृत दायरों में चीजों को ले जाने की गुलजार की शैली के आगे जब बाकी गीतकार पीछे छूटते जा रहे थे तो उस समय प्रसून जोशी इस अंतराल को पाटते हुए नजर आए। प्रसून अपने कई गीतों में खालिस ताजापन समेटे आए। चांद सिफारिश.. की अभिव्यक्ति में एक नए किस्म की ताजगी थी। प्रसून जोशी ने हम-तुम, फ़ना, रंग दे बसंती, तारे ज़मीन पर, दिल्ली 6, ब्लैक, और गज़नी जैसी दर्जनों फिल्मों में लिखे अपने गीतों के मार्फत बॉलीवुड में गीत की नई ज़मीन तैयार की है।

पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड का कई ऐसे गीतकारों से साक्षात्कार हुआ है जिनके भीतर से देश, दुनिया, समाज और संस्कृति को अभिव्यक्त करने की मौलिक शैली बाहर निकली है। सईद क़ादरी ने शुरुआत में ही आवारापन, बनजारापन में मौजूद भीतरी ख़ालीपन की जद में लोगों को चुपचाप समेट लिया। सईद के गीतों में छटपटाहट, बेचैनी, ख़ालीपन, उमंग, जुदाई और विश्वास का गज़ब तालमेल देखने को मिलता है। इमरान हाशमी और महेश भट्ट की फिल्मों की सफ़लता के पीछे सईद क़ादरी का बड़ा योगदान है। क़ादरी ने ज़न्नत, वो लम्हे, गैंगस्टर, कलियुग, फरेब, जहर, रोग, मर्डर, पाप, जिस्म जैसी फ़िल्मों में ऐसे गाने लिखे, जिनके न सिर्फ शब्द अच्छे थे, बल्कि इन गानों ने लोकप्रियता और सफ़लता के नए प्रतिमान स्थापित किए। इनको आवाज़ देने वाले कुछ ऐसे गायक सामने आए, जहां से गायिकी के क्षेत्र में स्पष्ट मोड़ महसूसा जा सकता है। कुणाल गांजावाला, आतिफ़ असलाम जैसे गायकों ने अपनी पारी यहीं से शुरू की। इन गानों के फिल्मांकन को लेकर कई लोगों ने यह सवाल भी उठाए कि क़ादरी के लिखे कुछ बेहतरीन गानों की वीडियो में उन सारे भावों और गंभीरता को सस्ती और बाज़ारू दृश्यों में तब्दील कर दिया गया।

क़ादरी से मिलती-जुलती शैली में आजकल लोकप्रिय फ़िल्मों में बेहतरीन गाना रचने वाले इरशाद क़ामिल ने फ़िल्मी गानों को प्रचलित स्वरूप से दूर किया है। आज दिन छडयाके लिए उन्हें खूब सराहा गया और कई पुरस्कार भी मिले। हालांकि क़ामिल के गीतों को पुरस्कार के जरिए मापने का पैमाना बहुत उपयुक्त नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इरशाद ने नीरज श्रीधर, केके से लेकर उदित नारायण तक से गवाने वाले हर मूड के गाने लिखे और सपाट, सस्ती अभिव्यक्ति से अपने को बचाए रखा। गुलजार और जावेद अख़्तर के गानों में जो प्रकृति सौंदर्य और देसी खुशबू देखने को मिलती है,वह अब कई गीतकारों के गीतों में छलक रही है। गुलजार में कल्पनाशीलता और गाने के मूड के अनुसार शब्दों की चयन क्षमता गज़ब की है। कुछ मिसाल लीजिए, पत्ती-पत्ती झड़ जावे पर खुशबू चुप न होवे.. या फिर ताजा गिरे पत्तों की तरह सब्ज-ए-लॉन में लेटे हुए। गुलज़ार और जावेद में एक समानता यह है कि ये दोनों सिर्फ गीत नहीं लिखते हैं। निर्देशन से लेकर संवाद लेखन तक के क्षेत्र में दोनों सक्रिय रहे हैं। फ़िलवक्त हिंदी फ़िल्मी दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो संवाद लिखते-लिखते गीत लिखने लगे या फिर गीत लिखने के साथ-साथ कई अन्य फ़िल्मी विधा में सक्रिय हैं। माई नेम इज ख़ान के स्क्रीनराइटर निरंजन आयंगर को जावेद अख़्तर की झोली से गीत लिखने की जिम्मेदारी आई तो उन्होंने तेरे नैना जैसे गीत लिखकर लोगों को चौंका दिया। बॉलीवुड के कई लोग अब उन्हें गीत लिखने की सलाह दे रहे हैं। स्वानंद किरकिरे गायन, स्क्रीन लेखन और गीत लेखन जैसे कई विधा में सक्रिय हैं। पिया बोले.. बहती हवा सा था वो और बंदे में था दम.. जैसे गीतों पर सम्मानित हो चुके किरकिरे ने शांतनु मोइत्रा के साथ अच्छी जुगलबंदी की है। स्वानंद को सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार के बतौर आलोचक देख रहे हैं।

रीमिक्स का बुखार थमने के बाद जो मौलिक रचनाएं निकलकर आ रही हैं, निश्चित तौर पर उनमें अच्छी और बुरी दोनों तरह के गीत हैं। इसमें भड़काऊ, उबाऊ और सस्ती शैली के गीत भी हैं, तो गंभीर, सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत करने वाले गीत भी। इसी समय नीलेश मिश्रा जैसा गीतकार भी बॉलीवुड पहुंचता है, जो कभी कड़ी मेहनत करने वाले रिपोर्टर के बतौर जाने जाते थे। ऐसे गीतकारों के पास सामाजिक स्थितियों की पूरी तस्वीर सामने होती है। जाहिर है, इनके गीतों में ताजगी और गहराई का स्तर उन गीतकारों से अधिक होगा जो बंद कमरों में बैठकर गीतों का उत्पादन करते रहे हैं। जादू है नशा है, क्या मुझे प्यार है, लम्हा-लम्हा, मैंने दिल से कहा, चलो तुमको लेकर, बेपनाह प्यार है, जैसे गीत लिखने वाले नीलेश मिश्रा प्रिंट पत्रकारिता और रेडियो के बरास्ते गीतों तक पहुंचे हैं, लेकिन एक झलक में कोई भी यही कहेगा कि उनका मूल स्वभाव गीत लिखने का ही है। पीयूष मिश्रा और अशोक मिश्रा भी कुछ अर्थों में नीलेश से मिलते-जुलते गीतकार हैं। पीयूष की बहुमुखी प्रतिभा को सिनेमा के मुरीद अच्छी तरह पहचानते हैं। वह अदाकार हैं, गायक हैं, संगीतकार हैं, स्क्रीन प्ले लिखते हैं और गीतकार भी है। गुलाल में लिखे गए उनके गीत ओ री दुनिया का रेंज देखिए और फिर आजा नचले, टशन और दिल पे मत ले यार के गीतों को सुनिए। पीयूष हर स्थिति को अपने शब्दों में बांधने की क्षमता रखते हैं। कुमार, ए.एम. तुराज, अमिताभ भट्टाचार्य और फ़ैज अनवर जैसे गीतकारों से भी काफी उम्मीदें हैं। 1990 के दशक के साथ तुलना करते हुए यह जरूर लगता है कि बीते दशक के गानों की उम्र बहुत सीमित थी, लेकिन 90 के समूचे दशक में समीर और नदीम श्रवण की जुगलबंदी वाला जो पक्ष उभरा उसने संगीत को एक बड़े कारखाने में तब्दील कर दिया। 9 मिनट और एक गाना तैयार। जावेद अख्तर ने भी अपना पहला गाना तुमको देखा तो ये ख़याल आया 10 मिनट से कम समय में लिखा था। इस गाने को आज भी प्रशंसा मिलती है। इसलिए सवाल कम समय का नहीं है। असल सवाल यह है कि कम समय में गानों में रूपक बिंब और प्रस्तुति को जिस तरह एकदम सपाट कर दिया गया वह गानों की तमीज को लील गया। आनन-फ़ानन में लिखे गए ऐसे गीतों में कई ऐसे हिट गाने भी हुए, जिन्हें अब भी सुना जाता है। लेकिन, हिट होना और गाने का बोल अच्छा होना दो अलग-अलग चीज़ें हैं। मुन्नी बदनाम.. जैसे गाने भी हिट होते हैं और उन्हें पुरस्कार मिलता है। इस बार के फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार में बॉलीवुड के कई गीतकारों, गायकों और संगीतकारों ने चयन प्रक्रिया पर सार्वजनिक नाखुशी का प्रदर्शन किया। स्वानंद किरकिरे ने कहा था कि उनके हिसाब से दिल तो बच्चा है जी.. बीते साल का सबसे मधुर, कर्णप्रिय और पुरस्कार के मानकों के हिसाब से भी सबसे उपयुक्त गीत था। इन राजनीतिक उठापटक के बीच अगर ए. एम. तुराज जैसे नए गीतकार गुजारिश के लिए उड़ी.. जैसे गाने लिख रहा है, तो इसमें बेहतरी की साफ गुंजाइश दिखती है।

गीत संगीत में बदलाव बहुत साफ हैं। फ़िल्म जगत से उदित नारायण, कुमार सानू और सोनू निगम की गायक तिकड़ी तथा अल्का याज्ञनिक अनुराधा पौंडवाल और कविता कृष्णामूर्ति जैसी गायिका की लोकप्रिय तिकड़ी अब परिदृश्य से गायब नज़र आने लगी है। रेखा भारद्वाज, ऋचा शर्मा जैसी गायिकाएं अपनी अलग आवाज़ की वजह से ही एक खास जगह बनाई है। संगीत के इस ढर्रे की कई मंचों से विशेषज्ञों ने आलोचना भी की। कुछ लोगों का मानना है कि इसमें मधुरता को खत्म किया जा रहा है। कुछ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि गायन से गंभीरता को खत्म किया जा रहा है और बदलाव के नाम पर हिमेश रेशमिया जैसे गायकों का बाजार चल निकला है। लेकिन, इन आलोचनाओं में गीतों के बोल वाले पहलू पर सबसे कम जोर दिया गया। गानों के बोल के मार्फत से यदि गीतों को देखा जाए तो गीतों के स्तर में गिरावट की शिकायत नहीं रह जाएगी। 1990 के दशक में भी चलताऊ गाने लिखे जाते थे और आज भी लिखे जा रहे हैं, लेकिन औसत तौर पर आज के गानों की अभिव्यक्ति 90 के दशक से अधिक कविताई संस्कार से लैश है।

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