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18 फ़रवरी 2016

तीन रंग वाली आज़ादी

-हिमांशु पंड्या
मैं सबसे संवेदनशील मुद्दे नारे-पोस्टर-सभा पर ही बात करूंगा. उसके बहाने कई बातें आयेंगी.

पहली बात, मैं अब यह दावे से कह सकता हूँ कि 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा वहां लगाया ही नहीं गया था.यह जी टीवी था जिसने 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' को बड़ी कुशलता से वॉइस ओवर के जरिये 'पाकिस्तान जिंदाबाद' में बदला और फिर जब उसमें एबीवीपी के लोग ही फंसने लगे तो मूल वीडियो प्रस्तुत कर दिया लेकिन तब तक वह 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का हौव्वा खडा कर चुका था जो लोगों की स्मृति में बस गया. वैसे यह सबसे कम आपत्तिजनक नारा है मेरी निगाह में, पर आपकी में है तो ये आपकी जानकारी के लिए है.

जो जीटीवी एक बार धोखा कर सकता है, उसके बाकी वीडियोज को भी शक की निगाह से देखिये. वॉइस ओवर से कुछ का कुछ बनाया जा सकता है. दूसरा वीडियो जो काफी अँधेरे में था, जिसमें 'भारत की बर्बादी' वाला नारा दिया गया, मैं उसके सन्दर्भ में खास तौर पर ये बात कह रहा हूँ. बहरहाल, यह नारा सर्वाधिक आपत्तिजनक है. इसका बचाव कोई भी नहीं कर सकता, सबको इसकी निंदा करनी चाहिए. सबने की भी, सभी दलों ने की, लिखित में भी पर्चे जारी कर की, फ़ौरन की. पर उसे किस किसने दिखाया ? 

जेएनयू में छात्र-छात्राओं की एकजुटता
'इंशा अल्लाह' का नारा कोई वामपंथी लगा ही नहीं सकता. डीएसयू ( -वह संगठन, जिससे कभी जुड़े रहे विद्यार्थियों ने यह कार्यक्रम रखा था) में तो सबसे 'कड़े' वामपंथी होते हैं, चौबीस कैरेट वाले ! ( मजाक कर रहा हूँ, हालांकि उस संगठन में भी मेरे अच्छे दोस्त रहे हैं. लडाइयां बहसें भी हुईं पर जब मेरे राज्य राजस्थान में 'सूचना के अधिकार' के तहत स्टैच्यू सर्किल, जयपुर पर चल रहे धरने में भागीदारी के लिए जेएनयू के साथियों से मैंने कहा तो जो छ दोस्त मेरे साथ जयपुर चले, उसमें तीन डीएसयू वाले ही थे.और वह कोई वामपंथी आन्दोलन नहीं था.) उसी तरह ( कन्हैया कुमार के संगठन ) एआईएसऍफ़ वाले राष्ट्रवाद को प्रश्नचिह्नित करने वाला कोई नारा नहीं लगा सकते. सबके नारे और उनकी राजनीति स्पष्ट है. 'न हिन्दू राष्ट्र न नक्सलवाद/ एक रहेगा हिन्दुस्तान' यह एसएफआई का नारा है, इसे आइसा कभी नहीं लगाएगी. दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि संयुक्त मोर्चे/जुलूस में यह नारा एसएफआई भी नहीं लगाएगी. आप शायद समझ रहे होंगे.




बहरहाल, अब वो नारे जिनसे मुझे कोई दिक्कत नहीं है. और जो इस घटाटोप में बुरे मान लिए गए हैं. सबसे पहले 'आज़ादी' का नारा. आपने देखा होगा, उसमें एक के बाद एक कई आजादियों की मांग की जाती है. यह एक बहुत सुन्दर नारा है और यह अनेक मौकों पर दिया जाता है. यह हमारी आज़ादी को व्यापक अर्थों में ले जाने की मांग करता है.खुद बाबा साहब आंबेडकर ने राजनीतिक आज़ादी को नाकाफी कहते हुए सामाजिक आज़ादी के लिए लम्बी लड़ाई की जरूरत बतायी थी.हमारे दोस्त पंकज श्रीवास्तव ने इसका एक रूप प्रस्तुत किया है, मैं उसे साभार ले रहा हूँ : 

मैं भी माँगूँ आज़ादी
तुम भी माँगो आज़ादी
सामंतवाद से आज़ादी,
पूँजीवाद से आज़ादी,
साम्राज्यवाद से आज़ादी
कारपोरेट से आज़ादी,
जातिवाद से आज़ादी,
ब्राह्मणवाद से आज़ादी
मर्दवाद से आज़ादी..
राम भी माँगे आज़ादी
रहमान भी माँगे आज़ादी
सांप्रदायिकता से आज़ादी
दंगाइयों से आज़ादी
फ़ासीवाद से आज़ादी
लूटपाट से आज़ादी
लड़ के लेंगे आज़ादी
छीन के लेंगे आज़ादी..
आज़ादी भाई आज़ादी
हमें चाहिए आज़ादी...


तस्वीर-1. कश्मीर की अर्ध-विधवाएं
इस नारे ने निर्भया/ज्योति के आन्दोलन के समय एक नया आयाम और लोकप्रियता पायी. जिस समय निर्भया के निर्मम बलात्कार-हत्या के बाद पितृसत्ता द्वारा लड़कियों पर पाबंदियां बढ़ने और उनके कपड़ों-आचरण-घूमने-दोस्ती वगैरह को दोष देने का खतरा मंडरा रहा था, उस समय बहुत जागरूक ढंग से प्रमुख स्त्री संगठनों और जेएनयू के विद्यार्थियों ने इसे पितृसत्ता से लड़ाई पर फोकस करने में काम में लिया. उन मूल्यों से लड़ाई में काम लिया जो स्त्री को कमजोर और संरक्षणीय मानते थे,उनकी हिफाजत का जिम्मा मर्दों को देते थे और इस नाते स्त्री के हितैषी होने की छवि प्रस्तुत करते थे लेकिन दरअसल उसकी गुलामी की जंजीरें तैयार करते थे. ( कोई चैनल उन् नारों को न समझ पाने के कारण 'अनऑडिबल' कह रहा था, मुझे हंसी आ गयी.मुझसे पूछ लेते, पर नहीं , वह आपको नहीं समझ आयेगा, आपको सिर्फ 'कश्मीर मांगे आज़ादी' सुनाई देगा.) 'बाप से मांगे आज़ादी/ खाप से मांगे आज़ादी/ सुनसान सड़क पर आज़ादी/रात में घूमने की आज़ादी ...' इस तरह यह नारा बढ़ता जाता है, इसमें कई आयाम लोगों ने अपनी समझ और सूझ से जोड़े. इसी क्रम में यह समझना जरूरी है कि जब निर्भया आन्दोलन चल रहा था, तब इसकी मध्यवर्गीय सीमाओं को लांघने की कोशिश की गयी. इसमें सोनी सोरी ( एक आदिवासी बहन, जिसे बिना सबूतों के नक्सलवादी कहकर जेल में डाला गया, जिनकी योनि में दंतेवाडा एस पी अंकित गर्ग ने पत्थर भर दिए थे और इस वीर एस पी को भारत सरकार ने गैलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया.) या मनोरमा ( मणिपुर की बहन, जिसे आसाम राइफल्स के जवानों ने 10 जुलाई, 2004 को उठा लिया और अगले दिन उसका बलात्कृत क्षत विक्षत शव सड़क पर मिला और जिसके पांच दिन बाद मणिपुर की कुछ स्त्रियों ने भारत का सर्वाधिक मार्मिक झकझोर देनेवाला प्रतिरोध करते हुए नग्न होकर इस भारतीय राष्ट्र के सामने एक पोस्टर दिखाया जिस पर लिखा था - "इंडियन आर्मी, रेप अस". ) या कुनन पोश्पोरा की महिलाओं( कश्मीर के कुपवाड़ा का एक गाँव जहां 23 फरवारी ,1991 की रात फोर्थ राज राइफल्स के जवानों ने वहां की अनगिनत महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया,पूरी रात.) के सवाल क्यों नहीं शामिल होंगे. इसमें खैरलांजी के दलित परिवार की सुरेखा और प्रियंका भोटमांगे क्यों नहीं आयेंगी. 

29 सितम्बर,2006 को भोटमांगे परिवार के चार लोगों की नृशंस हत्या की गयी. दोनों मां-बेटी को गाँव भर में नग्न परेड और बलात्कार के बाद मारा गया. महिला आन्दोलन का मानना था कि जाति,धर्म,राष्ट्र के भाले सबसे पहले महिलाओं के ही शरीर में घोंपे जाते हैं और इसलिए कोई भी महिला मुद्दा इन सब पर हमला किये बिना,इकलौता नहीं लड़ा जा सकता.इस तरह इस लड़ाई में जातिगत शोषण से लेकर AFSPA जैसे कानूनों के विरोध ने भी जगह ली. छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को भी आज़ादी चाहिए, कॉर्पोरेट लूट से. कश्मीर को आज़ादी चाहिए आफ्सपा जैसे घोर मानव विरोधी क़ानून से. पूरे मुल्क को आज़ादी चाहिए हमारी नसों में घुस चुके जातिवाद के जहर से.

कश्मीर में फौज
यह सिर्फ एक लंबा उदाहरण था यह समझाने के लिए कि अधिकारों के लिए चल रही सारी लडाइयां आज़ादी की ही लडाइयां हैं. और ये आपस में जुडी हुई भी हैं. ‘आज़ादी’ – यह दुनिया का सबसे खूबसूरत लफ्ज़ है. बराबरी और भाईचारा इसका हाथ पकडे बिना नहीं आ सकते. आपको इससे डर क्यों लगता है ? आप नहीं चाहते कि इस मुल्क के सभी भाई बहन आज़ाद हों ? आपकी बेटियाँ देर रात घर आयें तो आपको चिंता न हो. यदि किसी के साथ उसके रंग या जन्म या लिंग या भाषा या क्षेत्र किसी भी आधार पर भेदभाव होता है तो सबसे पहले उसकी आज़ादी का हनन होता है, उन अधिकारों का हनन होता है, जो इस आज़ाद मुल्क ने अपने आज़ाद नागरिकों को देने का वादा किया था. क्यों यह मुल्क डेढ़ दशक से आमरण अनशन पर बैठी एक महिला की आवाज़ नहीं सुनना चाहता ? ( और जानकारी के लिए, यह पूरी दुनिया में सबसे लंबा आमरण अनशन बन चुका है. हैट्स ऑफ़ टू नेशन व्हिच डू नॉट वांट टू नो!)

और आपकी जानकारी के लिए, मैं हर साल जब साहित्य की अपनी कक्षा में आधुनिक काल पर आता हूँ तो सबसे पहले ‘आधुनिकता’ क्या है, इसी पर बात करता हूँ और आधुनिकता के सबसे जरूरी तत्त्व के रूप में इसी आज़ादी का मोल और अर्थ समझाता हूँ. ( दूसरा तत्त्व है – तर्क ) अब क्या आप मेरी कक्षा को भी देशद्रोही साबित करेंगे ? क्या उन किताबों को भी जला देंगे, जिनसे मैंने यह सीखा है ? 

अब रहा आख़िरी नारा – ‘तुम कितने अफज़ल मारोगे / हर घर से अफज़ल निकलेगा’. यदि मेरी अब तक की बातों का सिरा पकडके आप यहाँ तक पहुंचे तो इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि इसका सीधा मतलब यही है कि राज्य की हिंसा सिर्फ प्रतिहिंसा को जन्म देती है. वैसे चर्चा तो इसकी भी की जा सकती है कि जब सामने से नारा लग रहा हो ‘जो अफज़ल की बात करेगा / वो अफज़ल की मौत मरेगा’ तो वो कौनसा यार्डस्टिक या पैमाना है, जो एक को राष्ट्र समर्थक और दूसरे को राष्ट्रद्रोही घोषित करता हो. दूसरी ओर का दूसरा नारा तो जगत्प्रसिद्ध है ही जिसमें दूध मांगने पर खीर देने की बात कही गयी है और खीर मुझे बचपन से ही बहुत पसंद है इसलिए मैं इस नारे का अर्धांश बचा लेना चाहता हूँ सभी खीर प्रेमियों की ओर से. मैं ‘दूसरी ओर’ यह भाषा काम में नहीं लेना चाहता था पर जब दो छोर हैं ही और आप एक छोर की बात सुन चुके हैं तो मेरा फ़र्ज़ है कि अनसुने छोर की ही बात बताऊँ. इसमें लगे हाथ यह भी जोड़ लीजिये कि अफज़ल को कश्मीर में लाखों लोग शहीद मानते हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने अपने निर्णय में उसके खिलाफ षड्यंत्र में प्रत्यक्ष भागीदारी के ठोस सबूत न होने की बात को स्वीकारा है और लिखा है कि उसे इस देश के ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए फांसी दी जाए. इसका क्या मतलब होता है ? क्या इसे कोई न्यायिक हत्या कहे तो वह दोषी है इस मुल्क का ? इस आयोजन के आयोजकों ने अपने पर्चे में यही कहा था. इस कार्यक्रम का नाम था –‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफिस’. यह आगा शाहिद अली के 1997 में आये कविता संग्रह का नाम है. 

1990 में कश्मीर में सात महीनों तक डाक नहीं बंटी थी, यह इसका सन्दर्भ है. क्या उनकी तकलीफ को बाकी मुल्क को जानने का अधिकार नहीं है ? अपने को इस पूरे राष्ट्र का ठेकेदार मानने वाले पत्रकार का वह क्लिप आपने देखा होगा जिसमें उसने उमर खालिद को हनुमंथप्पा का नाम लेकर चुप करवा दिया था. चुप क्या करवा दिया था, माइक निकाल दिया था. आपको लगा ऐसा करके उसने भारतीय राष्ट्र की तरफ से उमर को चुप करवा दिया था. लांसनायक हनुमंथप्पा ने इस मुल्क के लिए जान दी थी तो इस मुल्क के लोगों की बात को, उन लोगों की बात को – जिसे यह मुल्क नहीं सुन पा रहा, पहुंचाने की कोशिश करने वाला उनकी विरासत का उत्तराधिकारी है या उस आवाज़ को चुप कराने वाला ? और क्या उसका अपने मुल्क के अभागे भाइयों से प्यार , देशद्रोह है ? ठीक से सोचिये, कहीं हमारी राष्ट्रवाद की अवधारणा में कोई बुनियादी कमी तो नहीं है ? 

इस चित्र को फिर ध्यान से देखिये, जिसे देखकर आपका खून खौल रहा था. इसमें एक चित्र कश्मीर की अर्धविधवाओं का है, वे मजलूम औरतें जिनके शौहर लापता हैं, जो बरसों से इस उम्मीद में जी रही हैं कि किसी दिन वे वापिस आ जाएंगे, वे उन कहानियों के सहारे जीवित हैं कि फलां का शौहर-बेटा-बाप तेरह साल बाद अचानक मिल गया था.दूसरा चित्र उनके यहाँ बरसों से स्थायी रूप से रह रही फ़ौज का है और तीसरा अफज़ल गुरु का है, जिसे वे अपने साथ हुए अन्याय का प्रतीक मानते हैं. ये तस्वीरें बर्बादी की कामना नहीं बल्कि जो बर्बाद हो रहा है, उसकी ओर आपका ध्यान दिलाने के लिए हैं.

अफ़ज़ल गुरु
वापिस नारों पे आईये. ‘बर्बादी’ वाला वह नारा कितनी देर का है ? बीस सैकंड ? तीस सैकंड ? जो मुल्क पंद्रह साल से गूँज रही अपनी बेटी की पुकार नहीं सुन रहा, उसने तीस सेकंड्स के नारे इतनी फुर्ती से कैसे सुन लिए ? इस सारी बहस को तो खैर जाने ही दीजिये कि उस केऑस में कोई नारा कितनी जल्दी रुकवाया जा सकता था, पर यह जान लीजिये कि इस मुल्क ने फिलहाल इतनी ‘सहिष्णुता’ दिखा रखी है कि वह इन इलाकों में उठने वाले आक्रोश के स्वरों की आसानी से ‘उपेक्षा’ कर देता है. यहाँ तक कि ऐसी आवाजों के साथ केंद्र , राज्य संचालन के दायित्त्व भी बाँट लेता है. जेएनयू इस देश का , कम से कम मानविकी, सामाजिक विज्ञान और गैर तकनीकी अनुसंधान में अकेला विश्वविद्यालय है जो अखिल भारतीय चरित्र का है. इसकी प्रवेश परीक्षा आनेवाली 16-19 मई को देश के बावन शहरों में होगी. यह विश्वविद्यालय एक छोटा भारत है. बड़ा भारत जब अपने दूरदराज के कोनों की आवाज़ दूरी के कारन सुन नहीं पा रहा होता, तब इस छोटे भारत में ये आवाजें पास पास आती हैं, कई बार केरल का लड़का, बिहार के लड़के का रूम पार्टनर बनता है. इस छोटे भारत में एक वे एक दूसरे की बातें सुनना-समझना-लड़ना-झगड़ना सब सीखते हैं. तब थोड़ा हौसला आता है, दूरियां मिटती हैं और यह छोटा भारत उस सपने को पाने की कोशिश करता है, जिसे दरअसल बड़े भारत को एक न एक दिन पाना ही है.

आपने जिन नौ दस बच्चों के चित्र टीवी पर देखे हैं ना, वे सब अलग अलग प्रान्तों के हैं, उनका साथ आना इस मुल्क को कमजोर नहीं, मजबूत बनाता है, शब्द के वास्तविक अर्थ में मजबूत. दबाव की एकता नहीं, साथ की एकता, प्यार की एकजूटता. कम से कम इस छोटे भारत में तो यह प्रयोग होना चाहिए. किसी दिन बड़े भारत में भी हम इस सपने को पा लेंगे.

और अब आखिर में मैं यह बता ही दूं – यह आज़ादी का नारा मूलतः कश्मीर का ही है और अब अगर मैं हिचकते हुए यह भी बता दूं कि यह नारा सबसे पहले कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़नेवालों ने ही लगाया था तो अब तो आप मेरे मुंह से ‘आज़ादी’ इस लफ्ज़ का उच्चारण सुनकर मुझे देशद्रोही तो नहीं कहेंगे ना ? मैं इस मुल्क से बहुत प्यार करता हूँ , अपने अल्मा मैटर से प्यार करता हूँ जिसने मुझे पूरे मुल्क से प्यार करना सिखाया.

इसलिए लिखता हूँ – “असली नारे लगानेवाले को ढूंढो !” यह नारा भी दरअसल जेएनयू को बचा नहीं रहा है. एक नौजवान – जिसका नाम उमर खालिद है, उसे आपने बिना सबूत के आतंकवादी बनाकर पूरे मुल्क को उसकी तस्वीर दिखा दी है. दिल्ली की सड़कों पर उसके चित्र वाले पोस्टर लगा दिए हैं. बजरंग दल नामक सांस्कृतिक दल के कार्यकर्ता उसके खून से तिलक करके अपना अनुष्ठान पूर्ण करना चाहते हैं. यदि आज उसे कुछ हो गया ना, तो इस छोटे भारत में तो सम्वाद के सारे रास्ते बंद हो ही जायेंगे , पर आपकी कमीज़ पर जो खून के दाग लगेंगे,उनका क्या होगा ? माना,अखलाक का मारा जाना हम नहीं रोक सकते थे पर रोहित का मारा जाना एक क्रमबद्ध हत्या थी. उसका निष्कासन, उसका बहिष्कार, उसकी प्रताड़ना सब धीरे धीरे घटित हुआ था. उसे भी ‘राष्ट्र विरोधी’ ही घोषित किया गया था. ठीक है, आपको तब पता नहीं चला, पर इस बार तो आपकी आँखों के सामने सब हो रहा है.कन्हैया कुमार, उमर खालिद, रामा नागा, श्वेता राज,आशुतोष कुमार,अनंत प्रकाश नारायण ये सब नाम नहीं हैं,आपके विवेक की कसौटी हैं. अभी हम एक रोहित की हत्या का पश्चाताप भी नहीं कर पाए हैं, दूसरे रोहित को खुदसे बिछड़ने देंगे ? 







28 मार्च 2013

फांसी तो हो गई किन्तु यह तो पता चले कि संसद पर हमला किया किसने था?


डॉ संदीप पाण्डेय 
(नोटः हाल ही में लियाकत शाह के मामले से साफ हो गया है कि किस तरह पुलिस श्रेय लेने के लिए आत्मसमर्पण किए हुए उग्रवादियों को फर्जी मामलों में फंसा कर आतंकवादी के रूप में पेश करती है। यदि जम्मू-कश्मीर पुलिस और मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्लाह ने खुल कर लियाकत के पक्ष में भूमिका नहीं ली होती तो सारा देश यही मानता कि लियाकत होली के समय दिल्ली में विस्फोट करने आया था। यह भी सवाल उठता है कि पुरानी दिल्ली में बरामद हथियार-बारूद किसने रखे थे? हमारा मानना है कि अफजल गुरु का मामला लियाकत जैसा ही था। एस.टी.एफ. और दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने उसे बलि का बकरा बना दिया। इस देश में पुलिस अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए अन्य मामलों में भी निर्दोष लोगों को फंसाती रही है।)

अफजल गुरु को फांसी हो गई। अफजल को फांसी की सजा इसलिए दी गई थी कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना संतुष्ट हो सके। राष्ट्र की सामूहिक चेतना संतुष्ट हो गई होगी। राष्ट्रवादी लोगों ने नाच-गा कर, एक-दूसरे को मिठाई खिला कर, पटाखे चला कर खुशियां मनाईं। शायद सजा सुनाने के पीछे उद्देश्य भी यही था कि एक अध्याय पूरा हो।
किंतु एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है। संसद पर हमले की साजिश आखिर रची किसने थी? जो पांच कड़ी सुरक्षा भेद कर संसद भवन तक पहुंच गए थे वे तो मौके पर ही मारे गए। जांच एजेंसियों के अनुसार साजिशकर्ता हैं मसूद अज़हर, गांजी बाबा और तारिक अहमद जो पाकिस्तान में हैं। जाहिर है कि इन्हें अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।
फिर अफजल कौन था और संसद हमले में उसकी क्या भूमिका थी? आइए देखें उसका और उसकी पत्नी का पक्ष जो पत्र रूप में उसकी सजा से पहले सार्वजनिक हो चुका था।
अफजल गुरु को फांसी की सजा हुई मात्र उस इकबालिया बयान के आधार पर जो उसने विशेष पुलिस सहायक पुलिस आयुक्त राजबीर सिंह के दबाव में मीडिया के सामने दिया। उसे यह धमकी दी गई थी कि यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसके परिणाम उसकी पत्नी और बच्चों के लिए सही नहीं होंगे।
अफजल गुरु जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की ओर 1990 में आकर्षित हुआ और प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान गया। किन्तु तीन माह ही रहने के बाद वह लौट आया क्योंकि उसे इन संगठन के नेताओं की बातें, खासकर पाकिस्तान के पक्ष में, पसंद नहीं आईं। उसने लौटकर सीमा सुरक्षा बल के सामने आत्मसमर्पण किया। उसे जल्दी ही समझ में आया कि आत्मसमर्पित उग्रवादी के रूप में रहना आसान नहीं। उसे समय समय पर सेना, बी.एस.एफ. व एस.टी.एफ. जैसी सुरक्षा एजेंसियां परेशान करती रहती थीं। उसका परिवार सुरक्षित रहे इसलिए अफजल गुरु जैसे आत्मसमर्पण किए हुए उग्रवादी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बताए गए सही या गलत काम करने को मजबूर थे। जो पैसे दे सकते थे उन्हें परेशान नहीं किया जाता। यानी यहां भी भ्रष्टाचार। एक बार पारमपोर पुलिस स्टेशन के पुलिसकर्मी अकबर ने उससे पांच हजार रुपए मांगे थे और फिरौती न मिलने की सूरत में उसे नकली दवाएं व चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने की धमकी दी गई। अफजल के मुदकमे के दौरान अकबर भी गवाह के रूप में न्यायालय में पेश हुआ और अफजल के खिलाफ बयान दिया। अफजल ने 1997-98 में दवाओं और उपकरणों का व्यापार कमीशन के आधार पर शुरू किया था चूकिं आत्मसमर्पित उग्रवादियों को नौकरी नहीं मिल सकती थी। इससे अफजल की चार-पांच हजार प्रति माह की कमाई हो जाती थी। वर्ना एस.टी.एफ. के साथ विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में काम करना पड़ता जिसमें आतंकवादियों के हाथ मारे जाने का खतरा रहता था। अफजल को एस.पी.ओ. को भी 300-500 रुपए घूस देनी पड़ती थी ताकि वे उसे परेशान न करें।
एक दिन सुबह 10 बजे जब वह दो माह पुराने स्कूटर से जा रहा था तो एस.टी.एफ. उसे पकड़ कर पलहल्लन शिविर ले गई। यहां उसे काफी प्रताड़ित किया गया। फिर उसे हमहामा शिविर ले गए। यहां भी यातनाओं का दौर चलता रहा। एस.टी.एफ. उससे रुपयों की मांग कर रही थी जिसके लिए उसे अंततः उसे अपनी पत्नी के जेवर बेचने पड़े। कुल मिलाकर 80 हजार रुपए नकद और अपनी नई स्कूटर से उसे हाथ धोना पड़ा। हरेक प्रताड़ना के बाद स्थिति ये होती थी कि कई दिनों तक इलाज कराना पड़ता था।
1990 से 1996 के दौरान अफजल ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और उस दौरान ट्यूशन भी पढ़ाता था। बड़गाम के एस.एस.पी. अशफाक हुसैन के साले अल्ताफ हुसैन ने उसे अपने दो बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा। एक दिल अल्ताफ अफजल को डी.एस.पी. दरविंदर सिंह के पास ले गया। उससे कहा गया कि उसे मोहम्मद नामक एक आदमी, जो गैर-कश्मीरी था, को दिल्ली ले जाना है और उसे वहां किराए का घर दिलवाना है। वहां कार खरीदवाने से लेकर उसने मोहम्मद की सभी प्रकार से मदद की। एक दिन मोहम्मद ने उसे पैंतीस हजार रुपए देकर कश्मीर वापस जाने के लिए मुक्त कर दिया। इस बीच अफजल ने दिल्ली में आकर अपनी पत्नी और चार वर्ष के बेटे गालिब के साथ रहने के फैसले के साथ एक कमरा भी इंदिरा विहार में किराए पर ले लिया। उसने चाभियां मकान मालकिन को सौंपते हुए उनसे कहा कि वह शीघ्र परिवार के साथ लौटेगा।
संसद हमले के बाद कश्मीर पहुँच कर जब अगले दिन वह सोपोर की बस पकड़ने के लिए बस स्टैण्ड पर खड़ा था तो श्रीनगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गई। उससे पैंतीय हजार रुपए ले लिए गए। एस.टी.एफ. मुख्यालय ले गए। वहां से दिल्ली ले जाया गया। विशेष सेल ने यहां उसको प्रताड़ि़त करना शुरू किया।
विशेष सेल द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में जब उसने यह कह दिया कि सैयद अब्दुर रहमान गिलानी निर्दोष हैं तो ए.सी.पी. राजबीर सिंह मीडिया के सामने उसपर बहुत नाराज हुए और मिडिया को उस बयान को न दिखाने या छापने का आग्रह किया।
अफजल को यह समझाया गया कि एस.टी.एफ. का सहयोग करने में ही उसकी भलाई है। दिल्ली में उसे उन जगहों पर ले जाया गया जहां से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। फिर उसे कश्मीर ले गए और वहां से वापस दिल्ली। उससे कई सादे कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए।
अफजल को न्यायालय में अपनी बात कहने का मौका नहीं मिला। न्यायाधीश ने उससे कहा कि अंत में उसे मौका दिया जाएगा लेकिन अदालत ने उसके बयान दर्ज नहीं किए और न ही दर्ज किए बयानों को उसे दिखाया गया। यदि सिर्फ उसे किए गए फोन कॉल का ही रिकॉर्ड निकाला जाता तो पता चल जाता कि एस.टी.एफ. ने उसे कितने फोन किए। उच्च न्यायालय का फैसला आने तक उसके मुकदमे की कैसी सुनवाई हो रही है उसे इसका कोई अंदाजा ही नहीं था।
हो सकता है अफजल ने अपने को बचाने के लिए उपर्यक्त बात कही हों। किन्तु यदि ये बातें सही हैं तो बड़ी गम्भीर हैं। एक तो अफजल का संसद हमले से सिर्फ इतना सम्बंध था कि उसने मोहम्मद नामक एक आदमी की मदद की जिसकी कोई भूमिका संसद हमले में प्रतीत होती है। यह मोहम्म्द कौन है? सबसे गम्भीर बात यह है कि उसने मोहम्मद की मदद एस.टी.एफ. के कहने पर की जिस बात को न्यायालय ने नहीं माना। क्या यह न्यायोचित नहीं है कि यदि अफजल ने यह बात कही है तो इस कोण की भी जांच हो कि संसद हमले में एस.टी.एफ. की कोई भूमिका थी या नहीं? एस.टी.एफ. की भी जिम्मेदारी है कि एक निष्पक्ष जांच के उपरांत अपनी भूमिका साफ करे।
यदि हम ऐसा नहीं करते तो संसद हमले की साजिश की तह तक कभी नहीं पहुचेंगे और इस तरह के हमलों का खतरा बना रहेगा। अपनी सुरक्षा के लिए यह सच पता लगाना जरूरी है कि संसद पर हमले की साजिश किसने की?

लेखक, मगसेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं.  ईमेल: ashaashram@yahoo.com

17 मार्च 2013

अफजल गुरु की याद में

भारत के फासीवादी राज्य द्वारा मो. अफजल गुरु की कानूनी हत्या के बाद आई प्रतिक्रियाओं में सबसे ज्यादा पढ़ी गई प्रतिक्रियाएं अरुंधति राय की हैं. उन्होंने लगातार इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया है. और सबसे मजबूत दलीलों के साथ दर्ज कराया है. 2006 में संसद पर हमले के मामले के विभिन्न पहलुओं पर लेखों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ था- 13 दिसंबर: ए रीडर. उसमें एक लेख और उसकी प्रस्तावना अरुंधति ने ही लिखी थी. यह संग्रह अपने नए रूप में और कुछ नई सामग्री के रूप में फिर से प्रकाशित हो रहा है. इसके लिए अरुंधति ने एक नई प्रस्तावना लिखी है. इसका अनुवाद जितेन्द्र कुमार ने किया है, जिसे हाशिया पर संपादित करके पोस्ट किया जा रहा है.


अफजल गुरु की याद में

नई दिल्ली के जेल में ग्यारह साल के बाद, जिसमें से ज्यादातर वक्त एकांत में कालकोठरी में मृत्यु दंड की प्रतीक्षा में बीता था, फरवरी की एक साफ सुथरी सुबह, अफजल गुरु को फांसी पर लटका दिया गया। भारत के एक पूर्व सॉलीसीटर जेनरल व सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता ने इसे हड़बड़ी में छुपाकर लिया गया फैसला बताया है; फांसी दिए जाने का यह ऐसा फैसला है, जिसकी वैधता पर गंभीर प्रश्न चिह्न लग गए हैं।

जिस व्यक्ति को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तीन उम्र कैद और दो मृत्यु दंड की सजा तजवीज की हो, और जिसे लोकतांत्रिक सरकार ने फांसी पर लटकाया हो, उस प्रक्रिया पर वैधानिक प्रश्न कैसे लगाया जा सकता है? क्योंकि फांसी पर लटकाए जाने के सिर्फ दस महीने पहले, अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट में वैसे कैदियों की याचिका पर कई बैठकों में सुनवाई पूरी हुई थी जिनमें कैदियों को बहुत ज्यादा समय तक जेल में रखा गया है। उन कई मुकदमों में एक मुकदमा अफजल गुरु का भी था जिसमें सुप्रीम कोर्ट के बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। लेकिन अफजल गुरु को फैसला सुनाए जाने से पहले ही फांसी दे दी गई है।

सरकार ने अफजल के परिवार को उनका शरीर सौंपने से मना कर दिया है। उनका अंतिम संस्कार किए बगैर, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के संस्थापक मकबूल भट्ट की कब्र की बगल में दफना दिया गया, जो कश्मीर की आजादी के सबसे बड़े प्रतीक थे। और इस तरह तिहाड़ जेल के चहारदीवारी के भीतर ही दूसरे कश्मीरी की लाश अंतिम रस्म अदा किए जाने की प्रतीक्षा कर रही है। उधर कश्मीर में मजार-ए-शोहदा के कब्रिस्तान में एक कब्र लाश के इंतजार में खाली पड़ी है। जो लोग कश्मीर को जानते-समझते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे कल्पित, भूमिगत आदमकद कोटरों ने अतीत में कितने चरमपंथी हमलों को जन्म दिया है।

हिन्दुस्तान में, ‘कानून का राज कायम होने’ का ढ़िंढोरा पीटे जाने का जश्न थम गया है, सड़कों और गलियों में गुंडों द्वारा फांसी पर चढ़ाए जाने की खुशी में मिठाई बंटनी बंद हो गयी है (आप कितनी देर बिना चाय ब्रेक के मुर्दे के पोस्टर को फूंक सकते हैं?), कुछ लोगों को फांसी की सजा दिए जाने पर आपत्ति जताने और अफजल गुरु के मामले में निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) हुई या नहीं, कहने की छूट दे दी गई। वह बेहतर और सामयिक भी था, एक बार फिर हमने ज़मीर से लबालब जनतंत्र देखा।
बस उन बहसों को नहीं देख सके जो छह साल पहले ही चार साल देर से शुरू हुई थीं। सबसे पहले यह किताब 2006 के दिसबंर में छपी थी जिसके पहले भाग के लेखों में विस्तार से सुनवाई के बारे में चर्चा हुई है। इसमें कानूनी विफलता, ट्रायल कोर्ट में उन्हें वकील नहीं मिलने की बात, कैसे सूत्रों के तह तक नहीं जाया गया और उस समय मीडिया ने कितनी घातक भूमिका निभायी।

इस नए संस्करण के दूसरे खंड में फांसी दिए जाने के बाद लिखे गए लेखों और विश्लेषणों का एक संकलन है। पहले संस्करण के प्राक्कथन में कहा गया है, 'इसलिए इस पुस्तक से एक आशा जगती है' जबकि यह संस्करण गुस्से में प्रस्तुत किया गया है।

इस प्रतिहिंसक समय में, अधीरता से कोई भी यह पूछ सकता है: विवरणों और कानूनी बारीकियों को छोड़िए। क्या वे दोषी थे या वे दोषी नहीं थे? क्या भारत सरकार ने एक निर्दोष व्यक्ति को फांसी पर लटका दिया है?

जो भी व्यक्ति इस किताब को पढ़ने का कष्ट करेगा, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि अफजल गुरु के ऊपर जो आरोप लगाए गए थे, उनके लिए वे दोषी साबित नहीं हुए थे- भारतीय संसद पर हमला रचने के षड्यंत्रकारी या फिर जिसे फैशन में 'भारतीय लोकतंत्र पर हमला' भी कहा जाता है, (जिन्हें मीडिया लगातार गलत तरीके से अपराधी ठहराता रहा है जबकि अभियोजन पक्ष द्वारा उन पर हमला करने का आरोप नहीं लगाया गया और न ही उन्हें किसी का हत्यारा कहा गया। उनके ऊपर हमलावरों का सहयोगी होने का आरोप था)। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध के लिए उन्हें दोषी पाया और उन्हें फांसी की सजा दी। अपने उस विवादास्पद फैसले में, जिसमें ‘समाज के सामूहिक विवेक को तुष्ट करने के लिए’ किसी को फांसी पर लटका दिए जाने की बात कही गई है।  उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था, केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य थे।

आतंकवाद विशेषज्ञ और अन्य विश्लेषक गौरव के साथ बता रहे हैं कि ऐसे मामलों में 'पूरा सच' हमेशा ही मायावी होता है। संसद पर हमले के मामले में तो बिल्कुल  यही दिखता है। इसमें हम 'सच' तक नहीं पहुंच पाए हैं। तार्किक रूप से, न्यायिक सिद्धांत के अनुसार 'उचित संदेह' की बात उठनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक आदमी को जिसका अपराध महज ‘उचित संदेह से परे’ स्थापित नहीं हो पाया, फांसी पर लटका दिया गया।

चलिए हम मान लेते हैं कि भारतीय संसद पर हमला हमारे लोकतंत्र पर हमला है। तो क्या 1983 में तीन हजार ‘अवैध’ बांग्लादेशियों का नेली जनसंहार भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था? या 1984 में दिल्ली की सड़कों पर तीन हजार से अधिक सिखों का जनसंहार क्या था? 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था क्या? 1993 में मुंबई में शिवसैनिकों के नेतृत्व में हजारों मुसलमानों की हत्या भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था? गुजरात में 2002 में हुए हजारों मुसलमानों जनसंहार क्या था? वहां प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य, दोनों प्रकार के सबूत हैं जिसमें बड़े पैमाने हुए जनसंहार में हमारे प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के तार जुड़े हैं। लेकिन ग्यारह साल में क्या हमने कभी इसकी कल्पना तक की है कि उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है, फांसी पर चढ़ाने की बात को तो छोड़ ही दीजिए। खैर छोड़िए इसे। इसके विपरीत, उनमें से एक को- जो कभी किसी सार्वजनिक पद पर नहीं रहे- और जिनके मरने के बाद पूरे मुंबई को बंधक बना दिया था, उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। जबकि दूसरा व्यक्ति अगले आम चुनाव में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है।

इस सर्द, बुदजिली भरे रास्ते में, खाली, अतिरंजित इशारों की नकली प्रक्रिया के तहत भारतीय मार्का  फासीवाद हमारे उपर आ खड़ा हुआ है।

श्रीनगर के मजार-ए-शोहदा में, अफजल की समाधि के पत्थर पर (जिसे पुलिस ने हटा दिया था  और बाद में जनता के आक्रोश की वजह से फिर से रखने के लिए बाध्य हुई) लिखा है:

‘देश का शहीद, शहीद मोहम्मद अफजल, शहादत की तिथि 9 फरवरी 2013, शनिवार। इनका नश्वर शरीर भारत सरकार की हिरासत में है और अपने वतन वापसी का इंतजार कर रहा है।’

हम क्या कर रहे हैं, यह जानते हुए भी अफजल गुरु का एक पारंपरिक योद्धा के रूप में वर्णन करना काफी कठिन होगा। उनकी शहादत कश्मीरी युवकों के अनुभवों से आती है जिसके गवाह दसियों हजार साधारण युवा कश्मीरी रहे हैं। उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है, उन्हें जलाया जाता है, पीटा जाता है, बिजली के झटके दिए जाते हैं , ब्लैकमेल किया जाता है और अंत में मार दिया जाता है।( उन्हें क्या-क्या यातनाएं दी गई उसका विवरण आप परिशिष्ट तीन में पढ़ सकते हैं)। जब अफजल गुरु को अति गोपनीय तरीके से फांसी पर लटका दिया गया, उन्हें फांसी पर लटकाए जाने की प्रक्रिया को बार-बार प्रहसन के रूप में पर्दे पर दिखाया गया। जब पर्दा नीचे सरका और रोशनी आयी तो दर्शकों ने उस प्रहसन की तारीफ की। समीक्षाएँ मिश्रित थी  लेकिन जो कृत्य किया गया था, वह सचमुच ही बहुत घटिया था।

'पूर्ण' सच यह है कि अब अफजल गुरु मर चुके हैं और अब शायद हम कभी नहीं जान पाएंगे कि भारतीय संसद पर हमला किसने किया था। भारतीय जनता पार्टी से उनके भयानक चुनावी नारे को छीन लिया गया है: 'देश अभी शर्मिंदा है, अफजल अभी भी जिंदा है' । अब भाजपा को एक नया नारा तलाशना होगा।

गिरफ्तारी से बहुत पहले अफजल गुरु एक इंसान के रूप में पूरी तरह टूट चुके थे। अब जब कि वे मर चुके हैं, उनकी लाश पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। लोगों के गुस्से को भड़काया जा रहा है। कुछ समय के बाद हमें उनकी चिट्ठियां मिलेगीं, जो उन्होंने कभी नहीं लिखीं, कोई किताब मिलेगी, जो उन्होंने नहीं लिखी । साथ ही, कुछ ऐसी बातें भी सुनने को मिलेंगी जो उन्होंने कभी नहीं कहीं। ये बदसूरत खेल बदस्तूर जारी रहेगा लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलेगा। क्योंकि जिस तरह वे जीते थे और जिस तरह वे मरे, वह कश्मीरी यादों में लोकप्रिय रहेगा, एक नायक के रूप में, मकबूल भट्ट के कंधे से कंधा मिलाकर और उनकी मिली-जुली आभा से हिल-मिल कर।

हम बाकी लोगों के लिए, उनकी कहानी तो बस ये है कि भारतीय लोकतंत्र पर वास्तविक हमला कश्मीर में सैनिकों के बल पर भारतीय साम्राज्य है।

मोहम्मद अफजल गुरु की रूह को सुकून मिले।

21 फ़रवरी 2013

क्या आपके बमरोधी बेसमेंट में अटैच बाथरूम है? : अरुंधति राय


अफजल गुरु की फांसी के निहितार्थों और भारत की युद्धोन्मादी सांप्रदायिक राजनीति पर अरुंधति राय. मूल अंग्रेजी: आउटलुक. अनुवाद: रेयाज उल हक.

2001 के संसद हमले के मुख्य आरोपी मोहम्मद अफजल गुरु की खुफिया और अचानक दी गई फांसी के क्या नतीजे क्या होने जा रहे हैं? क्या कोई जानता है? सेंट्रल जेल जेल नं. 3, तिहाड़, नई दिल्ली के सुपरिंटेंडेंट द्वारा ‘मिसेज तबस्सुम, पत्नी श्री अफजल गुरु’ को भेजे गए मेमो में, जिसमें संवेदनहीन नौकरशाहाना तरीके से हरेक नाम को अपमानजनक तरीके से लिखा गया है, लिखा है:
‘श्री मो. अफजल गुरु, पुत्र- हबीबिल्लाह की माफी की याचिका को भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दिया गया है. इसलिए मो. अफजल, पुत्र-हबीबिल्लाह को 09/02/2013 को सुबह आठ बजे सेंट्रल जेल नं. 3 में फांसी देना तय किया गया है.
आपको सूचना देने और आगे की जरूरी कार्रवाई के लिए भेजा गया.’
मेमो भेजने का वक्त जानबूझ कर ऐसा रखा गया कि वह तबस्सुम को फांसी के बाद ही मिले, और इस तरह उन्हें उनके आखिरी कानूनी मौके – यानी क्षमा याचिका के खारिज किए जाने को चुनौती देने के अधिकार -  से महरूम कर दिया गया. अफजल और  उनके परिवार, दोनों को अलग-अलग ये अधिकार हासिल था. दोनों को ही इस अधिकार का उपयोग करने से रोक दिया गया. यहां तक कि कानून में अनिवार्य होने के बावजूद तबस्सुम को भेजे गए मेमों में राष्ट्रपति द्वारा क्षमा याचिका खारिज किए जाने की कोई वजह नहीं बताई गई. अगर कोई वजह नहीं बताई गई है, तो आप किस आधार पर अपील करेंगे? भारत में फांसी की सजा प्राप्त सभी कैदियों को यह आखिरी मौका दिया जाता रहा है.
चूंकि फांसी दिए जाने से पहले तबस्सुम को अपने पति से मिलने की इजाजत नहीं दी गई, चूंकि उनके बेटे को अपने पिता से सलाह के आखिरी दो बोल सुनने की इजाजात नहीं दी गई, चूंकि उन्हें दफनाने के लिए अफजल का शरीर नहीं दिया गया, और चूंकि कोई जनाजा नहीं हुआ, तो जेल मैनुअल के मुताबिक ‘आगे की जरूरी कार्रवाई’ क्या है? गुस्सा? अपार, अपूरणीय दुख? बिना किसी सवाल के, जो हुआ उसे कबूल कर लिया जाना? संपूर्ण अखंडता?
फांसी के बाद एक अपार जश्न मनाया गया. संसद हमले में मारे गए लोगों की गमजदा बीवियां टीवी पर दिखाई गईं, अपनी उत्तेजित मूंछों के साथ ऑल इंडिया एंटी-टेररिस्ट फ्रंट के अध्यक्ष एम.एस. बिट्टा थे उनकी छोटी सी उदास कंपनी के सीईओ की भूमिका अदा कर रहे थे. क्या कोई उन्हें बताएगा कि जिस इंसान ने उनके पतियों को मारा वो भी उसी वक्त, उसी जगह पर मारा गया था? और जिन लोगों ने हमले की योजना बनाई उनको कभी सजा नहीं होगी, क्योंकि हम अब तक नहीं जानते कि वे कौन हैं.
इस बीच कश्मीर पर एक बार फिर कर्फ्यू लागू है. एक बार फिर इसके लोगों को बाड़े में जानवरों की तरह बंद कर दिया गया है. एक बार फिर उन्होंने कर्फ्यू को मानने से इन्कार कर दिया है. तीन दिनों में तीन लोग मारे जा चुके थे और पंद्रह गंभीर रूप से जख्मी थे. अखबार बंद करा दिए गए हैं, लेकिन जो भी इंटरनेट पर छानबीन करना जानता है, वो पाएगा कि नौजवान कश्मीरियों का गुस्सा उतना अवज्ञाकारी और साफ जाहिर नहीं है, जितना यह 2008, 2009 और 2010 की गर्मियों के जन उभार के दौरान था – यहां तक कि उन मौकों पर 180 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इस बार गुस्सा सर्द और तीखा है. निर्मम. क्या ऐसी कोई वजह है कि इसे ऐसा नहीं होना चाहिए था?
20 वर्षों से भी अधिक समय से, कश्मीरी एक फौजी कब्जे को भुगत रहे हैं. जिन दसियों हजार लोगों ने अपनी जानें गवाईं, वे जेलों में, यातना शिविरों में और असली और फर्जी ‘मुठभेड़ों’ में मारे गए. अफजल गुरु की फांसी को जो बात इन सबसे अलग बनाती है, वो यह है कि इस फांसी ने उन नौजवानों को, जिन्हें कभी भी लोकतंत्र का सीधा अनुभव नहीं रहा है, सबसे आगे की कुर्सियों पर बैठ कर भारतीय लोकतंत्र को पूरी महिमा के साथ काम करते हुए देखने का मौका मुहैया कराया है. उन्होंने पहियों को घूमते हुए देखा है, उन्होंने एक इंसान को, एक कश्मीरी को फांसी देने के लिए इसके सारे पुराने संस्थानों, सरकार, पुलिस, अदालतों, राजनीतिक दलों और हां, मीडिया को एकजुट होते हुए देखा है, जिसके बारे में उऩका मानना है कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं हासिल हुई थी. और उनके यह मानने की खासी वजहें हैं.
निचली अदालत में सुनवाई के सबसे अहम हिस्से में अफजल का पक्ष पेश करने वाला लगभग कोई नहीं था. अदालत द्वारा नियुक्त वकील कभी उनसे जेल में नहीं मिला, और असल में उसने अपने खुद के मुवक्किल के खिलाफ इल्जाम लगाने वाले सबूत पेश किए. (सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार किया और फिर फैसला किया कि यह ठीक है.) संक्षेप में, किसी भी तरह से तर्कसंगत संदेहों के परे जाकर उनका अपराध साबित नहीं हुआ. उन्होंने देखा कि सरकार ने उन्हें फांसी की सजा का इंतजार कर रहे लोगों में से चुन कर, बेवक्त फांसी दे दी. यह नया सर्द, तीखा गुस्सा किस दिशा में जाएगा और कौन सी शक्ल अख्तियार करेगा? क्या यह उन्हें वह मुक्ति (आजादी) दिलाएगा, जिसकी उन्हें इतनी चाहत है और जिसके लिए उन्होंने एक पूरी पीढ़ी कुरबान कर दी है. या इसका अंजाम तबाही से भरी हुई हिंसा का एक और सिलसिले में, कुचल दिए जाने और फौजी बूटों द्वारा थोपी गई ‘सामान्य हालात’ वाली जिंदगी में होगा?
हममें से जो भी इलाके में रहते हैं, वे जानते हैं 2014 एक ऐतिहासिक साल होने जा रहा है. पाकिस्तान, भारत और जम्मू और कश्मीर में चुनाव होंगे. हम जानते हैं कि जब अमेरिका अफगानिस्तान से अपने फौजियों को निकाल लेगा तो पहले से ही गंभीर रूप से अस्थिर पाकिस्तान की अव्यवस्था कश्मीर तक फैल जाएगी, जैसा कि पहले हो चुका है. जिस तरह से अफजल को फांसी दी गई है, उससे भारत सरकार ने इस अस्थिरता की प्रक्रिया को बढ़ाने का फैसला किया है, असल में उसने इसकी दावत दी है. (जैसा कि इसने पहले भी, 1987 में कश्मीर चुनावों में धांधली करके किया था.) घाटी में लगातार तीन सालों तक चले जनांदोलन के 2010 में खत्म होने के बाद सरकार ने ‘सामान्य हालात’ का अपना वर्जन लागू करने की काफी कोशिश की है (खुशहाल सैलानी, वोट डाल रहे कश्मीरी). सवाल है कि क्यों यह अपनी ही कोशिशों को पलटना चाहती है? जिस तरह अफजल गुरु को फांसी दी गई, उसके कानूनी, नैतिक और उसके अमानवीय पहलुओं को परे कर दें और इसे एक महज राजनीतिक, कार्यनीतिक रूप में देखें तो यह एक खतरनाक और गैरजिम्मेदार काम है. लेकिन यह किया गया है. साफ साफ और जान बूझ कर. क्यों?
मैंने ‘गैरजिम्मेदार’ शब्द सोच-समझ कर ही इस्तेमाल किया है. पिछले कुछ समय में जो हुआ है, उस पर नजर डालते हैं. 
2001 में, संसद पर हमलों के हफ्ते भर के भीतर (अफजल गुरु की गिरफ्तारी के कुछ दिनों के बाद) सरकार ने पाकिस्तान से अपने राजदूत को बुला लिया और अपनी पांच लाख फौज सरहद पर भेज दी. ऐसा किस आधार पर किया गया? जनता को सिर्फ यही बताया गया कि दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की हिरासत में अफजल गुरु ने पाकिस्तान स्थित एक चरमपंथी समूह जैश-ए-मुहम्मद का सदस्य होना कबूल किया है. सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को कानून की नजर में अमान्य करार दिया. लेकिन कानून की नजर में जो अमान्य है वो क्या जंग में मान्य हो जाता है?
मामले के अपने अंतिम फैसले में, ‘सामूहिक अंतरात्मा की संतुष्टि’ वाले अब मशहूर हो गए बयान और किसी सबूत के न होने के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इसका ‘कोई सबूत नहीं था कि मोहम्मद अफजल गुरु का संबंध किसी आतंकवादी समूह या संगठन से है.’ तो फिर कौन सी बाद उस फौजी चढ़ाई, फौजियों के जान के उस नुकसान, जनता के पैसे को पानी के तरह बहाए जाने और परमाणु युद्ध के वास्तविक जोखिम को जायज ठहराती है? (विदेशी दूतावासों द्वारा यात्रा सुझाव जारी किया जाना और अपने कर्मचारियों को वापस बुलाया जाना याद है?) संसद हमले और अफजल गुरु की गिरफ्तारी के पहले क्या कोई खुफिया सूचना आई थी, जिसके बारे में हमें नहीं बताया गया? अगर ऐसा था, तो हमले को होने कैसे दिया गया? और अगर खुफिया सूचना सटीक थी, और इतनी सटीक थी कि उससे ऐसी खतरनाक फौजी तैनाती को जायज ठहराया जा सकता था, तो क्या भारत, पाकिस्तान और कश्मीर की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वह क्या थी? अफजल गुरु का अपराध साबित करने के लिए वह सबूत अदालत में क्यों नहीं पेश किया गया?
संसद पर हमले के मामले की सारी अंतहीन बहसों में से इस मुद्दे पर, जो कि सबसे अहम मुद्दा है, वामपंथी, दक्षिणपंथी, हिंदुत्वपंथी, धर्मनिरपेक्षतावादी, राष्ट्रवादी, देशद्रोही, सनकी, आलोचक - सभी हल्कों में मुर्दा खामोशी है. क्यों?
हो सकता है कि हमले के पीछे जैश-ए-मुहम्मद का दिमाग हो. भारतीय मीडिया के जाने-माने ‘आतंकवाद’ विशेषज्ञ प्रवीण स्वामी ने, जिनके भारतीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों में ऐसे सूत्र हैं कि जलन होती है, हाल ही में एक पूर्व आईएसआई प्रमुख ले. जन. जावेद अशरफ काजी के 2003 के एक बयान का और एक पाकिस्तानी विद्वान मुहम्मद आमिर राणा की 2004 की एक किताब का हवाला दिया है, जिसमें संसद हमले में जैश-ए-मुहम्मद को जिम्मेदार ठहराया गया है. (एक ऐसे संगठन के मुखिया के बयान की सच्चाई पर यकीन करना दिल को छू गया, जिसका काम भारत को अस्थिर करना है.) लेकिन तब भी यह नहीं बताता कि 2001 में जब फौजी तैनाती हो रही थी, तो कौन से सबूत पास में थे.
चलिए बहस की खातिर मान लेते हैं कि जैश-ए-मुहम्मद ने हमला कराया था. हो सकता है कि आईएसआई भी इसमें शामिल हो. हमें यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान सरकार कश्मीर में छुपी हुई गतिविधियां करने से पाक-साफ है. (जैसे कि भारत सरकार बलूचिस्तान और पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में करता है. याद करें कि भारतीय सेना ने 1970 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी को और 1980 के दशक में लिट्टे सहित छह विभिन्न श्रीलंकाई तमिल चरमपंथी समूहों को प्रशिक्षण दिया था.)
यह एक गंदा नजारा है. पाकिस्तान से जंग से क्या हासिल होने वाला था और अभी इससे क्या हासिल होगा? (जानों के भारी नुकसान के अलावा. और हथियारों के कुछ डीलरों के बैंक खातों के फूलते जाने के अलावा.) भारतीय युद्धोन्मादी लगातार यह सुझाव देते हैं कि ‘समस्या को जड़ से खत्म करने’ का अकेला तरीका ‘सख्ती से पीछा करते हुए’ पाकिस्तान में स्थित ‘आतंकवादी शिविरों’ को ‘खत्म करना’ है. सचमुच? यह देखना दिलचस्प होगा कि हमारे टीवी के पर्दों पर दिखने वाले कितने आक्रामक रणनीतिक विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों के हित रक्षा और हथियार उद्योग में हैं. उन्हें तो युद्ध की जरूरत तक नही है. उन्हें एक युद्ध-जैसी स्थिति की जरूरत है, जिसमें फौजी खर्च का ग्राफ ऊपर चढ़ता रहे. सख्ती से पीछा करने का खयाल बेवकूफी भरा है और जितना लगता है उससे कहीं अधिक दयनीय है. वे किन पर बम गिराएंगे? कुछ व्यक्तियों पर? उनके बैरकों और भोजन की आपूर्ति पर? या उनकी विचारधारा पर? देखिए कि अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा ‘सख्ती से पीछा किया जाना’ किस अंजाम को पहुंचा है. और देखिए कि कैसे पांच लाख फौजियों का ‘सुरक्षा जाल’ कश्मीर की निहत्थी, नागरिक आबादी को काबू में नहीं कर पाया है. और भारत सरहद पार करके एक ऐसे देश पर बम गिराने जा रहा है जिसके पास परमाणु बम है और जो अव्यवस्था में धंसता जा रहा है. भारत में युद्ध चाहनेवाले पेशेवरों को पाकिस्तान के बिखराव को देख कर काफी तसल्ली मिलती है. जिसे भी इतिहास और भूगोल की थोड़ी बहुत, कामचलाऊ भी जानकारी होगी, वो जान सकता है कि पाकिस्तान का टूटना  (उन्मादी, नकारवादी, धार्मिक हिमायतियों के गैंगलैंड के रूप में बिखर जाना) किसी के लिए भी खुशी मनाने की वजह नहीं है.
अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी मौजूदगी और आतंक के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी मातहत के रूप में पाकिस्तान की भूमिका ने इस इलाके को सबसे ज्यादा खबरों में बने रहने वाला क्षेत्र बना दिया है. वहां जो खतरनाक चीजें हो रही हैं, कम से कम बाकी की दुनिया उनके बारे में जानती है. लेकिन उस खतरनाक तूफान के बारे में बहुत कम जाना-समझा जाता है और उससे भी कम पढ़ा जाता है, जो दुनिया की पसंदीदा नई महाशक्ति की दुनिया में तेजी अख्तियार कर रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से मुश्किलों में है. आर्थिक उदारीकरण ने नए-नए बने मध्य वर्ग में जो आक्रामक, लालची महत्वाकांक्षा पैदा की है वो तेजी से उतनी ही आक्रामक हताशा में बदल रही है. जिस हवाई जहाज में वे बैठे थे, वो उड़ान भरने के फौरन बाद बंद हो गया है. खुशी का दौरा आतंक में बदल रहा है.
आम चुनाव 2014 में होने वाले हैं. एक्जिट पोल के बिना भी मैं आपको बता सकती हूं कि नतीजे क्या रहेंगे. हालांकि हो सकता है कि यह खुली आंखों से न दिखे, हमारे पास एक बार फिर कांग्रेस-भाजपा गठबंधन होगा. (दोनों में से हरेक दल के दामन पर अल्पसंख्यक समुदायों के हजारों लोगों के जनसंहारों के दाग हैं.) सीपीआई (एम) बाहर से समर्थन देगी, हालांकि उससे यह मांगा नहीं जाएगा. ओह, और यह एक मजबूत राज्य होगा. (फांसी के मोर्चे पर, फंदे तैयार हैं. क्या अगली बारी पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के लिए फांसी का इंतजार कर रहे बलवंत सिंह रजोआना की होगी? उनकी फांसी पंजाब में खालिस्तानी भावनाओं को भड़का देगी और अकाली दल को फायदा पहुंचाएगी. यह कांग्रेसी राजनीति का वही पुराना तरीका है.)
लेकिन पुराने तरीके की वह राजनीति कुछ मुश्किलों में है. पिछले कुछ उथल-पुथल भरे महीनों में, केवल मुख्य राजनीतिक दलों की छवि को ही नहीं, बल्कि खुद राजनीति को, राजनीति के विचार को जैसा कि हम इसे जानते हैं, धक्का लगा है. फिर और फिर से, चाहे वो भ्रष्टाचार हो, कीमतों का बढ़ना हो या बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा हो, नया मध्य वर्ग बैरिकेडों पर है. उन पर पानी की बौछारें छोड़ी जा सकती हैं या लाठी चलाई जा सकती है, लेकिन गोली चला कर उनको हजारों की संख्या में मारा नहीं जा सकता, जिस तरह गरीबों को मारा जा सकता है, जिस तरह दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों, कश्मीरियों, नागाओं और मणिपुरियों को मारा जा सकता है - और मारा जाता रहा है. पुराने राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर पूरी तबाही नहीं लानी है, तो इस आक्रामकता को आगे बढ़ कर खत्म करना है, इसकी दिशा बदलनी है. वे जानते हैं कि राजनीति पहले जो हुआ करती थी, उसे वापस वही बनाने के लिए उनका मिल कर काम करना जरूरी है. तब एक सांप्रदायिक आग से बेहतर रास्ता क्या हो सकता है? (वरना और किस तरीके से एक धर्मनिरपेक्ष एक धर्मनिरपेक्ष बना रह सकता है और एक सांप्रदायिक एक सांप्रदायिक?) मुमकिन है कि एक छोटा सा युद्ध भी हो, ताकि हम फिर से नूराकुश्ती का खेल खेल सकें.
तब उस आजमाए हुए और भरोसेमंद पुराने राजनीतिक फुटबाल कश्मीर को उछालने से बेहतर समाधान और क्या हो सकता है? अफजल गुरु की फांसी, इसकी बेशर्मी और इसका वक्त, दोनों जानबूझ कर चुने गए हैं. इसने कश्मीर की सड़कों पर राजनीति और गुस्से को ला दिया है.
भारत इनको हमेशा की तरह क्रूर ताकत और जहरबुझी, मैकियावेलियाई चालबाजियों के साथ इसे काबू में कर लेने की उम्मीद करता है, जिन्हें लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने के लिए बनाया गया है. कश्मीर में युद्ध को दुनिया के सामने एक सबको समेटने वाले, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और उग्र इस्लामवादियों के बीच लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है. तब हमें इस तथ्य का क्या करना चाहिए कि कश्मीर के तथाकथित ग्रांड मुफ्ती (जो एक पूरा कठपुतली पद है) मुफ्ती बशीरुद्दीन असल में एक सरकार द्वारा नियुक्त मुफ्ती हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा नफरत से भरे हुए भाषण दिए और एक के बाद एक फतवे जारी किए और जो मौजूदा कश्मीर को एक डरावना, अखंड वहाबी समाज बनाने का इरादा रखते हैं? फेसबुक के बच्चे गिरफ्तार किए जा सकते हैं, लेकिन वे कभी नहीं. हम इस तथ्य का क्या करें कि जब सऊदी अरब (अमेरिका का मजबूत दोस्त) कश्मीरी मदरसों में पैसे झोंकता है तो भारत सरकार दूसरी तरफ देख रही होती है? सीआईए ने अफगानिस्तान में उन सारे वर्षों में जो किया, यह उससे अलग कैसे है? उन करतूतों ने ही ओसामा बिन लादेन, अल कायदा और तालिबान को जन्म दिया. उन करतूतों ने ही अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया. अब यह किस तरह के बुरे सपनों को जगाएगा?
समस्या यह है कि हो सकता है कि अब पुराने राजनीतिक फुटबॉल को काबू में करना पूरी तरह आसान नहीं रहे. और यह रेडियोएक्टिव भी है. हो सकता है कि यह महज एक इत्तेफाक न हो कि कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान ने ‘सामने आते परदृश्य’ से पैदा होने वाले खतरों के खिलाफ अपनी रक्षा की खातिर छोटी दूरी का जमीन से जमीन पर वार कर सकने वाले परमाणु मिसाइल का परीक्षण किया है. दो हफ्तों पहले, कश्मीर पुलिस ने परमाणु युद्ध में ‘बचाव की तरकीबें’ प्रकाशित की हैं. इसमें शौचालय-युक्त बमरोधी बेसमेंट बनाने के साथ साथ, जो इतना बड़ा हो कि पूरा परिवार इसके भीतर दो हफ्तों तक रह सके, कहा गया है: ‘एक परमाणु हमले के दौरान, गाड़ीचालकों को जल्दी ही पलट जाने वाली अपनी गाड़ियों के नीचे कुचलने से बचने के लिए उनसे निकल कर धमाके की तरफ छलांग लगानी चाहिए.’ और ‘उन्हें शुरुआती मतिभ्रम के लिए तैयार रहना चाहिए, जब धमाके की तरंगें गिरेंगी और अनेक महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताओं को हटा देंगी.’
मुमकिन है कि महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताएं पहले से ही गिर चुकी हों. शायद हम सबको अपनी जल्दी ही पलट जाने वाली गाड़ियों से कूद जाना चाहिए.

(अनुवादकीय नोट: नीचे से पांचवें पैराग्राफ की आखिरी पंक्ति में जहां ‘नूराकुश्ती’ का इस्तेमाल किया गया है, वहां अरुंधति ने Hawks & Doves का इस्तेमाल किया है. ये एक अंग्रेजी कॉमिक्स के अपराध से लड़ने वाले सुपरहीरो हैं. हालांकि इन दोनों का चरित्र अलग-अलग है, हॉक गरममिजाज और सख्त है तो डोव नरममिजाज है, लेकिन अपराध से दोनों मिल कर लड़ते हैं. यहां इनको क्रमश: भाजपा और कांग्रेस के साथ जोड़ कर दिखाया गया है. हिंदी में ऐसे पात्रों का अभी ध्यान नहीं आने की वजह से इसे 'नूराकुश्ती' में समेटने की कोशिश की गई है, फिर भी इसे इस टिप्पणी के साथ ही पढ़ा जाए.)

13 फ़रवरी 2013

उसने 'सत्‍यमेव जयते' कहा, और उसका परिवार बच गया!

अफज़ल गुरु को हुई फांसी के बाद अब तक उठी तमाम बहसों में उसके द्वारा अपने वकील सुशील कुमार को लिखी गई चिट्ठी का जि़क्र बार-बार आया है। यह चिट्ठी अब एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है, क्‍योंकि इसमें एक आत्‍मसमर्पित आतंकवादी समूची राज्‍य व्‍यवस्‍था पर कुछ सवाल खड़े करता है, उसके काम करने के तरीकों को उजागर करता है और आखिरकार यह स्‍वीकार करता है कि उसकी नियति दरअसल अपने परिवार को बचाने की उसकी सदिच्‍छा का परिणाम थी। यह चिट्ठी अक्‍टूबर 2006 में दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा रखी गई एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सार्वजनिक की गई थी जिसके आधार पर मैंने साप्‍ताहिक पत्रिका 'सहारा समय' के आखिरी अंक (8 अक्‍टूबर 2006) में एक स्‍टोरी भी की थी। अफज़ल के मामले पर खर्च किए गए लाखों शब्‍दों पर यह इकलौती चिट्ठी भारी पड़ती है। विडंबना यह है कि अक्‍टूबर 2006 से लेकर अब फांसी दिए जाने के बीच सात साल के दौरान हालांकि यह चिट्ठी मीडिया में तकरीबन दबी ही रही, आज भले इसकी चर्चा हो रही हो लेकिन उसका शायद कोई मोल नहीं है। साथ में उस वक्‍त की कुछ तस्‍वीरें भी हैं। (अभिषेक श्रीवास्‍तव)

[जनपथ से इंट्रो सहित साभार]
अंग्रेज़ी में यह पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


  
माननीय श्री सुशील कुमार,
नमस्कार

मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं और अहसानमंद महसूस करता हूं कि आपने मेरे मुकदमे को अपने हाथ में लेकर मेरा बचाव करने का फैसला लिया। इस मुकदमे की शुरुआत से ही मेरी उपेक्षा की गई है और कभी भी मुझे मीडिया या न्यायालय के समक्ष सचाई उजागर करने का मौका नहीं दिया गया। तीन अर्जियों के बावजूद अदालत ने मुझे वकील मुहैया नहीं करवाया। उच्च न्यायालय में एक मानवाधिकार अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अफज़ल की इच्छा फांसी से लटकने की बजाय नशीला इंजेक्शन लेने की है। यह बात सरासर गलत है। मैंने अपने वकील को कभी ऐसा कुछ नहीं बताया था। चूंकि वह वकील मेरे या मेरे परिवार का चुनाव नहीं था, बल्कि मेरी असहायता और एक उपयुक्त वकील तक पहुंच न हो पाने का नतीजा था। उच्च सुरक्षा वाली जेल में कैद किए जाने और उस मानवाधिकार अधिवक्ता से कोई संवाद न होने की स्थिति में मैं उसे बदल नहीं सका या उच्च न्यायालय के सामने अपनी मृत्यु इच्छा संबंधी आपत्तियों को दर्ज नहीं करा सका चूंकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही यह बात मुझे पता चली।

संसद पर हमले वाले मामले में मुझे कश्मीर की स्पेशल टास्क फोर्स ने गिरफ्तार किया था। यहां दिल्ली में निर्धारित न्यायालय ने विशेष पुलिस के उस बयान के आधार पर मुझे फांसी की सजा सुनाई जो एसटीएफ के साथ मिलकर काम करती है और जिस पर मीडिया का खासा प्रभाव था जिसके समक्ष मुझे विशेष पुलिस एसीपी राजबीर सिंह के दबाव और खौफ के चलते अपराध कबूल करवाया गया। इस खौफ और दबाव की पुष्टि न्यायालय के समक्ष 'आज तक' के साक्षात्कर्ता शम्स ताहिर ने भी की।

जब मुझे श्रीनगर बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया तो मुझे एसटीएफ के मुख्यालय ले जाया गया। यहां से एसटीएफ और विशेष पुलिस मुझे दिल्ली ले आई। श्रीनगर के पारमपोरा पुलिस स्टेशन पर मुझसे मेरी सभी चीजें छीन ली गईं, मेरी पिटाई की गई और मुझे धमकी दी गई कि यदि मैंने किसी के भी सामने सचाई बयान की तो मेरी पत्नी और परिवार के लिए नतीजे बुरे होंगे। यहां तक कि मेरे छोटे भाई हिलाल अहमद गुरु को भी बगैर किसी वारंट इत्यादि के गिरफ्तार कर लिया गया और 2-3 महीनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया। यह बात सबसे पहले मुझे राजबीर सिंह ने बताई थी। विशेष पुलिस ने मुझसे कहा कि यदि मैं उनके मुताबिक बयान देता हूं तो मेरे परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और यह झूठा आश्वासन भी दिया कि वे मेरे मुकदमे को कमजोर कर देंगे जिससे कुछ दिनों बाद मैं रिहा हो जाऊंगा।

अफ़ज़ल का बेटा
मेरी प्राथमिकता मेरे परिवार को सुरक्षित रखने की थी क्योंकि पिछले सात साल से मैं देख रहा हूं कि किस तरह एसटीएफ के लोग कश्मीरियों की हत्या कर रहे हैं, उन्होंने युवाओं को गायब किया है और उसके बाद पुलिस हिरासत में उन्हें मार डाला है। इन तमाम प्रताड़नाओं और हिरासत में मौतों का मैं एक जीता-जागता प्रत्यक्षदर्शी हूं और खुद एसटीएफ के खौफ और प्रताड़ना का शिकार हूं। चूंकि, मैं पहले जेकेएलएफ का आतंकवादी था और मैंने आत्मसमर्पण कर दिया था, मुझे विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों जैसे सेना, बीएसएफ और एसटीएफ ने मिलकर उत्पीड़ित, प्रताड़ित और खौफज़दा किया है। लेकिन, चूंकि एसटीएफ असंगठित बल है और राज्य सरकार द्वारा संरक्षित लुटेरों का एक गुट है, वे कश्मीर के किसी भी घर और किसी भी परिवार में किसी भी वक्त घुस जाते हैं। अगर एसटीएफ ने किसी को भी उठा लिया और उसके परिवार को इसकी जानकारी मिल जाती है, तो फिर परिजन सिर्फ लाश की ही उम्मीद रखते हैं और उसका इंतजार करते हैं। लेकिन अमूमन वे यह कभी नहीं जान पाते कि अपहृत व्यक्ति का ठिकाना क्या है। छह हजार जवान लड़के इस तरीके से गायब हो चुके हैं।

इन्हीं परिस्थितियों और भयपूर्ण वातावरण में मेरे जैसे लोग एसटीएफ के हाथों कोई भी गंदा खेल खेलने को तैयार हो जाते हैं जिससे कम से कम जान बची रहे। जो लोग पैसे खिलाने की क्षमता रखते हैं, उन्हें मेरी तरह बुरे काम करने को मजबूर नहीं किया जाता चूंकि मैं पैसे देने में अक्षम रहा था। यहां तक कि पारमपोरा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी अकबर ने तो मुझसे 5 हजार रुपए फिरौती की मांग की थी। यह बात संसद पर हमले से बहुत पहले की है। उसने मुझे धमकी दी थी कि फिरौती की रकम न मिलने पर वह मुझे नकली दवाएं और चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लेगा। मैं 2000 में सोपोर में इनका व्यापार करता था। वह भी यहां निर्धारित न्यायालय के समक्ष पेश हुआ था और उसने मेरे खिलाफ बयान दिया था। संसद पर हमले से बहुत पहले से वह मुझे जानता था। अदालत के कक्ष में उसने मुझे कश्मीरी में बताया कि मेरा परिवार सही सलामत है। दरअसल, यह एक छुपी हुई धमकी थी जिसे अदालत समझ नहीं पाई थी, नहीं तो मैंने जरूर अदालत के समक्ष उससे सवाल पूछा होता जब उसने अपना बयान दर्ज कराते वक्त यह बात मुझे बताई थी। पूरे मुकदमे के दौरान मैं मूक और असहाय दर्शक बना रहा जबकि सभी गवाह, पुलिस और यहां तक कि जज भी मिलकर मेरे खिलाफ एक हो गए थे। मैं अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित और असमंजस में रहा। अब मैंने अपने परिवार को बचा लिया है, भले ही यह झूठ बोलने के लिए मुझे मौत दी जा रही है तो क्या!

1997-98 में मैंने दवाइयों और चिकित्सीय उपकरणों का एक व्यापार कमीशन के आधार पर चालू किया, चूंकि एक आत्मसमर्पित आतंकवादी होने के नाते मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। आत्मसमर्पित आतंकवादियों को नौकरियां नहीं मिलतीं। उन्हें या तो एसटीएफ के साथ विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के तौर पर काम करना होता है या सुरक्षा बलों और पुलिस के संरक्षण में लुटेरों की मंडली में शामिल होना होता है। रोज ही ये विशेष पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के हाथों मारे जाते थे। ऐसी स्थिति में मैंने अपना कमीशन आधारित व्यापार शुरू किया जिससे महीने में 4-5 हजार की कमाई हो जाती थी। चूंकि, एसपीओ अक्सर उन आत्मसमर्पित आतंकवादियों को प्रताड़ित करते हैं जो एसटीएफ के साथ काम नहीं करते, लिहाजा 1998 से 2000 के बीच मुझे अमूमन 300 से 500 रुपए स्थानीय एसपीओ को देने पड़ते जिससे मैं अपना काम-धंधा जारी रख सकता था। नहीं तो ये एसपीओ मुझे सुरक्षा एजेंसियों के सामने ले जाते। एक एसपीओ ने तो मुझे एक दिन बताया भी था कि उसे अपने अधिकारियों को पैसे देने पड़ते हैं। मैंने मेहनत से काम किया और मेरा व्यापार चमक गया। एक दिन सुबह 10 बजे मैं दो महीने पहले ही अपने नए खरीदे स्कूटर से जा रहा था। मुझे एसटीएफ के लोगों ने घेर लिया और एक बुलेटप्रूफ जिप्सी में पलहल्लन शिविर ले गए। वहां डीएसपी विनय गुप्ता ने मुझे प्रताड़ित किया, बिजली के झटके दिए, ठंडे पानी में डाला, पेट्रोल और मिर्च का इस्तेमाल भी किया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास हथियार हैं। शाम को उनके एक इंस्पेक्टर फारुक ने मुझे कहा कि यदि मैं उन्हें 10 लाख रुपए दे देता हूं तो मुझे छोड़ दिया जाएगा अन्यथा वे मुझे जान से मार देंगे। इसके बाद वे मुझे हमहामा एसटीएफ शिविर में ले गए जहां डीएसपी दरविंदर सिंह ने भी मुझे प्रताड़ित किया। उन्हीं के एक इंस्पेक्टर शैंटी सिंह ने नंगा करके मुझे तीन घंटों तक मुझे बिजली के झटके दिए और उसी दौरान जबर्दस्ती पानी भी पिलाया।

अफज़ल गुरु की पत्नी
आखिरकार मैं उन्हें दस लाख रुपए देने को तैयार हो गया जिसके लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के गहने बेचने पड़े। इसके बावजूद केवल 80 हजार का ही इंतजाम हो पाया। इसके बाद वे मेरा स्कूटर ले गए जो मैंने 2-3 महीने पहले ही 24 हजार रुपए में खरीदा था। एक लाख रुपए पाने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा लेकिन अब मैं पूरी तरह टूट चुका था। उसी हमहामा एसटीएफ शिविर में तारिक नाम का एक और शिकार था उसने मुझे सलाह दी थी कि मैं हमेशा एसटीएफ का सहयोग करूं, नहीं तो वे मुझे प्रताड़ित करेंगे और सामान्य जिंदगी नहीं जीने देंगे। यह मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। मैंने वैसे ही जीने का फैसला कर लिया जैसे मुझे तारिक ने बताया था। 1990 से 1996 तक मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और विभिन्न कोचिंग सेन्टरों और घरों पर जाकर ट्यूशन पढ़ाता था। यह जानकारी बड़गाम के एसएसपी अशफ़ाक हुसैन के साले अल्ताफ़ हुसैन को थी, चूंकि इसी ने मेरे परिवार और हमहामा के डीएसपी दरविंदर सिंह के बीच दलाल की भूमिका निभाई थी। अल्ताफ़ ने मुझे कहा कि मैं उसके दो बच्चों को पढ़ाऊं चूंकि आतंकवादियों के खौफ़ की वजह से वे ट्यूशन पढ़ने नहीं जा पाते। इनमें एक दसवीं में था, दूसरा बारहवीं में। इस तरह अल्ताफ से मेरी नजदीकियां बढ़ीं। एक दिन अल्ताफ मुझे डीएसपी दरविंदर सिंह के पास ले गया और बताया कि मुझे उनके लिए एक छोटा सा काम करना पड़ेगा।

काम यह था कि एक आदमी को दिल्ली ले जाना था और उसे वहां एक किराए का घर दिलवाना था, चूंकि मैं दिल्ली को बेहतर तरीके से जानता था। मैं उस व्यक्ति को नहीं जानता था, लेकिन मुझे संदेह था कि वह कश्मीरी नहीं है क्योंकि वह कश्मीरी नहीं बोलता था। लेकिन मैं असहाय था और मुझे दरविंदर का काम करना ही था। मैं उसे दिल्ली ले गया। एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह एक कार खरीदना चाहता है। मैं उसे करोलबाग लेकर गया। उसने कार खरीदी। दिल्ली में वह तमाम लोगों से मिलता था और हम दोनों को दरविंदर सिंह के फोन कॉल आते रहते थे। एक दिन मोहम्मद ने मुझे बताया कि अगर मैं कश्मीर जाना चाहूं तो जा सकता हूं। उसने मुझे पैंतीस हजार रुपए भी दिए और कहा कि यह मेरे लिए एक उपहार है।

छह या आठ दिन पहले मैंने इंदिरा विहार में अपने परिवार के लिए एक किराए का कमरा ले लिया था। चूंकि मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब दिल्ली में ही रहूंगा क्योंकि मैं अपने इस जीवन से संतुष्ट नहीं था। मैंने किराए के मकान की चाबियां अपनी मकान मालकिन को थमा दीं और उसे बताया कि मैं ईद के बाद 14 दिसंबर को लौटूंगा क्योंकि संसद पर हमले के बाद वहां काफी तनाव था। मैंने श्रीनगर में तारिक से संपर्क किया। शाम को उसने मुझसे पूछा कि मैं कब वापस आया। मैंने बताया कि मुझे आए हुए सिर्फ एक घंटा हुआ है। अगली सुबह जब मैं सोपोर जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था, श्रीनगर पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गई। तारिक वहां एसटीएफ के साथ मौजूद था। उन्होंने मेरी जेब से 35000 रुपए निकाल लिए, मेरी पिटाई की और सीधे मुझे एसटीएफ मुख्यालय ले गए। वहां से मुझे दिल्ली लाया गया। मेरी आंखों को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यहां मैंने खुद को विशेष पुलिस के उत्पीड़न कक्ष में पाया।

...और उसने अपना परिवार बचा लिया : अफज़ल के परिजन और अधिवक्ता एनडी पंचोली (सबसे दाएं)
 विशेष सेल की हिरासत में मैंने उन्हें मोहम्मद इत्यादि के बारे में सब कुछ बताया लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि मैं, शौकत, उसकी पत्नी नवजोत (अफशां) और गिलानी ही संसद पर हमले के पीछे हैं। उन्होंने मेरे परिवार को लेकर मुझे धमकाया और उनमें से एक इंस्पेक्टर ने बताया कि मेरा छोटा भाई हिलाल अहमद गुरु भी एसटीएफ की हिरासत में हैं और यदि मैंने उनका सहयोग नहीं किया तो वे मेरे दूसरे परिजनों को भी उठवा लेंगे। इसके बाद उन्होंने मेरे ऊपर दबाव डाला कि मैं शौकत, उसकी पत्नी और गिलानी को दोषी ठहराऊं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उन्हें बताया कि यह असंभव है। फिर उन्होंने मुझे कहा कि मुझे गिलानी के निर्दोष होने के बारे में चुप रहना है। कुछ दिनों बाद मुझे मीडिया के सामने पेश किया गया। वहां एनडीटीवी, आज तक, जी न्यूज, सहारा टीवी आदि थे। एसीपी राजबीर सिंह भी वहां थे। जब एक साक्षात्कर्ता ने मुझे बताया कि संसद पर हमले में गिलानी की क्या भूमिका है, तो मैंने भी ऐसे ही कह दिया कि गिलानी निर्दोष हैं, ठीक इसी वक्त एसीपी राजबीर सिंह अपनी घूमती हुई कुर्सी से उठे, मेरे ऊपर चिल्लाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे पहले ही हिदायत दी गई थी कि मीडिया के सामने गिलानी के बारे में कुछ नहीं बोलना है। राजबीर के व्यवहार ने मेरी असहायता को प्रदर्शित कर दिया और कम से कम मीडिया के लोग यह जान गए कि अफजल जो भी बयान दे रहा है वह दबाव और खौफ में दे रहा है। इसके बाद राजबीर सिंह ने टीवी के लोगों से अनुरोध किया कि गिलानी वाला सवाल दिखाया न जाए।

शाम के वक्त राजबीर सिंह ने मुझसे पूछा कि क्या मैं परिवार से बात करना चाहता हूं। मैंने हां में जवाब दिया। फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। फोन करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि यदि मैं अपनी पत्नी और परिवार को जिंदा देखना चाहता हूं तो हर कदम पर उनका सहयोग करूं। वे मुझे दिल्ली में तमाम जगहों पर ले गए। वहां उन्होंने मुझे वे जगह दिखाईं जहां से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। वे मुझे कश्मीर ले गए और हम वहां से बगैर कुछ किए वापस आ गए। उन्होंने मुझसे कम से कम 200-300 कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए।

मुझे निर्धारित कोर्ट में अपनी कहानी सुनाने का मौका ही नहीं दिया गया। जज ने मुझे बताया कि मुकदमे के अंत में मुझे बोलने का पूरा मौका दिया जाएगा, लेकिन आखिरकार न तो उन्होंने मेरे बयानों को दर्ज किया और न ही अदालत ने दर्ज किए गए बयान मुझे मुहैया कराए। यदि ध्यान से रिकॉर्ड किए गए फोन नंबरों को देखा जाता तो अदालत यह जान जाती कि वे एसटीएफ के फोन नंबर थे।

अब मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय मेरी असहाय स्थिति और उस सचाई को समझ सकेगा जिससे मैं गुजरा हूं। एसटीएफ ने अपने और कुछ अन्य अज्ञात लोगों द्वारा निर्मित और निर्देशित इस आपराधिक गतिविधि में मुझे बलि का बकरा बना दिया। इस पूरे खेल में विशेष पुलिस निश्चित तौर पर एक हिस्सा है चूंकि हर वक्त उन्होंने मेरे ऊपर चुप रहने का दबाव डाला। मुझे भरोसा है कि मेरी इस चुप्पी को सुना जाएगा और मुझे न्याय मिलेगा।

मैं एक बार फिर आपको दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने मेरा बचाव किया।

सत्यमेव जयते।

मोहम्मद अफज़ल
पुत्र हबीबुल्ला गुरु
वार्ड न. 6 (उच्च सुरक्षा वार्ड)
जेल न. 1, तिहाड़
नई दिल्ली-110064


12 फ़रवरी 2013

‘हिन्दू फांसी’

 अनिल चमड़िया

13 दिसंबर 2001 को संसद भवन परिसर में हमले के आरोप में अफजल गुरू को फांसी की सजा को न्यायिक मापदंड और शर्तो की कसौटी पर देखें तो वह घटनाओं के सिलसिलेवार अध्ययन के बाद ‘राजनीतिक’ फैसला दिखता है. अफजल पहले पुलिस के लिए भी काम करता था. वह संसद भवन के परिसर में घुसे पांच हथियारबंदों के साथ नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने जब निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को बहाल रखा तो सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं. उसे समाज की मनस्थिति को संतुष्ट करने के लिए फांसी की सजा को बहाल रखने पर जोर दिया. फांसी देने तक का घटनाक्रम भी ऐसा ही है. जैसे सबकुछ अचानक हुआ. उनके परिवार के सदस्यों तक को उसकी जानकारी नहीं दी गई. सरकार ने कहा कि कश्मीर घाटी के सोपोर में रहने वाले परिवार को स्पीड पोस्ट के जरिये ये सूचना भेजी गई थी कि फांसी की सजा को माफ किए जाने की उनकी अपील रद्द कर दी गई है. अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने के बाद उसके शव को वही दफना दिया गया. पिछले बीसेक वर्षों में पूरी दुनिया में ताकतवर और ताकतवर बनने की चाह पैदा करने वाले शासकों में आक्रमकता इस रूप में बढ़ी है कि मारो भी और दफना दो. यह आक्रमकता अपने फैसले में न्यूनतम मानव अधिकार की भी जगह को स्वीकार नहीं करती है. पूरी दुनिया में फांसी की सजा को खत्म करने के आंदोलन चल रहे हैं. इसका एक कारण तो यह है कि सत्ता का काम नागरिकों की सुरक्षा और उनके जीवन की बेहतरी के लिए होती है. दूसरा कारण यह भी है कि फांसी की सजा को पाने वाले समाज के कमजोर वर्गों के सदस्य ही होते हैं. भारत में तो इक्की दुक्की घटनाओं को छोड़ दें तो फांसी की सजा समाज की कमजोर वर्गों के सदस्यों को ही अब तक दी गई है और दूसरी तरफ फांसी की सजा से माफी पाने वाले लोग समाज के प्रभावशाली लोगों में रहे हैं. क्या अफजल गुरू को फांसी से माफी के सारे कानून सम्मत रास्ते बंद हो चुके थे? ऐसा नहीं है. दरअसल अफजल को फांसी देने का फैसला राजनीतिक स्तर पर लिया जा चुका था, लिहाजा माफी के लिए समय और सूचना से ही महरूम कर दिया गया.

 अफजल गुरू को फांसी तब दी गई जब कश्मीर के मकबूल भट्ट को 1984 में दी गई फांसी की बरसी अगले दिन थी. मकबूल भट्ट को फांसी की सजा के बाद कश्मीर घाटी में इस कदर की बेचैनी विकसित हुई कि आज तक वह वहां से नहीं उबर पाई. कश्मीर घाटी का संसदीय राजनीति की दृष्टि से कोई महत्व नहीं है. यानी वहां के मतदाताओं का रूख, केन्द्र की सरकार के बनने-बिगड़ने में कोई महत्व नहीं रखता है. संसदीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण वह है जो सत्ता के बनने बिगड़ने में अपनी दखल रखता है. लेकिन कश्मीर घाटी देश के मतदाताओं के बीच ससंदीय राजनीति के लिए खुराक रहा है. वह साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी साम्प्रदायिकता का व्यवहारिक स्तर पर सबसे ज्यादा काम आता रहा है. पिछले साठ वर्षों में कश्मीर घाटी और वहां की बहुसंख्यक आबादी पर आधारित राजनीति का खासतौर से उत्तर भारत की संसदीय राजनीति में लगातार विस्तार हुआ है. अब तो कश्मीर घाटी और वहां की बहुसंख्यक आबादी की कीमत पर हर पार्टी संसदीय राजनीति में कश्मीर से बाहर के मतदाताओं को जीतने के लिए होड़ में खड़ी है. 

सभी छोटे राज्यों के प्रति लगभग ऐसा ही दृष्टिकोण है. इसे समझने के लिए केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम का अफजल को फांसी के दो दिन पहले इस बयान को भी देखा जा सकता है. उन्होंने बताया कि सुरक्षा बलों को दिए गए विशेषाधिकार के कानून को इसीलिए वापस नहीं लिया जा सकता है क्योंकि सेना उसके विरोध है. संसद के लिए चुनाव का चरित्र अब कुंभ जैसा हो गया है. 1989 में कांग्रेस की कमान जब राजीव गांधी के हाथों में थी तब उन्होंने हिन्दू संदेश के साथ अयोध्या से अपना चुनाव प्रचार जारी किया था. अब राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस आ गई है तब यह प्रचार कश्मीर से शुरू हो रहा है लेकिन वह भी हिन्दू संदेश के साथ और आक्रमकता की एक सत्ता शैली की साथ. पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में मंडल आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार आरक्षण के फैसले के बाद हिन्दूत्व की राजनीति में एक विभाजक रेखा के खीचे जाने का आकलन किया गया था लेकिन हिन्दूत्ववादी राजनीति ने पिछड़ों को उसमें समाहित करने का कार्यक्रम बनाकर संसदीय चुनाव की धूरी पर खुद खड़ा कर लिया है. गुजरात में विधानसभा की जीत के बाद हिन्दूत्ववादी राजनीति का नेतृत्व करने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके चुनावी संगठन भारतीय जनता पार्टी ने हिन्दूत्ववाद को संसद के चुनाव में एक बार फिर उतारने का मन बना लिया है. कांग्रेस में शुरू से ही हिन्दूत्ववादी राजनीति की तरफ झुकाव रखने वाला एक ताकतवर पक्ष रहा है. संघ और उसकी पार्टी भाजपा के मजबूत होने के साथ कांग्रेस के भीतर वह पक्ष भी लगातार और ताकतवर हुआ है. गुजरात में हारे जाने के बाद और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के अगले प्रधानमंत्री बनने की योजना के साथ ही कांग्रेस में राहुल गांधी के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह हिन्दूत्ववाद की प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रह जाए. वैसे भी गैर भाजपा की पार्टियां शायद यह समझ रखती हैं कि मुस्लिम मतदाताओं के सामने उन्हें चुनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता है. हिन्दूओं के धार्मिक आयोजन कुंभ में भाजपा द्वारा अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए समर्थन की मांग से कांग्रेस में बेचैनी और बढ़ी है. देखा जाए तो कांग्रेस ने हर स्तर पर भाजपा से खुद को कमजोर नही दिखने का पूरा प्रयास किया है. भ्रष्टाचार, महंगाई, घोटाले के मामलों में उसने खुद के कटघरे के साथ अपने बगल में भाजपा के लिए भी कटघरा बनाया तो आर्थिक नीतियों को लागू करने के स्तर पर कांग्रेस ने भाजपा को कमजोर साबित किया है.

हिन्दूत्ववाद एक ऐसा मसला है, जिसे कांग्रेस किसी दूसरी भाषा में संबोधित कर सकती है. उसे धर्म निरपेक्ष भी दिखने का प्रयास करना है. खुद को घर्मनिरपेक्षवादी कहने वाले विचार राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के जरिये साम्प्रदायिकता की राजनीति की जरूरत को साधते हैं. अफजल की फांसी को लेकर भाजपा अपने कार्यकर्ताओं में गति पैदा करती रही है. कांग्रेस का यह अनुमान है कि अफजल को फांसी देकर कश्मीर के बाहर फैले हिन्दू मतदाताओं को संबोधित किया जा सकता है. वास्तव में अफजल को हिन्दू फांसी हुई है. संसदीय चुनाव के लिए सेना और साम्प्रदायिकता के आगे राजनीतिक सत्ता के समर्पण ने देश को एक गहरे संकट में खड़ा कर दिया है. इस स्थिति में कानून और उसकी व्यवस्था नागरिकों के लिए नहीं रह जाती है. विरोध के सारे अवसर खत्म हो जाते हैं, जैसा कि अफजल गुरू की फांसी की सजा के बाद विरोध करने वालों के साथ सरकारी मशीनरी और साम्प्रदायिक संगठनों की संयुक्त कार्रवाई देखी गई हैं. बचपन में हम फिल्मों में देखा करते थे कि न्यायाधीश फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद अपने कलम की नीब को तोड़ देता था. अब सड़कों पर फांसी दिए जाने के बाद लोगों की शक्ल में राजनीति और विचारों को मिठाईयां बांटते और पटाखे छोड़ते हिन्दूत्ववादी खुशियां देखते हैं. 

लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और शोध पत्रिका ‘जन मीडिया’ के संपादक हैं .साभार-रविवार.कॉम.