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24 अगस्त 2010

एक पितृसत्तात्मक पटकथा

नया ज्ञानोदय में छपे विभूति के इंटरव्यू के बाद काफी कुछ हुआ है, कहा गया है, लिखा गया है. लेकिन साथ में, काफी कुछ नहीं भी कहा गया है, काफी कुछ नहीं भी लिखा गया है और जो होना चाहिए वह अब तक नहीं हुआ है. यह महज गलत शब्दों का चयन या बदजुबानी नहीं है, जैसा कि इसे कई बार साबित करने की कोशिश की गई है. साथ ही यह सिर्फ बिक जाने की मानसिकता भी नहीं है. इसकी गहरी वजहें हैं. यह टिप्पणी बाजार, इस व्यवस्था के पितृसत्तात्मक आधारों, सामंतवाद के साथ उपनिवेशवाद की संगत और महिलाओं के साथ-साथ समाज के सभी उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति के संघर्षों से कट कर जी रहे और साथ में कुछ हद तक सुविधाभोगी हुए एक तबके के हितों के आपस में गठजोड़ का एक (एकमात्र नहीं, सिर्फ एक) उदाहरण भर है. इसलिए हैरत नहीं कि दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के पक्ष में हो रहे लेखन की मलामत करते हुए इसी ज्ञानोदय में कुछ समय पहले लिखे गए संपादकीय पर किसी का ध्यान नहीं गया था. कितना गहरा रिश्ता है आपस में इन सबका. एक व्यवस्था आदिवासियों को विस्थापित करती है, उनके संघर्षों को कुचलने के लिए सेना उतारती है. उसका एक तबका दलितों पर लगातार अत्याचार करता है. उसका एक दूसरा तबका महिलाओं को अपनी विजय के तमगे के रूप में इस्तेमाल करता है और एक संपादक (जिसके पीछे लेखकों और दूसरे बुद्धिजीवियों की एक बड़ी जमात है) उन सबके समर्थन में लिखे जा रहे को हिकारत से खारिज कर देता है. विभूति प्रसंग में हम हाशिया पर ईपीडब्ल्यू के ताजा संपादकीय का अनिल द्वारा किया गया अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं.
हिंदी में महिला लेखकों के प्रति संरक्षणवादी और मर्दवादी यौन नजरिए को साहित्यिक आलोचना के रूप में प्रचलित करने की कोशिश हो रही है।
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (मगांअंहिंवि) के कुलपति विभूति नारायण राय ने महिला हिंदी उपन्यासकारों पर दिए गए अपने घृणित बयान के लिए खेद व्यक्त करते हुए माफ़ी मांग ली है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के भूतपूर्व अधिकारी रहे राय ने नया ज्ञानोदय पत्रिका (भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित) को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था कि पिछले कुछ वर्षों से नारीवादी विमर्श मुख्यतः देह तक केंद्रित हो गया है और कई लेखिकाओं में यह प्रमाणित करने की होड़ लगी है उनमें से कौन सबसे बड़ी छिनाल (व्यभिचारी महिला, वेश्या) हैं। एक मशहूर हिंदी लेखिका की आत्मकथा का हवाला देते हुए, राय ने अतुलनीय ढंग से कहा कि अति-प्रचारित लेखन को असल में कितनी बिस्तरों में कितनी बार का दर्ज़ा दे देना चाहिए।
यह एक बहसतलब बिंदु है कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल सहित कई हल्कों में अपनी टिप्पणी की व्यापक निंदा के चलते राय ने माफ़ी मांगी है। अपने बचाव में वे जो पहले कह रहे थे उससे स्पष्ट है कि माफ़ीनामा उनके वक्तव्य पर आई प्रतिक्रियाओं के चलते, निश्चित तौर पर दबाव में, (ख़ासतौर से, मानव संसाधन विकास मंत्री के, जिनके क्षेत्राधिकार में यह विश्वविद्यालय है) जबरन दिया गया है न कि आत्मनिरीक्षण के बाद और नज़रिए में एक वास्तविक बदलाव की बदौलत। कुलपति ने शुरू में कहा कि महान हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद ने कई बार छिनाल शब्द का इस्तेमाल किया है, कि उनका (राय का) मतलब वास्तव में यह है कि महिलाओं के अन्य मुद्दे नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं और कि बतौर लेखक उन्हें इन मुद्दों पर टिप्पणी करने की आज़ादी है।
हालांकि यह किसी एक व्यक्ति, चाहे वह जिस किसी भी पद में आसीन हो, की टिप्पणी मात्र से संबंधित एक मुद्दा नहीं है। यहां एक वृहद और ज़्यादा परेशान करने वाले मुद्दे– साहित्यिक दुनिया में लैंगिक क्षुद्रताओं और दुराग्रह का है। हिंदी की पहुंच और हिंदी साहित्य का बाज़ार विशाल है और कई भारतीय भाषाओं के मुक़ाबले इसके प्रकाशन और विक्रय का नेटवर्क विस्तृत और विकसित है। महिला लेखकों में महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मृणाल पाण्डेय, शिवानी, मन्नू भंडारी, अलका सरावगी और मैत्रेयी पुष्पा समेत कई अन्य के योगदान बहुत प्रशंसनीय हैं। इन लेखिकाओं को निश्चित तौर पर न तो उनकी लेखन शैली और न ही विषय-वस्तु के लिहाज़ से एक दूसरे के खांचे में बिठाया जा सकता। लेकिन जैसा कि अन्य महिला लेखिकाओं के साथ है, हिंदी में महिला साहित्य एक ख़ास ज़ाती संकीर्णता के रोग का शिकार है। प्रमुखतः पुरुष प्रधान आलोचकीय सत्ता-स्थापनाएं, महिला लेखिकाओं को साहित्य में उनके योगदान के बजाय उनके जेंडर द्वारा लेखन की ख़ासियतों को दर्ज़ करने में ख़ुद को आसान पाती हैं।
अधिकतर दूसरे साहित्यिक सत्ता स्थापनाओं की तरह हिंदी साहित्य की दुनिया में भी गॉडफ़ादर्स हैं जो सत्ता में रहते हुए अपने इर्द गिर्द मंडलियां जमा करते हैं और आश्रय (संरक्षण देने, पालने) की रेवड़ियां बांटते हैं। बहुधा महिला लेखक पाती हैं कि वे ऐसी मंडलियों से दुश्मनी मोल लेने के ख़तरे नहीं उठा सकतीं। एक बड़े फलक में प्रभावी आलोचना और शायद बहुसंख्य पाठक भी ऐसी लेखिकाओं के लेखन से राहत पा लेते हैं जो सुधारवादी झालरों के साथ सिर्फ़ तथाकथित “महिला मुद्दों” में जुटी होती हैं। यहां तक कि जब वे बहुसंख्यक भारतीय महिलाओं की ज़िंदगी में हंसी ख़ुशी देने वाली स्पष्ट रोशनी की घोर कमी के अनगिनत बारीक़ पहलुओं — पसंद करने,या उनकी ज़िंदगी जीने के तरीक़ों, या उनके जीवनसाथी चुनने — के बारे में लिखती हैं तो आलोचना उन्हें आसानी से बर्दाश्त कर लेती है।
लेकिन जब उनका लेखन यौन संबंधों या स्त्री यौनिकता पर महिलाओं के परिप्रेक्ष्य को छूता है तो उन्हें (आलोचकों को) असहजता चुभने लगती है और वे उसे ख़ारिज़ करने पर (अमान्य क़रार कर देने पर) तुल जाते हैं। 1980 में, हिंदी साहित्य संसार मृदुला गर्ग के ख़िलाफ़ लगाए गए अश्लीलता के आरोपों से हिल गया था जिनके उपन्यास चितकोबरा में एक नायिका है जिसके लिए यौन-कार्य बहुत उबाऊ और मशीनी होता है जिससे वो दूसरे मुद्दों की ओर अपना दिमाग़ घुमाती है। इस लेखन के लिए मृदुला गर्ग को यहां तक कि गिरफ़्तार कर लिया गया था। बाद में आरोप ख़ारिज़ कर दिए गए। दूसरी ओर कुछ लेखिकाओं ने चिंता और नाराज़गी जताई है कि कुछ प्रकाशन घरानों ने उन महिलाओं के लेखन को प्रकाशित करने से इंकार किया है जिन्हें वे व्याख्यायित करते हैं कि वह “पर्याप्त साहसी नहीं” है अर्थात वह बाज़ार को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त सनसनीख़ेज़ नहीं है। लेकिन तब ये लक्षण हिंदी साहित्य के लिए प्रधान नहीं हैं।
राय की मान्यता कि नारीवादी विमर्श देह तक ही नहीं केंद्रित रहना चाहिए बल्कि इसमें अन्य मुद्दों और दलितों और आदिवासियों को भी शामिल किया जाना चाहिए, एक उद्दंडता भरा चटखारा है जिसका सारा लेन-देन पितृसत्तात्मक अंधेपन के साथ साथ जाति और अन्य सामाजिक मुद्दों के बारे में सूक्ष्म सामाजिक-सुधारवादी समझदारी पर टिका है। यह साहित्यिक उत्पादन या आलोचना के लिए एक सुचिंतित दृष्टिकोण की तरह नहीं प्रकट हुआ है। बतौर एक लेखक और कुलपति, राय को साहित्यिक आलोचना को अभिव्यक्त करने का हक़ है। तथापि उनका वक्तव्य एक पितृसत्तात्मक पटकथा के मुताबिक महिलाओं के लेखन को नियंत्रित करने की कुटिल और छिछोरी प्रवृत्तियों को उजागर और प्रस्तुत करता है। यह साहित्य आलोचना की (प्रमुखतः पुरुषों के वर्चस्व वाली) दुनिया के सरलीकृत नज़रिये के रोग का सूचक है। राय की टिप्पणी, इससे भी अधिक एक दृष्टांत है जिसे चिंता का एक कारण ज़रूर होना चाहिए।

12 अगस्त 2010

दिल्ली की गर्मी मे वर्धा का गुनगुनापन

चन्द्रिका
दैनिक भास्कर में छपे संपादित आलेख का मूल।
"नया ज्ञानोदय" का अंक अब पुराना पड़ चुका है और बाजार से उसके वापसी की घोषणा भी हो चुकी है. तमाम विरोधों को बाद इसका बाजार से वापस लौटना, विभूति नारायण राय के दिल्ली से वर्धा लौटने जैसा ही है. बावजूद इसके विभूति नारायण राय की चाहत के अनुसार इस पर बहस जारी है पर यह बहस उनके कुलपति बने रहने या हटाये जाने तक पहुंच गयी है और हिन्दी का बौद्धिक तबका पहली बार इतने खुले और बृहद तौर पर अपनी पक्षधरता और असहमति के साथ सामने आ रहा है. ऐसे में शायद वर्धा की रोमांचक बारिस जो हिन्दी विश्वविद्यालय में राइटर इन रेजिडेंस बनाये जाने के बाद लेखक राजकिशोर को बेहद पसंद आयी थी और उनकी कलम से शब्द अनायास ही निकल पड़े थे (jansatta 9 julay) को थोड़ा विचलित भी कर रही होगी.
कथाकार राकेश मिश्रा जिन्होंने नया ज्ञानोदय के लिये यह साक्षात्कार लिया था उनके लिये यह सुकून और शायद गौरव की बात थी जो हिन्दी समाज को १० वर्षों बाद मिली थी कि हिन्दी साहित्य की इतनी बड़ी ख़बर देश में पहली बार बनी. विभूति नारायण राय के दिल्ली से लौटने के एक घंटे बाद उनके आवास पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नारे लगाते हुए पहुंचे वे पानी और बिजली की मांग कर रहे थे साथ में अधिकारियों और कुलपति को गाली दे रहे थे. दूसरे दिन एक छात्र अपनी गाली को इस आधार पर सही ठहरा रहा था कि कुलपति लिखित तौर पर महिला साहित्यकारों को गाली दे सकते हैं तो वह अपनी मूलभूत जरूरतों के लिये गाली या अपमानित करने वाले शब्द क्यों नहीं बोल सकता है. कपिल सिब्बल के कार्रवायी का आश्वासन टेलीविजन पर सुन कर एक छात्र खुशी से उछल पड़ा था. कुछ छात्र और अध्यापक कुलपति के बयान को उचित ठहराने में जुटे थे और अपने बयान ठीक उसी तौर पर बदल रहे थे जैसे कि विभूति नारायण राय, पहले श्ब्दों की व्याख्या, फिर कथाकार प्रेमचंद और काशीनाथ के संदर्भ की प्रस्तुति और बाद में माफी.
हिन्दी विश्वविद्यालय में दखल वेब पत्रिका द्वारा इस मसले पर अध्यापक, कर्मियों और छात्रों की एक संगोष्ठी आयोजित की गयी जिसमे कुलपति ने यह कहकर आने से मना कर दिया कि वे स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में आयेंगे और अपना पक्ष रखेंगे. इस संगोष्ठी के लिये जो सूचनायें लगायी गयी थी उन्हें अधिकारियों के निर्देश पर उखड़वा दिया गया और कार्यक्रम के पूर्व ही होमगार्ड की एक फौज लगा दी गयी बाद में एक वरिष्ठ अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद यह कार्यक्रम सम्पन्न हो सका. स्त्री अध्ययन विभाग ने जो संगोष्ठी रखी थी कुछ घंटे पूर्व कुलपति ने उसमे आने से मना कर दिया. विश्वविद्यालय में मीडिया पर बैन लगा दिया गया जिन पर इस मसले को लेकर बहस चल रही थी. हिन्दी विश्वविद्यालय में अक्सर संगोष्ठियां होती हैं और संगोष्ठीयों में यहाँ का अध्यापक वर्ग एक दूसरे को विद्वान और प्रकांड विद्वान जैसे श्ब्दों से नवाजता रहता है शायद यह विद्वान होने की तुष्टि है जो आपस में एक दूसरे से पा लेते हैं.
विभूतिनारायण राय ने अपने साक्षात्कार में जिस घटना का जिक्र किया है कि उन्होंने छात्राओं को छात्रों के छात्रावास में जाने से मना इसलिये कर दिया कि यहाँ का समाज इसके अनुकूल नहीं है उसका जवाब पंकजविष्ट अपने आलेख में दे चुके हैं पर इस सत्र के शुरुआत में ही एक नियम बनाया गया कि विश्वविद्यालय की छात्रायें शहर में यदि किसी लड़के के साथ रहती हैं तो उन्हें अपने घर से अनुमति पत्र लेकर विश्वविद्यालय को देना होगा. दरअसल ये महज घटनायें नहीं हैं बल्कि एक ऐसे विश्वविद्यालय जिसे हिन्दी देश का बड़ा हिन्दी समाज आशा भरी निगाह से देख रहा है या था उसमें पनप रही संस्कृति है जो शायद खाप पंचायती संस्कृति के ही अनुरूप है जब सर्वोच्च पद पर बैठे किसी व्यक्ति के द्वारा समाज के अनुरूप संस्कृति के निर्माण का तर्क दिया जाता है तो यह तयशुदा हो जाता है कि ऐसे संस्थान समाज को आगे ले जाने वाले कारक के रूप में नहीं बल्कि पीछे ढकेलने के तौर पर कार्य करेंगे.
निश्चित तौर पर पिछले दो वर्षों में विभूतिनारायण राय ने इस विश्वविद्यालय को भवन और ढांचा दिया है पर वहीं अध्यापकों की एक ऐसी मूढ़ फेहरिस्त भी खड़ी हो गयी है जिसके पास उसकी अपनी जुबान नहीं है, और न ही उसके पास व्यापक सोच का कोई दायरा. उसे चुप रहने और सबकुछ सहने का ही सलीका पता है. यह इसलिये भी है क्योंकि उसके पास इससे बेहतर विकल्प नहीं है. अपनी कार्यपद्धति में विभूति नारायण राय शायद हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर कभी रहे भी नहीं बल्कि अकेले उन्होंने विश्वविद्यालय के सभी पदों की जिम्मेदारी अपरोक्ष रूप से ले ली और एक केन्द्रीकृत संरचना स्थापित होती गयी. अकादमिक स्थितियाँ बेसक बदतर होती गयी और यहाँ पर शोध करने वाले कई छात्र जो कि जे.आर.एफ. थे ने हिन्दी विश्वविद्यालय छोड़ अन्य विश्वविद्यालयों में दाखिला ले लिया. जबकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश में शिक्षण संस्थानों की कमी महसूस कर रहा है ऐसे में हिन्दी विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में इस बार एक भी विद्यार्थी ने प्रवेश नही लिया.
लगभग दो वर्ष पूर्व जब विभूतिनारायण राय को हिन्दी विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया था तो उन्होंने अपने प्रथम सम्बोधन में इस बात को कहा था कि हम लोकतंत्र में असहमतियों को जगह देंगे अभी अपने साक्षात्कार के संदर्भ में भी वे यही बात अपने लिये कह रहे थे कि लोकतंत्र में उन्हें पाठक के तौर पर कुछ भी कहने की छूट मिलनी चाहिये. यह बात इटली के महान दार्शनिक वाल्तेयर से मिलती हुई लगती है पर कार्यपद्धति में शायद उनके लिये यह मुश्किल हो रहा है. उनकी ऐसी मंसा भी एक व्यक्ति के तौर पर हो सकती है पर किसी संस्कृति के निर्माण में वहाँ की जमीन को उसके अनुरूप तैयार किया जाना चाहिये. दिल्ली में भाषा, मानसिकता और पद की चर्चा गर्म है जबकि वर्धा में चुप रहने के बीज बो दिये गये हैं और मातहत इस तौर पर कि अपनी जीभ किसी और की जेब में भूल गये हैं या फिर वह जमी ही नहीं. यह एक संस्थान में लोकतंत्र का अवसान है.

25 मार्च 2010

क्या जो घर्म निरपेक्ष होगा वो लोकतांत्रिक भी होगा?


अनिल चमडिया

जब दिल्ली स्थित आल इंडिया इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ( एम्स) मंडल-दो विरोधी आंदोलन का केन्द्र बना हुआ था उस समय उसके निदेशक डा. के वेणुगोपाल थे। एम्स के आरक्षण विरोधी आंदोलन का केन्द्र बनाने में हृदय रोग विशेषज्ञ डा. वेणुगोपाल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि किसी की जिस भूमिका को लेकर कोई कुछ कहना चाहता हो तो उस भूमिका पर बात करने के बजाय उस व्यक्ति या संस्था की किसी दूसरी भूमिका को सामने रख दिया जाता है। डा. वेणुगोपाल देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर के हृदय (अपनी ओर से- मनुष्य के ) विशेषज्ञ है।लेकिन उनकी आरक्षण विरोधी भूमिका को सुनने को कई लोग तैयार नहीं थे। कहा जाने लगता कि ये देश की एक निधि हैं। जबकि उनकी डाक्टरी की अलोचना नहीं की जा रही थी बल्कि बतौर एम्स निदेशक उनकी जातिवादी मानसिकता और आरक्षण विरोधी भूमिका को लेकर बातचीत करने की कोशिश की जा रही थी।

ऐसा नहीं है कि जो लोग ऐसा करते है वे समझते नहीं हैं। जिन्हें आरक्षण विरोध से चिंता नहीं थी वे डा. वेणुगोपाल की बेहतरीन डाक्टरी का रास्ता दिखाने में लगे थे। सबसे अच्छा तरीका होता है कि जिस विशेषण पर हमला हो उसकी शक्ल बदल दी जाए ताकि अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखा जा सके। मुख्य बात अपने हितों की सुरक्षा ही होती है। जैसे अटल बिहारी बाजपेयी ईमानदार है भारतीय राजनीति का ये सबसे ज्यादा प्रचारित विशेषण हैं। क्या कोई साम्प्रदायिक पैसे कौड़ी के मामले में ईमानदार नहीं हो सकता या इसके उलट कहा जाए कि क्या कोई ईमानदार साम्प्रदायिक नहीं हो सकता है?

हिटलर तानाशाह था ये तो हम सब जानते है लेकिन हो सकता है कि वह स्वीस बैंक में पैसे जमा करने की योजना को अनैतिक मानता हो। इसी तरह क्या कोई धर्म निरपेक्ष पैसे कौड़ी के मामले में बेईमान नहीं हो सकता है और क्या कोई बेईमान धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता है? क्या कोई धर्मनिरपेक्षता का विशेषण धारण करने वाला जातिवादी नहीं हो सकता है? अपने समाज में बुनियादी तौर पर वैचारिक घटना के रूप में जो कुछ घटित हो रहा है उसे बतौर घटना सतह पर आने से ही रोक दिया गया है। इसकी वजह से वैचारिक स्तर पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है।दरअसल ये स्थितियों के भ्रामक बनाने की सबसे कारगर कवायद होती है।

अपने समाज में एक विशेषण से कई विशेषणों को कमवा देने की संस्कृति विकसित की गई है। किसी भी स्थिति, इसमें संगठन, व्यक्ति आदि सभी आते हैं, का मूल्यांकन करने और उसे ठीक ठीक सूत्रबद्ध करने की पद्धति में ही गड़बड़ी पैदा कर दी जाए तो जाहिर है कि स्थिति को दुरूस्त करने या बदलने की कोई कवायद सफल नहीं हो सकती है। इस काम को हमारे शासक वर्ग ने बड़ी साफगोई से पूरा किया है। लोगों में एक आदत या कहें कि एक संस्कृति विकसित कर दी है कि वे किसी को दिए जाने वाले एक विशेषण में कई कई विशेषण जोड़ लें।

जैसे किसी पुलिस अधिकारी ने अपने प्रशासनिक दायित्वों के तहत किसी बलवे वाज या साम्प्रदायिक व्यक्ति को गिरफ्तार किया तो उसे मान लिया जाए कि वह धर्म निरपेक्ष है? वह घर्म निरपेक्ष होगा तो लोकतांत्रिक भी होगा। वह ईमानदार भी होगा। इसका एक खतरा ये होता है कि वह इन सबकी आड़ में अपने पुलिसिया चरित्र को छिपा लेता है जिसकी वास्तव में दमनकारी मशीनरी के रूप पहचान बनी हुई हैं। वह धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कितनी और किस किस्म की बेईमानी करता है और किस हद तक वह लोकतंत्र के खिलाफ कार्रवाईयों को अंजाम देता है ये दर्ज ही नहीं हो पाती है। आखिर हम किसी भी विशेषण का स्वतंत्र अस्तित्व बने रहने देने में क्यों घबराते हैं ? क्या हमें किसी को भी देवता बना देने की आदत लगी हुई है ? और जब तक किसी के साथ कई कई विशेषण नहीं लगा दिए जाते हैं तब तक वह देवता कैसे बन सकता है?

एक गंभीर वैचारिक- सांस्कृतिक संकट है। यदि भक्तों की भाषा में बात की जाए तो उसने ढेर सारे नकली देवता खड़े कर दिए हैं। लेकिन बात केवल विशेषणों तक ही नहीं है। जब हमने इसे एक संस्कृति के रूप में यहां व्यक्त किया है तो वह वास्तव में एक संस्कृति के रूप में ही है और वह वास्तविक अर्थों या अपनी भाषा में कहें तो असलियत को छिपाने की पद्दति के रूप में दिखाई देती है। जैसे हमारे समाज में डिग्रीधारी लोगों को पढ़ा लिखा माना जाता है। इसमें समझदारी का भाव भी शामिल होता है और आधुनिक होने का भी भाव होता है। लेकिन ऐसा पढ़ा लिखा व्यक्ति जातिवादी भी होता है। दहेजखोर भी होता है। पुरूष-वेश्या भी होता है। अलोकतांत्रिक भी होता है। बेईमान भी होता है।

क्या साम्प्रदायिक होना आधुनिकता है? क्या पुरूष वेश्या होना आधुनिकता है? सामंतवाद के दौर के औरतखोर का ही तो ये रूप है? डाक्टर, इंजीनियर मध्ययुग के आसपास खड़े दिखाई देते हैं। हुआ ये है कि आधुनिक तकनीक के प्रशिक्षणर्थियों को हमने शिक्षाविद् और विद्वान मान लिया है। आधुनिकता का संबंध टाई, कोर्ट, जिंस और अंग्रेजी बोलने से नहीं है। आधुनिकता का सीधा संबंध विचारों से है। विचारों की कसौटी पर ही आधुनिकता परिभाषित होती है। लेकिन अपने आसपास ठहर कर देखे कि कैसे आधुनिकता का दर्जा पाने वाला हिस्सा बर्बर विचारों के साथ खड़ा है। जिन्हें देखकर सीधे मध्ययुग के इतिहास के पन्ने लड़खड़ाते दिखने लगते हैं। वास्तव में शिक्षा के दर्शन को ही विस्थापित कर दिया गया है। लेकिन हमें जरा सी सोचने की फूर्सत होती तो हम सोचते कि जब मनुष्य को संसाधन में तब्दील कर दिया गया है तो वह शिक्षा का कैसे हकदार बने रह सकता है?

आमतौर पर प्रशिक्षण को ही शिक्षा मान लिया गया है। प्रशिक्षण क्या होता है इससे जुड़े किस्से सुनाता हूं। एक बार संसद भवन में एम एस गिल का इंटरव्यू करना था। संसद में जाने का लेखक के पास स्थायी पत्र था। लेकिन जेब में टेप रिकोर्डर लेकर जाना था। प्रशिक्षण प्राप्त सुरक्षाकर्मी ने कहा कि टेप के साथ नहीं जा सकते है। उसे जिरह करना चाहता था। उसे बताया कि टेप में क्या है? उसने कहा कि टेप अलाउ नहीं है। मैंने कहा कि टेप तो जेब में भी है। मोबाईल में टेप, कैमरे सब होते है। मोबाईल को ले जाने की मनाही तो नहीं है। लेकिन वह उस टेप के बारे में रट लगाता रहा कि यह अलाउ नहीं है। प्रशिक्षण तर्क नहीं सिखाता है। वह अनुसरण करना सिखाता है। प्रशिक्षण एक मानसिक परिधि तय कर देता है।

एक पुलिस अधिकारी को विश्वविद्यालय में शैक्षणिक-प्रशासनिक कार्य देखने की जिम्मेदारी मिली। उसके खुफिया ने बताया कि एक कमरे में हीटर जलता है। हीटर छात्र के कमरे में नहीं एक टीचर के कमरे में जल रहा था। छात्रावासों के लिए तो हीटर जलाने की मनाही थी। लेकिन उसके प्रशिक्षण में यही बात समाई हुई थी कि हीटर जलाना मना है। लेकिन हीटर जलने की घटना को भी एक ही रूप में देख पा रहा था। हीटर का मतलब उसके लिए पुराने किस्म का पचहत्तर सौ रूपये वाला गोल मोटल हीटर था। लेकिन मजेदार बात कि वहां सभी कमरे में हीटर जल रहे थे और उसे हीटर कहीं नहीं दिख रहा था। क्योंकि दूसरे कमरे में जलने वाले हीटर नये नये रूप धारण किए हुए थे। जिस हीटर में चाय बनती है उसे वह हीटर नहीं मानता था। क्योंकि एक तो उसके रूप के बदलने के साथ उसका नाम भी बदल गया था। दरअसल यही मानसिकता और उसका विकास बौद्धिकता के पर्याय के रूप में स्थापित हो गई है जो कि एक नये किस्म की सैनिकशाही मानसिकता का आधार बनी हुई है।

समाज के बौद्धिक विकास को अवरूद्ध करने का यह सबसे कारगर तरीका है कि नदी की वास्तविक धारा के बीच में एक नई ऐसी धारा निकल दी जाए कि वास्तविक धारा के रूकने का भान ही नहीं हो। भाषा वहीं हो लेकिन उसके अंतर्वस्तु वर्चस्ववादी संस्कृति के अनुरूप बदल जाए। हम इस बात पर गौर करें कि ये काम दो तरह से हुआ है। एक तो भाषा पुरानी लेकिन उसके अतंर्वस्तु को अपने अनुरूप शासकों ने ढाल लिया है।

दूसरा काम ये हुआ कि शब्दों के अर्थ सीमित कर दिए गए है। सांस्कृतिक विकास की यात्रा इस रूप में सुनिश्चत होती है कि एक शब्द के भीतर के कई कई अर्थों के लिए नये नये शब्द विकसित हो। एक शब्द के विभिन्न अर्थ निकल सकते हो। शब्दों से निकलनी वाली ध्वनियां उसके इस्तेमाल किए जाने वाली जगह के अनुरूप उसके अर्थ को व्यक्त कर दें।पर्यायवाची शब्दों का भंडार इसी तरह विकसित हुआ है। लेकिन अब उलट स्थिति हो गई है। एक शब्द के एक ही अर्थ का प्रशिक्षण दिया जाता है। पर्यायवाची की पौध की जड़ में ही नमक डाल दिया गया है। हम एक विशेषण के कई कई पर्यायवाची तैयार कर लेते हैं। शासकों ने इस संस्कृति को इस कदर विकसित कर दिया है कि हम अपने विशेषण भूल गए है। जागरूक है। चेतना संपन्न है। आदि आदि। शासक अपने प्रशिक्षण से हमें कैसे तैयार कर रहा है? हम भूमंडलीकरण के प्रशिक्षणार्थी नागरिक बन रहे हैं

10 फ़रवरी 2010

श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र


दिल्ली 9 फरवरी 2010

प्रिय विभूतिजी
अभिवादन !

उम्मीद है, स्वस्थ होंगे .

लम्बे समय से इस उधेड़बुन में था कि चन्द बातें आप तक किस तरह संप्रेषित करूं ? व्यक्तिगत मुलाकात संभव नहीं दिख रही थी, सोचा पत्र के जरिए ही अपनी बात लिख दूं. और यह एक ऐसा पत्र हो, जो सिर्फ हमारे आप के बीच न रहे बल्कि जिसे बाकी लोग भी पढ़ सकें, जान सकें. इसकी वजह यही है कि पत्र में जिन सरोकारों को मैं रखना चाहता हूं, उनका ताल्लुक हमारे आपसी संबंधों से जुड़े किसी मसले से नहीं है.

आप को याद होगा कि महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर आप की नियुक्ति होने पर मेरे बधाई सन्देश का आपने उसी आत्मीय अन्दाज़ में जवाब दिया था. उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की अनुचित गिरफ्तारी के मसले को जब मैंने आप के साथ सांझा किया तब आपने अपने स्तर पर उस मामले की खोज-ख़बर लेने की कोशिश की थी. हमारे आपसी संबंधों की इसी सांर्द्रता का नतीजा था कि आप के संपादन के अंतर्गत सांप्रदायिकता के ज्वलंत मसले पर केन्द्रित एक किताब में भी अपने आलेख को भेजना मैंने जरूरी समझा. इतना ही नहीं कुछ माह पहले जब मुझे बात रखने के लिए आप के विश्वविद्यालय का निमंत्रण मिला तब मैंने भी इसे सहर्ष स्वीकार किया.

यह अलग बात है कि वर्धा की अपनी दो दिनी यात्रा में मेरी आप से मुलाक़ात संभव नहीं हो सकी. संभवतः आप प्रशासनिक कामों में अत्यधिक व्यस्त थे. आज लगता है कि अगर मुलाक़ात हो पाती तो मैं उन संकेतों को आप के साथ शेअर करता -जो विश्वविद्यालय समुदाय के तमाम सदस्यों से औपचारिक एवं अनौपचारिक चर्चा के दौरान मुझे मिल रहे थे- और फिर इस किस्म के पत्र की आवश्यकता निश्चित ही नहीं पड़ती.

मैं यह जानकर आश्चर्यचकित था कि विश्वविद्यालय में अपने पदभार ग्रहण करने के बाद अध्यापकों एवं विद्यार्थियों की किसी सभा में आप ने छात्रों के छात्रसंघ बनाने के मसले के प्रति अपनी असहमति जाहिर की थी और यह साफ कर दिया था कि आप इसकी अनुमति नहीं देंगे.

विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद की आकस्मिक बैठक करके अनिल चमड़िया को पद से मुक्त करने का फैसला लिया गया और उन्हें जो पत्र थमा दिया गया, उसमें उनकी नियुक्ति को ‘कैन्सिल’ करने की घोषणा की गयी.


यह बात भी मेरे आकलन से परे थी कि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित तबके से आने वाले एक छात्र- सन्तोष बघेल को विभाग में सीट की उपलब्धता के बावजूद शोध में प्रवेश लेने के लिए भी आंदोलन का सहारा लेना पड़ा था और अंततः प्रशासन ने उसे प्रवेश दे दिया था. विश्वविद्यालय की आयोजित एक गोष्ठी में जिसमें मुझे बीज वक्तव्य देना था, उसकी सदारत कर रहे महानुभाव की ‘लेखकीय प्रतिभा’ के बारे में भी लोगों ने मुझे सूचना दी, जिसका लुब्बेलुआब यही था कि अपने विभाग के पाठयक्रम के लिए कई जरूरी किताबों के ‘रचयिता’ उपरोक्त सज्जन पर वाड्मयचैर्य अर्थात प्लेगिएरिजम के आरोप लगे हैं. कुछ चैनलों ने भी उनके इस ‘हुनर’ पर स्टोरी दिखायी थी.

बहरहाल, विगत तीन माह के कालखण्ड में पीड़ित छात्रों द्वारा प्रसारित सूचनाओं के माध्यम से तथा राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से में विश्वविद्यालय के बारे में प्रकाशित रिपोर्टों से कई सारी बातें सार्वजनिक हो चुकी हैं. अनुसूचित जाति-जनजाति से संबंधित छात्रों के साथ कथित तौर पर जारी भेदभाव एवं उत्पीड़न सम्बन्धी ख़बरें भी प्रकाशित हो चुकी हैं.

6 दिसम्बर 2009 को डॉ. अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित रैली में शामिल दलित प्रोफेसर लेल्ला कारूण्यकारा को मिले कारण बताओ नोटिस पर टाईम्स आफ इण्डिया भी लिख चुका है. उन तमाम बातों को मैं यहां दोहराना नहीं चाहता.

जनवरी माह की शुरूआत में मुझे यह भी पता चला कि हिन्दी जगत में प्रतिबद्ध पत्रकारिता के एक अहम हस्ताक्षर श्री अनिल चमड़िया- जिन्हें आप के विश्वविद्यालय में स्थायी प्रोफेसर के तौर पर कुछ माह पहले ही नियुक्त किया गया था- को अपने पद से हटाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन आमादा है.

फिर चंद दिनों के बाद यह भी सूचना सार्वजनिक हुई कि विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद की आकस्मिक बैठक करके उन्हें पद से मुक्त करने का फैसला लिया गया और उन्हें जो पत्र थमा दिया गया, उसमें उनकी नियुक्ति को ‘कैन्सिल’ करने की घोषणा की गयी.

मैं समझता हूं कि विश्वविद्यालय स्तर पर की जाने वाली नियुक्तियां बच्चों की गुड्डी-गुड्डा का खेल नहीं होता कि जब चाहें हम उसे समेट लें. निश्चित तौर पर उसके पहले पर्याप्त छानबीन की जाती होगी, मापदण्ड निर्धारित होते होंगे, योग्यता को परखा जाता होगा. यह बात समझ से परे है कि कुछ माह पहले आप ने जिस व्यक्ति को प्रोफेसर जैसे अहम पद पर नियुक्त किया, उन्हें सबसे सुयोग्य प्रत्याशी माना, वह रातों रात अयोग्य घोषित किया गया और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया ?

कानून की सामान्य जानकारी रखनेवाला व्यक्ति भी बता सकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के खिलाफ है. और ऐसा मामला नज़ीर बना तो किसी भी व्यक्ति के स्थायी रोजगार की संकल्पना भी हवा हो जाएगी क्योंकि किसी भी दिन उपरोक्त व्यक्ति का नियोक्ता उसे पत्र थमा देगा कि उसकी नियुक्ति –‘कैन्सिल’.

यह जानी हुई बात है कि हिन्दी प्रदेश में ही नहीं बल्कि शेष हिन्दोस्तां में लोगों के बीच आप की शोहरत एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की रही है, जिसने अपने आप को जोखिम में डाल कर भी साम्प्रदायिकता जैसे ज्वलंत मसले पर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की कोशिश की. ‘शहर में कर्फ्यू’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से या ‘वर्तमान साहित्य’ जैसी पत्रिका की नींव डालने के आप की कोशिशों से भी लोग भलीभांति वाकीफ हैं. संभवतः यही वजह है कि कई सारे लोग, जो कुलपति के तौर पर आप की कार्यप्रणाली से खिन्न हैं, वे मौन ओढ़े हुए हैं.

इसे इत्तेफाक ही समझें कि महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के समय से ही विवादों के घेरे में रहा है. चाहे जनाब अशोक वाजपेयी का कुलपति का दौर रहा हों या उसके बाद पदासीन हुए जनाब गोपीनाथन का कालखण्ड रहा हो, विवादों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है. मेरी दिली ख्वाहिश है कि साढ़े तीन साल बाद जब आप पद भार से मुक्त हों तो आप का भी नाम इस फेहरिस्त में न जुड़े.

मैं पुरयकीं हूं कि आप मेरी इन चिंताओं पर गौर करेंगे और उचित कदम उठाएंगे.

आपका
सुभाष गाताडे

01 फ़रवरी 2010

“न किसी से जाति पूछता हूं, न किसी को जाति बताता हूं -अनिल चमड़िया

अनिल चमड़िया को हटाये जाने के इस वर्धा प्रकरण में एक वेबसाइट ने उनकी राय जानी और जो बताया गया, उसमें कुछ मसाला जोड़ कर छापा गया। पूरे मामले को जातीय रंग देने की कोशिश की गयी। वीसी का पक्ष भी उसी आधार पर ले लिया गया। यानी जो है, उस पर बात करने के बजाय दूसरी गली पकड़ने का षडयंत्र वीसी और उक्‍त वेबसाइट ने मिल कर किया। अपनी जाति और दूसरों की जाति और अंतत: जाति के सवाल को लेकर पेश है

विश्वविद्यालय से आपकी सेवा खत्म किये जाने की क्या वजह है?

अनिल चमड़िया : मेरी सेवा समाप्त करने की ये कोई पहली कोशिश नहीं है। 12 अगस्त 2009 को कुलपति वीएन राय ने देर शाम मुझे अपने घर पर बुलाकर कहा था कि आप इस्तीफा दे दीजिए। आप अपने इस्तीफे में ये लिख दीजिए कि आप ये सोचकर यहां आए थे कि यहां अपनी सेवा जारी रखते हुए दिल्ली में पंद्रह-बीस दिनों तक रह सकते है। मैंने कहा कि लगभग एक महीने पहले मैंने ये पद संभाला है और ये झूठ लिखकर इस्तीफा क्यूं दूं। फिर आप मुझे ये झूठ लिखने के लिए क्यों दबाव बना रहे हैं। मैं दिल्ली और अपने परिवार को छोड़कर वर्धा इसीलिए आया था कि यहां की चुनौतियां मुझे अच्छी लगती हैं। मरुस्थल जैसी जगह पर पौधे लगाने और उसे विकसित करने की चुनौती मुझे ताक़तवर बनाती है। बहरहाल सेवा समाप्त करने की कोशिश की एक लंबी पृष्ठभूमि हैं। मेरी डायरी के कई पन्ने इससे भरे हैं। मैं इतना कह सकता हूं कि मैं लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। मैं निजी तौर पर भी और विभाग के प्रोफेसर के तौर पर भी। जो लोग सेवा समाप्त करने की वजहों को नहीं समझना चाहते हैं, उन्हें मैं नहीं समझा सकता। लेकिन जो समझना चाहते हैं, उन्हें प्रचार सामग्री की घेरेबंदी से निकल कर तथ्यों की तरफ लौटना चाहिए। मेरी नियुक्ति एक लंबी प्रक्रिया के बाद हुई। विज्ञापन निकला। मैंने आवेदन किया। आवेदन पत्रों की छंटनी की गयी। छंटनी समिति में विश्वविद्यालय प्रशासन, विभाग और विषय के विशेषज्ञ थे। इस समिति ने चयन समिति से कहा कि मैं साक्षात्कार के लिए आमंत्रित करने के योग्य हूं। चयन समिति में राष्ट्रपति के प्रतिनिधि, कुलपति, प्रति कुलपति, डीन, रजिस्ट्रार, विषय के तीन विशेषज्ञ कुल नौ लोग थे। उन्होने एकमत से मेरी नियुक्ति का फैसला किया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने प्रोफेसर पद के लिए जो योग्यताएं निर्धारित की हैं, उसमें डिग्रीधारियों को भी योग्य बताया गया है और गैर डिग्रीधारियों को भी योग्य माना है। जाहिल लोग नहीं जानते हैं कि जिनके पास डिग्रियां नहीं हैं, उन्हें संस्थानों में प्रोफेसर बनाया जाता रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में अचिन विनायक भी ऐसे ही लोगों में हैं और वे देश के सबसे बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) में डीन हैं। मेरी नियुक्ति के सात महीने के बाद ये कहा जा रहा है कि विश्वविद्यालय ने जो विज्ञापन निकाला था, वो गलत था। यह विज्ञापन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 1998 में निर्धारित मानदंड़ों के अनुसार निकाला गया था। लेकिन ये विज्ञापन केवल मेरे पद भर के लिए नहीं था। विभिन्न विभागों में सत्रह शैक्षणिक पदों के लिए था। मास मीडिया में ही उस विज्ञापन के आधार पर चार नियुक्तियां हुई हैं। लेकिन केवल मेरे मामले में ये दोहराया जा रहा है कि विज्ञापन गलत निकला था। जबकि 1998 में जो प्रावधान थे, वो 2009 में भी हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2000 में जो प्रोफेसर के लिए मानदंड तय किये थे, उन पर भी मैं तकनीकी तौर पर खरा उतरता हूं। वजह ये है कि कुलपति मेरी सेवा समाप्त करना चाहते थे। वे कई महीने पहले से ही कई जगहों पर ये कह चुके हैं। एक ब्‍लॉग ने तो दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार के हवाले से लिखा है कि कुलपति ने मुझे हटाने के लिए उनसे कहा था। दूसरी बात कि मेरी जगह पर उन्हें लाने का न्यौता भी दिया था। किसी भी प्रशासक की एक कार्य संस्कृति होती है। वो अपनी कार्य संस्कृति के ढांचे में सबको ढालना चाहता है। मैं ऐसे किसी ढांचे के लिए खुद को कच्चा माल बनाने की स्थिति कभी नहीं रहा। मैं यहां विद्यार्थियों को पढ़ाने आया था और इस संस्थान के साथ जो अंतरराष्ट्रीय शब्द जुड़ा है, उसे सार्थक बनाने की कोशिश करना चाहता था। ये बात मैंने अपने चयन के लिए हुए साक्षात्कार के दौरान भी कहा था। मैंने अपनी योजनाएं भी बतायी थी। मैं चाहता था कि हिंदी में मौलिक काम किये जा सकते हैं और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया जा सकता है। दरअसल हिंदी में इतनी ज़डता है कि उसे किसी भी तरह की आधुनिक पहल तत्काल खटकने लगती है। वहां की सत्ता खुद विस्थापित होने की असुरक्षा से घिरा महसूस करने लगती है। मेरे निकाले जाने की वजह में कार्य संस्कृति का सवाल प्रमुख है।

क्या आपको कभी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया?


अनिल चमड़िया : नहीं, कोई कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया। 27 जनवरी 2010 को मेरे घर पर शाम को सात बजे चिट्ठी भिजवा दी गयी कि मेरी नियुक्ति को कार्य परिषद के आठ सदस्यों ने 13 जनवरी 2010 को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक बैठक कर स्वीकृति प्रदान नहीं की है।

क्या आपको ये बताया गया है कि आपकी सेवा क्यों खत्म की जा रही है?


अनिल चमड़िया : जो मुझे पत्र मिला है, उसमें केवल इतना ही कहा गया है कि कार्यपरिषद ने मेरी नियुक्ति को स्वीकार नहीं किया है। उसमें स्वीकार नहीं किये जाने का कोई कारण नहीं बताया गया है।

वीसी वीएन राय ने कहा कि लोग अनिल चमड़िया के दलित होने के चलते हटाये जाने की बात मुझे बता रहे हैं पर मुझे तो पता भी नहीं है कि अनिल चमड़िया दलित हैं – ये पहली बार पता चल रहा है। वास्तविक स्थिति क्या है?

अनिल चमड़िया : वीएन राय सारी बातें लोगों के हवाले से करते हैं। ये उनकी कार्य संस्कृति का हिस्सा है। कौन लोग कह रहे हैं कि दलित होने के कारण मुझे हटाया गया है। दरअसल प्रचार की इस रणनीति को समझना चाहिए। किसी भी समस्या के केंद्र में क्यों नहीं ऐसी बात ला दी जाए, जिससे की पूरी बहस उल्टे सिर खड़ी हो जाए। मेरी नियुक्ति में कहीं से भी दलित शब्द शामिल नहीं है। फिर इस दलित की बहस को यहां क्यों खड़ा किया जा रहा है। कुलपति को मुझमें इतनी दिलचस्पी रही है कि मैं कितने लोगों के लिए अपने कमरे में खाना बनाता रहा हूं। वे मेरे बारे में इस तरह की सूचनाएं प्राप्त करते रहे कि मैं किस किससे सब्जी मंगवाता हूं। फिर कुलपति की तो वर्ण व्यवस्था के विषय में काफी दिलचस्पी दिखाई देती है। यह विषय उनका एक ब्रांड है। मैं अपने स्तर पर न तो किसी को अपनी जाति बताना जरूरी समझता हूं और ना ही किसी से उसकी जाति पूछता हूं। क्योंकि मैं दो तरह की भाषा नहीं जानता। एक ही भाषा में सभी लोगों से बात करने की योग्यता ही मेरे पास है।

वीसी के दलित विरोधी आचरण और अपनी बर्खास्तगी को आप कैसे जोड़कर देख रहे हैं?

अनिल चमड़िया : वीसी को आप दलित विरोधी कह रहे हैं, मैं नहीं कह रहा हूं। मेरे पास उन्हें देने के लिए कई विशेषण हैं। मैं अपनी बर्खास्तगी भी नहीं मानता हूं। लेकिन आपके इस सवाल की जो मूल भावना है, उसे मैं अपने तरीके से समझ कर जवाब देना चाहता हूं। मैं अपने लेखन, कर्म और व्यवहार के लिए अलग-अलग आईना लेकर नहीं घूमता हूं। हिंदी समाज का सत्ताधारी वर्ग इस मायने में दुनिया में सबसे ज्यादा योग्य है कि वो लिखने और व्यवहार के लिए अलग-अलग भाषा को बरतना जानता है। लिखता कुछ है और व्यवहार उसके विपरीत करता है। अपनी सारी पक्षधरता, व्यभिचार, भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए एक मुखौटा तैयार कर लेता है। वह मुखौटा वामपंथी होने का हो सकता है। धर्मनिरपेक्ष होने का हो सकता है। विश्वविद्यालय में दलित और महिलाएं अपने अनुकूल स्थितियां नहीं महसूस करती हैं। विश्वविद्यालय के दलित छात्र संगठन द्वारा जारी दलित चार्जशीट में अब तक के दलित उत्पीड़न की घटनाएं जगजाहिर हैं। दलित प्रोफेसर प्रो कारुण्‍यकारा को दी गयी नोटिस की खबर समाचार पत्रों में छपी है। लिहाजा दलित विरोधी आचारण के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। मेरी सेवा समाप्त करने की कोशिश का संबंध पूरी कार्यसंस्कृति से है। उसमें कई तरह के आचरण शामिल हैं। मैंने जब से यहां अपनी सेवा शुरू की, तब से कुलपति को ये लगता रहा है कि विश्वविद्यालय में मास मीडिया के प्रमुख को जिस तरह से चोर गुरू के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, उसमें मेरी भूमिका है। ये बात उन्‍होंने कई लोगों से कही भी है। जब भी विद्यार्थियों के बीच किसी तरह का असंतोष पनपा और वे संगठित होकर विरोध करने के लिए तैयार हुए, उन्हें लगता रहा कि उसमें मेरी भूमिका है। वे विरोध के कारणों या जो बातें प्रकाशित होती हैं, उन्हें संज्ञान में नहीं लेना चाहते हैं। ये उनकी कार्यसंस्कृति है। पुलिस का काम किसी घटना को अपराध के रूप में स्थापित करना और उसका किसी अपराधी से संबंध जोड़ने का होता है। वह घटना के कारणों को दूर नहीं करना जानती है। उन्‍होंने एक बार मुझसे फोन पर कहा कि मैं चाहूंगा तो विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अपना विरोध आंदोलन समाप्त कर सकते हैं। दरअसल विश्वविद्यालय में कदम रखने के पहले घंटे में ही कुलपति ने मुझे विद्यार्थियों से दूर रहने का निर्देश दे दिया था। मैं छात्रावासों में नहीं जा सकता और न विद्यार्थियों से हाथ मिला सकता था।

वीसी का कहना है कि आपको हटाने का फैसला ईसी का है और इस फैसले से उनका कोई लेना देना नहीं है। आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया है?

अनिल चमड़िया :प्रचार के लिए आप अपनी सामग्री को किसी भी तरह प्रस्तुत कर सकते हैं। विश्वविद्यालयों की संस्कृति के बारे में जो जानते हैं, उन्हें पता है कि कुलपति के चाहने और नहीं चाहने का क्या अर्थ होता है। मुझे पता है कि ईसी की मीटिंग में कुलपति ने ईसी के माननीय सदस्यों से क्या कहा। ईसी की अध्यक्षता कुलपति ही करते हैं। दरअसल किसी तरह की कार्रवाई के बाद सबसे ज्यादा सावधानी इस बात को लेकर बरतनी पड़ती है कि उस कार्रवाई के साथ किस तरह के संदेश को लोगों के बीच भेजा जाए। संदेश की ऊपरी सतह पर मूल बात नहीं होती है। जो ये कहता रहा हो कि उसने एक महान काम किया है और फिर जब उसके सामने ये संकट खड़ा हो कि उसे इस महानता को पचाना मुश्किल है, तो वह क्या कर सकता है। किसी की आड़ लेकर बात कहने की अपनी एक विशेष संस्कृति होती है। ईसी न तो मेरी नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया को जानती रही है न ही उसकी दिलचस्पी बारह नियुक्तियों में किसी एक पर खासतौर से हो सकती है जब तक कि उसे खास नहीं बना कर पेश किया जाए। ईसी के कुलाध्यक्ष द्वारा मनोनीत सदस्य कुलाध्यक्ष के मनोनीत प्रतिनिधि द्वारा चयनित किसी व्यक्ति की नियुक्ति को क्या इतनी आसानी से अस्वीकार कर सकते हैं? दरअसल इस मामले में जो बारीकी नहीं जानना चाहता है और मुझे गालियां निकालने के मौके के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता है, तो मैं उसमें क्या कर सकता हूं। मैं धैर्यवान व्यक्ति हूं। हमलों से मजबूत होता हूं।

मोहल्ला से साभार


ताक़तवर जुगाड़‍ियों को परास्‍त करने का समय है यह- चंदन पांडेय (चर्चित युवा कथाकार)
इस कुकर्म को चाहे जो नाम दिया जाए, इसके पक्ष में जो तर्क रखे जाए, मैं यही समझ पाया कि अनिल चमड़िया की नौकरी छीन ली गयी। कुछ बड़े नामों की एक मीटिंग बुलायी गयी और कुछ नियमों का आड़ ले सब के सब उनकी नौकरी खा गये।

हमारे समाज से विरोध का स्वर तो गायब हो ही रहा है, विरोध में उठने वाली आवाजों के समर्थक भी कम हो रहे हैं। यह सरासर गलत हुआ। मेरे पास एक सटीक उदाहरण है। बचपन की बात है, गांव में जब हम नंग-धड़ंग बच्चों के बीच कोई साफ-सुथरा कपड़ा पहन कर आ जाता था, विशेष कर चरवाही में, तो बड़ी उम्र के लड़के उन बच्चों का मजाक उड़ाते थे और कभी-कभी पीट भी देते थे। किसी न किसी बहाने से, उन बच्चों को जान-बूझकर मिट्टी में लथेड़ देते थे। आप समझ गये होंगे, मैं कहना क्या चाहता हूं?

वजहें जो भी हों, सच यह है कि अनिल चमड़िया के विशद पत्रकारिता अनुभव से सीखने-समझने के लिए विश्वविद्यालय तैयार नहीं था। वरना जिस कुलपति ने नियुक्ति की, उसी कुलपति को छह महीने में ऐसा क्या बोध हुआ कि अपने द्वारा की गयी एकमात्र सही नियुक्ति को खा गया। (मैं चाहता हूं कि पिछली पंक्ति मेरे मित्रों को बुरी लगे)। मृणाल पांडेय, कृष्ण कुमार, गोकर्ण शर्मा, गंगा प्रसाद विमल और ‘कुछ’ राय साहबों ने अनिल की नियुक्ति का विरोध किया तो इसका निष्कर्ष यही निकलेगा कि पत्रकारिता जगत की उनकी समझ कितनी थोथी है? यह समय की विडंबना है कि पत्रकारिता जगत में सिर्फ और सिर्फ संबंधों का बोलबाला रह गया है। कितने पत्रकार मित्र ऐसे हैं, जो नींद में भी किसी पहुंच वाली हस्ती से बात करते हुए पाये जाते हैं।

आश्चर्य इसका कि कई लोग यह कहते हुए पाये गये : अनिल को विश्वविद्यालय के विपक्ष में बोलने की क्या जरूरत थी? इन गये गुजरे लोगों को यह समझाने की सारी कोशिशें व्यर्थ हैं कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज उठाना कोई ऐसा अपराध नहीं है, जिसकी सजा में किसी की नौकरी छिन जाए। वर्धा में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जिसके खिलाफ सख्त आवाज उठनी चाहिए।

ये हर कोई जानता है कि पात्रता के बजाय संबंधों और ताकत के सहारे चल रही इस दुनिया में विभूति नारायण राय को कोई दोषी नहीं ठहराएगा। जिस एक्ज्यूटिव काउंसिल के लोगों ने इस धत-कर्म में कुलपति का साथ दिया है, उन्‍हें भी उनका हिस्सा दिया जाएगा। वैसे भी 1995 से अखबार देखता पढ़ता रहा हूं, पर आज तक मृणाल का कोई ऐसा आलेख या कोई ऐसी रिपोर्टिंग नहीं देखी, जिससे लगता हो कि ये पत्रकार हैं या कभी रही हैं। हां, उदय प्रकाश की एक कहानी में किसी मृणाल का जिक्र आता है, जो दिनमान या सारिका में “अचार कैसे डालें” जैसे लेख लिखती हैं। कुल बात यह कि मृणाल या दूसरे ऐसी पात्रता नहीं रखते कि वो किसी की नौकरी खा जाएं।

अनिल जी, हमलोग कथादेश में तथा अन्य जगहों पर आपके लेख पढ़ते हुए बड़े हुए हैं। आपसे बहुत कुछ सीखा है। आप एक दफा भी यह बात अपने मन में न लाना कि आपसे कोई चूक हो गयी। आप इस तुगलकी फरमान के खिलाफ लड़ाई जारी रखिए। अपने सीमित संसाधनों के बावजूद आप इस लड़ाई में चापलूसों की फौज के सारे तर्क ध्वस्त कर देंगे और ताकतवर जुगाड़ियों को परास्त करेंगे, इस बात का भरोसा है।

24 नवंबर 2009

उच्च शिक्षा में शोध की राजनीति

-विवेक जायसवाल (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के
मीडिया विभाग में शोधार्थी व स्वतन्त्र लेखन संपर्क- v.mgahv@gmail.com 09975771385
)



विद्वानों का मानना है कि शोध ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है. आज भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में हो रहे शोधों की स्थिति को देखें तो वे ज्ञान निर्माण को आगे तो नहीं पर पीछे जरूर ले जा रहे हैं. सरकार लगातार देश में उच्च शिक्षा के लिए बेहतर प्रयास करने के रट लगाती रहती हैं पर क्या सरकारी प्रयासों पर ही हमारे ज्ञान निर्माण की नींव टिकी है? उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में सरकारी दावे तो अपनी जगह हैं पर यदि हम ध्यान दें कि इन संस्थानों में जो लोग शोध कराने के लिए बैठाए गये हैं वे क्या भूमिका निभा रहे हैं. ये आखिर ऐसी किस राजनीति में मशगूल हैं जिससे भारतीय ज्ञान परम्परा की गति कछुए जैसी हो गयी है.

आज यदि हम सामाजिक शोध कराने वाली संस्थाओं में हो रहे शोधों की प्रकृति पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे कि या तो वे पूर्व में हुए किसी शोध की नकल हैं या विदेशों में हुए शोधों के कट-पेस्ट हैं. अधिकत्तर शोधों की यही हालत है. इन शोधों के पीछे केवल इतना ही मामला नहीं है कि ये मौलिक हैं या नहीं. पहला सवाल तो यह है कि शोध के लिए किन लोगों को चुना जाता है. अधिकांश उच्च शिक्षा संस्थानों में खासकर राज्याधीन विश्वविद्यालयों में शोध करने के लिए बिना किसी प्रवेश प्रक्रिया को अपनाए नामांकन कर लिया जाता है. ये नामांकन किस आधार पर होता है इसका पता किसी को नहीं. इनमें आरक्षण का प्रावधान है कि नहीं इसका भी पता किसी को नहीं है. पता है केवल उनको जिनको शोध करना है और जिनको शोध कराना है. आप किसी भी राज्याधीन विश्वविद्यालय की वेबसाइट को खंगालिए आपको शोध की डिग्री से सम्बन्धित कोई जानकारी नहीं मिलेगी. यदि मिलेगी भी तो केवल इतनी कि पी-एच.डी. के सम्बन्ध में सम्बन्धित विभाग से सम्पर्क करें. अब एक दूर-दराज के गावों में रहने वाला छात्र कहां-कहां के सम्बन्धित विभाग में चक्कर लगाएगा. हां जानकारी तब मिलती है जब आप अखबारों में पढेंगे कि फलां को, फलां विषय में, फलां विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि मिली तभी आप जानेंगे कि अमुक विश्वविद्यालय के अमुक विभाग में पी-एच.डी. की भी डिग्री मिलती है. यह उच्च शिक्षा की एक बड़ी राजनीति और खेमेबन्दी का हिस्सा है. एक तरफ जहां मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधान लागू करने के निर्देश दिए हैं वहीं दूसरी तरफ ये शोध संस्थान छात्रों को जानकारी के अभाव में इन वर्गों के छात्रों को शोध करने से वंचित करने के प्रयास में लगे हुए हैं. आरक्षण की इस नियमावली से ऐसे शोध संस्थानों पर कुंडली मारकर बैठे सवर्ण बुद्धिजीवियों को सांप सूंघ गया है. इस राजनीति का एक हिस्सा यह भी है कि जो छात्र जिस जाति का होगा उसको उसी जाति का ही निर्देशक उपलब्ध होगा. कहने का आशय यह कि विद्वता की सारी पोटली जो उच्च वर्गीय गुरुओं के पास है वह केवल उच्चवर्ग के चेलों के लिए है.

अब यदि हम शोध के विषयों की जांच पड़ताल करें खासकर मानविकी विषयों की, तो सारे के सारे शोध उन्हीं लोगों के कार्यों पर केन्द्रित होंगे जिनकी कृपा से ऐसे सवर्णवादी मानसिकता के नुमाइंदो को उनकी जगह मिली है. हिन्दी जैसे विषय के शोधों की यही हालत है. वे ऐसा कोई नया विषय शोधार्थियों को नहीं बताते जिससे वे ज्ञान को आगे बढ़ाने में सकारात्मक रूप से भागीदार हों. आप फलां लेखक, फलां साहित्यकार, फलां सामाजिक कार्यकर्ता आदि विषयों पर अपना शोध पूरा कीजिए तभी आपके शोध का महत्त्व है अथवा नहीं. यदि आप उनके मन का नहीं करते हैं तो वे आपकी पी-एच.डी जीवन भर नहीं पूरी होने देंगे. यदि आपने उनके घर के काम-काज नहीं किए तो भी आपकी पी-एच.डी. रह गयी अधूरी. भले ही आपका नामांकन हो गया हो और आप कितने ही योग्य क्यों न हों. आपने ये सारे काम नहीं किए तो आपकी सारी की सारी योग्यता धरी की धरी रह जाएगी.

अब सवाल आता है शोध के निष्कर्ष का. शोध का निष्कर्ष वही होना चाहिए जो शोध निर्देशक निकलवाना चाहता है. उसने जिस कथाकार, साहित्यकार, कार्यकर्ता आदि के कार्यों पर शोध करने के लिए आपको कहा है उसका निष्कर्ष उसको महिमामंडित करते हुए दिखना चाहिए भले ही उसका कार्य समाज के लिए प्रासंगिक हो या न हो. उसके द्वारा किए गए कार्यों को आपने अपने निष्कर्ष में बढ़ा-चढ़ाकर नहीं लिखा तो चली आएगी आपकी थीसिस वापस और आपको उसे फिर से सुधारने के लिए कहा जाएगा और उसमें उन बातों को लिखने के लिए कहा जाएगा जो आपके गले के नीचे नहीं उतरेगी. मरता क्या न करता की हालत में आप अन्तिम चरण में वही करेंगे जो आपके निर्देशक महोदय कहेंगे. ऐसी स्थिति में शोध में मौलिकता और तटस्थता कहां से आएगी आप कल्पना कर सकते हैं.

सरकार दिनोंदिन उच्च शिक्षा और शोध के नए-नए संस्थान तो खोल रही है पर जब तक इसके पीछे होने वाली राजनीति और इस राजनीति को अंजाम देने वाले लोगों पर लगाम नहीं कसी जाएगी तो हम वहीं के वहीं रह जाएंगे जहां हमारी स्थिति सैकड़ों वर्ष पहले थी. शोधार्थियों को भी चाहिए कि वे ऐसी राजनीति के शिकार न हों और उनका डटकर मुकाबला करने का हर सम्भव प्रयास करें तभी उनका शोध समाज के लिए प्रासंगिक होगा और एक बेहतर भविष्य की कल्पना साकार हो सकेगी.


31 अक्टूबर 2008

लडते हैं मरते नहीं हैं दख़ल - भित्ति पत्रिका से

महत्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा २०० के आस-पास लोग एक पहाडी़ पर रहते खाते पीते हैं कभी-कभी लडते भी हैं पर मरते नहीं हैं मरना यानि संख्या का कम होना जो आया कभी नहीं गया पचटीला की एक पहाडी़ है . जिसके पाँच टीले है जिस वजह से श्हर से मुंह भी चुपा सा हुआ है यहाँ लोग लिखते हैं यहाँ कि हर रात हर सुबह किसी न किसी राष्ट्रीय पत्रिका की कहानी बन ही जाती है .फिदेल ने कल क्या किया देश को पता हो या न हो कैन्टीन में शाम की चाय के वक्त पता चल ही जाता है . हा दुनियाँ में जो घटित हुआ सो तो हो गया . पर होना क्या चाहिये यह यहाँ के लोग तय करते हैं पर मुश्किल कि वह होता नहीं . भला सोचो हिटलर और मार्क्स आपस में मिले तो गले लगें और फ़िर बात करें ..............खैर मौका मिले तो आइये कभी , बिता के जाइये लेकिन ये झूठ है कि आने के बाद आप जायेंगे . दीवाल पर एक पत्रिका निकलती है सो उसके अंश यहाँ लगा रहा हूँ देखिये.....
रागदरबारी :-

कुछ नया घटित होने वाला था कि बस होने ही वाला था कोई आसमान से तारा टूटने वाला था सब उसकी तर्फ निगाह लगाये बैठे थे जैसे युगों की रोसनि आने वालि थि विश्वविद्यालय कि गाडी़ दाहिने ट्रैक पर मनमाने ढंग से चल रही थी जो आज सही था वह कल गलत हो रहा था परसों फिर सहि हो रहा था सब गड्डम गड्ड कितने बार धक्के लगे गिरि पडी़ पर ट्रैक नहीं बदला मानों ड्राइवर ने दाहिने से चलने की जिद थाम लि हो पर यह जिद भी ऎसि नहीं कि मदिरा पान के नसे मेम यह सब कुछ खलासी के इसारे पर चल रहा था कई बार तो गाडी़ बीच से चलती लगता सही रास्ता अख्तियार कर लेगी पर तब तक खलासी का इसारा होता और फिर ड्राइवर दाहिने पर मोड़ देता ऎसे वक्त में कैटीन ही एक जगह थी जहाँ बैठ लोग ड्राइवएर के पागलपन के किस्से सुना सुनाया करते थे कहाँ कहाँ के किस्से निकल जाते जितने मुहं उतनी बातें नही बल्कि जितने दांत उतनी बातें होयी थी किस्सागोई के इस चर्चे में नयी बात निकल कर आयी जो पीएच. डी . के एडमिसन हुए बिना ही शांतिकुटी से राग भाई खोज लाये थे यह पूरी तरह से ओरल हिस्ट्री थी जिस पर आस्था के साथ विश्वास किया जा सकता था पर तर्क नहीं विश्वविद्यालय तर्कों पर नहीं चलता राग भाई ने जेब से एक पुर्ची निकाली और पढ़ना शुरुउ किया ये उनके सिनाप्सिस का विषय था जिसका शोध अभी बाकी था .कहा जाता है कि विश्वविद्यालय की अवधारणा कुछ भले मानुस द्वारा १९७५ में हुए नागपुर के विश्वहिन्दी सम्मेलन में रखी गयी थी पर शोध इस बात किओ खन्डित करते हुए इसके इतिहास को द्वापर युग से प्रतिस्थापित करता है कुछ लोगों के मुंह से ब्रेड पकौडा़ गिर गया दरबारी भाई चाय की एक और चुस्की मार लिये और अपनी मूँछ विहीन होठ को पोछकर ध्यान से सुनने लगे खैर उनके लिये कुछ भी अब अद्भुत लगना बंद हो गया था क्योकि उन्हें पंचटीला में डायनाशोरॊम का निवास नामक शीर्षक से किया गया शोढ याद था शायद उससे आगे का यह शोध था राग भाई ने कहना जारी रखा था यह द्वापर युग की बात है जब नारद जी धरती पर उतरे थे विष्णु की बातों का खयाल रखते हुए उन्हों ने एक सुनसान जगह ढूढ़ ली थी रात के तकरीबन १० बज रहे थे उनके पास न तो अम्बेजडर थी न ही पुस्पक विमान बस हवा में उतर गये थे उन्हें सरस्वती ने धरती पर शिक्षा की स्थिति का जायजा लेने के लिये भेजा था कहा जाता है कि तब यू. जी. सी. नही थी सरस्वती डायरेक्ट उपर से ही सब कुछ डील करती थी बाद में जब जनसंख्या बढी़ फेलोसिप का मामला आया विश्वविद्यालयों में घोटाले होने लगे तो यू.जी.सी की अवधारणा रखी गयी.एकांत ढूंढ़ते हुए जब नारद पंचटीला की पहाडी़ पर उतरे जिस जगह उनके चरण पहली बार पडे़ थे कहा जाता है अभी रजिस्ट्रार आफिस के रूप में वहाँ का भवन बनाया ग्या है . कहा तो यह भी जाता है कि नारद की आत्मा अभी भी रात में १०-११ बजे के बीच यहाँ भटका करती है और एक्वागार्ड तक जाते-जाते गायब हो जाती है दरबारी भाई पूछ पडे़ कि एक्वागार्ड तक ही क्यों ? राग भाई ने अपने मुंह पर उंगली रखते हुए चुप रहने का इशारा किया दरबारी भाई चुप ....नारद जब अवतरित हुए तो कोई भवन नहीं था सब कुछ वीसी आवास की तरह शंत था उन्हें प्यास लगी थी और नारद देर तक प्यास से व्याकुल यहाँ खडे़ रहे फिर यही वह जगह हैं जहाँ खडे़ होकर उन्होंने सरस्वती को फोन मिलाया था पर एयरटेल की सिम सो नेटवर्क का भारी प्राबलम सारे दुनियाँ के शिक्षा विदों का फोन मिलाया सब स्विच आफ उन्हें पता नहीं था कि दिन का टीचर रात में विश्वविद्यालय में का एक अधिकारी होता है और अधिकारी अपना फोन चालू नहीं करते फौरन उन्होंने सरस्वती को फोन लगाया बोला माते बडी़ बिडम्बना है ऎसी जगह उतरा हूँ जहाँ सब कुछ वीरान है, चारो तरफ शांति छायी हुई है सामने पहाडि़यों के नाम पर कुछ टीले है(तब पंचटीला की पहाडि़याँ बहुत छोटी थी और उनकी लम्बाई में बृद्धि हो रही थी) नेटवर्क से पता चल पा रहा है कि यह एशिया का जम्बूदीपे भारत खण्डे नामक कोई प्रान्त है. पूरा आसमान यहाँ से साफ दिखाई पड़ रहा है आप किधर बैठी हो मै .....आवाज कट रही है माते. नारद मुनि थोडा़ खिसक जाते हैं और वहाँ खडे़ हो जाते है जहाँ अभी इंटरनेट का टावर लगा हुआ है अब आवाज साफ आने लगी थी नारद मुनि अपना बोलना जारी रखे ....माते पूरा आसमान साफ है बस पहाडी़ के उस पार से बादल की एक लकीर बनी हुई है लगता है शुक्राचार्य इधर से गुजरा है जरूर हमारे फिराक में आया होगा. पर माते प्यास के मारे उदर में त्राहि त्राहि मची हुई है .सरस्वती ने सुझव दिया नारद यह धरती है यहाँ अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है पर भारत खंडे क्षेत्र में जहाँ के नेटवर्क से तुम बात कर रहे हो वहाँ तुम्हें कोई समस्या नहीं होगी जनेऊ बाहर निकाल लो और अपनी चुटिया में कंघी करके लहराते चले जाओ पूरा ब्रहमणॊं का ही राज है रही बात पानी की तो तुम तत्काल शक्ति का प्र्योग करो और पहाडी़ के उस पार आते बादल को पानी में बदल कर ......इतने में फोन कट गया नारद को पता नहीं था रोमिंग का चार्ज . पर उन्हें बात समझ में आ गयी थी और वे टहलते हुए वहाँ पहुचे जहा व्र्तमान में वी.सी. आफिस बनी है यहीं पर खडे़ होकर अपनी शक्ति का प्रयोग किया था नारद ने पर बादल पानी में नहीं बदला फ़िर से प्रयास किया नाकाम रहे और छलांग लगाकर बादल तक पहुंच गये देखा तो सब कुछ धोखा था यह बादल नहीं धुंवा था जिसमें से गंध आ रही थी श्रोत को पकड़ धुएं के सहारे नाराद पहाडी़ के उस पार पहुंचे जहाँ से धुँवा उठ रहा था देखा तो अद्भुत दृष्य था देवों के देव महादेव शिव पहाडी़ के इस पार बैठकर सिगरेट पी रहे थे.तब धूम्रपान पर किसी भी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं था और खुलेआम नाशा किया जा सकता था पर शिव की इस आदत के खिलाफ विश्णु ने याचिका दायर की थी जिसका जिक्र ऋगवेद के पंचवें अध्याय में मिलता है. इतिहास्कारों का मानना है कि पृथवी लोक पर डाली गयी यह पहली याचिका थी इतिहासकारों का यह भी मानना है कि सभी देवों में शिव ही थे जो सभी तरह के नशीले द्रव्यों का पान किया करते थे पर बडे़ बुजुर्ग होने के नाते कोई देवता उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटाता था यह भी माना जाता है कि वर्धा को ड्राई सिटि बनाने का काम विष्णु की उस याचिका ने किया था. शिव के मुह से बदब्म्म आने के कारण अक्सर विष्णु नजदीक से बात नही किया करते थे जिस बात को लेकर पार्वती और लक्षमी में तू-तू मै-मै हो गयी थी. इन सब बातिओं से परेशान होकर विष्णु क्षीर सागर चले गये थे कहा जाता है कि विष्णु पुरुषवादी मानसिकता के थे और दिन भर लक्षमी से पाँव दबवाते थे तब कहीं भी स्त्री अध्ययन जैसा कोई कोर्स नहीं खुला था पर नारी चेतना को लेकर सरस्वती काफी सजग थी और लक्ष्मी की ये हालत देख ही स्त्री अध्ययन की अवधारणा उनके विचार में आयी थी .वर्धा के ड्राई सिटि बनने के बाद शिव कैलास पर्वत चले गये माना जाता है कि वे आज भी वहीं कहीं निवास करते हैं पर उन पर अभी हाल मेम आरोप लगाया गया है कि हिमालय के ग्लेशियर उन्हीं की धूम्रपान की वजह से पिगल रहे है. अगले अंक में जारी.........



बढ़ता महिला यौन शोषण:- चरणजीत म. गा. अं. हि. वि. वि. से

हम इक्कीसवीं शदी के आधुनिक युग में जी रहे हैं एक महाश्क्ति के रूप में भारत अपने को साबित कर रहा है. यह युग सूचना की क्रांति और लोकतंत्र के मूल्यों का देश है जहाँ स्वतंत्रता और स्वेक्षा पूर्वक जीवन जीने का हक सबको हासिल है स्त्रीयों के शोषण अन्याय दुर्व्यवहार को ऎतिहासिक रूप से ही देखा जाता है और आज के समाज में इन्से मुक्त हो जाने की बात कही जाती है कि आज महिलाये स्वतंत्र हैं पर वास्तविकतायें कुछ और ही कहती हैं आज के समय में म्हिला यौन शोषण में गाँवों से लेकर शहरों तक बृद्धि हुई है. स्थिति ये है कि मैट्रों शहरों मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास जैसे शहरों में दिनों में भी महिलायेणं अपने आपको असुरक्षित महसूस करती हैं स्त्रियाँ अपने कामों के लिये जब घर से निकलती हैं तो सड़क, बस स्टैन्ड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल पुलिस स्टेशन, बस रेलगाडी़ में तो असुरक्षित महसूस ही करती हैं पर इससे कम असुरक्षा उन्हें घरों में नहीं होती है.कम मामले सामने आने के बावजूद हर रोज अखबारों में ५-१० मामले खबरों में दिख ही जाते हैं. जिस तरह से फूलन देवी का मामला सामने अया और उन पर फिल्म बनने के बाद लोगों ने उन्हें जाना, भवरी बायी जो उच्च जातीयों कीजातीय हिंसा और यौन उत्पीणन का शिकार बनी उस तरह के कितने ऎसे मामले है जो घरों गाँवों में दबा दिये जाते हैं या महिला खुद ही झेल लेती है. महानगरों में टी.वी. रिपोर्टर वकील डाक्टर जैसी सशक्त महिलायें भी जो समाज में अग्रणी भूमिका निभाती हैं अपने आपको असुरक्षित महसूस करती हैं.महानगरों में भाग्दौड़ की जिंदगी ने जो असंवेदन शीलता भर दी है उसकी एक बानगी देखी जा सकती है कि बंगलौर में आयशा नम की एक पत्रकार बताती हैं कि बंगलौर एक हाइटेक सिटि के रूप में देखा जाता है आधुनिकता का पर्याय भी माना जाता है पर स्थिति ये है कि केवल रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी सड़क चकती महिलाओं के साथ अभद्रपूर्ण व्यवाहार किया जाता है २९ अक्टूबर ०७ को याद करते हुए वह बताती हैं कि इस दिन वे ट्रैफिक में फंसने के कारण आटॊ से उतर कर पैदल चलने लगी तभी मोटर्सायकिल से सवार कुछ लड़के आये और गाडी़ उनके सामने खडी़ कर दी एक ने मुझे धक्का दिया फ़िर जब उन्होंने बाइक को धका देने का प्रयास किया तो एक लड़के ने भद्दी गाली दी पर लोग खडे़ होकर अगल-बगकल देखते रहे कोई सामने नहीं आया जब मैने एफ. आइ. आर. की बात कही तो तो वे लड़के हंसने लगे क्योंकि उन्हें पता था कि पुलिस क्या करती है. फिर मैने पीछे बैठे लड़के को मारा तो वह भी मुझे मारा और ये सारी घटनाये लोग तमासाबीन होकर देखते रहे कोई सामने नहीं आया स्थितियाँ इतनी विपरीत हैं कि महिला सड़कों पर अकेले नहीं चल सकती अतः उसे अपने भाई माँ बाप के साये में ही चलना पड़ता है जहाँ वह गुलामी का एक सुकूं महसूस करती है. चन्डीगढ़ जैसे शहरों की स्थिति ये है कि वहाँ कुंवारी लड़कियाँ जब अपने घरों से निकलती हैं तो अपने गले में मंगलसूत्र डालकर निकलती हैं क्योंकि शादीशुदा होने का भ्रम बनाना चाहती है यह है आजादी का मतलब है आज के समाज में महिलाओं की.दुनियाँ मेम यौनशोषण का ग्राफ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है.नाबालिग लड़कियों से लेकर उम्रदराज महिलायें तक इस शोषण में आती जा रही हैं युनिसेफ के एक सर्वेक्षन से पता चलता है कि सिर्फ एशिया में हर साल दस लाख युवतियाँ यौनशोषण की दलदल मेम धकेली जा रही हैं. जिसमे थाईलैन्ड जैसे देश का नाम अग्रणी रूप से सामने है जहाँ हर साल दस हजार लड़कियाँ यौनव्यापार में ढकेली जाती है. इसमे सिर्फ आर्थिक कार्ण ही नही है बल्कि कुछ अन्य सामाजिक कारण भी है जिनके कारण इतनी बडी़ संख्या में महिलायें यौन शोषण मेम ढकेलि जाती हैं यह घटनायेम तथाकथित विकसित देशों मेम भी इससे कम गति की नही है और वहाँ का ग्राफ एक गंभीर रूप लेता जा रहा है. यह एक बडे़ उद्योग के रूप में पनप चुका है और पूंजीवादी समाज की जरूरत बन चुका है.विश्व भर मे महिला शोषण का बढ़ता ग्राफ चिता का विषय है इसके साथ-साथ यौनशोषण से अन्य समस्यायें भी उभर रही हैं और यह व्यापकता मेम आ रहीं है दिशियों को दन्डित करने के लिये कानून भी बनाये गये है ढेर सारे महिला संगठन भी काम कर रहे हैं पर यह समस्या न तो कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है न्याय व्यवस्था खोखली साबित हो रही है ऎसी स्थितुइ मेम समाज को अन्य सम्स्याओं से हटकर इस समस्या पर गंभीरता से बात करने और सोचने की जरूरत है.साधारणतया समाज इसी दृष्टिकोण से इन समस्याओं का वर्णन करता है कि स्त्रियों द्वारा इस तरह के पहनावे प्र्योग में लाये जाते हैं जिससे मानसिक रूप से यह पुरूषों को आकर्षित करता है या यह कहा जाता है कि महिलायें अकेले न घूमेम कार्यालयो मेम अकेले नौकरी करना या अन्य इस तरह के आम बातेम है जो पुरुष मानसिकता से ग्रसित होकर कही जाती हैं अब सवाल यह उठता है कि क्या उपरोक्त कारण पुरुषों को ये वैद्यता देते हैं कि वे महिलाओं के साथ छेड़खानी करें या उपरोक्त कारणों मेम स्त्री क्या कोई अपराध कर रही है . यहाँ साफ पता चलता है कि समस्या महिलाओं की नही है बल्कि पुरुष के पित्रसत्तात्मक मानसिकता का है . अतः ऎसी स्थिति में पुरुषों को इस मानसिकता से बाहर आकर महिला की समाज मेम बराबर की हिस्सेदारी और भागीदारी की लडा़ई में सामिल होना चाहिये जहाँ एक बेहतर समाज की संकल्पना की जा सके और महिलाओं के संघर्षों मे साथ रहते हुए हमे उनके लडा़ई के पक्ष मेम खडा़ होना चाहिये.


लोकतंत्र का एक कुरुप चेहरा:- कमला थोकचोम म. गा. अं. हि. वि. वि.

मणिपुर एक राजकीय देश था.२१ सितम्बर सन १९४९ को मणिपुर को उस समय के राजा बुद्धचन्द्र को इम्फाल में बुलाकर भारत ने एक समझौता किया . और इस समझौते के बाद १५ अक्टूबर १९४९ को मणिपुअर को भारत के संघ में सामिल कर लिया गया इसके साथ ही मणिपुर भारत का एक राज्य बना लिया गया. आज भी हर साल १५ अक्टूबर को मणिपुअर का काला दिवस के रूप में वहाँ की जनता के द्वारा मनाया जाता है यह वह दिन था जब कहा जाय कि मणिपुर प्र भारत ने कब्जा कर लिया.और कई लोग पूरे महीने काली पट्टी बांधकर चलते हैंआखिर ऎसा क्यों है कि लोग इस दिन को काले दिवस के रूप मेम याद करते हैं कई सालों तक हम इसका मतलब नहीं समझते थे.पर हर दिन घटनें वाली घटनायें देखकर ऎसा लगा कि इतिहास में यह वह मोड़ था जब लोकतंत्र की आड़ मेम मणिपुर को कब्जे में लिया गया. तब से अब तक मणिपुर की जनता दिनों दिन अत्याचारों को सहते हुए आ रही है. और यह कम होने के बजाय दिनों दिन बढ़ रहा है. भारत में अग्रेजों के सत्ता छोड़ने के बाद १९५८ में ही राज्य पर आफ़्सपा नामक एक गैरलोकतांत्रिक कानून लगादिया ग्या है जिसके आड़ में वहाँ के लोगों को मारा जा रहा है वहाँ की महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनायें आम हो गयी हैं . और न जाने कितनी औरते विधवा हो गयी हैं कितने बच्चे अनाथ हो गये कितने माँ बाप बेसहारा हो गये हैं मणिपुर में जिंदगी की अहमियत को आफ़्सपा ने खत्म कर दिया है. स्थिति ये है कि किसी भी व्यक्ति को पकड़ कर इन्काउंटर कर दिया जाता है और उसके हाँथ में बंदूक थमा कर उसे आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है यह एक आम बात हो गयी है जिसे वहाँ का हर इंसान जानता है और सहमा हुआ सा जीता है कि कब उसकी बारी आ जाय राष्ट्रीय मीडिया चंद खबरों को ही अब तक अहमियत दिया है उसमे से एक है मनोरमा हत्या कांड कुमारी थांजम मनोरमा चनु जो कि ३२ वर्षीय महिला थी ११ जुलाई २००४ को बामोन कंपू इम्फाल इस्ट से रात दस बजे १७ असम राइफल्स के जवानों ने उन्हें उठा लिया गलत तरीके से अरेस्ट मेमो दिखाया गया और बिना किसी महिला पुलिस या बिना किसी नजदीकी थाने की सहयाता के वे उसे पकड़ कर ले गये उसे घर मे घर वालों के सामने देर तक पीटा गया और दूसरे दिन घर से तीन किमी की दूरी पर उसकी लास राजमार्ग पर पायी गयी घर वालों ने लास लेने से इनकार कर दिया और न्याय न मिलने तक लास को अपने घर लाने से मना कर दिया. ऎसी स्थिति में उसकी लास कुछ दिन के बाद म्युनिसपल्टी के लोगों द्वारा जला दी गयी. मनोरमा के मरने के ठीक ४ दिन बाद महिलाओं ने निरवस्त्र होकर असम राइफल्स के गेट पर प्रदर्शन किया और नारा दिया इंडियन आर्मी रेप अस गो बैक इंडियन आर्मी यह उनका एक प्रतिरोध था कि अपनी बेटियों पर हो रहे अत्याचार को वे सह नही सकती. पवित्रता का ढोंग रचने वाले देश को एक चेहरा दिखाया. इस साल की २२ जुलाई को भी हजारॊं विरोधियों ने इसका विरोध किया और कई नारे दिये काला कानून हटाओ, उत्तर भारत से आफ्सपा को भगाओ, कांगला को आर्मी से मुक्त करो कांगला एक ऎतिहासिक जगह है मनोरमा केस की जाँच रिपोर्ट को प्रकाशित करो, २४ जुलाई को पांच कारयकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के गेट पर खुद को जलाने की कोशिश की इसके पश्चात २६ जुलाई को मणिपुर छात्र संघ के छात्र छात्राओं को राज भवन के गेट पर आफ्सपा के जवानों ने पीता, कितनी ऎसी घटनायें बीत चुकी हैं जिनका जिक्र चंद हर्फों में नही किया जा सकता एक दिन वह भी याद करना जरूरी अगता है जब देश का प्रधान मंत्री लाल किले पर तिरंगा फहरा रहा था और बिसन पुर मणिपुर मेम पेबम चितरंजन नाम का ३२ वर्षीय एक युवक १५ अगस्त को अपने को यह कहते हुए जला लिया कि इस कानून में मरने से अच्छा है मसाल जी तरह जलकर मरना तकि भारतीय लोकतंत्र पने लोकतांत्रिक चेहरे को देख सके इसी साल २१ जुलाई को मनोरमा काश्राद्ध कर्म मनाया गया पर इसके बावजूद पूरा देश शान्त हैं हमे नहीं पता हम कब नहीं रहेंगे कब अपने घर से निकलेंगे और माँ इंतजार में खडी़ खडी़ बूढी हो जायेगी और हम नहीं लौटेंगे.