07 मई 2008

क्या मार्क्सवाद धर्म है?

बीसवी शदी में दुनिया में जितने भी महान दार्शनिक हुए सभी को मर्क्स्वाद ने प्रभावित किया:एजाज अहमद.मार्क्स की १९० वीं जन्मदिवस पर गोरख पान्डे का यह लेख.
मार्क्सवाद को धर्म बताने की कोशिश एक राजनीतिक हथकंडा है। यह काम बहुत पहले से होता रहा है। मार्क्सवाद के बारे में इस बचकानी समझ पर कवि गोरख पाण्डेय ने गंभीरता से विचार किया है। प्रस्तुत है उनके शोध प्रबंध का एक अंश-
मार्क्सवाद धर्म की व्याख्या कर वैज्ञानिक ज्ञान के पक्ष में धर्म के समाप्त होने की घोषणा करता है। कुछ लोग अंधमत के इस तरह के शिकार हैं या शिकार बनना चाहते हैं कि मार्क्सवाद को भी धर्म कहने लगे हैं। उनकी दृष्टि में जो कुछ भी है धर्म है। यह दिन की तरह खुली बात है कि नास्तिकता और आस्तिकता में भेद है, ईश्वरवाद और निरीश्वरवाद में भेद है, स्वर्ग के काल्पनिक सत्य और जगत के कठोर याथार्थ में भेद है। धर्म आस्तिकता, ईश्वरवाद और स्वर्ग के काल्पनिक सत्य का नाम है। यदि ध्यान दें तो पाएंगे कि मार्क्सवाद चेतना और भौतिक पदार्थ के पारस्परिक संबंध के प्रसंग भौतिक पदार्थ को, जो अचेतन है, शास्वत, गतिशील सत्ता मानकर किसी भी किस्म की धार्मिक या भाववादी ब्याख्या का पूर्ण निषेध करता है। चेतन ईश्वर या आत्मा को जगत के मूल में न मानना अधर्म है, धर्म नहीं।
क्या धर्म उसे कहते हैं जिस सिद्धांत में मानवीय स्वतंत्रता, समानता,भातृत्व की चर्चा की गई है ? मार्क्स के अनुसार ये चीजें भी भौतिक उत्पादन के आधार पर निर्मित है, किसी मानवीय आत्मा या साधु पुरुष की कृपा का फल नहीं है। इनका भी इतिहास में अनिवार्य रूप से अर्थ बदलता रहता है, संघर्षों के जरिए नई धारणाओं का विकास होता रहता है। और अनिवार्य भौतिक तथा ऐतिहासिक द्वंध की धारणा के अनुसार जीवन प्रकृति के कठोर नियमों से संचालित है, उसमें किसी भी किस्म का परिवर्तन वर्ग संघर्ष, उत्पादन संघर्ष और वैज्ञानिक ज्ञान के जरिए प्राप्त किया जा सकता है।
मार्क्सवाद को दो तरह के लोग ‘धर्म’ कहते हैं। एक तरफ वे लोग हैं, जो धर्म को व्यापक मानते हैं कि अधर्म, नास्तिकता वगैरह को भी उसी निगाह से, उसी दायरे में देखते हैं, दूसरी तरफ हर संगत और निश्चयपूर्वक बोलने वाली ज्ञान प्रणाली को धार्मिक अंध-श्रद्धा के रूप में देखते हैं। बर्कले ने भौतिकवाद को धर्म का दुस्मन माना था और उसके विरूद्ध जेहाद का नारा दिया था। ईसाई धर्म का परावर्ती इतिहास वैज्ञानिक ज्ञान के दमन का इतिहास है। विज्ञान दिनोंदिन उन्नति करता जा रहा है, प्रकृति और मानव समाज के रहस्य एक-एक कर खुलते जा रहे हैं और इस स्थिति में भ्रम फैलाने की निश्चचित योजना के अनुसार संदेहवाद और धर्मवाद की ओर से टुच्ची कोशिशें की जा रही हैं। वैज्ञानिक ज्ञान के प्रति संदेह अंतत:धर्म के पक्ष में जाता है।
मार्क्स ने फायरबाख की आलोचना इसलिए की थी कि वह असंगत भौतिकवादी है; धर्म, भाववाद को छूट देता है और नास्तिकता को एक नए धर्म में बदल देता है।
एंगेल्स ने “लुडविग फारबाख तथा क्लासिकल जर्मन दर्शन का अंत” में लिखा है-फायरबाख का यह कथन, कि “केवल धार्मिक परिवर्तनों से ही मानवीय यूगों की विशिष्टता का निर्माण होता है”, निश्चित रूप से गलत है।
इसी निबंध में उन्होने लिखा है-“....मुख्य चीज उसके लिए यह नहीं है कि ये शुद्ध रुप से मानवीय संबंध मौजूद हैं, बल्कि मुख्य चीज यह है कि एक नए, सच्चे धर्म के रूप में उन्हे स्थापित कर दिया जाय। वे अपनी पूरी गरिमा तभी प्राप्त कर सकेंगे जबकि उनके ऊपर धार्मिक छाप लगा दी जाय। रिलीजन (धर्म) शब्द की उत्पत्ति रेलीगेयर से हुई है। इस शब्द का मौलिक मतलब था-एक बंधन। इसलिए दो व्यक्तियों के बीच का हर बंधन (रिश्ता) एक धर्म है। शब्द विज्ञान संबंधी इस तरह की तिकड़में ही भाववादी दर्शन का सहारा रह गई हैं। उनके लिए इस चीज का महत्व नहीं है कि वास्तविक प्रयोग के आधार पर हुए उसके ऐतिहासिक विकास के अनुसार शब्द का अर्थ क्या है, उसके लिए जिस चीज का महत्व है वह यह है कि उक्त शब्द की उत्पत्ति के अनुसार उसका क्या अर्थ होना चाहिए। और इसलिए यौन-प्रेम तथा स्त्री-पुरुष के संभोग पर देवत्वारोपण करके उन्हे एक धर्म का रूप दे दिया गया है, जिससे कि धर्म शब्द का जो उसकी भाववादी स्मृतियों को इतना ज्यादा प्रिय है, शब्दकोश से लोप न हो जाय। पेरिस के लुई ब्लांकवादी सुधारक भी पिछली शताब्दी के चौथे दशक में ठीक इसी प्रकार की बातें किया करते थे। उनका भी यही विचार था कि जो आदमी धर्म नहीं मानता वह केवल राक्षस हो सकता है। वे हमसे कहा करते थे-अच्छा तो नास्तिकता ही तुम्हारा धर्म है। फायरबाख यदि प्रकृति की मूलतः भौतिकवादी धारणा के आधार पर एक सच्चे धर्म की स्थापना करना चाहता है तो यह कुछ ऐसी ही बात है जैसे कि आधुनिक रसायन शास्त्र को ही कोई सच्ची कीमियागिरी मान ले.....।”
इस प्रकार मार्क्स तथा एंगेल्स ने एक संगत, संपूर्ण विश्वदृष्टिकोण की स्थापना की थी जिसका प्रथम सूत्र यह है कि जगत गतिशील शाश्वत पदार्थ का विकास है, जीवन तथा चेतना उसी विकास के क्रम में परवर्ती अवस्थाएं हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. चन्द्रिका जी, गोरख के इस आलेख के लिए धन्यवाद। मैं लेख से सहमत हूँ। धर्म शब्द का अर्थ है किसी भी वस्तु का व्यवहार। लेकिन शब्दों के अर्थ भी व्यवहार से बदलते हैं। अब धर्म शब्द का अर्थ भी रिलीजन का समानार्थी हो गया है। उस संदर्म में गोरख का यह आलेख भी मार्क्सवादी है। मार्क्स का दर्शन कोई जड़ दर्शन नहीं है। पर जैसे दूसरे दर्शनों को जड़ बना दिया गया है वैसे ही मार्क्सवाद को भी जड़ बना दिए जाने के प्रयास जारी हैं। ये बाहर से भी आते हैं और खुद को मार्क्सवादी कहने वाले लोगों की ओर से भी। बाहर से होने वाले प्रयासों से कोई नुकसान नही होता अपितु उन से तो बहस के माध्यम से मार्क्सवाद को लाभ ही होता है, उस के विकास में मदद मिलती है। लेकिन जब यही प्रयास खुद को मार्क्सवादी समझने और बताने वाले गैर मार्क्सवादी लोगों के द्वारा होता है तो उसे समझने में भी देर लगती है और वह मार्क्सवाद को नुकसान भी बहुत कर जाता है।
    आप का ब्लॉग देख कर प्रसन्नता हुई।

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  2. Dharma is most powerful and everlasting value for humanism and liberlism.If Marxism is a Dharma. this nothing but rediculus and childish treatment.Isn't marxism be value loaded when it willbe recongnised as a religion.And It will treated as New bhrahmanvad of dhrambhiru theory of marxism.SOo it is time to rethink about,when you are leveling "Dharma" on it.
    No doudt in our great Indian mythology "Dharma is the essential value to be alive.S one shouldn't forget that. Those foolish peole who are thinking that marxism is supernatural, my thoght is puely superficial.
    So Marxim can't aqire the meaning of Dhram and can't understand the meaning & deep imapct of it.what about to be treated as Dhrama. never ever.


    .....janardan

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  3. जनार्दन मिश्र के कथन से सहमत नहीं हो पाया, लेकिन द्विवेदी जी के कथन से मुझे लेख के बारे में वैचारिक स्पष्टता मिली...मिश्र जी धर्म शब्द के प्रयोग और उसका प्रणाली रूप में प्रयोग देखकर उत्साहित हुए और उन्हों ने धर्म के सामाजिक और सुलभ पक्ष को सामने रखा...मार्क्स धर्म की सामाजिक भूमिका को सामाजिक परिभाषाओं की मदद से ही सुलझाते हैं, और धर्म का सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप भी....साथ ही प्रत्ययवादी पक्ष को दार्शनिक तरीके से सुलझाते है...जिसे हम आम तौर पर धर्म का आध्यात्मिक सिरा कहते हैं..फायरबाख के साथ साथ हीगेल की प्रत्ययवादी पद्धति की भी मार्क्स ने प्रखर आलोचना की है..मगर हीगेल के भौतिकवादी दृष्टिकोण को मार्क्स ने अपने दर्शन का आधार बनाया है, और इसके सहायता से वे प्रकृति,धर्म,समाज और ऐसे ही कई बुनियादी सवालों की दार्शनिक तरीके से व्याख्या और समीक्षा करते हैं.

    निशांत कौशिक

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