26 दिसंबर 2007

विनायक सेन की कैद के मायने-

अपूर्वानंद
इसी महीने 10 दिसंबर को एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जा रहा था तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक शख्स की कैद लंबी हो रही थी. ये शख्स हैं इस साल मई से छत्तीसगढ़ की रायपुर जेल में बंद पीयूसीएल नेता डॉ. बिनायक सेन जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया. 45 मिनट चली सुनवाई वहां मौजूद लोगों के लिए एक भयावह अनुभव था. अभियोजन पक्ष का दावा था कि सेन माओवादी हैं और उन्हें छोड़ने का मतलब होगा सरकार की जड़ें खोदने के लिए उन्हें खुली आजादी देना. परेशान करने वाली बात ये थी कि इस दावे की प्रामाणिकता जांचने की जरूरत ही नहीं समझी गई. डॉ सेन के कंप्यूटर रिकॉर्डों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हुए सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इसमें वे पत्र हैं जिनसे ये पता लगता है कि किस तरह डॉ सेन ने नागपुर में हथियारों का प्रशिक्षण कैंप आयोजित क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा?
करने में मदद पहुंचाई. बचाव पक्ष के वकील राजीव धवन ने इस ओर ध्यान खींचने की कोशिश की कि पत्रों को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है और डॉ सेन खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए नागपुर गए थे. लेकिन अदालत का मानना था कि धवन का तर्क ट्रायल कोर्ट में देखेगा और उसके पास डॉ सेन को जमानत न देने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं.

इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात थी हमारे कुछ अनुभवी मित्रों का यह कहना कि अभियोजन पक्ष का काम ही है कि वह झूठ बोले और इसमें कुछ भी नया या अनोखा नहीं है कि सरकारी वकील ने डॉ सेन के बारे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया.

जब सरकार ही झूठ बोलने पर उतर आए तो आप क्या करेंगे? क्या देश के उच्चतम न्यायालय ने ये सिद्धांत नहीं दिया है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और जमानत से तब तक इनकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक ये स्वतंत्रता दूसरों के लिए खतरा न बन जाए? क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा? वो आदिवासी जिनके लिए डॉ सेन ही एकमात्र मेडिकल सुविधा थे. क्या खंडपीठ ने ये सोचा कि डॉ सेन की गिरफ्तारी के फलस्वरूप धमतारी अस्पताल बंद हो गया है? और इसके साथ ही पढ़ने में आता है अदालत ने किसी फिल्म स्टार को सिर्फ इसलिए जमानत दे दी कि उसके ऊपर फिल्म उद्योग के करोड़ों रुपये लगे हुए हैं.

आम आदमी सीधे सवाल पूछता है : क्या जमानत दिए जाने पर डॉ सेन के भूमिगत होने का खतरा था? ये एक तथ्य है कि बंगाल में अपनी छुट्टियां बिताने के बाद डॉ सेन मई में रायपुर लौटे थे, ये पता होने के बावजूद कि स्थानीय मीडिया के सहयोग से छत्तीसगढ पुलिस उनके बारे में दुष्प्रचार कर रही है. उनके भाई ने उन्हें एक पत्र भी भेजा था जिसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि लौटने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. लेकिन वह वापस आए और जैसी कि आशंका थी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. अगर छत्तीसगढ़ पुलिस अदालत को जैसा बता रही थी वैसा होता तो डॉ सेन मई में ही भूमिगत हो जाते. उनका वापस आने और कानून का सामना करने का फैसला पर्याप्त आधार होना चाहिए था कि कोई भी अदालत उन्हें जमानत दे देती. केस की जानकारी रखने वालों के मुताबिक सरकार द्वारा ट्रायल कोर्ट में मामले को लटकाए रखने के लिए अपनाई गई चालबाजियां छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है.
इस बात का सबूत हैं कि सरकार की दिलचस्पी केवल डॉ सेन को लंबे समय तक कैद रखने में है. इसका नतीजा ये हुआ कि सलवा जुडूम के नाम पर हो रहे सरकारी अत्याचारों का पर्दाफाश करने वाली एक ताकतवर और भरोसेमंद जुबान खामोश हो गई है. इसका मतलब ये भी है कि मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले समुदाय के सारे संसाधन अब अपने नेता को आजादी दिलाने में लग जाएंगे. नतीजतन सरकार को निर्बाध दूसरी ज्यादतियां करने की छूट मिल जाएगी.

छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है. जब डॉ सेन ने छत्तीसगढ़ सरकार की जनविरोधी प्रकृति का भांडाफोड़ करना शुरू किया, जब उन्होंने सलवा जुडूम और एनकाउंटर के नाम पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की तो सरकार उसे बर्दाश्त न कर सकी. उसने डॉ सेन की जुबान बंद करने का फैसला कर लिया. सबसे आसान तरीका था उन्हें माओवादी घोषित कर देना.

डॉ सेन कितने दिन जेल में रहेंगे कहा नहीं जा सकता. जो निश्चित रूप से कहा जा सकता है वह ये है कि डॉ बिनायक सेन जैसे लोगों के जेल में बिताये गये हर दिन का मतलब है भारत में लोकतंत्र और आजादी के एक दिन का कम हो जाना. हमें ये जानने की आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जेलें डॉ सेन जैसे सैकड़ों लोगों से भरी हैं. ऐसे कई सीपीआई कार्यकर्ता हैं जिन्हें सिर्फ इस अपराध में माओवादी करार देकर जेल में ठूंस दिया गया कि उन्होंने सलवा जुडूम का विरोध किया था. माओवादियों की हिंसावादी राजनीति का समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन जब राज्य में किसी भी विपक्ष को माओवादी बता जेल में ठूंसा जाने लगे तो ऐसा उनकी राजनीति को निश्चित तौर पर थोड़ी सी वैधता प्रदान करता है. क्या सरकार ऐसा जानबूझकर कर रही है? क्या ये सरकार खुद भारत का अलोकतंत्रीकरण कर रही है?
साभार तहलका

यह चरित्र है संसदवादी कम्युनिष्टों काः-

के ए शाजी
संसदवाद की प्रणाली में अपने को फिट करते-करते अब भारतीय कम्युनिष्तों का चरित्र सामने आा रहा है चाहे वह नंदीग्राम में हो या फिर केरल में
बुद्धदेव भट्टाचार्य अब शायद खुश होंगे। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का नंदीग्राम मार्का मार्क्सवादी समाजवाद अब केरल के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। राज्य के इडुक्की जिले में कॉमरेड भू-माफियाओं और पर्यटन व्यवसायियों के हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसकी मार पड़ रही है उन गरीब आदिवासियों पर जिन्हें उनकी सदियों पुरानी ज़मीनों से खदेड़ा जा रहा है।

पार्टी के नवउदारवादी नेता पिन्नाराई विजयन, टीएम थॉमस, आइसाक और एमए बेबी के स्थानीय गुंडों ने इडुक्की की ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है। इडुक्की हाल तक मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन का गढ़ हुआ करता था जहां उन्होंने बड़े भू-माफियाओं को बाहर खदेड़ने के लिए कड़े क़दम उठए थे। लेकिन ताकतवर माफियाओं ने स्थानीय सीपीआई और सीपीएम, दोनों को अपने पाले में कर लिया। नतीजा, अच्युतानंदन का सबसे मजबूत गढ़ उनके हाथ से जाता रहा।

नवंबर के आखिर में हजारों की संख्या में सीपीएम कैडरों ने हिल स्टेशन मुन्नार के पास बसे गांव चिन्नाकनाल की 53 एकड़ सरकारी ज़मीन पर कब्जा कर लिया. इस जमीन पर करीब कुछ महीनों से 160 भूमिहीन आदिवासी सरकार के उस आश्वासन आदिवासियों के सामने मुश्किल हालात हैं। झोपड़ियां मार्क्सवादी आक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं और वे समझ नहीं पा रहे कि कहां जाएं। ज़िला प्रशासन और पुलिस ने उनसे आंखें फेर ली हैं और सीपीएम के लोग अभी भी आज़ाद कराई गई इस जगह की निगरानी कर रहे है।
के बाद झोपड़ियां बनाकर रह रहे थे जिसमें कहा गया था कि उन्हें इस इलाके में जमीन दी जाएगी। इन झोपड़ियों को आग लगाकर राख कर दिया गया और उनके ऊपर लाल झंडे फहरा दिए गए जो इस बात का संकेत थे कि जमीन अब आजाद है। असहाय आदिवासियों ने पास ही स्थित एक चट्टान के नीचे शरण ली और सीपीएम के लोगों ने उस ज़मीन पर अपने छप्पर डाल कर अपने "अतिक्रमण विरोधी" अभियान को अंतिम रूप दे दिया।

हालांकि पहले दिन सिर्फ अनयिरंगल और पप्पाथिचोला से ही आदिवासियों को बाहर निकालने का अभियान चला लेकिन अगले दिन सीपीएम के गुंडो ने लगभग पूरे चिन्नाकनाल गांव में आने वाली राजस्व भूमि पर लाल झंडे फहरा कर उस पर अपने अधिकार का ऐलान कर दिया। दूसरे दिन के अभियान में करीब 2000 कैडरों ने हिस्सा लिया।

अब आदिवासियों के सामने मुश्किल हालात हैं। झोपड़ियां मार्क्सवादी आक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं और वे समझ नहीं पा रहे कि कहां जाएं। ज़िला प्रशासन और पुलिस ने उनसे आंखें फेर ली हैं और सीपीएम के लोग अभी भी आज़ाद कराई गई इस जगह की निगरानी कर रहे है।

आदिवासी परिवारों ने 1500 एकड़ की जिस ज़मीन पर झोपड़ियां बनाई थीं उसे सरकार ने सालों पहले हिंदुस्तान न्यूज़प्रिंट लिमिटेड नाम की एक कंपनी को यूकेलिप्टिस के पेड़ लगाने के लिए आवंटित किया था। इन आदिवासियों को पता ही नहीं चला कि कब सीपीएम कैडरों ने अपना कब्जा अभियान शुरू कर किया। दरअसल ये पूरा इलाका आदिवासियों का ही था और कंपनी इस ज़मीन का कोई उपयोग नहीं कर रही थी। आदिवासियों को सीपीएम का कोपभाजन इसलिए बनना पड़ा क्योंकि उन्होंने ज़मीन को तब तक न छोड़ने की धमकी दी थी जब तक की सरकार उन्हें अपने वादे के मुताबिक ज़मीनें मुहैया नहीं करवाती। आदिवासी इन ज़मीनों पर ट्राइबल रिहैबिलिटेशन प्रोटेक्शन कमेटी के झंडे तले रह रहे थे।

जाने-माने आदिवासी नेता सी के जानू कहते हैं, "ये एक औऱ नंदीग्राम की शुरुआत है। आदिवासियों के आवंटन वाली ज़मीन से उन्हें बेदखल करने का अधिकार सीपीएम कैडरों को किसने दिया? ये लोग ज़मीन के मामलों में फैसला करने का अधिकार न्यायपालिका और सरकार के जिम्मे क्यों नहीं छोड़ते हैं? मामला बिल्कुल साफ है कि पार्टी बाहुबल के दम पर सार्वजनिक ज़मीनों पर कब्जा करके उसे भू-माफियाओं को सौंपना चाहती है।"

चिन्नाकनाल में सीपीएम कैडरों के इस कारनामें पर सीपीआई नेता और राज्य के राजस्व मंत्री केपी राजेंद्रन ने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ज़िला प्रशासन को आदेश दिया कि पार्टी से जुड़ाव को दरकिनार करके सभी अतिक्रमणकारियों को हटाया जाय। बावजूद इसके अभी तक सीपीएम के अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मुन्नार में ज़मीन के कब्जेदारों को हटाने के लिए बने टास्क फोर्स के मुखिया केएम रामानंदन ने इस मसले को हल करने के लिए सभी पार्टियों की मीटिंग भी बुलाई लेकिन इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला।

गुस्साए आदिवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो सीपीएम ने चिन्नाकलान में हड़पी गई ज़मीनों को वापस न करने की ठानी हुई है। चिन्नाकनाल में सीपीएम के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले आदिवासी पुन्नाम्बलम कहते हैं, "अगर अधिकारियों ने तत्काल कड़े क़दम नहीं उठाए तो यहां मुथांगा जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।" मुथांगा में पुलिस ने आदिवासियों के खिलाफ सबसे कठोर अभियान चलाया था। ज़िलाधिकारी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है जिसमें कहा गया है कि चिन्नाकनाल की ज्यादातर सरकारी ज़मीन सीपीएम नेताओं के अवैध कब्जे में है।
एके एंटनी की यूडीएफ सरकार के दौरान ने जब उत्तरी केरल के वायनाड ज़िले में आदिवासियों को वायदे के मुताबिक ज़मीन नहीं दी तो इसके विरोध में उन्होंने जंगलों में अपनी झोपड़ियां बना ली थीं। इसकी प्रतिक्रिया में फरवरी 2003 में पुलिस कार्रवाई में एक आदिवासी और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई थी जबकि कई आदिवासी घायल हुए थे। इस मामले में आदिवासियों को अब तक भी जमीनें नहीं मिली हैं। पुन्नाबलम कहते हैं, "मार्क्सवादियों का लक्ष्य ये साबित करना है कि आदिवासी ज़मीन के हक़दार नहीं है। चूंकि वो सत्ता में हैं इसलिए वो आसानी से अपने दावे को सही साबित करने के लिए जाली दस्तावेज भी पेश कर देते हैं और हम पर अपनी ज़मीनों से बेदखल करने का दबाव डालते हैं। एक बार ऐसा हो गया तो वो ज़मीनों के बंटवारे को ठंडे बस्ते में डालकर इन ज़मीनों को भू-माफियाओं के हवाले कर देंगे।"

उधर, राजस्व मंत्री ने तहलका को बताया कि सभी प्रदर्शनकारी आदिवासियों को उनकी ज़मीनें वापस दी जाएंगी और लाल झंडे की परवाह न करते हुए जमीनों से कब्जे हटाए जाएंगे। लेकिन चिन्नाकनाल पंचायत में वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ये आसान नहीं लगता। पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर अस्थायी तौर पर सीपीएम कैडर हट भी जाते हैं तो आदिवासियों को ज़मीने सौंपना आसान नहीं है। स्थानीय पत्रकार टीसी राजेश कहते हैं, "सीपीएम पहले से ही ये तर्क दे रही है कि जिन 120 आदिवासियों ने अपनी झोपड़ियां यहां बना रखी थीं उनमें सिर्फ 21 के पास ही मालिकाना हक़ है। सीपीएम के लिए आदिवासियों को जारी किए गए ऑफर लेटर की फिर से जांच की मांग करना आसान है। इससे पार्टी को अपना एजेंडा लागू करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।" सालों पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री एके एंटनी और आदिवासी नेता सीके जानू के बीच हुए एक समझौते के बाद आदिवासी इन जमीनों पर बसे थे। एक भव्य समारोह के दौरान एंटनी ने 798 आदिवासियों को ज़मीन के कागज़ात सौंपे थे। लेकिन 540 परिवारों को ही चिन्नाकनाल में ज़मीन मिली। बाक़ियों को जो ज़मीनें मिली वो पहले से ही भूमाफियाओं के कब्जे में थी।

"ये गरीब लोग पिछले पांच सालों से अपनी ज़मीन के इंतज़ार में हैं। सरकार उन्हें सीधे-सीधे सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर रही है," ये कहना है आदिवासी नेता सीपी शाजी का। उधर सीपीएम नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस और सीपीआई के लोगों ने आदिवासियों को इन ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए उकसाया ताकि एक बार मामला शांत हो जाने के बाद वो खुद इन ज़मीनों पर कब्जा कर सकें।

बहरहाल ज़िलाधिकारी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है जिसमें कहा गया है कि चिन्नाकनाल की ज्यादातर सरकारी ज़मीन सीपीएम नेताओं के अवैध कब्जे में है। ज़िलाधिकारी ने ये भी साफ किया है कि आदिवासियो की ज़मीन पर कब्जा करने के पीछे टूरिस्ट रेजॉर्ट बनाने वाली एक लॉबी का हाथ भी है।

राजेश कहते हैं, "ये गांव पर्यटन के लिहाज से काफी अहम जगह पर मौजूद है जिसकी सीमाएं मथिकेत्तन राष्ट्रीय उद्यान और मुन्नार हिल स्टेशन से लगती हैं। विवादित ज़मीन दर्शनीय अनयिरंकल बांध से भी काफी नज़दीक है। रियल इस्टेट माफिया को अहसास है कि इसे बड़े फायदे के सौदे में बदला जा सकता है।"
:-तहलका से साभार

12 दिसंबर 2007

मुझे गवाह के कटघरे मे आने दो


मेरा मुक़दमा ऐसा नही की उसका फैसला
काले कोटवालों की नीली कर्रेंसी नोट देकर
किसी एक देश की किसी एक अदालत मी हो जाए
मुझे गवाह के कटघरे में आने दो

तुम लोग जो आदमी की आस्था को बरबाद करते हो
इश्वर के नाम पर मुझे शपथ क्यों दिलाना चाहते हो
निर्दोष और अपराधियों के लिए
तुमलोग एक ही कानून पर बहस करते हो
न्याय को चूहे की तरह तुम लोग उतार देते हो
वकील की फीस की गर्त में
इस काम के लिए तुम्हारी योग्यता क्या है
मुझे गवाह के कटघरे मे आने दो

तुम्हारा ही न्याय और तुम्हारा ही जेलखाना
तुम डरते क्यों हो
एक अंतहीन सांचा चला आ रहा है युगों से

यह भरा हुआ है तुम्हारे दिमाग के महलों में
तुम्हारे कबूतर गुटुर्गूँ कर रहे हैं घरेलु मुड़ेरों पे
मधुर आकांक्षाएं झरती जाती हैं हर क्षण
तुम अपने सरों को कलम क्यों नही करते
नही ढहाते कमरे की चारों दीवारें
कारों दिशाएं खोल दो फ़िर देखना तुम विश्व नागरिक कैसे नही बनते

11 दिसंबर 2007

बिहार में विकास के माडल की तलाश


प्रेम कुमार मणि
आज पूरी दुनिया में विकास की आंधी चल रही है। कभी राष्ट्रवाद और समाजवाद को लेकर भी ऐसी ही आंधी चली थी। विकास की इस आंधी ने राष्ट्रवाद को तो पूरी तरह और समाजवाद को बहुत हद तक अप्रासंगिक बना दिया है। जहां तक भारत की बात है जिस कांग्रेस ने कभी समाजवाद शब्द को भारतीय संविधान में भारतीय गणराज्य के साथ नत्थी कराने में अग्रणी भूमिका निभायी थी उसी ने उसे अप्रासंगिक बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभायी है। अब बिहार में समाजवादी तबियत के नीतीश कुमार विकास की राजनीति की प्रस्तावना कर रहे हैं जिसकी एक झांकी पिछले १९-२१ जनवरी को पटना में हुए एक ग्लोबल कांफ्रेंस में प्रस्तुत हुई; जिसे एक एनजीओ ने बिहार सरकार के सहयोग से आयोजित किया था और जिसका उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने किया। राष्ट्रपति डॉ. कलाम विकास की राजनीति के पुराने प्रस्तावक रहे हैं। इसलिए उनका भाषण रश्मी तौर पर दिया गया भाषण नहीं, बल्कि मनोयोग से तैयार किया गया एक दिलचस्प भाषण था। उद्घाटन सत्र, जो पटना कें एक बड़े सभागार में ताम-झाम के साथ आयोजित था, में मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। बिहार में कांग्रेस का जो पहला अधिवेशन हुआ था (१९१२, बांकीपुर कांग्रेस) उस में भाग लेकर जवाहरलाल नेहरू को जो अनुभूति हुई थी, कुछ-कुछ वैसी ही अनुभूति इस समारोह के बाद मेरी थी। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- 'I visited as a delegate, the Bankipore congress during christmas 1912. It was very much an English knowing upper class affair, Where morning coats and well-pressed trousers were greatly in evidence. Essentially it was a social gathering with no political excitment or tension.(Page-30)' इसमें यदि संशोधन की जरूरत है तो बस 'अपर क्लास` की तरह 'अपर कास्ट` भर की। कुलीन 'बुद्धिजीवियों` की इस खूबसूरत कांफ्रेंस में प्रतिभागियों की रूचि विकास में कम, अपनी धज प्रदर्शित करने में अधिक थी। इस समारोह को ग्लोबल नहीं गोलमाल समारोह कहने वाले लालू प्रसाद ने भी ठीक इसी समय को ब्राह्मणवादी ठीहे पर आत्मसमर्पण के लिए चुना था। इस दौरान वे अपने गांव में शंकराचार्य को बुलाकर उनके चरणों में लोट रहे थे। फुलवरिया में खुला ब्राह्मणवाद था तो पटना में प्रच्छन्न ब्राह्मणवाद। अब बिहार को इनके बीच से आगे या पीछे जाना है।

सवाल उठता है बिहार में विकास का मॉडल क्या हो? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद सोचते हैं तो उनके सोच में सामाजिक न्याय का एक पुट होता है। पंचायत चुनावों में अपनी सोच को साकार कर उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। महिलाओं और बहुत पिछड़े तबकों को पंचायत चुनावों में आरक्षण सुनिश्चित कर ग्रामीण इलाकों में उन्होंने एक नया नेतृ वर्ग खड़ा किया है। इससे जो हलचल पैदा हुई है वह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का कारक बनेगा। लेकिन नीतीश कुमार यदि यह सोचते हैं कि बाहरी निरंकुश निवेश से बिहार में विकास होगा तो वे गलती पर हैं। वास्तविक विकास के लिए ग्रामीण स्तर पर कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी रूझानों को बल देना होगा। आजादी के बाद से ही ब्राह्मणवादी-समाजवादी चेतना ने निचले स्तर पर पूंजीवादी रूझानों को हतोत्साहित किया और इसी का नतीजा है गांव और शहर की दूरी बढ़ती गयी। जिन लोगों ने यूरोप में औद्योगिक क्रांति के इतिहास का अध्ययन किया है वे यह भी जानते हैं कि किन लोगों ने वहां इसे विकसित किया था। पूंजीवाद एक अवस्था में प्रगतिशील कदम होता है क्योंकि यह सामंतवादी रूझानों को खत्म करता है। (फ्रांसीसी लेखक बॉल्जाक की रचनाओं को देखें। मार्क्स ने इसे रेखांकित किया है।) हमारे मुल्क में आयातित समाजवाद ने अपनी लड़ाई पूंजीवाद से शुरू की। (दरअसल समाजवाद पूंजीवाद से ही संघर्ष करता है।) इसका प्रतिफल हुआ कि एक तरफ तो समाज के सामंतवादी रूझान साबूत रह गये दूसरी तरफ ऊंची जातियों के प्रभुत्व वाले लोकतंत्र ने जिस समाजवाद को लाया वह ब्राह्मण-समाजवाद बन कर रह गया। उदाहरण के लिए भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में ऊंची जातियों, खासकर ब्राह्मणों के प्रभुत्व को देखंे। यह सरकारी प्रयासों से हुआ है। (विस्तृत अध्ययन के लिए गेल ऑम्वेट का लेख 'रिजर्वेशन इन प्राइवेट सेक्टर` द हिन्दू ३१ मई-१ जून २००१) अब विकास के इस दौर में देखना होगा कि निचले तबकों को लेकर हम विकास का कैसा खाका बनायंे जिससे वास्तविक विकास हो सके। शायद इसे ही नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास कहते हैं। इसके लिए पूंजी से अधिक ज्ञान और समर्पण की जरूरत है। फ्रांसीसी लेखक-चिन्तक गाइ सोमां इसे बेयरफुट कैप्टिलिज्म (नंगे पांव पूंजीवाद) कहते हैं। यह बेयरफुट कैप्टिलिज्म विकास का आधार बनेगा तभी सामाजिक न्याय भी संभव होगा। (मार्च अंक में इस विषय पर गाई सोमां का लेख देखेंगे) १९-२१ जनवरी को संपन्न ग्लोबल मीट पिछड़े बिहार को विकास की ओर नहीं, एक नयी राजनीतिक गुलामी की ओर ले जायेगा जो अंतत: एक जटिल सामाजिक गुलामी को भी जन्म देगा और जिससे जूझने में समानता और आजादी के सिपाहियों को दशकों का समय लग जायेगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे की मजबूती के लिए रात-दिन परिश्रम कर रहे हैं। हर सभा-समारोह में लाठी फेंकने और कलम-कागज पकड़ने की बात कहते हैं। बिहारियों की लगनशीलता और काबलियत पर वे इतराते भी हैं। इस मानव संसाधन को उन्होंने अपनी पूंजी माना है। जाति और संप्रदाय से बाहर आकर वे बिहारीपन की, इसके स्वाभिमान की बात करते हैं। दरअसल यही वह महत्वपूर्ण कार्य है जिससे निचले स्तर से पूंजीवादी रूझान विकसित होंगे। इसी आधार पर सम्यक विकास की रूप रेखा बन सकेगी। यही वास्तविक सामाजिक न्याय भी है। जैसा कि राष्ट्रपति कलाम ने भी २०१५ तक पूर्ण साक्षरता और पूर्ण गरीबी उन्मूूलन की बात की है। इसे हर हाल में हासिल करना होगा। लेकिन प्रवासी निवेशकों की रूचि साक्षरता और गरीबी उन्मूलन में नहीं है। उनकी रूचि औन-पौन दाम में जमीन हासिल करने और येन-केन अपनी झोली भरने में है। किसी भी विकास पुरुष के लिए ऐसे लोगों से सावधान रहना ही श्रेयस्कर होगा।
जनविकल्प से साभार

10 दिसंबर 2007

मानवाधिकार दिवस गोष्टीयों में और मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में


आज मानवाधिकार दिवस है और छत्तीसगढ़ में मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले आदिवासियों के हक हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले डा बिनायक सेन जेल में है - संयोग यह भी है कि आज सुप्रीम कोर्त में उनके बेल को लेकर सुनवाई भी है
नक्सल समर्थन के आरोप में गिरफ्तार, पेशे से बाल चिकित्‍सक डा. बिनायक पी यू सी एल से जुड़े रहे हैं। उनकी पत्‍नी इलीना सेन ने आज अखबार में लिखा कि डा. बिनायक पर नक्‍सलियों को समर्थन देने का आरोप है- उनके बच्‍चे की ट्रिग्‍नोमैट्री की कापी को सबूत के तौर पर पेश किया गया है। डा. जीलानी पर संसद पर आतंकवादी हमले का आरोप था और इसी किस्‍म के ‘प्रमाण’ जुटाए गए थे- जो कोर्ट में धराशाही हो गए- खुन्‍नस में जीलानी पर हमला किया गया और स्‍पेशल सेल के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं मिला (संयोग से उसी स्‍पेशल सेल में अपना एक पुराना सहपाठी भी था- उसने क्‍या बताया ये नहीं बताउंगा पर ये मान लीजिए कि सब ठीक तो नहीं ही था)। अब जाहिर है कोई ‘मसिजीवी की आत्‍मा’ बनकर कहेगा कि देश की पुलिस के खिलाफ लिखना जयचंदी काम है पर क्‍या करें हमें लगता है कि यही राष्‍ट्रभक्ति है- देश की संसद पर हमला हो और आप इस-उस को पकड़कर दोषी सिद्ध करने में ताकत झोंको, जिसका मतलब है कि दोषी आतंकवादी अगला हमला करने के लिए अभी भी बाहर मजे में घूम रहे हैं- दूसरी ओर किसी विचारधारा से भयंकर तौर पर भयभीत होकर आप एक डाक्‍टर को जेल में ठूंसो क्‍योंकि आप उससे सहमत नहीं हैं।

डा. बिनायक के विषय में हमें नहीं पता कि वे कितने नक्‍सली हैं जैसे कि अफजल व जीलानी के विषय में नहीं पता था कि वे कितने बड़े आतंकवादी थे – किंतु एक बात सहजता से पता लग रही है- राज्‍य अपनी वैधता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है और हॉं उसी व्‍यकितगत अनुभव से ये भी जानते हैं कि जीलानी को राज्‍य के दमन के विरुद्ध प्रतीक बनाने में सरकार की वही भूमिका है जो बजार1 जैसे बदमजा चिट्ठे को असहमति की अभिव्‍यक्ति का प्रतीक बना देने में नारद की थी।

जिस तरह कश्‍मीरी अलगाववाद से हम असहमत है, राहुल की भाषा को अनावश्‍यक रूप से बदमजा मानते हैं तथा अधिकतर समय हमने नए नए मार्क्‍सवादी रंगरूटों से उनके विचारों से गहरी असहमति जाहिर करते हुए गुजारा है- अब भी उस विचारधारा से अपना असहमति का ही रिश्‍ता है पर पुलिस स्‍टेट कायम करने के खिलाफ लोकतंत्र के पक्ष में हम राहुल, जीलानी और बिनायक के पक्ष में खड़े हैं। मसीजीवी सेः-

06 दिसंबर 2007

लाल सलाम-लाल सालेम:-

घटनायें काल परिवर्तन का माध्यम होती है वे स्थितियों का भान कराती है नंदीग्राम आज के बर्बर व क्रूर सत्ता का सच है जिसे बार-बार याद कराने की जरूरत हैः-



विचारधारा के लिए लड़ने वाले सिपाही या राजनीतिक गुंडे? पश्चिम बंगाल में पिछले तीन दशक से सीपीएम के अबाध राज का राज़ कैडर ही रहे हैं. कैसे कैडर सीपीएम की मदद करते हैं और इसमें उनका क्या फायदा है बता रहे हैं शांतनु गुहा रे...

भास्वती सरकार कार्ल मार्क्स के केवल नाम से ही परिचित हैं, मगर मार्क्स के सिद्धांत क्या हैं ये जानने के लिए उन्होंने उनकी किताबों को कभी नहीं खंगाला. 34 वर्षीय ये स्कूल शिक्षिका अपने पति(राज्य परिवहन निगम में क्लर्क) के साथ कोलकाता के दक्षिणी इलाके में रहती हैं. समर्पित सीपीएम कैडरों की तरह ये दोनों पति-पत्नी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) की गढ़िया से निकलने वाली रैलियों का एक अभिन्न हिस्सा होते हैं. सरकार पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के शासन पर बात तो करती हैं लेकिन अपनी तस्वीर छपवाने के सवाल पर पीछे हट जाती हैं. हालांकि उनके पड़ोसी बताते हैं कि सरकार को रैलियों में नारे लगाने के बदले पैसे मिलते हैं, लेकिन वो इस बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं.
गौरतलब है कि ये महिला कैडर, पार्टी में और पांच साल बिताने के बाद नेता के रूप में अपनी पदोन्नति का सपना संजोए हुए है. सरकार का पार्टी से जुड़ाव छात्र जीवन में ही हो गया था. तब वो स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया(एसएफआई) की एक सामान्य सदस्य थीं और उसी दौरान उन्होंने पहली बार सीपीएम की रैली में भी हिस्सा लिया था. कैडर सत्ता का उतना आनंद नहीं ले पाते. लिहाजा सरकार सहित राज्य के लाखों कैडर राज्य के शीर्ष पार्टी नेताओं के संपर्क में आने की अपनी बारी के इंतजार में हैं. पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के लिए नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है. पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है.

अब जरा ये देखें कि पार्टी के प्रति इस अंधभक्ति के फलस्वरूप सरकार जैसे लोगों को मिलता क्या है.

पहले राज्य में सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया राज्य सरकार के हाथ में होती थी और इनमें से 90 प्रतिशत तक नौकरियां प. बंगाल में सीपीएम कैडरों की झोली में ही जाती थीं. नौकरियों से योग्यता का कोई लेना-देना नहीं था और वामपंथ से थोड़ा-सा जुड़ाव ही पर्याप्त योग्यता मानी जाती थी. कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के जिम्मे कर दिया मगर अब भी सैकड़ों अस्थाई नियुक्तियां स्थानीय नेताओं के निर्देशों पर ही होती हैं. चाहे सरकारी नौकरी हो, नगर परिषद् की या फिर किसी निजी संस्थान की - पार्टी का संदेश स्पष्ट हैः यदि आप हमारे साथ हैं, तो हम भी आपका ध्यान रखेंगे.

बहरहाल, कैडर के सवाल पर सरकार कहती हैं, “मैं एक कैडर हूं और पार्टी के लिए काम करती हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई गुंडा-बदमाश हूं.” वो एक सीधा-सा सिद्धांत जानती हैं - पार्टी के प्रति अंधभक्ति कैडर के जीवन और उसकी प्रगति की अनिवार्य शर्त है. यानी कैडर को हर हाल में पार्टी के पक्ष में खड़ा होना है, पार्टी के बचाव का रास्ता तलाशना है. वह इसे पलटवार का सिद्धांत कहती हैं. उनका मानना है कि विरोधी हर कदम पर पार्टी पर कीचड़ उछालते रहते हैं, लिहाजा कैडरों को उसके जवाब के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है.

उदाहरण के तौर पर जिस दिन फिल्मकार अपर्णा सेन ने नंदीग्राम विरोधी रैली में हिस्सा लेने का निर्णय किया, कैडर पहले से तैयार थे कि मीडिया में उन्हें क्या कहना है. सेन के इस कदम पर कैडरों ने ये प्रचारित करना शुरू किया कि कोलकाता में हाल में संपन्न हुए फिल्म समारोह में अध्यक्ष न बनाए जाने को लेकर वो सरकार से नाराज थीं. जिन तक ये कहानी नहीं पहुंच पाई थी, उन्होंने दूसरा कारण गढ़ा: सेन इसलिए नाराज थीं क्योंकि राज्य सरकार ने सेन की अगली फिल्म को वित्तीय सहायता देने से इनकार कर दिया था.

पश्चिम बंगाल में यदि आप एक कैडर हैं, तो आपको न केवल इस सिद्धांत में विश्वास करना होगा, बल्कि इसे प्रचारित-प्रसारित भी करना होगा. यानी जमीनी स्तर पर व्यावहारिक मार्क्सवादी सिद्धांत यही है.

स्थानीय न्यूज चैनल तारा बंगला की संपादक सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है. गली के नुक्कड़ पर होने वाली सभा में वक्ता के रूप में कोई प्राध्यापक भी हो सकता है. किसी सार्वजनिक सभा में भीड़ जुटाने वाला संयोजक हो सकता है. पास-पड़ोस के तलाक, किराएदारी, असफल प्रेम प्रसंग जैसे मामलों को सुलझाने के प्रयास करता कोई कार्यकर्ता भी हो सकता है और विरोधियों के खिलाफ क्रूर कार्रवाई करने वाला कोई क्षेत्रीय गुंडा भी हो सकता है, जिसे सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त होता है.”

चट्टोपाध्याय अपने स्टूडियो में घटी एक घटना का उदाहरण देती हैं. एक प्राइमटाइम शो के खत्म होने के बाद उन्होंने स्टूडियो में मौजूद और सत्ताधारी पार्टी से निकटता रखने वाले गार्डन रीच इलाके के डॉन झुनू अंसारी से पूछा कि क्या उन्होंने अपने आदमियों को नंदीग्राम में जवाबी कार्रवाई के लिए भेजा था. अंसारी ने ऐसा करने से तो इनकार किया लेकिन ये जरूर बताया कि ज्यादातर कैडर बंगाल के बाहर से आए थे. सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है.

जानकार बताते हैं कि ज्यादातर माकपाई कैडर बेरोजगार हैं और सीपीएम से उनके जुड़ाव के कई कारण हैं. एक तो इससे उनकी कुछ आमदनी की गारंटी हो जाती है, दूसरे, उनका एक सामाजिक स्तर बन जाता है और साथ ही प्रसिद्धि की राह पर पहला कदम भी पड़ जाता है.

सीपीआई(एमएल) के वरिष्ठ नेता अरिंदम पाल स्वीकारते हैं कि “पार्टी के कई कार्यकर्ता मुश्किलें खड़ी कर देने वाले हैं. शीर्ष कामरेड इसे महसूस भी करते हैं लेकिन उन्हें पता है कि राजनीति में आपको बुद्धिजीवियों की नहीं, ऐसे ही तत्वों की जरूरत पड़ती है.” उन्होंने हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर घटी घटना का हवाला दिया, जहां कैडरों ने एयरपोर्ट यूनियन के चुनाव प्रचार के दौरान एक तरह से इस पर कब्जा कर लिया था. इस उपद्रव के कारण एयरपोर्ट्स अथॉरिटी के लगभग 55 प्रतिशत कर्मचारी काम पर आए ही नहीं. हॉवड़ा स्टेशन पर होने वाले रेलवे इम्प्लाइज यूनियन के चुनाव में भी इसी नजारे की उम्मीदें लगाई जा रही है. “ये तो राष्ट्रीय चुनाव है, और मुंबई व दिल्ली के मतदाता भी वोट देने आएंगे. लेकिन मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनस के पोस्टरों से पटे होने और कामकाज ठप्प होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. दरअसल, ये सब सिर्फ बंगाल में ही संभव है, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी इस तरह के चुनावों को अपने जनाधार से जुड़ाव का आदर्श रास्ता मानती है. यही दरअसल कैडर हैं”, कहते हैं सीपीआई(एमएल) के ही कार्तिक सेन.

शहर के जादवपुर विश्वविद्यालय में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान छात्रा सोहिनी मजुमदार कहती हैं, “सभी पार्टियों की तरह वाम मोर्चे में और सीपीएम में भी इस तरह के लोग इसलिए हैं, क्योंकि आप खुद इस तरह के लोगों का समर्थन चाहते हैं. लेकिन उनके बारे में नकारात्मक सोच इसलिए बन गई है क्योंकि ज्यादातर घटनाओं में उनके बुरे पक्ष को ही सामने लाया जाता है.” इस तरह की शुरुआती घटनाओं में से एक 1990 में उत्तरी कोलकाता के विधानसभा चुनाव में हुई थी जहां स्थानीय डॉन नंदा के नेतृत्व में अपराधियों ने सुबह 10 बजे ही बूथ पर कब्जा कर लिया था. स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से सक्रिय रूप से जुड़ी मजुमदार स्वीकारती हैं, “वहां नंदा का खुलेआम रिवाल्वर लहराना निश्चितरूप से परेशान करने वाली बात थी.” लेकिन वो ये भी कहती हैं कि अब परिस्थिति बदल रही है और हाल ही में पार्टी ने इस तरह के 12 हजार लोगों को पार्टी से निकाल बाहर कर दिया है.

प्रेसीडेंसी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अमाल मुखर्जी कहते हैं, “कैडर ब्रिगेड, कार्यकर्ता बनने के लिए मौका देख कर सुविधानुसार अपने रंग बदलता है. चूंकि उनके पास आरएसएस की शाखा की तरह कोई नियमित अड्डा नहीं होता और उन्हें रोज सुबह परेड नहीं करनी पड़ती, लिहाजा उन्हें पहचानना मुश्किल होता है.”

पास के ही सरकारी स्कूल में पार्टी की स्थानीय शाखा की एक बैठक चल रही है जहां कार्ल मार्क्स, लेनिन, प्रमोद दासगुप्ता व ज्योति बसु जैसे नेताओं के कटआउट लगे हुए हैं. पूछे जाने पर सभा के आयोजक अनिरबन रॉय चौधरी कहते हैं, “यहां ऐसी कोई गलत चीजें नहीं है. किसी के पास कोई गोली-बंदूक नहीं होती. ये तो पश्चिम बंगाल के बारे में मीडिया की अपनी कपोल कल्पना है. कैडर तो अनुशासित कार्यकर्ता मात्र होते हैं जो पार्टी हित में जमीनी जनाधार जुटाने का काम करते हैं.”

वामपंथी विचारधारा के कट्टर समर्थक, केंद्रीय कर्मचारी उत्पल मित्रा कहते हैं, “कोई राजनीतिक पार्टी किसी राज्य में तीन दशक तक सिर्फ इस वजह से सत्ता में नहीं रह सकती, क्योंकि उसके पास कैडर के रूप में असामाजिक तत्व हैं.” मित्रा नंदीग्राम के प्रेत को दफन करने के लिए शहर भर में निकाली जा रही रैलियों का नियमित हिस्सा होते हैं. वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है.

अब सवाल ये उठता है कि राज्य भर में कैडरों की वृद्धि को आखिर प्रोत्साहित किसने किया है और उनकी संख्या इतनी कैसे हो गई जिसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है? विश्लेषक कहते हैं कि शुरुआत 1977 में सीपीएम के सत्ता में आने के साथ हुई. पश्चिम बंगाल में रीयल एस्टेट कारोबार में तेजी की शुरुआत ही हुई थी. इससे जुड़े हर तरह के फायदे पार्टी से जुड़े लोगों को दिए जाने लगे. देखादेखी और लोग भी बहती गंगा में हाथ धोने को सीपीएम से जुड़ने लगे. भूमि सुधारों ने भी लोगों की पार्टी के प्रति अंधस्वामिभक्ति सुनिश्चित की.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निरबेद रे कहते हैं, “वास्तव में सीपीएम में कैडरों की भीड़ 1990 में आनी शुरू हुई और ये आज तक जारी है.” रे आगे जोड़ते हैं, “इन कैडरों ने राज्य के मतदाताओं का विस्तृत डाटाबेस तैयार किया, जो चुनावों के दौरान पार्टी के काम आया और क्षेत्र पर पकड़ बनाने में उनकी मदद की. कैडरों के पास अपने पास-पड़ोस के बारे में जो सूक्ष्म जानकारी होती है, वो अन्य पार्टियों के पास नहीं होती और ये जानकारी उन्हें बड़ी मदद पहुंचाती है.” रे की मानें तो वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है. “लेकिन आज अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों व नव उदारवादी नीतियों का समर्थन, बाहुबलियों पर भरोसा और अपने सहयोगियों के प्रति उपेक्षापूर्ण बरताव वामपंथी राजनीति का शगल बन गया है.” रे आगे कहते हैं, “आज तो कैडर नंदीग्राम में लोगों को धमकाने, उन्हें वहां से बेदखल करने या फिर उन्हें अपने प्रभाव में लेने संबंधी पार्टी के अभियान का एक अहम हिस्सा बन गए हैं.”

कैडरों की क्रूरता की पहली घटना 1978 में तब सामने आई थी जब उन्होंने बीरभूमि जिले के मारिचझापी में असहाय बांग्लादेशी शरणार्थियों पर फायरिंग में पुलिस का साथ दिया था. रे कहते हैं कि “उसके बाद तो इस तरह की घटनाओं का सिलसिला सा चल पड़ा. शहर के एक पुल से गुजर रहे 17 आनंदमार्गियों की सरेआम हत्या इसी तरह की एक जघन्य घटना थी, लेकिन नंदीग्राम आज इन सभी घटनाओं को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष पर पहुंच गया है क्योंकि सभी को ऐसा लग रहा है कि हथियारबंद कैडरों की वहां उपस्थिति व उनके द्वारा की गई हिंसा को पार्टी खुद ही जायज ठहरा रही है.”

वरिष्ट स्तंभकार प्रभाष जोशी भी सच की पड़ताल में एक दल के साथ नंदीग्राम गए थे. उनका कहना है कि कैडर नजर न आने वाली ऐसी इकाई है जिसमें अनवरत बढ़ोतरी हो रही है. “ये तो आप भाग्यशाली थे जो नंदीग्राम में इनमें से कुछ को देख पाए, वरना ग्रामीण इलाकों में जिन कैडरों को बाइक वाहिनी के रूप में जाना जाता है, उनके बारे में तो शायद ही किसी को पता हो.”

राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एस.एन. भार्गव कहते हैं कि कैडर एक ऐसी विध्वंशक सेना हैं जिसकी ताकत पुलिस की मिलीभगत से बनती है. भार्गव कहते हैं, “नंदीग्राम के कैडर पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा व 24-परगना जिलों से आए थे और वे स्वचालित आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल में पूर्ण प्रशिक्षित थे.”

कुछ भी हो कैडर तो इन सब चर्चाओं से बेखबर अपनी प्राथमिकता वाले कामों में आज भी व्यस्त हैं. और ये काम हैं--नंदीग्राम की हिंसा की लीपापोती और सरकारी तंत्र के पार्टी हितों के आगे घुटने टेकने के आरोपों को खारिज करना.

:-तहलका से साभार

04 दिसंबर 2007

डॉलर : साम्राज्य में सेंध


रेयाज-उल-हक
द इकोनॉमिस्ट भले ही इस बात पर खुशी जाहिर कर रहा हो कि डॉलर अभी ध्वस्त नहीं होने जा रहा है. मगर यह एक विश्व मुद्रा के लिए बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं कि वह एक मॉडल के पारिश्रमिक भुगतान में असमर्थ साबित हो. ब्राजील की सुपर मॉडल गीसेल अब डॉलर स्वीकार नहीं कर रही हैं.
और ऐसा करनेवाली गीसेल अकेली नहीं हैं. अरबपति जार्ज सोरोस के पूर्व पार्टनर जिम रोजर्स अपनी पूरी जायदाद और मकान बेच रहे हैं, ताकि वे पूरी संपत्ति चीनी यूआन में तबदील कर सकें. एयर बस ने पहले ही डॉलर के इस संकट को प्राणघातक कहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने इकोनॉमिक वार की चेतावनी दी है.
अमेरिकी पूंजी का अमेरिका से बाहर निवेश होना और बुश द्वारा युद्ध पर किये जा रहे भारी खर्च के बीच मांग और आपूर्ति के सिद्धांत में विश्वास रखनेवालों को यह अभी आकलन ही करना है कि डॉलर की मांग में कमी डॉलर की कीमत और अमेरिकी शक्ति को किस तरह डुबो रही है.
दुनिया भर के अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि डॉलर का इस तरह लुढकते जाना नियंत्रण से बाहर हो सकता है. और अगर ऐसा हुआ तो अमेरिकी साम्राज्य का बने रहना असंभव हो जायेगा.
अगर हम थोडी कल्पना करने की इजाजत लें तो हम देखेंगे कि अमेरिका के लिए तब भारी मुश्किल पैदा हो जायेगी, जब उसका डॉलर विश्व मुद्रा के रूप में अपना अस्तित्व खो देगा. तब अमेरिका को विदेशों में स्थित अपने ७३७ सैनिक अड्डों के खर्च के लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित करनी होगी. और अभी अमेरिका के ८०० बिलियन व्यापार घाटे को देखते हुए यह असंभव लगता है. जब डॉलर रिजर्व करेंसी के रूप में नहीं रह जायेगा, विदेशी निवेशक अमेरिकी व्यापार और बजट घाटे में पैसा लगाना भी बंद कर देंगे.
२००२ में, जबकि डॉलर का प्रभुत्व विश्व अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक था, के बाद से वह संयुक्त रूप से विश्व की शेष करेंसियों के मुकाबले २४ प्रतिशत नीचे गिरा है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में ०.७५ प्रतिशत की कटौती के बावजूद इसकी गिरावट जारी है. बढी हुई मुद्रास्फीति से उबरने के लिए ब्याज दरों में कटौती की जाती है. मगर अब अमेरिका में यह मांग उठने लगी है कि डॉलर को विनाश से बचाने के लिए अभी और कटौती पर रोक लगायी जाये.
अभी कुछ समय पहले यह खबर आयी थी कि दुनिया के सात देश डॉलर का परित्याग करनेवाले हैं. इनमें दक्षिण कोरिया, वेनेजुएला, ईरान, सूडान, चीन और रूस के साथ आश्चर्यजनक रूप से सऊदी अरब भी शामिल है. सऊदी अरब ने हाल में तब ब्याज दरों में कटौती से इनकार कर दिया, जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें घटायीं. जानकारों का कहना है कि यह स्थिति अमेरिकी डॉलर के लिए एक विश्व मुद्रा के रूप में बेहद खतरनाक हालात पैदा करेगी. अमेरिका के साथ लेन-देन में अकेले सऊदी अरब की ८०० बिलियन डॉलर की भागीदारी है. और अगर सऊदी अरब ने डॉलर का साथ छोड दिया तो यह मध्य पूर्व में डॉलर के लिए एक बडा झटका साबित होगा. पूरे मध्य पूर्व के साथ अमेरिका का ३५०० बिलियन का लेन-देन है. दक्षिण कोरिया अगस्त में १०० मिलियन डॉलर बेच चुका है और ऐसी खबरें हैं कि वह एक बिलियन अमेरिकी बांड बेचनेवाला है. चीन के बारे में माना जाता है कि वह डॉलर को उडा देने की क्षमता रखता है.
नवंबर, २००५ में दक्षिण कोरिया के मात्र इतना कहने से कि वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार में कटौती करने की योजना पर विचार कर रहा है, डॉलर के इतिहास में सबसे बडी एकदिवसीय गिरावट आयी थी. उस समय द कोरिया के पास मात्र ६९ बिलियन डॉलर का रिजर्व था. हम कल्पना कर सकते हैं कि चीन और जापान जैसे देशों, जिनके पास कुल मिला कर लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का विदेशी भंडार है, यदि डॉलर में कटौती पर विचार करें तो क्या हालत हो सकती है.
हम संकेतों को पढ सकते हैं. मध्य पूर्व में ताजा राजनीतिक-सैन्य गतिविधियों को देखें तो युद्ध को लेकर अमेरिकी उतावली और ईरान के खिलाफ नये सिरे से और तेज लामबंदी का डॉलर के इस घटते प्रभुत्व से भी संबंध है. २००३ में इराक पर सारी दुनिया की जनता के प्रतिरोध को नजरअंदाज करते हुए थोपे गये युद्ध के पूर्व भी ऐसी ही स्थिति थी. तब साम हुसेन ने अपने १० बिलियन अमेरिकी डॉलर के भंडार को यूरो में बदल दिया था और उसकी देखा-देखी कई और देश इस राह पर जाने को तैयार थे.
१९७० के बाद से जारी वैश्विक मंदी से निकलने के लिए कि्वे ग्वे सारे उपा्व असफल साबित हुए हैं. उल्टे संकट और सघन हुआ है. लैटिन अमेरिका, एशि्वा और अफ्रीका में जनता के तेज होते प्रतिरोध संघर्षों के बीच उसका संकट और बढेगा ही.
...और जाहिर है, ऐसे में द इकोनॉमिस्ट' के लिए राहत भरे दिन लंबे समय तक नहीं नहीं रहनेवाले हैं.

03 दिसंबर 2007

लज्जा : तसलीमा की नहीं, हमारी



क्या तसलीमा नसरीन की कहानी हमारे समाज की उदारता के पतन की कहानी है? शांतनु गुहा रे बता रहे हैं कि जब राजनीतिक हितों पर आंच आती नजर आती है तो दक्षिणपंथी और वामपंथी एक ही पंथ पर चल पड़ते हैं.

“बारी फिरबो सुनिल दा...कोतो दिन बारी जाई नी. कोतो दिन बारी फिरे कोब्जी डूबिए गोरोम दाल भात खाई नी, किच्छू बूझते पारछी ना कि होछे.” (मैं घर लौटना चाहती हूं, सुनिल दा. घर गए और अपना मनपसंद गर्म दाल-भात खाए कितने दिन गुजर गए. मुझे समझ नहीं आता कि ये क्या हो रहा है.)

ये वे शब्द हैं जो 2004 में तसलीमा नसरीन ने बंगाली लेखक सुनिल गंगोपाध्याय से तब कहे थे जब वे जर्मनी के म्यूनिख शहर में थीं. शायद इन दिनों भी उनकी मनोदशा कमोबेश ऐसी ही हो. बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन दर-दर भटकने को मजबूर हैं. वह भी एक ऐसे देश में जिसे वह अपना घर कहती आई हैं. वह एक ऐसी अनचाही और असुविधाजनक वस्तु हो गई हैं जिससे हर कोई पीछा छुड़ाता नजर आ रहा है. तसलीमा इसलिए अनचाही हो गईं थीं कि उन्हें सुरक्षा देने से वामदलों को प. बंगाल में कीमती मुस्लिम वोटों के खिसकने का डर लग रहा था. और हास्यास्पद ही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत इस पेशकश से की कि ‘तसलीमाबेन’ गुजरात में रहें.

तसलीमा जब भारत पहुंची थी तो उन्हें यकीन था कि यहां उन्हें लिखने और बोलने की आजादी होगी. उनके ऐसा सोचने की वजह भी थी. लोकतंत्र और सामाजिक अधिकारों के लिए लड़ने वालों को भारत ने हमेशा पनाह दी है. उदाहरण एक नहीं अनेक हैं--दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायी, नेपाली कांग्रेस के कई नेता, फैज़ अहमद फैज़ और फाहमिदा रियाज़ जैसे पाकिस्तानी लेखक, शेख मुजीबुर्र रहमान की पुत्री शेख हसीना वाज़ेद, अफगानिस्तान के नजीबुल्ला और उनका परिवार.

तो फिर अचानक तसलीमा नसरीन के साथ ही ऐसा क्या हो गया?

जवाब सीधा मगर शर्मिंदा करने वाला है. तसलीमा राजनीतिक रूप से तकलीफदेह हो गईं थीं और इसलिए उन्हें निकाल बाहर किया गया. अप्रत्याशित ये रहा कि उन्हें धक्का देने वाले हाथ इस बार वामपंथियों के थे जिन्होंने सामाजिक अधिकारों और आजादी की बड़ी-बड़ी बातें के बीच अचानक अपना असली चेहरा जाहिर कर दिया है. वह चेहरा जो पार्टी के हित के लिए आजादी और अधिकारों के दमन से बनता है. ऐसा ही कुछ नंदीग्राम में हुआ और यही तसलीमा नसरीन के साथ भी दोहराया गया. मुस्लिमों का एक वर्ग इस जानी-मानी लेखिका के विरोध में सड़कों पर क्या उतरा कि तसलीमा को बंजारा बना दिया गया. उन्हें आनन-फानन में पहले जयपुर रवाना किया गया, उसके बाद दिल्ली और अब वह राजधानी के आसपास किसी गोपनीय जगह पर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की सुरक्षा में हैं.

वामदल हमेशा से लेखकों और कलाकारों के खिलाफ संघ परिवार की असहिष्णुता पर लानत भेजते रहे हैं लेकिन अचानक ही इस घटना ने उनके दोगलेपन को सामने ला दिया है. तसलीमा इसलिए अनचाही हो गईं थीं कि उन्हें सुरक्षा देने से वामदलों को प. बंगाल में कीमती मुस्लिम वोटों के खिसकने का डर लग रहा था. और हास्यास्पद ही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत इस पेशकश से की कि ‘तसलीमाबेन’ गुजरात में रहें. नई दिल्ली में मौजूद उनके साथी शायद वाम को शर्मिंदा करने और अपनी खामियों से ध्यान हटाने के लिए तसलीमा बचाओ अभियान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहे थे. वामपंथियों की असहिष्णुता ने अचानक ही दक्षिणपंथियों को अपनी असहिष्णुता के बचाव का ब्रह्मास्त्र दे दिया है. जहां तक केंद्र का सवाल है तो उसकी जबान ज्यादातर मौकों पर दबी ही रही. जैसा कि एक कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ये एक गंदा राजनीतिक खेल बन गया है. किसी को तसलीमा की चिंता नहीं है. सबको अपने वोटबैंक की पड़ी है.”

विचारों की आजादी का मुद्दा राजनीतिक बयानों में कहीं दिखाई नहीं दे रहा. जैसा कि जाने-माने लेखक और संपादक जॉय गोस्वामी कहते हैं, “उनके (तसलीमा के) लेखन की आलोचना की जा सकती है पर जिस तरह से उन्हें निकाला गया यह खेदजनक है.” ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमन्स एसोसिएशन की महासचिव कुमुदिनी पति भी इससे सहमति जताते हुए कहती हैं, “इसे और कुछ नहीं बस अपने मतलब के लिए किसी के पीछे पड़ना कहा जा सकता है. हैरानी हो रही है कि आखिर कलाकारों को राजनीतिक गोटियों की तरह इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है? नंदीग्राम और रिजवानुर मुद्दे पर प. बंगाल के मुस्लिम नाराज हैं और ऐसे में तसलीमा को कोलकाता से बाहर करना राजनीति से प्रेरित कदम ज्यादा लगता है.” “अब जब सरकार ने बयान दे दिया है तो कौन ये फैसला करेगा कि किस चीज से भारत में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचती है और किससे नहीं.क्या उन्हें हर बार अपनी मूल प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भेजनी होगी?”

उधर, सीपीएम ऐसी किसी भी बात से इनकार करती है. लेकिन इस मामले में उसका रुख साफ है कि पार्टी तसलीमा को सुरक्षा देकर अपने वोट बैंक के नुकसान का खतरा मोल नहीं ले सकती. पार्टी प्रवक्ता सीताराम येचुरी तीखे सुर में कह चुके हैं कि तसलीमा को वीजा देने वाले केंद्र को उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए. पिछले तीन साल से तसलीमा का घर रहे कोलकाता में राज्य सरकार और पुलिस विभाग के आला अधिकारी इस मामले पर कोई टिप्पणी करने के लिए तैयार नहीं हैं. हालांकि राइटर्स बिल्डिंग में बैठे उच्चाधिकारी विनम्र और अनिश्चित लहजे में ‘तसलीमा की वापसी का स्वागत है’ जैसी बातें जरूर कह रहे हैं, लेकिन पुलिस ने यह साफ कर दिया है कि तसलीमा वहां अवांछित हैं. कोलकाता के डिप्टी कमिश्नर विनीत गोयल का कहना था, “हमें फौरन उन्हें बाहर भेजने के आदेश थे. हमने सुरक्षा कारणों के चलते उन्हें बाहर भेजा और ऐसा करने के निर्देश राज्य के गृह विभाग से आए थे.”

लेकिन बात छोटी-मोटी नहीं थी. तसलीमा की जिंदगी में आए इस नए भूचाल से उपजी तरंगों को प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने में देर नहीं लगी. युगांडा की राजधानी कंपाला में राष्ट्रकुल देशों के सम्मेलन से वापस आने के बाद प्रधानमंत्री ने सबसे पहले यह संदेश बाहर भेजा कि सरकार कट्टरपंथी ताकतों द्वारा तसलीमा के उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेगी और उनकी सुरक्षा हर कीमत पर सुनिश्चित करेगी. विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद को आश्वासन दिया कि सरकार न केवल तसलीमा के वीजा की अवधि बढ़ाएगी बल्कि उन्हें सुरक्षा भी प्रदान करेगी. गौरतलब है कि तसलीमा ने स्वीडन की नागरिकता ली हुई है और भारत में उनका वीजा फरवरी 2008 में खत्म होना है.

मगर वोट बैंक की चिंता तो कांग्रेस को भी है. इसीलिए सुरक्षा की बातें तो की गईं लेकिन साथ ही तसलीमा को, उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए, ये पाठ भी पढ़ाया गया. प्रणव मुखर्जी के शब्द थे, “यह उम्मीद की जाती है कि मेहमान उन गतिविधियों से परहेज करेंगी जिनसे हमारे लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचे.”

मशहूर चित्रकार सुवाप्रसन्ना के मुताबिक इस हिदायत से तसलीमा के लेखन की आजादी पर कोई न कोई असर तो पड़ेगा ही. वह कहती हैं, “अब जब सरकार ने बयान दे दिया है तो कौन ये फैसला करेगा कि किस चीज से भारत में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचती है और किससे नहीं.क्या उन्हें हर बार अपनी मूल प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भेजनी होगी.” जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के शिक्षक जोया हसन कहती हैं, “दुखद ये है कि कोई भी इसका विरोध नहीं कर रहा. उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाए.” लेखक सुनिल गंगोपाध्याय भी नाराजगी भरे स्वर में कहते हैं, “किसी न किसी को जिम्मेदारी तो लेनी ही होगी. आखिर किसी लेखक को इस तरह परेशान कैसे किया जा सकता है?”

गंगोपाध्याय अनुमान लगाते हैं कि अगर तसलीमा ने 2004 के बाद अपनी कोई कृति प्रकाशित नहीं की है तो इसके पीछे की एक वजह शायद उनकी परेशानियों को लेकर कोलकाता के प्रबुद्ध वर्ग की खामोशी भी हो सकती है. तसलीमा ने उस साल जब अपनी आत्मकथा का चौथा भाग ‘साइ सोब ओंधोकार’ (वही अंधकार) लिखा था तो बांग्लादेश सरकार ने ये कहते हुए तुरंत इस पर प्रतिबंध लगा दिया था कि इसमें पैगंबर के बारे में आपत्तिजनक बातें हैं.

गौरतलब है कि पुलिस द्वारा कई बार शहर छोड़ने के सुझाव को तसलीमा ने कोई तरजीह नहीं दी थी. इसलिए ये भी कहा जा रहा है कि राज्य सरकार ने 22 नवंबर को कोलकाता में हुई हिंसा को तसलीमा से छुटकारा पाने के लिए इस्तेमाल किया. गुपचुप रूप से ये भी कहा जा रहा है कि ये हिंसा कई सालों से तसलीमा के खिलाफ सुलग रहे गुस्से का परिणाम हो सकती है. इसी साल अगस्त में कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने तसलीमा के खिलाफ मौत का फतवा भी जारी किया था. लेकिन आलोचकों के मुताबिक कोलकाता में हुई हिंसा तसलीमा को लेकर नहीं बल्कि नंदीग्राम के विरोध में थी.

लेकिन कोलकाता छोड़ना शायद तसलीमा की मुसीबतों का अंत न हो. विश्वस्त सूत्रों ने तहलका को बताया है कि परदे के पीछे तसलीमा को इस बात के लिए राजी करने की कोशिशें हो रही हैं कि वह स्वीडन या किसी दूसरे यूरोपीय देश चली जाएं. दिल्ली में स्वीडन के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन ने हमें बताया कि उनका देश तसलीमा के वापस लौटने का स्वागत करेगा.

लेकिन सवाल ये है कि अगर तसलीमा को भारत छोड़ना भी पड़ा तो क्या हम खुद को कभी सही अर्थों में उदार लोकतंत्र की संज्ञा दे पाएंगे? क्या ये हमारी छवि पर एक और दाग नहीं होगा?

:-तहलका से सभार

28 नवंबर 2007

भूमंडलीकरण एक प्रचार :-















ए.वी.वर्धन

इन दिनों भूमंडलीकरण एक बहु-प्रचारित अवधारणा है। यह आर्थिक विषयों पर सभी लेखन तथा बातचीत से सामने आ जाता है। इसे एक बड़ी वास्तविकता के रूप में स्वीकार करने के लिए दबाव बढ़ रहा है। यह दलील दी जाती है कि इससे बचा नहीं जा सकता है। स्पष्टत: इसका उद्देश्य सहज सत्य बतलाना नहीं है कि हम सभी `एक ही भूमंडल´ में रहते है। यह भौगोलिक तथ्य तो मंद बुद्वि के लिए भी साफ है। न ही इसका उद्देश्य इस नवीनतम सत्य को सामने लाना है कि संचार प्रौद्योगिकी में क्रांति ने दूरियों को काफी कम कर दिया है और विश्व एक `भूमंडलीय गांव´ बन गया है।
भूमंडलीकरण एक नीति-एक आर्थिक, सामाजिक तथा राजनितिक नीति का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक ऐसी नीति है जिसकी कुछ शक्तिशाली हितों द्वारा आक्रामक रूप से वकालत की जाती है और उन लोगों के गले में जबर्दस्ती उतारने का प्रयास किया जाता है जो असहाय हो कर इसे स्वीकार कर सकते हैं या इसका विरोध करने का प्रयास कर सकते हैं, हालांकि उन्हें अधिक सफलता नहीं मिल सकती हैं। ऐसे भी लोग हैं जो यह कहते हैं कि आप इसे उतना ही पीछे कर सकते हैं जितना आप किसी लहर को पीछे कर सकते हैं। यह देर-सबेर प्रत्येक देश को अपने आगोश में ले लेगा।
भूमंडलीकरण वास्तव में `नव-उदारवादी´ की संतति हो सकता है और अपने अभिभावक की भांति यह भी एक नीति है जिसे साम्राज्यवादी देशों द्वारा आगे बढ़ाया जाता है और वह तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ नििर्दष्ट है जिन्हें वह अपना िशकार बनाता है। तीन बहनें- उदारवाद, निजीकरण और भूमंडलीकरण साथ-साथ चलती हैं।
तीसरी दुनिया के देशों ने पिछली दो या तीन सदियों से साम्राज्यवाद के प्रभुत्व के तहत तकलीफें भोगी हैं। उन्होंने अपने उननिवेशी स्वामियों से पिछड़ेपन की विरासत प्राप्त की है। 20वीं सदी के मध्य या उत्तरार्ध के दौरान स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से वे अपने को कठोर स्थिति में पाते हैं, खासकर पूंजी तथा प्रौद्योगिकी के मामले में जिसकी विकास के लिए जरूरत है। वे हर क्षेत्र में अर्धविकास से पीिड़त हैं। भयंकर गरीबी, उच्च बेकारी, निरक्षरता, स्वास्थ्य-देखभाल का अभाव ही उनकी नियति बन गयी है।
द्वितीय विश्वययुद्ध की समाप्ति के बाद जो इतिहास का सर्वाधिकार विध्वंसकारी युद्ध था- विजेता ब्रेटनवूड्स सम्मेलन में शामिल हुए और उन्होंने पुनिर्नर्माण तथा विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों की स्थापना की। इन संस्थानों पर विकसित पूंजीवादी देशों खासकर अमरीका का प्रभुत्व कायम हो गया । जल्द ही वे यह निर्देश देने के औजार हो गये कि अपनी जरूरतों के लिए इन संस्थाओं से कर्ज लेने वाले ग्राहक देशों की किस तरह की आर्थिक नीतियां अपनानी चाहिए। कर्जों के साथ लगातार `शर्तो´ को भी थोप दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने एक पूर्ण संरचनात्मक समायाजोन कार्यक्रम को जोड़ दिया जो सभी विकासशील देशों के लिए एक रामबाण हो गया, चाहे उनकी खास विशेषता जो भी हो।
संयुक्त राष्ट्र ने एक `नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था´ की रूपरेखा तैयार की। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ऐसी व्यवस्था की बातें बंद हो गयीं और उसकी जगह अमरीका निर्देिशत `नयी आर्थिक व्यवस्था´ की बात की जाने लगी। ` नव- उदरतावाद ´ का आर्थिक दशZन इस क्षेत्र में प्रभावी होने लगा। `मुक्त बाजार´ प्रतिस्पर्धा, निजी उद्यम, संरचनात्मक समायोजन आदि की बातों के आवरण में तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों जो अमरीका तथा ग्रुप-8 देशों से काम करती हैं, नवगठित विश्व व्यापार संगठन के औजार साथ जो असमान गैट संधि द्वारा सामने लाया गया, साम्राज्यवादी देशों ने तीसरी दुनिया के देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर नियंत्रण करने का निष्ठुर अभियान शुरू कर दिया है। यह और कुछ नहीं बल्कि नये रूप में, नये तरीके से समकालीन विश्व स्थिति में नव उपनिवेशी शोषण थोपने का एक तरीका था। उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडीकरण प्रिय मुहावरा हो गये हैं।
तथ्य यह साबित कर रहे हैं कि इन सभी नीतियों ने वस्तुत: गरीबी, बेकारी, निरक्षरता तथा बीमारी की समस्याओं को और अधिक गहरा किया है जिनसे विकासशील देशा लगातार पीडित रहे हैं। इन नीतियों ने अमीर तथा गरीब देशों के बीच एवं प्रत्येेक देश में अमीर तथा गरीब के बीच खाई को बढ़ाया है।
विश्व व्यापार संगठन की कार्यविधि के जरिये सभी देशों पर निवेश पर बहुपक्षीय समझौते को थोपने के प्रयास का उद्देश्य भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाना एवं आगे बढ़ाना है जिसकी पहल अमरीका ने यूरोपीय यूनियन तथा आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के समर्थन से की है। वह विकासशील देशों की आर्थिक संप्रभुता का भितरघात करेगा।
नव-उदार भूमंडलीकरण एक अराजक विश्व का निर्माण कर रहा है जो पूंजीवाद, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं विश्व व्यापार संगठन के अंधे कानूनों की दया पर निर्भर रहेंगें। क्या भूमंडलीकरण यह काम कर सकता है ? या मानव जाति की बुनियादी समस्याओं का समाधान कर सकता है ? ऐसा भूमंडलीकरण आर्थिक संकट ही लायेगी जो अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लेगा। हम ऐसे संकट के पूर्व संकेतों को देख रहे हैं।
इस तरह का भूमंडलीकरण नििश्चत तौर से अधिकांश देशों में मेहनतकश जनता की उपलब्धियों की निष्फल कर देगा।
हम केवल एक भूमंडलीकरण की परिकल्पना कर सकते हैं वह है समाजवादी भूमंडलीकरण जिसकी माक्र्स ने 150 वषZ पहले परिकल्पना की थी। लेकिन वह अभी काफी दूर है। पर इसके लिए संघषZ को विकसित किया जाना है। जन- प्रतिरोध तथा सभी विकासशील देशों के संयुक्त रूख ने नव-उदावादी भूमंडलीेकरण के प्रस्तावकों की योजनाओं को पराजित किया जा सकता है और एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर आधारित एक भूमंडलीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

20 नवंबर 2007

54 करोड़ की विकल्पहीन दुनिया :-

एक आंकडे़ के मुताबिक भारत 54 करोड़ युवाओं की आबादी का देश है जो कि दुनिया में किसी भी देश के युवा आबादी की सबसे बड़ी संख्या है। 54 करोड़ युवा मस्तिष्क, एक अरब आठ करोड़ ( देश की सम्पूर्ण जनसंख्या से कुछ ज्यादा ही) हाथों वाला देश, देश की सबसे बड़ी शक्ति हो सकती है! यह शक्ति देश को बना सकती है और तबाह भी कर सकती है। बनाने व तबाह करने में इन हाथों को औजार की जरूरत है। इन हाथों में औजारों के चेहरे देश के भविष्य का चेहरा तय करेंगे। इनके उदर की भूख इस व्यवस्था में चारे की तलाश करेगी। इनका आक्रोश विकल्प को ढूंढ़ निकालेगा। देश के दो असमान बंटे ध्रुवों में पुल बनाकर रास्ता तय करने की कोई गुजांइश नहीं दिखती। अत: इस खाई को पाट कर समतल किया जाय, यह फैसला युवा आबादी की बहुसंख्या तय करेगी।
युवा वर्ग में शिक्षा की स्थिति व शिक्षा प्राप्त करने के जो कारण हैं उसका मनोविज्ञान शिक्षा प्रणालियों व पाठ्यक्रमों से तय होता है। शिक्षा के द्वारा समय-काल व हित को देखते हुए हमेशा लोगों का मनोभाव बनाया जाता रहा है। आज जो शिक्षा दी जा रही है चाहे वह मीडिया के द्वारा या फिर शिक्षण संस्थानों के द्वारा उसके पीछे के हित को हमेशा समझना होगा यद्यपि यह अलग बात है कि देश का मात्र 4% युवा ही विश्वविद्यालय के प्रांगण की सूरत देख पाता है पर देश की व्यवस्था प्रणाली को पूरी संचालित यही वर्ग कर रहा है। उच्च शिक्षा पाने वाला यह अल्प वर्ग आज किस वर्गों से आ रहा है यह देखना महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि शिक्षा कुछ खास घरानों में कैद होती जा रही है बल्कि शिक्षा के निजीकरण ने इस दायरे को और संकुचित करने का कार्य किया हैं शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार उन्हीं हाथों में कैद होते जा रहे हैं जिनके पास पहले से पैसे हैं, रोजगार हैं। तकनीकी शिक्षा, विज्ञान की शिक्षा या फिर सामाजिक विषयों कि शिक्षा मौलिक चितंन की परंपरा को बढ़ावा देकर समाज सापेक्ष बनाने के बजाय कुछ वगो के हित में अपनी भूमिका अदा कर रही है जिसका एक और उद्देश्य नौकरी पाने और निजी संपत्ति को बढ़ावा देने की योग्यता हासिल करना मात्र रह गया है। ऐसा करने में पाठ्यक्रमों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इन पाठ्क्रमों को तय करने वाले लोगों का हित व उद्देश्य इससे जुड़ा हुआ है। यह वर्ग इन पाठ्यक्रमों के जरिये अपने और आम युवा वर्ग के बीच एक मध्यस्थ तैयार कर रहा है। अपनी भाषा के मुताबिक इस वर्ग का मनोविज्ञान बना रहा है। शिक्षा मानव समाज के सभी पहलुओं के विकास के बजाय निजी विकास व व्यक्तिवाद के बढ़ावा देने वाली होती जा रही है, जिसका असर शहरी मèयम वर्ग में साफ तौर पर दिखाई पड़ता है, वह संवेदनहीन होता जा रहा है। समाज के निचले पायदान पर खड़ा आदमी उसके लिये जरूरत के मुताबिक सिर्फ मशीन है। उसके दुख, शोषण, अधिकार, निजता के स्वप्न में बहुत दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ते। मानसिक रूप से इनके साथ वह खड़े होने को भी तैयार नहीं है। यह निजीगत मुनाफे का भाव शिक्षा प्रणाली के जरिये मानव के मशीनीकरण की एक प्रक्रिया है। जो वेदना, करूणा, सहानुभूति जैसे मूल्यों को कमजोर बना रहा है। तकनीक, विज्ञान चिकित्सा में हो रहे शोध सामाजिक कल्याण के बजाय मुनाफे को ध्यान में रख कर किये जा रहे हैं। इसी पर दुनिया का बड़ा बजार टिका है।
शिक्षा व रोजगार के सवाल को एक दूसरे से जोड़ कर देखा जाता है और कुछ विषयों को लेकर बूम जैसी बातें की जाती है जिसमें मीडिया, तकनीक, मैनेजमेंट आदि विषय शामिल है। यह बूम क्या है ? इसे समझने की जरूरत है समाज के इस एक पक्षीय विकास में, जरूरत के मुताबिक कुछ खास तरह की योग्यता रखने वालों की जरूरत है ऐसी जरूरतें नयी तकनीक के कारण पैदा होती है। अत: अधिकाधिक संख्या में इस योग्यता या ज्ञान को बढ़ावा देकर ज्यादा से ज्यादा मानव संसाधन तैयार किया जाता है ताकि उन्हें बार्गेन कर सस्ती मजदूरी देकर मुनाफा कमाया जा सके। बूम जैसे फलसफे सिर्फ मुनाफे की बढ़ोत्तरी के लिये बनाये गये है। दूसरे पक्ष में उसका फायदा यह होता है कि बड़े-बड़े निजी संस्थान खोल कर अधिकाधिक फीस ली जाती है और धीरे-धीरे इस बूम में कूदनें वाले युवाओं की छलांग छोटी होती जाती है।

युवा और राजनीति :-
युवाओं में राजनीति एक अस्पृश्य शब्द है। यह माना जाता है कि राजनिति और शिक्षा दो अलग-अलग ध्रुव हैं। शिक्षण संस्थानों से राजनीति को धीरे- धीरे और दूर किया जा रहा है बी.एच.यू. जिसे एिशया के सबसे बड़े शिक्षण संस्थान के नाम से जिसे जाना जाता है, छात्र-संघ को बैन रख किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियां रोकने के लिये कई वषोZं से धारा 144 लगा दी गयी है। जिसमें 5 लोग एक साथ इकट्ठा भी नहीं हो सकते और दूसरी तरफ प्रशासन के सहयोग से संघ की शाखायें चलायी जाती है अन्य संस्थानों में राजनीति को संसदीय राजनीति से ही जोड़ कर देखा जा रहा है जिसका समाज से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
विश्वविद्यालय की राजनीति को लूट-अत्याचार का कैम्प बनाकर¡ इसे संसदवादी राजनीति के ट्रेंनिग कैम्प के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है। जहा¡ विश्वविद्यालय में िशक्षा प्राप्त राजनीतिक युवा को समाज के साथ जुड़ना चाहिये वहीं इसके विपरीत वह जनराजनीति को भूल जाता है। इस तरह से िशक्षा और राजनीति को अलग कर युवा वर्ग का गैर राजनीतिकरण किया जा रहा है। शिक्षण संस्थानों में चुनावों के बंद करने के पीछे एक कारण यह भी है कि संस्थानों में यदि राजनीति होगी तो जनपक्षीय राजनीति के भी उभार की आशंका बनी रह जाती है अत: किसी भी तरह राजनीति को शिक्षण संस्थानों में वर्जित किया जा रहा है।

मीडिया का प्रभाव :-
मीडिया के विभिन्न माध्यमों ने अपने-अपने तरह से युवा वर्ग को प्रभावित करने का प्रयास किया है फिल्मों की दुनिया में दिखने वाला युवा एक उच्च वर्ग का है जिसके पास गाड़ी है, समय की सबसे कीमती मोबाइल है, जीवन जीने की अपनी एक अलग शैली है, साथ में एक प्रेमी अवश्य है जिसमें दोयम दर्जे का प्रेम पाने के लिये उसे तमाम ताकतों से जूझना पड़ता है। यह एक सच हो सकता है पर उसकी जीवन शैली युवा वर्ग को प्रभावित कर अपनाने के लिये प्रेरित करती है। अपने शातिराने प्रेम मे वह समाज की समस्याओं से बहुत दूर खड़ा दिखता है। भविष्य में यदि इन फिल्मों को कोई इतिहासविद् आधार बनाकर समय को परिभाषित करेगा तो प्रेम समाज की सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभर कर आयेगी जहा¡ से रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार में जूझता समाज गायब ही दिखता है। ये फिल्मों के चरित्र किस युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहें है। समाज के मूल्यों को इतना बदल दिया गया है कि भगत सिंह, महात्मा गांधी को रूमानी अंदाज में परोस कर सामने लाने की जरूरत महसूस हो रही है और लाया भी जा रहा है। विज्ञापन ने इच्छाओं को आवश्यकताओं में तब्दील कर दिया है मानसिक रूप से सभी वर्गों की जरूरतों में समानता स्थापित करने का काम किया जा रहा है। जहा¡ बिना मोबाइल, परयूम व अन्य कई चीजें जरूरत बनती जा रही हैं। इन्हें पूरा करने के लिये वह विवश है। विज्ञापनों ने जिस चालाकी के साथ यह सोच डाली है उसमें वो विशेष वस्तु के विज्ञापनों के लिये विशेष माडल व पीढ़ी का चुनाव कर रही है शीतल पेय, ब्रांडेड कपड़े, वाइन, बाइक, व मोटर गािड़यों का विज्ञापन किसी पापुलर युवा ब्रांड द्वारा करवा रही है उसके साथ एक विशेष वेश-भूषा में महिला ब्रांड के रूप में अभिनय करती है जिसमें विज्ञापन परोक्ष रूप से यह कहता हुआ दिखता है कि यदि आप के पास फला ब्रांड है तो इस तरह की लड़की भी आपके साथ हो सकती है या मिल सकती है।

विकल्प हीन दुनिया :-
पूंजी प्रधान इस युग में युवा पैसे के लिये कुछ भी करने को तैयार है, किसी भी तरह का रोजगार जहा¡ उसे पैसा मिल सकें, उसकी एक बड़ी उपलब्धियाँ के तौर पर यह है चाहे वह डोर-टु-डोर जा कर कंपनियों में हुए अति उत्पादन की खपत करे या काल सेंटरों में वक्त बेवक्त अपनी श्रम देकर तनाव भरी जिंदगी जिये। समाज के विकास की अवधारणा को उसने स्व विकास में ढाल लिया है पर इन समस्त बिंदुओं में सीमित अवसर के बीच एक स्थान बनाता है तो दूसरों की कब्र खोदकर, तीसरे को धक्का देकर। ऐसे में सम्पूर्ण युवा वर्ग के सामने एक अंधेरी दुनिया है जिसे बिना बदले कोई विकल्प सामने नहीं दिखता।

02 नवंबर 2007

23 मार्च:-

भगत सिंह पर पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश के डायरी से प्राप्त ये कविताः-

-पाश

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मु¡दी पलकें देश में सिमटती जर रही झांकी की
देश सारा बच रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाजें जम गईं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चिहरे से आ¡सू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
उससे संबधित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था।

(डायरी, 23 मार्च 1982)

भगत सिंह के कुछ पत्रः-

घर को अलविदा : पिता जी के नाम पत्र:-

( सन् 1923 में भगतसिंह, नेशनल कालेज, लाहौर के विद्यार्थी थे। जन-जागरण के लिए ड्रामा-क्लब में भी भाग लेते थे। क्रान्तिकारी अध्यापकों और साथियों से नाता जुड़ गया था। भारत को आजादी कैसे मिले, इस बारे में लम्बा-चौड़ा अध्ययन और बहसें जारी थीं।
घर में दादी जी ने अपने पोते की शादी की बात चलायी। उनके सामने अपना तर्क न चलते देख पिता जी के नाम यह पत्र लिख छोड़ा और कानपुर में गणेशशंकर विद्यार्थी के पास पहु¡चकर `प्रताप´ में काम शुरू कर दिया। वहीं बी.के. दत्त, िशव वर्मा, विजयकुमार सिन्हा-जैसे क्रान्तिकारी साथियों से मुलाकात हुई। उनका कानपुर पहु¡चना क्रान्ति के रास्ते पर एक बड़ा कदम बना। पिता जी के नाम लिखा गया भगतसिंह का यह पत्र घर छोड़ने सम्बन्धी उनके विचारों को सामने लाता है।


पूज्य पिता जी,
नमस्ते।
मेरी जिन्दगी मकसदे आला यानी आजादी-ए-हिन्द के असूल के लिए वक्फ हो चुकी है। इसलिए मेरी जिन्दगी में आराम और दुनियावी खाहशात बायसे किशश नहीं है।
आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हू¡।

आपका ताबेदार
भगतसिंह



कुलतार के नाम अन्तिम पत्र:-

सेण्ट्रल जेल,
3 मार्च,1931


प्यारे कुलतार,
आज तुम्हारी आ¡खों में आ¡सू देखकर बहुत दुख पहु¡चा। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था। तुम्हारे आ¡सू मुझसे सहन नहीं होते। बरखुरदार, हिम्मत से विद्या प्राप्त करना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना। हौसला रखना, और क्या कहू¡-



उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे-जफ़ा क्या है,
हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।

दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहा¡ अदू सही, आओ मुक़ाबला करें।

कोई दम का मेहमा¡ हू¡ ऐ अहले-महिफ़ल,
चराग़े- सहर हू¡ बुझा चाहता हू¡।

हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।

अच्छा रूख़सत। खुश रहो अहले-वतन, हम तो स़फर करते हैं। हिम्मत से रहना।
नमस्ते।
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह



बलिदान से पहले साथियों को अन्तिम पत्र:-
22मार्च,1931

साथियों,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिन्दा रह सकता हू¡, कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता।
मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रान्ति का प्रतीक बन चुका है और क्रान्तिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज नहीं हो सकता।
आज मेरी कमजोरिया¡ जनता के सामने नहीं है। अगर मैं फा¡सी से बच गया तो वे जाहिर हो जायेंगी और क्रान्ति का प्रतीक-चिन्ह मिद्धम पड़ जायेगा या सम्भवत: मिट ही जाये। लेकिन दिलेराना ढंग से हसते-हसते मेरे फासी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताए¡ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि क्रान्ति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।
हा¡, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवा¡ भाग भी पूरा नहीं कर सका। अगर स्वतन्त्र, जिन्दा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता।
इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फा¡सी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अन्तिम परीक्षा का इन्तजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाये।
आपका साथी,
भगतसिंह



असेम्बली बम काण्ड:-

असेम्बली हॉल में फेंका गया पर्चा
(8 अप्रैल,सन् 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और दत्त द्वारा बाटें गये अंग्रजी पर्चे का हिन्दी अनुवाद)

`हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातािन्त्रक सेना´
सूचना


``बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊ¡ची आवाज की आवश्यकता होती है´´ प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलिया¡ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस वषोंZ में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं और न ही हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जानेवाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है। यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग `साइमन कमीशन´ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आखें फैलाये हैं और इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार `सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक´ (पब्लिक सेटी बिल) और `औद्योगिक विवाद विधेयक´ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है। इसके साथ ही आनेवाले अधिवेशन में `अखबारों द्धारा राजद्रोह रोकने का कानून´ (प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करनेवाले मजदूर नेताअो की अन्धाधुन्ध गिरतारिया¡ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गम्भीरता को महसूस कर `हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ´ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि कानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाये। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परन्तु उसकी वैधनिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम
`सार्वजनिक सुरक्षा´ और `औद्योगिक विवाद´ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर मिल सके। हम इन्सान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रान्ति द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रन्ति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
इन्कलाब जिन्दाबाद! कमाण्डर इन चीफ बलराज

गाँधीजी के नाम खुली चिट्ठी:-


परम कृपालु महात्मा जी,

आजकल की ताजा खबरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की सफलता के बाद आपने क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को फिलहाल अपना आन्दोलन बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौका देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाए की हैं। वस्तुत: किसी आन्दोलन को बन्द करना केवल आदर्श या भावना से होने वाला काम नहीं है। भिन्न-भिन्न अवसरों की आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता है।
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अन्तिम समझौता न होगा। मैं मानता हू¡ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ गए होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर कोई यह न मानेगा कि हम मंजिल-मकसूद पर पहु¡च गये हैं। सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बधी हुई है। उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की कल्पना की जा सकती और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है।
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्तें ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआओं का है। लाहौरवाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आपने फिलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो भी वह प्रस्ताव तो कायम ही है। इसी तरह `हिन्दुस्तानी सोिशयालिस्ट रिपब्लिकन पार्टी´ के नाम से ही साफ पता चलता है कि क्रान्तिवादियों का आदर्श समाज-सत्तावादी प्रजातन्त्र की स्थापना करना है। यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नहीं है। उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए ब¡धे हुए हैं। परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध-नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे। क्रान्तिकारी युद्ध जुदा-जुदा रूप धारण करता है। कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी केवल आन्दोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन जाता है। ऐसी दशा में क्रान्तिवादियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए विशेष कारण होना चाहिए। परन्तु आपने ऐसा कोई नििश्चत विचार प्रकट नहीं किया। निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रान्तिवादी युद्ध में कोई विशेष महत्व नहीं होता, न हो नहीं सकता।
आपके समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया है, और फलस्वरूप आपके सब कैदी रिहा हुए है। पर क्रान्तिकारी कैदियों का क्या? 1915 ई‐ से जेलों में पड़े हुए गदर-पक्ष के बीसों कैदी सजा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे है। मार्शल लॉ के बीसों कैदी आज भी जिन्दा कब्रों में दफनाये पड़े हैं। यही हाल बब्बर अकाली कैंदियों का हैं। देवगढ़, काकोरी, मछुआ-बाजार और लाहौर सड़यंत्र के कैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बन्द पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं। लाहौर, दिल्ली, चटगा¡व, बम्बई, कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज्यादा सड़यंत्र के मामले चल रहे हैं। बहुसंख्यक क्रान्तिवादी भागते फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रिया¡ हैं। सचमुच आधी दर्जन से अधिक कैदी फा¡सी पर लटकने की राह देख रहे हैं। इन सबका क्या? लाहौर ‘सड़यंत्र के सज़ायाता तीन कैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गए हैं और जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रान्तिवादी दल के बड़ा हिस्सा नहीं है। उनका भविष्य ही उस दल के सामने एक मात्र प्रश्न नहीं है। सच पूछा जाये तो उनकी सजा घटाने की अपेक्षा उनके फा¡सी पर चढ़ जाने से ही अधिक लाभ होने की आशा है।
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते हैं। वे ऐसा क्यों करें? आप ने कोई नििश्चत वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है।
ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है। यदि ऐसी बात नहीं है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रान्तिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते। अपना आन्दोलन बन्द करने के बारे में पहले अपको उनकी बुिद्ध की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए था। मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं कि क्रन्तिकारी बुिद्धहीन हैं, विनाश और संहार में आनन्द मानने वाले हैं। मैं आपको कहता हू¡ कि वस्तुस्थिति ठीक इसकी उल्टी है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार जो जिम्मेदारी वे अपने माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख्याल रहता है। क्रान्ति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यंत महत्व का मानते हैं, हाला¡कि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा कोई चारा उनके लिए नहीं है। उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाए। अकेले पड़ जाने पर उनका िशकार आसानी से किया जा सकता है। ऐसी दशा में उनके दल में बुिद्ध-भेद और िशथिलता पैदा करने वाली कोई भी भाव पूर्ण अपील एकदम बुिद्धमानी से रहित और क्रान्तिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी।
इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्रान्तिकारी नेताओं से बातचीत कीजिए-उनमें से कई जेलों में हैं- और उनके साथ सुलह कीजिए या ये सब प्रार्थनाए¡ बन्द रखिए। कृपा कर हित की दृिष्ट से इन दो में से कोई एक रास्ता चुन लीजिए और सच्चे दिल से उस पर चलिए। अगर आप उनकी मदद न कर सकें, तो मेहरबानी कर के उन पर रहम करें। उन्हें अलग रहने दें। वे अपनी हिफाजत अपने आप अच्छी तरह कर सकते हैं। वे जानते हैं कि भावी राजनैतिक युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रान्तिकारी पक्ष को ही मिलने वाला है। लोक समूह उनके आस-पास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जन समूह को अपने झंडे तले, समाज सत्ता प्रजातंत्र के उम्दा और भव्य आदशZ की ओर ले जाते होंगे।
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिए।
आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे।
आपका
अनेकों में से एक

विद्यार्थी और राजनीति:-


भगत सिंह के द्वारा यह लेख यद्यपि पंजाब के युवाओं के नाम लिखा गया है परन्तु आज पूरे देश के शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों का गैर राजनीतिकरण किया जा रहा है। ऐसे में इस लेख के मायने और बढ़ जाते हैं।

इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान(विद्यार्थी) राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें।
पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है। विद्यार्थी से कालेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं कि वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे। आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मन्त्री हैं, स्कूलों-कालेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ानेवाला पालिटिक्स में हिस्सा न ले। कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था। वहा¡ भी सर अब्दुल कादर और प्रोफसर ईश्वरचन्द्र नन्दा ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को पोलटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।
पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है। इसका क्या कारण है? क्या पंजाब ने बलिदान कम किये हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली है? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं। आज पंजाब कौंसिल की कार्यवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है, और विद्यार्थी-युवा जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस सम्बन्ध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते है तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोिशश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नही तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं- ``काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमन्द साबित होगे।´´
बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक `(`नौजवानों के नाम अपील´, प्रिंस क्रोपोटकिन) पढ़ रहा था। एक प्रोफेसर साहब कहने लगे, यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा- प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफेसर के लिए बड़ा जरूरी था। प्रोफेसर की `योग्यता´ पर लड़का हस भी पड़ा। और उसने फिर कहा- ये रूसी सज्जन थे। बस! `रूसी!´ कहर टूट पड़ा! प्रोफेसर ने कहा कि ``तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो।´´
देखिए आप प्रोफेसर की योग्यता! तब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते है?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गा¡धी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी, तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज? फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करनेवाले वफादार नहीं, बल्कि गद्दार हैं, इन्सान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं। तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।
सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत हैं, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्योछावर कर दें। लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनिया¡दारी के झंझटों में फ¡से सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फ¡से हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो। सिर्फ गणित और ज्योग्राफी का ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो।
क्या इंग्लैण्ड के सभी विद्यार्थियों का कालेज छोड़कर जर्मनी के खिलाफ लड़ने के लिए निकल पड़ना पोलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहा¡ थे जो उनसे कहते-जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो। आज नेशनल कालेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जायेंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है? सभी देशों को आजाद करवाने वाले वहा¡ के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। क्या हिन्दुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पायेगा? नवजवानों को 1919 में विद्यार्थियों पर किये गए अत्याचार भूल नहीं सकते। वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रान्ति की जरूरत है। वे पढ़ें। जरूर पढ़े! साथ ही पोलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें। अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें। वरना बचने का कोई उपाय नजर नहीं आता।

01 नवंबर 2007

भगत सिंह के आइने में भारत


भगत सिंह के विचारों की बढ़ती प्रासंगिकता और आम आदमी का आज के समय में अलग-अलग मुद्दे पर संघर्ष आज उनके विचारों को और ज्यादा प्रासंगिक बना देता है ऐसी स्थिति मे हम दख़ल में भगत सिंह के दस्तावेजों की श्रिंखला की पहली कड़ी मे ये आलेख प्रस्तुत कर रहे है

दुनिया के सामने भगत सिंह का जो चेहरा जाने-अनजाने में रखा गया है वह किसी जुनूनी व मतवाले देश भक्त का है। भगत सिंह के विचार, उनके दर्शन को लोगों से दूर रखा गया पर वक्त ने देश को उस मुकाम पर ला खड़ा किया है जहॉ भगत सिंह के विचार और प्रासंगिक होते दिख रहे है। जिस आम जन की बात भगत सिंह करते थे वह मंहगाई, गरीबी, भूख से पीड़ीत होकर अपने को हाशिये पर महसूस कर रहा है। वह देश में बनाये गये कानूनों , नियमों, की पक्षधरता को देखते हुए उनके प्रतिरोध में खड़ा हो रहा है।
देश को अग्रेजी सत्ता से मुक्त होनें के साठ साल बाद भी देश का आम जन उस आजादी को नहीं महसूस कर पर रहा है। जो भगत सिंह, पेरियार, अम्बेडकर का सपना था। आज वे स्थितियां जिनका भगत सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय आंकलन किया था लोगों के सामने हैं। आंदोलन के चरित्र को देखते हुए भगत सिंह ने कहा था कि काग्रेस के नेतृत्व में जो आजादी लड़ी जा रही है उसका लक्ष्य व्यापक जन का इस्तेमाल करके देशी धनिक वर्ग के लिये सत्ता हासिल करना है। यही कारण था कि देश का धनिक वर्ग गांधी के साथ था। उसे पता था कि जब तक देश को अंग्रजी सत्ता से मुक्ति नहीं मिलेगी तब तक बाजार में उनके सिक्के जम नहीं सकेगें। आखिरकार हुआ भी वही जिसे भगत सिंह गोरे अंग्रजों से मुक्ति व काले अंग्रजों के शासन की बात करते थे। आज आम आदमी इस शासन तल में अपनी भागीदादी महसूस नहीं कर रहा है। उसके लिये आज भी अंग्रजों के द्वारा दमन के लिये बनें नियम-कानून नाम बदलकर या उसी स्थिति में लागू किये जा रहे हैं। आजादी के साठ वर्ष बाद सरकारे आफ्सा, पोटा, राज्य जन सुरक्षा अधिनियम जैसे दमन कानूनों की जरूरत पड़ रही है क्योंकि जन प्रतिरोध का उभार लगातार बढ़ रहा है।
आजादी के बाद कई मामलों में स्थितियां ओर भी विद्रूप हुई है। जहॉ सन् 42 में केरल के वायनाड जिले में इक्का-दुक्का किसानों की मौतें होती थी वहॉ आज स्थिति ये है कि देश के विभिन्न राज्यों में हजारों हजार की संख्या में किसान आत्महत्यायें कर रहे है। आज भी देश में काला हांडी जैसी जगह है बल्कि काला हांडी से एक कदम ऊपर देश की एक बड़ी आबादी है। जो जीवन की मूलभूत जरूरतों से जुझ रही है। जो इसलिये भी जिन्दा रखी गयी है ताकि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये वह सस्ते में श्रम को बेंच सके। इसके बावजूद भी आज एक बड़े युवा वर्ग के लिये करने को काम नहीं है। कारणवस वह किसी भी तरह का अपराध करनें को तैयार है। भारत एक बड़ी युवा संख्या की विकल्पहीन दुनियां है। ऐसी स्थिति में यह बात सच साबित होती है कि भगत सिंह जिस आजादी की तीमारदारी करते थे वह आजादी देश को नही मिल पायी है।
भगत सिंह देश, दुनिया को लेकर एक मुकम्मल समाज बनानें का सपना देखते थे जिसमें वे अन्तिम आदमी को आगे नहीं लाना चाहते थे बल्कि सबको बराबरी पर लाना चाहते थे। जहॉ जाति, धर्म भाषा के आधार पर समाज का विभाजन न हों। वे शोषण व लूट खसोट पर टिके समाज को खत्म करना चाहते थे, वे किसी प्रकार के भेदभाव को खारिज करते थे। उनका मानना था कि दुनियां में अधिकांश बुराइयों की जड़ निजी सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को शोषण व भ्रष्टाचार के जरिये जुटाया जाता है जिसके सुरक्षा के लिये शासन की जरूरत पड़ती है यानि निजी संम्पत्ति के ही कारण समाज में शासन की जरूरत पड़ती है।
एक लम्बे अर्से तक भगत सिंह को आतंकी की नजर से देखा जाता रहा जिसको भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ विचार-विर्मश करते हुए कहा कि मैं आतंकी नहीं हूं। आंतकी वे होते है जिनके पास समस्या के समाधान की क्रांतिकारी चेतना नही होती। हमारे भीतर क्रांतिकारी चिंतन के पकड़ के आभाव की अभिव्यक्ति ही आतंकवाद है पर क्रांतिकारी चेतना को हिंसा से कतई नही जोड़ा जाना चाहिये, हिंसा का प्रयोग विशेष परिस्थिति में ही करना जायज है वर्ना किसी जन आंदोलन का मुख्य-हथियार अहिंसा ही होनी चाहिये। हिंसा-अहिंसा से किसी व्यक्ति को आंतकी नही माना जा सकता। हमें उसकी नीयति को पहचानना होगा क्योंकि यदि रावण का सीता हरण आतंक था तो क्या राम का रावण वध भी आतंक माना जाय। अपने अल्प कालिक जीवन के दौरान भगत सिंह ने कई विषयों पर लिखा, पढ़ा व सोचा समझा, और यह कहते गये कि-
हवा में रहेगी, मेरे ख्याल की बिजली।
ये मुस्ते खाक है फानी रहे, रहे न रहे।।

23 अक्तूबर 2007

शान्ति पाठ

अखबारों की सुर्खियाँ मिटाकर दुनिया के नक्शे पर
अन्धकार की एक नयी रेखा खींच रहा हूँ ,
मैं अपने भविष्य के पठार पर आत्महीनता का दलदल
उलीच रहा हूँ।
मेरा डर मुझे चर रहा है।
मेरा अस्तित्व पड़ोस की नफरत की बगल से उभर रहा है।
अपने दिमाग के आत्मघाती एकान्त में
खुद को निहत्था साबित करने के लिए
मैंने गांधी के तीनों बन्दरों की हत्या की हैं।
देश-प्रेम की भट्ठी जलाकर
मैं अपनी ठण्डी मांसपेशियों को विदेशी मुद्रा में
ढाल राह हूँ।
फूट पड़ने के पहले, अणुबम के मसौदे को बहसों की प्याली में उबाल रहा हूँ।
ज़रायमपेशा औरतों की सावधानी और संकटकालीन क्रूरता
मेरी रक्षा कर रही है।
गर्भ-गद् गद् औरतों में अजवाइन की सत्त और मिस्सी
बाँट रहा हूँ।
युवकों को आत्महत्या के लिए रोज़गार दफ्तर भेजकर
पंचवर्षीय योजनाओं की सख्त चट्टान को
कागज़ से काट रहा हूँ।
बूढ़ों को बीते हुए का दर्प और बच्चों को विरोधी
चमड़े का मुहावरा सिखा रहा हू¡।
गिद्धों की आँखों के खूनी कोलाहल और ठण्डे लोगों की
आत्मीयता से बचकर
मैकमोहन रेखा एक मुर्दे की बगल में सो रही है
और मैं दुनिया के शान्ति-दूतों और जूतों को
परम्परा की पालिश से चमका रहा हूँ।
अपनी आँखों में सभ्यता के गर्भाशय की दीवारों का
सुरमा लगा रहा हूँ।
मैं देख रहा हूँ एशिया में दायें हाथों की मक्कारी ने
विस्फोटक सुरंगें बिछा दी हैं।
उत्तर-दक्षिण-पूरब-पिश्चम-कोरिया, वियतनाम
पाकिस्तान, इसराइल और कई नाम
उसके चारों कोनों पर खूनी धब्बे चमक रहे हैं।
मगर मैं अपनी भूखी अंतड़ियाँ हवा में फैलाकर
पूरी नैतिकता के साथ अपनी सड़े हुए अंगों को सह रहा हूँ।
भेड़िये को भाई कह रहा हूँ।
कबूतर का पर लगाकर
विदेशी युद्धप्रेक्षकों ने
आज़ादी की बिगड़ी हुई मशीन को
ठीक कर दिया है।
वह फिर हवा देने लगी है।
न मै कमन्द हूँ
न कवच हूँ
न छन्द हूँ
मैं बीचोबीच से दब गया हूँ।
मै चारों तरफ से बन्द हूँ।
मैं जानता हूँ कि इससे न तो कुर्सी बन सकती है
और न बैसाखी
मेरा गुस्सा-
जनमत की चढ़ी हुई नदी में
एक सड़ा हुआ काठ है।
लन्दन और न्यूयार्क के घुण्डीदार तसमों से
डमरू की तरह बजता हुआ मेरा चरित्र
अंग्रेजी का 8 है।

09 अक्तूबर 2007

खम्माम से रिर्पोट:-



आंध्र प्रदेश के मोदी गोंडा जिले में जुलाई में हुई पुलिस फायरिंग में कई लोगों की जानें गयी। दख़ल पत्रिका मंच के सदस्य के द्वारा की गयी फैक्ट फाइडिंग पर आधारित रिर्पोट-

यह वक्त घबराये हुए लोगों के
शर्म आंकने का नही
और न यह पूंछने का-
कि सन्त और सिपाही में
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!


अखबार के पन्ने पर जो खबर 29 जुलाई को छायी हुई थी, उससे बेपरवाह, होटल के नौकर ने टेबल पर गिरी चाय को पोंछकर डस्टविन में फेंक दिया। चौराहे के कचड़े से गाय ने उठाकर अपने जबड़ों में उसे निगल लिया। मूंगफली बेंचने वाले के ठोंगों से होती हुई वह खबर किसी दरवाजे के पास पड़ी थी, जिस पर कुत्ते ने मूत दिया। ट्रेन के डब्बे में वह पढ़नें के बाद बिस्तर बनी, झाडू लगाने वाले ने उसे बुहारकर तेज रतार से दौड़ती ट्रेन की पटरियों पर गिराया और वह हवा में धूल के साथ देर तक उड़ती रही।
खबर थी मोदी गोंडा में पुलिस की गोलियों से भूने गये उन लोगों की जो शान्तिपूर्वक धरने पर बैठे हुए थे। मसला था 170 एकड़ जमीन का जो सरकारी कब्जे में थी।
दस हजार की आबादी वाले इस मण्डल में कुल 24 गाँव है, यहाँ के लोग मुख्यता कृषि पर निर्भर है। दरअसल बात यहाँ से शुरू की जाय जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने राज्य से शांति वार्ता के दौरान इस जमीन को भूमिहीनों में बांटने की मांग की। उनकी यह मांग पूरी न हो सकी। अलबत्ता अन्य पार्टीयों व उनके कार्यकत्ताZओं की नजर इसपर जरूर गड़ गयी। कुछ माह बाद जमीन का 35 एकड़ कांग्रेस समर्थकों व कार्यकर्ताओं द्वारा जोत लिया गया जिस पर कोई आवाज इसलिए नहीं उठी क्योकि सरकार कांग्रेस की थी। तत्पश्चात मोदी गोंड़ा के प्रधान जो कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के सदस्य है, के कुछ कार्यकर्ताओं व समर्थकों ने भी 16 जुलाई को कुछ जमीन जोतनी शुरू की, मनाही होने पर वे 21 जुलाई को धरनें पर बैठे, धरने को बेअसर देखते हुए 24 जुलाई से उन्होने भूख हड़ताल शुरू की। 27 को हुए लाठी चार्ज के विरोध में 28 जुलाई को बंद का आवाहन किया, बन्द को असरदार बनाने के लिये सड़क पर वाहनों को न चलने देने का फैसला लिया गया। 28 को दोपहर बारह बजे के आसपास पुलिस की एक टुकड़ी ने आकर 1घटें के अंदर प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। धरने पर बैठे लोग अपनी मांगों को लेकर अडिग रहे, फिर पुलिस के द्वारा लाठी चार्ज शुरू किया गया जबाब में लोगों ने पत्थर फेंकना शुरू किया तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, जिससे सात लोग मारे गये कई लोग घायल हो हुए। 20 लोगों की सूची घायलों में उपलब्ध हो पायी।
लोगों के द्वारा पुलिस के खिलाफ थाने में एफ0 आई0 आर0 जैसी हास्यास्पद बात की कार्यवाही की गयी पर एफ0 आई0 आर0 नामंजूर कर दिया गया। उल्टा पुलिस ने ही लोगों के खिलाफ एफ0 आई0 आर0 दर्ज किया। कुछ समय बाद ए0 पी0 सी0 एल0 सी0 (आध्रप्रदेश सिविल लिबर्टी कमेटी) ने किसी तरह से एक एफ0 आई0 आर0 दर्ज करवाया। जिस पर सिवाय एक-दो तबादलों के कोई कार्यवाही नहीं हुई।
यह एक संक्षिप्त घटनाक्रम था जिसकी तसीस के लिये हम हैदराबाद से सुबह पा¡च बजे निकले। हम कुल सात लोग थे, 220 कि0मी0 की यात्रा तय कर हमें खम्माम पहुंचना था। जहाँ से 15 कि0मी0 दूरी पर बसा था मोदी गोंडा मण्डल, संड़क के चारो तरफ टीलानुमा पहािड़या थी। सड़क के किनारे खेतों में कपास की फसलें लगी हुई थी। हमारी गाड़ी में कोई तेलगू धुन बज रही थी, जिसमें बीच-2 में अग्रेजी के शब्दों की भी दखलंदाजी थी। झोपड़पट्टी, भूख, गरीबी, असमानता को देखकर भारत की अखण्डता में एकता का एहसास हो रहा था जो कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर तक सर्व व्याप्त है। तस्वीरों को अपनी आंखों में सजोते हुए तीन घंटे का रास्ता तय करके हम खम्माम के लेनिन नगर कस्बे में पहुंचे, जहाँ से हमारे साथ कुछ िशक्षक, वकील मोदी गोंडा के लिये रवाना हुए। इनको साथ में लेने के पीछे कारण यह था कि हम गाँव वालों की तेलगू समझ सकें।
अब हम उस चौराहे पर थे जहाँ लोगों को कुछ दिन पूर्व गोलीयों से भूना गया था। चौराहे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (संसदवादी) के झंडे लगे हुए थे, जिसके नीचे सार्ट-कट में cpm.znb. (कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद) लिखा हुआ था, किनारे पर अम्बेडकर की मुर्ति लगी थी जो एक हाथ उठा कर आसमान की तरफ इशारा कर रही थी। जिसे हम नहीं समझ सके। चारो तरफ से लोगों ने हमें घेर लिया। लोग हमें घटनाओं का ब्योरा दे रहे थे।
शर्मीला जी, जिसकी म्युजिक सेंटर की दुकान है जिसके बगल में ही लोग धरनें पर बैठे हुए थे। वे हमें अपने दुकान के नजदीक ले गयी, उन्होने अपनी दुकान की शटर बंद करके गोलियों के छर्रों से सटर में हुए छेद के निशान दिखाये। गोलियों से टूटे पी0 सी0 ओ0 के शीशे दिखायैं हमने आसपास की सभी दुकानों के कांउटर, बाक्स, व अन्य समानों में गोलियों के निशान देखे जगह-2 दीवालों के पलस्तर टूट गये थे।
चौराहे पर, घटना के दौरान मारे गये लोगो की याद में एक 38 फुट ऊचा स्मारक बनाया गया था। जिसकी बीस फुट-लम्बे व बीस फुट चौड़े आधार पर गुम्मदनुमा बनाया गया था। इसमें घटना में मारे गये उन सात लोगों की तस्वीरें मढ़ी गयी थी और नीचे उनके नाम लिखे हुए थे, गाँव के एक व्यक्ति ने तेलगू में लिखे उन नामों को पढ़ कर सुनाया जो इस प्रकार थे (उसकेला गोपया, वनका गोपीया, चिट्दूरीबाबू राव, छगम बाला स्वामी, एलागन तुला वीरन्ना, कट्टूला पेदूदा लक्ष्मी, पुस्थलति कुटुम्बराव) इन सात लोगों में छ: लोग घटना स्थल पर ही मारे गये जबकि छगम बाला स्वामी ने 31 जुलाई को अस्पताल में दर्द से कराहते हुए दम तोड़ा।
स्मारक के बगल में उन सोलह लोगों के भी नाम थे जो इस घटना में घायल हुए थे। लोगों ने हमें बताया की 300 से 400 गोलियां पुलिस के द्वारा चलाई गयी। हम स्मारक में जड़े गये उन सात मृतकों के चित्र देख रहे थे।
रमेश जिसकी उम्र तकरीबन 15 साल होगी, ने हमें बताया कि उसकी मां बट्टू राम बाई के पैर में गोली लगी है जिससे उनके पैर में स्टील का छड़ डाला गया है वे अब चल नहीं सकती। चौरहे पर वे ठेला लगाकर केले बेचती थी। पिता उपेन्द्र जो कि दूध बेंचते है अब घर का काम देखते है। रमेश ने हमसे पूछा कि क्या मैं उसे कोई नौकरी दिला सकता हू! जिसका मेरे पास कोई जबाव न था।
चौराहे से 100 मी0 की दूरी पर कोटेश्वर राव का घर था, जिसके हाथ में गोली लगी थी और स्टील के छड़ से उसे बांधा गया था। कोटेश्वर ने हमें बताया कि पहली गोली उसके सर्ट की जेब पर लगी, जेब में डायरी रखी हुई थी जिससे वे बच गये। उन्होंने वह डायरी दिखाई, जो फट गयी थी। कोटेश्वर कह रहे थे कि डायरी न होती तो उस स्मारक में उनका भी फोटो लगा होता।
हम घटना में मृत वीरन्ना की पत्नी ऊषा से मिले, ऊषा 28 बर्ष की एक दुबली-पतली महिला है, जिनके आंखो के ऑसू सूख चुके थे पर तबाही के मंजर व पति के मृत होने का दर्द अभी-भी किसी कोनें में छुपा था। ऊषा अपने 3 व 4 बर्ष के बच्चों के साथ इस वक्त अपनें बहन के घर में रहती थी। ऊषा ने हमें बताया कि वीरन्ना धरनें में शामिल नही थे हादसे के वक्त वे देखने के लिये घर से गये थे और नाहक ही मारे गये।
चौरहे के बगल में भा0 क0 पा0 (संसदवादी) के आफिस में हम गये। हशिये-हथौड़े का एक बड़ा चिन्ह दीवाल पर लाल रंग से पेंट किया हुआ था। चिन्ह देखकर नंदी ग्राम की याद आ गयी जहाँ हशिया किसानों का गला काटने व हथौड़ा मजदूरों का सिर काटने पर उतारू था। आफिस में हमें घटना के समय कैमरें में कैद की गयी कुछ तस्वीरें दिखायी गयी लोगों की अफरा-तफरी, रोते-कराहते चेहरों के साथ फोटो मौन थे। कोई चीख नहीं थी, कोई आवाज नही थी। कैमरे में कैंद किये गये चित्रों को तारतम्यता से घटनानुसार रखा गया था- खेत जोतते किसानों के चित्र, धरने पर बैठे लोग, भूख हड़ताल पर बैठे लोग, बंदी के दिन शांति पूर्वक बैठे लोग, पुलिस के साथ बातचीत करते लोग, पुलिस की गोलियों से भूनें जाते लोग, एस0 एल0 आर0 और ए0 के0 47 लिये सिविल डेªस में पुलिस, इसके बाद सड़क पर बिखरी लाशें थी। एक फोटो ऐसा था जिसमें छ: लाशों को एक साथ रखा गया था, उन्हे भा0 क0 पा0 (संसदवादी) के झंडे से लपेटा गया था। उसे देखकर यह लगा कि इन पार्टीयों के लिये लाश भी वोट मांगेगी। कल उनके बड़े-2 बैनर बनेंगे, सड़क, चौराहे, मुहल्लें, गलियों में वे चिपकाये जायेंगे। गोपीया, बाबू राव, लक्ष्मी, वीरन्ना सब इनके लिए वोट मांगने का काम करेंगे। मृतकों को पाँच लाख रू0 व घायलों को पचास हजार रू0 की रािश सरकार के द्वारा विभिन्न तरीकों से बांटी गयी लेकिन लोगों के यह सवाल भी थे कि क्या जिंदगी की कीमत पैसे से तौली जा सकती है? क्या गोपीया, वीरन्ना को 6 लाख रू0 में लौटाया जा सकता है? क्या कागज के टुकड़ों से ऊषा के आंसू व दर्द पोछें जा सकते है? क्या दमन व हत्या पुलिस की आदत बन चुकी है? धमाके की अवाज वहाँ नही थी। बीते हुए कल के साथ लोगों ने घटना को अपने घरों में, बच्चों ने अपनी चीखों में, सड़क ने अपनी धूल के नीचे दबा दिया था। तबाही के बाद सब कुछ शांत था। स्मारक पर एक दिया जलते-2 बुछ चुका था जिसकी राख इधर-उधर बिखरी हुई थी।

टिप्पणिया¡:-

एक आदिवासी गांव की यात्रा-








पिछले माह महत्मागांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्व विद्यालय के जनसंचार विभाग के छात्रों द्वारा विदर्भ के कई गांवों का सर्वे किया गया। गांव की स्थिती व आंतरिक, सामाजिक संरचना पर आधारित आदिवासी गांव बानरचूहा से यह रिर्पोट-
सरकार के शब्दकोश में/हम हैं कमजोर वर्ग के आदमी/जैसा कि आकाशवाणी, दूरदर्शन और/ अखबारों में आते हैं/सरकार के बयान/दतर में अपने सहकर्मियों के बीच/हम चपरासी, क्लर्क या अधिकारी/नहीं हैं/हम हैं मंदबुद्धि पियक्कड़/या फिर रिजर्व कोटे के आदमी/स्कूल कॉलेज में पढ़ते/छोटे भाई हमारे/पुलिस की निगाहों में छात्र नहीं/लूटेरे हैं, डकैत हैं/या फिर उग्रवादी/संविधान की भाषा में हम/अनुसूचित जाति या/अनुसूचित जनजाति हैं/मनु की भाषा में शूद्र/ कम्युनिस्टों की भाषा में शोषित/भाजपाईयों की भाषा में/पिछड़े हिन्दू/मैं पूछता हू तुम सबसे/आखिर इस देश में इस प्रजातंत्र में/हम क्या हैं हम क्या हैं।


एक आदिवासी कवि महादेव टोप्पो के कलम से लिखी गयी ये पंक्तियाँ महोगांव ग्रामपंचायत के एक आदिवासी गांव बानरचूहा जाते वक्त वगैर तारतम्यता के मुझे याद आ रही थी। टुटी सड़कों व झाड़ियों के बीच धूल उड़ाते हुए हम गांव के उस मोड़ पर खड़े थे। यहाँ एक बोर्ड पर किसी पेंटर की कूची के बजाय किसी व्यक्ति की उंगुली से तेल और सिंधूर से लिखा था ``बानरचूहा´´। इस गांव को जिला कार्यालय से सूचना के अनुसार एक विकसित गांव के रूप में रखा गया है।

गांव के पहले कदम पर हनुमान जी का एक मंदिर था बाद में पता चला कि गांववालों ने चन्दा कर इसे बनवाया है। सामने पीपल के छायादार पेड़ की जड़ों को लपेटे हुए एक चबूतरा था जिसपर गांव के ढेर सारे लोग बैठे हुए थे। वहाँ पहुंचकर हमने ग्रामसरपंच के बारे में पता लगाने की कोशिश की पर पता चला कि वे यहाँ से पाँच किलोमीटर दूर रहती हैं। हमनें उनसे मिलनें की कोशिशें छोड़ दी और गांववालों से बातचीत करने में मशगूल हो गये। तकरीबन कुल 50 घरों के इस गांव में 3-4 मकान ही पक्के दिखे। हम गांव के कुछ लोगों के साथ बातचीत करते हुए गांव की सड़कों पर घूम रहे थे। एक घर के सामने हम थोड़ी देर के लिए रूके जहाँ लकड़ियाँ चीर कर दरवाजे और खिड़की बनाये जा रहे थे, बातचीत के दौरान पता चला कि ये लकिड़या काफी मंहगे दाम पर वन विभाग से खरीद कर लायी गयी हैं। उन लोगों का यह भी कहना था कि गांववालों के द्वारा लगाये गये पेड़ या खुद-ब-खुद उगे हुए पेड़ों की देखभाल गांव के लोग करते हैं पर बड़ा होने पर वन विभाग के द्वारा उसे हड़प लिया जाता है। एक महिला मक्का की सफाई कर रही थी, यह गांववालों का प्रमुख आहार है। थोड़ी ही देर में गांव के कई लोग इकठ्ठा हो गए, पूछने पर उनका कहना था कि गांव में औसतन खेती कि जमीन दो-तीन एकड़ प्रति परिवार है पर खेती का कोई भरोसा नहीं है, हर साल बाढ़ आती है और पूरी खेती बर्बाद हो जाती है। जब अपने खेत में काम करने से गांव वालों को फुर्सत मिलती है तो बगल के गांव में बड़े कास्तकारों के यहाँ वे मजदूरी के लिए जाते हैं। गांव में खेती के लिए पानी की कोई सुविधा नहीं है, यह पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। गांव में पंचायत द्वारा 5-6 नलों की टोटी लगाई गयी है और एक सामूहिक मोटर से पानी चलाया जाता है। समय-समय पर गांव का एक आदमी पानी चलाता है जिससे पीने के पानी की पूर्ति हो पाती है। गांव में सीमेंट से बनी पक्की सड़क है जो काफी साफ-सुथरी दिख रही थी। पूरा गांव पेड़ों की आड़ में ढका हुआ है, गांव में सरीफे के कई पेड़ है जिसे गांव के लोग सीताफल कहते थे। सन् 1989 के पहले ही गांव में बिजली आ चुकी है, अभी कई लोगों के पास तो टी.वी. भी है पर गांव के लोग सिर्फ सीरियल या फिल्म देखना ही पसंद करते हैं। गांव के नजदीक में एक प्रायमरी स्कूल भी है जिसमें गांव के बच्चें पढ़ने जाते हैं, इससे ऊपर की पढ़ाई करने के लिए उन्हें तीन किलो मीटर दूर जाना पड़ता है। गांव में एक मात्र व्यक्ति नौकरी करता है, जो की सरपंच का चपरासी है। गांव में सबसे ज्यादा शिक्षा पाने वाले एक मात्र व्यक्ति राजू हैं जिन्होंने 12वीं तक शिक्षा पायी है। राजू एक अच्छे कलाकार भी हैं। हम देर तक उनसे बातें करते रहे, उनका कहना था कि जब खाने के लिए घर में कुछ नहीं है तो पढ़ने से क्या फायदा? पढ़ कर ही सबको नौकरी कहाँ मिल जा रही है? बड़ी-बड़ी कक्षाओं तक पढ़कर शहरों में भी लोग बेकार पड़े हुए हैं।
गांव की एक 70 वर्षीय महिला जिसके आधे शरीर में लकवा लग गया था बार-बार बड़ी निरीहता के साथ कह रही थी- बाबू़.......उसकी आंखे बहुत कुछ कह रही थी। पूरे गांव के लोगों में हमसे कुछ पाने की ललक दिख रही थी। गांव के किसी भी वृद्ध को बी.पी.एल. कार्ड नहीं मिला था। फिर इस महिला का क्या? वहाँ से जब हम चल रहे थे तो वह महिला हमारे हाथ पकड़ कर देर तक हमें निहारती रही, पर हम बेबस थे। सिवाय उनकी स्थितियों को जानने के हमारे पास उसे बदलने के लिए कुछ भी न था। गांव के ढेर सारे लोग हमारे साथ हो लिए थे फिर हम सब उस स्थान पर आये जहाँ गणपति की मूर्ति सजायी गयी थी। वहाँ कुछ लड़के बैठ कर ताश के पत्ते खेल रहे थे, मुझे पिछले गांव मंगरूल की याद आयी जहाँ लोग नशे में धुत हो कर कई टोलियों में दिन भर पत्ते खेला करते हैं, पर यहाँ वैसा नहीं था। यह जानकर हमें आश्चर्य भी हुआ कि गांव में किसी भी प्रकार का नशा नहीं मिलता। उन लोगों का कहना था कि जब खाने के लिए ही पैसा नहीं है तो लोग नशे के बारे में कैसे सोचेंगे। बातचीत के दौरान पता चला कि गणपति की जो मूर्ति बनायी गयी है वह गांव के ही एक युवक ने बनाया है। बहरहाल हम मूर्ति देखकर ही समझ गये थे कि यह किसी कारीगर के द्वारा बनी मूर्ति नहीं है क्योंकि मूर्ति के चेहरे में शहरीपन का भाव नहीं था।
धीरे-धीरे गांव के तकरीबन सभी पुरूष और दो-चार महिलायें वहाँ पर जमा हो गयी। उन लोगों का कहना था कि गांव में किसी भी योजना का पता नहीं चल पाता सब लोग वोट मांगने के लिए यहाँ आते हैं वर्ना सरपंच भी नहीं दिखाई पड़ती। रोजगार गारंटी योजना पर बात करते हुए पता चला कि 50 से अधिक लोगों ने फार्म भरा है पर अभी तक किसी को न तो रोजगार मिला न ही बेरोजगारी भत्ता। कुछ लोगों ने हमें फार्म भरने का रीसीविंग भी दिखाया। उनका यह भी कहना था कि काम अगर आयेगा भी तो सरपंच अपने गांव के लोगों को देगें। हमने उनको रोजगार गारंटी योजना, वृद्धा पेंशन आदि के बारे में विस्तार से बताया जिन बातों की उन्हें बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी। हमने उन्हें सरपंच से मिलकर इसका लाभ लेने के लिए भी बताया। वे सब सहमत थे।
गांव के कुछ युवाओं ने मिट्टी की कुछ अद्भुत कलाकृतियां बनायी हुई थी जिसने हमें काफी आकर्षित किया। उन मूर्तियों में विशेष तौर पर एक राक्षस की मूर्ति बनायी गयी थी जिसके पेट को डब्बे से बनाया गया था वे उसमें आग सुलगा कर रख देते थे जिसका धुआँ राक्षस के मुंह से निकलता था। लौटते वक्त उन लोगों ने हमें चीनी चूड़े का प्रसाद भी दिया। खाते-खाते मैने सोचा कि क्या गणपति इनकी स्थितियां बदल सकता है? हम गांव से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे थे और मुंह से प्रसाद की मिठास भी।

28 सितंबर 2007

लोकतंत्र : किसका, किसके लिए ?

देवाशीष प्रसून जी महत्मा गांधी अंतरराष्तीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र है आज देश में चल रहे लोकतंत्र को ढोंग के रूप में देखते है सवाल है कि लोकतंत्र किसका है क्योंकि कोई भी सत्ता किसी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है तो आज का लोकतंत्र किस वर्ग की छाँव में पल रहा है? किसका प्रतिनिधित्व कर रहा है? कुछ मौजू़ सवालों को उठाया है.....
सरकार नामक संस्था का निर्माण जन-सामान्य के हितों के लिये होता है। ऐसी ही परिकल्पना एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में सरकार की होती है, बिना भेदभाव के सबके विकास को ध्यान में रख कर ऐसी नीतियों को बनाना और लागू करना, जिससे सामाज का हर तबका ,देश के सभी क्षेत्र और राष्ट्र की प्रत्येक जातियों और धर्मो को समान रूप से लाभान्वित किया जा सके। शायद एक सफल सरकार का यही कार्य होता है। कम से कम सही अर्थों में एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में सरकारो का सही अर्थों में लोकतांत्रिक प्रयोग है, कि इस विश्व में कई ऐसे लोकतांत्रिक राष्ट्र हुए हैं जहॉ लोकहितों का कोई ख्याल नहीं रखा गया है,उनका प्रयोग सिर्फ सत्ता कायम करते वक्त मत एकत्र करने हेतु किया जाता है ,ताकि दुनिया के सामने लोकतांत्रिक होने का ढोग किया जा सके, उदाहरण है कि जिस तरह का लोकतंत्र अफगानिस्तान ,पाकिस्तान में है और जो सद्दाम के समय इराक में था, अभी जो अमेरीका नियंत्रित है क्या उन्हें सही अर्थों में लोकतंत्र कहा जा सकता है ?
भारत की स्थिति भी लोकतंत्र के मामले में दूध की धुली नहीं है, भारतीय लोकतंत्र में कहने को तो भारत में छह दशको से लोकतंत्र है ,फिर भी आज बढती जन-सामान्य विरोधी नीतियों और सरकार में बढ़ती प्रतिरोध के प्रति असहिष्णुता से अदांज लगता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार किस दिशा में जा रही है, आज भारत विकाससील से विकसित राष्ट्र बनने की बात करता है, विकास के क्या मायने है? क्या यह राष्ट्रीय संपत्ति का विकस है या चुनिंदा पूंजीपतियॉ का विकास या फिर जन सामान्य का विकास? यह सोचने की जरूरत है, जन सामान्य का विकास तो अब बस राजनीतिक घटनाओं तक ही सीमित रह गया है, सरकार कितनी उदासीन है जन सामान्य के प्रति, आराम से यह बात समझ में आती है, कि भारतीय सरकार संस्था बहुसंख्यक आम जनता के प्रति गंभीर नहीं है। भारत सरकार की नीतियॉं अलोकतांत्रिक हो रही है? भले कुछ लोग इसे लोकतंत्र कहें लेकिन इस लिबरल लोकतंत्र से जन सामान्य का हित गौण है।

सरकारी नजरिया

ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना के उददेश्य पत्र की रूपरेखा पर विचार करने और उसे मंजूरी दिलाने के लिये आयोजित विकास परिसद की 52 वीं बैठक में उद्धाटन के उपरांत प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह यह ज़ाहिर करते हैं कि कृषी क्षेत्र इस समय संकट में है और विकास के पथ पर केंद्र और राज्य सरकारों को कुछ कठिन फैसले लेने होंगे।
प्रधानमंत्री को यह जवाब देना चाहिए कि क्यों कृषी क्षेत्र संकट में है? क्या कृषी के प्रति सरकार की लापरवाही इसके लिए जिम्मेवार नहीं है? क्या कृषी के प्रति सरकार का व्यवहार सौतेला नहीं है?
कृषी क्षेत्र, वह क्षेत्र जिस पर बहुसंख्यक आम जनता निर्भर है, संकट में हैं। केंद्र और राज्य सरकारें कृषी की उन्नति और किसानों के हित के प्रति उदसीन है। हर फैसले में किसानों, खेतिहर-मज़दूरों और कृषी-आश्रितों के हित को हाशिये पर रखा जा रहा है?

विषेश आर्थिक क्षेत्र

आर्थिक विकास का सिगूफा छोड़ते हुए विषेश आर्थिक क्षेत्र अधिनियम 2005 लागू कर किसका भला किया गया है और किसको भाले की नोक पर रहने की स्थिति में ला दिया गया है, यह स्पष्ट है। इस अधिनियम ने काफी हद तक किसानों को विस्थापन के लिए मज़बूर किया, कृषी-क्षेत्र और संकटों में आ घिरा है। कृषी को हाशिये पर रख उद्योगों को उन्नत करना कैसा अर्थषास्त्र है? समझ में नहीं आता। वह भी ऐसे उद्योगों को उन्नत करना जिससे मुट्ठीभर पूंजीपतियों को लाभ हो... इसे पूरा करने में सरकार अपनी पूरी उर्जा झोंक रही है।
विषेश आर्थिक क्षेत्र के नाम पर पूंजीपतियों को कर में छूट दी जा रही है और उनकी मनमानी के लिए यह क्षेत्र ऐसे अभ्यारण्य के रूप में विकसित करने की परियोजना है, जहॉं कोई भी श्रम कानून नहीं हो। यदि विषेश आर्थिक क्षेत्र राष्टीय विकास के लिए इतने आवश्यक भी है तो उन्हें उन स्थानों पर होना चाहिए था, जो कृषी के लिए अयोग्य भूमि हो। लेकिन अरबों - खरबों रूपयों की पूंजी लगाने वाली ये कंपनियॉं निम्नस्तरीय भूमि को नहीं स्वीकार करतीं, इसलिए सरकार किसानों की उपजाऊ जमीनों को अपने विषेशाधिकार से जबरन अधिग्रहित कर औने-पौने दाम में इन कंपनियों के चरणों में सौंपने लगी है, तो कृषी-क्षेत्र संकट में क्यों नहीं आयेगा?

सलवा जुडुम
सन 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार ने एस्सार और टाटा समूह के साथ समझौते किये, जिसमें सूचना के अधिकार को ताख़ पर रखते हुए यह उपवाक्य है कि किसी तीसरे पार्टी को शर्त एवं नियम का उद्धाटन नहीं होना चाहिए। फिर भी सरकार और कंपनियां अपनी प्रतिबद्धताओं को दावे के साथ कहती है, कि औद्योगिक घरानों के माध्यम से राज्य का औद्योगिक विकास होगा। जिसमें सरकार भूमि, खनिज, बिजली और पानी उपलब्ध करायेगी।
छत्तीसगढ़ के 16 जिलों में खनिज संपदा और उपजाऊ भूमि का धनी दांतेवाडा जिला की भूमि का 80 फीसदी आदिवासियों का है। कानूनन प्राकृतिक संसाधनों पर इन्हीं आदिवासियों का अधिकार है। सरकार ने इनको नक्सलियों का भय दिखा कर इनकी भूमि से विस्थापित कर इन्हें शिविरों मे रहने को मज़बूर किया है। सरकार इनके हाथों में हथियार दे नक्सलियों से लड़ने का काम करती हैं।
दो-चार प्रश्न स्वभाविक हैं-
पहला, नक्सल से लड़ने में क्या राज्य की सुरक्षा व्यवस्था इतनी लाचार है, जो आम नागरिकों के हाथ में हथियार डाल रही है?
दूसरा, जिन आदिवासियों को अपने पारंपारिक रोजगारों में व्यस्त रहना चाहिये था, क्या उनके पहचान को नष्ट नहीं किया जा रहा है? तीसरा, पिछले डेढ़ साल से जबरन शिविरों में रख और उन्हे विस्थापित कर उनकी ज़मीन हडपने का तो इरादा नहीं है?
इन प्रश्न के उत्तर की अब तक प्रतीक्षा है। आम जनता क्या सोचती है, इन विषयों पर? सरकार के इस रवैये पर भारत कि लोकतांत्रिक चेतना क्या कहती है?
यदि ग़ौर से देखें, तो पूजी के नवसाम्राज्यों के हाथों देश का सौदा हो रहा है और फिर देश गुलामी की जंजीर में जकड़ता जा रहा है। आज स्थिति और भी बदतर है, जब लड़ने के लिए कोई विदेशी शासन नहीं। बल्कि लिबरल लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुखौटे में छुपी नवसाम्राज्यवाद की गुलामी होंगी।