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20 अक्टूबर 2016

मोदी जी, ऐसे लड़ेंगे आतंकवाद से?

- दिलीप ख़ान

ब्रिक्स में भारत का सबसे बड़ा एजेंडा क्या था? इसका जवाब टीवी देखने वाला कोई भी व्यक्ति दे सकता है। हर कोई जानता है कि ब्रिक्स और बिम्सटेक देशों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे ज़्यादा पाकिस्तान और आतंकवाद की बात की। मोदी ने यहां तक कहा कि आतंकवाद की निंदा से आगे बढ़कर दुनिया को अब कार्रवाई की तरफ़ आगे बढ़ना चाहिए। दुनिया से भारत ने इस दिशा में सहयोग मांगा। उरी हमले के बाद जिस तरह का माहौल बना, उसमें भारत ने पहले ही ये संकेत दे दिया था कि ब्रिक्स सम्मेलन से पाकिस्तान को काटने के लिए सार्क के बदले बिम्सटेक देशों को न्यौता दिया जाएगा। न्यौता दिया गया और पाकिस्तान को सम्मेलन से काट दिया गया। अगर इसे कूटनीतिक जीत मान लें, तो उम्मीद बंधी थी कि ब्रिक्स में भारत लश्कर-ए-तैय्यबा समेत जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के ख़िलाफ़ वैश्विक सहयोग हासिल करने में क़ामयाबी पाएगा। लेकिन क्या ये हो पाया?

ज़ाहिर है कि नहीं। गोवा घोषणापत्र में जिन आतंकवादी संगठनों के नाम हैं, वो हैं- ISIL और अल नुसरा। यहीं असल पेंच फंसता है। अल नुसरा के नाम पर ज़रा ग़ौर कीजिए। इस संगठन को अगर आपने फॉलो किया है, तो शायद इसके बारे में कुछ बुनियादी जानकारी आपको होगी। ये संगठन सीरिया में सक्रिय है और दावा करता है कि वो आईएस और सीरियन सरकार, दोनों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है। सीरिया में मोटे तौर पर तीन पार्टियां सक्रिय हैं।

1. सीरिया की बशर अल-असद सरकार। असद को रूस और ईरान का समर्थन हासिल है।
2. फ्री सीरियन आर्मी+ अल नुसरा+ अमेरिका+ फ्रांस+ सऊदी+ तुर्की+ और भी कई संगठन
3. आईएसआईएस

छोटी-मोटी और भी पार्टियां हैं, लेकिन मोटे तौर पर यही तीन गुट आपस में लड़ रहे हैं। बशर अल-असद सरकार बाक़ी दोनों से लड़ रही है। फ्री सीरियन आर्मी भी बाक़ी दोनों से और आईएसआईएस तो ज़ाहिर तौर पर बाक़ी दोनों से लड़ ही रहा है। यानी हर किसी के दो-दो दुश्मन हैं, लेकिन जब सवाल आता है ISIS का तो उसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस और अमेरिका दोनों ये दावा करते हैं कि वो सीरिया में ‘शांति बहाली’ और ISIS को नेस्तनाबूद करने के लिए बम बरसा रहे हैं।

पार्टी-1.


रूस अल नुसरा फ्रंट को आतंकवादी संगठन मानता है। फ्री सीरियन आर्मी में शामिल कई गुटों को रूस आतंकवादी मानता है। और यही वजह है कि ब्रिक्स सम्मेलन के बाद जारी गोवा घोषणापत्र में रूस ने अल नुसरा का नाम शामिल किया। अब सवाल ये है कि इसमें भारत कहां खड़ा है और कूटनीतिक तौर पर भारत का क्या स्टैंड है? या फिर साफ़-साफ़ कहें तो भारत कहां फंस रहा है?


पार्टी-2.


जहां रूस एक तरफ़ अल नुसरा को आतंकवादी संगठन मानता है, वहीं अमेरिका का रुख बिल्कुल उलट है। अमेरिका की रुचि ISIS के अलावा बशर अल-असद सरकार को उखाड़ फेंकना भी है। अल नुसरा फ्रंट बशर अल-असद सरकार के ख़िलाफ़ शुरू से सक्रिय रहा है। अमेरिका फ्री सीरियन आर्मी को आर्थिक सहायता और हथियार सप्लाई करता है। अल नुसरा भी इसी गुट में रहकर लड़ाई कर रहा है। ओबामा सरकार ने इस गुट को 50 करोड़ डॉलर की मदद की। सब कुछ ऑन रिकॉर्ड है।


भारत की मुश्किल


दिलचस्प ये है कि अल-क़ायदा ही सीरिया में अल नुसरा नाम से काम करता है। कुछ वक़्त पहले तक अमेरिका का दुनिया में सबसे बड़ा दुश्मन अल-क़ायदा था। फ़िलहाल ISIS है। अमेरिका सीधे तौर पर अल नुसरा के साथ गुटबंदी करने से इनकार करता रहा है, लेकिन फ्री सीरियन आर्मी के लड़ाके खुले तौर पर मानते हैं कि अल नुसरा का उन्हें समर्थन हासिल है और वो साथ में लड़ते हैं। यानी अमेरिका के सहयोगी का सहयोगी हुआ अल नुसरा। अब गोवा घोषणापत्र में अल नुसरा को आतंकवादी संगठन माना गया है।

भारत ने गोवा घोषणापत्र के मुताबिक़ आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई का संकल्प लिया है। लेकिन दिक़्क़त ये है कि भारत जब अमेरिका के साथ द्विपक्षीय या बहुपक्षीय मंचों पर बैठता है तो आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका और भारत का एक ही रोडमैप हो जाता है। यानी अल नुसरा के ख़िलाफ़ जहां भारत एक तरफ़ कड़ी कार्रवाई की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ़ अल नुसरा को बढ़ावा देने में मदद करने वाले अमेरिका को पार्टनर भी मानता है। ऐसे में कैसे होगी आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई?

09 जनवरी 2015

शार्ली एब्दो प्रकरण विवाद

-दिलीप ख़ान
[फ़ेसबुक पर टुकड़ों में  बात करने के बदले एक साथ ही यहां अपना पक्ष लिख दे रहा हूं।]

शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ़्तर पर हुए ख़ूनी हमले के बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी का पुराना विमर्श फिर से सामने आ गया है। पूरे मामले पर सोशल मीडिया पर जिस तरह की बहस चल रही है उसको मोटे तौर पर तीन-चार खांचों में बांटा जा सकता है। पहला तबका ऐसे लोगों का है जो ऐसे किसी भी हमले के ख़िलाफ़ हैं और पत्रिका में छपे कार्टूनों से जिन्हें कोई परेशानी नहीं है। दूसरा तबका ऐसे लोगों का है जो हमले के ख़िलाफ़ हैं, लेकिन कार्टून्स के भी ख़िलाफ़ हैं। तीसरा तबका वो है जो कार्टून्स के कारण हमले तक के पक्ष में दबी ज़ुबान हामी भर रहे हैं।

पहले खांचे में वो लोग भी शामिल हैं जो हाल-हाल तक ‘पीके’ पर प्रतिबंध लगाने की बात करते थे। अचानक धार्मिक दायरा बदलने से वो शार्ली एब्दो की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक हो गए। ऐसे लोग, एक ही मसले पर अपने धर्म पर अलग और दूसरे धर्म पर अलग स्टैंड लेने वाले ढुलमुल प्रजाति के होते हैं। 

दूसरे और तीसरे खांचे के लोगों में से तीन-चार तर्क ज़ोरों से दिए जा रहे हैं। पहला, पैग़ंबर की कोई आकृति नहीं है तो फिर उनपर कार्टून बनाना धार्मिक भावना को आहत करने वाला कदम है। दूसरा, शार्ली एब्दो पत्रिका लगातार धर्म पर चोट करने के चलते विवादों से घिरी रही है। तीसरा, वो ना सिर्फ़ इस्लाम बल्कि कैथोलिक और यहूदियों को भी समय-समय पर नाराज़ करती रही है। कुल जमा मतलब ये कि उस पत्रिका के कंटेंट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम लगातार किया है। तर्कों को खींचकर उस समूची पत्रिका को ही अश्लील, हल्की और फसाद पैदा करने का कारखाना बताया जा रहा है। 

विवादित कार्टून्स

2006 में इस साप्ताहिक पत्रिका ने पैगंबर मोहम्मद पर एक कार्टून छापा और इसके चलते बड़ा विवाद हुआ। इसके बाद सीरीज़ में इस्लाम पर इस पत्रिका ने अंक निकाले। सर्वाधिक विवादित कार्टूनों में से एक में पैगंबर मोहम्मद कह रहे हैं कि “कट्टरपंथियों की हरक़त से पैगंबर खुश हुआ है”। इस व्यंग्य में अगर इस्लामिक चरमपंथियों के नकार के बजाए पैगंबर का कैरीकेचर ध्यान खींचता है तो कार्टून नाम की पुरानी विधा के अब-तक के सफ़र पर समाज की कूपमंडूकता का झटके में भारी पड़ना तय हो जाता है। अगर पैगंबर के नाम पर ही मार-काट मचाने वाले कुछ चरमपंथी अपनी राजनीति को समाज में पैबस्त करने पर जुटे हुए हैं तो एक कैरीकेचर वाली पत्रिका के सामने कोई विकल्प नहीं बचता कि वो यह बात सीधे पैगंबर के मुंह से कहलवाए कि उनके नाम के आधार पर ये तमाम हमले बंद होने चाहिए। 

इस अंक का फ्रांस सहित दुनिया के कई मुल्क़ों में विरोध हुआ। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति यॉक शिरॉक ने इसे भड़काऊ बताया था और अंतत: पत्रिका को लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। फ्रांस में अदालती लड़ाई जीतने के बाद पत्रिका में साप्ताहिक प्रकाशन जारी रहा, जिनमें अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक मसले (सिर्फ़ धार्मिक नहीं) शामिल थे। बाद के दिनों में निकोलस सरकोज़ी और फ्रांस्वा ओलांद ने “फ्रांस की पुरानी व्यंग्य परंपरा” का हवाला देते हुए पत्रिका का बचाव किया। 2011 में एक बार फिर पत्रिका को लेकर विवाद हुआ। पत्रिका ने एक अंक में पैगंबर मोहम्मद को अतिथि संपादक बना दिया और उस अंक में पत्रिका के मॉस्टहेड के नीचे एक उपशीर्षक दिया और अंक का नाम रखा ‘शरिया एब्दो’। ये शरिया क़ानून पर चोट करने वाला अंक था। 
क्या शार्ली रेसिस्ट पत्रिका है?

सवाल ये है कि क्या शार्ली एब्दो सिर्फ़ इस्लाम पर कार्टून्स छापकर उस एकमात्र धर्म को निशाने पर अब तक रखती आई है या फिर क्या ये पत्रिका सिर्फ़ धार्मिक मामलों पर ही कार्टून्स और व्यंग्य छापती है?  मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ये दोनों सवाल काफी अहम हैं। शार्ली एब्दो में व्यंग्य, कार्टून और कैरीकेचर ही प्रमुख सामग्री है और हफ़्तेवार प्रकाशन में विवाद का मामला सिर्फ़ धर्म को लेकर ही बार-बार आया। इसलिए पत्रिका के बारे में पढ़ने पर ऐसा लगता है गोया पत्रिका हर अंक में धार्मिक मामलों पर विवादित कार्टून प्रकाशित करती रही हो। जबकि ऐसा है नहीं। जिस दूसरे कार्टून पर ज़्यादा विवाद है वो है- पोप का कंडोम पहनना। ये तब की ख़बर है जब ख़बर आई थी कि पोप चर्च के भीतर सेक्स करते हैं। हालांकि अब तो ब्रूसेल्स मे एक पोप पर बाल तस्करी, बलात्कार सहित कई मामले अदालत में साबित हुए। इसलिए पोप पर चोट करने पर हैरानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन हैरानी सिर्फ़ इसलिए होती है क्योंकि पोप को आलोचना से परे कर दिया गया है। 

ठीक पराशक्ति अल्लाह या ईश्वर की तरह। अगर पोप के सेक्स करने के तथ्य को कार्टून का रूप दे दिया गया तो धार्मिक असहिष्णुता का मामला कैसे हो गया? तथ्य, तथ्य है। चर्च के भीतर सेक्स पर पाबंदियों पर व्यंग्य करते हुए किसी कार्टून में अगर नन को हस्तमैथुन करते दिखाया गया है तो ये व्यक्तिगत और निजी मामला नहीं है। किसी ख़ास नन के बारे में नहीं है, बल्कि उस ट्रेंड पर बात करता हुआ ये कार्टून है जिसमें नन की सैक्सुअल ज़रूरत को पूरा करने के तरीके को रेखांकित किया गया है। क्या सेक्स पर बात करना या सेक्स पर कार्टून छापना अश्लील है? या, धार्मिक लोगों के सेक्स पर बात करना अश्लील और नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है? या, धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए राजनीतिक यथार्थ को बयां करने के लिए पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बना देना दुनिया के लिए ख़तरनाक है?  अभिव्यक्ति के टूल हर दफ़े अगर समाज के हर तबके से पूछकर तलाशे जाए तो शायद कार्टून और कैरीकेचर में दर्ज़ होने वाले कैरेक्टरों की संख्या मुट्ठी भर रह जाएगी। 

राजनीतिक मामलों को लेकर प्रतिबंध

1970 के दशक में प्राकृतिक आपदा को लेकर निकाले गए एक अंक के बाद इस पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिया गया था। तब तक ये दूसरे नाम से निकलता था। प्रतिबंध के दायरे से बाहर निकलने के लिए इसका नाम शार्ली एब्दो रखा गया। हालांकि इस पत्रिका में कई बार ये आरोप भी लगे हैं कि इसके कुछ कार्टून्स नस्लवादी रहे हैं। लेकिन, नस्लीयता का मामला जहां भी रहा शार्ली एब्दो के भीतर भी विरोध हुए। कोई भी पत्रिका ग़लती करती है, शार्ली ने भी की। कुछ लोग निकलकर नई पत्रिका भी निकाले। लेकिन नस्लीयता के जितने इल्ज़ाम है, उनमें से ज़्यादातर धार्मिक संगठनों ने ही लगाए। लिस्ट उठाकर चेक कर लीजिए।  मैं फ्रेंच नहीं जानता, इसलिए ये दावा नहीं कर सकता कि मैंने पत्रिका पढ़ी है। 

लेकिन, इस पत्रिका पर हमले के बाद इंटरनेट सहित समाचार एजेंसियों पर जितनी सामग्रियां थीं, उनमें से ज़्यादातर को पढ़ा क्योंकि अगले दिन आधे घंटे को प्रोग्राम बनाना था इस पर। कुल जमा इस नतीजे पर हूं कि असहमत हैं तो असहमति जताइए लेकिन जो सहमत हैं उनपर क्यों पिल पड़ रहे हैं? आपकी असहमति किसी कार्टून पर ठीक वैसे ही हो सकती है जिस तरह आपकी किसी बात पर किसी और की असहमति। आपकी असहमति के चलते कोई बात करना बंद नहीं कर देगा। आप आहत हैं तो आहत होना मुबारक़। कार्टून और कैरीकेचर के नाम पर ज़रा-ज़रा सी बात पर आहत होने के चलन को जिस तरह सिद्धांत के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है वो अंतत: बहुत संकुचित दिशा की तरफ़ लेकर हमें बढ़ेगा। 

10 अप्रैल 2014

हिटलर और मोदीः साम्यताएं महज संयोग हैं क्या

अनिल यादव
मानव का स्वभाव है कि वह किसी चीज को किसी परिप्रेक्ष्य में रखकर ही पहचान सकता है, उसे पूरी तरह समझ सकता है। अब तो सापेक्षता विज्ञान की भी स्वीकृत धारणा है। कोई चीज किसी संदर्भ में ही मोटी-पतली या अच्छी-बुरी होती है। अगर इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा जाये तो तुलना और उदाहरण बुद्धि द्वारा विकसित बौद्धिक उपकरण हैं- इससे ही विकास की धारा का, इतिहास की दिशा का पता चलता है। वस्तुतः बिना दूरी लिए हम किसी भी वस्तु को पूर्ण रूप से नहीं देख सकते हैं और वर्तमान से दूरी लेने का एक ही तरीका है कि उसे अतीत से जोड़कर देखा जाए। इतिहास में एक परम्परा रही है कि किसी भी व्यक्तित्व को समझने के लिए ‘उसी जैसा’ व्यक्ति इतिहास की गर्त में खंघाला जाता है, इतिहास के विद्यार्थियों के पास ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब वह किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को समझने के लिए अतीत की धारा में आगे-पीछे होते हंै। कभी किसी को ‘कश्मीर का अकबर’ तो कभी किसी को ‘भारत का नेपोलियन’ कह कर उसे आंकता है। अभी हाल में ही भारत में तमाम लोगों ने अन्ना हजारे को गांधी के सापेक्ष करके अतीत को खंघाला। खैर अभी हाल में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी को हिटलर कह कर हमें फिर से अतीत की धारा में पीछे जाने के लिए विवश किया है। पूरी भारतीय राजनीति में हिटलर (जर्मनी का) फिर से चर्चा में है- आखिर कौन है ये हिटलर? नरेन्द्र मोदी से उसका क्या रिश्ता है? मोदी जिस संघ परिवार में खेल-कूद कर बड़े हुए हैं क्या उसकी विचारधारा से हिटलर जुड़ा हुआ है? ये सारे सवाल आज राजनैतिक विश्लेषकों और मीडिया द्वारा उछाले जा रहे हैं।
हमें नरेन्द्र मोदी को समझने के लिए अतीत की धारा में लौटाना होगा- आॅस्ट्रिया के एक छोटे से शहर ब्रानों में, जहाँ 20 अप्रैल 1889 को हिटलर ने एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लिया, एक सैनिक के तौर पर हिटलर ने अपना जीवन शुरू किया परन्तु बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती गयी और अपनी जालसाजी और कुटिलता के चलते हिटलर जर्मनी का फ्यूहरर (प्रधान नेता) बन बैठा। इसी क्रम में हिटलर ने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रम दल (नात्सीदल) के अध्यक्ष डेªक्सलर को भी अपने रास्ते से हटा दिया। इसी क्रम में यदि मोदी को देखा जाए तो हम आसानी से देख सकते हैं कि किस तरह नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए भाजपा के संस्थापक सदस्यों को ही अपने रास्ते से हटा दिया। लालकृष्ण आडवाणी सरीखे नेता जो भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ थे को भी नहीं बक्शा। इस क्रम में जसवंत सिंह, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी, लाल जी टंडन जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी संघ परिवार के साथ मिलकर अपने रास्ते से लगभग हटा ही दिया है। ये नेता आज अपनी सीटों से बेदखल होकर अपनी स्वयं की जीत-हार में ही परेशान हैं।
हिटलर ने तात्कालीन जर्मनी के आर्थिक हालात का बड़ी चतुराई के साथ लाभ उठाया था। 1929 में आयी महा आर्थिक मंदी ने जर्मनी की व्यवस्था को चैपट कर दिया था। उस समय जर्मनी की सड़कों पर बड़ी संख्या में बेरोजगार गले में तख्ती लटकाये- ‘मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ’ दिखायी देने लगे थे। पूँजीपतियों को भय सताने लगा था कि कहीं जर्मनी में साम्यवादी क्रान्ति न हो जाये। आज भारत भी आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लूट-खसोट की नीतियों से पीडि़त है। अर्थव्यवस्था के हालात ठीक नहीं हैं, वस्तुतः इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब फासिस्ट संगठन अपना प्रभाव बढ़ाते हैं तो पूंजीपति वर्ग उनके साथ जुड़ जाता है। आज जब नरेन्द्र मोदी अम्बानी और आडानी के पैसों से उड़नखटोले में उड़ कर विकास का जुमला उछाल रहे हैं तो अनायास ही हिटलर के साथ जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बन्धों की यादें ताजा नहीं हो रही हैं। यहाँ जर्मनी के इतिहास के पन्नों को पलटना बेहद उपयोगी होगा क्योंकि प्रश्न हिटलर और जर्मनी के पूंजीपतियों के सम्बंधों अथवा मोदी और अम्बानी के सम्बंधों का नहीं है बल्कि इसका है कि इन सम्बन्धों के चलते मनुष्यता को कैसे-कैसे दुख झेलने पड़ते हैं।
हिटलर के पतन के बाद न्यूरेमबर्ग में नाजियों के खिलाफ मुकदमा चला, जिसमें बाल्थर फंक नामक का एक व्यक्ति भी था जो जर्मनी के प्रसिद्ध आर्थिक अखबार ‘बर्लिनर वोरसेन जेतुंग’ का सम्पादक था और पूंजीपतियों और हिटलर के बीच का महत्वपूर्ण कड़ी भी। उसने कई रहस्यों को उजागर किया जिससे हिटलर और पूंजीपतियों का संबंध उजागर हुआ। हिटलर ने कोयला खानों के मालिकों से पैसे वसूलने के लिए ‘सर ट्रेजरी’ नाम से एक फण्ड भी बनाया था। फंक ने एक लम्बी लिस्ट बतायी जिसमें काॅर्टन आई.जी. फाखेन, वान स्निजलर, अगस्त दिहन, जैसे उद्योगपति थे जो हिटलर को अपने स्वार्थों के लिए चंदा देते थे। आज भारत में खास कर के गुजरात में मोदी ने अडानी को 1 रू0 प्रति वर्गफुट से हिसाब से जमीने दी हैं, से साफ जाहिर है कि आडानी और अम्बानी मोदी को किस लिए पैसे दे रहे हैं? क्यों भारत के दो-तिहाई पूंजीपति मोदी को बतौर प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं?
हिटलर ने अपना प्रचार करवाने के लिए एक पोस्टर जारी किया था- जिसमें सिर्फ हिटलर का एक फोटो था। यानि नाजीवादी पार्टी के अन्य नेताओं ने हिटलर के समक्ष समर्पण कर दिया था। भारत के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम हैं जब एक व्यक्ति ने पूरी पार्टी को हाइजैक कर लिया हो- तभी तो आज ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा उछाला जा रहा है। भारत के इतिहास में कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के लिए शायद ही इतना उतावला या हड़बड़ी में रहा हो। आज संसदीय गरिमा को ताक पर रखकर ‘प्रेसीडेन्सियल फोबिया’ से ग्रसित मोदी ‘प्रधानमंत्री का चुनाव’ लड़ रहे हैं।
मोदी अपनी छवि बनाने के लिए प्रतिदिन 25 हजार डाॅलर खर्च करते हैं। सोशल साइटों, फेसबुक, ट्यूटर, यू-ट्यूब पर हजारों की संख्या में पेशेवर लोग बैठाए गए हैं जो मोदी के भाषणों और वीडियो को अपलोड करते हैं। उनकी रैलियों को लाईव कवर करने के लिए टीवी चैनलों को अपना ओवी वैन नहीं भेजना पड़ता, उनकी पीआर एजेंसी खुद लाईव कवरेज चैनलों के दफ्तरों तक पहंुचाती है। यह तरीका कोई नया नहीं है जर्मनी में हिटलर भी ठीक इसी तरीके से अपना प्रचार करता था। उसने चार लाख रेडियो सेट बांटे थे जिस पर उसका भाषण सुनना अनिवार्य था। आज मोदी जिस तरह से ‘विकास-विकास’ रट रहे हैं, वह एक पुराना हथियार है। अपने चुनाव प्रचार में हिटलर ने भी एक पोस्टर जारी करवाया था- जिस पर लिखा हुआ था- ‘आपकी फाॅक्सवागन’। इसके जरिये यह एहसास करवाने की कोशिश की गयी कि अब आम मजदूर भी कार खरीद सकता है। आज भारत के 16वीं लोक सभा के चुनाव में भाजपा मध्यवर्ग को कुछ ऐसे ही सपने दिखा रही है।
भाषा का भ्रमजाल ऐसा होता है कि बहुत सारी चीजों पर लोग धूल डालने में सफल हो जाते हैं। यदि हम हिटलर के भाषणों को सुनंे तो पाएंगे कि उसने कुछ शब्द ईजाद किए थे जिसका वह बखूबी प्रयोग करता था। यहूदियों की हत्या और गैस चैम्बरों में दम घोट कर मारने वाली प्रक्रिया के लिए क्रमशः वह ‘अन्तिम समाधान’ और ‘इवैक्युएशन’ शब्द का प्रयोग करता था। आज मोदी भी अपने ‘राजधर्म’ की असफलता और गुजरात दंगे को ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ कह कर अपने ‘खूनी दाग’ को छुपा लेते हैं। ठीक हिटलर की तरह वह भी अपने विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते नजर आते हैं।
खैर मोदी और हिटलर की इस बहस को आगे ले जाने के लिए हमें आर0 एस0 एस0 और नाजीवाद के संबंधों और विचार धारा को देखना होगा। जैसा कि हिटलर ने नाजी पार्टी को मजबूत करने के लिए एस0 एस0 नाम का एक सशक्त सैनिक दल बनाया जो भूरी रंग की कमीज पहनते थे। यह मात्र संयोग नहीं माना जाना चाहिए कि मोदी जिस संगठन में खेल-कूद कर बड़े हुए हैं उसका नाम भी आर0 ‘एस0 एस0’ है। इनका पहनावा भी इन्हीं लोगों से प्रेरित है। संघियों के लिए गीता मानी जाने वाली पुस्तक ‘वी आॅर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में गोलवलकर ने राष्ट्र को परिभाषित भी हिटलर की तरह ही किया है। गोलवलकर ने राष्ट्र की परिभाषा में इसके पांच तत्वों को बताया है- भौगोलिक (देश), नस्वी (नस्ल) धार्मिक (धर्म), सांस्कृतिक (संस्कृति), भाषायी (भाषा), इसमें से एक भी तत्व हटा दिया जाए तो राष्ट्र समाप्त हो जाता है। आज जब भी मोदी राष्ट्र अथवा राष्ट्रीयता की बात करते हैं तो वह धर्म को नहीं भूलते हैं, तभी तो खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी कहते हैं। वस्तुतः नाजियों के लिए भी धर्म और नस्ल राष्ट्र के प्रमुख नियामक अंग होते थे। इसी आधार पर वे राष्ट्रीयता की जमीन तैयार करते थे। आज मोदी भी खुले मंचों से भारत को हिन्दुओं के लिए सुरक्षित जगह बनाने की गारंटी देते नजर आते हैं। नाजियों द्वारा राष्ट्र के लिए ‘वोल्क’ शब्द का प्रयोग किया जाता था जिसका अर्थ था- ‘धार्मिक-रक्त संबंधी एकता वाला जनसमूह’। ठीक इसी तर्ज पर संघ के लोगों ने ‘रेस’ की अवधारणा गढ़ी है।
वस्तुतः इतिहास वह प्रयोगशाला है जिसमें मानव-कृतियों का लेखा-जोखा सुरक्षित है। उसमें हिटलर के भी सारे कारनामे दर्ज हैं और जब-जब ऐसी परिस्थितियां बनेंगी तब-तब वर्तमान को इसी प्रयोगशाला में समझा जायेगा और मौजूदा दौर के हिटलर को पहचाना जायेगा ताकि हम अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को बचा सकें।

21 मार्च 2014

गुजरात का विकास मॉडल : खून और राख में लिपटी विकास की कहानी

नए सन्दर्भ-पुरानी बात  
रेयाज-उल-हक
राज्य की 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर के बावजूद गुजरात में एक तीखा सांप्रदायिक धु्रवीकरण रहा है. सवाल यह है कि इतने तेज विकास और ऐसी समृद्धि के बावजूद राज्य में बार-बार दंगे क्यों होते रहे हैं? क्यों राज्य के मुख्यमंत्री को झूठी मुठभेडों में हुई हत्याओं पर गर्व होता है? तथा क्यों वे ऐसी और हत्याओं की चेतावनी देते हैं? क्यों गुजरातियों को अचानक उनकी अस्मिता की इस कदर तीव्र जरूरत पड जाती है? सबसे बडी बात तो यह कि क्यों देश का पूरा तंत्र-सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं, संसद, न्यायपालिका, प्रेस-इस पूरे घटनाक्रम को तटस्थ भाव से देखते हैं?

नहीं, शायद हम गलती पर हैं. कोई भी तटस्थ नहीं है. ये सभी संस्थाएं संसद, न्यायपालिका, प्रेस- सब मिल कर मुख्यमंत्री को दोबारा सत्ता में आने में मदद करती हैं.एक पूरी तारतम्यता है, पूरा सामंजस्य है. विंग्स के पीछे हम ऑर्केस्ट्रा की पूरी टीम देखते हैं, जिसका हर सदस्य अपने काम पर मुस्तैद है. हां कभी-कभी कोई नौसिखिया किसी गलत बटन को दबा देता है, जिससे संगीत गडबडा जाता है और दर्शक कुछ देर के लिए इस बेसुरेपन का भी मजा उठाते हैं, जायका बदलने के लिए.

केवल गुजरात ही नहीं, पूरे देश भर में जो घटनाएं घट रही हैं, उन सबमें एक जैसी बातें दिखायी देंगी. देश की 9 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर और तीन दर्जन अरबपतियों के बावजूद असम, सिंगूर-नंदीग्राम, गोहाना, ओडिशा, लोहंडीगुडा, गुर्जर-मीणा विवाद और सिख-सौदा विवाद जैसी घटनाएं क्यों घट रही हैं? इन तेजी से विकसित होते महानगरों, साइबर सिटीज, 16 लेन की विशाल सडकों, सुपर मॉल्स, मल्टीप्लेक्सेज और विशाल औद्योगिक इकाइयों का लाभ आखिरकार कहां जा रहा है? लोगों तक संपन्नता, जैसे कि हमें शुरू में बताया गया था, रिसते हुए भी क्यों नहीं पहुंच रही? लोगों में इतना असुरक्षा बोध क्यों है?

अगर इन सभी घटनाओं में एक समान चीज को ढूंढने की कोशिश करें तो हम पायेंगे कि प्रायः इन सभी जगहों पर भारी पूंजी निवेश हुआ है या होनेवाला है या फिर आर्थिक संकट ने समाज को तोड दिया है, जैसे कि असम. इनमें से अधिकतर जगहों पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव मंजूर किये गये हैं. इनके लिए बडी मात्रा में किसानों से जमीनें ली गयी हैं, ली जा रही हैं. प्रायः सभी जगहों पर उनके मुखर विरोध खडे हुए हैं. प बंगाल और ओडिशा के अलावा दादरी एवं गोवा में हम इसके उदाहरण देख सकते हैं.

मगर साथ ही इनमें से अधिकतर जगहों पर हम एक उद्धत भीड को, हत्यारे गिरोहों को, जनता के ही एक हिस्से को पाते हैं, जो लोगों की हत्याएं करती, बस्तियां और दुकानें जलाती और संपत्तियां लूटती फिरती है. इस भीड को हमेशा ही सत्ता का समर्थन होता है. नंदीग्राम में इस हत्यारी भीड के पीछे सीपीएम होती है और गुजरात में बीजेपी. ओडिशा में इसी भीड को जदयू-बीजेपी का समर्थन होता है तो छत्तीसगढ में कांग्रेस-बीजेपी दोनों का.
ऊपर से एकदम असंबद्ध लगनेवाली वित्तीय पूंजी और इस हत्यारी (दंगाई) भीड के बीच बेहद आत्मीय अंतर्संबंध हैं. मुख्यतः यह संगठित भीड या गिरोह इन जगहों पर किसानों अथवा संघर्षरत समूहों को विभाजित करने की कोशिशों का हिस्सा हैं. ये उनके प्रतिरोध को तोड कर रखे देते हैं और वहां की आबादियों में सरकारी और अधिकतर जनविरोधी नीतियों के प्रति व्यापक आक्रोश को प्रायः धुंधला कर देते हैं.

प बंगाल में नंदीग्राम के ताजा कत्लेआम के ठीक बाद तसलीमा नसरीन के मुे को हवा दी गयी. यह सिर्फ ध्यान बंटाने भर का मामला नहीं था, बल्कि प बंगाल में, विशेष कर नंदीग्राम की मुसलिम आबादी के प्रतिरोध को बांटने की कार्रवाई भी थी. ओडिशा में, जहां पोस्को के खिलाफ आदिवासी संघर्षरत हैं, वहां हिंदू-ईसाई विभाजन को तेज किया जा रहा है. सत्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता में से ही ऐसे गिरोह निर्मित करती है, जो कि प्रायः उन समुदायों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयां करते हैं, जो शासन की नीतियों का विरोध कर रहे हों या जिनकी तरफ से ऐसी आशंका हो. छत्तीसगढ में तो इसे और अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया है. वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों को जमीन देने से मना कर रहे आदिवासियों के खिलाफ उन्हीं के एक हिस्से को खडा कर दिया गया. सलवा जुडूम नाम के इस हत्यारे अभियान के दौरान सैकडों आदिवासी मारे गये और लाखों लोग अपनी जमीनों से उजाड दिये गये. अब वे सडकों के किनारे बनी झोंपडियों में रह रहे हैं. सरकार ने चुपचाप इन राहत शिविरों को राजस्व ग्राम में तबदील कर दिया है. मतलब यह कि वे आदिवासी अब अपनी जमीन पर कभी नहीं लौट पायेंगे. उस जमीन को अब जिंदल, एस्सार आदि कंपनियों के हवाले करने की तैयारियां चल रही हैं.
ठीक यही वह जगह है, जहां हमें भारत में लगातार बढ रही सांप्रदायिक, फासिस्ट (सामाजिक-सांप्रदायिक दोनों) व क्षेत्रीय हिंसा के सूत्र मिलते हैं. गुजरात में पहले से ही छोटे-छोटे उद्योगों की श्रृंखला रही है, जहां प्रायः अकुशल श्रम के जरिये उत्पादन होता रहा है. 1980 के बाद से, जब से पूरे भारत में वित्तीय पूंजी का आगमन शुरू हुआ, गुजरात में सांप्रदायिक दंगों की आवृत्ति में बढोतरी हुई. ज्यादातर अकुशल श्रमिक मुसलमान थे और छोटे उद्योगों में उनकी अच्छी-खासी हिस्सेदारी थी. मगर जब विदेशी पूंजी आने लगी, वह इस अकुशल श्रम को, छोटे-छोटे उद्योगों को बरदाश्त नहीं कर सकती थी. उसे बाजार पर अपने उत्पादों के लिए एकाधिपत्य चाहिए था और अपने उद्योगों के लिए श्रमिक, जो कि इन छोटे उद्योगों में लगे हुए थे. अतः इन छोटे उद्योगों के रहते उसके लिए अपना विस्तार संभव नहीं रह गया था. इनका उन्मूलन जरूरी हो गया.

से में हिंदुत्व बडे काम की चीज साबित हुई. उसके पास न सिर्फ एक पहले से ही ऐसी विचारधारा मौजूद थी जो देश के प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपना शत्रु मानती थी, बल्कि देश भर में उसका विशाल संगठन, विभिन्न छोटे-छोटे गिरोह, एक राजनीतिक पार्टी और विभिन्न भूमिकाओं में कार्यरत उसके लाखों कार्यकर्ता मौजूद थे. फिर गुजरात ने अपनी इस तथाकथित आर्थिक विकास की शुरुआत खून और राख से की. गुजरात में पहले से ही एक सांप्रदायिक विभाजन था. 1969 के दंगों ने राज्य के दोनों प्रमुख समुदायों में बडी दरार डाल दी थी. 1981 के दंगे हुए. और फिर छह माह तक चलनेवाले 1985 के कुख्यात दंगे, जिनमें सरकारी तौर पर 275 लोग मारे गये, लाखों बेघर हुए और लगभग 2200 करोड रुपये मूल्य के संपत्ति और व्यापार की क्षति (अनुमानित) हुई. इसके बाद भी 1990, 92, 93 में दंगे होते रहे. 1960 से 1993 के बीच राज्य में 43 सांप्रदायिक दंगे हुए. 1990 के दशक में गुजरात में भारी पैमाने पर छोटे उद्योग बंद हुए. इसके बाद से गुजरात में भाजपा का एकछत्र राज रहा है. साथ ही बीजेपी की नजदीकी बडे व्यापारिक घरानों और कंपनियों से बढी. यहां एक दिलचस्प तथ्य हम यह भी पाते हैं कि गुजरात में हुई अब तक की अंतिम औद्योगिक हडताल ब्रिटिश शासनकाल में, 1941 में हुई थी. इसके बाद इस औद्योगिक राज्य में कोई औद्योगिक हडताल नहीं हुई.
एक पूरे समुदाय को शत्रु के रूप में चिह्नित करने और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिंसा को बढावा देने के पीछे एक और वजह है. वित्तीय पूंजी के लिए अधिक-से-अधिक मुनाफा बटोरने को सुगम बनाने के लिए राज्य को डब्ल्यूटीओ और वर्ल्ड बैंक की साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करना जरूरी था. इसके लिए उसे श्रम कानूनों में ढील देनी थी, जिससे मजदूरों के पास कोई अधिकार नहीं रह जाते. उसे बडी मात्रा में जमीनों का अधिग्रहण करना था, जिससे किसान बरबाद होते. राज्य के दूसरे संसाधनों को वित्तीय पूंजी की सेवा में लगाना था, जिससे राज्य के लोग अपने स्वाभाविक संसाधनों से वंचित हो जाते. इन सबका भारी प्रतिरोध होनेवाला था.
इन सबसे निबटने के लिए ऐसी सरकार चाहिए थी जो ऊपर से मजबूत ही न दिखे, उसे पास जनसमूह को जुटा लेने और अपने साथ रखने की काबीलियत भी हो. इसके लिए सरकारों को ऐसे नारे गढने जरूरी थे, जो ऊपर से जनता की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते दिखें, हालांकि जनता को उन नारों से कभी कुछ फायदा न हुआ. व्यापक जनसमूह को उसकी जातीय अस्मिता का हवाला देकर अपने साथ एकजुट करना जरूरी था. इन सबकी वजह से प्रतिरोध की संभावनाएं कम हो जातीं और जो प्रतिरोध करने का साहस जुटाते उन पर इस जन समूह को छोडा जा सकता था. वैसे भी गुजरात में ऐसा कोई विकल्प नहीं रहा जो इस प्रतिरोध का नेतृत्व कर सके और उसको रचनात्मक दिशा देकर राज्य को इस दुष्चक्र से छुटकारा दिला सके.

हिंदुत्व ने वित्तीय पूंजी की मदद से उत्पीडक और उत्पीडित वर्गों की पृथक पहचान और चेतना को धुंधला करके सभी को एक साथ खडा किया. चूंकि इसका नेतृत्व शासन में बैठी पार्टी कर रही थी, लोग शासन के साथ एकजुट होते गये. सारे मामले में धर्म का इतना बेहतर उपयोग किया गया कि लोग इस मकडजाल में और अधिक फंसते चले गये. उनमें तीव्र असुरक्षाबोध पैदा करके उनकी सुरक्षा करने के बहाने उन्हीं के तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म कर दिया. अधिक क्रूर और दमनकारी कानून लाये गये और मानवाधिकारों को हिकारत की वस्तु बना दिया गया. लोग यह अब तक नहीं समझ पाये हैं कि उन्हें डरा कर खुद उनकी सरकार ने उनके नीचे से उनकी जमीन खिसका दी है और वे अंधी खाई में गिरे जा रहे हैं.

गुजरात दंगे स्वतःस्फूर्त नहीं थे और न उनके संदर्भ तात्कालिक थे. हम पाते हैं कि इन दंगों के पहले राज्य की अर्थव्यवस्था 1994 के बाद से गिरावट का शिकार थी. मगर दंगों के बाद 2004 से इसमें बेहतरी आयी है. 2004 में गुजरात में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद शेष भारत के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक था. इसके अलावा राज्य में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर, जो कि 1994 के बाद से लगातार घट रही थी, 2004 के बाद पुनः बढने लगी.

हम यहां एक और विरोधाभास पाते हैं. अक्सर यह कहा जाता है कि निवेश के लिए राज्य में शांति और कानून-व्यवस्था बनी रहनी जरूरी है. मगर गुजरात का उदाहरण हमे इसकी एक उलटी बात दिखाता है. वहां विदेशी पूंजी निवेश की शुरुआत ही दंगों के साथ होती है और उनके तीव्र होते जाने के क्रम में ही निवेश में भी उछाल आता गया है. 2002 के दंगों के कुछ ही समय बाद, 2004 में गुजरात ने कुल 12 हजार 437 करोड रुपयों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी. दरअसल वित्तीय पूंजी क्षेत्र विशेष की आर्थिक, सामाजिक विशिष्टताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती. गुजरात के अकुशल श्रम और कारीगरों को नष्ट किये बगैर उसका मुनाफा संभव नहीं है, तो वह वहां दंगों का आयोजन करवाती है. मगर जहां पहले से ही साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियां मौजूद हैं, वहां वह कानून-व्यवस्था और शांति के नाम पर दमनात्मक कानूनों की जगह बनाती है और उन संघर्षों पर सत्ता के जरिये कठोर दमन करती है.

तो हम पृष्ठभूमि में एक ऐसे लोकतंत्र को पाते हैं जो वित्तीय पूंजी के प्रवाह को विकास का पर्याय मानता है, उसके लिए हत्याएं और नरसंहार कराये जाते हैं, हत्यारे गिरोहों और भीड को प्रोत्साहन दिया जाता है और सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध को कुचलने के लिए समाज को अंधी आस्थाओं से लैस किया जाता है. यह कुल मिला कर समाधान को हमसे और दूर कर देता है.

और ऐसे में हमसे कहा जाता है कि गुजरात को विकास के एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया जाये, क्या हुआ जो वहां अब भी एक पूरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार जारी है, क्या हुआ जो वहां अब भी दंगे के शिकार लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ, क्या हुआ जो वहां फिल्मों पर अघोषित प्रतिबंध लगा दिये जाते हैं और पेंटिंग्स जलायी जाती हैं. इन सबके बावजूद हमें इस विकास को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री फिर से चुनाव जीत गये हैं.

चुनाव. विकास. नवउदारवादी शब्दकोश के सबसे खनखनाते शब्द.

मगर एक ऐसी व्यवस्था में, जहां खुद चुनाव और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं वित्तीय पूंजी और साम्राज्यवादी संस्थाओं की सेवा में लगी हुई हों, हम लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी कैसे कर सकते हैं? भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मदद से ही फासीवाद सत्ता पर काबिज हुआ है. क्या 1975 में आपातकाल का अनुमोदन किसी दूसरे देश की संसद ने किया था? क्या 1984 के सिख विरोधी दंगों में शामिल पार्टी विशेष के लोग इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे? क्या बाबरी मसजिद इसी लोकतंत्र और इसके सभी स्तंभों के रहते नहीं तोड दी गयी? गुजरात नरसंहार के समय भी क्या यही लोकतंत्र नहीं था और नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने की बात कहनेवाले मुख्यमंत्री इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही नहीं चुने गये हैं?

जहां संसद, न्यायपालिका और प्रेस, पूरा तंत्र ही, वित्त पूंजी के हिरावल दस्ते के रूप में काम करने लगे हों, हम इस बात की गारंटी नहीं कर सकते कि संसद ही जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर रही है और जनता के अधिकार भंग नहीं कर दिये गये हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो जनता के तमाम प्रतिरोधों के बावजूद संसद सेज प्रस्तावों को मंजूरी कैसे देती और अदालतें हडताल, बंद, आरक्षण और मजदूर विरोधी फैसले कैसे देतीं? अकेले गुजरात का उदाहरण ही इस बात के लिए काफी है कि लोकतंत्र वास्तव में जनवादी मूल्यों, समानता और आजादी की गारंटी नहीं दे सकता.

हत्यारे गिरोह खडा करने और उन्हें समर्थन देने के संदर्भ में हम देख चुके हैं कि चुनाव लडनेवाली प्रायः सभी पार्टियां अपनी-अपनी स्थितियों में ऐसे गिरोहों को संरक्षण-समर्थन देती रही हैं. इनमें कोई अंतर नहीं होता, सिवाय इसके लिए वे एक दूसरे के खिलाफ वोट मांगती हैं. उनकी आर्थिक और विदेशी नीतियां तथा आंतरिक नीतियां भी लगभग समान हैं. असल में चुनाव में हमारे पास चुनने को इसके सिवा कुछ भी नहीं रह जाता कि कौन-सी पार्टी इस बार वित्तीय पूंजी की सेवा करेगी व इसके लिए जनता के अधिकारों को र करेगी. इस तरह हम यह भी देखते हैं कि चुनाव अंततः सांप्रदायिकता आदि का समाधान नहीं हो सकते.

और विकास के नाम पर जो आंकडे दिखाये जा रहे हैैं, उनसे बहुत प्रभावित होने की जरूरत नहीं है. यह वित्त पूंजी का दबाव है, जो नरेंद्र मोदी को राज्य में बुनियादी संरचना में सुधार करने पर विवश कर रहा है.

राज्य में भारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने प्रकटतः बडे उद्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. मगर जो लोग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रकृति के बारे में जानते हैं, यह उनके लिए बहुत उत्साहजनक तथ्य नहीं है. उल्टे यह चिंताजनक स्थिति ही है, क्योंकि एफडीआइ किसी भी तरह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करता. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निवेशक को सारा मुनाफा अपने देश ले जाने का अधिकार होता है. एफडीआइ देश के संसाधनों और इसकी संरचना का उपयोग अपने मुनाफे के लिए करता है और बदले में वह देश के लिए उसकी सदियों की जहालत छोड देता है. चूंकि सारा मुनाफा देश के बाहर चला जाता है, देश में आगे के औद्योगिक विकास के लिए उससे कोई पूंजी नहीं बचती. अधिक से अधिक उद्योगों की स्थापना के पीछे जो रोजगार निर्मित करने का तर्क दिया जाता है, वह भी मुनाफे की व्यवस्था के तहत तकनीकआधारित उद्योगों के दौर में बेमानी हो गये हैं. उनसे बहुत रोजगार उत्पन्न होने की आशा नहीं रखनी चाहिए. इसके अलावा एफडीआइ कभी टिकाऊ औद्योगिक विकास का माध्यम नहीं हो सकता. यह दरअसल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और पूंजीवाद के संकट से उत्पन्न आवारा पूंजी का हिस्सा है. यह हर समय और अधिक मुनाफे की तलाश में अपनी जगह बदलती रहती है. यह आज यहां है, कल कहीं और होगी. और फिर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि तब हमारी अर्थव्यवस्था का क्या होगा जो इस आवारा पूंजी पर अधिकाधिक निर्भर है.

गुजरात में जो बुनियादी सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं, वे प्रायः उन वर्गों की सुविधा के लिए हैं जो पहले से ही संपन्न हैं. उपभोक्ता बाजार के लिए गांवों तक पहुंच सुलभ बनाने और उसके लिए गांवों के दरवाजे खोलने के लिए जरूरी हो गया था कि वहां तक सडकें जायें और बिजली रहे.

मगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकडे राज्य में लोगों की बेहतरी को मापने के लिए एक बदतरीन उदाहरण हैं. राज्य अपने शासकों के चकाचौंध कर देनेवाले दावों के बावजूद , भूख, बदहाली और बीमारी से मुक्त नहीं है. गुजरात मानव विकास रिपोर्ट, 2004 बताती है कि गुजरात में निर्माण और कृषि क्षेत्रों, विकसित और अविकसित क्षेत्रों, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों तथा आर्थिक विकास और लोगों की बेहतर जीवनशैली के बीच का अंतर तीखा हुआ है. 2005 में गुजरात में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार बच्चों में 54 थी, जो कि राष्ट्रीय औसत से 1.07 गुणा ज्यादा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक 2005-06 के दौरान गुजरात में पांच वर्ष तक के आधे से कुछ कम (47 प्रतिशत) बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं. गुजरात में सामाजिक सेक्टर में खर्च नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में घटा है. वहां की 74.3 प्रतिशत महिलाएं और 46.3 प्रतिशत बच्चे एनीमिक हैं.

और अब हमारे सामने एक ऐसा राज्य है जो एफडीआइ की आयातित रोशनी में चमचमाता हुआ मंच पर खडा है और नेपथ्य में आत्महत्या किये 500 किसानों की लाशें सड रही हैं. जहां दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ तीव्र भेदभाव है और जहां तीन वर्षों में 100 से अधिक दलितों की हत्या कर दी गयी.

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि यह विकास कैसे हुआ और इसकी कीमत अंततः कौन चुका रहा है? क्या इस अबाध विकास के पीछे हत्याओं, नरसंहारों, घेटोकरण और संसदीय ढांचे के भीतर, उसी से उपजी तानाशाही की भूमिका को नजरअंदाज किया जा सकता है? और इसकी कीमत कौन चुका रहा है? उन पांच करोड गुजरातियों में से वे लोग जो कामगार हैं, वंचित हैं और गरीब हैं, अल्पसंख्यक हैं. जिनसे न सिर्फ उनके संसाधन और लोकतांत्रिक अधिकार ही छीन लिये गये हैं बल्कि इसका प्रतिरोध करने की उनकी संभावनाएं भी. जो कुछ राज्य ने उनके लिए छोडा है, वह है वापी में दुनिया का सबसे खतरनाक केमिकल हब, कपडा रंगाई उद्योग, जहाज तोडने और हीरे की पॉलिशिंग के रोजगार, जो उन्हें उनके जीवन के 30 वें साल में ही अंधा बना देंगे.

तो क्या वास्तव में हम अपने लिए ऐसे ही विकास को पसंद करेंगे?

15 जनवरी 2014

जो बचा है वह एक दुः स्वप्न है

पूरे शहर में नए वर्ष की शुभकामनाओं के होर्डिंग लगा दिए गए हैं. अलग-अलग राजनैतिक पार्टियों के बड़े और छोटे होर्डिंग. होर्डिंग में लिखा है कि नया साल शुभ हो. यह शहर मुज़फ्फर नगर है. पिछले बरस के सितम्बर माह में हुई साम्प्रदायिक हमले की सारी घटनाएं बीत चुकी हैं जो दुर्घटनाएं भी ती और शुभ-अशुभ की भाषा में ‘अशुभ भी. तब यह नए साल में संसद की राजनैतिक पार्टियों की तरफ से शुभकामनाएं आस्वाशन सी लगती हैं. जैसे यह सबकुछ उनके चाहने और न चाहने पर निर्भर रहा हो. फ्लाईओवर के ऊपर बड़ा सा बोर्ड लगा है. भगवा रंग के बोर्ड पर मोदी का हंसता हुआ चेहरा, जिस पर लिखा है ‘सुरक्षा नहीं सम्मान देंगें, दंगा नही विकास देंगे. मानो दंगा तो पिछले बरस की योजना में था. जबकि यह इस बरस के लोकसभा चुनाव की उद्घोषणा और तैयारी है. जब भी किसी राजनैतिक पार्टी के द्वारा विकास की बात की जाती है तो यह एक ऐसी अवधारणा है जिसका कोई स्वरूप नहीं दिखता. मुज़फ्फर नगर में साम्प्रदायिक हमले के जो पीड़ित हैं उनके विकास की कहानी सच्चर कमेटी के किसी दस्तावेज में कई वर्षों से दबी पड़ी है. जिसमे देश में उनके हालात क्या हैं यह भी दर्ज है और इसे ठीक किए जाने के कुछ सुझाव भी दर्ज हैं. मुज़फ्फर नगर में चार महीने पहले हुए साम्प्रदायिक हमले में हजारों घर उजड़ चुके हैं और मुस्लिम समुदाय की एक बड़ी आबादी बेघर हो चुकी है. राज्य का मुख्यमंत्री हमले में मारे गए लोगों को मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी निभा चुका है. इसके बावजूद हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने सड़कों के किनारे झुग्गियां बना रखी हैं. वे साम्प्रदायिकों और उन्मादियों की असुरक्षा और भय के कारण अपने गांव और घर नहीं लौटना चाहते. मुख्यमंत्री उन लोगों को भाजपा और कांग्रेस के समर्थक लोग कहते हुए उन पर गांव लौटने का लगातार दबाव बना रहा है. झुग्गियों के लोग कहते हैं कि कोई इस ठंड के मौसम में क्यों खुले आसमान के नीचे रहना चाहेगा. उनके घर, जिसे वे छोड़कर चले आए इन झुग्गियों से बड़े थे. उनके गांव जहां वे वर्षों से, कई पीढ़ियों से रहते आए वहां रहने की यादें बहुत बड़ी हैं. जब वे झुग्गियों में रहने आए हैं, जब उन्होंने वहां न लौटने का फैसला किया है तो यह सब उन्हें अपनी पुरानी स्मृति का हिस्सा बनाना है. उन्हें यह सब अपने जीवन के इतिहास में बीती एक दुर्घटना की तरह याद रखना है. इस इलाके में मुस्लिम समुदाय के पास जमीन उतनी ही बड़ी है जितना बड़ा उनका घर था. पर घर एक स्थायित्व था एक आस्वाशन की तरह जहां वे दिन भर की दिहाड़ी या किन्ही और कामों के बाद बेफिक्री से रहने के लिए लौट आते थे. अब उनके लिए घर का न होना जानवर होना हो गया है. हजारों झुग्गियों के बीच गंदगी पसर सी गई है और उसी के बीच अपने दिनचर्या के लिए उन सबको थोड़ी सी सुरक्षित जगह ढूंढ़ लेनी होती है. राज्य द्वारा पुलिस दबाव के चलते कई लोगों को इस ठंड में अपनी झुग्गियां हटानी पड़ी हैं. वे संझाक के कब्रिस्तान में आ गए हैं. कब्रिस्तान में उन्होंने झुग्गियां बना ली हैं. जिले के अधिकारी उन्हें वहां से भी हटाने की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में वे ऐसी जगह ढूढ़ रहे हैं जहां वे सरकार और हमलावरों दोनों को न दिखाई दें. पर ऐसा करना एक समुदाय के लिए संभव नहीं है.
मलकपुर, नूरपुर खुरगान, मदरसा कैम्प सड़कों के किनारे बसे हुए हैं. ४ जनवरी वह आखिरी तारीख थी जिस दिन लोगों को यह कैम्प छोड़ देना था पर लोगों ने तय कर लिया कि गांव जाकर साम्प्रदायिक ताकतों के हाथों मरने से बेहतर है कि यहीं मरे. अपने लोगों के बीच ही मरें. लोगों को भय इसलिए बना हुआ था कि कुछ लोग सितम्बर हमले के बाद गांव की तरफ अपना घर देखने गए और वे आज तक नहीं लौटे. लोगों को पता है कि उनके न लौटने का कारण क्या है. उन्हें यह भी पता है कि वे कभी नहीं लौटेंगे. मलकपुर कैम्प में रहने वाले अनवर के भाई कासिम भी इनमे से एक हैं. वे बूढ़े जो हमले के वक्त नहीं भाग पाए उनकी लाश बाद में घर के किसी कोने मं टंगी हुई मिली. यही वह वजह है जो लोगों के अपने गांव न लौटने का भय बना रही है. कैम्पों में कुल ८० से अधिक बच्चे ठंड में मर चुके हैं. इनमे से ज्यादातर बच्चियां हैं. कई नवजात अभी निमोनिया से ग्रसित हैं पर यह सब कैम्पों में रह रहे लोग सहन कर ले रहे हैं क्योंकि उन्हें एक हद तक सुरक्षा है. एकजुट रहने की सुरक्षा. यह पीड़ितों की एकजुटता है जो सरकार तक से लड़ने के लिए तैयार है. वहां के लोग सवाल करते हैं कि जब एक मुल्क दूसरे मुल्क के लोगों को पनाह दे देता है तो हमारे ही राज्य की सरकार हमे कैम्पों तक में क्यों नही रहने दे रही है. वे हर रोज सुबह आने वाली पार्टियों के नेताओं, एन.जी.ओ. के फोटोग्राफरों और उनके दुख व सदमे की गर्मी पर रोटियां सेंकने वालों से रू-ब-रू होते हैं. उन्होंने सब कुछ अस्थायी बना रखा है. अस्थायी मदरसे खोले गए हैं, अस्थाई मस्ज़िदें बनाई गई हैं और अस्थाई चौकियां जिस पर कपड़े धुले जा रहे हैं. मुश्किल हालातों में जिंदगियां विकल्प की तलाश कर ही लेती हैं. पालीथीन की चौकी और घर और बिस्तर. सरकार की तरफ से शुरुआती दौर में राहत शिविरों में कम्बल बांटे गए थे बस वही हैं. आसपास और पड़ोस के अलावा समुदाय के लोगों ने दूर-दूर से राहत भेजी है जो आधी-अधूरी ही उन तक पहुच पा रही है. मुस्लिम समुदाय के ये लोग बेहद गरीब लोग हैं जिनका सच्चर कमेटी ने कई साल पहले एक व्यापक स्थिति का आंकड़ा जुटाया था. तब से अब तक सरकार और सरोकार दोनों बदले. साल और बरस के बाद सरकार के वायदे भी बदले पर उनकी स्थिति एकदम न बदली. अब जबकि एक बड़ा बदलाव आया है तो वह उजाड़ और विस्थापन के रूप में. मुज़फ्फर नगर के इस हमले में अन्य साम्प्रदायिक हमलों से एक बड़ी भिन्नता इसी आधार पर देखी जा सकती है कि इसके पहले हुए लगभग सभी हमलों में लोगों की जाने ज्यादा गई. ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारा और जला दिया गया था. मुज़फ्फर नगर में एक संरचनात्मक हिंसा है जो सरकार की तरफ से जारी है और हमले में बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है. विस्थापन एक ऐसी घटना है जिससे उबरने में किसी परिवार को पीढ़ियां लग जाती हैं. इस लिहाज से मुज़फ्फर नगर का हमला एक समुदाय पर तात्कालिक ही नहीं एक लंबे समय तक फर्क डालने वाला हमला है. जबकि किसानी रूप से समृद्ध यह क्षेत्र अपने लिए सस्ते मजदूर बना पाएगा. यह ऐसा क्षेत्र है जहां ज्यादातर बड़े किसान जाट हैं जिन्हें अपने खेतों के लिए सस्ते मजदूरों की जरूरत है. हमला करने वाला समुदाय भी यही है. जब विस्थापित मुस्लिम समुदाय फिर से अपने को बसाने की कोशिशें करेगा तो उसे वह सबकुछ इकट्ठा करना होगा जो अपने पुस्तैनी जमीन पर उसे मिली हुई थी. इसे इकट्टा करने के लिए वह सस्ता मजदूर भी बनने को तैयार हो जाएगा. इस तरह से यह लंबे समय के लिए एक आर्थिक आधार वहां के समृद्धशाली और वर्चस्व बनाए हुए लोगों के लिए मुहैया कराएगा. जबकि हमले में पीड़ित लोगों को फिर से अपना एक घर बनाने में पीढ़ियां लग जाएंगी. संभव यह भी है कि वे कई पीढ़ियों तक उजड़ कर ही रह जाएं.     
चन्द्रिका

30 सितंबर 2013

मोदी के दिल्‍ली रैली की हकीकत.

विकास रैली की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट

अभिषेक श्रीवास्तव

हाल ही में एक बुजुंर्ग पत्रकार मित्र ने मशहूर शायर मीर की लखनऊ यात्रा पर एक किस्सा सुनाया था। हुआ यों कि मीर चारबाग स्टेनशन पर उतरे, तो उन्हें पान की तलब लगी हुई थी। वे एक ठीहे पर गए और बोले, ”ज़रा एक पान लगाइएगा।” पनवाड़ी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा, फिर बोला, ”हमारे यहां तो जूते लगाए जाते हैं हुज़ूर।” दरअसल, यह बोलचाल की भाषा का फ़र्क था। लखनऊ में पान बनाया जाता है। लगाने और बनाने के इस फ़र्क को समझे बगैर दिल्ली से आया मीर जैसा अदीब भी गच्चा खा जाता है। ग़ालिब, जो इस फ़र्क को बखूबी समझते थे, बावजूद खुद दिल्ली में ही अपनी आबरू का सबब पूछते रहे। दिल्ली और दिल्ली के बाहर के पानी का यही फ़र्क है, जिसे समझे बग़ैर ग़यासुद्दीन तुग़लक से दिल्ली हमेशा के लिए दूर हो गई। गर्ज़ ये, कि इतिहास के चलन को जाने-समझे बग़ैर दिल्ली में कदम रखना या दिल्ली से बाहर जाना, दोनों ही ख़तरनाक हो सकता है। क्या नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात कोई जाकर समझा सकता है? चौंकिए मत, समझाता हूं…।

अगर आपने राजनीतिक जनसभाएं देखी हैं, तो ज़रा आज की संज्ञाओं का भारीपन तौलिए और मीडिया के जिमि जि़प कैमरों के दिखाए टीवी दृश्यों से मुक्ता होकर ज़रा ठहर कर सोचिए: जगह दिल्ली, मौका राजधानी में विपक्षी पार्टी भाजपा की पहली चुनावी जनसभा और वक्ता इस देश के अगले प्रधानमंत्री का इकलौता घोषित प्रत्याशी नरेंद्र मोदी। सब कुछ बड़ा-बड़ा। कटआउट तक सौ फुट ऊंचा। दावा भी पांच लाख लोगों के आने का था। छोटे-छोटे शहरों में रैली होती है तो रात से ही कार्यकर्ता जमे रहते हैं और घोषित समय पर तो पहुंचने की सोचना ही मूर्खता होती है। मुख्य सड़कें जाम हो जाती हैं, प्रवेश द्वार पर धक्का-मुक्की तो आम बात होती है। दिल्ली में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। न कोई सड़क जाम, न ही कोई झड़प, न अव्यवस्था।। क्या इसका श्रेय जापानी पार्क में मौजूद करीब तीन हज़ार दिल्ली पुलिसबल, हज़ार एसआइएस निजी सिक्योरिटी और हज़ार के आसपास आरएएफ के बलों को दिया जाय, जिन्होंने कथित तौर पर पांच लाख सुनने आने वालों को अनुशासित रखा? दो शून्य‍ का फ़र्क बहुत होता है। अगर हम भाजपा कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों, मीडिया को अलग रख दें तो भी सौ श्रोताओं पर एक सुरक्षाबल का हिसाब पड़ता है। ज़ाहिर है, पांच लाख की दाल में कुछ काला ज़रूर है।

आयोजन स्थल पर जो कोई भी सवेरे से मौजूद रहा होगा, वह इस काले को नंगी आंखों से देख सकता था। मोदी की जनसभा का घोषित समय 10 बजे सवेरे था, जबकि वक्ता की लोकप्रियता और रैली में अपेक्षित भीड़ को देखते हुए मैं सवेरे सवा सात बजे जापानी पार्क पहुंच चुका था। उस वक्त ईएसआई अस्पताल के बगल वाले रोहिणी थाने के बाहर पुलिसवालों की हाजि़री लग रही थी। सभी प्रवेश द्वार बंद थे। न नेता थे, न कार्यकर्ता और न ही कोई जनता। रोहिणी पश्चिम मेट्रो स्टेशन वाली सड़क से पहले तक अंदाज़ा ही नहीं लगता था कि कुछ होने वाला है। अचानक मेट्रो स्टेशन वाली सड़क पर बैनर-पोस्टर एक लाइन से लगे दिखे, जिससे रात भर की तैयारी का अंदाज़ा हुआ। बहरहाल, आठ बजे के आसपास निजी सुरक्षा एजेंसी एसआइएस के करीब हज़ार जवान पहुंचे और उनकी हाजि़री हुई। नौ बजे तक ट्रैक सूट पहने कुछ कार्यकर्ता आने शुरू हुए। गेट नंबर 11, जहां से मीडिया को प्रवेश करना था, वहां नौ बजे तक काफी पत्रकार पहुंच चुके थे। गेट नंबर 1 से 4 तक अभी बंद ही थे। सबसे ज्यादा चहल-पहल मीडिया वाले प्रवेश द्वार पर ही थी। दिलचस्प यह था कि तीन स्तरों के सुरक्षा घेरे का प्रत्यक्ष दायित्व तो दिल्ली पुलिस के पास था, लेकिन कोई मामला फंसने पर उसे भाजपा के कार्यकर्ता को भेज दिया जा रहा था। तीसरे स्तर के सुरक्षा द्वार पर भी भाजपा की कार्यकर्ता और एक स्था्नीय नेतानुमा शख्स। दिल्ली पुलिस को निर्देशित कर रहे थे।

यह अजीब था, लेकिन दिलचस्प। साढ़े नौ बजे पंडाल में बज रहे फिल्मी गीत ”आरंभ है प्रचंड” (गुलाल) और ”अब तो हमरी बारी रे” (चक्रव्यूबह) अनुराग कश्यप व प्रकाश झा ब्रांड बॉलीवुड को उसका अक्स दिखा रहे थे। इसके बाद ”महंगाई डायन” (पीपली लाइव) की बारी आई और भाजपा के सांस्कृतिक पिंजड़े में आमिर खान की आत्मा तड़पने लगी। जनता हालांकि यह सब सुनने के लिए नदारद थी। सिर्फ मीडिया के जिमी जि़प कैमरे हवा में टंगे घूम रहे थे। अचानक मिठाई और नाश्ते के डिब्बे बंटने शुरू हुए। कुछ कार्यकर्ता मीडिया वालों का नाम-पता जाने किस काम से नोट कर रहे थे। फिर पौने दस बजे के करीब अचानक एक परिचित चेहरा दर्शक दीर्घा में दिखाई दिया। यह अधिवक्ता प्रशांत भूषण को चैंबर में घुसकर पीटने वाली भगत सिंह क्रांति सेना का सरदार नेता था। उसकी पूरी टीम ने कुछ ही देर में अपना प्रचार कार्य शुरू कर दिया। ”नमो नम:” लिखी हुई लाल रंग की टोपियां और टीशर्ट बांटे जाने लगे। कुछ ताऊनुमा बूढ़े लोगों को केसरिया पगड़ी बांधी जा रही थी। कुछ लड़के भाजपा का मफलर बांट रहे थे। जनसभा के घोषित समय दस बजे के आसपास पंडाल में भाजपा कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों और मीडिया की चहल-पहल बढ़ गई। सारी कुर्सियां और दरी अब भी जनता की बाट जोह रही थीं और टीवी वाले जाने कौन सी जानकारी देने के लिए पीटीसी मारे जा रहे थे।

सवा दस बजे एक पत्रकार मित्र के माध्यम से सूचना आई कि नरेंद्र मोदी 15 मिनट पहले फ्लाइट से दिल्ली के लिए चले हैं। यह पारंपरिक आईएसटी (इंडियन स्ट्रे चेबल टाइम) के अनुकूल था, लेकिन आम लोगों का अब तक रैली में नहीं पहुंचना कुछ सवाल खड़े कर रहा था। साढ़े दस बजे के आसपास माइक से एक महिला की आवाज़़ निकली। उसने सबका स्वागत किया और एक कवि को मंच पर बुलाया। ”भारत माता की जय” के साथ कवि की बेढंगी कविता शुरू हुई। फिर एक और कवि आया जिसने छंदबद्ध गाना शुरू किया। कराची और लाहौर को भारत में मिला लेने के आह्वान वाली पंक्तियों पर अपने पीछे लाइनें दुहराने की उसकी अपील नाकाम रही क्यों कि कार्यकर्ता अपने प्रचार कार्य में लगे थे और दुहराने वाली जनता अब भी नदारद थी।

पौने ग्यारह बजे की स्थिति यह थी कि आयोजन स्थल पर बमुश्किल दस से बारह हज़ार लोग मौजूद रहे होंगे। एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने (नाम लेने की ज़रूरत नहीं) बताया कि कुल सात हज़ार के आसपास सुरक्षाबल (सरकारी और निजी), 500 के आसपास मीडिया, तीन हज़ार के आसपास कार्यकर्ता और स्वयंसेवक व छिटपुट और लोग होंगे। ”लोग नहीं आए अब तक?”, मैंने पूछा। वो मुस्कराकर बोला, ”सरजी संडे है। हफ्ते भर नौकरी करने के बाद किसे पड़ी है। टीवी में देख रहे होंगे।” फिर उसने अपने दो सिपाहियों को चिल्लाकर कहा, ”खा ले बिजेंदर, मैं तुम दोनों को भूखे नहीं मरने दूंगा।” ग्यारह बज चुके थे और पंडाल के भीतर तकरीबन सारे मीडिया वाले और पुलिसकर्मी भाजपा के दिए नाश्ते। के डिब्बों को साफ करने में जुटे थे। मंच से कवि की आवाज़ आ रही थी, ”मोदी मोदी मोदी मोदी”। उसने 14 बार मोदी कहा। मंच के नीचे पेडेस्ट़ल पंखों और विशाल साउंड सिस्टम के दिल दहलाने वाले मिश्रित शोर का शर्मनाक सन्नाटा पसरा था और हरी दरी के नीचे की दलदली ज़मीन कुछ और धसक चुकी थी।

कुछ देर बाद हम निराश होकर निकल लिए। मोदी सवा बारह के आसपास आए और दिल्ली में हो रही जोरदार बारिश के बीच एक बजे की लाइव घोषणा यह थी कि रैली में पांच लाख लोग जुट चुके हैं। मोदी ने कहा कि ऐसी रिकॉर्ड रैली आज तक दिल्ली में नहीं हुई। इस वक्त मोबाइल पर उनका लाइव भाषण देखते हुए हम बिना फंसे रिंग रोड पार कर चुके थे। पंजाबी बाग से रोहिणी के बीच रास्ते में गाजि़याबाद से रैली में आती बैनर, पोस्टर और झंडा बांधे कुल 13 बसें दिखीं। अधिकतर एक ही टूर और ट्रैवल्स की सफेद बसें थीं। निजी वाहनों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हरेक बस में औसतन 20-25 लोग थे। लाल बत्तियों पर लगी कतार को छोड़ दें तो पूरी रिंग रोड (जो हरियाणा को दिल्ली से जोड़ती है), रोहिणी से धौला कुआं वाली रोड (गुड़गांव वाली), कुतुब से बदरपुर की ओर जाती सड़क(जो फरीदाबाद को दिल्ली से जोड़ती है) और बाद में उत्तर प्रदेश से दिल्ली को जोड़ने वाली आउटर रिंग रोड खाली पड़ी हुई थी। और यह दिल्ली( की बारिश में था जबकि जाम एक सामान्य दृश्य होता है।

रैली में आखिर लाखों लोग आए कहां से? क्या सिर्फ 26 मेट्रो से? बसों और निजी वाहनों से तो जाम लग जाता, जबकि ग़ाजि़याबाद से रोहिणी और वहां से वापस रिंग रोड, आउटर रिंग रोड व भीतर की पंजाबी बाग वाली रोड को कुल 125 किलोमीटर हमने पूरा नापा। ग़ाजि़याबाद का जि़क्र इसलिए विशेष तौर पर किया जाना चाहिए क्योंकि राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं और पिछले दो दिनों से बड़े पैमाने पर यहां रैली की तैयारियां चल रही थीं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मोदी की जनसभा में जितने भी नेताओं के कटआउट आए थे, सब ग़ाजि़याबाद से आए थे जिन्हें एक ही कंपनी ”आज़ाद ऐड” ने बनाया था। सवेरे साढ़े आठ बजे तक ये कटआउट यहां ट्रकों में भरकर पहुंच चुके थे, हालांकि ग़ाजि़याबाद से श्रोता नहीं आए थे। वापस पहुंचने पर इंदिरापुरम, ग़ाजि़याबाद के स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता टीवी पर मोदी का रिपीट भाषण सुनते मिले।

बहरहाल, मोदी जब बोल चुके थे तो भाजपा कार्यालय के एक प्रतिनिधि ने फोन पर बताया कि रैली में आने वालों की कुल संख्या 50,000 के आसपास थी। अगर हम इसे भी एकबारगी सही मान लें, तो याद होगा कि इतने ही लोगों की रैली पिछले साल फरवरी में दिल्ली में कुछ मजदूर संगठनों ने की थी और समूचा मीडिया यातायात व्यवस्था और जनजीवन अस्तव्यस्त हो जाने की त्राहि-त्राहि मचाए हुए था। अजीब बात है कि बिना हेलमेट पहने और लाइसेंस के बतौर भारत का झंडा उठाए दर्जनों बाइकधारी नौजवानों के आज सड़क पर होने के बावजूद कुछ भी अस्तव्यस्त नहीं हुआ, लाखों लोग रोहिणी जैसी सुदूर जगह पर आ भी गए और चुपचाप चले भी गए। यह नरेंद्रभाई मोदी की रैली में ही हो सकता है। उत्तराखंड की बाढ़ में फंसे गुजरातियों को जिस तरह उन्होंने एक झटके में वहां से निकाल लिया था, हो सकता है कि ऐसा ही कोई जादू चलाकर उन्हों ने दिल्लीं की विकास रैली में लाखों लोगों को पैदा कर दिया हो। ऐसे चमत्कांर आंखों से दिखते कहां हैं, बस हो जाते हैं।

ऐसे चमत्कारों का हालांकि खतरा बहुत होता है। उत्तराखंड वाले चमत्कार में ऐपको नाम की जनसंपर्क एजेंसी का भंडाफोड़ हो चुका है। दिल्ली् में किस एजेंसी को भाजपा ने यह रैली आयोजित करने के लिए नियुक्त़ किया, यह नहीं पता। देर-सवेर पता चल ही जाएगा। मेरी चिंता हालांकि यह बिल्कुकल नहीं है। मैं इस बात से चिंतित हूं कि मोदी जैसा कद्दावर शख्स दिल्ली में बोल गया और दिल्ली वाले नहीं आए। वजह क्या है? कहीं तुग़लक जैसी कोई समस्या तो इसके पीछे नहीं छुपी है? मोदी दिल्लीवालों को न समझें न सही, क्या? विजय गोयल आदि आयोजकों से भी कोई चूक हो गई? ठीक है, कि टीवी चैनलों के हवा में लटकते पचास फुटा कैमरों ने टीवी देख रहे लोगों को काम भर का भरमाया होगा, जैसा कि उसने अन्ना हज़ारे की गिरफ्तारी के समय किया था। अन्ना से याद आया- वह भी तो रोहिणी जेल का ही मामला था जहां दो-चार हज़ार लोगों को कैमरों ने एकाध लाख में बदल दिया था। इत्तेफाक कहें या बदकिस्मती, कि रोहिणी में ही इतिहास ने खुद को दुहराया है। मोदी चाहें तो किसी ज्योतिषी से रोहिणी पर शौक़ से शोध करवा सकते हैं। वैसे रोहिणी तो एक बहाना है, असल मामला दिल्ली के मिजाज़ का है जिसे भाजपा (प्रवृत्ति और विचार के स्तर पर इसे अन्ना आंदोलन भी पढ़ सकते हैं) समझ नहीं सकी है।

भाजपा और संघ के पैरोकार वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने आज तक एक ही बात ऐसी लिखी है जो याद रखने योग्य है। उन्हों ने कभी लिखा था कि इस देश का दक्षिणपंथ जनता की चेतना से बहुत पीछे की भाषा बोलता है और इस देश का वामपंथ जनता की चेतना से बहुत आगे की भाषा बोलता है। इसीलिए इस देश में दोनों नाकाम हैं। कहीं मोदी समेत भाजपा की दिक्कत यही तो नहीं? कहीं वे भी तो शायर मीर की तरह ”लगाने” और ”बनाने” का फर्क नहीं समझते? मुझे वास्तव में लगने लगा है कि किसी को जाकर नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात गंभीरता से समझानी चाहिए कि 29 सितंबर, 2013 को दिल्ली के जापानी पार्क में उनकी ”बनी” नहीं, ”लग” गई है। ग़ालिब तो शेर कह के निकल लिए, इस ”भारत मां के शेर” का संकट उनसे कहीं बड़ा है। दिल्ली वालों ने आज संडे को टीवी देखकर मोदी और भाजपा की आबरू का सरे दिल्ली में जनाज़ा ही निकाल दिया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं) Contact: guru.abhishek@gmail.com,  M. 08800114126

06 सितंबर 2013

आसाराम और उनके ‘साधक’ संत या गुंडे ?

सुनील कुमार
आसाराम पर पहले भी कई बार आरोप लग चुके हैं लेकिन हर बार वह अपनी राजनीतिक पहुंच के कारण बड़े-बड़े कांड को भी वो रफा-दफा कराने में कामयाब रहे। आसाराम के छिंदवाड़ा, ‘गुरूकुल’ में पढ़ने वाली 16 वर्षीय नाबालिग छात्रा ने दिल्ली के कमला मार्केट थाना में 19 अगस्त को यौन शोषण (बलात्कार) का केस दर्ज कराया है। मेडिकल टेस्ट में भी नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की पुष्टि हो गई है। लड़की के स्वस्थ्य होने के बावजूद ‘गुरूकुल’ द्वारा लड़की के मां-बाप को सूचना देकर बुलाया गया और बताया गया कि लड़की बीमार है उस पर भूत-प्रेत की साया है। प्रेत की सया से छुटाकार दिलाने के लिए अनुष्ठान करना पड़ेगा और अनुष्ठान स्वयं आसाराम बापू ही करेंगे और वो जोधपुर के आश्रम में हैं। लड़की व उसके मां-बाप जोधपुर आसाराम के पास आ गये। आसाराम का व्यक्तिगत आश्रम जोधपुर के मनई गंाव के एक फॉर्म हाऊस में है। इस आश्रम में आसाराम उनके सहयोगी शिवा तथा महिला सेविका ही प्रवेश कर सकती हैं। यहां तक कि फॉर्म हाऊस के मालिक और उनके पुत्र नारायण साईं को भी जाने की इजाजत नहीं थी। इसी आश्रम में आसाराम ने पीड़िता व उसके मां-बाप को अनुष्ठान करने के लिये बुलाया था। इसी आश्रम में जांच के दौरान पता चला है कि कुछ माह पहले आसाराम ने एक और लड़की को हवश का शिकार बनाने की कोशिश की लेकिन शोर-मचाने के कारण लड़की बच गई। 
आसाराम पर बलात्कार की खबर जब मीडिया में आया तो आसारम के प्रवक्ता सुनली वानखेड़े ने सफेद झूठ बोलते हुए कहा कि बापू उस दिन जोधपुर मे थे ही नहीं, वे 11 अगस्त् को ही जोधपुर से चले गये थे। जब यह साबित हो गया कि आसाराम 15 अगस्त् को जोधपुर में ही थे तो आसाराम ने सफाई देना शुरू किया। आसाराम ने माना कि लड़की व उसके मां-बाप स्वेच्छा से अनुष्ठान कराने के लिए उनके आश्रम में आये हुए थे। वे अपने भक्तों को बता रहे थे कि उनका आश्रम इतना शांत है कि कोई धीरे से भी ताली बजाये तो उसकी आवाज बाहर जाती है। इस तरह आसाराम ने मान लिया कि 15 अगस्त् को लड़की उनके साथ थी, अभी पुछताछ में उन्होंने यह भी माना है कि लड़की 1 घंटे तक उनके साथ एकांत में थी। 
आसाराम के ‘शिष्य’ साधक
आसाराम के ‘शिष्य’ जिसको आसाराम की भाषा में ‘साधक/साधिका’ कहा जाता है। उनके व्यवहार से आपको कहीं ऐसा नहीं लगेगा कि वे साधक हैं वे अपने को साधे हुए हैं। वे जगह-जगह मार-पीट किये यहां तक कि जोधपुर में तो मीडिया वालों को बुरी तरह पीटे, केमरे तोड़ दिये जिसमें आसाराम की महिला साधक अग्रणी भूमिका निभा रही थीं। इसी तरह 30 अगस्त् को जन्तरमन्तर पर आसाराम के ‘साधक/साधिका’ मीडिया के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। इसमें हरियाणा और दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से 400-500 लोग आये हुए थे जिसमें कई तो पूरा छुट भैय्या नेता की ड्रेस में थे। वे मीडिया को पानी पी-पी कर गाली दे रहे थे- ‘‘भारतीय संस्कृति का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान,’’ ‘‘पैसा लेकर अपना ईमान बचेने वाली मीडिया मुर्दाबाद,’’ ‘‘देशद्रोही मीडिया हाय..हाय,’’ ‘‘पेड मीडिया मुर्दाबाद,’’ ‘‘बापू हैं सच्चे, हम हैं बापू के बच्चे’’ इत्यादि।  इन ‘साधकों’ में से एक ‘साधक’ से मेरी बात हुई है यह ‘साधक’ कह रहा था कि ‘‘बापू गंगा जैसे पवित्र हैं वे गलत कर ही नहीं सकते, उनको फंसाया जा रहा है। बापू सेक्स नहीं कर सकते, क्योंकि वे त्रिबंध योग करते हैं जो कि सेक्स पॉवर को खत्म कर देता है। बापू अपने सभी साधकों को त्रिबंध योग सिखाते हैं मैंने भी कुछ समय किया है जिससे मेरी सेक्स पॉवर खत्म हो रही थी तो मैंने छोड़ दिया क्योंकि मैं शादी-शुदा था। बाबा तो रोज त्रिबंध करते हैं तो वे सेक्स कैसे कर सकते हैं?’’ ये पूछने पर कि बाबा यदि गलत किये हों तो क्या होना चाहिए? ये ‘साधक’ अपना आपा खोते हुए गालियां बकने लगा; जबकि मेरे साथ में एक महिला भी थी ‘‘बाबा का कोई ............ उखाड़ नहीं सकता, उसकी........ ये वो,’’ इन गालियों के साथ-साथ वो उसी तरह का एक्शन भी कर रहा था। उसी दिन एक और घटना हुई, जब हम दो लोग बात कर रहे थे कि आसाराम की गिरफ्तारी में जानबूझकर देर किया जा रहा है उसको काफी समय दिया गया, जबकि दिल्ली-मुम्बई के गैंग रेप में 24 घंटे में गिरफ्तारी हो गई थी। पुराने केसों में भी कुछ नहीं हुआ एक उनका ‘साधक’ पास में खड़ा था जब मेरे मित्र चल गया तो गाली से बातें शुरू किया ‘‘मेरा घर हिसार में है अभी तुम्हारे ............ हाथ कर दूंगा। तू कांग्रेस का दलाल है।’’ ये रहा आसाराम के साधकों का चरित्र। यहां तक कि उनके ‘साधक’ गिरफ्तारी के बाद भी जहाज के अन्दर उनके साथ यात्रा कर रहे थे और मीडिया वालों को अपना काम करने से रोकते रहे। जबकि यही मीडिया वाले अपना टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए आसारा जैसे पाखंडी बापूओं, गुरूओं, बाबाओं को बढ़ावा दिया है। 
लड़की के पिता का कहना है कि वे ‘‘संत आसाराम बापू को भगवान मान उनकी भक्ति में पागल थे। शाहजहांपुर में आश्रम के लिए जमीन खरिदवाई। लाखों रुपये बापू की सेवा में खर्च कर दिए। पत्नी, बेटे, बेटी भी बापू को भगवान मानते थे। चैनलों और अखबारों में बापू के खिलाफ खबरें देख उन्हें भी बापू के खिलाफ दुष्प्रचार, षड़यंत्र नजर आता था। वे कई बार मीडिया से भिड़ गए, गाली-गलौच तक कर डाला। लेकिन खुद की बेटी के साथ दुष्कर्म होने पर बापू की असलियत का पता चला। बापू के कुकृत्यों को सामने लाने पर जो साधक आज मुझे गलत समझ रहे हैं, असलियत सिद्ध होने पर वे साथी साधक भी उनकी तरह आसाराम से घृणा करने लगेंगे।’’ तो क्या आज जो लोग आसाराम के समर्थन में आ रहे हैं वे अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं? इसमें से बहुत ऐसे लोग होंगे जो दामनी/निर्भया कांड में फांसी की सजा की मांग कर रहे होंगें। लेकिन उनकी आखों पर धर्म की जो पट्टी चढ़ी है उससे आसाराम की दरिंदगी को नहीं देख पा रहा है। आसाराम के प्रमुख सेवादार शिवा ने पुलिस के सामने खुलासा किया है कि आसाराम बापू कई महिलाओं से अकेले में मिलते थे। 
आसाराम आश्रम के पूर्व सदस्य राजू चंडक ने पुलिस हलफनामे में दवा किया है कि उन्होंने आसाराम को महिलाओं के साथ यौन शोषण करते हुए देखा है। आसाराम तांत्रिक रस्में भी करते हैं इसके बाद दिसम्बर 2009 में राजू चंडक पर दो अज्ञात व्यक्तिों ने अहमदाबाद में बंदूक से जानलेवा हमला किया। जिसमें आसाराम नामजद हैं। 
जिस आसाराम को उनके ‘साधक’ त्रिबंध योग के द्वारा अपने को नपुंसक बनाने की बात कह रहे थे वे मेडिकल जांच में साबित हो चुका है कि वे सेक्स कर सकते हैं। अपने को निर्दोष बताने वाले आसाराम जवाब देने से क्यों बचते रहे? क्या मीडिया अब इन बाबाओं को धर्म गुरूओं को दिखाना और उन्हें नायक बनाना बंद कर देगी? महिलाओं के प्रति आशाराम के मनोरोग का पता चलने और थू-थू होने के बावजूद क्या ऐसे बापुओं, बाबाआंे, ढोंगी-पाखंडी, साधुओं और अध्यात्मिक गुरूआंे के ‘‘कारोबार में कोई कमी आएगी? इन बाबाओं की सभाओं में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पत्रकार, फिल्म सितारे, खिलाड़ी पहुंचकर उनकी ढोंग को बढ़ावा देते रहे हैं। क्या ये लोग इनके आश्रमों, चौखटों पर माथा टेकना बंद कर सकते हैं? 
बलात्कार जैसे केसों में भी आम और खास को भेद-भाव हो रहा है। जहां दिल्ली और मुम्बई जैसे गैंग रेप के आरोपियों को 24 घंटे में पकड़कर कई दिन पुलिस कस्टडी में रखा गया। क्यों नहीं आसाराम के खिलाफ और सबूत जुटाए जा रहे हैं, उनके ऊपर जो भी अभी तक आरोप लगे हैं उसकी सबुत जुटाये जा रहे हैं? इन सभी सबूतों के आधार पर ही हम पीड़िता को सही न्याय दिला पायेंगे। आसाराम को जेलर अपने घर से दलिया क्यों लाकर दे रहे हैं (इंडिया टीवी) ?  वहीं आसाराम पर केस दर्ज होने के 10 दिन बाद गिरफ्तार करते हैं और महज एक दिन की पुलिस कस्टडी में पुछताछ पूरा कर लेते हैं। इसी राजस्थान में बलात्कार के आरोपियों को 10 दिन, 16 दिन और 4 माह में सजा सुना दिया गया है।
लोगों को अंध भक्ति बनाने में धर्म का बहुत बड़ा हाथ है जिस धर्म में कृष्ण-गोपियों की लीला की बात होती है जहां एक पुरुष सैकड़ों-हजारों महिलाओं के साथ सेक्स कर सकता है। इसी का सपना दिखाकर आसाराम बापू जैसे संत छोटी-छोटी बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। शासक वर्ग ऐसे बाबाओं को फलने-फूलने देता है कि ये बाबा समस्याओं से मुंह मोड़ना सिखाते हैं। लुटेरों को बचाने के लिए ये लोगों को ‘‘कर्म किये जा फल की चिन्ता मत कर’’ की शिक्षा देते हैं। जिस दिन इन बाबाओं की दुकानें बंद हो जाएंगी लोग सही अर्थों में मुक्ति का रास्ता खोजने लगेंगे।

20 जून 2012

शौकत पर लश्कर का ठप्पा लगाने की फिराक में यूपी एटीएस


 -राजीव यादव
 आने वाले दिनों की खतरनाक आहट, जेल की काल कोठरी या पुलिस प्रताड़ना से उसे डर नहीं लगता। उसे फिक्र हैं अपनी ग्यारह साल की बच्ची हाजरा का, जो सेरिब्रल पैरालिसिस से पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग है और फिक्र है अपने उस भाई वाहिद अली (25 वर्ष) का जो हर अनजान व्यक्ति की आहट सुनके डर जाता है। और उसकी इस हालत का जिम्मेवार वो अपनी खामोशी को मानता है। पर अब उसने अपनी खामोशी तोड़ने का फैसला किया है। इस पूरी दास्तान से यह बात हमारे सामने आएगी कि कैसे लश्कर-ए-तैयबा,  इंडियन मुजाहिदीन,  हूजी और न जाने किन-किन संगठनों के नाम पर बेगुनाह मुसलमानों को कभी एरिया कमाण्डर तो कभी मास्टर माइण्ड कहा जाता है, पर असल के मास्टर माइण्ड कौन हैं, ये अबूझा रह जाता है।
इस शख्स का नाम है- शौकत अली। उम्र- 45 वर्ष। पुत्र साबित अली।  गांव- श्रीनाथपुर, थाना कन्धई, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। मैं जब इस शख्स से मिला तो मेरे दिमाग में एक खाका बनने लगा कि अगर इस शख्स ने अपनी खामोशी उन तमाम लोगों की तरह नहीं तोड़ी होती तो इसके बारे में हमें जो जानकारी मिलती या इसकी जो हालत होती वो बड़ी भयावह होती। शौकत पर यूपी एटीएस द्वारा आतंकवाद का ठप्पा लगाने से पहले ही उसकी जुबानी उसकी दास्तान को सुनने की कोशिश करते हैं।
शौकत उस दिन काफी परेशान हो गया। जब उसके भाई नासिर अली (40 वर्ष) को 11 जून 2012 को साढ़े दस बजे के तकरीबन जिला अस्पताल प्रतापगढ़ पहुंचने पर कुछ अनजान व्यक्तियों ने उससे पूछताछ की। नासिर जान गए कि वे एटीएस के लोग हैं। उन लागों ने इधर-उधर की बात करते हुए नासिर की पर्ची को जांचा। फिर उनका एक सहयोगी जो फोन पर था उसने पूछा कि इसे उठाना है,  तो पर्ची जांच चुके व्यक्ति ने कहा- अभी नहीं। नाशिर ‘खुदा का शुक्र’  कहते हुए कहते हैं कि उस दिन हमने लू के मारे अपने मुंह पर गमछा बांधा था, वे लोग पहचान नहीं पाए पर जब पर्ची देखा तो वे सन्तुष्ट हो गए, पर जब तक मैं अस्पताल में था वे वहीं रहे। जब मैं साइकिल से वहां से निकला तो वे पांचों अपने दो पहिया से वहां से निकल चले।
इसके पीछे की कहानी शौकत बताते हैं कि मैंने अपने मोबाइल नम्बर 08726692670 से 10 जून 2012 को दिन में 9 बजे के तकरीबन अपने मित्र मास्टर शमीम को फोन किया कि मैं कल 11 जून 2012 को अपने बेटे अब्दुल्ला अज्जाम को दिखाने के लिए जिला अस्पताल प्रतापगढ़ आउंगा। पर मैं कुछ व्यक्तिगत कारणों से नहीं जा सका। पर मेरे भाई अपने को दिखाने 11 जून 2012 को जब जिला अस्पताल गए तो उनसे हुई पूछताछ से यह बात स्पष्ट होती है कि मेरे मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया गया है। ऐसे में जिस तरीके से उन लोगों ने भाई नासिर से कहा कि इसे नहीं उठाना है उससे यह भी स्पष्ट होता है कि वे मुझे उठाने की फिराक में थे। दरअसल मेरे भाई और मेरी शक्ल काफी मिलती जुलती है।
शौकत अली
 शौकत जब अपनी कहानी फ्लैश बैक से शुरु करते हैं तो उसमें कहीं ठहराव नहीं होता। ठहरती है तो बस उनकी जिन्दगी और एक संगठन जिसके इर्द-गिर्द उनके खिलाफ साजिशों दौर शुरु होता है। शौकत बीएससी करने के बाद एसआईएम जिसे अब सिमी कहा जाता है से जुड़े और फिर 1992 में बीएड करने के बाद 1995 से प्राइमरी अध्यापक के रुप में कार्य करने लगे।
2001 में एसआईएम के प्रतिबंधित होने के बाद देश के तमाम मुस्लिम नौजवानों की तरह शौकत भी खुफिया और बेनामी सादी वर्दियों के पूछताछ के आदी हो गए। और उन्हें लगने लगा कि जैसे वो उनके जीवन का हिस्सा हो गए हों। पर 2008 का दौर वे कभी नहीं भूलेंगे क्योंकि यह वह दौर था जब यूपी एटीएस की सादी वर्दियों के बूटों की आवाजें उनके दरवाजे गाहे-बगाहे कभी भी दस्तखत दे देती।
दरअसल,  2008 में शौकत के घर यूपी एटीएस की यह दस्तक इलाहाबाद के चक हिदायत उल्ला से आमिर महफूज की गिरफ्तारी के बाद शुरु हुई। 15 अगस्त 2008 के अमर उजाला प्रतापगढ़ के संस्करण में एक खबर छपी की इलाहाबाद से गिरफ्तार हुए आमिर महफूज को शौकत जाली नोट सप्लाई करता था। दरअसल इसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी। 10-11 अगस्त 2008 में आमिर महफूज को घूरपुर (इलाहाबाद) के थाने वालों ने बुलाया कि तुम अपने बहनोई मौलाना अशफाक को बुलाओ तब तुम्हें छोड़ेगे। पुलिस वालों की अनुसार मौलाना अशफाक को लंबे समय से पुलिस खोज रही थी। इस बीच आमिर महफूज के घर वालों ने 12-13 अगस्त में डीएम-एसपी वगैरह को फैक्स कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने कहानी बनाने के लिए 14 को उसे जाली नोटों के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया।
शौकत को इस कहानी में लाने की वजह यह थी की मौलाना अशफाक जो मालेगांव के थे उससे शौकत के जरिए ही आमिर महफूज की बहन की शादी हुई थी। बहरहाल, खबर यह भी है कि आमिर महफूज पिछले दिनों छूट गया है और उसके जिस बहनोई को पुलिस बहुत खोजने का दावा कर रही थी लोग बताते हैं कि वो आज भी वहीं रहते हैं।
बहरहाल, यह कहानी शौकत की है। 2008 के स्वतंत्रता दिवस के दिन छपी इस खबर से ही शौकत को गुलामी की बेडि़या जकड़ने लगती हैं। इस बारे में शौकत से कोई सीधी पूछताछ नहीं की गई। बल्कि विकास क्षेत्र बेलखरनाथ धाम के जिस प्राथमिक विद्यालय नौहर हुसैनपुर में शौकत पढ़ाते थे के प्रधानाध्यापक राम प्रताप पटेल से एलआईयू के इस्पेक्टर ओपी पाण्डेय ने पूछतछ की। प्रधानाध्यापक से खास तौर पर आर्थिक स्थित, रहन-सहन, व्यवहार के बारे में पूछा गया। जब प्रधानाध्यापक ने कहा कि वो सामान्य रहन-सहन वाले व्यक्ति हैं और साइकिल से चलते हैं, मामूली मकान में रहते हैं तो एलआईयू इस्पेक्टर ने कहा कि आप सामान्य आदमी बता रहे हैं पर वो तो जाली नोट छापता है।
इन हालात में आस-पास के लोगों और स्कूल में अध्यापकों और छात्रों की निगाहों में शौकत अपने को दोषी मानने लगता है। हर नए चेहरे के सामने वह जवाब देने को तैयार हो उठता है। क्योंकि जब न तब कोई भी दरवाजे की कुंडी खटका देता और देर तक उससे पूछताछ के नाम पर एक लंबी खामोशी के लिए उसे तैयार कर चला जाता। भारतीय नागरिक से ज्यादा भारतीय मुसलमान होने के संकट से जूझ रहा शौकत देश की सुरक्षा के नाम पर जवाब दर जवाब देता रहा। पर उसे संदेह रहता था कि उसके हर जवाब से उसे किसी बड़ी साजिश में फसाने के सबूत गढ़े जा रहे हैं।
शौकत बताते हैं कि सितम्बर-अक्टूबर 2008 के तकरीबन एक दिन यूपीएटीएस के लोग मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे कहा कि प्रतापगढ़ की रानीगंज तहसील में एक आदमी तलहा अब्दाली रहता था। क्या तुम उसे जानते थे? मैंने अपनी जानकारी के अनुसार उन्हें बता दिया कि उससे मेरी मुलाकात को एक अरसा हो गया है। उससे पहली बार मेरी मुलाकात 98-99 के तकरीबन रानीगंज ईद मिलन समारोह में हुई थी। उसके बाद कभी कभार रानीगंज बाजार और प्रतापगढ़ शहर आते जाते उससे कभी-कभार मुलाकात हुई। उसके बाद लंबे समय से मेरी उससे कोई मुलाकात नहीं हुई। इसके बाद यूपीएटीएस के लोगों ने कहा कि हम तलहा को खोज रहे हैं अगर कोई जानकारी मिले तो हमें बताना। उन लोगों ने कहा कि तलहा प्रतापगढ़ के किसी स्कूल में अभी भी पढ़ाता है और साथ ही कहा कि वह तुम्हारे सम्पर्क में है। मैंने उनसे तलहा से किसी भी प्रकार के सम्पर्क और सम्बन्ध से इनकार कर दिया।
तलहा के बारे में पूछताछ का यह सिलसिला कईयों के साथ हुआ और हो भी रहा है। दरअसल, तलहा हो या फिर पिछले दिनों चर्चा में रहे यासीन भटकल उर्फ इमरान उर्फ शाहरुख और न जाने कौन-कौन ये सब खूफिया थ्योरी के क्रिएशन हैं। जिनको खूफिया खुद प्लांट करती है और उसके बाद उनके पीछे-पीछे अपनी जांच की फर्जी पटकथा रचती है। शौकत को फांसने की पटकथा भी इसी से मिलती-जुलती है।
प्रतापगढ़ की एसओजी में रहे हेमंत भूषण जब एटीएस में गए तो फरवरी-मार्च 2009 में फिर से वे तलहा की तफ्तीश में शौकत से मिले। शौकत बताते हैं कि वो कहते थे कि वे पूर्वांचल के एटीएस इन्चार्ज हो गए हैं। हेमन्त भूषण ने मुझसे कहा कि हमें लंबे समय से तलहा अब्दाली की तलाश है। क्या तुम्हारे पास उसका कोई फोटो है? मेरे मना करने के बाद कि मेरे पास उसका कोई फोटो नहीं है उन्होंने कहा कि वह देश की सुरक्षा के लिए एक खतरनाक व्यक्ति है। मुझसे उन्होंने पूछा कि कहां का रहने वाला था, तलहा अब्दाली? तो मैंने कहा कि उसने अपने बारे में बताया था कि वो बाराबंकी का रहने वाला है। इस बात पर हेमंत ने कहा कि नहीं वो सीतापुर का रहने वाला है। मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम। हेमन्त ने कहा कि आप को हमारा सहयोग करना चाहिए और कहीं से उसकी फोटो और जो भी जानकारी उपलब्ध हो सके उसे हमें बताएं। इसके बाद उनके साथ आए एक सिपाही से हेमन्त भूषण के सामने ही तय हुआ कि मैं अगले दिन रानीगंज क्षेत्र जाकर जिन लोगों से भी जानकारी प्राप्त हो सकती है, उन्हें प्राप्त कराऊं। उस दरम्यान 2009 लोकसभा चुनाव का दौर चल रहा था। मैंने रानीगंज पहुंचकर हेमन्त भूषण के सहयोगी एटीएस के सिपाही को फोन किया कि मैं रानीगंज आ गया हूं, आप आ जाइए। इस पर एटीएस के सिपाही ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप अकेले क्यों चले गए? साथ चलने की बात हुई थी जब। तो मैंने कहा कि यहां आकर जानकारी ही आपको इक्ट्ठा करनी थी तो मैंने सोचा कि मैं जब यहां आया हूं तो आपका भी यह काम कर दूं। इस पर उसने जानकारियों में कोई दिलचस्पी न दिखाते हुए कहा कि आप ही इक्ट्ठा कर लो। और आगे से साथ चलने को कहा जाय तो साथ ही चला करो।
दरअसल, यहां जानकारियां इकट्ठा करने की फिराक में एटीएस नहीं थी वो शौकत को कर्ही अनजान जगह से उठाने की फिराक में थी। क्योंकि जिस दिन शौकत को एटीएस अकेले बुलाने का यह प्रपंच कर रही थी, उसी दिन इलाहबाद के आमिर महफूज के भाई आरिफ महफूज को भी इलाहाबाद में उठाया था। पर पूर्व निर्धारित पटकथा में शौकत के अकेले जाने की हरकत ने पुलिस को एक कदम पीछे हटने को मजबूर किया और उसने आरिफ महफूज को भी छोड़ दिया।
शौकत बताते हैं कि बाद में एटीएस अधिकारी हेमन्त भूषण का फोन आया कि मैं उनसे इलाहाबाद या लखनऊ आकर मिलूं। पर मैंने मना कर दिया कि जब मैं आपसे बात कर लेता हूं और जिस वक्त भी आप कहते हैं तो ऐसे में मेरा कहीं दूसरी जगह आने का क्या मतलब है। हेमंत बार-बार मुझे घर से कहीं दूर बुलाने की कोशिश करता। पर मैंने एटीएस के बारे में जिस तरह सुन रखा था, वैसे में मैं कहीं दूसरी जगह अकेले में एटीएस वालों से मिलना मुनासिब नहीं समझता था।
एटीएस के हेमन्त भूषण से इस मुलाकात के दस-पन्द्रह दिन बाद ही शौकत की पत्नी फरीदा महजबीन द्वारा संचालित स्कूल शहपर पब्लिक स्कूल, आजादनगर प्रतापगढ़ में शौकत के नाम से एक कोरियर आया। इस कोरियर को भेजने वाले का नाम तलहा अब्दाली था और यह कोरियर इलाहाबाद से भेजा गया था। जिस पर बाराबंकी का पता लिखा था। शौकत बताते हैं कि इस कोरियर में एक उर्दू भाषा में लिखा पत्र था जो मेरे नाम से संबोधित था। जिसमें लिखा था कि मुझे लश्कर-ए-तैयबा का एरिया कमाण्डर बना दिया गया है, आपके स्कूल में असलहे छिपा दिए गए हैं। इस पत्र में एक महत्वपूर्ण बात के रुप में यह लिखा था कि खवातीन (महिला) की विंग भी कायम हो चुकी है। यह पत्र मिलने के साथ ही आप अपना काम शुरु कर दीजिए।
इस पत्र के मिलने के बाद शौकत और उसका पूरा परिवार डर व दहशत में आ गया। दूसरे ही दिन शौकत ने जिलाधिकारी और एसपी को एक पत्र के माध्यम से इस पत्र के बारे में सूचित करते हुए इस पत्र की फोटो कापी नत्थी कर उन्हें प्रेषित कर दिया। इसके बाद शौकत को लगा कि एटीएस भी तलहा के बारे में पूछताछ कर रही है और उसके नाम से ही पत्र आया है तो ऐसे में एटीएस को सूचित कर देना चाहिए। शौकत ने एटीएस अधिकारी हेमंत भूषण को फोन किया और कोरियर आए पत्र का पूरा ब्योरा दिया। हेमन्त ने आकर शौकत से उस खत की मूल प्रति ले ली और कहा कि क्या जरुरत थी एसपी-डीएम को बताने की, मुझसे पहले बताया होता। चलो अब तो बता ही दिया, लेकिन अब जो भी हो पहले मुझे बताना। शौकत ने इसके बारे में एलआईयू को भी सूचित कर दिया था।
शौकत से इस पत्र के बारे में आईबी ने भी पूछताछ की। पर लंबे समय तक जब प्रशासनिक हल्के से को कोई जानकारी नहीं मिली तो उसने सूचना अधिकार के तहत एसपी कार्यालय से जानकारी मांगी। इतने गंभीर सवाल पर प्रतापगढ़ का एसपी कार्यालय शौकत को सूचना से वंचित रखा।
शौकत बताते हैं कि हेमन्त का मुझे लगातार फोन आता कि मुझसे डीआईजी साहब बात करना चाहते हैं, मैं आकर उनसे मिल लूं। मैंने हेमन्त से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि मेरी आठ साल की बच्ची हाजरा जो सेरिब्रल पालिसी से पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग है और उसकी देख-रेख के चलते मैं कहीं जा नहीं पाता हूं। ऐसे में जो भी बात करनी है आप मुझसे फोन पर बात कर लें। मैं कहीं नहीं आ पाउंगा। हेमन्त का बार-बार जोर रहता कि मैं घर से दूर कहीं उससे मुलाकात करुं।
यूपी एटीएस की इस आपराधिक पूछताछ में शौकत ने भाई वाहिद अली (25 वर्ष) को एक खतरनाक बीमारी की चपेट में जाते देखा। वो घर आने-जाने वाले व्यक्ति और अनजान व्यक्ति से डरने लगा। वो इस डर में कपड़े निकाल कर फेकना और इस तरह की तमाम पागलपन की हरकतें करने लगा है। जिसका इलाज उसने नूर मंजिल लाल बाग, लखनऊ में साइक्रेटिक के डाक्टर एस नायडू से करवाया। आज वो फिर से हो रही इस पूछताछ से परेशान हो रहा है। इस पूरी पूछताछ ने शौकत के पूरे पारिवारिक जीवन को तहस-नहस कर दिया है।
पर एटीएस कहां रुकने वाली थी। अक्टूबर 2009 में एटीएस अधिकारी हेमन्त भूषण 26/11 की बाम्बे की घटना का टेलीफोनिक टेप लेकर शौकत के विद्यालय नवहर हुसैनपुर आए। शौकत को टेप सुनाकर हेमंत ने पूछा कि क्या यह आवाज तलहा अब्दाली की है। तो शौकत ने कहा कि मेरी याददाश्त की हद तक तलहा अब्दाली की आवाज नहीं लगती। इस पर हेमन्त भूषण ने मुझसे कहा कि ‘आजकल वो इंडिया से बाहर है, हो सकता है उसकी आवाज बदल गई हो’। तो मैंने उनसे साफ कहा कि मैं आवाज पहचानने में असमर्थ हूं।
28 फरवरी 2012 को कुछ लोग आजमगढ़ एटीएस कहकर शौकत से मिले। शौकत बताते हैं कि वो लोग बीआरसी शीतलागंज जहां पर मेरा विभागीय प्रशिक्षण चल रहा था वहां आए पहले आकर उन्होंने मुझसे सिमी के बारे में और उनके लोगों के बारे में पूछताछ की। उसके बाद उन लोगों ने तलहा के बारे में पूछताछ की कि वह प्रतापगढ़ कब आया कब तक रहा। वहां पर किन-किन लोगों से उसके सम्बन्ध और रहे। रानीगंज के अब्दुल कादिर अंसारी के बारे में तफसील से पूछताछ की और उसके घर के लोकेशन के बारे में पूछा। जो व्यक्ति मुझसे प्रमुख रुप से बात कर रहा था उस व्यक्ति का नाम अश्वनी था, जो घंटो की बातचीत में कुछ बात करने के बाद फोन पर दूर हट कर बात करने लगता। उनका प्रयास था कि मैं उनके साथ चलूं। लेकिन मैंने उनके साथ चलने के उनके प्रस्ताव को टाल दिया।
शौकत बताते हैं कि 12 मई 2012 को लखनऊ एटीएस के नाम पर कुछ लोग फिर उसके घर आए। उन्होंने बताया कि वे रानीगंज से होकर आए हैं। जहां तलहा अब्दाली रहता था। उन्होंने बहुत सारे नाम पूछ-पूछकर मुझसे उनके बारे में जानना चाहा। जो नाम मुझे याद है वो कुछ इस तरह के थे- शाहबाज (भदोही), अब्दुल कयूम (लखीमपुर खीरी), खालिद (आजमगढ़), इस्माल, रियाज भटकल आदि। इन बातों में एक खास बात यह रही की उन्होंने शहबाज के बारे में पूछते हुए कहा कि शहबाज लश्कर वाला और फिर उन्होंने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा कि आप भी तो लश्कर के ही हैं न? उन्होंने मुझसे पूछा कि आप को मालूम है, तलहा पकड़ा गया? जब मैंने कहा कि नहीं तो उन लोगों ने कहा हम ही ने पकड़ा है, कोई बच नहीं पाएगा। मुझसे मेरी फोटो मांगी जब मैंने कहा कि नहीं है तो उन लोगों ने मोबाइल से मेरी फोटो खींची। उन लोगों ने मेरे पूरे परिवार की डिटेल ली। जाते-जाते कहा कि जरुरत पड़ी तो आपको लखनऊ एटीएस आॅफिस बुलाया जाएगा।
अब शतरंज की इस आतंकी बिसात पर शौकत एटीएस का एक मोहरा है, जिसे वो कभी भी चल देना चाहती है। इसी तरह सीतापुर के रहने वाले शकील से भी लंबे समय तक पूछताछ कर उस पर आतंकवाद का आरोप लगा दिया। यहां गौर करने की बात है कि शकील को फरवरी में गिरफ्तार किया और उसी दरम्यान शौकत पर भी एटीएस का शिकंजा फिर से मजबूत हुआ। दूसरे कि शकील को 12 मई 2012 को दिल्ली एटीएस ने दुबग्गा लखनऊ से उठाया और उसी दिन यूपी एटीएस जो शकील की गिरफ्तारी से पल्ला झाड़ रही है वो शौकत के घर गई। अब सवाल तलहा अब्दाली का है कि आखिर वो कौन है तो इसका जवाब भी एटीएस के हेमंत ने शौकत को फरवरी-मार्च 2009 के तकरीबन ही दे दिया था। जब हेमंत ने शौकत से पूछा कि तलहा कहां का है तो उसने बताया कि बाराबंकी का तो हेमंत ने कहा कि नहीं सीतापुर। अब हो न हो यह पूरी खूफिया थ्योरी बशीर पर आकर टिकती है। बशीर, शकील का बहनोई है और उसे 5 फरवरी 2012 को उन्नाव से उठाया गया था, जो बाराबंकी का रहने वाला है और सीतापुर में लंबे समय तक रहा है।
यहां अहम सवाल यह है कि अगर तलहा अब्दाली हो या फिर कोई और जब वह गिरफ्तार कर लिया गया तो शौकत से किस तरह की पूछताछ? शौकत कहते हैं कि मैं चाहता हूं की सरकार सालों-साल से चल रही मेरी इस पूछताछ की जांच करवाए। इसने मेरे पूरे परिवार को तबाह कर दिया। मैंने देश की सुरक्षा के सवाल पर उनकी हर स्तर पर मदद की। पर आज मैं जब स्कूल में अपने बच्चों के सामने खड़ा होता हूं तो नजर नहीं मिला पाता हूं। क्योंकि जब न तब एटीएस के लोग मेरे स्कूल में आ धमकते हैं। मैंने इस चुप्पी में अपने भाई के पागलपन को देखा है कि किस तरह वो हर नई आहट से डर जाता है।
शौकत की इस दास्तान को सुनते-सुनते रात के दस बज गए। हमने उनसे कहा कि इतनी रात कहां जाएंगे। तो शौकत का जवाब था, बेटी परेशान होगी, मेरी पत्नी को भी पैरों से दिक्कत है?

14 मार्च 2012

काज़मी केस: आतंकवाद का नया फॉर्मूला


-दिलीप खान

बीते एक दशक से आतंकवाद को लेकर खुफ़िया एजेंसियों के बीच दुनिया भर में तमाम प्रयोग हो रहे हैं। भारत में इस आधार पर 9/11 के बाद के समय को तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है। पहले भाग में वह दौर है जब किसी भी बम विस्फ़ोट के बाद पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। इसमें सब कुछ पाकिस्तानी इशारों पर देश में घटित होता है। पाकिस्तान से आतंकवादी आते हैं, बम फोड़कर चले जाते हैं या फिर पुलिस की गिरफ़्त में आ जाते हैं। जिन मामलों में कोई सबूत नहीं मिलते उसमें मीडिया पाकिस्तान की ओर उंगली उठाना शुरू कर देता है और पुलिस और ख़ुफिया महकमों में मीडिया ख़बरों के आधार पर पाकिस्तान पर दोष मढा जाता है। फिर पुलिस के हवाले से आई ख़बर को मीडिया प्रमाणिकता के साथ लोगों के बीच पेश करता है।

26/11 के बाद यह दौर सुस्त पड़ गया, लेकिन अब भी पाकिस्तान निशाने में नंबर वन है। दूसरा दौर 2008 के आस-पास शुरू होता है और इसमें विदेश से आए आतंकवादी की जगह ‘होम ग्रोन टेररिस्ट’ ले लेते हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन नाम का एक ख़ौफ़नाक आतंकी संगठन ज़्यादातर बम विस्फोट को अंजाम देता है। जयपुर धमाके में पहली बार इस संगठन का नाम आता है। इस संगठन के साथ-साथ ही एक और संगठन अस्तित्व में आता है-हूजी। जयपुर और बंगलौर धमाके में इन दोनों के नाम लिए जाते हैं। कभी आईएम तो कभी हूजी। लेकिन बीते 9 (और उससे पहले के 3 यानी सभी) मामलों में हूजी को लेकर एक भी सबूत खुफिया एजेंसियां इकट्ठा नहीं कर पाई है। हूजी के अड्डे को लेकर खुफ़िया एजेंसी भी अभी तक साफ़ नहीं है कि इसका मुख्यालय कराची में है या ढाका में, लेकिन ये ज़रूर स्थापित किया जा रहा है कि आईएम और हूजी देश में आतंकवाद का जखीरा तैयार कर रहा है। बड़े पैमाने पर इन संगठनों के नाम पर देश में गिरफ़्तारियां हुईं। मालेगांव से लेकर मक्का मस्जिद तक, हर मामले में मुसलमानों को पकड़ा जाता है। (बाद में 2006 के मालेगांव मामले में 5 साल से ज़्यादा जेल काटने के बाद 7 लोगों को रिहा किया जाता है। उधर आंध्र प्रदेश सरकार अपनी ग़लती सुधारने के लिए चरित्र प्रमाणपत्र जारी कर लोगों को रिहा करती है और हर्जाना भी भरती है।)

मालेगांव विस्फोट मामले में फ़र्ज़ी गिरफ़्तारी के 5 साल बाद निर्दोष
करार दिए गए अभियुक्त

इसी दौर में एक नया खुलासा होता है। समझौता एक्सप्रेस में पाकिस्तानी हाथ होने का हल्ला मचाने वाला मीडिया और ख़ुफ़िया बाद में उससे मुकरते हैं और असीमानंद एंड कंपनी अपना जुर्म कबूल कर जेल जाती है। आंतरिक आतंकवाद का मामला बड़े स्तर पर हमारे बीच उपस्थित होता है। असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा जैसे उदाहरणों के बावजूद आतंकवादी के रूप में मोटे तौर पर मुस्लिमों को ही हमारे बीच पेश किया जाता है। ख़ुफ़िया एजेंसी आंतरिक आतंकवाद को इस समय विदेशी आतंकवाद से ज़्यादा बड़ा ख़तरा करार दे रहे हैं। ये दोनों दौर एक-दूसरे को ओवरलैप करते हुए चलते हैं लेकिन ट्रेंड में आ रहे अंतर को साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है।

लेकिन आतंकवाद के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर दुनिया में बहुचर्चित ओसामा-बिन-लादेन की प्रचारित हत्या के बाद देश में नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। अब आंतरिक आतंकवाद, पाकिस्तानी-बांग्लादेशी आतंकवाद के साथ-साथ भारतीय आतंकवाद के नेटवर्क को ‘वैश्विक इस्लामी आतंकवाद’ के साथ जोड़ने की कोशिश चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट बम विस्फोट में पहले हूजी और फिर आईएम का नाम आया और अब हिज़बुल मुजाहिद्दीन का नाम बताया जा रहा है। लेकिन शुरुआती दौर में दो स्कैच जारी करने के बाद इसकी जांच प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति नहीं देखी गई। स्कैच को लेकर भी एनआईए ने बाद में आपत्ति जाहिर की थी कि वो स्कैच ठीक नहीं है और नए खेप में स्कैच बनाने के लिए मुंबई से टीम बुलाई गई थी। हमेशा की तरह एनआईए सहित बाकी जांच एजेंसियों ने अब तक कोई ठोस सबूत हासिल नहीं किए हैं, लेकिन अपनी जांच-पड़ताल के समय ही खुफ़िया विभाग ने ये बारीक इशारा ज़रूर कर दिया था कि अब देश में आतंकवाद के नेटवर्क को कहां से जोड़ा जाएगा! हाई कोर्ट बम विस्फ़ोट में सबसे ज़्यादा एनआईए और मीडिया ने जिस बात पर ज़ोर दिया वो था विस्फोटक के तौर पर पीईटीएन का इस्तेमाल। पीईटीएन को अलक़ायदा के ट्रेड-मार्क के तौर पर सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफ़िया सहित पुलिस विभाग ने लोगों के बीच पेश किया। इस घटना के बाद भारत में आतंकवाद को पहली बार अलक़ायदा से सीधे-सीधे जोड़ा गया और इस तरह दुनिया में जिस आतंक के ख़िलाफ़ ‘वार ऑन टेरर’ छेड़ा गया है भारत के साथ उसका सिरा जुड़ जाता है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों में अलकायदा का जो भूत नाच रहा है वो अब भारत पर भी नाचने लगा। इस तरह इन देशों के बीच कुछ साझापन-सा बन गया है। इसके बाद दिल्ली में इज़रायली दूतावास के सामने कार में विस्फोट होता है। दिल्ली पुलिस की घोषणा से पहले ही इज़रायल ये घोषणा करता है कि इसमें ईरान का हाथ है। रॉयटर्स से ईरान को लेकर ख़बरें चलने लगती हैं। इसके ठीक एक दिन बाद बैंकॉक में तीन विस्फोट होते हैं। फिर ईरान का हाथ बताया जाता है। इज़रायल-ईरान के रिश्तों पर मैं यहां सिर्फ़ एक वाक्य में चर्चा करूंगा कि नाभिकीय बम के बहाने ईरान पर अमेरिका और इज़रायल उसी तरह आक्रमण करने के फिराक में है जिस तरह जैविक हथियार के बहाने इराक पर किया था। दिल्ली पुलिस ये बताती है कि कोई मोटरसाईकिल सवार कार से बम चिपकाकर भाग गया। फिर लाडो सराय से एक लाल बाईक पकड़ी जाती है। बाद में पुलिस कहती है कि वो ग़लत बाईक पकड़ ली थी।  
पत्रकार काज़मी की गिरफ़्तारी खुफिया विभाग के नए और ज़्यादा
ख़तरनाक फॉर्मूले की तरफ़ इशारा कर रहा है।

इसके बाद ख़बर आती है कि सीसीटीवी में किसी भी बाईक सवार को नहीं देखा गया। बाईक फॉर्मूले को पुलिस छोड़ देती है और फिर अचानक काज़मी को गिरफ़्तार करते समय पुलिस ये तर्क देती है कि काज़मी के घर से लावारिस स्कूटी बरामद हुई है। बाईक फॉर्मूले को पुलिस फिर से जीवित करती है जो सीसीटीवी वाली बात के मुताबिक झूठी है। जिन आरोपों के आधार पर काज़मी को पकड़ा गया उसकी चर्चा इससे पहले वाली रिपोर्ट में की जा चुकी है।

अब सवाल है कि काज़मी को गिरफ़्तार करने के पीछे क्या हित हो सकते हैं? असल में भारत इस समय सबसे ज़्यादा तेल ईरान से खरीद रहा है, जाहिर है ईरान के साथ भारत के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं इसलिए इस बम विस्फ़ोट को लेकर इज़रायली बयान के बाद गृह मंत्रालय ने ये सफ़ाई दी थी कि उसे ईरान के हाथ होने के सबूत नहीं मिले हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर भारत ईरान के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता। लेकिन भारत इज़रायल से सबसे ज़्यादा हथियार खरीदता है और अमेरिका के साथ अपने संबंध को हमेशा मधुर देखना चाहता है। जाहिर है दूसरे पक्ष को यह बिल्कुल इग्नोर नहीं कर सकता। तो खुफिया स्तर पर ‘जांच-पड़ताल’ के बाद काज़मी को पकड़ा गया।

काज़मी को गिरफ़्तार कर देश में पहली बार ‘ईरानी आतंकवाद’ के साथ सीधे संबंध को स्थापित किया जा रहा है। आतंकवाद को लेकर देश में ये सबसे नया ट्रेंड है। एक नए दौर की शुरुआत। ऐसे में राजनीतिक तौर पर भारत ईरान को ये जवाब देने की स्थिति में अब है कि ये तो खुफिया विभाग की कार्रवाई है और पूरा मामला राजनीतिक दबाव से मुक्त है। दूसरा, आतंकवाद और नक्सलवाद के नाम पर अब शहरी और शिक्षित लोगों को गिरफ़्तार करने की गति तेज हुई है और काज़मी भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। इस गिरफ़्तारी के बाद अब देश में ये तस्वीर बन गई कि भारत वैश्विक आतंकवाद के साथ सीधा जुड़ा हुआ है। इस स्थापना के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो अपनी वैश्विक पहुंच रखते हो और काज़मी इसके लिए उपयुक्त थे!