27 सितंबर 2011

हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है, मुसलमानों का कौन है?


भरतपुर हत्याकांड: प्राथमिक रिपोर्ट
जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के 11 छात्रों की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम राजस्थान के भरतपुर जिले में हुए गोपालगढ़ हत्याकांड के कारणों और घटनाक्रम का पता लगाने के लिए 25 सितंबर को गोपालगढ़ और आसपास के गांवों में गई. इस टीम में शामिल थे: अनिर्बान (डीएसयू, जेएनयू), अनुभव (डीएसयू, जेएनयू), आनंद के राज (जेएनयू), गोगोल (डीएसयू, जेएनयू), रेयाज (डीएसयू, जेएनयू), श्रीरूपा (जेएनयू), श्रिया (डीएसयू, जेएनयू), अदीद (सीएफआई), शोभन (डीएसयू, डीयू) और सुशील (डीएसयू, डीयू). इस दौरान हम चार गांवों में गए और हमने तीन दर्जन से अधिक लोगों से बात की. इस हत्याकांड में मारे गए लोगों के परिजनों, घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीद गवाहों और हत्याकांड में जीवित बच गए लोगों, घायलों और पीड़ित समुदाय के दूसरे अनेक सदस्यों से हुई बातों के आधार पर हम मुसलिम समुदाय पर प्रशासन के पूरे संरक्षण में हुए इस सांप्रदायिक फासीवादी हमले की आरंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं. आगे हम एक विस्तृत रिपोर्ट भी जारी करेंगे.

गोपालगढ़ के लिए रवाना होते समय हमारे पास इस हत्याकांड से जुड़ी जानकारियां सीमित थीं. अखबारों और दूसरे समाचार माध्यमों को देखते हुए लगा कि इस हत्याकांड के खबरों को जान-बूझ कर छुपाया जा रहा है. जिन कुछेक अखबारों में इसकी खबरें आईं भी, वो आधी-अधूरी ही नहीं थीं, बल्कि उनमें घटनाओं को पुलिस और सरकार के नजरिए से पेश किया गया था. इसने पीड़ितों को अपराधियों के रूप में और अपराधियों को पीड़ितों के रूप में लोगों के सामने रखा. केवल एक अंगरेजी अखबार ने कुछ खबरें प्रकाशित की थीं, जिनमें पीड़ित मुसलिम समुदाय का पक्ष जानने की कोशिश की गई थी और इस हत्याकांड के पीछे की असली ताकतों के संकेत दिए गए थे.
ये संकेत तब नामों और चेहरों में बदल गए जब हम भरतपुर जिले में दाखिल हुए. जिले के पापरा, जोतरू हल्ला (अंधवाड़ी), ठेकरी, हुजरा, पिपरौली आदि गांवों और गोपालगढ़ कस्बे के पीड़ित मुसलिम समुदाय के लोगों ने एक के बाद एक जो कहानियां बताईं वो एक बार फिर भारतीय राज्य के फासीवादी चरित्र को सामने ले आती हैं और राज्य के साथ गुर्जर तबके की सामंती ताकतों तथा आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तालमेल को साबित करती हैं.
घटनाक्रम की शुरुआत 13 सितंबर से हुई. गोपालगढ़ कस्बे में करीब 50 घर मुसलिम परिवारों के हैं, जिनमें से अधिकतर मेव हैं. इस समुदाय की लगभग साढ़े ग्यारह बीघे जमीन के एक टुकड़े पर आपस में लगी हुई एक मसजिद है, ईदगाह है और कब्रिस्तान की जमीन है. मसजिद और ईदगाह पर पक्का निर्माण है, जबकि कब्रिस्तान की जमीन पर फिलहाल कोई निर्माण नहीं है. 1928 से यह वक्फ की संपत्ति है और कम से कम 40 साल पहले इस जमीन के एक टुकड़े को कब्रिस्तान घोषित किया गया था. लेकिन इस जमीन पर स्थानीय गुर्जर समुदाय के एक सदस्य और गोपालगढ़ के सरपंच ने बार-बार गैरकानूनी रूप से कब्जा करने की कोशिश की है. मेव मुसलिमों की तरफ से यह मामला दो बार स्थानीय एसडीएम अदालत में ले जाया गया, जहां से दोनों बार फैसला मुसलिम समुदाय के पक्ष में आया है. 12 सितंबर को एसडीएम अदालत ने सरपंच को यह जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, जिसके बाद मसजिद के इमाम हाफिज अब्दुल राशीद और मसजिद कमेटी के दो और सदस्य सरपंच के पास इस जमीन को खाली करने के लिए कहने गए. इस पर सरपंच और दूसरे स्थानीय गुर्जरों ने मिल कर तीनों को बुरी तरह पीटा.
इमाम और कमेटी पर हमले की इस खबर से मुसलिम समुदाय में आक्रोश की लहर दौड़ गई. उस रात को जब मेव मुसलिम इस विवाद को अगले दिन की पंचायत में बातचीत के जरिए सुलझाने की तैयारियां कर रहे थे, उस रात गोपालगढ़ में भरतपुर से कम से कम दो सौ आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता गुर्जरों के जमा हो रहे थे. उन्होंने आसपास के अनेक गांवों से गुर्जरों को अगले दिन गोपालगढ़ आने के निर्देश दिए. अगले दिन 14 सितंबर को जब इस मामले के निबटाने के लिए स्थानीय थाने में दो विधायक और दोनों समुदायों के लोग जमा हुए तो केरवा, भैंसोड़ा, बुराना, बुरानी, पहाड़ी, पांडे का बयाना, बरखेड़ा, बौड़ोली और नावदा के गुर्जर आरएसएस कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में गोपालगढ़ को एक तरह से अपने कब्जे में कर चुके थे. उन्होंने सड़कों पर पहरे लगा दिए थे और लोगों को कस्बे में आना-जाना रोकने लगे थे. उधर बैठक में दोनों समुदायों के जिन दो प्रतिनिधियों के ऊपर फैसला लेने की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने यह फैसला किया कि जमीन पर उसी समुदाय का अधिकार है, जिसके नाम रेकार्ड में यह जमीन दर्ज है. इस पर भी सहमति बनती दिखी कि कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे के लिए दोषी व्यक्ति मेवों से माफी मांगें. लेकिन यहीं कुछ गुर्जरों और आरएसएस के लोगों ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने थाने की कुरसियों और दूसरे सामान की तोड़फोड़ शुरू कर दी. मीटिंग में मौजूद अनेक प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आरएसएस के लोगों और गुर्जरों ने मीटिंग में मौजूद भरतपुर के डीएम और एसपी के साथ धक्का-मुक्की की और कॉलर पकड़ कर पुलिस को मुसलिमों के ऊपर फायरिंग का आदेश दिलवाया.
मीटिंग आखिरी दौर में थी, जब पूरे गोपालगढ़ कस्बे में फैले आरएसएस, विहिप, बजरंग दल और गुर्जर समुदाय के हथियारबंद लोग मुसलिम मुहल्ले पर हमला कर रहे थे. चुन-चुन कर मुसलिमों की दुकानों को लूट कर आग लगा दिया गया. उनके घरों के ताले तोड़ कर सामान लूट लिए गए. इस वक्त सारे मर्द या तो थाने में चल रही मीटिंग में थे या मसजिद में, इसलिए महिलाएं भीतर के घरों में एक जगह जमा हो गई थीं. इस घर से लगी छत पर चढ़ कर हमलावरों ने महिलाओं के ऊपर भारी पथराव किया. इस घर में 11 दिन बाद भी बिखरे हुए पत्थर पड़े थे और पथराव के निशान मौजूद थे. हमलावर भीड़ एक-एक करके मुसलिम घरों से सामान लूटती रही और उनकी संपत्ति बरबाद करती रही. यह लूट अभी अगले तीन दिनों तक चलनेवाली थी और इसमें इमाम अब्दुल रशीद, अली शेर, अली हुसैम, डॉ खुर्शीद, नूर मुहम्मद, इसहाक और उम्मी समेत तमाम मुसलिम घरों को तबाह कर दिया जानेवाला था.
दोपहर ढल रही थी और असर की नमाज का वक्त हो रहा था. आस-पास के गांवों के लोग गोपालगढ़ में सामान खरीदने के लिए आते हैं. नमाज का वक्त होते ही स्थानीय मुसलिम बाशिंदे और खरीदारी करने आए लोग मसजिद में जमा हुए. पिछले दो दिनों की घटनाओं की वजह से मसजिद में भीड़ थोड़ी ज्यादा ही थी. पिपरौली गांव के इलियास इसकी एक और वजह बताते हैं. उनके मुताबिक कस्बे में तब यह खबर भी थी कि गुर्जर और आरएसएस-विहिप-बजरंग दल के लोग पुलिस के साथ मिल कर मसजिद तोड़ने आनेवाले हैं. मसजिद में उस वक्त कम से कम 200 लोग मौजूद थे (कुछ लोग यह संख्या 500 से हजार तक बता रहे थे). जोतरू हल्ला के 35 वर्षीय सपात खान उनमें से एक थे. उन्हें याद है कि उन्होंने नमाज पढ़नी शुरू ही की थी कि मसजिद पर फायरिंग शुरू हुई.
पुलिस का दंगा नियंत्रण वाहन मसजिद के ठीक सामने खड़ा हुआ और उसने मसजिद पर फायरिंग शुरू की. मसजिद से बाहर निकलने के दोनों दरवाजों पर गुर्जर और आरएसएस के लोग हथियारों के साथ खड़े थे. इसलिए मसजिद के भीतर घिरे लोग पीछे की तरफ की एक पतली दीवार तोड़ कर भागने लगे. सपात खान को भागने के क्रम में पांव में गोली लगी और वे गिर पड़े. उन्होंने करीब दस लोगों को गोलियों से जख्मी होकर दम तोड़ते देखा. फर्श पर पड़े हुए उन्होंने देखा कि गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गोलियों से जख्मी लोगों के पेट में लाठी और फरसा मार कर लोगों की जान ले रहे थे. फायरिंग रुकने के बाद जब दर्जनों लोग मसजिद की फर्श पर घायल और मरे हुए पड़े थे, तो उनके शरीर पर से गोलियों के निशान हटाने के लिए उनके हाथ-पांव काटे गए. घायलों को और लाशों को गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गाड़ी में लाद रहे थे. सपात खान भी उनमें से एक थे. गाड़ी में लादे जाने के बाद वे बेहोश हो गए. पांचवें दिन जब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को भरतपुर हॉस्पीटल में पाया. वे खुशकिस्मत रहे कि वे जिंदा जलाए जाने से बच गए. लेकिन पथरौली के शब्बीर, लिवाशने के इस्माइल, पिलसु के हमीद, ठेकरी के उमर, खटकरा के कालू खां, जोतरू हल्ला के ईसा खां उतने खुशकिस्मत नहीं थे. उनमें से कइयों को तेल छिड़क कर जिंदा जलाने की कोशिश की गई. ये सारे लोग जयपुर के सवाई मान सिंह हॉस्पीटल में अब तक भरती हैं. घायलों में से हत्याकांड के 11 दिन बाद 25 सितंबर को दम तोड़ा, जिस दिन हम गोपालगढ़ में मौजूद थे.
लेकिन मसजिद में मारे गए और घायल हुए कई लोगों को जला दिया गया. उन्हें मसजिद की सीढ़ियों से महज दस कदम दूर सरसों की सूखी लकड़ी पर रख कर जलाया गया. वहां अधजली हड्डियां, जूते और कपड़ों के टुकड़े पड़े हुए हैं. यहां से एक-डेढ़ किमी दूर एक जंगल में भी अधजली हड्डियां मिली हैं. मसजिद से सटी ईदगाह में एक कुआं है, जिसमें से घटना के तीन दिनों बाद तीन अधजली लाशें मिली थीं. कुएं के पत्थर पर जली हुई लाशों को घसीटने के निशान बारिश और 11 दिन बीत जाने के बावजूद बने हुए हैं. ईदगाह में लाशों को जलाने के लिए लाए गए डीजल से भरा एक टिन रखा हुआ है. आसपास के इलाके पर पुलिस का पहरा है. जिस मसजिद में यह हत्याकांड हुआ, उसमें पुलिस किसी को जाने की इजाजत नहीं दे रही है. लेकिन बाहर से भी साफ दिखता है कि मसजिद में कितनी तबाही हुई है. सारी चीजें टूटी हुई हैं और फर्श पर बिखरी पड़ी हैं. खून के निशानों को मिटाने की कोशिश की गई है. दीवार पर गोलियों के कम से कम 50 निशान मौजूद हैं, जिन्हें सीमेंट लगा कर भरा गया है. जाहिर है कि यह काम पुलिस या उसकी मरजी से किसी आदमी ने किए हैं. गौर करने की बात यह भी है कि घटना के बाद से मसजिद में मुसलमानों को घुसने नहीं दिया जा रहा है.
जिन्होंने पूरी घटना अपनी आंखों से देखी और मारे जाने से बच गए उनके मुताबिक हमले की सारी कार्रवाई इतनी व्यवस्थित और संगठित थी कि इससे साबित होता है कि इसकी योजना पहले से बनाई गई थी. गुर्जरों और आरएसएस की हत्यारी भीड़ का नेतृत्व गोपालगढ़ के आरएसएस नेता केशऋषि मास्टर, जवाहर सिंह (बेडम) और भोला गूजर (पहाड़ी) कर रहे थे. इसमें आरएसएस द्वारा संचालित एक आदर्श विद्यालय के शिक्षक भी लुटेरों के साथ शामिल थे, जिनकी पहचान उसी विद्यालय में पढ़नेवाले एक मुसलिम छात्र ने की. छठी कक्षा में पढ़ने वाले सखावत की नई साइकिल इस लुटेरी भीड़ ने छीन ली. वह उस शिक्षक को गुरुजी के नाम से जानता है.
घटना के बाद गोपालगढ़ के मुसलिम परिवार घर छोड़ कर अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं. अधिकतर घरों में कोई नहीं है. कुछ में ताला लगा है, लेकिन बाकी घरों के दरवाजे और कुंडियां गुर्जर-संघी लुटेरों ने उखाड़ ली हैं. जिस दिन हम गोपालगढ़ में थे, एकाध लोग अपने घरों की खबर लेने के लिए कस्बे में लौटे थे. गोपालगढ़ में कर्फ्यू रहता है लेकिन पिपरौली के इलियास बताते हैं कि यह कर्फ्यू सिर्फ मुसलमानों पर ही लागू होता है. कर्फ्यू के दौरान भी गुर्जर और आरएसएस के लोग खुलेआम कस्बे में घूमते हैं. वे यह देख कर इतने हताश थे कि वे पूछते हैं, हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है. मुसलमानों का कौन है?’
सरकार दावा कर रही है कि इस घटना में महज तीन लोग मारे गए हैं. लेकिन लोग बताते हैं कि कम से कम 20 लोग इस हमले में मारे गए हैं. उनमें से सारे मुसलिम हैं. जख्मी लोगों की संख्या भी लगभग इतनी ही है और वे सारे लोग भी मुसलिम हैं. इसके अलावा कम से कम तीन लोग लापता हैं. इनमें से दो हैं: ढौड़ कलां (फिरोजपुर झिरका) के मुहम्मद शौकीन और चुल्हौरा के अज्जू. इतने बड़े हत्याकांड को दो समुदायों के दंगा कह कर असली अपराधियों को बचाने की कोशिश की जा रही है. लोग पूछते हैं कि अगर यह दंगा था तो गुर्जरों और पुलिस की तरफ से कोई घायल तक क्यों नहीं हुआ. वे लोग जानते हैं कि हमलावरों में कौन लोग थे, लेकिन किसी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ है. उल्टे, लोगों की शिकायत है कि 600 मुसलमानों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हालांकि डीएम और एसपी का तबादला हो गया है, लेकिन लोग तबादलों से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी साफ मांग है कि मुसलमानों पर गोलियां चलाने वालों पर हत्या के मुकदमे दर्ज किए जाएं. इसको लेकर अंधवाड़ी में पिछले छह दिनों से धरना चल रहा है, जिसमें रोज लगभग आठ सौ से एक हजार लोग शामिल होते हैं.
मुसलिमों पर गुर्जरों का यह हमला कोई नई बात नहीं है. छोटे-मोटे हमले लगातार होते रहे हैं. यहां खेती आजीविका का मुख्य साधन है. मेव मुसलमानों की यहां खासी आबादी है, लेकिन उनमें से आधे से भी कम लोगों के पास जमीन है. जमीन का आकार भी औसतन दो से तीन बीघे है, जिसमें सिंचाई निजी बोरवेल से होती है. बाकी के मेव छोटे मोटे धंधे करते हैं, दुकान चलाते हैं और पहाड़ों पर पत्थर काटते हैं. गुर्जर यहां पारंपरिक रूप से जमीन के मालिक रहे हैं. उनके पास न केवल बड़ी जोतें हैं, बल्कि दूसरे कारोबारों पर भी उनका वर्चस्व है. खेती, इलाज और शादी वगैरह के खर्चों के लिए मेव अक्सर गुर्जरों से कर्ज लेते हैं, जिस पर उन्हें भारी ब्याज चुकाना पड़ता है (गांववालों ने बताया कि उन्हें चौगुनी रकम लौटानी पड़ती है). देर होने या नहीं चुका पाने पर अक्सर मुसलिमों-मेवों पर हमले किए जाते हैं- इसमें धमकाने, गाली देने से लेकर मार-पीट तक शामिल है. इस तरह जमीन का सवाल यहां एक अहम सवाल है.
इस नजरिए से गोपालगढ़ का हत्याकांड नया नहीं है. कानपुर, मेरठ, बंबई, सूरत...हर जगह अल्पसंख्यकों, मुसलमानों को उनके नाममात्र के संसाधनों से भी उजाड़ने और उनकी संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए प्रशासन, पुलिस और संघ गिरोह की तरफ से मिले-जुले हमले किए जाते रहे हैं, गोपालगढ़ उनमें सबसे ताजा हमला है. इसी जून में बिहार के फारबिसगंज में अपनी जमीन पर एक कंपनी के कब्जे का विरोध कर रहे मुसलमानों पर गोली चलाकर पुलिस ने चार मुसलिमों की हत्या कर दी थी और नीतीश सरकार के इशारों पर कारपोरेट मीडिया ने इस खबर को दबाने की भरपूर कोशिश की.
गोपालगढ़ में भी कारपोरेट मीडिया और सरकार ने तथ्यों को दबाने की कोशिश की. मिसाल के तौर पर इस तथ्य का जिक्र कहीं नहीं किया गया कि डीएम और दूसरे अधिकारियों द्वारा आरएसएस नेताओं के कहने पर गोली चलाने का आदेश दिए जाने के बाद पुलिस के शस्त्रागार को खोल दिया गया और पुलिस के साथ-साथ गुर्जरों और आरएसएस कार्यकर्ताओं को भी पुलिस के शस्त्रागार से आधुनिक हथियार दिए गए. मसजिद पर हुई गोलीबारी में पुलिस के हथियारों का उपयोग ही हुआ, लेकिन उन हथियारों को चलानेवालों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. यह दिखाता है कि इन तीनों ताकतों की आपस में कितनी मिलीभगत थी. इलाके के मेव शिक्षा और रोजगार में बहुत पिछड़े हुए हैं. सरकारी-गैर सरकारी नौकरियों में भी उनका हिस्सा नगण्य है. इसके उलट गुर्जर समुदाय के लौगों की नौकरियों में भरमार है. जिस पुलिस ने मेव लोगों पर हमला किया, उसमें बहुसंख्या गुर्जरों की ही थी और उसमें एक भी मुसलिम नहीं था. गुर्जरों के बीच आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों का काफी काम है और इसका असर पुलिसबलों पर भी साफ दिखता है. इसीलिए जब पुलिस मसजिद पर फायरिंग करने पहुंची तो उसकी कतारों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. जाहिर है कि यह दो समुदायों के बीच कोई दंगा का मामला नहीं है, जैसा कि इसे बताया जा रहा है, बल्कि गोपालगढ़ में हुई हत्याएं एक सुनियोजित हत्याकांड हैं.

(डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन की तरफ से जारी).

16 सितंबर 2011

एक दिन बंदूकों से पानी जरूर निकलेगा.

चन्द्रिका
शायद वहां मान्यताएं इतिहास से भी ज्यादा मजबूत हैं, वे ऐसी मान्यताएं हैं जिसने जीने और लड़ने की ललक पैदा की थी. ये सहज जिन्दगियों के लिए आसान रास्ते थे जिस पर चलकर वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उतर रहे थे. ऐसे अतीत में बीता हुआ इतिहास उनके लिए एक किस्सा है जिसे वे रोज दुहराते हैं और हर दुहराव के साथ यह थोड़ा बदल जाता है और हर बदलाव के साथ एक इतिहास टूट जाता है. आखिर इतिहास को दिनों और तारीखों में सजोने से क्या फ़ायदा. विस्मृतियां कई बार मनुष्य को मजबूत बनाती हैं जबकि स्मृतियां एक घायल इतिहास को लगातार ढोती रहती हैं. वे हर वक्त जिंदगी को कुरेदती है और कुढ़न पैदा करती हैं, कोई सीख देने के बजाय वे आतंकित करती हैं और एक डरावने स्वप्न की तरह गहरी नीदों में उतर आती हैं. विद्रोहों की कहानियों में जश्न और हताशा दोनों होती है पर विद्रोहों का रुख ही जश्न और हताशा में किसी एक के चेहरे को उभार देता है. रात दुहराती है अंधेरे को और अंधेरा पुत जाता है समय की पीठ पर, ठीक उसी अंधेरे के साथ नही बल्कि रात जाने कहां से हर रोज नया और इतना ढेर सारा अंधेरा लाती है. यहां घटनाएं एक कटे हुए पेड़ सरीखी हैं जिसमे से कई कोपलें निकल आई हैं ठीक पेड़ सरीखी पर जाने कितनी जिनकी पत्तियां, तने और आकार मिलते-जुलते लगते हैं. किसी एक घटना की कई-कई गाथाएं हैं हर बदली हुई आवाज एक नई गाथा पेश करती है. आसमान का रंग नीला है इसके अपने वैग्यानिक कारण हो सकते हैं पर यहां के लोगों के लिए इससे भी ज्यादा मौजू कारण यह हो सकता है कि ढेर सारे नील गायों ने आसमान पर अपनी पीठ रगड़ी है. ऐसे में विग्यान औंधे मुंह गिर पड़ता है. दण्डकारण्य के आदिवासियों के पास जंगल की कोई पुरानी आग है जिसकी रोशनी में वे एक नया स्वप्न देख रहे हैं. पर आंच है, आग है जिसमे वे झुलस भी रहे हैं.

सोड़ी दीपक का नाम कुछ और भी हो सकता है उन्हे अपनी उम्र तक का पता नही वे अपने उम्र का मापन आपकी आंखों पर छोड़ देते हैं. जिंदगी जीने का उम्र से कोई वास्ता हो सकता है क्या? शायद इसकी उन्हें जरूरत ही नहीं महसूस होती. क्योंकि वहां मौत उम्र और गुनाह पूंछ कर नहीं आती. अपनी जमीन पर जिंदा रहना ही उनका गुनाह हो सकता है, उनका गुनाह हो सकता है माओवादियों के सहयोग से बने तालाबों में मछली पकड़ना, उनका गुनाह हो सकता है कि अपने गांव मसले को फैसले में बदलना जो सब मिलजुल कर आपस में निबटा लेते हैं और वहां गुनाहों की लम्बी फेहरिस्त है, जहां आदिवासियों ने सरकार से अब उम्मीदें छोड़ दी हैं. सरकार से उम्मीदों के प्रबल दावेदार वे हैं जो इनकी जमीनों पर अपनी मशीने खड़ा करना चाहते हैं, जिनके लिए देश एक कच्चा माल है और देश का हर नागरिक संसाधन. शायद इस कच्चे माल को उन्हें खोदना है, पकाना है और राख की शक्ल में उसे फेंक देना है. लाल किले से १५ अगस्त को हर बार दुहराया जाने वाला प्रगति और विकास का कोई संदेस इन आदिवासियों के लिए नहीं होता. वे प्रधानमंत्री की जुबान में बस एक भयानक खतरे की तरह आते हैं और..... और एक दिन किसी नाले के किनारे उनकी लाश मिल सकती है या संभव है लाश भी न मिले. जिंदा पकड़े जाने पर वे उन छत्तीस वारदातों के दोषी हो सकते हैं जिन इलाकों को उन्होंने देखा तक नहीं. वे कई अनाम नामों के साथ महान गुनाहों की श्रेणी में शामिल हैं. यह नवम्बर २०१० के किसी घटना की स्मृति है जिसे सोडी दीपक साझा कर रहे हैं. इससे पहले की ढेर सारी स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं या शायद वे उसमे लौटना नहीं चाहते.

इस गांव की सबसे बुजुर्ग महिला बंजामी बुधरी के आंखों की रोशनी जा चुकी है, इसमे ७० साल का इतिहास था जिसे किसी कागज पर नहीं उतारा जा सका, जो अब बस जेहन में बचा है. उनके पास जंगलों में पूरे के पूरे गांव के टहलने के कई किस्से हैं. इसे पलायन नही कहा जा सकता, इन जंगलों में बसने वाले गांवों की जनसंख्या जब बढ़ जाती थी तो उनमे से कुछ घर उठकर थोड़ी दूर जाकर बस जाते थे. बंजामी ४० साल पहले गदरा, सुकमा के नजदीक किसी जगह से आकर आखिरी बार इस गांव में बसी थी और तब से यहां रह रही हैं. अब वे यहां से नहीं जाना चाहती, दो साल पहले उनका पोते की पुलिस ने हत्या कर दी है. वे बताती हैं कि वह तो बस पार्टी (माओवादी) वालों के साथ रहता था और सलवा-जुडुम के खिलाफ था.
दण्डकारण्य का एक बड़ा हिस्सा आज माओवादी आंदोलन के प्रभाव में है और राज्य का एक बड़ा तंत्र इसके चिंता के प्रभाव में. यहां माओवादी होना उतना ही सहज है जितना जंगल में पेड़ होना. सबके सब आदिवासी और सबके सब माओवादी. ये गांव मुरिया और कोया समुदाय का है जिसमे माओवादियों द्वारा नियुक्त एक अध्यापक तेलगू और हिन्दी दोनो जानता है. यहां कोई नहीं जानता कि वह कितना खतरनाक है, यह बात सिर्फ देश के प्रधान मंत्री को पता है जिसे वे बार-बार दुहराते रहते है.
इन सब बातों से अलग एक इतिहास है जो मिथक के साथ लगातार प्रभावी बना रहा है. पूर्ववर्ती विद्रोहों को इन मिथकों ने संबल दिया था. आदिवासियों का एक राजा जो कभी नहीं मारा गया.....विद्रोह का एक नायक जिसके शरीर पर आते ही बंदूक की गोलियां पानी में बदल जाती थी......आम की टहनियां जो गांवों में पहुंचते ही लड़ाई का आगाज कराती थी. ये अब मौखिक कहानी बन गये हैं, इससे अलग जिंदगी एकदम उलट गयी है. जबकि उनके गांव खाली कराये जा रहे हैं, उन्हें कैम्पों में ढकेला जा रहा है, उनके शिकार के लिए ग्रीन हंट चलाया जा रहा है और बंदूक की नालें उन पर तान दी गयी हैं. वे बंदूकें छीनकर उनकी नालें मोड़ना सीख चुके हैं. अब तक इन आदिवासियों को भारतीय राज्य सत्ता ने हमेशा एक ऐसे तत्व के रूप में देखा जो कभी किसी सत्ता के खांचे में फिट नहीं हो पाए. यह एक देशज असमानता का परिणाम था जहां हमेशा से इन पर साशन करने के ही बारे में सोचा गया और ये स्वसाशन के बारे मे सोचते रहे. विकास नाम की कोई चीज है जो इन तक कभी नहीं पहुंच पाई और जब भी वह इन तक आई इनके कई सारे विनाश को एक साथ लेकर. जिसमे उस संस्कृति का विनास, उस सामूहिकता का विनाश और उस जंगल का विनाश समाहित था, जहां वे अब तक जीते आ रहे थे. १९१० के भूमकाल और उसके पूर्व में हुए विद्रोहों ने हमेशा एक बाहरी व्यवस्था को थोपने की अस्वीकार्यता को प्रकट किया है. जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग छिड़ी तो आदिवासी यह सोच कर गोलियां खाते रहे कि उनका नायक गुंडाधुर कभी नहीं मारा जाएगा और गोलियां पानी में बदल जाएंगी, पर गोलियां पानी में नहीं बदली. वे चली और कुछ चीखें उठी, कुछ उनके बीच से हमेशा के लिए जाने कहां चले गए और फिर कभी लौटे. भारतीय सत्ता से पहली बार ६० के दशक में शुरु हुए राजा भंजदेव के नेतृत्व में भी यही मान्यता रही कि राजा को मारा नहीं जा सकता और पुलिस की गोली पानी में बदल जाएगी. भंजदेव की हत्या के बाद उन्हें कई वर्षों तक यह यकीन नहीं हुआ कि वह मारा जा चुका है और उसके तकरीबन १६ अवतार हुए जो यह दावा करते रहे कि वे राजा भंजदेव हैं. अब जबकि ८० के दशक में माओवादियों ने यहां प्रवेश किया और धीरे-धीरे वे इनमे घुले मिले उन्होने आदिवासियों के सहयोग से उनका जो विकास किया, उन्हें जिस तरह की व्यवस्था मुहैया कराई शायद वह उनके समाज के अनुरूप थी, वे इसे अपने समाज की व्यवस्था के रूप में स्वीकार्य कर चुके हैं. वर्तमान में दण्डकारन्य इलाके में माओवादियों ने जो बड़ा फर्क लाया है वह यह है कि उन्होंने अधिकांस स्थानीय व्यवस्था को वहां की स्थानीय लोगों के साथ जोड़ दिया है और वे माओवादी पार्टी के और वहां की जनताना-सरकार के तमाम पदों पर स्थित हो गए हैं...........जारी

12 सितंबर 2011

लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाए




----मानेसर से लौटकर दिलीप खान
पिछले 14 दिनों से लगातार (लगातार को लगातार ही पढ़ें) चल रहे भाषणों के बीच जब एकरसता-सी आ रही थी तो सड़क के उस पार एक बस से ज़ोर-ज़ोर से आ रही क्रांतिकारी नारों की आवाज़ ने मज़दूरों में कौतूहल जगा दी. पहले बस से उतरते कुछ पैर नीचे दिखे, फिर दो-एक चेहरे और फिर 50 से ज़्यादा ऐसे चेहरे जिसे देखकर मज़दूरों ने किलकारी मारनी शुरू कर दी. उनके हाथ में तख़्तियां थीं जिनमें मज़दूरों के समर्थन वाले हर्फ़ लिखे थे. सड़क के इस पार अब यह साफ़ हो गया था कि जेएनयू से यह बस आई है और मज़दूरों के इस सवाल पर वे उनका साथ देने आए हैं. बहुत देर तक तालियां बजती रही. फिर छात्र-मज़दूर एकता ज़िदाबाद के नारे. डीयू और जामिया से भी छात्र-छात्राओं के कुछ समूह वहां मौजूद थे. नौजवान से दिखने वाले मज़दूरों के उत्साही नेता सोनू गुज्जर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, जिस आंदोलन में स्टूडेंट घुस जाए. समझो वो लड़ाई जीत ली गई.मानेसर और गुड़गांव के बाकी कंपनियों के मज़दूर यूनियनों से मिलने वाले समर्थन के बाद दिल्ली के विश्वविद्यालयों से आ रहे विद्यार्थियों ने सबके भीतर उत्साह और जीत की नई उमंग भर दी.
सफ़ेद और लाल रंग के पंडाल के नीचे पिछले 14 दिनों से जमा मज़दूरों के लिए दिन के मायने ख़त्म हो गए हैं. 15, 16 या 17 महज एक संख्या है और वे इन्हें जीत के रास्ते में आने वाले पड़ाव की तरह देख रहे हैं. आईएमटी मानेसर में 750 एकड़ में फैले मारुति-सुजुकी के प्लांट के गेट संख्या 2 के ठीक सामने मज़दूरों के जमावड़े के बीच आप जाएंगे तो यक़ीन मानिए आप अपनी उस दकियानूसी धारणा से मुक्त हो जाएंगे कि दिन गुजरने के साथ उत्साह में गिरावट आती है. कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठानों ने पिछले कुछ वर्षों में इग्नोर करने को बड़े हथियार के तहत भांजा है. मारुति-सुजुकी भी उसी रास्ते मज़दूरों को हतोत्साहित करने की फिराक़ में है. प्रबंधन की तरफ़ से अब तक बातचीत की कोई पहल नहीं हुई है. लेकिन आईटीआई करने के बाद ऑटोमोबाइल कारखाना में नौकरी बजाने वाले सारे मज़दूर यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें इग्नोर नहीं किया जा रहा. वे ब्रांड, विज्ञापन और मार्केटिंग के फंडे को समझते हैं. पिछले चार सालों से कंपनी में काम करने वाले अजय कहते हैं, हां यह ज़रूर है कि वो (प्रबंधन) सीधे-सीधे हमसे बात करने अब तक नहीं आए हैं, लेकिन अख़बारों में वो लगातार अपना विज्ञापन बढ़ा रहे हैं. इससे यह साबित होता है कि उन पर दबाव है.
अजय की बात को बीच में ही काटते हुए विजय कहते हैं, ज़्यादातर मीडिया के जरिए ही हम कंपनी का पक्ष जान पाते हैं. दैनिक जागरण ने हमे बताया है कि सोमवार तक यदि हम लोगों ने प्रबंधन की मांग नहीं मानी तो स्थाई तौर पर हमें अंदर जाने से रोक दिया जाएगा. प्रबंधन की इन धमकियों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा और मज़दूरों के बीच तक़रीबन एक तयशुदा सहमति है कि यदि उनकी मौजूदा एकता क़ायम रही तो प्रबंधन उनका कुछ नहीं कर सकता. वे यह जानते हैं कि मालिक सिर्फ़ पूंजी के बदौलत उत्पादन नहीं कर सकते. उत्पादन के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ मेहनत और मज़दूरी होती है और वो मज़दूरों के पास है.
अगर आप कई सारे अख़बारों में आ रही ख़बरों के सहारे मानेसर को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो मानेसर को समझना छोड़ दीजिए. अख़बारों ने तो बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखा है कि मारूति-सुजुकी प्लांट में मज़दूरों का हड़ताल चल रहा है, लेकिन यह ख़बर पूरी तरह झूठी है. यहां कोई हड़ताल नहीं चल रहा. मज़दूर अपने लोकतांत्रिक शर्तों के साथ काम करने को तैयार हैं, लेकिन मारूति ने ख़ुद तालाबंदी कर रखी है. मारूति का कहना है कि गुड कंडक्ट फॉर्म को जो-जो मज़दूर भरेगा वो अंदर आकर काम शुरू करें और जो नहीं भरेगा उनके लिए यह दरवाज़ा बंद है. मज़दूर प्राथमिक तौर पर इसी गुड कंडक्ट फॉर्मके ख़िलाफ़ है और सड़क पर डटे हुए हैं.
इस गुड कंडक्ट फॉर्म के साथ-साथ मारूति-सुजुकी मज़दूर आंदोलन की संक्षिप्त कहानी से पहले मज़दूरों के उन मांगों को आप देख लीजिए जिनको पूरी करवाने के लिए वो आधे महीने से कंपनी के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और जिनको तोड़ने-मरोड़ने के लिए कंपनी मालिक से लेकर ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार तक के सुर एक हैं. ये चार मांगें हैं.-
11. 1. मारुति सुजुकी इंप्लाइज यूनियन बहाल की जाए
2.22. निकाले गए मज़दूरों को वापस लिया जाए
3. 33. सभी चार्ज शीट वापस लिए जाए
4.44 ग़ैरक़ानूनी तालाबंदी ख़त्म की जाए
पहली मांग काफी पुरानी है और मौजूदा गतिरोध की सबसे मज़बूत वजह है. दूसरी, तीसरी और चौथी मांग कंपनी द्वारा पहली मांग को ध्वस्त करने के लिए की गई कार्रवाई से उपजी हुई है. जून में जब यूनियन बनाने के लिए मज़दूरों ने अपनी मांग शुरू की तो मारुति सुजुकी प्रबंधन के कान खड़े हो गए. प्रबंधन एक-एक मज़दूर को अलग-अलग बुलाकर अनुशासन के नाम पर नौकरी छीनने की धमकी देने लगा. मज़दूरों से प्रबंधन का कहना था कि वो पहले से मौजूद यूनियन को ही वास्तविक यूनियन माने. असल में प्रबंधन चालित एक यूनियन कंपनी में पहले से अस्तित्व में थी/है, जिसमें चुनिंदा मज़दूरों को शामिल किया गया था और वे मज़दूर नीतियों का कम और प्रबंधन की नीतियों का ज़्यादा प्रचार करते है. फ़िलवक़्त चल रहे आंदोलन के बारे में भी मलाई काट रहे वास्तविक यूनियन से जुड़े नेताओं का मानना है कि कंपनी में अनुशासनहीनतानहीं चल सकती.
रेवाड़ी के रहने वाले मज़दूर आनंद हमें बताते हैं, उस वक़्त मज़दूरों से एक पेपर पर हस्ताक्षर करने कहा गया जिसमें यह लिखा था कि मज़दूरों की तरफ़ से किसी नई यूनियन की कोई मांग नहीं है और भविष्य में भी उनकी इस तरह की कोई मांग नहीं होगी. प्रबंधन के उस बाध्यकारी हस्ताक्षर अभियान के ख़िलाफ़ मारूति कामगारों ने मोर्चा खोल दिया. मज़दूरों ने सोनू गुज्जर को अपना नेता मानते हुए प्रबंधन की नीतियों का विरोध किया. परिणामस्वरूप कंपनी ने 11 लोगों को नौकरी से बाहर निकाल दिया. मज़दूरों के इस दमनकारी निष्काषण के विरोध में मज़दूरों ने बेहतरीन एकता का प्रमाण देते हुए हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया और 13 दिनों तक चली उस हड़ताल के बाद समझौता हुआ. सभी 11 लोगों को वापस लिया गया. कंपनी ने उस समय यह भरोसा दिलाया कि अब वो किसी मज़दूर को नहीं धमकाएगी और न ही किसी को बाहर का रास्ता दिखाएगी. ये सब जून की कहानी है. एक तरह से शुरुआती लड़ाई में मज़दूर जीत चुके थे, लेकिन सवाल जहां से शुरू हुआ था वह वहीं पर ठहरा हुआ था. सवाल था- मज़दूर हितों की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाली यूनियन का निर्माण! जून की टकराहट का नतीजा यह हुआ कि अब तक मशीन से बनी जली-कच्ची रोटियों और पतली दाल पहले के मुकाबले कुछ बेहतर हुई. हालांकि जेएनयू के एक छात्र से मज़दूर दिनेश सेठी का कहना था, आप विद्यार्थी लोग आज भी उस रोटी को ताकेंगे नहीं. आपके कॉलेज (विश्वविद्यालय) में उस तरह की रोटियां एक दिन भी बन जाए तो आप लोग ऐसी कैंटीन वाले को बाहर कर देंगे.’
यूनियन की मांग जारी रही और साथ में कंपनी प्रबंधन की तरफ से मिलने वाली धौंस भी. हमेशा की तरह एक दिन 7 बजे जब मज़दूर काम करने कंपनी पहुंचे तो कंपनी पूरी तरह बदली हुई दिख रही थी. भीतर-बाहर पुलिस और निजी सुरक्षा गार्ड से अटी हुई कंपनी. बाहर गेट पर एक फॉर्म के साथ तैनात सुरक्षा गार्ड- जो मज़दूरों को यह हिदायत दे रहा है कि जो इस गुड कंडक्ट फॉर्मको भरेगा वही काम करने अंदर जाएगा. मज़दूरों ने वह फॉर्म भरने से इंकार कर दिया. बैठक हुई और सोनू गुज्जर के नेतृत्व में सबने यह फैसला किया कि न तो यूनियन की मांग छोड़ेंगे और न ही यह फॉर्म भरेंगे और न ही कंपनी छोड़ के जाएंगे. यशवंत प्रजापति कहते हैं, वह फॉर्म मज़दूर हितों के साथ बड़ा धोखा है. उसमें कंपनी कहती है कि मज़दूर कोई कंपनी विरोधी काम नहीं करेगा. प्रबंधन के साथ सही आचरण रखेगा......हां सही आचरण क्या है यह कंपनी ही तय करेगी.
मारुति सुज़ुकी इस तालाबंदी के लिए पहले से माहौल बना रही थी. कुछ दिन पहले से ही वह लगातार मज़दूरों को धमका रही थी कि वो जानबूझकर काम ठीक से नहीं कर रहे हैं और सुपरवाइजर उनके कामों में लगातार खोट निकाल रहे थे. मज़दूरों का दावा है कि कंपनी जान-बूझ कर मैटिरियल में कमी लाई और मज़दूरों पर यह आरोप लगाया कि वे सुस्त गति से और सोच-समझकर ख़राब उत्पादन कर रहे हैं. इसी को आधार बनाते हुए कंपनी धीरे-धीरे मज़दूरों को बाहर करने लगी. निकाले गए मज़दूरों की संख्या अब तक 57 हो गई है. तालाबंदी के बाद भी कंपनी द्वारा मज़दूरों का निकाला जाना जारी है.
प्रदर्शन स्थल पर जिला प्रशासन और लेबर कमीशन के लोग स्थिति का जायजा लेने आए, लेकिन उनकी पक्षधरता साफ़ थी. सोनू गुज्जर ने लेबर कमिश्नर के साथ हुई बातचीत का मजमून रखते हुए कहा कि उन्होंने निकाले गए 57 मज़दूरों को पहले बिल्कुल भूल जाने को कहा, लेकिन बाद में कहा कि छह माह बाद निकाले गए मज़दूरों को वापस लिए जाने पर विचार किया जाएगा. उन्होंने यह भी समझाइश दी कि यूनियन बनाकर क्या होगा, पहले से मौजूद यूनियन के बैनर तले ही वे अपनी मांगों को मज़बूती से रखे. सोनू गुज्जर के साथ बातचीत से पहले लेबर कमिश्नर को शायद यह तथ्य पता नहीं होगा कि बीते 16 जुलाई को पुरानी यूनियन का चुनाव हुआ था और 2500 मज़दूर संख्या वाली इस कंपनी में 20 से भी कम लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया. प्रबंधन वाली यूनियन की असलियत ऊघर के सामने आ गई है.
राज्य सरकार को मारुति ने धमकाया है कि अगर समाधान उनके पक्ष में नहीं रहता है तो वे प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे. मुख्यमंत्री हुड्डा साहब इस धमकी से घबराए हुए हैं. लेकिन, मारुति सुज़ुकी की पिछली कुछ घोषणाओं और कामों पर नज़र दौड़ाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि उनकी धमकी में बहुत दम नहीं है. मारुति ने मानेसर में इस प्लांट के अलावा दो और नए प्लांट पर काम करना शुरू कर दिया है. कुछ दिन पहले तक गुड़गांव वाले प्लांट को भी वे मानेसर लाने की बात कह रहे थे. वह सिर्फ मज़दूर हड़ताल की वजह से गुजरात नहीं भाग सकती. यह दबाव बनाने का प्रोपगैंडा है. सोनू गुज्जर इस प्रचार की असलियत जानते हैं, कंपनी कोई थाली नहीं है कि हाथ में उठाए और बस में सवार होकर गुजरात चल दिए. कंपनी कंपनी होती है.
यूनियन बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मारुति के भीतर जो स्थिति थी उससे निजात पाने के लिए इसका गठन होना बहुत ज़रूरी हो चला था. चार्ली चैपलिन की मॉडर्न टाइम्स जिसने देखी है वो कंपनी के भीतर काम करने के तरीके को बेहतर समझ पाएंगे. एक मज़दूर अपना पसीना पोछने के लिए हाथ उठाए तो चलती पट्टी के दो नट-वोल्ट कसने बच जाएंगे और उस दो-तीन सेकेंड की भरपाई में उसे तेजी से हाथ-पैर मारने होंगे. मारुति सुजुकी हर 45 सेकेंड में एक कार तैयार करती है. दिनभर में यहां 1200 कारें बनती हैं. मज़दूरों को दो बार चाय पीने के लिए 7-7 मिनट का वक़्त मिलता है, जिसमें उन्हें हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और मशीनी औज़ार स्टोर में रखने भी होते हैं, फिर पंचिंग कार्ड के जरिए कैंटीन भी जाना होता है फिर कतार में खड़े होकर चाय भी लेनी होती है, पीनी भी होती है और फिर हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और तमाम लाव-लश्कर से लैश होकर काम शुरू कर देना होता है. इसमे एक सेकेंड की भी देरी बर्दाश्त नहीं है. याद कीजिए कि मॉडर्न टाइम्स में जब चार्ली को बीड़ी पीने की तलब होती है और वो छुपकर बीड़ी सुलगाता है तो सामने स्क्रीन पर उसका मैनेजर उसे रंगे हाथों पकड़ लेता है और ज़ोर से फटकारता है. बिल्कुल यही माहौल मारुति के भीतर भी है. लंच के लिए आधा घंटा दिया जाता है.
काम दो शिफ्ट में होता है. सुबह 7.30 से शाम 3.45 तक पहला शिफ्ट और शाम 3.45 से लेकर रात 12.30 तक दूसरा शिफ्ट. अगर मज़दूर 7.31 बजे सुबह पहुंचा तो उसका हाफ डे लग जाएगा. रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति मज़दूरों को बताता है कि चूंकि पंचिंग कार्ड के जरिए अंदर आने और जाने का वक़्त नोट किया जाता है इसलिए एक सेकेंड की भी देरी होने पर कंप्यूटर उसे पकड़ लेता है और देरी से आने का खामियाजा मज़दूरों को भुगतना पड़ता है. कितनी मासूम दलील है! मशीन का अपने पक्ष में इस्तेमाल की इस बानगी के क्या कहने! एक दूसरा पक्ष सोचते हैं. पिछले कुछ महीनों की लड़ाई के बाद कंपनी में यह नियम बना कि मज़दूरों को ला रही बस में अगर देरी होती है तो उस देरी को कन्सीडर नहीं किया जाएगा. बस लेट होने पर भी मज़दूर पंचिंग कार्ड के जरिए ही अंदर जाते हैं और कंप्यूटर में ही वो समय भी दर्ज होता है. कंप्यूटर इस देरी को नहीं पकड़ता? प्रबंधन की बेईमान व्याख्या की यह एक नज़ीर मात्र है. बस में होने वाली देरी का भी कंपनी खामियाजा वसूलती है, लेकिन भुक्तभोगी पहले शिफ्ट में काम कर रहे मज़दूर बनते हैं. अगर बस लेट हो गई तो पहले वाली शिफ्ट को उस समय तक काम करना पड़ेगा जब तक बस नहीं आ जाती और इसका कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा. ओवरटाइम सिर्फ तब मिलेगा जब बस आने के बाद भी मज़दूरों से कंपनी काम जारी रखे.
एक छुट्टी पर मज़दूरों के 1200 रुपए कट जाते हैं और तीन-चार छुट्टियों पर आधे महीने का पैसा. कोई सिक लिव नहीं. बीमार होने पर कुछ अस्पताल तय किए गए है सिर्फ उन्हीं में इलाज कराने के एवज में कुछ फ़ीसदी भुगतान किए जाते हैं. बाक़ी अस्पतालों में ईलाज पर कोई भुगतान नहीं होता. फिर अस्पताल बिल की गहरी जांच होती है कि बिल का पैसा कितना वास्तविक है कितना नहीं. मारुति को अगर लगे कि टायफाइड 1500 रुपए में ठीक हो सकता है तो डॉक्टरी चक्कर में 15,000 लुटाने के बावज़ूद मज़दूरों को 1500 रुपए का ही आधा या आधे से ज़्यादा पैसों का भुगतान किया जाएगा.
मज़दूरों को शुरुआती तीन साल प्रशिक्षण में गुजारने होते हैं और इस दौरान क्रमश: 7, 8 और 9 हज़ार का वेतन दिया जाता है. प्रशिक्षण ख़त्म होने पर वेतन 16,000 रुपए है. इसके बाद ही मज़दूरों को मतदान का अधिकार मिल पाता है. मौजूदा प्रतिरोध को हतोत्साहित करने के लिए मारुति ने यह दावा किया है कि यदि सोमवार तक सारे मज़दूर गुड कंडक्ट फॉर्म भरने को तैयार नहीं होते तो सारे मज़दूरों को बर्खास्त कर दिया जाएगा और कंपनी नए मज़दूरों को बहाल करेगी. 2500 मज़दूरों में से अब तक सिर्फ 20-30 लोगों ने ही यह फॉर्म भरा है और अंदर जाने के हक़दार बने हैं. जाति-धर्म के आधार पर भी मज़दूरों को बांटने की कोशिश हो रही है. प्रबंधन के लोग ऐसे मज़दूरों की तलाश में रहते हैं जो समान जाति और धर्म वाले हों. उन्हें जाति का हवाला देकर पक्ष में करने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन मज़दूरों ने नारा बुलंद किया है कि वे ऐसी हर कोशिश को नाकाम करेंगे. उनका मानना है कि उनकी एक ही जाति और धर्म है और वो है उनका मज़दूर होना. मारुति ने दावा किया है कि बीते 1 सितंबर को उसने कुछ नए लोगों के सहारे 80 कार बनाकर बाज़ार में उतारा है. मज़दूरों का मानना है कि अव्वल तो यह मुश्किल है कि बिना ट्रेंड मज़दूरों के सहारे कंपनी इतनी कारें बना लें. दूसरा अगर कंपनी ने रिस्क लेते हुए यह काम किया भी है तो सड़क पर वे गाड़ियां दुर्घटना की बारंबारता को और बढ़ाने में मदद करेगी क्योंकि सही गुणवत्ता को परख पाना नए लोगों के लिए टेढ़ी खीर है. सड़क दुर्घटना की गंभीरता को दिखाती एक रिपोर्ट का मैं ज़िक्र करना चाहूंगा जिसमें कहा गया है कि बीती सदी में सबसे ज़्यादा मौत ऑटोमोबाइल से होने वाली दुर्घटनाओं से हुई है (रिपोर्ट मिलने पर उपलब्ध कराउंगा).
इस समय मानेसर का यह पंडाल मज़दूर आंदोलन का सबसे गरम पंडाल है. यहां के मज़दूरों में ग़ज़ब की ऊर्जा है. जब नारे लगते हैं और सड़क के उस पार मारुति-सुजुकी के प्लांट की भीतरी दीवारों से टकराकर आवाज़ वापस लौटती है तो उस गूंज को सुनकर मज़दूर और ज़ोर का हुंकार भरते हैं. एक थकता है तो दूसरा माइक थाम लेता है. इस तरह दो शिफ्ट में लोग लगातार जमे रहते हैं. कंपनी की तरह यहां भी एटैंडेंस लगता है ताकि मज़दूरों को पता चल सके कि कितने लोग सक्रिय तौर पर उनके साथ हैं और कितने टूट रहे हैं और कितने दलाल बन रहे हैं, बिक रहे हैं. यहां सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक एक शिफ्ट और शाम 7 से सुबह 7 तक दूसरी शिफ्ट में मज़दूर मोर्चा संभाले रहते हैं. यहां सोनू नाम के कई मज़दूर हैं. कम से कम तीन से तो मैं ही मिला. जो दूसरा सोनू है वह सोनू गुज्जर के भाषणों के बीच में लोगों के बीच जोश भरने के लिए जोरदार नारे लगाता रहता है. लगातार. बिना थके.
सोनू गुज्जर ने बताया है कि मानेसर और गुड़गांव के 40-50 कंपनियों की लीडरशिप ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है और गुड़गांव चक्का जाम में वे उनके साथ आएंगे. कुछ सांसदों का भी उन्हें समर्थन हासिल है. सोनू ने कहा कि उन लोगों ने 14 दिनों तक गांधी बन कर देख लिया है, अब ज़रूरत पड़ेगी तो भगत सिंह भी बनेगे. मज़दूरों को उन्होंने याद दिलाया कि भगत सिंह को 23 साल की उम्र में फांसी हो गई थी और उनके यहां तक़रीबन सारे मज़दूर 23 वर्ष से ज़्यादा के हैं. इसलिए इतिहास को यदि दोहराना होगा तो दोहराएंगे. झुकेंगे नहीं.
सोनू गुज्जर ने मज़दूरों और मज़दूर हित में रहने वाले सभी लोगों से यह आह्वान किया है - लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाएं.

03 सितंबर 2011

एक फांसी



जार्ज आरवेल- अनुवाद: गुंजेश
यह बर्मा में बारिशों वाली सुबह थी। जेल की ऊंची दीवारों से, प्रकाश की एक बहुत पतली रेखा, टीन के पीली पन्नी जैसी, जेल में प्रवेश कर रही थी। हम दोहरे छड़ों वाले कैद खाने में, जो किसी जानवर के पिंजड़े जैसा था इंतज़ार कर रहे थे। हर एक कैदी के लिए 10*10 फिट की जगह थी जो तख्ते के एक बिस्तर, कंबल और पानी के घड़े के अलावा खाली ही था। जिनमें से कुछ में बादामी रंग वाले कैदी पालथी मारे, कंबल लपेटे बैठे थे। ये लोग अपराधी थे और इन्हें अगले एक दो हफ्तों में फांसी पर लटका दिया जाना था।
एक कैदी को उसके सेल से निकाला गया। मुंडे सिर और अस्थिर तरल आँखों वाला एक कमजोर छरहरा कैदी। उसकी मुछें घनी थीं, उसके शरीर के अनुपात में कुछ ज़्यादा ही घनी जो की किसी कामेडी सिनेमा के पात्र की तरह दिखती थी। छह लंबे चौड़े भारतीय पहरेदार उसे घेरे हुए थे और फांसी के लिए तैयार कर रहे थे। पहरेदारों में, दो के पास संगीनों वाली राइफलें थीं, जबकि बाँकी पहरेदार कैदी को हथकड़ी लगाए हुए थे। सिपाहियों ने कैदी को कस कर जकड़ रखा था मानो उन्हें यह डर था कि कैदी कभी भी छुट कर भाग सकता है। यह एक आदमी के ज़िंदा मछली को हाथों में पकड़ रखने जैसा था मानों पकड़ ढीली हुई नहीं कि मछली हाथ से गई। जबकि कैदी बहुत ही समर्पित भाव से तमाम गतिविधियों को चलने दे रहा था जैसे उसे पता ही न हो कि क्या होने वाला है।
आठ बजे का गजर बज चुका था, गजर की आवाज़ भिंगी हुई हवा के साथ जेल के हर एक बैरक में पहुँच चुकी थी। जेल अधीक्षक, जो की कैदियों से अलग खड़ा था और इस पूरी प्रक्रिया को सदम्भ संचालित कर रहा था, ने घंटे की तरफ सर उठाया। भूरे मुछों और कर्कश आवाज़ वाला जेल अधीक्षक फौज का डाक्टर रह चुका था। ‘भगवान के लिए जल्दी करो फ्रांसिस’- उसने उकताते हुए कहा, ‘इस समय तक कैदी को फांसी हो जानी चाहिए थी, तुमलोगों की तैयारी अभी तक पूरी नहीं हुई?’
जेल प्रधान फ्रांसिस ने हकलाते हुए कहा ‘यस सर यस सर, सब कुछ तैयार है जल्लाद प्रतीक्षा कर रहा है हम सज़ा को मुकम्मल कर सकते हैं’
‘अच्छा है जल्दी करो, जब तक फांसी नहीं हो जाती बाँकी कैदियों को सुबह का नाश्ता नहीं मिलेगा’।
हम फांसी को देखने के लिए तैयार थे। दोनों राइफल धारी पहरेदार कैदी के आजू-बाजू चल रहे थे जबकि दो पहरेदार पहले की ही तरह कैदी को कस कर जड़के हुए थे। मजिस्ट्रेट और बाँकी लोग उनके पीछे थे। हम दस गज ही चले होंगे कि अचानक, बिना किसी आदेश या पूर्वसूचना के, एकाएक सब कुछ थम गया। एक अशुभ घटना घट गई थी- ईश्वर जाने कहाँ से एक कुत्ता रास्ते में आ गया था। लगातार भौंकता हुआ वह कुत्ता इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर उल्लासित हुआ जा रहा था। वह घने बालों वाला कुत्ता था। एक क्षण तो वह हमारे आस पास घूमता रहा और फिर इससे पहले की कोई उसे पकड़ पता वह कैदी की ओर लपका और उसके चेहरे को चूमने लगा। हर कोई अचंभित था। ‘इस नीच को यहाँ किसने आने दिया, कोई इसे बाहर करो’ जेल अधीक्षक ने झल्लाते हुए कहा।
छ्ह पहरेदारों के दल में से एक आगे बढ़ा और कुत्ते को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पहरेदार के बर्ताव से लग रहा था की वह इसके लिए प्रशिक्षित नहीं किया गया है, जब तक वह कुत्ते तक पहुंचता कुत्ता उसकी पहुँच से निकल चुका था। एक युवा यूरेशियन जेलर ने जमीन से कुछ ढले उठाए और कुत्ते पर निशाना साधा पर कुत्ता उससे भी बच निकला और वापस हमारे बीच आ गया। उसके भौंकने की आवाज़ें हमारे कानों में गूंज रहीं थी। क़ैदी और उसे जकड़े हुए दो सिपाही यह सब कुछ ऐसे देख रहे थे मानो यह भी फांसी होने से पहले की कोई रस्म हो। किसी ने कुत्ते के गले में रुमाल का पट्टा डाल कर उसे पकड़ा और बाहर किया।
फांसी का तख़्ता हमसे चालीस गज़ की दूरी पर रहा होगा। मुझे तख़्ते की ओर बढ़ते क़ैदी के भूरे रंग की पीठ नज़र आ रही थी। बंधे हुए बाजुओं वाले उस क़ैदी की चाल में अनाड़ीपन तो था लेकिन वह काफी स्थिर लग रहा था, यह उस भारतीय की ठसक भरी चल थी जिसने कई दिनों से अपने ठेहुनों को सीधा नहीं क्या था। उसके पाँव भिंगी हुई बाजरी पर अपना निशान छोड़ रहे थे। और एक बार तो वह खुद ही रास्ते के कीचड़ से बचने के लिए थोड़ा बच कर चला था।
यह सब बहुत अनूठा था लेकिन तब तक जब तक मेरे दिमाग में यह ख्याल नहीं आया था कि एक स्वस्थ और सजग आदमी को मारने का क्या मतलब होता है। जब क़ैदी ने ख़ुद को कीचड़ से बचाया तो मेरा साक्षात्कार एक विडम्बना से हुआ। एक अच्छे खासे जवान मर्द को फांसी पर लटकाने का क्या तर्क है, क्या यह एक न्यायिक चूक नहीं है। आने वाले कुछ समयों में उसकी मृत्यु नहीं होनी थी, वह हमारी ही तरह ज़िंदा रहने वाला था। उसके शरीर के सभी हिस्से ठीक काम कर रहे थे। आँतें भोजन पचा रही थीं, नाख़ुन बढ़ रहे थे, रोम छिद्रों से पसीना निकाल रहा था कोशिकाएं अपनी गति से निर्मित हो रहीं थीं — सभी अंग अभी तक एक मूर्ख की भांति लगातार मेहनत कर रहे थे। समभवतः उसके नाख़ुन तब भी बढ़ते रहें जब वह फांसी के तख्ते पर चढ़ा होगा, और जब उसकी ज़िंदगी एक झटके के साथ सेकेंड के दसवें हिस्से में हवा में घुल जाएगी। उसकी आँखों ने पीले तख़्ते और सीमेंटी दीवारों को देखा, उसका मस्तिष्क अब भी काम कर रहा है वह पूर्वानुमान लगा सकता है समझ सकता है- वह कीचड़ से बच सकता है। हम लोग एक साथ देख, सुन और समझ रहे हैं, महसूस कर रहे हैं एक ही दुनिया के बारे में एक ही तरह से। और दो मिनट से भी कम समय में, एक झटके के साथ हमारे बीच का एक चला जाएगा- एक मस्तिष्क एक दुनिया कम हो जाएगी।
फांसी का तख़्ता जेल से अलग एक छोटी सी जगह में बना हुआ था जिसके चारो तरफ़ कांटे वाली झाड़ियाँ फैली हुई थीं। यह ईटों के एक त्रिविमीय शेड की तरह था जिसके बीच में लकड़ी का एक तख़्ता था ऊपर दो बिंबों और क्रॉस्बार कि सहायता से एक रस्सी टंगी हुई थी। सफ़ेद बालों वाला बूढ़ा जल्लाद जो जेल की वर्दी पहने हुए था अपने मशीन के पास इंतज़ार कर रहा था। हम जैसे ही तख़्ते के पास पहुंचे जल्लाद ने हमें दासों की तरह नमस्कार किया। फ्रांसिस के इशारे पर दो सिपाही, जो क़ैदी को अब पहले से भी ज़्यादा कस कर जकड़े हुए थे, क़ैदी को तख़्ते पर ले गए। जल्लाद ने क़ैदी के गले में फंदा डाल दिया।
हम तख़्त से चालीस गज़ की दूरी से सब कुछ देख रहे थे। जेल के कर्मचारी तख़्त के आस-पास एक गोल घेरा बना कर खड़े हो गये। और जब सब कुछ तैयार हो गया तब क़ैदी ने अपने ईश्वर को याद करना शुरू किया, वह बहुत तेज़ आवाज़ में बार बार राम! राम! राम! पुकार रहा था। उसकी आवाज़ में कोई जल्दबाजी नहीं थी और न ही वह किसी मदद के लिए कुहर रहा था। वह स्थिर और स्स्वर था उसकी आवाज़ घंटे के ध्वनि की तरह ठनकदार थी। सिर्फ कुत्ता ही रोते हुए उसकी आवाज़ को जबाब दे रहा था। जल्लाद ने उसके चहरे पर सूती कपड़े के बने नकाब को पहना दिया। लेकिन वह नकाब भी क़ैदी के आवाज़ को दबा नहीं पाई और राम! राम! राम! की ध्वनि गूँजती रही।
जल्लाद वापस अपने मशीन के पास आ गया था और उसने मशीन का लीवर पकड़ लिया। समय रीत रहा था। क़ैदी की स्थिर आवाज़ हरेक क्षण बिना लड़खड़ाये हम तक पहुँच रही थी- राम! राम! राम! जेल अधीक्षक सर झुकाये, अपनी छड़ी से धीरे धीरे जमीन को कुरेद रहा था शायद वह राम! राम! की आवृतियों को गिन रहा था, क़ैदी को एक खास गिनती तक इसकी इजाज़त मिली होगी- शायद पचास या सौ। सब के चहरे तनाव से रंगे हुए थे। भारतियों के चहरे खराब काफी की तरह भूरे पड़ गये। दो संगीने हवा में हल्के हल्के हिल रहीं थीं। हम नकाब से ढके उस चहरे को देख रहे थे जो, फांसी के फंदे पर टंगा हुआ था, उसकी आवाज़ हम सुन रहे थे- हर बार एक आवृति और जीवन का एक सकेंड और। ओह, इसे जल्दी लटका दो,खत्म करो इसे, इस असहनीय आवाज़ को बंद करो; हम सब के दिमाग में यही चल रहा था।
‘चलो!’ जेल अधीक्षक ने सउत्साह कहा, उसने अपना मन बना लिया था।
क्लिक की एक आवाज़ और फिर चारो तरफ़ मरघट की शांति। कैदी खत्म हो चुका था, फंदा अपने में ही उलझ गया था। कुत्ते को छोड़ दिया, वह भौंका और कंटीली झाड़ियों की तरफ भाग गया, वह हमारी तरफ डरी हुई निगाहों से देख रहा था। हम मृतक का परीक्षण करने फांसी के तख्ते के पास गये। उसके पंजे बिलकुल सीधे ज़मीन की तरफ झुके हुए थे और पूरा शरीर धीरे-धीरे दायें बाएँ घूम रहा था, मानो पत्थर की किसी मूर्ति को रस्सी पर लटका दिया गया हो।
जेल अधिकक्षक मृत शरीर के पास गया और अपनी छड़ी से मृत शरीर को कोंचा, रस्सी पर टंगी पत्थर की मूर्ति थोड़ा डोली। ‘यह ठीक है’ जेल अधीक्षक ने कहा। वहाँ से पीछे हटते हुए उसने एक गहरी सांस ली। अचानक ही उसके चेहरे की अस्थिरता गायब हो चुकी थी। उसने अपनी कलाई घड़ी में झाँका आठ बज कर आठ मिनट। ‘भगवान का शुक्र है सब कुछ समय पर ही निपट गया’।
सिपाहियों ने अपने राइफलों से संगीने निकाल ली और वहाँ से चले गये। कुत्ता जिसे शायद अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उन्हीं सिपाहियों के पीछे निकल गया। हम भी वहाँ से निकल कर, अपराधियों के सेल से होते हुये जेल के बड़े से केन्द्रीय कक्ष में पहुँच चुके थे। दोषियों को पहरेदारों के आदेश पर नाश्ता मिलने लगा था। कैदी बेतरतीब तरीके से लंबी लाइनों में लगे हुए थे, हर एक के पास टीन का बना एक छोटा पैन था और दो पहरेदार बाल्टियों में चावल लेकर घूम रहे रहे थे। यहाँ सब कुछ सामान्य दिख रहा था, फांसी के बाद का यह एक सुखद माहौल था। हम सब एक राहत की साँसों से भरे हुए थे- आखिर काम हो गया था। कोई प्रशंसा के गीत गा रहा था, कोई यूं ही भाग रहा था, कोई बेढब तरीके से हस रहा था। कुल मिला कर सब खुश थे।
एक यूरेशियन लड़का मेरी बगल में खड़ा था और उस रास्ते को देख रहा था जिधर से हम आये थे, उसने एक परिचित मुस्कान के साथ कहा- ‘सर, आप जानते हैं हमारे दोस्त, (उसका इशारा मृतक कैदी की तरफ था), ने जब सुना की उसकी अर्जी खारिच कर दी, वह फर्श पर ऐसे गिर पड़ा मानो वह नशे में घूत्त हो- डर की वजह से। क्या आप नए सिगरेट केस से सिगरेट लेना पसंद करेंगे। नया खरीदा है 2 रुपये और आठ आने में, पारंपरिक यूरोपियन स्टाइल का’
कुछ लोग ज़ोर से हसे- किस बात पर! यह ठीक से कोई नहीं जनता कोई नहीं जनता था।
फ्रांसिस जेल अधीक्षक के साथ टहलते हुए चापलूसीयत भरी अदाओं से बोल रहा था –‘चलिये सर, सब कुछ अच्छे से निपट गया। एक ही झटके में कैदी खत्म हो गया। यह इतना आसान नहीं होता, मैं ऐसे कई मामलों को जनता हूँ जहां सज़ा मुकम्मल कराने के लिए डाक्टर को फांसी के तख्ते के नीचे जाना पड़ा, और कैदी के टांगों को खिचना पड़ा है। कितना अपमानजनक है यह’।
‘हाँ, यह बुरा है’- जेल अधीक्षक ने तड़पते हुए कहा।
‘सर, यह और भी मुश्किल हो जाता है जब कैदी प्रतिरोध कर रहा हो। मुझे याद है एक आदमी तो अपने सेल के सलाखों से ही चिपक गया था’। आपको मुझे शब्बाशी देनी चाहिए सर, ‘मुझे इसे भी कैदखाने से निकालने में छह लोग लगे, तीन-तीन लोग दोनों पैरों के लिए। हमने उससे कहा- दोस्त तुम ज़रा सोचो तुम हमें कितना कष्ट दे रहे हो’। लेकिन उसके कानों पर जू तक नहीं रेंगी। ‘वो बहुत शैतान था’।
मुझे एक ज़ोर की हसी आ गई। हर कोई हस रहा था। जेल अधीक्षक ने भी ठहाका लगाया और कहा –‘अच्छा होगा हम यह सब भूल कर एक-एक जाम लगाएँ’। फ्रांसिस ने तत्परता से कहा ‘मेरे कार में एक विस्की की बोतल पड़ी है, मैं ले कर आता हूँ’।
हम जेल के दोहरे दरवाजों से निकल बाहर सड़क पर आ गये थे। ‘तीन-तीन लोग दोनों पैरों के लिए’ अचानक ही बर्मा के एक मजिस्ट्रेट ने दुहराया, और हम बहुत ज़ोर से हस पड़े। हम फिर से हसने लगे थे। फिर हम सबने साथ बैठ कर जाम सजाया। मृत शरीर हमसे सौ गज की दूरी पर था।
(द हिन्दू और 1931 — © By permission of the Estate of the Late Sonia Brownell Orwell से साभार)

01 सितंबर 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार- आनंद स्वरूप वर्मा

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उद्धारक की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।
अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिद्धि के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।
अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।
क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उद्धारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्तारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फिल्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।
अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।

समकालीन तीसरी दुनिया / अगस्त- सितम्बर 2011 का संपाद्कीय