13 मई 2008

धर्म परिवर्तनः एक राजनैतिक हथियार


राम पुनियानी
इन दिनों ईसाई मिश्नरियों द्वारा कराए जा रहे तथाकथित धर्मपरिवर्तनों की चर्चा देशभर के मीडिया में हो रही है. ऐसा कहा जा रहा है कि आदिवासियों द्वारा एक ''विदेशी धर्म'' को अपनाए जाने से हिंदू राष्ट्र को खतरा है. इस आधारहीन आशंका की सामाजिक स्वीकार्यता में भारी वृध्दि हुई है. महाराष्ट्र के अलीबाग में मार्च महीने में ननों पर हमला और गत 27 अप्रैल को मुबई में बडे पैमाने पर हुआ शुध्दि यज्ञ भी धर्मपरिवर्तन की राजनीति का हिस्सा है. शुध्दि यज्ञ में बड़ी संख्या में ईसाई आदिवासियों को हिंदू बनाया गया. ननो पर हमले और शुध्दि यज्ञ के पीछे एक ही व्यक्ति था. ननों पर हमले के लिए रामानंदाचार्य पीठ के सद्गुरू नरेन्द्र महाराज के शिष्य जिम्मेदार थे और शुध्दि यज्ञ का नेतृत्व स्वयं नरेन्द्र महाराज ने किया. इस अवसर पर बोलते हुए नरेन्द्र महाराज ने कहा कि ईसाई मिश्नरियों की गतिविधियों के कारण हिंदू अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनने की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने केन्द्र सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने धर्मपरिवर्तन पर रोक लगाने वाला कानून अब तक नहीं बनाया है और महाराष्ट्र सरकार के अंधविश्वास- विरोधी कानून की निंदा की. उनके अनुसार ये दोनों ही कदम हिंदू विरोधी हैं. जहां ईसाई मिश्नरियों को धर्म परिवर्तन के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वहीं संघ परिवार की संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे धर्म परिवर्तन को घर वापसी का नाम दे दिया गया है.
नरेन्द्र महाराज का यह दावा कि हिंदू इस देश में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं, हास्यास्पद और तथ्यहीन है. सच यह है कि भारत की कुल जनसंख्या में हिंदुओं का प्रतिशत लगभग स्थिर बना हुआ है. कई राज्यों में जो धर्मपरिवर्तन-विरोधी विधेयक पास किए गए हैं, वे हमारे संविधान की अनेक धाराओं के खिलाफ हैं. हमारा संविधान तार्किक सोच को प्रोत्साहन देने की बात करता है और इस सिलसिले में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित अंधविश्वास-विरोधी विधेयक एक प्रशंसनीय कदम है.
इस विधेयक का विरोध करने वाले शायद यह चाहते हैं कि समाज में अंधविश्वास बने रहें और उनका सामाजिक और राजनैतिक वर्चस्व कायम रहे. गुरूजी ने यह बात स्पष्ट शब्दों में कही. इन्हीं गुरूजी के समर्थक हिंसा करने से नहीं चूकते. अलीबाग में ननों पर हमला उस दौरान किया गया जब एड्स पर एक लेक्चर सुनने के लिए लोग इकट्ठा थे.
आदिवासी इलाकों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में वृध्दि का कारण समझना मुश्किल नहीं है. पिछले साल क्रिसमस के आसपास उड़ीसा के कंधारमल और फूलबनी जिलों में व्यापक हिंसा हुई थी. गुजरात के डांग, मध्यप्रदेश के झाबुआ और उड़ीसा के अनेक जिलों सहित आदिवासी इलाकों में हिंसा का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है. ये वे इलाके हैं जहां आदिवासियों के ''हिंदूकरण'' का अभियान भी चलाया जा रहे हैं. यहां यह स्पष्ट कर देना उपयोगी होगा कि आदिवासी मूलत: प्रकृति-पूजक हैं. वे न तो ईसाई हैं और न ही हिंदू.
कुछ आदिवासी समय-समय पर ईसाई धर्म को अपनाते रहे हैं परंतु यह कोई नई बात नहीं है. आदिवासियों का ईसाई धर्म से परिचय सदियो पुराना है. पिछले कुछ दशकों में भारत की ईसाई आबादी में हल्की गिरावट दर्ज की गई है. सन् 1971 में ईसाईयों का आबादी में प्रतिशत 2.60 था जो 1981 में घटकर 2.44 प्रतिशत और 1991 में 2.34 प्रतिशत रह गया. सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में ईसाई, आबादी का 2.30 प्रतिशत हैं. यह भी सच है कि कुछ ईशाई मिश्नरियां धर्मपरिवर्तन कराने में विश्वास करती हैं और उन्होंने आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन कराया भी है. आदिवासी इलाकों में आर.एस.एस. की घुसपैठ लगभग दो दशक पहले शुरू हुई जब वनवासी कल्याण आश्रम ने इन इलाकों में अपनी गतिविधियां चलाना शुरू कीं. इन इलाकों में ईसाईयों और ईसाई धर्म के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया जिससे हिंसा भड़की. चूंकि ये घटनाएं दूरदराज के इलाकों में होती हैं इसलिए अपराधी अक्सर बच निकलते हैं. सांप्रदायिक हो चुका शासकीय तंत्र भी इस मामलें में कुछ खास नहीं करता. आदिवासी इलाके में आर.एस.एस. से सीधे या अपरोक्ष रूप से जुडे धर्मगुरू अपने आश्रम स्थापित कर रहे है और अपनी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं. डांग क्षेत्र में असीमानंद, उडीसा में लखानंद, झाबुआ में आसाराम बापू और महाराष्ट्र में नरेन्द्र महाराज इनमें प्रमुख हैं.
ईसाई मिशनरियों को आतंकित करने के अलावा आदिवासियों को सांस्कृतिक रूप से हिंदू बनाने की कोशिशें भी जारी हैं. इसके लिए हिंदू संगम और शबरी कुंभ आयोजित किए जाते हैं. दिलीप सिंह जूदेव मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में लंबे समय से आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में लगे हुए हैं. इस अभियान को घरवापसी और शुध्दिकरण कहा जाता है. स्पष्ट है कि आदिवासियों को हिंदू मानकर चला जा रहा है. यह इस तथ्य के बावजूद की आदिवासी प्रकृति-पूजक हैं और हिंदू धर्म, इस्लाम या ईसाई धर्म से उनका कोई वास्ता नहीं है.
आदिवासी इस देश के सबसे वंचित समूहों में से एक हैं और उनका लंबे समय से राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए शोषण किया जाता रहा है. सन् 1920 के दशक की शुरूआत में ''तन्जीम'' (मुस्लिम सांप्रदायिक) अभियान के प्रतिउत्तर में ''शुध्दि'' (हिंदू सांप्रदायिक) अभियान चलाया गया था. अब शुध्दि अभियान एक बार फिर लौट आया है. इस अभियान को घरवापसी का नाम देने के पीछे की मंशा स्पष्ट है. जहां ईसाई मिश्नरियों को धर्मपरिवर्तन के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वहीं संघ परिवार की संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे धर्मपरिवर्तन को घरवापसी का नाम दे दिया गया है. प्रचार यह किया जाता है कि आदिवासी वे हिन्दू हैं जो मुस्लिम राजाओं द्वारा जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाने के डर से जंगलों में भाग गए थे. कई सदियों तक जंगलों में रहने के कारण उनका हिंदू सामाजिक मुख्यधारा से संपर्क कट गया.
इस मिथक को फैलाए जाने के दो फायदे हैं. पहला तो यह कि इससे इस गलतफहमी को बढ़ावा मिलता है कि इस्लाम को तलवार की नोंक पर फैलाया गया था. दूसरे, इससे आदिवासियों का यह दावा गलत सिध्द होता है कि वे इस देश के मूल निवासी हैं. इस प्रकार भारत के हिंदू राष्ट्र होने की परिकल्पना को मजबूती मिलती है क्योंकि उसके मूल रहवासी भी हिंदू हैं.
सांप्रदायिक ताकतें यह अच्छी तरह से जानती हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए चुनावों में सफलता जरूरी है. इसके लिए आदिवासियों का हिंदूकरण करना फायदेमंद है. आदिवासी देश की आबादी का लगभग 8 प्रतिशत हैं और अगर दक्षिणपंथी राजनैतिक दलों को उनका समर्थन मिल जाता है तो इन दलों के जनाधार में भारी वृध्दि होगी. दूसरा फायदा यह है कि आदिवासियों का हिंदूकरण करने के बाद उनका उपयोग हिंदू राष्ट्र के अन्य शत्रुओं, जैसे मुसलमानों के खिलाफ भी किया जा सकता है. गुजरात में हमने देखा था कि किस तरह आदिवासियों का उपयोग हिंदू राष्ट्र के सैनिकों की तरह किया गया था.
चाहे वह रामकृष्ण मिशन हो या ईसाई मिशनरियां- शांतिपूर्वक आदिवासी क्षेत्रों में इनके काम करने से किसी को कोई परेशानी नहीं है. परंतु धर्म के नाम पर अंधविश्वास और दूसरे धर्मो के प्रति घृणा फैलाना निश्चित रूप से राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बड़ा खतरा है. sabhar ravivar.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई,

    सब के विकास से ही देश का विकास सम्‍भव है ।

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  2. धर्मांतरण वास्तव मे राष्ट्रांतरण ही है । ईसाई वामपंथी चोले मे काम कर रहे है, आपका यह आलेख ईस बात का पुख्ता प्रमाण है । आप किस धर्म को मानते है इसका निश्चित प्रभाव आप किस देश के प्रति निष्ठावान है, ईस बात पर पडता है । मै जानता हु की आप समझ कर भी नही सम्झेगे ।

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