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05 अप्रैल 2017

गांव बचेगा तो गाय बचेगी


 चन्द्रिका
 (मूलरूप से द वायर में प्रकाशित)

वे गाय को बचा रहे हैं और गांव को खत्म कर रहे हैं. गांव बचेगा तो गाय खुद ही बच जाएगी. वैसे यह कहना भी ख़तरनाक हो गया है. फिलहाल कुछ भी कहना ख़तरनाक हो गया है. सुनने के लिए दो लोगों के नाम बचे हैं और इसी के उन्माद में जाने कितने लोग फंसे हैं. फंसे हैं कि उन्हें लगता है कि यही है जो उन्हें उबार देगा. उन्हें उनके दुख और डर से निकाल लेगा. वे भीतर से डरे हुए लोग हैं जो उन्मादी हो गए हैं. हत्या और उन्माद के लिए उन्हें वहीं से ताकत मिल रही है. जबकि एक को दूसरे से शोहरत मिल रही है.

जहां कोई नाम बहुत बड़ा बना दिया जाता है. उसकी मान्यता बढ़ा दी जाती है और एक समूह भक्त बन जाता है. धर्म, राजनीति, ब्यूरोक्रेसी कहीं भी इसे देखा जा सकता है. वे एक अदृश्य ताकत के बल पर फलते-फूलते हैं और तलवार की तरह समाज के चेहरे पर झूलते हैं. वे, जो गाय की रट लगाए हुए हैं. वे जो कोई भी मांस न खाने की हठ लगाए हुए हैं. वे गाय प्रेमी नहीं हैं. अगर होते तो गाय और गांव के संबध को समझते. कि वह गांव खत्म हो रहा है जहां गाय रह पाती थी. गांव वह बच रहा है जहां गाय की जगह दो गऊ जैसे बूढ़े ही बच पा रहे हैं. इसी विकास की प्रक्रिया ने गाय पालने वाले लोगों को गांव से बाहर कर दिया है. खेतीबाड़ी तबाह कर उन्हें शहर में भर दिया है. शहरों और शहरों के बीच अथाह भरे हुए इलाकों के बीच जो रिक्त स्थान है, वही गांव है. इन रिक्त स्थानों को गाय से नही भरा जा सकता. गाय से कोई भी रिक्त स्थान नहीं भरा जा सकता. फिलहाल जहां-जहां गाय लिखा जा रहा है, जहां-जहां गाय बोला जा रहा है. नफरत का कोई और ही चीज घोला जा रहा है. दो समुदायों के बीच जो बना हुआ, बचा हुआ रिश्ता था उसका धागा खोला जा रहा है.

गाय के बहाने वे उससे अपनी नफरत जता रहे हैं. सुअर (बाराह) जो उनके मिथक में ईश्वर था उसके खाए जाने, मारे जाने पर सवाल तक नहीं उठा रहे हैं. सवाल नहीं उठना चाहिए. न गाय पर न सुअर पर. खानपान के अलग-अलग भौगोलिक, सांस्कृतिक कारण हैं. वैसे उन्हें किसी की संस्कृति का सम्मान नहीं है. उन्हें किसी से प्यार नहीं है. न मुल्क से, न गाय से, न गांव से, न गोरू से. क्योंकि गांव और गाय वाले मुल्क का बचना एक अलग तरह से बसना है. पूरी तरह से एक अलग अर्थव्यवस्था को रचना है. जिसे उजाड़ा गया और उजाड़ा जा रहा है. गाय से प्यार बगैर चरागाहों के नहीं हो सकता. गाय से प्यार बिना बैलों और हरवाहों के नहीं हो सकता. शहर चरागाह नहीं बना सकते. वहां हम हल बैल नहीं चला सकते. वहां तो हम खुद ही हर रोज कातिक के बैल बने हुए हैं. शहर जितने बड़े हैं हम उतना ज्यादा मिट्टी में सने हैं. इन घनी बस्तियों की बहुतायत आबादी जमीन से ऊपर सीढ़ियों वाले छतों की है. जानवरों ने अभी अपने को इस मुताबिक नहीं बनाया. सीढ़ियों पर चढ़ने और छतों पर रहने के लायक खुद को नहीं ढाला. हम हैं कि यह सब नहीं सोचते. अपनी ज़िंदगी और अपनी आंख से न देखकर गाय और गोबर में अड़े हुए हैं.

वन बीएचके में कोई कैसे गाय बसाएगा. बस वह अपनी दौड़ती-फिरती ज़िंदगी में जब भी गाय का नाम सुनेगा भावुक हो जाएगा. उसके लिए वन बीएचके की भी जरूरत नहीं. ट्रेन की सीट पर भी बैठकर गाय को लेकर भावुक हुआ जा सकता है. गाय को पालने और बचाने की बात वहीं पर ठहरी हुई है और हररोज ट्रेन हमे शहर की तरफ लिए जा रही है. शहर की भीड़ हररोज और बढ़ रही है. आसपास के गांव को अपने भीतर कर रही है. इंसान का ही रहना यहां मुहाल है. यह तो गाय को बचाने और बसाने का सवाल है.

सारे रोजगार, सारे संस्थान शहर में हैं. सारी मुफलिसी, सारी तंगी घर में है. एक को तो छोड़ देना पड़ेगा. या इस विकास के रास्ते को ही मोड़ देना पड़ेगा. शहर टूटेंगे गांव तभी बस पाएगा. गाय तभी बस पाएगी. जब गाय सिर्फ धरम के लिए नहीं होगी. जब गोमूत्र सिर्फ पीने के लिए नहीं होगा. जब गोबर सिर्फ हवन के लिए नहीं होगा. वह खेतों में खाद के लिए होगा, उपजाऊं अनाज के लिए होगा. हमारे जीवन की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होगा. होंगे सारे जानवर. गाय जैसा होगा उनका भी होना.

पर ऐसा नहीं होगा इस सरकार से. इससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा और उससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा. क्योंकि इस मुल्क के विकास के लिए उनके पास वही खाका है. जिससे बना न्यूयार्क है, जिससे बना ढाका है. मुल्क हमारे अलग हैं पर उनका विकास, हमारा विकास एक है. गाय के मामले में वे हमसे ज्यादा नेक हैं. हम बड़ी आबादी वाले देश को बगैर गांव के नहीं जीना था. हमारे कपड़े अलग थे हमे अपने तरीके से सीना था. हम न्यूयार्क नहीं हो सकते, हम जापान नहीं हो सकते. कई मुल्कों की लाशों पर चमकता हुआ शहर दुनिया में बहुत कम बन सकता है. अमेरिका बनना कई मुल्कों के इतिहास, भूगोल को निगल जाना है. अमरीका बनना कई मुल्कों का पड़ोसी मुल्कों से युद्ध कराते रहना है. अमेरिका होना दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार तैयार करना है. हथियार तैयार करना भविष्य में तबाही और भय की उम्मीद को ज़िंदा रखना है. दुनिया में हम सबको असुरक्षित रखने का ही नाम है सबसे विकसित देश का नाम. हम उसी का पीछा करते हुए कुछ दशक पीछे हैं. शायद हम हमेशा पीछा करने वाले देश ही रहेंगे. हम आगे तभी जा सकते हैं जब वह पीछे जाए. इस एक लाइन वाली दुनिया की व्यवस्था में ऐसे ही सबको खड़े होना है. आगे जाने के लिए कोई और रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि अपने से आगे वाले को पीछे छोड़ा जाए, इसके लिए उसकी बांह मरोड़ा जाए.

हमे भारत बनाना था. जहां सबको बसना था. जहां इतिहास में सबके हिस्से थे. जहां जातीयों के जुल्म के भी किस्से थे. हमे उसे खतम करना था. हमने वह नहीं किया. हमने वह नहीं सोचा. दुनिया के उन मुल्कों के उधारी विकास को हमने अपनी मिल्कियत बना ली. अब जो है वह भयावह है. उनके विकास का ही मॉडल शहर है कि हमे भी उसे ज़हर की तरह पीना पड़ रहा है. मौत के पहले हर रोज की मौत को जीना पड़ रहा है. युवा उम्र के लोग अफवाह की तरह फैल गए हैं, इन शहरों में. निराधार, हर रोज बदल दिए जाने वाली ख़बर की तरह. पहले उन्हें नौकरी न पाने के ख़तरे हैं, नौकरी पाने के बाद इसके छिन जाने के ख़तरे हैं. इन खतरों से जो बचा हुआ मोहलत का वक्त होता है उसमे वे खुद भी खतरनाक हो जाते हैं. कहीं उन पर ख़तरा है तो कहीं वे उससे उबरने के लिए खुद खतरा बन रहे हैं. उन्माद यहीं से पैदा होता है. व्यवस्था उन्हें खतरे में डालती है और उससे उबरने के लिए उन्हें खतरनाक बनाती है. तब गाय ही सबसे बड़ा सवाल बना दिया जाता है. गांव वहां से फिर भी हट जाता है.

जिन्हें इतनी असुरक्षाओं के बीच ज़िंदा रहना और बचे रहना है उन्हें नैतिकता नहीं सिखाई जा सकती. नैतिकता उस ढांचे से पनपती है जहां आप जीवन जी रहे होते हैं. अर्थतंत्र पर टिकी इस दुनिया में आर्थिक तंगी के बीच आप किसी को ईमानदार नहीं बना सकते. ईमानदार बनाने की धारणा बना सकते हैं. इस आधार पर एक राजनैतिक पार्टी बना सकते हैं. सदी के सबसे बड़े झूठ को सच बना सकते हैं. और भी बहुत कुछ बना सकते हैं पर ईमानदार इंसान नहीं बना सकते. क्योंकि इंसान अपने समाज की जरूरतों और ढांचों से अपने मूल्य बनाता है. न कि उसके मूल्य के आधार पर ढांचा बन पाता है. बहते हुए नाले का पानी अगर साफ हो तो सारी चीजें अपने मूल रंग में दिख सकती हैं. एक-एक चीज को निकालकर उसे धुलकर उसका रंग दिखाना सिर्फ बहकावा है. ऐसे बहकावे में ही उन्माद भी है, हिंसा भी है और वह सबकुछ है जो पूर्णता में किसी चीज को देखने से रोक देगा. गाय दिखेगी, गांव नहीं दिखेगा. विकास सुनाई पड़ेगा और हर कोई परेशान रहेगा.       

25 मार्च 2016

रमा कँवर: 'इज्ज़त' के नाम हुआ हत्याकांड

रमा कँवर: 'इज्ज़त' के नाम हुआ हत्याकांड  
डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के पचलासा छोटा गाँव की रिपोर्ट
द्वारा पीयूसीएल तथ्यान्वेषण दल
तारीख : 12 मार्च 2016

 राजस्थान के डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के गाँव पचलासा छोटा में 4 मार्च 2016, शुक्रवार की रात, रमा कँवर नाम की युवा महिला को गाँव के चौराहे पर उसके भाइयों तथा अन्य लोगों द्वारा केरोसिन डालकर जलाकर मार डालने और फिर रातोरात शमशान में अंतिम क्रिया किए जाने की खबर 6 मार्च 2016 को स्थानीय अखबारों में पढ़कर हम स्तब्ध हो गए. अखबारों से ज्ञात हुआ कि यह मामला मृतक रमा कँवर पिता विजयसिंह व प्रकाश पुत्र कचरू सेवक के 2007 में हुए अंतरजातीय विवाह से हुए विवाद से जुडा है. आसपुर के पुलिस थाना क्षेत्र में हुई इस घटना घटने के बाद पुलिस ने उसी रात गाँव पहुँचकर मृतका की सास कलावती की रीपोर्ट के आधार पर मामला दर्ज करवाया व कारवाही शुरू की. इस मामले में आसपुर पुलिस ने पचलासा निवासी लक्ष्मणसिंह पुत्र विजयसिंह, प्रवीणसिंह पुत्र वीरसिंह, कल्याणसिंह पुत्र गौतमसिंह, इश्वरसिंह पुत्र हमीरसिंह, महेंद्रसिंह पुत्र तखतसिंह , भूपालसिंह पुत्र विजयसिंह, गजेन्द्रसिंह उर्फ़ गजराज सिंह पुत्र किशोरीसिंह को गिरफ्तार किया. लगभग 35लोगों को नामज़द किया गया. इस रिपोर्ट के बनने तक 14 लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी है जो इस प्रकार है: लक्षमण सिंह पुत्र विजयसिंह, प्रवीणसिंह पुत्र वीरसिंह, कल्याणसिंह पुत्र गौतमसिंह, इश्वरसिंह पुत्र हमीरसिंह, महेंद्रसिंह पुत्र तख्तसिंह, भोपालसिंह पुत्र किशोरसिंह, गजेन्द्रसिंह पुत्र गज़राज सिंह, जयसिंह पुत्र नाहरसिंह, प्रतापकंवर पत्नी वीरसिंह, मोतीकंवर पत्नी दलपतसिंह, दलपतसिंह पुत्र किशोरीसिंह, हमीरसिंह पुत्र भवानीसिंह राजपूत. पुलिस ने आरोपित लोगों के खिलाफ निम्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है धारा 302(ह्त्या), 201 (साक्ष्य विलोपित करना), 364 ( ह्त्या की नियत से अपहरण), 458 (किसी को मारने अथवा घायल करने अथवा चोट पहुंचाने अथवा जबरदस्ती रोककर रखने के उद्देश्य से रात को किसी के घर में घुसना), 323 ( स्वेच्छा से किसी को चोट पहुंचाना), 149 (unlawful assembly guilty of offense committed in prosecution of common object), 147 (Negotiable Instruments), 143 (unlawful assembly) तथा 120B (Concealing Design to commit offense).
ईंट के घेरे में जो-कुछ ख़ाली जगह दिख रही है वहीं रमा कंवर ने दम तोड़ी थी
(फोटो- प्रज्ञा जोशी)


हम सभी इस पुरे मामले की क्रूरता को तथा राज्य तथा राष्ट्रीय महिला आयोग की इस प्रकरण में चुप्पी को देखकर स्तब्ध व क्षुब्ध हैं.

पीपुल्स यूनियन फॉर सीविल लिबर्टीज इस मानवाधिकार संगठन ने राजस्थान के डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के गाँव पचलासा छोटा में 4 मार्च 2016, शुक्रवार की रात, रमा कँवर को ज़िंदा जलाकर की गयी ह्त्या का तथ्यान्वेषण कर यह रिपोर्ट तैयार की है. पीयूसीएल के तथ्यान्वेषी दल के सदस्य इस प्रकार थे: धुली बाई, छगन बाई, कमलेश शर्मा, धर्मराज गुर्जर, हेमंत खराड़ी, फेंसी, मधुलिका, कांतिलाल रोत, प्रज्ञा जोशी. तथ्यान्वेषी दल ने दो चरणों में यानी 7 मार्च 2016 व 9 मार्च 2016 को क्रमशः पचलासा छोटा तथा सागवाड़ा जाकर संबधित व्यक्तियों से मिलकर तथ्य जुटाने का प्रयास किया. यह दस्तावेज़ निम्न सूत्रों के आधार पर तैयार किया गया है: इस दल ने कलावती पत्नी कचरू सेवक, भावना पत्नी जितेन्द्र सेवक, पचलासा छोटा वर्तमान सरपंच जस्सू देवी मीणा, पूर्व सरपंच कालूभाई मीणा, नाहर सिंह (वर्तमान उपसरपंच तथा वार्ड 4 के वार्ड पञ्च ), दलपत सिंह, अमरसिंह (हेड कांस्टेबल, थाना आसपुर), रामलाल चंदेल (एएसपी, डूंगरपुर), लक्ष्मण डांगी (थानाधिकारी, आसपुर), ब्रजराज चारण (डि.वाय एस. पी., सागवाडा), डूंगरपुर  पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार जैन, पत्रकार,  तथा पचलासा छोटा के अन्य ग्रामीणों से इस मामले में प्रत्यक्ष की बातचीत, मोहनलाल यादव (पटवारी) व गोवर्धन सिंह चौहान (ग्राम सचिव) से हुई वार्ता, मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट. दल ने जिन अन्य ग्रामीणों से बात की उनके नाम उन लोगों की सुरक्षा के मद्देनज़र नहीं दिए हैं.

पचलासा छोटा गाँव :
राजस्थान के डूंगरपुर जिले की आसपुर तहसील से 12 किमी स्थित पचलासा छोटा गाँव लगभग6.5कि मी के दायरे में फैला है. यह लगभग 700 घरों की आबादी का गाँव है. इस गाँव में सबसे अधिक घर राजपूत समुदाय के हैं जो कि 250 के करीब हैं, लगभग 150 घर आदिवासी समुदाय के हैं तो सेवक समुदाय के घर 30-40 हैं.  गाँव में यादव, नाई, प्रजापत, नाथ, पांचाल, बुनकर, धोबी, मुस्लिम, तथा जैन समुदाय रहते हैं. संख्या और सामाजिक तौर पर राजपूत समुदाय का गाँव में वर्चस्व है.  गाँव में सिसोदिया, राठोड़, पंवर, तथा बोडना इन कुलों के राजपूत हैं. स्थानीय सूत्रों से पता चला कि इन्हें वागड़ीया राजपूत कहा जाता है. गाँव में विभिन्न गोत्रों के होने के कारण इस गाँव के ही परिवारों में वैवाहिक संबंध स्थापित होने का चलन रहा है. इस गाँव के अधिकतर पुरुष आजीविका हेतु बंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में रहते हैं.

रमा और प्रकाश की शादी की पारिवारिक व सामाजिक पूर्वपीठिका :
2007 में पचलासा छोटा गाँव के वार्ड क्रमांक 4 की निवासी रमा कँवर पुत्री विजय सिंह सिसोदिया का विवाह गाँव के माधो सिंह के साथ हुआ परन्तु इस संबंध से नाखुश हो कर रमा कँवर लगभग छ: महीने पश्चात अपने पैतृक परिवार के साथ रहने लगी. इस दौरान पूर्व शादी के लगभग साल भर बाद रमा कँवर ने प्रकाश पुत्र कचरू सेवक जो उनके पड़ोसी थे, से अपनी मर्जी से विवाह किया. कलावती पत्नी कचरू सेवक के अनुसार दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली और वे बंबई में रहने लग गए. विभिन्न स्त्रोतों से पता चला कि प्रकाश की भी शादी पूर्व में हो चुकी थी. सागवाड़ा उपाधिक्षक ब्रजराज चारण ने बताया कि प्रकाश की पहली पत्नी नाते चली गयी थी. इस तरह राजपूत समुदाय की रमा कँवर की शादी सेवक समुदाय के प्रकाश से दोनों की परस्पर सम्मति से हुई थी. इस सबंध के कारण राजपूत समुदाय में तीव्र प्रतिक्रया उठी. आज की तारीख में रमा कँवर के पूर्व पति ने व प्रकाश सेवक की पूर्व पत्नी ने अपनी अपनी पृथक गृहस्थी बसा ली है व दोनों के अपने अपने दांपत्य व बच्चे हैं. रमा कँवर का पूर्व पति अहमदाबाद या इंदौर में होने के बारे में गाँव में जानकारी प्राप्त हुई. प्रकाश सेवक की पूर्व पत्नी के वर्त्तमान स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी. प्रकाश सेवक के परिवार में उसके पिता कचरू सेवक, माँ कलावती सेवक के अलावा दो भाई जितेन्द्र  और  सुरेश थे व तीन बहनें थी. परन्तु कलावती जी के अनुसार प्रकाश इस विवाह के बाद फिर कभी घर नहीं आया.

सामाजिक दबाव व बहिष्कार:
रमा कँवर व प्रकाश सेवक के विवाह के मसले को लेकर राजपूत समुदाय की बैठक पचलासा छोटा गाँव के लक्ष्मी-नारायण मंदिर के सामने के चौक में हुई. गाँव में काफी तनाव का माहौल था. पचलासा छोटा में राजपूत समुदाय के पारंपारिक पञ्च दलपत सिंह के अनुसार यह 52 गाँवों के चोखले (curcuit of caste panchaayat) की बैठक थी. ज्ञात हो कि इस बैठक का स्थान व रमा कँवर को जिस स्थान पर ज़िंदा जलाया गया एक ही है. इस बैठक के होने की पुष्टि तत्कालीन सरपंच कालू भाई मीणा तथा प्रकाश सेवक की माँ, कलावती सेवक ने भी की. इस बैठक में निम्न फरमान सुनाया गया था:
·इस बैठक ने रमा कँवर और प्रकाश सेवक को अपने समुदाय के बाहर के व्यक्ति से विवाह दोषी माना.
·रमा कँवर तथा प्रकाश सेवक के गाँव में लौटने को प्रतिबंधित किया गया.
·इस बैठक ने गाँव के बाशिंदों को स्पष्ट निर्देश दिए कि संबधित परिवार को कोई नमक तक नहीं देगा.


चोखले के फरमान की परिणति:
इस बैठक के पश्चात परिणाम यह हुआ कि इस सेवक परिवार से उनके अपने समाज ने भी संबध तोड़ लिए. आज जब पुलिस कहती है कि सेवक समुदाय से भी कोई इस परिवार के बारे में बोलने को तैयार नहीं है तो इस पृष्ठभूमि को देखना ज़रूरी हो जाता है. यह सामजिक दबाव रमा कँवर के पैतृक परिवार व प्रकाश सेवक के पैतृक परिवार पर बीते 8 सालों से लगातार हावी रहा है. इसका परिणाम यह रहा कि प्रकाश सेवक के पिता तथा दोनों भाइयों को आजीविका के लिए गाँव से पलायन कर बाहर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा. परिवार को जब जमीन के लिए पूछा गया तो कलावती जी ने बताया कि उनके पास मात्र वही ज़मीन है जिसमें उनका मकान बना हुआ है. मकान के अलावा खेत के तौर पर नाम मात्र ज़मीन थी और दल ने पाया कि यह ज़मीन जोती हुई नहीं थी. परिवार के पुरुष घर के बाहर रहते थे और कलावती जी अस्वास्थ्य के कारण खेती के  करने में अक्षम थी.

कलावती जी से बात करके पता चला कि यह महिला सामाजिक दबाव का सामना करते हुए जीवनयापन करती रही. प्रकाश और रमा की शादी के पश्चात उसके परिवार में एक के बाद एक विपत्तियाँ आती रही. पर सामाजिक दबाव के चलते उसका बेटा प्रकाश कभी लौटकर नहीं आया. उन्होंने बताया कि उन्हें उनकी बेटी के सन्दर्भ में भी राजपूत समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा दबाव इससे पूर्व बनाया गया था.  उनकी बेटी, पति के मृत्यु के बाद उनके साथ रह रही थी. उसने अपनी मर्जी से अपने समुदाय के युवक के साथ संबंध बनाया पर गाँव के लोगों ने इस पर आपत्ति जताते हुए लड़की को ज़िंदा जला देने को कहा. पर कलावती नहीं मानी. उसने कहा कि वैसे भी गाँव उसके साथ संबंध तोड़ चुका है इससे बुरा और क्या हो सकता है. लड़की ने इस संबंध से भी बाहर आकर फिर अपने समुदाय के युवक के साथ घर बसाया व आज उसके बच्चे भी है. कलावती व कचरू सेवक का सबसे छोटे बेटे सुरेश की बंबई में टीबी से मौत हुई. उसकी अंतिम क्रिया वहीं की गयी. हालांकि कलावती जी कहती हैं कि इन्फेक्शन फ़ैलने का अंदेशे के चलते ऐसा किया  गया पर यह सोचा जा सकता है कि सामाजिक तौर पर बहिष्कृत परिवार गाँव के सहयोग के बिना बेटे का अंतिम संस्कार कैसे करता. इस घटना के बाद कलावती जी के पति कचरू सेवक की भी मौत हुई. इस तनाव से वे बीमार रहने लगे व कुछ समय बाद वे गुज़र गए. अब कलावती अपने बेटे जितेन्द्र की पत्नी भावना के साथ रहती हैं. भावना व जितेन्द्र ने भी दो माह पूर्व कोर्ट में शादी की. इन सभी मौकों पर प्रकाश परिवार के किसी भी कार्य में सहभागी नहीं हुआ या कहें कि नहीं हो पाया.

जिस गाँव में लगभग 80 प्रतिशत घर दबंग जाति के हो वहाँ सामजिक तौर पर उनकी हुकूमत को इस तरह के फरमानों से समझा जा सकता है कि इस तरह के फरमान सामाजिक बहिष्कार को स्थापित करते हैं जो असंवैधानिक है और अतः लोकंतंत्र की धज्जियां उड़ाते हैं.

रमा कँवर की ह्त्या:
पिछले लगभग 8 साल से अपने विवाह के बाद रमा कँवर और प्रकाश दोनों ही अपने गाँव परिजनों से मिलने तक नहीं आए थे. उनके गाँव में प्रवेश पर पाबंदी थी. ऐसी स्थितियों में 3 मार्च 2016 को रमा कँवर अपनी व प्रकाश की बेटी (आयु 3 साल) को लेकर प्रकाश के बिना ही पचलासा छोटा आयी. रमा अपने ससुराल यानी प्रकाश के घर गयी. कलावती व प्रकाश के छोटे भाई जितेन्द्र की पत्नी भावना घर पर थे. कलावती जी ने बताया कि रमा के गाँव लौटने पर उन्हें डर था कि जिस गाँव में वे प्रकाश-रमा के विवाहोपरांत से बहिष्कार झेल रही थी वह गाँव उन्हें रमा के आने पर ज़िंदा नहीं रहने देगा. उन्होंने अपने डर को रमा से साझा किया तब रमा ने उन्हें बताया कि उसके गाँव लौटने की सूचना उसके पीहर में थी. कलावती और भावना दोनों के अनुसार रमा जब घर लौटी तब वह 4-5 महीने की गर्भवती थी. इन परिस्थितियों में रमा का अचानक अपने गाँव अपने ससुराल में लौटना कई तरह के संदेह उत्पन्न करता है. ऐसे में अब केवल प्रकाश ही इस पर कुछ रौशनी डाल सकता है.  भावना ने बताया कि रमा अधिक सामान नहीं लेकर आयी थी. उसके सामान में सब से अधिक सामान उसकी बेटी के कपडे थे.

4 मार्च को शाम के समय लगभग 7.30 बजे से 8.00 बजे तक बिजली अप्रत्याशित रूप से गायब रही. इसकी पुष्टि गाँव के विभिन्न बस्तियों के बाशिंदों से हुई. कुछ लोगों का यह मानना था कि यह गाँव के दबंग लोगों द्वारा की गयी हरकत थी. आम तौर पर गाँव में दहशत फैलाने के उद्देश्य से ऐसी हरकत की जाती है. यह एक तरह से गाँव के लोगों को घर से बाहर न निकलने की दी गयी चेतावनी थी. कुछ लोगों के अनुसार रमा के भाई और राजपूत समुदाय के लोगों ने अनौपचारिक बैठक इसी दौरान की व घटना को अंजाम देने के लिए आवश्यक सामग्री जुटाई गयी. जब वे रात रमा के ससुराल घुसे तो वे हिंसा की नीयत से ही घुसे थे.

'इज़्ज़त' बचाने के बाद गांव में पसरी शांति (फोटो- प्रज्ञा जोशी) 
कलावती जी के अनुसार शाम को 8.00 से 8.30 के दरम्यान रमा के भाई और अन्य रिश्तेदार घर में जबरदस्ती घुस आएं. वे रमा तथा प्रकाश को ढूंढ रहे थे. रमा उस वक़्त बाथरूम में बंद थी. उसे बाहर निकाला गया. उसके भाई तथा रिश्तेदार उसे लगातार पीटते रहे. कलावती व भावना ने मध्यस्ती कर रमा को बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी मारा गया. कलावती जी को इतने जोर से मारा कि वे बेहोश हो गयी. भावना ने बताया कि रमा के भाई रमा को खींचकर बाहर ले जाने लगे. वे रमा की तीन साल की बेटी नन्ही को भी ले जाना चाहते थे. भावना को उनके इरादे ठीक नहीं लगे तो उसने खींचकर बच्ची को अपने साथ रखा.

ज्ञात हो कि रमा का पीहर और ससुराल के मकाने लगभग आमने सामने हैं. गाँव के प्रमुख चौराहे के पीछे की गली में दोनों मकान स्थित है. ऐसे में रमा को खींचकर मारते हुए भरे चौक में लाया गया व् उसके ऊपर केरोसीन डाल कर उसे ज़िंदा ज़लाया गया. ज़ाहिर है इस दौरान रमा ने बचाव के लिए खूब आवाज़ लगाई होगी परन्तु उसका बचाव नहीं किया गया. सार्वजनिक रूप से उसे जलाया गया. जिस स्थान पर उसके खिलाफ 52 गाँवों के चोखले ने फरमान सुनाया था उसी चौक में उसे जलाया गया. किसी ने उसे नहीं बचाया. बड़ी तादात में भीड़ होने के बावजूद रमा कँवर को बचाया नहीं जा सका यह ह्रदयविदारक सत्य है. रात 8.30 से 9.00 के दरम्यान यह घटना हुई. रमा के जले शरीर को शमशान ले जाकर उसका अंतिम संस्कार किया गया.

जवाबदेही किसकी?
रमा को जब सार्वजनिक तौर पर ज़िंदा जलाया गया तो निश्चित रूप से बड़ी तादात में लोग उपस्थित थे पर आज बोलने के लिए कोई भी तैयार नहीं है. जिस स्थान पर रमा को जलाया वहाँ ना केवल मंदिर, बाज़ार की दुकाने हैं वहीं पास में आंगनवाडी भी है. टीम के सदस्यों ने ग्राम सचिव गोवर्धन सिंह चौहान तथा पटवारी मोहनलाल यादव से बात की परन्तु उनके अनुसार वे उस समय गाँव में थे नहीं. गाँव की विभिन्न बस्तियों में हमें बताया गया कि उन्हें अगले दिन सबेरे खबर मिली. घटनाक्रम को देखते हुए इसकी संभावना कम लगती है कि इस घटना के दौरान गाव की प्रमुख बस्तियों में इसकी खबर ना चली हो. यह सोचसमझकर साधी हुई चुप्पी है. ऐसे में जवाबदेही निर्धारित करना ज़रूरी है. पुलिस को खबर देर से की गयी . पुलिस के अनुसार रात्रि देर रात को लैंड लाईन फोन पर पचलासा छोटा में रमा कँवर को ज़िंदा ज़लाने की सूचना दी गयी थी. उसके अनुसार उन्होंने मौक़ा मुआइना कर  रिपोर्ट दर्ज कराई व तपतीश कर  रमा के भाई तथा अन्य को गिरफ्तार किया. पुलिस के अनुसार जब तक वे पहुंचे रमा का शव  राख में तब्दील हो चुका था.

पीयूसीएल के सवाल तथा मांगे: 

·पुलिस प्रशासन ने अपनी सक्रिय तत्परता से कार्रवाई कर आरोपितों को गिरफ्तार कर एक प्रशंसनीय पहल की है. अब आवश्यकता इस बात की है कि गाँव में छाये दहशत के माहौल को दूर कर प्रशासन आम ग्रामवासी के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास को पुनर्बहाल करे. इस विश्वास के अभाव में गवाह आगे नहीं आयेंगे और ऐसे में अपराधी आखिरकार छूट जायेंगे. ऐसी किसी निर्मम घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए भी इस हत्या के दोषियों को समुचित दंड मिलना आवश्यक है. हमारी मांग है कि सभी नामजद अभियुक्तों की अनिवार्य रूप से गिरफ्तारी हो और उन्हें सामान्य परिश्तितियों में बेल न मिले.

·अगर  यह परिवार सामजिक दबाव के डर से पचलासा छोटा में पुनर्वासित होने में कतराए तो यह प्रशासन का अपयश होगा कि वह इस परिवार के रिहाईश के अनुकूल वातावरण गाँव में तैयार करने में नाकाम रहा. ऐसे में परिवार के इच्छा अनुरूप परिवार को घर उपलब्ध कराना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है. पता करने  पर ज्ञात हुआ कि कलावती को विधवा पेंशन मिल रही थी. उस परिवार का नाम गरीबीरेखा से नीचे की सूची में शामिल है परन्तु सभी विकास योजनाओं का लाभ इस परिवार को मिले यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेवारी है.

·रमा व प्रकाश की 3 वर्षीय बेटी नन्ही को पालनहार योजना के साथ जोड़ा जाए.

·सामजिक बहिष्कार का बीते 8 साल से सामना करनेवाली कलावती जी पर आज प्रकाश व् रमा कँवर की बेटी के परवरिश की ज़िम्मेदारी आन पडी है. बीते समय में जो उनके अधिकारों का हनन हुआ है उसे ध्यान में रखते हुए उन्हें 20 लाख रुपये का मुवावज़ा दिया जाए. साथ ही नन्ही के परवरिश के हेतु 10 लाख रुपये प्रदान किए जाए.

·पीड़ित सेवक परिवार को आज अपने घर से दूर अज्ञात स्थान पर रहना पड़ रहा है जिसमें पुलिस द्वारा उन्हें सहयोग और संरक्षण प्रदान किया गया है. हालात जितनी जल्दी सामान्य होंगे, इस परिवार को अज्ञातवास छोड़कर अपने घर लौटना संभव होगा. इसके लिए यथासंभव प्रयास किये जाने चाहिए. इसके लिए आवश्यक होगा कि इस परिवार के पक्ष में गाँव में सकारात्मक जनमत को तैयार किया जाए. आशा है कि पुलिस व प्रशासन इस सन्दर्भ में उचित कार्यवाही करेंगे. पुलिस विभाग के अलावा प्रशासनिक स्तर का कोई अधिकारी गाँव नहीं गया व पीड़ित सेवक परिवार से नहीं मिला ये अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है. यह भी विडम्बनापूर्ण है कि ग्राम स्तर पर कार्यरत प्रशासनिक कर्मियों यथा ग्राम सेवक, पटवारी, आंगनबाड़ी प्रबंधक आदि द्वारा ग्राम में घटित इस क्रूर घटना का कोई संज्ञान नहीं लिया गया और न ही ऐसी कोई जानकारी है कि जिले के उच्च अधिकारियों द्वारा उनसे कोई रिपोर्ट माँगी गयी.

·प्रकाश जहां कहीं भी है, उसकी ज़िंदगी पर खतरा बरक़रार है. उसकी खोज खबर एवं कुशलता को सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है.

·इस निर्मम हत्याकांड को 15 दिन बीत जाने के बाद भी राज्य महिला आयोग द्वारा इसका संज्ञान भी न लिया जाना शर्म की बात है. यदि राज्य महिला आयोग ने इस पर सख्त कदम उठाते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को स्पष्ट शब्दों में रखा होता और घटना स्थल पर जाकर पीड़ित सेवक परिवार का साथ दिया होता तो अपराधियों के हौसले पस्त होते और आम जनता में विश्वास का संचार होता.

·रमा के जल जाने से सामने आया कि उसकी मौत सामाजिक बहिष्कार की परिणति थी. बीते 8 साल से जिस दहशत में गाँव का परिवार जी रहा था उसकी जवाबदेही किसकी मानी जाएगी? इस तरह का सामाजिक बहिष्कार 8 साल तक गाँव में कैसे बना रहा और इस संबंध में किसी भी सरकारी नुमाइंदे ने शिकायत क्यों दर्ज नहीं कराई? इस परिवार के संबंध में यह तथ्य क्यों छुपाया गया कि यह परिवार सामाजिक बहिष्कार को झेल रहा था. इसी सामाजिक बहिष्कार के डर से आज इस अमानवीय घटना के बाद भी लोगों के मुंह पर ताले पड़े हुए है. कहना न होगा कि इस प्रकार के सामाजिक बहिष्कार का फरमान देने वाले चोखले की बैठक खाप का ही एक प्रांतीय संस्करण है और इस पर तुरंत रूप से प्रतिबन्ध लगाता क़ानूनन आवश्यक है. पिछली केंद्र सरकार ने खाप पंचायतों के ऐसे फैसलों के खिलाफ तथाकथित सम्मान एवं परम्परा के नाम पर होने वाले अपराधों की रोकथाम संबंधी विधेयक का प्रस्ताव रखा था लेकिन वह ठन्डे बस्ते में चला गया. वर्तमान केंद्र सरकार ने भी इस सम्बन्ध में विधि आयोग की रिपोर्ट पर राज्य सरकारों से राय माँगी थी. लगभग सभी राज्य सरकारों की इसके समर्थन में राय आ भी चुकी है, पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई. वर्तमान तथा इससे पूर्व की दोनों केंद्र सरकारों ने अपने बयानों में इन खाप पंचायतों को न्याय और संविधान के खिलाफ माना है. पर दंड संहिता में समुचित बदलाव न होना इनके इरादों के ठोस होने में संदेह पैदा करता है. यदि यह विधेयक जल्दी आता है तो इन हत्याओं के सामूहिक चरित्र की पहचान और दंड का प्रावधान संभव हो पायेगा.

·भावना और कलावती दोनों ने स्पष्ट बताया कि रमा ने उन्हें बताया था कि उसके गाँव वापिस आने की खबर उसके पीहर में थी.  ऐसे में साफ़ है कि यह एक सोची समझी साजिश के तहत अंजाम दी घटना थी. इन हालातों में पुलिस गाँव से साक्ष्य जुटाकर आरोपियों को सज़ा तक कैसे पहुंचाएगी यह सवाल बारबार उठता है. यह निहायत ज़रूरी है कि आरोपियों को बेल ना मिले क्योंकि वे  साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकते है और गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं.

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पीयूसीएल के तथ्यान्वेषी दल के सदस्य इस प्रकार थे धुली बाई (एकल नारी शक्ति संगठन), छगन बाई (एकल नारी शक्ति संगठन), कमलेश शर्मा (पीयूसीएल) धर्मराज गुर्जर (पीयूसीएल), हेमंत खराड़ी (राजस्थान शिक्षक संघ, शेखावत), फेंसी (विकल्प संस्थान, उदयपुर), मधुलिका (पीयूसीएल), कांतिलाल रोत (पीयूसीएल तथा आदीवासी संघर्ष समिति), प्रज्ञा जोशी (पीयूसीएल). जाँच दल ने कई जगह पर व्यक्तियों के नाम उन लोगों की सुरक्षा के मद्देनज़र नहीं दिए हैं.
नोट/अपडेट  : 22.03.16 को पीयूसीएल, जयपुर एवं नगर के प्रमुख महिला संगठनों के प्रतिनिधि राज्य की महिला एवं बाल मंत्री सुश्री अनीता भदेल तथा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री सुमन शर्मा से मिले, यह रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा अपनी मांगें रखीं. मंत्री महोदया ने इस घटना के प्रति अपनी अनभिज्ञता जाहिर की परन्तु अब इस मामले में ध्यान देने का आश्वासन दिया.
राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री सुमन शर्मा ने आश्वासन दिया कि वे सम्बन्षित विभागों को तलब कर इस विषय में की गयी कार्रवाई की रिपोर्ट लेंगी तथा व्यक्तिशः 1 से 4 अप्रैल के अपने दक्षिण राजस्थान के दौरे के अंतर्गत विशेष रूप से पचलासा छोटा जायेंगी.

                                                                                                                                                                                                                                                                 


06 अप्रैल 2014

भाजपा के हनुमान बने तीन दलित राम: आनंद तेलतुंबड़े

चुनाव के मौसम में जिस तरह मौकापरस्त गठबंधनों को वंचित और दलित जनता के हितों की पैरोकारी का नाम दिया जाता है, उसमें आनंद तेलतुंबड़े का यह नया लेख पढ़ना दिलचस्प है. अनुवाद: रेयाज उल हक
बाबासाहेब आंबेडकर का झंडा ढोने का दावा करने वाले तीन दलित रामों ने - रामदास आठवले, राम विलास पासवान और राम राज (हालांकि उन्होंने कुछ साल पहले अपना नाम बदल कर उदित राज कर लिया था), सत्ता के टुकड़ों की आस में पूरी बेशर्मी से रेंगते हुए अपनी ठेलागाड़ी को भाजपा के रथ के साथ जोत दिया है. इनमें से पासवान 1996 से 2009 तक अनेक प्रधानमंत्रियों – अटल बिहारी बाजपेयी, एचडी देवेगौड़ा, आईके गुजराल और मनमोहन सिंह - के नेतृत्व में बनने वाली हरेक सरकार में केंद्रीय मंत्री (रेलवे, संचार, सूचना तकनीक, खनन, इस्पाद, रसायन एवं उर्वरक) रहे और उन्होंने खुद को एक घाघ खिलाड़ी साबित किया है. उनको छोड़ कर बाकी के दोनों राम हाल हाल तक भाजपा के सांप्रदायिक चरित्र के खिलाफ गला फाड़ कर चिल्लाते रहे थे. आठवले की रीढ़विहीनता तब उजागर हुई जब केंद्र में मंत्री बनने की उनकी बेहिसाब हसरत पूरी नहीं हुई और 2009 के लोकसभा चुनावों में वे हार गए. उन्होंने कांग्रेस के अपने सरपरस्तों पर अपने ‘अपमान’ का इल्जाम लगाना शुरू किया, जिन्होंने उन्हें सिद्धार्थ विहार के गंदे से कमरे से उठा कर महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री के रूप में सह्याद्रि के एयरकंडीशंड सूइट में बिठाया था. लेकिन कम से कम डॉ. उदित राज (हां, उन्होंने प्रतिष्ठित बाइबल कॉलेज एंड सेमिनरी, कोटा, राजस्थान से डॉक्टरेट किया था!)  ने जिस तरह से अपने भाजपा-विरोधी तर्कसंगत रुख से कलाबाजी खाई है, वह हैरान कर देने वाला है.

एक मायने में, भारतीय लोकतंत्र के पतन को देखते हुए, दलित नेतृत्व की ऐसी मौकापरस्त कलाबाजियां किसी को हैरान नहीं करती हैं. आखिरकार हर कोई ऐसा ही कर रहा है. तब अगर दलित नेता ऐसा करते हैं तो इसकी शिकायत क्यों की जाए? आखिरकार, उनमें से अनेक अब तक कांग्रेस में रहते आए हैं, तो अब वे भाजपा में जा रहे हैं तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? हो सकता है कि भाजपा और कांग्रेस में बहुत थोड़ा ही फर्क हो, लेकिन असल में चिंतित होने की वजहें उनके पेशों और उनके बारे में जनता की अवधारणा में निहित हैं. कांग्रेस के उलट, भाजपा एक विचारधारा पर चलने वाली पार्टी है. इसका विचारधारात्मक आधार हिंदुत्व है, जिसमें शब्दों की कोई लफ्फाजी नहीं है, यह फासीवाद की विचारधारा है जिसे साफ तौर से आंबेडकर की विरोधी विचारधारा के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि उपयोगिता भाजपा से भारत के संविधान के प्रति वफादारी की मांग करती है या फिर आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों को लुभाने की मांग करती है, लेकिन उनका विचारधारात्मक रवैया उन सबके खिलाफ है. इसलिए दलित नेताओं को आंबेडकर का जयगान गाते हुए उनके साथ गद्दारी करने की इस घटिया हरकत को देखकर गहरा दुख होता है.

आंबेडकर की विरासत

हालांकि आंबेडकर ने हिंदू धर्म में सुधारों के विचार के साथ शुरुआत की थी जिसका आधार उनका यह खयाल था कि जातियां, बंद वर्गों की व्यवस्था हैं [कास्ट्स इन इंडिया]. यह घेरेबंदी बहिर्विवाह और अंतर्विवाह के व्यवस्था के जरिए कायम रखी जाती है। व्यवहार में इसका मतलब यह था कि अगर अंतर्विवाहों के जरिए इस व्यवस्था से मुक्ति पा ली गई तो इस घेरेबंदी में दरार पड़ जाएगी और जातियां वर्ग बन जाएंगी। इसलिए उनकी शुरुआती रणनीति यह बनी थी कि दलितों के संदर्भ में हिंदू समाज की बुराइयों को इस तरह उजागर किया जाए कि हिंदुओं के भीतर के प्रगतिशील तत्व सुधारों के लिए आगे आएं। महाड में उन्होंने ठीक यही कोशिश की है। हालांकि महाड में हुए कड़वे अनुभव से उन्होंने नतीजा निकाला कि हिंदू समाज में सुधार मुमकिन नहीं, क्योंकि इनकी जड़ें हिंदू धर्मशास्त्रों में गड़ी हुई थीं। तब उन्होंने सोचा कि इन धर्मशास्त्रों के पुर्जे उड़ाए बगैर जातियों का खात्मा नहीं होगा [एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट]। आखिर में, अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले उन्होंने वह तरीका अपनाया जो उनके विचारों के मुताबिक जातियों के खात्मे का तरीका था: उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। इतना वक्त बीत जाने के बाद, आज इस बात में कोई भी उनके विश्लेषण के तरीके की कमियों को आसानी से निकाल सकता है। लेकिन जातियों का खात्मा आंबेडकर की विरासत के केंद्र में बना रहा। इस दौरान उन्होंने जो कुछ भी किया वह दलितों को सशक्त करने के लिए किया ताकि वे उस जाति व्यवस्था के खात्मे के लिए संघर्ष कर सकें, जो उनकी निगाह में ‘स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे’ को साकार करने की राह में सबसे बड़ी रुकावट थी। चूंकि मार्क्सवादियों के उलट वे यह नहीं मानते थे कि इतिहास किसी तर्क के आधार पर विकसित होता है, कि इसकी गति को कोई नियम नियंत्रित करता है, इसलिए उन्होंने वह पद्धति अपनाई जिसे व्यवहारवाद कहा जाता है। इसमें उनपर कोलंबिया में उनके अध्यापक जॉन डिवी का असर था।

व्यवहारवाद एक ऐसा नजरिया है जो सिद्धांतों या विश्वासों का मूल्यांकन, व्यावहारिक रूप से उन्हें लागू करने में मिली कामयाबी के आधार पर करता है। यह किसी विचारधारात्मक नजरिए को नकारता है और सार्थकता, सच्चाई या मूल्य के निर्धारण में बुनियादी कसौटी के रूप में व्यावहारिक नतीजों पर जोर देता है. इसलिए यह मकसद की ईमानदारी और उसको अमल में लाने वाले के नैतिक आधार पर टिका होता है। आंबेडकर का संघर्ष इसकी मिसाल है। अगर इस आधार से समझौता कर लिया गया तो व्यवहारवाद का इस्तेमाल दुनिया में किसी भी चीज़ को जायज ठहराने के लिए किया जा सकता है। और आंबेडकर के बाद के आंदोलन में ठीक यही हुआ। दलित नेता ‘आंबेडकरवाद’ या दलित हितों को आगे ले जाने के नाम पर अपना मतलब साधने में लगे रहे। भारत की राजनीति का ताना-बाना कुछ इस तरह का है कि एक बार अगर आप पैसा पा जाएं तो आप अपने साथ जनता का समर्थन होने का तमाशा खड़ा कर सकते हैं। एक बार यह घटिया सिलसिला शुरू हो जाए तो फिर इसमें से बाहर आना मुमकिन नहीं। इसी प्रक्रिया की बदौलत एक बारहवीं पास आठवले करोड़ों रुपए की संपत्ति जुटा सकता है, और उस आंबेडकर की विरासत का दावा कर सकता है जो बेमिसाल विद्वत्ता और दलितों-वंचितों के हितों के प्रति सर्वोच्च प्रतिबद्धता के प्रतीक हैं। करीब करीब यही बात दूसरे रामों और उनके जैसे राजनीतिक धंधेबाजों के बारे में भी कही जा सकती है। उनका सारा धंधा आंबेडकर और दलित हितों की तरक्की के नाम पर चलता है।

दलित हित क्या हैं?

अपने निजी मतलब को पूरा के लिए बेकरार ये सभी दलित हितों की पुकार मचाते हैं. दलित नेताओं में यह प्रवृत्ति तब भी थी जब आंबेडकर अभी मौजूद ही थे. तभी उन्होंने कांग्रेस को जलता हुआ घर बताते हुए उसमें शामिल होने के खिलाफ चेताया था. जब कांग्रेस ने महाराष्ट्र में यशवंत राव चह्वाण के जरिए दलित नेतृत्व को हथियाने का जाल फैलाया तो आंबेडकरी नेता उसमें जान-बूझ कर फंसते चले गए. बहाना यह था कि इससे वे दलित हितों की बेहतर सेवा कर पाएंगे. उन्होंने जनता को यह कहते हुए भी भरमाया कि आंबेडकर ने नेहरू सरकार में शामिल होकर कांग्रेस के साथ सहयोग किया था. भाजपा उस हजार चेहरों वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक धड़ा है, जो हिंदुत्व पर आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पैरोकारी करता है. उसने संस्कृति और धर्म का यह अजीब घालमेल जनता को भरमाने के लिए किया है. यह भाजपा अंबडकरियों के लिए सिर्फ एक अभिशाप ही हो सकती है. असल में अनेक वर्षों तक यह रही भी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. आरएसएस ने समरसता (समानता नहीं बल्कि सामाजिक सामंजस्य) का जाल दलित मछलियों को फंसाने के लिए फेंका और इसके बाद अपनी सख्त विचारधारा में थोड़ी ढील दी. दिलचस्प है कि दलित हितों के पैरोकार नेता, शासक वर्ग (और ऊंची जातियों) की इन पार्टियों को तो अपने ठिकाने के रूप में पाते हैं लेकिन वे कभी वामपंथी दलों पर विचार नहीं करते हैं, जो अपनी अनगिनत गलतियों के बावजूद उनके स्वाभाविक सहयोगी थे. इसकी वजह सिर्फ यह है कि वामपंथी दल उन्हें वह सब नहीं दे सके, जो भाजपा ने उन्हें दिया है.

तो फिर दलित हितों का वह कौन सा हौवा है, जिसके नाम पर ये लोग यह सारी करतब करते हैं? क्या वे यह जानते हैं कि 90 फीसदी दलितों की जिंदगी कैसी है? कि भूमिहीन मजदूरों, छोटे-हाशिए के किसानों, गांवों में कारीगरों और शहरों में झुग्गियों में रहने वाले ठेका मजदूरों और शहरी अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक सेक्टर में छोटे मोटे फेरीवाले की जिंदगी जीने वाले दलित किन संकटों का सामना करते हैं? यहां तक कि आंबेडकर ने भी अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त में यह महसूस किया था और इस पर अफसोस जताया था कि वे उनके लिए कुछ नहीं कर सके. आंशिक भूमि सुधारों के पीछे की पूंजीवादी साजिशों और हरित क्रांति ने गांवों में पूंजीवादी संबंधों की पैठ बना दी, जिसमें दलितों के लिए सुरक्षा के कोई उपाय नहीं थे. इन कदमों का दलित जनता पर विनाशकारी असर पड़ा, जिनके तहत अंतर्निर्भरता की जजमानी परंपरा को नष्ट कर दिया गया. देहातों में पहले से कायम ऊंची जातियों के जमींदारों को बेदखल करके उनकी जगह लेने वाले, सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी शूद्र जातियों के धनी किसानों द्वारा क्रूर उत्पीड़न के लिए दलितों को बेसहारा छोड़ दिया. ब्राह्मणवाद का परचम अब उन्होंने अपने हाथों में ले लिया था. बीच के दशकों में आरक्षण ने उम्मीदें पैदा कीं, लेकिन वे जल्दी ही मुरझा गईं. जब तक दलितों को इसका अहसास होता कि उनके शहरी लाभान्वितों ने आरक्षणों पर एक तरह से कब्जा कर रखा है, कि नवउदारवाद का हमला हुआ जिसने आरक्षणों को पूरी तरह खत्म ही कर दिया. हमारे राम इन सब कड़वी सच्चाइयों से बेपरवाह बने रहे और बल्कि उनमें से एक, उदित राज, ने तो आरक्षण के एक सूत्री एजेंडे के साथ एक अखिल भारतीय संगठन तब शुरू किया, जब वे वास्तव में खत्म हो चुके थे. जनता को आरक्षण के पीछे छिपी शासक वर्ग की साजिश को दिखाने के बजाए, वे शासक वर्ग की सेवा में इस झूठे आसरे को पालते-पोसते रहने को तरजीह देते हैं. क्या उन्हें यह नहीं पता कि 90 फीसदी दलितों की जरूरतें क्या हैं? उन्हें जमीन चाहिए, सार्थक काम चाहिए, मुफ्त और उचित और बेहतर शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य की देखरेख चाहिए, उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी ढांचे चाहिए और जाति विरोधी सांस्कृतिक व्यवस्था चाहिए. ये हैं दलितों के हित, और अफसोस इस बात है कि किसी दलित राम द्वारा उनकी दिशा में बढ़ना तक तो दूर, उनको जुबान तक पर नहीं लाया गया है.

भाजपाई राम के हनुमान

यह बात एक सच्चाई बनी हुई है कि ये राम दलित हितों के नाम पर सिर्फ अपना फायदा ही देखते हैं. उदित राज इनमें से सबसे ज्यादा जानकार हैं, अभी कल तक संघ परिवार और भाजपा के खिलाफ हर तरह की आलोचनाएं करते आए हैं जो अगर कोई देखना चाहे तो उनकी किताब ‘दलित्स एंड रिलिजियस फ्रीडम’ में यह आलोचना भरी पड़ी है. उन्होंने मायावती को बेदखल करने के लिए सारी तरकीबें आजमा लीं और नाकाम रहने के बाद अब वे उस भाजपा की छांव में चले गए हैं, जो खुद उनके ही शब्दों में दलितों का सबसे बड़ा दुश्मन है. दलितों के बीच उनकी जो कुछ भी थोड़ी बहुत साख थी, उसका फायदा भाजपा को दिलाने के लिए वे हनुमान की भूमिका अदा कर रहे हैं. दूसरे दोनों राम, पासवान और आठवले ने उदित राज के उलट भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने का फैसला किया है. वे दलितों में अपने छोटे-मोटे आधारों के बूते बेहतर सौदे पाने की कोशिश कर रहे हैं: पासवान को सात सीटें मिली हैं, जिनमें से तीन उनके अपने ही परिवार वालों को दी गई हैं, और आठवले को उनकी राज्य सभा सीट के अलावा एक सीट दी गई है. बीते हुए कल के कागजी बाघ आठवले नामदेव ढसाल के नक्शे-कदम पर चल रहे हैं, जो बाल ठाकरे की गोद में जा गिरे थे. उस बाल ठाकरे की गोद में, जो आंबेडकर और आंबडेकरी दलितों से बेहद नफरत करता था. ये काबिल लोग अपने पुराने सहयोगियों द्वारा ‘दलितों के अपमान’ (अपने नहीं) को भाजपा के साथ हाथ मिलाने की वजह बताते हैं. आठवले का अपमान तब शुरू हुआ जब उन्हें मंत्री पद नहीं मिला. उन्हें तब शर्मिंदगी नहीं महसूस हुई जब उन्होंने दलितों द्वारा मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखने के लिए दी गई भारी कुर्बानी को नजरअंदाज कर दिया और विश्वविद्यालय के नाम को विस्तार दिए जाने को चुपचाप स्वीकार कर लिया था. और न ही उन्हें तब शर्मिंदगी महसूस हुई जब उन्होंने दलित उत्पीड़न के अपराधियों के खिलाफ दायर मुकदमों को आनन-फानन में वापस ले लिया. ये तो महज कुछ उदारण हैं, पासवान और आठवले का पूरा कैरियर दलित हितों के साथ ऐसी ही गद्दारी से भरा हुआ है.

अब वे भाजपा के राम की सेवा करने वाले हनुमान की भूमिका निभाएंगे. लेकिन यह मौका है कि दलित उनके मुखौटों को टुकड़े टुकड़े कर दें और देख लें कि उनकी असली सूरत क्या है: एक घटिया बंदर!

03 अप्रैल 2014

हमारे दौर के लिए एक आंबेडकर

बाबासाहेब आंबेडकर की क्रांतिकारी रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट पर अरुंधति रॉय द्वारा लिखी गई हालिया प्रस्तावना द डॉक्टर एंड द सेंट के बारे में छिड़े विवाद पर यह सबसे तर्कसंगत, सटीक और रचनात्मक हस्तक्षेप है, जिसमें आनंद तेलतुंबड़े ने न सिर्फ जातियों के खात्मे के सवाल को केंद्र में रखते हुए पूरे विवाद का विश्लेषण किया है, बल्कि उन्होंने आंबेडकर को एकांगी और सरलीकृत प्रतीक के रूप में पेश किए जाने की राजनीति और इसके खतरों को भी सामने रखा था. अनुवाद: रेयाज उल हक

आउटलुक (10 मार्च 2014) में छपे अपने एक साक्षात्कार में अरुंधति रॉय ने कहा, ‘हमें अंबेडकर की जरूरत है-अभी और तुरंत’. यह बात उन्होंने नई दिल्ली के एक प्रकाशक नवयाना से बाबासाहेब आंबेडकर की रचना एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट के एक नए, व्याख्यात्मक टिप्पणियों वाले संस्करण के प्रकाशन के सिलसिले में कही. अरुंधति ने ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ के नाम से एक 164 पन्नों का निबंध इस किताब की प्रस्तावना के रूप में लिखा है. इस तरह करीब 100 पन्नों की मूल रचना अब प्रस्तावना और टिप्पणियों समेत 415 पन्नों की मोटी किताब के रूप में हमारे सामने है.

एक अनुचित विवाद

अरुंधति की प्रस्तावना ने दलित हलकों में एक अनुचित विवाद पैदा किया है. इसने 1970 के दशक में शुरुआती दलित साहित्य के दौर में चली बहस की याद दिला दी, कि कौन दलित साहित्य लिख सकता है. दलितों के पक्ष में दलील देनेवालों का जोर इसपर था कि दलित साहित्य लिखने के लिए जन्म से दलित होना जरूरी है. मौजूदा विवाद में भी पहचान को लेकर ऐसी ही सनक की झलक दिखी है, कि आंबेडकर या उनकी किसी रचना की प्रस्तावना लिखने के लिए या उनसे परिचित कराने के लिए अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र पेश करना जरूरी है. हालांकि यह बात उलझन में डालने वाली है कि जब अनगिनत गैर दलित पहले ही आंबेडकर और उनके लेखन पर लिख चुके हैं, ऐसा विवाद सिर्फ अरुंधति के मामले में ही क्यों पैदा हुआ? क्या यह उनकी नामी-गिरामी हैसियत की वजह से है या मध्य वर्गीय दलितों की नजर में उनके माओवादी समर्थक होने की बदनामी की वजह से? इस दूसरी बात की गुंजाइश ज्यादा है, और यह उनकी प्रतिक्रिया की मूल वजह हो सकती है. क्योंकि उनके लिए कम्युनिज्म से दूर दूर से भी किसी चीज का जुड़ा होना उससे दूर भागने और उसे खारिज कर देने के लिए काफी है.

इस शोरगुल की जो भी वजह हो, यकीनन यह अनुचित था. सोशल मीडिया पर घटिया फिकरों की बाढ़ को नजरअंदाज कर दें तो इस रचना को लेकर तर्कसंगत स्तर की जो मुख्य आपत्तियां रहीं उनमें ये थीं कि उन्होंने आंबेडकर से परिचय कराने में गांधी को अनुचित रूप से ज्यादा जगह दी है. या यह कहा गया कि क्या इस काम के लायक काबिलियत उनमें थी. या फिर यह कि उनकी प्रस्तावना किताब में शामिल मूल रचना की प्रस्तावना नहीं है. अगर कोई इन नजरियों को जायज मान भी ले तो यह मानना मुश्किल है कि उनको ऐसी शिद्दत के साथ और खारिज कर देने के लहजे में जाहिर करना जरूरी था. वास्तविकता ये है कि अरुंधति के भीतर के सृजनात्मक लेखक ने पारंपरिक अर्थों में मूल रचना को नहीं बल्कि मूल पाठ पर गांधी की पत्रिका हरिजन में छपी गांधी की प्रतिक्रिया के संदर्भ में आंबेडकर और गांधी के बीच विवाद को चुना. उन्होंने सोचा कि नीरस, मशीनी तरीके से विषय को उठाने के बजाए अगर वे आंबेडकर और गांधी के बीच विरोधाभास की मदद लेंगी तो वे जातियों की समस्या को कहीं ज्यादा कारगर तरीके से पेश कर पाएंगी क्योंकि गांधी उदार हिंदू समाज का बेहतर प्रतिनिधित्व करते हैं. जहां तक काबिलियत का सवाल है, हालांकि अरुंधति जिस किसी भी विषय के बारे में लिखती हैं, उसे समझने के लिए काफी मेहनत करती हैं, लेकिन उनके लेख में उनकी शैली की मांग के मुताबिक, आमफहम समझदारी से परे जाकर किसी विशेषज्ञता की तड़क-भड़क नहीं दिखाई देती है. और शायद इसीलिए, उनका निबंध आम लोगों को ज्यादा आकर्षित करता है बजाए तथाकथित बुद्धिजीवियों के.

हालांकि यह अजीब विरोधाभास है कि सबसे दिलचस्प दलील दलितों की तरफ से नहीं बल्कि एक ऊंची जाति के पत्रकार की तरफ से लाइव मिंट के 18 मार्च 2014 अंक में आई ('बीआर आंबेडकर, अरुंधति रॉय एंड द पॉलिटिक्स ऑफ एप्रोप्रिएशन', जी संपत) जिसमें अरुंधति को यह चुनौती दी गई कि अगर वे नियमगिरी पहाड़ियों के नीचे मौजूद बॉक्साइट को आदिवासियों के पास छोड़ देने की मांग करती हैं, तो क्यों नहीं उन्हें आंबेडकर को दलितों के लिए छोड़ देना चाहिए, जो दलितों की अकेली संपत्ति हैं. यह दलील दिलचस्प भले ही हो, इसको लागू किया जाना खतरनाक है क्योंकि जातियों के आधार पर ‘अन्य’ बता दिए गए लोगों की किसी भी भागीदारी या संवाद को अनुचित बता कर खारिज किया जा सकता है. आंबेडकर दलितों सांस्कृतिक हितों के प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन तब भी सिर्फ दलितों के लिए उनकी घेरेबंदी कर दिए जाने का मतलब उनकी तौहीन करना और दलितों के हितों को बेहिसाब नुकसान पहुंचाना होगा. नियमगिरी को आदिवासियों के लिए छोड़ दिया जाना विकास की प्रचलित अवधारणा को एक प्रगतिशील चुनौती है, जबकि आंबेडकर को सिर्फ दलितों तक सीमित कर देने का मतलब होगा बाबासाहेब आंबेडकर के जातियों के खात्मे के मकसद को पीछे की ओर ले जानेवाली प्रतिक्रांति.

आंबेडकर: वास्तविक और अवास्तविक

हैरानी की बात यह है कि पूरी बहस ने मुख्य मुद्दे को पीछे धकेल दिया है, वो यह है कि अरुंधति से किताब की प्रस्तावना लिखवाने के पीछे बुनियादी वजह प्रकाशक का कारोबारी हिसाब-किताब था. एक बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखिका होने के रुतबे के कारण, जिसमें बाद में विभिन्न मौकों पर विभिन्न मुद्दों पर जनता की हिमायत में निडरता से खड़े होने से और भी बढ़ोतरी हुई है, किताब को मशहूरियत मिलनी ही थी. इससे भी आगे बढ़कर, यह कल्पना भी की जा सकती थी कि उनके लेखन से विवाद भी जरूर पैदा होगा जैसा कि सचमुच हुआ भी. किसी भी प्रकाशक के लिए यह किताब की बिक्री के लिहाज से मुंहमांगी मुराद है. भले ही नवयाना ने सचेत रूप से इसके बारे में सोचा हो या नहीं, लेकिन कोई व्यक्ति एक प्रकाशक की उत्पाद संबंधी स्थापित रणनीतियों के बारे में कोई शिकायत नहीं कर सकता, क्योंकि जो भी हो उसे इस कारोबार के तौर तरीकों पर ही चलना होता है. खुद को ‘जाति विरोधी’ बताने के बावजूद नवयाना में इधर गिरावट के रुझान भी दिखे हैं. आंबेडकर को लेकर बेहद प्रशंसा और भक्तिभाव से भरा साहित्य प्रकाशित करना और जातियों के उन्मूलन को समर्थन देना एक ही बात नहीं है. कुछ लोगों द्वारा शुरू किया गया यह विवाद एक बार ठंडा पड़ जाए तो दलितों की व्यापक बहुसंख्या इस पर गर्व करेगी कि अरुंधति रॉय जैसी शख्सियत तक उनके देवता की पूजा में शामिल हो गई हैं. आंबेडकर के प्रति ऐसा भक्तिभाव असल में जातीय पहचान को मजबूत करता आया है और जातियों के खात्मे की परियोजना को और भी दूर धकेलता आया है.

आंबेडकर की स्वीकार्यता बढ़ रही है तो इससे लाजिमी तौर पर यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि आंबेडकर जो चाहते थे, ऐसा जाति-विरोधी सदाचार भी बढ़ रहा है. आज आंबेडकर आम स्वीकार्यता के मामले में किसी भी दूसरे नेता से यकीनन कहीं आगे निकल गए हैं. कोई भी दूसरा नेता प्रतिमाओं, तस्वीरों, सभाओं, किताबों, शोध, संगठनों, गीतों या लोकप्रियता की दूसरी सभी निशानियों के मामले में आंबेडकर का मुकाबला नहीं कर सकता. दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों और टीवी धारावाहिकों तक में उनकी तस्वीर स्थायी जगह पाने लगी है. हालांकि जातीय भेदभाव, जातीय उत्पीड़न, जातीय संगठनों और जातीय विमर्श आदि से जो बात साफ होती है, ये है कि आंबेडकर की स्वीकार्यता के समांतर जातिवाद का हमला भी बढ़ता गया है. इस अजीब रूप से विरोधाभासी परिघटना को केवल तभी समझा जा सकता है, जब वास्तविक आंबेडकर को अवास्तविक आंबेडकर से जुदा किया जाए. उस अवास्तविक आंबेडकर को, जिसे निहित स्वार्थों ने प्रतीकों में बदल दिया है, ताकि दलित जनता में पैदा होने वाली क्रांतिकारी बदलाव की चेतना को कुंद किया जा सके. ये प्रतीक वास्तविक और गूढ़ आंबेडकर को एक सरलीकृत प्रतीक में बदल देते हैं: संविधान का निर्माता, महान राष्ट्रवादी, आरक्षण का जन्मदाता, एक कट्टर कम्युनिस्ट विरोधी, एक उदारवादी जनवादी, संसदीय व्यवस्था का एक महान हिमायती, दलितों का मसीहा, एक बोधिसत्व आदि. एक हानिरहित, यथास्थितिवादी आंबेडकर के ये प्रतीक हर जगह छा गए हैं और इन्होंने वास्तविक आंबेडकर को क्रांतिकारी तरीके से देखने की संभावनाओं की राह में रुकावट खड़ी कर दी है.

कौन से आंबेडकर

राज्य के सक्रिय समर्थन के साथ निहित स्वार्थों द्वारा ऐसे प्रतीकों को बढ़ावा दिए जाने के पीछे की साजिशें जो भी हों, आंबेडकर द्वारा जिंदगीभर अपने नजरिए को विकसित करते रहने, और किसी विचारधारा विशेष में उलझे बगैर व्याहारिक प्रयोगों पर जोर देने के कारण आंबेडकर को समझना बेहद मुश्किल हो जाता है. युवा आंबेडकर ने जातियों को एक घेरे में बंद वर्गों के रूप में देखा, जिस घेरेबंदी को अंतर्विवाह और बहिर्विवाह की व्यवस्था के जरिए कायम रखा जाता है. उन्होंने उम्मीद की कि व्यापक हिंदू समाज जागेगा और अंतर्जातीय विवाह जैसे सामाजिक सुधारों को अपनाएगा ताकि जातियों को वर्गों के रूप में खोला जा सके. उनकी यह राय यकीनन ही महाड के बाद के आंबेडकर के उलट है, जिनका सवर्ण हिंदुओं की उन्माद से भरी प्रतिक्रिया के कारण मोहभंग हो गया था और अब उन्होंने अपने मकसद को पूरा करने के लिए राजनीति का रुख कर लिया था. क्या उनकी इस्लाम धर्म कबूल कर लेने की धमकी दलितों की अलग राजनीतिक पहचान हासिल करने के लिए थी या सवर्ण हिंदुओं को सामाजिक सुधारों के बारे में विचार करने पर मजबूर करने के लिए थी? 1930 के दशक के आंबेडकर एक जातिविहीन मजदूर वर्गों के दायरे में जगह बनाने को उत्सुक दिखते हैं, जिन्होंने इंडियन लेबर पार्टी की स्थापना की. यह तर्कसंगत रूप से भारत की पहली वामपंथी पार्टी थी. तब वे कम्युनिस्टों के साथ भी कुछ दूर तक गए लेकिन तभी उन्होंने जातियों से पीछा छुड़ाने के लिए किसी दूसरे धर्म को अपनाने का एलान भी किया. 1940 के दशक के आंबेडकर, जो जातियों की तरफ फिर से लौटे, आईएलपी को भंग किया और शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की स्थापना की. उन्होंने सड़क पर आकर प्रतिरोध करने की राजनीति को छोड़ा और श्रम मंत्री के रूप में औपनिवेशिक सरकार में शामिल हुए. या वे आंबेडकर जिन्होंने स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज लिखी, जिसमें आजाद भारत के प्रस्तावित संविधान में एक स्थायी बुनियादी चरित्र के रूप में राजकीय समाजवाद की हिमायत की गई. कांग्रेस के सख्त विरोधी आंबेडकर या वे आंबेडकर जिन्होंने सर्वदलीय सरकार में शामिल होते हुए कांग्रेस के साथ सहयोग किया और संविधान सभा में शामिल होने के लिए जिनका समर्थन हासिल किया. वे आंबेडकर जिन्होंने प्रतिनिधित्व के तर्क को विकसित किया जो आखिरकार आरक्षण के रूप में सामने आया, जिन्होंने उम्मीद की थी कि दलितों के बीच के कुछ आगे बढ़े हुए तत्व पूरे समुदाय की तरक्की में मदद करेंगे या फिर वे आंबेडकर जिन्होंने इस पर सार्वजनिक रूप से अफसोस जाहिर किया कि उन्हें पढ़े लिखे दलितों ने धोखा दिया है. वे आंबेडकर जिन्होंने संविधान की रचना की और दलितों को सलाह दी कि अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सिर्फ संवैधानिक पद्धतियों को ही अपनाएं या वे आंबेडकर जिन्होंने संभवत: सबसे कड़े शब्दों में इस संविधान को नकार दिया और कहा कि इसे जलाने वाले वे पहले इंसान होंगे. वे आंबेडकर जो एक तरह से अपने फैसलों की कसौटी के रूप में बार बार मार्क्स का जिक्र करते हैं या वे आंबेडकर जिन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया और, आंबेडकर के विशेषज्ञों में से एक एलियानॉर जेलियट के शब्दों में कहें तो, भारत में कम्युनिज्म के खिलाफ एक किलेबंदी खड़ी कर दी, या वे आंबेडकर जिन्होंने दुनिया को अलविदा कहने के कुछ ही दिन पहले बुद्ध और मार्क्स की सराहना के लहजे में तुलना करते हुए कहा कि इनका मकसद तो एक ही था, लेकिन उसे हासिल करने के तरीके अलग थे. उनके मुताबिक इसमें बुद्ध का रास्ता मार्क्स से बेहतर था. ये महज कुछ ऐसी मिसालें हैं, जो आंबेडकर को एकतरफा तरीके से पेश करने को चुनौती देती हैं. अगर कोई थोड़ी और गहराई में जाए उसका सामना कुछ और भी गंभीर समस्याओं से होगा.

इस धरती पर जब तक जाति का वायरस मंडराता रहेगा, आंबेडकर की जरूरत यकीनी तौर पर बनी रहेगी. लेकिन यह आंबेडकर उस पुराने आंबेडकर का फिर से अवतार भर नहीं होंगे, जिनकी ज्यादातर दलित भावुकता के साथ कल्पना करते हैं. वैसे भी नहीं जैसे अरुंधति उन्हें अभी और तुरंत बुलाना चाहेंगी. आंबेडकर को यकीनन ही तब की तुलना में आज के समाज में जातियों की कहीं अधिक जटिल और बिखरी हुई समस्या का सामना करने के लिए फिर से गढ़ा जाना जरूरी होगा.

08 मार्च 2014

हिंदुत्व के नए सेवक

अनिल चमड़िया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों और संस्थाओं और उनकी बनाई पार्टी भारतीय जनता पार्टी (पूर्व में जनसंघ) के इतिहास की जो थोड़ी भी जानकारी रखते हैं, वे जानते हैं कि उनकी दलितों समेत पिछड़ी जातियों को दिए जाने वाले संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ उन्मादी कार्रवाइयां हर मौके पर देखी गई हैं। अस्सी के दशक में गुजरात में दो बार आरक्षण-विरोधी उग्र आंदोलन हुए और मतदाताओं द्वारा चुनी गई सरकार को दो बार आसानी से पराजित किया गया।

बिहार में कर्पूरी ठाकुर के शासनकाल में 1978 में मुंगेरीलाल आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को दिए गए आरक्षण का जबर्दस्त विरोध जनता पार्टी के घटक के रूप में जनसंघ ने किया और सरकार गिरा दी। उत्तर प्रदेश में भी इसे दोहराया गया। कर्पूरी ठाकुर को हटा कर एक दलित जाति के रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बना कर आरक्षण-विरोधी सरकार बनाई गई। संसदीय राजनीति का इतिहास बताता है कि पिछड़ों के बीच जातिवाद और पिछड़ा बनाम दलित की एक रेखा खींचने में मुख्यत: सवर्ण आधार वाली पार्टियों को महारत हासिल रही है।

पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी वाली पिछड़ी जातियों को विशेष अवसर देने का जब कभी प्रयास किया गया तो उसके विरोध के लिए हिंदुत्व का ही सहारा लिया गया और मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववाद के हमले तेज हुए। अस्सी के दशक में गुजरात से लेकर बिहार के जमशेदपुर दंगे को इस सिलसिले में याद किया जा सकता है। पिछड़ों को आरक्षण देने के फैसलों और अल्पसंख्यक-विरोधीहमलों का एक सीधा संबंध है। 1990 के दशक में भी केंद्रीय सेवाओं में वीपी मंडल आयोग की अनुंशसाओं के अनुसार पिछड़ी जातियों को सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला हुआ तो लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या तक की रथयात्रा निकाली और विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

आरक्षण-विरोध के दौरान जो उग्रता पैदा हुई उसे 1980 के दशक में राम मंदिर अभियान की तरफ मोड़ा गया और उसे संचालित करने के लिए संघ ने कई नए संगठन बनाए। 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में हिंसक आरक्षण-विरोध और रथयात्रा के उन्मादी माहौल में मुसलमानों के खिलाफ देश भर में हमले हुए। संघ के निर्माण के इतिहास पर नजर डालें तो वह दलितों के राजनीतिक उभार की प्रतिक्रिया में ही बना था। महाराष्ट्र में डॉ भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में हुए दलित आंदोलन की प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र के कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी।

1990 के बाद पिछड़ी जातियों के लिए विशेष अवसर के खिलाफ हिंदुत्ववादी विरोध से एक स्थिति यह पैदा हुई कि पिछड़ी और दलित जातियों में विशेष अवसर का समर्थन करते हुए सत्ता का नेतृत्व करने का एक तरह का भरोसा विकसित हुआ। तब भाजपा ने अपनी रणनीति बदल ली, जो बाद में संघ के विचारक गोविंदाचार्य के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के रूप में लोकप्रिय हुई। संघ की यह स्पष्ट राय बन रही थी कि पिछड़ी जातियों के भीतर ही एक उग्र हिंदुत्ववाद को विकसित किया जाए और दूसरी तरफ उनके भीतर सत्ता का नेतृत्व करने की जिस महत्त्वाकांक्षा को सामाजिक न्याय के नेताओं द्वारा लगातार विकसित किया जा रहा है उसे एक पड़ाव पर हिंदुत्व से मिलाने की रणनीति अख्यितार की जाए।

अगर नब्बे के दशक के बाद की प्रमुख घटनाओं को याद करें तो एक पिछड़ी जाति से आए कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार के वायदे के बावजूद अयोध्या में बाबरी मस्जिद को सुरक्षा नहीं मिल सकी।
इसी कड़ी में पिछड़ी जातियों के नेताओं में विनय कटियार से लेकर उमा भारती की गतिविधियों और बयानों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि वे कैसे उग्र हिंदुत्ववाद के सबसे बड़े प्रतिनिधि के तौर पर सामने आए। इस उग्रता का सिरा गुजरात में मिलता है जब नरेंद्र मोदी की सरपरस्ती में 2002 में मुसलिम विरोधी हमले हुए। उग्र हिंदुत्ववाद का एक नया खूंखार चेहरा सामने आया।

यहां इन तथ्यों को भी देख लेना चाहिए कि नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व-काल में जिन हमलों की शुरुआत हुई उनमें मारे गए और गिरफ्तार हुए लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि क्या रही है? एक शोध से ये तथ्य सामने आए हैं कि गुजरात में 1 मार्च 2002 से 4 जून 2002 के दौरान हुई गिरफ्तारियों में 2,945 लोग अमदाबाद के तैंतीस थाना क्षेत्रों से थे। इनमें जिन 1577 हिंदुओं को गिरफ्तार बताया गया उनमें 747 केवल अनुसूचित जाति के थे और पिछड़ों की तादाद 797 थी। ब्राह्मण और बनिया केवल दो-दो और पटेल जाति के उन्नीस लोग थे।

गुजरात प्रयोग के बाद संघ को लगा कि कल्याण सिंह, उमा भारती, लालकृष्ण आडवाणी से भी ज्यादा उग्र एक पिछड़ी जाति का नेतृत्व उसके सपनों को साकार करने के लिए उसके हाथों में आ गया है। इसीलिए यह हैरानी नहीं होनी चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने वैचारिक संगठन होने का जो परदा डाल रखा था, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए उसे उठा दिया।

संघ अपने वैचारिक धरालत पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की सत्ता और संसद को दोयम दर्जे का समझता है। उसके सांगठनिक ढांचे में भी लोकतांत्रिक चुनाव की कोई परंपरा नहीं रही है। कोई भी राजनीतिक संगठन अपने ढांचागत चरित्र के अनुरूप ही शासन व्यवस्था का ढांचा विकसित करना चाहता है और संघ भी एक राजनीतिक संगठन है। भले वह खुद के सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन होने के दावे को तकनीकी स्तर पर सही ठहरा लेता है क्योंकि संघ के नाम से चुनाव नहीं लड़ा जाता है।

संसदीय राजनीति में किसी वर्ग, धर्म या जाति के प्रतिनिधित्व का विश्लेषण संख्या के आधार पर तो किया जा सकता है लेकिन संख्या को आधार बना कर विचारधारात्मक विकास के विश्लेषण का तरीका सही नहीं हो सकता। 1984 में हुए सिख-विरोधी हमलों के बाद भाजपा को लोकसभा की महज दो सीटों पर जीत मिलीं। लेकिन संसदीय इतिहास में हिंदुत्ववादी राजनीति का वह चरम रूप था जब कांग्रेस को दो तिहाई से ज्यादा सीटों पर कामयाबी मिली। हिंदुत्ववादी राजनीति का प्रतिनिधित्व पार्टी के रूप में बदलता रहा है और संघ उसके साथ रहा है। 1984 का विश्लेषण यह होना चाहिए कि उसने संसदीय राजनीति में हमले और उग्र हिंदुत्ववाद का एक रिश्ता विकसित कर लिया। मंडल आयोग की सिफारिशों से आए राजनीतिक उभार ने यह चेतना जगाई कि देश की सत्ता की बागडोर पिछड़ों को मिलनी चाहिए। यह राजनीति तो चलाई पिछड़ी और दलित जातियों के खंडों में बंटे नेतृत्व ने, लेकिन उसे भुनाने की योजना संघ ने तैयार की।

जो एजेंडा संसदीय राजनीति में तात्कालिक फायदे के लिए तैयार किया जाता है उसका दूरगामी इस्तेमाल बराबर विचारधारात्मक संगठन ही कर सकते हैं। मंडल और कमंडल का नरेंद्र मोदी के रूप में मिश्रण संघ के हाथों में देखा जा रहा है। एक महत्त्वपूर्ण बात समझने की है कि मंडल आयोग के बाद संघ की सोशल इंजीनियरिंग में यह नीति समाहित है कि पूरे विचारधारात्मक ढांचे में बिना किसी छेड़छाड़ के प्रतिनिधित्व की गुंजाइश बनाना क्योंकि उसे विचारधारा के विस्तार के लिए जरूरी माना गया। प्रतिनिधित्व महज प्रतिनिधित्व होता है और वह उस जमात के काम तभी आ सकता है जब विचारधारात्मक ढांचे में उसकी पर्याप्त जगह हो।

नरेंद्र मोदी भाजपा में बतौर पिछड़े वर्ग सत्ता-शीर्ष पर भी जा सकते हैं लेकिन वे विचारधारा के स्तर पर हिंदुत्ववादी हैं। गुजरात में मोदी के शासनकाल का अध्ययन क्या बताता है? गुजरात में दंगों के लिए दलितों-पिछड़ों की गिरफ्तारी तो इसका एक उदाहरण है। दूसरा उदाहरण यह भी है कि देश में सबसे कम न्यूनतम मजदूरी गुजरात में ही दी जाती है।

दलित और पिछड़ी जातियों में जाति आधारित राजनीति करने वाले नेताओं के भाजपा की तरफ जाने के कई उदाहरण मिल रहे हैं। मंडल आयोग के बहाने पूरे उभार को समानता के विचार विकसित करने के लिए नहीं बल्कि एक दूसरे के मुकाबले जातियों के भीतर वर्चस्व स्थापित करने की होड़ दिखाई देती है। जिन जातियों ने मंडल उभार में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ताकत हासिल की, उन्हें हिंदुत्व के रूप में वर्चस्व में हिस्सा चाहिए। जिन जातियों की सत्ता-शीर्ष पर पहुंच नहीं हो पाई है उन जातियों के प्रतिनिधियों द्वारा भी यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि हिंदुत्व के रास्ते सत्ता पर वर्चस्व में हिस्सेदारी हासिल की जा सकती है।

सन 1990 के बाद वर्चस्ववादियों की राजनीति ही मुख्यधारा के रूप में उपस्थित होती चली गई। इसका एक कारण सोवियत संघ का विघटन भी है। उसे समाजवाद की विचारधारा का मनोबल समझा जाता था। विचारधाराएं ही मुख्य होती हैं। समाजवादी और वामपंथी विचारों से प्रभावित पार्टियां और आंदोलन कमजोर पड़ते चले गए। ऐसे ही समय में भूमंडलीकरण की परियोजना के जरिए समाज पर वर्चस्व रखने वाली ताकतों का एक आक्रामक अभियान शुरू हुआ। देशों, सामाजिक समूहों, लोकतांत्रिक संस्थाओं आदि पर बेफ्रिक होकर हमलों के अभियान चले।

भारत में भी यह दौर चला। उस दौर में संघ को वर्चस्ववादियों को आक्रामक रूप में संगठित करने का अनुकूल समय मिला। भूमंडलीकरण की पूरी परियोजना सामाजिक स्तर पर भी वर्चस्ववाद को विस्तार देने में सहायक हुई। दुर्घटना यह हुई कि समाजवादी और वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में सक्रिय पार्टियों और संगठनों ने भी उस परियोजना को अपरिहार्य मान लिया। संसदीय राजनीति का मुख्य स्वर वर्चस्ववाद और उसकी विचारधारा की तरफ मुड़ गया। इसीलिए कल की दमित और पिछड़ी जातियों के बीच का महत्त्वाकांक्षी नेतृत्व अपने सामने किसी किस्म की चुनौती और खतरा महसूस नहीं कर रहा है और धड़ल्ले से वर्चस्ववादी विचारधारा पर आधारित पार्टियों के नेतृत्व को स्वीकार कर रहा है।

अगर विश्लेषण करें तो तमाम स्तरों पर जो वंचित थे, गैर-बराबरी के शिकार थे और समानता की बात करते थे उनके बीच में वर्चस्ववादी विचारधारा के प्रभाव के कारण आक्रामकता दिखती है। यह राजनीति वंचितों को अधिकार देने के बजाय राहत और लालच देने को अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है।
                                                                    (मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित)