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04 जून 2014

बस, बहुत हो चुका: आनंद तेलतुंबड़े का नया लेख

आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख एक बेशर्म और बेपरवाह राष्ट्र को संबोधित है. एक ऐसे राष्ट्र को संबोधित है जो अपने ऊपर थोप दी गई अमानवीय जिंदगी और हिंसक जातीय उत्पीड़नों को निर्विकार भाव से कबूल करते हुए जी रहा है. यह लेख बदायूं में दो दलित किशोरियों के बलात्कार और हत्या के मामले से शुरू होता है और राज्य व्यवस्था, पुलिस, कानून और इंसाफ दिलाने वाले निजाम तक के तहखानों में पैवस्त होते हुए उनके दलित विरोधी अपराधी चेहरे को उजागर करता है. मूलत: द हिंदू में प्रकाशित इस लेख के साथ इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में छपे उनके मासिक स्तंभ मार्जिन स्पीक का ताजा अंक भी पढ़ें. अनुवाद रेयाज उल हक


यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा गांव की है. इसमें दो दलित लड़कियों की लाश पेड़ से टंगी हुई है और तमाशबीनों की एक भीड़ हैरानी से खड़ी देख रही है. यह तस्वीर हमारे राष्ट्रीय चरित्र को सबसे अच्छे तरीके से बयान करती है. हम कितना भी अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं, किसी भी हद की नाइंसाफी सह सकते हैं, और पूरे सब्र के साथ अपने आस पास के किसी भी फालतू बात को कबूल कर सकते हैं. यह कहने का कोई फायदा नहीं कि वे लड़कियां हमारी अपनी बेटियां और माएं थीं, हम तब भी इसी तरह हैरानी और निराशा से भरे हुए उन्हें उसी तरह ताकते रहे होते, जैसी भीड़ में दिख रहे लोग ताक रहे हैं. सिर्फ पिछले दो महीनों में ही, जबकि हमने एक देश के रूप में नरेंद्र मोदी और अच्छे दिनों के उसके वादे पर अपना वक्त बरबाद किया, पूरे देश में दलित किशोरों और किशोरियों के घिनौने बलात्कारों और हत्याओं की एक बाढ़ सी आ गई.

लेकिन इस फौरन उठने वाले गुस्से से अलग, इन उत्पीड़नों के लिए सचमुच की कोई चिंता मुश्किल से ही दिखती है. शासकों को इससे कोई सरोकार नहीं है, मीडिया की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, और फिर इसको लेकर प्रगतिशील तबका उदासीन है और खुद दलितों में भी ठंडा रवैया दिख रहा है. यह शर्मनाक है कि हम दलितों के बलात्कार और हत्या को इस तरह लेते हैं कि वे हमारे सामाजिक ताना-बाने का अटूट हिस्सा हैं और फिर हम उन्हें भुला देते हैं.

मनु का फरमान नहीं हैं बलात्कार

जब भी हम जातियों की बातें करते हैं, तो हम शतुरमुर्ग की तरह एक मिथकीय अतीत की रेत में अपना सिर धंसा लेते हैं और अपने आज के वक्त से अपनी आंखें मूंद लेते हैं. हम पूरी बात को आज के वक्त से काट देते हैं, जिसमें समकालीन जातियों का ढांचा कायम है और अपना असर दिखा रहा है. यानी हम ठोस रूप से आज के बारे में बात करने की बजाए अतीत के किसी वक्त के बारे में बातें करने लगते हैं. आज जितने भी घिसे पिटे सिद्धांत चलन में हैं वे या तो यह सिखाते हैं कि चुपचाप बैठे रहो और कुछ मत करो या फिर वे जाति की पहचान का जहर भरते हैं – जो कि असल में एक आत्मघाती प्रवृत्ति है. वे हमारे शासकों को उनकी चालाकी से भरी नीतियों के अपराध से बरी कर देते हैं जिन्होंने आधुनिक समय में जातियों को जिंदा बनाए रखा है. यह सब सामाजिक न्याय के नाम पर किया गया. संविधान ने अस्पृश्यता को गैरकानूनी करार दिया, लेकिन जातियों को नहीं. स्वतंत्रता के बाद शासकों ने जातियों को बनाए रखना चाहा, तो इसकी वजह यह नहीं थी कि वे सामाजिक न्याय लाना चाहते थे बल्कि वे जानते थे कि जातियों में लोगों को बांटने की क्षमता है. बराबरी कायम करने की चाहत रखने वाले एक देश में आरक्षण एक ऐसी नीति हो सकता है, जिसका इस्तेमाल असाधारण मामले में, अपवाद के रूप में किया जाए. औपनिवेशिक शासकों ने इसे इसी रूप में शुरू किया था. 1936 में, अनुसूचित जातियां ऐसा ही असाधारण समूह थीं, जिनकी पहचान अछूत होने की ठोस कसौटी के आधार पर की गई थी. लेकिन संविधान लिखे जाने के दौरान इसका दायरा बढ़ा दिया गया, जब पहले तो एक बेहद लचर कसौटी के आधार पर एक अलग अनुसूची बना कर इसको आदिवासियों तक विस्तार दिया गया और फिर बाकी उन सबको इसमें शामिल कर लिया गया, जिनकी पहचान राज्य द्वारा ‘शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों’ के रूप में की जा सकती हो. 1990 में मंडल आरक्षणों को लागू करते हुए इस बाद वाले विस्तार का इस्तेमाल हमारे शासकों ने बेहद सटीक तरीके से किया, जब उन्होंने जातिवाद के घोड़े को बेलगाम छोड़ दिया.

उनके द्वारा अपनाई गई इन और ऐसी ही दूसरी चालाकी भरी नीतियों ने उस आधुनिक शैतान को पैदा किया है जो दलितों के जातीय उत्पीड़न का सीधा जिम्मेदार है. समाजवाद की लफ्फाजी के साथ शासक वर्ग देश को व्यवस्थित रूप से पूंजीवाद की तरफ ले गया. चाहे वह हमारी पहली पंचवर्षीय योजना के रूप में बड़े पूंजीपतियों द्वारा बनाई गई बंबई योजना (बॉम्बे प्लान) को अपना कर यह दिखावा करना हो कि भारत सचमुच में समाजवादी रास्ते पर चल रहा है, या फिर सोचे समझे तरीके से किए गए आधे अधूरे भूमि सुधार हों या फिर हरित क्रांति की पूंजीवादी रणनीति को सब जगह लागू किया जाना हो, इन सभी ने भारी आबादी वाले शूद्र जाति समूहों में धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया जिनकी भूमिका केंद्रीय पूंजीपतियों के देहाती सहयोगी की थी. अब तक जमींदार ऊंची जातियों से आते थे, लेकिन अब उनकी जगह इन धनी किसानों ने ले ली, और उनके हाथ में ब्राह्मणवाद की पताका थी. दूसरी तरफ, अंतरनिर्भरता बनाए रखने वाली जजमानी प्रथाओं के खत्म होने से दलित ग्रामीण सर्वहारा बनकर और अधिक असुरक्षित हो गए. वे अब धनी किसानों से मिलने वाली खेतिहर मजदूरी पर निर्भर हो गए थे. जल्दी ही इससे मजदूरी को लेकर संघर्ष पैदा हुए जिनको कुचलने के लिए सांस्कृतिक रूप से उजड्ड जातिवाद के इन नए पहरेदारों ने भारी आतंक छेड़ दिया. इस कार्रवाई के लिए उन्होंने जाति और वर्ग के एक अजीब से मेल का इस्तेमाल किया. तमिलनाडु में किल्वेनमनी में 1968 में रोंगटे खड़े कर देने वाले उत्पीड़न से शुरू हुआ यह सिलसिला आज नवउदारवाद के दौर में तेज होता गया है. जो शूद्र जोतिबा फुले के विचारों के मुताबिक दलितों (अति-शूद्रों) के संभावित सहयोगी थे, नए शासकों की चालाकी भरी नीतियों ने उन्हें दलितों का उत्पीड़क बना दिया.

उत्पीड़न को महज आंकड़ों में न देखें

‘‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. यहां तक कि शेयर बाजार सूचकांकों तक में उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन दलितों पर उत्पीड़न में केवल इजाफा ही होता है. लेकिन तब भी ये बात हमें शर्मिंदा करने में नाकाम रहती है. हम अपनी पहचान बन चुकी बेर्शमी और बेपरवाही को ओढ़े हुए अपने दिन गुजारते रहते हैं, कभी कभी हम कठोर कानूनों की मांग कर लेते हैं – यह जानते हुए भी कि इंसाफ देने वाले निजाम ने उत्पीड़न निरोधक अधिनियम को किस तरह नकारा बना दिया है. जबसे ये अधिनियम लागू हुआ, तब से ही जातिवादी संगठन इसे हटाने की मांग करते रहे हैं. मिसाल के लिए महाराष्ट्र में शिव सेना ने 1995 के चुनावों में इसे अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बनाया था और महाराष्ट्र सरकार ने अधिनियम के तहत दर्ज किए गए 1100 मामले सचमुच वापस भी ले लिए थे.

दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामलों को इस अधिनियम के तहत दर्ज करने में भारी हिचक देखने को मिलती है. यहां तक कि खैरलांजी में, जिसे एक आम इंसान भी जातीय उत्पीड़न ही कहेगा, फास्ट ट्रैक अदालत को ऐसा कोई जातीय कोण नहीं मिला कि इस मामले में उत्पीड़न अधिनियम को लागू किया जा सके. खैरलांजी में एक पूरा गांव दलित परिवार को सामूहिक रूप से यातना देने, बलात्कार करने और एक महिला, उसकी बेटी और दो बेटों की हत्या में शामिल था, महिलाओं की बिना कपड़ों वाली लाशें मिली थीं जिन पर हमले के निशान थे, लेकिन इन साफ तथ्यों के बावजूद सुनवाई करने वाली अदालत ने नहीं माना कि यह कोई साजिश का मामला था या कि इसमें किसी महिला की गरिमा का हनन हुआ था. यहां तक कि उच्च न्यायालय तक ने इस घटिया राय को सुधारने के लायक नहीं समझा. उत्पीड़न के मामलों में इंसाफ का मजाक उड़ाए जाने की मिसालें तो बहुतेरी हैं. इंसाफ दिलाने का पूरा निजाम, पुलिस से लेकर जज तक खुलेआम असंगतियों से भरा हुआ है. किल्वेनमनी के पहले मामले में ही, जहां 42 दलित मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धनी जमींदार, जिनके पास कारें तक हैं, ऐसा जुर्म नहीं कर सकते और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया. रही पुलिस तो उसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा. ज्यादातर पुलिसकर्मी तो वर्दी वाले अपराधी हैं. वे उत्पीड़न के हरेक मामले में दलितों के खिलाफ काम करते हैं. चाहे वो खामियों से भरी हुई जांच हो और/या आधे-अधूरे तरीके से की गई पैरवी हो, संदेह का दायरा अदालतों के इर्द गिर्द भी बनता है जिन्होंने मक्कारी से भरे फैसलों का एक सिलसिला ही बना रखा है. हाल में, पटना उच्च न्यायालय ने अपने यहां चल रहे दलितों के जनसंहार के मामलों में एक के बाद एक रणवीर सेना के सभी अपराधियों को बरी करके दुनिया को हैरान कर दिया. हैदराबाद उच्च न्यायालय ने भी बदनाम सुंदुर मामले में यही किया, जिसमें निचली अदालतों ने सभी दोषियों को रिहा कर दिया था.

अपराधियों का हौसला बढ़ाया जाता है

इंसाफ देने वाले निजाम द्वारा कायम की गई इस परिपाटी ने अपराधियों का हौसला ही बढ़ाया है कि वे दलितों के खिलाफ किसी भी तरह का उत्पीड़न कर सकते हैं. वे जानते हैं कि उनको कभी सजा नहीं मिलेगी. पहले तो वे यह देखते हैं कि जो दलित अपने अस्तित्व के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं, वे यों भी उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. इस तरह उत्पीड़न के अनेक मामले तो कभी सामने तक नहीं आ पाते हैं, जिनमें से ज्यादातर दूर दराज के देहाती इलाकों में होते हैं. और अगर किसी तरह उत्पीड़न का कोई मामला दबाया नहीं जा सका, तो असली अपराधी तो पुलिस की गिरफ्त से बाहर ही रहते हैं और न्यायिक प्रक्रिया के लपेटे में उनके छुटभैए मातहत आते हैं. पुलिस बहुत कारीगरी से काम करती है जिसमें वह जानबूझ कर जांच में खामियां छोड़ देती है, मामले की पैरवी के लिए किसी नाकाबिल वकील को लगाया जाता है और आखिर में एक पक्षपात से भरे फैसले के साथ मामला बड़े बेआबरू तरीके से खत्म होता है. यह पूरी प्रक्रिया अपराधियों को काफी हौसला देती है.

क्या भगाना के उन बलात्कारियों के दुस्साहस का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिन्होंने 13 से 18 साल की चार दलित किशोरियों का क्रूरता से पूरी रात सामूहिक बलात्कार किया और फिर पड़ोस के राज्य में ले जाकर उन्हें झाड़ियों में फेंक आए और इसके बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि सबकुछ रफा दफा हो जाएगाॽ जो लड़कियां अपने अपमान को चुनौती देते हुए राजधानी में अपने परिजनों के साथ महीने भर से इंसाफ की मांग करते हुए बैठी हैं और कोई उनकी खबर तक नहीं ले रहा है, क्या इसकी कल्पना की जा सकती है कि यह सब उन्हें कितना दर्द पहुंचा रहा होगाॽ क्या हम देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके के छुपे हुए जातिवाद की कल्पना कर सकते हैं, जिसने एक गैर दलित लड़की के बलात्कार और हत्या पर राष्ट्रव्यापी गुस्से की लहर पैदा कर दी थी, उसे निर्भया नाम दिया था, लेकिन वो भगाना की इन लड़कियों की पुकार पर चुप्पी साधे हुए हैॽ महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के खरडा गांव के 17 साल के दलित स्कूली लड़के नीतीश को जब दिनदहाड़े पीट-पीट कर मारा जा रहा था – सिर्फ इसलिए कि उसने एक ऐसी लड़की से बात करने का साहस किया था जो एक प्रभुत्वशाली जाति से आती है – तो क्या उस लड़के और उसके गरीब मां-बाप की तकलीफों की कल्पना की जा सकती है, जिनका वह इकलौता बेटा थाॽ और क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि इन दो बेगुनाह लड़कियों पर क्या गुजरी होगी, जिनके साथ अपराधियों ने रात भर बलात्कार किया और फिर पेड़ पर लटका कर मरने के लिए छोड़ दियाॽ और मामले यहीं खत्म नहीं होते. पिछले दो महीनों में इन दोनों राज्यों में उत्पीड़न के ऐसे ही अनगिनत मामले हुए, लेकिन उन्हें मीडिया में जगह नहीं मिली. क्या यह कल्पना की जा सकती है कि अपराधी बिना राजनेताओं की हिमायत के ऐसे घिनौने अपराध कर सकते हैंॽ इन सभी मामलों में राजनीतिक दिग्गज अपराधियों का बचाव करने के लिए आगे आए: हरियाणा में कांग्रेस के दिग्गजों ने, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दिग्गजों ने और महाराष्ट्र में एनसीपी के दिग्गजों ने अपराधियों का बचाव किया.

अमेरिका में काले लोगों को पीट-पीट कर मारने की घटनाओं के जवाब में काले नौजवानों ने बंदूक उठा ली थी और गोरों को सिखा दिया था कि कैसे तमीज से पेश आया जाए. क्या जातिवादी अपराधी यह चाहते हैं कि भारत में इस मिसाल को दोहराया जाएॽ

गुंडों की सल्तनत का महापर्व: आनंद तेलतुंबड़े


आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख दलितों की जिंदगी के एक ऐसे सफर पर ले चलता है, जहां हिंसक उत्पीड़नों, हत्याओं और बलात्कारों को उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बना दिया गया है. अनुवाद रेयाज उल हक.

एक तरफ जब मीडिया में लोकतंत्र के महापर्व की चकाचौंध तेज हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ देश के 20.1 करोड़ दलितों को अपने अस्तित्व के एक और रसातल से गुजरने का अनुभव हुआ. उन्होंने शैतानों और गुंडों की सल्तनत का महापर्व देखा. बहरहाल, उनके लिए लोकतंत्र बहुत दूर की बात रही है. इस अजनबी तमाशे में वे यह सोचते रहे कि क्या उन्हें इस देश को अब भी अपना देश कहना चाहिएॽ

‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में जो बात परेशान करती है वह देश की समझदार आबादी का दोमुहांपन है. यह वो तबका है जिसने डेढ़ साल पहले नोएडा की एक लड़की के क्रूर बलात्कार पर तूफान मचा दिया था, और इसकी तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन उसने हरियाणा के जाटलैंड में चार नाबालिग दलित लड़कियों के बलात्कार पर या फिर ‘फुले-आंबेडकर’ के महाराष्ट्र में एक दलित स्कूली छात्र की इज्जत के नाम पर हत्या पर चुप्पी साध रखी है. इस चुप्पी की अकेली वजह जाति है, इसके अलावा इसे किसी और तरह से नहीं समझा जा सकता. अगर देश के उस छोटे से तबके की यह हालत है, जिसे संवेदनशील कहा जा सकता है, तब दलित जनता बेवकूफी और उन्माद के उस समुद्र से क्या उम्मीद कर सकती है, जिसमें जाति और संप्रदाय का जहर घुला हुआ हैॽ

भगाना की असली निर्भयाएं

भगाना हरियाणा में हिसार से महज 13 किमी दूर एक गांव है जो राष्ट्रीय राजधानी से मुश्किल से तीन घंटे की दूरी पर है. 23 मार्च को यह गांव उन बदनाम जगहों की लंबी फेहरिश्त में शामिल हो गया, जहां दलितों पर भयानक उत्पीड़न हुए हैं. उस दिन शाम को जब चार दलित स्कूली छात्राएं – मंजू (13), रीमा (17), आशा (17) और रजनी (18) – अपने घरों के पास खेत में पेशाब करने गई थीं तो प्रभुत्वशाली जाट जाति के पांच लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. उन्होंने उन लड़कियों को नशीली दवा खिला कर खेतों में उनके साथ बलात्कार किया और फिर उन्हें कार में उठा कर ले गए. शायद उनके साथ रात भर बलात्कार हुआ और फिर उन्हें सीमा पार पंजाब के भटिंडा रेलवे स्टेशन के बाहर झाड़ियों में छोड़ दिया गया. जब उनके परिजनों ने गांव के सरपंच राकेश कुमार पंगल से संपर्क किया, जो अपराधियों का रिश्तेदार भी है, तो वह उन्हें बता सकता था कि लड़कियां भटिंडा में हैं और उन्हें अगले दिन ले आया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारी नशीली दवाओं के असर में और गहरी वेदना के साथ लड़कियां अगली सुबह झाड़ियों में जगीं और मदद के लिए स्टेशन तक गईं, लेकिन उन्हें दोपहर बाद 2.30 बजे तक इसके लिए इंतजार करना पड़ा जब राकेश और उसके चाचा वीरेंदर लड़कियों के परिजनों के साथ वहां पहुंचे. लौटते वक्त परिजनों को ट्रेन से भेज दिया गया और लड़कियों को कार में बिठा कर भगाना तक लाया गया. रास्ते में राकेश ने उनके साथ गाली-गलौज और बदसलूकी की, उन्हें पीटा और धमकाते हुए मुंह बंद रखने को कहा. जब वे गांव पहुंचे तो दलित लड़को ने कार को घेर लिया और लड़कियों को सरपंच के चंगुल से निकाला. अगले दिन लड़कियों को मेडिकल जांच के लिए हिसार के सदर अस्पताल ले जाया गया. वहां सुबह से दोपहर बाद डेढ़ बजे तक जांच चली, जो समझ में न आने वाली बात थी. लड़कियों ने बताया कि डॉक्टरों ने कौमार्य की जांच के लिए टू फिंगर टेस्ट जैसा अपमानजनक तरीक अपनाया जिसकी इतनी आलोचना हुई है और सरकार ने बलात्कार के मामले में इसका इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा रखा है. 200 से ज्यादा दलित कार्यकर्ताओं के दबाव और मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद सदर हिसार पुलिस थाना ने (एससी/एसटी) उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की. हालांकि लड़कियों द्वारा दिए गए बयान में राकेश और वीरेंदर का नाम होने के बावजूद उनको इससे बाहर रखा.

ऐसा हिला देने वाला अपराध भी पुलिस को कार्रवाई करने के लिए कदम उठाने में नाकाम रहा. खैरलांजी की तरह, जब हिसार मिनी सेक्रेटेरिएट पर 120 से ज्यादा दलित जुटे और जनता का गुस्सा भड़क उठा तथा शिकायतकर्ता लड़कियों के साथ भगाना के 90 दलित परिवार दिल्ली में जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से धरना पर बैठे तब हरियाणा पुलिस हरकत में आई और उसने 29 अप्रैल को पांच बलात्कारियों – ललित, सुमित, संदीप, परिमल और धरमवीर – को गिरफ्तार किया. दलित परिवार इंसाफ मांगने के मकसद से दिल्ली आए हैं, लेकिन इसके साथ साथ एक और वजह है. वे गांव नहीं लौट सकते क्योंकि उन्हें डर है कि बर्बर जाट उनकी हत्या कर देंगे. इन दलित मांगों को सुनने और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के बजाए हिसार जिला अदालत अपराधियों को रिहा करने के मामले को देख रही है. हालांकि ये बहादुर लड़कियां, असली निर्भयाएं, खुद अपनी आपबीती जनता के सामने रख रही हैं, लेकिन दिलचस्प रूप से मीडिया ने बलात्कार से गुजरने वाली महिलाओं की पहचान को सार्वजनिक नहीं करने के कायदे का पालन नहीं किया, जैसा कि उसने गैर दलित ‘निर्भयाओं’ के साथ बेहद सतर्कता के साथ किया था. राजनेताओं के बकवास बयानों से तिल का ताड़ बनाने में जुटे मीडिया ने इन परिवारों द्वारा किए जा रहे विरोध की खबर को दिखाने के लायक तक नहीं समझा – एक अभियान शुरू करने की तो बात ही छोड़ दीजिए, जैसा उसने उन ज्यादातर बलात्कार मामलों में किया है, जिनमें बलात्कार की शिकार कोई गैर दलित होती है. ऐसी भाषा में बात करने से नफरत होती है, लेकिन उनका व्यवहार इसी भाषा की मांग करता है.

दिसंबर 2012 में जारी की गई पीयूडीआर की जांच रिपोर्ट इसके काफी संकेत देती है कि भगाना बलात्कार महज अमानवीय यौन अपराध भर नहीं है बल्कि ये दलितों को सबक सिखाने के उपाय के बतौर इस्तेमाल किया गया है. वहां दलित परिवार जाटों द्वारा अपनी जमीन, पानी और श्मशान भूमि पर कब्जा कर लेने और अलग अलग तरीकों से उन्हें उत्पीड़ित करने के खिलाफ विरोध कर रहे थे.

महाराष्ट्र के चेहरे पर एक और दाग

हरियाणा की घिनौनी खाप पंचायतों वाले जाट इज्जत के नाम पर हत्या के लिए बदनाम हैं, लेकिन फुले-शाहूजी-आंबेडकर की विरासत का दावा करने वाले सुदूर महाराष्ट्र में एक गरीब दलित परिवार से आने वाले 17 साल के स्कूली लड़के को आम चुनावों की गहमागहमी के बीच 28 अप्रैल को एक मराठा लड़की से बाद करने के लिए दिन दहाड़े बर्बर तरीके से मार डाला गया. यह दहला देने वाली घटना अहमदनगर जिले के खरडा गांव में हुई. फुले का पुणे यहां से महज 200 किमी दूर है, जहां से उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ विद्रोह की चिन्गारी सुलगाई थी. दलित अत्याचार विरोधी क्रुति समिति की एक जांच रिपोर्ट ने उस क्रूर तरीके के बारे में बताया है, जिससे गांव के सिरे पर एक टिन की झोंपड़ी में रहने वाले और एक छोटे से मिल में पत्थर तोड़ कर गुजर बसर करने वाले भूमिहीन दलित दंपती राजु और रेखा आगे से उनके बेटे को छीन लिया गया. नितिन आगे को गांव के एक संपन्न और सियासी रसूख वाले मराठा परिवार से आनेवाले सचिन गोलेकर (21) और उसके दोस्त और रिश्तेदर शेषराव येवले (42) ने पीट पीट कर मार डाला. नितिन को स्कूल में पकड़ा गया, उसके परिसर में ही उसे निर्ममता से पीटा गया, फिर उसे घसीट पर गोलेकर परिवार के ईंट भट्ठे पर ले आया गया, जहां उनकी गोद और पैंट में अंगारे रखकर उसे यातना दी गई और फिर उनकी हत्या कर दी गई. इसके बाद उसका गला घोंट दिया गया, ताकि इसे आत्महत्या के मामले की तरह दिखाया जा सके. नितिन से प्यार करने वाली गोलेकर परिवार की लड़की के बारे में खबर आई कि उसने आत्महत्या करने की कोशिश की और ऐसी आशंका जताई जा रही है उसे भी जाति की बलिवेदी पर नितिन के अंजाम तक पहुंचा दिया गया.

स्थानीय दलित कार्यकर्ताओं के दबाव में, अगले दिन नितिन की लाश की मेडिकल जांच के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया जिसमें उसने आरोपितों पर हत्या करने, सबूत गायब करने, गैरकानूनी जमावड़े और दंगा करने का आरोप लगाया है. यह मामला भारतीय दंड विधान के तहत और उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम की धारा 3(2)(5) और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 7 (1)(डी) के तहत भी दर्ज किया गया है. पुलिस ने सभी 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है, जिसमें दोनों मुख्य अपराधी और एक नाबालिग लड़का शामिल है. लेकिन दलित अब यह जानते हैं कि दलितों के खिलाफ किए गए अपराध के लिए देश में संपन्न ऊंची जाति के किसी भी व्यक्ति को अब तक दोषी नहीं ठहराया गया है. अपनी दौलत के बूते और सबसे विवेकहीन पार्टी में – जिसका नाम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) है – अपनी पहुंच के बूते गोलेकर परिवार को शायद जेल में बहुत दिन नहीं बिताने पड़ेंगे. आखिरकार एनसीपी के दिग्गजों के रोब-दाब वाले इस अकेले जिले में ही, हाल के बरसों में हुए खून से सने जातीय उत्पीड़न के असंख्य मामलों में क्या हुआॽ नवसा तालुका के सोनाई गांव के तीन दलित नौजवानों संदीप राजु धनवार, सचिम सोमलाल धरु और राहुल राजु कंदारे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने ‘इज्जत’ के नाम पर उनकी हत्या की थीॽ धवलगांव की जानाबाई बोरगे के हत्यारों का क्या हुआ, जिन्होंने बोरगे को 2010 में जिंदा जला दिया थाॽ उन लोगों का क्या हुआ जिन्होंने 2010 सुमन काले का बलात्कार करने के बाद उनकी हत्या कर दी थी या फिर उनका जिन्होंने वालेकर को मार कर उनकी देह के टुकड़े कर दिए थे, या 2008 में बबन मिसाल के हत्यारों का क्या हुआॽ यह अंतहीन सूची हमें बताती है कि इनमें से हरेक उत्पीड़न में असली अपराधी कोई धनी और ताकतवर इंसान था, लेकिन दोषी ठहराया जाना तो दूर, मामले में उस नामजद तक नहीं बनाया गया.

जागने का वक्त

अपने अकेले बेटे को इस क्रूर तरीके से खो देने वाले राजू और रेखा आगे की भयावह मानवीय त्रासदी ‘हत्याओं’ की संख्या में बस एक और अंक का इजाफा करेगी और भगाना की उन लड़कियों को तोड़ कर रख देने वाला सदमा और जिंदगियों पर हमेशा के लिए बन जाने वाला घाव का निशान एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) की ‘बलात्कारों’ की गिनती में जुड़ा बस एक और अंक बन कर रह जाएगा. इन मानवीय त्रासदियों को आंकड़ों में बदलने वाली सक्रिय सहभागिता, जिनके बगैर वे भुला दी गई होती, गुम हो गई है. ऐसी सामाजिक प्रक्रियाओं द्वारा पैदा किए गए उत्पीड़न के आंकड़े अब भी 33,000 प्रति वर्ष के निशान के ऊपर बनी हुई हैं. इन आधिकारिक गिनतियों का इस्तेमाल करते हुए कोई भी यह बात आसानी से देख सकता है कि हमारे संवैधानिक शासन के छह दशकों के दौरान 80,000 दलितों की हत्या हुई है, एक लाख से ज्यादा औरतों के बलात्कार हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा दलित किसी न किसी तरह के जातीय अपराधों के शिकार हुए हैं. युद्ध भी इन आंकड़ों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. एक तरफ दलितों में यह आदत डाल दी गई है कि वे अपने संतापों के पीछे ब्राह्मणों को देखें, जबकि सच्चाई ये है कि इस शासन की ठीक ठीक धर्मनिरपेक्ष साजिशों ने ही उन शैतानों और गुंडों को जन्म दिया जो दलितों को बेधड़क पीट पीट कर मार डालते हैं और उनका बलात्कार करते हैं.

इसने सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों को बरकरार रखने की साजिश की है, इसने पुनर्वितरण के नाम पर भूमि सुधार का दिखावा किया जिसने असल में भारी आबादी वाली शूद्र जातियों से धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया. वह सबको खाना मुहैया कराने के नाम पर हरित क्रांति लेकर आई, जिसने असल में व्यापक ग्रामीण बाजार को पूंजीपतियों के लिए खोल दिया. वह ऊपर से रिस कर नीचे आने के नाम पर ऐसे सुधार लेकर आई, जिन्होंने असल में सामाजिक डार्विनवादी मानसिकता थोप दी है. ये छह दशक जनता के खिलाफ ऐसी साजिशों और छल कपट से भरे पड़े हैं, जिनमें दलित केवल बलि का बकरा ही बने हैं. भारत कभी भी लोकतंत्र नहीं रहा है, जैसा इसे दिखाया जाता रहा है. यह हमेशा से धनिकों का राज रहा है, लेकिन दलितों के लिए तो यह और भी बदतर है. यह असल में उनके लिए शैतानों और गुंडों की सल्तनत रहा है.

दलित इन हकीकतों का मुकाबला करने के लिए कब जागेंगेॽ कब दलित उठ खड़े होंगे और कहेंगे कि बस बहुत हो चुका!

21 मार्च 2014

गुजरात का विकास मॉडल : खून और राख में लिपटी विकास की कहानी

नए सन्दर्भ-पुरानी बात  
रेयाज-उल-हक
राज्य की 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर के बावजूद गुजरात में एक तीखा सांप्रदायिक धु्रवीकरण रहा है. सवाल यह है कि इतने तेज विकास और ऐसी समृद्धि के बावजूद राज्य में बार-बार दंगे क्यों होते रहे हैं? क्यों राज्य के मुख्यमंत्री को झूठी मुठभेडों में हुई हत्याओं पर गर्व होता है? तथा क्यों वे ऐसी और हत्याओं की चेतावनी देते हैं? क्यों गुजरातियों को अचानक उनकी अस्मिता की इस कदर तीव्र जरूरत पड जाती है? सबसे बडी बात तो यह कि क्यों देश का पूरा तंत्र-सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं, संसद, न्यायपालिका, प्रेस-इस पूरे घटनाक्रम को तटस्थ भाव से देखते हैं?

नहीं, शायद हम गलती पर हैं. कोई भी तटस्थ नहीं है. ये सभी संस्थाएं संसद, न्यायपालिका, प्रेस- सब मिल कर मुख्यमंत्री को दोबारा सत्ता में आने में मदद करती हैं.एक पूरी तारतम्यता है, पूरा सामंजस्य है. विंग्स के पीछे हम ऑर्केस्ट्रा की पूरी टीम देखते हैं, जिसका हर सदस्य अपने काम पर मुस्तैद है. हां कभी-कभी कोई नौसिखिया किसी गलत बटन को दबा देता है, जिससे संगीत गडबडा जाता है और दर्शक कुछ देर के लिए इस बेसुरेपन का भी मजा उठाते हैं, जायका बदलने के लिए.

केवल गुजरात ही नहीं, पूरे देश भर में जो घटनाएं घट रही हैं, उन सबमें एक जैसी बातें दिखायी देंगी. देश की 9 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर और तीन दर्जन अरबपतियों के बावजूद असम, सिंगूर-नंदीग्राम, गोहाना, ओडिशा, लोहंडीगुडा, गुर्जर-मीणा विवाद और सिख-सौदा विवाद जैसी घटनाएं क्यों घट रही हैं? इन तेजी से विकसित होते महानगरों, साइबर सिटीज, 16 लेन की विशाल सडकों, सुपर मॉल्स, मल्टीप्लेक्सेज और विशाल औद्योगिक इकाइयों का लाभ आखिरकार कहां जा रहा है? लोगों तक संपन्नता, जैसे कि हमें शुरू में बताया गया था, रिसते हुए भी क्यों नहीं पहुंच रही? लोगों में इतना असुरक्षा बोध क्यों है?

अगर इन सभी घटनाओं में एक समान चीज को ढूंढने की कोशिश करें तो हम पायेंगे कि प्रायः इन सभी जगहों पर भारी पूंजी निवेश हुआ है या होनेवाला है या फिर आर्थिक संकट ने समाज को तोड दिया है, जैसे कि असम. इनमें से अधिकतर जगहों पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव मंजूर किये गये हैं. इनके लिए बडी मात्रा में किसानों से जमीनें ली गयी हैं, ली जा रही हैं. प्रायः सभी जगहों पर उनके मुखर विरोध खडे हुए हैं. प बंगाल और ओडिशा के अलावा दादरी एवं गोवा में हम इसके उदाहरण देख सकते हैं.

मगर साथ ही इनमें से अधिकतर जगहों पर हम एक उद्धत भीड को, हत्यारे गिरोहों को, जनता के ही एक हिस्से को पाते हैं, जो लोगों की हत्याएं करती, बस्तियां और दुकानें जलाती और संपत्तियां लूटती फिरती है. इस भीड को हमेशा ही सत्ता का समर्थन होता है. नंदीग्राम में इस हत्यारी भीड के पीछे सीपीएम होती है और गुजरात में बीजेपी. ओडिशा में इसी भीड को जदयू-बीजेपी का समर्थन होता है तो छत्तीसगढ में कांग्रेस-बीजेपी दोनों का.
ऊपर से एकदम असंबद्ध लगनेवाली वित्तीय पूंजी और इस हत्यारी (दंगाई) भीड के बीच बेहद आत्मीय अंतर्संबंध हैं. मुख्यतः यह संगठित भीड या गिरोह इन जगहों पर किसानों अथवा संघर्षरत समूहों को विभाजित करने की कोशिशों का हिस्सा हैं. ये उनके प्रतिरोध को तोड कर रखे देते हैं और वहां की आबादियों में सरकारी और अधिकतर जनविरोधी नीतियों के प्रति व्यापक आक्रोश को प्रायः धुंधला कर देते हैं.

प बंगाल में नंदीग्राम के ताजा कत्लेआम के ठीक बाद तसलीमा नसरीन के मुे को हवा दी गयी. यह सिर्फ ध्यान बंटाने भर का मामला नहीं था, बल्कि प बंगाल में, विशेष कर नंदीग्राम की मुसलिम आबादी के प्रतिरोध को बांटने की कार्रवाई भी थी. ओडिशा में, जहां पोस्को के खिलाफ आदिवासी संघर्षरत हैं, वहां हिंदू-ईसाई विभाजन को तेज किया जा रहा है. सत्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता में से ही ऐसे गिरोह निर्मित करती है, जो कि प्रायः उन समुदायों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयां करते हैं, जो शासन की नीतियों का विरोध कर रहे हों या जिनकी तरफ से ऐसी आशंका हो. छत्तीसगढ में तो इसे और अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया है. वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों को जमीन देने से मना कर रहे आदिवासियों के खिलाफ उन्हीं के एक हिस्से को खडा कर दिया गया. सलवा जुडूम नाम के इस हत्यारे अभियान के दौरान सैकडों आदिवासी मारे गये और लाखों लोग अपनी जमीनों से उजाड दिये गये. अब वे सडकों के किनारे बनी झोंपडियों में रह रहे हैं. सरकार ने चुपचाप इन राहत शिविरों को राजस्व ग्राम में तबदील कर दिया है. मतलब यह कि वे आदिवासी अब अपनी जमीन पर कभी नहीं लौट पायेंगे. उस जमीन को अब जिंदल, एस्सार आदि कंपनियों के हवाले करने की तैयारियां चल रही हैं.
ठीक यही वह जगह है, जहां हमें भारत में लगातार बढ रही सांप्रदायिक, फासिस्ट (सामाजिक-सांप्रदायिक दोनों) व क्षेत्रीय हिंसा के सूत्र मिलते हैं. गुजरात में पहले से ही छोटे-छोटे उद्योगों की श्रृंखला रही है, जहां प्रायः अकुशल श्रम के जरिये उत्पादन होता रहा है. 1980 के बाद से, जब से पूरे भारत में वित्तीय पूंजी का आगमन शुरू हुआ, गुजरात में सांप्रदायिक दंगों की आवृत्ति में बढोतरी हुई. ज्यादातर अकुशल श्रमिक मुसलमान थे और छोटे उद्योगों में उनकी अच्छी-खासी हिस्सेदारी थी. मगर जब विदेशी पूंजी आने लगी, वह इस अकुशल श्रम को, छोटे-छोटे उद्योगों को बरदाश्त नहीं कर सकती थी. उसे बाजार पर अपने उत्पादों के लिए एकाधिपत्य चाहिए था और अपने उद्योगों के लिए श्रमिक, जो कि इन छोटे उद्योगों में लगे हुए थे. अतः इन छोटे उद्योगों के रहते उसके लिए अपना विस्तार संभव नहीं रह गया था. इनका उन्मूलन जरूरी हो गया.

से में हिंदुत्व बडे काम की चीज साबित हुई. उसके पास न सिर्फ एक पहले से ही ऐसी विचारधारा मौजूद थी जो देश के प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपना शत्रु मानती थी, बल्कि देश भर में उसका विशाल संगठन, विभिन्न छोटे-छोटे गिरोह, एक राजनीतिक पार्टी और विभिन्न भूमिकाओं में कार्यरत उसके लाखों कार्यकर्ता मौजूद थे. फिर गुजरात ने अपनी इस तथाकथित आर्थिक विकास की शुरुआत खून और राख से की. गुजरात में पहले से ही एक सांप्रदायिक विभाजन था. 1969 के दंगों ने राज्य के दोनों प्रमुख समुदायों में बडी दरार डाल दी थी. 1981 के दंगे हुए. और फिर छह माह तक चलनेवाले 1985 के कुख्यात दंगे, जिनमें सरकारी तौर पर 275 लोग मारे गये, लाखों बेघर हुए और लगभग 2200 करोड रुपये मूल्य के संपत्ति और व्यापार की क्षति (अनुमानित) हुई. इसके बाद भी 1990, 92, 93 में दंगे होते रहे. 1960 से 1993 के बीच राज्य में 43 सांप्रदायिक दंगे हुए. 1990 के दशक में गुजरात में भारी पैमाने पर छोटे उद्योग बंद हुए. इसके बाद से गुजरात में भाजपा का एकछत्र राज रहा है. साथ ही बीजेपी की नजदीकी बडे व्यापारिक घरानों और कंपनियों से बढी. यहां एक दिलचस्प तथ्य हम यह भी पाते हैं कि गुजरात में हुई अब तक की अंतिम औद्योगिक हडताल ब्रिटिश शासनकाल में, 1941 में हुई थी. इसके बाद इस औद्योगिक राज्य में कोई औद्योगिक हडताल नहीं हुई.
एक पूरे समुदाय को शत्रु के रूप में चिह्नित करने और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिंसा को बढावा देने के पीछे एक और वजह है. वित्तीय पूंजी के लिए अधिक-से-अधिक मुनाफा बटोरने को सुगम बनाने के लिए राज्य को डब्ल्यूटीओ और वर्ल्ड बैंक की साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करना जरूरी था. इसके लिए उसे श्रम कानूनों में ढील देनी थी, जिससे मजदूरों के पास कोई अधिकार नहीं रह जाते. उसे बडी मात्रा में जमीनों का अधिग्रहण करना था, जिससे किसान बरबाद होते. राज्य के दूसरे संसाधनों को वित्तीय पूंजी की सेवा में लगाना था, जिससे राज्य के लोग अपने स्वाभाविक संसाधनों से वंचित हो जाते. इन सबका भारी प्रतिरोध होनेवाला था.
इन सबसे निबटने के लिए ऐसी सरकार चाहिए थी जो ऊपर से मजबूत ही न दिखे, उसे पास जनसमूह को जुटा लेने और अपने साथ रखने की काबीलियत भी हो. इसके लिए सरकारों को ऐसे नारे गढने जरूरी थे, जो ऊपर से जनता की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते दिखें, हालांकि जनता को उन नारों से कभी कुछ फायदा न हुआ. व्यापक जनसमूह को उसकी जातीय अस्मिता का हवाला देकर अपने साथ एकजुट करना जरूरी था. इन सबकी वजह से प्रतिरोध की संभावनाएं कम हो जातीं और जो प्रतिरोध करने का साहस जुटाते उन पर इस जन समूह को छोडा जा सकता था. वैसे भी गुजरात में ऐसा कोई विकल्प नहीं रहा जो इस प्रतिरोध का नेतृत्व कर सके और उसको रचनात्मक दिशा देकर राज्य को इस दुष्चक्र से छुटकारा दिला सके.

हिंदुत्व ने वित्तीय पूंजी की मदद से उत्पीडक और उत्पीडित वर्गों की पृथक पहचान और चेतना को धुंधला करके सभी को एक साथ खडा किया. चूंकि इसका नेतृत्व शासन में बैठी पार्टी कर रही थी, लोग शासन के साथ एकजुट होते गये. सारे मामले में धर्म का इतना बेहतर उपयोग किया गया कि लोग इस मकडजाल में और अधिक फंसते चले गये. उनमें तीव्र असुरक्षाबोध पैदा करके उनकी सुरक्षा करने के बहाने उन्हीं के तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म कर दिया. अधिक क्रूर और दमनकारी कानून लाये गये और मानवाधिकारों को हिकारत की वस्तु बना दिया गया. लोग यह अब तक नहीं समझ पाये हैं कि उन्हें डरा कर खुद उनकी सरकार ने उनके नीचे से उनकी जमीन खिसका दी है और वे अंधी खाई में गिरे जा रहे हैं.

गुजरात दंगे स्वतःस्फूर्त नहीं थे और न उनके संदर्भ तात्कालिक थे. हम पाते हैं कि इन दंगों के पहले राज्य की अर्थव्यवस्था 1994 के बाद से गिरावट का शिकार थी. मगर दंगों के बाद 2004 से इसमें बेहतरी आयी है. 2004 में गुजरात में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद शेष भारत के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक था. इसके अलावा राज्य में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर, जो कि 1994 के बाद से लगातार घट रही थी, 2004 के बाद पुनः बढने लगी.

हम यहां एक और विरोधाभास पाते हैं. अक्सर यह कहा जाता है कि निवेश के लिए राज्य में शांति और कानून-व्यवस्था बनी रहनी जरूरी है. मगर गुजरात का उदाहरण हमे इसकी एक उलटी बात दिखाता है. वहां विदेशी पूंजी निवेश की शुरुआत ही दंगों के साथ होती है और उनके तीव्र होते जाने के क्रम में ही निवेश में भी उछाल आता गया है. 2002 के दंगों के कुछ ही समय बाद, 2004 में गुजरात ने कुल 12 हजार 437 करोड रुपयों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी. दरअसल वित्तीय पूंजी क्षेत्र विशेष की आर्थिक, सामाजिक विशिष्टताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती. गुजरात के अकुशल श्रम और कारीगरों को नष्ट किये बगैर उसका मुनाफा संभव नहीं है, तो वह वहां दंगों का आयोजन करवाती है. मगर जहां पहले से ही साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियां मौजूद हैं, वहां वह कानून-व्यवस्था और शांति के नाम पर दमनात्मक कानूनों की जगह बनाती है और उन संघर्षों पर सत्ता के जरिये कठोर दमन करती है.

तो हम पृष्ठभूमि में एक ऐसे लोकतंत्र को पाते हैं जो वित्तीय पूंजी के प्रवाह को विकास का पर्याय मानता है, उसके लिए हत्याएं और नरसंहार कराये जाते हैं, हत्यारे गिरोहों और भीड को प्रोत्साहन दिया जाता है और सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध को कुचलने के लिए समाज को अंधी आस्थाओं से लैस किया जाता है. यह कुल मिला कर समाधान को हमसे और दूर कर देता है.

और ऐसे में हमसे कहा जाता है कि गुजरात को विकास के एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया जाये, क्या हुआ जो वहां अब भी एक पूरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार जारी है, क्या हुआ जो वहां अब भी दंगे के शिकार लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ, क्या हुआ जो वहां फिल्मों पर अघोषित प्रतिबंध लगा दिये जाते हैं और पेंटिंग्स जलायी जाती हैं. इन सबके बावजूद हमें इस विकास को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री फिर से चुनाव जीत गये हैं.

चुनाव. विकास. नवउदारवादी शब्दकोश के सबसे खनखनाते शब्द.

मगर एक ऐसी व्यवस्था में, जहां खुद चुनाव और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं वित्तीय पूंजी और साम्राज्यवादी संस्थाओं की सेवा में लगी हुई हों, हम लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी कैसे कर सकते हैं? भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मदद से ही फासीवाद सत्ता पर काबिज हुआ है. क्या 1975 में आपातकाल का अनुमोदन किसी दूसरे देश की संसद ने किया था? क्या 1984 के सिख विरोधी दंगों में शामिल पार्टी विशेष के लोग इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे? क्या बाबरी मसजिद इसी लोकतंत्र और इसके सभी स्तंभों के रहते नहीं तोड दी गयी? गुजरात नरसंहार के समय भी क्या यही लोकतंत्र नहीं था और नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने की बात कहनेवाले मुख्यमंत्री इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही नहीं चुने गये हैं?

जहां संसद, न्यायपालिका और प्रेस, पूरा तंत्र ही, वित्त पूंजी के हिरावल दस्ते के रूप में काम करने लगे हों, हम इस बात की गारंटी नहीं कर सकते कि संसद ही जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर रही है और जनता के अधिकार भंग नहीं कर दिये गये हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो जनता के तमाम प्रतिरोधों के बावजूद संसद सेज प्रस्तावों को मंजूरी कैसे देती और अदालतें हडताल, बंद, आरक्षण और मजदूर विरोधी फैसले कैसे देतीं? अकेले गुजरात का उदाहरण ही इस बात के लिए काफी है कि लोकतंत्र वास्तव में जनवादी मूल्यों, समानता और आजादी की गारंटी नहीं दे सकता.

हत्यारे गिरोह खडा करने और उन्हें समर्थन देने के संदर्भ में हम देख चुके हैं कि चुनाव लडनेवाली प्रायः सभी पार्टियां अपनी-अपनी स्थितियों में ऐसे गिरोहों को संरक्षण-समर्थन देती रही हैं. इनमें कोई अंतर नहीं होता, सिवाय इसके लिए वे एक दूसरे के खिलाफ वोट मांगती हैं. उनकी आर्थिक और विदेशी नीतियां तथा आंतरिक नीतियां भी लगभग समान हैं. असल में चुनाव में हमारे पास चुनने को इसके सिवा कुछ भी नहीं रह जाता कि कौन-सी पार्टी इस बार वित्तीय पूंजी की सेवा करेगी व इसके लिए जनता के अधिकारों को र करेगी. इस तरह हम यह भी देखते हैं कि चुनाव अंततः सांप्रदायिकता आदि का समाधान नहीं हो सकते.

और विकास के नाम पर जो आंकडे दिखाये जा रहे हैैं, उनसे बहुत प्रभावित होने की जरूरत नहीं है. यह वित्त पूंजी का दबाव है, जो नरेंद्र मोदी को राज्य में बुनियादी संरचना में सुधार करने पर विवश कर रहा है.

राज्य में भारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने प्रकटतः बडे उद्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. मगर जो लोग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रकृति के बारे में जानते हैं, यह उनके लिए बहुत उत्साहजनक तथ्य नहीं है. उल्टे यह चिंताजनक स्थिति ही है, क्योंकि एफडीआइ किसी भी तरह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करता. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निवेशक को सारा मुनाफा अपने देश ले जाने का अधिकार होता है. एफडीआइ देश के संसाधनों और इसकी संरचना का उपयोग अपने मुनाफे के लिए करता है और बदले में वह देश के लिए उसकी सदियों की जहालत छोड देता है. चूंकि सारा मुनाफा देश के बाहर चला जाता है, देश में आगे के औद्योगिक विकास के लिए उससे कोई पूंजी नहीं बचती. अधिक से अधिक उद्योगों की स्थापना के पीछे जो रोजगार निर्मित करने का तर्क दिया जाता है, वह भी मुनाफे की व्यवस्था के तहत तकनीकआधारित उद्योगों के दौर में बेमानी हो गये हैं. उनसे बहुत रोजगार उत्पन्न होने की आशा नहीं रखनी चाहिए. इसके अलावा एफडीआइ कभी टिकाऊ औद्योगिक विकास का माध्यम नहीं हो सकता. यह दरअसल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और पूंजीवाद के संकट से उत्पन्न आवारा पूंजी का हिस्सा है. यह हर समय और अधिक मुनाफे की तलाश में अपनी जगह बदलती रहती है. यह आज यहां है, कल कहीं और होगी. और फिर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि तब हमारी अर्थव्यवस्था का क्या होगा जो इस आवारा पूंजी पर अधिकाधिक निर्भर है.

गुजरात में जो बुनियादी सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं, वे प्रायः उन वर्गों की सुविधा के लिए हैं जो पहले से ही संपन्न हैं. उपभोक्ता बाजार के लिए गांवों तक पहुंच सुलभ बनाने और उसके लिए गांवों के दरवाजे खोलने के लिए जरूरी हो गया था कि वहां तक सडकें जायें और बिजली रहे.

मगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकडे राज्य में लोगों की बेहतरी को मापने के लिए एक बदतरीन उदाहरण हैं. राज्य अपने शासकों के चकाचौंध कर देनेवाले दावों के बावजूद , भूख, बदहाली और बीमारी से मुक्त नहीं है. गुजरात मानव विकास रिपोर्ट, 2004 बताती है कि गुजरात में निर्माण और कृषि क्षेत्रों, विकसित और अविकसित क्षेत्रों, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों तथा आर्थिक विकास और लोगों की बेहतर जीवनशैली के बीच का अंतर तीखा हुआ है. 2005 में गुजरात में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार बच्चों में 54 थी, जो कि राष्ट्रीय औसत से 1.07 गुणा ज्यादा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक 2005-06 के दौरान गुजरात में पांच वर्ष तक के आधे से कुछ कम (47 प्रतिशत) बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं. गुजरात में सामाजिक सेक्टर में खर्च नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में घटा है. वहां की 74.3 प्रतिशत महिलाएं और 46.3 प्रतिशत बच्चे एनीमिक हैं.

और अब हमारे सामने एक ऐसा राज्य है जो एफडीआइ की आयातित रोशनी में चमचमाता हुआ मंच पर खडा है और नेपथ्य में आत्महत्या किये 500 किसानों की लाशें सड रही हैं. जहां दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ तीव्र भेदभाव है और जहां तीन वर्षों में 100 से अधिक दलितों की हत्या कर दी गयी.

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि यह विकास कैसे हुआ और इसकी कीमत अंततः कौन चुका रहा है? क्या इस अबाध विकास के पीछे हत्याओं, नरसंहारों, घेटोकरण और संसदीय ढांचे के भीतर, उसी से उपजी तानाशाही की भूमिका को नजरअंदाज किया जा सकता है? और इसकी कीमत कौन चुका रहा है? उन पांच करोड गुजरातियों में से वे लोग जो कामगार हैं, वंचित हैं और गरीब हैं, अल्पसंख्यक हैं. जिनसे न सिर्फ उनके संसाधन और लोकतांत्रिक अधिकार ही छीन लिये गये हैं बल्कि इसका प्रतिरोध करने की उनकी संभावनाएं भी. जो कुछ राज्य ने उनके लिए छोडा है, वह है वापी में दुनिया का सबसे खतरनाक केमिकल हब, कपडा रंगाई उद्योग, जहाज तोडने और हीरे की पॉलिशिंग के रोजगार, जो उन्हें उनके जीवन के 30 वें साल में ही अंधा बना देंगे.

तो क्या वास्तव में हम अपने लिए ऐसे ही विकास को पसंद करेंगे?

26 फ़रवरी 2014

तस्वीर के पर्दे में: मुज़फ्फरनगर राहत शिविरों से लौट कर

रियाज़ उल हक़

मलकपुर शिविर, शामली. अपनी बीमार मां और हताश पिता से बीच चार लोगों के परिवार के लिए आटा गूंधते हुए निसा कैमरा देख कर रुकती नहीं. बस मुस्कुरा देती है. पास के खाट पर उसकी मां की सांसें दमे से उखड़ रही हैं और पिता धुआं उगलते चूल्हे में आग जलाने की कोशिश कर रहे हैं.

बिना दीवारों वाली यह एक ऐसी जगह है जहां रातों में तापमान दो डिग्री तक गिर जाता है. हवा से बचाने के लिए उनके पास पॉलिथीन की चादरों, फटे कपड़ों और चीथड़े हो चुके कंबलों के अलावा कुछ नहीं है. आसपास गन्ने की सूखी हुई पत्तियां हैं, लकड़ी की चिन्नियां हैं, न्यूमोनिया से मरते बच्चों की फेहरिश्त है, खाली पेट दिन गुजारने की मजबूरियां हैं और अपने घर से बेदखल कर दिए जाने की जलील यादें हैं. इन सबके बीच वह कौन सी चीज है जो उन्हें कैमरे के सामने मुस्कुरा उठने के लिए तैयार करती है?

क्या यह सिर्फ कैमरे के आगे खड़े होकर मुस्कुराने की आदत भर है?

लेकिन यह मुमकिन नहीं है. मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर और बागपत के जो एक लाख से ज्यादा लोग अपने घरों से उजाड़ दिए गए हैं, गुजर बसर की आखिरी उम्मीदें भी जिनसे छीन ली गई हैं, जिनकी हरेक पुरानी चीज को उनकी जिंदगी से बाहर कर दिया गया है- यह सिर्फ एक आदत भर नहीं हो सकती कि वे कैमरे के आगे मुस्कुराएं.

इसका संबंध काफी हद तक इससे है कि वे अपनी जिंदगी में फोटोग्राफ्स को किस तरह लेते आए हैं.

यह यकीन किया जाता है कि फोटोग्राफ किसी एक चुने हुए पल को हमेशा के लिए, या कम से कम लंबे समय तक के लिए, सहेज कर रख लेता है. वक्त गुजर जाता है, आदमी गुजर जाते हैं, जगहें बदल जाती हैं, लेकिन तस्वीरों में बचा कर रखा हुआ वह पल ज्यों का त्यों बना रहता है. बदले हुए हालात में वह उस जिंदगी की यादगार के रूप में मौजूद रहता है. फोटोग्राफ द्वारा यह भूमिका अपना लेने के कारण इंसानी याद्दाश्त पर उस खास मौके को हमेशा ज्यों का त्यों बचा कर रखने की जिम्मेदारी नहीं रहती. और चूंकि एक फोटोग्राफ भौतिक रूप में मौजूद रहता है न कि महज किसी की याद में, इसलिए वह सबके लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होता है. इस सहूलियत के कारण फोटोग्राफ्स को उन हालात के एक सच्चे सबूत की तरह लिया जाता है, जिनसे एक खास वक्त में जिंदगी को गुजरना पड़ा था.

यानी ये आदतें नहीं बल्कि यादें हैं, जो इन हालात में फोटोग्राफ के लिए तैयार होने को सहज बनाती हैं.

वे यादें खौफ और आतंक में डूबी हुई रातों की यादें हैं. जब मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर और बागपत जिलों के दूर दराज के उनके गांवों में प्रभुत्वशाली हिंदू भू-स्वामी जातियों तथा खाप पंचायतों के नेतृत्व में दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जनसंहार, औरतों पर यौन हमले, आगजनी और लूटपाट की गई. झूठी खबरों और अफवाहों के बूते पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया कि उनका गांवों में रहना मुमकिन नहीं रह गया. मुस्लिम आबादी वाले मुहल्लों पर हमले हुए, उनकी दुकानें और मकान लूट लिए गए. औरतों के खिलाफ किए गए अमानवीय अपराधों की ऐसी शिकायतें हैं, जिन पर एकबारगी यकीन नहीं होता. आरा मशीन पर उन्हें चीर देने की शिकायतें. कांच के टुकड़ों पर, निर्वस्त्र करके नाचने पर मजबूर करने की शिकायतें. मुस्लिम गोरी औरतों को हमलावरों द्वारा जबरन अपने घर में कैद कर रख लेने की शिकायतें.

शामली जिले के फुगाना गांव में मेहरदीन की नंगी लाश पिंकू जाट के घर में बल्लियों से लटकी हुई मिली. एक दूसरे गांव में घटना की पड़ताल करने दिल्ली से गई एक टीम को कहा गया कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि मुसलमान कितनी संख्या में मार दिए गए? उनके तो बच्चे ज्यादा होते हैं.

सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. कम से कम उस व्यवस्था को तो बिल्कुल ही नहीं, जिसे बटन दबा कर बदल देने के दावों की गूंज अभी ठीक से खत्म भी नहीं हुई है. मेहरदीन की तरह सीधे हमले में मार दिए गए लोगों की तादाद सरकारी तौर पर अधिक से अधिक 80 है लेकिन गैर सरकारी तौर पर यह संख्या 130 के ऊपर जाती है. जो इन हमलों में जीवित बच गए वे एक अनिश्चित भविष्य में दाखिल हुए. उनमें से ज्यादातर पिछले चार महीनों से ज्यादा वक्त इन शिविरों में गुजार चुके हैं, जहां बाहर से आ रही नाकाफी मदद किसी तरह जिंदा रख पा रही है. कभी कभी वह भी नहीं. जैसे कि चित्तमखेड़ी, बागपत से आईं महबूबा के लिए अपनी बच्ची को भूल पाना मुश्किल हो रहा है. 2 दिसंबर को बुखार और उल्टी शुरू हुई तो उन्होंने पाया कि उसे ठंड लगी है. अगले दिन सवेरे वे उसे पास के कैराना कस्बे में एक डॉक्टर को दिखाने ले गईं. इंजेक्शन देकर इंतजार करने के बाद भी जब उसकी हालत नहीं सुधरी तो डॉक्टर ने उन्हें लौटा दिया. उस रात दो बजे उनकी बच्ची गुजर गई. खुशनुमा! अब बस यह एक नाम बचा रह गया है, एक खाली जगह की शक्ल में, जो यह महसूस कराता है कि वह बच्ची कभी इस दुनिया में हुआ करती थी.

महबूबा के पति फावड़े की मजदूरी करते हैं. यानी जमीन के मालिक प्रभुत्वशाली तबके के गन्ने के खेतों में काम करते हैं. उनके पास अपनी जमीन नहीं हुई कभी. सांप्रदायिक हमलों में परिवार के उजड़ जाने और रोजगार खो बैठने के बाद उनके पास कुछ भी नहीं है, सिवाय इस तंबू के, जूट की रस्सियों से बुनी हुई एक खाट के, दर्जन पर कपड़ों के और कुछ बरतनों के. आप इसे एक दुस्वप्न भरी जिंदगी कह सकते हैं, जो पिछले साल सितंबर में शुरू हुई.

लेकिन महबूबा के लिए इसकी शुरुआत कभी हुई ही नहीं. वे इसे हमेशा से जीते आए हैं. अपनी सात साल की बेटी के बाल ठीक करते हुए वे बताती हैं, ‘कई साल पहले मेरे ससुर बारू को बीच मोहल्ले में मार दिया गया पीट पीट कर. न कोई केस बना न किसी को सजा हुई. जिन्होंने मारा वे ऊंची जाति के हैं. जमीन उनकी है, पुलिस और सरकार में उनका रोब-दाब है. हम कौन हैं? हम तो उनकी हाजिरी में जीने वाले लोग हैं. हमारी कोई ताकत नहीं है.’ इस साल जब रमजान का महीना चल रहा था, जबरन उन्हीं तबकों से आने वाले लोगों ने मस्जिद पर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया, जिस पर अजान दी जाती थी और रोजा खोलने के वक्त का ऐलान होता था. कोई कुछ न कर सका. महबूबा कहती हैं, ‘बच्चे पूछते हैं कि हम मुसलमान क्यों हैं? हम जिस तरह जीना चाहते हैं, हमें इसकी आजादी क्यों नहीं है? हमारे पास आज तक एक मस्जिद तक नहीं है. बस एक चबूतरा है, जिसे हम मस्जिद कहते हैं.’

और अब महबूबा से वह गांव भी छूट गया है जिसमें एक चबूतरेनुमा मस्जिद हुआ करती थी. और अगर सरकार की चली तो यह शिविर भी छूट जाएगा. प्रेस और अदालतों में राहत शिविरों की दुर्दशा की खबरों की चर्चा के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने जबरन शिविरों को बंद कराया जाने लगा है. साल के पहले हफ्ते में, जब मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में तापमान शून्य के आसपास गिर गया था, पुलिस और प्रशासन ने जबरन शिविरों को खाली कराया. जिस वक्त महबूबा अपनी बच्ची के बाल संवार रही थीं, सरकारी अधिकारियों की गाड़ियों का एक काफिला मलकपुर शिविर से धूल उड़ाता हुआ रवाना हुआ. वे इस शिविर को खाली कराने के लिए 12 घंटे में दूसरी बार आए थे. पहली बार वे आधी रात के बाद उस वक्त आए थे जब उन्हें उम्मीद थी कि लोग सो रहे होंगे. लेकिन परिवारों के मर्द और बच्चे सड़क को घेरे हुए रात भर बैठे रहे थे, ताकि पुलिस को जबरन शिविर में घुसने से रोका जा सके. अगले दिन दोपहर में जब वे दोबारा आए तो फिर लोगों ने उन्हें घेर कर वापस लौटा दिया. इलाके में लगभग सभी शिविरों में यह कहानी थोड़े-बहुत अंतर से दोहराई गई.

मलकपुर, नूरपुन खुरगान, सुनेठी और लोई जैसे करीब 25 राहत शिविरों में रह रहे तीस हजार से अधिक लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है. शिविर छोड़ कर वे जाएंगे कहां? जिन लोगों ने पिछले चार महीनों में कभी अपने पुराने गांव लौटने की कोशिश की, उन्हें अपमान और धमकियां सहनी पड़ीं. खेड़ी गांव, जिला शामली के मो. सलीम दिसंबर में एक बार अपने गांव लौटे थे. उनके मकान पर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के लोगों ने कब्जा कर लिया है. सलीम को देख कर उन्होंने गाली गलौज की और कहना शुरू किया कि ‘मुल्ले फिर आ गए. देखते हैं कि ये कैसे यहां रहते हैं.’ डरे हुए और अपमानित सलीम लौट आए.

राज्य या केंद्र, किसी भी सरकार ने इनको फिर से बसाने की कोई कोशिश नहीं की है. लेकिन ये हमेशा के लिए विस्थापित जिंदगी जीते रहें, इसे यकीनी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है. सरकार राहत शिविरों में रह रहे सभी लोगों को पीड़ित मानने को राजी नहीं. इसलिए उन्हें मुआवजा भी नहीं मिलेगा. अगस्त सितंबर के दौरान इन इलाकों में हुए सांप्रदायिक हमलों के कारण 162 गांवों के मुसलमान विस्थापित हुए. लेकिन सरकार महज 9 गांवों को ही ‘दंगा’-ग्रस्त स्वीकार करने को तैयार है. वे गांव हैं- लाक, लिसाढ़, बहावड़ी, कुतबा, कुतबी, मोहम्मदपुर रायसिंह, काकड़ा, फुगाना, और मुंडभर. सरकार इन गांवों के कुल 1800 परिवारों को प्रति घर पांच लाख की रकम मुआवजे के बतौर देने की बात कर रही है. लेकिन एक घर में अगर अनेक परिवार हों तब या तो यह रकम बंट कर बहुत थोड़ी सी रह जाएगी या फिर रकम किसी एक परिवार के पास ही रहेगी और बाकी परिवारों को कोई रकम नहीं मिल पाएगी. ऐसा अनेक मामलों में देखने में आया भी है.

राज्य सरकार ने अब तक जिन गिने-चुने लोगों को मुआवजा राशि दी है, उन्हें इसके लिए एक हलफनामा दायर करना पड़ा है कि वे लौट कर अपने गांव नहीं जाएंगे. अगर गए तो यह राशि उनसे उसी तरह जब्त कर ली जाएगी जैसी बकाया लगान वसूला जाता है.

बाकी 153 गांवों के विस्थापित लोगों के बारे में सरकार का कहना है कि वे मुआवजे की लालच में शिविरों में रह रहे हैं, जबकि उनका कोई नुकसान नहीं हुआ है. यह सही नहीं है. लोगों ने हमले से आतंकित होकर गांव छोड़ा और जो लोग पीछे रह गए वे मार दिए गए या लापता हैं, जैसे कि लिसाढ़ से आए अलीबान के अब्बा के साथ हुआ. अगस्त सितंबर में जब वे लोग गांव से भागे तो उनके अब्बा नसीरुद्दीन नहीं आए. उनके साथ साथ 12 दूसरे लोगों ने भी गांव छोड़ना कबूल नहीं किया. अगले दिन वे सभी 13 लोग मार दिए गए. उनमें से सिर्फ दो की लाश मिल पाई. साफ है कि अगर लोग गांव से नहीं भागते तो मार दिए जाते.

अलीबाज का एक सवाल है: ‘जिस घर में मेरे चाचा (अजमू), चाची (अलीमन) और अब्बा (नसीरुद्दीन) का कत्ल कर दिया गया, मैं वहां जाकर कैसे रह सकता हूं? मुझे यह भरोसा कौन दिलाएगा कि वहां मुझे मार नहीं दिया जाएगा?’

अलीबाज ने सिर्फ अपने परिजन ही नहीं खोए हैं. उन्होंने अपनी जिंदगी को लगातार तबाह होते देखा है. और यह एक ऐसी घटना है जिसे कैलेंडर की कुछ तयशुदा तारीखों में नहीं मापा जा सकता. यह इस व्यवस्था में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों का सामाजिक इतिहास भी बनाता है.

पच्चीस साल पहले तक अलीबाज के पास पहले अपने दो हथकरघे हुआ करते थे, जिस पर बुने कपड़ों को उनके मुहल्ले के लोग घूम घूम कर बेचा करते थे. पूंजी की कमी, सूत की महंगाई और सरकारी मदद की गैर मौजूदगी में उन्हें यह काम बंद कर देना पड़ा. इसके बाद वे शहर की दुकानों से थोक में कपड़े खरीद कर गांव गांव में बेचने लगे. लेकिन 20 साल यह काम करने के बाद इस काम को भी बंद कर देना पड़ा, क्योंकि उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं बच पाती थी. सो उन्होंने घूम घूम कर रद्दी-कबाड़ खरीद कर बेचना शुरू किया. इस धंधे में उनका यह तीसरा साल था. लेकिन अब धंधा भी हाथ से गया और थोड़ी बहुत जमा पूंजी भी. उनके पास कुल मिला कर 300 गज जमीन हुआ करती थी, जिस पर उनके घर के सात कमरे थे. उन्हें दुख इस बात का है कि जब हिंदू समूह ने हमला किया तो उनमें वे दलित भी थे, जिनके पास उन्हीं जितनी जमीन है. या उतनी भी नहीं. वे समझ नहीं पाते कि आखिर दलितों को उनसे क्या शिकायत थी?

अगर इलाके में जमीन के मालिकाने पर नजर डालें तो इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है. इलाके में ज्यादातर जमीनों के मालिक संपन्न जाट हैं. सबसे संपन्न 4.78 फीसदी लोगों के पास कुल भूमि का 26.73 फीसदी मालिकाना है, जबकि सबसे नीचे के 60 फीसदी लोगों के पास करीब 20 फीसदी जमीन है. जाहिर है इस दूसरे समूह के पास बहुत छोटी जोतें हैं-एक हेक्टेयर से भी कम. भूमिहीन लोगों में मुस्लिम और दलित सबसे बड़े दो समूह हैं. वे अपनी आजीविका के लिए जाटों के खेतों और उनके द्वारा संचालित दूसरे धंधों पर निर्भर हैं. वे एक दूसरी वजह से भी निर्भर हैं. संपन्न जाट महाजनी का एक समांतर धंधा भी करते हैं. वे 10 फीसदी तक की ऊंचे सूद पर पैसा गरीब भूमिहीनों को देते हैं. कुरमल गांव से आकर नूरपुर खुरगान में रह रहे मो. दिलशाद ने 2003 में 40000 हजार रुपए एक जमींदार सूदखोर से लिए थे, जिसके बदले में उनपर 2006 में एक लाख 80 हजार रुपए की देनदारी थी. पैसा न चुका पाने की हालत में उन्हें जमींदारों के यहां बंधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है, जो ज्यादातर मामलों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है. इस प्रभुत्वशाली तबके का कानूनी और साथ साथ कानून के बाहर की राजनीतिक-सामाजिक संगठनों पर पूरा कब्जा होता है-चाहे वह पंचायतों के सरपंच हों, मुखियाहों या प्रधान या फिर खाप पंचायतें हों. उनका पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर पूरा नियंत्रण होता है. दिशलाद ने मुसलमानों द्वारा झेले जा रहे सामंती उत्पीड़न और हमले के डर के बारे में बताया, ‘अगर हम नए कपड़े पहनें तो वे हमें गाली देते हैं और सूअर कहते हैं. वे हमारे साथ गाली के बगैर बात ही नहीं करते…और तो और वे किसी को भी कभी भी गिरफ्तार करा सकते हैं.’

खेती से होने वाले आय को सूद पर चलाने और बाजार की स्थिरता के बीच भारी मशीनी के इस्तेमाल की वजह से खेती की उत्पादकता में कोई खासी तरक्की नहीं दिखी है, राज्य की उत्पादकता में सात फीसदी वृद्धि दर के बरअक्स इस इलाके में खेती की वृद्धि दर महज 4.5 फीसदी है. जाहिर है कि बड़े किसान, जो ज्यादातर गन्ना की खेती करते हैं और जिन्हें अपर्याप्त सरकारी समर्थन मूल्य की शिकायत रही है, संकट का सामना कर रहे हैं. इस संकट का एक दूसरा पहलू भी है. इस संकट ने एक सामाजिक तनाव को पैदा किया है, जिसका नतीजा सांप्रदायिक हमले के रूप में सामने आया है और जो पूरे देश में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे हमलों का ही एक हिस्सा है. दलित तबका आर्थिक और समाजिक रूप से संपन्न और भूस्वामी जाट तबके पर इस कदर निर्भर है, कि वह उनके दबाव से तब बाहर नहीं जा सका, जब खाप पंचायतों के जरिए आरएसएस और संपन्न तबके ने मुसलमानों पर हमले की योजना पर अमल किया.

इसलिए, जिन्हें मुआवजा नहीं मिला है, वे भी अब अपने गांव नहीं लौटना चाहते. अब दोबारा उस बंधुआ जिंदगी को जीने की चाहत उनमें नहीं है.

वे अपने गांव नहीं लौट सकते. वे शिविरों में नहीं रह सकते. उनके पास कोई संसाधन नहीं है. वे कहां जाएं?

महबूबा गुस्से में हैं, ‘आग लगा दो अपने मुआवजे में. मेरी बच्ची को जिंदा कर दो.’

जिस जगह पर उनकी बच्ची दफ्न है, उसे छोड़ कर वे कहीं नहीं जाएंगी.

याद. अपनी मरी हुई बच्ची की याद, जो इस जमीन पर दफ्न है. इसलिए वे इस जमीन से नहीं जाएंगी. इंसान किसी को क्यों याद करता है. अब हम उस जगह पर पहुंच गए हैं जहां हम यह सवाल कर सकते हैं: चीजें याद में क्यों बनी रहती हैं? खास कर अगर वो नाइंसाफी और जुल्म से, गुनाह और जुर्म से जुड़ी हुई हों? ऐसी यादों के बने रहने के साथ यह उम्मीद जुड़ी होती है कि इनका कभी इंसाफ होगा. इंसाफ की यह उम्मीद किसी हुकूमत या व्यवस्था से भी हो सकती है और किसी ऐसी ताकत से भी जिनके बारे में उन्हें यकीन हो कि वह मौजूद है और वह सबकुछ देखती और इंसाफ करती है.

हुकूमत और व्यवस्था ने उनके सामने बार बार यह साफ किया है कि वे उनसे कोई उम्मीद नहीं रखें. ठंड से ठिठुरते हुए जिन हफ्तों में उन्हें पुलिस और प्रशासन से शिविरों की हिफाजत के लिए रात-रात भर सड़कों जागते हुए बैठना पड़ा, उत्तर प्रदेश की सरकार और प्रशासन मुलायम सिंह के गांव सैफई में भव्य जलसे में जुटा हुआ था. इस आयोजन में 200 से 300 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है. इसके अलावा सात हजार की आबादी वाले इस गांव के लिए 334 करोड़ रुपए की योजनाएं मौजूदा सरकार के दौरान घोषित की गई हैं. लेकिन सांप्रदायिक हमलों में तबाह लोगों को बहाल करने की जरूरत इस सरकार को कभी महसूस नहीं हुई.

अगर सरकार और मौजूदा व्यवस्था इस इंसाफ को यकीनी नहीं बनाती तो जब तक यह इंसाफ मिल नहीं जाता, तब तक के लिए जरूरी है कि अपराध के सबूत बने रहें. और जिनके खिलाफ ये अपराध किए गए हैं, वे भी. बदहाली और तकलीफों से गुजर रही जिंदगी के बीच कैमरे के सामने अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने में किसी झिझक के न होने के पीछे यह जिद है. राहत शिविरों में रह रहे हजारों लोग महसूस करते हैं कि उन पर किया गया हमला एक कौम के रूप में उनके अस्तित्व पर किया गया हमला है. वे महसूस करते हैं कि एक पूरे समुदाय के रूप में उनकी जिंदगी को तबाह कर देना इस हमले का मकसद है. वे यह भी बताते हैं कि यह ऐसा हमला नहीं है, जिसे महज तारीखों के साथ गिनाया जा सके. यह शायद उनके होने के साथ ही शुरू हो गया था. इसलिए, जब वे काले से डिब्बे के भीतर एक शटर के खुलने और बंद होने के बीच कैमरे की तरफ देखना चुनते हैं तो वे एक बयान दे रहे होते हैं कि एक संप्रदाय के रूप में मिटा दिए जाने की सारी कोशिशों के बावजूद वे बने हुए हैं. यहां. इस तरह. हाड़ मांस की शक्ल में. रगों में दौड़ते हुए खून और आती जाती सांसों के साथ. ताकि सनद रहे.

वे जानते हैं कि अगर यादें बनी रहीं तो इंसाफ की उम्मीदें भी बची रहेंगी. अगर उन्हें भुला दिया गया तो जुर्म का आखिरी सबूत भी मिट जाएगा. वे देखते हैं कि कैसे उनकी सारी तकलीफों को, उनके दर्द और उनकी बेदखली को पिछले चार महीनों में झुठलाने की कोशिशें हुई हैं. ये कोशिशें तब हुई हैं जब एक लाख लोग इन चार महीनों में उजड़े और राहत शिविरों में बसने को मजबूर किए गए. अगर वे यहां से चले गए तो क्या कोई मानेगा कि यहां कोई जुर्म हुआ भी था? अगर इस जुर्म के होने को स्वीकार करना है तो सबसे पहले उनकी मौजूदगी को भी स्वीकार करना होगा, जिन के खिलाफ जुर्म हुआ.

जाहिर है अब तक उन्हें निराशा ही मिली है. लेकिन इस दुनिया में चार गुना चार हाथ के तंबू के सामने अपने परिवार के लिए आटा गूंथती इस लड़की की तस्वीर जब तक रहेगी, वह इंसानी याद को इस बेचैनी से निजात दिलाती रहेगी कि इंसाफ की जरूरत को साबित करने वाली अकेली वही नहीं है. एक तस्वीर भी है.

(इस लेख में फोटोग्राफी संबंधी कुछ बुनियादी स्थापनाओं के लिए लेखक जॉन बर्जर और सूसन सॉन्टैग का आभारी है.)

26 नवंबर 2013

तहलका का साहस अब कहां है? - अरुंधति रॉय

'तरुण तेजपाल उस इंडिया इंक प्रकाशन घराने के पार्टनरों में से एक थे, जिसने शुरू में मेरे उपन्यास गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स को छापा था. मुझसे पत्रकारों ने हालिया घटनाओं पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही है. मैं मीडिया के शोरशराबे से भरे सर्कस के कारण कुछ कहने से हिचकती रही हूं. एक ऐसे इंसान पर हमला करना गैरमुनासिब लगा, जो ढलान पर है, खास कर जब यह साफ साफ लग रहा था कि वह आसानी से नहीं छूटेगा और उसने जो किया है उसकी सजा उसकी राह में खड़ी है. लेकिन अब मुझे इसका उतना भरोसा नहीं है. अब वकील मैदान में आ खड़े हुए हैं और बड़े राजनीतिक पहिए घूमने लगे हैं. अब मेरा चुप रहना बेकार ही होगा, और इसके बेतुके मतलब निकाले जाएंगे. तरुण कई बरसों से मेरे एक दोस्त थे. मेरे साथ वे हमेशा उदार और मददगार रहे थे. मैं तहलका की भी प्रशंसक रही हूं, लेकिन मुद्दों के आधार पर. मेरे लिए तहलका के सुनहरे पल वे थे जब इसने आशीष खेतान द्वारा गुजरात 2002 जनसंहार के कुछ गुनहगारों पर किया गया स्टिंग ऑपरेशन और अजित साही की सिमी के ट्रायलों पर की गई रिपोर्टिंग को प्रकाशित किया. हालांकि तरुण और मैं अलग अलग दुनियाओं में रहते हैं और हमारे नजरिए (राजनीति भी और साहित्यिक भी) भी हमें एक साथ नहीं लाते और जिससे हम और दूर चले गए. अब जो हुआ है, उसने मुझे कोई झटका नहीं दिया, लेकिन इसने मेरा दिल तोड़ दिया है. तरुण के खिलाफ सबूत यह साफ करते हैं कि उन्होंने ‘थिंकफेस्ट’ के दौरान अपनी एक युवा सहकर्मी पर गंभीर यौन हमला किया. ‘थिंकफेस्ट’ उनके द्वारा गोवा में कराया जाने वाला ‘साहित्यिक’ उत्सव है. थिंकफेस्ट को खनन कॉरपोरेशनों की स्पॉन्सरशिप हासिल है, जिनमें से कइयों के खिलाफ भारी पैमाने पर बुरी कारगुजारियों के आरोप हैं. विडंबना यह है कि देश के दूसरे हिस्सों में ‘थिंकफेस्ट’ के प्रायोजक एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें अनगिनत आदिवासी औरतों का बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं और हजारों लोग जेलों में डाले जा रहे हैं या मार दिए जा रहे हैं. अनेक वकीलों का कहना है कि नए कानून के मुताबिक तरुण का यौन हमला बलात्कार के बराबर है. तरुण ने खुद अपने ईमेलों में और उस महिला को भेजे गए टेक्स्ट मैसेजों में, जिनके खिलाफ उन्होंने जुर्म किया है, अपने अपराध को कबूल किया है. फिर बॉस होने की अपनी अबाध ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने उससे पूरे गुरूर से माफी मांगी, और खुद अपने लिए सजा का एलान कर दिया-अपनी ‘बखिया उधेड़ने’ के लिए छह महीने की छुट्टी की घोषणा-यह एक ऐसा काम है जिसे केवल धोखा देने वाला ही कहा जा सकता है. अब जब यह पुलिस का मामला बन गया है, तब अमीर वकीलों की सलाह पर, जिनकी सेवाएं सिर्फ अमीर ही उठा सकते हैं, तरुण वह करने लगे हैं जो बलात्कार के अधिकतर आरोपी मर्द करते हैं-उस औरत को बदनाम करना, जिसे उन्होंने शिकार बनाया है और उसे झूठा कहना. अपमानजनक तरीके से यह कहा जा रहा है कि तरुण को राजनीतिक वजहों से ‘फंसाया’ जा रहा है- शायद दक्षिणपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा. तो अब एक नौजवान महिला, जिसे उन्होंने हाल ही में काम देने लायक समझा था, अब सिर्फ एक बदचलन ही नहीं है बल्कि फासीवादियों की एजेंट हो गई? यह एक और बलात्कार है- उन मूल्यों और राजनीति का बलात्कार जिनके लिए खड़े होने का दावा तहलका करता है. यह उन लोगों की तौहीन भी है, जो वहां काम कर रहे हैं और जिन्होंने अतीत में इसको सहारा दिया था. यह राजनीतिक और निजी, ईमानदारियों की आखिरी निशानों को भी खत्म करना है. मुक्त, निष्पक्ष, निर्भीक. तहलका खुद को यह बताता है. तो साहस अब कहां है?' 
आउट्लुक से हिन्दी अनुवाद रेयाज-उल-हक़


तरुण तेजपाल के घिनौने यौन अत्याचार का दोष तय करो!- क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा

तरुण तेजपाल के घिनौने यौन अत्याचार का दोष तय करो!
पीड़ित महिला पत्रकार के पक्ष में न्यायपूर्ण कार्रवाई करो!!
साम्राज्यवादी-सामंतवादी संस्कृति को ध्वस्त करो!!

पिछले दो वर्षों में महिला की सुरक्षा की जितनी दावेदारी राज्य सरकारों और संसदीय पार्टियों ने किया है उससे कई गुना महिला उत्पीड़न की घटनाएं घटीं। पिछले दिसम्बर में बलात्कार की हुई घटना से दिल्ली ही नहीं पूरा देश सड़क पर उतर पड़ा था। इसके बावजूद न तो बलात्कार की घटनाओं में कमी आ रही है और न ही उत्पीड़न की घटनाओं में गिरावट का संकेत मिल रहा है। यह तकलीफदेह हालात एक रोजमर्रा की खबर और जीवनचर्या का हिस्सा बनता हुआ लग रहा है। मानो यह सब कुछ होना समाज का अनिवार्य हिस्सा हो। किसी सांसद, विधायक, नौकरशाह आदि का इस तरह की घटनाओं में लिप्त होना इस तरह के विचार को बनाने में न केवल मदद करता है बल्कि इस तरह के घिनौने समाज विरोधी कार्य को वैधानिकता भी प्रदान करता है। एक मीडियाकर्मी की लिप्तता इस भयावह स्थिति का एक ऐसा नमूना है जिसके नीचे वर्तमान साम्राज्यवादी-सामंतवादी आर्थिक-सामाजिक ढांचा सड़ रहा है और जिसका खामियाजा पूरा समाज और महिलाएं भुगत रही हैं।

तरुण तेजपाल, मुख्य संपादक, तहलका ने गोवा में अपनी पत्रिका द्वारा आयोजित ‘थिंक फेस्टिवल’के दौरान अपनी पत्रिका की एक पत्रकार का जिस तरह लगातार यौन अत्याचार किया है वह शर्मनाक और उत्पीड़ित महिला और समाज के प्रति घोर अपराध है। यह महिला पत्रकार तरुण तेजपाल की बेटी की मित्र है और वह उसी की उम्र की है। ‘थिंक फेस्टिवल’का आयोजन खनन कारपोरेशन्स और माफिया के सहयोग से करने वाले तरुण तेजपाल खुद को ‘लोकतंत्र’के झंडाबरदार के तौर पर पेश करते रहे हैं। पत्रकारिता के पेशे में तहलका कायम करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन के दौरान महिलाओं का ‘कॉलगर्ल’के तौर पर इस्तेमाल के दौरान भी उनपर कई आरोप लगे थे। पत्रकारिता और नैतिकता की बहस में यह मसला उस समय दब गया और उन महिलाओं के प्रति किए गए अपराध को न्याय के दायरे से ही नहीं पत्रकारिता की नैतिकता से भी बाहर ही रखा गया। उत्पीड़ित पत्रकार महिला और तरुण तेजपाल की बेटी के बीच हुए संदेशों और ई-मेल के माध्यम से तरुण तेजपाल की महिला के प्रति घिनौनी मानसिकता का काफी खुलासा होता है। इस घिनौने अपराध को लेकर तरुण तेजपाल ने जिस तरह बयानों को तोड़ा मरोड़ा है उससे भी उनके अपराध का पक्ष काफी कुछ बाहर आ जाता है। तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी ने जिस तरह महिला विरोधी पक्ष लिया है, बचाव के नाम पर जो कुछ बयान दिया है वह चितंनीय और कथित व्यवसायगत एकता के नाम पर पत्रकारिता को कलंकित करने का भी काम है।

तरुण तेजपाल को बचाने के लिए शोमा चौधरी ने जिस तरह का बयान दिया और माहौल बनाया उसकी वजह से उत्पीड़ित महिला पत्रकार को एक बार फिर यातना से गुजरना पड़ा। इस तरह के बचाव की शह पर तरुण तेजपाल ने पैंतरेबाजी कर उत्पीड़िता को एक बार फिर यातना का शिकार बनाया। पीड़िता को न्याय मिले इसके लिए जरूरी है कि तरूण तेजपाल के घिनौने कृत्य के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई हो और पीड़िता के खिलाफ माहौल बनाने वालों का दोष तय हो।

वैश्वीकरण और नवउदारवादी संस्कृति का जिस तेजी से हमारे सामने एक मॉडल खड़ा हुआ है उसे हम कारपोरेट, संसद व विधायिका, मीडिया और साम्राज्यवादी गिरोहों के गठजोड़ में देख सकते हैं। इस गठजोड़ में अहम हिस्सा है महिला को बाजार में ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’के रूप में उतारना। यह साम्राज्यवादी संस्कृति है जिसका गठजोड़ अपने देश में सामंतवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति के साथ हुआ है। मीडिया संस्थानों के मालिकों, प्रबंधकों, संपादकों...में मुनाफे की होड़, संपदा निर्माण और सत्ताशाली होने का लोभ-लालच पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति, आधुनिकता, जीवनशैली आदि आवरण में खतरनाक रूप से ऐसी संस्कृति को पेश कर रहा है जो पूरे समाज और महिला के लिए भयावह स्थिति बना रहा है। महिला उत्पीड़न का बढ़ता फैलाव और उच्चवर्गों का खुलेआम हिंसक व्यवहार एक ऐसी चुनौती है जिसे रोकने के लिए सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक मोर्चों पर संघर्ष को तेज करना होगा।

क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ) तहलका में काम करने वाले आम पत्रकार और पीड़िता जिन्होंने तरुण तेजपाल के खिलाफ बोलने का साहस किया के साथ अपनी एकजुटता प्रकट करता है। क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आरडीएफ) पीड़िता के पक्ष में न्याय की लड़ाई और दोषी को सजा दिलाने के संघर्ष में अपनी भागीदारी प्रस्तुत करता है।

वरवर राव
जीएन साईबाबा

21 फ़रवरी 2013

क्या आपके बमरोधी बेसमेंट में अटैच बाथरूम है? : अरुंधति राय


अफजल गुरु की फांसी के निहितार्थों और भारत की युद्धोन्मादी सांप्रदायिक राजनीति पर अरुंधति राय. मूल अंग्रेजी: आउटलुक. अनुवाद: रेयाज उल हक.

2001 के संसद हमले के मुख्य आरोपी मोहम्मद अफजल गुरु की खुफिया और अचानक दी गई फांसी के क्या नतीजे क्या होने जा रहे हैं? क्या कोई जानता है? सेंट्रल जेल जेल नं. 3, तिहाड़, नई दिल्ली के सुपरिंटेंडेंट द्वारा ‘मिसेज तबस्सुम, पत्नी श्री अफजल गुरु’ को भेजे गए मेमो में, जिसमें संवेदनहीन नौकरशाहाना तरीके से हरेक नाम को अपमानजनक तरीके से लिखा गया है, लिखा है:
‘श्री मो. अफजल गुरु, पुत्र- हबीबिल्लाह की माफी की याचिका को भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दिया गया है. इसलिए मो. अफजल, पुत्र-हबीबिल्लाह को 09/02/2013 को सुबह आठ बजे सेंट्रल जेल नं. 3 में फांसी देना तय किया गया है.
आपको सूचना देने और आगे की जरूरी कार्रवाई के लिए भेजा गया.’
मेमो भेजने का वक्त जानबूझ कर ऐसा रखा गया कि वह तबस्सुम को फांसी के बाद ही मिले, और इस तरह उन्हें उनके आखिरी कानूनी मौके – यानी क्षमा याचिका के खारिज किए जाने को चुनौती देने के अधिकार -  से महरूम कर दिया गया. अफजल और  उनके परिवार, दोनों को अलग-अलग ये अधिकार हासिल था. दोनों को ही इस अधिकार का उपयोग करने से रोक दिया गया. यहां तक कि कानून में अनिवार्य होने के बावजूद तबस्सुम को भेजे गए मेमों में राष्ट्रपति द्वारा क्षमा याचिका खारिज किए जाने की कोई वजह नहीं बताई गई. अगर कोई वजह नहीं बताई गई है, तो आप किस आधार पर अपील करेंगे? भारत में फांसी की सजा प्राप्त सभी कैदियों को यह आखिरी मौका दिया जाता रहा है.
चूंकि फांसी दिए जाने से पहले तबस्सुम को अपने पति से मिलने की इजाजत नहीं दी गई, चूंकि उनके बेटे को अपने पिता से सलाह के आखिरी दो बोल सुनने की इजाजात नहीं दी गई, चूंकि उन्हें दफनाने के लिए अफजल का शरीर नहीं दिया गया, और चूंकि कोई जनाजा नहीं हुआ, तो जेल मैनुअल के मुताबिक ‘आगे की जरूरी कार्रवाई’ क्या है? गुस्सा? अपार, अपूरणीय दुख? बिना किसी सवाल के, जो हुआ उसे कबूल कर लिया जाना? संपूर्ण अखंडता?
फांसी के बाद एक अपार जश्न मनाया गया. संसद हमले में मारे गए लोगों की गमजदा बीवियां टीवी पर दिखाई गईं, अपनी उत्तेजित मूंछों के साथ ऑल इंडिया एंटी-टेररिस्ट फ्रंट के अध्यक्ष एम.एस. बिट्टा थे उनकी छोटी सी उदास कंपनी के सीईओ की भूमिका अदा कर रहे थे. क्या कोई उन्हें बताएगा कि जिस इंसान ने उनके पतियों को मारा वो भी उसी वक्त, उसी जगह पर मारा गया था? और जिन लोगों ने हमले की योजना बनाई उनको कभी सजा नहीं होगी, क्योंकि हम अब तक नहीं जानते कि वे कौन हैं.
इस बीच कश्मीर पर एक बार फिर कर्फ्यू लागू है. एक बार फिर इसके लोगों को बाड़े में जानवरों की तरह बंद कर दिया गया है. एक बार फिर उन्होंने कर्फ्यू को मानने से इन्कार कर दिया है. तीन दिनों में तीन लोग मारे जा चुके थे और पंद्रह गंभीर रूप से जख्मी थे. अखबार बंद करा दिए गए हैं, लेकिन जो भी इंटरनेट पर छानबीन करना जानता है, वो पाएगा कि नौजवान कश्मीरियों का गुस्सा उतना अवज्ञाकारी और साफ जाहिर नहीं है, जितना यह 2008, 2009 और 2010 की गर्मियों के जन उभार के दौरान था – यहां तक कि उन मौकों पर 180 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इस बार गुस्सा सर्द और तीखा है. निर्मम. क्या ऐसी कोई वजह है कि इसे ऐसा नहीं होना चाहिए था?
20 वर्षों से भी अधिक समय से, कश्मीरी एक फौजी कब्जे को भुगत रहे हैं. जिन दसियों हजार लोगों ने अपनी जानें गवाईं, वे जेलों में, यातना शिविरों में और असली और फर्जी ‘मुठभेड़ों’ में मारे गए. अफजल गुरु की फांसी को जो बात इन सबसे अलग बनाती है, वो यह है कि इस फांसी ने उन नौजवानों को, जिन्हें कभी भी लोकतंत्र का सीधा अनुभव नहीं रहा है, सबसे आगे की कुर्सियों पर बैठ कर भारतीय लोकतंत्र को पूरी महिमा के साथ काम करते हुए देखने का मौका मुहैया कराया है. उन्होंने पहियों को घूमते हुए देखा है, उन्होंने एक इंसान को, एक कश्मीरी को फांसी देने के लिए इसके सारे पुराने संस्थानों, सरकार, पुलिस, अदालतों, राजनीतिक दलों और हां, मीडिया को एकजुट होते हुए देखा है, जिसके बारे में उऩका मानना है कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं हासिल हुई थी. और उनके यह मानने की खासी वजहें हैं.
निचली अदालत में सुनवाई के सबसे अहम हिस्से में अफजल का पक्ष पेश करने वाला लगभग कोई नहीं था. अदालत द्वारा नियुक्त वकील कभी उनसे जेल में नहीं मिला, और असल में उसने अपने खुद के मुवक्किल के खिलाफ इल्जाम लगाने वाले सबूत पेश किए. (सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार किया और फिर फैसला किया कि यह ठीक है.) संक्षेप में, किसी भी तरह से तर्कसंगत संदेहों के परे जाकर उनका अपराध साबित नहीं हुआ. उन्होंने देखा कि सरकार ने उन्हें फांसी की सजा का इंतजार कर रहे लोगों में से चुन कर, बेवक्त फांसी दे दी. यह नया सर्द, तीखा गुस्सा किस दिशा में जाएगा और कौन सी शक्ल अख्तियार करेगा? क्या यह उन्हें वह मुक्ति (आजादी) दिलाएगा, जिसकी उन्हें इतनी चाहत है और जिसके लिए उन्होंने एक पूरी पीढ़ी कुरबान कर दी है. या इसका अंजाम तबाही से भरी हुई हिंसा का एक और सिलसिले में, कुचल दिए जाने और फौजी बूटों द्वारा थोपी गई ‘सामान्य हालात’ वाली जिंदगी में होगा?
हममें से जो भी इलाके में रहते हैं, वे जानते हैं 2014 एक ऐतिहासिक साल होने जा रहा है. पाकिस्तान, भारत और जम्मू और कश्मीर में चुनाव होंगे. हम जानते हैं कि जब अमेरिका अफगानिस्तान से अपने फौजियों को निकाल लेगा तो पहले से ही गंभीर रूप से अस्थिर पाकिस्तान की अव्यवस्था कश्मीर तक फैल जाएगी, जैसा कि पहले हो चुका है. जिस तरह से अफजल को फांसी दी गई है, उससे भारत सरकार ने इस अस्थिरता की प्रक्रिया को बढ़ाने का फैसला किया है, असल में उसने इसकी दावत दी है. (जैसा कि इसने पहले भी, 1987 में कश्मीर चुनावों में धांधली करके किया था.) घाटी में लगातार तीन सालों तक चले जनांदोलन के 2010 में खत्म होने के बाद सरकार ने ‘सामान्य हालात’ का अपना वर्जन लागू करने की काफी कोशिश की है (खुशहाल सैलानी, वोट डाल रहे कश्मीरी). सवाल है कि क्यों यह अपनी ही कोशिशों को पलटना चाहती है? जिस तरह अफजल गुरु को फांसी दी गई, उसके कानूनी, नैतिक और उसके अमानवीय पहलुओं को परे कर दें और इसे एक महज राजनीतिक, कार्यनीतिक रूप में देखें तो यह एक खतरनाक और गैरजिम्मेदार काम है. लेकिन यह किया गया है. साफ साफ और जान बूझ कर. क्यों?
मैंने ‘गैरजिम्मेदार’ शब्द सोच-समझ कर ही इस्तेमाल किया है. पिछले कुछ समय में जो हुआ है, उस पर नजर डालते हैं. 
2001 में, संसद पर हमलों के हफ्ते भर के भीतर (अफजल गुरु की गिरफ्तारी के कुछ दिनों के बाद) सरकार ने पाकिस्तान से अपने राजदूत को बुला लिया और अपनी पांच लाख फौज सरहद पर भेज दी. ऐसा किस आधार पर किया गया? जनता को सिर्फ यही बताया गया कि दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की हिरासत में अफजल गुरु ने पाकिस्तान स्थित एक चरमपंथी समूह जैश-ए-मुहम्मद का सदस्य होना कबूल किया है. सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को कानून की नजर में अमान्य करार दिया. लेकिन कानून की नजर में जो अमान्य है वो क्या जंग में मान्य हो जाता है?
मामले के अपने अंतिम फैसले में, ‘सामूहिक अंतरात्मा की संतुष्टि’ वाले अब मशहूर हो गए बयान और किसी सबूत के न होने के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इसका ‘कोई सबूत नहीं था कि मोहम्मद अफजल गुरु का संबंध किसी आतंकवादी समूह या संगठन से है.’ तो फिर कौन सी बाद उस फौजी चढ़ाई, फौजियों के जान के उस नुकसान, जनता के पैसे को पानी के तरह बहाए जाने और परमाणु युद्ध के वास्तविक जोखिम को जायज ठहराती है? (विदेशी दूतावासों द्वारा यात्रा सुझाव जारी किया जाना और अपने कर्मचारियों को वापस बुलाया जाना याद है?) संसद हमले और अफजल गुरु की गिरफ्तारी के पहले क्या कोई खुफिया सूचना आई थी, जिसके बारे में हमें नहीं बताया गया? अगर ऐसा था, तो हमले को होने कैसे दिया गया? और अगर खुफिया सूचना सटीक थी, और इतनी सटीक थी कि उससे ऐसी खतरनाक फौजी तैनाती को जायज ठहराया जा सकता था, तो क्या भारत, पाकिस्तान और कश्मीर की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वह क्या थी? अफजल गुरु का अपराध साबित करने के लिए वह सबूत अदालत में क्यों नहीं पेश किया गया?
संसद पर हमले के मामले की सारी अंतहीन बहसों में से इस मुद्दे पर, जो कि सबसे अहम मुद्दा है, वामपंथी, दक्षिणपंथी, हिंदुत्वपंथी, धर्मनिरपेक्षतावादी, राष्ट्रवादी, देशद्रोही, सनकी, आलोचक - सभी हल्कों में मुर्दा खामोशी है. क्यों?
हो सकता है कि हमले के पीछे जैश-ए-मुहम्मद का दिमाग हो. भारतीय मीडिया के जाने-माने ‘आतंकवाद’ विशेषज्ञ प्रवीण स्वामी ने, जिनके भारतीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों में ऐसे सूत्र हैं कि जलन होती है, हाल ही में एक पूर्व आईएसआई प्रमुख ले. जन. जावेद अशरफ काजी के 2003 के एक बयान का और एक पाकिस्तानी विद्वान मुहम्मद आमिर राणा की 2004 की एक किताब का हवाला दिया है, जिसमें संसद हमले में जैश-ए-मुहम्मद को जिम्मेदार ठहराया गया है. (एक ऐसे संगठन के मुखिया के बयान की सच्चाई पर यकीन करना दिल को छू गया, जिसका काम भारत को अस्थिर करना है.) लेकिन तब भी यह नहीं बताता कि 2001 में जब फौजी तैनाती हो रही थी, तो कौन से सबूत पास में थे.
चलिए बहस की खातिर मान लेते हैं कि जैश-ए-मुहम्मद ने हमला कराया था. हो सकता है कि आईएसआई भी इसमें शामिल हो. हमें यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान सरकार कश्मीर में छुपी हुई गतिविधियां करने से पाक-साफ है. (जैसे कि भारत सरकार बलूचिस्तान और पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में करता है. याद करें कि भारतीय सेना ने 1970 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी को और 1980 के दशक में लिट्टे सहित छह विभिन्न श्रीलंकाई तमिल चरमपंथी समूहों को प्रशिक्षण दिया था.)
यह एक गंदा नजारा है. पाकिस्तान से जंग से क्या हासिल होने वाला था और अभी इससे क्या हासिल होगा? (जानों के भारी नुकसान के अलावा. और हथियारों के कुछ डीलरों के बैंक खातों के फूलते जाने के अलावा.) भारतीय युद्धोन्मादी लगातार यह सुझाव देते हैं कि ‘समस्या को जड़ से खत्म करने’ का अकेला तरीका ‘सख्ती से पीछा करते हुए’ पाकिस्तान में स्थित ‘आतंकवादी शिविरों’ को ‘खत्म करना’ है. सचमुच? यह देखना दिलचस्प होगा कि हमारे टीवी के पर्दों पर दिखने वाले कितने आक्रामक रणनीतिक विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों के हित रक्षा और हथियार उद्योग में हैं. उन्हें तो युद्ध की जरूरत तक नही है. उन्हें एक युद्ध-जैसी स्थिति की जरूरत है, जिसमें फौजी खर्च का ग्राफ ऊपर चढ़ता रहे. सख्ती से पीछा करने का खयाल बेवकूफी भरा है और जितना लगता है उससे कहीं अधिक दयनीय है. वे किन पर बम गिराएंगे? कुछ व्यक्तियों पर? उनके बैरकों और भोजन की आपूर्ति पर? या उनकी विचारधारा पर? देखिए कि अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा ‘सख्ती से पीछा किया जाना’ किस अंजाम को पहुंचा है. और देखिए कि कैसे पांच लाख फौजियों का ‘सुरक्षा जाल’ कश्मीर की निहत्थी, नागरिक आबादी को काबू में नहीं कर पाया है. और भारत सरहद पार करके एक ऐसे देश पर बम गिराने जा रहा है जिसके पास परमाणु बम है और जो अव्यवस्था में धंसता जा रहा है. भारत में युद्ध चाहनेवाले पेशेवरों को पाकिस्तान के बिखराव को देख कर काफी तसल्ली मिलती है. जिसे भी इतिहास और भूगोल की थोड़ी बहुत, कामचलाऊ भी जानकारी होगी, वो जान सकता है कि पाकिस्तान का टूटना  (उन्मादी, नकारवादी, धार्मिक हिमायतियों के गैंगलैंड के रूप में बिखर जाना) किसी के लिए भी खुशी मनाने की वजह नहीं है.
अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी मौजूदगी और आतंक के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी मातहत के रूप में पाकिस्तान की भूमिका ने इस इलाके को सबसे ज्यादा खबरों में बने रहने वाला क्षेत्र बना दिया है. वहां जो खतरनाक चीजें हो रही हैं, कम से कम बाकी की दुनिया उनके बारे में जानती है. लेकिन उस खतरनाक तूफान के बारे में बहुत कम जाना-समझा जाता है और उससे भी कम पढ़ा जाता है, जो दुनिया की पसंदीदा नई महाशक्ति की दुनिया में तेजी अख्तियार कर रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से मुश्किलों में है. आर्थिक उदारीकरण ने नए-नए बने मध्य वर्ग में जो आक्रामक, लालची महत्वाकांक्षा पैदा की है वो तेजी से उतनी ही आक्रामक हताशा में बदल रही है. जिस हवाई जहाज में वे बैठे थे, वो उड़ान भरने के फौरन बाद बंद हो गया है. खुशी का दौरा आतंक में बदल रहा है.
आम चुनाव 2014 में होने वाले हैं. एक्जिट पोल के बिना भी मैं आपको बता सकती हूं कि नतीजे क्या रहेंगे. हालांकि हो सकता है कि यह खुली आंखों से न दिखे, हमारे पास एक बार फिर कांग्रेस-भाजपा गठबंधन होगा. (दोनों में से हरेक दल के दामन पर अल्पसंख्यक समुदायों के हजारों लोगों के जनसंहारों के दाग हैं.) सीपीआई (एम) बाहर से समर्थन देगी, हालांकि उससे यह मांगा नहीं जाएगा. ओह, और यह एक मजबूत राज्य होगा. (फांसी के मोर्चे पर, फंदे तैयार हैं. क्या अगली बारी पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के लिए फांसी का इंतजार कर रहे बलवंत सिंह रजोआना की होगी? उनकी फांसी पंजाब में खालिस्तानी भावनाओं को भड़का देगी और अकाली दल को फायदा पहुंचाएगी. यह कांग्रेसी राजनीति का वही पुराना तरीका है.)
लेकिन पुराने तरीके की वह राजनीति कुछ मुश्किलों में है. पिछले कुछ उथल-पुथल भरे महीनों में, केवल मुख्य राजनीतिक दलों की छवि को ही नहीं, बल्कि खुद राजनीति को, राजनीति के विचार को जैसा कि हम इसे जानते हैं, धक्का लगा है. फिर और फिर से, चाहे वो भ्रष्टाचार हो, कीमतों का बढ़ना हो या बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा हो, नया मध्य वर्ग बैरिकेडों पर है. उन पर पानी की बौछारें छोड़ी जा सकती हैं या लाठी चलाई जा सकती है, लेकिन गोली चला कर उनको हजारों की संख्या में मारा नहीं जा सकता, जिस तरह गरीबों को मारा जा सकता है, जिस तरह दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों, कश्मीरियों, नागाओं और मणिपुरियों को मारा जा सकता है - और मारा जाता रहा है. पुराने राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर पूरी तबाही नहीं लानी है, तो इस आक्रामकता को आगे बढ़ कर खत्म करना है, इसकी दिशा बदलनी है. वे जानते हैं कि राजनीति पहले जो हुआ करती थी, उसे वापस वही बनाने के लिए उनका मिल कर काम करना जरूरी है. तब एक सांप्रदायिक आग से बेहतर रास्ता क्या हो सकता है? (वरना और किस तरीके से एक धर्मनिरपेक्ष एक धर्मनिरपेक्ष बना रह सकता है और एक सांप्रदायिक एक सांप्रदायिक?) मुमकिन है कि एक छोटा सा युद्ध भी हो, ताकि हम फिर से नूराकुश्ती का खेल खेल सकें.
तब उस आजमाए हुए और भरोसेमंद पुराने राजनीतिक फुटबाल कश्मीर को उछालने से बेहतर समाधान और क्या हो सकता है? अफजल गुरु की फांसी, इसकी बेशर्मी और इसका वक्त, दोनों जानबूझ कर चुने गए हैं. इसने कश्मीर की सड़कों पर राजनीति और गुस्से को ला दिया है.
भारत इनको हमेशा की तरह क्रूर ताकत और जहरबुझी, मैकियावेलियाई चालबाजियों के साथ इसे काबू में कर लेने की उम्मीद करता है, जिन्हें लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने के लिए बनाया गया है. कश्मीर में युद्ध को दुनिया के सामने एक सबको समेटने वाले, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और उग्र इस्लामवादियों के बीच लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है. तब हमें इस तथ्य का क्या करना चाहिए कि कश्मीर के तथाकथित ग्रांड मुफ्ती (जो एक पूरा कठपुतली पद है) मुफ्ती बशीरुद्दीन असल में एक सरकार द्वारा नियुक्त मुफ्ती हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा नफरत से भरे हुए भाषण दिए और एक के बाद एक फतवे जारी किए और जो मौजूदा कश्मीर को एक डरावना, अखंड वहाबी समाज बनाने का इरादा रखते हैं? फेसबुक के बच्चे गिरफ्तार किए जा सकते हैं, लेकिन वे कभी नहीं. हम इस तथ्य का क्या करें कि जब सऊदी अरब (अमेरिका का मजबूत दोस्त) कश्मीरी मदरसों में पैसे झोंकता है तो भारत सरकार दूसरी तरफ देख रही होती है? सीआईए ने अफगानिस्तान में उन सारे वर्षों में जो किया, यह उससे अलग कैसे है? उन करतूतों ने ही ओसामा बिन लादेन, अल कायदा और तालिबान को जन्म दिया. उन करतूतों ने ही अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया. अब यह किस तरह के बुरे सपनों को जगाएगा?
समस्या यह है कि हो सकता है कि अब पुराने राजनीतिक फुटबॉल को काबू में करना पूरी तरह आसान नहीं रहे. और यह रेडियोएक्टिव भी है. हो सकता है कि यह महज एक इत्तेफाक न हो कि कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान ने ‘सामने आते परदृश्य’ से पैदा होने वाले खतरों के खिलाफ अपनी रक्षा की खातिर छोटी दूरी का जमीन से जमीन पर वार कर सकने वाले परमाणु मिसाइल का परीक्षण किया है. दो हफ्तों पहले, कश्मीर पुलिस ने परमाणु युद्ध में ‘बचाव की तरकीबें’ प्रकाशित की हैं. इसमें शौचालय-युक्त बमरोधी बेसमेंट बनाने के साथ साथ, जो इतना बड़ा हो कि पूरा परिवार इसके भीतर दो हफ्तों तक रह सके, कहा गया है: ‘एक परमाणु हमले के दौरान, गाड़ीचालकों को जल्दी ही पलट जाने वाली अपनी गाड़ियों के नीचे कुचलने से बचने के लिए उनसे निकल कर धमाके की तरफ छलांग लगानी चाहिए.’ और ‘उन्हें शुरुआती मतिभ्रम के लिए तैयार रहना चाहिए, जब धमाके की तरंगें गिरेंगी और अनेक महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताओं को हटा देंगी.’
मुमकिन है कि महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताएं पहले से ही गिर चुकी हों. शायद हम सबको अपनी जल्दी ही पलट जाने वाली गाड़ियों से कूद जाना चाहिए.

(अनुवादकीय नोट: नीचे से पांचवें पैराग्राफ की आखिरी पंक्ति में जहां ‘नूराकुश्ती’ का इस्तेमाल किया गया है, वहां अरुंधति ने Hawks & Doves का इस्तेमाल किया है. ये एक अंग्रेजी कॉमिक्स के अपराध से लड़ने वाले सुपरहीरो हैं. हालांकि इन दोनों का चरित्र अलग-अलग है, हॉक गरममिजाज और सख्त है तो डोव नरममिजाज है, लेकिन अपराध से दोनों मिल कर लड़ते हैं. यहां इनको क्रमश: भाजपा और कांग्रेस के साथ जोड़ कर दिखाया गया है. हिंदी में ऐसे पात्रों का अभी ध्यान नहीं आने की वजह से इसे 'नूराकुश्ती' में समेटने की कोशिश की गई है, फिर भी इसे इस टिप्पणी के साथ ही पढ़ा जाए.)