-दिलीप
ख़ान
जेंडर बजट या जेंडर सेंसिटिव बजट बीते दो-तीन दशकों में दुनिया के पटल
पर उभरा शब्द है। इसके जरिए राष्ट्र-राज्य की कोशिश होती है कि किसी भी सरकारी
योजना के लाभ को महिलाओं तक इस तरह पहुंचाया जाए ताकि लैंगिक तौर पर पुरुषों और महिलाओं
के बीच जो विकास की खाई बनी हुई है उसको पाटा जा सके। महिलाओं को बेहतर जीवन-स्तर
मुहैया कराने की कोशिश की जाती है जिससे सामाजिक तौर पर पुरुषों की तुलना में वो
पीछे न छूटे। अवधारणा के बतौर ये महिला सशक्तिकरण का ही विस्तार है जिसमें महिलाओं
के विकास को स्वतंत्र रूप से न देखकर पुरुषों के बराबर पहुंचाने की कोशिश की जाती
है।
जेंडर बजट या वीमेंस बजट का यह मतलब कतई नहीं है कि महिलाओं के लिए
अलग से बजट पेश किया जाए बल्कि इसका मतलब यह है कि मुख्य बजट में ही कुछ ऐसी
व्यवस्था की जाए ताकि सामाजिक लैंगिक दरार को भरने में ये मदद कर सके। सरकारी पैसे
को किस मद में कितना ख़र्च किया जाए और कहां से पैसा जमा किया जाए बजट में कुल जमा
यही दो काम होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे किसी परिवार में मासिक और वार्षिक
ख़र्च-आमदनी का लेखा-जोखा रखा जाता है। इसी ख़र्च और आमदनी को सरकार यदि इस तरह
व्यवस्थित करती है ताकि उसके लाभ से सामाजिक विकास में पीछे छूटती आधी आबादी को
मदद पहुंच सके तो उसे लैंगिक तौर पर संवेदनशील बजट कहा जाता हैं। इसमें वंचित,
कमज़ोर और बेसहारा महिलाओं पर ज़्यादा ज़ोर होता है। प्रयोग के स्तर पर ऑस्ट्रेलिया
से इसकी शुरुआत मानी जाती है जहां पर 1980 के दशक में पहली बार इसका इस्तेमाल किया
गया। इस समय भारत सहित दुनिया में तकरीबन 70 देश ऐसे हैं जहां जेंडर बजट के प्रयोग
हो रहे हैं। भारत में औपचारिक तौर पर 1997-98 के बजट में इसको पेश किया गया लेकिन
सातवें पंचवर्षीय योजना से ही महिला एवं बाल विकास विभाग के तहत इसको लेकर प्रयास
शुरू हो चुके थे।
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| बजट का पिटारा दिखाते वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी |
2004 में वित्त मंत्रालय ने जेंडर बजटिंग को लेकर कुछ सिफ़ारिशें की
जिनके तहत कई सरकारी मंत्रालयों में अंतर-विभागीय समितियां बनाईं गईं जिन्हें
जेंडर बजट सेल के नाम से जाना जाता है। ये समितियां इन विभागों के दायरे में आने
वाले विषयों में महिला उत्थान को लेकर सक्रिय रहते हैं।
बीते 16 मार्च को प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए बजट का अगर जेंडर
विश्लेषण करें तो इसे बहुत उत्साही बजट नहीं कहा जा सकता। बीते 6 साल से सरकारी
मंत्रालयों और विभागों ने जिन 33 मांगों को जेंडर बजट की खातिर पेश किया उसमें इस
बार भी किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं देखी गई। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अलावा किसी
भी विभाग के लिए नई पहलक़दमी नहीं हुई। पुरानी योजनाओं के मद को ज़रूर बढ़ाया गया
लेकिन योजनाओं की नए सिरे से समीक्षा नहीं की गई। बजट के कुल आकार में हुई बढ़ोतरी
के मुताबिक इन योजनाओं में भी वृद्धि हुई। ये एक तरह से आनुपातिक और स्वाभावित
वृद्धि है। मिसाल के तौर पर ‘सबला’ योजना के मद को बढ़ाकर 750 करोड़ कर दिया गया।
स्वर्णजयंती ग्राम रोज़गार योजना को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत लाने
के बाद इसमें उप-घटक के तौर पर महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना को इसमें शामिल
किया गया था। इस परियोजना के लिए बीते बजट में आवंटित 2914 रुपए को इस बार बढ़ाकर 3915 करोड़ कर दिया गया। हालांकि खेती-बारी में संलग्न महिला श्रम के आकार को
देखते हुए ये बहुत सुकूनदेह तस्वीर अब भी नहीं है। इसी तरह ‘महिला स्व-सहायता समूह विकास निधि’ के मद को 200 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 300 करोड़
रुपए कर दिया गया। इसके अलावा बच्चों और महिलाओं में व्यापक रूप से फैले ‘कुपोषण पर लगाम कसने’ की ख़ातिर वित्त मंत्री ने सोया प्रोटीन पर सीमा
शुल्क घटाकर 10 फ़ीसदी कर दिया। हालांकि कुपोषित महिलाओं और बच्चों तक इस सोया
प्रोटीन को किस तरह पहुंचाया जाएगा इसकी कोई रूप रेखा सरकार द्वारा अब तक पेश नहीं
की गई है। जब तक कुपोषित आबादी को लेकर ठोस योजना नहीं बनेगी तब तक सीमा शुल्क के
घटे दर का सीधे तौर पर इनके बीच कोई मज़बूत प्रभाव नहीं पड़ सकता। असल सवाल ये है
कि किस तरह देश में बड़ी तादाद में मौजूद इस आबादी की क्रय शक्ति को इस रूप में बढ़ाया
जाए कि वो सोया खाद्य-पदार्थों को अपने रोज़मर्रा के भोजन में शामिल कर सकें।
जेंडर नज़रिए से देखें तो कामकाजी महिलाओं को प्रोत्साहित किए जाने की
पुरानी योजना में कतरब्योंत के साथ ये बजट हमारे बीच पेश हुआ है। आत्मनिर्भरता को
लेकर महिलाओं के बीच जिस आत्मविश्वास को,
हल्के स्तर पर ही सही, राज्य द्वारा समर्थन दिया जा रहा था, मौजूदा बजट में उससे
हाथ खींच लिया गया। दफ़्तर में काम करने वालीं निम्न-मध्यवर्गीय महिलाओं के लिए यह
बजट एक तरह से हताश करने वाला है। बीते साल सामान्य लोगों के लिए टैक्स माफ़ी की
न्यूनतम सीमा 1.80 लाख और महिलाओं के लिए 1.90 लाख थी। इस तरह महिलाओं के 10 हज़ार
रुपए की अतिरिक्त कमाई को राज्य ने करमुक्त कर रखा था। ये एक तरह से काम-काजी
महिलाओं के आत्मविश्वास को हल्का बेहतर करने वाली कवायद थी। वित्त वर्ष 2012-13 के
लिए पेश मौजूदा बजट में कर माफ़ी की जो न्यूनतम सीमा रखी गई है उसमें पहले के
मुकाबले बढ़ोतरी हुई है। इसे बढ़ाकर 2 लाख रुपए कर दिया गया, लेकिन अब महिला और
सामान्य श्रेणी के बीच के अंतर को ख़त्म कर दिया गया। इसे दूसरे तरीके से देखें तो
अगर सामान्य श्रेणी के लोगों को वित्त मंत्रालय ने साल में 2000 रुपए के बचत की
सुविधा दी है तो महिलाओं को महज 1000 रुपए की। इस तरह लैंगिक संवेदनशीलता के जरिए
समाज में बराबरी की जो कोशिश थी उसे वेतन और कर में मिलने वाली छूट में बराबरी के
स्तर पर ला दिया गया! वित्त मंत्रालय के
मुताबिक समाज की असमानता अब भी बरकरार है लेकिन महिलाओं को कर सीमा में मिलने वाली
1000 रुपए के अतिरिक्त छूट को मंत्रालय ने कतर लिया। बजट में ऐसी कोई ताजी पहलकदमी
और दृष्टिकोण भी नहीं झलकता जिसके बिनाह पर ये कहा जा सके कि सरकार महिला मुद्दों
पर मंथन की प्रक्रिया में है। बीते एक दशक में बजट में शामिल विषयों और उसकी
प्रकृति में स्थिरता बरकरार है और उसमें समय के साथ कुछ नई चीज़ें शामिल करने की
जो उम्मीद इस बजट में की जा रही थी उसे झटका ही लगा है।

