आधी दुनिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आधी दुनिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

19 मार्च 2012

मौजूदा बजट का जेंडर विश्लेषण


-दिलीप ख़ान

जेंडर बजट या जेंडर सेंसिटिव बजट बीते दो-तीन दशकों में दुनिया के पटल पर उभरा शब्द है। इसके जरिए राष्ट्र-राज्य की कोशिश होती है कि किसी भी सरकारी योजना के लाभ को महिलाओं तक इस तरह पहुंचाया जाए ताकि लैंगिक तौर पर पुरुषों और महिलाओं के बीच जो विकास की खाई बनी हुई है उसको पाटा जा सके। महिलाओं को बेहतर जीवन-स्तर मुहैया कराने की कोशिश की जाती है जिससे सामाजिक तौर पर पुरुषों की तुलना में वो पीछे न छूटे। अवधारणा के बतौर ये महिला सशक्तिकरण का ही विस्तार है जिसमें महिलाओं के विकास को स्वतंत्र रूप से न देखकर पुरुषों के बराबर पहुंचाने की कोशिश की जाती है।
जेंडर बजट या वीमेंस बजट का यह मतलब कतई नहीं है कि महिलाओं के लिए अलग से बजट पेश किया जाए बल्कि इसका मतलब यह है कि मुख्य बजट में ही कुछ ऐसी व्यवस्था की जाए ताकि सामाजिक लैंगिक दरार को भरने में ये मदद कर सके। सरकारी पैसे को किस मद में कितना ख़र्च किया जाए और कहां से पैसा जमा किया जाए बजट में कुल जमा यही दो काम होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे किसी परिवार में मासिक और वार्षिक ख़र्च-आमदनी का लेखा-जोखा रखा जाता है। इसी ख़र्च और आमदनी को सरकार यदि इस तरह व्यवस्थित करती है ताकि उसके लाभ से सामाजिक विकास में पीछे छूटती आधी आबादी को मदद पहुंच सके तो उसे लैंगिक तौर पर संवेदनशील बजट कहा जाता हैं। इसमें वंचित, कमज़ोर और बेसहारा महिलाओं पर ज़्यादा ज़ोर होता है। प्रयोग के स्तर पर ऑस्ट्रेलिया से इसकी शुरुआत मानी जाती है जहां पर 1980 के दशक में पहली बार इसका इस्तेमाल किया गया। इस समय भारत सहित दुनिया में तकरीबन 70 देश ऐसे हैं जहां जेंडर बजट के प्रयोग हो रहे हैं। भारत में औपचारिक तौर पर 1997-98 के बजट में इसको पेश किया गया लेकिन सातवें पंचवर्षीय योजना से ही महिला एवं बाल विकास विभाग के तहत इसको लेकर प्रयास शुरू हो चुके थे।
बजट का पिटारा दिखाते वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी

2004 में वित्त मंत्रालय ने जेंडर बजटिंग को लेकर कुछ सिफ़ारिशें की जिनके तहत कई सरकारी मंत्रालयों में अंतर-विभागीय समितियां बनाईं गईं जिन्हें जेंडर बजट सेल के नाम से जाना जाता है। ये समितियां इन विभागों के दायरे में आने वाले विषयों में महिला उत्थान को लेकर सक्रिय रहते हैं।
बीते 16 मार्च को प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए बजट का अगर जेंडर विश्लेषण करें तो इसे बहुत उत्साही बजट नहीं कहा जा सकता। बीते 6 साल से सरकारी मंत्रालयों और विभागों ने जिन 33 मांगों को जेंडर बजट की खातिर पेश किया उसमें इस बार भी किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं देखी गई। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अलावा किसी भी विभाग के लिए नई पहलक़दमी नहीं हुई। पुरानी योजनाओं के मद को ज़रूर बढ़ाया गया लेकिन योजनाओं की नए सिरे से समीक्षा नहीं की गई। बजट के कुल आकार में हुई बढ़ोतरी के मुताबिक इन योजनाओं में भी वृद्धि हुई। ये एक तरह से आनुपातिक और स्वाभावित वृद्धि है। मिसाल के तौर पर ‘सबला’ योजना के मद को बढ़ाकर 750 करोड़ कर दिया गया। स्वर्णजयंती ग्राम रोज़गार योजना को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत लाने के बाद इसमें उप-घटक के तौर पर महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना को इसमें शामिल किया गया था। इस परियोजना के लिए बीते बजट में आवंटित 2914 रुपए को इस बार बढ़ाकर 3915 करोड़ कर दिया गया। हालांकि खेती-बारी में संलग्न महिला श्रम के आकार को देखते हुए ये बहुत सुकूनदेह तस्वीर अब भी नहीं है। इसी तरह ‘महिला स्व-सहायता समूह विकास निधि’ के मद को 200 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 300 करोड़ रुपए कर दिया गया। इसके अलावा बच्चों और महिलाओं में व्यापक रूप से फैले ‘कुपोषण पर लगाम कसने’ की ख़ातिर वित्त मंत्री ने सोया प्रोटीन पर सीमा शुल्क घटाकर 10 फ़ीसदी कर दिया। हालांकि कुपोषित महिलाओं और बच्चों तक इस सोया प्रोटीन को किस तरह पहुंचाया जाएगा इसकी कोई रूप रेखा सरकार द्वारा अब तक पेश नहीं की गई है। जब तक कुपोषित आबादी को लेकर ठोस योजना नहीं बनेगी तब तक सीमा शुल्क के घटे दर का सीधे तौर पर इनके बीच कोई मज़बूत प्रभाव नहीं पड़ सकता। असल सवाल ये है कि किस तरह देश में बड़ी तादाद में मौजूद इस आबादी की क्रय शक्ति को इस रूप में बढ़ाया जाए कि वो सोया खाद्य-पदार्थों को अपने रोज़मर्रा के भोजन में शामिल कर सकें।
जेंडर नज़रिए से देखें तो कामकाजी महिलाओं को प्रोत्साहित किए जाने की पुरानी योजना में कतरब्योंत के साथ ये बजट हमारे बीच पेश हुआ है। आत्मनिर्भरता को लेकर महिलाओं के बीच जिस आत्मविश्वास  को, हल्के स्तर पर ही सही, राज्य द्वारा समर्थन दिया जा रहा था, मौजूदा बजट में उससे हाथ खींच लिया गया। दफ़्तर में काम करने वालीं निम्न-मध्यवर्गीय महिलाओं के लिए यह बजट एक तरह से हताश करने वाला है। बीते साल सामान्य लोगों के लिए टैक्स माफ़ी की न्यूनतम सीमा 1.80 लाख और महिलाओं के लिए 1.90 लाख थी। इस तरह महिलाओं के 10 हज़ार रुपए की अतिरिक्त कमाई को राज्य ने करमुक्त कर रखा था। ये एक तरह से काम-काजी महिलाओं के आत्मविश्वास को हल्का बेहतर करने वाली कवायद थी। वित्त वर्ष 2012-13 के लिए पेश मौजूदा बजट में कर माफ़ी की जो न्यूनतम सीमा रखी गई है उसमें पहले के मुकाबले बढ़ोतरी हुई है। इसे बढ़ाकर 2 लाख रुपए कर दिया गया, लेकिन अब महिला और सामान्य श्रेणी के बीच के अंतर को ख़त्म कर दिया गया। इसे दूसरे तरीके से देखें तो अगर सामान्य श्रेणी के लोगों को वित्त मंत्रालय ने साल में 2000 रुपए के बचत की सुविधा दी है तो महिलाओं को महज 1000 रुपए की। इस तरह लैंगिक संवेदनशीलता के जरिए समाज में बराबरी की जो कोशिश थी उसे वेतन और कर में मिलने वाली छूट में बराबरी के स्तर पर ला दिया गया! वित्त मंत्रालय के मुताबिक समाज की असमानता अब भी बरकरार है लेकिन महिलाओं को कर सीमा में मिलने वाली 1000 रुपए के अतिरिक्त छूट को मंत्रालय ने कतर लिया। बजट में ऐसी कोई ताजी पहलकदमी और दृष्टिकोण भी नहीं झलकता जिसके बिनाह पर ये कहा जा सके कि सरकार महिला मुद्दों पर मंथन की प्रक्रिया में है। बीते एक दशक में बजट में शामिल विषयों और उसकी प्रकृति में स्थिरता बरकरार है और उसमें समय के साथ कुछ नई चीज़ें शामिल करने की जो उम्मीद इस बजट में की जा रही थी उसे झटका ही लगा है।  

12 फ़रवरी 2012

एसपी अंकित गर्ग ने मुझे नंगा किया..मेरे गुप्तांग में पत्थर भरे।


नक्सली बताकर गिरफ़्तार की गई सोनी सोरी
के मामले में भाजपा और कांग्रेस एक है।

आप सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार एक आदिवासी महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि
(1) मुझे करंट शॉट देने, मुझे कपड़े उतार कर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड़-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी। हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है।
(2) जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ। महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकार कर अपनी लज्जा को बचा ली। मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था। ये नहीं कहूंगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हां, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताड़ना क्यों दी गयी।
(3) पुलिस आफिसर अंकित गर्ग (एसपी) मुझे नंगा करके ये कहता है कि ‘तुम रंडी औरत हो, मादरचोद गोंड… इस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो। वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है। तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो। तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ क्‍यों इतने बड़े-बड़े लोग देंगे।’
[ आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा। इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था। इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया, तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया। आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं, क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं। हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद करते हैं - एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता। आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूं। ]
(4) संसार की सृष्टि किसने की? बलशाली, बुद्धिमान योद्धाओं को जन्म किसने दिया है? यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी? मैं भी तो एक औरत ही हूं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया। जवाब दीजिए…
मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी। मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है। मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूं। मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है। फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है। बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे। आज महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता। आप सभी से इसका जवाब चाहिए।
ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कह कर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा है… और लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं? क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपड़ियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिर अत्याचार सहने की क्षमता है। आखिर क्यों?
हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बना कर, एक-दो केसों के लिए भी 5-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है। न कोई फैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है। या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए। कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक। मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूं, जवाब दीजिए।
जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग 20-21 वर्ष के हो रहे हैं। फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है, तो इनका भविष्य कैसा होगा। हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचिएगा।
नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मार कर उन्हें विकलांग बना दिया। पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया। मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी। मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता। आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी। उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है। नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं। फिर सरकार आदिवासियों के लिए क्यों कुछ करेगी?
छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती
स्व हस्ताक्षरित
श्रीमती सोनी सोरी
(मोहल्ला लाइव से कट पेस्ट)

18 अगस्त 2011

भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय महिलाओं की ’भारतीयता’

-इलीना सेन, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में स्त्री अध्ययन विभाग में प्रोफ़ेसर.
इन दिनों सामान्य बातचीत और आम सामाजिक जीवन में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का महत्व बहुत अधिक हो गया है. निम्न साक्षरता और कम शिक्षा स्तर वाले इस देश में सूचना प्रौद्योगिकी तक तेज पहुंच (रिपोर्ट बताती है कि प्रति १००० लोगों पर संडास की तुलना में मोबाइल फ़ोन अधिक हैं) और स्वस्थ मनोरंजन के साधनों तक पहुंच की कमी के बीच, इस बात से हमें हैरान नहीं होना चाहिए. इसमें एक तरफ़ तो बॉलीवुड से थोक के भाव में निकलने वाली फ़िल्मों और धारावाहिकों में स्त्री शरीर को अंधाधुंध तरीके से वस्तु की तरह नुमाया किया जाता है, दूसरी तरफ़ दोपहर बाद और देर शाम के सोप ओपेरा में महिला किरदारों को ’अत्यधिक पारंपरिक’ परिधानों में प्रस्तुत किया जाता है. इसमें चटक लाल सिंदूर की रेखा महिलाओं के ललाट से लेकर बीच खोपड़ी तक खिंची रहती है. महिला किरदारों की इस छवि को आम तौर पर अत्यधिक अधीन, दूसरों पर निर्भर और आत्मविश्वास की पूर्ण कमी से लिपटे लबादे में प्रस्तुत किया जाता है. इन कार्यक्रमों के निर्माता यह कहते फिरते हैं कि स्त्रीत्व की ’भारतीय’ परंपरा को सहेजने के प्रति उनका यह अंशदान है. कुछ इस तरह गोया हिमालय की अडिग गौरव को वे सहेज रहे हो. भूमंडलीकरण की वजह से हुए परिवर्तनों की दिशाहीन तरीके से कोरा नकल मारते दसियों लाख लोग इसके प्रति आश्वस्त हो जाते हैं.
इन कपटी सुरक्षा को हासिल करने के प्रयास पूरी तरह परिणामहीन नहीं होते. निर्धन शहरी झोपड़पट्टियों में टीवी और फ़िल्म के किसी किरदार की तरह एक युवती के पहनावे और व्यवहार को आज कोई भी देख सकता है. हालांकि इन्हीं झोपड़पट्टियों में कोई भी व्यक्ति वे सारी चीज़ें भी देख सकता हैं जो भारतीय महिलाओं की भारतीय बिरासत की वास्तविक स्थितियों को बयां करते हैं. पानी भरने के लिए सामुदायिक जल स्रोत के पास कतारबद्ध होने, पानी से भरे कई बरतनों को लादकर घर तक लाने, बीपीएल से मिलने वाले राशन की उपलब्धता और बकाया भुगतानों की जांच करने, बच्चों की देखभाल करने से लेकर बेहद कम दर मे बाहरी घरों में असुरक्षित-सा काम करने जैसे रोजमर्रा के जीवन का अंग बनी कठोर शारीरिक मेहनत के अतिरिक्त महिलाओं को अपने पतियों द्वारा छोड़े जाने से लेकर रोज़-रोज़ अपने शराबी पतियों से शारीरिक मार का भी सामना करना पड़ता है. पिछले दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की रोज़गारविहीन वृद्धि (भूमंडलीकरण का एक उत्पाद) का कई विश्लेषकों ने दस्तावेज़ीकरण किया है. २००९-१० के संबंध में नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े यह दिखाते हैं कि मज़दूर भागीदारी ४२ फ़ीसदी से घटकर ३९ फ़ीसदी पर आ गई है. इससे यह साबित होता है कि शाइनिंग इंडिया की जीडीपी की चमत्कारिक उपलब्धि सेवा और वित्तीय सेक्टर पर आधारित है. ग़रीबी, अनिश्चितता और बिखरे परिवारों से भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों इलाके इक्कीसवीं सदी में भी अटे पड़े हैं. भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा मातृत्व और शिशु मृत्यु दर वाले देशों में से एक है. बाल कुपोषण लगातार चोटी पर बरकरार है अल्पपोषित महिलाएं मुसलसल अल्पवज़नी बच्चों को जन्म दे रही हैं. जीवन की घोर अनिश्चितताओं और पारिवारिक जिम्मेवारियों, जिनसे महिलाएं तकरीबन नहीं बच पातीं, की वजह से संपत्तिविहीन घरों से वे मेट्रोपोलिटन का रुख करती हैं. आगामी संतति के लिए इन महिलाओं के जीवन और संघर्षों को बैबी हलदार जैसी महिलाओं ने अपनी लेखनी से सुरक्षित किया है. और निश्चित तौर पर इन महिलाओं की मेहनत और पसीनों के बगैर कुलांचे भरता भारतीय मध्यवर्ग उस स्थिति में नहीं होता जहां आज वह खड़ा है. दिल्ली जैसे तमाम बड़े शहर इसके गवाह हैं. वैश्विक यातायात की संभावना बनने के बाद मंदी और संकट की इस घड़ी में कुछ महिलाएं समृद्ध खाड़ी देशों अथवा अन्य विदेशी देशों में काम की तलाश में रहती हैं. वे वहां पर धनाढ्य भारतवंशियों और विदेशियों के पास घरेलू देखरेख का काम देखती हैं. समय-समय पर इन महिलाओं की दयनीय जीवन और खस्ताहाल स्थितियों की कहानियां लोगों के बीच उजागर होती रहती हैं. इन महिलाओं की पीड़ा उसी रूप में घर पहुंचती रहती है जिस तरह रिज़ाना नफ़ीक की दारुण कथा हमारे बीच पहुंची थी. हालांकि वह भारतीय नहीं है, फिर भी उसकी कहानी दुबई और बैंकॉक हवाई अड्डे के जरिए काम करने के लिए सीमापार पहुंचने को हाथ-पैर मारती दसियों लाख भारतीय युवतियों में से किसी की भी हो सकती है, जो इस उम्मीद में उड़ान भरती है कि वे अपने परिवार वालों को कुछ पैसे घर भेज सके. रिज़ाना नफ़ीक एक श्रीलंकाई युवती थी, जोकि घरेलू नौकरानी का काम करने के उद्देश्य से सऊदी अरब गई थी. २००५ में १७ वर्ष की उम्र में नफ़ीक पर अपने सऊदी मालिक के नवजात शिशु की हत्या करने का आरोप लगाया गया. इस घटना को बच्चे के माता-पिता में से किसी ने भी नहीं देखा था, तो भी तथाकथित ’स्वीकारोक्ति’ के बाद उस पर मुकदमा चलाया गया, उसे पीटा गया, दोषी क़रार दिया गया और अंततः सऊदी अधिकारियों द्वारा उसे बख्शीश में मौत की सजा सुनाई गई. वह आज भी सऊदी की जेल में उस दिन की बाट जोह रही है जब सार्वजनिक तौर पर उसका सर धड़ से अलग कर दिया जाएगा.इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिखने वाली चमकदार परंपरा से लिपटी भारतीय महिलाओं की दुनिया और हमारे देश की अधिसंख्य महिलाओं की दुनिया निश्चित तौर पर दो अलग-अलग छोर हैं. कठोर मेहनत करने वाली महिलाएं इसमें एक छोर पर भूमंडलीकरण के उबलते बरतन में पिघल रही है. पारंपरिक जीवनयापन की सुरक्षा, समुदाय और पारिवारिक सौहार्द्रता के बग़ैर भूमंडलीकरण से पैदा हुई स्थिति में हरे-थके घुड़सवार सेना की तरह वे इसमें शामिल हो गई हैं और भूमंडलीकरण से जन्में नए अवसरों का लाभ उठाने की कोशिश में शिद्दत से लगी हुई हैं. इस प्रक्रिया में उनकी पितृसत्तात्मक हिंसा से, लंबे समय में जम चुकी कानून व्यवस्था की हिंसा से और जातीय तथा वर्गीय स्थिति की वजह से होने वाली हिंसा से मुठभेड़ होती है. जब बाज़ार की ताक़त आधे कपड़े पहने महिलाओं को जूते बेचते दिखाती है तो वे पितृसत्ता में गहरे स्तर तक जड़ जमाए हुए महिला शरीर के प्रति घृणा को भुना रही होती है. जिस समय व्यावसायिक फ़िल्मों और टेलीविज़न के जरिए महिलाओं को अपने हाल पर स्थिर रखने वाली परंपरा की तगड़ी खुराक भारतीय दर्शकों की थाल में परोसी जाती है, उसी वक़्त यही पितृसत्ता उन्हें एक वैचारिक पिंजरे में कैद कर देना चाहती है, जोकि अब तक ऐतिहासिक तौर पर पितृसत्तात्मक सांस्कृतिक मूल्यों को हस्तांतरित करने में सहायक साबित हुई है. इस नकली ’भारतीयता’ में कुछ भी खास भारतीय नहीं हैं. दूसरे सांस्कृतिक मुहावरे में इसी प्रक्रिया को दूसरी भाषा में बताया जा सकता है. भारतीय महिलाओं के लिए सामाजिक न्याय के साथ इस मामले को जोड़कर देखने वाले हम जैसे लोग इसे इस रूप में लेते हैं कि भारतीय होने के लिए इसकी किस दुनिया और किस सच्चाई के साथ पहचान की जाती है. --- (हिंदी अनुवाद: दिलीप ख़ान)