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15 दिसंबर 2016

बिना डाकघरों वाला देश

हम डरे हुए हैं. डरे हुए वे भी हैं. हमारा यह वक्त डरे हुओं का वक्त है. वे डरे हुए हैं कि अब भी हम बचे हुए हैं. हम, जो उनके झूठ को सच कहने से इनकार कर रहे हैं. वे जिसे नायक और नायक से महानायक कह रहे हैं. हम उसे अपराधी और हत्यारा लिख रहे हैं. उनकी बढ़ी हुई ताकतें हमारे साहस को कम न पर पा रहीं. वे हमारी यादों से गुजरात और गुजरात जैसी कई रात की कालिख़ मिटाना चाहते हैं और हम उस कालिख़ को अपने दवात की स्याही बनाना चाहते हैं.  
हम जो हमारी उम्र में राष्ट्रद्रोही होने की सोच में ऊब रहे हैं. हम जो जाने कितनी फाजिल की बहसों में हर रोज डूब रहे हैं. हम जिनकी डायरियों में कुछ और लिखा जाना था. कुछ और कहा जाना था. जहां पुरानी प्रेमिकाओं की यादें उतरनी थी. उन डायरियों में उनके फैलाए जा रहे झूठ से फैली परेशानियां उतर रही हैं. ऐसे ही वक्त की यह डायरी है. जिसे दोस्त मिथिलेश प्रियदर्शी ने लिखा है. जेएनयू वाली ‘एन्टीनेशनल’ डायरी. जे.एन.यू. के उन दिनों को बयान करती हुई जब अपने दोस्तों को जेएनयू का सच बताना ‘पाकिस्तान’ हो जाना था. जिसका एक छोटा हिस्सा यहां पढ़ सकते हैं. बाकी पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 
डायरी का एक हिस्सा
कैलेंडर की हर तारीख के पास बताने के लिए बहुत कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता. पर जेएनयू के 9 फरवरी के हिस्से कुछ ऐसा आया था, जिसके बारे में सभी जानना चाहते थे.    
यह साबरमती ढाबे की घटना थी. ‘ढाबा संस्कृति’ जेएनयू की जान है. जेएनयू से अगर ढाबों को हटा दिया जाए तो जेएनयू उतना ही बचेगा जितना गीत हटा देने के बाद बिहार की शादियां. बहसों-मुबाहिसों के केंद्र ये ढाबे शाम होते ही जीवंत हो उठते हैं, जो देर रात तक गतिशील रहते हैं. बैठकें, पोस्टर-प्रदर्शनी, विरोध प्रदर्शन, नुक्कड़-नाटक, गीत-संगीत आदि कई सारे कार्यक्रम इन्हीं ढाबों पर होते हैं. खुले आसमान के नीचे अच्छी संख्या में चाय-पकौड़ियां टूंगते विद्यार्थी इन कार्यक्रमों में हमेशा मौजूद होते हैं.     
9 फरवरी को साबरमती ढाबे पर कश्मीर को लेकर एक कार्यक्रम था, ‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफिस’. यह शीर्षक आगा शाहिद अली के 1997 में आये कविता संग्रह से लिया गया था. 1990 में कश्मीर में करीब सात महीनों तक कोई चिट्ठी नहीं बांटी गयी थी. यह ठीक आज के उन हालातों की तरह था, जब मोबाईल और इंटरनेट की सुविधा घाटी में कभी भी बंद कर दी जाती है, व्हाट्सअप ग्रुप रजिस्टर करवाने के लिए थाने को बताना पड़ता है, मोबाईल से सामूहिक संदेशों का भेजा जाना रोक दिया जाता है और कश्मीर पूरी दुनिया से कटकर एक टापू में तब्दील हो जाता है. उस रोज़ उस कार्यक्रम में कश्मीर में मौजूदा नारकीय जीवन से मुक्ति के लिए गीत गाए जा रहे थे. घाटी के गायब हुए उन युवाओं को याद किया जा रहा था, जो अपने पीछे एक अंतहीन और बेहद दर्दीला इंतज़ार छोड़ अनुपस्थित हो गए हैं. उन आधी विधवाओं को याद किया जा रहा था, जिन्हें यह तक नहीं मालूम कि उनके पति ज़िंदा भी हैं या नहीं. सेना द्वारा कश्मीरियों पर किये जा रहे अत्याचारों, बलात्कार और छद्म मुठभेड़ों पर बात हो रही थी, जो इस कदर आम है कि यह बच्चों के खेल में शामिल हो गया है. साथ ही, अफ़जल की फांसी पर बात हो रही थी, जिसे इस देश के ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए मार दिया गया. आफ्सपा पर बात हो रही थी, जिसके अमानवीय कानूनों ने कश्मीरियों का जीवन सीमित कर दिया है. इस कार्यक्रम में कई लोग आफ़्सपा, सेना की ज्यादतियों, बलात्कार के मामले, अफ़जल आदि के मसलों पर सहमति की वजह से इसमें शामिल हुए थे जो जेएनयू की जनवादी राजनीतिक परम्परा के अनुरूप था. इस मामले में जेनयू की एक 'वाल्तेयराना' परम्परा रही है कि तमाम असहमतियों के बावज़ूद किसी के अपनी बात रखने के अधिकार की रक्षा के लिए लोग खड़े होते हैं. खासकर, किसी भी कार्यक्रम में एबीवीपी की गुंडई से होने वाले व्यवधानों से बचाने की एक ज़िम्मेदारी के तहत भी दूसरे छात्र संगठन घेरा बनाकर उसमें शामिल होते हैं. इस कार्यक्रम में भी वाम संगठनों की भागीदारी की मुख्य वज़ह जेएनयू की यही 'वाल्तेयराना' परम्परा थी. पिछले साल 'मुज़फ्फरनगर बाकी है' डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन भी इसी वजह से हो पाया था. अन्यथा एबीवीपी की संघी मानसिकता जेएनयू में इस किस्म का एक कार्यक्रम न होने दे.
इधर गीत गाये जा रहे थे, गिटार बजाया जा रहा था, उधर एबीवीपी के सदस्य इस कार्यक्रम के ख़िलाफ़ ढाबे के बगल की सड़क पर बैठकर प्रदर्शन कर रहे थे. वे बेहद आक्रामक अंदाज़ में 'खून बहेगा सड़कों पर, जो अफ़जल की बात करेगा, वो अफ़जल की मौत मरेगा, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’ जैसे नारे लगा रहे थे. पर इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि जेएनयू पर हमले के लिए तैयार बैठे लोगों को मौक़ा मिल गया.
अब तक ढाबे पर झुटपुटा सा अंधेरा उतर गया था. अचानक कार्यक्रम में चार-पांच लोगों का एक समूह नमूदार होता है. उनके चेहरे रूमाल से ढंके होते हैं. वो एक छोटा सा घेरा बनाते हैं और नारे लगाने लगते हैं. कश्मीर की आज़ादी के लिए नारे लगाता वह समूह अचानक भारत की बर्बादी के नारे लगाने लगता है. बस यहीं से सब कुछ बदल जाता है. वहां मौजूद लोग असहज हो उठते हैं. उन्हें रोका जाता है. सब एक दूसरे से उनकी बाबत पूछ रहे होते हैं. उनके किसी अन्य विभाग/सेंटर से होने का अनुमान लगा रहे होते हैं पर उनके बारे में ठीक-ठीक कोई नहीं जानता. बाद में स्पष्ट होता है, वो यहाँ किसी सेंटर के नहीं थे. तब सवाल आता है, वो कौन थे और कहां से आये थे और कहाँ गायब हो गए?
इस बीच कार्यक्रम एक जुलूस में तब्दील हो जाता है, जिसे गंगा ढाबा पर समाप्त होना होता है. देखादेखी एबीवीपी के लोग भी ‘मार देंगे, काट देंगे, गोलियों से आरती करेंगे’ जैसी धमकियों वाले नारे लगाते हुए सामानांतर जुलूस निकालते हैं. जुलूस के दौरान बार-बार टकराव की स्थिति आती है. जुलूस के समापन के साथ ही उस वक्त तो यह मामला ख़त्म हो जाता है. यही जेएनयू की संस्कृति भी है. यहाँ हर कोई अपनी बात रखने को स्वतन्त्र है. लोग धैर्य से सुनते हैं, अगर सहमत हुए तो तालियाँ बजाकर उत्साहवर्धन करते हैं, अन्यथा मुस्कुराकर चल देते हैं. और मामला खत्म हो जाता है. पर इस बार यह महज़ जेएनयू के भीतर की बात नहीं थी. दिलचस्पी लेने वाले लोग बाहर के थे. इस पूरे प्रकरण में जी न्यूज का एक रिपोर्टर वहां शुरू से ही मौजूद होता है, जो एबीवीपी के आमंत्रण पर आता है. दिलचस्प सवाल यह कि इन्हें कैसे पता होता है कि जेएनयू में कुछ बिल्कुल अलग घटने जा रहा है? दिल्ली के एक भाजपा नेता जेएनयू में हुए कार्यक्रम को लेकर तुरंत एक मुकदमा लिखवा देते हैं. और कार्रवाई के मामले में ‘सेलेक्टिव कैरेक्टर’ वाली पुलिस फ़ौरन से पेश्तर जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लेती है.

09 दिसंबर 2016

नोटबंदी: संदिग्ध फायदे, निश्चित नुकसान

आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि किस तरह नोटबंदी के फैसले ने लोगों के लिए अभूतपूर्व परेशानियां खड़ी की हैं और यह भाजपा के लिए वाटरलू साबित होनेवाली है. अनुवाद: रेयाज़ उल हक

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपए के करेंसी नोटों को बंद करने के फैसले से होने वाली तबाही और मौतों की खबरें पूरे देश भर से आ रही हैं. एक ऐसे देश में जहां कुल लेनदेन का 97 फीसदी नकदी के ज़रिए किया जाता है, कुल करेंसी में से 86.4 फीसदी मूल्य के नोटों को अचानक बंद करने से अफरा-तफरी पैदा होना लाजिमी था. अभी तक 70 मौतों की खबरें आ चुकी हैं. पूरी की पूरी असंगठित अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है, जो भारत की कुल कार्यशक्ति के 94 फीसदी और सकल घरेलू उत्पाद का 46 फीसदी का हिस्सेदार है. पहले से बदहाली झेल रही ग्रामीण जनता इस बात से डरी हुई है कि उसके बचाए हुए पैसे रद्दी कागज में तब्दील हो रहे हैं. उनमें से कइयों ने तो कभी बैंक का मुंह भी नहीं देखा है. बैंकों के बाहर अपनी खून-पसीने की कमाई को पकड़े हुए लोगों की लंबी कतारें पूरे देश भर में देखी जा सकती हैं. मध्य वर्ग और मोदी भक्तों की शुरुआती खुशी हकीकत की कठोर जमीन पर चकनाचूर हो गई. लेकिन अब तक की सबसे कठोर टिप्पणी मनमोहन सिंह की ओर से आई है, जिनके पास रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर, पूर्व वित्त मंत्री और दो बार पूर्व प्रधानमंत्री रहने के नाते मोदी के इस तुगलकी फरमान का जायजा लेने के लिहाज से एक ऐसी साख है जो और किसी के पास नहीं है. उन्होंने नोटबंदी के इस कदम को “भारी कुप्रबंधन” कहा और इसे “व्यवस्थित लूट और कानूनी डाके” का मामला बताते हुए राज्य सभा उन्होंने कहा कि यह देश के जीडीपी को दो फीसदी नीचे ले जाएगा. ऐसा कहने वाले वे अकेले नहीं हैं. अर्थशास्त्रियों, जानकारों और चिंतकों की एक बड़ी संख्या ने भारत की वृद्धि में गिरावट की आशंका जताई है. उनमें से कुछ ने 31 मार्च 2017 को खत्म हो रही छमाही के लिए इसमें 0.5 फीसदी गिरावट आने का अनुमान लगाया है. लेकिन आत्ममुग्ध मोदी पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ेगा, उल्टे वह उन सभी लोगों को राष्ट्र-विरोधी बता देंगे जो इस तबाही लाने वाले कदम पर सवाल उठा रहे हैं. यह सब देख कर सैमुअल जॉनसन की वह मशहूर बात याद आती है कि देशभक्ति लुच्चे-लफंगों की आखिरी पनाहगाह होती है.

इस अजीबोगरीब दुस्साहस के असली मकसद के बारे में किसी को कोई संदेह नहीं है. यह उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और मणिपुर में आनेवाले चुनावों के लिए उनकी छवि को मजबूत करने के लिए चली गई एक तिकड़म थी. चुनाव के पहले किए गए सभी वादे अधूरे हैं, तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक समेत उनके सभी कदम बुरी तरह नाकाम रहे हैं, जनता खाली जुमलेबाजियों और बड़बोलेपन से ऊब गई है. ऐसे में अब कुछ नाटकीय हरकत जरूरी थी. विपक्षी दल चुनावों के दौरान जनता को मोदी के इस चुनावी वादे की याद जरूर दिलाते कि उन्होंने 100 दिनों के भीतर स्विस बैंकों में जमा सारा गैरकानूनी धन लाकर हरेक के खाते में 15 लाख रुपए डालने की बात की थी. यह कार्रवाई यकीनन इस दलील की हवा निकालने के लिए और यह दिखाने के लिए ही की गई कि सरकार अर्थव्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए साहसिक कदम उठाने की ठान चुकी है. अफसोस कि इसने पलट कर उन्हीं को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. इसने लोगों के लिए जैसी अभूतपूर्व परेशानियां खड़ी की हैं, उससे यह बात पक्की है कि इससे भाजपा को आने वाले चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. भले ही वह विपक्षी दलों की जमा नकदी को रद्दी बना देने और इस तरह उन्हें कमजोर करने में कामयाब रही है.

जाली अर्थव्यवस्था

मोदी ने गैरकानूनी धन और भ्रष्टाचार पर चोट करने, नकली नोटों के नाकाम करने और आतंक पर नकेल कसने का दावा किया है. अब तक अनेक अर्थशास्त्रियों ने इन दावों की बेईमानी को बखूबी उजागर किया है. जैसा कि छापेमारी के आंकड़े दिखाते हैं, आय से अधिक संपत्तियों में नकदी का हिस्सा महज 5 फीसदी है. इनमें जेवर भी शामिल हैं जिनका हिसाब नकदी के रूप में लगाया जाता है. अगर नोटबंदी का कोई असर पड़ा भी तो इससे गैरकानूनी धन का बहुत छोटा सा हिस्से प्रभावित होगा. यह थोड़ी सी नकदी अमीरों के हाथ में होती है, जो इसका इस्तेमाल गैर कानूनी धन को पैदा करने और चलाने वाली विशालकाय मशीन के कल-पुर्जों में चिकनाई के रूप में करते हैं. गैरकानूनी धन असल से कम या ज्यादा बिलों वाली विदेशी गतिविधियों (बिजनेसमेन), किराए, निवेश और बॉन्ड आदि गतिविधियों (राजनेता, पुलिस, नौकरशाह) और आमदनी छुपाने के अनेक तरीकों (रियल एस्टेट कारोबारी, निजी अस्पताल, शिक्षा के सेठ) के जरिए बनाया जाता है. इस धन को कानूनी बनाने के अनेक उपाय हैं, जिनका इस्तेमाल करते हुए छुटभैयों (कागजों पर चलने वाली अनेक खैराती संस्थाएं यही काम करती हैं) से लेकर बड़ी मछलियां तक करों की छूट वाले देशों के जरिए भारत में सीधे विदेशी निवेश के रूप में वापस ले आती हैं. गैर कानूनी धन पैदा करने और चलाने के इन उपायों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ेगा.

नोटबंदी से नकली नोटों की समस्या पर काबू पाया जा सकता है, अगर यह उतनी बड़ी समस्या हो. लेकिन कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) की रिपोर्ट के मुताबिक जितनी करेंसी चलन में है, उसका महज 0.002 फीसदी मूल्य के नोट यानी 400 करोड़ रुपए ही नकली नोटों में हैं, जो इतने ज्यादा नहीं है कि उनसे अर्थव्यवस्था की सेहत पर कोई असर पड़े. आईएसआई रिपोर्ट में कभी भी नकली नोटों से निजात पाने के लिए नोटबंदी का सुझाव नहीं दिया. अगर सरकार को नकली नोटों की चिंता थी, तो नोटबंदी के बाद आने वाले नए नोटों में सुरक्षा के बेहतर उपाय होते. लेकिन ऐसा भी नहीं किया गया. रिजर्व बैंक ने खुद कबूल किया है कि 2000 के नए नोटों को बिना किसी अतिरिक्त सुरक्षा विशेषता के ही जारी किया जा रहा है. आतंकवादियों के पैसों की दलील पूरी तरह खोखली है. अगर आतंकवादियों के पास नकदी हासिल करने का कोई ज़रिया है, तो वे नए नोटों से निबटने के रास्ते भी उनके पास होंगे. इस तरह नोटबंदी के पीछे मोदी के आर्थिक दावे पूरी तरह धोखेबाजी हैं. इसके अलावा नए नोटों को छापने पर अंदाजन 15,000-18,000 करोड़ रुपए का खर्च अलग से हुआ और फिर हंगामे से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान भी हुआ और यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब हालात स्थिर नहीं होते.

‘स्वच्छ भारत’ 

शगूफे छोड़ते हुए मोदी ने नोटबंदी के फैसले को अपने स्वच्छ भारत अभियान से जोड़ दिया, जबकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि इस अभियान का भी कोई खास नतीजा नहीं निकल पाया है. अगर उन्होंने इस अभियान पर खर्च होने वाली कुल रकम का आधा भी भारत को रहने के लायक बनाने वाले दलितों को दे दिया होता तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता था. लेकिन जहां दलितों द्वारा मैला ढोने की प्रथा के खात्मे की मांग के लिए संघर्ष जारी है, मोदी अपने स्वच्छ भारत का ढोल पीट रहे हैं. वे भारत को भ्रष्टाचार और गंदे धन से मुक्त कराने का दावा करते हैं. उनके सत्ता में आने के लिए वोट मिलने की वजहों में से एक संप्रग दो सरकार के दौरान घोटालों की लहर भी थी, जिसका कारगर तरीके से इस्तेमाल करते हुए उन्होंने देश को पारदर्शी बनाने और ‘बहुत कम सरकारी दखल के साथ अधिकतम प्रशासन’ का वादा किया था. वे अपना आधा कार्यकाल बिता चुके हैं और उनके शासन में ऊंचे किस्म के भ्रष्टाचार की फसल भरपूर लहलहाती हुई दिख रही है. भ्रष्टाचार के मुहाने यानी राजनीतिक दल अभी भी अपारदर्शी हैं और सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर हैं. ‘पनामा लिस्ट’ में दिए गए 648 गद्दारों के नाम अभी भी जारी नहीं किए गए हैं. उनकी सरकार ने बैंकों द्वारा दिए गए 1.14 लाख करोड़ रुपए के कॉरपोरेट कर्जों को नन परफॉर्मिंग असेट्स (एनपीए) कह कर माफ कर दिया है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 11 लाख करोड़ है, लेकिन कॉरपोरेट लुटेरों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की जा रही है. कॉरपोरेट अरबपतियों का सीधा कर बकाया 5 लाख करोड़ से ऊपर चला गया है, लेकिन मोदी ने कभी भी इसके खिलाफ ज़ुबान तक नहीं खोली. पिछले दशक के दौरान उनको करों से छूट 40 लाख करोड़ से ऊपर चली गई, जिसकी सालाना दर मोदी के कार्यकाल के दौरान 6 लाख करोड़ को पार कर चुकी है, जो संप्रग सरकार के दौरान 5 लाख करोड़ थी. मोदी अपने आप में कॉरपोरेट भ्रष्टाचार के भारी समर्थक रहे हैं, जो गैरकानूनी धन का असली जन्मदाता है.

यहां तक कि यह भी संदेह किया जा रहा है कि नोटबंदी में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ है. इस फैसले को लेकर जो नाटकीय गोपनीयता बरती गई, वह असल में लोगों को दिखाने के लिए थी. इस फैसले के बारे में भाजपा के अंदरूनी दायरे को पहले से ही पता था, जिसमें राजनेता, नौकरशाह और बिजनेसमेन शामिल हैं. इसको 30 सितंबर को खत्म होने वाली तिमाही के दौरान बैंकों में पैसे जमा करने में आने वाली उछाल में साफ-साफ देखा जा सकता है. खबरों के मुताबिक भाजपा की पश्चिम बंगाल ईकाई ने घोषणा से कुछ घंटों पहले अपने बैंक खाते में कुल 3 करोड़ रुपए जमा किए. एक भाजपा नेता ने नोटबंदी के काफी पहले ही 2000 रु. के नोटों की गड्डियों की तस्वीरें पोस्ट कर दी थी और एक डिजिटल पेमेंट कंपनी ने 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे होने वाली घोषणा की अगली सुबह एक अखबार में नोटबंदी की तारीफ करते हुए पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशिक कराया. असल में, नोटबंदी ने बंद किए गए नोटों को कमीशन पर बदलने का एक नया धंधा ही शुरू कर दिया है. इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि ट्रांस्पेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा भारत की रैंकिंग में मोदी के राज में कोई बदलाव नहीं आया है जो 168 देशों में 76वें स्थान पर बना हुआ है.

आत्ममुग्ध बेवकूफी

सिर्फ एक पक्का आत्ममुग्ध ही ऐसी बेवकूफी कर सकता है. इससे भारत के संस्थागत चरित्र का भी पता लगता है, जो सत्ता के आगे झुकने को तैयार रहता है. मोदी को छोड़ दीजिए, यह वित मंत्रालय के दिग्गजों और खास कर आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की हैसियत को भी उजागर करता है, जो न सिर्फ अपने पद की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में नाकाम रहे हैं, बल्कि जिन्होंने यह बदनामी भी हासिल की है कि वे पेशेवर रूप से अक्षमता हैं. ऐसा मुमकिन नहीं होगा कि आरबीआई के मुद्रा विशेषज्ञ इस फैसले के दोषपूर्ण हिसाब-किताब को नहीं देख पाए होंगे, लेकिन जाहिर है कि वे साहेब की मर्जी के आगे झुक गए. नोटबंदी भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है, लेकिन इतिहास में कई शासक इसे आजमा चुके हैं. हालांकि उन्होंने जनता के पैसे के साथ इसे कभी नहीं आजमाया. आखिरी बार मोरारजी देसाई ने 1978 में 1000 रुपए के नोट को बंद किया था, जो आम जनता के बीच आम तौर पर चलन में नहीं था. अपनी क्रयशक्ति में यह आज के 15,000 रुपयों के बराबर था. यह तब प्रचलित धन का महज 0.6 फीसदी था, जबकि आज की नोटबंदी ने कुल प्रचलित धन के 86.4 फीसदी को प्रभावित किया है.

अपनी विदेश यात्राओं के दौरान मोदी हमेशा ही अपनी जन धन योजना की उपलब्धियों की शेखी बघारते रहे हैं, जो संप्रग सरकार की वित्तीय समावेश नीतियों का ही महज एक विस्तार है. उन्होंने सिर्फ गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स के लिए बैंकों को खाते खोलने पर मजबूर किया. जुलाई 2015 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 33 फीसदी ग्राहकों ने बताया कि जन धन योजना का खाता उनका पहला खाता नहीं था और विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 72 फीसदी खातों में एक भी पैसा नहीं था. विश्व बैंक-गैलप ग्लोबल फिनडेक्स सर्वे द्वारा किए गए एक और सर्वेक्षण में दिखाया गया कि कुल बैंक खातों का करीब 43 फीसदी निष्क्रिय खाते हैं. यहां तक कि रिजर्व बैंक भी कहता है कि सिर्फ 53 फीसदी भारतीयों के पास बैंक खाते हैं और उनका सचमुच उपयोग करने वालों की संख्या इससे भी कम है. ज्यादातर बैंक शाखाएं पहली और दूसरी श्रेणी के शहरों में स्थित हैं और व्यापक ग्रामीण इलाके में सेवाएं बहुत कम हैं. ऐसे हालात में सिर्फ एक आत्ममुग्ध इंसान ही होगा जो भारत में बिना नकदी वाली एक कैशलेस अर्थव्यवस्था के सपने पर फिदा होगा. यह सोचना भारी बेवकूफी होगी कि ऐसे फैसलों से भाजपा लोगों का प्यार पा सकेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि दलितों और आदिवासियों जैसे निचले तबकों के लोगों को इससे सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है और वे भाजपा को इसके लिए कभी माफ नहीं करेंगे. भाजपा ने अपने हनुमानों (अपने दलित नेताओं) के जरिए यह बात फैलाने की कोशिश की है कि नोटबंदी का फैसला असल में बाबासाहेब आंबेडकर की सलाह के मुताबिक लिया गया था. यह एक सफेद झूठ है. लेकिन अगर आंबेडकर ने किसी संदर्भ में ऐसी बात कही भी थी, तो क्या इससे जनता की वास्तविक मुश्किलें खत्म हो सकती हैं या क्या इससे हकीकत बदल जाएगी? बल्कि बेहतर होता कि भाजपा ने आंबेडकर की इस अहम सलाह पर गौर किया होता कि राजनीति में अपने कद से बड़े बना दिए गए नेता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं.

18 मई 2015

सलवा-जुड़ुम -2 सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना

फोटो: साभार बीबीसी
यूपीए ने जिस सलवा-जुडुम की शुरुआत छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के साथ मिलकर की थी. अब उसे क्रमांक में लिखने की जरूरत आन पड़ी है. उसे सलवा जुड़ुम-1 कहा जाएगा. क्योंकि बीजेपी शासन की मदद से सलवा-जुड़ुम -2 की शुरुआत करने की घोषणा स्थानीय नेताओं द्वारा कर दी गई है. इन घोषणाओं से यह भ्रम पैदा होता है कि सलवा-जुड़ुम -१ ख़त्म हो गया था. शायद उसे महेन्द्र कर्मा की मौत के बाद ख़्त्म हुआ मान लिया गया हो या यह 5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर द्वारा जो आदेश दिया गया था उसके बाद खत्म मान लिया गया रहा हो. आदेश में इसे पूरी तरह से बंद करने को कहा गया था और सरकार को जनसंहारो में संलिप्त बताया गया था. सलवा-जुडुम पर यह फैसला इसके शुरू होने के लगभग 6 साल बाद आया था. इन 6 सालों में हत्या, बलात्कार और आगजनी की जाने कितनी घटनाएं घटी. छः लाख लोग अस्त-व्यस्त हो गए और कई अपने गांव फिर कभी लौटकर नहीं आए. राज्य के इस अभियान के खिलाफ उनमें से कई आदिवासी माओवादियों के साथ भी जुड़े, वे लड़कियां भी जिनके भाई सलवा-जुड़ुम में शामिल थे. और उन्होंने एक मजबूत विरोध जताया. क्या फिर से सलवा-जुडुम-2 का शुरू होना इन घटनाओं का दुहराव होगा. क्या इतिहास खुद को दुहराता है. क्या यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं है. निश्चय ही यह सब सवाल जब तक हल किए जाएंगे. जब तक इन पर नागरिक समाज से आवाज़ें उठनी शुरू होंगी कई कत्लेआम कर दिए जाएंगे. जबकि यह सच है कि सलवा-जुडुम के बंद करने के आदेश के बाद यह कभी बंद नहीं हुआ था. सरकार और विपक्ष के राजनेता इस पर पूरी तरह से खामोश हैं. क्योंकि आदिवासियों के साथ होने वाले सुलूक में संसद का पक्ष-विपक्ष एक साथ खड़ा है. भाकपा माओवादी ने इस पर अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी की है जिसे यहां देखा जा सकता है.  विज्ञप्ति: हिन्दी अंग्रेजी       

30 सितंबर 2013

मोदी के दिल्‍ली रैली की हकीकत.

विकास रैली की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट

अभिषेक श्रीवास्तव

हाल ही में एक बुजुंर्ग पत्रकार मित्र ने मशहूर शायर मीर की लखनऊ यात्रा पर एक किस्सा सुनाया था। हुआ यों कि मीर चारबाग स्टेनशन पर उतरे, तो उन्हें पान की तलब लगी हुई थी। वे एक ठीहे पर गए और बोले, ”ज़रा एक पान लगाइएगा।” पनवाड़ी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा, फिर बोला, ”हमारे यहां तो जूते लगाए जाते हैं हुज़ूर।” दरअसल, यह बोलचाल की भाषा का फ़र्क था। लखनऊ में पान बनाया जाता है। लगाने और बनाने के इस फ़र्क को समझे बगैर दिल्ली से आया मीर जैसा अदीब भी गच्चा खा जाता है। ग़ालिब, जो इस फ़र्क को बखूबी समझते थे, बावजूद खुद दिल्ली में ही अपनी आबरू का सबब पूछते रहे। दिल्ली और दिल्ली के बाहर के पानी का यही फ़र्क है, जिसे समझे बग़ैर ग़यासुद्दीन तुग़लक से दिल्ली हमेशा के लिए दूर हो गई। गर्ज़ ये, कि इतिहास के चलन को जाने-समझे बग़ैर दिल्ली में कदम रखना या दिल्ली से बाहर जाना, दोनों ही ख़तरनाक हो सकता है। क्या नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात कोई जाकर समझा सकता है? चौंकिए मत, समझाता हूं…।

अगर आपने राजनीतिक जनसभाएं देखी हैं, तो ज़रा आज की संज्ञाओं का भारीपन तौलिए और मीडिया के जिमि जि़प कैमरों के दिखाए टीवी दृश्यों से मुक्ता होकर ज़रा ठहर कर सोचिए: जगह दिल्ली, मौका राजधानी में विपक्षी पार्टी भाजपा की पहली चुनावी जनसभा और वक्ता इस देश के अगले प्रधानमंत्री का इकलौता घोषित प्रत्याशी नरेंद्र मोदी। सब कुछ बड़ा-बड़ा। कटआउट तक सौ फुट ऊंचा। दावा भी पांच लाख लोगों के आने का था। छोटे-छोटे शहरों में रैली होती है तो रात से ही कार्यकर्ता जमे रहते हैं और घोषित समय पर तो पहुंचने की सोचना ही मूर्खता होती है। मुख्य सड़कें जाम हो जाती हैं, प्रवेश द्वार पर धक्का-मुक्की तो आम बात होती है। दिल्ली में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। न कोई सड़क जाम, न ही कोई झड़प, न अव्यवस्था।। क्या इसका श्रेय जापानी पार्क में मौजूद करीब तीन हज़ार दिल्ली पुलिसबल, हज़ार एसआइएस निजी सिक्योरिटी और हज़ार के आसपास आरएएफ के बलों को दिया जाय, जिन्होंने कथित तौर पर पांच लाख सुनने आने वालों को अनुशासित रखा? दो शून्य‍ का फ़र्क बहुत होता है। अगर हम भाजपा कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों, मीडिया को अलग रख दें तो भी सौ श्रोताओं पर एक सुरक्षाबल का हिसाब पड़ता है। ज़ाहिर है, पांच लाख की दाल में कुछ काला ज़रूर है।

आयोजन स्थल पर जो कोई भी सवेरे से मौजूद रहा होगा, वह इस काले को नंगी आंखों से देख सकता था। मोदी की जनसभा का घोषित समय 10 बजे सवेरे था, जबकि वक्ता की लोकप्रियता और रैली में अपेक्षित भीड़ को देखते हुए मैं सवेरे सवा सात बजे जापानी पार्क पहुंच चुका था। उस वक्त ईएसआई अस्पताल के बगल वाले रोहिणी थाने के बाहर पुलिसवालों की हाजि़री लग रही थी। सभी प्रवेश द्वार बंद थे। न नेता थे, न कार्यकर्ता और न ही कोई जनता। रोहिणी पश्चिम मेट्रो स्टेशन वाली सड़क से पहले तक अंदाज़ा ही नहीं लगता था कि कुछ होने वाला है। अचानक मेट्रो स्टेशन वाली सड़क पर बैनर-पोस्टर एक लाइन से लगे दिखे, जिससे रात भर की तैयारी का अंदाज़ा हुआ। बहरहाल, आठ बजे के आसपास निजी सुरक्षा एजेंसी एसआइएस के करीब हज़ार जवान पहुंचे और उनकी हाजि़री हुई। नौ बजे तक ट्रैक सूट पहने कुछ कार्यकर्ता आने शुरू हुए। गेट नंबर 11, जहां से मीडिया को प्रवेश करना था, वहां नौ बजे तक काफी पत्रकार पहुंच चुके थे। गेट नंबर 1 से 4 तक अभी बंद ही थे। सबसे ज्यादा चहल-पहल मीडिया वाले प्रवेश द्वार पर ही थी। दिलचस्प यह था कि तीन स्तरों के सुरक्षा घेरे का प्रत्यक्ष दायित्व तो दिल्ली पुलिस के पास था, लेकिन कोई मामला फंसने पर उसे भाजपा के कार्यकर्ता को भेज दिया जा रहा था। तीसरे स्तर के सुरक्षा द्वार पर भी भाजपा की कार्यकर्ता और एक स्था्नीय नेतानुमा शख्स। दिल्ली पुलिस को निर्देशित कर रहे थे।

यह अजीब था, लेकिन दिलचस्प। साढ़े नौ बजे पंडाल में बज रहे फिल्मी गीत ”आरंभ है प्रचंड” (गुलाल) और ”अब तो हमरी बारी रे” (चक्रव्यूबह) अनुराग कश्यप व प्रकाश झा ब्रांड बॉलीवुड को उसका अक्स दिखा रहे थे। इसके बाद ”महंगाई डायन” (पीपली लाइव) की बारी आई और भाजपा के सांस्कृतिक पिंजड़े में आमिर खान की आत्मा तड़पने लगी। जनता हालांकि यह सब सुनने के लिए नदारद थी। सिर्फ मीडिया के जिमी जि़प कैमरे हवा में टंगे घूम रहे थे। अचानक मिठाई और नाश्ते के डिब्बे बंटने शुरू हुए। कुछ कार्यकर्ता मीडिया वालों का नाम-पता जाने किस काम से नोट कर रहे थे। फिर पौने दस बजे के करीब अचानक एक परिचित चेहरा दर्शक दीर्घा में दिखाई दिया। यह अधिवक्ता प्रशांत भूषण को चैंबर में घुसकर पीटने वाली भगत सिंह क्रांति सेना का सरदार नेता था। उसकी पूरी टीम ने कुछ ही देर में अपना प्रचार कार्य शुरू कर दिया। ”नमो नम:” लिखी हुई लाल रंग की टोपियां और टीशर्ट बांटे जाने लगे। कुछ ताऊनुमा बूढ़े लोगों को केसरिया पगड़ी बांधी जा रही थी। कुछ लड़के भाजपा का मफलर बांट रहे थे। जनसभा के घोषित समय दस बजे के आसपास पंडाल में भाजपा कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों और मीडिया की चहल-पहल बढ़ गई। सारी कुर्सियां और दरी अब भी जनता की बाट जोह रही थीं और टीवी वाले जाने कौन सी जानकारी देने के लिए पीटीसी मारे जा रहे थे।

सवा दस बजे एक पत्रकार मित्र के माध्यम से सूचना आई कि नरेंद्र मोदी 15 मिनट पहले फ्लाइट से दिल्ली के लिए चले हैं। यह पारंपरिक आईएसटी (इंडियन स्ट्रे चेबल टाइम) के अनुकूल था, लेकिन आम लोगों का अब तक रैली में नहीं पहुंचना कुछ सवाल खड़े कर रहा था। साढ़े दस बजे के आसपास माइक से एक महिला की आवाज़़ निकली। उसने सबका स्वागत किया और एक कवि को मंच पर बुलाया। ”भारत माता की जय” के साथ कवि की बेढंगी कविता शुरू हुई। फिर एक और कवि आया जिसने छंदबद्ध गाना शुरू किया। कराची और लाहौर को भारत में मिला लेने के आह्वान वाली पंक्तियों पर अपने पीछे लाइनें दुहराने की उसकी अपील नाकाम रही क्यों कि कार्यकर्ता अपने प्रचार कार्य में लगे थे और दुहराने वाली जनता अब भी नदारद थी।

पौने ग्यारह बजे की स्थिति यह थी कि आयोजन स्थल पर बमुश्किल दस से बारह हज़ार लोग मौजूद रहे होंगे। एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने (नाम लेने की ज़रूरत नहीं) बताया कि कुल सात हज़ार के आसपास सुरक्षाबल (सरकारी और निजी), 500 के आसपास मीडिया, तीन हज़ार के आसपास कार्यकर्ता और स्वयंसेवक व छिटपुट और लोग होंगे। ”लोग नहीं आए अब तक?”, मैंने पूछा। वो मुस्कराकर बोला, ”सरजी संडे है। हफ्ते भर नौकरी करने के बाद किसे पड़ी है। टीवी में देख रहे होंगे।” फिर उसने अपने दो सिपाहियों को चिल्लाकर कहा, ”खा ले बिजेंदर, मैं तुम दोनों को भूखे नहीं मरने दूंगा।” ग्यारह बज चुके थे और पंडाल के भीतर तकरीबन सारे मीडिया वाले और पुलिसकर्मी भाजपा के दिए नाश्ते। के डिब्बों को साफ करने में जुटे थे। मंच से कवि की आवाज़ आ रही थी, ”मोदी मोदी मोदी मोदी”। उसने 14 बार मोदी कहा। मंच के नीचे पेडेस्ट़ल पंखों और विशाल साउंड सिस्टम के दिल दहलाने वाले मिश्रित शोर का शर्मनाक सन्नाटा पसरा था और हरी दरी के नीचे की दलदली ज़मीन कुछ और धसक चुकी थी।

कुछ देर बाद हम निराश होकर निकल लिए। मोदी सवा बारह के आसपास आए और दिल्ली में हो रही जोरदार बारिश के बीच एक बजे की लाइव घोषणा यह थी कि रैली में पांच लाख लोग जुट चुके हैं। मोदी ने कहा कि ऐसी रिकॉर्ड रैली आज तक दिल्ली में नहीं हुई। इस वक्त मोबाइल पर उनका लाइव भाषण देखते हुए हम बिना फंसे रिंग रोड पार कर चुके थे। पंजाबी बाग से रोहिणी के बीच रास्ते में गाजि़याबाद से रैली में आती बैनर, पोस्टर और झंडा बांधे कुल 13 बसें दिखीं। अधिकतर एक ही टूर और ट्रैवल्स की सफेद बसें थीं। निजी वाहनों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हरेक बस में औसतन 20-25 लोग थे। लाल बत्तियों पर लगी कतार को छोड़ दें तो पूरी रिंग रोड (जो हरियाणा को दिल्ली से जोड़ती है), रोहिणी से धौला कुआं वाली रोड (गुड़गांव वाली), कुतुब से बदरपुर की ओर जाती सड़क(जो फरीदाबाद को दिल्ली से जोड़ती है) और बाद में उत्तर प्रदेश से दिल्ली को जोड़ने वाली आउटर रिंग रोड खाली पड़ी हुई थी। और यह दिल्ली( की बारिश में था जबकि जाम एक सामान्य दृश्य होता है।

रैली में आखिर लाखों लोग आए कहां से? क्या सिर्फ 26 मेट्रो से? बसों और निजी वाहनों से तो जाम लग जाता, जबकि ग़ाजि़याबाद से रोहिणी और वहां से वापस रिंग रोड, आउटर रिंग रोड व भीतर की पंजाबी बाग वाली रोड को कुल 125 किलोमीटर हमने पूरा नापा। ग़ाजि़याबाद का जि़क्र इसलिए विशेष तौर पर किया जाना चाहिए क्योंकि राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं और पिछले दो दिनों से बड़े पैमाने पर यहां रैली की तैयारियां चल रही थीं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मोदी की जनसभा में जितने भी नेताओं के कटआउट आए थे, सब ग़ाजि़याबाद से आए थे जिन्हें एक ही कंपनी ”आज़ाद ऐड” ने बनाया था। सवेरे साढ़े आठ बजे तक ये कटआउट यहां ट्रकों में भरकर पहुंच चुके थे, हालांकि ग़ाजि़याबाद से श्रोता नहीं आए थे। वापस पहुंचने पर इंदिरापुरम, ग़ाजि़याबाद के स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता टीवी पर मोदी का रिपीट भाषण सुनते मिले।

बहरहाल, मोदी जब बोल चुके थे तो भाजपा कार्यालय के एक प्रतिनिधि ने फोन पर बताया कि रैली में आने वालों की कुल संख्या 50,000 के आसपास थी। अगर हम इसे भी एकबारगी सही मान लें, तो याद होगा कि इतने ही लोगों की रैली पिछले साल फरवरी में दिल्ली में कुछ मजदूर संगठनों ने की थी और समूचा मीडिया यातायात व्यवस्था और जनजीवन अस्तव्यस्त हो जाने की त्राहि-त्राहि मचाए हुए था। अजीब बात है कि बिना हेलमेट पहने और लाइसेंस के बतौर भारत का झंडा उठाए दर्जनों बाइकधारी नौजवानों के आज सड़क पर होने के बावजूद कुछ भी अस्तव्यस्त नहीं हुआ, लाखों लोग रोहिणी जैसी सुदूर जगह पर आ भी गए और चुपचाप चले भी गए। यह नरेंद्रभाई मोदी की रैली में ही हो सकता है। उत्तराखंड की बाढ़ में फंसे गुजरातियों को जिस तरह उन्होंने एक झटके में वहां से निकाल लिया था, हो सकता है कि ऐसा ही कोई जादू चलाकर उन्हों ने दिल्लीं की विकास रैली में लाखों लोगों को पैदा कर दिया हो। ऐसे चमत्कांर आंखों से दिखते कहां हैं, बस हो जाते हैं।

ऐसे चमत्कारों का हालांकि खतरा बहुत होता है। उत्तराखंड वाले चमत्कार में ऐपको नाम की जनसंपर्क एजेंसी का भंडाफोड़ हो चुका है। दिल्ली् में किस एजेंसी को भाजपा ने यह रैली आयोजित करने के लिए नियुक्त़ किया, यह नहीं पता। देर-सवेर पता चल ही जाएगा। मेरी चिंता हालांकि यह बिल्कुकल नहीं है। मैं इस बात से चिंतित हूं कि मोदी जैसा कद्दावर शख्स दिल्ली में बोल गया और दिल्ली वाले नहीं आए। वजह क्या है? कहीं तुग़लक जैसी कोई समस्या तो इसके पीछे नहीं छुपी है? मोदी दिल्लीवालों को न समझें न सही, क्या? विजय गोयल आदि आयोजकों से भी कोई चूक हो गई? ठीक है, कि टीवी चैनलों के हवा में लटकते पचास फुटा कैमरों ने टीवी देख रहे लोगों को काम भर का भरमाया होगा, जैसा कि उसने अन्ना हज़ारे की गिरफ्तारी के समय किया था। अन्ना से याद आया- वह भी तो रोहिणी जेल का ही मामला था जहां दो-चार हज़ार लोगों को कैमरों ने एकाध लाख में बदल दिया था। इत्तेफाक कहें या बदकिस्मती, कि रोहिणी में ही इतिहास ने खुद को दुहराया है। मोदी चाहें तो किसी ज्योतिषी से रोहिणी पर शौक़ से शोध करवा सकते हैं। वैसे रोहिणी तो एक बहाना है, असल मामला दिल्ली के मिजाज़ का है जिसे भाजपा (प्रवृत्ति और विचार के स्तर पर इसे अन्ना आंदोलन भी पढ़ सकते हैं) समझ नहीं सकी है।

भाजपा और संघ के पैरोकार वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने आज तक एक ही बात ऐसी लिखी है जो याद रखने योग्य है। उन्हों ने कभी लिखा था कि इस देश का दक्षिणपंथ जनता की चेतना से बहुत पीछे की भाषा बोलता है और इस देश का वामपंथ जनता की चेतना से बहुत आगे की भाषा बोलता है। इसीलिए इस देश में दोनों नाकाम हैं। कहीं मोदी समेत भाजपा की दिक्कत यही तो नहीं? कहीं वे भी तो शायर मीर की तरह ”लगाने” और ”बनाने” का फर्क नहीं समझते? मुझे वास्तव में लगने लगा है कि किसी को जाकर नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात गंभीरता से समझानी चाहिए कि 29 सितंबर, 2013 को दिल्ली के जापानी पार्क में उनकी ”बनी” नहीं, ”लग” गई है। ग़ालिब तो शेर कह के निकल लिए, इस ”भारत मां के शेर” का संकट उनसे कहीं बड़ा है। दिल्ली वालों ने आज संडे को टीवी देखकर मोदी और भाजपा की आबरू का सरे दिल्ली में जनाज़ा ही निकाल दिया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं) Contact: guru.abhishek@gmail.com,  M. 08800114126

02 सितंबर 2013

हेम की गिरफ्तारी के बहाने

अभिनव श्रीवास्तव

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हेम मिश्रा की पांडु नरोटे और महेश टिर्की के साथ कथित तौर पर माओवादियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तारी की खबर अब सोशल साइटों से होती हुयी मुख्य धारा मीडिया में भी जगह बना चुकी है। खबरों के अनुसार गढ़चिरौली पुलिस ने हेम सहित पांडु नरोटे और महेश टिर्की कोनक्सल कुरियरहोने के आरोप में अहेरी बस स्टेशन से गिरफ्तार किया। वहीं हेम की गिरफ्तारी पर पहले-पहल सोशल साइटों पर चल रहा विरोध कमोबेश अब एक अभियान की शक्ल ले चुका है। बीते 24 अगस्त को राजधानी दिल्ली के वाम संगठनों और संस्कृतकर्मियों ने महाराष्ट्र सदन के सामने हेम की गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन किया। देश भर के कई वाम संगठनों ने भी हेम, पांडु और महेश की गिरफ्तारी की कड़े शब्दों में निंदा की है। दिल्ली और देश के अन्य वाम संगठनों में हेम की गिरफ्तारी को लेकर जिस बेचैनी और विरोध का माहौल है, वो सिर्फ इसलिये नहीं है कि हेमजेएनयूका छात्र था। निस्संदेह, हेम की पहचान जेएनयू में चाइनीज स्टडीज के छात्र और वाम छात्र संगठन डीएसयू के सक्रिय संस्कृतकर्मी की तरह थी, लेकिन सिर्फ इस पहचान के आस-पास बुने गये विश्लेषण और रिपोर्टों से हेम की गिरफ्तारी के विरोध में उठ रही आवाजों की वास्तविक वजहों को नहीं समझा जा सकता। सिर्फ इस पहचान के आधार पर हेम की गिरफ्तारी को नाजायज बताने वाली आवाजों को हमें सहानुभूति से नहीं, बल्कि संदेह की नजर देखना होगा। दरअसल हम हेम की गिरफ्तारी को एक प्रतीक मान सकते हैं, अनवरत चलने वाली उन गिरफ्तारियों का प्रतीक जिनको अंजाम देते समय अक्सर पुलिस द्वारा माओवाद, नक्सलवाद और मुस्लिम आतंकवाद के फैलने का डर और भय खड़ा किया जाता है। जिसके दायरे में कभी जीतन मरांडी, सुधीर ढवले, सीमा आजाद और विनायक सेन आते हैं तो कभी राज्य दमन के खिलाफ आवाज उठाने वाले वे निर्दोष और अनाम चेहरे आते हैं जिनकी जिंदगी और कभी-कभी तो मौत तक चर्चा का विषय नहीं बन पाते।  ये सभी मामले अपने आप में। कहा जा सकता है कि हेम की गिरफ्तारी के मामले में भी जो बेचैनी दिखायी पड़ रही है उसका आधार भी ये पुराने अनुभव ही हैं। इन सभी मामलों में पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया, उसके आरोपों और उसके तमाम दावों में जो गहरे सुराख दिखायी पड़े, उससे यह शक और संदेह और गहरा जाता है कि हेम की गिरफ्तारी के मामले में भी यही सब कुछ दोहराया जा रहा हो। बल्कि हेम की गिरफ्तारी की आधिकारिक सूचना जिस अंदाज और जितनी अस्पष्टता के साथ शुरुआत में सार्वजनिक हुयी, उसने बहुत हद तक इस संदेह पर मुहर लगाने का ही काम किया है। गढ़चिरौली पुलिस की ओर से पहली बार 24 अगस्त को आधिकारिक रूप से प्रेस नोट जारी कर बताया गया कि उसने हेम मिश्रा, पांडु नरोटे  और महेश टिर्की को 23 अगस्त को अहेरी बस स्टाप से देर शाम गिरफ्तार किया। इसी नोट में पुलिस ने यह भी दावा किया है कि तीनों के पास से एक माइक्रो चिप और खुफिया दस्तावेज मिले हैं जिन्हें वे माओवादी नेता नर्मदा को सौंपने जा रहे थे। हालांकि इस पूरे नोट में पुलिस की ओर से कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि उसने किन धाराओं के अंतर्गत इन तीनों को गिरफ्तार किया है? अगर पुलिस के पास माओवादियों से मदद के असंदिग्ध और प्रामाणिक सबूत हैं तो उसे ये बताने या जाहिर करने से परहेज क्यों होना चाहिये कि उसने किन धाराओं के अंतर्गत तीनों को अदालत में पेश किया है? ऐसे और भी कई सवाल हैं जो अनुत्तरित हैं और जिनके अनुत्तरित रहने का तात्पर्य है कि गढ़चिरौली पुलिस ने संभवतः आधे-अधूरे साक्ष्यों और जांच-पड़ताल के आधार पर हेम, पांडु और महेश को गिरफ्तार किया। दरअसल माओवादियों की मदद का आरोप इतना सपाट और सतही तरीके से लगाया जाता है कि इसके बाद गिरफ्तारी की जनतांत्रिक प्रक्रिया और उससे जुड़े सवाल पूछने की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है। अपने वर्गीय और कारोबारी हितों के चलते मुख्य धारा मीडिया भी पलटकर पुलिस से ऐसे सवाल पूछने से हिचकता है। नतीजा ये होता है कि ऐसे मामलों में पुलिस किसी भी स्तर पर जवाबदेह नहीं रह जाती और उसके पास जांच-पड़ताल के नाम पर ऐसे असीमित अधिकार जाते हैं जिनका उपयोग वह पूरी वैधता के साथ करती है। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। जनतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी कर पुलिस को असीमित अधिकार देने जैसे स्थिति एक राज्य व्यवस्था के लिये तब आती है जब वह हर हाल में जनता से अपना आज्ञापालक होने की उम्मीद करती है। यह स्थिति तब आती है जब राज्य व्यवस्था के प्रतिनिधियों के पास जनता का भरोसा जीतने के लिये आवश्यक प्राधिकार और युक्तियों की कमी हो जाती है। ऐसी ही सूरत में एक व्यवस्था को ज्यादा से ज्यादा दमनात्मक होना पड़ता है। जल, जंगल, जमीन के आंदोलनों के साथ भारतीय राज्य व्यवस्था के टकराव की परिणीति ऐसी ही दमनात्मक कारर्वाइयों के रूप में हो रही है और इन कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिये माओवाद और नक्सलवाद का भय पैदा करना एकजरुरतसी बन गयी है। हेम, पांडु और महेश की गिरफ्तारियों से पहले भी ऐसी कई गिरफ्तारियां इस जरुरत को पूरा करने के लिये ही की जाती रही हैं। इसलिये तीनों की गिरफ्तारी को इन बड़े सन्दर्भों से अलग कर देखना मुश्किल है। अंत में ये दोहराना फिर जरूरी होगा कि सवाल ये नहीं है कि जेएनयू का छात्र होते हुये भी हेम गिरफ्तार हुआ, सवाल ये है कि गढ़चिरौली पुलिस ने हेम को जिन आरोपों में हिरासत में लिया है, क्या पुलिस के पास उन आरोपों में हेम को गिरफ्तार करने का ठोस और पर्याप्त आधार था या पुलिस किसी खासमकसदके साथ उन सभी लोगों को कोई संदेश देना चाहती है जो विकास की बनी-बनायी, समझदारी पर सवाल उठाने को तत्पर और तैयार दिखायी देते हैं