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28 दिसंबर 2010

लोकतंत्र को उम्रकैद :- प्रणय कृष्ण

25 दिसम्बर, 2010 ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी। मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई - न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है। छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा। बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी। यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए. डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से , जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर , न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़ सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए. पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़ , मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा हैहमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द वाइटहाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.( आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को .क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश , बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है 1870 में लाई गई जिसके तहत सरकार के खिलाफ ”घृणा फैलाना”, ” अवमानना करना” और ” असंतोष पैदा”करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बर्खा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं ? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ ”सलवा जुडूम” चलाती हैं, बहुराश्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाशा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों . याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है?. एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे? इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा.सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि ”कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है ”. तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों ( हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसिदिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था,
“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !
यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--बंब संब की छोड़ो, भाशण दिया कि पकड़े जाओगे !निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “
ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है. - मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो , जितनी दूर तक हो हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

26 मई 2009

जन संघर्षों की जीतः

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ की जेल में बंद नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले डॉ विनायक सेन को सोमवार को ज़मानत दे दी है.
न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू और दीपक वर्मा की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि डॉ सेन को निजी मुचलके पर स्थानीय अदालत से ज़मानत दे दी जाए.
डॉ सेन पिछले दो वर्षों से छत्तीसगढ़ की जेल में बंद हैं. राज्य सरकार का आरोप है कि उन्होंने राज्य में सक्रिय माओवादियों की मदद की है और उनके समर्थक रहे हैं.
पर डॉक्टर बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.
बिनायक सेन की ज़मानत के बारे में जानकारी देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद को बताया, "बिनायक को ज़मानत की ख़बर मानवाधिकारों के लिए लड़ाई कर रहे लोगों के लिए इस मामले में पहली जीत है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिला है जिसे आज ही एक कार्यकर्ता के हाथों रायपुर भेजा जा रहा है. मंगलवार को इस आदेश के आधार पर बिनायक रिहा किए जा सकते हैं."
उनकी बेटी अपराजिता सेन ने बीबीसी को बताया, "मेरे लिए और पूरे परिवार के लिए आज का दिन एक भावुक दिन है. दो वर्षों से बिना किसी अपराध के मेरे पिताजी हिरासत में रहे. अब मेरे परिवार को एकसाथ मिलने का मौका मिला है. मैं जल्द से जल्द उनसे मिलना चाहूंगी."
बिनायक का व्यक्तित्व
पेशे से चिकित्सक डॉ बिनायक सेन छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि लेते रहे हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ में समाजसेवा की शुरुआत सुपरिचित श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ की और श्रमिकों के लिए बनाए गए शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे.
इसके बाद वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए काम करते रहे.
डॉ बिनायक सेन सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार करने के लिए बनी छत्तीसगढ़ सरकार की एक सलाहकार समिति के सदस्य रहे और उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि डॉ सेन के सुझावों के आधार पर सरकार ने ‘मितानिन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरु किया.
इस कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार की जा रहीं हैं.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान को उनके कॉलेज क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर ने भी सराहा और पॉल हैरिसन अवॉर्ड दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जोनाथन मैन सम्मान दिया गया.
डॉ बिनायक सेन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के उपाध्यक्ष भी हैं.
इस संस्था के साथ काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे.
नक्सली आंदोलन और बिनायक
उन्होंने अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े किए और नक्सली आंदोलन के ख़िलाफ़ चल रहे सलमा जुड़ुम की विसंगतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए.
सलवा जुड़ुम के चलते आदिवासियों को हो रही कथित परेशानियों को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही.
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े बस्तर में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम को सरकार स्वस्फ़ूर्त जनांदोलन कहती है जबकि इसके विरोधी इसे सरकारी सहायता से चल रहा कार्यक्रम कहते हैं. इस कार्यक्रम को विपक्षी पार्टी कांग्रेस का भी पूरा समर्थन प्राप्त है.
छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 2005 में जब छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम लागू करने का फ़ैसला किया तो उसका मुखर विरोध करने वालों में डॉ बिनायक सेन भी थे.
उन्होंने आशंका जताई थी कि इस क़ानून की आड़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.
उनकी आशंका सही साबित हुई और इसी क़ानून के तहत उन्हें 14 मई 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया था .
बीबीसी हिन्दी से साभार

05 मई 2008

डॉ बिनायक सेन और नक्सलवाद के रिश्ते का सच

- अनिल चमड़िया हिन्दी के पत्रकार है पत्र्करिता में मूल्यों की अडाई देश में चल रहे सामाजिक परिवर्तनों की लडाई और सत्ता के द्वारा मीडिया में चल रहे प्रोपोगेन्डा को इन्होंने समय समय पर अपनी लेखनी के माध्यम से उजागर किया है। वर्तमान में नक्सल्वादी आन्दोलन को किस तरह से राज्य और केन्द्र सरकार पेश कर रही है और उसके क्या पेंच हैं।तथा छ्त्तीसगढ की स्थिति पर अनिल चमडिया का ये विश्लेषण:-
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कई अवसरों पर नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बताया है। खतरे के ग्राफ को स्थापित करने के लिये नक्सलवादी गतिविधियों के ११८ जिलों में फैलने की जानकारी दी जाती है।लेकिन इसी बात को गृहमंत्री कई मौकों पर एक दूसरे प्रभाव के साथ पेश करते हैं।उनके अनुसार नक्सलवादी समस्या को बढ़ा चढ़ा कर नहीं उछाला जाना चाहिये। नक्सलवाद देश के साढ़े छ: लाख गाँवों के महज ३ प्रतिशत हिस्से तक ही सीमित है।इस तरह नक्सलवाद ११८ जिलों के आँकड़ों के आइने में बहुत बड़ी समस्या दिखने लगती है तो वहीं कुल गाँवों के संख्या के आलोक में कोई खास नहीं लगती।इस उदाहरण को केवल यही सीमित कर नहीं देखें।यह तो हुई पहली बात।इसे शासन शैली की खासियत के रूप में देखें।दूसरे इसे दुनिया भर में आँकड़ों के साथ सत्ता और उसके तंत्र द्वारा खेले जाने वाले खेलों के बतौर एक नमूना देखें।तीसरा इसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बीच इस मसले पर भिन्न नज़रिये के रूप में कतई नहीं देखें।

इसी तरह देश के विभिन्न प्रदेशों में विभन्न पार्टियों की सरकरों के दृष्टिकोण में मतभेद इस आधार पर नहीं देखे जा सकते कि वहाँ अलग- अलग राजनीतिक पार्टियों की सरकारें हैं।छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार है, इसलिये काँग्रेस की केन्द्र सरकार उस प्रदेश सरकार को नक्सलवादी विरोधी अभियान के नाम पर मदद पहुँचाने के लिये बाध्य है।यह छत्तीसगढ़ में बैठा ऎसा जागरुक व्यक्ति ही सोच सकता है जो पड़ोसी राज्य आँध्र-प्रदेश की तरफ नहीं झाँकना चाहता।छत्तीसगढ़ के गॄहमंत्री रामविचार नेताम ने ७ अप्रैल २००७ को यह बयान दिया कि छत्तीसगढ़ में स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर की नियुक्ति केन्द्र के निर्देश पर की गई है और उन्हें पुलिस वालों की तरह सुविधाएँ दी जा रही हैं।

दरअसल देश में केन्द्र और राज्य सरकारों का ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियों का मन नक्सलवादी गतिविधियों के प्रति एक जैसा ही बन चुका है।नक्सलवादी गतिविधियों को केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में रख कर विचार करने पर ज़ोर दिया जाता है।केवल उसके हिंसा के पक्ष को ही विमर्श के केन्द्र में रखा जाता है।नतीजतन नक्सलवादियों के खिलाफ़ अभियान के नाम पर कॊई भी तरीका स्वीकार करने में हिचक नहीं दिखाई देता है।दुनिया भर के सामने छत्तीसगढ़ को एक ऎसे उदाहरण के रूप में पेश होते देखा जा सकता है, जहाँ लोकतांत्रिक होने के सारे मानदंड ध्वस्त किये जा रहे हैं।वहाँ सरकारी और विरोधी दल मिलकर बिहार की निजी सेनाओं के तरह सलवा जुडुम चलाते हैं।निर्वाचित विधानसभा की गोपनीय बैठक होती है, लेकिन वास्तव में देखें तो नक्सलवादियों के खिलाफ़ कोई अभियान लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों के लिये लड़ने वाले लोगों के खिलाफ़ तक जाता है।यानि पहले चरण में तमाम कानून एवं व्यवस्था की धज्जियाँ उडा़ते हुये नक्सलियों को मारने की स्वीकृति हासिल की जाती है और दूसरे चरण में वे निशाना बनते हैं जो लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करते हैं।छत्तीसगढ़ में तो तीसरा चरण भी स्थापित किया गया जहाँ साहित्य पढ़ने, सोचने विचारने और स्वतंत्र रूप से अपनी आजीविका के लिये अपने पेशों को अंजाम देने वालों पर भी अंकुश लगा दिया है।हर पेशे का आदमी सहमा सहमा दिखता है।वह अपने हर ग्राहक को भय की दृष्टि से देखता है।छत्तीसगढ़ के लिये इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या होगी कि पूरी दुनिया में जिस डॉ बिनायक सेन को जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनकी सेवा के लिये सम्मानित किया जा रहा है, उन्हें १४ मई २००७ से जेल के इतने पहरे में रखा गया है कि उनका वजन १५ किलोग्राम से भी अधिक घट गया है। डॉ सेन को ग्लोबल हेल्थ कॉउन्सिल ने २९ मई २००८ को अमेरिका वासिंगटन शहर में जोनाथन मान पुरस्कार देने का फैसला किया।इससे पहले उनके जेल में बंदी के दौरान ही भारतीय सामाजिक विज्ञान अकादमी की ओर से २००७ आर.आर. कैथान स्वर्ण पदक देने का फैसला किया गया।पूरा देश डॉ सेन की स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की प्रति जागरुकता को जानता है।वे वेल्लौर के नामी गिरामी क्रिश्‍चन मेडिकल कॉलेज़ से डॉक्टर बनने के बाद किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के दरवाजे पर नहीं गये बल्कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके दल्लीराजहरा में शंकर गुहा नियोगी के पास आये और मज़दूरों द्वारा संचालित देश के पहले हस्पताल को स्थापित करने में मदद की। लेकिन इस तरह के कामों के महत्व को कोई पुलिस वाला महज यह कह कर उपहास उड़ाने की जरुरत कर लेता है कि नियोगी तो नक्सल्वादी थे।

दरअसल इस बात को समझने की जरुरत है कि नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में स्थापित करके सत्ता तमाम तरह की निरंकुशताएँ स्थापित करने की छूट चाहती है।लोकतंत्र के लिये जो जगह बनी है उस पर इंच दर इंच सत्ता तंत्र कब्ज़ा करना चाहता है,इसीलिये छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा में लगे लोगों और संगठनों को बख़्सने का कोई भी मौका सत्ता तंत्र नहीं छोड़ रहा है।संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक सत्ता पक्ष और विपक्ष में बँटी दिकती है,लेकिन यहाँ इस तरह के बँटवारे की रेखा लुप्त हो जाती है।ऎसे रुख के कारण न्यायालय भी अपनी भूमिका में दिखाई देना बंद कर देता है।आपातकाल में न्यायालयों से लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की माँग मुश्किल हो गई थी।न्यायालयों ने समर्पण सा कर दिया था।इस वक्त छत्तीसगढ़ के संदर्भ में क्या देखा जा रहा है? डॉ सेन के मामले तो यह साफ दिखता है कि डॉ सेन के बहाने सरकार का मकसद मानवाधिकार विचारों को ही चेतावनी देना भर है।सरकारें यदि यह मान लें कि न्यायिक प्रक्रिया ऎसी है कि किसी को वर्षॊं तक जेल में रखा जा सकता है तो यहाँ लोकतंत्र पर सरकारी साजिश के अनुपात का अंदाज़ किया जा सकता है।लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि यदि न्यायालय सरकारी तंत्र के इन निरंकुश इरादों को समझ कर उसे ध्वस्त नहीं करे तो उसकी भूमिका की सक्रियता पर सवाल तो जरुर खड़े होते है।

हाल के वर्षों में ऎसे दर्जनों मामले सामने आये हैं जिसमें न्यायालय ने संघर्षशील लोगों को बरी किया लेकिन सरकार द्वारा उन्हें महीनों और वर्षों तक बंदी बना कर रखने में कामयाबी हासिल करने के बाद।जब इस तरह आर्थिक,राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को व्यक्त करने के अवसर कम होते जायेंगे तो क्या स्थिति बन सकती है!हर विरोध को नक्सलवादी कह कर उसे नकारने की छूट मिलती हो तो हर सत्तातंत्र यही करेगा और वह कर रहा है ।देश के सामने एक बड़ी चुनौती है कि वह राजनीतिक पार्टियों के चरित्र को वास्तविक अर्थों में कैसे लोकतांत्रिक बनाये।इस समय यह समझने की जरुरत है कि विकास और सुरक्षा की राजनीति के निहितार्थ क्या हैं?अमरीका को इराक में जनसंहार के हथियार दिख रहे थे ।अपने देश में भाजपा को विकास और सुरक्षा के लिये आतंकवाद दिखता है।वह गुजरात में नरेन्द्र मोदी की जीत को विकास और सुरक्षा की जीत के रूप में व्याख्यायित करता है।इसी तरह मनमोहन सिंह को विकास और सुरक्षा के लिये नक्सल्वादी चाहिये।इसीलिये वे नक्सलवाद को जिलों के संख्या के आधार पर सबसे बडॆ़ खतरे के रूप में दिखाते है और दूसरी तरफ़ गृहमंत्री ३ प्रतिशत गाँव में नक्सलवाद की समस्या दिखा कर भूमंडलीय विकास नीति में लगी जमात को आश्वस्त भी कर देते हैं।विकास और सुरक्षा वास्तव में अपनी मनचाही विकास की सुरक्षा है।