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26 जून 2014

बसपा का शीराजा क्यों बिखरा: आनंद तेलतुंबड़े

आनंद तेलतुंबड़े ने अपने इस लेख में बसपा की पराजय का आकलन करते हुए एक तरफ मौजूदा व्यवस्था के जनविरोधी चेहरे और दूसरी तरफ उत्पीड़ित जनता के लिए पहचान की राजनीति के खतरों के बारे में बात की है. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले आम चुनाव हैरानी से भरे हुए रहे, हालांकि पहले से यह अंदाजा लगाया गया था कि कांग्रेस के नतृत्व वाला संप्रग हारेगा और भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता में आने वाला है. वैसे तो चुनावों से पहले और बाद के सभी सर्वेक्षणों ने भी इसी से मिलते जुलते राष्ट्रीय मिजाज की पुष्टि की थी, तब भी नतीजे आने के पहले तक भाजपा द्वारा इतने आराम से 272 का जादुई आंकड़ा पार करने और संप्रग की सीटें 300 के पार चली जाने की अपेक्षा बहुत कम लोगों ने ही की होगी. खैर, भाजपा ने 282 सीटें हासिल कीं और संप्रग को 336 सीटें. महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह, बिहार में नीतीश कुमार जैसे अनेक क्षेत्रीय क्षत्रप मुंह के बल गिरे. लेकिन अब तक चुनाव नतीजों का सबसे बड़ा धक्का यह रहा कि बहुजन समाज पार्टी का उत्तर प्रदेश की अपनी जमीन पर ही पूरी तरह सफाया हो गया. लोग तो यह कल्पना कर रहे थे, और बसपा के नेता इस पर यकीन भी कर रहे थे, कि अगर संप्रग 272 सीटें हासिल करने नाकाम रहा तो इसके नतीजे में पैदा होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल में मायावती हैरानी में डालते हुए देश की प्रधानमंत्री तक बन सकती हैं. इस कल्पना को मद्देनजर रखें तो बसपा का सफाया स्तब्ध कर देने वाला है. आखिर हुआ क्या?

नतीजे आने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में मायावती ने दावा किया कि दलितों और निचली जातियों में उनका जनाधार बरकरार है और चुनावों में खराब प्रदर्शन की वजह भाजपा द्वारा किया गया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है. उन्होंने कहा कि जबकि ऊंची जातियों और पिछड़ी जातियों को भाजपा ने अपनी तरफ खींच लिया और मुसलमान समाजवादी पार्टी की वजह से बिखर गए. बहरहाल उन्होंने इसके बारे में कोई व्याख्या नहीं दी कि ये चुनावी खेल अनुचित कैसे थे. मतों के प्रतिशत के लिहाज से यह सच है कि बसपा उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राष्ट्रीय स्तर पर इसे 2.29 करोड़ वोट मिले जो कुल मतों का 4.1 फीसदी है. 31.0 फीसदी मतों के साथ भाजपा और 19.3 फीसदी मतों के साथ इससे आगे हैं और 3.8 फीसदी मतों के साथ सापेक्षिक रूप से एक नई पार्टी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इससे पीछे है. 15वीं लोकसभा में बसपा की 21 सीटें थीं जिनमें से 20 अकेले उत्तर प्रदेश से थीं. बसपा से कम मत प्रतिशत वाली अनेक पार्टियों ने इससे कहीं ज्यादा सीटें जीती हैं. मिसाल के लिए तृणमूल कांग्रेस को मिले 3.8 फीसदी मतों ने उसे 34 सीटें दिलाई हैं और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम को इससे भी कम 3.3 फीसदी मतों पर तृणमूल से भी ज्यादा, 37 सीटें मिली हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी (आप) महज 2.0 फीसदी मतों के साथ चार सीटें जीतने में कामयाब रही. उत्तर प्रदेश में बसपा को 19.6 फीसदी मत मिले हैं जो भाजपा के 42.3 फीसदी और सपा के 22.2 फीसदी के बाद तीसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. इसमें भी एक खास बात है: चुनाव आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि बसपा इस विशाल राज्य की 80 सीटों में 33 पर दूसरे स्थान पर रही.

लेकिन देश में तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी का संसद में कोई वजूद नहीं होने की सबसे बड़ी वजह हमारी चुनावी व्यवस्था है, जिसके बारे में बसपा कभी भी कोई शिकायत नहीं करेगी. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली यह चुनावी व्यवस्था (एफपीटीपी) हमें हमेशा ही हैरान करती रही है, इस बार इसने कुछ ज्यादा ही हैरान किया. भाजपा कुल डाले गए वोटों में से महज 31.0 फीसदी के साथ कुल सीटों का 52 फीसदी यानी 282 सीटें जीत सकी. चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक कुल 66.36 फीसदी वोट डाले गए, इसका मतलब है कि भाजपा को जितने वोट मिले उनमें कुल मतदाताओं के महज पांचवें हिस्से (20.5 फीसदी) ने भाजपा को वोट दिया. इसके बावजूद भाजपा का आधी से ज्यादा सीटों पर कब्जा है. इसके उलट, हालांकि बसपा तीसरे स्थान पर आई लेकिन उसके पास एक भी सीट नहीं है. जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूं, एफपीटीपी को चुनने के पीछे हमारे देश के शासक वर्ग की बहुत सोची समझी साजिश रही है. तबके ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर उपनिवेशों ने इसी चुनाव व्यवस्था को अपनाया. लेकिन एक ऐसे देश में जो निराशाजनक तरीके से जातियों, समुदायों, नस्लों, भाषाओं, इलाकों और धर्मों वगैरह में ऊपर से नीचे तक ऊंच-नीच के क्रम के साथ बंटा हुआ है, राजनीति में दबदबे को किसी दूसरी चुनावी पद्धति के जरिए यकीनी नहीं बनाया जा सकता था. एफपीटीपी हमेशा इस दबदबे को बनाए रखने में धांधली की गुंजाइश लेकर आती है. इस बात के व्यावहारिक नतीजे के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस या भाजपा का दबदबा इसका सबूत है. अगर मिसाल के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) व्यवस्था अपनाई गई होती, जो प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं द्वारा चुनावों के लिए अपनाई गई अधिक लोकप्रिय और अधिक कारगर व्यवस्था है, तो सभी छोटे समूहों को अपना ‘स्वतंत्र’ प्रतिनिधित्व मिला होता जो इस दबदबे के लिए हमेशा एक खतरा बना रहता. दलितों के संदर्भ में, इसने आरक्षण कहे जाने वाले सामाजिक न्याय के बहुप्रशंसित औजार की जरूरत को भी खत्म कर दिया होता, जिसने सिर्फ उनके अस्तित्व के अपमानजनक मुहावरे का ही काम किया है. कोई भी दलित पार्टी एफपीटीपी व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगी. बसपा तो और भी नहीं. क्योंकि यह उन सबके नेताओं को अपने फायदे के लिए धांधली करने में उसी तरह सक्षम बनाती है, जैसा यह शासक वर्गीय पार्टियों को बनाती आई है.

दूसरी वजह पहचान की राजनीति का संकट है, जिसने इस बार पहचान की राजनीति करने वाली बसपा से इसकी एक भारी कीमत वसूली है. बसपा की पूरी कामयाबी उत्तर प्रदेश में दलितों की अनोखी जनसांख्यिकीय उपस्थिति पर निर्भर रही है, जिसमें एक अकेली दलित जाति जाटव-चमार कुल दलित आबादी का 57 फीसदी है. इसके बाद पासी दलित जाति का नंबर आता है, जिसकी आबादी 16 फीसदी है. यह दूसरे राज्यों के उलट है, जहां पहली दो या तीन दलित जातियों की आबादी के बीच इतना भारी फर्क नहीं होता है. इससे वे प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं, जिनमें से एक आंबेडकर के साथ खुद को जोड़ता है तो दूसरा जगजीवन राम या किसी और के साथ. लेकिन उत्तर प्रदेश में जाटवों और पासियों के बीच में इतने बड़े फर्क के साथ इस तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और वे एक साझे जातीय हित के साथ राजनीतिक रूप से एकजुट हो सकते हैं. इसके बाद की तीन दलित जातियों – धोबी, कोरी और वाल्मीकि – को भी उनके साथ मिला दें तो वे कुल दलित आबादी का 87.5 फीसदी बनते हैं, जो राज्य की कुल आबादी की 18.9 फीसदी आबादी है. कुल मतदाताओं में भी इन पांचों जातियों का मिला जुला प्रतिशत भी इसी के आसपास होगा. यह बसपा का मुख्य जनाधार है. इन चुनावी नतीजों में कुल वोटों में बसपा का 19.6 फीसदी वोट हासिल करना दिखाता है कि बसपा का मुख्य जनाधार कमोबेश बरकरार रहा होगा.

दूसरे राज्यों के दलितों के उलट जाटव-चमार बाबासाहेब आंबेडकर के दिनों से ही आर्थिक रूप से अच्छे और राजनीतिक रूप से अधिक संगठित रहे हैं. 1957 में आरपीआई के गठन के बाद, आरपीआई के पास महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत इलाके रहे हैं, कई बार तो महाराष्ट्र से भी ज्यादा. यह स्थिति आरपीआई के टूटने तक रही. महाराष्ट्र में आरपीआई के नेताओं की गलत कारगुजारियों के नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश में आरपीआई के दिग्गजों बुद्ध प्रिय मौर्य और संघ प्रिय गौतम भी क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के साथ गए. इस तरह जब कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में कदम रखे तो एक दशक या उससे भी अधिक समय से वहां नेतृत्व का अभाव था. उनकी रणनीतिक सूझ बूझ ने उनकी बहुजन राजनीति की संभावनाओं को फौरन भांप लिया. उन्होंने और मायावती ने दलितों को फिर से एकजुट करने और पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबकों को आकर्षित करने के लिए भारी मेहनत की. जब वे असल में अपनी इस रणनीति की कामयाबी को दिखा पाए, तो उन्होंने पहले से अच्छी तरह स्थापित दलों को एक कड़ी टक्कर दी और उसके बाद सीटें जीतने में कामयाब रहे. इससे राजनीतिक रूप से अब तक किनारे पर रहे सामाजिक समूह भी बसपा के जुलूस में शामिल हो गए. मायावती ने यहां से शुरुआत की और उस खेल को उन्होंने समझदारी के साथ खेला, जो उनके अनुभवी सलाहकार ने उन्हें सिखाया था. जब वे भाजपा के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनीं, तो इससे बसपा और अधिक मजबूत हुई. ताकत के इस रुतबे पर मायावतीं अपने फायदे के लिए दूसरे राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करने लगीं.

कुछ समझदार दलित बुद्धिजीवियों ने इस पर अफसोस जाहिर किया है कि बसपा ने दलितों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन इस मामले की असल बात यह है कि इस खेल का तर्क बसपा को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है. जैसे कि शासक वर्गीय दलों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे जनसमुदाय को पिछड़ेपन और गरीबी में बनाए रखें, मायावती ने यही तरीका अख्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश में दलितों को असुरक्षित स्थिति में बनाए रखा. वे भव्य स्मारक बना सकती थीं, दलित नायकों की प्रतिमाएं लगवा सकती थीं, चीजों के नाम उन नायकों के नाम पर रख सकती थीं और दलितों में अपनी पहचान पर गर्व करने का जहर भर सकती थीं लेकिन वे उनकी भौतिक हालत को बेहतर नहीं बना सकती थीं वरना ऐसे कदम से पैदा होने वाले अंतर्विरोध जाति की सोची-समझी बुनियाद को तहस नहस कर सकते थे. स्मारक वगैरह बसपा की जीत में योगदान करते रहे औऱ इस तरह उनकी घटक जातियों तथा समुदायों द्वारा हिचक के साथ वे कबूल कर लिए गए. लेकिन भेद पैदा करने वाला भौतिक लाभ समाज में ऐसी न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा करता, जिसे राजनीतिक रूप से काबू में नहीं किया सकता. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक दलित या गरीब परस्त एजेंडा नहीं बनाया जा सकता था. राजनीतिक सीमाओं के बावजूद वे दिखा सकती थीं कि एक ‘दलित की बेटी’ गरीब जनता के लिए क्या कर सकती है. लेकिन उन्होंने न केवल अवसरों को गंवाया बल्कि उन्होंने लोगों के भरोसे और समर्थन का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया.

बाद में उनकी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाएं उन्हें बहुजन से सर्वजन तक ले गईं, जिसमें उन्होंने अपना रुख पलटते दिया और उनमें दलितों के लिए जो भी थोड़ा बहुत सरोकार बचा था, उसे और खत्म कर दिया. तब अनेक विश्लेषकों ने यह अंदाजा लगाया था कि दलित मतदाता बसपा से अलग हो जाएंगे, लेकिन दलित उन्हें हैरानी में डालते हुए मायावती के साथ पहले के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े हुए और उन्हें 2007 की अभूतपूर्व सफलता दिलाई. इसने केवल दलितों की असुरक्षा को ही उजागर किया. वे बसपा से दूर नहीं जा सकते, भले ही इसकी मुखिया चाहे जो कहें या करें, क्योंकि उन्हें डर था कि बसपा के सुरक्षात्मक कवच के बगैर उन्हें गांवों में सपा समर्थकों के हमले का सामना करना पड़ेगा. अगर मायावती इस पर गर्व करती हैं कि उनके दलित मतदाता अभी भी उनके प्रति आस्थावान हैं तो इसका श्रेय मायावती को ही जाता है कि उन्हें दलितों को इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकते. निश्चित रूप से इस बार भाजपा ने कुछ दलित जातियों को लुभाया है और वे संभवत: गोंड, धानुक, खटिक, रावत, बहेलिया, खरवार, कोल आदि हाशिए की जातियां होंगी जो दलित आबादी का 9.5 फीसदी हिस्सा हैं. मुसलमान भी ऐसे ही एक और असुरक्षित समुदाय हैं जिन्हें हमेशा अपने बचाव कवच के बारे में सोचना पड़ता है. इस बार बढ़ रही मोदी लहर और घटती हुई बसपा की संभावनाओं को देखते हुए वे सपा के इर्द-गिर्द जमा हुए थे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. 2007 के चुनावों में उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में फिर से दावेदारी जताने को बेकरार ब्राह्मणों समेत ये सभी जातियां बसपा की पीठ पर सवार हुईं और उन्होंने बसपा को एक भारी जीत दिलाई थी, लेकिन बसपा उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी. तब वे उससे दूर जाने लगे जिसका नतीजा दो बरसों के भीतर, 2009 के आम चुनावों में दिखा जब बसपा की कुल वोटों में हिस्सेदारी 2007 के 30.46 फीसदी से गिरकर 2009 में 27.42 फीसदी रह गई. इस तरह 3.02 फीसदी वोटों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. तीन बरसों में यह नुकसान 1.52 फीसदी और बढ़ा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कुल वोटों की हिस्सेदारी गिरकर 25.90 पर आ गई. और अब 2014 में यह 19.60 फीसदी रह गई है जो कि 6.30 फीसदी की गिरावट है. यह साफ साफ दिखाता है कि दूसरी जातियां और अल्पसंख्यक तेजी से बसपा का साथ छोड़ रहे हैं और यह आने वाले दिनों की सूचना दे रहा है जब धीरे धीरे दलित भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलेंगे. असल में मायावती की आंखें इसी बात से खुल जानी चाहिए कि उनका राष्ट्रीय वोट प्रतिशत 2009 के 6.17 से गिर कर इस बार सिर्फ 4.1 फीसदी रह गया है.

जबकि जाटव-चमार वोट उनके साथ बने हुए दिख रहे हैं, तो यह सवाल पैदा होता है कि वे कब तक उनके साथ बने रहेंगे. मायावती उनकी असुरक्षा को बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं. न केवल वे बसपा के टिकट ऊंची बोली लगाने वालों को बेचती रही हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा अहंकार भी विकसित कर लिया है कि वे दलित वोटों को किसी को भी हस्तांतरित कर सकती हैं. उन्होंने आंबेडकरी आंदोलन की विरासत को छोड़ कर 2002 के बाद के चुनावों में मोदी के लिए प्रचार किया जब पूरी दुनिया मुसलमानों के जनसंहार के लिए उन्हें गुनहगार ठहरा रही थी. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को भी छोड़ दिया और मौकापरस्त तरीके से ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे चलाए. लोगों को कुछ समय के लिए पहचान का जहर पिलाया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बेवकूफ हैं. लोगों को मायावती की खोखली राजनीति का अहसास होने लगा है और वे धीरे धीरे बसपा से दूर जाने लगे हैं. उन्होंने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्होंने जनता को सिर्फ पिछड़ा बनाए रखने का काम किया और अपने शासनकालों में उन्हें और असुरक्षित बना कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मानकों पर दूसरे राज्यों के दलितों से कहीं अधिक पिछड़े बने हुए हैं, बस बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलित ही उनसे ज्यादा पिछड़े हैं. मायावती ने भ्रष्टाचार और पतनशील सामंती संस्कृति को बढ़ाना देने में नए मुकाम हासिल किए हैं, जो कि बाबासाहेब आंबेडकर की राजनीति के उल्टा है जिनके नाम पर उन्होंने अपना पूरा कारोबार खड़ा किया है. उत्तर प्रदेश दलितों पर उत्पीड़न के मामले में नंबर एक राज्य बना हुआ है. यह मायावती ही थीं, जिनमें यह बेहद गैर कानूनी निर्देश जारी करने का अविवेक था कि बिना जिलाधिकारी की इजाजत के दलितों पर उत्पीड़न का कोई भी मामला उत्पीड़न अधिनियम के तहत दर्ज नहीं किया जाए. ऐसा करने वाली वे पहली मुख्यमंत्री थीं.

जातीय राजनीति की कामयाबी ने बसपा को इस कदर अंधा कर दिया था कि वह समाज में हो रहे भारी बदलावों को महसूस नहीं कर पाई. नई पीढ़ी उस संकट की आग को महसूस कर ही है जिसे नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके लिए पैदा की हैं. देश में बिना रोजगार पैदा किए वृद्धि हो रही है, और सेवा क्षेत्र में जो भी थोड़े बहुत रोजगार पैदा हो रहा है उन्हें बहुत कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल दिया जा रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के सिकुड़ने से आरक्षण दिनों दिन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. दूसरी तरफ सूचनाओं में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण नई पीढ़ी की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. उन्हें जातिगत भेदभाव की वैसी आग नहीं झेलनी पड़ी है जैसी उनके मां-बाप ने झेली थी. इसलिए वे ऊंची जातियों के बारे में पेश की जाने वाली बुरी छवि को अपने अनुभवों के साथ जोड़ पाने में नाकाम रहते हैं. उनमें से अनेक बिना दिक्कत के ऊंची जातियों के अपने दोस्तों के साथ घुलमिल रहे हैं. हालांकि वे अपने समाज से रिश्ता नहीं तोड़ेंगे लेकिन जब कोई विकास के बारे में बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ खींचेगा. और यह खिंचाव पहचान संबंधी उन बातों से कहीं ज्यादा असरदार होगा जिसे वे सुनते आए हैं. दलित नौजवान उदारवादी संस्कृति से बचे नहीं रह सकते हैं, बल्कि उन्हें व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, उपयोगवाद वगैरह उन पर असर डाल रहे हैं, इनकी गति हो सकता है कि धीमी हो. यहां तक कि गांवों में भीतर ही भीतर आए बदलावों ने निर्वाचन क्षेत्रों की जटिलता को बदल दिया है, जिसे हालिया अभियानों में भाजपा ने बड़ी महारत से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी शैली की जातीय और सामुदायिक लफ्फाजी में फंसे रहे. बसपा का उत्तर प्रदेश के नौजवान दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाना साफ साफ दिखाता है कि दलित वोटों में 1.61 करोड़ के कुल इजाफे में से केवल 9 लाख ने ही बसपा को वोट दिया.

भाजपा और आरएसएस ने मिल कर दलित और पिछड़ी जातियों के वोटों को हथियाने की जो आक्रामक रणनीति अपनाई, उसका असर भी बसपा के प्रदर्शन पर दिखा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के संयोजक अमित शाह ने आरएसएस के कैडरों के साथ मिल कर विभिन्न जातीय नेताओं और संघों के साथ व्यापक बातचीत की कवायद की. शाह ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हमले का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए किया. उसने मोदी की जाति का इस्तेमाल ओबीसी वोटों को उत्साहित करने के लिए किया कि उनमें से ही एक इंसान भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस रणनीति ने उन इलाकों की पिछड़ी जातियों में सपा की अपील को कमजोर किया, जो सपा का गढ़ मानी जाती थीं. इस रणनीति का एक हिस्सा बसपा के दलित आधार में से गैर-जाटव जातियों को अलग करना भी था. भाजपा ने जिस तरह से विकास पर जोर दिया और अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के तहत बसपा की मौकापरस्त जातीय राजनीति को उजागर किया, उसने भी बसपा की हार में एक असरदार भूमिका अदा की. लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा, बसपा की अपनी कारगुजारियां ही इसकी बदतरी की जिम्मेदार हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए बसपा आत्मविश्लेषण करेगी और खुद में सुधार करेगी.

21 मार्च 2014

गुजरात का विकास मॉडल : खून और राख में लिपटी विकास की कहानी

नए सन्दर्भ-पुरानी बात  
रेयाज-उल-हक
राज्य की 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर के बावजूद गुजरात में एक तीखा सांप्रदायिक धु्रवीकरण रहा है. सवाल यह है कि इतने तेज विकास और ऐसी समृद्धि के बावजूद राज्य में बार-बार दंगे क्यों होते रहे हैं? क्यों राज्य के मुख्यमंत्री को झूठी मुठभेडों में हुई हत्याओं पर गर्व होता है? तथा क्यों वे ऐसी और हत्याओं की चेतावनी देते हैं? क्यों गुजरातियों को अचानक उनकी अस्मिता की इस कदर तीव्र जरूरत पड जाती है? सबसे बडी बात तो यह कि क्यों देश का पूरा तंत्र-सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं, संसद, न्यायपालिका, प्रेस-इस पूरे घटनाक्रम को तटस्थ भाव से देखते हैं?

नहीं, शायद हम गलती पर हैं. कोई भी तटस्थ नहीं है. ये सभी संस्थाएं संसद, न्यायपालिका, प्रेस- सब मिल कर मुख्यमंत्री को दोबारा सत्ता में आने में मदद करती हैं.एक पूरी तारतम्यता है, पूरा सामंजस्य है. विंग्स के पीछे हम ऑर्केस्ट्रा की पूरी टीम देखते हैं, जिसका हर सदस्य अपने काम पर मुस्तैद है. हां कभी-कभी कोई नौसिखिया किसी गलत बटन को दबा देता है, जिससे संगीत गडबडा जाता है और दर्शक कुछ देर के लिए इस बेसुरेपन का भी मजा उठाते हैं, जायका बदलने के लिए.

केवल गुजरात ही नहीं, पूरे देश भर में जो घटनाएं घट रही हैं, उन सबमें एक जैसी बातें दिखायी देंगी. देश की 9 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर और तीन दर्जन अरबपतियों के बावजूद असम, सिंगूर-नंदीग्राम, गोहाना, ओडिशा, लोहंडीगुडा, गुर्जर-मीणा विवाद और सिख-सौदा विवाद जैसी घटनाएं क्यों घट रही हैं? इन तेजी से विकसित होते महानगरों, साइबर सिटीज, 16 लेन की विशाल सडकों, सुपर मॉल्स, मल्टीप्लेक्सेज और विशाल औद्योगिक इकाइयों का लाभ आखिरकार कहां जा रहा है? लोगों तक संपन्नता, जैसे कि हमें शुरू में बताया गया था, रिसते हुए भी क्यों नहीं पहुंच रही? लोगों में इतना असुरक्षा बोध क्यों है?

अगर इन सभी घटनाओं में एक समान चीज को ढूंढने की कोशिश करें तो हम पायेंगे कि प्रायः इन सभी जगहों पर भारी पूंजी निवेश हुआ है या होनेवाला है या फिर आर्थिक संकट ने समाज को तोड दिया है, जैसे कि असम. इनमें से अधिकतर जगहों पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव मंजूर किये गये हैं. इनके लिए बडी मात्रा में किसानों से जमीनें ली गयी हैं, ली जा रही हैं. प्रायः सभी जगहों पर उनके मुखर विरोध खडे हुए हैं. प बंगाल और ओडिशा के अलावा दादरी एवं गोवा में हम इसके उदाहरण देख सकते हैं.

मगर साथ ही इनमें से अधिकतर जगहों पर हम एक उद्धत भीड को, हत्यारे गिरोहों को, जनता के ही एक हिस्से को पाते हैं, जो लोगों की हत्याएं करती, बस्तियां और दुकानें जलाती और संपत्तियां लूटती फिरती है. इस भीड को हमेशा ही सत्ता का समर्थन होता है. नंदीग्राम में इस हत्यारी भीड के पीछे सीपीएम होती है और गुजरात में बीजेपी. ओडिशा में इसी भीड को जदयू-बीजेपी का समर्थन होता है तो छत्तीसगढ में कांग्रेस-बीजेपी दोनों का.
ऊपर से एकदम असंबद्ध लगनेवाली वित्तीय पूंजी और इस हत्यारी (दंगाई) भीड के बीच बेहद आत्मीय अंतर्संबंध हैं. मुख्यतः यह संगठित भीड या गिरोह इन जगहों पर किसानों अथवा संघर्षरत समूहों को विभाजित करने की कोशिशों का हिस्सा हैं. ये उनके प्रतिरोध को तोड कर रखे देते हैं और वहां की आबादियों में सरकारी और अधिकतर जनविरोधी नीतियों के प्रति व्यापक आक्रोश को प्रायः धुंधला कर देते हैं.

प बंगाल में नंदीग्राम के ताजा कत्लेआम के ठीक बाद तसलीमा नसरीन के मुे को हवा दी गयी. यह सिर्फ ध्यान बंटाने भर का मामला नहीं था, बल्कि प बंगाल में, विशेष कर नंदीग्राम की मुसलिम आबादी के प्रतिरोध को बांटने की कार्रवाई भी थी. ओडिशा में, जहां पोस्को के खिलाफ आदिवासी संघर्षरत हैं, वहां हिंदू-ईसाई विभाजन को तेज किया जा रहा है. सत्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता में से ही ऐसे गिरोह निर्मित करती है, जो कि प्रायः उन समुदायों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयां करते हैं, जो शासन की नीतियों का विरोध कर रहे हों या जिनकी तरफ से ऐसी आशंका हो. छत्तीसगढ में तो इसे और अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया है. वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों को जमीन देने से मना कर रहे आदिवासियों के खिलाफ उन्हीं के एक हिस्से को खडा कर दिया गया. सलवा जुडूम नाम के इस हत्यारे अभियान के दौरान सैकडों आदिवासी मारे गये और लाखों लोग अपनी जमीनों से उजाड दिये गये. अब वे सडकों के किनारे बनी झोंपडियों में रह रहे हैं. सरकार ने चुपचाप इन राहत शिविरों को राजस्व ग्राम में तबदील कर दिया है. मतलब यह कि वे आदिवासी अब अपनी जमीन पर कभी नहीं लौट पायेंगे. उस जमीन को अब जिंदल, एस्सार आदि कंपनियों के हवाले करने की तैयारियां चल रही हैं.
ठीक यही वह जगह है, जहां हमें भारत में लगातार बढ रही सांप्रदायिक, फासिस्ट (सामाजिक-सांप्रदायिक दोनों) व क्षेत्रीय हिंसा के सूत्र मिलते हैं. गुजरात में पहले से ही छोटे-छोटे उद्योगों की श्रृंखला रही है, जहां प्रायः अकुशल श्रम के जरिये उत्पादन होता रहा है. 1980 के बाद से, जब से पूरे भारत में वित्तीय पूंजी का आगमन शुरू हुआ, गुजरात में सांप्रदायिक दंगों की आवृत्ति में बढोतरी हुई. ज्यादातर अकुशल श्रमिक मुसलमान थे और छोटे उद्योगों में उनकी अच्छी-खासी हिस्सेदारी थी. मगर जब विदेशी पूंजी आने लगी, वह इस अकुशल श्रम को, छोटे-छोटे उद्योगों को बरदाश्त नहीं कर सकती थी. उसे बाजार पर अपने उत्पादों के लिए एकाधिपत्य चाहिए था और अपने उद्योगों के लिए श्रमिक, जो कि इन छोटे उद्योगों में लगे हुए थे. अतः इन छोटे उद्योगों के रहते उसके लिए अपना विस्तार संभव नहीं रह गया था. इनका उन्मूलन जरूरी हो गया.

से में हिंदुत्व बडे काम की चीज साबित हुई. उसके पास न सिर्फ एक पहले से ही ऐसी विचारधारा मौजूद थी जो देश के प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपना शत्रु मानती थी, बल्कि देश भर में उसका विशाल संगठन, विभिन्न छोटे-छोटे गिरोह, एक राजनीतिक पार्टी और विभिन्न भूमिकाओं में कार्यरत उसके लाखों कार्यकर्ता मौजूद थे. फिर गुजरात ने अपनी इस तथाकथित आर्थिक विकास की शुरुआत खून और राख से की. गुजरात में पहले से ही एक सांप्रदायिक विभाजन था. 1969 के दंगों ने राज्य के दोनों प्रमुख समुदायों में बडी दरार डाल दी थी. 1981 के दंगे हुए. और फिर छह माह तक चलनेवाले 1985 के कुख्यात दंगे, जिनमें सरकारी तौर पर 275 लोग मारे गये, लाखों बेघर हुए और लगभग 2200 करोड रुपये मूल्य के संपत्ति और व्यापार की क्षति (अनुमानित) हुई. इसके बाद भी 1990, 92, 93 में दंगे होते रहे. 1960 से 1993 के बीच राज्य में 43 सांप्रदायिक दंगे हुए. 1990 के दशक में गुजरात में भारी पैमाने पर छोटे उद्योग बंद हुए. इसके बाद से गुजरात में भाजपा का एकछत्र राज रहा है. साथ ही बीजेपी की नजदीकी बडे व्यापारिक घरानों और कंपनियों से बढी. यहां एक दिलचस्प तथ्य हम यह भी पाते हैं कि गुजरात में हुई अब तक की अंतिम औद्योगिक हडताल ब्रिटिश शासनकाल में, 1941 में हुई थी. इसके बाद इस औद्योगिक राज्य में कोई औद्योगिक हडताल नहीं हुई.
एक पूरे समुदाय को शत्रु के रूप में चिह्नित करने और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिंसा को बढावा देने के पीछे एक और वजह है. वित्तीय पूंजी के लिए अधिक-से-अधिक मुनाफा बटोरने को सुगम बनाने के लिए राज्य को डब्ल्यूटीओ और वर्ल्ड बैंक की साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करना जरूरी था. इसके लिए उसे श्रम कानूनों में ढील देनी थी, जिससे मजदूरों के पास कोई अधिकार नहीं रह जाते. उसे बडी मात्रा में जमीनों का अधिग्रहण करना था, जिससे किसान बरबाद होते. राज्य के दूसरे संसाधनों को वित्तीय पूंजी की सेवा में लगाना था, जिससे राज्य के लोग अपने स्वाभाविक संसाधनों से वंचित हो जाते. इन सबका भारी प्रतिरोध होनेवाला था.
इन सबसे निबटने के लिए ऐसी सरकार चाहिए थी जो ऊपर से मजबूत ही न दिखे, उसे पास जनसमूह को जुटा लेने और अपने साथ रखने की काबीलियत भी हो. इसके लिए सरकारों को ऐसे नारे गढने जरूरी थे, जो ऊपर से जनता की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते दिखें, हालांकि जनता को उन नारों से कभी कुछ फायदा न हुआ. व्यापक जनसमूह को उसकी जातीय अस्मिता का हवाला देकर अपने साथ एकजुट करना जरूरी था. इन सबकी वजह से प्रतिरोध की संभावनाएं कम हो जातीं और जो प्रतिरोध करने का साहस जुटाते उन पर इस जन समूह को छोडा जा सकता था. वैसे भी गुजरात में ऐसा कोई विकल्प नहीं रहा जो इस प्रतिरोध का नेतृत्व कर सके और उसको रचनात्मक दिशा देकर राज्य को इस दुष्चक्र से छुटकारा दिला सके.

हिंदुत्व ने वित्तीय पूंजी की मदद से उत्पीडक और उत्पीडित वर्गों की पृथक पहचान और चेतना को धुंधला करके सभी को एक साथ खडा किया. चूंकि इसका नेतृत्व शासन में बैठी पार्टी कर रही थी, लोग शासन के साथ एकजुट होते गये. सारे मामले में धर्म का इतना बेहतर उपयोग किया गया कि लोग इस मकडजाल में और अधिक फंसते चले गये. उनमें तीव्र असुरक्षाबोध पैदा करके उनकी सुरक्षा करने के बहाने उन्हीं के तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म कर दिया. अधिक क्रूर और दमनकारी कानून लाये गये और मानवाधिकारों को हिकारत की वस्तु बना दिया गया. लोग यह अब तक नहीं समझ पाये हैं कि उन्हें डरा कर खुद उनकी सरकार ने उनके नीचे से उनकी जमीन खिसका दी है और वे अंधी खाई में गिरे जा रहे हैं.

गुजरात दंगे स्वतःस्फूर्त नहीं थे और न उनके संदर्भ तात्कालिक थे. हम पाते हैं कि इन दंगों के पहले राज्य की अर्थव्यवस्था 1994 के बाद से गिरावट का शिकार थी. मगर दंगों के बाद 2004 से इसमें बेहतरी आयी है. 2004 में गुजरात में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद शेष भारत के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक था. इसके अलावा राज्य में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर, जो कि 1994 के बाद से लगातार घट रही थी, 2004 के बाद पुनः बढने लगी.

हम यहां एक और विरोधाभास पाते हैं. अक्सर यह कहा जाता है कि निवेश के लिए राज्य में शांति और कानून-व्यवस्था बनी रहनी जरूरी है. मगर गुजरात का उदाहरण हमे इसकी एक उलटी बात दिखाता है. वहां विदेशी पूंजी निवेश की शुरुआत ही दंगों के साथ होती है और उनके तीव्र होते जाने के क्रम में ही निवेश में भी उछाल आता गया है. 2002 के दंगों के कुछ ही समय बाद, 2004 में गुजरात ने कुल 12 हजार 437 करोड रुपयों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी. दरअसल वित्तीय पूंजी क्षेत्र विशेष की आर्थिक, सामाजिक विशिष्टताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती. गुजरात के अकुशल श्रम और कारीगरों को नष्ट किये बगैर उसका मुनाफा संभव नहीं है, तो वह वहां दंगों का आयोजन करवाती है. मगर जहां पहले से ही साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियां मौजूद हैं, वहां वह कानून-व्यवस्था और शांति के नाम पर दमनात्मक कानूनों की जगह बनाती है और उन संघर्षों पर सत्ता के जरिये कठोर दमन करती है.

तो हम पृष्ठभूमि में एक ऐसे लोकतंत्र को पाते हैं जो वित्तीय पूंजी के प्रवाह को विकास का पर्याय मानता है, उसके लिए हत्याएं और नरसंहार कराये जाते हैं, हत्यारे गिरोहों और भीड को प्रोत्साहन दिया जाता है और सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध को कुचलने के लिए समाज को अंधी आस्थाओं से लैस किया जाता है. यह कुल मिला कर समाधान को हमसे और दूर कर देता है.

और ऐसे में हमसे कहा जाता है कि गुजरात को विकास के एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया जाये, क्या हुआ जो वहां अब भी एक पूरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार जारी है, क्या हुआ जो वहां अब भी दंगे के शिकार लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ, क्या हुआ जो वहां फिल्मों पर अघोषित प्रतिबंध लगा दिये जाते हैं और पेंटिंग्स जलायी जाती हैं. इन सबके बावजूद हमें इस विकास को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री फिर से चुनाव जीत गये हैं.

चुनाव. विकास. नवउदारवादी शब्दकोश के सबसे खनखनाते शब्द.

मगर एक ऐसी व्यवस्था में, जहां खुद चुनाव और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं वित्तीय पूंजी और साम्राज्यवादी संस्थाओं की सेवा में लगी हुई हों, हम लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी कैसे कर सकते हैं? भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मदद से ही फासीवाद सत्ता पर काबिज हुआ है. क्या 1975 में आपातकाल का अनुमोदन किसी दूसरे देश की संसद ने किया था? क्या 1984 के सिख विरोधी दंगों में शामिल पार्टी विशेष के लोग इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे? क्या बाबरी मसजिद इसी लोकतंत्र और इसके सभी स्तंभों के रहते नहीं तोड दी गयी? गुजरात नरसंहार के समय भी क्या यही लोकतंत्र नहीं था और नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने की बात कहनेवाले मुख्यमंत्री इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही नहीं चुने गये हैं?

जहां संसद, न्यायपालिका और प्रेस, पूरा तंत्र ही, वित्त पूंजी के हिरावल दस्ते के रूप में काम करने लगे हों, हम इस बात की गारंटी नहीं कर सकते कि संसद ही जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर रही है और जनता के अधिकार भंग नहीं कर दिये गये हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो जनता के तमाम प्रतिरोधों के बावजूद संसद सेज प्रस्तावों को मंजूरी कैसे देती और अदालतें हडताल, बंद, आरक्षण और मजदूर विरोधी फैसले कैसे देतीं? अकेले गुजरात का उदाहरण ही इस बात के लिए काफी है कि लोकतंत्र वास्तव में जनवादी मूल्यों, समानता और आजादी की गारंटी नहीं दे सकता.

हत्यारे गिरोह खडा करने और उन्हें समर्थन देने के संदर्भ में हम देख चुके हैं कि चुनाव लडनेवाली प्रायः सभी पार्टियां अपनी-अपनी स्थितियों में ऐसे गिरोहों को संरक्षण-समर्थन देती रही हैं. इनमें कोई अंतर नहीं होता, सिवाय इसके लिए वे एक दूसरे के खिलाफ वोट मांगती हैं. उनकी आर्थिक और विदेशी नीतियां तथा आंतरिक नीतियां भी लगभग समान हैं. असल में चुनाव में हमारे पास चुनने को इसके सिवा कुछ भी नहीं रह जाता कि कौन-सी पार्टी इस बार वित्तीय पूंजी की सेवा करेगी व इसके लिए जनता के अधिकारों को र करेगी. इस तरह हम यह भी देखते हैं कि चुनाव अंततः सांप्रदायिकता आदि का समाधान नहीं हो सकते.

और विकास के नाम पर जो आंकडे दिखाये जा रहे हैैं, उनसे बहुत प्रभावित होने की जरूरत नहीं है. यह वित्त पूंजी का दबाव है, जो नरेंद्र मोदी को राज्य में बुनियादी संरचना में सुधार करने पर विवश कर रहा है.

राज्य में भारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने प्रकटतः बडे उद्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. मगर जो लोग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रकृति के बारे में जानते हैं, यह उनके लिए बहुत उत्साहजनक तथ्य नहीं है. उल्टे यह चिंताजनक स्थिति ही है, क्योंकि एफडीआइ किसी भी तरह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करता. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निवेशक को सारा मुनाफा अपने देश ले जाने का अधिकार होता है. एफडीआइ देश के संसाधनों और इसकी संरचना का उपयोग अपने मुनाफे के लिए करता है और बदले में वह देश के लिए उसकी सदियों की जहालत छोड देता है. चूंकि सारा मुनाफा देश के बाहर चला जाता है, देश में आगे के औद्योगिक विकास के लिए उससे कोई पूंजी नहीं बचती. अधिक से अधिक उद्योगों की स्थापना के पीछे जो रोजगार निर्मित करने का तर्क दिया जाता है, वह भी मुनाफे की व्यवस्था के तहत तकनीकआधारित उद्योगों के दौर में बेमानी हो गये हैं. उनसे बहुत रोजगार उत्पन्न होने की आशा नहीं रखनी चाहिए. इसके अलावा एफडीआइ कभी टिकाऊ औद्योगिक विकास का माध्यम नहीं हो सकता. यह दरअसल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और पूंजीवाद के संकट से उत्पन्न आवारा पूंजी का हिस्सा है. यह हर समय और अधिक मुनाफे की तलाश में अपनी जगह बदलती रहती है. यह आज यहां है, कल कहीं और होगी. और फिर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि तब हमारी अर्थव्यवस्था का क्या होगा जो इस आवारा पूंजी पर अधिकाधिक निर्भर है.

गुजरात में जो बुनियादी सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं, वे प्रायः उन वर्गों की सुविधा के लिए हैं जो पहले से ही संपन्न हैं. उपभोक्ता बाजार के लिए गांवों तक पहुंच सुलभ बनाने और उसके लिए गांवों के दरवाजे खोलने के लिए जरूरी हो गया था कि वहां तक सडकें जायें और बिजली रहे.

मगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकडे राज्य में लोगों की बेहतरी को मापने के लिए एक बदतरीन उदाहरण हैं. राज्य अपने शासकों के चकाचौंध कर देनेवाले दावों के बावजूद , भूख, बदहाली और बीमारी से मुक्त नहीं है. गुजरात मानव विकास रिपोर्ट, 2004 बताती है कि गुजरात में निर्माण और कृषि क्षेत्रों, विकसित और अविकसित क्षेत्रों, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों तथा आर्थिक विकास और लोगों की बेहतर जीवनशैली के बीच का अंतर तीखा हुआ है. 2005 में गुजरात में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार बच्चों में 54 थी, जो कि राष्ट्रीय औसत से 1.07 गुणा ज्यादा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक 2005-06 के दौरान गुजरात में पांच वर्ष तक के आधे से कुछ कम (47 प्रतिशत) बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं. गुजरात में सामाजिक सेक्टर में खर्च नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में घटा है. वहां की 74.3 प्रतिशत महिलाएं और 46.3 प्रतिशत बच्चे एनीमिक हैं.

और अब हमारे सामने एक ऐसा राज्य है जो एफडीआइ की आयातित रोशनी में चमचमाता हुआ मंच पर खडा है और नेपथ्य में आत्महत्या किये 500 किसानों की लाशें सड रही हैं. जहां दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ तीव्र भेदभाव है और जहां तीन वर्षों में 100 से अधिक दलितों की हत्या कर दी गयी.

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि यह विकास कैसे हुआ और इसकी कीमत अंततः कौन चुका रहा है? क्या इस अबाध विकास के पीछे हत्याओं, नरसंहारों, घेटोकरण और संसदीय ढांचे के भीतर, उसी से उपजी तानाशाही की भूमिका को नजरअंदाज किया जा सकता है? और इसकी कीमत कौन चुका रहा है? उन पांच करोड गुजरातियों में से वे लोग जो कामगार हैं, वंचित हैं और गरीब हैं, अल्पसंख्यक हैं. जिनसे न सिर्फ उनके संसाधन और लोकतांत्रिक अधिकार ही छीन लिये गये हैं बल्कि इसका प्रतिरोध करने की उनकी संभावनाएं भी. जो कुछ राज्य ने उनके लिए छोडा है, वह है वापी में दुनिया का सबसे खतरनाक केमिकल हब, कपडा रंगाई उद्योग, जहाज तोडने और हीरे की पॉलिशिंग के रोजगार, जो उन्हें उनके जीवन के 30 वें साल में ही अंधा बना देंगे.

तो क्या वास्तव में हम अपने लिए ऐसे ही विकास को पसंद करेंगे?

07 नवंबर 2013

पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय: फरियादी होने की सजा.

प्रियंका शर्मा
भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में एक महिला के तौर पर पली-बढ़ी होने के नाते,यहाँ की महिलाएं हमेशा ही यौनिक हिंसा के डर और असुरक्षा में जीती हैं. यह डर घर के बाहर की दुनिया में सहभागिता और साझेदारी बनाने में महिलाओं को हमेशा पीछे खींचता रहा है, फिर बाहरी दुनिया में यह भागीदारी चाहे किसी भी क्षेत्र और किसी भी स्तर पर हो.इस डर का असर यहाँ तक भी होता है कि कि महिलाओं का घर से निकलना भी मुश्किल हो जाता है. महिलाओं पर यौनिक हिंसा और उससे होने वाले व्यक्तिगत, संस्थानिक और सांस्कृतिक नुकसान को देखते हुए भारत सरकार ने इसे कानूनी रूप से दंडनीय अपराध माना.इसीलिए आज हर सरकारी संस्थान में सेक्सुअल हिंसा की रोकथाम करने वाली कमेटी का होना जरूरी कर दिया गया है.
भारतीय महिलाओं के जीवन में सेक्सुअल हिंसा ऐसा भाग है जिसे आमतौर पर लगभगरोज ही झेलना होता है और कई बार तो बार-बार और इतने बड़े स्तर पर होता है कि वे इसे अनदेखा करने लगती हैं,फिर वे अपना रास्ता और यहांतक कि लक्ष्य भी बदल लेती हैं. मुझे आज भी याद पड़ता है कि जब कॉलेज के दिनों में जब छेड़छाड़ की किसी घटना की रिपोर्ट घर पे करती तो घरवाले कॉलेज का रास्ता बदल लेनेको कहते और कुछ गंभीर-से लगने वाले ममलों में दो-चार दिनोंतक कॉलेज न जाने को कहते.
शिक्षा के क्षेत्र में भी यौनिक हिंसा एक बहुत बड़ा मुद्दा रहा है. स्कूल, कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटीज़ तक में लड़कियों और महिलाओं को यौनिक हिंसा के कई-कई रूपों का सामना करना पड़ता है. हालांकि इस यौनिक हिंसा को रोकने के लिहाज़ से हर यूनिवर्सिटी में ‘एंटी सेक्सुअल हरैस्मेंट सेल/कमेटी’ बनाई जाती हैं, जिनका काम यौन हिंसा के मामलों पर तत्काल कार्यवाहीकर पीड़ित को मानसिक-सामजिक न्याय और राहत दिलाना होता है.लेकिन अक्सर इन ‘एंटी सेक्सुअल हरैस्मेंट सेल’ और कमेटियों के सदस्यों की पितृसत्तात्मक मानसिकता और जेंडर मामलों के प्रति असंवेदनशीलता,पीड़ित को न्याय देने के बजाए उसे बार-बार उत्पीड़ित ही करते हैं.सदस्यों की इसी मानसिकता के चलते विश्वविद्यालयों में भी महिलाएं अपने साथ होने वाली छेड़छाड़ की घटनाओं की शिकायत कम करा पाती हैं या फिर नहीं ही करा पाती हैं. ये सदस्यजाने-अनजाने यौनिक हिंसा को सरेआम बढ़ावा देते रहते हैं.
अपने चार-साढ़े चार साल के यूनिवर्सिटी प्रवासों के दौरान मुझे दो-चार बार ही ऐसे पीड़ितों से मिलने का मौका मिल पाया जिन्होंने अपने खिलाफ हुईयौनिक हिंसा के मामलों के बारे में न्याय की आशा लिए शिकायत दर्ज़ करवाई हो. जबकिविश्वविद्यालय की लड़कियों/महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के कई-कई मामलेआमतौर पर सुनने और देखने को मिल जाते हैं. हिंदी यूनिवर्सिटी,वर्धा के समाजकार्य विभाग के2011-13 की एक छात्रा को यौन उत्पीड़न के लगभग तीन-चार महीने तक चलते रहे विचारार्थ मामले में, विश्वविद्यालय एंटी रैगिंग सेल के सद्स्यों के रवैये से उपजी मानसिक परेशानी ने उसे इतनानिराश किया गया कि उसने अपने आगे की पढ़ाई किसी और जगह करने का निश्चय किया.मामले पर बातचीत के दौरान उसनेकई बार कहा था किभविष्य में इस तरह की किसी मामले में न्याय पाने के लिए उसे सोचना पड़ सकता है और हो सकता है कि वो ऐसे मामलों को चुपचाप सह जाए. उसकी निराशा और बातों ने कुछ देर के लिए मुझे भी ऐसी सेल्स/ कमेटियों के प्रति निराश कर दिया था.
मेरी उस निराशा को 22 सितम्बर (2013) रात लगभग 10:00-11:45 बजे तक चलेलगभग दो सौ छात्र-छात्राओं के जुलुस को संबोधित करती दो लड़कियों नेउम्मीद और उर्जा में बदल दिया था. ये लड़कियां पॉन्डिचेरी यूनीवर्सिटी के एम.ए. प्रोग्राम की नई आगंतुक थीं और इस जुलुस की वजह कैम्पस में एंटी सेक्सुअल हरैस्मेंट और जेन्डर समानता की अपील थी.विश्वविद्यालय में सेस्क्सुअल हरैस्मेंट की शिकार ये दोनों भी हो गईं थीं.फिज़िकल एजुकेशन विभाग के के.एस. श्रीजित जीतूने इन लड़कियों की रैगिंग ली, अपशब्द कहे और अपने खिलाफ कोई भी शिकायत करने पर रेप करने की धमकी दी. लेकिन लड़कियां साहसी निकलीं और उन्होंनेअपने दोस्तों के साथ मिलकर यूनिवर्सिटी प्राशसन में रैगिंग की शिकायत दर्ज कराई.इससे बौखलाए जीतू ने अपने दोस्तों के साथ पीडित लड़कियों के समर्थक मित्रों के साथ पारपीट की जिसमें मासकॉम डिपार्टमेंट का एक छात्र गंभीर घायल हुआ. प्रशासन की ढ़ीली कार्यवाही और रवैया देखकर लड़कियों ने पारपीट की प्राथमिकी पास के थाने में दर्ज कराई और अपने साथ हुए इस घटनाक्रम की खबर मीडिया को भी दी. जिसे‘द हिंदू’ और ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ ने छापा (देखें 24 सितं. का ‘द हिंदू’).
मामले पर तत्काल कोई कार्यवाही न होने,प्रशासन के ढुलमुल रवैये,इस तरह के मामलों के दोहराब से बचने और अपराधी कीसज़ा सुनिश्चित करने के नज़रिए से लड़कियों और उसके मित्रों ने रात को कैम्पस रैली का आह्वान किया. रैली में लड़कियों के उत्पीड़न का मामला मुख्य था पर रैली में शामिल लड़कियों ने प्रशासन की ओर से हो रहे जेंडर्ड व्यवहार को भी उठाया. ये वो लड़कियां थीं जो खुद भी इसतरह के घटनाक्रम झेल रही थीं,विश्वविद्यालय के जेंडर्ड रवैये से असंतुष्ट थीं,और बोलने का साहस कर रहीं थीं. जुलुस में ‘डाउन विथ द सेक्सुअल हरैस्मेंट’,‘डाउन विथ द गुंडा राज’,‘मॉरल पुलिसिंग डाउन-डाउन’ और ‘वी वांट जस्टिस’ के नारे लगे.यौनिक हिंसा के खिलाफ रैली में शामिल इन स्टुडेंट्स के प्रतिरोध को विश्वविद्यालय के बाहर की दुनिया में भी दर्ज करने के लिए मीडिया भी बुलाई गई. इस रैली की उर्जा देखकर दोनों पीड़ित लड़कियां बेहद खुश दिख रही थीं, उन्हें लग रहा था कि उनके साथ-साथ और दूसरी तमाम लड़कियों के साथ होने वाले उत्पीड़न में कमी आएगी. उस रात हो सकता है वो और जुलुस में शामिल हुए सब लोग शायद रोज़ से ज्यादा जागेहों न्याय की उम्मीदमें इतने लोगों के शामिल होने की खुशी में.
लेकिन एक महिने बाद जब इस मामले को देख रही कमेटी का 1 नवम्बर को फैसला आया तो उसने,उस रात जुलुस में शामिल लोगों की न्याय में उम्मीदऔर विश्वास को ध्वस्त कर डाला. फैसले में यौनिक हिंसा के अपराधी सहित 7 लोगों को एक सेमेस्टर के लिए ससपेंड किया गया है. बाकी के 6लोगों में दोनों उत्पीड़ित लड़कियां और उनके समर्थकशामिल हैं. फैसले में कहा गया है कि, “यह घटनाक्रम छात्रों के दो ग्रुप्स के बीच की लड़ाई थी जिसमें दोनों ग्रुपने एक-दूसरे पर गाली-गलौज किया. शिकायत करने वाली लड़कियों और उसके मित्रों ने विश्वविद्यालय की अनुमति के बिना, बाहरी चैनल्स और एजेंसीज़ के जरिए न्यायिक भरपाई करने की कोशिश करने से पहले,विश्वविद्यालय में उपलब्ध उपचार/न्यायिक व्यवस्था का पूरी तरह उपयोग नहीं किया”.
पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पीड़ित लड़कियों और उनके मित्रों के ससपेंड करने के कारण,पिछले30 सितंबर को गठित की गई ‘डिसिप्लिनैरी कमेटी’की रिपोर्ट को बनाया है.ये एक नए किस्मका प्रशासनिक तर्क है;मुखर और किसी भी उपीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले विद्यार्थियोंके साहस और उर्जा को खत्म करने का.कायदे से इस मामले पर कार्यवाही ‘सेक्सुअल हरैस्मेंट कमेटी’ में होनी चाहिए थी, जैसा कि अपराधी जीतू ने लड़कियों को बलात्कार की धमकी भी थी,पर यूनिवर्सिटी प्रशासन में इसको सिर्फ रैगिंग का मुद्दा बनाकर देखा और विचार किया गया.और इसी का परिणाम यह फैसला है.
इस फैसले पर असंतुष्टि और विरोध दर्ज कराते हुए ‘ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस असोसिएशन’की तरफ से सेक्रेट्ररी सुधा सुंदररमन ने भी यह कहा है और दोनो पीड़ित लड़कियों सहित दूसरे पांच छात्रों का सपेंशन तुरंत रद्द करने की मांग की है. उन्होंनेयहभी कहा कि,“ऐसे फैसले कानूनके खिलाफ होते हैं जहाँ यौनिक हिंसा की शिकायत करने वाले को ही पीड़ित किया जाता हो”. ‘ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस असोसिएशन’ के साथ ही ‘स्टूडेंट्सफेडरेशन ऑफ इंडिया’,‘डेमोक्रेटिक्स यूथ फेडरेशनऑफ इंडिया’,‘ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन’ ने यूनिवर्सिटी के इस फैसले के खिलाफ अपना अपना विरोध दर्जकराया है.
यह मामला सीधे तौर पर यौनिक हिंसा का है लेकिन अगर यह रैगिंग मान भी लिया जाए तो भी लिया गया फैसला छात्रों के हक़ में नहीं आता. एस.एफ.आई. पॉन्डिचेरी के सेक्रेट्ररी ने भी इस फैसले से होने वाले आगामी परिणामों के बारे में चिंता जताई कि,“यह जानना बहुत दु:खद है कि रैगिंग की शिकायत के बाद फ्रैशर्स के लिए सुरक्षा का वातावरण बनाने की बजाय यूनिवर्सिटी ने दो रैगिंग के पीड़ितों और उनके समर्थकों को ही ससपेंड कर दिया. यह निर्णय आगे भविष्य में छात्र-छात्राओं को रैगिंग के खिलाफ शिकायत करने से रोकेगा”.
आमतौर पर यौनिक उत्पीड़न करनेवाले अपराधी को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर देनेसे लेकर आजीवन किसी भी शैक्षणिक संस्थान में एडमिशन न देने का प्रावधान होता है.लेकिन पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी के इस फैसले में घोर पितृसत्तत्मक और तानाशाही विचार झलकते हैं; जहाँ यौनिक हिंसा पीड़ित पक्षको ही दोषी और अन्याय के खिलाफ अवाज बुलंद करने वालों को अपराधी माना जाता है.पीड़ित पक्ष के समर्थकों को यूनिवर्सिटी प्रशासन की अनुमति लिए बगैर मिडिया और पुलिस को इंवॉल्व करने की बिनाह पर सस्पेंड करना एक तरह का न्याय पाने की संवैधानिक आज़ादी को ताक पर देना है,क्योंकि न ही संविधान और न ही यू.जी.सी. का ऐसा कोई नियमनहीं हैं कि किसी यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेने के बाद किसी भी मामले में न्याय पाने के लिए छात्र-छात्राएं पुलिस,कोर्ट या दूसरेवैकल्पिक संस्थाओं की ओर रुख नहीं कर सकते हैं.
यूनिवर्सिटी फैसलेमें यह बात भी कही गई है कि बाकी पांच छात्रों के ससपेंशन का कारण कैम्पस में बिना अनुमति ‘एंटी रैगिंग प्रोटेस्ट मार्च’ऑर्गैनाईज़ किया जाना भी है.हालांकि यह मार्च एक पीसफुल और विरोध दर्ज कराने के लिए किया गया मार्च था, जिसकी आजादी भारतीय संविधान अपने नागरिकों को देता है.मार्च के कारण यूनिवर्सिटी में किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ फिर भी इसको फैसले का आधार बनाया गया. ये आधार बनाया जाना दरअसलएक उदाहरण बनाता है कि आगे कोई भी यूनिवर्सिटी प्रशासन से असंतुष्ट होकर उससे इतर दूसरे संस्थाओं में न्याय पाने जाता है तो उसके साथ भी यह हो सकता है, औरउसे नहीं जाना चाहिए.
इस फैसले के कारण आजकल यूनिवर्सिटी में अजीब सी दबीबातचीत होती रहती है इस मामले पर, फैसले के तर्कों और असंतुष्टी पर, लेकिन कैम्पस के अंदर कोई स्पष्ट कुछ नहीं कहता.शायद यही इस फैसले का अंतर्निहित उद्देशय था कि आगे से हर कोई अपने विचारों, असहमतियों और असंतुष्टियों को मन में ही कहीं दबा कर रख ले.
एक साथ 6-7 लोगोंको ससपेंड कर देने वालेऐसे फैसले एक दूरगामी परिणाम को ध्यान में रखकरलिए जाते हैं ताकि विश्वविद्यालयप्रशासन और छात्र-छात्राओं की मुखर असहमतियों को डर भरी चुप्पियों में बदल दिया जाए, ताकि दोनों के द्वंद और संघर्ष को धीरे-धीरे शांत कर दिया जाए.

लेकिन जैसा होता आया है कि इंसाफ पसंद लोगों ने साहस और उम्मीद का दामन अभी भी पकड़े रखा है. सेक्सुअल उत्पीड़न करनेवाले अपराधीछात्र के अलावा शेष छात्रों के ससपेंशन को तत्काल रद्द करने की मांग को लेकर छात्र-छात्राएं यूनिवर्सिटी गेट के सामने 5 सितम्बर से अनिश्चित भूख अनशन पर बैठे है और उनका साथ देने देश के विभिन्न छात्र संगठन, वीमेंस असोशिएशन, लॉयर्स असोशिएशन से जुड़े लोग आ रहे हैं.अनशन पर बैठे छात्रों के संघर्ष के जज़्बे परास्त न होने और मांगे पूरी होने की कामनामें कई सुर और जुड़ रहे हैं.

02 नवंबर 2013

जनसंहार की राजनीति और प्रतिरोध

सुष्मिता

सोन नदी की निष्ठुरता में अब भी कोई कमी नहीं आई हैं। मध्य बिहार में इसके दोनों किनारों पर गरीबों का इतना खून बहाया गया कि इसका पानी खून से लाल हो गया। लेकिन तब भी यह ऐसे बहती रही जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह सोन का निर्विकार भाव से बहना नहीं था बल्कि यह उसकी सामंतों के प्रति पक्षधरता ही थी कि उसने अपने पानी से सामंतों के खेतों को सींचकर उन्हें ताकतवर बनाया। सैकड़ो महिलाओं, नौजवानों और बच्चों के खून तथा इनके परिवार वालों के विलाप ने इसके प्रवाह पर कोई प्रभाव नहीं डाला। ठीक वैसे ही जैसे देश के मध्य वर्ग को इन गरीबों की हत्या, बलात्कार और इनके विलाप से कोई परेशानी नहीं होती। बल्कि यह वर्ग तो मानता है कि देश की सुरक्षा के लिए सरकारी एजेंसियां अच्छा काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के रिहंद इलाके से निकलकर घोर सामंती प्रभुत्व वाले इलाकों से गुजरने वाली यह नदी सैकड़ों हत्याओं की गवाह बनती आयी है।
उसी सोन नदी के एक छोर पर बसा गांव बाथे 1997 में अचानक दुनिया के नक्शे पर आ गया। इसी तरह इस गांव से महज 15-20 किलोमीटर की दूरी पर बसा अरवल भी 1986 में दुनिया के नक्शे पर आ गया था। 1 दिसंबर, 1997 को सहार की तरफ से आए रणवीर सेना के हत्यारों ने इस बाथे में मजदूर किसान संग्रामी परिषद् (माओवादियों का करीबी माना जाने वाला संगठन, नामक किसानों के संगठन के 56 समर्थकों और कार्यकर्ताओं और भाकपा (माले, लिबरेषन के 3  समर्थकों की गोली मारकर बर्बरता पूर्वक हत्या कर दी थी। मारे गए तमाम लोग दलित समुदाय के थे। अभी 9 अक्टूबर 2013 को इस हत्याकांड के तमाम आरोपियों के बरी हो जाने की वजह से फिर बाथे चर्चा में है। इस मामले में निचली अदालत ने 16 आरोपियों को फांसी दी थी जबकि 10 को आजीवन कारावास की सजा दी थी। उच्च न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य के अभाव की बात कहते हुए तमाम लोगों को बरी कर दिया। इस पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जा रही हैं। संसदीय पार्टियां इस पूरी परिघटना को जहां चुनावी नजरिए से देख रही हैं, वहीं कम्युनिस्ट नामधारी कुछ पार्टियां निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। लेकिन यहां यह समझने की जरूरत है कि क्या यह महज निचली अदालत और ऊपरी अदालत के फैसले में विरोध का मामला है; कुछ लोग इन नरसंहारों को दलितवादी नजरिए से देखते हुए इसके पीछे काम कर रहे शासक वर्गीय तंत्र को ओझल कर देते हैं। ऐसे में जनसंहार और प्रतिरोध की पूरी राजनीति को समझने के लिए इन जनसंहारों को पुरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा।

जनसंहार की राजनीतिः
बिहार में 1976 से लेकर 2001 तक लगभग 700 दलितों और पिछड़ों की ऊंची जातियों की सेना और पुलिस द्वारा हत्या की गयी है। अगर इन जनसंहारों की राजनीति को समझना है तो इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। शासक वर्गों की मदद से सामंतों द्वारा कराए गए जनसंहार एक खास दौर में सामने आए हैं, और यह दौर मुख्य रूप से 70 से लेकर 90 के दशक तक है। यहां यह सवाल बनता है कि यह सामंतों का महज दलितों पर हमला था तब ये नरसंहार 70 के दशक से पहले क्यों नहीं किए गए। उस समय तो सामंतों द्वारा दलितों पर हमला करना बेहद सुविधाजनक था। यहां मूल बात यह है कि 1970 के दशक में देश में उभरी  राजनीति ने देश के सामने नए सवाल सामने रखे। इस राजनीति ने जनता के समक्ष यह साबित करने की कोशिश की कि सामंती उत्पीड़न जमीन और इज्जत के सवाल शासक वर्गों के खिलाफ लड़ाई से ही हल किए जा सकते हैं न कि सरकारी कानूनी दायरे में। इस संघर्ष ने व्यापक उत्पीड़ित जनता को हौसला दिया और इन तमाम सवालों को संविधान के दायरे से बाहर संघर्ष के मैदान में हल करने के लिए संघर्ष शुरू हो गया। इस संघर्ष को आतंकित और नेस्तनाबूद करने के लिए शासक वर्गों ने जनसंहार का सहारा लिया। इस तरह ये जनसंहार सामंती उत्पीड़न, जमीन और इज्जत जो कि सीधे राजसत्ता के साथ जुड़े हुए थे, के लिए संघर्ष के दौर की उपज थे। शासक वर्ग की प्रतिक्रिया जाहिर तौर पर पुराने तंत्र को बचाए रखने के लिए ही थी।
अब यहां प्रश्न यह बनता है कि आखिर उन मुद्दों का क्या हुआ, जिनकी वजह से इतने लोगों ने अपनी शहादतें दीं। आज इन जनसंहारों और फैसलों पर अपनी राजनीति चमकाने वालों की तो भरमार है लेकिन तमाम लोग उन सवालों से बचने की कोषिष कर रहे हैं। जाहिर तौर पर शासक वर्गों का उत्पीड़ित जनता पर ये हमले जनता के राजनीतिक सवालों को सैनिक हमलों के जरिए कुचल देने की साजिषों का ही एक हिस्सा थे। इसे दलितवाद और महज न्यायिक ढोंग के चश्मे से देखना अंततः इस पूरे संघर्ष को नकारने की तरह ही होगा। अरवल जनसंहार पूरे देश में अपने तरह का बर्बर जनसंहार था जिसे मिनी जलियांवाला बाग कहा गया था। इसमें एक शांतिपूर्ण सभा को घेरकर पुलिस ने 25 लोगों की हत्या कर दी थी और इसमें 60 लोग घायल हो गए थे। आज इसपर कोई बात नहीं करना चाहता क्योंकि यह उनके संसदीय राजनीतिक हितों के अनुकूल नहीं है। दरअसल इन तमाम निजी सेनाओं और जनसंहारों को जनता के प्रतिरोध और शासक वर्गों की प्रतिक्रिया के रूप में ही देखना ज्यादा माकूल है।
जनसंघर्ष और शासक वर्गः
1970 के दशक में जब जौहर के नेतृत्व में भोजपुर में किसानों का व्यापक संघर्ष शुरू हुआ तब से ही शासक वर्गों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आने लगी। कहा जाता है कि सहार के बेरथ, बाघी और एकबारी में 1974 में ऊंची जातियों के जमींदारों द्वारा स्थापित प्रशिक्षण केंद्रों को आरएसएस ने मदद की। इसके अलावा 28 मई, 1975 को तत्कालीन पुलिस उप-महानिरीक्षक (नक्सल)  शिवाजी प्रसाद सिंह ने एलान किया कि बिहार सरकार ने भोजपुर और पटना जिले के सभी स्वस्थ पुरुषों को हथियारों से लैस करने का फैसला किया है, ताकि वे नक्सलवादियों के खिलाफ अपनी रक्षा कर सकें। इसके एक सप्ताह पहले ही पूर्व-मध्य क्षेत्र के पुलिस उप-महानिरीक्षक ने आदेश दिया था कि भोजपुर, नालंदा, रोहतास और गया जिले के तमाम गैर लाइसेंसशुदा हथियारों को जब्त कर लिया जाए, क्योंकि नक्सलवादी जमींदारों के हथियार छीनने में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा 1975 के उत्तरार्ध आते-आते बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने बिना किसी प्रचार के भोजपुर की या़त्रा की और जमींदारों तथा उनके बेटों के लिए स्थापित फायरिंग एंड शूटिंग सेंटर का उद्घाटन किया। इस दौरान तमाम नियमों को ताक पर रखते हुए ऊंची जातियों के लोगों को भारी मात्रा में हथियार के लाइसेंस जारी किए गए। 28 मई, 1975 को ही नक्सलवादी मामलों से संबद्ध पुलिस उप-महानिरीक्षक (नक्सल) षिवाजी प्रसाद सिंह द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि भोजपुर और पटना जिले के जिलाधीशों से कहा गया है कि वे उग्रवादियों के प्रभाव वाले गांवों का दौरा करें और मौके पर ही उन लोगों को हथियार के लाइसेंस जारी कर दें जिनके अंदर इन हथियारों को चलाने की क्षमता है’। इस तरह 1970 के दषक में संघर्ष के शुरू होते ही शासक वर्ग ने एक संगठित प्रतिक्रिया व्यक्त की और सामंतों को हथियारबंद किया। 6 मई, 1973 को ही भोजपुर के चवरी में पुलिस ने अर्धसैनिक बलों की मदद से एक हत्याकांड रचा था। इसमें 4 किसान मारे गए थे। इसकी जांच के लिए एक आयोग भी बना, जिसने 1976 में अपनी रिपोर्ट जारी की और इसे मुठभेड़ बताकर पुलिस को निर्दोष साबित कर दिया। शासक वर्ग की इतनी तीखी प्रक्रिया के बावजूद संघर्ष तेज होता ही गया और 1980 का दषक संघर्षों के उफान का दषक साबित हुआ। तत्कालीन गया जिले के जहानाबाद में संघर्षों का व्यापक उभार देखा गया। सामंती उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाकू संघर्ष संगठित किए गए। गैर मजरुआ जमीन पर कब्जे का अभियान शुरू हो गया। जैसे ही संघर्ष शुरू हुआ शासक वर्ग ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। संघर्ष की तीव्रता को देखते हुए शासक वर्ग ने तीखा दमन अभियान चलाया।
जहानाबाद के इलाके में 1985 की शुरुआत में ही ’ऑपरेषन ब्लैक पैंथर’ नामक एक बर्बर अभियान चलाया गया था। इसके लिए राज्य स्तर पर एक टास्कफोर्स गठित किया गया था। दिसंबर 1985 तक ’ऑपरेशन ब्लैक पैंथर’ का पहला दौर समाप्त हुआ। इसके संचालन के लिए गठित टास्क फार्स की बैठक मार्च, 1986 में की गई। इसमें शामिल केंद्रीय गृह मंत्री अरुण नेहरू (तत्कालीन गृहमंत्री) और महेंद्र सिंह (निजी सेनाओं का संरक्षक और कांग्रेस एमपी) समेत सरकारी अधिकारी शामिल थे। इसने तुरंत ही दूसरे दौर के दमन अभियान की शुरुआत की घोषणा की। बिहार सरकार के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि नक्सलवादियों को तुरंत ही नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। इस तरह उत्पीड़ित जनता के ऊपर दमन का सरकारी फैसला असल में सामंती ताकतों से सलाह मशविरे के साथ ही हो रहा था। अप्रैल, 1986 में सरकारी बलों को सुसज्जित करने और कमांडो तैनात करने की घोषणा की गई। जहानाबाद का संघर्ष इन तमाम सरकारी साजिशों के बावजूद तेज होता गया। ईपीडब्ल्यू में अपनी रिपोर्ट में नीलांजना दत्ता लिखती है कि ’1986 की शुरुआत तक इस क्षेत्र में मजदूरों-किसानों के संगठन मजदूर किसान संग्राम समिति ने कुर्मी जमींदारों की निजी सेना भूमि सेना को परास्त कर दिया था। इसने पूरे बिहार के समक्ष प्रतिरोध का उदाहरण प्रस्तुत किया था। अब सामंतों में आतंक था और इस तरह राजसत्ता ने दमन के नए तरीकों पर काम करना शुरू कर दिया’। भूमिसेना के खात्मे के बाद ही ब्रह्मर्षि सेना और लोरिक सेना को संगठित किया गया। लेकिन जनता के संघर्ष के बल पर तमाम निजी सेनाएं धराशायी हो गयीं। नीलांजना दत्ता की रिर्पोट के अनुसार ’तत्कालीन मजदूर किसान संग्राम समिति ने 5 मार्च से 3 अप्रैल तक निजी सेनाओं और पुलिस के हमले के बावजूद बड़े पैमाने पर जन गोलबंदी की। यह सेनाओं को डराने के लिए पर्याप्त था और अब सीधे सत्ता उनकी मदद में आयी। पूरे तंत्र को दमन के अनुरूप बनाया गया। तत्कालिन एसडीओ, ब्यास जी ने इन सेनाओं की मदद करने से इन्कार किया तो उनका तबादला कर दिया गया। एक नए पदस्थापित पुलिस अधिकारी वीर नायायण को भी निजी सेना से सहयोग नहीं करने की वजह से बदल दिया गया। इसके बाद तुरंत जहानाबाद को पुलिस जिला घोषित कर दिया गया। 16 अप्रैल, 1986 को जहानाबाद में बीएमपी के पूर्व कमांडेंट सीआर कासवान, जो भूमिहार जाति का था को एसपी स्तर के अधिकारी के बतौर पदस्थापित किया गया। इसके बाद 19 अप्रैल, 1986 को तत्कालीन पार्टी युनिटी के करीबी माने जाने वाले मजदूर किसान संग्राम समिति की खुली सभा को घेरकर सीआर कासवान के निर्देशन में अरवल में गोलियां चलायीं। दरअसल यह जनता को आतंकित करने के लिए सरकार के निर्देशन में रचा गया हत्याकांड था। एक रिपोर्ट बताती है, ‘‘कई लोगों को संदेह है कि यह एक उच्च स्तर की सरकारी साजिश थी। एसपी (सीआईडी) एससी झा ने इस घटना के जांचोपरांत पुलिस के डीजी और गृह सचिव को 5 मई को एक चिट्ठी लिखी। उन्होंने आरोप लगाया कि रामाश्रय प्रसाद सिंह (बिहार के मंत्री), महेंद्र प्रसाद (सांसद, राज्य सभा), जगदीष शर्मा और रामजतन सिन्हा (दोनों कांग्रेस के विधायक) और सीपीआई के एक अन्य विधायक आरपी सिंह पटना-गया-जहानाबाद के इलाके में अपने राजनीतिक हितों के लिए जातीय तनाव और हिंसा प्रोत्साहित कर रहे है।’’ इसके बाद तुरंत इस अधिकारी का तबादला कर दिया गया और 26 मई को सरकार द्वारा उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके बाद सरकारी आदेश पर एक कनीय अधिकारी को उनकी जगह दे दी गई। इतना ही नहीं जब अरवल के तत्कालिन डीएम ने अरवल हत्याकांड की न्यायिक जांच हेतु मुख्यमंत्री को लिखा तो डीएम को अरवल के स्थिति की रिपोर्ट भेजने से रोक दिया गया। ये तमाम तथ्य इन जनसंहारों के पीछे की साजिष और शासक वर्ग द्वारा प्रोत्साहन को स्पष्ट करते हैं।
आनंद चक्रवती इस पूरी परिघटना की व्याख्या इन शब्दों में करते है, ‘दरअसल ये तमाम सामंती निजी गिरोह राजसत्ता के ही मजबूत औजार थे। शासक वर्ग और राज्य के बीच अलगाव बर्जुआ तंत्र का चरित्र है और बिहार में यह हासिल होने से काफी दूर है। यहां जमींदार न केवल शासक वर्ग हैं बल्कि अपने आदेशों को मनवाने के लिए राज्य मशीनरी पर काबिज हैं। वे राज्य का हिस्सा हैं या फिर उसका विस्तार हैं। बिहार में राज्य मशीनरी में न केवल आधिकारिक तंत्र शामिल है, बल्कि जमींदारों और उनके हथियारबंद गिरोहों के गैर आधिकारिक औजार है‘। इस तरह तमाम तथ्यों को ध्यान में रखा जाए तो इन तमाम जनसंहारों को जनता के संघर्षों को कुचलने के लिए शासक वर्गों ने अपनेे मुखौटे संगठनों के जरिए अंजाम दिया।

निजी सेनाओं के खिलाफ प्रतिरोध
           
भोजपुर और जहानाबाद में कई निजी सेनाएं बनीं। खासकर जहानाबाद-पटना के इलाके में तो एक के बाद एक निजी सेनाओं की बाढ़ सी आ गयी। जहां भी निजी सेनाएं बनी हों उन्होंने जहानाबाद को ही अपना आतंक का क्षेत्र बनाया। भूमि सेना बनी तो पुनपुन में लेकिन उसने जहानाबाद में भारी आतंक मचाया हालांकि जहानाबाद भूमि सेना के लिए कब्रगाह भी साबित हुआ। अगस्त, 1994 में रणवीर सेना का गठन भोजपुर में किया गया लेकिन वहां से चारा-पानी लेकर इसने लगभग 3 साल के भीतर ही सोन पार करके जहानाबाद के इलाके में आतंक मचाना शुरू कर दिया। दरअसल निजी सेनाओं के गठन और उसके मजबूत बनने की पूरी प्रकिया को ऐतिहासिक संदर्भ में समझना जरूरी है। निजी सेनाएं बनती हैं हमेशा जातीय आधार पर लेकिन प्रतिरोध की ताकतें इन सेनाओं में अपने संघर्ष के दौर में उसका वर्गीय स्तर पर विभाजन कर उसे कमजोर करती हैं और फिर उसे प्रतिरोध के बूते नष्ट करती है। रणवीर सेना ने भोजपुर में आधार बनाते हुए मध्य बिहार के इलाकों में अपने हमले तेज किए। यहां लिबरेशन ने रणवीर सेना के खिलाफ मजबूत प्रतिरोध खड़ा करने के बजाए अपने संसदीय हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियां तय कीं। इसने अपने लड़ाकू आधार को अपने संसदीय राजनीति के अनुरूप वोट बैंक के रूप में ढाल लिया था।
            जहानाबाद में लड़ाकू जनसंघर्षों और प्रतिरोध की बदौलत 1985 के अंत तक भूमि सेना का खात्मा हो गया। ऐसे में शासक वर्गों ने सीधे हमले की योजना बनायी और इसे अरवल में अंजाम दिया। अरवल जनसंहार ने सामंतवाद विरोधी संघर्षों में नए आयाम विकसित कर दिए। अब संघर्ष के अनुभवों ने यह साफ कर दिया था कि सामंतवाद विरोधी संघर्ष को एक मुकाम पर पहुंचाने के लिए संघर्ष का विस्तार राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष तक करना होगा। इस तरह जहानाबाद जिले में शुरु हुए आंदोलन ने न्याय और मुक्ति की आकांक्षाओं को सामंतवाद विरोधी संघर्षों के जरिए राजसत्ता के खिलाफ लड़ाई तक विकसित किया।
            अब बिहार में लड़ाई के दो मॉडल सामने थे। भोजपुर में कार्यरत लिबरेशन ने जहां समझौते के मॉडल को सामने रखा वहीं जहानाबाद में संघर्षरत पार्टी युनिटी ने संघर्ष का विस्तार राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष तक किया। ये दोनों मॉडल आज भी अपने-अपने तरीके से कार्यरत हैं। भोजपुर में रणवीर सेना ने जब तीखा हमला शुरू किया तब लिबरेशन ने तीखे हमले के प्रतिरोध के बजाए समझौते का रास्ता आख्तियार किया। बथानी टोला जनसंहार के बाद जारी केंद्रीय कमिटी के पर्चे में लिबरेशन का कहना है, ‘हम हमेशा शांति के पक्ष में रहे हैं। शांति पसंद लोगों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए हमने शांति के पहल की शुरुआत की। बिहटा में किसान महासभा द्वारा आयोजित स्वामी सहजानंद सरस्वती के जन्मदिन के अवसर पर हमने शांति वार्ता शुरू की। श्रीमती तारकेश्वरी सिन्हा और श्री ललितेश्वर शाही सहित भूमिहार जाति के कुछ आदरणीय महानुभावों नें इसमें हिस्सा लिया। हमारी तरफ से केंद्रीय कमिटी सदस्य और पूर्व राज्य सचिव कॉ. पवन शर्मा उपस्थित थे। वार्ता काफी सकारात्मक रही। इसके दो दिन बाद पार्टी के महासचिव ने आरा में संवाददाता सम्मेलन में शांति के लिए एक अपील जारी किया। इस अपील को अखबारों ने काफी महत्व भी दिया। तमाम शांति पसंद लोगों ने इसका स्वागत किया। हमें रणवीर सेना की तरफ से सकारात्मक जवाब की आशा थी। इसके बाद हमने एक मित्र के जरिए, जो मध्यस्थता कर रहा था, रणवीर सेना को एक संदेश भेजा कि रणवीर सेना भी ऐसा ही करे। रणवीर सेना की प्रतिकिया काफी निराशाजनक थी। इस तरह शांति की हमारी कोशिशें विफल हो गयी थीं। हमारी आशा थी कि प्रशासन भी हमारी मदद करेगा। हमने जून, 1996 में दर्जनों जन बैठकों के जरिए शांति अभियान की शुरुआत की। जल्दी ही पांच गांवों में रणवीर सेना और हमारे संगठनों के लोगों के बीच अंतर्विरोधों को सुलझा लिया गया।’ इस तरह लिबरेशन की रणवीर सेना के साथ समझौतों की कोशिशों ने रणवीर सेना को प्रोत्साहित किया और फिर सोन के इस तरफ जहानाबाद में रणवीर सेना ने अपनी कार्रवाइयां शुरु कीं।
            निजी सेनाओं और सामंती उत्पीड़न से मुक्ति तथा न्याय का सवाल सीधे तौर पर सामंती उत्पीड़न और इन निजी सेनाओं के चरित्र से जुड़ा हुआ है। यहां तमाम तथ्य दिखाते हैं कि ये तमाम निजी सेनाएं शासक वर्गों द्वारा शोषित-उत्पीड़ित जनता के संघर्ष को कुचलने के लिए दमन का एक मुखौटा मात्र था। जब इन मुखौटों से भी शासक वर्ग सामंतों की रक्षा में विफल होने लगा तब उसने सीधे जनता पर हमला शुरू किया। इस तरह शासक वर्गों के एक औजार के रूप में इन निजी सेनाओं को समझे बगैर इसके खिलाफ प्रतिरोध का सवाल महज दिवास्वप्न पर ही खत्म होगा। आज शासक वर्ग सामंतवाद विरोधी संघर्षों को कुचलने के लिए और ज्यादा बर्बर और दमनकारी रुख अपना रहा है। अब निजी सेनाओं की जगह खुफिया गिरोहों और ग्रामीण स्तर पर एसपीओ ने ले ली है। ऐसे में वर्तमान दौर में जनता के न्याय, पहचान और मुक्ति का संघर्ष सीधे तौर पर राजसत्ता विरोधी संघर्षों से सीधे तौर पर जुड़ गया है।

जनसंहार और न्याय
बाथे जनसंहार के आरोपियों के बरी होने के बाद शासक वर्ग द्वारा न्याय के संहार पर बहस काफी तेज है। शायद विगत में भोजपुर में इसके पहले यही बहस बथानी नरसंहार के आरोपियों के बारे में भी हो रही थी। हाइकोर्ट हमें यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि इस हत्याकांड के आरोपियों के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे। कुछ लोग हमें समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि निचली अदालत ने तो ठीक ही फैसला दिया था सारा दोष हाईकोर्ट का है। हर कोई अपनी सुविधा के अनुसार अपने तर्क बना रहा है। इस फैसले के जरिए न्यायालय  अपने वर्गीय चरित्र को ही और ज्यादा स्पष्ट कर रही है। यदि हत्याकांड के आरोपी हत्या में शामिल नहीं थे तब फिर हत्यारों को ढूंढ़ने का जिम्मा किसका है? जहां तक निचली अदालत के फैसले के सही ठहराए जाने का मामला है तो यह प्रचारित करने वाले लोग भी इस साजिश में बराबर के हिस्सेदार हैं। बाथे हत्याकांड के बारे में पूरी तरह साफ है कि इसकी योजना भोजपुर में बनायी गयी थी। उस समय तक रणवीर सेना जहानाबाद में इस स्तर के हमले के लिए जरूरी आधार नहीं बना पाया था। बल्कि यह जनसंहार रणवीर सेना के जहानाबाद तक के विस्तार की ही कोशिश थी। इस हत्याकांड का संचालन करने वाले रणवीर सेना के मुख्य सरगना भी भोजपुर के ही थे। बाथे के कानूनी मामलों के जानकारों का कहना है कि इस हत्याकांड में 19 आरोपी भोजपुर से थे। इन तमाम आरोपियों के खिलाफ निचली अदालत में गवाहियां बदलवायी गयीं और इस तरह निचली अदालत ने भोजपुर के रणवीर सेना से जुड़े तमाम सरगनाओं को बरी कर दिया। यह संयोग नहीं हो सकता कि भोजपुर के तमाम सरगना रिहा हो जायें। शायद यह विगत दिनों में भोजपुर में किए गए समझौते का कर्ज चुकता किया गया था। इसीलिए निचली अदालत के फैसले को इतना न्यायोचित ठहराया जा रहा है।
निचली अदालत या फिर उच्च न्यायालय द्वारा आरोपियों का बरी किया जाना कोई आष्चर्यजनक और नयी बात नहीं हैं। अरवल जनसंहार के आरोपियों का क्या हुआ? तमाम नरसंहार के आरोपी ऐसे ही बरी किए गए क्योंकि ये तमाम घटनायें तो शासक वर्गों के आतंक का ही विस्तार थीं। लेकिन जो सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है वो यह है कि क्या बथानी या फिर बाथे के आरोपियों को सजा मिल जाने भर से इन जनसंहार में मारे गए लोगों के साथ न्याय हो जाएगा? क्या 1976 से लेकर 2001 तक मारे गए 700 लोगों के साथ न्याय महज हत्यारों को सजा मिलने भर से हो जाएगा? सबके न्याय के अपने-अपने पैमाने हैं। हर कोई न्याय को अपनी सुविधा के अनुसार विश्लेषित करता है। लेकिन मेहनतकश उत्पीड़ित जनता के लिए न्याय का सपना उनके जीवन के सवालों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी बन जाता है कि आखिर उन मुद्दों और सवालों का क्या हुआ जिसके लिए उन्हें सामंतों या फिर पुलिस के हाथों अपनी जान गंवानी पड़ी? आखिर उस संघर्ष का क्या हुआ जिसके लिए हजारों लोगों ने अपनी कुर्बानियां दीं?
ऐतिहासिक रूप से यह साफ है कि ये जनसंहार इसलिए रचे गए क्योंकि गरीबों ने इज्जत, पहचान और न्याय के लिए संघर्ष के साथ खुद को जोड़ा। इसलिए इज्जत, पहचान और न्याय के लिए मुकम्मल संघर्ष ही मारे गए लोगों के साथ न्याय होगा। जनता ने संघर्ष का रास्ता इसलिए आख्तियार किया क्योंकि संविधान और न्यायालय उन्हें न्याय नहीं दे पाए। ऐसे में इस संघर्ष की वजह से मारे गए लोगों के हत्यारों को सजा भी जाहिर तौर पर न्यायालय नहीं दे सकती। इस न्याय का सवाल भी जनता के संघर्षों से ही जुड़ा हुआ है। मसला सामंती प्रभुत्व के खात्मे, इज्जत, पहचान और जीवन का है। इसे जनसंहार के आरोपियों की सजा भर तक समेट देना न केवल उन मारे गए लोगों के साथ अन्याय होगा, बल्कि धोखाधड़ी भी। कुछ लोग नरसंहार के आरोपियों की सजा के लिए एसआइटी के गठन की मांग कर रहे है। दरअसल इन घिसे-पीटे तरीकों का दौर कब का खत्म हो गया। क्या चबरी गोलीकांड के हत्यारों को आयोग के जरिए कोई सजा हुई? अरवल जनसंहार के बाद भी एक ’पीपुल्स ट्रिब्यूनल’ का गठन हुआ। इसने तमाम लोगों की गवाहियां लीं। अरवल जनसंहार के हत्यारों का क्या हुआ? उन्हें दंडित करने के बजाए प्रोत्साहित किया गया। इसके अलावा यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जनता के न्याय की आकांक्षाएं समझौतों के जरिए पूरी नहीं की जा सकतीं। रणवीर सेना के बर्बर होने के बाद भोजपुर में शांति कायम करने के नाम पर गांव-गांव में शांति समितियां गठित की गईं। किसी से छिपी हुई बात नहीं है कि किस कीमत पर भोजपुर में शांति स्थापित की गयी। इन शांति समितियों ने केवल न्यायालय में चल रहे मामलों को वापस लेने के समझौते किए। इतना ही नहीं रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह ने अपने बरी होने की घटना को सही बताते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार को यह बताया कि ‘आज जो लोग न्याय का हल्ला मचा रहे हैं उनसे क्यों नहीं पुछते कि दनवार बिहटा के (सहार का एक जमींदार) ज्वाला सिंह की हत्या में आरोपित एक पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य को कैसे रिहा कराया गया है।’ अब इन तमाम मामलों को कोर्ट से बाहर कैसे मैनेज किया गया है यह तो मैनेज कराने वाले जानें, लेकिन इतना तो तय है कि इन समझौतों से जनता की न्याय की आकांक्षाओं को कभी हासिल नहीं किया जा सकता। शासक वर्ग के जन आंदोलनों पर दमन का तर्क शुरू से ही रहा है कि इन्हें संघर्ष के बजाए सरकार के साथ मिल-बैठकर संविधान सम्मत फैसला करना चाहिए। लेकिन जनता के न्याय का सवाल इन सब भ्रमों से पहले ही पार पा चुका था, ऐसे में शांति के सरकारी तरीके इन आंदोलनों के आत्मसमर्पण के ही बराबर थे। न्याय की सारी आंकाक्षाओं का रास्ता संघर्षों के रास्ते से ही होकर गुजरता है। तमाम मारे गए लोगों के लिए न्याय का सवाल सामंती प्रभुत्व के खात्मे और इससे भी अधिक राजसत्ता के सवाल के साथ जुड़ा हुआ है। इसके बिना न्याय और मुक्ति की सारी आकांक्षाएं महज संसदीय राजनीति का एक खिलौना बनकर रह जाएंगी।
सितंबर 1996 में रणवीर सेना द्वारा बथानी जनसंहार के बाद सहार से लिबरेशन के तत्कालीन विधायक रामनरेश राम सहित इनके कई नेता बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के इस्तीफे और आरा के डीएम-एसपी के निलंबन के सवाल पर पटना में अनशन पर बैठ गए। उस समय मुख्यमंत्री ने जनता के गुस्से को शांत करने के लिए महज डीएम-एसपी का स्थानांतरण कर दिया। इसके अलावा राजस्व विभाग द्वारा एक आम जांच की घोषणा हो गयी। इसे लिबरेशन ने अपनी जीत बताते हुए बंद का आह्वान वापस ले लिया। अब बंद की जगह पटना में एक विजय जुलूस निकाला गया। इस तरह लिबरेशन ने एक वीभत्स जनसंहार के खिलाफ उभरे जनाक्रोश को एक लड़ाकू दिशा देने के बजाए प्रतिरोध के टोकनिज्म का एक नया रास्ता निकाल लिया। यदि उस समय अधिकारियों का स्थानांतरण ही लिबरेशन की जीत थी फिर बथानी का फैसला उसके लिए व्यथित करने वाली बात कैसे बन गया? हालांकि इस घटना के बाद बथानी के दौरे पर आये तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सीपीआई के इंद्रजीत गुप्त ने इसे राज्य में पुलिस प्रशासन की पूरी तरह विफलता बताया। बिहार सरकार के तत्कालीन डीजी ने खुलेआम स्वीकार किया कि पुलिस इस वीभत्स हत्याकांड को रोक सकती थी। अब पता नहीं ऐसे वीभत्स हत्याकांड में महज अधिकारियों का स्थानांतरण ही जनता की जीत किस तरह मान लिया गया! आज फिर कुछ लोग न्याय की तमाम आकांक्षाओं को एसआइटी और निचली-उपरी अदालतों की बहस में उलझाकर इस पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा होने से बचाना चाहते हैं। जनता ने तमाम आयोगों और न्यायिक फैसलों का हस्र देख लिया है। इन घिसे-पिटे तरीको के जरिए कोई जनता की न्याय की आकांक्षाओं को भले ही बहला-फुसला ले लेकिन इन्हें न्याय नहीं मिल सकता। भारत की शोषित-उत्पीड़ित जनता की न्याय और मुक्ति की आकांक्षा को समझौते की राजनीति ने एकदम शुरू से ही दिवास्वप्न में तब्दील कर दिया। लेकिन 1970 के दषक में तमाम बेड़ियों और समझौते की राजनीति के विभ्रमों को तोड़ती हुई जनता ने संघर्ष और कुर्बानियों का नया रास्ता पकड़ा। तमाम तरह के दमन और हत्या की राजनीति द्वारा प्रतिरोध को खत्म करने की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं। अब समझौते की राजनीति बेनकाब हो गयी थी। सवाल महज बाथे में मारे गए लोगों के साथ न्याय का नहीं है बल्कि सवाल संघर्ष के दौरान कुर्बान हुए जगदीश मास्टर, रामेश्वर, बुटन, कृष्णा सिंह समेत अरवल, बाथे, शंकरबीघा के तमाम लोगों के साथ का है। जाहिर तौर पर बाथे के लोगों के न्याय का सवाल भी उन तमाम कुर्बान हुए लोगों के न्याय के साथ जुड़ी हुई है।
 शासक वर्ग आज सामंतवाद विरोधी संघर्षों को कुचलने के लिए और ज्यादा बर्बर और दमनकारी रुख अपना रहा है। अब निजी सेनाओं की जगह हत्यारे गिरोहों (विजिलांते गैंग्स) और ग्रामीण स्तर पर एसपीओ ने ले ली है। वर्तमान में संघर्ष को कुचलने के लिए सरकार का आंदोलन विरोधी औजार विषेष तरह की खुफिया पुलिस बन गयी है। ऐसे में वर्तमान दौर में जनता के न्याय, पहचान और मुक्ति का संघर्ष सीधे तौर से राजसत्ता विरोधी संघर्षों के साथ जुड़ गया है। राजसत्ता के खिलाफ संघर्षों को बिना व्यापक किए जनता के न्याय और मुक्ति का सवाल खयाली पुलाव और लोकप्रिय प्रचार का महज एक औजार बनकर रह जाएगा। वर्तमान में शासक वर्ग ने अपने तंत्र को बचाए रखने के लिए जब नए तरीके इजाद किए है तब सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों को भी नए तरीके के संगठन और संघर्ष का स्वरूप विकसित करना होगा। इतिहास गवाह है कि जनता के न्याय और मुक्ति की आकांक्षाओं को सैनिक और विद्रोह विरोधी कार्रवाइयों से खत्म नहीं किया जा सका है। आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल करेंगी कि क्यो खून से पानी के लाल होने के बाद भी सोन ऐसे ही बहती रही। निष्पक्ष रहने का दिखावा करना भी एक तरह की पक्षधरता ही है।
मेहनतकशों ने अपने संघर्षों के बदौलत इतिहास की दिशा बदल दी है। सोन को भी अपनी पक्षधरता साफ करनी होगी। इसे भी अपनी निष्ठुरता छोड़नी ही होगी अन्यथा यह भी इतिहास में विलीन हो जाएगी। इतिहास में ऐसा ही हुआ है और यही दुनिया के विकास का विज्ञान भी है। आज न सही लेकिन कल यह होकर रहेगा। ऐसे में उन मुद्दों के लिए, जिनकी वजह से इन हत्याकांडों को अंजाम दिया गया, संघर्ष तेज करना ही बाथे समेत तमाम जनरंहारों में सामंतों और पुलिस द्वारा मारे गए लोगों के लिए इंसाफ हासिल करने तरफ बढ़ाया गया कदम होगा।

संदर्भः-
1 भोजपुरः बिहार में नक्सलवादी आंदोलन, कल्याण मुखर्जी
2 ईपीडब्ल्यू, निलांजना दत्ता
3 ईपीडब्ल्यू, अरविंद सिन्हा
4 ईपीडब्ल्यू, आनंद चक्रवर्ती
5 बिहाइन्ड द किलिंग्स इन बिहार, पीयूडीआर की रिपोर्ट
6 भाकपा माले लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी द्वारा बथानी नरसंहार के बाद जारी पर्चा
7 अरवल जनसंहार की एपीडीआर द्वारा रिपोर्ट