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27 अप्रैल 2016

जेएनयू के सौरभ शर्मा के नाम एक टीचर का खुला ख़त

(ये ख़त 19 मार्च को लिखा गया है। लेखिका ने अभी भेजा तो देर से छाप रहा हूं- मॉडरेटर )

प्रिय सौरभ शर्मा,

        मैं बहुत दिनों से तुमसे बात करने की सोच रही थी। परसों जब मैं JNU में अपनी बेटी से मिलने गई थी तो तुम मुझे दिखे भी थे। अनुपम खेर के लिए इंतजाम करने में मशगूल। सोचा भी कि तुमसे मिलकर आऊं, लेकिन तभी उमर और अनिर्बान की ज़मानत की ख़बर आई और देखते ही देखते एडमिन ब्लॉक पर लगने वाले नारों में मैंने ख़ुद को बह जाने दिया। उस खुशी का हिस्सा बन गई, जिसमें हमारी अगली पीढ़ी महफूज़ रहती है। पिछले कई दिनों (11 फरवरी ) से मैं ठीक से सो नहीं पाई थी। चिंता, परेशानी, डर, घृणा, अफ़सोस के साथ हतप्रभ थी। मैंने सोचा नहीं था मैं अपने जीवन में यह दिन देखूंगी। इमरजेंसी के समय मैं बहुत छोटी थी, कुछ भी याद नहीं है। बस सुना ही है उसके बारे में। लेकिन यह जो गुज़री हम सब पर यह भी कम ख़ौफ़नाक नहीं था। युद्ध जब युद्ध के नाम पर हो तब अपना पक्ष तय करना आसान होता है पर जब युद्ध प्रेम, संस्कृति, आस्था, शिक्षा, देश और विकास के नाम पर हो तो लड़ने के लिए बहुत ताक़त लगानी पड़ती है। सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन इस लड़ाई की शुरुआत तुमने कर दी है। हालांकि मैं यह मानती हूँ कि तुम सिर्फ एक मोहरा हो और तुम्हारा इस्तेमाल किया गया है। जिन्होंने यह किया है उनका इतिहास दाग़दार है, हम सब यह जानते हैं। नमो गंगे से नमो दंगे तक की सारी प्रक्रिया से हम सब, पूरा देश वाकिफ़ है।
जेएनयू का प्रशासनिक भवन, जो प्रतिरोध की जगह में तब्दील हो गया
        दूसरी तरफ मैं यह भी मानती हूं कि तुम्हारा विश्वविद्यालय भी अल्टीमेट नहीं है वहाँ भी ज़रूर कुछ कमियां, कुछ ज्यादतियां और परेशानियां होंगी। इसका साफ प्रमाण है कि तुम वहां से चुनाव जीते और तुम्हारे विश्वविद्यालय ने तुम्हें JNU में काम करने का एक बेहतरीन मौका दिया लेकिन अफ़सोस तुमने यह बड़ा मौका गवां दिया और उस जमात में जा शामिल हुए जो बहुत दिनों से रंगे सियार की तरह तुम्हारे विश्वविद्यालय पर नज़रें गड़ाए हुए थे।  JNU की सारी कमियों के बावजूद तुम्हें भी यह मानने में परहेज़ नहीं होगा कि JNU हमेशा से सत्ता विरोधी रहा है। नंदीग्राम से लेकर पता नहीं कितने मुद्दों पर हर वक़्त बहस करने को भी तैयार रहता है। वैचारिक विरोध का मतलब वहां दुश्मनी तो कतई नहीं है। सौरभ मैं तुम्हें बताऊं मेरी बेटी तीन साल से वहाँ पढ़ रही है। मैं और उसके बाबा दोनों ही वहाँ पढ़ना चाहते थे पर पढ़ नहीं सके।  जिसका अफ़सोस थोड़ा कम हुआ जब हमारी बेटी ने वहां का एंट्रेंस क्लियर किया। हमने उसे शुरू से ही तार्किक और वैज्ञानिक सोच रखने वाला इंसान बनाने की कोशिश की है और उसका व्यक्तित्व स्वतंत्र हो, किसी की छाया नहीं, दूसरों की बात सुनने-समझने का माद्दा हो। गलत चीज पर उसे बहुत गुस्सा आए। झूठ-फरेब से नफरत करे।  ऐसी कोशिश हमारी रही है। (कितनी पूरी हो पाई नहीं जानती, क्योंकि सीखने का कोई अंतिम दिन नहीं होता)। कुल मिलाकर मोटे तौर पर तुम यह कह सकते हो कि कुछ वामपंथियों जैसी विचारधारा वाला घर उसे मिला।

        JNU, जिसे वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है बड़ा ही स्वाभाविक था कि वह जाते ही किसी वामपंथी स्टूडेन्ट यूनियन से जुड़ जाती, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और किसी वाम धड़े ने उसे बाध्य भी नहीं किया। उसने तय किया कि अभी वो सबको, सबके काम को देखेगी फिर सोचेगी कि किसके साथ जुड़ना है, हो सकता था कि तुमसे जुड़ती। 'था' इसलिए लिख रही हूं कि अब ऐसा कभी नहीं होगा। तार्किक, समझदार और ईमानदार लोगों के लिए तुमने अपने रास्ते बंद कर लिए हैं। 

शेहला, रामा और कन्हैया
         मैं ये पत्र इसलिए लिख रही हूं कि मैं तुम्हारी, तुम जैसे युवा की पूरी बनावट समझना चाहती हूं। मैं आज तक नहीं समझ पाई कि एक युवा दिमाग जो सबसे ज्यादा सवाल पूछता है, असहमतियां दर्ज करता है। लड़ता है, जूझ़ता है, ग़लत चीजों से सीधे जाकर भिड़ जाता है। कैसे, किसके प्रभाव से षड़यंत्र करने लगा, साम्प्रदायिक हो गया और सबसे बड़ी बात कि वर्ग शत्रु बन गया। दिल पर हाथ रख कर कहो सौरभ जब तुम्हारे साथियों (विरोधी ही सही) को पुलिस घसीट कर ले जा रही थी। तुम्हारे दिल की धड़कने बढ़ नहीं गई थीं ? आंखें भर नहीं आईं थी? जब कन्हैया को बेरहमी से मारा जा रहा था। असहाय होने की पीड़ा से तुम गुस्से से छटपटा नहीं रहे थे? जब उमर सिर्फ एक मुसलमान में बदल दिया गया और 'मास्टर माइंड' जैसी गालियों से मर रहा था। तुम्हारा दिमाग क्या शांत रह पाया था? वहाँ कोई हलचल नहीं हुई? रामा नागा, अनंत, अनिर्बान, आशुतोष तुम्हारे ही जैसे हाड़-मांस के स्टूडेन्ट जब 'देशद्रोही' में बदल दिए गए। तुम्हे अपने आकाओं से घृणा नहीं हुई? रामा तो शायद तुमसे भी ज्यादा ग़रीब परिवार का लड़का है। चलो इन सबको छोड़ो, शायद इन नामों से तुम्हे गुस्सा आता हो, कि ये सब तुम्हारे विरोधी हैं। लेकिन तुम्हें रोहित वेमुला से भी कोई लेना-देना नहीं है? टी.वी. पर जब तुमने कहा कि खेतों में पानी देकर तुमने पढ़ाई की है तो मुझे सुनकर अच्छा लगा, आज तुम अपनी मेहनत से JNU में हो यह जानकर और अच्छा लगा। लेकिन इसी तरह से रोहित के पढ़ने से तुम्हें खुशी क्यूं नहीं होती? उसकी मेहनत और तुम्हारी मेहनत में क्या फर्क रह जाता है? ऐसा क्या गुज़रता है कि रोहित की संस्थागत हत्या होती है और तुम एक लोकतांत्रिक संस्था की हत्या के अगुआ या चेहरा बन जाते हो? अपराध तुमसे हुआ है सौरभ लेकिन तुम स्टूडेन्ट हो इसलिए हम हमेशा इसे एक गलती कह कर सम्बोधित करेंगे क्योंकि अपराध की सज़ा होती है और गलतियां सुधारी जाती हैं। अपराधी से घृणा होती है और गलती करने वाले को सुबह का भूला कह कर सब कुछ भूल जाने का मन करता है। 

       हो सकता है अभी कुछ लोग तुमसे नफरत कर बैठे हों पर एक टीचर होने के नाते मैं तुमसे नफरत नहीं कर सकती। हां तुमसे नाराज़ हूं और बेहद नाराज़ हूं। हो सकता है तुम भी अपनी संस्था से नाराज़ हो और अलग पार्टी, अलग विचारधारा को अपना कर तुम अपनी नाराज़गी जता ही रहे थे फिर ऐसा क्या हुआ कि नाराज़ होते-होते तुम व्यक्तियों (कन्हैया, उमर, बान, अनंत, आशुतोष, शेहला, रामा आदि) से नफरत करने लगे। इतनी नफरत कि चुपके से तुमने ज़ी न्यूज़ को अपनी संस्था में सेंध लगाने के लिए बुला लिया। बहुत कुछ गुज़र गया सौरभ और जो कुछ घट चुका उसे लौटाया नहीं जा सकता-रोहित वेमुला को नहीं लौटाया जा सकता, कन्हैया, उमर और बान के जेल में बिताए दिन नहीं लौटाए जा सकते, कन्हैया की पिटाई का अपमान नहीं लौटाया जा सकता, उनके परिवारों पर जो गुज़री वो नहीं लौटाया जा सकता, तुम्हारे लोगों द्वारा दी गई भद्दी गालियों का दंश नहीं लौटाया जा सकता लेकिन फिर भी एक चीज़ है जो लौटाई जा सकती है और वो है तुम्हारी समझ और तुम्हारी मरी हुई आत्मा। 

उमर और अनिर्बान
      अगर ये लौट आए तो JNU  के बेलौस बेफिक्र दिन और रात लौट आएंगे। इस देश के दिलों में पड़ी दरार भर जायेगी। बसंत का मौसम लौट आएगा। राधिका वेमुला के होठों की मुस्कान लौट आयेगी। संघ अपने दड़बे में लौट जायेगा और एमएचआरडी के फरमान लौट जायेंगे। सौरभ तुम्हें लौटना इसलिए भी चाहिए कि जिस तरफ तुम खड़े हो उधर नफरत, घृणा, हिंसा, झूठ, कायरता, साम्प्रदायिकता और फासिज़्म है जिसे अंत में खुद की कनपटी पर गोली मारकर आत्महत्या करनी पड़ती है। और एक टीचर होने के नाते मैं कभी नहीं चाहूंगी कि तुम्हारा नाम इतिहास में एक धोखेबाज़ और विभीषण के तौर पर दर्ज़ हो क्यूंकि अगर ऐसा हुआ तो जब मेरी बेटी की बेटी JNU में पढ़ने जायेगी तो उसके सीनियर भी उसे सुनायेंगे ये कथा कि एक समय में यहाँ एक सौरभ शर्मा हुआ करता था...............। 

नोट: मेरा एक सुझाव है कि रबीन्द्र नाथ टैगौर का उपन्यास "गोरा" पढ़ लेना। शायद तुम्हें वापस लौटने में मदद मिले।     

08 फ़रवरी 2014

बीजेपी: प्रतीक, रणनीति और हिंदुत्व

-दिलीप ख़ान

हाल में संपन्न पांच विधानसभा चुनावों में से तीन राज्यों में बीजेपी को अपनी जीत से ज़्यादा कांग्रेस के लद्धड़ प्रदर्शन ने आश्वस्त किया होगा। राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया के मंचों में इस चुनाव को लोकसभा के सेमीफाइनल की तरह देखा गया। जाहिर है इसके नतीजे से मिली ऊर्जा के बल पर राजनीतिक पार्टियां 2014 को देख रही है। पहली मर्तबा इसी चुनाव के आस-पास से लोकसभा पर नज़र गड़ाते हुए बीजेपी ने अपना प्रचार अभियान शुरू किया। पार्टी के भीतर नेतृत्व और भूमिका को लेकर पोजिशन साफ़ है और किसी भी तरह की असहमति और विभेद को या तो अलग-थलग कर दिया गया है या फिर मान-मनौव्वल और फुसलाहट के जरिए उन्हें कोई दूसरी ज़िम्मेदारी समझा दी गई।
56 इंच सीने की चाहत

पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनाव की हम बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मौजूदा राजनीतिक विमर्श को इसने वाकई एक मज़बूत मोड़ दिया है। अचानक छोटी सी दिखने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में बीजेपी और कांग्रेस सहित बाकी राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनौती पेश करने का दावा करने लग गई है। बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने जब विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए दिल्ली में रैली की थी तो अपने दो भाषणों में उन्होंने आम आदमी पार्टी का नाम तक नहीं लिया था। जाहिर है उस वक़्त बीजेपी के निशाने के दायरे में सिर्फ़ कांग्रेस थी। फ़िलवक़्त दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है और बीजेपी के निशाने पर सबसे प्रमुखता से यही पार्टी है। हां, दिल्ली से बाहर बीजेपी निश्चित तौर पर कांग्रेस को सबसे मज़बूत विपक्ष मानते हुए राजनीतिक बिसात बिछा रही है।

बहरहाल, टीवी मीडिया में दिख रहे ज़्यादातर ओपिनियन पोल बीजेपी के पक्ष में दिख रहे हैं और पार्टी नेताओं की शारीरिक भाषा अभी से विजेता की तरह ठसक से भरी हुई दिखने लगी है, लेकिन 2014 के लिए बीजेपी कोई नई रणनीति, कोई नया मुद्दा या फिर कोई नया नज़रिया लेकर लोगों के बीच नहीं जा रही है। हां, गुजरात में बन रहे बल्लभ भाई पटेल की मूर्ति को ज़रूर राष्ट्रवाद के नए प्रतीक के तौर पर इस बार बीजेपी और ख़ासकर नरेन्द्र मोदी प्रचारित कर रहे हैं। फ़िलहाल वाकई बीजेपी के समूचे राजनीतिक विमर्श को इस प्रतीक के आइने में देखने की दरकार है। इसको भूल जाइए कि पटेल बीजेपी के लिए प्रतिनिधि चेहरा हो सकते हैं या नहीं। हर पार्टी किसी इतिहास पुरुष का उतना हिस्सा अपने पक्ष में नोंच लेती है जो उसके राजनीतिक दर्शन में फिट हो। इसलिए भगत सिंह पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी अपनी दावेदारी ठोकता है। 

एकीकरण की नीति के चलते पटेल को बीजेपी अपनी कश्मीर पर उग्र राय और वाया कश्मीर पाकिस्तान विरोधी राजनीति और इस तरह मुस्लिम विरोधी राजनीति में फिट कर सकती है। इसके लिए वो एक मुफ़ीद चेहरा होंगे। लेकिन पटेल के रूप में चित्त भी मेरी, पट भी मेरी का नायाब सिक्का बीजेपी को हाथ लग गया है। एक तरफ़ उग्र हिंदुत्व के प्रतिनिधि चेहरा, नरेन्द्र मोदी, को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाकर हिंदू वोट को गोलबंद करने की पूरी कोशिश है, दूसरी तरफ़ पटेल के भीतर धर्मनिरपेक्षता के तत्त्व देखेन वाला तबका भी इस संतोष में बीजेपी के साथ हो सकता है कि इसी बहाने भारत की ज़मीन पर दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति लगने वाली है। सामान्य ज्ञान में सबसे ऊंचा, सबसे बड़ा और सबसे लंबा में भारत का नाम आने पर गर्वानुभूति महसूस करने वाला तबका देश में छोटा नहीं है! इनमें से एक हिस्सा तो वो है जिन्हें राजनीतिक तौर पर किसी भी खेमे में जाने में कोई मुश्किल नहीं होती।
हुंकार, फुफकार जैसी रैलियों के मॉनिटर!

बहरहाल, एक सवाल ये है कि क्या बीजेपी इस चुनाव में नई रणनीति लेकर सामने आ रही है? क्या बीजेपी अपने पुराने राजनीतिक दर्शन में संशोधन के साथ 2014 के मैदान में उतर रही है? इस कसौटी पर अगर बीजेपी की गतिविधियों को देखें तो आश्वस्त करने वाले जवाब नहीं मिलते हैं। राम मंदिर की आवाज़ मुखर न होने के कारण अगर कोई इस चुनाव में ये समझ रहा है कि बीजेपी ने उग्र-हिंदुत्व की राजनीति से अपना काफिला आगे बढ़ा लिया है, तो उसे ठहरकर सोचना चाहिए। नरेन्द्र मोदी के गुजरात में नंबर-2 अमित शाह को देश के सबसे बड़े राज्य, उत्तर प्रदेश, का प्रभारी बनाया गया। उसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर जिस तरह बदली है उसकी व्याख्या न करते हुए सिर्फ़ इतना देखे कि किस पार्टी के पक्ष में वो ज़्यादा झुकी हुई दिख रही है तो निश्चित तौर पर उसमें बीजेपी को फायदा मिलता दिख रहा है। 

मुज़फ़्फ़रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों में बीजेपी नेताओं की भूमिका सार्वजनिक होने के बाद आगरा के मंच पर उन्हें जिस तरह सम्मानित किया गया, उसमें काफी संदेश छिपा हुआ था। उसी मंच पर 2014 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से बीजेपी के सबसे बड़े नेता नरेन्द्र मोदी भी भाषण देने पहुंचे थे। राम मंदिर के आह्वान की हिंदुत्ववादी राजनीति से कहीं आगे बढ़कर बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में इस बार मुस्लिम-विरोधी हिंसक विचारधारा को खाद-बीज मुहैया कराया है और ये साफ़ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकता के आर-पार वोट का बंटवारा बीजेपी को फायदा पहुंचाती दिख रहा है।

मौजूदा चुनाव प्रचार में न सिर्फ़ हिंदुत्व बल्कि मर्दवाद और आक्रामकता भी बीजेपी के प्रतीक के तौर पर सामने आ रही है। 29 सितंबर को दिल्ली के रोहिणी में हुई रैली में समूची दिल्ली में लगे पोस्टरों में नरेन्द्र मोदी को ‘भारत मां का शेर’ के तौर पर संबोधित किया गया। नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में अपनी एक रैली में 56 इंच के सीने का जुमला उछाला। जुमले और चेतावनी के लिहाज से ही सही मोदी अगर सीने की चौड़ाई से प्रधानमंत्री की योग्यता का परीक्षण कर रहे हैं तो जाहिर तौर पर इस मर्दवादी प्रतीक के जरिए वो महिलाओं की आधी आबादी के बारे में सोच तक नहीं रहे।  उनकी रैलियों के नाम हुंकार और महागर्जना वगैरह होते हैं। नरेन्द्र मोदी जब ‘देहाती औरत’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल करते हुए व्यंग्य कसते हैं तो एकबारगी न सिर्फ़ महिला क़ौम को बल्कि समूचे देहात का निषेध करते हुए दिखते हैं। 
'महागर्जना'

वैसे भी मोदी के भाषण में शहरी चमक-दमक ही दिखाई-सुनाई पड़ता है। गांव देहातों का ज़िक्र वो गाहे-बगाहे ही करते हैं। कॉरपोरेट्स उन्हें पसंद करते हैं और वे कॉरपोरेट्स को। सहानुभूति के लिए ‘चाय बेचने’ की बात अब हर मंच से वो दोहराते हैं। राहुल गांधी के पिता और दादी की शहादत पर लोगों से सहानुभूति की काट के तौर पर चाय बेचने की कहानी नरेन्द्र मोदी सुनाते हैं। लेकिन चाय कंपनियों के मालिक मोदी के पक्ष में बोलते नज़र आते हैं। यानी वोट ‘चाय बनाने और बेचने’ वालों से मेल खाते लोगों से मिले और नीतिगत फ़ैसला चाय कंपनियों के मालिकों के पक्ष में दिए जाए। नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक प्रमेय को इस रूप में देखा जाना चाहिए और मोदी के जरिए बीजेपी के राजनीतिक दर्शन को।

फ़िलहाल,  बीजेपी के सामने नरेन्द्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रचार अभियान के कंधों पर सवार होकर मोदी ने ख़ुद को देशभर में फैलाया है उसके सामने आडवाणी, सुषमा, जेटली और राजनाथ सिंह टिक नहीं पा रहे। बीजेपी के तरकश में मोदी है, हिंदुत्व है, ‘गुजराती विकास-मॉडल’ है और यूपीए सरकार के अनगिनत भ्रष्टाचार की कहानियां हैं। सबसे ख़ास बात कांग्रेस में उपाध्यक्ष बने राहुल गांधी जैसे कमज़ोर राजनीतिक से मुख्य टक्कर है। इसके अलावा कालाधन मार्का बाबा रामदेव है। बीजेपी के पास भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरे अण्णा हज़ारे और किरण बेदी से अपनी प्रशंसा करवाने की राजनीतिक बढ़त है। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह जैसे प्रशंसक हैं जिनके पास एक साथ कई मंचों पर समान अधिकार से बैठते हुए एक ही साल में एक साथ राजनीतिक और अराजनीतिक होने का हुनर है!

बहरहाल, बीजेपी संख्या, समीकरण और राजनीतिक नफ़ा-नुकसान पर पूरी नज़र गड़ाए हुए है। दक्षिण भारत में कर्नाटक के हाथ से निकलने के बाद पार्टी के पास और कोई चारा नहीं था, लिहाजा येदियुरप्पा को वापस पार्टी में मिला लिया गया। लेकिन, बीजेपी की राजनीतिक कल्पनाशीलता में दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर प्रमुख नहीं है। उनका समूचा ज़ोर हिंदी पट्टी पर है और हिंदी पट्टी के मिजाज़ को मेल खाती राजनीति के जरिए ही वो 2014 को साधना चाहती है।
मुज़फ़्फ़रनगर: शिविर में सिमटी ज़िंदगी

बावजूद इसके, बीजेपी सतह पर इस बार हिंदुत्व को लाने से बचना चाहती है। उनके भाषण में हिंदुत्व कम है, तरक्की ज़्यादा है। हिंदुत्व के जिस चेहरे को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाया गया है उसको लेकर पार्टी के भीतर ही कई फाड़ देखने को मिल रहे हैं, लिहाजा पार्टी नेतृत्व के सामने बड़ा सवाल ये है कि अगर पूर्ण बहुमत नहीं मिला और गठबंधन के आसर हुए तो सामाजिक सौहार्द्र में ज़रा भी यक़ीन करने वाली पार्टी बीजेपी से छिटक जाएगी। इसलिए रणनीति के तौर पर झंडे, पोस्टर, बैनर और भाषण से हिंदुत्ववादी स्वर कम उठ रहे हैं। इस तरह राजनीतिक पार्टियों के सामने बीजेपी ख़ुद को इस मामले में नरम बताने की कोशिश कर रही है और वोटरों के सामने मुज़फ़्फ़रनगर की सांप्रदायिक हिंसा में शामिल विधायक का स्वागत करके ये बताने की कोशिश कर रही है कि उसने अपनी राजनीतिक लाइन बदली नहीं है।

(सबलोग के नए अंक के लिए लिखा गया लेख।) 

19 अगस्त 2013

पन्द्रह अगस्त के दिन दलितों पर हुए क्रूर अत्याचार की पहली रिपोर्ट.

वे जिन्हें लगता है कि जातिगत अत्याचार की घटनाएं पुरानी हो चुकी. वे जिन्हें लगता है कि समता के संवैधानिक नारों ने लोकतंत्र को अपनी पीठ पर लाद लिया है. जिन्हें लगता है कि दिन अच्छे आ गए हैं.... सवर्ण वर्चस्व और क्रूरताओं की लड़ाईयां अवशेष हो रही हैं. उन सबके लिए बिहार की यह घटना शायद फिर से सोचने को विवश करे. सवर्णों के क्रूर अत्याचारों ने पूरे एक गांव को ही नहीं तबाह किया है बल्कि पूरे समुदाय को आगाह किया है कि संविधान और लोकतंत्र से परे उनके साशन जिंदा हैं.   
बिहार
दिनांक 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस 2013 को ग्राम डडवा बडडी,  थाना शिवसागर जिला रोहतास में धर्म स्थल रबिदास मंदिर के परिसर में घुसकर र्गैर दलित राजपूत 300 के सख्या बल में आकर दलित समुदाय के  चमार जाति पर गोला-बारूद, लाठी-डंटा, भाला, गडासा के साथ एकाएक हमला बोल दिया. दलित महिला व पुरूष तथा बच्चो के साथ मारपीट किया, जिसमें एक व्यक्ति कि हत्या हो गई है, व 39 महिला व पुरूष तथा बच्चे गंभीर रूप से घायल हैं. गैर दलितों ने रबिदास का मंदिर व दलितो के घर में किरोसीन का तेल डालकर आग लगाकर जला दिया. रबिदास मंदिर को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया है व एक दलित व्यक्ति का घर जलाकर राख का दिया गया है.
घटना का अंजाम 9 बजे सुबह में गैर दलित राजपूत गुट बनाकर आये और दलितों के रबिदास मंदिर पर हमला बोल दिया और पहले मंदिर में किरोसीन डालकर आग लगाकर जलाकर क्षतिग्रस्त कर दिया और एक दलित महिला मंजू देवी का घर भी किरोसीन तेल डालकर आग लगाकर जला दिया, जिसमे दलित महिला के लाख रूपए से ज्यादा की जान माल का क्षति हुआ है. लाखों लाख की समपत्ति का नुकसान पहुचाया गया है.
इस घटना में दलित महिला व पुरूष तथा बच्चो को मारपीट कर गंभीर रूप से घायल कर दिया है, जिसमें घायलो को पटना पी. एम. सी. एच. में इलाज के लिए रेफर किया गया हैं बाकि लोगो का सासाराम सदर हॅास्पिटल में इलाज किया जा रहा हैं. एक अन्य व्यक्ति की भी मौत हो चुकी है, 5 लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है लेकिन 10 लोगों के मरने की संभवना है.
दलित अत्याचार के घटना के 1 घटे बाद जिला प्रशासन, जिला पदाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, पुलिस पदाधिकारी व पुलिस बल के साथ पहुचे हैं. घटना की जांच कर अपराधी पर प्राथमिकी दर्ज की गई है. पुलिस अपराघियों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर छोड़ दिये गए हैं.
रोहतास के पुलिस अधीक्षक ने बातचीत के द्वौरान बताया है कि हम पूरी तरह से जांच कर कारवाई कर रहे हैं. अनुसूचित जाति जनताति अत्याचार अधिनियम के अंतर्गत एफ. आई. आर. कर रहे हैं.
पुलिस पदाधिकारी, सासाराम से जन अधिकार केन्द्र, चेनारी, अध्यक्ष रविन्द्र कुमार से बातचीत में कहा है कि यहॉं के राजपूत काफी दबंग है, हम पुलिस प्रशासन के तरफ से 9 लागों को हिरासत लिया गया है. सुरक्षा के रूप में घटना स्थल पर पुलिस कैंप करेगी.
घटना का कारण: अखिल भारतीय रबिदासिया धर्म संगठन के जिला अध्यक्ष काशी राम ने बताया कि रबिदास मंदिर स्थल पर निशान सिंह की प्रतिमा बनाने को लेकर तथा निशान सिंह का झंडा लगाने को लेकर  राजपूत जाति के लोगों से दो महीने से झगडा व विवाद चल रहा था. इस विवाद की सूचना दिनांक 7, 06 2013 को जिला पदाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक रोहतास को दी गई थी, जिसमें जिला पदाधिकरी व पुलिसअधीक्षक ने दलितो एवं गैर दलित दोनो पक्ष को शांति बनाये रखने का आदेश निकाला था कि किसी पक्ष को धार्मिक स्थल पर झंडा नहीं फहरना है. झंडा तोलन यदि करना है, तो सहायक थाना बडडी में आकर झंडा तोलन करना है अन्यथा नहीं करना है. दिनाकं 14/8/2013 को भी दोनों पक्ष को बुलाकर सहायक थाना बडडी में शांति बनाने व झंडा तोलन करने से स्पष्ट मना किया गया था. इसके बावजूद भी राजपूत लोग दलित के धर्म स्थ्ल के परिसर में शहीद निशान सिंह के नाम से आजादी के दिन जबरदस्ती झांडा तोलन करने लगे जिसमें सभी दलित मिलकर इसका विरोध किये और झंडा तोलन रोकने का प्रयास किये तो  राजपूत जाति के लोग 300- 400 कि संख्या में गुट बनाकर दलितों के मदिर में हमला बोल दिया, और आजादी का झंडा तोलन करने के बहाने से घटना का अंजाम दिया.
इस घटना की सूचना जिला पदाधिकारी रोहतास को 7/06/2012 एवं 13/8/2013 को आवेदन के माध्यम से दिया गया था, जिसमे जिला पदाधिकारी ने यह फैसला दिया था कि धर्मिक स्थ्ल पर किसी समुदाय का झंडा नहीं फहराया जायेगा. इसके बावजूद भी राजपूतों ने जिला पदाधिकारी के आदेश को नहीं माना और दलितों की हत्या कर दी.
राजपूत लोग अपने पूर्वज निशान सिंह का स्मारक बनाना चाहते हैं इसी कारण घटना को आंजाम दिया गया. निशान सिंह का स्मारक लगाने के लिए हाई स्कूल के बच्चे व शिक्षको को भी इस्तेमाल किया जाता है, पहले शिक्षकों के द्वारा स्कूल में झंडा फहराया जाता है. इसके बाद दलितों के धार्मिक स्थ्ल में राजपूत आकर झंडा फहराना शुरू किया, इसमे आलमपुर ग्राम के छात्र को भी गोली लगने कि सूचना है.
दलित किशोरी बच्चियो के साथ छेडखानी करने का दुसाहस:
राजकीय माध्यमिक विद्यालय बडडी में झंडा तोलन करने के बाद 10 बजे राजपूत का एक लड़का आकाश कुमार व कुछ अन्य उसके सहयोगियों ने जाकर दलित समुदाय के बच्चियो के बारे में मंटू नाम के शिक्षक से पूछने लगा कि हरिजन की लडकियो को उठाकर ले जाने चाहते हैं और दबाव बनाने लगा, तभी स्कूल का गेट खुलते ही सभी दलित बच्चियां भागी तो उनके द्वारा दौड़कर पकड़ने का प्रयास किया गया. रानी कुमारी पिता रादारायन राम की लड़की व उसके साथ अन्य सभी लड़कियां जान बचाकर किसी तरह भाग गई.  15 अगस्त के दिन दलित समुदाय की लड़्कियां दूसरे गांव में भी छुपी हुई थी.
बच्चो पर हमला: घटना के समय धर्म स्थल पर उस्थित नाबालिक दलित बच्चों पर भी हमला बोला गया और सामुदायिक भवन व मंदिर के छत पर से बच्चों को उठाकर पटक दिया गया और कुछ बच्चों को उठाकर बाहर फेंक दिया गया. जिसमें कई बच्चे भी गंभीर रूप से घायल है. जिसका इलाज सदर हॉस्पीटल सासाराम में चल रहा है.
घटना का आंजाम देने वाला समूह:
    नाम              पिता का नाम
डॉ शम्भू सिंह      स्वं बच्चन सिंह
लखन सिंह          स्वं केशो सिंह
अक्षयबर सिंह      स्व कमला सिंह
विनोद सिंह        स्वजगदीश सिंह
रामअशिष सिंह   भाईजी सिंह
उमाकान्त सिंह    मुन्सी सिंह
श्री राम सिंह       स्वं जीरी सिंह
दीपक सिंह        
आकाश सिंह        रामजी सिंह
विभूति सिंह        विश्वनाथ सिंह
अक्षय सिंह          अक्ष्यबर सिंह
रणविजय सिंह     स्वं कुलवंश सिंह
प्रकाश सिंह         रामप्रवेश सिंह
चन्द्रशेखर सिंह     बिन्दा सिंह
शेखर सिंह          स्व रामेश्वर सिंह
हरिओम सिंह      स्व सिगासन सिंह
विकास सिंह        भिखारी सिंह
प्रकाश सिंह         रामप्रवेश सिहं

इस अत्याचार में अज्ञात लोग भी शामिल है.
पीड़ित महिला व पुरूष तथा बच्चों की सूचि:
  1 बेलास राम           मृत्यू हो गई, अंतिम दाससंस्कार भी करवाया है.  16 कृष्णवती देवी
                                                                             17 बिन्दू देवी 
  2 शुकिया देवी                                                       18 देवती देवी
  3 विकास कुमार        घायल, बच्चा                            19 बिमला दवी            
  4 संतोष कुमार           ,                                           20 तेतरी देवी
  5 राजेशकुमार              ,,                                        21 अस्तारनी देवी
  6 राहुल कुमार            ,,                                         22 अनिता देवी
  7 हलखोरी राम                                                     23 प्रकाशराम
  8 आकाली देवी             महिला                               24 तेजा साधु  मंदिर पुजारी
  9 मीना देवी                 ,,                                       25 राजा राम             
 10 सरस्वती देवी                                                    26 नागिना राम
 11 जोखना देवी                                                      27 दीपक राम 
 12 चम्पा देवी       र्गभवती महिला                            28 मगरू राम            
 13 शुकिया देवी                                                      29 फुलकुमारी
  14 उमरावती कुवर    15 सरोजा देवी                       30 सुदामा राम
31 रामरतल राम                                                     32  सहतूराम
33 विद्यार्थी राम                                                      34 जिज्ञासी देवी
35 सरजु राम                                                          36 मनोज राम
37 नथुनि राम                                                         38 प्यारी देवी
 40 अमित नन्दन
 39 रमेश कुमार
ग्राम बडडी: यह राजपूत बहुल गांव है दलितों की संख्या काफी कम है. यहॉं से जिला मुखयालय कि दूरी 25 किलो मीटर थाना और प्रखण्ड भी लगभग 25 किलोमीटर है, लेकिन सहायक थाना से घटना स्थल कि दूरी 200 मीटर है. सहायक थाना भी समय पर नहीं पहुचा दलितो के सुरक्षा में. केन्द्र सरकार व राज्य सरकार तथा सरकार के सभी विभाग व आयोग तथा सामाजिक संगठनो से अनुरोध है कि दलितो कि सुरक्षा में मदद, एवं अपराधियों को गिरफ्तार कर सजा दिलाने में सहयोग प्रदान किया जाये. सभी दलितों को सम्मान से जीने के अधिकार की गांरटी दी जाये.
क्या यही देश की आजादी है? लोकतंत्र के नाम पर यह क्रूर अपमान: है. 15 अगस्त के दिन लम्बे चौड़े लोकतंत्र पर दिए गए भाषण पर शर्मिंदा होना चाहिए. प्रधान मंत्री एवं मुख्य मंत्री तथा अन्य नेताओं ने जो भी कहा कि दलितो के लिए ये  कर रहे हैं और देश आज़ाद है. वो सब झूठी दलीले हैं और यह सब बकवास है. आजाद भारत देश में दलित गुलाम है, जिसे वे स्वतंत्रता का दिन कहते हैं उसी दिन राजपूतों ने संविधान का अपमान एवं मौलिक अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, अभिक्ति का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जीवन के अधिकार का घोर उलंघन किया है.
                                          जन अधिकार केन्द्र,चेनारी रोहता, बिहार

संपर्क: 09572427099

01 अगस्त 2013

संवाद: धोखा और बेईमानी के पक्ष में जो खड़े हैं

रेयाज-उल-हक़

वरवर के हंस के आयोजन में जाने से इन्कार करने को अब विरोधी पक्ष की बात सुनने से इन्कार के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है. क्या सचमुच मामला विरोधी पक्ष की बात नहीं सुनने का है? या मामला फासीवादी और सत्तापरस्त आवाजों को राजनीतिक स्पेस और औचित्य मुहैया कराने का है, जिसके बारे में वरवर राव ने अपने पत्र में इशारा किया है? आखिर किन ताकतों के पक्ष में, इस पूरे मामले के मूल सवाल को छोड़ कर अमूर्त रूप से ‘संवाद’, ‘लोकतंत्र’ और जाने किन किन बातों का जिक्र उठाया जा रहा है? जो लोग अब तक सत्ता के मुकाबले किसी बात पर तन कर नहीं खड़े हो पाए और सत्ता और ताकत की गलियों में अपनी मौकापरस्त गरदन झुकाए आवाजाही करते दिखते हैं, वे आज सत्ता को उसके ‘मुंह पर जवाब’ देने के गंवा दिए गए मौके पर अफसोस जाहिर करने निकल पड़े हैं.

सबसे पहली बात तो यह है कि न तो गोविंदाचार्य ने और न ही अशोक वाजपेयी ने वरवर (या अरुंधति) को संवाद के लिए बुलाया था. उन्हें हंस ने बुलाया था और बाकी वक्ताओं के बारे में वरवर को बताया तक नहीं गया था. यह किस तरह का संवाद है? क्या इस तरह के संवाद को लोकतांत्रिक कहा जा सकता है? यह धोखा और बेईमानी है और इसे संवाद और लोकतंत्र का नाम देना इसको बर्दाश्त किए जाने लायक बनाना है.



दूसरी बात, क्या गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी सिर्फ विरोधी पक्ष हैं? वरवर उस राजनीतिक-सांस्कृतिक संघर्ष की विरासत से आते हैं, जो उन विचारों और नजरिए को अपना विरोधी ही नहीं, शत्रु भी मानता रहा, जिसका प्रतिनिधित्व गोविंदाचार्य और काफी हद तक अशोक वाजपेयी करते हैं. यह सही है. लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं है. वे सत्ता के प्रतिनिधि भी हैं. सत्ता से उनका जुड़ाव बहुत साफ है. संस्कृतिकर्मी, लेखक, विचारक के रूप में उनके द्वारा सत्ता के प्रतिक्रियावादी विचारों को जनता के बीच ले जाने, उसे जनता के बीच स्वीकार्य और व्यापक बनाने के इतिहास से भी हम अपरिचित नहीं हैं. साम्राज्यवाद और सामंतवाद-ब्राह्मणवाद जनता के खिलाफ जो फौजी-सांस्कृतिक-वैचारिक-सैद्धांतिक हमले करते आए हैं, उनमें गोविंदाचार्य तो बहुत सीधे ही भागीदार रहे हैं और अशोक वाजपेयी भी कमोबेश इस हमले के हिमायती रहे हैं (विश्वरंजन, सलवा जुडूम और दूसरे अनेक मामलों पर उनके विचार देखिए). यह महज एक निरीह, निर्दोष और मासूम सा ‘विरोधी पक्ष’ नहीं था, जिसकी बात ‘सुनने’ और उसका जवाब देने के लिए वरवर को बुलाया गया था. यह हमलावर, अपराधी, प्रतिक्रियावादी, जनसंहारक और दमनकारी सत्ता के दो अलग-अलग प्रतिनिधियों के साथ मिल कर सुनने वालों को संबोधित करना था, जिससे किसी भी जनवादी, संघर्षशील, क्रांतिकारी और जनता को प्यार करने वाले लेखक, संस्कृतिककर्मी को कबूल नहीं करना चाहिए. ‘विरोधी पक्ष के मुंह पर विरोध जताने’ और उसके साथ एक मंच पर बैठ कर जनता या श्रोताओं को संबोधित करने में बहुत फर्क है और लगातार इस फर्क को धुंधला किया जा रहा है. यह बताने की जरूरत नहीं है कि वरवर बात को पीठ पीछे कहने और चुप रह जाने वाले, भाग जाने वाले और ‘पस्त हिम्मत’ लोगों में नहीं हैं (जैसा कि मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है). उनकी जेल यात्राएं और उन पर तथा उनके साथियों पर हुए जानलेवा हमले इसके गवाह हैं. वे ‘संवाद’ और ‘लोकतंत्र’ की किन्हीं निर्जीव और निराधार अवधारणाओं में यकीन नहीं करते. वे संवाद और लोकतंत्र को जनता के जुझारू संघर्षों की जमीन पर रख कर देखते हैं और इसीलिए वे इस हकीकत को समझते हैं कि उत्पीड़ित जनता और दमनकारी सत्ता के बीच संवाद नहीं होता (और जब यह संवाद होता भी है तो जनता इसमें अपनी शर्तों के साथ शामिल होती है. इसे कुश्ती के अखाड़े की तरह आयोजित नहीं किया जा सकता और न ही जनता या उसके लेखकों को भुलावा देकर, चारा दिखा कर धोखे से अखाड़े में बुला कर ‘मुकाबले’ के लिए मजबूर किया जा सकता है). जैसा कि कुछ लोग भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, हंस का आयोजन दोतरफा बातचीत या गोलमेज सम्मेलन नहीं था, यह एक आम सभा थी, जिसमें वक्ताओं को अपनी बात रखनी थी. लेकिन इस संदर्भ में संवाद और लोकतंत्र का जिक्र इस तरह किया जा रहा है, मानो वरवर ने (या अरुंधति ने) बातचीत के किसी प्रस्ताव को नकार दिया हो (हालांकि हालात के मुताबिक ऐसे प्रस्ताव भी नकारे जाते हैं और उनका नकारा जाना जरूरी होता है).

माफ कीजिएगा दोस्तो, जो लोग 2010 में भी और इस बार भी ‘दंगल’ देखने के लिए उत्साहित थे, वे भूल गए थे कि वरवर और अरुंधति जैसे लेखक उन रीढ़विहीन लेखकों की जमात से नहीं आते, जिनको नचा नचा कर आप अपना रसरंजन करते रहें. आपका रसरंजन दूसरी बहुत सारी बातों से रोज ही होता रहता है और बेहतर है आप वही करते रहें.

तीसरी बात. मुद्दा था अभिव्यक्ति और प्रतिबंध का. उसमें दो ऐसे लेखकों को बुलाया गया (कम से कम निमंत्रण में उनका नाम था), जिनको लिखने के लिए और अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए जेल जाना पड़ा है. बाकी के दो ऐसे लोग थे, जिनमें से एक फासीवादी संगठन के प्रचारक, सिद्धांतकार और कार्यकर्ता हैं और दूसरे हाल ही में अपने प्रशंसक बने एक कहानीकार के भूतपूर्व शब्दों में ‘सत्ता के दलाल’ हैं. मोटे तौर पर वे शासक वर्ग के हिमायती और प्रतिनिधि थे. सवाल है कि क्या शासक वर्ग की अभिव्यक्ति को किसी तरह का संकट है? क्या शासक वर्ग की अभिव्यक्ति पर किसी तरह की पाबंदी लगी है? और अगर हो भी तो क्या हम शासक वर्ग और सत्ता की अभिव्यक्ति की फिक्र करेंगे, जिसका अभिव्यक्ति के तमाम साधनों पर लगभग एकाधिकार, नियंत्रण और निगरानी है? अगर नहीं तो उन्हें क्यों बुलाया गया? फिर क्या मकसद यह था कि वे शासक वर्ग की तरफ से इस बात की सफाई दें या इसका औचित्य बताएं कि जनता के पक्ष में उठने वाली अभिव्यक्तियों पर प्रतिबंध क्यों लगाया जा रहा है? अगर ऐसा था तो क्या यह पहले से ऐसी कोई घोषणा हुई थी या हंस की तरफ इस तरह की कोई बात इनमें से किसी भी वक्ता और श्रोताओं को बताई गई थी? क्या यह सचमुच न्यूज चैनल के किसी टॉक शो जैसा आयोजन था? अब तक हंस के आयोजनों के इतिहास के आधार पर ऐसा कोई दावा नहीं किया जा सकता और न ही हंस ने बताया था कि इस बार फॉर्मेट कुछ अलग होगा. हो भी नहीं सकता. आम सभाओं या व्याख्यानों में स्रोताओं के एक समूह को संबोधित किया जा रहा होता है, और कोई भी ईमानदार, प्रतिबद्ध और क्रांतिकारी लेखक या वक्ता इसे कबूल नहीं कर सकता कि वह फासीवादी और प्रतिक्रियावादी विचारों के प्रसार के लिए स्पेस देने वाले आयोजन का हिस्सा बने.

अगर यह मौका खो देना था, अगर यह बेईमानी और धूर्तता थी, अगर यह पलायन था, तो समस्या इन शब्दों के साथ नहीं है, आपके दिमाग में इन शब्दों के साथ जुड़ी धारणाओं के साथ है.

24 जुलाई 2013

नरेंद्र मोदी: कॉरपोरेट क्रूरता और सांप्रदायिक कट्टरता के रसायन से बनी शख्सियत!

उर्मिलेश 
(18 जुलाई को उर्मिलेश ने यह लेख जनसत्ता में लिखा। हाल में रॉयटर्स वाले साक्षात्कार के बाद हिंदी-अंग्रेज़ी में मोदी पर कई लेख लिए गए..लेकिन उर्मिलेश का यह लेख हिंदी मीडिया में दब-छुपकर लिखने की परंपरा में मिसफिट है। अंग्रेज़ी में जो बातें कही जाती हैं, हिंदी आते ही वो पिलपिली हो जाती है। यह लेख इससे अलग है और इसी लिहाज से इसे पढ़ा जाना चाहिए। कायदे से इसे पहले ही साझा करना चाहिए था, लेकिन हफ़्ते भर बाद भी इसमें कुछ बासी नहीं है। अलबत्ता, मोदी को समझने के लिए महीनों बाद भी यह ताजा ही रहेगा:मॉडरेटर)

एक यशवंत सिन्हा को छोड़ कर पूरी भाजपा जिस तरह नरेंद्र मोदी के हाल के विवादास्पद और बेतुके बयानों के बचाव में उतर पड़ी है, उससे बिल्कुल साफ है कि औपचारिक घोषणा अभी भले न हुई हो, अगले संसदीय चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार वही हैं। बुजुर्ग भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को ‘नागपुर’ की तरफ से उनकी हैसियत बता दी गई है, इसलिए नेतृत्व के सवाल पर अब वे खामोश हैं। आखिर मोदी भी तो उन्हीं के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं! पर जनसंघ-भाजपा में अपने पूर्ववर्ती शीर्ष नेताओं के मुकाबले मोदी के विचारों और भाषा में एक खास तरह की आक्रामकता और निरंकुशता के तत्त्व प्रभावी दिखते हैं।

शायद इसलिए कि सन 2001 के बाद मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व का निर्माण कॉरपोरेट और कट्टर हिंदुत्व के मिश्रित रसायन से हुआ। ऐसा रसायन, जिसे नवउदारवादी सुधारों के दौर की संघ परिवारी-प्रयोगशाला में विकसित किया गया। वे जिस तरह ‘कुत्ते का बच्चा’, ‘हिंदू-राष्ट्रवादी’, ‘सेक्युलरिज्म का बुर्का’, या ‘आबादी बढ़ाने वाली मशीन’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, वे उनके राजनीतिक व्यक्तित्व के खास पहलू की तरफ इंगित करते हैं।

इसके साथ वे यह भी कहते हैं कि देश को तरक्की के रास्ते पर ले जाना है तो सरकार को उद्योग-व्यापार से हटना होगा। यह काम उद्योग और व्यापार में लगे लोगों का है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के कार्यकाल में देश को विनिवेश के नाम पर नए मंत्रालय की सौगात देने वाली भारतीय जनता पार्टी को मोदी के रूप में अर्थनीति के स्तर पर भी एक ‘आदर्श नेता’ मिला है। दक्षिणपंथी धारा में वे अपने ढंग के बिल्कुल नए नेता हैं। कॉरपोरेट क्रूरता और सांप्रदायिक कट्टरता के नायाब रसायन से बनी है उनकी शख्सियत!

भाजपा की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष चुने जाने के बाद नरेंद्र मोदी जिस आक्रामकता के साथ अपना अभियान चला रहे हैं, उसका पर्दाफाश भी उसी तेजी से हो रहा है। शुरू में उनके ‘विकास मॉडल’ का जोर-शोर से प्रचार किया गया और मोदी को विकास-पुरुष बताया गया। पर गुजरात के विकास मॉडल की पोल खुलते देर नहीं लगी। मानव विकास सूचकांक के कई जरूरी मानदंडों पर ‘मोदी का गुजरात’ देश के औसत सूचकांक से भी पीछे है। तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मिजोरम और मणिपुर जैसे राज्य उससे बहुत आगे हैं। उसकी कथित विकास-दर की कहानी की असलियत भी सामने आ चुकी है कि किस तरह सन 80-99 के दौर में भी गुजरात अन्य कई राज्यों से आगे था। पर आज देश के कई राज्यों की विकास-दर की उछाल उससे बहुत ज्यादा है।

इन ठोस तथ्यों के उजागर होने के बाद मोदी ने विकास की नारेबाजी को पीछे छोड़ फिर से ‘उग्र हिंदुत्व’ को सबसे भरोसेमंद अस्त्र के रूप में आगे किया है। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में संघ और मोदी का ज्यादा जोर कट्टर हिंदुत्व और खास तरह की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के मिले-जुले एजेंडे पर होगा। यह महज संयोग नहीं कि बिहार और उत्तर प्रदेश में मोदी को ‘सामाजिक न्याय आंदोलन’ से जोड़ने की कोशिश की गई है।

इस भोंडे अभियान में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी और पूर्व मंत्री नंदकिशोर यादव को खासतौर पर लगाया गया है। बिहार के गांवों में, खासकर पिछड़ी जातियों के बीच सभाओं-रैलियों के जरिए प्रचारित किया जा रहा है कि मोदी पिछड़ी जाति के पहले ऐसे नेता होंगे, जो प्रधानमंत्री बनेंगे। भाजपा के अलावा मोदी के कट्टर समर्थकों की खास टोलियां भी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के देहात और कस्बों में घूम-घूम कर उनकी ओबीसी पृष्ठभूमि और कुछ खास खूबियों के पक्ष में अभियान चला रही हैं।

जाहिर है, संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व की इजाजत के बगैर इस तरह का अभियान नहीं चलाया जा सकता। जहां मोदी को पिछड़ा (ओबीसी) बना कर वोट मिलेंगे, वहां भाजपा पिछड़े वर्ग की राजनीति करेगी, जहां अगड़ों को गोलबंद करना होगा, वहां वह आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बवाल कराने से भी गुरेज नहीं करेगी। इलाहाबाद और आसपास के इलाकों में हाल में हुआ हिंसक हंगामा उसका सबूत है।

एक विदेशी समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने अपना राजनीतिक परिचय पूछे जाने पर बताया कि वे ‘हिंदू-राष्ट्रवादी’ हैं। उन्होंने अपना परिचय एक ‘भारतीय’ बता कर नहीं दिया। ‘भारतीय हिंदू’ या ‘राष्ट्रवादी हिंदू’ भी नहीं कहा, ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ कहा। राष्ट्रवादी हिंदू और हिंदू राष्ट्रवादी का फर्क समझा जा सकता है। श्रीमान मोदी और उनकी पार्टी अक्सर अमेरिका और अन्य पूंजीवादी देशों के विकास मॉडल की तारीफ करते नहीं थकते।

उनसे पूछा जाना चाहिए कि दुनिया के किस पूंजीवादी मुल्क या किस समृद्ध-खुशहाल जनतांत्रिक देश का बड़ा नेता अपनी राष्ट्रीयता से पहले अपने धर्म का उल्लेख करता है! लेकिन मोदी एक खतरनाक विरासत के संवाहक हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के ‘आदर्श राष्ट्र’ अमेरिका के राष्ट्रपतियों की तरह अपनी राष्ट्रीयता को सर्वोपरि नहीं माना, सबसे पहले अपने धार्मिक विश्वास को चिह्नित करते हुए अपना परिचय दिया।

इसके कुछ ही दिनों बाद, नरेंद्र मोदी ने चौदह जुलाई को पुणे के मशहूर फर्ग्युसन कॉलेज में छात्र-युवाओं को बीच कांग्रेस और यूपीए सरकार को जमकर कोसा। उनके भाषण के एक खास वाक्य को ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने अपनी सुर्खी के तौर पर पेश किया। वह वाक्य था- ‘संकट में फंसने पर कांग्रेस पार्टी सेक्युलरिज्म का बुर्का   ओढ़ लेती है।’ वे चाहते तो अपनी बात को ज्यादा संयत-शालीन और सीधे ढंग से भी कह सकते थे। पर कांग्रेस और सेक्युलरिज्म के साथ उन्होंने बुर्का शब्द जोड़ा ताकि दोनों को एक खास प्रतीकात्मक ढंग से जोड़ा जा सके।

मोदी चाहते तो कह सकते थे कि कांग्रेस ‘सेक्युलरिज्म की चादर’ ओढ़ लेती है। चादर ज्यादा व्यवहार में लाई जाती है; इसका प्रयोग हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और नास्तिक, सभी करते हैं। पर उन्होंने बुर्का शब्द का इस्तेमाल जान-बूझ कर किया। यही नहीं, उन्होंने कांग्रेस और बुर्के के साथ ‘बंकर’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने गलतफहमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। एक समुदाय विशेष के पहनावे को प्रतीक बना कर उन्होंने उसका रिश्ता एक सामरिक प्रतीक से जोड़ने की कोशिश की, आतंक की तरफ इंगित करने के लिए। समाज के कुछ हिस्सों में उत्तेजना और विवाद पैदा करने के लिए यह उन्हें जरूरी लगा होगा।

ठीक इसी तरह, कुछ दिनों पहले मोदी ने 2002 के गुजरात दंगों में मारे गए अल्पसंख्यक समुदाय के हजारों लोगों के बारे में पूछे एक सवाल के जवाब में कहा था कि वे गाड़ी में पीछे बैठें हों और चलती गाड़ी के नीचे कुत्ते का बच्चा आ जाए, तो भी उन्हें दुख होगा। कुछ मोदी-भक्तों को गुजरात के मुख्यमंत्री के इस वाक्य में स्वाभाविक मानवीय करुणा नजर आई। पर कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति जब मोदी के जवाब को पत्रकार द्वारा पूछे सवाल के संदर्भ में देखेगा तो अल्पसंख्यकों के प्रति उनके खास रवैये का आसानी से अहसास हो जाएगा। 
इस तरह की अभिव्यक्तियां जुगुप्सा भरी हैं और इनसे निरंकुशता की बू आती है। कोई भी पूछ सकता है कि गुजरात के दंगों में हजारों लोगों के मारे जाने के लिए सूबे के मुखिया के तौर पर मोदी साहब ने आज तक देश की जनता से माफी क्यों नहीं मांगी?

माफी की बात दूर रही, उन्होंने ईमानदार ढंग से आज तक अफसोस भी नहीं जताया। गुजरात का दंगा कोई दुर्घटना नहीं था। वह एक योजना के तहत हुआ था। पर सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय सूबे के मुख्यमंत्री कुत्ते के बच्चे के दुर्घटनावश गाड़ी के पहिए से कुचलने का जिक्र कर रहे हैं!

आश्चर्य है, यह एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की भाषा है, जो भारतीय जनता पार्टी की तरफ से देश के प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार बन कर उभरा है। मोदी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। वे जान-बूझ कर राजनीतिक शिष्टता, प्रोटोकॉल और सभ्य सामाजिक मूल्यों की अवहेलना करते रहते हैं। मियां मुशर्रफ (पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के लिए), अहमद मियां (कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के लिए) जैसे ढेर सारे उनके जुमले यह साबित करने के लिए काफी हैं कि राजनीतिक विमर्श में वे हमेशा असहज रहते हैं और आए दिन सामाजिक शिष्टाचार की मर्यादा खोते रहते हैं।

नरेंद्र मोदी अपनी ही दक्षिणपंथी राजनीतिक धारा के दिवंगत श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दिवंगत दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, यहां तक कि लालकृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी जैसे व्यवस्थित मन:स्थिति के नेता नहीं हैं। भाषा में सांप्रदायिक विद्वेष भरी चुटकलेबाजी करते हुए वे हमेशा सहज मानवीय मूल्यों के भी खिलाफ खड़े दिखते हैं। इसे वे अपना ‘यूएसपी’ समझते हैं। पर दक्षिणपंथी धारा के नेताओं की कतार में वे एक नेता और वक्ता के तौर पर भी पिद्दी दिखते हैं। न तो उनके चिंतन में गंभीरता दिखाई देती है, न आचरण में मानवीयता। एक अजीब तरह की गुस्सैल खुर्राहट से वे भरे दिखते हैं। क्या ऐसी शख्सियत आज के जटिल वैश्विक परिदृश्य में भारत जैसे महादेश की अगुआई कर सकती है?

उनकी एक-एक गतिविधि और हरेक भाषण से महसूस किया जा सकता है कि राजनीतिक चिंतन के स्तर पर वे बेहद अनुदार और एकपक्षीय हैं। समाज में ‘सौ फूलों को खिलने दो’ की जनतांत्रिक धारणा के वे हर समय सख्त खिलाफ दिखते हैं। वामपंथियों को वे राजनीतिक विरोधी के रूप में नहीं लेते, राष्ट्रद्रोही बताते हैं। इसी तरह वे कांग्रेस को हराने या जनता में उसका पूरी तरह से पर्दाफाश करने की बात नहीं कहते, वे कहते हैं कि वे भारत को ‘कांग्रेस-मुक्त देश’ बनाना चाहते हैं।

यह सही है कि आज देश की जनता का बड़ा हिस्सा कांग्रेसी कुशासन से बेहद क्षुब्ध है, पर ‘कांग्रेस-मुक्त देश’ जैसे जुमले में मुझे जनतांत्रिकता की नहीं, निरंकुशता की गंध आती है। ऐसी निरंकुशता को एक समय कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी ने अपने कार्यक्रम का हिस्सा बनाया था। वे विपक्ष-रहित राष्ट्रीय राजनीति चाहती थीं। पर उनकी ‘इमरजेंसी’ का देश की जनता ने सन 77 में माकूल जवाब दे दिया। विविधता से भरे इस महादेश में मोदी का संकीर्ण राजनीतिक सोच क्या हमारे विकासशील जनतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा नहीं है?