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05 जून 2015

वे कुछ सिल रहे हैं, उनका जीवन उधड़ रहा है

रिपोर्ट

TAILOR-MADE LIVES: Accidents and Discontent among the Garment Industry Workers in Udyog Vihar, Haryana

12 फरवरी 2015 को उद्योग विहार, गुड़गांव में कपड़ा फैक्ट्रियों के सैंकड़ों मज़दूर सड़कों पर आ उतरे और कुछ फैक्ट्रियों की बिल्डिंगों पर पत्थर फैंके | उन्होंने अफ़वाह सुनी थी की उनके एक साथी मज़दूर समी चंद की मौत हो गई है | बाद में पता चला कि समी चंद की मौत नहीं हुई थी, पर दो दिन पहले उसके साथ बुरी तरह मार पीट की गई थी | वह गौरव इंटरनाश्नल (प्लाट संख्या 236, उद्योग विहार, फेज़ 1) में काम करता था और 10 फरवरी को काम पर देरी से पहुँचने पर कम्पनी के अफसरों और कर्मचारियों ने उसे मिलकर पीटा था | इस घटना की खबर सभी अखबारों में छपी थी | पी.यू.डी.आर. और पर्सपेक्टिव्स ने तय किया की वह इस घटना की एक जॉइंट फैक्ट-फाइंडिंग (सम्मिलित जांच) करेंगे | टीम सामी चंद, उसकी पत्नी और भाई से मिली | साथ ही टीम सूबे सिंह (एस.एच.ओ., उद्योग विहार थाना), अमरदीप डागर (जनरल मेनेजर - ह्यूमन रिसोर्सेस और एडमिनिस्ट्रेशन, रिचा एंड कंपनी), गिरफ्तार हुए मज़दूरों में से एक के वकील, और कापसहेड़ा में रह रहे कुछ मज़दूरों से भी मिली |
फैक्ट-फाइंडिंग के दौरान, टीम को उद्योग विहार के कपड़ा उद्योग में काम कर रहे मज़दूरों के जीवन के बारे में जानने का मौका मिला | टीम ने उनके काम और रहने की परिस्थितियों को जाना | और यह जानने की कोशिश की कि इस इलाके में बार-बार हो रही हमले और हादसे की घटनाओं का इन परिस्थितियों से कोई नाता है या नहीं |
टीम की रिपोर्ट निम्नलिखित बातों को उजागर करती है -
1. 10 फरवरी की घटना में दो प्राथिमिकियाँ दर्ज़ हुई हैं - एक समी चंद और दूसरी मैनेजमेंट द्वारा | परिणामस्वरूप, गौरव इंटरनेशनल के 9 कर्मचारी गिरफ्तार हुए जो की अब बेल पर बाहर हैं | दूसरी तरफ 4 मज़दूर गिरफ्तार हुए हैं, जिनमें से 2 की बेल की अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी गई हैं | समी चंद, जिसके साथ मार पीट की गई थी, और उसकी पत्नी और भाई को प्राथिमिकी में अफ़वाह फैलाने के लिए नामजद किया गया है |
2. 10 फरवरी की घटना कपड़ा उद्योग में घट रही अनेकों घटनाओं एवं हादसों में से एक थी | ये घटनाएं यहाँ के मज़दूरों के बीच पनप रही असंतुष्टि और काम की खराब परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करती हैं |
3. भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक ब्रैंड्स के लिए कपड़े बनाए जाते हैं | उद्योग विहार इलाके की कपड़ा यूनिट्स इनमें से एक हैं | कम से कम 1990 के दशक से मज़दूरों को 'चेन सिस्टम' या असेम्बली लाइन में काम करवाया जा रहा है जिसमें हर मज़दूर एक छोटे कार्य के लिए ज़िम्मेदार होता है, जैसे कमीज़ का कॉलर या एक बाजू सिलना आदि |
4. अधिकाँश मज़दूर उत्तर प्रदेश या बिहार से आए प्रवासी मज़दूर हैं, जिनमें अधिकतर मुसलमान हैं | 15-20 साल इस इलाके में काम करने और रहने के बावजूद इनके पास न तो राशन कार्ड हैं, और न ही वोटर कार्ड |
5. हालांकि मज़दूरों को हरियाणा सरकार की अधिसूचना के अनुसार न्यूनतम मज़दूरी मिलती है, पर इनकी तनख्वाह की क्रय-शक्ति में लगातार गिरावट हो रही है | इसका मतलब वे उस तनख्वाह से पहले से कम खरीददारी कर सकते हैं | सब दर्जियों में से सबसे विशेषाधिकृत दर्जी का भी मूल मासिक वेतन केवल 6203 रुपय है | और यह 2015 में हुए आखिरी बढ़त के बाद की स्थिति है |
6. कम वेतन की वजह से ओवरटाइम आम बात हो गया है | कईं मज़दूर हर महीने 100 घंटे तक ओवरटाइम करते हैं (जबकि कानूनी तौर पर हर तीन महीने में केवल 50 घंटे के ओवरटाइम की अनुमति है) | गौरतलब है की हाल में केंद्र द्वारा फैक्ट्रीज एक्ट (1948) में प्रस्तावित संशोधन ओवरटाइम की इस स्वीकृत सीमा को दुगना (तीन महीने में 100 घंटे) करने की बात करता है [अनुच्छेद 64 का प्रस्तावित संशोधन] |
7. फैक्ट्रियों द्वारा लगातार अलग-अलग तरीकों के प्रयोग से कार्य की तीव्रता और गति को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है | इसके कारण कई बार सुरक्षा उपायों का पालन नहीं हो पाता है क्योंकि वे काम की गति को धीमा करते हैं | ऐसे में हादसे अक्सर होते हैं |
कपड़ा उद्योग में हादसे और मज़दूरों के क्रोध को दर्शाती घटनाएं, उनके असुरक्षित और संकटपूर्ण जीवन का प्रमाण हैं | ध्यान देने योग्य है की ये ही असुरक्षित मज़दूर भारतीय अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सेक्टर का हिस्सा हैं |
रिपोर्ट की प्रति इस लिंक पर उपलब्ध हैं | हार्ड कॉपी के लिए सचिव को संपर्क करें |

26 मार्च 2015

युद्ध-क्षेत्र में आदिवासी जिंदगियाँ : बीजापुर के गावों में सुरक्षा कैंप के बीच असुरक्षित जीवन

26 से 31 दिसंबर 2014 के बीच पी.यू.डी.आर. का एक जांच दल छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के 9 गावों में गया | जांच दल ने इन क्षेत्रों में माओवादियों से लड़ने के लिए तैनात सुरक्षा बलों के द्वारा की जा रही गिरफ्तारियों, धमकियों, एवं उत्पीड़न के साथ-साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाओं को दर्ज़ किया | मुख्यतः आदिवासी, इन गावों (सार्केगुड़ा, राजपेटा, कोट्टागुड़ा, पुसबाका, तीमापुर, लिंगागिरी, कोरसागुड़ा, बासागुड़ा, कोट्टागुडेम) के निवासियों ने सुरक्षा कैम्पों में रह रहे सशस्त्र बलों द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले अपराधों तथा हिंसक गतिविधियों के तथ्य बयान किये | सुरक्षा बलों द्वारा लगातार इन 'क्षेत्रों में प्रभुत्व' स्थापित करने के प्रयास के दस्तावेज़ीकरण के अलावा, यह रिपोर्ट निम्न बिन्दुओं पर विशेष ध्यान आकर्षित करती है -
1. आबादी की एक बड़ी संख्या के खिलाफ 'स्थाई वारंट' जारी किये गए हैं और इनमें से एक बड़ी संख्या को 'फरार' घोषित कर दिया गया है | एक मोटा आंकलन यह दिखाता है की केवल बीजापुर में ही कम से कम 15 से 35 हज़ार लोग 'स्थाई वारंट' के आतंक और भय के साये में जी रहे हैं |
2. सशस्त्र बल और स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एस.पी.ओ.) बेलगाम तरीके से अवैध बर्ताव करते हैं जैसे की नियमतः आदिवासी ग्रामीणों के घरों पर छापा मारना, पिटाई करना, लूट-पात, हवालात में बंद करना तथा उनको सुरक्षा कैम्पों में 'बेगार' (मुफ्त श्रम) करने के लिए बाध्य करना | यौन-उत्पीड़न के मामले भी सामने आये |
3. एक ओर सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज़ करने की असंभवता और दूसरी ओर जेलों में बंद ग्रामीणों की गिरफ्तारियों की बढ़ती संख्या |
4. कैम्पों में आपूर्ति-प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु सेना द्वारा बढ़ते स्तर पर सड़क-निर्माण कार्यों की वजह से सशस्त्र बलों की उपस्थिति में अधिक्यता | सड़कों को खोलने का काम सशस्त्र बलों द्वारा सड़क उदघाटन अभ्यास के बाद ही किया जाता है और तत्पश्चात सड़क-अवरोधकों तथा चेक पोस्टों पर बार-बार यात्रियों को रोका जाता है | यह रोज़ाना का सिलसिला है |
5. बीजापुर और बासागुड़ा के बीच चलने वाली सार्वजनिक बसों में सशस्त्र बलों के जवानों के होने के कारण ग्रामीणों को यात्रा के दौरान उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है | अंतर्राष्ट्रीय नियमों की घोर अवहेलना करते हुए, सुरक्षा बल जान-बूझकर संभाव्य मुठभेड़ों के खिलाफ यात्रियों को 'मानवीय कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं |
6. आदिवासी ग्रामीणों की जीवन-स्थिति पर कैम्पों ने बहुत बुरा प्रभाव डाला है | कृषि-कार्यों में कमी और परिणामस्वरुप पारिवारिक आय और वेतनों में गिरावट इस उत्पीड़न का निश्चित परिणाम है | ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही वर्तमान स्कूल व्यवस्था (जिसके तेहत स्थानीय ग्रामीण सहायकों की सेवाएं ली जा रही थी) को अब इरादतन 'आश्रम स्कूलों' में बदला जा रहा है और इसका मकसद आदिवासी बच्चों को उनके घरों और ग्रामीण परिवेश से खींच लेना है |
7. वर्तमान परिस्थिति की प्रबलता सलवा जुडूम की गतिविधियों (2005 से 2009 के बीच ग्रामीणों के बेदखली और सामूहिक विस्थापन) से तुलनीय है और उसको आगे बढ़ाती है | वर्तमान परिस्थिति केवल विस्थापन और यतित पुनर्वास की दुर्गति को रेखांकित करती है जिसके तेहत पहले भी ग्रामीणों को गुज़रने के लिए बाध्य किया गया था |
8. माओवादियों द्वारा बारम्बार किये जा रहे बम विस्फोटों तथा सड़कों को निशाना बनाये जाने के बावजूद, ग्रामीण सुरक्षा कैम्पों से डरते हैं क्योंकि वे सशस्त्र बल ही है जो उन्हें प्रताड़ित करते हैं और उनके खिलाफ नृशंस व्यवहार करते हैं |
9. क्रमबद्ध आवधिक जनसंहारों के साथ-साथ इस क्षेत्र में दैनिक उत्पीड़न राज्य द्वारा चलाए जा रहे युद्ध की दोहरी रणनीति का हिस्सा है |
10. वर्तमान सैन्य उपक्रम के पीछे यही मंसूबा है की खनन गतिविधियों को और अधिक बढ़ाने के लिए क्षेत्र को साफ कर दिया जाए | उद्देश्य यह भी है की आदिवासियों की राज्य का विरोध करने की इच्छशक्ति को ख़त्म कर दिया जाये और उन्हें आधिकारिक प्रयासों को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाये|

03 सितंबर 2013

गडचिरौली मुठभेड़: मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट

दख़ल की दुनिया के लिए हिन्दी में अनुवाद किया है प्रेम प्रकाश ने. 
गडचिरोली जिले में इस वर्ष मुठभेड़ की छः वारदातों की खबरें मीडिया व प्रेस में आयीं। इन मुठभेड़ों में कुल 26 व्यक्तियों की जिंदगी खत्म हो गई। जहाँ पर मुठभेड़ हुई वहाँ के लोगों ने पुलिस द्वारा बताई गयी बात की सच्चाई पर सवाल खड़े किए हैं।  
            विभिन्न राज्यों के अखिल भारतीय नागरिक आजादी और जनतांत्रिक अधिकारों की संयुक्त संस्था जनतान्त्रिक अधिकार संगठनों का समन्वय (सी.डी.आर..) ने भारतीय जन वकील संघ (इंडियन एसोशिएसन आफ पीपुल्स लायर) के साथ मिलकर सत्य को सुनिश्चित करने के लिए तथ्यों की जाँच-पड़ताल को अंजाम दिया। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दिल्ली के सात संगठनों के 23 सदस्यीय दल ने 23 से 26 अगस्त 2013 तक गडचिरोली जिले का दौरा किया। दल नें पाँच गाँवों-  धानोरा तहसील के सिंदेसुर, कुरखेड़ा तहसील के भगवानपुर, एटापल्ली तहसील के मेंधरी और अहेरी तहसील के गोविंदगाँव व भाटपार का भ्रमण किया जहाँ मुठभेड़ हुई थी। जाँच दल नें पांचों गाँवों के लोगों, जन प्रतिनिधियों, मीडिया के लोगों, राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों और पुलिस से मुलाक़ात की। 
जाँच दल की तात्कालिक प्राप्तियाँ निम्नलिखित हैं:
1.      सभी पांचों घटनाओं में पुलिस द्वारा पहले गोलाबारी शुरू की गयी। भगवानपुर और गोविंदगाँव की  घटनाओं  में जो लोग मारे गए उनकी तरफ से कोई जवाबी गोलाबारी नहीं हुई।
2.         सभी पांचों घटनाओं में पुलिस द्वारा चेतावनी व समझाने का कोई प्रायस नहीं किया गया। पुलिस द्वारा तथाकथित माओवादियों से अपना हथियार डालने के लिए कोई घोषणा नहीं की गई। भगवानपुर, मेंधरी, गोविंदगाँव और भाटपार की घटनाओं में जहाँ लोग पुलिस द्वारा चारो तरफ से घेर लिए गए थे, पुलिस द्वारा आत्मसमर्पण करने के लिए घोषणा नहीं की गई और लोगों को बाद में मार डाला गया।
3.         मेंधरी और भगवानपुर की घटनाओं में हुई हत्याएं फर्जी मुठभेड़ थी। मेंधरी गाँव में छः महिला माओवादियों ने मारे जाने से पहले ही अपने हथियार डाल दिये थे और समर्पण कर दिया था। भगवानपुर में जो व्यक्ति मारा गया वह मारे जाने से पहले पुलिस हिरासत में था।
4.      भगवानपुर, मेंधरी और भाटपार गाँव की घटनाओं में गाँव वालों को पुलिस द्वारा बुरी तरह पीटा गया। भगवानपुर में 10 व्यक्तियों को सारी रात सड़क पर पीटा गया। मेंधरी में एक व्यक्ति को पुलिस द्वारा लोगों को पीटने तथा दुर्व्यवहार से बचाने के लिए गोली मार दी गयी। भाटपार गाँव के तीन लोगों को दो दिन तक पुलिस स्टेशन में रोक कर रखा गया और पीटा जाता रहा। 
5.    मुठभेड़ में हत्या की सभी घटनाओं में यह अनिवार्य है कि अपराध की जाँच ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा हो जो हत्या में शामिल पुलिस बल और पुलिस स्टेशन से स्वतंत्र हो। हमारी अधिकतम जानकारी के अनुसार इसका पालन नहीं किया गया।
6.       पुलिस अधीक्षक नें हमसे कहा की उचित पंजीयन और जाँच को सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक मुठभेड़ में हत्या की आंतरिक जाँच एक उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी द्वारा की जा रही है। यद्यपि उसने पुष्ट किया कि इन घटनाओं की जाँच रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है। आंतरिक जाँच होने की वजह से इसमें न तो पारदर्शिता होगी और न ही निष्पक्षता।
7.       मेंधरी मुठभेड़ मामले में मजिस्ट्रेट स्तर की जाँच का आदेश दिया गया है। परंतु हमें मजिस्ट्रेट द्वारा ग्रामीणों के बयान दर्ज करने के प्रयास का एक भी साक्ष्य नहीं मिला। किसी भी तरह अधिशासी मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच इस तरह के मामले की जाँच में निष्पक्षता नहीं प्रदान कर सकती।
8.      कम से कम सिंदेपुर की दो हत्याओं को “द्विपक्षीय क्षति कहा जा सकता है। पुलिस और प्रशासन का इस मामले में रवैया अत्यंत निर्मम है। गाँव के दो युवा लड़के दो-तरफा गोलाबारी में मारे गए। अभी तक उन परिवारों को न तो कोई मुआवजा मिला और न ही राज्य द्वारा उन परिवारों से कोई संवेदना प्रकट की गई। इसके विपरीत सरकार ने बड़ी फुर्ती से अपने मानवीय सरोकार” के प्रमाण के रूप में प्रत्येक परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता के बड़े विज्ञापन बोर्ड जिले भर में लगा दिया है।
9.   भाटपाल गाँव में मारी गई महिलाओं में से एक उसी गाँव की निवासी थी। उसके माँ-बाप के अनुनय-विनय और सारे गाँव के पुलिस थाने पर इकट्ठा होने के बावजूद पुलिस ने अंतिम अधिकार के रूप में मृत शरीर को उन्हें देने से इंकार कर दिया। यह अत्यंत निंदनीय है। अन्य मामलों में भी लाशें लंबे समय तक बिना पहचाने ही पड़ी रहीं, उनकी तस्वीरें प्रकाशित नहीं की गईं तथा माँ-बाप व संबंधियों को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया व अंतेष्टि में शामिल होने की संभावना को खत्म कर दिया गया।   
           
उपरोक्त के प्रकाश में सीडीआरओ इस विचार पर पहुंचा है कि पांचों मुठभेड़ों में हुई जीवन की क्षति को आसानी से बचाया जा सकता था। पुलिस और सुरक्षा बलों के क्रिया-कलाप को निर्देशित करने के लिए आरपीसी में दिये गए स्थापित मानकों का पालन इस उद्देश्य के लिए पर्याप्त हो सकता था। इन परिस्थितियों में गोलाबारी करना गाँव के हिसाब से गलत  था जो न तो आत्म रक्षा” और न ही दोषियों” को हिरासत में लेने की दृष्टि से उपयोगी था। वास्तव में उपरोक्त प्रत्येक मामला दोषियों को हिरासत में लेने की अत्यधिक असफलता थी।  यह शक्ति का अतिरिक्त व अनाधिकृत गठन था।   
            समान तरह की घटनाओं की लगातार पुनरावृत्ति बताती है कि बंदियों के लिए कोई कार्यकारी नीति नहीं है और उनको माओवादी होने के संदेह में मारा जा रहा है। यह प्रशासन द्वारा विभिन्न जगहों पर लगाए गए बैनर में स्पष्ट दिखाता है जो मेंधरी में मारी गई महिला माओवादियों की तस्वीरों से भरा है । यह कहता है कि सामान्य जनतेवार अन्याय करल, तार पोलिसांच्या बंदुकीनेच मारल (अगर तुम सामान्य जन के साथ अन्याय करोगे तो तुम पुलिस की बंदूकों से मारे जाओगे)
            इस तरह पुलिस के खतरे की एक झलक को इस बंदूक के आनंद की प्रवृत्ति में देखा जा सकता है जो भगवानपुर की घटना में दिखाई दी। उपचारात्मक उपायों से दूर पुलिस अधीक्षक गडचिरोली ने पुलिस की भाषा ही दोहराते हुये कहा कि इससे कोई मतलब नहीं की यह कितना अविश्वासनीय है कि सामान्य ग्रामीण रहवासी जोकि माओवादियों से संबन्धित नहीं है पुलिस पर गोलाबारी किए जबकि उनसे रुकने के लिए कहा गया। इस तरह की नीति भविष्य में भयानक अनहोनी की पूर्व-सूचना देती है ।      
            चारो मामले में पुलिस का विवरण हमारी खोज तथा ग्रामीणों के विवरण से गंभीर रूप से भिन्न है। प्रेस को दी गई पुलिस रिपोर्ट तथा एफ़आईआर चौंकाने वाली है जिसमें कहा गया है कि जाँच पूर्णतया हत्या में शामिल पुलिस दल के विवरण पर आधारित है। यह नागरिक न्यायशास्त्र के विचार से पूर्णतया उलट है। हत्यारा, सूचनादाता, जाँच और न्यायाधीश एक दूसरे से अलग होने चाहिए। और यह कानून तथा व्यवहार में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 
उपरोक्त के प्रकाश में हम मांग करते हैं कि:
           
1.      बंदियों को गिरफ्तार करने के बजाय उनको जान से मारना तथा अधिकतम नुकसान पहुंचाना अवश्य ही बंद किया जाय।
2.       मुठभेड़ के सभी मामलों में जिम्मेदार पुलिस दल के खिलाफ आपराधिक मानवहत्या की एफ़आईआर दर्ज हो। इसकी जाँच दूसरे जिले के पुलिस अधिकारी को सौंपी जाय।
3.      भाटपाल, मेंधरी और भगवानपुर की घटनाओं में जहाँ लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया, की न्यायिक जाँच की जाय।
4.      न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रत्येक मुठभेड़ की घटना की मजिस्ट्रेट स्तरीय जाँच की जाय और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान उनके घर पर भयमुक्त वातावरण में दर्ज किया जाय तथा इस तरह के गवाहों पर भविष्य में पुलिस प्रताड़ना के मामलों को रोकने के लिए कदम उठाए जाएँ।
5.      भगवानपुर से गिरफ्तार दो व्यक्तियों को अविलंब रिहा किया जाय।
6.      भगवानपुर गाँव के देवराव व बुधनाथ के परिवारों को अविलंब मुआवजा दिया जाय। 

द्वारा जारी: 
·       जनतान्त्रिक अधिकार संघ,पंजाब (Association for Democratic Rights, Punjab)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा संघ, पश्चिम बंगाल(Association for the Protection of Democratic Rights, West Bengal)
·        नागरिक स्वतन्त्रता समिति, आंध्र प्रदेश (Civil Liberties Committee, Andhra Pradesh)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा समिति, मुंबई (Committee for the Protection of Democratic Rights, Mumbai)
·       भारतीय जन वकील संघ (Indian Association of People’s Lawyers)
·       जंतान्त्रिक अधिकार रक्षा संगठन, आंध्र प्रदेश(Organisation for the Protection of Democratic Rights, Andhra Pradesh)
·       जंतान्त्रिक अधिकार जनसंघ, दिल्ली (People’s Union for Democratic Rights, Delhi)


गाँव की जाँच-प्राप्ति  का विवरण: संक्षिप्त रूप
(Village Accounts of our Findings – Short Version)

1-गोविंदपुरगाँव, अहेरी तहसील: 11 जनवरी को मावोवादियों के 11 सदस्यीय समूह की  ग्रामीणों के साथ शाम 7 बजे बैठक हुई। बैठक के दौरान माओवादियों नें गाँव में शराब उत्पादन और शराब पीने की बंदी के लिए, परिवार में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए, ग्रामीणो में झगड़े और तनाव को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने और बिजली के तारों से शिकार के खतरनाक तरीकों को बंद करने के लिए अभियान चलाया। उन्होने  सरकार की लघु-बचत योजना बचत घट के विरोध का लोगों से आह्वान किया। गाँव में रात्रि भोज के बाद मावोवादी दल बस्ती से अभी बाहर गया ही होगा कि “सुरक्षा बल” के लोगों ने ग्रामीणों को घेर लिया और उन पर गोलियां बरसाने लगे।
            छः व्यक्ति वारदात की जगह पर ही मारे गए जबकि बाकी माओवादी बच निकलने में  सफल हो गए। प्रतिरक्षा में माओवादियों द्वारा कोई गोलीबारी नहीं की गई। मृतकों में दो महिलाएं थी। गाँव से कुछ व्यक्तियों को मृतकों की पहचान के लिए लाया गया।

2- भगवानपुर, कुरखेडा तहसील: 16 जुलाई 2013 को रात के लगभग 10 बजे गाँव के 11 लोग जंगल में शिकार के लिए गए। उसमें से 8 लोग तीन स्कूटरों पर गए जिसके कुछ देर बाद तीन लोग दूसरे स्कूटर पर गए। बाद में गए लोग अपने साथ एक भामार (एक देशी बंदूक), एक कुल्हाड़ी, एक चाकू तथा एक टोपी वाली टार्च ले गए।  
करोडी गाँव के महात्मा फुले स्कूल के नजदीक मुख्य सड़क पर उन्होन्नें सी – 60 कमांडो दल को देखा और जल्दी से निकल जाने का निश्चय किया। पुलिस दल जो तीन गाड़ियों में था ने उनका पीछा किया और उन्हें रोक लिया। उनमें से तीन ग्रामीणों नें पुलिस को समझाने की कोशिश की कि उनके 8 साथी नीचे है। लेकिन सब कुछ अनसुना कर पुलिस द्वारा पीटे जाने के बाद आनंदराव मार दिया गया। आनंदराव घटना की जगह पर ही गिर गया और मर गया उसकी पसलियों के ठीक नीचे दो गोली मारी गई थी। साक्षियों ने बताया कि जिन पुलिस वालों  ने आनंदराव को मारा वे उसे पहले से जानते थे।   
            पुलिस ने अन्य आठ व्यक्तियों के लौटने की प्रतीक्षा की और उन्हें पकड़कर भोर के 4 बजे तक लगातार पीटती रही जबकि 10 ग्रामीणों व लाश को दो गाड़ियों में अरमोरी पुलिस थाने लाया गया। वहाँ आनंदराव के साथ दो व्यक्तियों देवराव राजाराव उसेंदी तथा बुधनाथ पांडुरंग तुलावी पर आईपीसी की धारा 307 व 353 के तहत केस दर्ज की गई। वर्तमान में वे दोनों चंद्रपुर केंद्रीय जेल में बंद हैं। बाकी बचे लोगों को जिन्हें पुलिस नें हवालात में बंद कर रखा  था बाद में छोड़ दिया गया।   

3- सिंदेसूर, धनोरा तहसील: 12 अप्रैल की सुबह सिंदेसूर गाँव से 12 लोगों का एक समूह पहाड़ी की तली में अपने खेतों के निकट जंगल से महुआ के फूलों को इकट्ठा कर रहा था। कुछ समय बाद चार माओवादी वहाँ आए और उन्होनें 20 साल के दो लड़कों से गाँव से पीने के लिए पानी लाने को कहा। जब ये लड़के पानी लेकर लौट रहे थे तो पुलिस ने अचानक आकार गोलीबारी शुरू कर दी। परिणाम स्वरूप जवाबी गोलीबारी हुई और दोनों लड़के उसकी चपेट में आ गए। दोनों ही मुकेश दुरु हुड़को तथा सुखदेव वरलू गवडे मारे गए। गोलीबारी के अंत में एक पुलिस  और चार माओवादी मृत पाये गए। दो मृतक ग्रामीण लड़कों के लिए मुआवजे की घोषणा की गई है परंतु अभी तक वह अंधेरे में ही अटकी हुई है।

4- मेंधरी, एटापल्ली तहसील: 7 जुलाई की सुबह 6 औरतों व दो पुरुषों का एक मावोवादी समूह गाँव के निकट एक नाले के पास था। उनमें से दो औरतें नहाने के लिए नाले में गईं तथा शेष गाँव की एक युवती के साथ चाय पीते हुये बातचीत करनें लगीं जबकि दो पुरुष सदस्य गाँव में चीनी तथा चाय खरीदने चले गए। नजदीक ही एक पुलिस को छिपते हुये देखकर गाँव की युवती अपने घर भाग गई और उसके कुछ क्षण बाद ही गोलीबारी शुरू हो गई। महिला मावोवादी अपना बैग वहीं छोड़कर बंदूकों के साथ दौड़ीं तथा जवाबी गोलीबारी शुरू हो गई। बिना युद्ध सामाग्री के भागते हुये महिलाओं नें गाँव की शरण लेने की कोशिश की लेकिन पुलिस नें खुले खेतों में उनका पीछा किया। दूसरी तरफ से अन्य पुलिस वाले आ गए और महिलाओं ने अपने आपको फंसा हुआ पाया, उन्होने अपनी बंदूकें फेंक दीं तथा आत्मसमर्पण में अपने हाथ उठा दिये। उनमें से एक नें अपनी बंदूक फेककर उसी खेत में महुआ के पेड़ पर चढ़ गई। इसके बाद पुलिस महिलाओं के निकट पहुंची, आत्मसमर्पण की हुई महिलाओं को नजदीक से मारा तथा पेड़ पर छिपने का प्रयास कर रही महिला को भी मार गिराया। 10 से अधिक गाँव वालों को खींचकर बाहर लाया गया और उन्हें पीटा गया जबकि वे मृतकों को पहचानने में असमर्थ थे। एक ग्रामीण को तब मार दिया गया जब वह शवों से दूर भागने की कोशिश कर रहा था।     

5- भाटपार, अहेरी तहसील: तीन अप्रैल की शाम चार सशस्त्र मावोवादियों का एक समूह ग्रामीणों के साथ बैठक कर रहा था। बाद में उस रात वे गाँव छोड़ दिये और आधा किलोमीटर दूर नदी के किनारे रुके। उनके साथ गाँव की दो औरतें भी थीं। दूसरे दिन तड़के सुबह गाँव वालों नें गोली की आवाज सुनी और उनमें से एक औरत भागती हुई गाँव में आई। बाकी पांचों की लाशों को पुलिस नदी के इस पार लायी। गाँव वालों नें पुलिस से कुम्मा ताड़ो की बेटी सुनीता की लाश को परिवार वालों को देने की मांग की। पुलिस नें लोगों को दूर रहने की चेतावनी दी, जबकि तीन ग्रामीणों को खेत से पकड़ा, उनको पीटा और अपने साथ धोजराज पुलिस थाने लाये। अगले दिन सुबह अधिकतम ग्रामीण थाने गए और मृतक की लाश को वापस करने तथा चार ग्रामीणों को छोड़ने की मांग किए। वे चार ग्रामीणों के साथ वापस आए। लाश को कभी भी परिवार वालों को नहीं सौंपा गया। 
जनतान्त्रिक अधिकार संगठनों का समन्वय
(Coordination of Democratic Rights Organisations)

27 सितंबर 2011

हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है, मुसलमानों का कौन है?


भरतपुर हत्याकांड: प्राथमिक रिपोर्ट
जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के 11 छात्रों की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम राजस्थान के भरतपुर जिले में हुए गोपालगढ़ हत्याकांड के कारणों और घटनाक्रम का पता लगाने के लिए 25 सितंबर को गोपालगढ़ और आसपास के गांवों में गई. इस टीम में शामिल थे: अनिर्बान (डीएसयू, जेएनयू), अनुभव (डीएसयू, जेएनयू), आनंद के राज (जेएनयू), गोगोल (डीएसयू, जेएनयू), रेयाज (डीएसयू, जेएनयू), श्रीरूपा (जेएनयू), श्रिया (डीएसयू, जेएनयू), अदीद (सीएफआई), शोभन (डीएसयू, डीयू) और सुशील (डीएसयू, डीयू). इस दौरान हम चार गांवों में गए और हमने तीन दर्जन से अधिक लोगों से बात की. इस हत्याकांड में मारे गए लोगों के परिजनों, घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीद गवाहों और हत्याकांड में जीवित बच गए लोगों, घायलों और पीड़ित समुदाय के दूसरे अनेक सदस्यों से हुई बातों के आधार पर हम मुसलिम समुदाय पर प्रशासन के पूरे संरक्षण में हुए इस सांप्रदायिक फासीवादी हमले की आरंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं. आगे हम एक विस्तृत रिपोर्ट भी जारी करेंगे.

गोपालगढ़ के लिए रवाना होते समय हमारे पास इस हत्याकांड से जुड़ी जानकारियां सीमित थीं. अखबारों और दूसरे समाचार माध्यमों को देखते हुए लगा कि इस हत्याकांड के खबरों को जान-बूझ कर छुपाया जा रहा है. जिन कुछेक अखबारों में इसकी खबरें आईं भी, वो आधी-अधूरी ही नहीं थीं, बल्कि उनमें घटनाओं को पुलिस और सरकार के नजरिए से पेश किया गया था. इसने पीड़ितों को अपराधियों के रूप में और अपराधियों को पीड़ितों के रूप में लोगों के सामने रखा. केवल एक अंगरेजी अखबार ने कुछ खबरें प्रकाशित की थीं, जिनमें पीड़ित मुसलिम समुदाय का पक्ष जानने की कोशिश की गई थी और इस हत्याकांड के पीछे की असली ताकतों के संकेत दिए गए थे.
ये संकेत तब नामों और चेहरों में बदल गए जब हम भरतपुर जिले में दाखिल हुए. जिले के पापरा, जोतरू हल्ला (अंधवाड़ी), ठेकरी, हुजरा, पिपरौली आदि गांवों और गोपालगढ़ कस्बे के पीड़ित मुसलिम समुदाय के लोगों ने एक के बाद एक जो कहानियां बताईं वो एक बार फिर भारतीय राज्य के फासीवादी चरित्र को सामने ले आती हैं और राज्य के साथ गुर्जर तबके की सामंती ताकतों तथा आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तालमेल को साबित करती हैं.
घटनाक्रम की शुरुआत 13 सितंबर से हुई. गोपालगढ़ कस्बे में करीब 50 घर मुसलिम परिवारों के हैं, जिनमें से अधिकतर मेव हैं. इस समुदाय की लगभग साढ़े ग्यारह बीघे जमीन के एक टुकड़े पर आपस में लगी हुई एक मसजिद है, ईदगाह है और कब्रिस्तान की जमीन है. मसजिद और ईदगाह पर पक्का निर्माण है, जबकि कब्रिस्तान की जमीन पर फिलहाल कोई निर्माण नहीं है. 1928 से यह वक्फ की संपत्ति है और कम से कम 40 साल पहले इस जमीन के एक टुकड़े को कब्रिस्तान घोषित किया गया था. लेकिन इस जमीन पर स्थानीय गुर्जर समुदाय के एक सदस्य और गोपालगढ़ के सरपंच ने बार-बार गैरकानूनी रूप से कब्जा करने की कोशिश की है. मेव मुसलिमों की तरफ से यह मामला दो बार स्थानीय एसडीएम अदालत में ले जाया गया, जहां से दोनों बार फैसला मुसलिम समुदाय के पक्ष में आया है. 12 सितंबर को एसडीएम अदालत ने सरपंच को यह जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, जिसके बाद मसजिद के इमाम हाफिज अब्दुल राशीद और मसजिद कमेटी के दो और सदस्य सरपंच के पास इस जमीन को खाली करने के लिए कहने गए. इस पर सरपंच और दूसरे स्थानीय गुर्जरों ने मिल कर तीनों को बुरी तरह पीटा.
इमाम और कमेटी पर हमले की इस खबर से मुसलिम समुदाय में आक्रोश की लहर दौड़ गई. उस रात को जब मेव मुसलिम इस विवाद को अगले दिन की पंचायत में बातचीत के जरिए सुलझाने की तैयारियां कर रहे थे, उस रात गोपालगढ़ में भरतपुर से कम से कम दो सौ आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता गुर्जरों के जमा हो रहे थे. उन्होंने आसपास के अनेक गांवों से गुर्जरों को अगले दिन गोपालगढ़ आने के निर्देश दिए. अगले दिन 14 सितंबर को जब इस मामले के निबटाने के लिए स्थानीय थाने में दो विधायक और दोनों समुदायों के लोग जमा हुए तो केरवा, भैंसोड़ा, बुराना, बुरानी, पहाड़ी, पांडे का बयाना, बरखेड़ा, बौड़ोली और नावदा के गुर्जर आरएसएस कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में गोपालगढ़ को एक तरह से अपने कब्जे में कर चुके थे. उन्होंने सड़कों पर पहरे लगा दिए थे और लोगों को कस्बे में आना-जाना रोकने लगे थे. उधर बैठक में दोनों समुदायों के जिन दो प्रतिनिधियों के ऊपर फैसला लेने की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने यह फैसला किया कि जमीन पर उसी समुदाय का अधिकार है, जिसके नाम रेकार्ड में यह जमीन दर्ज है. इस पर भी सहमति बनती दिखी कि कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे के लिए दोषी व्यक्ति मेवों से माफी मांगें. लेकिन यहीं कुछ गुर्जरों और आरएसएस के लोगों ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने थाने की कुरसियों और दूसरे सामान की तोड़फोड़ शुरू कर दी. मीटिंग में मौजूद अनेक प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आरएसएस के लोगों और गुर्जरों ने मीटिंग में मौजूद भरतपुर के डीएम और एसपी के साथ धक्का-मुक्की की और कॉलर पकड़ कर पुलिस को मुसलिमों के ऊपर फायरिंग का आदेश दिलवाया.
मीटिंग आखिरी दौर में थी, जब पूरे गोपालगढ़ कस्बे में फैले आरएसएस, विहिप, बजरंग दल और गुर्जर समुदाय के हथियारबंद लोग मुसलिम मुहल्ले पर हमला कर रहे थे. चुन-चुन कर मुसलिमों की दुकानों को लूट कर आग लगा दिया गया. उनके घरों के ताले तोड़ कर सामान लूट लिए गए. इस वक्त सारे मर्द या तो थाने में चल रही मीटिंग में थे या मसजिद में, इसलिए महिलाएं भीतर के घरों में एक जगह जमा हो गई थीं. इस घर से लगी छत पर चढ़ कर हमलावरों ने महिलाओं के ऊपर भारी पथराव किया. इस घर में 11 दिन बाद भी बिखरे हुए पत्थर पड़े थे और पथराव के निशान मौजूद थे. हमलावर भीड़ एक-एक करके मुसलिम घरों से सामान लूटती रही और उनकी संपत्ति बरबाद करती रही. यह लूट अभी अगले तीन दिनों तक चलनेवाली थी और इसमें इमाम अब्दुल रशीद, अली शेर, अली हुसैम, डॉ खुर्शीद, नूर मुहम्मद, इसहाक और उम्मी समेत तमाम मुसलिम घरों को तबाह कर दिया जानेवाला था.
दोपहर ढल रही थी और असर की नमाज का वक्त हो रहा था. आस-पास के गांवों के लोग गोपालगढ़ में सामान खरीदने के लिए आते हैं. नमाज का वक्त होते ही स्थानीय मुसलिम बाशिंदे और खरीदारी करने आए लोग मसजिद में जमा हुए. पिछले दो दिनों की घटनाओं की वजह से मसजिद में भीड़ थोड़ी ज्यादा ही थी. पिपरौली गांव के इलियास इसकी एक और वजह बताते हैं. उनके मुताबिक कस्बे में तब यह खबर भी थी कि गुर्जर और आरएसएस-विहिप-बजरंग दल के लोग पुलिस के साथ मिल कर मसजिद तोड़ने आनेवाले हैं. मसजिद में उस वक्त कम से कम 200 लोग मौजूद थे (कुछ लोग यह संख्या 500 से हजार तक बता रहे थे). जोतरू हल्ला के 35 वर्षीय सपात खान उनमें से एक थे. उन्हें याद है कि उन्होंने नमाज पढ़नी शुरू ही की थी कि मसजिद पर फायरिंग शुरू हुई.
पुलिस का दंगा नियंत्रण वाहन मसजिद के ठीक सामने खड़ा हुआ और उसने मसजिद पर फायरिंग शुरू की. मसजिद से बाहर निकलने के दोनों दरवाजों पर गुर्जर और आरएसएस के लोग हथियारों के साथ खड़े थे. इसलिए मसजिद के भीतर घिरे लोग पीछे की तरफ की एक पतली दीवार तोड़ कर भागने लगे. सपात खान को भागने के क्रम में पांव में गोली लगी और वे गिर पड़े. उन्होंने करीब दस लोगों को गोलियों से जख्मी होकर दम तोड़ते देखा. फर्श पर पड़े हुए उन्होंने देखा कि गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गोलियों से जख्मी लोगों के पेट में लाठी और फरसा मार कर लोगों की जान ले रहे थे. फायरिंग रुकने के बाद जब दर्जनों लोग मसजिद की फर्श पर घायल और मरे हुए पड़े थे, तो उनके शरीर पर से गोलियों के निशान हटाने के लिए उनके हाथ-पांव काटे गए. घायलों को और लाशों को गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गाड़ी में लाद रहे थे. सपात खान भी उनमें से एक थे. गाड़ी में लादे जाने के बाद वे बेहोश हो गए. पांचवें दिन जब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को भरतपुर हॉस्पीटल में पाया. वे खुशकिस्मत रहे कि वे जिंदा जलाए जाने से बच गए. लेकिन पथरौली के शब्बीर, लिवाशने के इस्माइल, पिलसु के हमीद, ठेकरी के उमर, खटकरा के कालू खां, जोतरू हल्ला के ईसा खां उतने खुशकिस्मत नहीं थे. उनमें से कइयों को तेल छिड़क कर जिंदा जलाने की कोशिश की गई. ये सारे लोग जयपुर के सवाई मान सिंह हॉस्पीटल में अब तक भरती हैं. घायलों में से हत्याकांड के 11 दिन बाद 25 सितंबर को दम तोड़ा, जिस दिन हम गोपालगढ़ में मौजूद थे.
लेकिन मसजिद में मारे गए और घायल हुए कई लोगों को जला दिया गया. उन्हें मसजिद की सीढ़ियों से महज दस कदम दूर सरसों की सूखी लकड़ी पर रख कर जलाया गया. वहां अधजली हड्डियां, जूते और कपड़ों के टुकड़े पड़े हुए हैं. यहां से एक-डेढ़ किमी दूर एक जंगल में भी अधजली हड्डियां मिली हैं. मसजिद से सटी ईदगाह में एक कुआं है, जिसमें से घटना के तीन दिनों बाद तीन अधजली लाशें मिली थीं. कुएं के पत्थर पर जली हुई लाशों को घसीटने के निशान बारिश और 11 दिन बीत जाने के बावजूद बने हुए हैं. ईदगाह में लाशों को जलाने के लिए लाए गए डीजल से भरा एक टिन रखा हुआ है. आसपास के इलाके पर पुलिस का पहरा है. जिस मसजिद में यह हत्याकांड हुआ, उसमें पुलिस किसी को जाने की इजाजत नहीं दे रही है. लेकिन बाहर से भी साफ दिखता है कि मसजिद में कितनी तबाही हुई है. सारी चीजें टूटी हुई हैं और फर्श पर बिखरी पड़ी हैं. खून के निशानों को मिटाने की कोशिश की गई है. दीवार पर गोलियों के कम से कम 50 निशान मौजूद हैं, जिन्हें सीमेंट लगा कर भरा गया है. जाहिर है कि यह काम पुलिस या उसकी मरजी से किसी आदमी ने किए हैं. गौर करने की बात यह भी है कि घटना के बाद से मसजिद में मुसलमानों को घुसने नहीं दिया जा रहा है.
जिन्होंने पूरी घटना अपनी आंखों से देखी और मारे जाने से बच गए उनके मुताबिक हमले की सारी कार्रवाई इतनी व्यवस्थित और संगठित थी कि इससे साबित होता है कि इसकी योजना पहले से बनाई गई थी. गुर्जरों और आरएसएस की हत्यारी भीड़ का नेतृत्व गोपालगढ़ के आरएसएस नेता केशऋषि मास्टर, जवाहर सिंह (बेडम) और भोला गूजर (पहाड़ी) कर रहे थे. इसमें आरएसएस द्वारा संचालित एक आदर्श विद्यालय के शिक्षक भी लुटेरों के साथ शामिल थे, जिनकी पहचान उसी विद्यालय में पढ़नेवाले एक मुसलिम छात्र ने की. छठी कक्षा में पढ़ने वाले सखावत की नई साइकिल इस लुटेरी भीड़ ने छीन ली. वह उस शिक्षक को गुरुजी के नाम से जानता है.
घटना के बाद गोपालगढ़ के मुसलिम परिवार घर छोड़ कर अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं. अधिकतर घरों में कोई नहीं है. कुछ में ताला लगा है, लेकिन बाकी घरों के दरवाजे और कुंडियां गुर्जर-संघी लुटेरों ने उखाड़ ली हैं. जिस दिन हम गोपालगढ़ में थे, एकाध लोग अपने घरों की खबर लेने के लिए कस्बे में लौटे थे. गोपालगढ़ में कर्फ्यू रहता है लेकिन पिपरौली के इलियास बताते हैं कि यह कर्फ्यू सिर्फ मुसलमानों पर ही लागू होता है. कर्फ्यू के दौरान भी गुर्जर और आरएसएस के लोग खुलेआम कस्बे में घूमते हैं. वे यह देख कर इतने हताश थे कि वे पूछते हैं, हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है. मुसलमानों का कौन है?’
सरकार दावा कर रही है कि इस घटना में महज तीन लोग मारे गए हैं. लेकिन लोग बताते हैं कि कम से कम 20 लोग इस हमले में मारे गए हैं. उनमें से सारे मुसलिम हैं. जख्मी लोगों की संख्या भी लगभग इतनी ही है और वे सारे लोग भी मुसलिम हैं. इसके अलावा कम से कम तीन लोग लापता हैं. इनमें से दो हैं: ढौड़ कलां (फिरोजपुर झिरका) के मुहम्मद शौकीन और चुल्हौरा के अज्जू. इतने बड़े हत्याकांड को दो समुदायों के दंगा कह कर असली अपराधियों को बचाने की कोशिश की जा रही है. लोग पूछते हैं कि अगर यह दंगा था तो गुर्जरों और पुलिस की तरफ से कोई घायल तक क्यों नहीं हुआ. वे लोग जानते हैं कि हमलावरों में कौन लोग थे, लेकिन किसी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ है. उल्टे, लोगों की शिकायत है कि 600 मुसलमानों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हालांकि डीएम और एसपी का तबादला हो गया है, लेकिन लोग तबादलों से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी साफ मांग है कि मुसलमानों पर गोलियां चलाने वालों पर हत्या के मुकदमे दर्ज किए जाएं. इसको लेकर अंधवाड़ी में पिछले छह दिनों से धरना चल रहा है, जिसमें रोज लगभग आठ सौ से एक हजार लोग शामिल होते हैं.
मुसलिमों पर गुर्जरों का यह हमला कोई नई बात नहीं है. छोटे-मोटे हमले लगातार होते रहे हैं. यहां खेती आजीविका का मुख्य साधन है. मेव मुसलमानों की यहां खासी आबादी है, लेकिन उनमें से आधे से भी कम लोगों के पास जमीन है. जमीन का आकार भी औसतन दो से तीन बीघे है, जिसमें सिंचाई निजी बोरवेल से होती है. बाकी के मेव छोटे मोटे धंधे करते हैं, दुकान चलाते हैं और पहाड़ों पर पत्थर काटते हैं. गुर्जर यहां पारंपरिक रूप से जमीन के मालिक रहे हैं. उनके पास न केवल बड़ी जोतें हैं, बल्कि दूसरे कारोबारों पर भी उनका वर्चस्व है. खेती, इलाज और शादी वगैरह के खर्चों के लिए मेव अक्सर गुर्जरों से कर्ज लेते हैं, जिस पर उन्हें भारी ब्याज चुकाना पड़ता है (गांववालों ने बताया कि उन्हें चौगुनी रकम लौटानी पड़ती है). देर होने या नहीं चुका पाने पर अक्सर मुसलिमों-मेवों पर हमले किए जाते हैं- इसमें धमकाने, गाली देने से लेकर मार-पीट तक शामिल है. इस तरह जमीन का सवाल यहां एक अहम सवाल है.
इस नजरिए से गोपालगढ़ का हत्याकांड नया नहीं है. कानपुर, मेरठ, बंबई, सूरत...हर जगह अल्पसंख्यकों, मुसलमानों को उनके नाममात्र के संसाधनों से भी उजाड़ने और उनकी संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए प्रशासन, पुलिस और संघ गिरोह की तरफ से मिले-जुले हमले किए जाते रहे हैं, गोपालगढ़ उनमें सबसे ताजा हमला है. इसी जून में बिहार के फारबिसगंज में अपनी जमीन पर एक कंपनी के कब्जे का विरोध कर रहे मुसलमानों पर गोली चलाकर पुलिस ने चार मुसलिमों की हत्या कर दी थी और नीतीश सरकार के इशारों पर कारपोरेट मीडिया ने इस खबर को दबाने की भरपूर कोशिश की.
गोपालगढ़ में भी कारपोरेट मीडिया और सरकार ने तथ्यों को दबाने की कोशिश की. मिसाल के तौर पर इस तथ्य का जिक्र कहीं नहीं किया गया कि डीएम और दूसरे अधिकारियों द्वारा आरएसएस नेताओं के कहने पर गोली चलाने का आदेश दिए जाने के बाद पुलिस के शस्त्रागार को खोल दिया गया और पुलिस के साथ-साथ गुर्जरों और आरएसएस कार्यकर्ताओं को भी पुलिस के शस्त्रागार से आधुनिक हथियार दिए गए. मसजिद पर हुई गोलीबारी में पुलिस के हथियारों का उपयोग ही हुआ, लेकिन उन हथियारों को चलानेवालों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. यह दिखाता है कि इन तीनों ताकतों की आपस में कितनी मिलीभगत थी. इलाके के मेव शिक्षा और रोजगार में बहुत पिछड़े हुए हैं. सरकारी-गैर सरकारी नौकरियों में भी उनका हिस्सा नगण्य है. इसके उलट गुर्जर समुदाय के लौगों की नौकरियों में भरमार है. जिस पुलिस ने मेव लोगों पर हमला किया, उसमें बहुसंख्या गुर्जरों की ही थी और उसमें एक भी मुसलिम नहीं था. गुर्जरों के बीच आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों का काफी काम है और इसका असर पुलिसबलों पर भी साफ दिखता है. इसीलिए जब पुलिस मसजिद पर फायरिंग करने पहुंची तो उसकी कतारों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. जाहिर है कि यह दो समुदायों के बीच कोई दंगा का मामला नहीं है, जैसा कि इसे बताया जा रहा है, बल्कि गोपालगढ़ में हुई हत्याएं एक सुनियोजित हत्याकांड हैं.

(डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन की तरफ से जारी).