वरवर राव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
वरवर राव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

06 अगस्त 2013

मित्रों के नाम खत- वरवर राव

''मित्रो, 31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद जयंती पर हुए कार्यक्रम में आयोजकों द्वारा सिद्धांतविहीन तरीके से एक हिंदू साम्‍प्रदायिक व्‍यक्ति व वैश्‍वीकरण के समर्थक एक कॉरपोरेट साहित्‍यकार को तर्कहीन बहस खड़ी करने की मंशा से मंच पर वरवर राव के साथ बैठाने का जो असूचित फैसला किया गया और जिसके कारण वीवी ने इसका बहिष्‍कार किया, उसके बाद शुरू हुई बहस के संदर्भ में उन्‍होंने अपनी दूसरी टिप्‍पणी भेजने के लिए मुझे कहा है। इस बात को लेकर काफी अटकलबाज़ी हुई है कि आयोजकों ने उन्‍हें यात्रा का खर्च दिया था, इसलिए यहां यह मसला साफ कर दिए जाने की ज़रूरत है। वीवी ने आयोजकों से यात्रा का कोई खर्च नहीं लिया था। उन्‍हें टिकट बुक करवा कर आयोजन में आने को कहा गया था। उन्‍हें आयोजन के स्‍वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला जब आयोजकों ने उन्‍हें लाने के लिए कार भिजवाई। कार में उनकी सीट पर एक आमंत्रण पत्र पड़ा हुआ था जो उसमें बैठते ही उन्‍हें दिखा। वे जैसे ही गंतव्‍य तक पहुंचे, उन्‍होंने वक्‍तव्‍य नहीं देने का फैसला लिया और निकल लिए। इसके बाद उन्‍होंने एक पत्र के रूप में अपना बयान जारी किया। वीवी हिंदी में नहीं लिखते हैं। वे बोलते हैं और उनके मित्र उसे टाइप करते हैं। लेकिन भाषा के बंधन दिलो-दिमाग के अहसास को साझा करने में आड़े नहीं आ सकते। यह वीवी का दूसरा बयान है। यह उनके पहले बयान के बाद जनसत्‍ता में आई टिप्‍पणियों के संदर्भ में है।'' 
(जीएन साईबाबा द्वारा ईमेल से भेजे गए वरवर राव के दूसरे पत्र पर पाद टिप्‍पणी, जिसे अनुवाद कर के लगाने का अनुरोध किया गया है: जनपथ)  


31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद जयंती पर ‘हंस’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सेदारी न करने का कारण उसी दिन अपने जारी पत्र में स्पष्ट कर दिया था। मैंने, मुझे सुनने आए श्रोताओं से माफी की दरख्वास्त की थी। इस पत्र के जबाब में ‘जनसत्ता’ अखबार के संपादक ने ‘हंस अकेला’ शीर्षक से संपादकीय लिख दिया। उसके दूसरे दिन अपूर्वानंद ने ‘प्रेमचंद परंपरा का दायरा’ लिख कर मेरी अनुपस्थिति की काफी सख्त पड़ताल की। ब्लॉग पर इस पत्र के आने के बाद टिप्पणीयां लिखी गई और मेरे बारे में कयास लगाया गया कि मैं किसी के उकसावे या बहकावे में आकर इस तरह का पत्र लिखा। ‘जनसत्ता’ ने तो ‘युवा लेखकों का एक गुट’ की खोज तक कर डाली। मुझे अभी तक ऐसे युवा लेखकों का ‘गुट’ नहीं मिला जो साहित्य और राजनीति में इस कदर हस्तक्षेप कर मुझे सचेत करे। मैं ऐसे किसी भी राजनीति, साहित्य और विचारधारा से लैस युवा लेखकों का जरूर स्वागत करूंगा जो मेरे होने वाली गलतियों से बचने के लिए हस्तक्षेप करे और हो गई गलतियों की आलोचना करे। यह मेरे ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी स्वास्थ्यकर माहौल होगा जब ऐसे ‘युवा लेखकों के गुटों’ का उभार हो और नई उर्जा के साथ ठहराव को तोड़कर सर्जना की महान धारा को नेतृत्व करते हुए आगे ले जाय। निश्चय ही मुझे आगामी दिनों में जब भी दिल्ली आऊंगा तो ऐसे लेखक ‘गुटों’ और लेखकों से मिलने की बेसब्री रहेगी।
एक बार फिर मैं अपनी बात दुहरा दूं कि प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर ‘हंस’ ने ‘अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में बुलाया था। यह बहस या संवाद का मसला नहीं था। मैं परिचर्चा, बहस, संवाद के आयोजनों में जाता रहा हूं और अपनी बात रखता रहा हूं। वहां निश्चय ही आयोजक को परिचर्चा में किसी को भी बुलाने की छूट रहती है और भागीदार को भी हिस्सेदारी करने की उतनी ही छूट होती है। आयोजन का स्वरूप, समय और प्रकृति से ही भागीदारी का अर्थ बनता है। इस कार्यक्रम का स्वरूप, समय और प्रकृति इसमें भागीदार वक्ता और आयोजक की मंशा दोनों से ही मेल नहीं खाता। इसलिए यह जरूरी बन गया कि मैं न केवल इसमें भागीदार न बनूं बल्कि अपना विरोध भी दर्ज कराऊं।
प्रेमचंद के संदर्भ में परंपरा और इतिहास के हवाले मैंने जिन बातों का पिछले पत्र में उल्लेख किया था वह सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी धारा को साहित्य में मजबूत करने और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सतत संघर्ष करने से जुड़ा हुआ है। 1930 के दशक में बहुत से भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल जैसे सैकड़ों क्रांतिकारी आर्य समाज और अन्य धार्मिक धाराओं से प्रभावित और जुड़े रहे थे। इन क्रांतिकारियों की सीख का अर्थ आज आर्यसमाजी होने या आर्य समाज के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करना नहीं है। इतिहास और परंपराएं समय के साथ बनते और मजबूत होते हुए हमारे तक आती हैं और आगे जाने के लिए उतनी ही जिम्मेदारी, सतर्कता और सक्रियता की मांग करती हैं। ‘हंस’ जिस परंपरा का निर्वाह करने का दावा कर रहा है वह उसके द्वारा आयोजित किए जा रहे पिछले कुछ कार्यक्रमों से तो फिलहाल मेल खाता नहीं दिख रहा है। शायद यही कारण भी है जिसके चलते ये कार्यक्रम विवाद के घेरे में आ रहे हैं। यह अच्छी बात है कि युवा लेखकों ने हर बार अपना प्रतिरोध, प्रतिवाद दर्ज कराया और सवाल उठाकर बहस को आगे बढ़ाया। मुझे खुशी है कि मैं इन युवा लेखकों के प्रतिरोध और प्रतिवाद का हिस्सा बन सका और उनके उठाए बहस में हिस्सेदार बना।
यह अच्छी बात है कि ज्यादातर बहस मेरे पत्र में अशोक वाजपेयी के संदर्भ में लिखी बातों पर हो रही है। गोविंदाचार्य के समर्थन में बातें नहीं आई हैं। जितनी तेजी से दक्षिणपंथी ताकतों का असर बढ़ा है और उन्हें जितनी बेशर्मी से मंच देने का प्रचलन बढ़ा है ऐसे में गोविंदाचार्य के समर्थन में बात न आना थोड़ा आश्चर्य में डालता है। हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी और फासिस्ट हिंदू ताकतों को मंच देने का मुद्दा बार बार आ रहा है और हर बार इस पर विरोध के स्वर भी बनते दिखते हैं। इस बार ‘हंस’ के इस कार्यक्रम में गोविंदाचार्य को बुलाने पर मुद्दा न बनना आश्चर्य में डालता है। 
अशोक वाजपेयी कारपोरेट घरानों और सत्ता के गलियारे से पूरी तरह नत्थी हैं, इस बात से अस्वीकार शायद ही किसी को है। उन्हें ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताकर उनकी प्रगतिशीलता सिद्ध करने का तर्क दिया गया है। विनायक सेन की रिहाई के लिए अकादमी में जगह बुक कराने के लिए सहर्ष सहयोग के आधार पर उन्हें प्रगतिशील बताया गया है। अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील सिद्ध करने के आग्रह के दौरान उतनी ही बार मुझे ‘संकीर्ण’ भी बताया गया जो सिर्फ ‘अपनों’ के बारे में बात करता है और ‘दूसरों’ के बारे में चुप रहता है। यह तर्क और उसका निश्कर्ष जितना गुस्से का परिणाम है उससे अधिक साहित्य और राजनीति में घट रही घटनाओं में पक्षधरता और सक्रियता का भी परिणाम है। लगभग दो साल पहले जीतन मरांडी को निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा के खिलाफ संस्कृतिकर्मियों द्वारा दिल्ली में बुलाई गई मीटींग में मदन कश्यप ने धर्मनिरपेक्षता को वर्ग दृष्टिकोण से देखने का आग्रह किया था। वे ठीक ही इस बात को रेखांकित कर रहे थे। मैं उनकी इस बात में इतना ही और जोड़ देना चाहता हूं कि भारत की धर्मनिरपेक्षता में धर्म के दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है।  हिंदी साहित्य में इन दिनों सीआईए द्वारा की गई ‘साहित्य सेवा’ के विवाद के केंद्र में जो मुख्य बात दिख रही है वह यह कि साहित्य साहित्य है। यही स्थिति देश में ‘विकास की राजनीति’ का भी है जिसे नरेंद्र मोदी करे तो अच्छा और टाटा-अंबानी-एस्सार करे तो अच्छा, के राग पर आगे बढ़ाया जा रहा है। यही स्थिति जन हितों की रक्षा और समाज सेवा का हो गया है जिसके झंडाबरदार आज एनजीओ के गैंग ने उठा रखा है। इनका राजनीति, साहित्य, जनसंगठन के स्तर पर विरोध संकीर्णता के दायरे में रखकर देखा जाने लगा है। इस ‘संकीर्णता’ को उदार लोकतत्र के जड़ में मठ्ठा डालने की तरह देखा जा रहा है। यह एक भयावह स्थिति है। यहां तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में हुए हमले के संदर्भ में मेरे ऊपर लगाए गए एक आरोप का जबाब देना जरूरी समझ रहा हूं। तसलीमा नसरीन को हैदराबाद बुलाने वाले लोग मुस्लिम विरोधी, कम्युनिस्ट विरोधी और अमेरीका परस्त लोग थे। यह कार्यक्रम मुस्लिम विरोध के एक खास संदर्भ में बुलाया गया था। बहरहाल, इस हमले का मैंने और विप्लव रचितल संघम ने इसकी भर्त्सना और साथ ही आयोजक की मंशा की आलोचना की आलोचना किया।
तेलगू और हिंदी साहित्य में हाल के दिनों में कमोबेश एक जैसी ही घटना और विवाद से ग्रस्त रही हैं। जब यहां मारूती मजदूरों का आंदोलन हो रहा था तो उसके सामानान्तर कान्हा रिसार्ट में वहां की परियोजना से प्रभावित होते लोगों से बेखबर होकर कविता पाठ का आयोजन किया गया। हमारे यहां भी येनम मजदूरों के दमन के समय गोदावरी नदी पर तैरती नावों पर पांडाल बनाकर कविता पाठ आयोजित किया गया। हिंदी में जितना यह मुद्दा विवादित रहा उतना ही तेलगू में भी यह विवाद जोर पकड़ा। हिंदी के विश्व सम्मेलन जैसी ही स्थिति तेलगू की विश्व सम्मेलन की स्थिति बन गई है। इस समानता और वैभिन्नता के कई बिंदू हैं जिसमें कारपोरेट सेक्टर, फासिस्ट ताकतों और सत्ता का घुसपैठ एक मुख्य पहलू है। इनके हस्तक्षेप से साहित्य में तेजी से एक विभाजक रेखा पैदा हुई है और इसका असर तेजी से फैला है। ‘उदार लोकतत्र’ के हवाले अपूर्वानंद का तर्क ऐसे ही विभाजक स्थिति को दिखाता है: ‘राव और उनके सहयोगियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली कविता श्रीवास्तव, तीस्ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी या हर्ष मंदर पर हो रहे हमले उतने गंभीर नहीं हैं कि एक क्रांतिकरी कवि अपने वक्तव्य में उन्हें अपने बगल में इनायत फरमाए। (जनसत्ता, 3 अगस्त 2013)।’ उपरोक्त मानवाधिकार कार्यकर्ता क्या ऐसे ही सोचते हैं जैसा अपूर्वानंद ने लिखा है? क्या उनके संगठन की चिंतन प्रक्रिया भी ऐसी ही है जिसके तहत यह तर्क गढ़ा गया है? या यह विनायक सेन की रिहाई के लिए अपूर्वानंद के किए गए उन प्रयासों से निकाले गए नतीजे हैं जिनमें ‘राव और उनके सहयोगियों’ के लिए कोई जगह नहीं थी? यहां इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि उपरोक्त जितने भी नाम हैं वे विभिन्न संगठनों से जुड़े हुए लोग हैं और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष उन संगठनों की वैचारिक अवस्थिति से निर्धारित होती है। ठीक वैसे ही जैसे अपूर्वानंद की वैचारिक अवस्थिति निर्धारित होती है। ‘मैं और मेरे सहयोगी’ इस सांगठनिक और वैचारिक अवस्थिति से बाहर नहीं हैं। ‘राव और उनके सहयोगी’ कौन हैं? अपूर्वानंद के शब्दों में ‘स्वतःसिद्ध ब्रम्हांड’ हैं! सरकार की नजरों में ‘देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं’। कारपोरेट सेक्टर की नजर में उनकी लूट और कब्जा के रास्ते में ‘सबसे बड़ी बाधा’ हैं। मीडिया की नजर में ‘राव और उनके सहयोगी’ गुड़गांव के मजदूरों से लेकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी लोगों तक में ‘घुसे’ हुए हैं। मैं और मेरे सहयोगी का अधिकार और ‘उदार लोकतंत्र’ के अधिकार की यह खींची गई विभाजक रेखा सिर्फ बिम्ब का गढ़न नहीं है। यह कारपोरेट सेक्टर और फासीस्ट ताकतों द्वारा अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए ‘उदार लोकतंत्र’ की सड़क को हाइवे बना देने के विचार का आरम्भिक तर्क है। ‘धर्मनिरपेक्षता’ मंे कितना धर्म छुपा हुआ है और ‘उदार लोकतंत्र’ कितना कारपोरेट सेक्टर, कितना साम्राज्यवाद समर्थित एनजीओ और कितना सत्ता के दलाल इसकी पड़ताल किए बिना एक गोल गोल घूमने वाले दुष्चक्र में फंसे रहेंगे।
साहित्य का इतिहास और उसकी परंपरा इस गोल गोल घूमने वाले दुष्चक्र से निकल कर आगे जाने का रहा है। प्रेमचंद ने इसी जिम्मेदारी को मशाल की तरह आगे चलने के बिम्ब की तरह ग्रहण किया और इस बात को जोरदार ढंग से कहा। श्री श्री ने इसी जिम्मेदारी को उठाने के लिए सक्रिय भागीदार होने का आह्वान किया। मैं ऐसी ही सीधी भागीदारी का तरफदार हूं। मुझे खुशी है ऐसी सीधी भागीदारी के तरफदारों, खासकर युवा पीढ़ी की काफी संख्या है जो आज के हालात में खड़े होने, बोलने और सक्रिय होने का साहस रखते हैं। ऐसे  हमसफर साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
वरवर राव
हैदराबाद, 
5 अगस्त 2013

05 अगस्त 2013

तुम्हारे देश में इतना कीचड़ कहाँ से आया हिन्दी.

1700 शब्दों में यह आलेख 5 दिन पहले लिखा गया था. 600 शब्द डिलीट भी करने पड़े. इतना व्यस्त भी नहीं था कि इसे पोस्ट न कर पाऊं, वजहें कुछ और थी... प्रकाशित होना कहीं और था. संपादक को जिन दो बातों पर आपत्ति थी वह अशोक वाजपेयी को कार्पोरेट से मदद लेने और विश्वरंजन के शातिराने में शामिल होने से थी. उन्होंने साक्ष्य मांगा मैने दे दिया, जो दिया था सो आपको भी संदर्भ के साथ दे रहा हूं.    चन्द्रिका

  

यह दो मनाहियों की अलग-अलग कहानियां हैं, जो एक वक्त में घट रही हैं. जो दूरी के लंबे फासलों के साथ घट रही हैं. उड़ीसा में राज्य और कार्पोरेट सभाएं कर नियमगिरी को खरीदना चाहता है और आदिवासी अपने गांवों को बेचने से मना कर रहे हैं. वे नियमगिरी को देवता मानते हैं. राज्य उनके नेताओं को माओवादी कह रहा है और कुछ को इन आरोपों के तहत जेल जाना पड़ा है. वहाँ कुल बारह सभाएं होनी हैं जिनमे से नौ सम्पन्न हो चुकी हैं, सब की सब मनाही के साथ. दूसरी एक सभा वहाँ से बहुत दूर की है. यह सभा है दिल्ली में हंस पत्रिका द्वारा आयोजित प्रेमचंद जयंती की सभा. जिसमें गोविंदाचार्य के साथ वरवरा राव और अरुंधती राय ने मंच साझा करने से मना कर दिया है. यह ठीक-ठीक आमंत्रण में वक्ताओं के बारे में न बताए जाने और बगैर अनुमति के नाम छाप दिए जाने की बात है. यदि तथ्य इससे इतर भी हों तो इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह मंच साझा करने की ही एक मनाही है. अरुंधती और वरवरा राव हिन्दी से इतर लेखक हैं जिनके अनुवाद के जरिए लगभग अन्य भारतीय भाषाओं में भी उतनी ही स्वीकार्यताएं हैं. हिन्दी के एक प्रतिष्ठित आयोजन में उनकी अस्वीकार्यता के आखिर क्या मायने हैं? ठीक उन्हीं समयों में जबकि हंस के सभा का कार्यक्रम होने वाला था, अरुंधती मंच पर जाने के बजाए उड़ीसा भवन की सड़क पर बोल रही थी. मंचों और सड़कों के चुनाव के मायने हैं. इनके मायने राजनैतिक है, व्यक्तिगत है और वर्गीय भी. इन सबके बीच कई साम्यताएं हैं. यह अछूत होने का सवाल नहीं है बल्कि सवाल पक्षधरता और विरोध का है. जब आप उद्देश्यों और परिणामों की संभावनाओं को आंक लेते हैं तो आप एक फैसला लेते ही हैं. एक ‘सभ्य-सुशील’ वर्ग आहत होता है कि साहित्य के लिए किए जाने वाले वार्षिक योगदान में उसे ठगा सा गया. वह वरवरा राव और अरुंधती राय के बारे में बहस करना शुरु करता है. वह आयोजकों द्वारा वक्ताओं की स्वीकृति, वक्ताओं को मंच साझा करने की सही-सही जानकारी न दिए जाने से विमुख है. वह आहत है कि अहिन्दी समाज के दो लेखकों द्वारा हिन्दी के प्रतिष्ठित माने जाने वाले लेखक की प्रतिबद्धता पर सवाल कैसे खड़े हो गए. यह आहत होने की बात इसलिए भी मौजूं लगती है कि नियमगिरी के आदिवासियों की मनाही और संघर्ष उनके विमर्षों से फिलवक्त गायब हैं. उनके संघर्ष और उनके साहस के साथ खड़े होने के बजाय वे अपने ठगे और आहत होने से दुखी हैं. दमित जनता के जश्न और दुखों के वे सहभागी तब तक नहीं होते जब तक उनके वर्गीय हित नहीं जुड़ते. जब तक राज्य की एजंसियां उनके वर्गीय खतरे को देश का खतरा बनाकर प्रस्तुत नहीं करती. जब तक कि इन विषयाधारित और विभागीय संगोष्ठियों में बोलना उनकी मजबूरी नहीं हो जाती. यानि दमित, दलित और आदिवासियों के बारे में बोलना-लिखना उनके जीवन, उनकी संवेदनाओं से इतर उनके प्रोफेसन का हिस्सा हैं. वे अपने शौक को एक कार्यकर्ता की भूमिका से प्रस्तुत करते हैं. उनके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खतरे मुक्तिबोध की किसी कविता से उठकर उनके बैनरों में चिपक जाते हैं पर खतरे उठाने के लिए वे अपनी गलियों में भी नहीं उठते. वे ‘खतरों’ के साथ खड़े होते हैं ‘खतरनाकों’ के साथ खड़े होते हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि जो जितना खतरनाक है उसके आसपास की जमीन उतनी सुरक्षित है. आर्थिक, बौद्धिक और प्रकाशकीय सुरक्षाएं उनकी प्रतिबद्धताओं को बदल देती हैं.    
उत्तर और उत्तर-पूर्व के हर जन संहारों से लेकर दक्षिण के श्रीलंका में हुए तमिलों तक के संहारों के खिलाफ खड़े होकर बोलने वाला कोई लेखक, हिन्दी समाज नहीं बना पाया. वरवरा राव हिन्दी और अहिंदी भाषियों में शायद अकेले लेखक हैं जो देश के एक छोर से दूसरी छोर तक उनकी लाशों को ढोते हुए उम्र भर चलते रहे. उनकी लाशें जो दलित, आदिवासी, गैर-आदिवासी, द्रविणियन, तमिलियन अपने हक़-हुकूक के लिए राज्य से लड़ रहे हैं. जिनकी लाशों के साथ खड़े होने से यह संभावना बढ़ जाती है कि अगली लाश वरवरा राव को भी बना दिया जाए. इसके कई प्रयास हुए और बिरसम साहित्य संगठन के लेखकों की हत्याएं भी हुई. क्या वरवरा राव की हिम्मत और हिम्मत पस्ती को लेकर वे लेखक/लेखिकाएं नैतिक आधार पर बोलने के हकदार हैं, जिन्होंने राज्य द्वारा प्रताड़ित और संहार किए गए आदिवासी, दलितों और अन्य समाजों तक अपनी पूरी उम्र बिताने के बाद भी नहीं गए. यहाँ लेखकीय प्रतिबद्धताएं क्या हैं. क्या वे यही नही हैं जो महज लेखक और लेखकीय सत्ता की स्थापनाएं निर्मित करती हैं. उन्हें मुक्तिबोध की पंक्तियां ‘उठाने होंगे खतरे’ किसी पुरानी पुस्तक की पुरानी जिल्द के साथ ही अच्छी लगती है. वैसे इसे लेखकीय अय्याशियां नही कही जानी चाहिए, इनकी भी भूमिकाएं हैं समाज में. उनकी भूमिकाएं क्या हैं. उन्होंने बहिस्कार किए हैं, उन्होंने आपसी हिन्दी मठों के टकराव में हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा लिया है और कुछ ही महीनों में वे बहिस्कार से बहि शब्द को बहा देते हैं और हिस्कार को ध्वनित करते हुए स्वीकार में बदल लेते हैं. जैसे सिंधु को आर्यों ने हिन्दू में बदल दिया था. वर्धा वहिस्कार के आइने में वे झांक सकते हैं. वे लेखक होने का सम्मान प्रेमचंद की परंपरा से पाना चाहते हैं परन्तु खतरे और मुश्किलों से वे नहीं गुजरना चाहते.  
पुरानी घटनाएं भुला दी जाती हैं और नई घटनाओं पर बहस शुरू कर दी जाती है. 2009 में प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के बाद विश्वरंजन ने शामिल हुए लेखकों को अपने साथ सहमत मानते हुए सलवा-जुडुम के पक्ष में एक लेख लिखा था. उनके इस एजेंडे में अशोक वाजपेयी शामिल थे. क्या जिन लेखकों ने शामिल होने से मना किया था वे छूआछूत बरत रहे थे. जिन्हें विश्वरंजन ने नए जातिवादी और अलोकतांत्रिक साबित करने का प्रयास किया था. सत्ता के एजेंडे बेहद बारीक होते हैं. क्या विरोधी विचारों के वक्ताओं को एक मंच पर बुलाना लोकतांत्रिक होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है. शातिरपने और लोकतांत्रिक होने में फर्क करना ही चाहिए. यदि उद्देश्य दो विरोधी विचारों में चर्चा का ही था तो अशोक वाजपेयी को राजेन्द्र यादव या हंस प्रकाशन ने किस पक्ष में रख कर बुलाया था. शायद इसी पक्ष को वरवरा राव ने अपने पत्र में और स्पष्ट विभाजन करके रख दिया है. ऐसे में हिन्दी के साहित्य समाज को अपने शातिराने मठों में झांक कर देखना चाहिए. क्या वाकई में ऐसे हिन्दी साहित्यिक समाज में स्वस्थ बहसों से प्रगतिगामी निर्मिति संभव हैं जिसका सबसे बड़ा आलोचक अपने चलने की अदा से अपनी जाति को प्रदर्शित करता हो. जिस भाषा के बड़ी पत्रिका का संपादक छिछोरेपन से छुटकारा न पाया हो और तिस पर ‘स्त्री विमर्श’, ‘दलित विमर्श’ उसके कलमदानों से निकल रहा हो. जिसका बड़ा कवि अपनी कुठाओं और पत्नी के उत्पीड़नों का भागी रहा हो और स्त्री की स्वतंत्रता पर सबसे अच्छी कविता लिखने की मान्यता भी पाता हो. मठाधीशों में एक वह भी जो गिरोह खड़े करने और पुस्तकों के प्रकाशनों व अप्रकाशनों में भूमिकाएं अदा करता हो. यदि इन्हीं के किन्हीं मठों में पल रहे नव लेखकों में कोई कच्चा चिट्ठा खोलने जैसी धमकियां दे रहा है तो गड़बड़ी एक भाषा के किसी कोने की नहीं है पूरा शहर घूम कर देखना चाहिए. तमाम अनैतिक और गलीजता भरे घावों ने ही इन्हें मठाधीश बनाया है. यह सब वैसा ही है जैसे एक हत्या करने के बाद किसी के ओहदे बढ़ जाते हैं और ज्यादा हत्याएं करके कोई राजनेता बन जाता है और सबसे बड़ा राजनेता व्यवस्था की संरचना से पूरे देश की हत्याओं में भूमिकाएं अदा करता है.
ये कुंठाएं और प्रवृत्तियां हिन्दी समाज में कहां से आई? अपने बंद दरवाजों के भीतर के जो तंग लेखन हैं वे जीवन की प्रवृत्तियों को कभी नहीं बदलते. वे जो मनोभावों और कर्मिक लेखन के रूप में संरचना जनित सत्ताओं के खिलाफ लिखने में प्रयासरत हैं उनके जीवन में वह मूल्य खुद इसलिए नहीं उतर पाता क्योंकि समाज के साथ जीवन संघर्षों की मुठभेड़ नहीं है. कईयों के भीतर दमितों के लिए लिखने की प्रबल उत्कंठाएं हैं पर उन समाजों में आवाजाही नहीं है, जहाँ राज्य सत्ताओं के खतरे बढ़ जाते हों. इसलिए उन्हें अपने मुह से यह बार-बार कहने की जरूरत महसूस होती है कि ‘उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे’. यह चिल्लाते हुए वे एक दिन मोमबत्तियों के साथ खड़े हो जाते हैं. जो पिघलते हुए उसी का हांथ जलाती हैं जिन हांथों में वे थामी गई होती हैं.
अपूर्वानंद का लेख प्रकाशित होने के बाद कुछ बातें उस संदर्भ से जरूरी हो जाती हैं. यह सच है कि गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी में बहुत भिन्नता है. दोनों को एक आधार पर कतई नही तौला जा सकता. इन भिन्नताओं को कर्मिक और लेखकीय दोनों आधारों पर देखा जा सकता है. प्रेमचंद से परम्परा के जुड़ाव भी इन्हीं आधारों पर ही तय किए जा सकते हैं. अशोक वाजपेयी को हिन्दी साहित्य के लेखन में योगदान के बजाय हिन्दी में संस्थान निर्माण और हिन्दी लेखकों के आश्रयदाता के तौर पर ज्यादा दिया जाना चाहिए. आश्रयदाताओं के योगदान को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए. उनके अपने महत्व हैं. पर नियति यह है कि आश्रयदाताओं की प्रसस्ति से मुक्त होना संभव नहीं बन पाता. वैसे ही जैसे कार्पोरेट के सहयोग से आप बाजारीकरण के विरुद्ध खड़े होने का प्रयास करना चाहते हैं. बाजारवाद के विरुद्ध खड़े होने की घोषणा करने वाले लेखकों को कार्पोरेट की मदद से सम्मानित करना चाहते हैं. ऐसे में प्रेमचंद की परंपरा से वरवरा राव या अशोक वाजपेयी के संबंध किस तरह के हैं यह एक जरूरी सवाल है. अपने सम्पूर्ण लेखन, व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ अशोक वाजपेयी कहीं भी खड़े हों परन्तु कार्पोरेट से मदद लेकर यदि वे हिन्दी समाज के लेखकों को कृत-कृत्य करना चाहते हैं तो हिन्दी समाज के कुछ लेखकों के हित तो उनके साथ निश्चित ही बनेगे. ऐसे में हिन्दी के साहित्य समाज की निर्मिति एक एन.जी.ओ. जैसी निर्मिति होगी. इस आधार पर वे गोधरा व कुछ अन्य घटनाओं से उन्हें उचित ही ठहराएंगे. यह मामला पवित्रता-अपवित्रता का नहीं है बल्कि यह है कि प्रेमचंद की परंपरा को कौन किधर ले जा रहा है. कौन उस कार्पोरेट से मदद की दरकार रखता है जिसके तार विदर्भ के होरियों और धनियों की आत्महत्याओं से जुड़ते हैं. जिसकी लपटें घीसुओं और माधवों के घरों में आग लगा रही हैं. वरवरा राव की लोकतांत्रिकता का मूल्यांकन वे कर रहे हैं जिनकी देह को कार्पोरेट ने सवांरा है जबकि ‘उनके लोकतंत्र’ ने ही वरवरा राव के शरीर को घावों से भरा है.   

01 अगस्त 2013

संवाद: धोखा और बेईमानी के पक्ष में जो खड़े हैं

रेयाज-उल-हक़

वरवर के हंस के आयोजन में जाने से इन्कार करने को अब विरोधी पक्ष की बात सुनने से इन्कार के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है. क्या सचमुच मामला विरोधी पक्ष की बात नहीं सुनने का है? या मामला फासीवादी और सत्तापरस्त आवाजों को राजनीतिक स्पेस और औचित्य मुहैया कराने का है, जिसके बारे में वरवर राव ने अपने पत्र में इशारा किया है? आखिर किन ताकतों के पक्ष में, इस पूरे मामले के मूल सवाल को छोड़ कर अमूर्त रूप से ‘संवाद’, ‘लोकतंत्र’ और जाने किन किन बातों का जिक्र उठाया जा रहा है? जो लोग अब तक सत्ता के मुकाबले किसी बात पर तन कर नहीं खड़े हो पाए और सत्ता और ताकत की गलियों में अपनी मौकापरस्त गरदन झुकाए आवाजाही करते दिखते हैं, वे आज सत्ता को उसके ‘मुंह पर जवाब’ देने के गंवा दिए गए मौके पर अफसोस जाहिर करने निकल पड़े हैं.

सबसे पहली बात तो यह है कि न तो गोविंदाचार्य ने और न ही अशोक वाजपेयी ने वरवर (या अरुंधति) को संवाद के लिए बुलाया था. उन्हें हंस ने बुलाया था और बाकी वक्ताओं के बारे में वरवर को बताया तक नहीं गया था. यह किस तरह का संवाद है? क्या इस तरह के संवाद को लोकतांत्रिक कहा जा सकता है? यह धोखा और बेईमानी है और इसे संवाद और लोकतंत्र का नाम देना इसको बर्दाश्त किए जाने लायक बनाना है.



दूसरी बात, क्या गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी सिर्फ विरोधी पक्ष हैं? वरवर उस राजनीतिक-सांस्कृतिक संघर्ष की विरासत से आते हैं, जो उन विचारों और नजरिए को अपना विरोधी ही नहीं, शत्रु भी मानता रहा, जिसका प्रतिनिधित्व गोविंदाचार्य और काफी हद तक अशोक वाजपेयी करते हैं. यह सही है. लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं है. वे सत्ता के प्रतिनिधि भी हैं. सत्ता से उनका जुड़ाव बहुत साफ है. संस्कृतिकर्मी, लेखक, विचारक के रूप में उनके द्वारा सत्ता के प्रतिक्रियावादी विचारों को जनता के बीच ले जाने, उसे जनता के बीच स्वीकार्य और व्यापक बनाने के इतिहास से भी हम अपरिचित नहीं हैं. साम्राज्यवाद और सामंतवाद-ब्राह्मणवाद जनता के खिलाफ जो फौजी-सांस्कृतिक-वैचारिक-सैद्धांतिक हमले करते आए हैं, उनमें गोविंदाचार्य तो बहुत सीधे ही भागीदार रहे हैं और अशोक वाजपेयी भी कमोबेश इस हमले के हिमायती रहे हैं (विश्वरंजन, सलवा जुडूम और दूसरे अनेक मामलों पर उनके विचार देखिए). यह महज एक निरीह, निर्दोष और मासूम सा ‘विरोधी पक्ष’ नहीं था, जिसकी बात ‘सुनने’ और उसका जवाब देने के लिए वरवर को बुलाया गया था. यह हमलावर, अपराधी, प्रतिक्रियावादी, जनसंहारक और दमनकारी सत्ता के दो अलग-अलग प्रतिनिधियों के साथ मिल कर सुनने वालों को संबोधित करना था, जिससे किसी भी जनवादी, संघर्षशील, क्रांतिकारी और जनता को प्यार करने वाले लेखक, संस्कृतिककर्मी को कबूल नहीं करना चाहिए. ‘विरोधी पक्ष के मुंह पर विरोध जताने’ और उसके साथ एक मंच पर बैठ कर जनता या श्रोताओं को संबोधित करने में बहुत फर्क है और लगातार इस फर्क को धुंधला किया जा रहा है. यह बताने की जरूरत नहीं है कि वरवर बात को पीठ पीछे कहने और चुप रह जाने वाले, भाग जाने वाले और ‘पस्त हिम्मत’ लोगों में नहीं हैं (जैसा कि मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है). उनकी जेल यात्राएं और उन पर तथा उनके साथियों पर हुए जानलेवा हमले इसके गवाह हैं. वे ‘संवाद’ और ‘लोकतंत्र’ की किन्हीं निर्जीव और निराधार अवधारणाओं में यकीन नहीं करते. वे संवाद और लोकतंत्र को जनता के जुझारू संघर्षों की जमीन पर रख कर देखते हैं और इसीलिए वे इस हकीकत को समझते हैं कि उत्पीड़ित जनता और दमनकारी सत्ता के बीच संवाद नहीं होता (और जब यह संवाद होता भी है तो जनता इसमें अपनी शर्तों के साथ शामिल होती है. इसे कुश्ती के अखाड़े की तरह आयोजित नहीं किया जा सकता और न ही जनता या उसके लेखकों को भुलावा देकर, चारा दिखा कर धोखे से अखाड़े में बुला कर ‘मुकाबले’ के लिए मजबूर किया जा सकता है). जैसा कि कुछ लोग भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, हंस का आयोजन दोतरफा बातचीत या गोलमेज सम्मेलन नहीं था, यह एक आम सभा थी, जिसमें वक्ताओं को अपनी बात रखनी थी. लेकिन इस संदर्भ में संवाद और लोकतंत्र का जिक्र इस तरह किया जा रहा है, मानो वरवर ने (या अरुंधति ने) बातचीत के किसी प्रस्ताव को नकार दिया हो (हालांकि हालात के मुताबिक ऐसे प्रस्ताव भी नकारे जाते हैं और उनका नकारा जाना जरूरी होता है).

माफ कीजिएगा दोस्तो, जो लोग 2010 में भी और इस बार भी ‘दंगल’ देखने के लिए उत्साहित थे, वे भूल गए थे कि वरवर और अरुंधति जैसे लेखक उन रीढ़विहीन लेखकों की जमात से नहीं आते, जिनको नचा नचा कर आप अपना रसरंजन करते रहें. आपका रसरंजन दूसरी बहुत सारी बातों से रोज ही होता रहता है और बेहतर है आप वही करते रहें.

तीसरी बात. मुद्दा था अभिव्यक्ति और प्रतिबंध का. उसमें दो ऐसे लेखकों को बुलाया गया (कम से कम निमंत्रण में उनका नाम था), जिनको लिखने के लिए और अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए जेल जाना पड़ा है. बाकी के दो ऐसे लोग थे, जिनमें से एक फासीवादी संगठन के प्रचारक, सिद्धांतकार और कार्यकर्ता हैं और दूसरे हाल ही में अपने प्रशंसक बने एक कहानीकार के भूतपूर्व शब्दों में ‘सत्ता के दलाल’ हैं. मोटे तौर पर वे शासक वर्ग के हिमायती और प्रतिनिधि थे. सवाल है कि क्या शासक वर्ग की अभिव्यक्ति को किसी तरह का संकट है? क्या शासक वर्ग की अभिव्यक्ति पर किसी तरह की पाबंदी लगी है? और अगर हो भी तो क्या हम शासक वर्ग और सत्ता की अभिव्यक्ति की फिक्र करेंगे, जिसका अभिव्यक्ति के तमाम साधनों पर लगभग एकाधिकार, नियंत्रण और निगरानी है? अगर नहीं तो उन्हें क्यों बुलाया गया? फिर क्या मकसद यह था कि वे शासक वर्ग की तरफ से इस बात की सफाई दें या इसका औचित्य बताएं कि जनता के पक्ष में उठने वाली अभिव्यक्तियों पर प्रतिबंध क्यों लगाया जा रहा है? अगर ऐसा था तो क्या यह पहले से ऐसी कोई घोषणा हुई थी या हंस की तरफ इस तरह की कोई बात इनमें से किसी भी वक्ता और श्रोताओं को बताई गई थी? क्या यह सचमुच न्यूज चैनल के किसी टॉक शो जैसा आयोजन था? अब तक हंस के आयोजनों के इतिहास के आधार पर ऐसा कोई दावा नहीं किया जा सकता और न ही हंस ने बताया था कि इस बार फॉर्मेट कुछ अलग होगा. हो भी नहीं सकता. आम सभाओं या व्याख्यानों में स्रोताओं के एक समूह को संबोधित किया जा रहा होता है, और कोई भी ईमानदार, प्रतिबद्ध और क्रांतिकारी लेखक या वक्ता इसे कबूल नहीं कर सकता कि वह फासीवादी और प्रतिक्रियावादी विचारों के प्रसार के लिए स्पेस देने वाले आयोजन का हिस्सा बने.

अगर यह मौका खो देना था, अगर यह बेईमानी और धूर्तता थी, अगर यह पलायन था, तो समस्या इन शब्दों के साथ नहीं है, आपके दिमाग में इन शब्दों के साथ जुड़ी धारणाओं के साथ है.

हंस की गोष्‍ठी पर वरवर राव का खुला पत्र

प्रेमचंद जयंती पर हंस के सालाना कार्यक्रम में आए कई लोग जानते थे कि अरुंधति राय की सहमति के बगैर उनका नाम आमंत्रण में छपा था इसलिए वे नहीं आ रही हैं। कुछ लोगों को यह भी पता था कि वरवर राव दिल्‍ली आ चुके हैं लेकिन यहां आने पर उन्‍हें गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेयी के साथ मंच साझा करने के बारे में पता चला है, इसलिए उन्‍होंने कार्यक्रम का बहिष्‍कार किया है। इतना जानने के बावजूद जानने वाले चुप रहे और हंस के संपादक राजेंद्र यादव अंत तक जनता को झूठ बोलकर बरगलाते रहे। आखिरकार कार्यक्रम खत्‍म होने के बमुश्किल घंटे भर बाद वरवर राव की ओर से कार्यक्रम में न शामिल होने पर एक खुला पत्र जारी किया गया जिसे हम पूरा नीचे चिपका रहे हैं। पढि़ए और समझिए कि सफेद हंस के काले चश्‍मे से आखिर सच्‍चाई कैसी दिखती है, कैसी दिखाई जाती है और इस चश्‍मे के भीतर कितने झूठ पैबस्‍त हैं।  जनपथ से साभार 

मुक्तिबोध की हजारों बार दुहराई गई पंक्ति को एक बार फिर दुहरा रहा हूं: ''उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे/ तोड़ने ही होंगे/ गढ़ और मठ/सब।''

कुछ साल पहले की बात है जब मेरे साथ अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कृतिक समिति और अखिल भारतीय जनप्रतिरोध मंच में काम करने वाले क्रांतिकारी उपन्यासकार और लेखक विजय कुमार ने आगरा से लेकर गोरखपुर तक हिंदी क्षेत्र में प्रेमचंद की जयंती पर एक सांस्कृतिक यात्रा आयोजित करने का प्रस्ताव दिया था। यह हिंदुत्व फासीवाद के उभार का समय था, जो आज और भी भयावह चुनौती की तरह सामने खड़ा है। उस योजना का उद्देश्‍य उभर रही फासीवाद की चुनौती से निपटने के लिए प्रेमचंद को याद करना और लेखकीय परम्परा को आगे बढ़ाकर इसके खिलाफ़ एक संगठित सांस्कृतिक आंदोलन को बनाना था।

जब ‘हंस’ की ओर से प्रेमचंद जयंती पर 31 जुलाई 2013 को ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' विषय पर बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया तो मुझे लगा कि अपनी बात रखने का यह अच्छा मौका है। प्रेमचंद और उनके संपादन में निकली पत्रिका ‘हंस’ के नाम के आकर्षण ने मुझे दिल्ली आने के लिए प्रेरित किया। इस आयोजन के लिए चुना गया विषय ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' ने भी मुझे आकर्षित किया। जब से मैंने नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के प्रभाव में लेखन और सांस्कृतिक सक्रियता में हिस्सेदारी करनी शुरू की तब से मेरी अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगता ही रहा है। यह स्वाभाविक था कि इस पर विस्तार से अपने अनुभवों को आपसे साझा करूं।

मुझे ‘हंस’ की ओर से 11 जुलाई 2013 को लिखा हुए निमंत्रण लगभग 10 दिन बाद मिला। इस पत्र में मेरी सहमति लिए बिना ही राजेंद्र यादव ने ‘छूट’ लेकर मेरा नाम निमंत्रण कार्ड में डाल देने की घोषणा कर रखी थी। बहरहाल, मैंने इस बात को तवज्जो नहीं दिया कि हमें कौन, क्यों और किस मंशा से बुला रहा है? मेरे साथ मंच पर इस विषय पर बोलने वाले कौन हैं?

आज दोपहर में दिल्ली में आने पर ''हंस'' की ओर से भेजे गए व्यक्ति के पास छपे हुए निमत्रंण कार्ड को देखा तब पता चला कि मेरे अलावा बोलने वालों में अरुंधति राय के साथ अशोक वाजपेयी व गोविंदाचार्य का भी नाम है। प्रेमचंद जयंती पर होने वाले इस आयोजन में अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य का नाम वक्ता के तौर पर देखकर हैरानी हुई। अशोक वाजपेयी प्रेमचंद की सामंतवाद-फासीवाद विरोधी धारा में कभी खड़े  होते नहीं दिखे। वे प्रेमचंद को औसत लेखक मानने वालों में से हैं। अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कारपोरेट सेक्टर के साथ जुड़ाव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी तरह क्या गोविंदाचार्य के बारे में जांच पड़ताल आप सभी को करने की जरूरत बनती है? हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति और साम्राज्यवाद की जी हूजूरी में गले तक डूबी हुई पार्टी, संगठन के सक्रिय सदस्य की तरह सालों साल काम करने वाले गोविंदाचार्य को प्रेमचंद जयंती पर ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' विषय पर बोलने के लिए किस आधार पर बुलाया गया!


मंच पर बाएं से संचालक अजय नावरिया, राजेंद्र यादव और अशोक वाजपेयी और के.एन. गोविंदाचार्य (खड़े) भाषण देने के बाद

मैं इस आयोजन में हिस्सेदारी कर यह बताना चाहता था कि अभिव्यक्ति पर सिर्फ प्रतिबंध ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का खतरा उठा रहे लोगों की हत्या तक की जा रही है। आंध्र प्रदेश में खुद मेरे ऊपर, गदर पर जानलेवा हमला हो चुका है। कितने ही सांस्कृतिक, मानवाधिकार संगठन कार्यकर्ता और जनसंगठन के सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया गया। हजारों लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। अभी चंद दिनों पहले हमारे सहकर्मी गंटि प्रसादम् की क्रूर हत्या कर दी गई। गंटी प्रसादम् जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा-आरडीएफ के उपाध्यक्ष, शहीद बंधु मित्र में सक्रिय सहयोगी और विप्लव रचियता संघम् के अभिन्न सहयोगी व सलाहकार और खुद लेखक थे। विरसम ने उनकी स्मृति में जब एक पुस्तक लाने की योजना बनाई और इस संदर्भ में एक वक्तव्य जारी किया तब हैदराबाद से कथित ''छत्तीसगढ चीता'' के नाम से विरसम सचिव वरलक्ष्मी को जान से मारने की धमकी दी गई। इस धमकी भरे पत्र में वरवर राव, प्रो. हरगोपाल, प्रो. शेषैया, कल्याण राव, चेलसानी प्रसाद सहित 12 लोगों को जान से मारने की चेतावनी दी गई है। लेखक, मानवाधिकार संगठन, जाति उन्मूलन संगठनों के सक्रिय सदस्यों को इस हमले में निशाना बनाकर जान से मारने की धमकी दी गई। इस खतरे के खिलाफ हम एकजुट होकर खड़े हुए और हमने गंटी प्रसादम् पर पुस्तक और उन्हें लेकर सभा का आयोजन किया। इस सभा के आयोजन के बाद एक बार फिर आयोजक को जान से मार डालने की धमकी दी गई। अभिव्यक्ति का यह भीषण खतरा साम्राज्यवादी-कारपोरेट लूट के खिलाफ अभियान, राजकीय दमन की खिलाफत और हिंदुत्व फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के चलते आ रहा है। यह जन आंदोलन की पक्षधरता और क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा को आगे ले जाने के चलते हो रहा है।

हैदराबाद में अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ एक सभा को संबोधित करने के समय हिंदुत्व फासीवादी संगठनों ने हम पर हमला किया और इसी बहाने पुलिस ने हमें गिरफ्तार किया। इसी दिल्ली में जंतर-मंतर पर क्या हुआ, आप इससे परिचित होंगे। अफजल गुरू के शरीर को ले जाने की मांग करते हुए कश्‍मीर से आई महिलाओं और अन्य लोगों को न तो जंतर-मंतर पर एकजुट होने दिया गया और न ही मुझे और राजनीतिक जेल बंदी रिहाई समिति के सदस्यों को प्रेस क्लब, दिल्ली में बोलने दिया गया। प्रेस क्लब में जगह बुक हो जाने के बाद भी प्रेस क्लब के आधिकारिक कार्यवाहक, संघ परिवार व आम आदमी पार्टी के लोग और पुलिस के साथ साथ खुद मीडिया के भी कुछ लोगों ने हमें प्रेस काफ्रेंस नहीं करने दिया और वहां धक्कामुक्की की।

मैं जिस जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा का अध्यक्ष हूं, वह संगठन भी आंध्र प्रदेश, ओडिशा में प्रतिबंधित है। इसके उपाध्यक्ष गंटी प्रसादम् को जान से मार डाला गया। इस संगठन के ओडिशा प्रभारी दंडोपाणी मोहंती को यूएपीए सहित दर्जनों केस लगाकर जेल में डाल दिया गया है। इस संगठन का घोषणापत्र सबके सामने है। पिछले सात सालों से जिस काम को किया है वह भी सामने है। न केवल यूएपीए बल्कि गृह मंत्रालय के दिए गये बयानों व निर्देशों में बार-बार जनआंदोलन की पक्षधरता करने वाले जनसंगठनों, बुद्धिजीवितयों, सहयोगियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, प्रतिबंधित करने, नजर रखने का सीधा अर्थ हमारी अभिव्यक्ति को कुचलना ही है। हम ‘लोकतंत्र’ की उसी हकीकत की आलोचना कर रहे हैं जिससे सारा देश वाकिफ है। जल, जंगल, जमीन, खदान, श्रम और विशाल मध्यवर्ग की कष्टपूर्ण बचत को लूट रहे साम्राज्‍यवादी-कारपोरेट सेक्टर और उनकी तानाशाही का हम विरोध करते हैं। हम वैकल्पिक जनवादी मॉडल की बात करते हैं। हम इस लूट और तबाही और मुसलमान, दलित, स्त्री, आदिवासी, मेहनतकश पर हमला करने वाली और साम्राज्यवादी विध्वंस व सामूहिक नरसंहार करने वाली हिंदुत्व फासीवादी राजनीति का विरोध करते हैं।

हम ऐसे सभी लोगों के साथ हैं जो जनवाद में भरोसा करते हैं। हम उन सभी लोगों के साथ हैं जो अभिव्यक्ति का खतरा उठाते हुए आज के फासीवादी खतरे के खिलाफ खड़े हैं। हम प्रेमचंद की परम्परा का अर्थ जनवाद की पक्षधरता और फासीवाद के खिलाफ गोलबंदी के तौर पर देखते है। प्रेमचंद की यही परम्परा है जिसके बूते 1930 के दशक में उपनिवेशवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी लहर की धार इस सदी में हमारे इस चुनौतीपूर्ण समय में उतनी ही प्रासंगिक और उतनी ही प्रेरक बनी हुई है।

अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य इस परम्परा के मद्देनजर किसके पक्ष में हैं? राजेन्द्र यादव खुद को प्रेमचंद की परम्परा में खड़ा करते हैं। ऐसे में सवाल बनता है कि वे अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य को किस नजर से देखते हैं? और, इस आयोजन का अभीष्‍ट क्या है? बहरहाल, कारपोरेट सेक्टर की संस्कृति और हिंदूत्व की राजनीति करने वाले लोगों के साथ मंच पर एक साथ खड़ा होने को मंजूर करना न तो उचित है और न ही उनके साथ ''अभिव्यक्ति और प्रतिबंध'' जैसे विषय पर बोलना मौजूं है।

प्रेमचंद जयंती पर ‘हंस’ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में जो भी लोग मुझे सुनने आए उनसे अपनी अनुपस्थिति की माफी दरख्वास्त कर रहा हूं। उम्मीद है आप मेरे पक्ष पर गौर करेंगे और अभिव्यक्ति के रास्ते आ रही चुनौतियों का सामना करते हुए हमसफर बने रहेंगे।

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
वरवर राव
31 जुलाई 2013, दिल्ली

26 जून 2013

वरवर राव से बातचीत तीसरा भाग.



माओवादियों के वार्ताकार होने के आधार पर आप तब कैसा महसूस करते हैं जब मीडिया माओवाद को ‘आंतरिक आतंकवाद’ और ‘देश के लिए बड़े खतरे’ जैसा कहता है?

मीडिया तो वैसे ही बनाता है। ये नहीं कि मनमोहन सिंह ने कहा है इसीलिए मैं...। रोजाना मीडिया वही प्रचार कर रहा है और उसे मानने के लिए भी मिडिल शासक तैयार हैं। ऐसी स्थिति बनी है, इसीलिए समस्या हो रही है लेकिन अब एक अंतर आ गया है। ग्रास-रूट लेवल पर जो संघर्ष कर रहे हैं, आदिवासी लोग हैं, दलित लोग हैं, किसान-मजदूर लोग हैं, वे अपने लिए, अपने साथ रहकर काम करने वाले माओवादी क्या कर रहे हैं, ये समझ गए हैं। वे मीडिया पर निर्भर नहीं हैं उनके बारे में समझने के लिए। जो टाउन्स में, अर्बन्स में रहने वाले मिडिल-क्लास लोग हैं, उनको तो सही पहचान माओवादियों के बारे में नहीं हो रही है, यह एक बड़ी समस्या है क्योंकि 1857 से लेकर आज तक हम देखते हैं कि संघर्ष करने वाले किसान-मजदूरों को बुद्धिजीवियों का समर्थन मिल रहा था क्योंकि उसे मालूम होता था कि ग्रास-रूट लेवल पर क्या हो रहा है। आज ऐसा नहीं है। अगर है भी तो दूसरी बात है कि आज बुद्धिजीवियों को खरीद लिया गया है। कॉरपोरेट सेक्टर ने उन्हें खरीद लिया है। पहले गाँव में जब टीचर होते थे, उनका बहुत ही कम वेतन हुआ करता था। वेतन न हो तो गाँव की जनता के ऊपर निर्भर होकर बच्चों को पढ़ाते थे। यानी, वे जनता के साथ रहते थे। आज स्थिति बदल गई है। आज टीचर को, प्रोफेसर को एक लाख रुपए वेतन मिलता है और पढ़ाने की कोई जिम्मेदारी भी नहीं है। तो क्या अपेक्षा करते हैं? क्योंकि बात यहाँ तक आ गई बुद्धिजीवी के लिए कि अब वे चेतना से जनता के पक्ष को रख सकते हैं, स्थिति से जनता के पक्ष नहीं रख सकते। स्थिति बहुत बदल गई है, हमारी लाइफ़-स्टाइल बहुत बदल गई है। हर तरफ़ से टैक्स मिल रहा है। घर आकर कार देता है, बाद में इंस्टॉलमेंट में कीमत लेता है। टी.वी. देता है। सभी उपकरण जो मनोरंजन के, रहने के हैं, आपके घर में आ जाते हैं, इंस्टॉलमेंट में ले सकते हैं और सरकार भी बहुत बड़े पैमाने पर आपको वेतन देती है। यह सहूलियत सॉफ्टवेयर में है, यूनीवर्सिटीज में है, हर जगह है, आपको जनता से अलग करने के लिए। ऐसी स्थिति में आप जनता का पक्ष लेने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि आपकी वैसी स्थिति नहीं है। भूख को महसूस करने की स्थिति ही नहीं है आपकी। भूखी पीढ़ी का पक्ष कैसे रख सकते हैं? चेतना से रख सकते हैं, कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। अब कितने लोग हो सकते हैं जो अपनी चेतना को...। आज देखिए न, एक विरोधाभास है, आदिवासी लोग जंगल में रहते हैं और हमारी जो ये पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है, ये तो नंबर से बनने वाली है। अब एक नंबर से बनने वाली पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी, जिसे मेजोरिटी डेमोक्रेसी कहते हैं। इस मेजोरिटी डेमोक्रेसी में आठ-दस प्रतिशत रहने वाले आदिवासियों की चेतना डिसाइड नहीं करती तो कौन-सी बात डिसाइड कर सकती है क्योंकि मैंने केरल जाकर देखा था, वहाँ चार प्रतिशत ही आदिवासी लोग हैं। 1970 से लेकर नब्बे के दशक तक जनता के लिए लिखने वाला, एक बड़ा मशहूर लोक-साहित्य का कवि, रामाकृष्णा मिनिस्टर बन गया। बहुत ही अच्छी तरह आदिवासियों के लिए लिखा। मैंने उनसे पूछा, ‘यह नेशनल पार्क क्यों बनवाया? आदिवासी महिला के ऊपर इतना क्यों हमला हो रहा है? यहाँ की जो जाति है, जिसका नाम कुछ है, जो एंटी नेशनल पार्क स्ट्रगल चलाया है।’ कहा, “नहीं-नहीं, जमाना बदल गया है।” “नहीं-नहीं, जमाना नहीं बदला, तुम बदल गये हो।” और एसेम्बली में बैठकर रेजोल्यूशन करते हैं एंटी-आदिवासी क्योंकि पूरे गैर-आदिवासी लोग हैं। वे डिसाइड कर रहे हैं। इसीलिए तो मेरा कहना है कि बात (आदिवासियों के संबंध में) ज्यादा लोग पूछ रहे हैं, ऐसा नहीं होता है। अब सोम पेटा हुआ है। वहाँ समस्या खासकर किसके लिए आ रही है? फिशरमैन (मछुआरों) के लिए आ रही है, किसानों के लिए आ रही है। श्रीकाकुलम जिले की आबादी में वे लोग माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक) ही हो सकते हैं और उनकी जिंदगी खत्म हो रही है। ये संख्या से निश्चय करते हैं या न्याय-अन्याय से डिसाइड करते हैं? महाभारत में जब पांडव जंगल में जा रहे होते हैं तो द्रौपदी उनके साथ जाती है, कुन्ती नहीं जा पाती। तो कुन्ती द्रौपदी से एक बात कहती है – “सुनो! अब तो बारह साल के लिए इन लोगों की तुम्हीं देखभाल कर लेना। ये युधिष्ठिर है, बड़ा है, तुम्हारे मन में भी उसके लिए सम्मान है। पकाने और खिलाने के समय तुम यह बात मन में रखती हो, मुझे बताने की जरूरत नहीं। भीम है, वो तो छीन लेता है, उसके बारे में भी कुछ कहने की जरूरत नहीं। अर्जुन है, उसके लिए तुम्हारे मन में प्रेम है। इन तीनों के बारे में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं पर ये जो नकुल-सहदेव हैं, छोटे बच्चे हैं। ये पूछते नहीं, ये मुँह से कहते नहीं हैं। इनके बारे में सोचो।” यानी oppressed of oppressed के बारे में, जिसे न्याय मिलना है, उसके बारे में सोचो। यानी आज की डेमोक्रेसी की एक परिभाषा यह होनी चाहिए कि एक्सप्रेशन मे कौन-से लोग Oppressed हैं? उनको क्या मिलना चाहिए? आदिवासियों में भी बंजारों को बहुत कुछ मिल रहा है लेकिन कोया, गोंड, इन लोगों को क्या मिल रहा है? दलितों में भी माला (मेहतर) जैसी जाति को मिल रहा है, लेकिन मादिगा (चमार), को क्या मिल रहा है? डक्करी को क्या मिल रहा है? सब-कास्ट को क्या मिल रहा है? यह सोचना ही डेमोक्रेसी होती है, न्याय होता है। ये सब चेतना से डिसाइड कर सकते हैं मगर मेजोरिटी-माइनॉरिटी, ये जो पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की बातें हैं, उससे तो नहीं हो सकता।

माओवाद-नक्सल आन्दोलन और आदिवासी उन्मूलन के सन्दर्भ में क्या भारतीय मीडिया का नजरिया बदलना चाहिए?

बदलना तो चाहिए ही लेकिन भारतीय मीडिया के सेल्फ इंटरेस्ट से तो समस्या आती है। उसका इंटरेस्ट तो है ही मगर उससे ज्यादा क्या चाहेगा? जन-आंदोलन को अपना मीडिया बनाना है, एक वैकल्पिक मीडिया बनाना चाहिए, जनता का मीडिया बनाना चाहिए और वह ग्रास-रूट लेवल से बनती आनी चाहिए क्योंकि समझिए, आपने एक ग्लास हाउस (शीशे का घर) बना लिया है। अब ग्लास हाउस के ऊपर पत्थर डालने वाले लोगों की हिफ़ाजत के लिए ग्लास हाउस में रहने वाले तो काम नहीं करते। तो ग्लास हाउस पर पत्थर डालने वाले लोगों के लिए एक अलग मीडिया बननी है। तो जैसा (सत्यजीत राय की फिल्म) प्रतिद्वंद्वी में एक कैरेक्टर कहता है कि “सिर्फ बम डालना ही नहीं है, अपना बम तुमको ही बनाना है।” तो क्रांति करने वाले जैसे क्रांति के लिए अपने आप शस्त्र बनाते हैं या पुलिस-स्टेशन पर हमला करके छीन लेते हैं, वैसे ही अपना मीडिया भी खुद बना लेना है या जनांदोलन के प्रभाव से मीडिया के ऊपर दबाव लाकर अपनी बातें रखने के लिए उसके ऊपर दबाव डालना है। जब दबाव बनता है, जैसे 2004 में जब दबाव बना तो हमारी ख़बरें दी गईं। जब दबाव नहीं बनता है, तो हमारी ख़बरें नहीं दी जाती हैं। जैसा मार्क्स ने भी कहा है कि केवल जल-जंगल-जमीन की मुक्ति नहीं, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भी मुक्त करना है Judges are to be judged, prosecutors are to be prosecuted. वह होना है। उसके लिए अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को हमें मुक्त करना है। इसे करने के लिए वैकल्पिक मीडिया बनाना है, वैकल्पिक पीपुल्स मीडिया बनाना है, वैकल्पिक भाषा को बनाना है, वैकल्पिक संस्कृति को बनाना है। आज ‘वैकल्पिक’ नहीं हो सकता है, वो ‘पीपुल्स’ (जनता का) ही होना चाहिए। मगर उस पर आक्रमण हो रहा है। उसे इस आक्रमण से मुक्त करके हमें जनता के हित में करना है।

क्या तेलुगु, तमिल, मलयालम, बंगला जैसी भाषाई पत्रकारिता ज्यादा जनपक्षीय भूमिका निभाती है?

क्रांति की स्थिति बहुत आगे रही तो मजबूरन उसका पक्ष लेते हैं, वैसी नहीं रही तो पक्ष नहीं लेते। दूसरी तरफ़ जितनी अंग्रेजी, हिन्दी भाषाओं का निहित स्वार्थ है उतना निहित स्वार्थ नहीं रहे तो थोड़ा बचते हैं। समझिए, दैनिक भास्कर है। दैनिक भास्कर की छत्तीसगढ़ में बहुत सी कोयले की कंपनियाँ हैं तो उसका निहित स्वार्थ ज्यादा होता है। वहीं आंध्र प्रदेश का एक छोटा-मोटा न्यूज पेपर होता है, उतना निहित स्वार्थ नहीं होता है, तो रिपोर्ट नहीं होती है। यहीं आप छत्तीसगढ़ आंदोलन को देखिए। दंडकारण्य आंदोलन के बारे में भोपाल से आने वाले, अलग क्षेत्रों से आने वाले, रायपुर से आने वाले हिंदी पेपर्स में रिपोर्टिंग बहुत रिटॉर्टेड (तोड़ी-मरोड़ी गई) होती है, लेकिन हैदराबाद से आने वाला जब भद्राचलम से रिपोर्टिंग करता है, तो उतना ‘बायस्ड’ (पक्षपातपूर्ण) नहीं होता क्योंकि उसका उतना निहित स्वार्थ नहीं है, तो फ़र्क होता है। तमिल मीडिया वहाँ के ईलम के इश्यू को लेकर क्या रिपोर्टिंग करता है? एल.टी.टी.ई. के बारे में वह क्या रिपोर्टिंग करता है? केरल में यू.ए.पी.ए. लागू किया जा रहा है, वहाँ का मीडिया कोई रिपोर्टिंग नहीं करता है। तो वहाँ भी एक निहित स्वार्थ काम करता है और ज्यादातर पूरे मीडिया को कंट्रोल कर रही हैं मल्टीनेशनल कम्पनियाँ। यहाँ तक कि क्षेत्रीय अख़बार भी मल्टीनेशनल कंपनियों के दलाल बन गए हैं। एक भी अख़बार या चैनल ऐसा नहीं है जिसके ऊपर टाटा या अम्बानी का कंट्रोल न हो। नमस्ते तेलंगाना नाम का एक न्यूज पेपर है। उसका एक चैनल है, टी न्यूज चैनल। ये टी न्यूज चैनल, राज न्यूज से लिंक होता है, जी.टी.वी. से लिंक होता है, क्योंकि अलग से चल नहीं सकता। एक विशिष्टता होती है जो कि मल्टीनेशनल कम्पनी की ही होती है, यही समस्या है।

पोस्को, जैतापुर, कुंडनकुलम, तेलंगाना की ख़बरें इन दिनों राष्ट्रीय मीडिया की बड़ी ख़बर नहीं हैं। ख़बरें कौन रोकते हैं – सरकार या उद्योगपति?

दोनों ही। उद्योगपति के लिए सरकार रोकती है। उद्योगपति भी छोटे-मोटे तो हैं नहीं। उद्योगपति कॉरपोरेट हैं और ख़बरें उनके इंटरेस्ट में सरकार रोकती है। इंटरेस्ट उनका है।

अम्बानी परिवार के ख़िलाफ़ देश के किसी हिस्से में कोई ख़बर लीक नहीं हो सकती। आखिर क्यों?

क्योंकि कल ही अरुंधति रॉय कह रही थीं, “आप क्यों इतनी बहस कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी बनेगा या राहुल बनेगा? यह बहस क्यों? जो भी बने, बनाने वाला अम्बानी है, टाटा है।” सवाल यह है, देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कौन होते हैं? दिखने वाले कठपुतली हैं ये लोग। इनको चलाने वाले तो अलग हैं – अंबानी है, टाटा है, बात यह है। इसलिए अम्बानी के विरोध में कहीं ख़बर लीक नहीं हो सकती।

आप जनपक्षीय पत्रकारिता की दिशा में प्रेस-काउंसिल और काटजू जी की भूमिका से संतुष्ट हैं?

(हँसते हुए) नहीं हैं, क्योंकि खासकर हमारा अनुभव है कि जब ‘चेयरमैन ऑफ़ दि प्रेस काउंसिल’ होते हुए काटजू यहाँ आया था, हम कुडनकुलम में ‘फैक्ट फाइंडिग’ के लिए गए थे। वरलक्ष्मी (हमारी संस्था की सचिव) भी गई थी जो वहाँ गिरफ्तार कर ली गई। देश-भर के एक ऑल इंडिया फैक्ट फाइंडिंग, आर.डी.एफ. ने आयोजित किया। वहाँ क्रांति चलाने के लिए उड़ीसा, दिल्ली, राँची सहित अन्य जगहों से लोग आए थे। यहाँ से वरलक्ष्मी और तीन लोग गए जो वहाँ गिरफ्तार कर लिए गए। एक महीने के लिए जेल में रहे। मीडिया ने इनका फोटो लगाकर खूब प्रचार किया कि ‘ये सब माओवादी हैं। वरलक्ष्मी माओवादी है और वरलक्ष्मी का पति एक ‘अंडरग्राउंड’ माओवादी नेता है।’ जबकि सच्चाई यह है कि वरलक्ष्मी की शादी ही नहीं हुई है। तमिल न्यूज पेपर, तमिल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने खूब झूठा प्रचार किया। दैनिक ईनाडु है, जिसका सबसे बड़ा सरक्युलेशन रहता है। उसने भी ख़बर छापी। हमने प्रोटेस्ट किया, तो उसका कहना था कि ‘आप भी लिखिए, हम वह भी छापेंगे।’ आज कोई बड़ा विषय होता है, कल हमारा खंडन होता है और दूसरा न्यूज आता है। इसे लेकर हमने प्रेस-काउंसिल से शिकायत की। प्रेस-काउंसिल का चेयरमैन दो-तीन रोज के लिए यहाँ आया था। उसके एजेंडे में यह मुद्दा ही नहीं था। मैं उससे मिलने के लिए गया तो पता चला कि वह मुख्यमंत्री से मिलने गया है, तो मैं पुष्पराज के कहने के बाद प्रेस-काउंसिल के एक सदस्य से मिला। तो प्रेस-काउंसिल के सदस्य ने कहा कि ‘मुझे शिकायत ही नहीं मिली है। आप फिर से दीजिए।’ यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति यह है कि इतना बड़ा जनांदोलन चल रहा है, इतने छात्रों ने खुदकुशी कर ली है, तेलंगाना मुद्दे को लेकर हजारों लोग परेशान हैं लेकिन वह (काटजू) यहाँ आकर इसके विरोध में बयान देकर जाता है और ईनाडु के बारे में जो शिकायत आती है, वो नहीं लेता है। कहता है कि ‘मुझे सी.एम. ने डिनर पर बुलाया है।’ आपको तो रामोजी राव डिनर देता है, आपको तो मुख्यमंत्री डिनर देता है, तो आप कैसे शिकायत लीजिएगा? आप ही बोल रहे हैं कि ‘मैं नहीं जा सकता हूँ, मैं नहीं ले सकता हूँ।’ यह कैसा जनपक्ष होता है? हाँ, हमको लगता है कि जो सेक्युलर डेमोक्रेटिक इश्यूज हैं, उन पर उसका रवैया तो ठीक लगता है लेकिन समस्या यह है कि जब मुद्दा वर्ग का होता है तो हम कहीं भी न्याय की आशा नहीं कर सकते।

भारतीय मीडिया की वह भूमिका जिसने आपको निजी तौर पर बहुत दुखी किया? आप जनांदोलनों की वैकल्पिक मीडिया के बारे में क्या सोचते हैं?

जनांदोलन का मीडिया बन रहा है और बनाया भी जा रहा है। छोटी-छोटी डॉक्यूमेंट्री फिल्में बन रही हैं। हाल ही में संजय काक ने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है ‘रेड आंट ड्रीम’ (माटी के लाल)। उन्होंने तीन मुद्दे लिए हैं। दंडकारण्य में क्या हो रहा है? जब अरुंधति रॉय गई थीं तो संजय काक भी गए। दंडकारण्य में कैसा जनतंत्र है? क्या प्रयोग किए जा रहे हैं? किन सपनों को हासिल करने के लिए वहाँ के लोग सोच रहे हैं? एक नियमगिरी आदिवासी ने क्या-क्या संघर्ष किए हैं? क्योंकि बाहर की दुनिया यह समझ रही है कि नियमगिरी एक स्पॉण्टेनियस (स्वत:स्फूर्त) आंदोलन है। वो (मीडिया) पूरा सच नहीं बता रहा है। वहाँ भी माओवादियों की भूमिका है। ज्यादा तो नहीं, मगर भूमिका है। तीसरा पंजाब को लेकर। भगत सिंह को लेकर आज तक क्रांति की क्या परंपरा है? क्या चल रहा है मल्टीनेशनल कम्पनियों में? इन तीनों को मिलाकर डॉक्यूमेंट्री बनाई है काक ने। हम इस फिल्म को इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी, हैदराबाद) में भी ले जाकर दिखाएंगे। तो एक वैकल्पिक, जनता के पक्ष में लेकर मीडिया आना चाहिए और इसके लिए छोटे-छोटे प्रयास होने चाहिए। ये हो रहे हैं और होंगे।

एन.जी.ओ. के कार्यों को मीडिया ने ‘विकासपरक पत्रकारिता’ का नाम दिया है। क्या आप एन.जी.ओ. की लीक से हो रही पत्रकारिता से संतुष्ट हैं?

कैसे संतुष्ट हो सकते हैं? क्योंकि उसका उद्देश्य यह है कि सारांश के तौर पर वह साम्राज्यवाद की सेवा कर रहा है। खासकर यह होता है कि क्रांति की बात को लेकर प्रचार होता है, तो क्रांति को ‘रिफॉर्म’ में खत्म करने के लिए एन.जी.ओ. आ रहा है, कॉन्सस (जागरूकता) में आ रहा है। मैंने हाल ही में एक फिल्म देखी थी, मिनुगुरुलु। इसे अमेरिका में रहने वाले एक एन.आर.आई. ने यहाँ आकर यह बनायी है। मुझे लगा कि इसे एक्शन एड सपोर्ट कर रहा है। थीम अच्छी है, बनाया भी बहुत अच्छा है। नेत्रहीन विद्यार्थियों का मुद्दा है। उनके होस्टल, उनके स्कूल, कितनी बुरी हालत में हैं! उनके लिए जो फंड मिलता है, उसे वहाँ के चलाने वाले खा जाते हैं और उनके लिए जो कमेटी है, कमेटी का चेयरमैन कैसे फंड को खा जाता है? फिल्म अच्छी बनी है। ‘अंधा होने से पहले वह अच्छा फोटोग्राफ़र था। बाद में एक एक्सीडेंट में वह अंधा हो गया। तो वो अपनी यादों के सहारे, अपने ज्ञान से, कैमरा लगाकर पूरी फिल्म बनाता रहता है, बहुत अच्छा! अगर क्रिएटिविटी देखी जाए तो as an art-piece, best art-piece. अब उसका पूरा-पूरा प्रयास होता है कि ये सब चीजें, नीचे जो हो रही हैं, उन्हें वह कलेक्टर को बताए। ये सब करके, कैमरा लगा के, और वह भी कलेक्टर के अटेंशन के लिए एक बड़े वाटर टैंक के ऊपर से कहता है कि ‘मैं खुदकुशी कर लूँगा।’ तो नीचे बहुत-से लोग आते हैं, पुलिस आती है, तो कलेक्टर भी आता है। तब उसने फिल्म बनाई। पूरा रिफॉर्म हो जाता है। यानी इससे क्या निकलता है देखने वालों को? जितना भी हो रहा है, भ्रष्टाचार हो या जो भी हो, कलेक्टर के नीचे एक सिस्टम है, उसी से हो रहा है। इसमें कलेक्टर नहीं है, इसमें पोलिटिकल सिस्टम नहीं है, इसमें दूसरे लोग नहीं हैं और ये रिफॉर्म करने वाला भी वही पालिटिकल सिस्टम है। वही रिफॉर्म करता है, ये फिल्म में है। जैसे ‘अंकुरम’ एक अच्छी जेन्यूइन फिल्म थी। फिल्म का एक पात्र झूठे मुठभेड़ में मारा गया, उसके बारे में जो बयान दिया गया, उस बयान को लेकर सरकार ने जाँच कराई और उसके लिए सजा भी दी। यह संदेश देने के लिए बहुत प्रभावशाली और बहुत विश्वसनीय फिल्म बनाई है। इसका उद्देश्य है रिफॉर्म की बात करना, वह कहीं सच्चाई में नहीं हो रहा है। आजाद के एन्काउंटर के बारे में सुप्रीम कोर्ट में गए तो बेंच ने कहा, “ये कैसे हो सकता है? रिपब्लिक अपने बच्चों को आप मार रहा है?” When we have petition the Supreme Court that was the first reaction of the Supreme Court. अन्त में क्या निकला है? सी.बी.आई. ने जाँच की, रिपोर्ट दी, क्या निकला है? दूसरी तरफ़ हमारा अनुभव है, कलेक्टर का अपहरण कर लिया, बहुत से डिमांड रखे, जनता के, आदिवासियों के। क्या नतीजा निकला? एक भी आदिवासी को नहीं छोड़ा, एक भी डिमांड पूरी नहीं की। समझिए, आप बताते हैं कि यह होने से बहुत रिफॉर्म आया है तो देखिए कि कहाँ आया है? सारे एन.जी.ओ. की कोशिश यह होती है कि क्रांति से रिफॉर्म में ले जाएँ, तो खासकर एन.जी.ओ. की भूमिका यह हो रही है कि लोगों की चेतना को वर्ग-संघर्ष की ओर न ले जाओ, वर्ग-संकट की ओर न ले जाओ, क्लास-कोलैबोरेशन (वर्ग सहभागिता) और एडजस्टमेंट (वर्ग सामंजस्य) में ले जाओ क्योंकि ये भी कॉरपोरेट स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट (संरचनात्मक सामंजस्य) करते हैं। एन.जी.ओ. स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट के लिए काम कर रहे हैं और इसीलिए मीडिया उनका बहुत प्रचार करता है।

क्या भारत में ‘प्रो-एस्टेब्लिस्मेंट जर्नलिज्म’ के समानांतर ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट जर्नलिज्म’ खड़ा हो पाया है?

अब ऐसा नहीं है कि मीडिया में ही एंटी-एस्टेब्लिशमेंट लोग हैं, मगर वह तो ‘dominated by, controlled by Pro-establishment’. अब अपनी-अपनी छोटी-छोटी पत्रिकाएँ निकालनी हैं, इसीलिए तो एक समय था कि कलकत्ते में ‘छोटी पत्रिकाओं का आंदोलन चला। पीपुल्स मीडिया का एक आंदोलन आना चाहिए तो उतने पैमाने पर नहीं हो सकता, फिर भी अलग-अलग क्षेत्रों में डि-सेंट्रेलाइज्ड (विकेंद्रीकृत) रूप में आना चाहिए। अभी कोशिश हो रही है, ये बंद नहीं होनी चाहिए, बल्कि और भी ज्यादा होनी चाहिए।

भारत के बहुल पेशेवर पत्रकारों और चंद गैर-पेशेवर पत्रकारों के लिए आपकी कोई अपील?

जाइए, वहाँ देखिएगा, जहाँ ग्रास-रूट पर संघर्ष हो रहा है। जाइए, देखिए, आपको जो लगे, वो रखिए। बिना गए, बिना देखे, जो आपको दिया गया है, वो मत बताइए। सच्चाई को बाहर लाइए। बस...।


24 जून 2013

वरवर राव से बातचीत का दूसरा भाग.


यूरोपियन मीडिया, लैटिन-अमेरिकी देशों की मीडिया या अन्य देशों की मीडिया जिसकी किसी भूमिका से आप बहुत प्रभावित हुए हों?

वैसे तो मैं मीडिया की भूमिका से प्रभावित नहीं हूँ मगर मीडिया में लिखने वाले कुछ लेखकों से जरूर प्रभावित हूँ। खासकर एदुआर्दो गालेआनो एक जर्नलिस्ट है, लैटिन अमेरिका में। ज्यादातर उसने ‘गडमेला के स्टेबल’ को लेकर बहुत कुछ लिखा है पर समग्रता से पूरे लैटिन अमेरिका में, जितने भी देशों में अमेरिकन साम्राज्य के विरोध में संघर्ष चल रहा है, उसके बारे में रिपोर्टिंग करने और किताबें लिखने के लिए एदुआर्दो गालेआनो से बेहतर और कोई नहीं है। आजकल जेम्स पेत्रास है जो खासकर भूमंडलीकरण के विरोध में लिख रहा है। वैसे देखें तो ज्यादातर लोग फ्रीलांस करने वाले इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट हैं, इन्हें हम मीडिया नहीं कह सकते। मगर वो अपने लेखन से ऐसी जगह पहुँच गए हैं कि वे जो भी लिखें तो मीडिया लेता है, रॉयल्टी देता है क्योंकि लोग पढ़ते हैं। उनका लेखन बिकता है। जेम्स पेत्रास लिखे तो बिकता है, एदुआर्दो गालेआनो लिखे तो बिकता है, चॉम्स्की लिखे तो बिकता है।

एक समय था जब बाजार सहमति का निर्माण कर रहा था, Manufacturing the consent, कन्सेंट को मेन्यूफेक्चर कर रहा था। पहले इतना प्रचार करते हैं कि आप एक खास ‘ब्रांड’ का टूथ-पेस्ट उपयोग करें मगर आपके दाँत वैसे सफेद नहीं हो सकते। पहले टूथ-पेस्ट खरीदने के लिए मानसिकता को बनाता है (माइंड सेट करता है), बाद में टूथ-पेस्ट को प्रोड्यूस करता है। यानी सहमति की उत्पत्ति होती है। यह स्थिति थी। आज यहाँ तक कि मेन्यूफेक्चरिंग डिसेंट भी मार्केट करता है। अब देखिए, तेलंगाना में एक समय हमारी न्यूज छापना अख़बार बेचने के लिए एक अच्छी चीज थी। खासकर टास्क के समय में (2004 में), फर्स्ट पेज पर हेडलाइन होती थी हमारी न्यूज। अब रामकृष्णा का इतना प्रचार हुआ टास्क के समय में, खासकर बंदूक रखे हुए जो फोटो हैं, हजारों फोटो छापे हैं हजारों न्यूज पेपर में, क्योंकि वह बिकता है। मीडिया के बारे में बात करना, एक तरह का रोजॉर्न ऑन द कन्ट्राडिक्शन्स। उसका मालिक होता है, उसका प्रॉपराइटर होता है, उसके लिए निहित स्वार्थ होता है, उसमें काम करने वाले होते हैं, खासकर जो ग्रास-रूट लेवल में स्ट्रिंगर्स से लेकर। मीडिया से जनता जो आशा करती है, वे उससे जानकार लोग होते हैं, होना चाहिए, नहीं होते हैं यह दूसरी बात है, होना चाहिए। उससे बहुत माने हुए लेखक आए हैं। राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी बहुत बड़ी भूमिका है, वाल्टेयर मूवमेंट में पत्रकारों की जो भूमिका है। जब समझते हैं कि ‘हमारे लिए इंडस्ट्री, खासकर न्यूज पेपर में काम नहीं मिल सकता है’, तो बाहर जाकर लिखते हैं। इमरजेंसी में बहुत से पत्रकारों को भी अरेस्ट किया था। कुलदीप नैयर तो जेल में था क्योंकि इमरजेंसी का विरोध कर रहा था, बाद में उसने अपने अनुभवों को लिखा। वैसे तो बहुत से माने हुए यूरोपियन जर्नलिस्ट भी हैं, मगर मेरे ऊपर जो प्रभाव है, एदुआर्दो गालेआनो का है। ऐसे भी लैटिन अमेरिका के जितने भी लेखक हैं, वे पत्रकार भी हैं, जैसे मैं हूँ। (गाब्रिएल गार्सिया) मार्केस, एक तो उपन्यासकार थे और वो रिपोर्टिंग भी कर रहे थे। यूरोप में हेमिंग्वे, जो लेखक था, वह युद्ध की रिपोर्टिंग करता था। द्वितीय विश्व युद्ध में, he was the reporter. ऐसे लोगों का प्रभाव है, हेमिंग्वे का तो बहुत प्रभाव है।



नेपाल में जनता क्रांति कर रही थी और पड़ोसी देश भारत का मीडिया क्रांति को आतंकवाद कह रहा था। आपने तब भारत की मीडिया के बारे में क्या राय बनाई थी?

नेपाल की क्रांति जब तक क्रांति रही है, वहाँ और यहाँ भी क्रांति को आतंकवाद ही कहा गया है। मगर नेपाल में जब क्रांति संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुई तब वहाँ और यहाँ की मीडिया उसकी बहुत प्रशंसा कर रही है। आपने बहुत अच्छा सवाल पूछा है। शायद एक सप्ताह पहले दिल्ली में प्रचंड आया था और द हिन्दू में दो दिनों तक सिलसिलेवार उसका साक्षात्कार आया और वह कहता है कि भारत-नेपाल का सम्बन्ध बहुत अच्छा होना चाहिए। भारत हमारी बहुत सहायता करता है। हम क्रांति छोड़कर 'प्लूरल डेमोक्रेसी' में आये हैं। हम में से जो लोग गए हैं उनसे क्रांति नहीं आ सकती, वे कुछ निश्चय कर सकते हैं मगर क्रांतिकारी नहीं हो सकते। हमें कहना है कि आज के प्रचंड और बाबूराम भट्टराई को लेकर सीताराम येचुरी हों या मनमोहन सिंह हों, बहुत प्रशंसा करते हैं क्योंकि इन लोगों ने क्रांति छोड़ दी है। ऐसा नहीं है कि नेपाल में क्रांति हो रही है तो यहाँ की क्रांति को आतंकवाद कहते हैं। क्रांति कहीं भी होती है तो इसे आतंकवाद ही कहते हैं। क्रांति नहीं हो रही है, क्रांति के नाम पर क्रांति का विरोध हो रहा हो तो बहुत प्रशंसा होती है। जो आज चल रहा है वो एक ‘continuation of corolism’ है। एक समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार थी, आज मल्टीनेशनल कंपनी की सरकार है। ईस्ट इंडिया कंपनी के इंटरेस्ट में 1857 में संघर्ष हुआ था जब ईस्ट इंडिया कंपनी से कुछ नहीं हो सका तो उससे ब्रिटिश सरकार बनी जो कंपनी की हिफाजत करती थी। क्लाइव के बारे में, वारेन हेस्टिंग्स के बारे में उसके बयान को देखें तो कंपनी को कितना फायदा मिला है? कितना नुकसान किया है? इंग्लिश पार्लियामेंट में बहुत चर्चा चली है, उसके बारे में। आज की स्थिति में देखा जाए तो यह बहुत छोटी बात है।

आज बुश क्या काम कर रहा है? या दूसरे अमेरिकन प्रेसिडेंट जो रिटायर्ड हुए हैं, क्या कर रहे हैं? ये लोग बड़ी-बड़ी कंपनियों में लग गए हैं, कम्पनियाँ इनके इंटरेस्ट में चल रही है, जिसमें क्लिंटन भी शामिल है। क्लिंटन दवा-उद्योग में है तो कोई शस्त्र-उद्योग में। तो वो इंटरेस्ट में ही राजनीति में आते हैं। अब 1930-40 के जर्मनी की स्थिति देखिए। हिटलर चुनाव में जाने से पहले 'नेशनल सोशलिज्म' का स्लोगन लेकर चुनाव लड़ा था। उसने कहा था कि ‘मैं सरकार में आऊंगा तो 'नेशनल सोस्लिज्म' लाऊंगा।’ एक तो 'नेशनल' बोलकर सेंटीमेंट को अपील कर रहा था और 'सोशलिज्म' बोलकर रिवर्सिटी को अपील कर रहा था। हिटलर का मानना था कि जर्मन ही शासन कर सकते हैं। उसको यहूदियों से समस्या थी और ‘यहूदी को ख़त्म करो’ कहते हुए उसने लगभग 90 प्रतिशत यहूदियों को ख़त्म किया। दूसरी तरफ 'नेशनलिटी' के विषय में उसका कहना था कि जर्मन, आर्यन हैं और आर्यन ही पूरी दुनिया पर शासन कर सकते हैं। एक समय था, सिकंदर का मानना था कि ग्रीक राजा ही पूरी दुनिया को जीत सकता है। इसीलिए सिकंदर दुनिया को जीतने निकला था। वह सिविल सोसाइटी का समय था। यूरोप में तो एक कहावत भी है कि जो भी नेशनल स्टेट हैं इनमें से एक-एक को अपने बारे में एक अलग भावना होती है।

फ्रांस की जनता समझती है कि वो बहुत सभ्य हैं और जर्मनी के लोग असभ्य। किसी को गाली देनी है तो उसे 'जर्मन' बोलते हैं। जर्मन समझते हैं कि हम आर्यन हैं और हम सबसे ज्यादा सभ्य हैं। इसी प्रकार अंग्रेज लोगों का मानना है कि जो हैं सो हम ही हैं और पूरी दुनिया पर हमने ही शासन किया है। सबका यही रवैया है। अब संस्कृत में देखिए आप, ‘म्लेच्छ’ कहते हैं, ‘अनटचेबल’ जो यहाँ के दलित लोग होते हैं। ‘अनटचेबल’ यूरोप में भी होते हैं। ये जो माइंड सेट होता है, इसी माइंड सेट को अपील करके वो सरकार में आया। अपनी कंपनी का यह रूल लागू करने के लिए पार्लियामेंट में उसके लिए बहुत मुश्किल हो गई और काम नहीं बना तो तो पार्लियामेंट को जला कर कम्युनिस्टों के ऊपर इसका इल्जाम लगाया और दो कम्पनियों की हिफ़ाजत के लिए वहाँ फासिज्म लाया, इसी तरह द्वितीय विश्वयुद्ध आया। आज हम देखें तो पूरी दुनिया की स्थिति एक-जैसी हो गई है। एक तरफ़ तो क्राइसिस है उनके इम्पीरियलिज्म का, दूसरी तरफ़ उस क्राइसिस से बाहर आने के लिए फ़ासिज्म। पार्लियामेंट की स्थिति देखिए आप। पार्लियामेंट चलता ही नहीं और संविधान के तहत जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसके दायरे में काम नहीं चल रहा है। सी.बी.आई. है, यह एक स्टेच्यूटरी बॉडी है। उसे जो जाँच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किया है, वह अपनी रिपोर्ट कानून मंत्री को बताता है।

आदिवासियों के बारे में देखिए। फिफ्थ शिड्यूल है, सिक्स्थ शेड्यूल है, अपने जल-जंगल-जमीन के लिए तो...उसके ऊपर उनका हक है। दूसरी तरफ़ जैसे नॉर्थ-ईस्ट स्टेट्स बने हैं। यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन में जल-जंगल-जमीन के ऊपर ही नहीं, इलाके की बात भी आई है। एक तरफ़ इंटरनेशनल लॉ और यहाँ के संविधान के तहत इतने हक हैं, दूसरी तरफ़ पूरे भारत में पूर्वी भारत से लेकर दक्षिण भारत तक सेंट्रल इंडिया में लाखों एकड़ जमीन आदिवासियों से छीन ली जा रही है, विस्थापन हो रहा है। बात क्रांति की नहीं है। संविधान कहाँ लागू हो रहा है? मौलिक अधिकार कहाँ लागू हो रहे हैं? संविधान की प्रस्तावना कहाँ लागू हो रही है? डायरेक्टिव पॉलिसीज को तो छोड़ दीजिए क्योंकि डायरेक्टिव पॉलिसीज में तो...अस्पृश्यता मिट जाना, हरेक को शिक्षा मिलना, समानता की बातें हैं। डायरेक्टिव बिल तो सरकार की तरफ से कोई बंधन नहीं है। ‘it is not binding on the part of Sarkar’, मगर एक आदर्श है। जो ‘bindingly’ सरकार के ऊपर जो धारा-56 है, वह भी नहीं लागू हो रही है। यानी जैसा संकट बढ़ता है, खासकर जो साम्राज्यवाद का संकट बढ़ता है, साम्राज्यवाद के प्रभाव में हैं सरकारें। जितने भी कानून बनाते हैं, जितने भी पार्लियामेंट-असेम्बली चलाते हैं, वे भी नहीं चल सकते। यानी उनका कानून ही उनके लिए शृंखला (बेड़ी) बन जाता है। उनका शासन ही उनके लिए शृंखला (बेड़ी) बन जाता है और उसको छोड़कर अपने असली रूप, जो फासिज्म का रूप होता है, वह दिखता है। इसमें और एक समझने वाली बात है कि यूरोप, जो पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की जन्म-भूमि है, खासकर इंग्लैंड और फ्रांस, वे देश भी द्वितीय विश्व युद्ध के समय संकट में आ गए। जर्मनी, इटली और जापान में पार्लियामेंट खत्म होकर फासिज्म-नाजिज्म लागू हुआ। तो तीसरी दुनिया के बारे में क्या समझ सकते हैं जहाँ संसदीय लोकतंत्र के लिए कोई जगह ही नहीं है। इसलिए कहते हैं कि संसदीय लोकतंत्र के लिए यहाँ जगह नहीं है, इसीलिए यहाँ जो लोकतंत्र आना है, वो नया लोकतंत्र ही हो सकता है जो क्रांति से होता है, शस्त्र-संघर्ष से होता है। आज वही चल रहा है भारत में।

अहिन्दी क्षेत्र की ख़बरें, राष्ट्रीय समाचार पत्र हिंदी क्षेत्र में नहीं पहुँचाते हैं। ऐसे में क्या राष्ट्रीय अखंडता प्रभावित होती है?

अब आज की स्थिति ऐसी आ गई है कि जिला संस्करण होते हैं। एक जिले की खबर दूसरे जिले में नहीं जाती है। अब हैदराबाद को ही लीजिए। एक दिलसुखनगर का संस्करण होता है, एक चिकटपल्ली का और एक उस्मानिया कैम्पस का संस्करण। दिलसुखनगर की ख़बरें आपके इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी) में ही रह जाती है। यानी न्यूज़ को कम्पार्टमेंटलाइज्ड कर दिया है और दमन को नेशनलाइज्ड कर दिया है। जनता क्या सोच रही है इसको कम्पार्टमेंटलाइज्ड कर दिया है और इस सोच को लेकर सरकार जो दमन चला रही है वह सेंट्रलाइज्ड रहे, कॉरपोरेटाइज्ड बना रहे। ख़ास कर आन्ध्र प्रदेश में 1974 से ईनाडु दैनिक शुरू हुआ है तभी से जिला संस्करण शुरू हुआ और न्यूज़ कम्पार्टमेंटलाइज्ड हुआ है।

हम वारंगल में रहते थे, बड़ा रेडिकल मूवमेंट था। उस रेडिकल मूवमेंट को लेकर जिला प्रशासन जो दमन चलाती थी वह खबर जिले के ही अखबार में आती थी। लेकिन अगर उसके ऊपर किसी कांग्रेसी नेता या एम.एल.ए. की प्रतिक्रिया आती तो पूरे आन्ध्र प्रदेश में खबर आती। तो बाहर वाले पूछते कि आपने यह क्या किया है? समझिये इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी) में एक संघर्ष चल रहा है और कुलपति का पुतला फूँका गया। कुलपति सेन्ट्रल के ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट का है और उसका पुतला फूँका गया तो पूरी दिल्ली में खबर पहुँचती है। क्योंकि दिल्ली में उसी समय उसकी किताब का राष्ट्रपति उद्घाटन भी कर रहा होता है। लेकिन दिल्ली के इफ्लू में रहने वाले छात्रों पर पुलिस ने दमन किया तो यह जिला संस्करण में आता है। यह तो हो ही रहा है। देखिये न, अभी कितनी आत्महत्याएँ हुई हैं इफ्लू में। अब देखिए स्थितियाँ कितनी बदल गई हैं? बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में राधाकृष्णन कुलपति बनाए गए थे। राष्ट्रीय आन्दोलन का समय था। विश्वविद्यालय के अन्दर और बाहर बहुत संघर्ष चल रहे थे। विश्वविद्यालय के अन्दर आर्मी भेजनी पड़ी थी। जब राधाकृष्णन को ले जाया गया तो उन्होंने कहा कि ‘जब तक सेना कैम्पस से बाहर नहीं आती, तब तक मैं अपना कुलपति पद नहीं संभालूँगा।’ तो प्रशासन को मानना पड़ा। पुलिस बाहर आई तो वे अन्दर गए और पद संभाला। अब उस वैल्यू सिस्टम की आज के वैल्यू सिस्टम से तुलना कीजिए। अब के कुलपति आते ही पुलिस को बुलाकर लाते हैं। हॉस्टल में स्टूडेंट की समस्या हुई है, एक मरा, दूसरा मरा! यह कौन हल करेगा? शिक्षक का क्या कर्तव्य है? मैं क्लास में पढ़ा रहा हूँ। 120 छात्र हैं, इन 120 छात्रों को पचास मिनट के लिए कंट्रोल करने का जो मेरा मोरल अथॉरिटी, मोरल रिस्पांसिबिलिटी होती है, क्या मैं ये पुलिस की सहायता से कर सकता हूँ? कैम्पस में कितने भी...यानी you lost your moral responsibility and the authority, and that’s …..लाठी बुला रहा है। यही हर जगह हो रहा है। 1982 से 1984 तक हमारे वारंगल के 12 कॉलेजों में रेडिकल मूवमेंट के कारण धारा-144 लगाई गई थी। मैं क्लास में पढ़ाता था तो खिड़की से बाहर बन्दूक दिखती था। मैंने एक जगह लिखा भी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में जर्मनी में यह बात फैल रही थी कि अब जर्मनी, पेरिस नगर पर कब्ज़ा करेगा। इस पर एक अच्छी फिल्म भी 'लास्ट लेसन' आई है। फ्रेंच शिक्षक रोजाना सबक पढ़ाता कि कल से फ्रेंच भाषा नहीं पढ़ाई जाएगी क्योंकि जर्मन लोग आ जाएंगे। The last date for teaching वाली स्थिति हमारे यहाँ भी दो सालों तक रही थी। तो यह स्थिति आजकल हर जगह हो गई है। चाहे केंद्रीय विश्वविद्यालय हो, इफ्लू हो या उस्मानिया कैम्पस हो। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के बाहर पुलिस ने मुझको रोका कि कहाँ जा रहे हो और क्यों जा रहे हो? तब प्रो. वी. कृष्णा ने उनको मुझे अन्दर आने देने को कहा, तब जाकर मुझे अन्दर जाने दिया गया। यह कैसी स्थिति आ गई है? अब मीडिया को भी देखिए आप, ईनाडु के ऑफिस में प्रवेश नहीं कर सकते है! हर जगह दिखने वाला स्टेट कंट्रोल है और स्टेट के ऊपर कॉरपोरेट कंट्रोल है।

अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल को मीडिया ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नायक घोषित किया। मीडिया की इस भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?

अब देखिए, तो 11 अप्रैल, 2011 को जब पहली बार अन्ना ने आन्दोलन शुरू किया था तो उस दिन मैं एम.एल. पार्टी के क्रन्तिकारी नेतृत्वकर्ता वासुदेव राव का पहला मेमोरी लेक्चर दे रहा था। मैंने कहा था कि ये तो अन्नलू के विरोध में अन्ना को लाया है। अन्नलू नक्सल को कहते हैं जिसका मतलब होता है भाई। जंगलमहल से लेकर बारह राज्यों में जो माओवादी आन्दोलन आया है, उसे मनमोहन सिंह देश के लिए बहुत बड़ा खतरा समझता है।  तो अन्नलू के प्रभाव का क्या करे, तो अन्ना हजारे को लाया। अन्ना हजारे सरकार और मीडिया दोनों के द्वारा मिलकर खड़ा किया गया है। इसके पीछे की कहानी यह है कि एक तरफ बी.जे.पी. बाबा रामदेव को प्रमोट कर रही थी। अब आप यह भी देखिए कि देश में बाबा रामदेव के बहुत उद्योग हैं, बहुत-सी दुकानें हैं। अब उन दुकानों के विज्ञापन के लिए उसको एक आश्रम चाहिए, एक पॉलिटिक्स चाहिए। अब ये सब तो एक घेरे के तहत होता है न। राजा दुष्यंत का राज चलना है तो राज चलने के लिए एक आश्रम होता है, वहाँ ऋषि होते हैं और उन ऋषियों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन देते हैं, गायें देते हैं। तो वे उसके धर्म को पालते हैं। ये ब्राह्मण हैं, वे क्षत्रिय हैं। वैसे ही रामदेव का आश्रम है, हर तरीके की बहुत-सी दुकानें हैं। अब उसको चलाना है तो उसके लिए एक धर्मनीति और एक राजनीति जरूरी हो जाती है और बी.जे.पी. उसको एक वाइस प्रेसीडेंट कैंडीडेट के रूप में देखती है। एक रामदेव है, योग वगैरह भी सिखा रहा है, उसका प्रभाव हो रहा है जिसका मीडिया भी खूब प्रचार कर रहा है। सरकार ने सोचा हम किसको लाएँ? तो अन्ना को लाया गया। सेबेस्टियन जो कि हमारे CPDR (Committee for Protection of Democratic Rights) का प्रेसीडेंट है। वह हैदराबाद के एक डेमोक्रेटिक राइट्स मूवमेंट में कह रहा था कि (अन्ना हजारे) गाँव में लोगों को पीटता है, प्रतिरोध पर लिखित रूप से प्रतिबंध लगाता है। ये कैसे प्रतिबंध लगते हैं? कैसे लागू करते हैं? ये अस्पृश्यता को बनाए रखना चाहता है। ये वैसा ही धर्म चाहता है, जैसा गाँधी ने चलाया था। खैर, जो भी हो, वैसे दो-तीन गाँवों में सुधार करने वाला आदमी जब दिल्ली में बैठता है और मीडिया का इतना बड़ा रिस्पॉन्स मिलता है तो वह अपने आपको बहुत बड़ा समझता है। यह बंबई आया था, सैकड़ों-हजारों गाड़ियाँ आई थीं। तो यह समझा कि ‘ये सब मेरे लिए आए हैं।’ अरे, ये सब तुम्हारे लिए नहीं, अपने इंटरेस्ट के लिए आए हैं। बासागुडा मुठभेड़ के बाद हम दिल्ली में धरना पर थे। कोई भी मीडिया वाला हमारे पास नहीं आया। दूसरी तरफ अन्ना हजारे का आन्दोलन चल रहा था, पूरा मीडिया वहाँ जमा हुआ थी। लगभग पचास चैनल्स स्थापित किए थे उन्होंने! अब देखिये, मीडिया के लिए अन्ना हजारे में कोई आकर्षण नहीं है। तो अब केजरीवाल को लाए हैं, अब केजरीवाल को प्रमोट किया जा रहा है। हमारा जैसा अनुभव है कि आम आदमी के टोपी वाले ने अज्ञान की रक्षा की है। आने वाले समय में कैसे डेमोक्रेसी हो सकती है? यानी "one can do or undo" आज स्थिति यह है कि कॉरपोरेट कम्पनियाँ किसी को ऊपर उठा भी सकती हैं और किसी को गिरा भी सकती हैं। अब अन्ना हजारे हो या जो भी हो। समझना यह है कि संकट क्या है? राजनीतिक अर्थशास्त्र का संकट क्या है? संसदीय लोकतंत्र का संकट क्या है? इसको ख़त्म करने के लिए अलग-अलग प्रयोग कर रहे हैं। एक तरफ दमन का दौर चल रहा है तो दूसरी तरफ ये नीति कभी शासक के लिए स्टिकेन कैरेक्टर का होता है। स्टिकी होता है और उसके साथ कैरेक्टर भी होता है। दमन तो चलता रहता है, शासन का दबाव भी बढ़ता रहता है। कभी-कभी इतिहास का भी इस्तेमाल होता है, वह चाहे अन्ना हजारे का हो या अरविन्द केजरीवाल का या फिर आम आदमी का हो। ‘आम आदमी’ भी आज कोई आम आदमी नहीं है। आम आदमी ग्रास रूट लेवल के सेंस में है।    

बुद्धिजीवियों का एक वर्ग मानता है कि मीडिया भारत में माओवादियों को बहुत कवरेज देता है?


कहाँ दे रहा है सही कवरेज? जब चाहा तब बहुत कवरेज दिया। मेरा अनुभव कहता है कि एक साल पहले मुझे अंग्रेजी इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले NEWS6  हो, NDTV हो, HEAD LINES  हो या TIMES NOW  हो, महीने में चार-पाँच बार बुलाते थे। TIMES NOW  हम नहीं जाते थे,  इन्कार करते थे। एक तरफ से सभी बुलाते थे, बहस होती थी। अब तो मीडिया में कवरेज ही नहीं है। उन्होंने जब चाहा तब किया। ये भी इसलिए कि सरकार इसका प्रचार करके उसके ऊपर दमन लाने के लिए या बुद्धिजीवियों के ऊपर जो इसका प्रभाव है उसको ख़त्म करने के लिए। इनको भी बुलाएँगे उनकी राय जानने के लिए और दूसरे लोगों से उसका खंडन भी करवाएँगे। मुद्दे के अंग-अंग का खंडन करते हैं और हमें यह बताना चाहते हैं कि कोई इसका जवाब नहीं दे सका है। मगर इसमें ये असफल हुए हैं। जब असफल हो गए तो साइलेंस किलिंग शुरू किया है। मीडिया आज कोई भी बड़ा विस्फोट हो या एनकाउण्टर हो, बाहर आने नहीं देती है।

वरवर राव से बातचीत.

भाग-१ 

विश्व मीडिया में भारतीय मीडिया की जनोन्मुखता.

वरवर राव मूलतः तेलगू के कवि हैं. उनकी कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. दुनिया के क्रांतिकारी लेखकों में वरवर राव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. ‘जन आंदोलन और मीडिया की भूमिका पर केन्द्रित यह साक्षात्कार सितारे हिन्द,गोपाल कुमार और आरळे श्रीकांत की बातचीत पर आधारित है. सभी हिन्दी एवं भारत अध्ययन विभाग अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. इस पूरी बातचीत को क्रमवार दख़ल की दुनिया पर बयां पत्रिका से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है.

फोटो- दख़ल की दुनिया
वर्तमान समय में खासकर तीसरी दुनिया में जो जनान्दोलन चल रहे हैं, उनके बारे में मीडिया बता रहा है। यहाँ यह जनांदोलन के पक्ष में ही होता है। खासकर इराक के ऊपर अमेरिकी हमले के समय हो या आज तक। अल-जजीरा जो कि जनांदोलन के पक्ष में है उसे एक तरह से वैकल्पिक और पीपुल्स मीडिया कह सकते हैं। ‘द गार्जियन’ अख़बार का प्रकाशन चाहे अमेरिका से हो, चाहे लंदन से, वह थोड़ा-थोड़ा निष्पक्ष होता है लेकिन अगर वर्ग-संघर्ष की बात हो तो शायद उनकी पक्षधरता शासक-वर्ग के साथ ही होती है। जैसे बी.बी.सी. को भी निष्पक्ष माना जाता है मगर आजकल बी.बी.सी. भी वर्ग-संघर्ष की समस्या होने पर उतना निष्पक्ष नहीं रह पाता है। इंग्लैंड का ‘रूल्स ऑफ लॉ’ केवल इंग्लिश लोगों के लिए ही चलता है, आयरिश क्रांतिकारियों के लिए नहीं। फ्रांस कई क्रांतियों का केंद्र रहा है। अल्जीरिया उसका उपनिवेश था जहाँ फ्रांस ने अपने विरोध में चल रहे संघर्ष का दमन किया। 1968 में द गाल ने ज्यां पॉल सार्त्र और सीमोन द बउवार जैसे बुद्धिजीवियों के रहते हुए भी छात्रों के आन्दोलन को कुचल दिया।

आज स्थिति यह है कि इस्लाम को मानने वाले जितने भी देश हैं, जैसे- अफ़गानिस्तान, इराक, ईरान, सीरिया, फिलिस्तीन आदि। इन देशों में जब भी साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष होता है तो वहाँ विश्व-मीडिया की भूमिका निष्पक्ष नहीं होती है। विश्व-मीडिया ने एक मानसिकता भी बना रखी है कि इन देशों की संस्कृति ही पिछड़ी है। मीडिया हमेशा से ही यह प्रचार करती रही है कि इन देशों के लोग ‘कॉन्फ्लिक्ट्स सिविलियन्स’ हैं। आज विश्व-मीडिया हो या भारत की मीडिया, यह हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। मीडिया शुरुआत से ही एक उद्योग रही है और समय के साथ ही यह एक ‘मोर ऑफ द मोनोपोलस इंडस्ट्री का माउथ पीस’ रह गई है। 1955 के आंध्रा चुनाव के समय के तेलुगु अख़बार का संदर्भ देना यहाँ उचित ही रहेगा क्योंकि उसमें मीडिया के बारे में कहा गया है कि “This is the product of capitalism and that’s why all the stories which one is published also are fictitious. It itself is a poison’s daughter.” क्योंकि एक पूँजीपति ही अख़बार शुरू करता है तो वह आपको या लेखकों को ‘लोकतांत्रिक क्रिया-कलापों’ के लिए कितनी जगह देगा? वह उतनी ही जगह देगा जहाँ तक उसकी स्वार्थ-सिद्धि का अतिक्रमण न हो। एक उद्योगपति या ‘मास्टर ऑफ फैक्ट्री’ उसमें काम करने वाले मजदूरों को कितनी आजादी देगा? जैसा कि मार्क्स ने कहा है “आज काम करने के लिए रोटी, कल के मजदूर को पैदा करने के लिए भी रोटी, उससे ज्यादा क्या? और आजादी भी उतनी ही कि कल आकर वह फैक्ट्री में काम कर सके, जी सके।” उतनी ही आजादी आपको भी दे सकता है। हम यह भी देखते हैं कि एक फैक्ट्री-मालिक दूसरों, खासकर कम्युनिस्ट लोगों द्वारा ट्रेड यूनियन नहीं बनाए जाने पर खुद एक ट्रेड यूनियन बनाता है। तो जिस प्रकार एक पूँजीपति अपने लाभ का अतिक्रमण न होने तक ही आजादी देता है, वैसी ही आजादी अख़बारों में भी होती है। इस प्रकार अख़बार में एकाधिकार की प्रबलता दिखाई देती है।

हमारे भारत में देखा जाए तो अख़बार जूट मिलों के प्रचार के लिए शुरू हुआ था। देश-भर में अनेक जूट मिलों के मालिक गोयनका ने अपने जूट मिलों के प्रचार के लिए ‘इंडियन एक्सप्रेस’ नामक अख़बार की शुरुआत की जिसके बाद में बहुत-से संस्करण निकले। लगभग सौ साल पहले तेलुगु में काशीनाथुनि नागेश्वर राव ने बंबई से ‘आंध्र पत्रिका’ नामक अख़बार निकाला जिसका राष्ट्रीय आंदोलन में काफ़ी योगदान रहा। हम इसे तेलुगु मीडिया और तेलुगु साहित्य के लिए ‘देशोद्धारक’ मानते हैं। अब इसी नाम से प्रेस क्लब और प्रकाशन भी चल रहा है। इस पत्रिका में तेलुगु के जाने-माने लेखक लगातार लिखते आए हैं। 1920 से 1960 तक का लगभग विश्व-क्लासिक इसमें अनूदित होकर आया है। हम अपने बचपन से ही इस पत्रिका को पढ़ते आए हैं। इसके बारे में सौ साल पहले ही एक लेखक ने कहा था कि इसे ‘अमृतांजन’ के प्रचार के लिए शुरू किया गया। ‘अमृतांजन’ बनाने वाली एक कंपनी बंबई में है। इसमें एक व्यंग भी है कि अख़बार पढ़ते हुए सिरदर्द होता है, इसीलिए ‘अमृतांजन’ पीता है। इसमें पोलिटिकल इकोनॉमी यह है कि ‘अमृतांजन’ के प्रचार के लिए यह अख़बार शुरू किया गया।

आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी आया है जिसमें कुछ गंभीर बातें भी होती हैं। मैंने एक बार उन्हें लिखा था समझो, बहुत अच्छे टेस्ट की फिल्में दिखाने वाले चैनल हैं। वे सत्यजीत रे की फिल्में दिखाते हैं या श्याम बेनेगल की लेकिन ये विज्ञापन के लिए अच्छी फिल्में दिखाते हैं। इसका उद्देश्य क्या है? हमें ऐसा लगता है कि वह एक अच्छी फिल्में बनाने वाला या दिखाने वाला चैनल है मगर ये फिल्मी चैनल अपने विज्ञापन दिखाने के लिए है और हमारी अभिरुचि सिनेमा देखने में। डिस्कवरी ऑफ इंडिया इसका उदाहरण है। नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनल हो या डिस्कवरी चैनल, बहुत रोचक होते हैं। मगर ये चैनल हमे भूगोल पढ़ाने के लिए तो शुरू नहीं हुए हैं! अब इसलिए कि मीडिया को लाने के लिए पहली सीमा यह है कि इंडस्ट्री, वह भी मोनोपोली इंडस्ट्री, अपने प्रचार के लिए कोई भी अख़बार शुरू करती है। अब उसकी पोलिटिकल इकोनॉमी भी देखिए तो जाहिर होता है, बहुत से लोगों ने लिखा भी है कि आठ-दस पेज के अख़बार निकालने के लिए आज की स्थिति में 16 या 20 रुपए का खर्च आता है और चार-पांच रुपये में इसे बेचा जाता है। फिर ये दस रुपयों का जो नुकसान हो रहा है, वह कहाँ से पूरा हो रहा है? इसके लिए सरकार या प्राइवेट कंपनियाँ विज्ञापन देती हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया या हिन्दुस्तान टाइम्स देखिए। एक समय में टाइम्स ऑफ इंडिया के सोलह पब्लिकेशन होते थे। हम पढ़ते-लिखते थे क्योंकि अच्छी पत्रिका होती थी और ये निष्पक्ष लिखते थे। एक तरफ़ विज्ञापन, एक तरफ़ आलेख और समाचार और ‘फुली अल्टरनेटिव’, हिन्दुस्तान टाइम्स में देखिए। अब आपको एयरपोर्ट पर टिकट खरीदते समय टाइम्स ऑफ इंडिया या हिन्दुस्तान में पूरे विज्ञापन मिलेंगे। ये कहाँ से लेते हैं आप?

हमारा नाइट वाचमैन मर गया था, उसके ऊपर मैंने कविता लिखी है। उसके बारे में मैंने रुचि ली थी। वह दस दिनों में एक बार आकर देखता। “क्या है?” “ये पेपर है।” “यह सब!” दस दिन में एक पेपर बनता है! उसके मन में आया कि अंग्रेजी पेपर लेना है। अंग्रेजी पेपर इतना मोटा रहता है कि दस दिन में एक बनता है। अब यह देखिए कि कॉमन माइंड का कॉमन सेंस भी इतना रहता है कि इससे तो ज्यादा पैसा बनता है, इसीलिए इतना लेता है। यह बात मैंने कविता में भी लिखी है। जैसा कॉमन माइंड का स्टैंड ज्यूडिसियरी के लिए भी होता है। उसके बारे में कॉमन माइंड कहते हैं कि जो हारता है, वो कोर्ट में रोता है और जो जीतता है, वो घर आकर रोता है। वैसा ही मीडिया और अख़बार के बारे में भी एक कॉमन माइंड के लिए ठीक है। ‘अरे, ये तो कहानी लिखते हैं’, ‘और इतना मोटा पेपर क्या हो सकता है?’, यह फुली एडवरटाइजमेंट है, यह जन-सामान्य की भी समझ होती है। अब हमारे जिन लोगों का स्टेट्स बढ़ गया है उनका कहना है कि अब पेपर लेते ही इसलिए हैं कि कौन-से मॉल में कौन-सी चीज चीप मिलेगी? पेपर आते ही वो यही देखते हैं और खरीदने जाते हैं। हमारी तरह गंभीर और अर्थपूर्ण राजनीतिक ख़बर पढ़ने के लिए नहीं। आज आप देखिए, खासकर अंग्रेजी में द हिन्दू छोड़कर कोई भी अख़बार, न्यूज़ के लिए पढ़ने लायक होता है? वो भी जहाँ एकेडमिक डेवलपमेंट पॉलिसी की बात होती है। समझिए, कुडनकुलम हुआ है कल, कुडनकुलम के मुद्दे में मीडिया और सुप्रीम कोर्ट से लेकर मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी तक सब इसे एक डेवलपमेंट प्रोग्राम समझते हैं और समर्थन देते हैं। इसे पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है। आज की स्थिति में एक भी ऐसा अख़बार नहीं है जो इस तथाकथित विकासात्मक नीति और भूमंडलीकरण-नीति का समर्थन नहीं करता हो। नहीं तो मनमोहन सिंह की बुनियाद ही क्या है? मनमोहन सिंह की बुनियाद ही एक मिडिल क्लास इंटलेक्चुअल की बुनियाद पर बनी हुई है। कश्मीर का प्रसंग है, मैं परसों दिल्ली जाकर आया। एक सौ पचास लोग कश्मीर रैली से दिल्ली आए थे। उसमें दस हजार मिसिंग केसेज के लोग थे। जिनको फाँसी हुई है या जिन्हें आजीवन जेल हुआ है। मकबूल भट्ट की माँ थीं। एक और व्यक्ति जिसे आजीवन जेल की सजा हुई है, उसकी दो-तीन साल की बच्ची थी। अफ़जल गुरु की ‘डेड बॉडी’ की डिमांड थी। अच्छा, हमारा माइंड सेट भी देखिए आप! सरबजीत सिंह पाकिस्तान में मर जाता है। शायद उन्होंने मारा है। उसको फाँसी देना और बात है और मारना दूसरी बात! तो इसपर गुस्सा आता है हमारे लोगों को। इसी तरह की राय हम बनाकर रखते हैं देश-भक्ति के बारे में। आज की स्थिति में दूसरे देश पर आक्रमण करना ही देश-भक्ति है। राजकपूर ने एक फिल्म बनाई थी, ‘परदेशी’। फिल्म का नायक रूस जाकर आता है। फिल्म में एक देशी लड़की होती है, नरगिस। नायक उसको समझाता रहता है कि रूस में बहुत बर्फ़ गिरती है। आज हम हैदराबाद में रहकर मई महीने में कैसा महसूस करते हैं? नायिका पूछती है, ‘क्या होता है बरफ़?’ नायक के समझाने पर उसे समझ में आता है तो वह हँसती है। “अच्छा, ऐसा होता है बरफ़!” बोलने के बाद वह पूछती है, “तुम इतनी क्यों तारीफ़ कर रहे हो रूस की?” रूस की जनता बहुत प्रेम से देखती है रूस को, हम जैसे भारत को देखते हैं। देश-भक्ति ऐसी होती है। अपने देश के लिए जितना गुमान हमको होता है, उनके देश के लिए उतना गुमान उन लोगों को होता है। इसको हमें मानना है, यह देश-भक्ति है। हमें यह मानना चाहिए कि पाकिस्तान की जनता को पाकिस्तान के प्रति प्रेम है। परस्पर द्वेष नहीं होना चाहिए। तो खैर, उन्होंने मार डाला। एक तो फाँसी होने के कारण, दूसरा मार डालने के कारण बहुत गुस्सा आया। इतने गुस्से के बावजूद पाकिस्तान सरकार ने, जिसे हम लोकतंत्र नहीं मानते, उसने हमें डेड बॉडी दी, उनके परिवार वालों को दी। आपने क्या किया है अफ़जल गुरु के बारे में? आप लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं, (डेड बॉडी दे देते तो) क्या होता? आसमान तो नहीं गिरता उधर? सरबजीत की डेड बॉडी दे दी तो क्या हुआ? कश्मीर में क्या होता? हमें यह कहना है कि सरकार जो स्टैंड लेती है, मीडिया भी वही स्टैंड लेता है। पाकिस्तान की जेल में क्या हो रहा है, इतनी जाँच करने वाले मीडिया-बुद्धिजीवी क्या यह बताते हैं कि भारत की जेलें कैसी हैं? क्या किसी ने कभी जाँच की है? हम कमेटी फॉर द रिलीज ऑफ पोलिटिकल प्रिजनर्स की तरफ़ से देखें। कश्मीर से आए लोग अफजल गुरु की ‘डेड बॉडी’ माँग रहे हैं। यासीन मलिक तो फ्लाइट से आया था, उसे इन्क्वायरी करके फ्लाइट से वापस श्रीनगर भेज दिया और जो लोग बस से आए उन्हें एक टेंट हाउस में सी.आर.पी.एफ. ने रखा, उनको आने नहीं दिया और उन्हें जन्तर-मन्तर जाते समय गिरफ्तार किया। उनके समर्थन में हम प्रेस क्लब में कॉन्फ्रेंस करना चाहते थे तो प्रेस-कॉन्फ्रेंस रद्द करके वहाँ संघ परिवार के लोग आ गए। अब मीडिया जो आपसे पूछ रहा है, उसे लेकर आप समझ सकते हैं। यह हमारा अनुभव है। अब लोगों को गिरफ्तार करने के विरोध में असहमति प्रकट करने के लिए दस हजार रुपये बाँधकर, जो कि प्रेस क्लब का नियम है, हम प्रेस-कॉन्फ्रेंस करने गए। हमारे जाते ही दरवाजा बन्द कर दिया गया। अन्दर मीडिया वाले थे और बाहर दिल्ली पुलिस। एक तरफ़ बजरंग दल वाले, अलग-अलग संघ-परिवार के लोग और टोपी लगाए ‘आम आदमी’ के लोग नारे लगा रहे थे और हर एक हाथ में यासीन मलिक का फोटो लिए, ‘बलात्कारी यासीन मलिक’ बोलकर नारे लगा रहे थे। इसीलिए मैंने उनको ‘वन्दे मातरम पार्टी’, ‘भारत माता की जय पार्टी’ और ‘आम आदमी पार्टी’ कहा। तो वे नारे लगा रहे थे और हम अंदर गए। अंदर कहा गया कि प्रेस-कॉन्फ्रेंस तो रद्द कर दिया गया है। आप कैसे रद्द कर सकते हैं? आपके नियम के मुताबिक हमने रुपए दे दिए हैं। ये कैसा लोकतंत्र है?’ यही लोकतंत्र है? अरे, Media is supposed to be fourth pillar of the democracy. ओ! यही लोकतंत्र है। यह सच भी है क्योंकि लोकतंत्र के एक-एक स्तंभ का क्या हो रहा है, यह दिखाई दे रहा है। विधि- व्यवस्था की क्या हालत हो रही है? इसे कैसे अमल में लाया जा रहा है? न्याय-तंत्र की क्या हालत हो रही है? सबमें कितने घोटाले चल रहे हैं, दिखाई दे रहे हैं। आंध्रा में पाँच जज जेल में हैं। ऐसा भी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में ठीक लोग हैं। यह बात आज से नहीं, जब भोपाल गैस ‘ट्रेजेडी’ हुई थी तो संबंधित कम्पनी में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों के शेयर्स थे। वह कम्पनी एवरेडी बैटरी बनाने वाली एक मल्टीनेशनल कम्पनी है। ऐसा कौन-सा कॉरपोरेट सेक्टर है जहाँ जजों के शेयर्स न हों, राजनीतिज्ञों के शेयर्स न हों या ब्यूरोक्रेट्स के शेयर्स न हों? तभी तो मल्टीनेशनल कम्पनियाँ चैम्पियन बन गई हैं। 1984 का समय था। कहा गया कि ‘जिन लोगों के कम्पनी में शेयर्स नहीं हैं, वे जाँच में शामिल हो सकते हैं।’ तीन लोग यह कहकर पीछे हट गए कि ‘हमारे शेयर्स हैं।’ न्याय-तंत्र के साथ-साथ मीडिया की भी यही हालत हो गई है। यदि मीडिया के बारे में देखें तो खासकर वे लोग जो बड़े-बड़े एंकर्स हैं, कैसे पॉलिटीसियन्स और ब्यूरोक्रेट्स से संबंध रख कर, पैसे बना रहे हैं, सारी बातें बाहर आ रही है। मीडिया में खास बात यह है कि इसमें निहित स्वार्थ बहुत ज्यादा हो गया है। जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के अख़बार बेनेट कोलमेन कम्पनी के इंटरेस्ट के लिए चलते हैं। इसीलिए अरिंदम गोस्वामी इतनी बाउंसिंग बातें करता है। एक तरफ़ कोबाद गाँधी को दिखाया जाता है, भगत सिंह जिंदाबाद, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए। भगत सिंह के नारे लगाने वालों, इन्कलाब के नारे लगाने वालों को मीडिया आतंकवादी और राष्ट्र-विरोधी कहता है। हाँ, परसों उन्होंने मुझे भी कहा, ‘हम (प्रेस क्लब को) एंटी-नेशनलिस्ट को नहीं देते हैं।’ अरे, एंटी-नेशनलिस्ट तो एक जिद है, जिसे आप क्वालिफाई करते हो। लेकिन न्यूज पेपर, जिसे सरकार इनसर्जेंसी कहती है, वो इनसर्जेंट्स का भी इंटरव्यू लेता है। जा-जाकर प्रभाकरण का इंटरव्यू लिया है, जंगल में जा-जाकर गणपति का इंटरव्यू लिया है। आप खुद जा-जाकर सरकार जिन्हें इनसर्जेंट कहती है, उनका इंटरव्यू लेते हैं, हम आकर प्रेस-क्लब में कॉन्फ्रेंस करना चाहें तो हमको एंटी-नेशनल कहते हैं। मीडिया को राष्ट्रवादी या राष्ट्र-विरोधी नहीं होना चाहिए। Ever who are anti-national? You are supposed to unwed the press-conference. How they anti-nationals think? ऐसी स्थिति मीडिया की है। इसका कारण मीडिया की एक सीमा है और वह सीमा यह है कि मोनोपोलिस्ट्स का, कॉरपोरेट सेक्टर के निहित स्वार्थ को सर्व करने के लिए मीडिया आज है।