भूमंडलीकरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भूमंडलीकरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

05 मई 2015

सोन का पानी लाल है...भाग-3

अकलू चेरो की गवाही
(आंबेडकर जयन्‍ती पर कनहर में हुए गोलीकांड का अविकल विवरण)


अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

''... उस दिन हम लोग तीन साढ़े तीन सौ रहा होगा... महिला और पुरुष। पहले धरना में जुट के न हम लोग यहां आए थे। उसके बाद जब वहां आए तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया। अब नाम नहीं बता पाएंगे... सब लगे हैं जासूसी में... उनको कमीशन मिल रहा है न भाई। तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया उनको। अब गाड़ी आ के खड़ा हो गयी तुरंत पुलिस की... जहां बाउंड्री किया है। हम कहे देखो अब नहीं सपोर्ट कर पाओगे... गाड़ी आ गयी। पहिला गाड़ी आया, दूसरा आया, फिर तीसरा आया। तीन गाड़ी आया। इतना कहते हुए सारे लोग चले गए धरनास्‍थल से। जब आए हैं तो हम जो हैं मोर्चा पर रहे। हम सोचा कि मोर्चा पर नहीं रहेंगे तो कोई संभाल नहीं पाएगा। मोर्चा पर रहने के वजह से यह घटना मेरे साथ घटी। वहां से जब चले हैं, यहां आते तक पुलिस वगैरह भी, पीएसी के लोग भी भाई, कोई अभी लाइट्रिन-बाथरूम नहीं नाश्‍ता पानी नहीं... छह बजे क बाते रहा। तब तक से वहां रोकना शुरू... हम कहे कोई मत मानना, एकदम चलते रहना, हम हैं न! भाई बात होगा तो बात हम करेंगे... आप लोग सुनना, पास करना- हां, ठीक कह रहे हैं... ऐसे करना। तब से वहां से रोकने का समय ही नहीं मिला उन लोगों को। तब फिर पूछते हुए गाड़ी से उतर गए। फिर कुछ लोग गाड़ी स्‍टार्ट किए, बीच में आ गए। हम कहे अगर बीच में गाड़ी अगर हॉर्न मारेगा तो तुम लोग चक्‍का जाम करे रहना, रुकना नहीं, जाने नहीं देना। ऐसा ही किया लोग। आगे-आगे हम और महिला-पुरुष चलते रहे।

अब जो है डीएम साहब उधर से चले। हमको मौका नहीं दिए। उतर के चले हैं डंडा पटकते से चले हैं। इसके बाद गाली-गलौज देने लगे, एकाध महिलाओं पर डंडा चला दिए। डीएम रहे, कोतवाल रहे, इंस्‍पेक्‍टर साहब रहे... मोर्चे पर। मौके से रहे डीएम साहब, दरोगा रहे कपिल यादव, कोतवाल रहे। इसके बाद में जो है... जब उन लोग गोली चलाया हमारे ऊपर... अचानक से... ऊ लोग जान रहे थे कि रस्‍ता हम लोग देबे नहीं करेंगे। माइक'वाइक का कहां समय था उन लोग के पास... वो लोग बोले, जाना नहीं है, चलो... लाउडस्‍पीकर पर कोई चेतावनी नहीं दिए। ओरिजिनल गोली मार दिया... ऐसा हमको मालूम होता न कि गोली मारेंगे तो ऐसा घटना होबे नहीं करता... हमको मारकर के अपने हाथे में गोली मार लिए हैं और कह दिए कि ये मारे हैं... बताइए... ई कपिलदेव। इन लोग का जो पीएसी गाड़ी है... जो बस वाली, बीचे में रोक दिया। ऊ लोग सोचे कि बीच में बसवे लगा दो त कइसे जनता क्रास करेगा। त जनता जब पहिले से सतर्क है न... कुछ उधर से पत्‍थरबाजी पीएसी की ओर से तो कुछ इधरो से चलने लगा। गडि़यो पर मार दिया, सिसवा सब फूट फाट गया। उन लोग कहे कि ये प्राइवेट बस पर क्‍यों मार दिया। हम कहे आपे लोग क गडि़या है... अंदाजा है... बात कर रहे हैं। उस समय लगभग पचास-पचपन के आसपास पुलिस रहे होंगे। कोई आदेश नहीं था ऊपर से... कुच्‍छ नहीं, सब अपना मनमानी किया।

वो तो हमको निगाह चढ़ाया था 23 मार्च को भगत सिंह के दिवस पर... हम लोग हर साल मनाते हैं। उसी दिन हमको निगाह चढ़ाया था। हम भी समझ गए थे। त हम लोग कहे कि हम लोग का जलूस उठेगा... पूरा मार्केट बाजार होते हुए जलूस उठेगा और धरने स्‍थल पर भगत सिंह क चित्र टांग टूंग के हम लोग अगरबत्‍ती जलाएंगे, फिर जनता घर जाएगी। 

करीब 250 जनता त एकदम चलते रहा... 100 जनता करीब पीछे रहा, त फुटने लगा। देखा पीछे जब त एतना जलता फुटने लगा। गोली लगने के बावजूद हम कहा कि ठीक कर रहा है तुम लोग न, भाग जाओ। फिर कोई कहा कि भगो मत, जो हुआ होना था, हो गया। फिर सब वापस आ गया। वो जो अपने को गोली लगाए हैं न... तो हम लोग त पीछे हैं, वो लोग क रस्‍ता अइसे है। हम लोग के आने से पहले ऊ लोग यहां आकर के हास्पिटल में दुद्धी दवा-इलाज कराना शुरू कर दिए। ये त हम लोग फोन किए, तब मीडिया वाला अखबार लत्‍ता पहुंचे। दो साथी हमको ले जाने को तैयार हो गए- एक लक्ष्‍मण और अशर्फी।*** ऊ लोग चल दिए। गाड़ी आया। उसमें हमको बैठाए हैं। उसके बाद दुद्धी आए। उसके बाद महेशानंद क लड़का गौरव... उनको पता चल गया। ऊ दौड़कर आए हैं। फिर तुरंत कराए... फिर लिखने-पढ़ने का काम, दवा करने का काम कराए। कहा कि पानी बोतल सब कर देते हैं लेकिन इनको हम यहां इनको भर्ती नहीं कर पाएंगे क्‍योंकि गोली लगा है... सरकारी अस्‍पताल में। त वहां से रेफर होके आ गए रॉबर्ट्सगंज। तो अशर्फी और लक्ष्‍मण जो बोले हैं, ऊ लोग भी साथ आए। मीडिया वाला को पता चल गया होगा, तो वहां ऊ लोग भी आए। बातचीत किए। फिर इहों से रेफर हुआ... बोला यहां भी नहीं होगा। लास्‍ट में यहां बीएचयू पहुंचे हैं बनारस में।

जब यहां बस खड़ा हुई है तो ये हुआ कि हम लोग चलेंगे घर इनको भर्ती करा के... त कौन कौन रहेगा- अशर्फी और लक्ष्‍मण। अब देखिए इनकी धोखा। हमारा आदमी जो रेगुलर रहने वाला, उनको चाय के नाम पर लेकर ऊ चले गए। ऊ लोग दूनो लापता हैं। हमको भी नहीं पता कहां हैं। वहां से आदेश है इन लोग को दिक्‍कत नहीं होना चाहिए। बताइए, जो हमारा दवाई, इलाज, पानी करता, उसको उठा ले गया। दूनों गायब हैं। कोई हमको कहा कि होटल में हैं। गांव नहीं पहुंचे। उसी दिन से गायब हैं... मंगलवार को।

इंस्‍पेक्‍टर साहब आएंगे अभी। कल से यहां पुलिस भी दो आ रहे हैं। इंस्‍पेक्‍टर साहब आए थे, पूछे कि दवा ठीक हो रहा है। वो अनाप-शनाप नहीं बोलते। कोई धमकी नहीं दिए हैं। सुन्‍दरी के हाल बहुत गंभीर है अभी... हमको बहुत अखर रहा है। अभी हम होते वहां तो... उस दिन 20 या 15 लोग घायल हुए थे। तुरंते दुद्धिए में उन लोग का दवाई हुआ। महिला लोग थे। डॉक्‍टर साहब हमसे पूछे कि ठीक हैं तो हम बोले कि थोड़ा प्रॉब्‍लम है। वो बोले कि जब कहोगे तब छोड़ देंगे।

कल से जैसे पुलिस आ रहा है, तो हमारे दिमाग में आ रहा है कि शायद पुलिस सोचता होगा कि हमको जइसे छोड़ेंगे तो वो पकड़ लेंगे। ऐसा हमको लग रहा है। हमको डरने की बात नहीं है।'' 

(19 अप्रैल, सुबह साढ़े आठ बजे)



***(सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव ने 20 अप्रैल को बताया कि लक्ष्‍मण और अशर्फी को गिरफ्तार कर के मिर्जापुर की जेल में रखा गया है और उनके ऊपर सरकारी काम में बाधा डालने, बलवा करने और पुलिस पर हमला करने के आरोप हैं। उन्‍हें कहां से और कब उठाया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गयी।) 




सोन का पानी लाल है...भाग-2

अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

कनहर बांध के मामले में कुछ तो है जो छुपाया जा रहा है। कुछ है जो उजागर तो हो गया है लेकिन शीशे की तरह साफ़ नहीं है। एक सच उनका है जिनके घर डूब जाएंगे। इन्‍हें बदले में क्‍या मिलेगा, इस पर सवाल है। यह सवाल हमेशा से रहा है। भाखड़ा-नंगल से लेकर रिहंद तक एक से ज्‍यादा बार विस्‍थापित होने वाले परिवारों को साठ साल में कायदे से उचित मुआवज़ा नहीं मिला। नर्मदा की लड़ाई तीस साल से हमारे सामने है। बहरहाल, दूसरा सच उनका है जिनके घर नहीं डूबेंगे। जिनके घर डूब रहे हैं, वह आदिवासी ग्रामीण है। जिनके नहीं डूब रहे, वह मोटे तौर पर गैर-आदिवासी और शहरी है। चूंकि इस तबके को बांध बनने से कोई नुकसान नहीं है, लिहाज़ा इस तबके को बांध बनने तक कुछ न कुछ फायदा ज़रूर है। जब 2800 करोड़ का एक बांध बनता है तो उसमें बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है। किसी का डम्‍पर चलता है। कोई ट्रक चलवाता है। कोई रोड़ी देता है। कोई बालू और कंक्रीट देता है। कोई मजदूर सप्‍लाई करता है। किसी का गेस्‍ट हाउस चमक जाता है। एक बांध के इर्द-गिर्द एक समूची परजीवी अर्थव्‍यवस्‍था खड़ी हो सकती है। इसका मतलब कि बांध से नुकसान झेलने वाले और उससे लाभ उठाने वाले वर्ग वास्‍तव में परस्‍पर शत्रुवत स्थिति में होते हैं। इन दोनों से इतर एक तीसरा पक्ष भी है। इसका अपना सच है। यह सच उन लोगों से जुड़ा है जो कनहर बांध के खिलाफ़ आंदोलन का नेतृत्‍व कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनका बांध बनने से कोई निजी नुकसान तो नहीं हो रहा, लेकिन फिर भी वे बांध के खिलाफ और आदिवासी ग्रामीणों के साथ खड़े माने जाते हैं। रोमा इसी पक्ष की नुमाइंदगी करती हैं, लेकिन कनहर बांध के संबंध में उनकी सक्रियता बहुत पुरानी नहीं मानी जाती है।

बताते हैं कि कनहर नदी को बचाने के लिए बांध के विरोध में आंदोलन का आरंभ गांधीवादी कार्यकर्ता महेशानंद ने आज से पंद्रह साल पहले किया था। उनके लोग आज भी गांवों में आदिवासियों के बीच सक्रिय हैं लेकिन महेशानंद समूचे परिदृश्‍य से नदारद हैं। दिलचस्‍प बात यह है कि बांध-विरोधी ग्रामीणों से लेकर बांधप्रेमी प्रशासन तक महेशानंद के बारे में एक ही राय रखते हैं जो अकसर एक ही जैसे वाक्‍य में भी ज़ाहिर होती है, ''वो तो भाग गया।'' 18 अप्रैल की सुबह जब सोते हुए ग्रामीणों पर लाठियां बरसायी गयीं, उसके कुछ देर बाद सुन्‍दरी गांव में आंदोलन का महिला नेतृत्‍व मानी जाने वाली सुकालो ने फोन पर बताया था, ''यहां कोई लीडर मौजूद नहीं था। महेशानंद तो भाग गया है। कहीं छुपा हुआ है।'' भीसुर गांव के नौजवान शिक्षक उमेश प्रसाद कहते हैं, ''सब लीडर फ़रार हैं। गम्‍भीरा, शिवप्रसाद, फणीश्‍वर, चंद्रमणि, विश्‍वनाथ- सब फ़रार हैं। इसीलिए जनता परेशान है। पहले ये लोग महेशानंद के ग्रुप के थे, बाद में इसमें रोमा घुस गयीं।'' य‍ह पूछने पर कि यहां के लोग अपने आंदोलन का नेता किसे मानते हैं, उन्‍होंने कहा, ''यहां के लोग तो गम्‍भीराजी को ही अपना नेता मानते हैं, लेकिन उनको फरार मानकर ही चलिए। जब से आंदोलन बदरंग हुआ, रामप्रताप यादव जैसे कुछ लोग बीच में आकर समझौता कर लिए। महेशानंद भी समझौते में चले गए हैं। रोमाजी तो यहां हइये नहीं हैं, बाकी आंदोलन तो उन्‍हीं का है। उन्‍हीं के लोग यहां लाठी खा रहे हैं।''

आंदोलन के नेतृत्‍व के बारे में सवाल पूछने पर पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं, ''महेशानंद आंदोलन छोड़कर भाग गए हैं। उन्‍होंने मान लिया है कि उनके हाथ में अब कुछ भी नहीं है। उनका कहना है कि बस उनके खिलाफ मुकदमा नहीं होना चाहिए। उनके जाने के बाद रोमाजी ने कब्‍ज़ा कर लिया है।'' आंदोलन पर ''कब्‍ज़े'' वाली बात इसलिए नहीं जमती क्‍योंकि लोग अब भी इसे रोमा का आंदोलन मानते हैं। ऐसा लगता है कि प्रशासन को दिक्‍कत दूसरी वजहों से है। यादव कहते हैं, ''महेशानंद बांध क्षेत्र से बाहर के इलाके में शांतिपूर्ण आंदोलन चलाते थे। इससे हमें कोई दिक्‍कत नहीं थी।'' प्रशासन को दिक्‍कत रोमा के आने से हुई। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''रोमाजी बहुत अडि़यल हैं।'' वे इसके लिए ''पिग-हेडेड'' शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं। वे कहते हैं, ''वे कहती हैं कि हमें बात करनी ही नहीं है... आप हमें गोली मार दीजिए, हम बांध नहीं बनने देंगे। उन्‍होंने संवाद की कोई जगह छोड़ी ही नहीं है। आखिर हम कहां जाएं?''

माना जाता है कि रोमा का यह समझौता नहीं करने वाला रवैया ही जनता को और महेशानंद के पुराने लोगों को उनके पाले में खींच लाया है। इसके अलावा महेशानंद के आंदोलन से हट जाने का लाभ कुछ दूसरे किस्‍म के समूहों ने भी उठाया है। मसलन, पीयूसीएल की राज्‍य इकाई से लेकर भाकपा(माले)-लिबरेशन और आज़ादी बचाओ आंदोलन के लोग भी अचानक इस आंदोलन में सक्रिय हो गए हैं। पड़ोस के सिंगरौली में महान के जंगल और नदी को बचाने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था ग्रीनपीस के सहयोग से जिस महान संघर्ष समिति का गठन हुआ था, वह भी अब सोनभद्र के आंदोलन में जुड़ गयी है। ये सभी धड़े रोमा को आंदोलन का असली नेता मानते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि 14 और 18 अप्रैल को जब कनहर के आदिवासियों पर पुलिस का कहर टूटा, तब और उसके बाद भी रोमा वहां नहीं मौजूद रहीं क्‍योंकि उनके आते ही उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया जाता। लोग इस बात को भी समझते हैं।

बांध के विरोध में अलग-अलग संगठनों का इतना बड़ा गठजोड़ बनने के जवाब में बांध समर्थक लोगों ने भी आंदोलन खड़ा कर दिया है। इस आंदोलन का नाम है ''बांध बनाओ, हरियाली लाओ''। दिलचस्‍प है कि इस आंदोलन में भाकपा(माले) के कुछ पुराने लोग शामिल हैं जिनमें अधिवक्‍ता प्रभु सिंह प्रमुख हैं। भीसुर गांव के रामप्रकाश कहते हैं, ''माले वाले भी हक के लिए ही लगे हुए हैं, लेकिन इनमें से कुछ लोग हैं जो बिचौलिये का काम कर रहे हैं। वे इधर भी हैं और उधर भी हैं।'' माले के एक स्‍थानीय नेता कहते हैं, ''हम लोग यहां स्थिति को ब‍हुत संभालने की कोशिश किए। रोमा तो हम लोगों के बाद आयीं और बने-बनाए आंदोलन में घुस गयीं।''

इस मामले में सबसे दिलचस्‍प पहलू यहां की विधायक रूबी प्रसाद से जुड़ा है। स्थानीय प्रशासन ने विधायक रूबी प्रसाद की अध्यक्षता में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना के मसले पर 16 जून 2014 को ग्रामीणों की एक सभा बुलायी। तहलका में प्रकाशित ''कनहर कथा'' में अंशु मालवीय लिखते हैं, ''इस सभा में हजारों लोग मौजूद थे। मंच पर आकर सभी ग्रामीण आदिवासियों ने कनहर बांध के विरोध में बात रखी। यहां वक्ताओं में वे ग्राम प्रधान भी मौजूद थे जिन्होंने बांध के विरोध में प्रस्ताव पारित कर रखा है। अंत में मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासन को सौंपा गया, लेकिन जब इस सभा की कार्यवाही की रपट प्रधानों के पास पहुंची तो वे चकित रह गए। इसमें सिर्फ सरकारी अधिकारी एवं विधायक के वक्तव्य थे। जनता के विरोध को उसमें जगह ही नहीं दी गई थी। इससे पता चलता है कि प्रशासन एवं सरकार एक कृत्रिम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।''

रूबी प्रसाद की सभा में उठी ग्रामीणों की बांध के विरोध में आवाज़ों के चलते कई लोगों को यह भ्रम हुआ था कि विधायक खुद बांध के विरोध में हैं। पुलिस अधीक्षक यादव इसे साफ़ करते हुए कहते हैं कि रूबी प्रसाद तो बांध के समर्थन में हैं। लोगों को भ्रम है। विधायक ने खुद यादव से कहा था कि ''अगर आप खाली नहीं करवा पा रहे (बांध स्‍थल को प्रदर्शनकारियों से) तो कहिए हम करवा दें।'' यादव दावा करते हैं, ''सभी पार्टियों के लोग बांध के समर्थन में हैं। एक सौ एक परसेंट लोग चाहते हैं कि बांध बने।''

एक सौ एक परसेंट लोगों से यादव का आशय उन लोगों से है जिन्‍हें बांध के बनने से कोई नुकसान नहीं हो रहा। इसमें सरकार, प्रशासन, गैर-आदिवासी शहरी वर्ग और हर राजनीतिक दल शामिल है। ये सब बांध के समर्थन में एकजुट हैं, लिहाजा आदिवासी ग्रामीण बिलकुल अकेले पड़ गए हैं। कुल 22000 के आसपास इन आदिवासियों को कोई भी मनुष्‍यों के बीच नहीं गिन रहा। यह संख्‍या सिर्फ उनकी है जो उत्‍तर प्रदेश की सीमा में रहते हैं। कनहर की डूब में आने वाले छत्‍तीसगढ़ और झारखण्‍ड के गांवों को भी गिन लिया जाए तो 101 परसेंट का बर्बर चेहरा और साफ हो जाएगा। गोलीकांड के बाद कनहर के आदिवासियों की आखिरी उम्‍मीद रोमा, स्‍थानीय नेता गम्‍भीरा और शिवप्रसाद पर टिकी थी। रोमा मौके पर पहुंच पाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि उन्‍हें जिला बदर कर दिया गया है जबकि गम्‍भीरा को 20 अप्रैल की रात इलाहाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया जब वे पीयूसीएल के वकील रविकिरण जैन के घर गए हुए थे। गम्‍भीरा को वहां से सोनभद्र लाकर पूछताछ की गई और बाद में जेल भेज दिया गया।

बांध विरोधी आंदोलन में सक्रिय भीसुर के एक नौजवान दुखी मन से कहते हैं, ''आंदोलन की दिशा टूटने के कगार पर जा चुकी है। जनता बहुत चोटिल हो चुकी है। आधे लोग धरने से उठकर चले गए थे। उन्‍हें किसी तरह वापस लाया गया है। पूरा इलाका धारा 144 लगाकर सील कर दिया गया है। जैसे ही लोग जमा होते हैं, कोई न कोई पुलिस की मुखबिरी कर देता है।''

इस शहर में मुखबिरों की कमी नहीं है। हर आदमी एक संभावित मुखबिर है। सोनभद्र का शहरी समाज बिलकुल सिंगरौली की तर्ज पर विकसित हो रहा है जहां हर आदमी हर दूसरे आदमी को मुखबिर मानता है, हर कोई हर किसी पर अविश्‍वास करता है और छोटी-छोटी टुच्‍ची आकांक्षाओं व हितों का नतीजा अंतत: पुलिस की लाठी और गोली के रूप में दिखायी देता है जिसे ''लॉ ऑफ दि लैंड'' कह कर जायज़ ठहराया जाता है। ऐसा समाज बनाने में स्‍थानीय मीडिया की भूमिका सबसे ज्‍यादा नज़र आती है। सोनभद्र के प्रमुख अख़बारों में खबरों का प्रमुख स्रोत पुलिस और प्रशासन हैं। पत्रकार सच्‍चाई को सामने नहीं लाने के लिए कटिबद्ध हैं क्‍योंकि उनके अपने हित झूठ के कारोबार के साथ जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के बाद आदिवासी ग्रामीणों के साथ हुई नाइंसाफी की ख़बर को इस कदर दबाया गया कि उसे सामने लाने के लिए दिल्‍ली से एक तथ्‍यान्‍वेषी दल को यहां आना पड़ा, जिसमें यह लेखक भी शामिल था।

इस तथ्‍यान्‍वेषी दल में कुल छह लोग थे- भाकपा(माले)-लिबरेशन की कविता कृष्‍णन, ग्रीनपीस की प्रिया पिल्‍लई, स्‍वतंत्र स्‍त्री अध्रिकार कार्यकर्ता पूर्णिमा गुप्‍ता, स्‍वतंत्र पत्रकार रजनीश, विंध्‍य बचाओ अभियान से देबोदित्‍य सिन्‍हा और यह लेखक। साथ में बनारस से पत्रकार सिद्धांत मोहन भी जुड़ गए थे। गोलकांड की सच्‍चाई को दबाने के लिए स्‍थानीय प्रशासन किस हद तक जा सकता है, उसका पता इस दल के सामने खड़ी की गयी मुश्किलों और इसके उत्‍पीड़न से लगता है। इस दल ने 19 अप्रैल की सुबह बनारस में भर्ती अकलू चेरो से मुलाकात कर के उसका बयान दर्ज किया, जिसके सीने में 14 को गोली लगी थी। इसके बाद शुरू हुआ पुलिसिया निगरानी का सिलसिला, जो अगले दिन वापसी तक लगातार जारी रहा।

बनारस से रॉबर्ट्सगंज के बीच 19 अप्रैल को कड़ा पहरा था। हमारी गाड़ी को रास्‍ते में तीन बार रोकर जांचा गया। किसी तरह सूरज ढलते-ढलते दुद्धी के गांवों में जब दल ने प्रवेश किया, तो उसे बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि आगे क्‍या होने वाला है। कोरची से कुछ दूरी पर बघाड़ू नाम का एक गांव है। यह गांव आधा डूब में आता है। यहीं पर शाम सात बजे के आसपास दल के सदस्‍य एक चाय की दुकान के बाहर बैठकर सुस्‍ता रहे थे कि जंगल के घुप्‍प अंधेरे में अचानक पुलिस की कुछ गाडि़यां आकर रुकीं। अचानक कुछ पुलिसवाले एक सादे कपड़े वाले अफसर के नेतृत्‍व में नीचे उतरे और उन्‍होंने पूछताछ शुरू कर दी। सादे कपड़े वाले अफसर ने अपना परिचय नहीं बताया, अलबत्‍ता उसकी गाड़ी पर उपजिला मजिस्‍ट्रेट अवश्‍य लिखा हुआ था। पहले पूछा गया कि आप यहां क्‍या कर रहे हैं। फिर कहा गया कि यह नक्‍सली इलाका है और वे हमारी सुरक्षा करने आए हैं। उसके बाद कविता कृष्‍णन पर मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने का आरोप लगाते हुए सादे कपड़े वाले अफसर ने कहा, ''ज्‍यादा होशियारी मत दिखाइए वरना बेइज्‍जत हो जाएंगी।'' ऐसा कहते हुए उसने कविता औश्र दल की महिला सदस्‍यों के साथ बदतमीज़ी की और मोबाइल छीनने की कोशिश की। दल के सदस्‍य देबोदित्‍य सिन्‍हा ने जब इस कार्रवाई पर आपत्ति जतायी तो अफसर ने कहा, ''यही नक्‍सली है। इसे अंदर करो।'' कुछ हस्‍तक्षेप के बाद जब यह मामला ठंडा हुआ तो पुलिस ने दल के ड्राइवर को पकड़कर उसे धमकाना शुरू किया। बड़ी मुश्किल से उसे छुड़ाया गया तो कथित मजिस्‍ट्रेट ने सामान की तलाशी के आदेश दे डाले। एसडीएम की मौजूदगी में पुलिसवालों ने एक-एक कर के सबका सामान जांचना शुरू किया। जब दल की महिलाओं ने पुरुषों द्वारा महिलाओं के सामान की जांच पर आपत्ति जतायी, तब महिला सिपाहियों को बुलाने के लिए वायरलेस करने की बात कही गयी लेकिन अंत तक कोई नहीं आया।

छत्तीसगढ़ की सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर अंधेरे जंगल में पुलिस का व्‍यवहार ऐसा था जैसे आतंकवादियों के साथ किया जाता है। तकरीबन एक घंटे तक पुलिस ने दल को हिरासत में रखा। कथित मजिस्‍ट्रेट का आग्रह था कि दल को दुद्धी थाने ले जाकर पूछताछ की जाए। जब दल ने जिलाधिकारी को भेजे पत्र की प्रति दिखायी, तब अचानक खुद को मजिस्‍ट्रेट कह रहा सादे कपड़ों वाला शख्‍स कहीं गायब हो गया और एक सभ्‍य पुलिस इंस्‍पेक्‍टर जाने कहां से आ गया। इस दौरान घटना की सूचना बड़े पैमाने पर फोन और एसएमएस से फैलायी जा चुकी थी। कुछ पत्रकारों ने सोनभद्र के डीएम को फोन भी कर दिया था। इस दबाव में इंस्‍पेक्‍टर ने माना कि प्रशासनिक स्‍तर पर दल के आने की सूचना को निचले अधिकारियों तक नहीं भेजा गया था और यह एक चूक है। इसके बावजूद दल को गांव में रुकने से मना किया गया और नक्‍सलियों सुरक्षा के नाम पर खदेड़ कर दुद्धी तहसील तक ले आया गया।

बाज़ार में पुलिस की गाडि़यां नदारद हो गयीं और अचानक खुद को एसडीएम बताने वाले एक और अधेड़ शख्‍स सादे कपड़ों में अवतरित हुए। आखिर जंगल में मिला खुद को मजिस्‍ट्रेट कहने वाला वह शख्‍स कौन था? इसका पता अब तक नहीं चल सका है। बार-बार कहने पर जिलाधिकारी ने भी उसकी पहचान उजागर नहीं की। बहरहाल, रात में दुद्धी के जिस डीआर पैलेस नामक होटल में कमरा देखा गया, उसने भोजन के बाद कमरा देने से इनकार कर दिया। उसके ऊपर संभवत: कोई दबाव था, जिसका उद्घाटन सवेरे हुआ। रात में खुद को होटल का मालिक बताने वाले मनोज जायसवाल नाम के व्‍यक्ति से बातचीत कर के रुकने का इंतज़ाम हुआ लेकिन रात भर होटल की गश्‍त लगने की आवाज़ें आती रहीं। सवेरे पता चला कि रात में होटल में मौजूद कर्मचारी के पास थाने से दो बार फोन आए थे और पुलिसवाले भी वहां पहुंचे थे।

अगले दिन सुबह होटल से बाहर निकलते ही दल को पुलिस ने घेर लिया। डीएस यादव नाम के पुलिसकर्मी ने दल के ऊपर लौट जाने का भारी दबाव बनाया। यह दल जब घायलों से मिलने अस्‍पताल पहुंचा तो वहां पुलिस ने भीतर जाने से रोकते हुए धारा 144 का हवाला दिया। डीएम से फोन पर बातचीत के बाद भीतर जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन असली दृश्‍य अभी बाकी था। थोड़ी देर बाद एक दो सितारा पुलिसकर्मी देवेश मौर्य एक उत्‍तेजित भीड़ को लेकर विजयी भाव में अस्‍पताल पहुंचे। यह भीड़ भड़काऊ नारे लगा रही थी और किसी तरह दल को बाहर निकालने पर आमादा थी। ''एनजीओ वापस जाओ'', ''विकास विरोधी मुर्दाबाद'', ''आइएसआइ एजेंट वापस जाओ'', ''मारो जुत्‍ता तान के'', आदि नारे लगाने वाले करीब डेढ़ सौ लोग थे जिन्‍होंने अस्‍पताल को घेर लिया था। पुलिस वालों में इस भीड़ में दोगुनप उत्‍साह आ गया था। संदीप कुमार राय नाम के एक पुलिसकर्मी ने पत्रकार सिद्धांत मोहन से चुटकी लेते हुए कहा, ''सबका समय आता है। कल तक आपका था, आज हमारा समय है।'' यह भीड़ पूरी तरह पुलिस की ओर से प्रायोजित थी जिसमें बाज़ार के लोग, व्‍यापारी, वकील और ठेकेदार शामिल थे जो बांध समर्थक हैं।

एक बार फिर डीएम के हस्‍तक्षेप के बाद पुलिस ने उग्र भीड़ को पीछे धकेला और तकरीबन दो घंटे तक दल को अस्‍पताल में बंधक बनाए रखने के बाद उसकी गाड़ी तक पुलिस संरक्षा में छोड़ा गया। इसके बावजूद एसडीएम की जिस गाड़ी में दल के सदस्‍यों को उनके होटल तक ले जाया गया, उस पर पीछे से जूते और चप्‍पल फेंके गए। दो बजे रॉबर्ट्सगंज में डीएम से बैठक थी। वहां जाते वक्‍त हाथीनाला पर एक बार फिर दल को पुलिस ने रोका और सबके नाम लिखवाए। डीएम से इन घटनाओं की बाबत पूछे जाने पर संक्षिप्‍त-सा जवाब मिला, ''अगर अभद्रता हुई है तो आइ फील सॉरी फॉर इट।''

पुलिस अधीक्षक का कहना था कि ''आपको इलाके में चुपके-चुपके नहीं जाना चाहिए था।'' जब ईमेल से भेजे गए पत्र का हवाला दिया गया तो यादव बोले, ''ईमेल की क्‍या विश्‍वसनीयता है?'' जांच दल की महिलाओं के साथ हुए दुर्व्‍यवहार पर यादव ने कहा, ''अगर आपने बता दिया होता कि पत्रकार हैं तो कोई दिक्‍कत नहीं होती।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या इसका मतलब यह माना जाए कि आपको सामाजिक कार्यकर्ताओं से दिक्‍कत है, तो यादव ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति खुले तौर पर अपना विद्वेष जाहिर किया। बाद में निजी बातचीत में यादव ने कहा, ''हमें गुप्‍तचर विभाग से सूचना मिली थी कि दिल्‍ली से जो टीम आ रही है, वह गांवों में जाकर लोगों को संगठित करने का काम करेगी।''
जांच दल से मुलाकात के बाद 20 अप्रैल की देर शाम जिलाधिकारी संजय कुमार ने एक प्रेस नोट जारी किया। उसमें लिखा है:
''वाकई 'कनहर सिंचाई परियोजना' के विस्थापितों को सभी अनुमन्य सुविधाएं दी जाएंगी। किसी विस्थापित को विस्थापन राशि के लिए भटकना नहीं होगा। डूब क्षेत्र के सुन्दरी, भीसुर, कोरकी, कुदरी, बड़खोरा आदि गांवों में कैम्प लगाकर दस दिनों के अन्दर चेक वितरण का कार्य किया जाएगा।'' उक्त बातें जिलाधिकारी श्री संजय कुमार ने कनहर सिंचाई परियोजना के डूब के गांव सुन्दरी के प्राथमिक विद्यालय प्रांगण में वरिष्‍ठ सपा नेता इस्तयाक अहमद की पहल पर कनहर विस्थापितों के साथ खुली बातचीत/बैठक में कहीं।
''जिलाधिकारी श्री कुमार ने मौके पर मौजूद राबर्ट्सगंजजिलाध्यक्ष समाजवादी पार्टी अविनाश कुशवाहा, जिला महासचिव विजय यादव, विधानसभा अध्यक्ष दुद्धी श्री अवध नारायण यादव, जुबैर आलम, डा. लवकुश प्रजापति, तकरार अहमद, नूरूल हक सदर, चन्द्रमणि, ग्राम प्रधान कुदरी इस्लाउद्दीन, ग्राम प्रधान सुन्दरी राम प्रसाद, प्रधान कोरची रमेश कुमार, प्रधान भीसुर परमेश्‍वर यादव के सार्थक प्रयासों की तारीफ करते हुए सारा श्रेय ग्रामीणों/विस्थापितों को दिया।''

अगले दिन इस प्रेस नोट को सारे स्‍थानीय अखबारों ने प्रमुखता से छापा, लेकिन किसी ने भी यह सवाल पूछने की ज़हमत नहीं उठायी कि जिलाधिकारी की इस बैठक में समाजवादी पार्टी के वे तमाम नेता क्‍यों मौजूद थे जो उसी सुबह दुद्धी अस्‍पताल के बाहर जांच दल के खिलाफ नारा लगाते और गाली देते पाए गए थे। 22 अप्रैल के अखबारों में यह ख़बर तो छपी कि सुन्‍दरी गांव में सर्वे का काम शुरू हो गया है, लेकिन किसी ने भी यह सूचना मिलने के बावजूद छापने की ज़हमत नहीं उठायी कि अकलू के साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी जिन्‍हें 14 के बाद से लापता बताया जा रहा था, वे मिर्जापुर जेल में हैं। अलबत्‍ता जो खबरें छापी गयीं उनका शीर्षक कुछ ऐसे था:

1. कनहर बांध के निर्माण ने अब पकड़ी रफ्तार (हिन्‍दुस्‍तान)
2. कनहर परियोजना मार्च 2018 तक होगी पूरी (हिन्‍दुस्‍तान)
3. पुलिस पर हमले का मुख्‍य आरोपी गिरफ्तार (दैनिक जागरण, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)
4. सुंदरी गांव में शुरू हुआ सर्वे (दैनिक जागरण)
5. एसडीएम, कोतवाल का हमलावर बंदी (अमर उजाला, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)

इनके अलावा एक अप्रत्‍याशित खबर सभी अखबारों के सोनभद्र संस्‍करण में 22 अप्रैल को प्रकाशित हुई:
 ''खनन हादसे में दो खान अफसरों समेत आठ फंसे''
 यह खबर 27 फरवरी 2012 को बिल्‍ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में हुए एक हादसे की मजिस्‍ट्रेटी जांच से जुड़ी है जिसमें 11 मजदूर मारे गए थे। लंबे समय से इाकी जांच चल रही थी लेकिन अचानक इस जांच को पूरा कर के जिलाधिकारी संजय कुमार ने रिपोर्ट पेश कर दी जिसमें दो खन अधिकारी, एक डीएफओ और आठ लोगों को दोषी बना दिया गया है। स्‍थानीय अखबार ''वनांचल एक्‍सप्रेस'' के संपादक शिवदास का कहना है, ''यह रिपोर्ट इसलिए लायी गयी है ताकि कनहर में हुए गोलीकांड पर परदा डाला जा सके और प्रशासन की साफ-सुथरी छवि को सामने लाकर आदिवासियों के दमन पर उठी ताज़ा बहस को कमजोर किया जा सके।''

कनहर की जटिल कहानी यहीं रुकने वाली नहीं है। बांध पर लगातार काम जारी है। इलाके में पुलिस बल बढ़ा दिया गया है। जांच दल के आने से जो खबरें और तस्‍वीरें बाहर निकल पायी हैं, उनसे प्रशासन बहुत चिंतित है क्‍योंकि मामला सिर्फ एक अवैधानिक बांध बनाने का नहीं बल्कि पैसों की भारी लूट और बंटवारे का भी है जिसके सामने आने का डर अब पैदा हो गया है। इसके अलावा जांच दल की वापसी के बाद कनहर की ओर राष्‍ट्रीय मीडिया ने भी अपना रुख़ कर लिया है। एनडीटीवी ने छोटी ही सही लेकिन एक अहम खबर आदिवासियों के दमन पर 21 अप्रैल को प्रसारित की है। जांच दल से दुर्व्‍यवहार की खबरें अंग्रेज़ी के अखबारों में आने के बाद उम्‍मीद बंधी है कि कि शायद यह मामला आने वाले दिनों में राष्‍ट्रीय फ़लक पर उठ सकेगा।

इस दौरान कनहर के आदिवासियों के लिए सोशल मीडिया पर अच्‍छा-खासा समर्थन जुटा है। वरिष्‍ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्‍तव ने कनहर गोलीकांड पर फेसबुक पर जो लिखा है, सोन नदी के ऊपर फैले अभद्रता के राज पर उससे बेहतर लिखना मुमकिन नहीं:
''यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बर्लिन से ट्वीट कर चिंता ज़ाहिर की है हेम्बोल्ट विश्वविदयालय के अभिलेखागार से लोहिया जी की वह थीसिस ग़ायब है जिस पर उन्हें डॉक्टरेट दी गयी थी। ख़बर सुनते ही तमाम समाजवादी पत्रकार और लोहियावादी सोशल मीडिया पर रोना-पीटना मचाने लगे हैं। उन सबके लिए सूचना है कि डॉक्टर लोहिया की थीसिस अधबने कनहर बाँध में ख़ून से लिथड़ी पड़ी है। कुछ पन्ने सोनभद्र पुलिस की संगीनों पर भी चिपके दिखे हैं। दम हो तो बचा लें समाजवादी थीसिस को!''

सोन का पानी लाल है...भाग-१

यूपी पुलिस की संगीनों पर चिपके हैं लोहिया की गुम थीसिस के पन्‍ने
अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

इस साल अक्षय तृतीया पर जब देश भर में लगन चढ़ा हुआ था, बारातें निकल रही थीं और हिंदी अखबारों के स्‍थानीय संस्‍करण हीरे-जवाहरात के विज्ञापनों से पटे पड़े थे, तबपश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के कुछ घरों में पहले से तय शादियां अचानक टाल दी गई थीं। कई अनब्‍याही लड़कियों के अभागे बाप बेमौसम बरसात और ओले से बरबाद फसल की भेंट गए, तो कई के भाई लेटी हुई गेहूं की बालियों और सड़े हुए आलू देखकर सदमे आ गए थे। खबरों की मानें तो बुलंदशहर, इटावा, बुंदेलखण्‍ड और मैनपुरी के किसान आगरा के पागलखाने के चक्‍कर लगा रहे थे। तबाही पूरब में भी हुई थी, लेकिन बनारस से सटे सोनभद्र में कहर कुदरत ने नहीं बल्कि पुलिस की लाठियों ने बरपाया था। इस इलाके में कम से कम दो शादियां ऐसी थीं जो अगर टली नहीं, तो उनमें रोका और कन्‍यादान करने के लिए लड़की का बाप नहीं आ सका।

फौजदार (पुत्र केशवराम, निवासी भीसुर) के बेटे का 22 अप्रैल को तिलक था। अगले हफ्ते उनके बेटे की शादी होनी थी। पड़ोस के गांव में 24 अप्रैल को देवकलिया और शनीचर (पुत्र रामदास, निवासी सुन्‍दरी) की बेटी की शादी थी। फौजदार समेत देवकलिया और शनीचर सभी 20 अप्रैल तक दुद्धी तहसील के ब्‍लॉक चिकित्‍सालय में भर्ती थे। देवकलिया की बेटी घर पर अकेली थी। 20 की शाम को अचानक फौजदार और शनीचर को गंभीर घायल घोषित कर के पांच अन्‍य मरीज़ों के साथ जिला चिकित्‍सालय में भेज दिया गया जबकि देवकलिया को दस मरीज़ों के साथ छुट्टी दे दी गयी। देवकलिया जानती थी कि चार दिन में अगर वह शादी की तैयारी कर भी लेगी तो उसके पति शनीचर को अस्‍पताल से नहीं छोड़ा जाएगा क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के समाजवादी राज में अस्‍पताल का दूसरा नाम जेल है। समाजवाद की इस नयी परिभाषा को आए यहां बहुत दिन नहीं बीते हैं।

सोनभद्र उत्‍तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जि़ला है। यहां की आधे से ज्‍यादा ज़मीन जंगल की है और दुनिया के सबसे पुराने जीवाश्‍म भी यहीं की विंध्‍य श्रृंखलाओं में पाए जाते हैं। आदिवासी बहुल यह जि़ला अपने आप में इकलौता है जिसकी सीमा चार राज्‍यों से एक साथ लगती है- छत्‍तीसगढ़, बिहार, झारखण्‍ड और मध्‍यप्रदेश। पिछले पांच महीने से अचानक इस जि़ले को 'विकास' नाम का रोग लग गया है। इसके पीछे पांगन नदी पर प्रस्‍तावित कनहर नाम का एक बांध है जिसे कोई चालीस साल पहले सिंचाई परियोजना के तहत मंजूरी दी गयी थी। झारखण्‍ड (तत्‍कालीन बिहार), छत्‍तीसगढ़ (तत्‍कालीन मध्‍यप्रदेश) और उत्‍तर प्रदेश के बीच आपसी मतभेदों के चलते लंबे समय तक इस पर काम रुका रहा और बीच में दो बार इसका लोकार्पण भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी लागत भी आरंभिक 23 करोड़ रुपये से बढ़कर 2800 करोड़ रुपये हो गयी। चूंकि 2014 के लोकसभा चुनाव ने तय कर दिया था कि इस देश पर वही राज करेगा जो 'विकास' का जुमला रटेगा, लिहाजा खुद को समाजवादी कहने वाले भी इस लोभ से अछूते न रह सके। पिछले साल जिस वक्‍त अखिलेश यादव की सरकार ने नयी-नयी विकास परियोजनाओं का एलान करना शुरू किया, ठीक तभी उनकी सरकार को इस भूले हुए बांध की भी याद हो आयी। कहते हैं कि उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव ने इसमें खास दिलचस्‍पी दिखायी और सोनभद्र को हरा-भरा बनाने के नाम पर इसका काम शुरू करवा दिया। खुली निविदा के माध्‍यम से हैदराबाद की कंपनी हिन्‍दुस्‍तान इंजीनियर्स सिंडीकेट (एचईएस) इन्‍फ्रा प्राइवेट लिमिटेड को बांध निर्माण का सौ फीसदी ठेका दे दिया गया। दिसंबर में काम शुरू हुआ तो ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू किया। प्रशासन से उनकी पहली झड़प 23 दिसंबर 2014 को हुई। इसके बाद 14 अप्रैल, 2015 को आंबेडकर जयन्‍ती के दिन पुलिस ने धरना दे रहे ग्रामीणों पर लाठियां बरसायीं और गोली चलायी। एक आदिवासी अकलू चेरो को छाती के पास गोली लगकर आर-पार हो गयी। वह बनारस के सर सुंदरलाल चिकित्‍सालय में भर्ती है। इस घटना के बाद भी ग्रामीण नहीं हारे। तब ठीक चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह सोते हुए ग्रामीणों को मार कर खदेड़ दिया गया, उनके धरनास्‍थल को साफ कर दिया गया और पूरे जिले में धारा 144 लगा दी गयी।

फौजदार, शनीचर और देवकलिया उन पंद्रह घायलों में शामिल सिर्फ तीन नाम हैं जिन्‍हें 20 अप्रैल तक दुद्धी के ब्‍लॉक चिकित्‍सालय में बिना पानी, दातुन और खून से लथपथ कपड़ों में अंधेरे वार्डों में कैद रखा गया था। प्रशासन की सूची के मुताबिक 14 अप्रैल की घटना में 12 पुलिस अधिकारी/कर्मचारी घायल हुए थे जबकि सिर्फ चार प्रदर्शनकारी घायल थे। इसके चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह पांच बजे जो हमला हुआ, उसमें चार पुलिसकर्मियों को घायल बताया गया है जबकि 19 प्रदर्शनकारी घायल हैं। दोनों दिनों की संख्‍या की तुलना करने पर ऐसा लगता है कि 18 अप्रैल की कार्रवाई हिसाब चुकाने के लिए की गयी थी। इस सूची में कुछ गड़बडि़यां भी हैं। मसलन, दुद्धी के सरकारी चिकित्‍सालय में भर्ती सत्‍तर पार के जोगी साव और तकरीबन इतनी ही उम्र के रुकसार का नाम सरकारी सूची में नहीं है। इसी तरह सुन्‍दरी गांव से दो महिलाएं 18 अप्रैल की घटना के बाद से ही लापता बतायी जा रही हैं जिनके बारे में तीन तरह की बातें सुनने में आयी हैं। एक स्‍थानीय पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर दावे से कहते हैं कि इनकी मौत हो गयी है और इन्‍हें पुलिस ने मौके पर ही दफना दिया है। कुछ दूसरे पत्रकारों का मानना है कि वे दोनों 14 अप्रैल की घटना में नामजद थीं और अभी जेल में हैं। जिले के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं कि कोई भी लापता नहीं है, यह सब अफ़वाह है। पुलिस अधीक्षक की बात पर इसलिए आशंका होती है क्‍योंकि 14 अप्रैल की घटना में गोली से घायल अकलू चेरो के दो साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी, जो अकलू के साथ बनारस तक गए थे, वे भी 20 अप्रैल तक लापता ही माने जा रहे थे जब तक कि खुद यादव ने इस संवाददाता के पूछने पर यह स्‍वीकार नहीं कर लिया कि वे दोनों मिर्जापुर की जेल में बंद हैं। इसका मतलब है कि जो लापता बताये जा रहे हैं वे जेल में भी हो सकते हैं। इसके अलावा 14 के हमले में घायल तीन और 18 के हमले में घायल छह ग्रामीणों (सरकारी सूची के मुताबिक) का कोई पता नहीं लग पाया है। इनमें से कुछ रॉबर्ट्सगंज के जिला चिकित्‍सालय में भर्ती हो सकते हैं। सूची में एक नाम 18 अप्रैल को घायल मनोज खरवार का है जो छत्‍तीसगढ़ के बलरामपुर का बताया गया है। अफ़वाह तो 18 अप्रैल को कुछ लोगों के मरने की भी थी, लेकिन यहां जिंदा लोगों की पहचान को लेकर ही इतना संशय है कि छत्‍तीसगढ़ के एक अखबार ने सोनभद्र जिले के सुन्‍दरी गांव के अकलू को भी छत्‍तीसगढ़ का बता दिया था।

अगर आपको लगता है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के संबंध में दी गयी उपर्युक्‍त सूचनाएं अधूरी हैं, तो आप बिलकुल ठीक सोच रहे हैं। जान जोखिम में डालकर भी अगर इतने ही तथ्‍य निकल पाएं, तो हम समझ सकते हैं कि सच्‍चाई को छुपाने के लिए प्रशासन की ओर से कितना ज़ोर लगाया जा रहा होगा। हम वास्‍तव में नहीं जान सकते कि बांध की डूब से सीधे प्रभावित होने वाले गांवों सुन्‍दरी, भीसुर और कोरची के कितने घरों में इस लगन बारात आने वाली थी, कितने घरों में वाकई आयी और कितनों में शादियां टल गयीं। कितने घर बसने से पहले उजड़ गए और कितने बसे-बसाये घर बांध के कारण उजड़ेंगे, दोनों की संख्‍या जानने का कोई भी तरीका हमारे पास नहीं है। दरअसल, यहां कुछ भी जानने का कोई तरीका नहीं है सिवाय इसके कि आप सरकारी बयानों पर जस का तस भरोसा कर लें। वजह इतनी सी है कि यहां एक बांध बन रहा है और बांध का मतलब विकास है। इसका विरोध करने वाला कोई भी व्‍यक्ति विकास-विरोधी और राष्‍ट्र-विरोधी है।

सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव इस बात को बड़े सहज तरीके से समझाते हैं, ''पूरी पब्लिक साथ में है कि बांध बनना चाहिए। सरकार साथ में है। तीनों राज्‍य सरकारों का एग्रीमेंट हुआ है बांध बनाने के लिए... हम लोगों ने जितना एहतियात बरता है, उसकी पूरी पब्लिक तारीफ़ कर रही है।'' यादव का यह बयान एक मान्‍यता है। इस मान्‍यता के पीछे काम कर रही तर्क-प्रणाली को आप सोनभद्र के युवा जिलाधिकारी संजय कुमार के इस बयान से समझ सकते हैं, ''हमने जो भी बल का प्रयोग किया, वह इसलिए ताकि लोगों को मैसेज दिया जा सके कि लॉ ऑफ दि लैंड इज़ देयर...। आप समझ रहे हैं? ऐसे तो लोगों में प्रशासन और पुलिस का डर ही खत्‍म हो जाएगा। कल को लोग कट्टा लेकर गोली मार देंगे... आखिर हमारे दो गज़ेटेड अफसर घायल हुए हैं...! बेचारे एसडीएम ने अपनी जेब से दस लाख अपने इलाज पर खर्च किया है!''

यह बात अपने आप में चौंकाने वाली है कि एक एसडीएम ने अपने इलाज पर अपनी जेब से दस लाख रुपये कैसे खर्च कर दिए। ज़ाहिर है, होगा तभी खर्च किए होंगे। सुन्‍दरी, भीसुर और कोरची के आदिवासियों के पास अपने ऊपर खर्च करने को सिर्फ आंसू हैं। समय के साथ वे भी अब कम पड़ते जा रहे हैं। दुद्धी के अस्‍पताल में भर्ती जोगी साव (जिनका नाम घायलों की सरकारी सूची में दर्ज नहीं है) हमें देखते ही फफक कर रो पड़ते हैं। गला भर्रा जाता है। इशारे से दिखाते हैं कि कहां-कहां पुलिस की मार पड़ी है। पैर के ज़ख्‍म दिखाने के लिए हलका सा झुकते हैं तो कमर पकड़कर ऐंठ जाते हैं। इनकी उम्र सत्‍तर बरस के पार है। 18 अप्रैल की सुबह धरनास्‍थल पर ये सो रहे थे। जब पुलिस बल आया, तो नौजवानों की फुर्ती से ये भाग नहीं पाए। वहीं गिर गए। वे रोते हुए बताते हैं, ''ओ दिन हमहन रह गइली ओही जगह... एके बेर में पहुंच गइलन सब... धर-धर के लगावे लगलन डंटा। मेहरारू के झोंटा धर के लेसाड़ के मारे लगलन... लइकनवो के नाहीं छोड़लन...।'' जोगी साव के शरीर पर डंडों के निशान हैं। उनके आंसू नहीं रुकते जब वे हाथ दिखाते हुए कहते हैं, ''एक डंटा मरले हउवन... दू डंटा गोड़े में... तब जीप में ले आके इहां गिरउलन।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है उनके खिलाफ़, वे बोले, ''मुकदमा त दर्ज नाहीं कइलन, बाकी कहलन कि अस्‍पताल में चलिए, जेल नहीं जाना पड़ेगा।''

जब हम 20 अप्रैल को दुद्धी अस्‍पताल के इस वार्ड में पहुंचे, तो कुल आठ पुरुष यहां भर्ती थे। महिला वार्ड में पांच महिलाएं थीं और अस्‍पताल के गलियारे में दो घायलों को अलग से लेटाया गया था। कुल दस पुरुषों में बस एक नौजवान था जिसका नाम था मोइन। बाकी नौ पुरुषों की औसत उम्र साठ के पार रही होगी। गलियारे में पहले बिस्‍तर पर जो बुजुर्ग लेटे थे, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। नाम- बूटन साव, गांव कोरची। इन्‍हें भी डंडे की मार पड़ी थी। चोट दिखाते हुए बोले, ''आप जनते के तरफ से हैं न?'' हां में जवाब देने पर बोले, ''हम लोगों को छोड़वा दीजिए घर तक''। और इतना कह कर वे अचानक रोने लगे। यह पूछने पर कि कब यहां से छोड़ने को कहा गया है, बूटन बोले, ''छोड़ेंगे नहीं... किसी को मिलने भी नहीं आने दे रहे हैं। बोले हैं यहीं रहना है, नहीं तो जेल जाओ।''

सुन्‍दरी में 18 अप्रैल की सुबह साठ-सत्‍तर साल के बूढ़ों के सिर पर डंडा मारा गया है। औरतों के कूल्‍हों में डंडा मारा गया है। जहूर को पुलिस ने इतनी तेज़ हाथ पर मारा कि तीन उंगलियां ही फट गयी हैं। पुलिस अधीक्षक यादव कहते हैं, ''सिर पर इरादतन नहीं मारा गया, ये ''इन्सिडेन्‍टल'' (संयोगवश) है।'' ''क्‍या तीनों बुजुर्गों के सिर पर किया गया वार ''इन्सिडेन्‍टल'' है?'' इस सवाल के जवाब में वे बोले, ''बल प्रयोग किया गया था, ''इन्सिडेन्‍टल'' हो सकता है। हम कोई दुश्‍मन नहीं हैं, इसकी मंशा नहीं थी।'' ''और 14 अप्रैल को अकलू के सीने को पार कर गयी गोली?'' यादव विस्‍तार से बताते हैं, ''पुलिस ने अपने बचाव में गोली चलायी। थानेदार (कपिलदेव यादव) को लगा कि मौत सामने है। वैसे भी हमारे यहां पहले एसडीएम पर हमला हो चुका है। सबसे पहले अकलू ने बांस की पटिया से थानेदार को मारा। फिर उसके भाई रमेश ने थानेदार के हाथ पर कुल्‍हाड़ी से हमला किया। पुलिस अफसर नीचे गिर गया। उसे लगा कि वह नहीं बच पाएगा, तो उसने रक्षा के लिए हवा में दो राउंड फायर किया।'' यह पूछे जाने पर कि हवा में फायर करने से अकलू की छाती के पास गोली कैसे लगी, यादव कहते हैं,''थानेदार ''लेड डाउन'' (पीछे की ओर झुका हुआ) था, ऐसी आपात स्थिति में ज्‍योमेट्री नहीं नापी जाती है। उसने खुद कहा कि उसे पता ही नहीं चला कि गोली कहां लगी है।''

यादव के मुताबिक आपात स्थिति में ''ज्‍योमेट्री'' नहीं नापी जाती है। उनके हिसाब से एकबारगी अगर मान भी लें कि पुलिस ने गोली ''आत्‍मरक्षा'' में चलायी और सिर पर डंडा ''संयोगवश'' चल गया, तो सवाल उठता है कि गांवों में घुसकर लोगों को पहाड़ तक खदेड़ देना, औरतों के साथ बदतमीज़ी करना, घरों पर हमला करना, उनके मुर्गे-मुर्गियां पकाकर खा जाना कौन सी गणित कहलाता है? यादव पूछते हैं, ''आप ही बताइए कौन सा घर तोड़ा गया। पुलिस आज तक गांव में नहीं घुसी है।'' डीएम भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। ''और पीएसी?'' इससे भी वे इनकार करते हैं। यादव पलटकर कहते हैं, ''तब तो आपने यह भी सुना होगा कि छह लोगों को मारकर पुलिस ने दफना दिया है?'' हमारे इनकार करने पर वे दोबारा इस बात पर ज़ोर देते हैं। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''हज़ारों मैसेज सर्कुलेट किए गए हैं कि छह लोगों को मारकर दफनाया गया है। इंटरनेशनल मीडिया भी फोन कर रहा है। एमनेस्‍टी वाले यही कह रहे हैं। हम लोग पागल हो गए हैं जवाब देते-देते। इतनी ज्‍यादा अफ़वाह फैलायी गयी है। चार दिन तक हम लोग सोये नहीं। ''  


कौन फैला रहा है यह अफ़वाह? जवाब में जिलाधिकारी हमें एक एसएमएस दिखाते हैं जिसमें 18 तारीख के हमले में पुलिस द्वारा छह लोगों को मार कर दफनाए जाने की बात कही गयी है। भेजने वाले का नाम रोमा है। रोमा सोनभद्र के इलाके में लंबे समय से आदिवासियों के लिए काम करती रही हैं। 14 अप्रैल की घटना के बाद जिन लोगों पर नामजद एफआइआर की गयी उनमें रोमा भी हैं। पुलिस को उनकी तलाश है। डीएम कहते हैं कि कनहर बांध विरोधी आंदोलन को रोमाजी ने अपना निजी एजेंडा बना लिया है। ''तो क्‍या सारे बवाल के केंद्र में अकेले रोमा हैं?'' यह सवाल पूछने पर वे मुस्‍करा कर कहते हैं, ''लीजिए, सारी रामायण खत्‍म हो गयी। आप पूछ रहे हैं सीता कौन है।'' डीएम और एसपी दोनों अबकी हंस देते हैं। 

11 जून 2014

खेल शुरू हो चुका है: आनंद तेलतुंबड़े


गरीबों-उत्पीड़ितों की हिमायत के ऐलान के साथ मोदी सरकार के बनते ही भगाणा के आंदोलनकारी दलित परिवारों को जंतर मंतर से बेदखल करने की कोशिशों और पुणे में एक मुस्लिम नौजवान की हत्या में आनंद तेलतुंबड़े ने आने वाले दिनों के संकेतों को पढ़ने की कोशिश की है. अनुवाद: रेयाज उल हक.

अब इस आधार पर कि लोगों ने भाजपा की अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा वोट उसे दिया है और नरेंद्र मोदी ने ‘अधिकतम प्रशासन’ की शुरुआत कर दी है, बहुत सारे लोग यह सोच रहे थे कि हिंदुत्व के पुराने खेल की जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने हाव-भाव और भाषणों के जरिए मोदी ने बड़ी कुशलता से ऐसा भ्रम बनाए भी रखा है. इसके नतीजे में मोदी के सबसे कट्टर आलोचक तक गलतफहमी के शिकार हो गए हैं. यहां तक कि जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है, उनमें से भी कइयों को ऐसा लगने लगा है कि मोदी शायद कारगर साबित हों. लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में, भावनाओं में लिपटी हुई लफ्फाजी से भरे ऐलान के आधार पर यह यकीन करना बहुत जल्दबाजी होगी कि मोदी सरकार गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति समर्पित होगी. तब भी कइयों को लगता है कि चूंकि वे एक साधारण पिछड़ी जाति के परिवार से आते हैं और पूरी आजादी से काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि गरीबों और उत्पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हों. नहीं भी तो वे मुसलमानों (जिन्होंने मोदी को वोट नहीं दिया है) और दलितों (जिन्होंने भारी तादाद में उन्हें वोट दिया है) के प्रति संवेदनशील होंगे. यही वे दो मुख्य समुदाय हैं जिनसे मिल कर वह गरीब और उत्पीड़ित तबका बनता है, जिसके प्रति मोदी समर्पित होने की बात कह रहे हैं. 

लेकिन इस हफ्ते हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने इन उम्मीदों को झूठा साबित कर दिया. दलितों के बलात्कारों और हत्याओं की लहर तो चल ही रही थी, उनके साथ साथ घटी इन दो घटनाओं ने ऐसे संकेत दिए हैं कि शायद पुराना खेल शुरू हो चुका है.

दलितों की नामुराद मांगें

भगाणा की भयानक घटना देश को शर्मिंदा करने के लिए काफी थी: घटना ये है कि हरियाणा में 23 मार्च को 13 से 18 साल की चार लड़कियों को नशा देकर रात भर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के ये अपराधी उन्हें ले जाकर भटिंडा रेलवे स्टेशन के पास झाड़ियों में फेंक आए. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कहीं अधिक घिनौना और शर्मनाक है. लड़कियों को मेडिकल जांच के दौरान अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट से गुजरना पड़ा, जिसका बलात्कार के मामले में इस्तेमाल करने पर आधिकारिक पाबंदी लगाई जा चुकी है. हालांकि पुलिस को दलित समुदाय के दबाव के चलते शिकायत दर्ज करनी पड़ी, लेकिन उसने अपराधियों को पकड़ने में पांच हफ्ते लगाए. जबकि हिसार अदालत में उनको रिहा कराने की न्यायिक प्रक्रिया फौरन शुरू हो गई. और यह गिरफ्तारी भी तब हुई जब भगाणा के दलितों को उन लड़कियों के परिजनों के साथ इंसाफ के लिए धरने पर बैठना पड़ा. ये दलित परिवार अपने गांव वापस लौटने में डर रहे हैं क्योंकि उन्हें जाटों के हमले की आशंका है. भगाणा के करीब 90 दलित परिवार, जिनमें बलात्कार की शिकायतकर्ता लड़कियों के परिवार भी शामिल हैं, दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके अलावा 120 दूसरे परिवार हिसार के मिनी सचिवालय पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान ही नाबालिग लड़कियों के बलात्कारों की अनेक भयानक खबरें निकल कर सामने आई हैं. जैसा कि एक हिंदी ब्लॉग रफू ने प्रकाशित किया है, पास के डाबरा गांव की 17 साल की एक दलित लड़की का जाट समुदाय के ही लोगों ने 2012 में सामूहिक बलात्कार किया था जिसके बाद उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी. एक और 10 वर्षीय बच्ची का एक अधेड़ मर्द ने बलात्कार किया था. इसके अलावा एक और लड़की का एक जाट पुरुष ने बलात्कार किया जो आज भी सरेआम घूम रहा है और उल्टे पुलिस ने लड़की को ही गिरफ्तार करके उसे यातनाएं दीं. ये सारी लड़कियां इंसाफ के लिए निडर होकर लड़ रही हैं और इन विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं.

जंतर मंतर पर 6 जून को सुबह करीब 6 बजे, जब ज्यादातर प्रदर्शनकारी सो रहे थे, पुलिसकर्मियों का एक बड़ा समूह आया और उसने प्रदर्शनकारियों के तंबू गिरा दिए. उन्होंने उनके तंबुओं को जबरन वहां से हटा दिया और चेतावनी दी कि वे लोग दोपहर 12 बजे तक वहां से चले जाएं. हिसार मिनी सचिवालय में भी विरोध करने वाले इसी तरह हटाए गए. दोनों जगहों पर पुलिस ने उन्हें तितर बितर कर दिया और उनका सामान तोड़ फोड़ दिया. छोटे-छोटे बच्चों समेत ये निर्भयाएं (बलात्कार से गुजरी लड़कियों के लिए मीडिया द्वारा दिया गया नाम) सड़कों पर फेंक दी गई, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां भी नहीं रहने दिया. वहां पर जुटे महिला, दलित और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों तथा दो शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं को साथ लेकर प्रदर्शनकारी दोपहर 2 बजे संसद मार्ग थाना के प्रभारी अधिकारी को यह ज्ञापन देने गए कि उन्हें जंतर मंतर पर रुकने की इजाजत दी जाए क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन इस समूह को थाना के सामने बैरिकेड पर रोक दिया गया. जब महिलाओं ने जाने देने और थाना प्रभारी से मिलने की इजाजत देने पर जोर दिया तो पुलिसकर्मी उन्हें पीछे हटाने के नाम पर उनके साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे. वुमन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन की कल्याणी मेनन सेन के मुताबिक, जो प्रदर्शनकारियों का हिस्सा थीं, पुलिस ने प्रदर्शनकारी महिलाओं के गुप्तांगों को पकड़ा और उनके गुदा को हाथ से दबाया. शिकायतकर्ता लड़कियों की मांओं और अनेक महिला कार्यकर्ताओं (समाजवादी जन परिषद की वकील प्योली स्वातीजा, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की सुमेधा बौद्ध और एनटीयूआई की राखी समेत) पर इसी घटिया तरीके से हमले किए गए. बताया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी चिल्ला रहा था, ‘अरे ये ऐसे नहीं मानेंगे, लाठी घुसाओ.’ इस घिनौने हमले के बाद अनेक कार्यकर्ताओं को पकड़ कर एक घंटे से ज्यादा हिरासत मे रखा गया.

इस नवउदारवादी दौर में जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक जगहें सुनियोजित तरीके से खत्म कर दी गई हैं और इन जगहों को राज्य की राजधानियों के छोटे से तयशुदा इलाके और दिल्ली में जंतर मंतर तक सीमित कर दिया गया है. लोग यहां जमा हो सकते हैं और पुलिस से घिरे हुए वे अपने मन की बातें कह सकते हैं, लेकिन वहां उनकी बातों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता. यह भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है. इस बदतरीन मामले में गांव के पूरे समुदाय को दो महीने तक धरने पर बैठना पड़ा है, अपने आप में यही बात घिनौनी है. उनकी जायज मांग की सुनवाई करने के बजाए – वे अपने पुनर्वास के लिए एक सुरक्षित जगह मांग रहे हैं क्योंकि वे भगाणा में नहीं लौट सकते – सरकार लोकतंत्र की इस सीमित और आखिरी जगह से भी उन्हें क्रूरतापूर्वक बेदखल कर रही है. यह बात यकीनन इसे दिखाती है कि ये दलितों के लिए वे ‘अच्छे दिन’ तो नहीं हैं, जिनका वादा मोदी सरकार ने किया था. दिल्ली पुलिस सीधे सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आता है और यहां पुलिस तब तक इतने दुस्साहस के साथ कार्रवाई नहीं करती जब तक उसे ऐसा करने को नहीं कहा गया हो. यह बात भी गौर करने लायक है कि हरियाणा और दिल्ली की पुलिस ने, जहां प्रतिद्वंद्वी दल सत्ता में हैं, समान तरीके से कार्रवाई की है. तो संदेश साफ है कि विरोध वगैरह जैसी बातों की इजाजत नहीं दी जाएगी. क्योंकि अगर जंतर मंतर और आजाद मैदान जैसी जगहें आबाद रहीं तो फिर कोई ‘अच्छे दिनों’ का नजारा कैसे कर पाएगाॽ

पहला विकेट गिरा

ऊपर की कार्रवाई तो सरकार की सीधी कार्रवाई थी, लेकिन कपट से भरी ऐसी अनेक कार्रवाइयां ऐसे संगठनों ने भी की हैं, जिनके हौसले भाजपा की जीत के बाद बढ़े हुए हैं. भगाणा के प्रदर्शनकारियों को उजाड़े जाने से ठीक दो दिन पहले 2 जून को पुणे में एक मुस्लिम नौजवान को हिंदू राष्ट्र सेना से जुड़े लोगों की भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला. दशक भर पुराना यह हिंदू दक्षिणपंथी गिरोह फेसबुक पर शिव सेना के बाल ठाकरे और मराठा प्रतीक छत्रपति शिवाजी की झूठी तस्वीरें लगाए जाने का विरोध कर रहा था. पुणे पुलिस के मुताबिक, इन झूठी तस्वीरों वाला फेसबुक पेज पिछले एक साल से मौजूद था और उसको 50,000 लाइक मिली थीं. भीड़ को उकसाने के लिए हिंदू राष्ट्र सेना के उग्रवादियों ने इस बहुप्रशंसित पेज के लिंक को चैटिंग के जरिए तेजी से फैलाया. उनका कहना था कि यह पेज एक मुसलमान ‘निहाल खान’ द्वारा बनाया गया और चलाया जाता है, लेकिन पुलिस के मुताबिक यह असल में एक हिंदू नौजवान निखिल तिकोने द्वारा चलाया जाता है, जो काशा पेठ के रहने वाले हैं. फिर इस गड़बड़ी का अहसास होते ही इस पेज को शुक्रवार को सोशल नेटवर्किंग साइटों से हटा लिया गया और तब इस मुद्दे पर विरोध को हवा देने की जरूरत नहीं रह गई थी. लेकिन हिंदू राष्ट्र सेना और शिव सेना के गुंडे सोमवार को प्रदर्शन करने उतरे. पुणे के बाहरी इलाके हदसपार में शाम उन्होंने एक बाइक रोकी, इसके सवार को उतारा और उसके सिर पर हॉकी स्टिक और पत्थरों से हमला किया और दौरे पर ही उसे मार डाला. मार दिया गया वह व्यक्ति मोहसिन सादिक शेख नाम का एक आईटी-प्रोफेशनल था और उसका उन तस्वीरों से कोई लेना देना नहीं था. लेकिन चूंकि उसने दाढ़ी रख रखी थी और हरे रंग का पठानी कुर्ता पहन रखा था हमलावरों ने उसे मार डाला. शेख के साथ जा रहे उनके रिश्ते के भाई बच गए जबकि दो दूसरे लोगों अमीन शेख (30) और एजाज युसूफ बागवान (25) को चोटें आईं. पुलिस ने पहले हमेशा की तरह इस रटे रटाए बहाने के नाम पर इस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की कि हमलावर शिवाजी की मूर्ति का अपमान किए जाने और एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़कों द्वारा बलात्कार किए जाने की अफवाह के कारण वहां जमा हुए थे. मानो इससे एक बेगुनाह नौजवान की हत्या जायज हो जाती हो.

शेख की हत्या के फौरन बाद, आनेवाले दिनों के बारे में बुरे संकेत देता हुआ एक एसएमएस पर भेजा गया जिसमें मराठी में कहा गया था: पहिली विकेट पडली (पहला विकेट गिरा है). इस संदेश को मद्देनजर रखें और शेख को मारने के लिए इस्तेमाल किए गए हथियारों पर गौर करें तो यह साफ जाहिर है कि यह एक योजनाबद्ध कार्रवाई थी. पुलिस ने रोकथाम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं. हालांकि उसको बस इसी का श्रेय दिया जा सकता है, खास कर संयुक्त आयुक्त संजय कुमार का, कि उन्होंने हिंदू राष्ट्र सेना के प्रमुख धनंजय देसाई समेत 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनमें से 17 पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. देसाई पर शहर के विभिन्न थानों में पहले से ही दंगा करने और रंगदारी वसूलने के 23 मामले दर्ज हैं. लेकिन इस फौरी कार्रवाई को इसके मद्देनजर भी देखना चाहिए कि आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-राकांपा सरकार अपना धर्मनिरपेक्ष मुखौटा दिखाने की कोशिश करेगी. लेकिन चूंकि मोदी सरकार इस पर चुप है, इसलिए संकेत अच्छे नहीं दिख रहे हैं.

ऐसा लगता है कि खेल शुरू हो गया है. देखना यह है कि नरेंद्र मोदी इस खेल में किस भूमिका में उतरते हैं.

21 मार्च 2014

गुजरात का विकास मॉडल : खून और राख में लिपटी विकास की कहानी

नए सन्दर्भ-पुरानी बात  
रेयाज-उल-हक
राज्य की 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर के बावजूद गुजरात में एक तीखा सांप्रदायिक धु्रवीकरण रहा है. सवाल यह है कि इतने तेज विकास और ऐसी समृद्धि के बावजूद राज्य में बार-बार दंगे क्यों होते रहे हैं? क्यों राज्य के मुख्यमंत्री को झूठी मुठभेडों में हुई हत्याओं पर गर्व होता है? तथा क्यों वे ऐसी और हत्याओं की चेतावनी देते हैं? क्यों गुजरातियों को अचानक उनकी अस्मिता की इस कदर तीव्र जरूरत पड जाती है? सबसे बडी बात तो यह कि क्यों देश का पूरा तंत्र-सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं, संसद, न्यायपालिका, प्रेस-इस पूरे घटनाक्रम को तटस्थ भाव से देखते हैं?

नहीं, शायद हम गलती पर हैं. कोई भी तटस्थ नहीं है. ये सभी संस्थाएं संसद, न्यायपालिका, प्रेस- सब मिल कर मुख्यमंत्री को दोबारा सत्ता में आने में मदद करती हैं.एक पूरी तारतम्यता है, पूरा सामंजस्य है. विंग्स के पीछे हम ऑर्केस्ट्रा की पूरी टीम देखते हैं, जिसका हर सदस्य अपने काम पर मुस्तैद है. हां कभी-कभी कोई नौसिखिया किसी गलत बटन को दबा देता है, जिससे संगीत गडबडा जाता है और दर्शक कुछ देर के लिए इस बेसुरेपन का भी मजा उठाते हैं, जायका बदलने के लिए.

केवल गुजरात ही नहीं, पूरे देश भर में जो घटनाएं घट रही हैं, उन सबमें एक जैसी बातें दिखायी देंगी. देश की 9 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर और तीन दर्जन अरबपतियों के बावजूद असम, सिंगूर-नंदीग्राम, गोहाना, ओडिशा, लोहंडीगुडा, गुर्जर-मीणा विवाद और सिख-सौदा विवाद जैसी घटनाएं क्यों घट रही हैं? इन तेजी से विकसित होते महानगरों, साइबर सिटीज, 16 लेन की विशाल सडकों, सुपर मॉल्स, मल्टीप्लेक्सेज और विशाल औद्योगिक इकाइयों का लाभ आखिरकार कहां जा रहा है? लोगों तक संपन्नता, जैसे कि हमें शुरू में बताया गया था, रिसते हुए भी क्यों नहीं पहुंच रही? लोगों में इतना असुरक्षा बोध क्यों है?

अगर इन सभी घटनाओं में एक समान चीज को ढूंढने की कोशिश करें तो हम पायेंगे कि प्रायः इन सभी जगहों पर भारी पूंजी निवेश हुआ है या होनेवाला है या फिर आर्थिक संकट ने समाज को तोड दिया है, जैसे कि असम. इनमें से अधिकतर जगहों पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव मंजूर किये गये हैं. इनके लिए बडी मात्रा में किसानों से जमीनें ली गयी हैं, ली जा रही हैं. प्रायः सभी जगहों पर उनके मुखर विरोध खडे हुए हैं. प बंगाल और ओडिशा के अलावा दादरी एवं गोवा में हम इसके उदाहरण देख सकते हैं.

मगर साथ ही इनमें से अधिकतर जगहों पर हम एक उद्धत भीड को, हत्यारे गिरोहों को, जनता के ही एक हिस्से को पाते हैं, जो लोगों की हत्याएं करती, बस्तियां और दुकानें जलाती और संपत्तियां लूटती फिरती है. इस भीड को हमेशा ही सत्ता का समर्थन होता है. नंदीग्राम में इस हत्यारी भीड के पीछे सीपीएम होती है और गुजरात में बीजेपी. ओडिशा में इसी भीड को जदयू-बीजेपी का समर्थन होता है तो छत्तीसगढ में कांग्रेस-बीजेपी दोनों का.
ऊपर से एकदम असंबद्ध लगनेवाली वित्तीय पूंजी और इस हत्यारी (दंगाई) भीड के बीच बेहद आत्मीय अंतर्संबंध हैं. मुख्यतः यह संगठित भीड या गिरोह इन जगहों पर किसानों अथवा संघर्षरत समूहों को विभाजित करने की कोशिशों का हिस्सा हैं. ये उनके प्रतिरोध को तोड कर रखे देते हैं और वहां की आबादियों में सरकारी और अधिकतर जनविरोधी नीतियों के प्रति व्यापक आक्रोश को प्रायः धुंधला कर देते हैं.

प बंगाल में नंदीग्राम के ताजा कत्लेआम के ठीक बाद तसलीमा नसरीन के मुे को हवा दी गयी. यह सिर्फ ध्यान बंटाने भर का मामला नहीं था, बल्कि प बंगाल में, विशेष कर नंदीग्राम की मुसलिम आबादी के प्रतिरोध को बांटने की कार्रवाई भी थी. ओडिशा में, जहां पोस्को के खिलाफ आदिवासी संघर्षरत हैं, वहां हिंदू-ईसाई विभाजन को तेज किया जा रहा है. सत्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता में से ही ऐसे गिरोह निर्मित करती है, जो कि प्रायः उन समुदायों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयां करते हैं, जो शासन की नीतियों का विरोध कर रहे हों या जिनकी तरफ से ऐसी आशंका हो. छत्तीसगढ में तो इसे और अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया है. वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों को जमीन देने से मना कर रहे आदिवासियों के खिलाफ उन्हीं के एक हिस्से को खडा कर दिया गया. सलवा जुडूम नाम के इस हत्यारे अभियान के दौरान सैकडों आदिवासी मारे गये और लाखों लोग अपनी जमीनों से उजाड दिये गये. अब वे सडकों के किनारे बनी झोंपडियों में रह रहे हैं. सरकार ने चुपचाप इन राहत शिविरों को राजस्व ग्राम में तबदील कर दिया है. मतलब यह कि वे आदिवासी अब अपनी जमीन पर कभी नहीं लौट पायेंगे. उस जमीन को अब जिंदल, एस्सार आदि कंपनियों के हवाले करने की तैयारियां चल रही हैं.
ठीक यही वह जगह है, जहां हमें भारत में लगातार बढ रही सांप्रदायिक, फासिस्ट (सामाजिक-सांप्रदायिक दोनों) व क्षेत्रीय हिंसा के सूत्र मिलते हैं. गुजरात में पहले से ही छोटे-छोटे उद्योगों की श्रृंखला रही है, जहां प्रायः अकुशल श्रम के जरिये उत्पादन होता रहा है. 1980 के बाद से, जब से पूरे भारत में वित्तीय पूंजी का आगमन शुरू हुआ, गुजरात में सांप्रदायिक दंगों की आवृत्ति में बढोतरी हुई. ज्यादातर अकुशल श्रमिक मुसलमान थे और छोटे उद्योगों में उनकी अच्छी-खासी हिस्सेदारी थी. मगर जब विदेशी पूंजी आने लगी, वह इस अकुशल श्रम को, छोटे-छोटे उद्योगों को बरदाश्त नहीं कर सकती थी. उसे बाजार पर अपने उत्पादों के लिए एकाधिपत्य चाहिए था और अपने उद्योगों के लिए श्रमिक, जो कि इन छोटे उद्योगों में लगे हुए थे. अतः इन छोटे उद्योगों के रहते उसके लिए अपना विस्तार संभव नहीं रह गया था. इनका उन्मूलन जरूरी हो गया.

से में हिंदुत्व बडे काम की चीज साबित हुई. उसके पास न सिर्फ एक पहले से ही ऐसी विचारधारा मौजूद थी जो देश के प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपना शत्रु मानती थी, बल्कि देश भर में उसका विशाल संगठन, विभिन्न छोटे-छोटे गिरोह, एक राजनीतिक पार्टी और विभिन्न भूमिकाओं में कार्यरत उसके लाखों कार्यकर्ता मौजूद थे. फिर गुजरात ने अपनी इस तथाकथित आर्थिक विकास की शुरुआत खून और राख से की. गुजरात में पहले से ही एक सांप्रदायिक विभाजन था. 1969 के दंगों ने राज्य के दोनों प्रमुख समुदायों में बडी दरार डाल दी थी. 1981 के दंगे हुए. और फिर छह माह तक चलनेवाले 1985 के कुख्यात दंगे, जिनमें सरकारी तौर पर 275 लोग मारे गये, लाखों बेघर हुए और लगभग 2200 करोड रुपये मूल्य के संपत्ति और व्यापार की क्षति (अनुमानित) हुई. इसके बाद भी 1990, 92, 93 में दंगे होते रहे. 1960 से 1993 के बीच राज्य में 43 सांप्रदायिक दंगे हुए. 1990 के दशक में गुजरात में भारी पैमाने पर छोटे उद्योग बंद हुए. इसके बाद से गुजरात में भाजपा का एकछत्र राज रहा है. साथ ही बीजेपी की नजदीकी बडे व्यापारिक घरानों और कंपनियों से बढी. यहां एक दिलचस्प तथ्य हम यह भी पाते हैं कि गुजरात में हुई अब तक की अंतिम औद्योगिक हडताल ब्रिटिश शासनकाल में, 1941 में हुई थी. इसके बाद इस औद्योगिक राज्य में कोई औद्योगिक हडताल नहीं हुई.
एक पूरे समुदाय को शत्रु के रूप में चिह्नित करने और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिंसा को बढावा देने के पीछे एक और वजह है. वित्तीय पूंजी के लिए अधिक-से-अधिक मुनाफा बटोरने को सुगम बनाने के लिए राज्य को डब्ल्यूटीओ और वर्ल्ड बैंक की साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करना जरूरी था. इसके लिए उसे श्रम कानूनों में ढील देनी थी, जिससे मजदूरों के पास कोई अधिकार नहीं रह जाते. उसे बडी मात्रा में जमीनों का अधिग्रहण करना था, जिससे किसान बरबाद होते. राज्य के दूसरे संसाधनों को वित्तीय पूंजी की सेवा में लगाना था, जिससे राज्य के लोग अपने स्वाभाविक संसाधनों से वंचित हो जाते. इन सबका भारी प्रतिरोध होनेवाला था.
इन सबसे निबटने के लिए ऐसी सरकार चाहिए थी जो ऊपर से मजबूत ही न दिखे, उसे पास जनसमूह को जुटा लेने और अपने साथ रखने की काबीलियत भी हो. इसके लिए सरकारों को ऐसे नारे गढने जरूरी थे, जो ऊपर से जनता की आर्थिक जरूरतों को पूरा करते दिखें, हालांकि जनता को उन नारों से कभी कुछ फायदा न हुआ. व्यापक जनसमूह को उसकी जातीय अस्मिता का हवाला देकर अपने साथ एकजुट करना जरूरी था. इन सबकी वजह से प्रतिरोध की संभावनाएं कम हो जातीं और जो प्रतिरोध करने का साहस जुटाते उन पर इस जन समूह को छोडा जा सकता था. वैसे भी गुजरात में ऐसा कोई विकल्प नहीं रहा जो इस प्रतिरोध का नेतृत्व कर सके और उसको रचनात्मक दिशा देकर राज्य को इस दुष्चक्र से छुटकारा दिला सके.

हिंदुत्व ने वित्तीय पूंजी की मदद से उत्पीडक और उत्पीडित वर्गों की पृथक पहचान और चेतना को धुंधला करके सभी को एक साथ खडा किया. चूंकि इसका नेतृत्व शासन में बैठी पार्टी कर रही थी, लोग शासन के साथ एकजुट होते गये. सारे मामले में धर्म का इतना बेहतर उपयोग किया गया कि लोग इस मकडजाल में और अधिक फंसते चले गये. उनमें तीव्र असुरक्षाबोध पैदा करके उनकी सुरक्षा करने के बहाने उन्हीं के तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म कर दिया. अधिक क्रूर और दमनकारी कानून लाये गये और मानवाधिकारों को हिकारत की वस्तु बना दिया गया. लोग यह अब तक नहीं समझ पाये हैं कि उन्हें डरा कर खुद उनकी सरकार ने उनके नीचे से उनकी जमीन खिसका दी है और वे अंधी खाई में गिरे जा रहे हैं.

गुजरात दंगे स्वतःस्फूर्त नहीं थे और न उनके संदर्भ तात्कालिक थे. हम पाते हैं कि इन दंगों के पहले राज्य की अर्थव्यवस्था 1994 के बाद से गिरावट का शिकार थी. मगर दंगों के बाद 2004 से इसमें बेहतरी आयी है. 2004 में गुजरात में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद शेष भारत के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक था. इसके अलावा राज्य में प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर, जो कि 1994 के बाद से लगातार घट रही थी, 2004 के बाद पुनः बढने लगी.

हम यहां एक और विरोधाभास पाते हैं. अक्सर यह कहा जाता है कि निवेश के लिए राज्य में शांति और कानून-व्यवस्था बनी रहनी जरूरी है. मगर गुजरात का उदाहरण हमे इसकी एक उलटी बात दिखाता है. वहां विदेशी पूंजी निवेश की शुरुआत ही दंगों के साथ होती है और उनके तीव्र होते जाने के क्रम में ही निवेश में भी उछाल आता गया है. 2002 के दंगों के कुछ ही समय बाद, 2004 में गुजरात ने कुल 12 हजार 437 करोड रुपयों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी. दरअसल वित्तीय पूंजी क्षेत्र विशेष की आर्थिक, सामाजिक विशिष्टताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती. गुजरात के अकुशल श्रम और कारीगरों को नष्ट किये बगैर उसका मुनाफा संभव नहीं है, तो वह वहां दंगों का आयोजन करवाती है. मगर जहां पहले से ही साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियां मौजूद हैं, वहां वह कानून-व्यवस्था और शांति के नाम पर दमनात्मक कानूनों की जगह बनाती है और उन संघर्षों पर सत्ता के जरिये कठोर दमन करती है.

तो हम पृष्ठभूमि में एक ऐसे लोकतंत्र को पाते हैं जो वित्तीय पूंजी के प्रवाह को विकास का पर्याय मानता है, उसके लिए हत्याएं और नरसंहार कराये जाते हैं, हत्यारे गिरोहों और भीड को प्रोत्साहन दिया जाता है और सरकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध को कुचलने के लिए समाज को अंधी आस्थाओं से लैस किया जाता है. यह कुल मिला कर समाधान को हमसे और दूर कर देता है.

और ऐसे में हमसे कहा जाता है कि गुजरात को विकास के एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया जाये, क्या हुआ जो वहां अब भी एक पूरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार जारी है, क्या हुआ जो वहां अब भी दंगे के शिकार लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ, क्या हुआ जो वहां फिल्मों पर अघोषित प्रतिबंध लगा दिये जाते हैं और पेंटिंग्स जलायी जाती हैं. इन सबके बावजूद हमें इस विकास को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री फिर से चुनाव जीत गये हैं.

चुनाव. विकास. नवउदारवादी शब्दकोश के सबसे खनखनाते शब्द.

मगर एक ऐसी व्यवस्था में, जहां खुद चुनाव और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं वित्तीय पूंजी और साम्राज्यवादी संस्थाओं की सेवा में लगी हुई हों, हम लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी कैसे कर सकते हैं? भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मदद से ही फासीवाद सत्ता पर काबिज हुआ है. क्या 1975 में आपातकाल का अनुमोदन किसी दूसरे देश की संसद ने किया था? क्या 1984 के सिख विरोधी दंगों में शामिल पार्टी विशेष के लोग इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे? क्या बाबरी मसजिद इसी लोकतंत्र और इसके सभी स्तंभों के रहते नहीं तोड दी गयी? गुजरात नरसंहार के समय भी क्या यही लोकतंत्र नहीं था और नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने की बात कहनेवाले मुख्यमंत्री इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही नहीं चुने गये हैं?

जहां संसद, न्यायपालिका और प्रेस, पूरा तंत्र ही, वित्त पूंजी के हिरावल दस्ते के रूप में काम करने लगे हों, हम इस बात की गारंटी नहीं कर सकते कि संसद ही जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर रही है और जनता के अधिकार भंग नहीं कर दिये गये हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो जनता के तमाम प्रतिरोधों के बावजूद संसद सेज प्रस्तावों को मंजूरी कैसे देती और अदालतें हडताल, बंद, आरक्षण और मजदूर विरोधी फैसले कैसे देतीं? अकेले गुजरात का उदाहरण ही इस बात के लिए काफी है कि लोकतंत्र वास्तव में जनवादी मूल्यों, समानता और आजादी की गारंटी नहीं दे सकता.

हत्यारे गिरोह खडा करने और उन्हें समर्थन देने के संदर्भ में हम देख चुके हैं कि चुनाव लडनेवाली प्रायः सभी पार्टियां अपनी-अपनी स्थितियों में ऐसे गिरोहों को संरक्षण-समर्थन देती रही हैं. इनमें कोई अंतर नहीं होता, सिवाय इसके लिए वे एक दूसरे के खिलाफ वोट मांगती हैं. उनकी आर्थिक और विदेशी नीतियां तथा आंतरिक नीतियां भी लगभग समान हैं. असल में चुनाव में हमारे पास चुनने को इसके सिवा कुछ भी नहीं रह जाता कि कौन-सी पार्टी इस बार वित्तीय पूंजी की सेवा करेगी व इसके लिए जनता के अधिकारों को र करेगी. इस तरह हम यह भी देखते हैं कि चुनाव अंततः सांप्रदायिकता आदि का समाधान नहीं हो सकते.

और विकास के नाम पर जो आंकडे दिखाये जा रहे हैैं, उनसे बहुत प्रभावित होने की जरूरत नहीं है. यह वित्त पूंजी का दबाव है, जो नरेंद्र मोदी को राज्य में बुनियादी संरचना में सुधार करने पर विवश कर रहा है.

राज्य में भारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने प्रकटतः बडे उद्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. मगर जो लोग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रकृति के बारे में जानते हैं, यह उनके लिए बहुत उत्साहजनक तथ्य नहीं है. उल्टे यह चिंताजनक स्थिति ही है, क्योंकि एफडीआइ किसी भी तरह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करता. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निवेशक को सारा मुनाफा अपने देश ले जाने का अधिकार होता है. एफडीआइ देश के संसाधनों और इसकी संरचना का उपयोग अपने मुनाफे के लिए करता है और बदले में वह देश के लिए उसकी सदियों की जहालत छोड देता है. चूंकि सारा मुनाफा देश के बाहर चला जाता है, देश में आगे के औद्योगिक विकास के लिए उससे कोई पूंजी नहीं बचती. अधिक से अधिक उद्योगों की स्थापना के पीछे जो रोजगार निर्मित करने का तर्क दिया जाता है, वह भी मुनाफे की व्यवस्था के तहत तकनीकआधारित उद्योगों के दौर में बेमानी हो गये हैं. उनसे बहुत रोजगार उत्पन्न होने की आशा नहीं रखनी चाहिए. इसके अलावा एफडीआइ कभी टिकाऊ औद्योगिक विकास का माध्यम नहीं हो सकता. यह दरअसल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और पूंजीवाद के संकट से उत्पन्न आवारा पूंजी का हिस्सा है. यह हर समय और अधिक मुनाफे की तलाश में अपनी जगह बदलती रहती है. यह आज यहां है, कल कहीं और होगी. और फिर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि तब हमारी अर्थव्यवस्था का क्या होगा जो इस आवारा पूंजी पर अधिकाधिक निर्भर है.

गुजरात में जो बुनियादी सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं, वे प्रायः उन वर्गों की सुविधा के लिए हैं जो पहले से ही संपन्न हैं. उपभोक्ता बाजार के लिए गांवों तक पहुंच सुलभ बनाने और उसके लिए गांवों के दरवाजे खोलने के लिए जरूरी हो गया था कि वहां तक सडकें जायें और बिजली रहे.

मगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकडे राज्य में लोगों की बेहतरी को मापने के लिए एक बदतरीन उदाहरण हैं. राज्य अपने शासकों के चकाचौंध कर देनेवाले दावों के बावजूद , भूख, बदहाली और बीमारी से मुक्त नहीं है. गुजरात मानव विकास रिपोर्ट, 2004 बताती है कि गुजरात में निर्माण और कृषि क्षेत्रों, विकसित और अविकसित क्षेत्रों, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों तथा आर्थिक विकास और लोगों की बेहतर जीवनशैली के बीच का अंतर तीखा हुआ है. 2005 में गुजरात में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार बच्चों में 54 थी, जो कि राष्ट्रीय औसत से 1.07 गुणा ज्यादा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक 2005-06 के दौरान गुजरात में पांच वर्ष तक के आधे से कुछ कम (47 प्रतिशत) बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं. गुजरात में सामाजिक सेक्टर में खर्च नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में घटा है. वहां की 74.3 प्रतिशत महिलाएं और 46.3 प्रतिशत बच्चे एनीमिक हैं.

और अब हमारे सामने एक ऐसा राज्य है जो एफडीआइ की आयातित रोशनी में चमचमाता हुआ मंच पर खडा है और नेपथ्य में आत्महत्या किये 500 किसानों की लाशें सड रही हैं. जहां दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ तीव्र भेदभाव है और जहां तीन वर्षों में 100 से अधिक दलितों की हत्या कर दी गयी.

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है कि यह विकास कैसे हुआ और इसकी कीमत अंततः कौन चुका रहा है? क्या इस अबाध विकास के पीछे हत्याओं, नरसंहारों, घेटोकरण और संसदीय ढांचे के भीतर, उसी से उपजी तानाशाही की भूमिका को नजरअंदाज किया जा सकता है? और इसकी कीमत कौन चुका रहा है? उन पांच करोड गुजरातियों में से वे लोग जो कामगार हैं, वंचित हैं और गरीब हैं, अल्पसंख्यक हैं. जिनसे न सिर्फ उनके संसाधन और लोकतांत्रिक अधिकार ही छीन लिये गये हैं बल्कि इसका प्रतिरोध करने की उनकी संभावनाएं भी. जो कुछ राज्य ने उनके लिए छोडा है, वह है वापी में दुनिया का सबसे खतरनाक केमिकल हब, कपडा रंगाई उद्योग, जहाज तोडने और हीरे की पॉलिशिंग के रोजगार, जो उन्हें उनके जीवन के 30 वें साल में ही अंधा बना देंगे.

तो क्या वास्तव में हम अपने लिए ऐसे ही विकास को पसंद करेंगे?