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12 अप्रैल 2012

जो कहा जाना चाहिए -गुंटर ग्रास


एक ऐसे वक्‍त में जब साहित्‍य और राजनीति की दूरी बढ़ती जा रही हो, जब लेखक-कवि लगातार सुविधापसंद खोल में सिमटता जा रहा हो, एक कविता के बदले जर्मन कवि गुंटर ग्रास के इज़रायल प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध ऐतिहासिक परिघटना है। नोबेल विजेता गुंटर ग्रास ने 84 साल की उम्र में एक कविता लिख कर इज़रायल को दुनिया के अमन-चैन का दुश्‍मन करार दिया है। यह बात उतनी सपाट भी नहीं है। कविता में गुंटर ग्रास का नैतिक संघर्ष दिखता है, जो कि उपनिवेशवाद और जि़योनवाद के बीच के रिश्‍तों की स्‍वाभाविक पैदाइश है। वह पश्चिम को दोहरा बताते हैं, अपने देश जर्मनी को भी इज़रायल की गुपचुप मदद का जि़म्‍मेदार ठहराते हैं और यहूदी विरोध के फतवे का खतरा समझते हुए अब तक साधी हुई अपनी चुप्‍पी की वजहें भी बताते हैं। यहूदी विरोधी होने की कई परतें हैं, जिन्‍हें इस परिचय में एकबारगी नहीं खोला जा सकता। लेकिन गुंटर ग्रास जैसे एक पब्लिक इंटेलेक्‍चुअल की ओर से कहा गया यह सच एक ऐसे वक्‍त में आया है जब लगातार यह बात तमाम तरीकों से साफ हो रही है कि इज़रायल अगर हिटलर द्वारा यहूदियों के दमन के शिकार लोगों की पनाहगाह है, तो वह यूरोपीय उपनिवेशवाद का नया मुहावरा भी है, बल्कि उसी की पैदाइश है। इसकी कीमत पिछले साठ साल से वे फलस्‍तीनी अपने खून से चुका रहे हैं जो जुर्म उन्‍होंने नहीं, बल्कि यूरोपीय उपनिवेशवाद ने ढहाया था।
बहरहाल, पिछले दस दिन से ''वॉट मस्‍ट बी सेड'' नाम की इस कविता का अनुवाद मैं करना चाह रहा था। इत्‍तेफ़ाक़ से कल जयप्रकाश मानस जी ने इस कविता को अंग्रेज़ी में फेसबुक पर जब शेयर किया, तो मैंने उनसे कहा कि बेहतर होता वे हिंदी अनुवाद भी कर डालते। उन्‍होंने तकरीबन आदेशात्‍मक लहज़े में जवाब दिया, ''आप करिए अनुवाद अभिषेक''। मैंने उनके कमेंट को सामाजिक जि़म्‍मेदारी मानते हुए अनुवाद कर डाला। मुझे नहीं पता कविता का अनुवाद करने की कोई खास तकनीक होती है या नहीं, लेकिन ऐसा लगता है कि बात समझ में आनी चाहिए, फिर चाहे कविता अनुवाद के बाद गद्य ही क्‍यों न बन जाए। नीचे पूरी कविता का अनुवाद ''जो कहा जाना चाहिए'' प्रस्‍तुत है। - अनुवादक : अभिषेक श्रीवास्‍तव

मैं चुप क्‍यों रहा, क्‍यों छुपाता रहा इतने लंबे समय तक
वह खुला राज़
जिसे बरता गया बार-बार जंगी मैदानों में, और
जिसके अंत में जो बचे हम
तो हाशिये से ज्‍यादा कुछ भी नहीं थी हैसियत हमारी।
ज़ोर-ज़ोर से चीख कर
उन्‍होंने खड़ा कर दिया एक उत्‍सव सा कुछ
जिसमें दब गई ये बात, कि
यह पहले हमला करने का कथित अधिकार ही है
जो मिटा सकता है ईरानी जनता को-
क्‍योंकि उनकी सत्‍ता का दायरा फैला है
एक न्‍यूक्लियर बम बनने की आशंकाओं के बीच
वे मानते हैं कि ऐसा कुछ ज़रूर हो रहा है।
बावजूद इसके, क्‍यों रोके रहा खुद को मैं
उस दूसरे देश का नाम लेने से
जहां बरसों से, भले गुपचुप
न्‍यूक्लियर आकांक्षाओं की तन रही थी मुट्ठी अदृश्‍य
क्‍योंकि उस पर किसी का ज़ोर, कोई जांच कारगर नहीं?
इन बातों को छुपाया गया दुनिया भर में
जिसमें शामिल थी मेरी चुप्‍पी भी-
जब्र तले एक झूठ की मानिंद-
जिसे सज़ा मिलनी ही चाहिए
बल्कि सज़ा मुकर्रर थी, बशर्ते इस चुप्‍पी को हम तोड़ते।
यहूदी विरोध के फतवे से तो आप वाकि़फ़ होंगे।
अब, चूंकि मेरा देश
जो एक नहीं, कई बार रहा साक्षी खुद अपने अपराधों का-
(और इसमें इसका कोई जोड़ नहीं)
बदले में यदि विशुद्ध व्‍यावसायिक नज़रिये से ही
विनम्र होठों से इसे करार देकर प्रायश्चित्‍त
इज़रायल को न्‍यूक्लियर पनडुब्‍बी भेजने का करता हो एलान
जिसकी खूबी महज़ इतनी है
कि वह दाग सकती है तमाम विनाशक मिसाइलें वहां
जहां एक भी एटम बम का वजूद अब तक नहीं हुआ साबित
लेकिन डर, ऐसा ही मानने पर करता है मजबूर बासबूत
तो कह डालूंगा मैं वो बात
जो अब कही जानी चाहिए।
लेकिन अब तक मैं खामोश क्‍यों रहा?
इसलिए, क्‍योंकि मेरी पैदाइश की धरती
जिस पर जमे हैं कभी न मिटने वाले कुछ दाग
रोकती थी मुझे कहने से वो सच
इज़रायल नाम के उस राष्‍ट्र से, जिससे बिंधा था मैं
और अब भी चाहता ही हूं बिंधे रहना।
फिर आज क्‍या हो गया ऐसा
कि सूखती दवात और बुढ़ाती कलम से
मैं कह रहा हूं ये बात
कि न्‍यूक्लियर पावर इज़रायल से
इस नाज़ुक दुनिया के अमन-चैन को खतरा है?
क्‍योंकि यह कहा ही जाना चाहिए
कल, हो सकता है बहुत देर हो जाए;
और इसलिए भी, कि उसका बोझ लादे हम जर्मन
ना बन जाएं कहीं ऐसे किसी अपराध के भागी
जो न दिखता हो, न ही मुमकिन हो जिसका प्रायश्चित्‍त
पुराने परिचित बहानों और दलीलों से।
लिहाज़ा, तोड़ दी है अपनी चुप्‍पी मैंने
क्‍योंकि थक गया हूं मैं पश्चिम के दोगलेपन से;
इसके अलावा, एक उम्‍मीद तो है ही
कि मेरी आवाज़ तोड़ सकेगी चुप्‍पी की तमाम जंज़ीरों को
और आसन्‍न खतरा बरपाने वालों के लिए होगी एक अपील भी
कि वे हिंसा छोड़, ज़ोर दें इस बात पर
कि इज़रायल की न्‍यूक्लियर सामर्थ्‍य और ईरान के ठिकानों पर-
दोनों देशों की सरकारों को मान्‍य एक अंतरराष्‍ट्रीय एजेंसी
की रहे निगरानी
स्‍थायी और अबाधित।
एक यही तरीका है
कि सभी इज़रायली और फलस्‍तीनी
यहां तक कि, दुनिया के इस हिस्‍से में फैली सनक के बंदी
तमाम लोग
रह सकें साथ मिल-जुल कर
दुश्‍मनों के बीच
और ज़ाहिर है, हम भी
जिन्‍होंने अब खोल दी है अपनी ज़बान।

04 मार्च 2012

मध्य-पूर्व: पश्चिमी युद्धाभ्यास का नया अड्डा


-दिलीप ख़ान
देशों केबीच नए गठजोड़ बनने लगे हैं और हम इस वक्त इतिहास के बेहतरीन और अद्भुत दौर मेंहैं। खाड़ी का संकट एक तरह से हमें आपस में ऐतिहासिक सहयोग की ओर ले जा रहा है। इसकठिन घड़ी से एक नई विश्व व्यवस्था झांक रही है: एक ऐसी दुनिया जो आतंक से मुक्त है, ज़्यादा न्यायपूर्ण है और शांति केलिए ज़्यादा प्रयासरत है। एक ऐसा समय जहां उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम चारों दिशाओंके देश खुशहाली और भाईचारे से एक साथ रह रहे हैं।

--प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद की स्थिति पर जॉर्जबुश सीनियर।


ये बयान बुश उस दौर में दे रहे थे जबसोवियत रूस के विघटन और शीत युद्ध के औपचारिक खात्मे के बाद अमेरिका के सामने कोईमज़बूत चुनौती नहीं रह गई थी और अमेरिका ने दुनिया को दुरूस्त करने का साराजिम्मा अपने माथे ले लिया था। बीते दो दशक को भू-राजनैतिक तौर पर देखें तो शांति बहाली के लिए सबसे ज़्यादा प्रयास जिन इलाकों में हुआ है वो ठीकवही इलाके हैं जहां से उत्पन्न संकट के दरवाज़े से जॉर्ज बुश सीनियर बेहतर विश्वका अक्स देख रहे थे। और नई विश्व व्यवस्था के देखे गए सपने के एक दशक बाद उनकेबेटे जॉर्ज बुश (जू) ने शांति बहाली की नई तालीम कीशुरुआत भी इसी इलाके में की। वार ऑन टेरर के मानवतावादी नारे के साथ।पश्चिमी एशिया की इस पूरी पट्टी में उसके बाद बम की आवाज़ के बिना कोई शाम नहींगुज़री है। क्या बीते दो दशक में मध्य-पूर्व वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है? क्या सोवियत संघके तौर पर अपने चिह्नित दुश्मन के टूट जाने के बाद अमेरिका मध्य-पूर्व के इलाके कोआजमाईश के लिए तैयार कर रहा है? क्या एक-ध्रुवीय शक्ति समीकरण के बाद अमेरिकी हुक्म को पूरा करना आज केवैश्विक राजनीति का अंतर्निहित अर्थ है? क्या अमेरिका स्वभावत: एक आतंकी राज्य है? ऐसे कई सवाल है जो अरब दुनिया के मौजूदा हालात को देखते हुए दुनिया केसामने उपस्थित होते हैं।


नाभिकीय हथियार के बहाने ईरान पर अमेरिकी नज़र
मध्य-पूर्व की राजनीति को यदि 9/11 के बाद परखा जाएतो उस इलाके के लिए बीते कई दशकों का ये सबसे खतरनाक दौर साबित हुआ है। 9/11 एक तरह से अमेरिकाऔर उनके सहयोगियों के लिए हमला करने का बहाना साबित हुआ है। असल में एक हमले केबाद उकी क्षतिपूर्ति के लिए जवाबी हमला करना अमेरिकी रणनीति का पुराना हिस्सा रहाहै। 1898 में हवाना हार्बर पर हमले के बाद अमेरिकी-स्पेनिश युद्ध शुरू हुआ, लुसिटानियाकी घटना को लेकर पहले विश्वयुद्ध में अमेरिका शामिल हुआ। पर्ल हार्बर हमले के बादअमेरिका ने जापान पर नाभिकीय बम बरसाए। हालांकि कई शोधकर्ता ये मानते हैं कि पर्लहार्बर के बारे में पेंटागन को पहले से जानकारी थी और अमेरिका ने जान-बूझकर इसेनज़रअंदाज किया। 1964 में टांकिन खाड़ी की घटना के बाद वियतनाम को अमेरिका नेतहस-नहस करने की कोशिश की और फिर 9/11 आया, जिसपर कार्रवाई फिलवक्त जारी है।

अफ़गानिस्तान और इराक पर फ़तह पाने के बादअमेरिका सहित तमाम पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों का मध्य-पूर्व में कौन सा देशनिशाने पर है, ये बेहद अहम सवाल है। जैविक हथियार के बहाने, जो बाद में झूठे साबितहुए, अमेरिका लगभग एक दशक से इराक को कब्जाया हुआ है। वहां इराकी सेना की बराबरसंख्या में अमेरिकी सैन्य अड्डे बने हुए हैं। सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर प्रचारितसद्दाम हुसैन को फांसी दी जा चुकी है लेकिन अमेरिकी सेना को वहां पर और ज़्यादा शांति की दरकार है।इसलिए वो अभी वहां अपने पैर भविष्य में भी जमाए रखना चाहता है। अफ़गानिस्तान मेंभी आतंकियों को पूरी तरहनिर्मूल करने के बाद ही अमेरिका वहां से हटेगा, चाहे इसमें शताब्दियां लग जाए। 2012 तक नाटो फ़ौज कीवापसी के बारे में जो बयान पहले जारी हो रहे थे उस पर संशोधन शुरू हो गया है।बताया जाने लगा है कि काबुल की स्थिति अभी स्वतंत्र रहने की नहीं है।और अब ईरान को लेकर दुनिया भर में माहौल बनाया जा रहा है।

एनबीसी न्यूज़ के साथ बात करते हुए बराकओबामा ने फ़रवरी की शुरुआत में कहा था कि ईरान पर इजरायल के साथ गठजोड़ कर हमलाकरने की सारी तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है। इसके बाद ईरान को लेकर इजरायल ने जिसतरह का वैश्विक (कु)प्रचार अभियान की शुरुआत की उसका सिरा भारत में इज़रायलीदूतावास के सामने कार में हुए धमाके से लेकर उसके ठीक अगले दिन बैंकॉक में हुए तीनसिलसिलेवार धमाकों से जाकर मिलता है। दिल्ली पुलिस की खोजबीन से पहले ही तेल अवीवने ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स के जरिए ये घोषित कर दिया कि दोनों धमाकों केपीछे ईरानी हाथ है।

ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह सेपश्चिमी देशों के निशाने पर है। पश्चिमी देशों ने कभी भी परमाणु मुक्त दुनिया कासवाल नहीं उठाया है बल्कि उनका ज़ोर हमेशा इस दिशा मे रही है कि उनकी इजाजत के साथदुनिया के देश परमाणु कार्यक्रम में आगे बढ़े। जिस परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिएइज़रायल-अमेरिका सबसे ज़्यादा ज़ोर लगा रहा है उसे अब तक आईएईए ने ग़लत करार नहींदिया है। लेकिन अमेरिका और इज़रायल सहित यूरोपीय संघ ईरान पर लगातार दबाव बनाने कीकोशिश में हैं। यूरोपीय संघ ने ईरान की मौजूदा हालात के मद्देनज़र 23 जनवरी कोविदेश मंत्री स्तरीय बैठक की और उसमें ये तय किया कि ईरान से तेल का आयात वो जुलाईसे बंद कर देंगे। यूरोपीय संघ को ये भरोसा था कि आयात रुकने से ईरानी अर्थव्यवस्थाकी हालत बिगड़ेगी और आर्थिक नाकेबंदी के जरिए अंतत: ईरान को पश्चिमी फांस में दबोच लिया जाएगा। लेकिनइस बैठक के तुरंत बाद ईरान ने घोषणा की कि वो ब्रिटेन और फ्रांस को तेल आयात करनाबंद कर रहा है। ईरान ने जुलाई का इंतज़ार किए बगैर खुद ही पांच देशों के आयात पर16 फरवरी से पाबंदी लगा दी। ईरानी समाचार एजेंसी एफएनए के मुताबिक़ यूरोपीय संघ केजवाब में ईरान ने ये फैसला लिया है। इस फैसले की हिम्मत ईरान ने एशियाई बाज़ार केप्रति जाहिर भरोसे से पाई है। चीन और भारत जैसे देश इस मौके का सबसे ज्यादा फ़ायदाउठाने की स्थिति में है ..और शायद यही वजह है कि दिल्ली धमाके के बाद भारतीय विदेशमंत्रालय ने इज़रायल की घोषणा के तुरंत बाद कोई उत्साही बयान नहीं दिया।

अमेरिका सहित यूरोपीय संघ के देशों नेबेतुके तर्क के साथ ईरानी केंद्रीय बैंक को सील करने का फैसला लेकर अंतरराष्ट्रीयमौद्रिक व्यवस्था से उसे बिल्कुल अलग-थलग करने का भरपूर प्रयास किया है। ईरान कीमुद्रा की कीमत 35 फ़ीसदी से ज़्यादा कम हो गई। आज के हिसाब से आर्थिक युद्ध एक तरह से पूरेदेश को पंगु बनाने का कारगर हथियार है। अमेरिका-इजरायल-यूरोपीय संघ ने अपने इसअभियान में दुनिया भर के देशों को जोड़ने की कोशिश की। मिसाल के तौर पर ईरान ने जबपश्चिमी देशों को तेल आयात करना बंद किया और पश्चिमी देशों ने ईरान पर आर्थिकपाबंदियां लगाई तो अमेरिका ने भारत पर बेतरह दबाव बनाया कि भारत भी ईरानी तेल काआयात कम करे और ईरान पर आर्थिक पाबंदी लगाए, लेकिन बीते साल वैश्विक आर्थिक संकटसे बचने वाला भारत जानता है कि विश्व बाज़ार की बिगड़ती हालात का भारत पर यदि कमअसर हुआ तो उसकी बड़ी वजह यही एशियाई देश थे। जब सारी कूटनीतिक और रणनीतिक दांव हीअर्थव्यवस्था के इर्द-गिर्द खेले जा रहे हों तो ऐसी स्थिति में ईरान के साथ खड़ारहने में ही भारत का फ़ायदा है। असल में ये भारत की मजबूरी है। और ईरान के लिएभारतीय और चीनी बाज़ार विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत! इस तरह ईरान के साथ भारत और चीन का संबंधपारस्परिक हितों में बंधा है। कुछ महीने पहले ही बराक ओबामा ने कहा था कि वैश्विकबाज़ार में अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी चीन है। और तथ्य ये है कि चीन इससमय ईरान का लगभग 20 फीसदी तेल आयात कर उस इलाके में अपना वर्चस्व पुख्ता कर रहाहै। चीनी वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ईरान में पैर फैलाना अमेरिका के लिए बेहदज़रूरी हो गया है।


200 से ज़्यादा परमाणु हथियार रखने वाला इज़रायल किस आधार पर ईरान के
हथियार का विरोध कर रहा है, ये समझ से परे है।
30 जनवरी को राष्ट्रपति बराक ओबामा नेजॉर्जिया के राष्ट्रपति से लंबी बात की। जॉर्जिया ईरान का पड़ोसी मुल्क है और आकारऔर आबादी में छोटा होने के बावजूद वह अमेरिका से वित्तीय सहायता पाने वाला तीसरासबसे बड़ा देश है। इस बैठक को लेकर कई पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान केसाथ किसी भी संभावित युद्ध के दौरान जॉर्जिया की ज़मीन इस्तेमाल करने को लेकरओबामा ने बात की। हालांकि ईरान को लेकर अमेरिका से ज़्यादा तत्परता इज़रायल दिखारहा है और इज़रायली सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बेनी गांट्ज ने तो यहां तक कहदिया कि अगर बाकी देश ईरान को लेकर सख्ती नहीं दिखाते तो वो अकेले ही ईरान पर हमलाकरने को तैयार है। हालांकि इज़रायल अपनी इस धमकी को ज़मीन पर उतारने मेंहिचकिचाएगा और ईरान पर हमला करने के लिए वह निश्चित तौर पर अमेरिका और नाटो देशोंका सहयोग चाहेगा, क्योंकि इज़रायल ने जब 2006 में लेबनान पर हमला किया था तोहिजबुल्लाह जैसे गुट ने इज़रायल की हालत ख़राब कर दी थी। इसलिए पूरे ईरान केख़िलाफ़ अकेले लड़ने की हिम्मत इज़रायल अकेले नहीं करेगा। इज़रायल के इस मनोभाव कोईरान अच्छी तरह जानता है और इसलिए अपनी सैन्य मज़बूती दिखाने के लिए वो सीरिया,लेबनान और जॉर्डन को सैन्य मदद पहुंचा रहा है। लेकिन इसके बावजूद अगर भविष्य मेंईरान पर अमेरिका, इजरायल और नाटो देश हमला करते हैं तो उसके लिए वो इस तरह केबहाने दुनिया के सामने रखेंगे-

· ईरान नाभिकीय हथियार बना रहा है और ये दुनिया के लिए ख़तरनाक है।

· ईरान जिद्दी देश है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की वो बात नहीं सुनता है।

· ईरान के भीतर तानाशाही पसर रही है और जनता की आवाज़ को कुचला जा रहा है।

· ईरान दुनिया भर में इजरालयी लोगों और प्रतीकों पर बम बरसा रहा है।

इसलिए नाटो को बचाव की जिम्मेदारी के तहत ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करनाचाहिए। परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने की अमेरिका जोमांग कर रहा है उसकी फ़ेहरिश्त अंतहीन है। कई देशों के साथ कई दौर की बातचीत केबाद अमेरिका ने आईएईए के मानकों को सबसे अहम बताया, जिसके दायरे में ईरान कोनाभिकीय कार्यक्रम चलाना था। 29-31 जनवरी को आईएईए के अधिकारियों ने ईरान का दौराकिया और उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है लेकिन उस दौरे के ठीक बादपश्चिमी मीडिया तेहरान पर ग़ैरज़िम्मेदार होने और इस तरह की जांच-पड़ताल के जरिएसमय ख़राब करने के आरोप लगाना शुरू कर दिया। ईरान पर अगला कदम बढ़ाने को लेकरइजरायल और अमेरिका बेहद उतावले हैं। यह महज संयोग नहीं है कि आईएईए ने 5 मार्च कोईरान पर बैठक बुलाई है और इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन न्टान्याहू उसी दिनअमेरिका में एआईपीएसी (अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी) की मीटिंग में अमेरिकाके साथ मध्य-पूर्व की रणनीति पर बात करेंगे। दरअसल किसी भी संभावितमौके को देखते हुए हमला करने की तैयारी में अमेरिका काफ़ी पहले से मुश्तैद है।अमेरिका ने हाल ही में अपने पूर्वी तट पर भारी-भरकम युद्धाभ्यास किया। बोल्डएलीगेटर 2012 नाम के इस अभ्यास को दक्षिणपंथी इज़रायली प्रकाशन डेबकैफिल ने पश्चिम का बीतेएक दशक का सबसे जबर्दस्त दृश्य बताया।

सीरिया और लीबिया में अमेरिकी मनसूबों को जिस तरह कामयाबी मिली है ईरान कोलेकर उसका उत्साह उतना ही बढ़ गया है। लीबिया में गद्दाफी के ख़िलाफ़ ऑपरेशन मेंनाटो ने ये हास्यास्पद दावा किया कि उनके बरसाए गए तकरीबन 2 लाख से ज़्यादा बमों कीवजह से कोई भी सिविलियन नहीं मारा गया। गद्दाफी को बागी सेना द्वारा मारने और फिरमांस बेचने वाली फ्रिज में बंद कर खुला प्रदर्शन के जो दृश्य लाईव रिपोर्टिंग केजरिए पश्चिमी मीडिया ने दुनिया भर में पहुंचाई, उसके साथ एक तरह से ये संदेश नत्थीथा कि लीबिया में अब पश्चिम की हितैषी सरकार बनेगी। ठीक उसी तरह जैसे सऊदी अरब,इराक, तुर्की या फिर जॉर्जिया में हैं। सत्ता परिवर्तन के लिए नाटो देश इस पूरी पट्टी में अपने सारे दांव खेल रहेहैं। सीरिया में लड़ रही फ्री सीरियन आर्मी को अमेरिका और नाटो ने खड़ा किया है।बंदूक और बम के अलावा टैंकों से सीरिया की गलियां पाट दी गई है। और नाटो का तर्कहै कि वो ये सब सुरक्षा की ज़िम्मेदारीके तहत कर रहा है। मध्य-पूर्व के नक्शे पर एक नज़र दौड़ाने पर आप पाएंगेकि ईरान के चारों तरफ हर देश में अमेरिकी सैन्य अड्डे बड़ी संख्या में बने हुएहैं। सऊदी अरब, इराक, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान, बहरीन औरकुवैत। इसके अलावा ज़ॉर्जिया और इजरालय उसके निकट सहयोगी देश है। सीरिया में सत्तापरिवर्तन के बाद अपने मुताबिक माहौल ढालने की कोशिश में पूरी ताकत के साथ वो लगाहुआ है। जाहिर है इस पट्टी में ईरान ही एकमात्र बड़ा ऐसा देश है जो अमेरिकी रणनीतिमें फिट नहीं बैठ रहा है। इसके अतिरिक्त अन्य कई देशों के मुकाबले समृद्ध तेलभंडार होने के बावजूद अमेरिका न केवल इसका दोहन करने में नाकामयाब साबित हो रहा हैबल्कि ईरान ने अमेरिकी सलाह को ताक पर रखते हुए परमाणु कार्यक्रम पर काम लगातारजारी रखा है। इसके एवज में ईरान ने बीते 2 साल में 5 बड़े वैज्ञानिकों की जानगंवाई है। ईरानी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मुस्तफ़ा अहमदी रोशन की हत्या इसकीआखिरी कड़ी है। मुस्तफ़ा की हत्या के तरीके को हू-ब-हू दिल्ली में इजरायली दूतावासके पास कार बम विस्फोट में उतारा गया। और इसके बाद ये स्थापित करने को कोशिश हुईकि मुस्तफ़ा के बदले में ईरान ये कार्रवाई कर रहा है।


निशान में मध्य-पूर्व के उन जगहों को दिखाया गया है जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं।
ईरान, जॉर्डन, सीरिया और लेबनान अमेरिकी दख़लअंदाजी से अब तक अछूते हैं।
बार-बार ईरान ने ये स्पष्टीकरण दिया है किवो शांतिपूर्ण उद्देश्य की खातिर नाभिकीय कार्यक्रम चला रहा है लेकिन इज़रायल कोईरान के परमाणुयुक्त होने पर सबसे ज़्यादा आक्रोश है। इज़रायल का कहना है कि ईंधनकी ओट में ईरान नाभिकीय बम बना रहा है। हालांकि मोटे अनुमान के मुताबिक़ 200 सेज़्यादा परमाणु बम रखने वाला इज़रायल किस नैतिक आधार पर ईरान में परमाणु बम काविरोध कर रहा है इसका उत्तर न तो अमेरिका देगा और न ही पश्चिमी मीडिया।

ईरान के पास वैश्विक प्राकृतिक गैस कालगभग 10 फीसदी भंडार है और इराक व सऊदी अरब के बाद सबसे बड़ा तेल भंडार। अगर ईरानकाबू में आता है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गाड़ी में इन तीनों देश के तेल भरे जासकेंगे। अमेरिका और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ये मजबूरी है कि ईरान को वो इराकमें तब्दील करें क्योंकि अमेरिका के भीतर वैश्विक तेल भंडार का महज 2 फीसदी हिस्साही है।

ईरान को लेकर अमेरिका लंबे समय से अपनीरणनीति बना रहा है। इसके अलावा बीते दिनों नाटो, तुर्की और सऊदी अरब के बीच भी इसपर महीनों बातचीत चली है कि सीरिया में उनके हस्तक्षेप का स्वरूप क्या होगा? ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने ये साफ़ किया था कि सीरिया को लेकर संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद में वो पहले ज़ोर लगाएंगे। हालांकि पश्चिमी मीडिया ने ही येखुलासे किए कि ब्रिटिश और फ्रांसीसी विशेष सैन्य बल फ्री सीरियन आर्मी को तुर्कीके सैन्य अड्डे में प्रशिक्षण दे रहे हैं। इस प्रशिक्षण के क्या मायने हैं? क्या सीधा हमला करना ही हमला कहलाएगा, क्या सीरिया के भीतर सैन्य प्रदर्शनकरने वाले गुटों को प्रशिक्षण देना हमले का दूसरा रूप नहीं है? असद सरकार से असहमत बड़ी आबादी सीरिया में चल रहे प्रदर्शन से नाराज हैंऔर उन्हें लगता है कि इस तरह सीरिया के भीतर पश्चिमी दख़लअंदाजी बढ़ जाएगी। सीरियामें सत्ता परिवर्तन को जिस तरह अमेरिका और इजरायल अपने मुताबिक मोड़ना चाहते हैंवो ईरान के लिए भी बराबर चिंता का विषय है, क्योंकि उस इलाके में सीरिया, जॉर्डनऔर लेबनान ही दो ऐसे देश हैं जिनके साथ ईरान के दोस्ताना संबंध हैं और जोमध्य-पूर्व की राजनीति में पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ साझी रणनीति रखते हैं।

सीरिया में अमेरिकी राजदूत कोफिर से बहाल किया जाना और इसके लिए रॉबर्ट एस फोर्ड को चुना जाना अमेरिकी मंसूबेको उनके बीच बेहद स्पष्ट कर देता है जो फोर्ड की पृष्ठभूमि जानते हैं। फोर्ड 2004 से2005 के बीच इराकी जनसंहार के दौरान अमेरिका की तरफ़ से बग़दाद में नंबर दो कीपोजीशन में थे। सीरिया में फोर्ड के अनुभव का अमेरिका लाभ उठाना चाहता है! बग़दाद के सारे अनुभवियों को अमेरिका आजकल महत्वपूर्णजिम्मेदारी दे रहा है। जनरल डेविड पेट्रॉस को ओबामा ने हाल ही में सीआईए का प्रमुखबनाया है। पेट्रॉस का 2004 के बग़दाद दमन में प्रदर्शन बेहद शानदार था। सीआईए प्रमुख कीजिम्मेवारी संभालने के बाद ही पेट्रॉस ने सीरिया और ईरान को सबसे प्रमुख मुद्दाबताते हुए ये साफ कर दिया था कि अमेरिका की प्राथमिकता में अभी कौन सा इलाका सबसेअहम है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी निशाने पर रहे साम्यवाद समर्थक देशोंके बजाए बीते दो दशक में इस्लामिक देश अमेरिका के निशाने पर सबसे आगे है। सैम्युअलहटिंगटन जैसे सिद्धांतकारों ने अपने सिद्धांत के जरिए अमेरिका क इस चाल को अवश्यंभावीकरार देते हुए वैश्विक शक्ति समीकरण के लिए ज़रूरी बताया था। लेकिन सभ्यताओं का टकराव जैसे सिद्धांत के जरिएहटिंगटनने आलोचनात्मक चिंतन को गलत दिशा में मोड़ दिया। असल मेंमसला कभी भी इस्लाम बनाम ईसाईयत का नहीं रहा है। वास्तव में मध्य-पूर्व के संदर्भमें भी लड़ाई साम्यवाद बनाम पूंजीवाद का ही है और चरमराती पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाकी लगाम को मज़बूत करने के लिए ही अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी पूंजीवादी देशमध्य-पूर्व के देशों के संसाधन का ओट ले रहे हैं। यदि मध्य-पूर्व केसंसाधन का दोहन करने में अमेरिका नाकामयाब रहा तो पूंजीवाद की हालत ज़्यादा जर्जरहो जाएगी और स्वाभाविक रूप से विकल्प के तौर पर लोग साम्यवाद की ओर मुंह करेंगे।इस स्थिति को रोकने के लिए अमेरिका मध्य-पूर्व में ज़ोर लगा रहा है और विरोध करनेवाले देशों पर बम बरसा रहा है। ऐसे में विरोध करने वाला देश यदि अमेरिका के सामनेतनकर खड़ा होता है तो इसे इस्लाम बनाम पश्चिमी देश के तौर पर नहीं देखा जानाचाहिए। अगर मामला ऐसा होता तो अमेरिका उन गुटों को समर्थन ही नहीं देता जो सत्तापरिवर्तन के लिए इन देशों में लड़ रहे हैं और अपने पूरे मिजाज में इस्लामी कट्टरपंथीहैं।

असल में अमेरिकाऔर नाटो मध्य-पूर्व की राजनीति को पुरातन विचारधारा की आगोश में डालने की पूरीकोशिश में हैं। मिस्र के जिस आंदोलन को अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों का समर्थनहासिल था उसकी परिणति सैन्य और फिर इस्लामी राजनीतिक पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड केउभार के रूप में हुई। लीबिया में तालिबान समर्थित संगठनों ने सत्ता परिवर्तन कीलड़ाई लड़ी और पूरे इलाके के एक मात्र बचा धर्मनिरपेक्ष राज्य सीरिया के सत्तापरिवर्तन के लिए भी ऐसी ही शक्ति को अमेरिका, इज़रायल और नाटो देश समर्थन दे रहे हैं।क्याअद्भुत संयोग है कि सीरिया के भीतर दुनिया में अल-कायदा को अपना सबसे बड़ा दुश्मनमानने वाले अमेरिका और अलकायदा दोनों का लक्ष्य एक ही है। बीते दिनों अलकायदा नेताअयमान अल-जवाहरी ने एक वीडियो जारी कर सीरिया के पड़ोसी मुल्कों से ये आह्वान कियाथा कि सीरिया के असद सरकार के ख़िलाफ़ वो संगठित हो। अगरसीरिया में भविष्य में सत्ता (या व्यवस्था) परिवर्तन होता है तो उसका स्वरूप या तोइस्लामी गणतंत्र का होगा या फिर अमेरिकापरस्त लोकतंत्र का।

मध्य-पूर्व को अमेरिका अपनेसैन्य अड्डे के तौर पर इस रूप में विकसित करना चाहता है जो रणनीतिक तौर पर अमेरिकीहित में सबसे ज़्यादा मुफीद हो और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संवर्धित करने मेंमददगार हो। हमले के बाद इन देशों में कठपुतली सरकार बनाकर अमेरिकाअपनी रणनीति में काफी हद तक कामयाब भी हो रहा है। जो देश हमला नहीं झेलना चाहते वोसीधे-सीधे अमेरिकी दोस्ती को अमेरिकी शर्त पर निभा रहे हैं। हाल ही में सऊदी अरबद्वारा इतिहास में अब तक का सबसे ज़्यादा मूल्य यानि 50 अरब डॉलर के हथियार खरीदनेको इसी रूप में देखा जाना चाहिए। सीरिया में यदि सत्ता परिवर्तन होता है तो यह ईरान को उस इलाके में बिल्कुल अलग-थलग कर देगा। और एक तरह से ईरान के लिए यह बड़ी हार होगी। ईरान पर सीधे हमला करने से पहले अमेरिका और इजरायल की कोशिश यही होगी कि सीरिया को पहले अपने अनुकूल बना लिया जाए।