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28 मार्च 2013

जेल से भेजी मारुती मजदूरों ने अपील


समर्थन में आज से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू 

मारुती कंपनी प्रबंधन, सरकार और प्रशासन के दमन के खिलाफ 24 मार्च से हरियाणा के कैथल जिले में चल रहा अनिश्चितकालीन धरना आज से आमरण अनशन में बदल गया है. संघर्षरत मज़दूरों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के पक्ष में व्यापक समर्थन की अपील की है. इस मौके पर हम जेल में बंद 147 मजदूरों की और से जारी पत्र को प्रसारित कर रहे हैं...
हम मारुति सुजुकी के वो मजदूर है जिनको 18-7-2012 की दुर्घटना का इल्जाम लगाकर बिना किसी न्यायिक जांच के जेल में डाल दिया गया हैं. हम 147 मजदूर अभी भी गुडगाँव सेंट्रल जेल के सलाखों के पीछे बंध हैं. जुलाई के बाद लगभग 2500 पक्के और कच्चे कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया. पिछले 8 महीनों से हम हरियाणा और केन्द्रीय सरकार के बहुत सारे उच्च अधिकारियों, हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री जी को भी कई बार अपील कर चुके हैं.
लेकिन न तो हमारी कहीं सुनाई हो रही है, न ही हमें जमानत दी जा रही है. और तो और, जो हरियाणा पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में पेश की है, उसमें किसी गवाह का नाम नही है और वह आधी अधूरी है. हमारा लोकतान्त्रिक अधिकारो का हनन लगातार हो रहा हैं, और कानून को कंपनी मालिकों के स्वार्थ में व्यवहार किया जा रहा हैं. इस दौरान बहत से कर्मचारियों ने अपने परिवार के सदस्य के साथ-साथ बहत कुछ खो दिया है. काफी मजदूर ऐसे भी है जिनके माता-पिता नहीं हैं और पुरे परिवार का पालन पोषण का भार उन्ही पर है.
काफी ऐसे भी साथी हैं, जब उन्हें जेल में डाला गया, तब उनकी पत्नियाँ गर्भवती थी. उनकी डिलीवरी के समय भी कर्मचारियों को न तो जमानत दी गयी, न ही पे-रोल पे छुट्टी दी गयी और न ही पे-रोल कस्टडी में ही भेजा गया. परिवार में अकेली होने के कारण व पति के जेल में होने के कारण, पता नहीं किन परिस्थितियों में उनकी डिलीवरी हुई है. इसके हम निचे कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है:-
हमारे एक साथी सुमित S/O स्वर्गीय श्री छत्तर सिंह के घर में सुमित और उनकी पत्नी के अलावा कोई अन्य पारिवारिक सदस्य नहीं है. लेकिन फिर भी दिनांक 6.12.2012 को उनकी पत्नी की डिलीवरी गुडगाँव के एक अस्पताल में हुई और उनकी देखभाल के लिए सुमित को कोई भी राहत प्रदान नहीं की गई.
हमारे एक साथी विजेंद्र S/O स्वर्गीय श्री दलेल सिंह अपने परिवार का पालन पोषण करनेवाला अकेला सदस्य है. उसके घर में उसकी पत्नी व बिमार माँ है. उसकी पत्नी की डिलीवरी 10.01.2013 को झज्जर के एक अस्पताल में हुई. विजेंद्र के माँ के बिमार होने के कारण उसकी पत्नी कि डिलीवरी के समय देखभाल करनेवाला कोई नहीं था. लेकिन फिरभी विजेंद्र को पत्नी के देखभाल के लिए डिलीवरी के समय कोई राहत नहीं दी गई.
हमारे साथी रामबिलास S/O स्वर्गीय श्री सीलक राम की दादीमा 26.02.2013 को रामबिलास के वियोग में बिमार हो कर स्वर्ग सिधार गई, क्योकि वह उसकी दादीमा का बहुत लाडला था. और तो और उसे दाह-संस्कार में सामिल होने या दादीमा के अंतिम दर्शन करने के लिए पेरोल कस्टडी में भी नहीं ले जाया गया. कुछ ही दिनों के बाद जब उसकी पत्नी कि डिलीवरी होनी थी तो उसकी जमानत या छुट्टी के लिए याचिका लगाई गई तब भी उसे कोई राहत नहीं दी गई. इससे उसके ऊपर बड़ा मानसिक आघात हुआ है.
हमारे एक साथी प्रेमपाल S/O श्री छिद्दीलाल के उपर पुरे परिवार के पालन पोषण का भार है, वह जब जेल में आया था तब उसके परिवार की रोजी-रोटी उसी के बलबूते पर टिकी हुई थी. परन्तु उसके जेल में आने के बाद उसकी इकलौती बेटी जो मात्र दो साल की थी, जो अपने पापा के वियोग में बीमार होकर पापा-पापा करते हुए भगवान को प्यारी हो गई. ये जख्म अभी हरा ही था कि तभी कुछ दिन बाद प्रेमपाल की माँ बेटे के वियोग में व अपनी लाडली पोती के वियोग में बीमार होकर स्वर्ग सिधार गई. हद तो तब हो गई जब उसकी एक सप्ताह कि छुट्टी भी ख़ारिज कर दी गई व उसे मात्र एक घंटे के लिए दाह-संस्कार होने के अगले दिन पे-रोल कस्टडी में भेजा गया. जबकि गुडिया व माताजी के देहांत के दुःख में घर में अकेली उसकी पत्नी भी बीमार होने के कारण अस्पताल में दाखिल करवानी पड़ी जो अभी भी बिमार है तथा उसकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं है. और इस कारण प्रेमपाल बहुत अधिक मानसिक दबाव में है.
हमारे एक साथी राहुल S/O श्री विनोद रतन जो घर में अपने माँ-बाप का एक इकलौता बेटा है व उसकी एक ही बहन है. उसकी बहन कि शादी दिनांक 16.11.2012 को हुई. परन्तु उसे कस्टडी में भी अपनी बहन के शादी के कन्यादान के लिए नहीं भेजा गया जिसके कारण घर की इकलौती बेटी की शादी होते हुए भी घर में मातम जैसा माहौल रहा और राहुल मानसिक दबाव में है.
हमारे एक साथी सुभाष S/O श्री लाल चंद जो कि अपनी दादीमा का बहुत लाडला था. जब वह जेल में आया तो उसके वियोग में उसके दादीमा खाना-पीना छोड़ दिया व कुछ दिन में ही अपने पोते को याद करते हुए स्वर्ग सिधार गई. परन्तु सुभाष को दाहसंस्कार या अंतिम दर्शन के लिए पे-रोल कस्टडी में भी नहीं भेजा गया.
ऐसी और कितनी ही दुख भरी घटनाएँ है, जिन्हें लिखते लिखते एक पूरी किताब बन जाये .

हमारे बारे में: परिचय, परिवार, नौकरी

हम सभी किसान या मजदूरों के बच्चे हैं. माँ-बाप ने हमे बड़ी मेहनत से खून-पसीना एक करके 10वी-12वी या ITI शिक्षा दिलवाई व इस लायक बनाया कि इस जीवन में कुछ बन सके व अपने परिवार का सहारा बन सके.
हम सभी ने कंपनी द्वारा भर्ती प्रक्रिया में लिखित व् मौखिक परीक्षायों को पास करके व् कंपनी की जो जो भी नियम व शर्ते थी, उनपर खरे उतर कर मारुति कंपनी को ज्वाइन किया. जोइनिंग करने से पहले, कंपनी ने सभी प्रकार से हमारी जांच करवाई थी, जैसे- घर की थाने तहसील की व क्रीमिनल जांच करवाई गई थी! पिछले समय का हमारा कोई क्रिमिनल रिकार्ड नहीं हैं.
जब हमने कंपनी को ज्वाइन किया तब, कंपनी का मानेसर प्लांट निर्माणाधीन था. हमने अपने कड़ी मेहनत व लगन से अपने भविष्य को देखते हुए, कंपनी को एक नयी उचाई पर ले गए. जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छायी हुई थी, तब हमने प्रतिदिन दो घंटे एक्स्ट्रा टाइम देकर साल में 10.5 लाख गाड़ियों का निर्माण किया था. कंपनी की लगातार बढ़ते मुनाफा का हम ही पैदावार रहे हैं, जबकि आज हमे अपराधी और खूनी ठहराया जा रहा हैं.
हम लगभग सभी मजदूर गरीब मजदूर-किसान परिवारों से हैं जिनकी जीविका हमारी नौकरी पर ही निर्भर हैं. हमनें अपने व अपने परिवार के भविष्य के सपने बुन रखे थे, कि हमारा भी अपना घर होगा. भाई-बहन व बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलाएंगे, ताकि उनका भविष्य भी उज्जवल हो सके व माता-पिता जिन्होंने इतने कष्ट उठाकर हमें इस लायक बनाया कि हम अपने पैरों पे खड़े हो सकें, उनका जीवन आरामदायक बनायेंगे.

कंपनी में हमारा हर प्रकार से शोषण हो रहा था, जैसे कि-

किसीको भी तबियत ख़राब होने पर डिस्पेंसरी न जाने देना व बिमारी की हालत में भी पूरा काम करवाना.

यहाँ तक कि टॉयलेट भी नहीं जाने दिया जाता था. केवल लांच या टि-टाइम में ही जाने दिया जाता था.

अधिकारीयों का कर्मचारियों के साथ भद्दा व्यवहार व गालिया देना और कभी कभी तो दंड देने के लिए थप्पड़ मारना व मुर्गा बना देना.

यदि किसी कर्मचारी के साथ या उसके परिवार के किसी सदस्य के साथ दुर्घटना या कोई समस्या होने पर या यहाँ तक की किसी सम्बन्धी की मृत्यु होने पर यदि कर्मचारी दो या चार दिन की छुट्टी लेता था, तो उसकी सेलरी का आधा भाग, लगभग नौ हज़ार रुपये काट लिया जाता था.

इस प्रकार शोषण के कारण कर्मचारियों को यूनियन कि जरूरत महसूस हुई. कंपनी यूनियन के खिलाफ थी, जिनके कारण हमारी साल 2011 में तीन हड़ताल हुई, जिसमे हमारे तीस साथियों को नौकरी से निकाल दिया गया. लेकिन आख़िरकार हमने फरवरी 2012 में यूनियन का रजि. करवाया, जिसमे हमारी मदद एच.आर. मैनेजर स्वर्गीय श्री अवनिश कुमार देव ने कि थी. हमारी मदद करने के कारण कंपनी देव जी से बहुत खफा हो गई थी, जिसके चलते देव जी ने नौकरी से अपना इस्तीफा दे दिया था. कंपनी ने पोल खुलने के डर से उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया था. यूनियन को तोडवाने व देव जी को रास्ते से हटाने के लिए एक योजनाबंध तरीके से बाउन्सरों व गुंडों को बुलाकर 18 जुलाई 2012 की ‘दुर्घटना’ को अंजाम दिया.

अबकी स्थिति

हम 147 मजदूरों को बिना किसी न्यायिक जाँच किये जेल में डाल दिया गया. हमारा जेल में बंध रहते 8 महीनें से ज्यादा समय हो चुका है. यहाँ जेल में हम बहुत मानसिक दबाव झेल रहे है. कई लोगों को टी. बी., पिलिया व किसीको दौरे पड़ रहे है. और बहुत सारे कर्मचारियों को अन्य काफी बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है.

हमारे लगभग सभी परिवारों में कमाने वाले केवल हम थे जो जेल में बंध हैं. जिसके कारण परिवारों को भूखे मरने की नोबत आ गई है. औरोतों और बच्चों कि शिक्षा तक भी छुट गई है जो कि उनका मौलिक अधिकार है. हमारा और हमारे परिवार का भविष्य अंधकार हो गया है. हमारे परिवार के सभी सदस्य भी मानसिक तौर पर बहुत परेशान है. हमे डर हैं कि वो परेशानी के कारण कोई गलत कदम न उठाये.

जेल से बाहर कर्मचारियों कि मौजूदा स्थिति 

147 कर्मचारियों को जेल में डालने के साथ साथ कंपनी ने लगभग 2500 कच्चे और पक्के कर्मचारियों की बिना किसी न्यायिक जाँच के नौकरी से निकाल दिया और वह बेरोजगार हो गए. उनकी परिवारों की स्थिति भी गंभीर है. यहा तक कि उनके पास कोई एक्सपीरियंस डोकुमेंट प्रूफ नहीं है और उनका पूरा कैरियर बर्बाद हो चूका है और उनमे से जो भी कोई हमारी पैरवी करने के लिए आगे आता है, उसे भी उठाकर जेल में डाल दिया जाता है (जैसे साथी ईमान खान के साथ किया गया, जिसका नाम कोई एफ.आई.आर., चार्जशीट या एस.आई.टी. रपट में नहीं था; 65 मजदूरों के ऊपर अभी भी गैर-जमानती वारंट जारी हैं). जेल में बंध कर्मचारियों और बाहर बेरोजगार कर्मचारियों के पास अपनी जीविका चलाने का कोई भी साधन नहीं है, जिसके चलते सभी मानसिक दबाव में है. लेकिन इन हालातों के बीच भी जेल के बहार के हमारे साथी जो न्याय के लिए संघर्ष जारी रखे हैं, उससे हमे इन सलाखों के पीछे भी आशा और उर्जा मिलती हैं. आठ महीने के उपर चल रहे इस संघर्ष में हमे देश के अलग अलग प्रान्त से मजदूर, मेहनतकश और आम जनता के समर्थन के खबरे आती रही हैं, जो भी हमे उम्मीद देती रही हैं.

हम अपनी जाँच की मांगों को लेकर सरकार के लगभग सभी मंत्रियों से मिल चुके हैं. राज्य उद्योग मंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री से भी न्याय की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन सरकार हरियाणा के मजदूर-कर्मचारियों की बजाये कंपनी मालिकों की ही तरफ झुकी हुई है. हम अंतिम बार सरकार से अपील करते है कि मरने या मारने के इस मुकाम तक पहुचने से पहले हमारे साथ न्याय हों. साभार- जनज्वार.

30 जुलाई 2012

घर के आगे कार चाहिए हड़ताल नहीं!


-दिलीप ख़ान

बंबई में 1918 में जब आम हड़ताल हुई थी तो उसमें 1,20,000 से ज़्यादा मज़दूरों ने हिस्सा लिया था और हड़ताल को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने लगभग 200 मज़दूरों को पुलिसिया गोली से उड़ा दिया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी नेता ने उस समय तक मज़दूरों के मामले पर गंभीरता से काम करना शुरू नहीं किया था। मज़दूरों की गोलबंदी स्थानीय स्तर पर स्थानीय नेताओं द्वारा शुरू हुई और देश में लगातार फैलती गई। बंबई से लेकर असम के चाय बगान तक और मद्रास से लेकर कानपुर के चमड़ा उद्योग तक। अप्रैल-जून 1921 तक अकेले बंबई 33 हड़तालों का गवाह बना और इसमें लगभग ढाई लाख मज़दूरों ने हिस्सा लिया। इसी आस-पास कानपुर में चमड़ा और सूती वस्त्र उद्योग के मज़दूरों ने हड़ताल की और प्रबंधन से मज़दूरी दर बढ़ाने, काम के तौर-तरीकों को बेहतर बनाने तथा मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग की। कानपुर में आज से लगभग 90 साल पहले, जब मज़दूर आंदोलन और औद्योगिक समाज के भीतर भारत में मज़दूर चेतना आकार ही ले रही थी, उत्पादन में हिस्सेदारी की मांग के साथ मज़दूर सड़क पर उतर गए थे। कांग्रेस सहित कई अन्य पार्टियों ने उस वक्त इस मांग को ठीक बताया था। आज अगर मुनाफ़े में हिस्सेदारी की मांग मज़दूरों की तरफ़ से उठे तो कॉरपोरेट घरानों के अलावा समूचा भारतीय मध्यवर्ग और सरकारी मशीनरी मज़दूरों पर पिल पड़ेंगे। मानेसर में जब बीते साल मारुति सुज़ुकी के कामगारों ने प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की बजाए वास्तविक यूनियन बनाने सहित काम-काज की स्थितियों को दुरुस्त करने और वेतन कटौती के त्रासद नियमों (1 मिनट देरी से आने पर आधे दिन का वेतन और तीन दिन काम पर नहीं आने पर आधे महीने के वेतन में कटौती) में परिवर्तन लाने की मांग की तो प्रबंधन को इसमें विकास-विरोधी नज़रिया दिखा था और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा मज़दूरों का पक्ष सुनने के बदले सुज़ुकी कंपनी का भरोसा जीतने टोक्यो पहुंच गए थे। कंपनी में तालाबंदी थी और प्रबंधन इस बात को लेकर मज़दूरों पर लगातार दबाव बना रहा था कि गुड कंडक्ट फॉर्म भरने वाले मज़दूर ही कारखाने के अंदर जा सकते हैं। गुड कंडक्ट फॉर्म का मतलब था- मज़दूरों की बुनियादी मांग की हत्या।
मानेसर का मारुति-सुज़ुकी प्लांट

बीते साल तीन बार हड़ताल हुई, काम से निकाले गए कई मज़दूरों को वापस लेने के वायदे से प्रबंधन मुकर गया और हड़ताल की अगुवाई करने वाले दोनों नेता खुद को कंपनी से अलग कर लिए। लेकिन, लंबी मशक्कत के बाद मारुति सुज़की इंपल्वाइज यूनियन को मान्यता मिल गई। प्लांट के भीतर उन्हीं सवालों पर संघर्ष अब भी जारी था जो बीते साल उठ रहे थे। इस पूरे वाकये को दौरान मारुति सुज़ुकी कंपनी को गुजरात सरकार लगातार यह प्रलोभन देती रही कि वो उसे हरियाणा से ज़्यादा फ्रेंडली माहौल दे सकती है। नरेंद्र मोदी और सुज़ुकी की बातचीत जारी थी और सुज़ुकी महोदय भी बीच-बीच में मीडिया के जरिए यह बात उछाल रहे थे कि वो प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे। मानेसर के मज़दूरों में उस समय एक जुमला प्रचलित था कि प्लांट कोई लोटा-थाली नहीं है कि जब मन करे कहीं भी उठा ले चलेंगे! सुज़ुकी के इसी फैसले को टालने के लिए भूपेंदर हुड्डा जापान गए थे ताकि सरकार की तरफ़ से कंपनियों को अब तक मिले प्रोत्साहन में बट्टा न लगे। इस तरह मारुति-सुज़ुकी के पास दो अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग पार्टियों के मुख्यमंत्री मनुहार लगा रहे थे। कंपनी प्रबंधन के पास मज़दूरों की मांग नहीं मानने के लिए ज़रूरी आत्मविश्वास बरास्ते सरकार जमा हो रहा था। इसके बाद हड़ताल, प्रदर्शन और किसी भी तरह के जमावड़े को रोकने के लिए प्रबंधन ने बड़ी संख्या में बाउंसरों की भर्ती की। मतलब खाए-पिए-अघाए लोग फ्रेश होने के लिए जब डांस क्लब में जाते हैं, तो छेड़खानी या फिर हंगामा वगैरह को नियंत्रित करने के लिए जिन बाउंसरों का इस्तेमाल होता है उन्हीं बाउंसरों को बुनियादी मांग उठा रहे मज़दूरों के सामने खड़ा कर दिया गया। कंपनी में काम-काज बाउंसरों की पृष्ठभूमि में होने लगा। अगजनी या फिर प्रबंधक की मौत निश्चित तौर पर एक दुखद चित्र हमारे सामने पेश करता है लेकिन ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा इसके कारणों का पता लगाना। जातिसूचक गाली देने वाले व्यक्ति की पिटाई एक तरह से जातिगत वर्चस्व की संरचना को तोड़ता है और इस वजह से मैं इसे सकारात्मक ही मानूंगा। मध्यवर्गीय समाज हिंसा-अहिंसा की बहस को सुविधानुसार समय में उठाता है। किसान-मज़दूरों का प्रदर्शन जब कभी उग्र हो जाए तो सरकार से लेकर मीडिया तक के दिमाग में औचक विचार आता है कि ये तो हिंसा का रास्ता है और इसलिए ग़ैर-संवैधानिक है! पिछले साल हुड्डा के जापान से लौटने के बाद जब मज़दूरों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठी भांजी तो उस समय संवैधानिक और ग़ैर-संवैधानिक वाली बहस नहीं उठी। संविधान के दायरे में मिले अधिकारों को तो कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद सरकार मटियामेट कर रही है। नौकरी की ठेका प्रथा पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और देश के संविधान में जो बातें कही गई हैं क्या उसे भारत के किसी भी कोने में सरकार लागू करवा रही है?  
मानेसर में मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट लगभग 3000 एकड़ में फैला है। 2002 में चौटाला सरकार ने 2.25 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से स्थानीय लोगों से ज़मीन ली थी। उस वक्त राज्य सरकार ने वादा किया था था कि ज़मीन देने वाले हरेक घर से एक व्यक्ति को नौकरी दी जाएगी। काम शुरू होने के बाद कंपनी ने नौकरी देने से इनकार कर दिया। जो लोग नौकरी की आस लगाए बैठे थे उन लोगों ने चाय की भट्टी और छोले-भटूरे की दुकान खोल ली। कुछ लोग रिक्शा और टैम्पो चलाने लगे। उनकी कमाई का जरिया मारुति-सुज़ुकी का यह प्लांट ही है। यहां काम करने वाले लोग ही उनके ग्राहक हैं। इसलिए उनका संकट ये है कि अगर प्लांट मानेसर से कहीं और शिफ्ट होता है तो उनमें से ज़्यादातर लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। प्रबंधन, सरकार और मीडिया से जिस तरह की बातें छन कर उन लोगों तक पहुंची उसका अर्थ यही था कि प्लांट के मज़दूर नहीं चाहते कि प्लांट चले! इस भाव को अगल-बगल के गांव के सरपंचों (हरियाणा के सरपंच को आप किस रूप में जानते हैं? संदर्भ- खाप) ने और स्थाई बना दिया। सरपंचों ने मिलकर महापंचायत बैठाई और फैसला किया कि लाल झंडे वालों को सबक सिखाने में वो दूसरे पक्ष का साथ देंगे। समाज का जिस तरह से (अ)राजनीतिकरण हो रहा है उसमें तत्कालिक आवेश ज़्यादा अहम हो चला है। दुनिया के किसी भी कारखाने में काम करने वाला कोई भी मज़दूर यह कभी नहीं चाहेगा कि वह कारखाना ठप्प हो जाए और यह बेहद सामान्य-सी बात है। हां, अपने अधिकार के लिए वो लड़ेगा ज़रूर। अगर प्लांट के चारों तरफ के गांव वाले इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं तो जाहिर है कंपनी के प्रोपेगैंडा के बीच यह पक्ष उन तक नहीं पहुंच रहा है। जिस बेरोज़गारी के डर से गांव वाले पंचायत बैठा रहे हैं उस आधार पर तो वो मज़दूरों के ज़्यादा करीब है। प्लांट बंद होने पर उनकी तरह मज़दूर भी बेरोजगार हो जाएंगे। अधिकारों के लिए लड़ रहे मज़दूरों को कंपनी धोखा दे रही है और गांव वालों को नौकरी नहीं देकर वो पहले ही धोखा दे चुकी है। सवाल ये है कि बीते साल हड़ताल को अंदरुनी मामला बताने वाला तटस्थ समाज आखिरकार कंपनी के पक्ष में अचानक कैसे चला जाता है? क्या तटस्थता का पूरा मामला अंतत: शक्तिशाली के पांत में ही खड़ा होना है? दिल्ली से लेकर बंबई तक के कॉलेज में पढ़ रहे फंकी युवाओं की हमदर्दी कंपनी के साथ क्यों रहती है? उदारीकृत आर्थिक व्यवस्था में समाज में निरपेक्ष दिखने वाले तबके का राजनीतिकरण किस दिशा में हो रहा है। यह व्यवस्था की चौहद्दी में हुई मानसिक बुनावट है या फिर पक्षधरता तय कर ली है समाज ने?
बाइक पर अन्ना समर्थक युवा-शहरी-मध्यवर्ग

25 जुलाई 2005 को होंडा मोटरसाइकिल के कामगारों पर लाठी चार्ज हुआ था। उस वक्त लगभग 800 मज़दूर होंडा सिटी के कारखाने में जमा होकर यूनियन बनाने और निकाले गए मज़दूरों की पुनर्बहाली को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रबंधन उनकी यूनियन को मान्यता नहीं दे रहा था और मज़दूरों को बहाल करने में आना-कानी बरत रहा था। 2005 में होंडा कंपनी से लेकर 2011-12 में मारुति-सुज़ुकी तक जो लकीर खिंची है उसमें बहुत फ़र्क़ कहां है? मारुति में भी शुरुआती आंदोलन इन्हीं दो सवालों से पैदा हुआ था। यह संयोग है कि 25 जुलाई को उस घटना की सालगिरह थी और इसी दिन प्रणब मुखर्जी ने देश के नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली और अन्ना हज़ारे एंड कंपनी ने जंतर-मंतर पर मोर्चा खोला। 2005 के बाद से हर साल मानेसर और गुड़गांव की ऑटोमोबाइल कंपनियों के मज़दूर इस दिन लाठी चार्ज के विरोध में प्रदर्शन करते हैं। इनमें मारुति सुज़ुकी, हीरो मोटोकॉर्प, रिको, सोना कोया, एफसीसी रिको, सुज़ुकी पावरट्रेन, सुज़ुकी मोटरसाइकिल और मार्क एक्झॉस्ट के मज़दूर अमूमन हर साल शामिल होते रहे हैं, लेकिन इस बार 24 जुलाई को गुड़गांव पुलिस ने यह घोषणा की कि 25 तारीख़ को मानेसर में धारा 144 लागू कर दी गई है और पांच से ज़्यादा व्यक्ति एक साथ इकट्ठा नहीं हो सकते। मज़दूरों के मार्च को रोक दिया गया। फिर भी कंपनी के भीतर लगभग 8,000 मज़दूर जमा हुए। जो मीडिया सौ लोगों की महापंचायत को दिखा रहा था उसने आठ हज़ार मज़दूरों के प्रदर्शन को नहीं दिखाया।
इस बीच मीडिया में इस तरह की ख़बरें लगातार आती रही कि मानेसर बंद होने से कौन सी कार बाज़ार में आउट-ऑफ-स्टॉक हो जाएगी, डीज़ल कार की क़ीमत पर इससे क्या असर होगा और मारुति-सुज़ुकी को इस तालाबंदी से कितना घाटा होने वाला है! वगैरह, वगैरह। मारुति सुज़ुकी के सीओओ मयंक पारीख ने 25 जुलाई को ही घोषणा की कि उनका दो सबसे ज़्यादा बिकने वाला मॉडल स्विफ्ट और डिज़ायर आउट ऑफ स्टॉक हो गया है। अगले दिन इस मुद्दे पर कुछ चैनलों ने लोगों की रायशुमारी ली जिसमें मध्यवर्ग छाती कूटता दिख रहा था। यह चर्चा लगातार ज़ोर पकड़ने लगी कि मारुति-सुज़ुकी में हुई हिंसा से भारत की छवि धूमिल हुई है। सार्क चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष विक्रमजीत सिंह साहनी ने देश की छवि पर पड़ने वाले असर पर भारी चिंता जताई। बंगाल चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष हर्ष झा ने कहा कि मानेसर के दोषियों पर आपराधिक क़ानून के तहत मुकदमा चलना चाहिए और इसे औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत नहीं देखा जाना चाहिए। झा ने दावा किया कि पूरा मामला पूर्वनियोजित मालूम पड़ता है! औद्योगिक घराना उस वक़्त आपराधिक क़ानून का जुमला नहीं उछालता जब सेज़ के लिए ज़मीन अधिग्रहण के वास्ते फ़ौजी बंदूक का सहारा लेकर गांव वालों को वो खदेड़ता है। उस समय उन्हें निजी कंपनियों की सुरक्षाकर्मी की तरह चाक-चौबंद होकर गांव खाली कराने वाली सरकार चाहिए।
कंपनी के अध्यक्ष आर सी भार्गव ने यह बार-बार जताया है कि कंपनी मानेसर में ही रहेगी लेकिन तालाबंदी के बाद मौका ताड़कर इस बार सुज़ुकी से मिलने के लिए नरेंद्र मोदी ने जापान का रास्ता नापा। वे अपनी तईं पूरा ज़ोर लगा रहे हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले मारुति-सुज़ुकी को अपने राज्य में खींचकर ले जाने में वो सफल हो पाएं। आख़िरकार वो कौन-सी शर्तें होंगी जिनके बिना पर मारुति-सुज़ुकी गुजरात जाने का फैसला करेगी। मज़दूरों की हड़ताल के अलावा मारुति-सुज़ुकी को अब तक मानेसर में कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। तो क्या हड़ताल को क्रश करने का भरोसा दिलाने मोदी जापान पहुंचे? विकसित राज्य तक पहुंचने का रास्ता इन्हीं वायदों से होकर गुजरता है। मध्यवर्ग को सिर्फ़ इससे मतलब है कि उनके घर के सामने स्विफ्ट और डिज़ायर पहुंचने में देर नहीं होनी चाहिए। उनके लिए कंपनी कार की जननी है और मज़दूर अड़ंगा डालने वाला प्राणी। यही मध्यवर्ग गाल पर तिरंगा छापकर अन्ना हज़ारे के साथ भ्रष्टाचार पर आवाज़ बुलंद करने पहुंचता है। इनका मुद्दा सिर्फ़ वहीं तक सीमित है जो सीधे-सीधे इनसे टकराता हो। मज़दूरों के मामले से इनको कोई लेना-देना नहीं है, अल्पसंख्यक-दलित-आदिवासियों का मामला इनको आउटसाइडर जैसा मालूम पड़ता है। सरकार इनको साफ़ सुथरी चाहिए, कोई भ्रष्टाचार नहीं चाहिए और सुज़ुकी के साथ गलबहियां डालने वाले नेता को उनके जनसंहार के लिए क्लीन चिट देते हुए यह पूरा वर्ग उसमें विकास के अक्स ढूंढता है।



12 सितंबर 2011

लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाए




----मानेसर से लौटकर दिलीप खान
पिछले 14 दिनों से लगातार (लगातार को लगातार ही पढ़ें) चल रहे भाषणों के बीच जब एकरसता-सी आ रही थी तो सड़क के उस पार एक बस से ज़ोर-ज़ोर से आ रही क्रांतिकारी नारों की आवाज़ ने मज़दूरों में कौतूहल जगा दी. पहले बस से उतरते कुछ पैर नीचे दिखे, फिर दो-एक चेहरे और फिर 50 से ज़्यादा ऐसे चेहरे जिसे देखकर मज़दूरों ने किलकारी मारनी शुरू कर दी. उनके हाथ में तख़्तियां थीं जिनमें मज़दूरों के समर्थन वाले हर्फ़ लिखे थे. सड़क के इस पार अब यह साफ़ हो गया था कि जेएनयू से यह बस आई है और मज़दूरों के इस सवाल पर वे उनका साथ देने आए हैं. बहुत देर तक तालियां बजती रही. फिर छात्र-मज़दूर एकता ज़िदाबाद के नारे. डीयू और जामिया से भी छात्र-छात्राओं के कुछ समूह वहां मौजूद थे. नौजवान से दिखने वाले मज़दूरों के उत्साही नेता सोनू गुज्जर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, जिस आंदोलन में स्टूडेंट घुस जाए. समझो वो लड़ाई जीत ली गई.मानेसर और गुड़गांव के बाकी कंपनियों के मज़दूर यूनियनों से मिलने वाले समर्थन के बाद दिल्ली के विश्वविद्यालयों से आ रहे विद्यार्थियों ने सबके भीतर उत्साह और जीत की नई उमंग भर दी.
सफ़ेद और लाल रंग के पंडाल के नीचे पिछले 14 दिनों से जमा मज़दूरों के लिए दिन के मायने ख़त्म हो गए हैं. 15, 16 या 17 महज एक संख्या है और वे इन्हें जीत के रास्ते में आने वाले पड़ाव की तरह देख रहे हैं. आईएमटी मानेसर में 750 एकड़ में फैले मारुति-सुजुकी के प्लांट के गेट संख्या 2 के ठीक सामने मज़दूरों के जमावड़े के बीच आप जाएंगे तो यक़ीन मानिए आप अपनी उस दकियानूसी धारणा से मुक्त हो जाएंगे कि दिन गुजरने के साथ उत्साह में गिरावट आती है. कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठानों ने पिछले कुछ वर्षों में इग्नोर करने को बड़े हथियार के तहत भांजा है. मारुति-सुजुकी भी उसी रास्ते मज़दूरों को हतोत्साहित करने की फिराक़ में है. प्रबंधन की तरफ़ से अब तक बातचीत की कोई पहल नहीं हुई है. लेकिन आईटीआई करने के बाद ऑटोमोबाइल कारखाना में नौकरी बजाने वाले सारे मज़दूर यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें इग्नोर नहीं किया जा रहा. वे ब्रांड, विज्ञापन और मार्केटिंग के फंडे को समझते हैं. पिछले चार सालों से कंपनी में काम करने वाले अजय कहते हैं, हां यह ज़रूर है कि वो (प्रबंधन) सीधे-सीधे हमसे बात करने अब तक नहीं आए हैं, लेकिन अख़बारों में वो लगातार अपना विज्ञापन बढ़ा रहे हैं. इससे यह साबित होता है कि उन पर दबाव है.
अजय की बात को बीच में ही काटते हुए विजय कहते हैं, ज़्यादातर मीडिया के जरिए ही हम कंपनी का पक्ष जान पाते हैं. दैनिक जागरण ने हमे बताया है कि सोमवार तक यदि हम लोगों ने प्रबंधन की मांग नहीं मानी तो स्थाई तौर पर हमें अंदर जाने से रोक दिया जाएगा. प्रबंधन की इन धमकियों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा और मज़दूरों के बीच तक़रीबन एक तयशुदा सहमति है कि यदि उनकी मौजूदा एकता क़ायम रही तो प्रबंधन उनका कुछ नहीं कर सकता. वे यह जानते हैं कि मालिक सिर्फ़ पूंजी के बदौलत उत्पादन नहीं कर सकते. उत्पादन के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ मेहनत और मज़दूरी होती है और वो मज़दूरों के पास है.
अगर आप कई सारे अख़बारों में आ रही ख़बरों के सहारे मानेसर को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो मानेसर को समझना छोड़ दीजिए. अख़बारों ने तो बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखा है कि मारूति-सुजुकी प्लांट में मज़दूरों का हड़ताल चल रहा है, लेकिन यह ख़बर पूरी तरह झूठी है. यहां कोई हड़ताल नहीं चल रहा. मज़दूर अपने लोकतांत्रिक शर्तों के साथ काम करने को तैयार हैं, लेकिन मारूति ने ख़ुद तालाबंदी कर रखी है. मारूति का कहना है कि गुड कंडक्ट फॉर्म को जो-जो मज़दूर भरेगा वो अंदर आकर काम शुरू करें और जो नहीं भरेगा उनके लिए यह दरवाज़ा बंद है. मज़दूर प्राथमिक तौर पर इसी गुड कंडक्ट फॉर्मके ख़िलाफ़ है और सड़क पर डटे हुए हैं.
इस गुड कंडक्ट फॉर्म के साथ-साथ मारूति-सुजुकी मज़दूर आंदोलन की संक्षिप्त कहानी से पहले मज़दूरों के उन मांगों को आप देख लीजिए जिनको पूरी करवाने के लिए वो आधे महीने से कंपनी के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और जिनको तोड़ने-मरोड़ने के लिए कंपनी मालिक से लेकर ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार तक के सुर एक हैं. ये चार मांगें हैं.-
11. 1. मारुति सुजुकी इंप्लाइज यूनियन बहाल की जाए
2.22. निकाले गए मज़दूरों को वापस लिया जाए
3. 33. सभी चार्ज शीट वापस लिए जाए
4.44 ग़ैरक़ानूनी तालाबंदी ख़त्म की जाए
पहली मांग काफी पुरानी है और मौजूदा गतिरोध की सबसे मज़बूत वजह है. दूसरी, तीसरी और चौथी मांग कंपनी द्वारा पहली मांग को ध्वस्त करने के लिए की गई कार्रवाई से उपजी हुई है. जून में जब यूनियन बनाने के लिए मज़दूरों ने अपनी मांग शुरू की तो मारुति सुजुकी प्रबंधन के कान खड़े हो गए. प्रबंधन एक-एक मज़दूर को अलग-अलग बुलाकर अनुशासन के नाम पर नौकरी छीनने की धमकी देने लगा. मज़दूरों से प्रबंधन का कहना था कि वो पहले से मौजूद यूनियन को ही वास्तविक यूनियन माने. असल में प्रबंधन चालित एक यूनियन कंपनी में पहले से अस्तित्व में थी/है, जिसमें चुनिंदा मज़दूरों को शामिल किया गया था और वे मज़दूर नीतियों का कम और प्रबंधन की नीतियों का ज़्यादा प्रचार करते है. फ़िलवक़्त चल रहे आंदोलन के बारे में भी मलाई काट रहे वास्तविक यूनियन से जुड़े नेताओं का मानना है कि कंपनी में अनुशासनहीनतानहीं चल सकती.
रेवाड़ी के रहने वाले मज़दूर आनंद हमें बताते हैं, उस वक़्त मज़दूरों से एक पेपर पर हस्ताक्षर करने कहा गया जिसमें यह लिखा था कि मज़दूरों की तरफ़ से किसी नई यूनियन की कोई मांग नहीं है और भविष्य में भी उनकी इस तरह की कोई मांग नहीं होगी. प्रबंधन के उस बाध्यकारी हस्ताक्षर अभियान के ख़िलाफ़ मारूति कामगारों ने मोर्चा खोल दिया. मज़दूरों ने सोनू गुज्जर को अपना नेता मानते हुए प्रबंधन की नीतियों का विरोध किया. परिणामस्वरूप कंपनी ने 11 लोगों को नौकरी से बाहर निकाल दिया. मज़दूरों के इस दमनकारी निष्काषण के विरोध में मज़दूरों ने बेहतरीन एकता का प्रमाण देते हुए हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया और 13 दिनों तक चली उस हड़ताल के बाद समझौता हुआ. सभी 11 लोगों को वापस लिया गया. कंपनी ने उस समय यह भरोसा दिलाया कि अब वो किसी मज़दूर को नहीं धमकाएगी और न ही किसी को बाहर का रास्ता दिखाएगी. ये सब जून की कहानी है. एक तरह से शुरुआती लड़ाई में मज़दूर जीत चुके थे, लेकिन सवाल जहां से शुरू हुआ था वह वहीं पर ठहरा हुआ था. सवाल था- मज़दूर हितों की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाली यूनियन का निर्माण! जून की टकराहट का नतीजा यह हुआ कि अब तक मशीन से बनी जली-कच्ची रोटियों और पतली दाल पहले के मुकाबले कुछ बेहतर हुई. हालांकि जेएनयू के एक छात्र से मज़दूर दिनेश सेठी का कहना था, आप विद्यार्थी लोग आज भी उस रोटी को ताकेंगे नहीं. आपके कॉलेज (विश्वविद्यालय) में उस तरह की रोटियां एक दिन भी बन जाए तो आप लोग ऐसी कैंटीन वाले को बाहर कर देंगे.’
यूनियन की मांग जारी रही और साथ में कंपनी प्रबंधन की तरफ से मिलने वाली धौंस भी. हमेशा की तरह एक दिन 7 बजे जब मज़दूर काम करने कंपनी पहुंचे तो कंपनी पूरी तरह बदली हुई दिख रही थी. भीतर-बाहर पुलिस और निजी सुरक्षा गार्ड से अटी हुई कंपनी. बाहर गेट पर एक फॉर्म के साथ तैनात सुरक्षा गार्ड- जो मज़दूरों को यह हिदायत दे रहा है कि जो इस गुड कंडक्ट फॉर्मको भरेगा वही काम करने अंदर जाएगा. मज़दूरों ने वह फॉर्म भरने से इंकार कर दिया. बैठक हुई और सोनू गुज्जर के नेतृत्व में सबने यह फैसला किया कि न तो यूनियन की मांग छोड़ेंगे और न ही यह फॉर्म भरेंगे और न ही कंपनी छोड़ के जाएंगे. यशवंत प्रजापति कहते हैं, वह फॉर्म मज़दूर हितों के साथ बड़ा धोखा है. उसमें कंपनी कहती है कि मज़दूर कोई कंपनी विरोधी काम नहीं करेगा. प्रबंधन के साथ सही आचरण रखेगा......हां सही आचरण क्या है यह कंपनी ही तय करेगी.
मारुति सुज़ुकी इस तालाबंदी के लिए पहले से माहौल बना रही थी. कुछ दिन पहले से ही वह लगातार मज़दूरों को धमका रही थी कि वो जानबूझकर काम ठीक से नहीं कर रहे हैं और सुपरवाइजर उनके कामों में लगातार खोट निकाल रहे थे. मज़दूरों का दावा है कि कंपनी जान-बूझ कर मैटिरियल में कमी लाई और मज़दूरों पर यह आरोप लगाया कि वे सुस्त गति से और सोच-समझकर ख़राब उत्पादन कर रहे हैं. इसी को आधार बनाते हुए कंपनी धीरे-धीरे मज़दूरों को बाहर करने लगी. निकाले गए मज़दूरों की संख्या अब तक 57 हो गई है. तालाबंदी के बाद भी कंपनी द्वारा मज़दूरों का निकाला जाना जारी है.
प्रदर्शन स्थल पर जिला प्रशासन और लेबर कमीशन के लोग स्थिति का जायजा लेने आए, लेकिन उनकी पक्षधरता साफ़ थी. सोनू गुज्जर ने लेबर कमिश्नर के साथ हुई बातचीत का मजमून रखते हुए कहा कि उन्होंने निकाले गए 57 मज़दूरों को पहले बिल्कुल भूल जाने को कहा, लेकिन बाद में कहा कि छह माह बाद निकाले गए मज़दूरों को वापस लिए जाने पर विचार किया जाएगा. उन्होंने यह भी समझाइश दी कि यूनियन बनाकर क्या होगा, पहले से मौजूद यूनियन के बैनर तले ही वे अपनी मांगों को मज़बूती से रखे. सोनू गुज्जर के साथ बातचीत से पहले लेबर कमिश्नर को शायद यह तथ्य पता नहीं होगा कि बीते 16 जुलाई को पुरानी यूनियन का चुनाव हुआ था और 2500 मज़दूर संख्या वाली इस कंपनी में 20 से भी कम लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया. प्रबंधन वाली यूनियन की असलियत ऊघर के सामने आ गई है.
राज्य सरकार को मारुति ने धमकाया है कि अगर समाधान उनके पक्ष में नहीं रहता है तो वे प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे. मुख्यमंत्री हुड्डा साहब इस धमकी से घबराए हुए हैं. लेकिन, मारुति सुज़ुकी की पिछली कुछ घोषणाओं और कामों पर नज़र दौड़ाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि उनकी धमकी में बहुत दम नहीं है. मारुति ने मानेसर में इस प्लांट के अलावा दो और नए प्लांट पर काम करना शुरू कर दिया है. कुछ दिन पहले तक गुड़गांव वाले प्लांट को भी वे मानेसर लाने की बात कह रहे थे. वह सिर्फ मज़दूर हड़ताल की वजह से गुजरात नहीं भाग सकती. यह दबाव बनाने का प्रोपगैंडा है. सोनू गुज्जर इस प्रचार की असलियत जानते हैं, कंपनी कोई थाली नहीं है कि हाथ में उठाए और बस में सवार होकर गुजरात चल दिए. कंपनी कंपनी होती है.
यूनियन बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मारुति के भीतर जो स्थिति थी उससे निजात पाने के लिए इसका गठन होना बहुत ज़रूरी हो चला था. चार्ली चैपलिन की मॉडर्न टाइम्स जिसने देखी है वो कंपनी के भीतर काम करने के तरीके को बेहतर समझ पाएंगे. एक मज़दूर अपना पसीना पोछने के लिए हाथ उठाए तो चलती पट्टी के दो नट-वोल्ट कसने बच जाएंगे और उस दो-तीन सेकेंड की भरपाई में उसे तेजी से हाथ-पैर मारने होंगे. मारुति सुजुकी हर 45 सेकेंड में एक कार तैयार करती है. दिनभर में यहां 1200 कारें बनती हैं. मज़दूरों को दो बार चाय पीने के लिए 7-7 मिनट का वक़्त मिलता है, जिसमें उन्हें हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और मशीनी औज़ार स्टोर में रखने भी होते हैं, फिर पंचिंग कार्ड के जरिए कैंटीन भी जाना होता है फिर कतार में खड़े होकर चाय भी लेनी होती है, पीनी भी होती है और फिर हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और तमाम लाव-लश्कर से लैश होकर काम शुरू कर देना होता है. इसमे एक सेकेंड की भी देरी बर्दाश्त नहीं है. याद कीजिए कि मॉडर्न टाइम्स में जब चार्ली को बीड़ी पीने की तलब होती है और वो छुपकर बीड़ी सुलगाता है तो सामने स्क्रीन पर उसका मैनेजर उसे रंगे हाथों पकड़ लेता है और ज़ोर से फटकारता है. बिल्कुल यही माहौल मारुति के भीतर भी है. लंच के लिए आधा घंटा दिया जाता है.
काम दो शिफ्ट में होता है. सुबह 7.30 से शाम 3.45 तक पहला शिफ्ट और शाम 3.45 से लेकर रात 12.30 तक दूसरा शिफ्ट. अगर मज़दूर 7.31 बजे सुबह पहुंचा तो उसका हाफ डे लग जाएगा. रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति मज़दूरों को बताता है कि चूंकि पंचिंग कार्ड के जरिए अंदर आने और जाने का वक़्त नोट किया जाता है इसलिए एक सेकेंड की भी देरी होने पर कंप्यूटर उसे पकड़ लेता है और देरी से आने का खामियाजा मज़दूरों को भुगतना पड़ता है. कितनी मासूम दलील है! मशीन का अपने पक्ष में इस्तेमाल की इस बानगी के क्या कहने! एक दूसरा पक्ष सोचते हैं. पिछले कुछ महीनों की लड़ाई के बाद कंपनी में यह नियम बना कि मज़दूरों को ला रही बस में अगर देरी होती है तो उस देरी को कन्सीडर नहीं किया जाएगा. बस लेट होने पर भी मज़दूर पंचिंग कार्ड के जरिए ही अंदर जाते हैं और कंप्यूटर में ही वो समय भी दर्ज होता है. कंप्यूटर इस देरी को नहीं पकड़ता? प्रबंधन की बेईमान व्याख्या की यह एक नज़ीर मात्र है. बस में होने वाली देरी का भी कंपनी खामियाजा वसूलती है, लेकिन भुक्तभोगी पहले शिफ्ट में काम कर रहे मज़दूर बनते हैं. अगर बस लेट हो गई तो पहले वाली शिफ्ट को उस समय तक काम करना पड़ेगा जब तक बस नहीं आ जाती और इसका कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा. ओवरटाइम सिर्फ तब मिलेगा जब बस आने के बाद भी मज़दूरों से कंपनी काम जारी रखे.
एक छुट्टी पर मज़दूरों के 1200 रुपए कट जाते हैं और तीन-चार छुट्टियों पर आधे महीने का पैसा. कोई सिक लिव नहीं. बीमार होने पर कुछ अस्पताल तय किए गए है सिर्फ उन्हीं में इलाज कराने के एवज में कुछ फ़ीसदी भुगतान किए जाते हैं. बाक़ी अस्पतालों में ईलाज पर कोई भुगतान नहीं होता. फिर अस्पताल बिल की गहरी जांच होती है कि बिल का पैसा कितना वास्तविक है कितना नहीं. मारुति को अगर लगे कि टायफाइड 1500 रुपए में ठीक हो सकता है तो डॉक्टरी चक्कर में 15,000 लुटाने के बावज़ूद मज़दूरों को 1500 रुपए का ही आधा या आधे से ज़्यादा पैसों का भुगतान किया जाएगा.
मज़दूरों को शुरुआती तीन साल प्रशिक्षण में गुजारने होते हैं और इस दौरान क्रमश: 7, 8 और 9 हज़ार का वेतन दिया जाता है. प्रशिक्षण ख़त्म होने पर वेतन 16,000 रुपए है. इसके बाद ही मज़दूरों को मतदान का अधिकार मिल पाता है. मौजूदा प्रतिरोध को हतोत्साहित करने के लिए मारुति ने यह दावा किया है कि यदि सोमवार तक सारे मज़दूर गुड कंडक्ट फॉर्म भरने को तैयार नहीं होते तो सारे मज़दूरों को बर्खास्त कर दिया जाएगा और कंपनी नए मज़दूरों को बहाल करेगी. 2500 मज़दूरों में से अब तक सिर्फ 20-30 लोगों ने ही यह फॉर्म भरा है और अंदर जाने के हक़दार बने हैं. जाति-धर्म के आधार पर भी मज़दूरों को बांटने की कोशिश हो रही है. प्रबंधन के लोग ऐसे मज़दूरों की तलाश में रहते हैं जो समान जाति और धर्म वाले हों. उन्हें जाति का हवाला देकर पक्ष में करने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन मज़दूरों ने नारा बुलंद किया है कि वे ऐसी हर कोशिश को नाकाम करेंगे. उनका मानना है कि उनकी एक ही जाति और धर्म है और वो है उनका मज़दूर होना. मारुति ने दावा किया है कि बीते 1 सितंबर को उसने कुछ नए लोगों के सहारे 80 कार बनाकर बाज़ार में उतारा है. मज़दूरों का मानना है कि अव्वल तो यह मुश्किल है कि बिना ट्रेंड मज़दूरों के सहारे कंपनी इतनी कारें बना लें. दूसरा अगर कंपनी ने रिस्क लेते हुए यह काम किया भी है तो सड़क पर वे गाड़ियां दुर्घटना की बारंबारता को और बढ़ाने में मदद करेगी क्योंकि सही गुणवत्ता को परख पाना नए लोगों के लिए टेढ़ी खीर है. सड़क दुर्घटना की गंभीरता को दिखाती एक रिपोर्ट का मैं ज़िक्र करना चाहूंगा जिसमें कहा गया है कि बीती सदी में सबसे ज़्यादा मौत ऑटोमोबाइल से होने वाली दुर्घटनाओं से हुई है (रिपोर्ट मिलने पर उपलब्ध कराउंगा).
इस समय मानेसर का यह पंडाल मज़दूर आंदोलन का सबसे गरम पंडाल है. यहां के मज़दूरों में ग़ज़ब की ऊर्जा है. जब नारे लगते हैं और सड़क के उस पार मारुति-सुजुकी के प्लांट की भीतरी दीवारों से टकराकर आवाज़ वापस लौटती है तो उस गूंज को सुनकर मज़दूर और ज़ोर का हुंकार भरते हैं. एक थकता है तो दूसरा माइक थाम लेता है. इस तरह दो शिफ्ट में लोग लगातार जमे रहते हैं. कंपनी की तरह यहां भी एटैंडेंस लगता है ताकि मज़दूरों को पता चल सके कि कितने लोग सक्रिय तौर पर उनके साथ हैं और कितने टूट रहे हैं और कितने दलाल बन रहे हैं, बिक रहे हैं. यहां सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक एक शिफ्ट और शाम 7 से सुबह 7 तक दूसरी शिफ्ट में मज़दूर मोर्चा संभाले रहते हैं. यहां सोनू नाम के कई मज़दूर हैं. कम से कम तीन से तो मैं ही मिला. जो दूसरा सोनू है वह सोनू गुज्जर के भाषणों के बीच में लोगों के बीच जोश भरने के लिए जोरदार नारे लगाता रहता है. लगातार. बिना थके.
सोनू गुज्जर ने बताया है कि मानेसर और गुड़गांव के 40-50 कंपनियों की लीडरशिप ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है और गुड़गांव चक्का जाम में वे उनके साथ आएंगे. कुछ सांसदों का भी उन्हें समर्थन हासिल है. सोनू ने कहा कि उन लोगों ने 14 दिनों तक गांधी बन कर देख लिया है, अब ज़रूरत पड़ेगी तो भगत सिंह भी बनेगे. मज़दूरों को उन्होंने याद दिलाया कि भगत सिंह को 23 साल की उम्र में फांसी हो गई थी और उनके यहां तक़रीबन सारे मज़दूर 23 वर्ष से ज़्यादा के हैं. इसलिए इतिहास को यदि दोहराना होगा तो दोहराएंगे. झुकेंगे नहीं.
सोनू गुज्जर ने मज़दूरों और मज़दूर हित में रहने वाले सभी लोगों से यह आह्वान किया है - लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाएं.