10 मार्च 2008

क्रांति की चेतना :-



सभी क्रांतिकारियों को निश्चित तौर पर मार्क्सवादी होना चाहिए, क्योंकि माक्सर्वाद मजदूर वर्ग की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है.

-जॉर्ज हब्बाश



फलस्तीनियों के बेवतन होने के 50 वें साल में उनके हकीम ने उन्हें अलविदा कह दिया. यह पूरी दुनिया के जनसंघर्षों, छापामार योद्धाओं और मार्क्सवादी-लेनिनवादी क्रांतिकारियों के लिए एक उदास कर देनेवाली खबर थी. यह हर तरह के शोषण के खात्मे और बराबरी का सपना देखनेवाले लोगों के लिए आंसुओं से भरी हुई खबर थी-आंसुओं, खून और पसीने से भरी हुई, जो जॉर्ज हब्बाश उर्फ हकीम के जीवन का हिस्सा रहे. जॉर्ज हब्बाश नहीं रहे. 82 साल की उम्र में जब उन्होंने अपनी आंखें बंद कीं, उनके वतन के 40 लाख लोग-एक पूरा का पूरा देश-अपनी अनेक पीढियों के शोक, पीडा और अपराजेय लडाइयों के साथ अब भी निर्वासित, बेघरबार और बेजमीन बने हुए हैं. वे एक ऐसे देश के बाशिंदे हैं, जिसकी अपनी कोई जमीन नहीं रही. उनकी जमीन उनसे छीन कर एक दूसरे देश को दे दी गयी और वह दूसरा्व देश लगातार अपनी घेराबंदी उनके चारों ओर कसता जा रहा है.
हब्बाश 2 अगस्त, 1926 को लिड्डा में जन्मे थे. उनका परिवार एक यूनानी ऑर्थोडॉक्स ईसाई परिवार था. उनका परिवार व्यापार करता था और काफी संपन्न था. जब हब्बाश 10 वर्ष के थे, 1936 में विद्रोह और क्रांतिकारी संघर्ष से उनका पहला परिचय हुआ. यह महान फलस्तीनी विद्रोह के फूट पडने का दौर था. बाद में, अभी से लगभग 10 साल पहले एक इंटरव्यू के दौरान हब्बाश ने उन दिनों को याद किया. उन्होंने याद किया कि किस तरह फलस्तीनी राष्ट्रवादी आंदोलनकारी ब्रिटेन के खिलाफ बडे विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया करते थे. उन्होंने उन शिक्षकों को याद किया, जिन्होंने उन सबमें संघर्ष की भावना भरी थी और अपने छात्रों को अपनी मातृभूमि के लिए संघर्ष को प्रोत्साहित किया था. हब्बाश ने उन्हें भी याद किया था, जिन्होंने दुनिया के इस सबसे लंबे युद्ध में अपनी जमीन और अपने लोगों के लिए महान शहादतें दीं.

जॉर्ज हब्बाश उन्हीं शहादतों, उन्हीं संघर्षों, उन्हीं लडाइयों और मुक्ति के उन्हीं सपनों की उपज थे. 1948 में हब्बाश अपने परिवार के साथ एक शरणार्थी बन गये, जब इस्राइल की स्थापना की गयी और फलस्तीन में जायनिस्ट हमलावर घुस आये. लाखों फलस्तीनी अपने घरों से जबरन खदेड दिये गये. फलस्तीनियों के जेहन में यह घटना अल नकबा के नाम से याद है।

हब्बाश के परिवार को लेबनान में शरण लेनी पडी. वहां रहते हुए हब्बाश का नामांकन बेरूत स्थित अमेरिका विश्वविद्यालय में हो गया, जहां उन्होंने मेडिकल की पढाई की. एक बातचीत में हब्बाश ने तबके लेबनानी राष्ट्रपति डॉ बायर्ड डोडगे की बातों को याद किया है-वे हमसे कहते कि हमें अमेरिका के बारे में बताओ जो कि इंसाफ, आजादी और मानवतावादी उसूलों के लिए खडा है. लेकिन हम उनकी बातों में, जो वे अमेरिका के बारे में कह रहे होते और अमेरिका जो कर रहा होता-इस्राइल और यहूदीवाद का समर्थन-में विरोधाभास देखते.

हब्बाश ने 1951 में मेडिकल की अपनी पढाई पूरी की. उन्होंने कुछ समय तक प्रैक्टिस भी की. उन्होंने उन दिनों अपनी जन्मभूमि लिड्डा की यात्रा की, जब वह एक जायनिस्ट हत्यारे गिरोह के कब्जे में थी. शहर पर इस्राइली सुरक्षा बलों द्वारा चलाये जा रहे हगाना नामक गिरोह की मदद से शासन कर रहे उक्त जायनिस्ट गिरोह ने शहर को लगभग श्मशान में तबदील कर दिया था. शहर के 20 हजार बाशिंदों का सफाया कर दिया गया. अब हम इस घटना को लिड्डा डेथ मार्च्व के नाम से जानते हैं. इस्राइली इतिहासकारों के अनुसार इसमें सिर्फ 335 आदमी, औरतें और बच्चे मारे गये, जबकि अन्य स्रोत इससे कहीं अधिक की संख्या बताते हैं. इस घटना के पहले 426 लोगों की हत्या जायनिस्ट बलों ने कर दी थी. विस्थापित फलस्तीनी जॉर्डन में शरण ले रहे थे. हब्बाश जॉर्डन स्थित इन शरणार्थी शिविरों में डॉक्टर के रूप में काम कर रहे थे. यहां रोज उनका सामना निर्वासन के कठोर जीवन और इस्राइली क्रूरता से होता. धीरे-धीरे वे मिस्र के राष्ट्रपति कमाल अब्दुल नासिर के अखिल अरब राष्ट्रवाद्व के करीब आये.

1957 में उन्हें जॉर्डन छोडने पर मजबूर होना पडा, क्योंकि तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. इसके लगभग एक साल बाद, 1958 में अमेरिका विवि, बेरूत के पूर्व छात्रों को लेकर हब्बाश ने अरब नेशनलिस्ट मूवमेंट शुरू किया. जो कि अम्मान और जॉर्डन में सक्रिय था. उनकी कोशिश थी कि इस्राइल के विरुद्ध सारा अरब जगत एक हो जाये.

1967 में इस्राइल-अरब के बीच छह दिवसीय युद्ध हुआ, जिसने मध्यपूर्व के भावी इतिहास की दिशा तय की. इस युद्ध में अरबों की पराजय हुई और इस्राइल ने पूर्वी येरुशेलम, पश्चिमी तट और गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया.
इलाके में बढते इस्राइली प्रभाव, मध्यपूर्व में अमेरिकी हस्तक्षेप, इस्राइल को खुली अमेरिकी मदद और अरब जगत पर विभिन्न रूपों में जायनिस्ट हमलों ने हब्बाश के लिए यह साफ कर दिया कि शांतिपूर्ण और समझौतावादी संघर्षों से कुछ नहीं होनेवाला. उन्होंने फलस्तीन की मुक्ति के लिए नये तरह के युद्ध की जरूरत समझी और पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ पैलेस्टाइन्व (पीएफएलपी) नामक मशहूर संगठन की बुनियाद रखी।






हब्बाश के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की समझ और घटनाओं के आपसी अंतर्संबंध इतने साफ थे कि वे मध्यपूर्व में साम्राज्यवाद के अस्तित्व, उसके स्वरूपों, उसके उत्पीडन और उसके खिलाफ निर्णायक युद्ध की जरूरत को मध्यपूर्व के किसी भी नेता से अधिक समझ रहे थे. इसलिए उन्होंने सिर्फ फलस्तीन की मुक्ति तक ही अपने को सीमित नहीं रखा. वे यह जानते थे कि उनका देश साम्राज्यवाद के मंसूबों के तहत उत्पीडन का शिकार है और इसके पतन के बगैर फलस्तीन आजाद नहीं हो सकता. इसके लिए पूरे अरब जगत और पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ संघर्षों की जरूरत और उनसे फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष की एकता के महत्व को उन्होंने समझा. यही वजह रही कि हब्बाश के पीएफएलपी ने पीएलओ के एक और घटक फतह से बिल्कुल भिन्न रास्ता अपनाया. फतह ने अपने को फलस्तीनी चरित्र दिया और उसने अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही सशस्त्र संघर्ष का सहारा लिया और इसके साथ-साथ कूटनीतिक कार्रवाइयां जारी रखीं. इसके उलट पीएफएलपी ने आरंभ से ही क्रांतिकारी कार्रवाइयों को अपनाया.

हब्बाश ने अपने को वैचारिक तौर पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद से समृद्ध किया. उन्होंने अपने उेश्यों के लिए क्रांतिकारी हिंसा का रास्ता चुना, जिसके बारे में उन्होंने 1967 में पीएफएलपी के उद्धाटन वक्तव्य में कहा-क्रांतिकारी हिंसा एकमात्र भाषा है, जिसे दुश्मन समझता है. पीएफएलपी ने जायनिस्ट दुश्मन के खिलाफ संघर्ष को ऐतिहासिक कार्यभार घोषित किया और उनके द्वारा कब्जा की हुई भूमि को नरक में बदल देने का आह्वान किया. 1969 में पीएफएलपी ने खुद को एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी आंदोलन घोषित किया और यह एलान किया कि वह साम्राज्यवाद और अरब प्रतिक्रियावाद के खिलाफ लडेगा. पीएफएलपी ने फलस्तीन को मुक्त करने के संघर्ष को व्यापक राजनीतिक-सामाजिक क्रांति के एक हिस्से के तौर पर देखा.

हब्बाश का कहना था कि फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष सिर्फ फलस्तीन को यहूदीवादियों से मुक्त कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उेश्य अरब जगत को पश्चिमी औपनिवेशिक ताकतों से मुक्त कराना भी है. इसके अलावा उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि इस्राइल पर विजय तभी हासिल हो सकती है जब पारंपरिक अरब सरकारें क्रांतिकारी शासन द्वारा हटा दी जायें.

60 का दशक दुनिया की उत्पीडित जनता के लिए सबसे सौभाग्यशाली दशकों में से था. यह वह दौर था जब दुनिया के अनेक देशों में उत्पीडित जनता साम्राज्यवादी, सामंती और उत्पीडक शासकों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्षों के नये-नये रूप तलाश रही थी और नये मोरचों पर अपने दुश्मनों को मात दे रही थी. भारत में नक्सलबाडी के रूप में एक सुव्यवस्थित क्रांतिकारी आंदोलन जन्म ले रहा था, चीन माओ के नेतृत्व में सांस्कृतिक क्रांति के दौर से गुजर रहा था और वियतनाम में उसकी बहादुर जनता के अपराजेय प्रतिरोध के कारण अमेरिका अपने इतिहास के सबसे अपमानजनक पराजय की ओर बढ रहा था. पेरिस में भी छात्रों का आंदोलन उभर रहा था. जॉर्ज हब्बाश के नेतृत्व में पीएफएलपी इन संघर्षों की उत्तेजना और तकनीक से कटा हुआ नहीं था. वह उनसे सीख रहा था और समृद्ध हो रहा था. इसी दौर में पीएफएलपी ने चीन और वियतनाम के गुरिल्ला युद्ध से गुरिल्ला तकनीक अपनायी और फलस्तीन-अरब मुक्ति संघर्ष में एक नये दौर की शुरुआत हुई.

हब्बाश का मानना था कि फलस्तीन की मुक्ति के लिए चीन और वियतनाम के रास्ते उपयुक्त हैं. हालांकि एक समय हब्बाश फिदायीन हमलों के बडे विरोधी रहे थे. लेकिन नयी परिस्थितियों में उन्होंने पाया कि गुरिल्ला युद्ध एक अनिवार्यता हो गया है. इस कारण से हो रही हिंसा के बारे में पूछने पर वे कहते-हमें दोष मत दो, दोष इस्राइलियों को दो जो हमारे युद्ध के स्वरूप को बिगाडने की कोशिश करते हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ सहित दुनिया की बडी ताकतों ने इस्राइल की स्थापना करने के बाद फलस्तीनियों को भुला दिया था. उनके लिए मानो फलस्तीनियों की व्यथा और उनका नारकीय-गुलामीभरा जीवन था ही नहीं. उनके संघर्षों की ओर और उनकी पीडा की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता था. 1970 में पीएफएलपी ने दुनिया का ध्यान फलस्तीन संघर्ष की ओर आकर्षित करने के लिए उग्र रणनीति अपनायी. उसके योद्धाओं ने दो वायुयानों को हाइजैक किया और नष्ट कर दिया.

हब्बाश का कहना था कि जब हम एक हवाई जहाज हाइजैक करते हैं तो यह सौ इस्राइलियों को युद्ध में मारने से ज्यादा प्रभावकारी होता है...दशकों से विश्व जनमत न तो फलस्तीन के पक्ष में और न इसके खिलाफ रहा है. उन्होंने सामान्यतः हमें नजरअंदाज किया है. कम से कम अब दुनिया हमारे बारे में बात तो करती है. वे कहते-इस्राइली बिना अमेरिकी समर्थन के कुछ भी नहीं कर सकते हैं. वे उस सबके जिम्मेवार हैं, जो हमारे शिविरों में हो रहा है. फलस्तीनी शरणार्थी शिविर यहूदियों के लिए बने नाजी यातना शिविरों से थोडे बेहतर हैं. हालांकि बाद में पीएफएलपी ने पश्चिमी सरकारों पर हमलों की रणनीति को त्याग दिया लेकिन उसने इस्राइली आक्रमणकारियों पर ऐसे हमले जारी रखे.फलस्तीननियों1980 में हब्बाश को दिल का एक दौरा पडा और उन्हें मजबूरी में कामकाज से अलग होना पडा. 1990 में वे सीरिया और जॉर्डन में रहे. 1993 में जब यासर अराफात ने ओस्लो समझौता किया तो पीएफएलपी ने अराफात पर आरोप लगाया कि वे फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष को बेच आये हैं. इस समझौते के तहत पीएलओ ने उन इलाकों में जिन पर इस्राइल ने 1967 के बाद से अधिकार कर लिया था, फलस्तीनी प्राधिकार के गठन के साथ सीमित शासन को स्वीकार कर लिया. यह फलस्तीनी मुक्E0��ि आंदोलन के पारंपरिक उेश्य-फलस्तीन से एक इस्राइली यहूदी राज्य की जगह एक लोकतांत्रिक, धर्मनरिपेक्ष राज्य के गठन जिसमें सभी धर्मों-मूलों को लोग समानता के साथ रह सकें-से पीछे हटना था. इस समझौते में उन फलस्तीनियों को लिए कोई चिंता नहीं दिखती थी, जो दूसरे देशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे. उनके लौटने का कोई प्रावधान इसमें नहीं था और न ही यह इस्राइल पर किसी भी तरह बाध्यकारी था कि वह फलस्तीनियों को उनके अधिकार सौंपे. वे इस बात को समझते थे कि ओस्लो समझौते के बाद पीएलओ अरबों का समर्थन खो देगा, क्योंकि इस समझौते में अरब-इस्राइल विवाद के केंद्र में नहीं रखा गया है और मामले के केवल फलस्तीन तक सीमति रखा गया है. वे इससे चिंतित थे कि यह समझौता फलस्तीनी एकता को खत्म कर देगा. ओस्लो समझौते के विरोध के लिए पीएफएलपी ने ब्लॉक-10 नामक समूह बनाया, जिसमें इसके अलावा हमास और इस्लामिक जेहाद समेत नौ और संगठन थे. फलस्तीनी प्राधिकार के गठन के बाद भी हब्बाश ने कभी भी उसे मान्यता नहीं दी और न उसके अधिकार क्षेत्र में आनेवाली भूमि पर कदम रखे.

1998 में एक साक्षात्कार में हब्बाश ने कहा था- इस्राइलियों के साथ काम करने की कूटनीति के लिए कोई जगह नहीं है.हब्बाश यासर अराफात से कभी भी सहमत नहीं रहे. उन्होंने अराफात पर आरोप लगाया कि अराफात ने यहूदीवाद के असली चरित्र को भुला दिया है और ओस्लो समझौते के परिणाम फलस्तीनी लोगों के लिए त्रासद रहेंगे. हब्बाश उन संगठनों के नजदीक थे जो सशस्त्र संघर्ष में यकीन रखते थे. उनका कहना था- हम हमास से जुडे हुए हैं. हरेक फलस्तीनी को अपने घर, अपनी जमीन, अपने परिवार और अपने सम्मान के लिए लडने का अधिकार है-ये उसके अधिकार हैं. अंत-अंत तक उन्होंने इसके कोई संकेत नहीं दिये कि उनका फ्रंट सैन्य कार्रवाइयों को स्थगित करने का इरादा रखता है. वे कहते-सशस्त्र संघर्ष विवाद की प्रकृति पर निर्भर करता है-जो कि दुश्मन की प्रकृति द्वारा तय होता है.

अपने अंतिम दिनों में हब्बाश ने युद्धरत फलस्तीनी धडों की एकता और गाजा की दीवारबंदी के खिलाफ युद्ध के लिए आह्वान किया. हब्बाश कहते थे-अरब राष्ट्रवाद और स्थानीय सक्रियता के बीच जुडाव जरूरी है.

आज हब्बाश अम्मान के एक कब्रिस्तान में गहरी नींद सो रहे हैं. उनके सम्मान में फलस्तीनी राष्ट्रीय झंडा झुका रहा और फलस्तीनियों ने शोक मनाया. वे जीवनपर्यंत फलस्तीन की क्रांति के नायक रहे. यहां तक कि वे लोग भी, जो हब्बाश से असहमत थे, वे हब्बाश को फलस्तीनी क्रांति की चेतना कहते थे. वे एक ईसाई थे और उनका संघर्ष फलस्तीनी मुक्ति संघर्ष के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को रेखांकित करता है.
जॉर्ज हब्बाश अपने फलस्तीन को कभी मुक्त हुआ नहीं देख सके, लेकिन उन्होंने फलस्तीनी जनता में और उसकी संघर्षचेतना में कभी यकीन भी नहीं खोया. फलस्तीन कासपना, आजादी और बराबरी का सपना, प्रतिरोध और संघर्ष की परंपरा जब तक जिंदा रहेगी, जॉर्ज हब्बाश उर्फ हकीम जिंदा रहेंगे...और दुनिया उस तरह मुक्त होगी, जिस तरह उन्होंने चाहा था-मार्क्सवाद-लेनिनवाद के रास्ते पर, मजदूरों, किसानों और व्यापक जनता के निर्णायक संघर्षों के जरिये।
from hashiya blog
पूरी दुनिया की आधी दुनिया को उनके अधिकार की आवाज को ऊँचा करने वाली सीमोन द बोउवार ः-







यह वर्ष प्रसिद्ध नारीवादी विचारक, लेखक और एक्टिविस्ट सिमोन द बोउवार का जन्मशती वर्ष है।उनका जन्म 9 जनवरी 1908 को पेरिस फ्रांस में हुआ।सिमोन ने दार्शनिक, राजनैतिक और अन्य सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी जिनमें ‘द सेकेंड सेक्स’ सबसे अधिक चर्चित रही।इस किताब में उन्होने स्त्री शरीर और मन के बारे में पितृसत्ता द्वारा बनाए गए तमाम मिथकों और पारंपरिक विश्वाशों को खुली चुनौती दी। उन्होने सिद्ध किया कि स्त्री पैदा नहीं होती वरन बना दी जाती है।उन्होने बताया की पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के चरित्र व प्रकृति को जान बूझ कर एक रहस्य के आवरण में पेश किया जाता है। जिससे समाज में उसकी हैसियत एक ‘अन्या’ की बना दी जाती है। ‘द सेकेंड सेक्स’ का हिन्दी अनुवाद प्रभा खेतान ने ‘स्त्री उपेक्षिता’ शीर्षक से किया है। सिमोन जीवनपर्यंत स्त्रियों की मुक्ति व मानवजाति कि बेहतरी के लिए संघर्षरत रहीं। हम उनके जन्मशताब्दी वर्ष पर सभी छात्रों से उनकी रचनाओं का अध्ययन करने व उन पर विचार गोष्टियाँ आयोजित करने के अलावा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम लेने का आह्वान करते हैं। हम आने वाली पोस्टों में उनकी इंटरनेट पर उपलब्ध कुछ रचनाओं का लिंक प्रेषित करेंगे। साभार:- परिसरवर्डप्रेस

26 फ़रवरी 2008


कैद में अधिकार:-

डॉक्टर और असाधारण मानवाधिकारकर्ता डॉ बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले नौ महीनों से अमानवीय कानूनों की आड़ में सलाखों के पीछे रखा हुआ है. उनकी कहानी दरअसल उस दरकती हुई जमीन की कहानी है जिसपर हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों की इमारत टिकी है. शोमा चौधरी की रिपोर्ट साभार तहलका.
दिल्ली और मुंबई की भव्यता से परे, चमचमाते मॉल्स और हिचकोले खाते शेयर बाजार की सुर्खियों से कहीं दूर एक भला इंसान जेल में अपनी रिहाई का इंतजार कर रहा है. उसके बारे में थोड़ी-बहुत खबरें आई हैं. कुछ अखबारों में, कुछ टीवी चैनलों पर. फिर भी जादू-टोने, तंत्र-मंत्र, चमत्कार, बाजार, फिल्मस्टार, एसएमएस पोल आदि से अभिभूत मीडिया में अगर डॉ बिनायक सेन का जिक्र हुआ भी होगा तो इस बात के आसार कम ही हैं कि उसने आपका ध्यान खींचा हो.

बिनायक सेन की कहानी दरअसल उस दरकती हुई जमीन की कहानी है जिस पर हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों की इमारत खड़ी है. ये कहानी है भारत के लोक और तंत्र, शहर और गांव, विकास और इंसानी जरूरतों, अंधे कानून और प्राकृतिक न्याय के बीच आ चुकी और बढ़ रही दरार की. ये उस भारत की कहानी है जिसे जोड़ने वाली डोरी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है. ये उस अन्याय की दास्तान भी है जो हजारों निर्दोष लोगों के साथ होता है और जिसकी खबर किसी को नहीं लगती. ये उस बेइंसाफी का सच भी है जो कल आपके और मेरे साथ होने का इंतजार कर रही है. और सबसे ज्यादा ये उस डरावनी हकीकत का पर्दाफाश करने वाली दास्तान है कि जब सरकार खुद को ही खतरे में बताने लगे तो साधारण लोगों के साथ क्या हो सकता है. पढ़ाई पूरी करने के बाद इस प्रतिभाशाली नौजवान के सामने करिअर के शानदार विकल्प थे. वो विदेश जा सकता था या फिर यहीं ऊंची तनख्वाह वाली कोई नौकरी कर बढ़िया जिंदगी गुजार सकता था. मगर उसने एक ऐसी मुश्किल राह चुनी जिस पर चलने की हिम्मत कम ही लोग करते हैं.

मगर सबसे पहले कहानी के तथ्य.

पेशे से बच्चों के डॉक्टर और जाने-माने क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी), वेल्लोर से गोल्ड मेडेलिस्ट, 56 वर्षीय बिनायक सेन वो शख्स हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ के गरीब आदिवासियों के बीच में कुपोषण, टीबी और घातक मलेरिया से लड़ते हुए लगभग तीन दशक बिताए हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद इस प्रतिभाशाली नौजवान के सामने करिअर के शानदार विकल्प थे. वो विदेश जा सकता था या फिर यहीं ऊंची तनख्वाह वाली कोई नौकरी कर बढ़िया जिंदगी गुजार सकता था. मगर उसने एक ऐसी मुश्किल राह चुनी जिस पर चलने की हिम्मत कम ही लोग करते हैं. सेन ने छत्तीसगढ़ के होशंगाबाद में एक ईसाई संस्था द्वारा चलाए जा रहे ग्रामीण चिकित्सा केंद्र में अपनी सेवाएं देने का फैसला किया. यहां वो महात्मा गांधी के जीवनी लेखक मारजोरी साइकस से काफी प्रभावित हुए. उनके दिल में जनस्वास्थ्य, पर्यावरण के अनुकूल विकास और न्यायमूलक समाज का सपना पलने लगा. पढ़ाई के दौरान वेल्लोर की झुग्गियों में भ्रमण करते हुए सेन को ये अहसास हो गया था कि आजीविका, रहन-सहन और स्वास्थ्य में एक अहम संबंध है. इसका और गहराई से अध्ययन करने के लिए उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से सोशल मेडिसिन में डिग्री ली और 1981 में होशंगाबाद में खान मजदूर संघ के मशहूर नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ काम करने चले आए. यहां उन्होंने दालिराजहारा में शहीद अस्पताल की स्थापना में मदद की जिसे मजूदरों ने अपने पैसे से बनाया था. बाद में वो तिल्दा के मिशन हॉस्पिटल से जुड़ गए. 1990 में सेन ने अपनी पत्नी इलिना सेन के साथ रायपुर में रूपांतर नाम के एक एनजीओ की स्थापना की. पिछले 18 सालों से ये संगठन ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देने और सुदूर इलाकों में मोबाइल क्लीनिक चलाने का काम कर रहा है. वो पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज(पीयूसीएल) नाम के मानवाधिकार संगठन से भी जुड़े जिसकी स्थापना जयप्रकाश नारायण ने की थी.

बिनायक सेन का काम कितना असाधारण है इसका अंदाजा आपको तब होता है जब आप रायपुर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर धमतरी जिले में जंगलों से घिरे बागरुमाला और साहेलबेरिया इलाकों में जाते हैं. यहां आकर आपको ये अहसास होता है कि एक रिटायर कर्नल के होनहार बेटे को असाधारण जुनून ही ऐसी जगह पर ला सकता था. इस इलाके में बसे छोटे-छोटे गांवों में कमार और दूसरी जनजातियों के वो लोग बसते हैं जिनका शुमार भारत के सबसे उपेक्षित लोगों में किया जा सकता है. यहां सेन अपना मंगलवार क्लीनिक चलाते थे. स्कूल, पीने के पानी, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम और अपने जंगल के परंपरागत संसाधनों से लगातार वंचित किए जा रहे इन लोगों की जुबान पर बिनायक सेन की कई कहानियां हैं. उदाहरण के लिए लोग बताते हैं कि कैसे सेन ने लग्नी की जान बचाई जिसका गर्भपात हो गया था और उसका खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था. या किस तरह उन्होंने वन अतिक्रमण के आरोप में सामूहिक रूप से जेल में डाल दिए गए पिपरही भारही गांव के लोगों को बचाया. या फिर कैसे उन्होंने अनाज बैंकों की स्थापना में मदद की. कमार बस्ती में एक वृद्ध हमसे कहते हैं, “कुछ कीजिए. डॉक्टर को बचाइये. अब कोई ऐसा नहीं है जिसके पास हम जा सकें.”

सीएमसी वेल्लोर के निदेशक डॉ. सुरंजन भट्टाचार्य कहते हैं, “बिनायक ने एक अलग राह बनाई. वो डॉक्टरों की कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं. उन्होंने हमारी अंतरात्मा को झिंझोड़ा. उन्होंने हमें याद दिलाया कि एक स्वस्थ समाज बनाने के लिए आजादी, खाद्य सुरक्षा, आश्रय, समानता और न्याय जैसी कई चीजों की जरूरत होती है.” 2004 में सीएमसी वेल्लोर ने सेन को अपने प्रतिष्ठित पॉल हैरीसन अवार्ड से सम्मानित किया. इसमें सेन की प्रशंसा में ये शब्द कहे गए थे, “डॉ. बिनायक सेन सत्य और सेवा के प्रति अपने समर्पण को लड़ाई के अग्रिम मोर्चे तक ले गए हैं. उन्होंने सांचों को तोड़ा है और अपने मकसद को अपनी सुरक्षा से ऊपर रखकर एक बिखरे और अन्यायपूर्ण समाज में एक डॉक्टर की संभावित भूमिका को फिर से परिभाषित किया है. सीएमसी को बिनायक सेन से जुड़े होने पर गर्व है.”

इसके बावजूद, तीन साल बाद 14 मई 2007 को राज्य सरकार ने एक मानवाधिकारकर्ता और डॉक्टर के रूप में किए गए बिनायक सेन के लंबे और समर्पित कार्य को अनदेखा कर दिया. पुलिस ने पहले तो उन्हें नक्सली नेता घोषित कर दिया और बाद में गिरफ्तार कर लिया. उन पर आपराधिक षडयंत्र, राष्ट्रदोह और आतंक के ज़रिए मिले पैसे का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए. सेन की गिरफ्तारी के बाद से तीन अदालतें उन्हें जमानत देने से इनकार कर चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2007 को सेन को जमानत देने से इनकार कर दिया. ये भी विडंबना ही है कि इस दिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस था. अदालत में जिरह के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम और छत्तीसगढ़ सरकार के वकील का तर्क था कि भारत सरकार, बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में उग्रवाद की जांच कर रही है और बिनायक सेन इस नेटवर्क का एक अहम हिस्सा हैं. उनका कहना था कि सेन को ज़मानत देने से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. इस दावे के पक्ष में हास्यास्पद सबूत पेश किए गए. लोग बताते हैं कि कैसे सेन ने लग्नी की जान बचाई जिसका गर्भपात हो गया था और उसका खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था. या किस तरह उन्होंने वन अतिक्रमण के आरोप में सामूहिक रूप से जेल में डाल दिए गए पिपरही भारही गांव के लोगों को बचाया. या फिर कैसे उन्होंने अनाज बैंकों की स्थापना में मदद की. कमार बस्ती में एक वृद्ध हमसे कहते हैं, “कुछ कीजिए. डॉक्टर को बचाइये. अब कोई ऐसा नहीं है जिसके पास हम जा सकें.”.

बिनायक सेन के व्यक्तित्व और चरित्र का अंदाजा उनके बारे में लोगों के विचारों से भी लगाया जा सकता है. जब सुप्रीम कोर्ट ने सेन को जमानत देने से इनकार कर दिया तो उनके समर्थन में उमड़ी एक रैली में मौजूद एक वृद्ध का कहना था, “अगर अदालत ने हमारे डॉक्टर को नहीं छोड़ा तो हम जेल तोड़ देंगे. मगर क्या फायदा? सारे कैदी भाग जाएंगे और डॉ बिनायक फिर भी वहीं रहेंगे.”

इसके बावजूद सेन के शुभचिंतकों की तमाम कवायदें भी उन्हें जमानत नहीं दिला सकीं. न एम्स और सीएमसी के उन डॉक्टरों के शपथपत्र जो सेन से प्रेरणा लेकर उनकी राह चल निकले हैं और न ही दुनिया भर के 2000 डॉक्टरों के हस्ताक्षर. ये भी गौरतलब है कि सेन जनस्वास्थ्य पर सरकार द्वारा बनाई गई सलाहकार समिति के भी सदस्य रह चुके हैं. विडंबना देखिये कि सेन के गिरफ्तार होने के सात महीने बाद 31 दिसंबर 2007 को इंडियन अकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज ने उन्हें आर आर खेतान गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया. अकेडमी ने डॉ बिनायक सेन के काम की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा प्रचारित मूल्यों से की.

क्या ऐसे आदमी को जेल में ठूंसना अन्याय नहीं है. छत्तीसगढ़ पुलिस के डीजीपी विश्व रंजन जवाब देते हैं, “तो क्या हुआ? क्या कोई मानवतावादी और आदर्शवादी, माओवादी नहीं हो सकता.” समझा जा सकता है कि राज्य सरकार के काम करने का तरीका क्या है.

सबसे ज्वलंत सवाल ये है कि बिनायक सेन को गिरफ्तार क्यों किया गया? ऐसा क्या हुआ कि सरकार के लिए उनकी पहचान बदल गई और उन्हें सलाखों के पीछे ठूंस दिया गया? एक नजर डालते हैं.

दो साल पहले जनवरी 2006 में आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में नारायण सान्याल नाम के एक माओवादी नेता को गिरफ्तार किया गया. 67 साल के सान्याल हाथ में गंभीर दर्द की एक बीमारी से पीड़ित थे जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में पामर्स कांट्रेक्चर कहा जाता है. जब सान्याल को वारंगल जेल से जमानत मिल गई तो जेल अधिकारियों ने उन्हें इस बीमारी का इलाज कराने की इजाजत दे दी. इसके तुरंत बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने उन्हें दंतेवाड़ा में हुए एक कत्ल के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और रायपुर जेल में डाल दिया. मई 2006 में कोलकाता में रह रहे सान्याल के बड़े भाई राधामाधव ने पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के महासचिव बिनायक सेन को एक पत्र लिखा और उनसे सान्याल के लिए वकील और चिकित्सा का इंतजाम करवाने की अपील की. इस पत्र की प्रतियां उन्होंने कई मानवाधिकार संगठनों को भी भेजीं. क्षेत्र के सबसे सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में से एक बिनायक ने इस मामले में हस्तक्षेप किया. उन्होंने अपने फ्लैट के सामने रह रहे एक वकील भीष्म किंजर को सान्याल का केस लेने को राजी किया. साथ ही उन्होंने सान्याल की शल्यक्रिया के लिए जेल अधिकारियों को पत्र लिखना भी शुरू किया. बूढ़े और खुद भी बीमार राधामाधव का कोलकाता से रायपुर आना और भी कम होता गया. वो निश्चिंत थे कि सेन उनके भाई का ख्याल रखेंगे.

छह मई 2007 को रायपुर पुलिस ने अचानक पीयुष गुहा नामक कोलकाता के एक व्यापारी को गिरफ्तार किया. गुहा राधामाधव का परिचित था जो किंजर की फीस के 49,000 रुपये राधामाधव से लेकर सेन को देने जा रहा था. पुलिस ने दावा किया कि उन्हें गुहा से तीन अहस्ताक्षरित पत्र भी मिले हैं जिन्हें मिस्टर पी, दोस्त वी और दोस्त को संबोधित किया गया था और जिनमें जेल की परिस्थितियों,
उम्र, जोड़ों के दर्द आदि जैसी चीजों की शिकायत की गई थी. पुलिस को यकीन था कि ये पत्र सान्याल के लिखे हुए हैं और इनके मुताबिक इनमें किसानों और शहरी केंद्रों में काम का विस्तार करने की सलाह दी गई थी. साथ ही इसमें नवीं कांग्रेस के सफलतापूर्ण आयोजन पर बधाई भी दी गई थी. हास्यास्पद रूप से पुलिस ने इन पत्रों को विस्फोटक बताया. पुलिस के मुताबिक गुहा ने माना था कि उसे ये पत्र सेन ने दिए थे जो जेल में बंद नक्सलियों के लिए अवैध पत्रवाहक का काम कर रहे हैं. मगर जैसे ही गुहा को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो उसने और ही बात कही. उसने खुलासा किया कि असल में उसे एक मई को गिरफ्तार किया गया था और पांच दिन तक अवैध रूप से हिरासत में रखकर और यातनाएं देकर उससे एक खाली दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए गए.

इस तरह के हास्यास्पद सबूतों पर पुलिस ने सेन को भगोड़ा नक्सल नेता घोषित कर दिया. उस समय सेन अपनी बीमार मां को देखने कोलकाता गए हुए थे. स्थानीय मीडिया में ये खबरें छपीं. इसे सुनकर सेन भौचक रह गए. उन्हें विश्वास था कि पुलिस को जरूर कोई गलतफहमी हुई है. उन्हें भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा था. इसलिए शुभचिंतकों की राज्य में न जाने और अग्रिम जमानत लेने की सलाहों को उन्होंने दरकिनार कर दिया. अपने त्रुटिहीन रिकॉर्ड और बेकसूर होने को लेकर निश्चिंत सेन पुलिस की गलतफहमी दूर करने बिलासपुर पहुंचे. यहां पहुंचने पर पुलिस ने उनसे कहा कि उनका बयान लिया जाएगा और वो तारबहार थाने में रुक जाएं. सेन ने ऐसा ही किया और 14 मई 2007 को उन्हें छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून और गैरकानूनी गतिवधि (बचाव) एक्ट के तहत फौरन गिरफ्तार कर लिया गया. ये दोनों देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक हैं जिनमें किसी चीज के लिए सोचना ही आपको जेल पहुंचा सकता है. जैसाकि किंजर कहते हैं, “मुझे पता था कि जज ज़मानत देने से इनकार कर देंगे. अगर आप पर इन कानूनों के तहत मामला दर्ज हुआ है तो समझिए आपका काम-तमाम हो गया. ये कानून जजों के मन में एक तरह का पूर्वाग्रह पैदा करने के लिए बनाए गए हैं.”

सेन के खिलाफ अभियोजन पक्ष के मुख्य आरोपों में एक ये है कि सेन जेल में बंद नक्सल नेता सान्याल से 33 बार मिले हैं. चलिए कुछ पल के लिए इस बात को छोड़ देते हैं कि सान्याल ने ऐसा क्यों किया, सान्याल का स्वास्थ्य, शल्यक्रिया, उनके मामले की जटिलताएं...सब छोड़ देते हैं. एक पल को ये भी मान लेते हैं कि बिनायक नक्सलियों से अप्रत्यक्ष सहानुभूति रखते हैं. मगर यहां तथ्य ये है कि इन सभी मुलाकातों की न सिर्फ कानूनी रूप से अनुमति ली गई थी बल्कि ये पूरी निगरानी में भी हुईं थीं. क्या सिर्फ इससे ही सरकार को किसी व्यक्ति की आजादी छीनने का अधिकार मिल जाता है? अभियोजन पक्ष का ये दावा है कि बिनायक ने खुद को सान्याल का रिश्तेदार बताकर अधिकारियों को धोखे में रखा. लेकिन उनकी पत्नी ने सूचना का अधिकार कानून के तहत वो पत्र निकाले जिनमें सेन ने जेल अधिकारियों से सान्याल से मिलने की अनुमति मांगी थी. पता चला कि वो सभी पीयूसीएल के आधिकारिक लेटरहेड पर लिखे गए थे जिनमें सेन ने महासचिव के रूप में हस्ताक्षर भी किए थे.

बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद से ही पुलिस उनके खिलाफ हास्यास्पद सबूत ढूंढकर ला रही है. जैसे कि दो माओवादियों का एक दूसरे को लिखा गया प्रेमपत्र जिसमें बिनायक सेन का नाम है. इसके अलावा गोंदी में कथित रूप से एक मुठभेड़ स्थल पर मिला कागज का एक टुकड़ा जिसकी लिखावट शायद ही कोई पढ़ सके. पर पुलिस ने पाया है कि इसमें पीयूसीएल और छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून लिखा है. या फिर नक्सल नेता मदन बरकड़े द्वारा सेन को लिखी गई एक चिट्टी जिसमें जेल के हालात की शिकायत की गई है जिसे सेन ने मानवाधिकार संगठनों के पत्रों में प्रकाशित करवाया. हैरत है कि इन सबूतों में कुछ भी ऐसा नहीं जो साबित करे कि सेन को जमानत देना राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालना होगा.

सवाल है कि फिर क्यों सरकार सेन को सलाखों के पीछे रखने पर तुली है? क्यों एक भले डॉक्टर को भयानक अपराधी की तरह पेश किया जा रहा है? क्यों सेन के खिलाफ सबूत बनाए जा रहे हैं? उदाहरण के लिए डीजीपी विश्व रंजन दावा करते हैं कि पीयुष गुहा, सेन के खिलाफ उनका मुख्य सबूत हैं. मगर गुहा की गिरफ्तारी के कई हफ्ते बाद पुलिस उसे चार जून 2007 को अचानक पुरुलिया ले गई और थाना बंडवाना में हुए एक पुराने बम धमाके के मामले में उसे आरोपी बना दिया. गौरतलब है कि डेढ़ साल पहले अक्टूबर 2005 में जब इस मामले की मूल एफआईआर दर्ज हुई थी तो उसमें गुहा का नाम तक नहीं था. तो क्या ये गुहा को भी एक अपराधी का जामा पहनाने के लिए किया गया था? आखिरकार सेन का दामन काला करने की ऐसी कोशिशें क्यूं? बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद से ही पुलिस उनके खिलाफ हास्यास्पद सबूत ढूंढकर ला रही है. जैसे कि दो माओवादियों का एक दूसरे को लिखा गया प्रेमपत्र जिसमें बिनायक सेन का नाम है. इसके अलावा गोंदी में कथित रूप से एक मुठभेड़ स्थल पर मिला कागज का एक टुकड़ा जिसकी लिखावट शायद ही कोई पढ़ सके.

बिनायक सेन मामले की भयावहता को पूरी तरह से समझने और इस देश के लिए इसके मायने जानने के लिए आपको छत्तीसगढ़ पर गौर से निगाह डालनी होगी. बिनायक सेन की कहानी उनके जैसे सैकड़ों बेनाम लोगों की कहानी का एक उदाहरण मात्र है जो उस लड़ाई में फंस गए हैं जो सरकार ने अपने ही लोगों के खिलाफ छेड़ रखी है. उन तमाम लोगों की तरह ही सेन की व्यथा भी मानवाधिकारों के खुलेआम हनन की कहानी है. कई मामलों में छत्तीसगढ़ अब माओवादी विद्रोह का केंद्र बन गया है जिसकी जड़ें 13 राज्यों में फैली हैं. छत्तीसगढ़ में खुद सरकार का कहना है कि बस्तर और दंतेवाड़ा के ज्यादातर हिस्से उसके नियंत्रण से बाहर हैं. बिना शक ये गंभीर स्थिति है. हर साल पुलिस के सैकड़ों जवान, असहाय आदिवासी और पुल, जेल व टेलीफोन के खंभों जैसे सरकारी प्रतीक उग्रवादियों द्वारा उड़ा दिए जाते हैं. गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2007 में छत्तीसगढ़ में 311 लोगों की जानें गई. देश भर में ये आंकड़ा 571 रहा। माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले आपको बताते हैं कि उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन है- ये समर्थन किस हद तक ऐच्छिक है और किस हद तक दबाव में, इसके बारे में कोई भी साफ-साफ नहीं बोलता। माओवादियों के बारे में जानकारी पाने का सिर्फ एक ही रास्ता है कि वो खुद आपको जंगलों में अपने कैंप तक ले जाएं. ज़ाहिर है ऐसे में वहां से आपको सिर्फ चुनिंदा सूचनाएं ही हासिल होंगी. ये बात भी साफ है कि जो इलाके माओवादियों के प्रभाव वाले हैं उनकी सरकारों ने पूरी तरह से अनदेखी की हुई है. स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा, बिजली, आजीविका जैसी चीजें यहां कहीं नजर नहीं आतीं. कई जगह सरकार ऐसे विकास और औद्योगीकरण की हड़बड़ी में है जो कि स्थानीय लोगों की उम्मीदों और जरूरतों से मेल नहीं खाता.

अदूरदर्शिता के चलते भारत सरकार शिकायतों का इलाज हिंसा से और रोग का इलाज रोगी को मिटाकर कर रही है. कठोर क़ानून, अनगिनत अर्धसैनिक बल, पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए हज़ारों करोड़ के पैकेज और नक्सल प्रभावित राज्यों के लिए विशेष पैकेज. यानी कि सरकारी जवाब हिंसा की एक प्रतिस्पर्धी ज़मीन तैयार करने जैसा है. इसका उदाहरण है छत्तीसगढ़ में 2005 में ही सरकार प्रायोजित नक्सल विरोधी अभियान, जो अब सल्वा जूडम के नाम से कुख्यात है. इसने एक ग्रामीण को दूसरे ग्रामीण पर गोलियां चलाने के लिए तैयार कर एक अघोषित गृहयुद्ध को बढ़ावा दिया. सरकार ने 644 गांवों को जबरन खाली करवा कर वहां के लोगों को अमानवीय अवस्था में तंबुओं में रहने को मजबूर कर दिया. सरकार का नारा है कि उनके समर्थन को ही खत्म कर दो. मानवाधिकार कार्यकर्ता आपको बताएंगे कि सरकार का असल निशाना माओवादी नहीं बल्कि जमीन के नीचे प्रचुर मात्रा में मौजूद लौह अयस्क है जिसे वे नंदीग्राम की तर्ज पर निजी कंपनियों को सौंपने के लिए तैयार है.

ये अफवाहें भी उड़ रही हैं कि अस्थाई शिविरों को राजस्व गांवों में तब्दील कर दिया जाएगा और आदिवासियों द्वारा छोड़ी ज़मीनों को सरकार अपने कब्ज़े में ले लेगी. ये सब अभी भले ही कयास हों लेकिन सल्वा जुडूम की अति एक हकीकत है.

इसी का विरोध करने के लिए बिनायक सेन राज्य सरकार की आंखों की किरकिरी बन गए. उनके द्वारा उठाए गए मामलों में नारायण सान्याल का मामला शायद सबसे कम विवादित है. संतोषपुर फर्जी मुठभेड़, गोलापल्ली फर्जी मुठभेड़, नारायण खेरवा फर्जी मुठभेड़, रायपुर फर्जी आत्मसमर्पण, राम कुमार ध्रुव की हिरासत में मौत, अंबिकापुर, लाकराकोना, बांदेथाना, कोइलीबेरा—ये सभी नाम भयावह सरकारी अत्याचारों के गवाह हैं. उन अत्याचारों के जिनका सच बिनायक सेन और दूसरे मानवाधिकार कार्यकर्ता सामने लाए जिससे सरकार को खासी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी. दिसंबर 2005 में बिनायक सेन ने 15 लोगों के एक दल के साथ सल्वा जूडम पर करारी चोट करने वाली एक रिपोर्ट प्रकाशित की.

बिनायक सेन ने सरकार को एक बार नहीं बल्कि बार-बार आईना दिखाने का अपराध कर रहे थे और इसके एवज़ में सरकार कुछ भी करके उन्हें एक सबक सिखाना चाहती थी. बिनायक सेन की असल कहानी एक बुद्धिहीन और डरे हुए राज्य की अंधेरगर्दी की कहानी है. सरकार का रवैया जार्ज बुश जैसा ही है. जिसे उस जगह जनसंहार के हथियार नजर आ रहे हैं जहां असल में कुछ है ही नहीं. बिनायक सेन जैसे लोगों की छवि ओसामा बिन लादेन जैसी बनाई जा रही है. और ये सब किया जा रहा है राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में.

एक हल्के-फुल्के क्षण में डीजीपी विश्व रंजन ये स्वीकार करते हैं कि सेन के साथ न्याय नहीं हुआ. वो कहते हैं, "अगर मेरे बस में होता तो मैं बिनायक सेन को निगरानी में रखता उन्हें गिरफ्तार नहीं करता." ये एक बड़ी स्वीकरोक्ति है. तुरंत ही संभलते हुए, उसी सांस में वो ये भी कह जाते हैं कि सेन के खिलाफ उनके पास सबूतों का पहाड़ है. ऐसे सबूत जिसे वे न तो आपको दिखा सकते हैं और न ही अदालत में ही पेश कर सकते हैं. जब तक सबूतों का असल जैसा पहाड़ खड़ा नहीं कर दिया जाता तब तक बिनायक सेन जेल में सड़ते रहेंगे. एक हल्के-फुल्के क्षण में डीजीपी विश्व रंजन ये स्वीकार करते हुए मिलते हैं कि सेन के साथ न्याय नहीं हुआ. वो कहते हैं, "अगर मेरे बस में होता तो मैं बिनायक सेन को निगरानी में रखता उन्हें गिरफ्तार नहीं करता." ये एक बड़ी स्वीकरोक्ति है.

2 फरवरी 2008 की सुबह, गिरफ्तारी के पूरे 9 महीने बाद, सेन के खिलाफ आरोप तय करने के लिए उन्हें रायपुर की सत्र अदालत में पेश किया गया. पुलिसवालों की भीड़ से घिरे शांतचित्त, आकर्षक बिनायक सेन पुलिस वैन से नीचे उतरते हैं. दृढ़ता से हाथ मिलाने के बाद कहते हैं, "यहां आने के लिए धन्यवाद", इसके बाद सारे लोग अदालत में चले जाते हैं. जज सलूजा थोड़ी असहजता के साथ आरोपों को सुनाते हैं. वो कुछ बेकार के आरोपों को खारिज कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं करते. बिनायक विटनेस बॉक्स में चुपचाप खड़े रहते हैं. और अंत में सारे आरोपों को मानने से इनकार कर देते हैं. इसके बाद वे अपनी पत्नी और वकील से मिलने के लिए कुछ समय मांगते हैं जो उन्हें दे दिया जाता है.

वहां हवाओं में एक अजीब सा डर साफ महसूस किया जा सकता है. तमाम डॉक्टर जो उनका साथ देने के लिए आए हैं, बात करने से भी झिझकते हैं. एक दिन पहले ही पूरे रायपुर में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई हैं- दो महिलाएं, एक ट्रैवेल एजेंसी का मालिक, एक पत्रकार...हर आदमी खुद को शिकार महसूस कर रहा है. झूठ और सच में फर्क करना मुश्किल है. यद्यपि बिनायक सेन इस सबसे विरक्त से प्रतीत होते हैं. जब पुलिस उनको वैन में धकेलती है तो वे लोहे की जालियों से मुंह सटाकर कहते हैं, "कुछ लोगों को जानबूझ कर विकास की प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है. आप दो तरह के लोगों का वर्ग तैयार नहीं कर सकते. सबको इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी वरना जल्द ही बहुत देर हो जाएगी." उनकी आवाज़ सलाखों के पीछे से भी सुनायी दे रही है "अगर ये लोग मुझ जैसे आदमी को गिरफ्तार करते हैं तो मानवाधिकार कार्यकर्ता असहाय हो जाएंगे. मैंने कभी भी माओवादी हिंसा का समर्थन नहीं किया. यह एक अवैध आंदोलन है जो ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगा. सल्वा जूडम के साथ मिलकर इसने आदिवासी समुदायों में खतरनाक खाई पैदा कर दी है. लेकिन उनकी व्यथा वास्तविक है. ये इलाका इस समय अकाल से जूझ रहा है. लोगों के शरीर का वजन 18.5 से भी नीचे आ गया है, 40 फीसदी आबादी कुपोषण की शिकार है. दलितों और आदिवासियों में इसका स्तर 50 से 60 फीसदी तक है. हमें और ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करने वाले विकास की जरूरत है. आप लोगो की दो श्रेणियां नहीं बना सकते...."

बातचीत कहीं से भी उनके भारत को तोड़ने वाला होने का आभास नहीं देती. ये पूछने पर कि खुद को नक्सली घोषित कर चुके नारायण सान्याल का साथ आप ने क्यों दिया, बिनायक सेन का जवाब दुनिया भर में मानवाधिकारों की जरूरत को स्थापित करता है, "मुझे पता था मैं शेर के मुंह में घुस रहा था लेकिन अगर आप अपने कदम पीछे खींचने लगे तो फिर आप कहां जाकर रुकेंगे? आप भेद-भाव नहीं कर सकते. सबको क़ानूनी सहायता और चिकित्सा सेवा पाने का अधिकार है. ये संविधान में लिखा है. ये मानवाधिकारों का आधार है."

डीजीपी विश्व रंजन गुस्से से पूछते हैं, "वह माओवादियों से ज्यादा सल्वा जूडम की आलोचना क्यों करते हैं?" बिनायक का जवाब होता है कि संविधान और क़ानूनी मर्यादाओं से बंधे होने के कारण भारत सरकार की जिम्मेदारियां उन माओवादियों के बनिस्बत ज्यादा बड़ी हैं जिन्होंने राज्य को ही त्याग दिया है. लेकिन सरकार से ऊंचे मूल्यो वाली ये नैतिकता हज़म नहीं होती. इलिना सेन से ये पूछने पर कि आपको ये लड़ाई लड़ने का जज्बा कहां से मिला, जवाब मिलता है, "मुझे महसूस हुआ कि ये सिर्फ बिनायक और मेरे परिवार का ही मामला नहीं है. हम एक बहुत बड़ी लड़ाई का हिस्सा हैं. हम शांतिपूर्वक अपनी असहमति जताने के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं. इसके प्रति हमारा समर्पण मुझे ताकत देता है." ये एक और ऐसा नैतिक सदाचरण है जो सरकार के गले नहीं उतरता. मेधा पाटकर को ही लीजिए. 20 सालों का शांतिपूर्ण विरोध- नतीजा सिफर. शर्मिला इरोम को लीजिए- सात सालों का उपवास लेकिन कोई फल नहीं। बिनायक सेन को ही लें...

जल्द ही बिनायक सेन की सुनवाई शुरू होगी. इस दौरान उन्हें कैद रखने का मतलब होगा कि भारत में शांतिपूर्ण विरोधों के लिए कोई जगह नहीं. ये जनसंहार के हथियारों को खाद-पानी देने के जैसा है. ये अपनी बात रखने के लिए हिंसक तरीके अपनाने को प्रेरित करने जैसा है. ये पहले से ही ज़िम्मेदार लोगों द्वारा तार-तार किये जा चुके गांधीवाद की धज्जियां उड़ाने जैसा होगा.

12 फ़रवरी 2008

दक्षिण एशिया के देशों में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी है इसी के साथ यहां ‘शांति खत्म हुई है





आनंद स्वरूप वर्मा दक्षिण एषिया देषों के जानकार हैं और विषेशतर नेपाल और भूटान की घटनाओं पर नजर रखते हैं उनका मानना है कि जबसे भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांगलादेष, भूटान यानि दक्षिण एषिया के देषो में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ी है इसी के साथ यहां ‘शांति खत्म हुई है। सन 1997 में पैट्रिक ºयूज की एक रिर्पोट आयी जिसमें कहा गया की आने वाले समय में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा दुष्मन होगा। यह रिर्पोट काफी चर्चा में रही। रिर्पोट का कहना था कि एषिया के देष अमेरिका की मिलेटरी को कम आंक रहे हैं और अमेरिका के खिलाफ एक आयडिओलॉजी पनप रही हैं। उसी समय डिफेंस मिनिस्टर डोनाल्ड रम्सफील्ड ने कहा कि यूरोप पर उतना ध्यान देने की जरूरत नही है जितना की साऊथ एषिया में।
ये सारी चीजें 1997 में घटित हो रही थी और 13 फरवरी 1996 में माओवादीओं ने नेपाल में पीपुल्सवार की घोशणा की गयी थी। इन सारी बातों को एक साथ देखने की जरूरत है। इसके बाद 2001 में स्टेट फॉर कि रिर्पोट आयी जिसमे दक्षिण एषिया को केंद्र में रखते हुए कहा गया की दक्षिण एषिया में माओवादीओं का उभार अमेरिका के लिये खतरा है। स्टेट फॉर की रिर्पोट मे यह भी कहा गया की यदि नेपाल माओवादीओं के हाथ में चला जाता है जैसा की हो चुका है तो उसका सम्बध चीन से अधिक प्रगाढ़ होगा न कि अमेरिका से जबकि चीन के लोग नेपाली माओवादीओं को न तो समर्थन करते हैं और न ही माओवादी विचार का मानते हैं उसी समय डोनाल्ड कैम ने यह कहा कि नेपाली माओवादीओं से अमेरिका के राश्ट्रहित को खतरा है। इसमें कई चीजें जुड़ी थी एक तो अमेरिका जिस बात का प्रचार कर रहा था इन्ड ऑफ आयडियोलॉजी विचार धारा की समाप्ति, क्लैस ऑफ सिविलाईजेषन यानी सभ्यता का टकराव वह नेपाल में उभता हुआ दिख रहा था। जो उनके लिये खतरा था। अत: आप देखे 2001 मे जब नेपाल में ‘शांतिवार्ता ‘शुरु हुई उसी समय अप्रेल में जसवंत सिंह अमेरिका गये हुए थे और भारत के ऐसे पहले विदेष मंत्री थे जिन्हें गार्ड ऑफ ऑनर से नवाजा गया था और जार्ज बुष ने उन्हें विषेश तव्वज्जो दी थी।
उसी समय हेनरी साल्टन की भारत यात्रा भी हुई। अत: कहीं-न-कहीं से अमेरिका भारत से अच्छे सम्बध बनाने के फिराक मे जुटा था जिसके पीछे की मंषा हम समझ सकते हैं। पंरतु नेपाल में अमेरिका को सेट बैक मिला क्योंकि जिन माओवादीओं को वे आतंकवादी लिस्ट में रखते हैं आज वे मंत्री हैं कल प्रधान मंत्री भी हो सकते हैं। भारत को लेकर 1998 में जब आडवानी गृह मंत्री थे तब हैदराबाद में एक मीटिंग हुई जिसमें भारत के 8 राज्यो को माओवादी प्रभावित क्षेत्र माना गया फिर 2005 में 13 राज्य, उसके बाद 14 राज्यों और अभी हाल की मीटिंग में 16 राज्यों के मुख्यमंत्री को इस बैठक में सम्मलित किया गया। यदि पूर्वोत्तर के राश्ट्रवादी आंदोलन कष्मीर, असम के आंदोलनों को लें तो कुल 16 और 8 मिलाकर 24 राज्यों में देष की सरकार इस तरह के विरोध को झेल रही है। तो क्या मात्र 4 राज्य ही ऐसे हैं जिनमे वह ‘शासन कर पा रही है, क्या यही लोकतंत्र है?
दरसल वजह यह है कि माओवादी आंदोलन या अन्य आंदोलनों से जूझते हुए राज्यों को केन्द्र से विषेश पैकेज मिलता है। जिसका इस्तेमाल वे आंतरिक मिलेट्राइजेषन में करते हैं। और इसी बहाने जनता के किसी भी तरह के प्रतिरोध को कुचलने में सहायता मिलती है। उदाहण के तौर पर प्रषांत राही वरिश्ठ पत्रकार उंतराखंड, विनायक सेन मानवाधिकार कार्यकर्ता छत्तीसगढ़, प्रफुल झा....... आदि गिरतार किये गये। इसी बहाने माकेZट फोर्स, पूंजी घराने की रक्षा की जा सकती है। यह इस लिए भी हो रहा है क्योंकि नयी बाजार की तलाष में कम्पनिंया जब गावं में जायेगी तो गावं में पनपते असंतोश को भी इन आंदोलनों के बहाने कुचला जा सके।
भूटान को देखें तो अभी वहां चुनाव हो रहा है और वहां का राजा मीडिया के व्दारा लोकतांत्रिक होनें का ढोंग रच रहा है। ‘शायद यह नेपाल की स्थितियों को देखते हुये। भूटान में जो लोग रियल डेमोकै्रसी की मांग कर रहे थे उन्हे देष से बाहर रियूजी की तरह घूमना पड़ रहा है। एक लाख 50 हजार से ज्यादा लोग भारत में हैं और जब वे जाने की बात करते हैं तो भारतीय पुलिस उनका दमन कर रही है। अमेरिकन और भारतीय सरकार यह चाहती है कि भूटान मे कुछ ऐसे आंदोलन ‘शुरु हों जिन्हें आतंकवादी, नक्सलवादी, माओवादी जैसा नाम देकर उनका दमन कर सकें और अपनी पैठ बना सकें।

11 फ़रवरी 2008

पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति पर एक रिपोर्ट :-



पाकिसतान में आज चुनाव है ऐसे हालात मे पाक पर एक नजरः-
करामत अली पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार है। पाकिस्तान की बदलती हालाते और बढ़ते सैन्यकरण को पाकिस्तान की जनता के हित में खतरे के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र का तकाजा है कि वह अपनी जनता को सुरक्षित रखे, उसके अधिकारो को सुरक्षित रखे। जनता को इस सुरक्षा का अहसास तभी हो सकता है जब पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंध हों देश की सीमाओं पर युध्द के खतरे कम हों और देश की सम्प्रभुता बरकरार रखी जाये। परंतु हाल के दिनों में पाक की सीमा और देश की आंतरिक शस्त्रीकरण और बढ़ता सैन्यकरण इस बात का संकेत है कि देश की स्थिति, मानवाधिकारों की स्थिति और लोकतंत्र की स्थिति बद से बद्तर हुई है।

पाक की स्थिति भारत से भी ज्यादा खराब है उसका अंदाजा हाल की कुछ घटनाओं से लगाया जा सकता है। इसका कारण यह है कि पाक की सेना देश में प्रत्यक्ष रूप में शासन कर रही है सेना का पूर्णता हस्तक्षेप पिछले कई वर्षों से रहा है, और बढ़ा है। इसका एक उदाहरण आप देखे तो बेनजीर भुट्टो की पीपुल्स पार्टी जब सत्ता मे आयी तो वह बहुमत में नहीं थी। अन्य छोटी पार्टिओं के सहयोग से ऐसा संभव हुआ। ऐसे अवसर पर पाक के आर्मी चीफ ने बेनजीर को डिनर पर बुलाया जिसमे सेना के सभी बडे़ हुक्मरान और उनकी बीबीयॉं भी शामिल थी। डिनर के वक्त आर्मी चीफ ने बेनजीर से कहा की शासन तो आप करिये पर तीन विभाग में कौन रहेगा यह हम तय करेंगें जो भी हो पर बेनजीर से यह बात मनवा ली गई पहला फॉरेंन अफेयर, दूसरा इंडिया पाक रिलेशन तीसरा फाइनेन्स ऑफिसर जाफरी रहेंगे । बेनजीर को खुद नही पता था की यह जाफरी है कौन? दरअसल जाफरी वल्र्ड बैंक के एक अधिकारी थे।
इस तरह पाक आर्मी के कब्जे में वित्त व्यवस्था किसी भी समय थी और है। जिससे वें मिलेट्राईजेशन और न्युिक्लयराइजेशन की बजट बढ़ाने में सफल रहे हैं। और देश की जी.डी.पी. का 6.5 व्यय सेना पर हो रहा है दूसरा अमेरिका को इससे ज्यादा मदद यह मिली की वल्र्ड बैंक का अधिकारी (अमेरिकी प्यादा) पाक का वित्त मंत्री रहा तीसरा अमेरिका को शस्त्र बेचनें में मदद मिली।
पाकिस्तान की सेना का सार्वजनिक उपक्रमों में भी पूरा हस्तक्षेप है देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति रिटायर्ड सेनाधिकारी हैं। समाज के हर सोरमे में सेना का हस्तक्षेप है और सेना-सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों को खत्म किया जाता है। विभाजन के बाद भारत पाक के ट्रेड युनियन एक जैसे थे पर पाकिस्तान के ट्रेड युनियन मे बदलाव आया है। पहले आर्मी में वे लोग यूनियन बना सकते थे जो वदीZधारी नही थे। जिनकी सेना मे एक बड़ी तादाद भी है पर अब वे यूनियन नहीं बना सकते हैं यहां तक कि जो लोग सेना से किसी भी तरह का सम्बध रखते हैं यूनियन नहीं बना सकते। अभी हाल में एक दिलचस्प वाकया घटित हुआ जिसमें कोर्ट ने एक फैसला सुनाया। मामला यह था कि एक एक्वागार्ड कम्पनी के मजदूरो ने यूनियन बनाई थी जिसको कम्पनी ने कोर्ट में यह कहते हुए मामला दाखिल किया कि वह सेना को एक्वागार्ड सप्लाई करती है और नियमत: सेना से सम्बध्द कोई भी विभाग की यूनियन नही हो सकती। कारण वश फैसला कम्पनी के पक्ष में रहा ।
दुनिया का यह पहला देश होगा जहां रेलवे लाईनों की लम्बाईओं में कमी आयी है कारण पड़ोसी देशों का खौफ रहा है जिसका झूठा प्रचार पाक सरकार हमेशा करती रही है। जिससे देश के लोगों को भी रेलवे सुविधाए ठीक ढंग से मुहैया नही हो पाती। और रेलवे में भी जहां से आमीZ की ट्रेन गुजरती है वहां से सारे ट्रेड यूनियन खत्म किये गये हैं।
भारत और पाक दोनों देश यह कहते रहे हैं कि जंग नही करनी है मसले को शांतिपूर्ण ढंग से हल किया जाना है इसके बावजूद दोनों देश नए हथियारों से लैस हो रहे हैं सेना की खर्च को बढ़ाया जा रहा है , परमाणु परीक्षण किये जा रहे हैं। भारत यदि 150 परमाणु शस्त्र रखने का दावा कर रहा है तो पाक कम-अज-कम 50 या उससे अधिक रखने का प्रयास में जुटा है। इसके पीछे क्या कारण हैं। यदि परमाणु बम पंजाब मे गिरता है तो ऐसा नही है कि वह केवल पंजाब में ही विध्वसं फैलायेगा उसका असर पाकिस्तान तक जायेगा क्योंकि बम कोई सीमा नहीं देखता और न ही किसी देश की सेना उसके प्रभाव को रोक पायेगी। कुल मिलाकर देश की जनता ही तबाह होगी जब कि ऐसा करने में दो चार बम ही काफी है फिर सौ क्या पचास क्या। और एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका फैसला लेने वाले दोनों देशो में पचास से भी ज्यादा लोग नही है जबकि अंजाम अरबों जनता को भुगतना होगा। यह कैसा लोकतंत्र है और कैसा न्याय है। अत: दोनों देशो को अपने सैन्य शस्त्रों को कम करना चाहिए और परमाणु निशस्त्रिकरण करना चाहिए। दरसल ये देश टेरर और वार के नाम पर यूरोप और अमेरिका की सेवा कर रहे हैं।
आपको जानकर आश्चर्य होगा और हसीं भी आएगी की पाकिस्तान मे आज गरीब की परिभाषा इससे तय की जाती है कि किसके पास बंदूक नही है , रॉकेट लांन्चर नही है , बच्चे लेवर कर रहे हैं बिलो पॉवर्टी के नीचे है, इससे नही। गणतंत्र दिवसपर हम अपनी मिलेट्री पावर अस्त्र-शस्त्र का प्रदशZन करते हैं, न कि डेमाके्रसी में सुधार, मानवाधिकार किसानों की बदतर हालातों की चर्चा।
दूसरी बात डिफेन्स पर हो रहे खर्चे पर किसी भी संसद में बहस नही होती जो होनी चाहिए और सेना को कम किया जाना चाहिए। इस बार जब कांग्रेस सत्ता में आयी तो एक मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री का कहना था कि एक दो माह में सियाचीन से आमीZ हटा ली जाऐगी पर हुआ यूं कि एक दो हप्ते बाद आमीZ चीफ का बयान आया कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं कि सेना को हटाया जाये और तब से यथास्थिति बनी हुई है। हमें यह नही सोचना चाहिए कि जब आमीZ माशZल लॉ लगाती है तभी शासन करती है बल्कि जब इनके पावर और ये बढ़ते हैं तब भी शासन करते हैं। और श्रीलंका, बंग्लादेश, पाक, भारत सबके सेना की हालत एक जैसी है।
भारत पाक की स्थिति को देखे हुए ऐसा लगता है कि देश मे एक बडे़ जन आंदोलन की जरूरत है जिसके जरिये मिलेट्राइजेशन को कम किया जा सकता है और उस पैसे से देश की अन्य बदतर स्थितियो को सुधारा जा सकता है। सेना में आयात किये जाने वाले शस्त्रो का दस प्रतिशत कमीशन भी हटाया जाना चाहिए।

07 फ़रवरी 2008

कब लौटेंगे हुसैन अपने घरः-



93 साल के मकबूल फिदा हुसैन अपने-आप में एक चलता-फिरता इतिहास हैं. अपनी पेंटिंग्स पर उठे विवादों और उन पर चल रहे अदालती मामलों के बाद पिछले कुछ समय से उन्हें दुबई में रहना पड़ रहा है. इन विवादों को लेकर वो क्या सोचते हैं? अपने विरोधियों को कहने के लिए उनके पास क्या है? ऐसे कुछ सवालों को टटोलता शोमा चौधरी का लेख .


मकबूल फिदा हुसैन को भारत रत्न दिया जाए या नहीं, खबरिया चैनल एनडीटीवी द्वारा इस सवाल पर एसएमएस पोल चलाने के विरोध में 19 जनवरी को जब कुछ लोग चैनल के अहमदाबाद स्थित दफ्तर में तोड़फोड़ कर रहे थे तो ये फनकार दुबई स्थित अपने घर में उस्ताद अमजद अली खान के बेटे की शादी के निमंत्रण पत्र के लिए दो घोड़ों का स्केच बनाने में तल्लीन था. उनके ब्रश की आवाज कमरे में पसरी शांति को तोड़ने के बजाय और गहरा कर रही थी. हुसैन जब चित्रकारी कर रहे होते हैं तो उनके ध्यान में कोई भी चीज बाधा नहीं डाल सकती. उनकी जिंदगी के पिछले 70 साल चित्रों के भक्त के रूप में गुजरे हैं. इन 70 सालों में उन्होंने हिंदू दर्शन और संस्कृति को आत्मसात किया है. रामायण पर चित्रकारी करते हुए आठ साल बिताए हैं. महाभारत को भी इतना ही वक्त दिया है. हुसैन ने गणेश, शिव, पार्वती, हनुमान, राग, नाट्य और बनारस की सैकड़ों तसवीरें बनाई हैं. भारत के बारे में दुनिया की समझ को समृद्ध करने के लिए उन्होंने सारी दुनिया की यात्रा की है. उन्हीं हुसैन को अब धर्मविरोधी करार दे कर उनके नाम पर तोड़फोड़ की जा रही है.

हुसैन कहते हैं, “ये इतिहास का बस एक लम्हा है, क्या कर सकते हैं.” दुबई में उन्होंने अपने सभी बच्चों के लिए फ्लैट खरीदे हैं. उन्होंने अपने लिए दो विशाल अपार्टमेंट्स भी खरीदे हैं जिनसे समुद्र को निहारा जा सकता है. इनमें से एक में वो अपने भतीजे फिदा, उसके परिवार और दो नौकरों के साथ रहते हैं. दूसरे को उन्होंने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है .

हालांकि हुसैन के लिए निर्वासन कड़वा अनुभव नहीं क्योंकि ऐसा होना उनके विरोधियों की जीत और उनकी हार जैसा होगा. वो ठाठ और मजे के साथ जीने में यकीन रखते हैं. दुबई में उन्होंने अपने सभी बच्चों के लिए फ्लैट खरीदे हैं. उन्होंने अपने लिए दो विशाल अपार्टमेंट्स भी खरीदे हैं जिनसे समुद्र को निहारा जा सकता है. इनमें से एक में वो अपने भतीजे फिदा, उसके परिवार और दो नौकरों के साथ रहते हैं. दूसरे को उन्होंने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है जिसकी भव्यता देखते ही बनती है. इसके तीन कमरे उन्होंने अपनी कला को समर्पित किए हैं—एक कमरे में 1950 के दशक में बनाई गई पेंटिग्स रखी गई हैं. इनमें अपने आप में एक कहानी ‘मारिया कलेक्शन’ भी शामिल है. दूसरे कमरे में पेंटिंग्स की एक श्रंखला, जिसे वो ‘हुसैन डिकोडेड’ कहते हैं, मौजूद है. तीसरे में मुगले-आज़म पर आधारित पेंटिंग्स रखी गई हैं.

इन दो अपार्टमेंट्स के बीच हुसैन अपनी जिंदगी उस ऊर्जा, उत्साह और सक्रियता के साथ जी रहे हैं जो उनसे एक तिहाई उम्र के लोगों को भी शर्मिंदा कर दे. वो सुबह सात बजे उठते हैं और रात को दो बजे तक जागे रहते हैं. उन्हें शानदार कारों का शौक है और उनके बेड़े में फेरारी, बेंटली, जगुआर और सात करोड़ में खरीदी गई बुगाटी शामिल है. हुसैन हंसते हुए कहते हैं, “लोग मूर्तियां खरीदते हैं, मैं कारें खरीदता हूं.”

शरारत उनके खून में है. फिदा की पत्नी साहिबा कहती हैं, “जब चाचा घर पर होते हैं तो सांस लेने की भी फुरसत नहीं होती.” हुसैन ने उन सबकी जिंदगी का कायाकल्प कर दिया है. फिल्में, पॉपकॉर्न, समारोह, मेहमान, महंगी जगहों पर भोजन, सस्ते रवि ढाबा पर दिन का खाना, एक मालाबारी होटल की चाय जैसी चीजों में ही उनका वक्त बीत रहा है.

पेंटिंग के इतर भी हुसैन सतत चलायमान रहते हैं. उनकी उंगलियां लगातार किसी काल्पनिक तबले पर थिरक रही होती हैं. वो एक दिन आबूधाबी में होते हैं तो दूसरे दिन कतर में. हर साल गर्मियों के महीने वो लंदन जाते हैं. इन दिनों वो अरबी भाषा भी सीख रहे हैं. इसके अलावा वो एक साथ चार प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. कतर की रानी के लिए वो अरबी सभ्यता पर 99 पेंटिंग्स बना रहे हैं. लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए भी वो इसी स्तर की एक श्रंखला तैयार कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त हुसैन भारतीय सिनेमा के इतिहास और मुगले आजम को भी चित्रबद्ध करने में लगे हुए हैं.

अकूत धनसंपदा का ये मालिक आज भी पहले की ही तरह अपने ड्राइंग रूम में बिछे एक साधारण गद्दे पर सोता है. हुसैन अकेले यात्रा करना पसंद करते हैं. 93 साल की उम्र के इस शख्स की शारीरिक फुर्ती और मानसिक क्षमता देखकर हैरत होती है. लगता है जैसे उन्हें कोई दिव्य वरदान मिला हुआ है.

हुसैन एक तरह से जीता-जागता इतिहास और राष्ट्रीय धरोहर हैं. जिस दिन एनडीटीवी के अहमदाबाद आफिस में बीस लोग तोड़-फोड़ करते हैं उसी शाम हम उस्ताद अमजद अली खान और उनके बेटों के संगीत आयोजन में जाते हैं. लोगों की भीड़ उन्हें ऐसे घेर लेती है जैसे वो एक फिल्म स्टार हों. बार-बार सुनने को मिलता है, “दुबई का सौभाग्य है कि आप यहां हैं.” लोग उन्हें छूने, उनका ऑटोग्राफ लेने और उनके साथ फोटो खिंचवाने की कोशिश करते हैं. उस्ताद के सरोद का संगीत अब भी माहौल में गूंज रहा है. कुछ देर पहले हमने उनकी गणेश वंदना का आनंद लिया है. विविधताओं से बनी भारत की जिस मजबूत संस्कृति पर हम गर्व करते हैं वो ऐसे ही लोगों में बसती है. इस माहौल में भी रह-रहकर भारत में हो रही घटनाओं पर ध्यान चला जाता है. बाद में मालाबार रेस्टोरेंट में चाय पीते हुए हुसैन इस बारे में मानो कुछ सोचते हुए कहते हैं, “गालिब ने एक बार बहुत परेशान होकर कहा था कि या तो मेरे श्रोताओं को समझ दे या फिर मेरी आवाज बदल दे.” वो एक साथ चार प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं. कतर की रानी के लिए वो अरबी सभ्यता पर 99 पेंटिंग्स बना रहे हैं. लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए भी वो इसी स्तर की एक श्रंखला तैयार कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त हुसैन भारतीय सिनेमा के इतिहास और मुगले आजम को भी चित्रबद्ध करने में लगे हुए हैं.


हुसैन की आत्मकथा ‘अपनी जबान में’ में एक घटना है. एक बच्चा मिट्टी से खेलता हुआ कुछ आकृतियां बना रहा है. मक़बूल नाम का एक नौजवान आता है और इन्हें चटख रंगों में रंग देता है. कोई भी इन आकृतियों में दिलचस्पी नहीं लेता. इसके बाद एम एफ हुसैन नाम का एक शख्स आता है और उन पर अपने हस्ताक्षर कर देता है. अचानक ही आकृतियों को खरीदने के लिए भीड़ टूट पड़ती है. हुसैन कहते हैं, “तीनों पात्र मैं ही हूं. कला की कीमत बढ़ाने के लिए मैंने एम एफ हुसैन को सोचसमझकर एक ब्रांड के रूप में तब्दील किया. मैं चाहता था कि कला के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़े. मेरे लिए ये एक मिशन था.”

एम एफ हुसैन ब्रांड को लोगों ने हाथों-हाथ लिया. कला के बाजारीकरण से कई नाराज भी हुए मगर इसने भारतीय कला को विश्व स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई. 90 के दशक में जब हुसैन ने अपनी एक कलाकृति का मूल्य 40 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये किया था तो लोगों ने इसे आत्मघाती कदम बताया. आखिर में जीत हुसैन की ही हुई और ये पांच लाख रुपये में बिकी. अगली बार उन्होंने अपने काम की कीमत पांच लाख लगाई, फिर दस लाख और इसके बाद आया एक करोड़ का मुकाम. इसे कामयाब बनाने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने इस आयोजन को सिटीबैंक से प्रायोजित करवाया और चुनिंदा दर्शकों को ही आमंत्रित किया. फिर उन्होंने एक तमाशा किया. संगीत की धुन और नर्तकों के थिरकते कदमों के बीच उनका कैनवास मखमल के किसी पर्दे की तरह लहराते हुए नीचे आया. इससे पहले वो ऐसा ही तामझाम भरा एक आयोजन वो माधुरी दीक्षित के साथ कर चुके थे. हुसैन कहते हैं, “मैंने माधुरी से पूछा कि क्या वो भारतीय कला को मशहूर बनाने के मिशन में मेरा साथ देंगी. आयोजन में हमने रंगों से पोता हुआ एक सफेद घोड़ा रखा हुआ था. शानदार लिमोजीन में बैठकर हम जानबूझकर आयोजन में देर से आए. लोगों को ये तमाशा खूब पसंद आया.”

हंसते हुए हुसैन कहते हैं, “लेकिन मैंने खुद को बचाए रखा है. मेरे भीतर वो बच्चा और चित्रकार मकबूल अब भी जिंदा है. मकबूल के बिना एम एफ हुसैन का वजूद नहीं होता.”

हुसैन के एक प्रशंसक और करीबी मित्र पूछते हैं, “हुसैन अपने काम के जरिये अपना गुस्सा क्यों जाहिर नहीं करते.” हुसैन जवाब देते हैं, “मैं वास्तव में कोई कड़वाहट महसूस ही नहीं करता. मेरा जिंदगी भर का काम ही मेरा जवाब है. बतौर कलाकार मैं अपनी ऊंचाई 1950 के दशक में छू चुका हूं. मेरा बाकी का काम उसी का प्रतिबिंब है. जब मेरी बीवी फाज़िला का भाई बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चला गया तो कई दशक तक मैंने उससे कोई संपर्क नहीं रखा. मैं हमेशा से राष्ट्रवादी रहा हूं. मगर मुझे जगहों से कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता. मां का प्यार आपके दिल में घर का अहसास पैदा करता है...आपको बांधकर रखता है. मैं बस डेढ़ साल का था जब मेरी मां चल बसी इसलिए मैंने इस तरह का लगाव भी कभी महसूस नहीं किया. मेरा पहला बच्चा शब्बीर तीन साल की उम्र में ही चल बसा. मैंने खुद एक गटर से उसकी लाश बाहर निकाली. इसके बाद खोने के लिए बाकी क्या रह जाता है.”

हुसैन के विचारों से आपको एक तरह की बुद्धिमत्ता की झलक मिलती है. इस उम्र में भी उनके भीतर खुद को दूसरी जगह जमाने और जिंदगी को फिर से गढ़ने की हिम्मत है. वो इसे इतना आसान बना देते हैं कि आपको ये बात बहुत हल्की लग सकती है. एक प्रशंसक और करीबी मित्र पूछते हैं, “हुसैन अपने काम के जरिये अपना गुस्सा क्यों जाहिर नहीं करते.” हुसैन जवाब देते हैं, “मैं वास्तव में कोई कड़वाहट महसूस ही नहीं करता. मेरा जिंदगी भर का काम ही मेरा जवाब है.

लेकिन अगर सिर्फ एक निगाह भर डालें तो उनके निर्वासन से जुड़ा बेतुकापन खुलकर सामने आ जाता है. यहां एक ऐसा व्यक्ति है जिसने लगभग एक सदी से भारत के हर पक्ष को बहुत नजदीक से देखा है. 1955 तक वह एक स्थापित कलाकार हो चुके थे और पद्मश्री से सम्मानित भी. 1971 तक उन्हें साओ पाओलो में पाब्लो पिकासो के साथ आमंत्रित किया जाने लगा था. 1986 में वह राज्यसभा सांसद भी बने. और ये सब महज ऊपर-ऊपर की बातें हैं—अगर ये सोचा जाए कि उन्होंने भारत के हर छोटे-बड़े रंग को 10,000 से ज्यादा चित्रों में उकेरा है तो ये बेतुकापन बिल्कुल नग्न हो जाता है.

एम एफ हुसैन एक चलता-फिरता इतिहास है. एक राष्ट्रीय धरोहर. और हमने उन्हें क्या दिया? देशनिकाला.

दुबई में हुसैन के साथ तीन दिन बिताने के बाद मैं भारत वापस आई. मैंने हुसैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डा. राम प्रताप सिंह को फोन किया. फोन उठाते ही जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा. डॉ. सिंह निहायत ही गर्ममिजाज आदमी हैं. बात शुरू करते ही वो फट पड़े, "मैं आप जैसे लोगों को अच्छी तरह जानता हूं. आप मुझसे सवाल क्यों पूछ रही हैं? आप लोग हमेशा हमें लतियाने की फिराक में रहते हैं." मैंने कहा, "आप किस 'हम' की बात कर रहे हैं डॉ. सिंह? मैं भी एक हिंदू हूं. ठीक है आप हुसैन से सहमति नहीं रखते हैं, लेकिन आप एक पढ़े-लिखे आदमी हैं इसलिए मैं सिर्फ इतना पूछना चाहती हूं क्या आप लोग ऑफिसों में तोड़फोड़, कला दीर्घाओं में आगजनी रोक नहीं सकते हैं. क्या आप तांत्रिक कला की परंपरा के बारे में नहीं जानते और कृष्ण राधा, शिव पार्वती के कामुक प्रेम चित्रण को बताने की जरूरत नहीं है..." आप मुझे पढ़ा लिखा आदमी कह रही हैं? आप लोग हमेशा हमें गालियां देते हैं.. मुझसे सवाल पूछने वाली आप होती कौन हैं? मैं आपसे तंत्र या फिर किसी चीज़ के बारे में बात नहीं करूंगा. आप लोग हमारे साथ सम्मान के साथ क्यों नहीं रहते? आप जैसे लोग इस देश में सिर्फ एक फीसदी हैं, हम आपके साथ भी वही करेंगे...”

डॉ. सिंह की याचिका हुसैन के खिलाफ उन सात याचिकाओं में शामिल है जिनकी जानकारी हुसैन के वकील अखिल सिब्बल को है. सबको एक में ही दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समाहित कर दिया गया है. सिब्बल ने बताया, "इसके अलावा अब मेरी जानकारी में उनके खिलाफ कोई और अदालती कार्रवाई नहीं चल रही है. लेकिन अक्सर हमें इसके बारे में जानकारी मीडिया के जरिए ही मिलती है."

हुसैन ने 2006 में उस वक्त हमेशा के लिए भारत छोड़ दिया था जब दक्षिणपंथियों के हमलावर रुख के बाद हरिद्वार की कोर्ट ने उनके खिलाफ ग़ैर ज़मानती वारंट जारी कर दिया था और इसमें भारत के भीतर उनकी सभी संपत्तियों की कुर्की का निर्देश भी था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी लेकिन बीते साल में ही हुसैन की पेंटिंग्स का कई हिंसक विरोधों से सामना हो चुका है. 2006 में लंदन के एशिया हाउस में आयोजित एक प्रदर्शनी में एक कट्टरपंथी हिंदू गुट ने जमकर तोड़फोड़ मचाई. यही कहानी अमेरिका के पीबॉडी एसेक्स संग्रहालय में लगी उनकी महाभारत श्रृंखला की पेंटिग्स के साथ भी दोहराई गई. ऐसा ही कुछ पिछले साल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में देखने को मिला जब केरल सरकार को दबाव में राजा रवि वर्मा पुरस्कार स्थगित करना पड़ा. मई 2007 में एबीएन एमरो बैंक को भी दबाव में अपने प्लेटिनम क्रेडिट कार्ड से हुसैन की कृति हटानी पड़ी. एक डरावने और बेतुके घटनाक्रम में लखनऊ में एक स्वघोषित हिंदू पर्सनल लॉ बोर्ड ने हुसैन का सिर लाने वाले को 51 करोड़ रूपये, आंखों के लिए 11 लाख और हाथ के बदले एक किलो सोना इनाम में देने की घोषणा की. एनडीटीवी के ऑफिस पर हमला इसी श्रंखला की ताज़ा कड़ी है. दुबई में हुसैन के साथ तीन दिन बिताने के बाद मैं भारत वापस आई. मैंने हुसैन के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डा. राम प्रताप सिंह को फोन किया. फोन उठाते ही जैसे उन्हें बिजली का झटका लगा.

अगर डॉ. राम प्रताप सिंह की जबान में ही बोला जाए तो ऐसे लोग भारत की आबादी का दशमलव कुछ फीसदी हिस्सा भी नहीं है. और भावनाओं का अनियंत्रित उफान भी नहीं है. उदाहरण के तौर पर गुजरात मामले को ही लें. बेरोजगार, कुंठित और बजरंग दल द्वारा दुत्कार दिया गया अशोक शर्मा किसी भी तरह से नाम कमाना चाहता था. अहमदाबाद के संयुक्त पुलिस कमिश्नर सतीश शर्मा भी इसका समर्थन करते हुए उसे ‘आवारा’ बताते हैं. इंटरनेट पर भी ये अभियान सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है लेकिन इसके बाद भी इस तरह की खुराफातों में हिस्सा लेने वाले लोग गिनती के ही हैं. तरस खाने वाली बात ये है कि ये गिने चुने, असहिष्णु, किसी तरह की बात में विश्वास न रखने वाले और क़ानूनों की बेशर्मी से धज्जी उड़ाने वाले लोग ही हमारे सार्वजनिक जीवन की दिशा तय करने लगे हैं. और इन मामलों में कोई भी गिरफ्तारी नहीं होती जबकि सिब्बल बताते हैं कि राज्य, कोर्ट और पुलिस के पास सिर्फ शक्तियां ही नहीं है बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी बनती है कि उनकी जानकारी में क़ानूनों का उल्लंघन करने की बात आए तो तो खुद-ब-खुद हस्तक्षेप करें. इस मसले पर हमने बीजेपी के अरुण जेटली से राय जानने की कोशिश की मगर उनका कहना था कि मीडिया से बात करना बंद कर रखा है. कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी से पूछिए आपको रटी रटाई लाइन सुनने को मिलेगी, “हुसैन के महत्व पर किसी को शक नहीं है, लेकिन भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सबको विरोध और असहमति जताने का हक़ है. उनका शोषण नहीं होना चाहिए आदि...“ जहां तक सड़क पर जो हिंसा होती है उसका क्या? “अगर कोई ग़लत काम करते पकड़ा जाता है तो निश्चित रूप से उसे गिरफ्तार करना चाहिए लेकिन क़ानून व्यवस्था का मसला राज्य सरकार के जिम्मे है”

अपनी तरह का विशिष्ट और हाईप्रोफाइल मामला होने की वजह से हुसैन का निर्वासन देश के सामने भी चुनौती बन गया है. तस्लीमा नसरीन, सलमान रश्दी, तैयब मेहता, अकबर पद्मसी, मृदुला गर्ग, हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर, दीपा मेहता... हिंदू और मुस्लिम असहिष्णु गुटों द्वारा सताए गए लोगों की गिनती करते करते उंगलियों में दर्द होने लगता है. कलाकारों के ऊपर बातचीत के जरिए नहीं बल्कि मारपीट के जरिए प्रतिबंध थोपा गया. खुद तहलका भी प्रतिष्ठित छायाकार रघु राय की एक नग्न महिला की फोटो प्रकाशित करने के आरोप में मुंबई में इसी तरह के एक मामले का सामना कर रही है. हर बार जब सुनवाई होती है प्रधान संपादक को कोर्ट में हाज़िर होकर फिर से ज़मानत करवानी पड़ती है.

इन सभी मामलों में सभ्यता से जुड़े चार बड़े सवाल पैदा होते हैं. अश्लीलता की परिभाषा क्या है? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला वो बिंदु क्या है (इन दिनों ये बहुत आसानी से चोट खा जाता है) जिसे पार करने से बचना चाहिए? लेखक और कलाकार की समाज में भूमिका क्या है? और, एक सभ्य समाज में हमें किस तरह से अपना विरोध जताना चाहिए? एम एफ हुसैन 2006 में तब प्रमुखता से ख़बरो में आ गए जब उनकी एक बिना नाम वाली पेंटिंग जिसमें एक नग्न युवती के रूप में देश का चित्रण किया गया था, का प्रदर्शन शैरोन एपारोस सैफ्रोनॉर्ट द्वारा किया गया. एक निष्पक्ष आदमी के लिए ये प्रेरक और सुंदर काम था. कुछ हिंदू गुटों ने इस पर हल्ला मचाना शुरू कर दिया. हुसैन को केरल अवार्ड दिए जाने का विरोध करने वाले रवि वर्मा बताते हैं, "हुसैन ने ये काम देश के 80 करोड़ हिंदुओं और इसके अलावा विदेशों में बसने वाले लाखों हिंदुओं की भावनाओं को जानबूझ कर चोट पहुंचाने की नीयत से किया है." ये पूछना ही बेकार है कि इतनी बड़ी संख्या की भावनाओं के बारे में वो कैसे दावा कर सकते हैं. सिब्बल के शब्दों में, "भारत माता पर किसी एक समुदाय का अधिकार नहीं है और क़ानूनों के मुताबिक खुद वर्मा के आरोप सांप्रदायिक और विभाजनवादी हैं."

इसके अलावा हुसैन द्वारा 1988 में बनायी गई सरस्वती पेंटिंग पर रूढ़िवादियों ने भौहें तरेरी थी. इसे निजी रूप से ही खरीदा गया था और इसका प्रकाशन भी टाटा स्टील द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक के सीमित संस्करणों में ही हुआ था. भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में जिस हद तक उत्तेजना का पुट होता है इस पेंटिंग में उसका एक चौथाई भी नहीं है. लेकिन अगर आप इस बात को कुछ देर के लिए छोड़ भी दें तो भी अश्लीलता पर जब हम बहस करते हैं तो एक अहम सवाल उठता है कि ये किस सीमा तक सार्वजनिक है? हुसैन का मामला हो, या किसी कलाकार का इन सभी मामलों में सभ्यता से जुड़े चार बड़े सवाल पैदा होते हैं. अश्लीलता की परिभाषा क्या है? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला वो बिंदु क्या है (इन दिनों ये बहुत आसानी से चोट खा जाता है) जिसे पार करने से बचना चाहिए? लेखक और कलाकार की समाज में भूमिका क्या है? और, एक सभ्य समाज में हमें किस तरह से अपना विरोध जताना चाहिए?
, वो अपना काम आपके ऊपर थोपते नहीं हैं, वो अपने काम का प्रचार बड़ी बड़ी होर्डिंग्स के सहारे नहीं करते जिनसे आपका सामना हर दिन होता है और आपके पास और भी विकल्प होते हैं. छोटी सी बात है, अगर आपको उनका काम पसंद नहीं है तो उसे मत देखिए. गैलरी में मत जाइए, किताबें मत खरीदिए. किसी समान विचारधारा वाले मीडिया में इसके खिलाफ अपने लेख प्रकाशित कीजिए. ये विरोध का एक सभ्य तरीका हो सकता है.

एक कलाकार या लेखक की तमाम जिम्मेदारियों में एक काम ये भी है कि वो समाज के विचारों की सीमा को आगे बढ़ाए. अगर उन्हें इस तरह से दबाया जाएगा तो फिर सारी कलाधर्मिता रुक जाएगी. खुशी की बात ये है कि बीते सालों में सुप्रीम कोर्ट ने बारीकी से आम ज़िंदगी में अश्लीलता का निर्धारण करने की कोशिश की है. रंजीत डी उदेशी बनाम महाराष्ट्र सरकार(1965), अजय गोस्वामी बनाम भारत सरकार(2005), समरेश बोस बनाम अमल मित्रा(1985) जैसे तमाम मामलों में अदालत ने ये राय दी है कि कला में सेक्स और नग्नता को अश्लीलता के दायरे में नहीं रखा जा सकता, न ही भद्देपन की समानता अश्लीलता से की जा सकती है. सिर्फ उन स्थितियों को, जिनमें जानबूझकर किसी का चरित्र बिगाड़ने या फिर भ्रष्ट करने की कोशिश की गई हो या कामुकता को भड़काने और दर्शक की यौन भावनाओं को उघाड़ने की कोशिश हो, ही अश्लीलता के दायरे में रखा जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि अश्लीलता की सीमा निर्धारित करने में वो अतिसंवेदनशील व्यक्तियों की सोच को इस्तेमाल नहीं कर सकता.

इसके पीछे का आशय काफी मायने रखता है. इन उदाहरणों के आगे हुसैन के खिलाफ मामले कहीं खड़े नहीं हो सकते. 10,000 कैनवास के जखीरे में बमुश्किल तीन पेंटिंग विवाद में हैं. क्या उनका मकसद अपमान करने का है? बजाय इसके उनका संपूर्ण काम ही उनके समर्पण को दर्शाता है. कला इतिहासकार अल्का पाण्डेय कहती हैं, "हुसैन असली मास्टर है. चित्र उकेरने की उनकी विशिष्ट कला, उनका बड़े पैमाने पर किया गया काम, खुद ही सीखने का गुण--ये सब अतुलनीय हैं. जहां तक कामुकता का सवाल है तो ये हमेशा से हमारे दर्शन और सौंदर्यप्रधान संस्कृति का हिस्सा रहे हैं. हुसैन इसी मिट्टी में सांस लेकर बड़े हुए हैं. उनकी कला भी इसी का नमूना है. उनका विरोध लज्जाजनक है.” ऐसा समर्थन उन्हें खूब मिलता है लेकिन इसका तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि कोई उनकी लड़ाई को लड़ने के लिए आगे नहीं आता. हुसैन खुद कुछ नहीं कहेंगे. वो एक उक्ति पर जीते हैं, “न कोई सफाई, न कोई बुराई”

25 जनवरी 2008

संविधान में मौलिक अधिकारों की प्रासंगिकता-


संविधान को लागू हुये 58 वर्ष बीत चुके है तब से तीन थके हुये रंगों को एक पहिया ढो रहा है। हर वर्ष 26 जनवरी को परेडों और जुलुसों के बीच राष्ट्र की संमप्रभुता और संविधान में प्रदत्त नागरिक अधिकारों का गुणगाण किया जाता है। पर इतने वर्षो बाद आम जन को ये अधिकार कितने मिल पायें है इसके विष्लेषण की जरूरत हैं। 1789 में मानवाधिकारों या मौलिक अधिकारों कों अपने नागरिकों के लिए सुनििष्चत करने वाला पहला राज्य फ्रांस था। भारतीय संविधान में नागरिकों के 7 मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12 से 35 तक वणीZत किये गये है। परंतु 1975 के 44 वे संषोधन में संपत्ति का अधिकार समाप्त होने के बाद 6 अधिकार ही बचे। और इन अधिकारों क® लेकर 13 के खंड 2 मेें इस बात का वर्णन किया गया है कि राज्य कोइ भी ऐसा कानून नहीं बनायेगा जो इन अधिकारों को छीनती है या कम करती है और बनायी गयी प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक षून्य होंगी। भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को जो अधिकार प्रदत्त किये गये उनकी कुछ सीमायें थी, सीमायें ही नहीं वरन उनमें इस तरह की व्यवस्था रखी गयी कि राज्य का कोई हस्तक्षेप न होते हुये भी राज्य की इच्छा के अनुरूप ही यह अधिकार मिल सके और नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन होता रहा।

समानता का अधिकार
अनुच्छेद 14 से 18 में नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है। जिनमें कई तरह की समानता नागरिकों को देने की बात कहीं गयी है। इनमे कानूनों के समक्ष समानता, अवसर की समानता, सामाजिक समानता, अस्पृष्यता का निषेध, उपाधियों का निषेध आदि षामिल है। पर गौर करने की बात यह है कि संविधान में वणिZत दिखावे की यह समानता है। आज भी समाज में वर्चस्ववादी वर्ग के लोगों का ही बोलबाला है। समाज में अवसर लाभ उसी को मिलता है जिसका समाज में वर्चस्व है। व्यवस्था में षिर्षस्थ स्थान पर वही लोग बैठे है जो पीढी दर पीढी से सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल रखे हुयें है। ऐसी स्थिती में आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद भी सामाजिक परिस्थितीयों ने दमित व षोषित वर्ग को वंचित ही बनाके रखा है। थोडे बहुत परिवर्तन यदि आये भी तो उन्ही के पास जिन्होने इस वर्चस्ववादी जन से समझौता किया है। पर वे परिवर्तन कहीं से भी अस्पृष्यता निषेध या जातिविहीन समाज बनाने में मददगार साबित नही लगते।

स्वतंत्रता का अधिकार
मूल संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को जो स्वतंत्रतायें प्रदान की गयी। जिनमें विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अस्त्र षस्त्र रहित षांतिपूर्ण संमेलन, संघ तथा समुदाय बनाना, देष में कही भी भ्रमण, देष के किसी भी क्षेत्र मे निवास तथा व्यापार व व्यवसाय की स्वतंत्रता है। परंतु नागरिकों को ये स्वतंत्रता प्रदान करने के बाद कुछ प्रतिबंध भी लगाये गये यदि कोई व्यक्ति राज्य की सुरक्षा, विदेषी राज्यों से मैत्रिपुर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, षिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय अवमानना, मानहानि या अपराध या फिर 1963 के 16 वे संषोधन में एक नया प्रतिबंध जोडा गया कि किसी क्षेत्र को भारत से अलग करने की मांग कोई करता है तो उसपर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। इन प्रतिबंधों के बाद अब ऐसा कुछ भी व्यक्त करने को नहीं बचता जिसके लिए आप स्वतंत्र है, और जो बचता है वह है राज्य की इच्छा की अनुरूप अभिव्यक्ति या राज्य की पक्षधरता अन्यथा इनकी व्याख्या करके राज्य किसी भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकता है यदि वह उसके उनुरूप न हो। अस्त्र षस्त्र रहित षांतिपूर्ण सम्मेलनों की व्याख्या राज्य किन रूपों में करेंगी। इसका कोई आधार नहीं है। लाठी या डंडे को अस्त्र माना जा सकता है। परंतु एके 47 लेकर रैलियों में सामूहिक प्रदषZन और गोलीबारी करने पर कोई प्रतिबंध नही लगता जैसा की पिछले दिनों उत्तर प्रदेष मेें मायावती सरकार की जीत के जष्न में उनके एक विधायक ने किया था।

शोषण के विरूद्ध अधिकार
अनुच्छेद 23-24 में वणिZत ये अधिकार व्यक्ति की गरिमा को सुनिष्चत करने के लिए बनायें गये हैं जिसके पीछे कारण यह था कि भारत में बेगार लेने या मजदूरों को गुलाम बनाने की प्रथा थी। परंतु जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरी करने के लिए रोटी, कपडा और प्रश्रय के अभाव में एक बडी जनसंख्या जी रही है। जो पहले दास के रूप में गुलाम बनकर अपना जिवन यापन करती थी। आज उसका स्वरूप थोडा बदल गया है। औद्योगिकरण के बाद उन दास का केंद्रीकरण हुआ है और वे किसी कंपनी में पूंजी घराने के दास बने हुये हैं और अपने श्रम को सस्ते दामों पर बेचने के लिए मजबूर हैं। जिसका मुनाफा उस निजी पूंजी घराने को जा रहा है। यही नहीं दूर दराज के गांव में आज भी यह व्यवस्था थोडे बहुत परिवर्तनों के साथ मौजूद है और मजदूर के रूप में सामंतों की जमीनों की जोत के बदले एक बडा तबका दास बनने को अभिसप्त है। यह अधिकार संविधान की किताब में लिखे चंद हफोंZ के अलावे कुछ नहीं दिखते।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 25 से 28 तक दिए गये इन अधिकारों में नागरिकों को किसी भी धर्म को अंगीकार करने तथा उसके प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी थी। जिसमें यह भी बात कही गयी थी कि उस नागरिक को राज्य कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता जो किसी विषेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विषेष रूप से सुनििष्चत किया हो। जिसका परिणाम यह हुआ की एक बडा व्यवसायी व संपन्न वर्ग इसकी आड में पूंजी का केंद्रीकरण करता रहा तथा आम जनता को धार्मिकता से ओतप्रोत करता रहा। जिसका फायदा आगे उठाकर धार्मिक कट्टरपंथियों ने लोगों की धार्मिक संवेदनाओं को सांप्रदायिकता के हद तक पहुचाया। लोगों को अपने धर्म के प्रति कट्टर बनाया और ताकिZक चिंतन और वैज्ञानिक चिंतन की परंपरा को भी कुंद करने का काम किया। कारणवष धर्म और धर्मगं्रथों में वणिZत व्यवस्थायें जो सामंती समाज आधारित थी उनको भी पुष्टी मिली और समाज में वर्णव्यवस्था वा विषमता को बरकरार रखने को बल मिला। सांप्रदायिक दंगों को भी अपरोक्ष रूप से आधार प्रदान किया गया और अल्पसंख्यकों के हितों का अनदेखा होता रहा।

संस्कृति और षिक्षा संबंधी अधिकार
अनुच्छेद 29-30 में संस्कृति और षिक्षा संबंधी अधिकारों का मूल उद्देष्य था कि अल्पसंख्यकों को इस बात से आष्वस्त करना कि उनके मामले में किसी भी प्रकार का अनावष्यक एवं अनुचित हस्तक्षेप नही किया जायेगा तथा भारतीय संघ किसी भी आधार पर भेदभाव नही करेगा। परंतु देष की सत्ता में विराजमान अधिकांषत: व सत्ता चरित्र के मुताबिक अपनी संस्कृति का निर्माण किया गया जो व्यवस्था को किसी भी रूप में स्थायित्व प्रदान कर सके। विभिन्न पार्टीयों ने वोट की राजनीति के लिए अपने हित के अनुरूप संस्कृति बनायी और उसे पोषित किया। पूंजी के इस युग में लोककला-संस्कृति को तरजीह देने के बजाय साम्राज्यवादी संस्कृति के रूप में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास किया गया। गुजरात में आज यदि अल्पसंख्यक के रूप में रह रहा मुस्लिम इतना भयभीत है कि वह गाडी, दुकान में हिंदू देवों की मुर्तिया लगा रहा है, अपने वेषभूषा को हिंदुओं के मुताबिक ढाल कर चलने को मजबूर है। तो उसके मौलिक अधिकार कहां है और उनकी रक्षा करने वाला कौन?

संवैधानिक उपचारों का अधिकार
अनुच्छेद 32 से 35 को अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा जिसके अंतर्गत न्यायपालिका- व्यवस्थापिका व कार्यपालिका की ऐसे सभी काननों और कार्याे को असंवैधानिक घोषित कर देगी जो मौलिक अधिकारों को अनुचित रूप से प्रतिबंधित करते है। किंतु गौरतलब बात यह है कि न्यायपालिका में बैठा हुआ न्यायाधीष वर्तमान लोकतंत्र के फासीवादी चरित्रपर सिर्फ नकाब पहना रहा है। जबकि इन अधिकारों का हनन करने वाले कितने ऐसे कानूनों- पोटा, आस्पा, छत्तीसगढ जनसुरक्षा अधिनियम आदि बनाये गये है। और हाल के कई फैसलों ने यह सिद्ध किया है कि न्यायपालिका-कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के कायोZं पर परदा डाल कर लोकतंत्र या जनता पर न्यायपूर्ण षासन का ढोंग कर रही है।

24 जनवरी 2008

शामिलः-

हाशिया वाले रेयाज भाई की यह कविता आज के समय में लिखे जा रहे साहित्य से हट कर छत्तीसगढ़ के समय और संघर्ष को व्याख्यायित करती है| जब छत्तीसगढ़ में जनसंघर्ष चल रहा है, या यूं कहें की युद्ध चल रहा है, ऐसी स्थिती में छत्तीसगढ़ के लेखक अपनी भाषा के गुल खिला रहें है, और चटकारे लेकर लिख रहें है, उनकी पक्षधरता भी दिख रही है, किसी घटना पर कुछ न बोलने की| चाहे वह सलवा जुडुम हो या विनायक सेन की गिरफ्तारी, शायद उन्हे डर है सत्ता से सम्मान खोने का, उन्हे परहेज है जनपक्षधर हो के लिखने का| ऐसे में रेयाज की यह कविता उनके लिये जबाब भी हो सकती है की सिर्फ लेखक बने रहने के लिये लिखना और अपने समाज काल की स्थितियों और अभिव्क्तियों से लोगों को वाकिफ कराना दोनों में अंतर है...रेयाज की साहसशील लेखनी को सलाम


तुम कहोगी
कि मैं तो कभी आया नहीं तुम्हारे गांव
सलीके से लीपे तुम्हारे आंगन में बैठ
कंकडों मिला तुम्हारा भात खाने
लाल चींटियों की चटनी के साथ
तो भला कैसे जानता हूं मैं तुम्हारा दर्द
जो मैं दूर बैठा लिख रहा हूं यह सबङ्क्ष

तुम हंसोगी
मैं यह भी जानता हूं

तुम जानो कि मैं कोई जादूगर नहीं
न तारों की भाषा पढनेवाला कोई ज्योतिषी
और रमल-इंद्रजाल का माहिर
और न ही पेशा है मेरा कविता लिखना
कि तुम्हारे बारे में ही लिख डाला, मन हुआ तो

मैं तुम्हें जानता हूं
बेहद नजदीक से
जैसे तुम्हारी कलाई में बंधा कपडा
पहचानता है तुम्हारी नब्ज की गति
और सामने का पेड
चीन्ह लेता है तुम्हारी आंखों के आंसू

मैं वह हूं
जो चीन्हता है तुम्हारा दर्द
और पहचानता है तुम्हारी लडाई को
सही कहूं
तो शामिल है उन सबमें
जो तुम्हारे आंसुओं और तुम्हारे खून से बने हैं

दूर देश में बैठा मैं
एक शहर में
बिजली-बत्तियों की रोशनी में
पढा मैंने तुम्हारे बारे में
और उस गांव के बारे में
जिसमें तुम हो
और उस धरती के बारे में
जिसके नीचे तुम्हारे लिए
बोयी जा चुकी है बारूद और मौत

सुना कि तुम्हारा गांव
अब बाघों के लिए चुन लिया गया है
तुमने सुना-देश को तुम्हारी नहीं
बाघ की जरूरत है
बाघ हैं बडे काम के जीव
वे रहेंगे
तो आयेंगे दूर देश के सैलानी
डॉलर और पाउंड लायेंगे
देश का खजाना भरेगा इससे

सैलानी आयेंगे
तो ठहरेंगे यहां
और बनेंगे इसके लिए सुंदर कमरे
रहेंगे उनमें सभ्य नौकर
सुसज्जित वरदी में
आरामदेह कमरों के बीच
जहां न मच्छर, न सांप, न बिच्छू
बिजली की रोशनी जलेगी
और हवा रहेगी मिजाज के माफिक

...वे बाघ देखने आयेंगे
और खुद बाघ बनना चाहेंगे
तुम्हारे गांव में कितनी लडकियां हैं सुगना
दस, बीस, पचास
शायद नाकाफी हैं उनके लिए
उनका मन इतने से नहीं भर सकेगा

जो बाघ देखने आते हैं
उनके पास बडा पैसा होता है
वे खरीद सकते हैं कुछ भी
जैसे खरीद ली है उन्होंने
तुम्हारी लडकियां
तुम्हारा लोहा
तुम्हारी जमीनें
तुम्हारा गांव
सरकार
...वह जमादार
जो आकर चौथी बार धमका गया तुम्हें
वह इसी बिकी हुई सरकार का
बिका हुआ नौकर है
घिनौना गोखरू
गंदा जानवर
ठीक किया जो उसकी पीठ पर
थूक दिया तुमने

आयेंगे बाघ देखने गाडियों से
चौडी सडकों पर
और सडकें तुम्हारे बाप-दादों की
जमीन तुमसे छीन कर बनायेगी
और तुम्हारी पीठ पर
लात मार कर
खदेड देगी सरकार तुम्हें
यह
तुम भी जानती हो

पर तुम नहीं जानतीं
दूसरी तरफ है बैलाडिला
सबसे सुंदर लोहा
जिसे लाद कर
ले जाती है लोहे की टेन
जापानी मालिकों के लिए
अपना लोहा
अपने लोहे की टेन
अपनी मेहनत
और उस पर मालिकाना जापान का

लेकिन तुम यह जानती हो
कि लोहा लेकर गयी टेन
जब लौटती है
तो लाती है बंदूकें
और लोहे के बूट पहने सिपाही
ताकि वे खामोश रहें
जिनकी जगह
बाघ की जरूरत है सरकार को

सुगना, तुमने सचमुच हिसाब
नहीं पढा
मगर फिर भी तुम्हें इसके लिए
हिसाब जानने की जरूरत नहीं पडी कि
सारा लोहा तो ले जाते हैं जापान के मालिक
फिर लोहे की बंदूक अपनी सरकार के पास कैसे
लोहे की टेन अपनी सरकार के पास कैसे
लोहे के बूट अपनी सरकार के पास कैसे

जो नहीं हुआ अब तक
जो न देखा-न सुना कभी
ऐसा हो रहा है
और तुम अचक्की हो
कि लडकियां सचमुच गायब हो रही हैं
कि लडके दुबलाते जा रहे हैं
कि भैंसों को जाने कौन-सा रोग लग गया है
कि पानी अब नदी में आता ही नहीं
कि शंखिनी और ढाकिनी का पानी
हो गया है भूरा
और बसाता है, जैसे लोहा
और लोग पीते हैं
तो मर जाते हैं

तुम्हारी नदी
तुम्हारी धरती
तुम्हारा जंगल
और राज करेंगे
बाघ को देखने-दिखानेवाले
दिल्ली-लंदन में बैठे लोग

ये बाघ वाकई बडे काम के जीव हैं
कि उनका नाम दर्ज है संविधान तक में
और तुम्हारा कहीं नहीं
उस फेहरिस्त में भी नहीं
जो उजडनेवाले इस गांव के बाशिंदों की है.

बाघ भरते हैं खजाना देश का
तुम क्या भरती हो देश के खजाने में सुगना
उल्टे जन्म देती हो ऐसे बच्चे
जो साहबों के सपने में
खौफ की तरह आते हैं-बाघ बन कर

सांझ ढल रही है तुम्हारी टाटी में
और मैं जानता हूं
कि मैं तुम्हारे पास आ रहा हूं
केवल आज भर के लिए नहीं
हमेशा के लिए
तुम्हारे आंसुओं और खून से बने
दूसरे सभी लोगों की तरह
उनमें से एक

हम जानते हैं
कि हम खुशी हैं
और मुस्कुराहट हैं
और सबेरा हैं
हम दीवार के उस पार का वह विस्तार हैं
जो इस सांझ के बाद उगेगा

हम लडेंगे
हम इसलिए लडेंगे कि
तुम्हारे लिए
एक नया संविधान बना सकें
जिसमें बाघों का नहीं
तुम्हारा नाम होगा, तुम्हारा अपना नाम
और हर उस आदमी का नाम
जो तुम्हारे आंसुओं
और तुम्हारे खून में से था

जिसने तुम्हें बनाया
और जिसे तुमने बनाया
सारी दुनिया के आंसुओं और खून से बने
वे सारे लोग होंगे
अपने-अपने नामों के साथ
तुम्हारे संविधान में

जो जिये और फंफूंद लगी रोटी की तरह
फेंक दिये गये, वे भी
और जिन्होंने आरे की तरह
काट डाला रात का अंधेरा
और निकाल लाये सूरज

जो लडे और मारे गये
जो जगे रहे और जिन्होंने सपने देखे
उस सबके नाम के साथ
तुम्हारे गांव का नाम
और तुम्हारा आंगन
तुम्हारी भैंस
और तुम्हारे खेत, जंगल
पगडंडी,
नदी की ओट का वह पत्थर
जो तुम्हारे नहाने की जगह था
और तेंदू के पेड की वह जड
जिस पर बैठ कर तुम गुनगुनाती थीं कभी
वे सब उस किताब में होंगे एक दिन
तुम्हारे हाथों में

तुम्हारे आंसू
तुम्हारा खून
तुम्हारा लोहा
और तुम्हारा प्यार

...हम यह सब करेंगे
वादा रहा.

16 जनवरी 2008

फिल्मी दुनिया केज्यादातर लोग कम पढ़े-लिखे हैं


साहित्य अकादेमी अवार्ड, इकबाल सम्मान, बहादुर शाह जफर अवॉर्ड, गालिब अवॉर्ड, राजभाषा अवॉर्ड, उदूü अकादमी अवॉर्डü, फिराक सम्मान आदि से नवाजे जा चुके `गमन´, `उमराव जान´, `अंजुमन´ जैसी फिल्मों में गीत लिख चुके और स्थानीय जनवादी लेखक संघ के 15 वषोZ से अध्यक्ष शहरयार आज हिंदुस्तानी शायरी की पहचान बन चुके हैं। इन पर कई पीएचडी हो चुकी हैं, तो कई विश्वविद्यालयों में (जहां मॉडनü पोएट्री है) एमए में उनको पढ़ाया जाता है। यह इत्तेफाक ही है कि जिस फिल्म के लिए उन्होंने अनमने से गीत लिखे, उसी ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। पहला संग्रह छपा, उस समय भारत-पाक जंग शुरू हो गई थी। मगर उनकी शायरी को सीमाओं के दायरे पड़ोसी देश पहुंचने से नहीं रोक सके और वाया लंदन उनकी किताब पाकिस्तान भी पहुंच गई। अलीगढ़ में उनके आवास पर हुई बातचीत के अंश प्रस्तुत हैं :

शहरयार साफ-साफ बात कहने और सुनने में विश्वास करते हैं। उनकी रचनाएं संवेदना और समय का भरा-पूरा दस्तावेज हैं। अब तक उन्हें साहित्य जगत के अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। गजलगो शहरयार हिंदुस्तानी शायरी का एक चेहरा बन गए हैं।

`दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए´ और `जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें´ जैसी गजलों का रचनाकार आज एक फ्लैट में सीमित होकर रह गया। क्या फिल्मों में आगे काम नहीं मिला या आपको फिल्मों का काम पसंद नहीं आया?


दरअसल, मुझे बहुत जल्द पता चल गया कि वहां की जिंदगी के लिए मैं बना ही नहीं हूं। वहां फिल्में बनाने और बेचने वाले अधिकांश लोग कम पढ़े-लिखे और छोटे जेहन के लगे। वहां मौलिकता की गुंजाइश भी नहीं थी। जिनसे वास्ता पड़ता था, उनकी बातेें बहुत सतही होती थीं। एक प्रोडKूसर मिला, जो बमुश्किल दस्तखत कर सकता था। संक्षेप में कहूं, तो `दुपट्टा मेरा´ टाइप गाने की फरमाइश मैं पूरी नहीं कर सकता था।


दूसरा कारण था कि जिस मुकाम पर आकर मुझे फिल्मों में काम करने का मौका मिला, वहां तक पहुंचकर मैं पूरी तरह सुकून की जिंदगी गुजारने का आदी हो गया था। मैं परिवार छोड़कर नहीं रह सकता था। मैंने देखा है कि लोगों ने पैसे तो बहुत कमा लिए, मगर उनके बच्चे गुमराह हो गए। मैं पिता का रोल बच्चों के साथ रहकर अदा करना चाहता था। (एक क्षण रुककर) जो कमियां बचपन में मेरे साथ रहीं, वह अपने बच्चों के साथ होते नहीं देखना चाहता था।


आपने फिल्मों तक का रास्ता कैसे तय किया?

मुजफ्फर अली पेंटर थे और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में मेरे जूनियर भी। वे शायरी पसंद करते थे। उन दिनों (वर्ष 1965 में) मेरा पहला गजल संग्रह `इस्मे आजम´ छपा, जो उनके पास था। उससे वे प्रभावित थे। पांच-छह साल बाद उनका एक खत मिला कि वे `गमन´ फिल्म में मेरी दो गजलें रखना चाहते हैं।


सीने में जलन आंखों में तूफान-सा क्यों है


इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यों है


और दूसरी...


अजीब सानिहा मुझ पर गुजर गया यारो


मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो


इस तरह ये गजलें सुरेश वाडकर और हरिहरन ने गाईं, जो उनकी भी बेस्ट रहीं।


उमराव जान में गाने का प्रस्ताव कैसे मिला?


इन गजलों के कैसेट रिलीज के मौके पर मुजफ्फर ने मुझे मुंबई बुलाया और लखनवी अदब पर फिल्म बनाने की बात कही। मैं फिक्शन पढ़ाता था और उमराव जान उपन्यास उस समय बन रहा था। मैंने इस किताब की बुनियाद पर फिल्म बनाने का सुझाव दिया। इस फिल्म में मेरी पांच गजलें हैं।


ऐसी कोई बात, जो भुलाए न भूल रही हो?


मेरे गॉड फादर के समान खलीलुर्रहमान की मृत्यु...। (काफी देर चुप रहने के बाद) मैं अपनी पत्नी से 12 वषोZ से अलग हूूं, यह बात भी मुझे भुलाए नहीं भूलती।


हालांकि यह नितांत निजी मामला है और पूछने में संकोच भी हो रहा है फिर भी बात निकली है, तो क्यों न पूरी कर लें। इस अलगाव का कारण?


(बहुत ही शांत चित्त से) कुछ मेरा कुसूर है, लेकिन इसका इल्म शादी से पहले था। मेरी हर कमजोरी से पत्नी वाकिफ थीं, लेकिन एक वक्त के बाद वह चाहती थी कि वे आदतें अच्छाइयों में तब्दील हो जाएं। बात नहीं बनी और हम अलग हो गए। (एक शेर सुनाते हैं)


इस मोड़ पर अब तुमसे बिछड़ना नहीं आसान


पहले ही कहीं तुमसे जुदा हो गए होते


आखिरी व्यक्तिगत प्रश्न पूछ रहा हूं। बच्चे ऐसे में कैसा महसूस करते है?


मैंने उन्हें सिखाया है कि वे अपनी मां को पूरा सम्मान दें। क्योंकि मैंने भी अपनी मां से बहुत प्यार किया। बड़ा बेटा हम दोनों का बराबर सम्मान करता है।


(हम साहित्य पर लौटते हैं)


हिंदी कविता तमाम बंदिशों को तोड़कर आगे बढ़ रही है। छंद-लय तक सीमित न रहकर वह अर्थ-लय तक पहुंच गई मगर ऐसा लगता है कि उदूü शायरी बंदिशों से मुक्त नहीं हो पा रही है।


ऐसा नहीं है। उदूü में काम बहुत हुआ है। हिंदी और उदूü की तुलना सम्मेलनों और मुशायरों को लेकर नहीं की जा सकती। उदूü में `सीरियस´ और `पॉपुलर´ में काफी अंतर रहा है। इसकी वजह हमारी साहिçत्यक गतिविधियों का व्यावसायिक पहलू न होना है। बेदी और इस्मत चुगताई आदि की कहानियां पहले हिंदी में छपीं तब उदूü में। प्रेमचंद भी इसी कारण उदूü से हिंदी में आ गए। रही बात छंदों की, तो मीटर तोड़ने की जरूरत नहीं है। मीटर की पाबंदियों में रहकर मुख्तलिफ बातें कही जा सकती हैं। अब शायरी बदल गई है। उसके सामाजिक और नैतिक पहलू का ध्यान रखा जाने लगा है। फैज़ म$कदूम और मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी पूरी तरह प्रोग्रेसिव है।


हिंदी में भी आज बड़े पैमाने पर गजलें लिखी जा रही हैं, जिनसे उदूü के बड़े शायर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। आपका क्या खयाल है?

मेरा कुछ भी कहना ज्यादती होगी। हां, दुष्यंत कुमार हिंदी के बेहतरीन गजलगो हैं। कई स्थानीय शायर भी बेहतरीन काम कर रहे हैं। मैं इसके खिलाफ नहीं हूं। भाषा कोई भी हो, गजल की शतेZ उसमें बरकरार होना जरूरी है। दो लाइनें बराबर तो होनी ही चाहिए।


आपने अपनी शायरी को भाषा के स्तर पर काठ का जूता नहीं पहनाया, जबकि उदूü के अधिकांश शायर ऐसा करते रहे हैं।


मैं अपने लिए शेर नहीं कहता। शायरी लोगों की समझ में आनी चाहिए, भले ही उसे कम लोग समझ पाएं। गालिब और मीर ने भी बहुत आसान शायरी की है। (दोनों के एक-एक शेर सुनाते हैं):


इब्ने मरियम हुआ करे कोई


मेरे दुख की दवा करे कोई


या फिर


नाजुकी उसके लब की क्या कहिए


पंखुड़ी एक गुलाब की-सी है


ऐसा नहीं लगता कि पुरानी उदूü शायरी कुछ हद तक सीमित दायरे में और पूर्वाग्रह से ग्रस्त है?


शायरी में इश्क-मोहब्बत होनी ही चाहिए, यह पूर्व धारणा है। मगर यही सब कुछ नहीं है, ये अब की सोच है। मैंने शराब पर कोई शेर नहीं कहा, न ही शराब पीकर शायरी की। दरअसल शायरों के साथ कई मिथक गढ़ दिए गए हैं। जैसे शायर है, तो अनपढ़ होगा, शक्ल-ओ-सूरत खराब होगी, शराब पीता होगा, गैरजिम्मेदार होगा आदि-आदि। हालांकि ऐसा हो भी सकता है, मगर यह जरूरी भी नहीं।


आपकी अपनी पसंदीदा गजल?


किसी एक को कहना मुश्किल है, मगर मेरी एक गजल चçर्चत हुई:


जिंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है।


हर घड़ी होता है एहसास कहीं, कुछ कम है॥


घर की ताकीर तसव्वुर में ही हो जाती है।


अपने नक्शे के मुताबिक ये जमीं, कुछ कम है॥


जीवन का उद्देश्य किस तरह व्याख्यायित करेंगे?


आदमी को किसी के लिए जिंदा रहना चाहिए। जिन चीजों से अच्छाइयों को खतरा है, उनका विरोध हो।


ये सफर वो है कि रुकने का मुकाम इसमें नहीं।


मैं जो थम जाऊं, तो परछाईं को चलता देखूं॥




(ऊर्दू के मशहूर शायर शहरयार से गीतेश्वर की बातचीत)
अमर उजाला से साभारः-

10 जनवरी 2008

मुक्तिबोध की तीन कवितायेंः-




1:- मृत्यु और कवि

घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर
व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर
है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,
जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर
बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,
वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला
"ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर" ।

ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर
जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम
जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।

क्षण-भंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर
दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर?
इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर,
सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर
तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्बल मानव के घर-घर
ज्योतित हों मुख नवम आशा से, जीवन की गति, जीवन का स्वर ।

2:- नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

3:- ऐ इन्सानों

आँधी के झूले पर झूलो
आग बबूला बन कर फूलो
कुरबानी करने को झूमो
लाल सबेरे का मूँह चूमो
ऐ इन्सानों ओस न चाटो
अपने हाथों पर्वत काटो

पथ की नदियाँ खींच निकालो
जीवन पीकर प्यास बुझालो
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा ।
- गजानन माधव मुक्तिबोध

26 दिसंबर 2007

विनायक सेन की कैद के मायने-

अपूर्वानंद
इसी महीने 10 दिसंबर को एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जा रहा था तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक शख्स की कैद लंबी हो रही थी. ये शख्स हैं इस साल मई से छत्तीसगढ़ की रायपुर जेल में बंद पीयूसीएल नेता डॉ. बिनायक सेन जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया. 45 मिनट चली सुनवाई वहां मौजूद लोगों के लिए एक भयावह अनुभव था. अभियोजन पक्ष का दावा था कि सेन माओवादी हैं और उन्हें छोड़ने का मतलब होगा सरकार की जड़ें खोदने के लिए उन्हें खुली आजादी देना. परेशान करने वाली बात ये थी कि इस दावे की प्रामाणिकता जांचने की जरूरत ही नहीं समझी गई. डॉ सेन के कंप्यूटर रिकॉर्डों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हुए सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इसमें वे पत्र हैं जिनसे ये पता लगता है कि किस तरह डॉ सेन ने नागपुर में हथियारों का प्रशिक्षण कैंप आयोजित क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा?
करने में मदद पहुंचाई. बचाव पक्ष के वकील राजीव धवन ने इस ओर ध्यान खींचने की कोशिश की कि पत्रों को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है और डॉ सेन खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए नागपुर गए थे. लेकिन अदालत का मानना था कि धवन का तर्क ट्रायल कोर्ट में देखेगा और उसके पास डॉ सेन को जमानत न देने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं.

इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात थी हमारे कुछ अनुभवी मित्रों का यह कहना कि अभियोजन पक्ष का काम ही है कि वह झूठ बोले और इसमें कुछ भी नया या अनोखा नहीं है कि सरकारी वकील ने डॉ सेन के बारे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया.

जब सरकार ही झूठ बोलने पर उतर आए तो आप क्या करेंगे? क्या देश के उच्चतम न्यायालय ने ये सिद्धांत नहीं दिया है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और जमानत से तब तक इनकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक ये स्वतंत्रता दूसरों के लिए खतरा न बन जाए? क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा? वो आदिवासी जिनके लिए डॉ सेन ही एकमात्र मेडिकल सुविधा थे. क्या खंडपीठ ने ये सोचा कि डॉ सेन की गिरफ्तारी के फलस्वरूप धमतारी अस्पताल बंद हो गया है? और इसके साथ ही पढ़ने में आता है अदालत ने किसी फिल्म स्टार को सिर्फ इसलिए जमानत दे दी कि उसके ऊपर फिल्म उद्योग के करोड़ों रुपये लगे हुए हैं.

आम आदमी सीधे सवाल पूछता है : क्या जमानत दिए जाने पर डॉ सेन के भूमिगत होने का खतरा था? ये एक तथ्य है कि बंगाल में अपनी छुट्टियां बिताने के बाद डॉ सेन मई में रायपुर लौटे थे, ये पता होने के बावजूद कि स्थानीय मीडिया के सहयोग से छत्तीसगढ पुलिस उनके बारे में दुष्प्रचार कर रही है. उनके भाई ने उन्हें एक पत्र भी भेजा था जिसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि लौटने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. लेकिन वह वापस आए और जैसी कि आशंका थी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. अगर छत्तीसगढ़ पुलिस अदालत को जैसा बता रही थी वैसा होता तो डॉ सेन मई में ही भूमिगत हो जाते. उनका वापस आने और कानून का सामना करने का फैसला पर्याप्त आधार होना चाहिए था कि कोई भी अदालत उन्हें जमानत दे देती. केस की जानकारी रखने वालों के मुताबिक सरकार द्वारा ट्रायल कोर्ट में मामले को लटकाए रखने के लिए अपनाई गई चालबाजियां छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है.
इस बात का सबूत हैं कि सरकार की दिलचस्पी केवल डॉ सेन को लंबे समय तक कैद रखने में है. इसका नतीजा ये हुआ कि सलवा जुडूम के नाम पर हो रहे सरकारी अत्याचारों का पर्दाफाश करने वाली एक ताकतवर और भरोसेमंद जुबान खामोश हो गई है. इसका मतलब ये भी है कि मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले समुदाय के सारे संसाधन अब अपने नेता को आजादी दिलाने में लग जाएंगे. नतीजतन सरकार को निर्बाध दूसरी ज्यादतियां करने की छूट मिल जाएगी.

छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है. जब डॉ सेन ने छत्तीसगढ़ सरकार की जनविरोधी प्रकृति का भांडाफोड़ करना शुरू किया, जब उन्होंने सलवा जुडूम और एनकाउंटर के नाम पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की तो सरकार उसे बर्दाश्त न कर सकी. उसने डॉ सेन की जुबान बंद करने का फैसला कर लिया. सबसे आसान तरीका था उन्हें माओवादी घोषित कर देना.

डॉ सेन कितने दिन जेल में रहेंगे कहा नहीं जा सकता. जो निश्चित रूप से कहा जा सकता है वह ये है कि डॉ बिनायक सेन जैसे लोगों के जेल में बिताये गये हर दिन का मतलब है भारत में लोकतंत्र और आजादी के एक दिन का कम हो जाना. हमें ये जानने की आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जेलें डॉ सेन जैसे सैकड़ों लोगों से भरी हैं. ऐसे कई सीपीआई कार्यकर्ता हैं जिन्हें सिर्फ इस अपराध में माओवादी करार देकर जेल में ठूंस दिया गया कि उन्होंने सलवा जुडूम का विरोध किया था. माओवादियों की हिंसावादी राजनीति का समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन जब राज्य में किसी भी विपक्ष को माओवादी बता जेल में ठूंसा जाने लगे तो ऐसा उनकी राजनीति को निश्चित तौर पर थोड़ी सी वैधता प्रदान करता है. क्या सरकार ऐसा जानबूझकर कर रही है? क्या ये सरकार खुद भारत का अलोकतंत्रीकरण कर रही है?
साभार तहलका

यह चरित्र है संसदवादी कम्युनिष्टों काः-

के ए शाजी
संसदवाद की प्रणाली में अपने को फिट करते-करते अब भारतीय कम्युनिष्तों का चरित्र सामने आा रहा है चाहे वह नंदीग्राम में हो या फिर केरल में
बुद्धदेव भट्टाचार्य अब शायद खुश होंगे। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का नंदीग्राम मार्का मार्क्सवादी समाजवाद अब केरल के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। राज्य के इडुक्की जिले में कॉमरेड भू-माफियाओं और पर्यटन व्यवसायियों के हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसकी मार पड़ रही है उन गरीब आदिवासियों पर जिन्हें उनकी सदियों पुरानी ज़मीनों से खदेड़ा जा रहा है।

पार्टी के नवउदारवादी नेता पिन्नाराई विजयन, टीएम थॉमस, आइसाक और एमए बेबी के स्थानीय गुंडों ने इडुक्की की ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है। इडुक्की हाल तक मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन का गढ़ हुआ करता था जहां उन्होंने बड़े भू-माफियाओं को बाहर खदेड़ने के लिए कड़े क़दम उठए थे। लेकिन ताकतवर माफियाओं ने स्थानीय सीपीआई और सीपीएम, दोनों को अपने पाले में कर लिया। नतीजा, अच्युतानंदन का सबसे मजबूत गढ़ उनके हाथ से जाता रहा।

नवंबर के आखिर में हजारों की संख्या में सीपीएम कैडरों ने हिल स्टेशन मुन्नार के पास बसे गांव चिन्नाकनाल की 53 एकड़ सरकारी ज़मीन पर कब्जा कर लिया. इस जमीन पर करीब कुछ महीनों से 160 भूमिहीन आदिवासी सरकार के उस आश्वासन आदिवासियों के सामने मुश्किल हालात हैं। झोपड़ियां मार्क्सवादी आक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं और वे समझ नहीं पा रहे कि कहां जाएं। ज़िला प्रशासन और पुलिस ने उनसे आंखें फेर ली हैं और सीपीएम के लोग अभी भी आज़ाद कराई गई इस जगह की निगरानी कर रहे है।
के बाद झोपड़ियां बनाकर रह रहे थे जिसमें कहा गया था कि उन्हें इस इलाके में जमीन दी जाएगी। इन झोपड़ियों को आग लगाकर राख कर दिया गया और उनके ऊपर लाल झंडे फहरा दिए गए जो इस बात का संकेत थे कि जमीन अब आजाद है। असहाय आदिवासियों ने पास ही स्थित एक चट्टान के नीचे शरण ली और सीपीएम के लोगों ने उस ज़मीन पर अपने छप्पर डाल कर अपने "अतिक्रमण विरोधी" अभियान को अंतिम रूप दे दिया।

हालांकि पहले दिन सिर्फ अनयिरंगल और पप्पाथिचोला से ही आदिवासियों को बाहर निकालने का अभियान चला लेकिन अगले दिन सीपीएम के गुंडो ने लगभग पूरे चिन्नाकनाल गांव में आने वाली राजस्व भूमि पर लाल झंडे फहरा कर उस पर अपने अधिकार का ऐलान कर दिया। दूसरे दिन के अभियान में करीब 2000 कैडरों ने हिस्सा लिया।

अब आदिवासियों के सामने मुश्किल हालात हैं। झोपड़ियां मार्क्सवादी आक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं और वे समझ नहीं पा रहे कि कहां जाएं। ज़िला प्रशासन और पुलिस ने उनसे आंखें फेर ली हैं और सीपीएम के लोग अभी भी आज़ाद कराई गई इस जगह की निगरानी कर रहे है।

आदिवासी परिवारों ने 1500 एकड़ की जिस ज़मीन पर झोपड़ियां बनाई थीं उसे सरकार ने सालों पहले हिंदुस्तान न्यूज़प्रिंट लिमिटेड नाम की एक कंपनी को यूकेलिप्टिस के पेड़ लगाने के लिए आवंटित किया था। इन आदिवासियों को पता ही नहीं चला कि कब सीपीएम कैडरों ने अपना कब्जा अभियान शुरू कर किया। दरअसल ये पूरा इलाका आदिवासियों का ही था और कंपनी इस ज़मीन का कोई उपयोग नहीं कर रही थी। आदिवासियों को सीपीएम का कोपभाजन इसलिए बनना पड़ा क्योंकि उन्होंने ज़मीन को तब तक न छोड़ने की धमकी दी थी जब तक की सरकार उन्हें अपने वादे के मुताबिक ज़मीनें मुहैया नहीं करवाती। आदिवासी इन ज़मीनों पर ट्राइबल रिहैबिलिटेशन प्रोटेक्शन कमेटी के झंडे तले रह रहे थे।

जाने-माने आदिवासी नेता सी के जानू कहते हैं, "ये एक औऱ नंदीग्राम की शुरुआत है। आदिवासियों के आवंटन वाली ज़मीन से उन्हें बेदखल करने का अधिकार सीपीएम कैडरों को किसने दिया? ये लोग ज़मीन के मामलों में फैसला करने का अधिकार न्यायपालिका और सरकार के जिम्मे क्यों नहीं छोड़ते हैं? मामला बिल्कुल साफ है कि पार्टी बाहुबल के दम पर सार्वजनिक ज़मीनों पर कब्जा करके उसे भू-माफियाओं को सौंपना चाहती है।"

चिन्नाकनाल में सीपीएम कैडरों के इस कारनामें पर सीपीआई नेता और राज्य के राजस्व मंत्री केपी राजेंद्रन ने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ज़िला प्रशासन को आदेश दिया कि पार्टी से जुड़ाव को दरकिनार करके सभी अतिक्रमणकारियों को हटाया जाय। बावजूद इसके अभी तक सीपीएम के अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मुन्नार में ज़मीन के कब्जेदारों को हटाने के लिए बने टास्क फोर्स के मुखिया केएम रामानंदन ने इस मसले को हल करने के लिए सभी पार्टियों की मीटिंग भी बुलाई लेकिन इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला।

गुस्साए आदिवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो सीपीएम ने चिन्नाकलान में हड़पी गई ज़मीनों को वापस न करने की ठानी हुई है। चिन्नाकनाल में सीपीएम के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले आदिवासी पुन्नाम्बलम कहते हैं, "अगर अधिकारियों ने तत्काल कड़े क़दम नहीं उठाए तो यहां मुथांगा जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।" मुथांगा में पुलिस ने आदिवासियों के खिलाफ सबसे कठोर अभियान चलाया था। ज़िलाधिकारी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है जिसमें कहा गया है कि चिन्नाकनाल की ज्यादातर सरकारी ज़मीन सीपीएम नेताओं के अवैध कब्जे में है।
एके एंटनी की यूडीएफ सरकार के दौरान ने जब उत्तरी केरल के वायनाड ज़िले में आदिवासियों को वायदे के मुताबिक ज़मीन नहीं दी तो इसके विरोध में उन्होंने जंगलों में अपनी झोपड़ियां बना ली थीं। इसकी प्रतिक्रिया में फरवरी 2003 में पुलिस कार्रवाई में एक आदिवासी और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई थी जबकि कई आदिवासी घायल हुए थे। इस मामले में आदिवासियों को अब तक भी जमीनें नहीं मिली हैं। पुन्नाबलम कहते हैं, "मार्क्सवादियों का लक्ष्य ये साबित करना है कि आदिवासी ज़मीन के हक़दार नहीं है। चूंकि वो सत्ता में हैं इसलिए वो आसानी से अपने दावे को सही साबित करने के लिए जाली दस्तावेज भी पेश कर देते हैं और हम पर अपनी ज़मीनों से बेदखल करने का दबाव डालते हैं। एक बार ऐसा हो गया तो वो ज़मीनों के बंटवारे को ठंडे बस्ते में डालकर इन ज़मीनों को भू-माफियाओं के हवाले कर देंगे।"

उधर, राजस्व मंत्री ने तहलका को बताया कि सभी प्रदर्शनकारी आदिवासियों को उनकी ज़मीनें वापस दी जाएंगी और लाल झंडे की परवाह न करते हुए जमीनों से कब्जे हटाए जाएंगे। लेकिन चिन्नाकनाल पंचायत में वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ये आसान नहीं लगता। पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर अस्थायी तौर पर सीपीएम कैडर हट भी जाते हैं तो आदिवासियों को ज़मीने सौंपना आसान नहीं है। स्थानीय पत्रकार टीसी राजेश कहते हैं, "सीपीएम पहले से ही ये तर्क दे रही है कि जिन 120 आदिवासियों ने अपनी झोपड़ियां यहां बना रखी थीं उनमें सिर्फ 21 के पास ही मालिकाना हक़ है। सीपीएम के लिए आदिवासियों को जारी किए गए ऑफर लेटर की फिर से जांच की मांग करना आसान है। इससे पार्टी को अपना एजेंडा लागू करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।" सालों पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री एके एंटनी और आदिवासी नेता सीके जानू के बीच हुए एक समझौते के बाद आदिवासी इन जमीनों पर बसे थे। एक भव्य समारोह के दौरान एंटनी ने 798 आदिवासियों को ज़मीन के कागज़ात सौंपे थे। लेकिन 540 परिवारों को ही चिन्नाकनाल में ज़मीन मिली। बाक़ियों को जो ज़मीनें मिली वो पहले से ही भूमाफियाओं के कब्जे में थी।

"ये गरीब लोग पिछले पांच सालों से अपनी ज़मीन के इंतज़ार में हैं। सरकार उन्हें सीधे-सीधे सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर रही है," ये कहना है आदिवासी नेता सीपी शाजी का। उधर सीपीएम नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस और सीपीआई के लोगों ने आदिवासियों को इन ज़मीनों पर कब्जा करने के लिए उकसाया ताकि एक बार मामला शांत हो जाने के बाद वो खुद इन ज़मीनों पर कब्जा कर सकें।

बहरहाल ज़िलाधिकारी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है जिसमें कहा गया है कि चिन्नाकनाल की ज्यादातर सरकारी ज़मीन सीपीएम नेताओं के अवैध कब्जे में है। ज़िलाधिकारी ने ये भी साफ किया है कि आदिवासियो की ज़मीन पर कब्जा करने के पीछे टूरिस्ट रेजॉर्ट बनाने वाली एक लॉबी का हाथ भी है।

राजेश कहते हैं, "ये गांव पर्यटन के लिहाज से काफी अहम जगह पर मौजूद है जिसकी सीमाएं मथिकेत्तन राष्ट्रीय उद्यान और मुन्नार हिल स्टेशन से लगती हैं। विवादित ज़मीन दर्शनीय अनयिरंकल बांध से भी काफी नज़दीक है। रियल इस्टेट माफिया को अहसास है कि इसे बड़े फायदे के सौदे में बदला जा सकता है।"
:-तहलका से साभार

12 दिसंबर 2007

मुझे गवाह के कटघरे मे आने दो


मेरा मुक़दमा ऐसा नही की उसका फैसला
काले कोटवालों की नीली कर्रेंसी नोट देकर
किसी एक देश की किसी एक अदालत मी हो जाए
मुझे गवाह के कटघरे में आने दो

तुम लोग जो आदमी की आस्था को बरबाद करते हो
इश्वर के नाम पर मुझे शपथ क्यों दिलाना चाहते हो
निर्दोष और अपराधियों के लिए
तुमलोग एक ही कानून पर बहस करते हो
न्याय को चूहे की तरह तुम लोग उतार देते हो
वकील की फीस की गर्त में
इस काम के लिए तुम्हारी योग्यता क्या है
मुझे गवाह के कटघरे मे आने दो

तुम्हारा ही न्याय और तुम्हारा ही जेलखाना
तुम डरते क्यों हो
एक अंतहीन सांचा चला आ रहा है युगों से

यह भरा हुआ है तुम्हारे दिमाग के महलों में
तुम्हारे कबूतर गुटुर्गूँ कर रहे हैं घरेलु मुड़ेरों पे
मधुर आकांक्षाएं झरती जाती हैं हर क्षण
तुम अपने सरों को कलम क्यों नही करते
नही ढहाते कमरे की चारों दीवारें
कारों दिशाएं खोल दो फ़िर देखना तुम विश्व नागरिक कैसे नही बनते

11 दिसंबर 2007

बिहार में विकास के माडल की तलाश


प्रेम कुमार मणि
आज पूरी दुनिया में विकास की आंधी चल रही है। कभी राष्ट्रवाद और समाजवाद को लेकर भी ऐसी ही आंधी चली थी। विकास की इस आंधी ने राष्ट्रवाद को तो पूरी तरह और समाजवाद को बहुत हद तक अप्रासंगिक बना दिया है। जहां तक भारत की बात है जिस कांग्रेस ने कभी समाजवाद शब्द को भारतीय संविधान में भारतीय गणराज्य के साथ नत्थी कराने में अग्रणी भूमिका निभायी थी उसी ने उसे अप्रासंगिक बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभायी है। अब बिहार में समाजवादी तबियत के नीतीश कुमार विकास की राजनीति की प्रस्तावना कर रहे हैं जिसकी एक झांकी पिछले १९-२१ जनवरी को पटना में हुए एक ग्लोबल कांफ्रेंस में प्रस्तुत हुई; जिसे एक एनजीओ ने बिहार सरकार के सहयोग से आयोजित किया था और जिसका उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने किया। राष्ट्रपति डॉ. कलाम विकास की राजनीति के पुराने प्रस्तावक रहे हैं। इसलिए उनका भाषण रश्मी तौर पर दिया गया भाषण नहीं, बल्कि मनोयोग से तैयार किया गया एक दिलचस्प भाषण था। उद्घाटन सत्र, जो पटना कें एक बड़े सभागार में ताम-झाम के साथ आयोजित था, में मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। बिहार में कांग्रेस का जो पहला अधिवेशन हुआ था (१९१२, बांकीपुर कांग्रेस) उस में भाग लेकर जवाहरलाल नेहरू को जो अनुभूति हुई थी, कुछ-कुछ वैसी ही अनुभूति इस समारोह के बाद मेरी थी। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- 'I visited as a delegate, the Bankipore congress during christmas 1912. It was very much an English knowing upper class affair, Where morning coats and well-pressed trousers were greatly in evidence. Essentially it was a social gathering with no political excitment or tension.(Page-30)' इसमें यदि संशोधन की जरूरत है तो बस 'अपर क्लास` की तरह 'अपर कास्ट` भर की। कुलीन 'बुद्धिजीवियों` की इस खूबसूरत कांफ्रेंस में प्रतिभागियों की रूचि विकास में कम, अपनी धज प्रदर्शित करने में अधिक थी। इस समारोह को ग्लोबल नहीं गोलमाल समारोह कहने वाले लालू प्रसाद ने भी ठीक इसी समय को ब्राह्मणवादी ठीहे पर आत्मसमर्पण के लिए चुना था। इस दौरान वे अपने गांव में शंकराचार्य को बुलाकर उनके चरणों में लोट रहे थे। फुलवरिया में खुला ब्राह्मणवाद था तो पटना में प्रच्छन्न ब्राह्मणवाद। अब बिहार को इनके बीच से आगे या पीछे जाना है।

सवाल उठता है बिहार में विकास का मॉडल क्या हो? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद सोचते हैं तो उनके सोच में सामाजिक न्याय का एक पुट होता है। पंचायत चुनावों में अपनी सोच को साकार कर उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। महिलाओं और बहुत पिछड़े तबकों को पंचायत चुनावों में आरक्षण सुनिश्चित कर ग्रामीण इलाकों में उन्होंने एक नया नेतृ वर्ग खड़ा किया है। इससे जो हलचल पैदा हुई है वह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का कारक बनेगा। लेकिन नीतीश कुमार यदि यह सोचते हैं कि बाहरी निरंकुश निवेश से बिहार में विकास होगा तो वे गलती पर हैं। वास्तविक विकास के लिए ग्रामीण स्तर पर कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी रूझानों को बल देना होगा। आजादी के बाद से ही ब्राह्मणवादी-समाजवादी चेतना ने निचले स्तर पर पूंजीवादी रूझानों को हतोत्साहित किया और इसी का नतीजा है गांव और शहर की दूरी बढ़ती गयी। जिन लोगों ने यूरोप में औद्योगिक क्रांति के इतिहास का अध्ययन किया है वे यह भी जानते हैं कि किन लोगों ने वहां इसे विकसित किया था। पूंजीवाद एक अवस्था में प्रगतिशील कदम होता है क्योंकि यह सामंतवादी रूझानों को खत्म करता है। (फ्रांसीसी लेखक बॉल्जाक की रचनाओं को देखें। मार्क्स ने इसे रेखांकित किया है।) हमारे मुल्क में आयातित समाजवाद ने अपनी लड़ाई पूंजीवाद से शुरू की। (दरअसल समाजवाद पूंजीवाद से ही संघर्ष करता है।) इसका प्रतिफल हुआ कि एक तरफ तो समाज के सामंतवादी रूझान साबूत रह गये दूसरी तरफ ऊंची जातियों के प्रभुत्व वाले लोकतंत्र ने जिस समाजवाद को लाया वह ब्राह्मण-समाजवाद बन कर रह गया। उदाहरण के लिए भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में ऊंची जातियों, खासकर ब्राह्मणों के प्रभुत्व को देखंे। यह सरकारी प्रयासों से हुआ है। (विस्तृत अध्ययन के लिए गेल ऑम्वेट का लेख 'रिजर्वेशन इन प्राइवेट सेक्टर` द हिन्दू ३१ मई-१ जून २००१) अब विकास के इस दौर में देखना होगा कि निचले तबकों को लेकर हम विकास का कैसा खाका बनायंे जिससे वास्तविक विकास हो सके। शायद इसे ही नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास कहते हैं। इसके लिए पूंजी से अधिक ज्ञान और समर्पण की जरूरत है। फ्रांसीसी लेखक-चिन्तक गाइ सोमां इसे बेयरफुट कैप्टिलिज्म (नंगे पांव पूंजीवाद) कहते हैं। यह बेयरफुट कैप्टिलिज्म विकास का आधार बनेगा तभी सामाजिक न्याय भी संभव होगा। (मार्च अंक में इस विषय पर गाई सोमां का लेख देखेंगे) १९-२१ जनवरी को संपन्न ग्लोबल मीट पिछड़े बिहार को विकास की ओर नहीं, एक नयी राजनीतिक गुलामी की ओर ले जायेगा जो अंतत: एक जटिल सामाजिक गुलामी को भी जन्म देगा और जिससे जूझने में समानता और आजादी के सिपाहियों को दशकों का समय लग जायेगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे की मजबूती के लिए रात-दिन परिश्रम कर रहे हैं। हर सभा-समारोह में लाठी फेंकने और कलम-कागज पकड़ने की बात कहते हैं। बिहारियों की लगनशीलता और काबलियत पर वे इतराते भी हैं। इस मानव संसाधन को उन्होंने अपनी पूंजी माना है। जाति और संप्रदाय से बाहर आकर वे बिहारीपन की, इसके स्वाभिमान की बात करते हैं। दरअसल यही वह महत्वपूर्ण कार्य है जिससे निचले स्तर से पूंजीवादी रूझान विकसित होंगे। इसी आधार पर सम्यक विकास की रूप रेखा बन सकेगी। यही वास्तविक सामाजिक न्याय भी है। जैसा कि राष्ट्रपति कलाम ने भी २०१५ तक पूर्ण साक्षरता और पूर्ण गरीबी उन्मूूलन की बात की है। इसे हर हाल में हासिल करना होगा। लेकिन प्रवासी निवेशकों की रूचि साक्षरता और गरीबी उन्मूलन में नहीं है। उनकी रूचि औन-पौन दाम में जमीन हासिल करने और येन-केन अपनी झोली भरने में है। किसी भी विकास पुरुष के लिए ऐसे लोगों से सावधान रहना ही श्रेयस्कर होगा।
जनविकल्प से साभार