24 जून 2013

वरवर राव से बातचीत का दूसरा भाग.


यूरोपियन मीडिया, लैटिन-अमेरिकी देशों की मीडिया या अन्य देशों की मीडिया जिसकी किसी भूमिका से आप बहुत प्रभावित हुए हों?

वैसे तो मैं मीडिया की भूमिका से प्रभावित नहीं हूँ मगर मीडिया में लिखने वाले कुछ लेखकों से जरूर प्रभावित हूँ। खासकर एदुआर्दो गालेआनो एक जर्नलिस्ट है, लैटिन अमेरिका में। ज्यादातर उसने ‘गडमेला के स्टेबल’ को लेकर बहुत कुछ लिखा है पर समग्रता से पूरे लैटिन अमेरिका में, जितने भी देशों में अमेरिकन साम्राज्य के विरोध में संघर्ष चल रहा है, उसके बारे में रिपोर्टिंग करने और किताबें लिखने के लिए एदुआर्दो गालेआनो से बेहतर और कोई नहीं है। आजकल जेम्स पेत्रास है जो खासकर भूमंडलीकरण के विरोध में लिख रहा है। वैसे देखें तो ज्यादातर लोग फ्रीलांस करने वाले इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट हैं, इन्हें हम मीडिया नहीं कह सकते। मगर वो अपने लेखन से ऐसी जगह पहुँच गए हैं कि वे जो भी लिखें तो मीडिया लेता है, रॉयल्टी देता है क्योंकि लोग पढ़ते हैं। उनका लेखन बिकता है। जेम्स पेत्रास लिखे तो बिकता है, एदुआर्दो गालेआनो लिखे तो बिकता है, चॉम्स्की लिखे तो बिकता है।

एक समय था जब बाजार सहमति का निर्माण कर रहा था, Manufacturing the consent, कन्सेंट को मेन्यूफेक्चर कर रहा था। पहले इतना प्रचार करते हैं कि आप एक खास ‘ब्रांड’ का टूथ-पेस्ट उपयोग करें मगर आपके दाँत वैसे सफेद नहीं हो सकते। पहले टूथ-पेस्ट खरीदने के लिए मानसिकता को बनाता है (माइंड सेट करता है), बाद में टूथ-पेस्ट को प्रोड्यूस करता है। यानी सहमति की उत्पत्ति होती है। यह स्थिति थी। आज यहाँ तक कि मेन्यूफेक्चरिंग डिसेंट भी मार्केट करता है। अब देखिए, तेलंगाना में एक समय हमारी न्यूज छापना अख़बार बेचने के लिए एक अच्छी चीज थी। खासकर टास्क के समय में (2004 में), फर्स्ट पेज पर हेडलाइन होती थी हमारी न्यूज। अब रामकृष्णा का इतना प्रचार हुआ टास्क के समय में, खासकर बंदूक रखे हुए जो फोटो हैं, हजारों फोटो छापे हैं हजारों न्यूज पेपर में, क्योंकि वह बिकता है। मीडिया के बारे में बात करना, एक तरह का रोजॉर्न ऑन द कन्ट्राडिक्शन्स। उसका मालिक होता है, उसका प्रॉपराइटर होता है, उसके लिए निहित स्वार्थ होता है, उसमें काम करने वाले होते हैं, खासकर जो ग्रास-रूट लेवल में स्ट्रिंगर्स से लेकर। मीडिया से जनता जो आशा करती है, वे उससे जानकार लोग होते हैं, होना चाहिए, नहीं होते हैं यह दूसरी बात है, होना चाहिए। उससे बहुत माने हुए लेखक आए हैं। राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी बहुत बड़ी भूमिका है, वाल्टेयर मूवमेंट में पत्रकारों की जो भूमिका है। जब समझते हैं कि ‘हमारे लिए इंडस्ट्री, खासकर न्यूज पेपर में काम नहीं मिल सकता है’, तो बाहर जाकर लिखते हैं। इमरजेंसी में बहुत से पत्रकारों को भी अरेस्ट किया था। कुलदीप नैयर तो जेल में था क्योंकि इमरजेंसी का विरोध कर रहा था, बाद में उसने अपने अनुभवों को लिखा। वैसे तो बहुत से माने हुए यूरोपियन जर्नलिस्ट भी हैं, मगर मेरे ऊपर जो प्रभाव है, एदुआर्दो गालेआनो का है। ऐसे भी लैटिन अमेरिका के जितने भी लेखक हैं, वे पत्रकार भी हैं, जैसे मैं हूँ। (गाब्रिएल गार्सिया) मार्केस, एक तो उपन्यासकार थे और वो रिपोर्टिंग भी कर रहे थे। यूरोप में हेमिंग्वे, जो लेखक था, वह युद्ध की रिपोर्टिंग करता था। द्वितीय विश्व युद्ध में, he was the reporter. ऐसे लोगों का प्रभाव है, हेमिंग्वे का तो बहुत प्रभाव है।



नेपाल में जनता क्रांति कर रही थी और पड़ोसी देश भारत का मीडिया क्रांति को आतंकवाद कह रहा था। आपने तब भारत की मीडिया के बारे में क्या राय बनाई थी?

नेपाल की क्रांति जब तक क्रांति रही है, वहाँ और यहाँ भी क्रांति को आतंकवाद ही कहा गया है। मगर नेपाल में जब क्रांति संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुई तब वहाँ और यहाँ की मीडिया उसकी बहुत प्रशंसा कर रही है। आपने बहुत अच्छा सवाल पूछा है। शायद एक सप्ताह पहले दिल्ली में प्रचंड आया था और द हिन्दू में दो दिनों तक सिलसिलेवार उसका साक्षात्कार आया और वह कहता है कि भारत-नेपाल का सम्बन्ध बहुत अच्छा होना चाहिए। भारत हमारी बहुत सहायता करता है। हम क्रांति छोड़कर 'प्लूरल डेमोक्रेसी' में आये हैं। हम में से जो लोग गए हैं उनसे क्रांति नहीं आ सकती, वे कुछ निश्चय कर सकते हैं मगर क्रांतिकारी नहीं हो सकते। हमें कहना है कि आज के प्रचंड और बाबूराम भट्टराई को लेकर सीताराम येचुरी हों या मनमोहन सिंह हों, बहुत प्रशंसा करते हैं क्योंकि इन लोगों ने क्रांति छोड़ दी है। ऐसा नहीं है कि नेपाल में क्रांति हो रही है तो यहाँ की क्रांति को आतंकवाद कहते हैं। क्रांति कहीं भी होती है तो इसे आतंकवाद ही कहते हैं। क्रांति नहीं हो रही है, क्रांति के नाम पर क्रांति का विरोध हो रहा हो तो बहुत प्रशंसा होती है। जो आज चल रहा है वो एक ‘continuation of corolism’ है। एक समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार थी, आज मल्टीनेशनल कंपनी की सरकार है। ईस्ट इंडिया कंपनी के इंटरेस्ट में 1857 में संघर्ष हुआ था जब ईस्ट इंडिया कंपनी से कुछ नहीं हो सका तो उससे ब्रिटिश सरकार बनी जो कंपनी की हिफाजत करती थी। क्लाइव के बारे में, वारेन हेस्टिंग्स के बारे में उसके बयान को देखें तो कंपनी को कितना फायदा मिला है? कितना नुकसान किया है? इंग्लिश पार्लियामेंट में बहुत चर्चा चली है, उसके बारे में। आज की स्थिति में देखा जाए तो यह बहुत छोटी बात है।

आज बुश क्या काम कर रहा है? या दूसरे अमेरिकन प्रेसिडेंट जो रिटायर्ड हुए हैं, क्या कर रहे हैं? ये लोग बड़ी-बड़ी कंपनियों में लग गए हैं, कम्पनियाँ इनके इंटरेस्ट में चल रही है, जिसमें क्लिंटन भी शामिल है। क्लिंटन दवा-उद्योग में है तो कोई शस्त्र-उद्योग में। तो वो इंटरेस्ट में ही राजनीति में आते हैं। अब 1930-40 के जर्मनी की स्थिति देखिए। हिटलर चुनाव में जाने से पहले 'नेशनल सोशलिज्म' का स्लोगन लेकर चुनाव लड़ा था। उसने कहा था कि ‘मैं सरकार में आऊंगा तो 'नेशनल सोस्लिज्म' लाऊंगा।’ एक तो 'नेशनल' बोलकर सेंटीमेंट को अपील कर रहा था और 'सोशलिज्म' बोलकर रिवर्सिटी को अपील कर रहा था। हिटलर का मानना था कि जर्मन ही शासन कर सकते हैं। उसको यहूदियों से समस्या थी और ‘यहूदी को ख़त्म करो’ कहते हुए उसने लगभग 90 प्रतिशत यहूदियों को ख़त्म किया। दूसरी तरफ 'नेशनलिटी' के विषय में उसका कहना था कि जर्मन, आर्यन हैं और आर्यन ही पूरी दुनिया पर शासन कर सकते हैं। एक समय था, सिकंदर का मानना था कि ग्रीक राजा ही पूरी दुनिया को जीत सकता है। इसीलिए सिकंदर दुनिया को जीतने निकला था। वह सिविल सोसाइटी का समय था। यूरोप में तो एक कहावत भी है कि जो भी नेशनल स्टेट हैं इनमें से एक-एक को अपने बारे में एक अलग भावना होती है।

फ्रांस की जनता समझती है कि वो बहुत सभ्य हैं और जर्मनी के लोग असभ्य। किसी को गाली देनी है तो उसे 'जर्मन' बोलते हैं। जर्मन समझते हैं कि हम आर्यन हैं और हम सबसे ज्यादा सभ्य हैं। इसी प्रकार अंग्रेज लोगों का मानना है कि जो हैं सो हम ही हैं और पूरी दुनिया पर हमने ही शासन किया है। सबका यही रवैया है। अब संस्कृत में देखिए आप, ‘म्लेच्छ’ कहते हैं, ‘अनटचेबल’ जो यहाँ के दलित लोग होते हैं। ‘अनटचेबल’ यूरोप में भी होते हैं। ये जो माइंड सेट होता है, इसी माइंड सेट को अपील करके वो सरकार में आया। अपनी कंपनी का यह रूल लागू करने के लिए पार्लियामेंट में उसके लिए बहुत मुश्किल हो गई और काम नहीं बना तो तो पार्लियामेंट को जला कर कम्युनिस्टों के ऊपर इसका इल्जाम लगाया और दो कम्पनियों की हिफ़ाजत के लिए वहाँ फासिज्म लाया, इसी तरह द्वितीय विश्वयुद्ध आया। आज हम देखें तो पूरी दुनिया की स्थिति एक-जैसी हो गई है। एक तरफ़ तो क्राइसिस है उनके इम्पीरियलिज्म का, दूसरी तरफ़ उस क्राइसिस से बाहर आने के लिए फ़ासिज्म। पार्लियामेंट की स्थिति देखिए आप। पार्लियामेंट चलता ही नहीं और संविधान के तहत जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसके दायरे में काम नहीं चल रहा है। सी.बी.आई. है, यह एक स्टेच्यूटरी बॉडी है। उसे जो जाँच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किया है, वह अपनी रिपोर्ट कानून मंत्री को बताता है।

आदिवासियों के बारे में देखिए। फिफ्थ शिड्यूल है, सिक्स्थ शेड्यूल है, अपने जल-जंगल-जमीन के लिए तो...उसके ऊपर उनका हक है। दूसरी तरफ़ जैसे नॉर्थ-ईस्ट स्टेट्स बने हैं। यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन में जल-जंगल-जमीन के ऊपर ही नहीं, इलाके की बात भी आई है। एक तरफ़ इंटरनेशनल लॉ और यहाँ के संविधान के तहत इतने हक हैं, दूसरी तरफ़ पूरे भारत में पूर्वी भारत से लेकर दक्षिण भारत तक सेंट्रल इंडिया में लाखों एकड़ जमीन आदिवासियों से छीन ली जा रही है, विस्थापन हो रहा है। बात क्रांति की नहीं है। संविधान कहाँ लागू हो रहा है? मौलिक अधिकार कहाँ लागू हो रहे हैं? संविधान की प्रस्तावना कहाँ लागू हो रही है? डायरेक्टिव पॉलिसीज को तो छोड़ दीजिए क्योंकि डायरेक्टिव पॉलिसीज में तो...अस्पृश्यता मिट जाना, हरेक को शिक्षा मिलना, समानता की बातें हैं। डायरेक्टिव बिल तो सरकार की तरफ से कोई बंधन नहीं है। ‘it is not binding on the part of Sarkar’, मगर एक आदर्श है। जो ‘bindingly’ सरकार के ऊपर जो धारा-56 है, वह भी नहीं लागू हो रही है। यानी जैसा संकट बढ़ता है, खासकर जो साम्राज्यवाद का संकट बढ़ता है, साम्राज्यवाद के प्रभाव में हैं सरकारें। जितने भी कानून बनाते हैं, जितने भी पार्लियामेंट-असेम्बली चलाते हैं, वे भी नहीं चल सकते। यानी उनका कानून ही उनके लिए शृंखला (बेड़ी) बन जाता है। उनका शासन ही उनके लिए शृंखला (बेड़ी) बन जाता है और उसको छोड़कर अपने असली रूप, जो फासिज्म का रूप होता है, वह दिखता है। इसमें और एक समझने वाली बात है कि यूरोप, जो पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की जन्म-भूमि है, खासकर इंग्लैंड और फ्रांस, वे देश भी द्वितीय विश्व युद्ध के समय संकट में आ गए। जर्मनी, इटली और जापान में पार्लियामेंट खत्म होकर फासिज्म-नाजिज्म लागू हुआ। तो तीसरी दुनिया के बारे में क्या समझ सकते हैं जहाँ संसदीय लोकतंत्र के लिए कोई जगह ही नहीं है। इसलिए कहते हैं कि संसदीय लोकतंत्र के लिए यहाँ जगह नहीं है, इसीलिए यहाँ जो लोकतंत्र आना है, वो नया लोकतंत्र ही हो सकता है जो क्रांति से होता है, शस्त्र-संघर्ष से होता है। आज वही चल रहा है भारत में।

अहिन्दी क्षेत्र की ख़बरें, राष्ट्रीय समाचार पत्र हिंदी क्षेत्र में नहीं पहुँचाते हैं। ऐसे में क्या राष्ट्रीय अखंडता प्रभावित होती है?

अब आज की स्थिति ऐसी आ गई है कि जिला संस्करण होते हैं। एक जिले की खबर दूसरे जिले में नहीं जाती है। अब हैदराबाद को ही लीजिए। एक दिलसुखनगर का संस्करण होता है, एक चिकटपल्ली का और एक उस्मानिया कैम्पस का संस्करण। दिलसुखनगर की ख़बरें आपके इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी) में ही रह जाती है। यानी न्यूज़ को कम्पार्टमेंटलाइज्ड कर दिया है और दमन को नेशनलाइज्ड कर दिया है। जनता क्या सोच रही है इसको कम्पार्टमेंटलाइज्ड कर दिया है और इस सोच को लेकर सरकार जो दमन चला रही है वह सेंट्रलाइज्ड रहे, कॉरपोरेटाइज्ड बना रहे। ख़ास कर आन्ध्र प्रदेश में 1974 से ईनाडु दैनिक शुरू हुआ है तभी से जिला संस्करण शुरू हुआ और न्यूज़ कम्पार्टमेंटलाइज्ड हुआ है।

हम वारंगल में रहते थे, बड़ा रेडिकल मूवमेंट था। उस रेडिकल मूवमेंट को लेकर जिला प्रशासन जो दमन चलाती थी वह खबर जिले के ही अखबार में आती थी। लेकिन अगर उसके ऊपर किसी कांग्रेसी नेता या एम.एल.ए. की प्रतिक्रिया आती तो पूरे आन्ध्र प्रदेश में खबर आती। तो बाहर वाले पूछते कि आपने यह क्या किया है? समझिये इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी) में एक संघर्ष चल रहा है और कुलपति का पुतला फूँका गया। कुलपति सेन्ट्रल के ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट का है और उसका पुतला फूँका गया तो पूरी दिल्ली में खबर पहुँचती है। क्योंकि दिल्ली में उसी समय उसकी किताब का राष्ट्रपति उद्घाटन भी कर रहा होता है। लेकिन दिल्ली के इफ्लू में रहने वाले छात्रों पर पुलिस ने दमन किया तो यह जिला संस्करण में आता है। यह तो हो ही रहा है। देखिये न, अभी कितनी आत्महत्याएँ हुई हैं इफ्लू में। अब देखिए स्थितियाँ कितनी बदल गई हैं? बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में राधाकृष्णन कुलपति बनाए गए थे। राष्ट्रीय आन्दोलन का समय था। विश्वविद्यालय के अन्दर और बाहर बहुत संघर्ष चल रहे थे। विश्वविद्यालय के अन्दर आर्मी भेजनी पड़ी थी। जब राधाकृष्णन को ले जाया गया तो उन्होंने कहा कि ‘जब तक सेना कैम्पस से बाहर नहीं आती, तब तक मैं अपना कुलपति पद नहीं संभालूँगा।’ तो प्रशासन को मानना पड़ा। पुलिस बाहर आई तो वे अन्दर गए और पद संभाला। अब उस वैल्यू सिस्टम की आज के वैल्यू सिस्टम से तुलना कीजिए। अब के कुलपति आते ही पुलिस को बुलाकर लाते हैं। हॉस्टल में स्टूडेंट की समस्या हुई है, एक मरा, दूसरा मरा! यह कौन हल करेगा? शिक्षक का क्या कर्तव्य है? मैं क्लास में पढ़ा रहा हूँ। 120 छात्र हैं, इन 120 छात्रों को पचास मिनट के लिए कंट्रोल करने का जो मेरा मोरल अथॉरिटी, मोरल रिस्पांसिबिलिटी होती है, क्या मैं ये पुलिस की सहायता से कर सकता हूँ? कैम्पस में कितने भी...यानी you lost your moral responsibility and the authority, and that’s …..लाठी बुला रहा है। यही हर जगह हो रहा है। 1982 से 1984 तक हमारे वारंगल के 12 कॉलेजों में रेडिकल मूवमेंट के कारण धारा-144 लगाई गई थी। मैं क्लास में पढ़ाता था तो खिड़की से बाहर बन्दूक दिखती था। मैंने एक जगह लिखा भी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में जर्मनी में यह बात फैल रही थी कि अब जर्मनी, पेरिस नगर पर कब्ज़ा करेगा। इस पर एक अच्छी फिल्म भी 'लास्ट लेसन' आई है। फ्रेंच शिक्षक रोजाना सबक पढ़ाता कि कल से फ्रेंच भाषा नहीं पढ़ाई जाएगी क्योंकि जर्मन लोग आ जाएंगे। The last date for teaching वाली स्थिति हमारे यहाँ भी दो सालों तक रही थी। तो यह स्थिति आजकल हर जगह हो गई है। चाहे केंद्रीय विश्वविद्यालय हो, इफ्लू हो या उस्मानिया कैम्पस हो। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के बाहर पुलिस ने मुझको रोका कि कहाँ जा रहे हो और क्यों जा रहे हो? तब प्रो. वी. कृष्णा ने उनको मुझे अन्दर आने देने को कहा, तब जाकर मुझे अन्दर जाने दिया गया। यह कैसी स्थिति आ गई है? अब मीडिया को भी देखिए आप, ईनाडु के ऑफिस में प्रवेश नहीं कर सकते है! हर जगह दिखने वाला स्टेट कंट्रोल है और स्टेट के ऊपर कॉरपोरेट कंट्रोल है।

अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल को मीडिया ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नायक घोषित किया। मीडिया की इस भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?

अब देखिए, तो 11 अप्रैल, 2011 को जब पहली बार अन्ना ने आन्दोलन शुरू किया था तो उस दिन मैं एम.एल. पार्टी के क्रन्तिकारी नेतृत्वकर्ता वासुदेव राव का पहला मेमोरी लेक्चर दे रहा था। मैंने कहा था कि ये तो अन्नलू के विरोध में अन्ना को लाया है। अन्नलू नक्सल को कहते हैं जिसका मतलब होता है भाई। जंगलमहल से लेकर बारह राज्यों में जो माओवादी आन्दोलन आया है, उसे मनमोहन सिंह देश के लिए बहुत बड़ा खतरा समझता है।  तो अन्नलू के प्रभाव का क्या करे, तो अन्ना हजारे को लाया। अन्ना हजारे सरकार और मीडिया दोनों के द्वारा मिलकर खड़ा किया गया है। इसके पीछे की कहानी यह है कि एक तरफ बी.जे.पी. बाबा रामदेव को प्रमोट कर रही थी। अब आप यह भी देखिए कि देश में बाबा रामदेव के बहुत उद्योग हैं, बहुत-सी दुकानें हैं। अब उन दुकानों के विज्ञापन के लिए उसको एक आश्रम चाहिए, एक पॉलिटिक्स चाहिए। अब ये सब तो एक घेरे के तहत होता है न। राजा दुष्यंत का राज चलना है तो राज चलने के लिए एक आश्रम होता है, वहाँ ऋषि होते हैं और उन ऋषियों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन देते हैं, गायें देते हैं। तो वे उसके धर्म को पालते हैं। ये ब्राह्मण हैं, वे क्षत्रिय हैं। वैसे ही रामदेव का आश्रम है, हर तरीके की बहुत-सी दुकानें हैं। अब उसको चलाना है तो उसके लिए एक धर्मनीति और एक राजनीति जरूरी हो जाती है और बी.जे.पी. उसको एक वाइस प्रेसीडेंट कैंडीडेट के रूप में देखती है। एक रामदेव है, योग वगैरह भी सिखा रहा है, उसका प्रभाव हो रहा है जिसका मीडिया भी खूब प्रचार कर रहा है। सरकार ने सोचा हम किसको लाएँ? तो अन्ना को लाया गया। सेबेस्टियन जो कि हमारे CPDR (Committee for Protection of Democratic Rights) का प्रेसीडेंट है। वह हैदराबाद के एक डेमोक्रेटिक राइट्स मूवमेंट में कह रहा था कि (अन्ना हजारे) गाँव में लोगों को पीटता है, प्रतिरोध पर लिखित रूप से प्रतिबंध लगाता है। ये कैसे प्रतिबंध लगते हैं? कैसे लागू करते हैं? ये अस्पृश्यता को बनाए रखना चाहता है। ये वैसा ही धर्म चाहता है, जैसा गाँधी ने चलाया था। खैर, जो भी हो, वैसे दो-तीन गाँवों में सुधार करने वाला आदमी जब दिल्ली में बैठता है और मीडिया का इतना बड़ा रिस्पॉन्स मिलता है तो वह अपने आपको बहुत बड़ा समझता है। यह बंबई आया था, सैकड़ों-हजारों गाड़ियाँ आई थीं। तो यह समझा कि ‘ये सब मेरे लिए आए हैं।’ अरे, ये सब तुम्हारे लिए नहीं, अपने इंटरेस्ट के लिए आए हैं। बासागुडा मुठभेड़ के बाद हम दिल्ली में धरना पर थे। कोई भी मीडिया वाला हमारे पास नहीं आया। दूसरी तरफ अन्ना हजारे का आन्दोलन चल रहा था, पूरा मीडिया वहाँ जमा हुआ थी। लगभग पचास चैनल्स स्थापित किए थे उन्होंने! अब देखिये, मीडिया के लिए अन्ना हजारे में कोई आकर्षण नहीं है। तो अब केजरीवाल को लाए हैं, अब केजरीवाल को प्रमोट किया जा रहा है। हमारा जैसा अनुभव है कि आम आदमी के टोपी वाले ने अज्ञान की रक्षा की है। आने वाले समय में कैसे डेमोक्रेसी हो सकती है? यानी "one can do or undo" आज स्थिति यह है कि कॉरपोरेट कम्पनियाँ किसी को ऊपर उठा भी सकती हैं और किसी को गिरा भी सकती हैं। अब अन्ना हजारे हो या जो भी हो। समझना यह है कि संकट क्या है? राजनीतिक अर्थशास्त्र का संकट क्या है? संसदीय लोकतंत्र का संकट क्या है? इसको ख़त्म करने के लिए अलग-अलग प्रयोग कर रहे हैं। एक तरफ दमन का दौर चल रहा है तो दूसरी तरफ ये नीति कभी शासक के लिए स्टिकेन कैरेक्टर का होता है। स्टिकी होता है और उसके साथ कैरेक्टर भी होता है। दमन तो चलता रहता है, शासन का दबाव भी बढ़ता रहता है। कभी-कभी इतिहास का भी इस्तेमाल होता है, वह चाहे अन्ना हजारे का हो या अरविन्द केजरीवाल का या फिर आम आदमी का हो। ‘आम आदमी’ भी आज कोई आम आदमी नहीं है। आम आदमी ग्रास रूट लेवल के सेंस में है।    

बुद्धिजीवियों का एक वर्ग मानता है कि मीडिया भारत में माओवादियों को बहुत कवरेज देता है?


कहाँ दे रहा है सही कवरेज? जब चाहा तब बहुत कवरेज दिया। मेरा अनुभव कहता है कि एक साल पहले मुझे अंग्रेजी इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले NEWS6  हो, NDTV हो, HEAD LINES  हो या TIMES NOW  हो, महीने में चार-पाँच बार बुलाते थे। TIMES NOW  हम नहीं जाते थे,  इन्कार करते थे। एक तरफ से सभी बुलाते थे, बहस होती थी। अब तो मीडिया में कवरेज ही नहीं है। उन्होंने जब चाहा तब किया। ये भी इसलिए कि सरकार इसका प्रचार करके उसके ऊपर दमन लाने के लिए या बुद्धिजीवियों के ऊपर जो इसका प्रभाव है उसको ख़त्म करने के लिए। इनको भी बुलाएँगे उनकी राय जानने के लिए और दूसरे लोगों से उसका खंडन भी करवाएँगे। मुद्दे के अंग-अंग का खंडन करते हैं और हमें यह बताना चाहते हैं कि कोई इसका जवाब नहीं दे सका है। मगर इसमें ये असफल हुए हैं। जब असफल हो गए तो साइलेंस किलिंग शुरू किया है। मीडिया आज कोई भी बड़ा विस्फोट हो या एनकाउण्टर हो, बाहर आने नहीं देती है।

1 टिप्पणी:

  1. आपने वही सवाल पूछे हैं जो जवाब देने वाले के लिए सुविधाजनक हैं. आपने पश्चिम बंगाल में माओवादियों की ममता बनर्जी के साथ मिलीभगत के विषय में प्रश्न ही नहीं किया. आश्चर्य है कि माओवादी उस बुर्जुआ मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं,जो उन्हें सबसे ज्यादा प्रचारित करता रहा है. "जो बिकता है, वह छपता है", यह तो पूंजीवाद का सार्वभौमिक सत्य है. मगर बुर्जुआ मीडिया में छपने के लिए माओवादी कोई प्रयास नहीं छोड़ते और यदि वे बिक सकें तो बुर्जुआ मीडिया को उन्हें छपने में कोई दिक्कत भी नहीं है. नेपाल के विषय में भी बहुत सतही सवाल पूछे गए हैं. यह नहीं पूछा गया कि क्या वरवर राव की पार्टी प्रचंड की इस लाइन से असहमत है, की नेपाल में राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग क्रांति का मित्र है? यह नहीं पूछा गया कि क्या नेपाल में प्रचंड के "जनवादी जनतंत्र" के निर्माण के उस कार्यक्रम से जिसे उसने माओ के "नव जनवाद" से लिया है, वह सहमत हैं या असहमत? यह नहीं पूछा गया कि वह नेपाल में सर्वहारा की तानाशाही के नारे का समर्थन करते हैं या विरोध? यह साक्षात्कार न तो भारत और न नेपाल में क्रांति के किसी भी प्रश्न को ठीक से प्रस्तुत करता है.....

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