02 दिसंबर 2011

दिल्ली से तीन कविताएं.


सुबह-सुबह ये कविताएं आसुतोष ने दिल्ली से भेजी, अब देखो भी कि दिल्ली भी इतनी नजदीक लगती है कि.......इन तीनों कविताओं को यहां पोस्ट कर रहा हूं.

गुमशुदगियों की तलाश करती कविता --''कवि के साथ -३'',मंगलेश डबराल , आर चेतन क्रांति , लीना मल्होत्रा -- शाम ७ बजे , तीन दिसंबर, कैजूरिना हौल, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नयी दिल्ली.

गुमशुदा की तलाश

शहर के पेशाबघरों और अन्य लोकप्रिय जगहों में

उन गुमशुदा लोगों की तलाश के पोस्टर

अब भी चिपके दिखते हैं

जो कई बरस पहले दस बारह साल की उम्र में

बिना बताए घरों से निकले थे

पोस्टरों के अनुसार उनका क़द मँझोला है

रंग गोरा नहीं गेहुँआ या साँवला है

हवाई चप्पल पहने हैं

चेहरे पर किसी चोट का निशान है

और उनकी माँएँ उनके बगै़र रोती रह्ती हैं

पोस्टरों के अन्त में यह आश्वासन भी रहता है

कि लापता की ख़बर देने वाले को मिलेगा

यथासंभव उचित ईनाम

तब भी वे किसी की पहचान में नहीं आते

पोस्टरों में छपी धुँधँली तस्वीरों से

उनका हुलिया नहीं मिलता

उनकी शुरुआती उदासी पर

अब तकलीफ़ें झेलने की ताब है

शहर के मौसम के हिसाब से बदलते गए हैं उनके चेहरे

कम खाते कम सोते कम बोलते

लगातार अपने पते बदलते

सरल और कठिन दिनों को एक जैसा बिताते

अब वे एक दूसरी ही दुनिया में हैं

कुछ कुतूहल के साथ

अपनी गुमशुदगी के पोस्टर देखते हुए

जिन्हें उनके माता पिता जब तब छ्पवाते रहते हैं

जिनमें अब भी दस या बारह

लिखी होती है उनकी उम्र ।

आर. चेतनक्रांति



परदे के पीछे शायद कोई आंख हो

उससे कहा गया कि सबसे पहले तुम्हें खुद को बचाना है उसके बाद दुनिया को

अगर समय रहा तो , पूरी ट्रेनिंग का सार बस यही था

कि जब जरुरत हो प्रेम दिखाना मुकर जाना अगर कोई याद दिलाये

कि तुम अपनेपन से मुस्कराये थे जब बेचने आये थे

मॉल बिकने के बाद तुम सिर्फ कम्पनी के हो कम्पनी के मॉल की तरह

और इसी तरह तुम्हें दिखना है, इसे जीवन शैली समझो

यह सिर्फ ड्यूटी कि बात नहीं है

और फिर हम उन्हें देखते हैं , नये बाजारों में

टीवी के परदों पर सड़कों के सिरहानों पर सजे चमकपटों पर

मूर्तियों सी शांत सुसज्जित लड़कियां

जिनकी त्वचा उनसे बेगानी कर दी गई

मुँह खोलने से पहले जो

हथेलिओं से थामतीं हैं कृत्रिम रासायनिक सौंदर्य को

जो दरअसल सम्पत्ति है पे मास्टर की

बुतों कि तरह ठस खड़े जोधा लड़के

जिनके बदन की मचलियाँ बींध दी गयीं हैं भव्य आतंक से

और जो हंसने से पहले जाने किससे इजाजत मांगते हैं

शायद दीवार में कोई आंख हो

शायद परदे के पीछे कोई डोरियां फंसाये बैठा हो ...

लीना मल्होत्रा राव



चाँद पर निर्वासन

मुअन जोदड़ो के सार्वजानिक स्नानागार में एक स्त्री स्नान कर रही है

प्रसव के बाद का प्रथम स्नान

सीढ़ियों पर बैठ कर देख रहे हैं ईसा, मुहम्मद, कृष्ण, मूसा और ३३ करोड़ देवी देवता

उसका चेहरा दुर्गा से मिलता है

कोख मरियम से

उसके चेहरे का नूर जिब्राइल जैसा है

उसने जन्म दिया है एक बच्चे को

जिसका चेहरा एडम जैसा, आँखे आदम जैसी, और हाथ मनु जैसे हैं

यह तुम्हारा पुनर्जन्म है हुसैन

तुम आँखों में अनगिनत रंग लिए उतरे हो इस धरती पर

इस बार निर्वासित कर दिए जाने के लिए

चाँद पर

तुम वहां जी लोगे

क्योंकि रंग ही तो तुम्हारी आक्सीजन है

और तुम अपने रंगों का निर्माण खुद कर सकते हो

वहां बैठे तुम कैसे भी चित्र बना सकते हो

वहां की बर्फ के नीचे दबे हैं अभी देश काल और धर्म

रस्सी का एक सिरा ईश्वर के हाथ में है हुसैन

और दूसरा धरती पर गिरता है

अभी चाँद ईश्वर कि पहुँच से मुक्त है

और अभी तक धर्मनिरपेक्ष है

चाँद पर बैठी बुढ़िया ने इतना कपडा कात दिया है

कि कबीर जुलाहा

बनायेगा उससे कपडा तुम्हारे कैनवास के लिए

और धरती की इस दीर्घा से हम देखेंगे तुम्हारा सबसे शानदार चित्र

और तुम तो जानते हो चाँद को देखना सिर्फ हमारी मजबूरी नही चाहत भी है

1 टिप्पणी:

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