14 दिसंबर 2011

इस बरस का पुल, नदी, चप्पल और विज्ञान- पहला हिस्सा

चन्द्रिका

बालू पर गिरे हुए थोड़े से आंसू हैं और मन में उनके नमकीनपन की गमगीनीयत. बीते साल में आंसुओं को हमने फिर भी बचा लिया और बची रह गयी इस बार भी आदमियत बहुत थोड़ी ही सही. कोई किताब है जो जो पढ़ते-पढ़्ते छूट गई है और उसके अधखुले पन्ने पर एक चींटी रेंग रही है. एक आदमी है जो उतर रहा है किसी पहाड़ी से इस पहाड़ी का नाम पतन हो सकता है पर वह उतर रहा है. हमे नहीं पता कि इसकी किन गहराइयों तक वह उतरेगा और वह कौन सा बरस होगा. एक औरत है जो उतर रही है एक कमरे के घुप्प अंधेरे में इसका नाम दुख हो सकता है, इसका नाम हतासा हो सकता है, पर वह उतर रही है वर्षों से, सदियों से और सभ्यता के हर मुहाने पर वह अकेली खड़ी है. एक नदी के लम्बे पुल पर खड़ा है एक साल अपनी पूरी उम्र और थोड़ी उदासी लिए, सुख बेहद कम थे और वे अगस्त की बारिस में चेहरे से धुल गये. अब वह अपनी पीठ हमारी तरफ किए हुए है और हमे नहीं पता कि वह कहां जाने को तैयार है कि वह जाना भी चाहता है या लौटना चाहता है. समय को वापस नहीं बुलाया जा सकता, उसे याद रखा जा सकता है या भुलाया जा सकता है. हम सब यही तो करते हैं कितनी भी गहरी हो कोई याद धीरे-धीरे यह समतल हो जाती है. कांच की तरह समतल जिस पर चलना फिसलन से भरा होता है.

किसी बरस के बीत जाने के बाद भी हम उसका इंतजार करते हैं जो नहीं बीता कि जिसे बीतना चाहिए था हमारे बेरुखे चेहरों पर थोड़ी सी खुशी देकर. हमारे बीते हुए दिनों में हमारे आस-पास के लोग-बाग के किस्से ही नहीं होते, उनमे पेड़ों की याददास्त होती है, चिड़ियों की उड़ान होती है, नदी का बहाव होता है और जाने क्या-क्या होता है. शायद वह सब कुछ जो होता है हमारे इर्द गिर्द और बीतता है हमारी उम्र के साथ अंतिम दिनों तक. इन दिनों नदी सबसे उदास है, सबसे उदास हैं शैवाल और एक झींगा डूब जाना चाहता है अतल गहराई में अपने नथुनों में वर्षों की सांस भरकर. वह बच गया है बगैर किसी पर्यावरण आंदोलन के और इससे पहले कि कुछ लोग उसे देखें वह आंखों के लिए शून्य बन जाना चाहता है. नदी में जो कुछ है वह डार्विन के पहले का है और डार्विन की किसी भी मान्यता को इनकार करने की साहस के साथ. यह नदी पानी के उस लकीर की तरह बची है जो पृथ्वी की आंख के इर्द-गिर्द बहती है इसके सहारे ढूंढ़ी जा सकती है पृथ्वी की आंख और इन आंखों में ढूंढ़ा जा सकता है पृथ्वी का दुख. पृथ्वी पर दुख की उम्र किसी भी बरस से बड़ी है. किसी देश की कोई नदी उसके दुख का कारण नहीं होती, पर हर देश का एक दुख है जो हर देश की नदी में उतरता है. नदी का बहना एक मुहावरे को बचाने की जिद जैसा है और वह मुहावरा छप्पर में लगे किसी सरपत की तरह अप्रासंगिक हो चुका है. वहां दूर किसी सागर में पृथ्वी की सारी नदियां मिलकर बतियाना चाहती है. शायद वे बताना चाहती हैं अपना दुख, शायद कोई नदी अपने भीतर से एक पत्थर निकालकर देना चाहती है किसी नदी को. कहीं कोई सूखी जमीन नहीं, जहां बैठ कर इत्मिनान से एक नदी कह सके दूसरे से अपने वर्षों भर के जिल्लत की कथा. अब तो बस कथाओं में बची है एक नदी बाल्मीक के किसी श्लोक में और पूरी की पूरी बहती है वहीं एक सरयू. एक नदी जब बहना बंद कर देगी तब कितनी बचेगी नदी, कि अपने बहाव के विरुद्ध सूखी रेत पर चमकती नदी के बारे में क्या होंगे मछलियों के विचार. इस साल जो नदियां बची रह गयी हैं वे गुजरे साल का जश्न नहीं मनाएंगी. झुरमुटों पहाड़ों और जंगलों के बीच इनका बहना कुछ खोजने जैसा होगा, शायद वह जीवन भी हो सकता है. नदी के बारे में जब भी सोचता हूं तो सोचता हूं कि किस नदी का आखिर क्या खो गया किस सभ्यता में कि इतनी सारी नदियां मिलकर खोज रही हैं कुछ. शायद नदी टटोलती है पृथ्वी के अतल गहराई से मुलायम समय का कोई टुकड़ा और उतर जाती है उस खोह में जहां नदी नहीं बचती नदी.

इन्हीं नदियों के किनारे वे सभ्यताएं पनपी थी जो इंसान की पीढ़ियों को पैदा करने का दावा आज भी पेश करती हैं. इसी बरस जंगलों में वे एक दिन चीखने लगे, तब जब पूरा देश बैट और बल्ले के खेलों में व्यस्त था. हम जश्न मना रहे थे दुनिया को जीतने का, दुनिया जीतने के शौक और आदतें राजशाहियों से हमने सीखी थी पर तंत्रों के बदलने से आदतें नहीं बदला करती. हमने बैट और बल्ले के खेल को जीत दुनिया में सबसे महान घोषित किया और महानता की सबसे पिछड़ी परिभाषा को सही साबित कर दिया. देशभक्ति के मायने तिरंगों को लहराते और धूम मचाते लोगों की शोर में सिमटा हुआ था. कोई यह क्यों नहीं बताता कि बगैर झंडे के भी देश भक्त रहते हैं इसी देश में. यह साल अपने कुछ महीने, कुछ दिन बिता चुका था जब वे जंगलों और पहाड़ों के बीच रह रहे थे और वहीं तिरोहित हो रहा था उनका संताप. उनके घरों को जलाया गया और एक पुरानी सभ्यता का घुंआ देर-दिनों तक घुमड़ता रहा पूरे जंगल में. यह मार्च महीने की कहानी है जब बसंत जैसी ऋतुएं पेड़ों से उतरने की तैयारी में थी और पूरे एक समाज का गला रुंधा हुआ था. उनकी जिंदगियां लकीरों की तरह सीधी थी और उसमे न जाने कितने छल्ले बना दिए गए कि गिनना मुश्किल लगता है. एक देश के बर्बर सभ्यों ने अदिवासी और खतरनाक को एक दूसरे का पर्याय बना दिया. अब वे किसी पहाड़ से बात नहीं करते और कोई पेड़ उनके दुखों को रात गए सहलाने नहीं आता. वहां अब चुप्पियां हैं और शोर है जो हर मौत के बाद अनायास ही घिर आती है. पगडण्डियों पर एक सहमा सा सन्नाटा उन इलाकों में हर रोज घिरा रहता है और कोई भी पदचाप भय की शिकायत करती है. उन्हें अपनी सभ्यता के साथ एक ऐसे देश की जरूरत थी जिसे वे जमीन पर रखते और तकिए की तरह सुस्ताने के लिए इश्तेमाल करते पर देश उनके लिए पीढ़ियों के लहू में सना एक नाम है. एक जमीन है जिसे हर वक्त पैर के नीचे से खिसकने का भय बना रहता है. शायद जो अपने को साभ्यतिक कहते हैं उनसे वे बहुत कुछ कहना चाहते हों कि वे उनके कान में कुछ गुनगुनाना चाहते हों कोई गीत जिसे समझना थोड़ा मुश्किल हि सकता है पर मर्मों की कोई भाषा नहीं होती और उसे सुनने से ज्यादा महसूस किया जाता रहा है अब तक. उनकी आवाजों में अब सुर नहीं शोर और चीख ही बच पाई है. यह साल उनके लिए चीख को सुर में बदलने का हो सकता था, हो सकता था उनके आंखों में लिखे इतिहास को पढ़ लेने का और धीरे से उतर जाने का उनके मन के किसी खोह में पर यह सब कुछ न हुआ. पहाड़ों से कोई एक बड़ा पत्थर टूटा और लुढ़कते हुए ढहा गया उनकी पुरानी स्मृतियां. अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ उनके बच्चे जानते हैं भूख और भूगोल के सम्बन्ध को, जो हर रोज उनकी अपनी देह में कहीं उठता है और सिमट जाता है रात गए. आग लगे घरों के धुंए बुझ चुके हैं, एक चीखती हुई औरत शांत हो चुकी है और एक बच्चा रोते-रोते चुप हो गया है. जो बचा है वह समय के साथ घटित होगा और एक घटना की तरह उन्हें जीना होगा आने वाले वर्षों में.

इतिहास अतीत की किसी खिड़की से अब भी झांकता है और एक कोलाहल सा उभरने लगता है समय के गर्भ से. आदमी के भीतर कई वर्षों से जो सुरक्षा है वह लड़ती है बाहर की शांति से, दूर से एक धुंआ उठता है जो किसी मिथक गाथा की आग को छूकर लौट आता है. हर साल कोई विलखता है ऐसे जैसे महाभारत के युद्ध के बाद का क्रंदन उठ रहा हो खुद अपनी ही देह में. हर राजा अब दिल्ली में किसी राजसिंहासन पर बैठ हुक्म देता है, वह राजा नहीं राजा जैसा है और तामील करने के लिए एक आदमी दूर किसी खोह के गांव में घुस जाता है. किसी को नहीं पता कि इतिहास कैसे किसी कपड़े से निथरते पानी की तरह बह रहा है रास्तों पर और भिगो रहा है वर्तामान, भविष्य दोनों को. युद्ध हमे अब उतने नहीं दिखाई देते जितने किताबों में दर्ज हैं क्योंकि अब उन्हें दर्ज ही नहीं किया जाता और न ही उड़ती हैं चीलें अपने पक्षी ध्वनि में चिग्घाड़ते हुए. पुराने पड़ चुके बिम्बों की तरह एक कवि अपने समय को दर्ज करने के लिए खुजलाता है अपनी दाढ़ी और उदास हो जाता है किसी मामूली सी बात को सोचकर. धूप की देह पर लिपट गया है पसीना और आंगन में सुबह-सुबह उतरी है जो चिड़िया उसके पंख भीग गये हैं. जारी..........

3 टिप्‍पणियां:

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