14 जनवरी 2011

चिट्ठी के पते पर बदलता शहर का नाम

चन्द्रिका
अहा-जिन्दगी से
कलेंडर की किसी तारीख पर उंगली रखकर नहीं बताया जा सकता कि कोई शहर कब बना. शहर समय की रवायत में उठते हैं और फैल जाते हैं, जमीन के भूगोल के एक हिस्से पर घास की तरह. किसी चौराहे पर खड़े होकर भूगोल में सिमटते गाँव और विस्तारित होते शहर को ताउम्र भला कैसे कोई देखेगा. एक निर्मित होते शहर की उम्र के छोटे से टुकड़े में कई पीढ़ीयों की उम्र द्फ़्न हो जाती है. शहर, कस्बों, गाँवों का इतिहास ऐसा ही होता है कि उसकी पीठ पर खड़े हो जाओ और पुराने लोगों की पुरानी स्मृतियों को कुरेदो तो मिथक और यथार्थ की एक घालमेल तस्वीर आँखों में उतर आयेगी. मिथक और यथार्थ की ऐसी कई कहानियों से गुथा हुआ है वर्धा, महाराष्ट्र का एक छोटा सा जिला जिसे अब इसलिये जाना जाता है कि विदर्भ में किसानों की मौत का एक जिला यह भी है. गांधी जिले के नाम से देश के शोरगुल युक्त शहरों में एक चुप्पी साधे खड़ा शहर. देश के महानायक महात्मा गांधी के ६ सालों की कार्यपद्धतियों की गवाही में खड़ा और सुबूत के तौर पर अभी भी वे लोग शहर के किसी घर में झूले पर झूलते हुए गाँधीवादी सफेद टोपी पहने मिल सकते हैं जिन्होंने गांधी के साथ कुछ समय गुजारे हैं. वे अब भी उतनी संख्या में इस शहर में रहते हैं जितना गांधी का विचार इस देश में. गाँधी से जुड़ी हुई अनगिनत कहानियाँ इनके जेहन में अभी भी बची हुई हैं, लहू की धीमी गति और मध्यम स्वर में ७० साल पुराने इतिहास की साक्ष्य में इनकी आवाजें तेज हो जाती है और गाँधी के किस्से टुकड़े-टुकड़े में वैसे ही सुनने को मिलते हैं जैसे दादियों और नानियों से हम परियों के किस्से सुना करते थे.
१९३६ में जब गांधी ने यहाँ रहने का विचार बनाया होगा तो शायद यही कारण प्रमुख रहा होगा कि यह शहर देश के मध्य में स्थित है जहाँ न ज्यादा पूर्व है न पश्चिम और न उत्तर जितना उत्तर न दक्षिण जितना दक्षिण. इस देश के मध्य को गाँधी ने उतना चुना था जितना वे अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ाई करते हुए भारतवासियों के मध्य चुने हुए एक सिपाही थे. वर्धा मे जब वे पहली बार आये तो जमुना लाल बजाज ने वर्धा शहर से ३ कि.मी. की दूरी पर सेगांव में १०० रूपये की लागत से उनके लिये एक कुटी बनवायी थी इस सौ रूपये की लागत से शायद अब उसकी पुताई भी सम्भव नहीं है. सेगाँव जिसे बाद के दिनों मे सेवाग्राम कहा जाने लगा पर सेगाँव से सेवाग्राम होने की भी रोमांचक कहानी है. सेगाँव नाम से इसी मार्ग पर एक और गाँव है जब गाँधी जी यहाँ नियमित रूप से रहने लगे तो उनकी चिट्ठियाँ भी यहीं पर आने लगी पर दो सेगाँव होने के कारण कई बार ऐसा होता था कि गाँधी जी की चिट्ठी भटकते हुए दूसरे वाले सेगाँव पहुंच जाती थी ऐसे में गाँधी जी ने उपाय सुझाया कि इस सेगाँव का नाम बदलकर सेवाग्राम कर दिया जाय और फिर यह सेवाग्राम बन गया. सेवाग्राम इसलिये भी कि गांधी जी इस गाँव में रहते हुए यहाँ के लोगों को सेवाभाव का एक पाठ पढ़ाया, वे परचुरे जैसे कुष्ट रोगियों की सेवा खुद अपने हाँथों करते थे. शिक्षा की नयी व्यवस्था नयी तालीम की यहाँ शुरुआत की गयी. गाँधी ने अपने जीवन के कार्यव्यवहार के अनुरूप एक दर्शन निर्मित किया जहाँ दैनिक जीवन के क्रिया कलाप से लेकर राजनैतिक जीवन के आदर्श का एक मिश्रित रूप ग्राम्य जीवन के साथ रचा गया. अपने इन ६ वर्षों में गाँधी एक राजनितिक, गृहस्त, आंदोलनकारी व समाज सेवक के रूप में रहे. कहा यह जा सकता है कि गाँधी जी का देश के बहुसंख्यक ग्रामीणों की व्यवस्था को लेकर जो सोचना था उसका एक प्रतिविम्बन सेवाग्राम में देखा जा सकता है. बाद के दिनों में अपनी व्यस्तताओं के कारण गाँधी जी स्थायी रूप से यहाँ नहीं रह पाये पर उनका आना जाना होता रहा. बाद में गाँधी के इस महत्वपूर्ण कर्मस्थली को भारत सरकार द्वारा संरक्षित कर दिया गया और उनके साथ के कई कार्यकर्ता यहाँ आकर रहने लगे. यहाँ से कुछ ही कि.मी. की दूरी पर पवनार आश्रम है जहाँ विनोवाभावे रहते थे एक छोटी पवनार नदी के किनारे पर बना. पवनार इतना बड़ा शहर नहीं बन पाया कि नदी दब जाय सो अभी भी नदी उतनी ही बची है जितनी विनोवाभावे के समय में थी. विनोवाभावे गाँधी के निकटतम शिष्य थे इस लिहाज से भी गाँधी की मृत्यु के पश्चात भी यह स्थान महत्वपूर्ण बना रहा.
इस जिले को गाँधी के विचारों के अनुरूप बनाने के लिये आधिकारिक तौर पर कई प्रयास किये गये इन प्रयासों में दृढ़ता कम उदार आस्थायें ज्यादा थी. वर्धा जिले को मदिरा बिक्री से मुक्त कर दिया गया और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने का फैसला किया गया. बापूकुटी से दस किमी. के क्षेत्र में ऐसे किसी भी बड़े औद्योगिक ईकाई लगाना प्रतिबंधित किया गया जिससे अति प्रदूषण का खतरा हो. केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा यह निर्देश २३ फरवरी १९९४ में जारी किया गया था जिसमे कहा गया कि बापूकुटी को प्रदूषण मुक्त रखने के लिये यह जरूरी है कि इसके १० किमी. के दायरे में कोई प्रदूषणकारी उद्योग न लगाये जायें पर इससे पहले ही कुटी से महज ३ किमी. की दूरी पर लायड्स स्टील कम्पनी स्थापित हो चुकी थी. समय बीतने के साथ जब यह सर्कुलर लोगों के ज़ेहन में धुंधला हो गया तो २००८ में एक और कम्पनी उत्तम गालवा मेटालिक्स लिमिटेड बापूकुटी से महज ४ किमी. की दूरी पर १४०० करोड़ की लागत से खड़ी कर दी गयी. यह आज की संरचना का गाँधी की संरचना के साथ टकराव था और है जिसे वर्तमान पर्यावरण मंत्री जयराम नरेश ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण और प्रदूषण के नाम पर विकास को रोका नहीं जा सकता और अपने ही शहर में गाँधी के विचार हार गये. जैसे अंग्रेजों से मुल्क जीतकर हार गये वे मुल्क में.
बापूकुटी की देखभाल करने वाले लोगों ने सरकार द्वारा सहयोग के रूप में दी गयी राशि को यह कहते हुए लौटा दिया कि बापूकुटी को वे गाँव वालों के चन्दे से ही चलायेंगे यह सरकार के प्रति सेवाग्राम के लोगों का गाँधीवादी असहयोग है, बापूकुटी में सरकार का राज नहीं बल्कि अपना सुराज, गाँधी से सीखा हुआ और अब तक बचा हुआ.
१२५ साल पूरे कर रही कांग्रेस पार्टी ने सेवाग्राम में अक्टूबर माह में एक बड़े जलसे का आयोजन किया जिसमे देश के लाखों गाँधीवादी कार्यकर्ता और समाजसेवी शामिल हुए. सोनिया गाँधी व कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी इस जलसे में सिरकत की और ७० साल पहले गाँधी के कहे वाक्य को अपनी जुबान से बिना शर्मिंदा हुए कह दिया कि विकास तब तक नहीं होगा जब तक पंक्ति में खड़ा आखिरी आदमी खुशहाल नहीं महसूस करता पर वर्धा शहर के लोगों को नहीं पता कि वह आखिरी आदमी कौन है और वे देर तक तालियाँ बजाते रहे शायद इस बात पर भी कि आखिरी आदमी अब लाइन में खड़ा ही नहीं होता उसे पता ही नहीं चलता कि यह विकास की लाइन कहाँ लगती है उसे तो बस एक लाइन पता है जो पिछले कई सालों से लगी है और वर्धा का जब भी कोई किसान प्रताड़ित व हतास महसूस करता है तो उसी लाइन में जाकर खड़ा हो जाता है वह किसानों की आत्महत्या की लाइन है. पोला यहाँ के किसानों का पर्व है जिसमे वे अपने बैलों को सजाकर पूजा करते हैं और जगह-जगह मेले लगते हैं, किसान खुशियाँ मनाते हैं पर इस बार कई किसानों ने गीले अकाल के कारण पोला के रोज ही आत्महत्या कर ली और विदर्भ के किसानों की आत्महत्या के आंकड़े में उनका नाम भी बस जोड़ दिया जाता है.
वर्धा शहर छोटी-छोटी पहाडियों या पहाड़ी न कहें तो टीलों ने जो जगह छोड़ दी है उसी में बसा हुआ है. अक्टूबर के महीने में जब लोग हल्की ठंडक में सड़कों पर टहल रहे होते हैं तो किसी भी गली या मोड़ से पहले बजती धंटियों की आवाज आती है फिर कतार में बैलगाड़ियों पर लदी सफेद कपास की गट्ठरे और उस पर बैठा किसान मानों इन्ही किसी टीले से लेकर लौट रहा हो सफेद बर्फ के बुरादे जो शहर के अन्तिम छोर पर बनी मंडी तक जाते हैं जहाँ इसे बेचकर वे कुछ पैसे और उदासी ही लेकर हरबार अपने लौटते हैं. शहर के किनारे किसी टीले पर खड़े होकर पूरा शहर देखा जा सकता है जैसे किसी ने टीले से ही मुट्ठी में भरकर इन घरों को फेंक दिया हो और वे पूरे शहर में बिखर गये हों पर एक चीज जो आकर्शित करती है वह है यहाँ के घरों की शैली छोटे-छोटे घर पर हर घर के निर्माण की अपनी एक अलग शैली है. इनकी गलियों में लोग कम ही दिखते हैं अलबत्ता हर घर के सामने विभिन्न रंगों से बनाई गयी आकर्शक रंगोलियां होती हैं जो यहाँ की महिलाओं के नित्यप्रति के कार्यों में संलग्न है जैसे वे घर बुहारती हैं रोज वैसे ही रोज रंगोलोयां भी बनाती है पर त्योहारों के अवसर पर ये विशेषतौर पर ही बनायी जाती हैं. पथरीली जमीनों में खेती से लेकर शहर की दुकानों तक महिलायें एक श्रमिक के रूप में दिखती है और वे अपने पहनावे में साड़ियों का कछार वैसे ही बनाती हैं जैसे कोई पुरुष धोती पहनता है. हिन्दी और मराठी की समावेसित संस्कृति में बसे यहाँ के लोग बेहद बेफिक्र होते हैं. उनकी बातचीत में न सख्ती होती है न मृदुता और गम्भीरता में भी एक अनमनेपन का भाव.
वर्धा शहर की आबादी २ लाख से भी कम है और पूरे जिले की आबादी १२ लाख से भी अधिक मतलब १० लाख से अधिक लोग गाँवों में रहते है. वर्धा की सरकारी ऑफिसों में आने के लिये ये लोग पैसेंजरगाड़ी का प्रयोग ज्यादा करते हैं भले ही उनके गाँव की दूरी १० किमी. हो. सुबह चलने वाली पैसेंजरगाड़ी इन्हें उतारती है और शाम को फिर वापस भी ले जाती है. सुबह और शाम के अलावा स्टेशन पर लोग इतने कम दिखते हैं जितनी कि रेलगाड़ियाँ जो उत्तर और दक्षिण भारत को यहीं से अलग करती हैं. आस-पास के बसे हुए गाँवों के साथ ही वर्धा सोता और जागता है गाँव के लोग अपनी नींद से उठते हैं और शहर की सड़कों पर अपनी सब्जियाँ, दूध, दही, मट्ठे इत्यादि लेकर अपने पैरों की धमक से शहर को नींद से जगा देते हैं और जब वे देर शाम जिसे देर रात नहीं कहा जा सकता वापस लौटते हैं तो शहर जम्हाइयां लेते हुए फिर से अपने नींद में लौट जाता है. ६० साल पहले वर्धा का नाम पालकवाड़ी था और फिर बाद में वर्धा नदी के नाम पर यह वर्धा हो गया यह गांधी जी के आने के पहले की बात है. नदी जिधर से भी गुजरी वर्धा जिले की सीमा रेखा का निर्धारण करती गयी. इस बिखरे हुए शहर में धूप हर मुड़ेड़ों पर पहुंचती है और धूप की मेहरबानी यह कि लोगों के घरों, सड़कों के साथ लोगों के रंग में भी उतर गयी है और चेहरे पर पीलापन नहीं बल्कि कालापन छाया रहता है. गर्मी के दिनों में यह तापमान ४८ डिग्री तक पहुंच जाता है बावजूद इसके लोग अपने चेहरे पर कपड़े को लपेटकर सड़कों पर घूमते हुए मिलते हैं गर्मी के दिनों में चेहरे पर लपेटे जाने वाले इस कपड़े को ड्रेस का एक हिस्सा ही माना जाता है. यहाँ रिक्से उतने ही हैं जितने कि यहाँ अमीर यानि बहुत कम और ज्यादातर लोग ऑटो से या फिर पैदल ही पूरे शहर को छानते रहते हैं. ठंडक के दिनों में यहाँ के बाजार और बाजारों जैसे नहीं होते न ही यहाँ स्वेटर की उतनी दुकाने दिखती हैं न अपने खाली समय में स्वेटर बुनती औरतें, ठंडक बस उतनी ही होती है जितनी कि यहाँ के हर घरों में लगे हुए मौसमी फूलों के खिलने को एक इशारा मिल जाय और घरों के बाहर फूल, पत्तियाँ, झाड़ ही होते हैं जो शहर के रंग में हरापन घोलते हैं. हर घर में सीताफल और नीबू जैसे पौधे लगे हुए मिलते हैं पर यह खाने के लिये कम देखने के लिये ज्यादा प्रयोग किया जाता है. वर्धा की जमीन कुछ इस तौर पर है कि इसमे कुछ भी उपजने के लिये मिट्टी और मौसम दोनों के संतुलन का अभाव दिखता है लिहाजा जिन्हें पेड़ कहते हैं वे पौधों के आकार मे ही उगते हैं.
यहाँ से ७५ किमी. की दूरी पर महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर बसी है जहाँ डा. भीमराव अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्याग कर बुद्धिज्म को अपनाया था इसका प्रभाव पूरे विदर्भ में आज भी है यहाँ के दलित और मेहनतकश लोग बड़े पैमाने पर अपना धर्म परिवर्तन करते है और बौद्ध धर्म स्वीकार करते है. सुदूर फैले छोटे-छोटे गाँवों में लोग एक जलसा करते हैं जिसमे यहाँ धर्म परिवर्तन कराया जाता है और लोग बौद्ध बन जाते हैं. वर्धा के शहरों और गाँवों में छोटे बडे बौद्ध विहार देखे जा सकते हैं. महाराष्ट्र में दलित आंदोलन की एक लम्बी परम्परा है वर्धा इस रूप एं भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है यहाँ के दलित समुदाय ने बौद्ध धर्म को भले ही स्वीकार लिया हो पर अपनी धार्मिक कार्यपद्धतियों में वे हिन्दूधर्म की मिलावट खते हैं. वर्धा में यह बुद्ध का हिन्दूकरण है. वर्धा के घरों में गांधी, बुद्ध और अम्बेडकर की टंगी हुई तस्वीरें मिल जायेंगी और बाहर इनके नाम पर बनाये गये संस्थान. गांधी के नाम पर बने संस्थान व कुटीर उद्योग, संग्रहालय वर्धा में कई हैं जिनकी स्थिति वैसी ही है जैसे देश के तमाम गांधी संस्थानों की अलबत्ता शहर के लोगों को भी नही पता होता कि यहाँ होता क्या है और ये क्यों बनाये गये हैं. २ अक्टूबर, १६ अगस्त और २६ जनवरी ये कुछ ऐसी तिथियां है जब इन संस्थानों की सफाई होती है और इनके प्रांगड़ में एक डंडे पर तीन पट्टियों वाला एक झंडा फहरा दिया जाता है. एक महत्वपूर्ण संस्थान कस्तूरबा गांधी के नाम से बना मेडिकल कालेज है जिसमे साल भर चहल-पहल रहती है क्योंकि सुविधा के लिहाज से यह देश का एक महत्वपूर्ण हास्पिटल माना जाता है. १० वर्ष पूर्व गांधी के नाम पर यहाँ एक और संस्थान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय स्थापित हुआ जिसकी अवधारणा यह थी कि हिन्दी को तकनीक के साथ जोड़ते हुए दुनिया के नये विमर्षों की शिक्षा यहाँ दी जायेगी पर यह हिन्दी समाज के भ्रष्ट प्रशासकों की बलि चढ़ गया.
जब देश अंग्रेजों का गुलाम था और मुक्ति की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो वर्धा तमाम गतिविधियों का केन्द्र बन गया था पर आज लोगों के ज़ेहन में वर्धा का नाम उसी तौर पर आता है जैसे इतिहास की छूटी हुई कुछ तारीखें हों, वर्धा अब गांधी के नाम पर मेले लगाने और देश के सरकारी गांधीवादियों के ढोंग का स्थल बन कर ही रह गया है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. वर्धा- मेरी पैदाइश का शहर, मेरे बचपन का शहर, मेरी किशोरावस्था का शहर. वह शहर जहाँ एक चौक 'सोशलिस्ट' है और एक रोड 'बैचलर'.
    जहाँ नानखटाई जैसी एक चीज़ को 'गोरसपाक ' कहा जाता है, जहाँ गोरस भण्डार में दूध पीने के लिए जितनी भीड़ जमती है उतनी ही समाधान उपहार गृह में 'आलूबोंडा-रसा' खाने के लिए भी. जहाँ एक मुस्लिम-बहुल मोहल्ले का नाम महादेवपुरा है, जहाँ हवालदारपुरा, मालगुज़ारीपुरा, भामटीपुरा नाम के अन्य मोहल्ले हैं.
    'ट्रिप डाउन दि मेमरी लेन' कराने के लिए शुक्रिया!

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