09 अक्तूबर 2007

एक आदिवासी गांव की यात्रा-








पिछले माह महत्मागांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्व विद्यालय के जनसंचार विभाग के छात्रों द्वारा विदर्भ के कई गांवों का सर्वे किया गया। गांव की स्थिती व आंतरिक, सामाजिक संरचना पर आधारित आदिवासी गांव बानरचूहा से यह रिर्पोट-
सरकार के शब्दकोश में/हम हैं कमजोर वर्ग के आदमी/जैसा कि आकाशवाणी, दूरदर्शन और/ अखबारों में आते हैं/सरकार के बयान/दतर में अपने सहकर्मियों के बीच/हम चपरासी, क्लर्क या अधिकारी/नहीं हैं/हम हैं मंदबुद्धि पियक्कड़/या फिर रिजर्व कोटे के आदमी/स्कूल कॉलेज में पढ़ते/छोटे भाई हमारे/पुलिस की निगाहों में छात्र नहीं/लूटेरे हैं, डकैत हैं/या फिर उग्रवादी/संविधान की भाषा में हम/अनुसूचित जाति या/अनुसूचित जनजाति हैं/मनु की भाषा में शूद्र/ कम्युनिस्टों की भाषा में शोषित/भाजपाईयों की भाषा में/पिछड़े हिन्दू/मैं पूछता हू तुम सबसे/आखिर इस देश में इस प्रजातंत्र में/हम क्या हैं हम क्या हैं।


एक आदिवासी कवि महादेव टोप्पो के कलम से लिखी गयी ये पंक्तियाँ महोगांव ग्रामपंचायत के एक आदिवासी गांव बानरचूहा जाते वक्त वगैर तारतम्यता के मुझे याद आ रही थी। टुटी सड़कों व झाड़ियों के बीच धूल उड़ाते हुए हम गांव के उस मोड़ पर खड़े थे। यहाँ एक बोर्ड पर किसी पेंटर की कूची के बजाय किसी व्यक्ति की उंगुली से तेल और सिंधूर से लिखा था ``बानरचूहा´´। इस गांव को जिला कार्यालय से सूचना के अनुसार एक विकसित गांव के रूप में रखा गया है।

गांव के पहले कदम पर हनुमान जी का एक मंदिर था बाद में पता चला कि गांववालों ने चन्दा कर इसे बनवाया है। सामने पीपल के छायादार पेड़ की जड़ों को लपेटे हुए एक चबूतरा था जिसपर गांव के ढेर सारे लोग बैठे हुए थे। वहाँ पहुंचकर हमने ग्रामसरपंच के बारे में पता लगाने की कोशिश की पर पता चला कि वे यहाँ से पाँच किलोमीटर दूर रहती हैं। हमनें उनसे मिलनें की कोशिशें छोड़ दी और गांववालों से बातचीत करने में मशगूल हो गये। तकरीबन कुल 50 घरों के इस गांव में 3-4 मकान ही पक्के दिखे। हम गांव के कुछ लोगों के साथ बातचीत करते हुए गांव की सड़कों पर घूम रहे थे। एक घर के सामने हम थोड़ी देर के लिए रूके जहाँ लकड़ियाँ चीर कर दरवाजे और खिड़की बनाये जा रहे थे, बातचीत के दौरान पता चला कि ये लकिड़या काफी मंहगे दाम पर वन विभाग से खरीद कर लायी गयी हैं। उन लोगों का यह भी कहना था कि गांववालों के द्वारा लगाये गये पेड़ या खुद-ब-खुद उगे हुए पेड़ों की देखभाल गांव के लोग करते हैं पर बड़ा होने पर वन विभाग के द्वारा उसे हड़प लिया जाता है। एक महिला मक्का की सफाई कर रही थी, यह गांववालों का प्रमुख आहार है। थोड़ी ही देर में गांव के कई लोग इकठ्ठा हो गए, पूछने पर उनका कहना था कि गांव में औसतन खेती कि जमीन दो-तीन एकड़ प्रति परिवार है पर खेती का कोई भरोसा नहीं है, हर साल बाढ़ आती है और पूरी खेती बर्बाद हो जाती है। जब अपने खेत में काम करने से गांव वालों को फुर्सत मिलती है तो बगल के गांव में बड़े कास्तकारों के यहाँ वे मजदूरी के लिए जाते हैं। गांव में खेती के लिए पानी की कोई सुविधा नहीं है, यह पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। गांव में पंचायत द्वारा 5-6 नलों की टोटी लगाई गयी है और एक सामूहिक मोटर से पानी चलाया जाता है। समय-समय पर गांव का एक आदमी पानी चलाता है जिससे पीने के पानी की पूर्ति हो पाती है। गांव में सीमेंट से बनी पक्की सड़क है जो काफी साफ-सुथरी दिख रही थी। पूरा गांव पेड़ों की आड़ में ढका हुआ है, गांव में सरीफे के कई पेड़ है जिसे गांव के लोग सीताफल कहते थे। सन् 1989 के पहले ही गांव में बिजली आ चुकी है, अभी कई लोगों के पास तो टी.वी. भी है पर गांव के लोग सिर्फ सीरियल या फिल्म देखना ही पसंद करते हैं। गांव के नजदीक में एक प्रायमरी स्कूल भी है जिसमें गांव के बच्चें पढ़ने जाते हैं, इससे ऊपर की पढ़ाई करने के लिए उन्हें तीन किलो मीटर दूर जाना पड़ता है। गांव में एक मात्र व्यक्ति नौकरी करता है, जो की सरपंच का चपरासी है। गांव में सबसे ज्यादा शिक्षा पाने वाले एक मात्र व्यक्ति राजू हैं जिन्होंने 12वीं तक शिक्षा पायी है। राजू एक अच्छे कलाकार भी हैं। हम देर तक उनसे बातें करते रहे, उनका कहना था कि जब खाने के लिए घर में कुछ नहीं है तो पढ़ने से क्या फायदा? पढ़ कर ही सबको नौकरी कहाँ मिल जा रही है? बड़ी-बड़ी कक्षाओं तक पढ़कर शहरों में भी लोग बेकार पड़े हुए हैं।
गांव की एक 70 वर्षीय महिला जिसके आधे शरीर में लकवा लग गया था बार-बार बड़ी निरीहता के साथ कह रही थी- बाबू़.......उसकी आंखे बहुत कुछ कह रही थी। पूरे गांव के लोगों में हमसे कुछ पाने की ललक दिख रही थी। गांव के किसी भी वृद्ध को बी.पी.एल. कार्ड नहीं मिला था। फिर इस महिला का क्या? वहाँ से जब हम चल रहे थे तो वह महिला हमारे हाथ पकड़ कर देर तक हमें निहारती रही, पर हम बेबस थे। सिवाय उनकी स्थितियों को जानने के हमारे पास उसे बदलने के लिए कुछ भी न था। गांव के ढेर सारे लोग हमारे साथ हो लिए थे फिर हम सब उस स्थान पर आये जहाँ गणपति की मूर्ति सजायी गयी थी। वहाँ कुछ लड़के बैठ कर ताश के पत्ते खेल रहे थे, मुझे पिछले गांव मंगरूल की याद आयी जहाँ लोग नशे में धुत हो कर कई टोलियों में दिन भर पत्ते खेला करते हैं, पर यहाँ वैसा नहीं था। यह जानकर हमें आश्चर्य भी हुआ कि गांव में किसी भी प्रकार का नशा नहीं मिलता। उन लोगों का कहना था कि जब खाने के लिए ही पैसा नहीं है तो लोग नशे के बारे में कैसे सोचेंगे। बातचीत के दौरान पता चला कि गणपति की जो मूर्ति बनायी गयी है वह गांव के ही एक युवक ने बनाया है। बहरहाल हम मूर्ति देखकर ही समझ गये थे कि यह किसी कारीगर के द्वारा बनी मूर्ति नहीं है क्योंकि मूर्ति के चेहरे में शहरीपन का भाव नहीं था।
धीरे-धीरे गांव के तकरीबन सभी पुरूष और दो-चार महिलायें वहाँ पर जमा हो गयी। उन लोगों का कहना था कि गांव में किसी भी योजना का पता नहीं चल पाता सब लोग वोट मांगने के लिए यहाँ आते हैं वर्ना सरपंच भी नहीं दिखाई पड़ती। रोजगार गारंटी योजना पर बात करते हुए पता चला कि 50 से अधिक लोगों ने फार्म भरा है पर अभी तक किसी को न तो रोजगार मिला न ही बेरोजगारी भत्ता। कुछ लोगों ने हमें फार्म भरने का रीसीविंग भी दिखाया। उनका यह भी कहना था कि काम अगर आयेगा भी तो सरपंच अपने गांव के लोगों को देगें। हमने उनको रोजगार गारंटी योजना, वृद्धा पेंशन आदि के बारे में विस्तार से बताया जिन बातों की उन्हें बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी। हमने उन्हें सरपंच से मिलकर इसका लाभ लेने के लिए भी बताया। वे सब सहमत थे।
गांव के कुछ युवाओं ने मिट्टी की कुछ अद्भुत कलाकृतियां बनायी हुई थी जिसने हमें काफी आकर्षित किया। उन मूर्तियों में विशेष तौर पर एक राक्षस की मूर्ति बनायी गयी थी जिसके पेट को डब्बे से बनाया गया था वे उसमें आग सुलगा कर रख देते थे जिसका धुआँ राक्षस के मुंह से निकलता था। लौटते वक्त उन लोगों ने हमें चीनी चूड़े का प्रसाद भी दिया। खाते-खाते मैने सोचा कि क्या गणपति इनकी स्थितियां बदल सकता है? हम गांव से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे थे और मुंह से प्रसाद की मिठास भी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह रिपोर्ट मन को छू गयी, विशेषकर फोटो ही सारी कथा कह देने के लिये पर्याप्त हैं।

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