21 अगस्त 2010

कश्मीर में जूते चलने के निहितार्थ

दैनिक भास्कर में प्रकाशित आलेख बिना काट-छांट के यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है -मॉडरेटर
दिलीप खान
हाल के वर्षों में जूता फेंकना राजकीय दमनात्मक कार्रवाई के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शित करने के एक नए वैश्विक तरीके के रूप में विकसित हुआ है. इराक में अमरीकी सैनिक आक्रमण और हस्तक्षेप से आहत आकर स्थानीय पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी द्वारा तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूते फेंके जाने को दुनिया भर के लोगों ने टेलीविज़न-सेट पर देखा. यही क़िस्सा भारत के गृहमंत्री पी. चिदंबरम के साथ दुहराया गया और एक बार फिर जूता फेंकने वाला पत्रकार था. अभी कुछ दिन पहले बरमिंघम में आसिफ़ अली ज़रदारी पर भी जूता फेंका गया और इससे पहले चीन में बेन जियाबाओ पर भी जूता उछाला गया. हालिया घटनाक्रम के तहत जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर 15 अगस्त के दिन किसी सस्पेंडड पुलिस अधिकारी ने जूता फेंका. प्रत्येक बार ऐसी घटना के बाद राज्य की तरफ़ से यह कोशिश की जाती है कि इसे लोकप्रिय जनभावना के तहत देखे जाने से टाला जाए. इसके लिए कुछ आसान तर्क भी जुटा लिए जाते हैं कि विरोध का यह छिछला तरीका है और सभ्य समाज में ऐसी हरकत वृहत्तर आबादी का सच नहीं हो सकता, या फिर ऐसी अलोकतांत्रिक और अमर्यादित हरक़त कुछ सनकी दिमाग़ों का सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए की गई कवायद है. लेकिन उमर अब्दुल्ला प्रकरण में फ़ारूख अब्दुल्ला की तत्काल टिप्पणी कि उनका बेटा जूते-वाले ’इलीट समूह’ का हिस्सा बन गया, का संदेश शायद यही है कि महान लोगों के विरोधी हर समाज में पैदा होते हैं और अगर महानता को हासिल करना है तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि विरोधी अनिवार्य तौर पर समाज के भीतर मौजूद हो. इस तरह प्रकारांतर से वे जॉर्ज बुश के इराकी नीतियों को भी सही ठहरा गए और यह बताने का भरसक प्रयत्न भी कर गए कि कश्मीर में सब ठीक-ठाक है.
लेकिन बहुत साफ़ है कि कश्मीर के मौजूदा राजनीतिक हालात में नेशनल कांफ्रेंस को लेकर घाटी के भीतर असंतोष भरा मत बन रहा है. युवाओं का एक बड़ा हिस्सा अलगाववादी दल हुर्रियत के पक्ष में सामने आ रहा है और बेहद निडरता से ’गो इंडिया, गो बैक’ अभियान को साधने की कोशिश कर रहा है. युवाओं का यह तबका बंद, कर्फ्यू, बारूद और पत्थर के साए में बड़ा हुआ है जिसमें उम्र के हिसाब से स्वाभाविक खिलंदड़ापन कम विकसित हुआ है. उन्हें सामान्य आज़ाद जीवन जीने का शीघ्र कोई विकल्प चाहिए. यह विकल्प अगर उमर अब्दुल्ला सरकार नहीं मुहैया करा रही है तो वे अलगाववादी धड़ों के साथ अपने को खड़ा कर लेते हैं. लगभग बीस साल बाद घाटी में इस तरह का दृश्य बन रहा है जब सरकार के विरोध में उग्र और अंतहीन दिखने वाले प्रदर्शन हो रहे है. ख़ास बात यह है कि हुर्रियत की दोनों धड़े यह ज़ोर देकर कह रही है कि युवाओं का यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन है जिसको वे केवल समर्थन दे रही हैं. पिछले एक साल में कश्मीर की राजनीति बेहद उठा-पटक भरे दौर से गुजरी है. शोंपिया में दो युवतियों की बलात्कार के बाद हत्या के मामले पर जांच समितियों की परस्पर-विरोधी रिपोर्ट और सरकार द्वारा उस मामले पर नाटकीय तरीके से लिए गए फैसलों से आंदोलन शुरू हुआ तो वह उमर अब्दुल्ला पर सैक्स स्कैंडल में फंसे होने के विवाद, इस्तीफ़ा से लेकर इस साल के जून में आंदोलनकारी युवकों की भीड़ पर पुलिस द्वारा फ़ेंके गए आंसू बम से एक नौजवान की मौत के बाद यह मौजूदा रूप में सामने आ रहा है.
पिछले एक महीने में इस प्रदर्शन में 58 लोगों की मौत हो चुकी है. सैंकड़ों घायल है. घायलों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल है. बीते सप्ताह सईद फ़ारूख बुखारी नामक एक उन्नीस वर्षीय छात्र का कथित तौर पर पुलिसिया टॉर्चर से मारे जाने के बाद हज़ारों लोग उसके अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए कर्फ्यू को तोड़ कर निकल आए. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने सईद की मौत के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए इस घटना की निंदा की. ऐसी प्रत्येक घटना के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लेकर असंतोष और भड़का है.
इस संवेदनशील घड़ी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब सर्वदलीय़ बैठक बुलाई और उसमें कश्मीर की स्वायत्तता को लेकर प्रस्ताव रखा गया तो कश्मीर के प्रधानमंत्री के तौर पर फ़ारूख अब्दुल्ला का नाम सामने आया. ऐसे में नई दिल्ली में स्वायत्तता की पहलकदमी होना कश्मीरियों के लिए मौज़ूदा आंदोलन के पक्ष में तो रहा लेकिन यह न तो तात्कालीन समस्या का समाधान है और न ही इस बात की कोई गारंटी है कि यह प्रस्ताव संसद में पारित हो ही जाएगा. मीरवाइज उमर फ़ारूख ने भारत सरकार को कश्मीर से सैन्य-बल वापस बुलाने, आफ़्सपा ख़त्म करने और कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच द्वि-पक्षीय मामला न मानते हुए इसमें कश्मीर को शामिल कर त्रि-पक्षीय तरीके से हल किए जाने की अपील करने के साथ-साथ स्थानीय कश्मीरियों की भावना को समझने के लिए ’कश्मीर की दीवारों पर लिखी इबारतो’ को पढ़ने को कहा है. स्थानीय कश्मीरी लोगों ने पिछ्ले चुनाव में सहभागिता के जिस स्तर को दिखाते हुए 60 फ़ीसदी से अधिक मतदान किया और उमर अब्दुल्ला की पार्टी को बहुमत के साथ विधानसभा में लाया उससे उनकी दैनंदिन की समस्याओं का खात्मा कहीं से भी होता नज़र नहीं आया. विरोध में फ़िर जूता फ़ेंकना आसान तरीका तो नज़र आता ही है.
लेखक स्वतंत्र पत्रकार है.
मो.-9561513701, ई-मेल dilipk.media@gmail.com

12 अगस्त 2010

साम्राज्य के ज़ुल्मों के बारे में इतने कम लोग क्यों जानते हैं?

ब्रिटेन के भुला दिए गए हत्याकांड
जॉर्ज मॉन्बिऑट27 दिसंबर, 2005

तुर्की उपन्यासकार ओर्हान पामुक के मुकद्दमे के बारे में रिपोर्टें पढ़ते हुए दो बातों पर आपका खास ध्यान जाता है। पहली तो खैर देश के पुरातन कानूनों की निर्ममता है। पामुक पर, ढेर सारे अन्य लेखकों और पत्रकारों की तरह, "तुर्कीपन की तौहीन" करने के लिए मुकद्दमा चलाया जा रहा है, जिसका मतलब है कि उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान किए गए आर्मेनियाई हत्याकांड और पिछले दशक के दौरान हुई कुर्दों की हत्याओं का ज़िक्र करने का साहस किया। यह दूसरी बात उस देश की अविश्सनीय बेवकूफी है। अगर इन हत्याकांडों को जीवित मुद्दे बनाने के लिए के लिए कुछ किया जा सकता है, तो वह है देश के सबसे अग्रणी उपन्यासकार पर इन मुद्दों का ज़िक्र करने के लिए मुकद्दमा चलाना।

यूरोपीय संघ का भाग बनने के लिए तुर्की सरकार जो तैयारी कर रही है, उसके ही दौरान उसे पता चलेगा कि यूरोपीय संघ को रोक लगाने के लिए एक अधिक प्रभावी माध्यम मिल गया है। कानूनी ज़बरदस्ती के बिना, लेखकों को उनके घरों से खदेड़ने के लिए हुल्लड़ मचाती भीड़ के इस्तेमाल के बिना हमने (ब्रिटेन ने) अपने ज़ुल्मों को भुलाने की असीमित क्षमता का विकास कर लिया है।

ज़ुल्म? कौनसे ज़ुल्म? जब तुर्की में कोई लेखक इस शब्द का प्रयोग करता हैं, तुर्की में हर कोई जानता है कि वह क्या कह रहा है, चाहे वे कितने ही ज़ोर-शोर से कहें कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन ब्रिटेन में अधिकतर लोग आपको खाली निगाहों से देखेंगे, बिना समझे। तो मैं आपके दो ऐसे उदाहरण देता हूँ, जिनके बारे में उतने ही सारे दस्तावेज़ हैं जितने आर्मेनियाई क़त्ले-आम के बारे में।

2001 में प्रकाशित अपनी किताब लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्स (उत्तर विक्टोरियाई हत्याकांड) में माइक डेविस हमें उन अकालों की कहानी सुनाते हैं जिनमें 1.2 से 2.9 करोड़ भारतीय मारे गए (1)। वे दिखाते हैं कि इन लोगों की ब्रिटेन की सरकारी नीति द्वारा हत्या की गई थी।

जब एक एल नीनो अकाल ने 1876 में दक्खन के पठार के किसानों को दरिद्र बना दिया, तब भारत में चावल और गेहूँ की पैदावार ज़रूरी मात्रा से ऊपर हुई थी। लेकिन वाइसरॉय, लॉर्ड लिटन, ने ज़ोर दिया कि इसके इंग्लैंड को निर्यात में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। 1877 और 1878 में, अकाल के चरम पर, अनाज व्यापारियों ने रिकॉर्ड 64 लाख सेर गेहूँ का निर्यात किया। जब किसान भूख से मरने लग गए, तब सरकारी अधिकारियों ने आदेश दिया कि "राहत कार्यों को हर तरह से हतोत्साहित किया जाए"(2)। 1877 के ऐंटी-चैरिटेबल कंट्रीब्यूशंस ऐक्ट (परोपकारी सहायता विरोधी कानून) ने "राहत हेतु चंदे पर, जो संभवतः बाज़ार में अनाज की कीमत ठहरने के आड़े आए, क़ैद किए जाने की सज़ा के साथ" रोक लगा दी। अधिकतर ज़िलों में राहत के नाम पर केवल कठोर श्रम की अनुमति थी, जिससे भी भुखमरी की बढ़ी हालत में पहुँचे हर व्यक्ति को दूर कर दिया जाता था। कामगारों को बुखेनवाल्ड के श्रम शिविरों में रहने वाले क़ैदियों से भी कम खाना दिया जाता था। 1877 में इन शिविरों में मासिक मृत्यु दर वार्षिक मृत्यु दर के 94% के बराबर थी।

जब दसियों लाख मर रहे थे, साम्राज्यवादी सरकार ने "अकाल के दौरान बकाया हो गए लगान को वसूल करने के लिए एक सशस्त्र अभियान शुरू कर दिया।" वो पैसा, जिसने उनको भी तबाह कर दिया जो शायद अकाल के बावजूद भी बच जाते, लिटन ने अपने अफग़ानिस्तान युद्ध में लगाया। सरकार की निर्यात नीतियों ने उन क्षेत्रों में भी, यूक्रेन में स्टॉलिन के समान, भूख पैदा की जहाँ अनाज की पैदावार ज़रूरत से ऊपर हुई थी। उत्तरी-पूर्वी प्रदेशों, अवध, और पंजाब में, जहाँ पिछले तीन सालों में रिकॉर्ड फसल हुई थी, 12.5 लाख लोग मारे गए।

हाल में प्रकाशित तीन किताबों - कैरोलिन एल्किंस की ब्रिटेंस गूलाग (ब्रिटेन का गूलाग), डेविड ऐंडरसन की हिस्टरीज़ ऑफ द हैंग्ड (फाँसी दिए गए लोगों का इतिहास) और मार्क कर्टिस की वेब ऑफ डिसीट (धोखे का जाल) - में दिखाया गया है कि बसने को आए गोरों और ब्रिटेन की सेना ने कैसे केन्या में 1950 के दशक में मऊ मऊ विद्रोह का दमन किया। अपनी सबसे अच्छी भूमि से बाहर कर दिए जाने और राजनीतिक अधिकार छीन लिए जाने पर किकूयू लोगों ने औपनिवेशिक राज के विरुद्ध - उनमें से कुछ ने हिंसात्मक रूप से - संगठित होना शुरू किया। ब्रिटेन ने उनमें से 320,000 को यातना शिविरों में खदेड़ दिया (3)। बाकी लोगों, दस लाख से ज़्यादा, को "घेराबंद गाँवों" में रोक कर रखा गया। क़ैदियों से पूछताछ करने के लिए "उनके कान काट लिए गए, कान के पर्दों में छेद किए गए, चाबुकों से मार-मार कर जान ली गई, संदिग्ध व्यक्तियों पर पैराफ़ीन उड़ेला गया जिन्हें फिर आग लगा दी जाती थी, और जलती सिगरेटों से कान के पर्दों को जलाया गया।" ब्रिटिश सैनिकों ने उंगलियाँ और अण्डकोष काटने के लिए "धातु के बधिया करने के यंत्र" का इस्तेमाल किया। वहाँ बसे एक गोरे ने डींग मारी कि "जब मैंने उसके अण्डकोष काटे, उसके कान नहीं बचे थे, और उसकी आँख, मेरे ख्याल से दाईं वाली, बाहर लटक रही थी (5)।" सैनिकों से कहा गया था कि वे जिसे चाहे गोली मार सकते हैं "बशर्ते वो काले हों (6)।" ऐल्किन के प्रमाणों से पता चलता है कि 100,000 से ज़्यादा किकूयू या तो ब्रिटिशों द्वारा या फिर शिविरों में बीमारी और भूख से मारे गए। डेविड ऐंडरसन ने 1090 संदिग्ध विद्रोहियों की फाँसी का ज़िक्र अपने दस्तावेज़ों में किया है: अल्जीरिया ने फ्रांस में जितने लोगों को फाँसी दी उससे कहीं ज़्यादा (7)। हज़ारों को तो सैनिकों ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी कि रुकने को कहने पर वो "रुकने में नाकामयाब रहे"।

ये तो ब्रिटिश सरकार या ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रवासियों द्वारा निरीक्षित और आयोजित कम से कम बीस अत्याचारों में से केवल दो उदाहरण हैं: ऐसे ही कुछ और उदाहरण हैं तस्मेनियाई हत्याकांड, मलाया में सामूहिक सज़ा का इस्तेमाल, ओमान में गाँवों पर बमवर्षा, उत्तरी यमन की कुत्सित लड़ाई, दिएगो गार्शिया को खाली किया जाना। इनमें से कुछ की हल्की सी, मिटी हुई सी याद कुछ पाठकों को शायद आ भी जाए, पर अधिकतर लोग तो यही नहीं समझ पाएंगे कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ। मैक्स हेस्टिंग्स, अगले पन्ने पर "स्टॉलिन और माओ के अपराधों में हमारी अपेक्षाकृत कम रुचि" पर दुख जता रहे हैं(8)। लेकिन हम इतना तो जानते हैं कि ये हुए थे।

ऐक्सप्रेस में हम इतिहासकार ऐंड्रयू रॉबर्ट्स को यह तर्क देते हुए पढ़ सकते हैं कि "अपने आधे सहस्राब्द के इतिहास के बहुत बड़े हिस्से में ब्रिटिश साम्राज्य अच्छाई की एक अनुकरणीय ताकत थी। ... ब्रिटेन ने साम्राज्य को लगभग बिना खून-खराबे के छोड़ दिया, अपनी उत्तराधिकारी सरकारों को जनतंत्र और प्रतिनिधित्व पर आधारित संस्थाओं के बारे में शिक्षित करने की कोशिश के बाद (9)" (शायद उनके भावी नेताओं को जेल में डाल कर)। संडे टेलीग्राफ में वे ज़ोर देकर कहते हैं कि "ब्रिटिश सरकार ने आश्चर्यजनक वृद्धि दरों को संभव बना दिया, कम से कम उन जगहों में जिन्हें ग्लोब पर गुलाबी रंग में रंगे जाने का सौभाग्य मिला।" (10) (इसकी तुलना माइक डेविस के केन्द्रीय निष्कर्ष से कीजिए कि "भारत की प्रति व्यक्ति आय में 1757 से 1947 के बीच कोई वृद्धि नहीं हुई", या प्रसन्नन पार्थसारथी द्वारा प्रमाणित इस बात से कि "18वीं सदी में दक्षिण भारत के किसानों की आय ब्रिटेन के किसानों से अधिक थी और उनके जीवन में आर्थिक सुरक्षा भी ज़्यादा थी।") (11) डेली टेलीग्राफ में जॉन कीगन का मानना है कि "साम्राज्य अपने आखिरी सालों में अत्यधिक दयालु और नैतिक हो गया था।" विक्टोरियाई "अपने उपनिवेशों में सभ्यता और अच्छी सरकार लाने और स्वागत अवधि खत्म हो जाने पर वापस चले आने के लिए निकल पड़े। लगभग हर देश में, उस देश के लाल हो जाने के बाद, वे अपने संकल्प पर डटे रहे।" (12)

यूरोपीय इतिहास में एक क़त्ले-आम है जो पावन समझा जाता है, और उसे ऐसा समझा जाना सही है। बाकी सबको नज़रअंदाज़ किया जा सकता है, कहा जा सकता है कि वे हुए ही नहीं, या उनको कम करके दिखाया जा सकता है। जैसे कि मार्क कर्टिस ने ध्यान दिलाया है, ब्रिटेन में सोचने के जिस तरीके का बोलबाला है वह "एक मुख्य विचार को शेष हर चीज़ के आधार के रूप में पेश करता है - ब्रिटेन की मूलभूत दयालुता का विचार। ... विदेश नीति की निंदा संभव तो अवश्य है, सामान्य भी है, पर सँकरी सीमाओं के भीतर जो मूलभूत दयालुता के शासन को प्रोत्साहन देने में "अपवाद" या "गलतियाँ" दिखाए।" यह विचार ही, मुझे डर है, असल में "ब्रिटिश सांस्कृतिक पहचान की अनुभूति" है जिसके खो दिए जाने पर मैक्स दुख प्रकट कर रहे हैं। इसे लागू करने के लिए किसी न्यायाधीश या सेंसर की ज़रूरत नहीं है। जो लोग अखबारों के मालिक हैं वे केवल उन्ही रिपोर्टों को लिखवाते हैं जो वे पढ़ना चाहते हैं।

तुर्की के यूरोपीय संघ में विलय, जो अभी ओर्हान पामुक के मुकद्दमे के कारण खटाई में पड़ गया है, के लिए उसे अपने अत्याचारों को ईमानदारी से स्वीकार करने की ज़रूरत नहीं है; उसे केवल इतना करना है कि वह इनके विरुद्ध लेखकों के नपुंसक आक्रोश को चलने दे। अगर सरकार आर्मेनियाई हत्याकांड को भुलवा देना चाहती है तो उसे अपने सेंसरशिप कानूनों को छोड़ देना चाहिए और लोगों को वह कहने देना चाहिए जो वो कहना चाहते हैं। उसे केवल रिचर्ड डेसमंड और बार्कले भाइयों को अपने अखबार खरीदने देने की ज़रूरत है, और अतीत उसे फिर कभी परेशान नहीं करेगा।

www.monbiot.com


संदर्भ:

1. माइक डेविस, 2001. उत्तर विक्टोरियाई हत्याकांड: एल नीनो अकाल तथा तीसरी दुनिया का बनना (Late Victorian Holocausts: El Nino Famines and the Making of the Third World). वर्सो, लंदन.
2. लेफ़्टिनेंट जनरल सर जॉर्ज कूपर का अपने ज़िला अधिकारियों के नाम एक आदेश (An order from the lieutenant-governor Sir George Couper to his district officers). माइक डेविस द्वारा उद्धरित, उपरोक्त.
3. कैरोलिन एल्किंस, 2005. ब्रिटेन का गूलाग:केन्या में साम्राज्य का निर्मम अंत (Britain's Gulag: The Brutal End of Empire in Kenya). जोनाथन केप, लंदन.
4. मार्क कर्टिस, 2003. धोखे का जाल (Web of Deceit: Britain's Real Role in the World). विंटेज, लंदन.
5. कैरोलिन एल्किंस, उपरोक्त.
6. मार्क कर्टिस, उपरोक्त.
7. डेविड ऐंडरसन, 2005. फाँसी दिए गए लोगों का इतिहास: केन्या में ब्रिटेन का कलंकित युद्ध और साम्राज्य का अंत (Histories of the Hanged: Britain's Dirty War in Kenya and the End of Empire). वाइडेनफेल्ड, लंदन.
8. मैक्स हेस्टिंग्स, 27 दिसंबर 2005. यह ड्रेक और पेपी का देश है, शाका ज़ूलू का नहीं (This is the country of Drake and Pepys, not Shaka Zulu). द गार्जियन
9. ऐंड्रू रॉबर्ट्स, 13 जुलाई 2004. हमें ब्रिटिश साम्राज्य के अतीत पर गर्व करना चाहिए (We Should Take Pride in Britain's Empire Past). द ऐक्सप्रेस.
10. ऐंड्रू रॉबर्ट्स, 16th जनवरी 2005. साम्राज्यों की ज़रूरत क्यों है (Why we need empires). द संडे टेलीग्राफ.
11. प्रसन्न पार्थसारथी, 1998. अट्ठारहवीं सदी के भारत तथा ब्रिटेन में आय एवं सक्षमता पर पुनर्विचार (Rethinking wages and competitiveness in Eighteenth-Century Britain and South India). अतीत और वर्तमान 158 (Past and Present 158). माइक डेविस द्वारा उद्धरित, उपरोक्त.
12. जॉन कीगन, 14 जुलाई 2004. साम्राज्य सम्मान के लायक है (The Empire is Worthy of Honour). द डेली टेलीग्राफ.

13. माइक डेविस, उपरोक्त.

अनुवादक: अनिल एकलव्य. जेड नेट से साभार

दिल्ली की गर्मी मे वर्धा का गुनगुनापन

चन्द्रिका
दैनिक भास्कर में छपे संपादित आलेख का मूल।
"नया ज्ञानोदय" का अंक अब पुराना पड़ चुका है और बाजार से उसके वापसी की घोषणा भी हो चुकी है. तमाम विरोधों को बाद इसका बाजार से वापस लौटना, विभूति नारायण राय के दिल्ली से वर्धा लौटने जैसा ही है. बावजूद इसके विभूति नारायण राय की चाहत के अनुसार इस पर बहस जारी है पर यह बहस उनके कुलपति बने रहने या हटाये जाने तक पहुंच गयी है और हिन्दी का बौद्धिक तबका पहली बार इतने खुले और बृहद तौर पर अपनी पक्षधरता और असहमति के साथ सामने आ रहा है. ऐसे में शायद वर्धा की रोमांचक बारिस जो हिन्दी विश्वविद्यालय में राइटर इन रेजिडेंस बनाये जाने के बाद लेखक राजकिशोर को बेहद पसंद आयी थी और उनकी कलम से शब्द अनायास ही निकल पड़े थे (jansatta 9 julay) को थोड़ा विचलित भी कर रही होगी.
कथाकार राकेश मिश्रा जिन्होंने नया ज्ञानोदय के लिये यह साक्षात्कार लिया था उनके लिये यह सुकून और शायद गौरव की बात थी जो हिन्दी समाज को १० वर्षों बाद मिली थी कि हिन्दी साहित्य की इतनी बड़ी ख़बर देश में पहली बार बनी. विभूति नारायण राय के दिल्ली से लौटने के एक घंटे बाद उनके आवास पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नारे लगाते हुए पहुंचे वे पानी और बिजली की मांग कर रहे थे साथ में अधिकारियों और कुलपति को गाली दे रहे थे. दूसरे दिन एक छात्र अपनी गाली को इस आधार पर सही ठहरा रहा था कि कुलपति लिखित तौर पर महिला साहित्यकारों को गाली दे सकते हैं तो वह अपनी मूलभूत जरूरतों के लिये गाली या अपमानित करने वाले शब्द क्यों नहीं बोल सकता है. कपिल सिब्बल के कार्रवायी का आश्वासन टेलीविजन पर सुन कर एक छात्र खुशी से उछल पड़ा था. कुछ छात्र और अध्यापक कुलपति के बयान को उचित ठहराने में जुटे थे और अपने बयान ठीक उसी तौर पर बदल रहे थे जैसे कि विभूति नारायण राय, पहले श्ब्दों की व्याख्या, फिर कथाकार प्रेमचंद और काशीनाथ के संदर्भ की प्रस्तुति और बाद में माफी.
हिन्दी विश्वविद्यालय में दखल वेब पत्रिका द्वारा इस मसले पर अध्यापक, कर्मियों और छात्रों की एक संगोष्ठी आयोजित की गयी जिसमे कुलपति ने यह कहकर आने से मना कर दिया कि वे स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में आयेंगे और अपना पक्ष रखेंगे. इस संगोष्ठी के लिये जो सूचनायें लगायी गयी थी उन्हें अधिकारियों के निर्देश पर उखड़वा दिया गया और कार्यक्रम के पूर्व ही होमगार्ड की एक फौज लगा दी गयी बाद में एक वरिष्ठ अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद यह कार्यक्रम सम्पन्न हो सका. स्त्री अध्ययन विभाग ने जो संगोष्ठी रखी थी कुछ घंटे पूर्व कुलपति ने उसमे आने से मना कर दिया. विश्वविद्यालय में मीडिया पर बैन लगा दिया गया जिन पर इस मसले को लेकर बहस चल रही थी. हिन्दी विश्वविद्यालय में अक्सर संगोष्ठियां होती हैं और संगोष्ठीयों में यहाँ का अध्यापक वर्ग एक दूसरे को विद्वान और प्रकांड विद्वान जैसे श्ब्दों से नवाजता रहता है शायद यह विद्वान होने की तुष्टि है जो आपस में एक दूसरे से पा लेते हैं.
विभूतिनारायण राय ने अपने साक्षात्कार में जिस घटना का जिक्र किया है कि उन्होंने छात्राओं को छात्रों के छात्रावास में जाने से मना इसलिये कर दिया कि यहाँ का समाज इसके अनुकूल नहीं है उसका जवाब पंकजविष्ट अपने आलेख में दे चुके हैं पर इस सत्र के शुरुआत में ही एक नियम बनाया गया कि विश्वविद्यालय की छात्रायें शहर में यदि किसी लड़के के साथ रहती हैं तो उन्हें अपने घर से अनुमति पत्र लेकर विश्वविद्यालय को देना होगा. दरअसल ये महज घटनायें नहीं हैं बल्कि एक ऐसे विश्वविद्यालय जिसे हिन्दी देश का बड़ा हिन्दी समाज आशा भरी निगाह से देख रहा है या था उसमें पनप रही संस्कृति है जो शायद खाप पंचायती संस्कृति के ही अनुरूप है जब सर्वोच्च पद पर बैठे किसी व्यक्ति के द्वारा समाज के अनुरूप संस्कृति के निर्माण का तर्क दिया जाता है तो यह तयशुदा हो जाता है कि ऐसे संस्थान समाज को आगे ले जाने वाले कारक के रूप में नहीं बल्कि पीछे ढकेलने के तौर पर कार्य करेंगे.
निश्चित तौर पर पिछले दो वर्षों में विभूतिनारायण राय ने इस विश्वविद्यालय को भवन और ढांचा दिया है पर वहीं अध्यापकों की एक ऐसी मूढ़ फेहरिस्त भी खड़ी हो गयी है जिसके पास उसकी अपनी जुबान नहीं है, और न ही उसके पास व्यापक सोच का कोई दायरा. उसे चुप रहने और सबकुछ सहने का ही सलीका पता है. यह इसलिये भी है क्योंकि उसके पास इससे बेहतर विकल्प नहीं है. अपनी कार्यपद्धति में विभूति नारायण राय शायद हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर कभी रहे भी नहीं बल्कि अकेले उन्होंने विश्वविद्यालय के सभी पदों की जिम्मेदारी अपरोक्ष रूप से ले ली और एक केन्द्रीकृत संरचना स्थापित होती गयी. अकादमिक स्थितियाँ बेसक बदतर होती गयी और यहाँ पर शोध करने वाले कई छात्र जो कि जे.आर.एफ. थे ने हिन्दी विश्वविद्यालय छोड़ अन्य विश्वविद्यालयों में दाखिला ले लिया. जबकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश में शिक्षण संस्थानों की कमी महसूस कर रहा है ऐसे में हिन्दी विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में इस बार एक भी विद्यार्थी ने प्रवेश नही लिया.
लगभग दो वर्ष पूर्व जब विभूतिनारायण राय को हिन्दी विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया था तो उन्होंने अपने प्रथम सम्बोधन में इस बात को कहा था कि हम लोकतंत्र में असहमतियों को जगह देंगे अभी अपने साक्षात्कार के संदर्भ में भी वे यही बात अपने लिये कह रहे थे कि लोकतंत्र में उन्हें पाठक के तौर पर कुछ भी कहने की छूट मिलनी चाहिये. यह बात इटली के महान दार्शनिक वाल्तेयर से मिलती हुई लगती है पर कार्यपद्धति में शायद उनके लिये यह मुश्किल हो रहा है. उनकी ऐसी मंसा भी एक व्यक्ति के तौर पर हो सकती है पर किसी संस्कृति के निर्माण में वहाँ की जमीन को उसके अनुरूप तैयार किया जाना चाहिये. दिल्ली में भाषा, मानसिकता और पद की चर्चा गर्म है जबकि वर्धा में चुप रहने के बीज बो दिये गये हैं और मातहत इस तौर पर कि अपनी जीभ किसी और की जेब में भूल गये हैं या फिर वह जमी ही नहीं. यह एक संस्थान में लोकतंत्र का अवसान है.

05 अगस्त 2010

माओवादियों से बातचीत ही एकमात्र रास्ता है

स्वामी अग्निवेश से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
माओवादियों और भारत सरकार के बीच बातचीत की कोशिश कर रहे सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक स्वामी अग्निवेश का मानना है कि भारत सरकार और माओवादी मजबूरी में शांति वार्ता कर रहे हैं. उनका कहना है कि दोनों के सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. माओवादी प्रवक्ता आज़ाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले स्वामी अग्निवेश का कहना है कि इस घटना ने शांति वार्ता को गहरा झटका पहुंचाया है. यहां पेश है उनसे हाल ही में की गई बातचीत.

• नक्सलियों के साथ बातचीत की कोशिशें पहले भी हुई है। आंध्र में कई-कई दौर की बातचीत हुई लेकिन उसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. अब जबकि सरकार और नक्सलियों के बीच संघर्ष अपने चरम पर है तब ऐसे समय में नए सिरे से नक्सलियों से बातचीत का औचित्य क्या है?
नए सिरे से तो मैं कैसे कहूं, क्योंकि इससे पहले कभी भी केंद्र सरकार ने किसी को इस तरह की बातचीत के लिए अधिकृत नहीं किया था। 11 मई को चिदंबरम जी ने पहली बार मुझे चिट्ठी लिखी। चिदंबरम जी का अपना दावा है कि भारत के किसी गृहमंत्री ने इससे पहले किसी को बातचीत के लिए अधिकृत किया हो, ऐसा कभी नहीं हुआ। पहले भी आंध्रप्रदेश में बातचीत हुई थी और वह खत्म भी हो गई, ठीक से नहीं चली। ये जो केंद्र के स्तर पर और सभी सात-आठ राज्यों की ओर से केंद्र जो बातचीत करना चाह रही है, ये पहली बार हो रहा है। और उसके लिए जो पहल की गई, मैं समझता हूं कि उसमें बहुत वजन है। सरकार एक तरफ जहां कह रही है, प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि ये भारत की सबसे बड़ी समस्या है, आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सरकार अपनी तरफ से इसमें अर्धसैनिक बलों को बहुत बड़ी तादाद में झोंक रही है। अकेले छत्तीसगढ़ में बताते है कि 12 हजार ऐसे अर्धसैनिक बल के जवान तैयार बैठे हुए है। हथियारों का पूरा का पूरा जखीरा उनके हवाले किया जा रहा है। इसके बावजूद भी सैनिक मर रहे हैं, बारूदी सुरंगों में उड़ाए जा रहे हैं। नक्सलियों के जो छापामार युद्ध के तरीके हैं, उसके मुकाबले में इनके पास कोई प्रशिक्षित जत्था नहीं है। ये समझ नहीं पा रहे है कि क्या करे। ऐसी परिस्थितियों में सेना का भी उपयोग नहीं कर सकते। वायु सेना का नहीं कर सकते। हेलीकाप्टर आप दे देंगे तो सैनिक एक जगह से दूसरी जगह चले जाएंगे, ये अलग बात है। लेकिन सेना जिसको कहते है, उसका उपयोग आप नहीं कर सकते। अर्धसैनिक बल उसके लिए नाकाफी है. पुलिस इस तरह के कामों के लिए ट्रेंड नहीं है. तो जाएंगे कहा?आखिरी से आखिरी इनको बातचीत के लिए ही आना पड़ेगा. हालांकि बातचीत पर ये एक पैसा भी खर्च नहीं कर रहे हैं. मेरे जैसे सन्यासी को एक चिट्ठी पकड़ा के कह रहे हैं कि आप बातचीत करवा दीजिए. मैं उसके लिए भी लगा हुआ हूं. और मैं उसमें ज्यादा जल्दी सफलता दिला सकता हूं. मैं से मेरा मतलब बातचीत की जो प्रक्रिया है, वह अपने आप में इतनी जबरदस्त, इतनी अच्छी है, सही है कि उसमें जल्दी सफलता मिल सकती है बजाय इस तरह की टकराहट से

• दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे के प्रति अविश्वास से भरे हुए हैं। सरकार कहती है कि नक्सली बातचीत के लिए गंभीर नहीं हैं और नक्सली कहते हैं कि सरकार दिखावा कर रही है। ऐसे में आप इतनी उम्मीद कैसे धरे हुए है?

मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि सरकार की हालत तो अखबारों के माध्यम से भी और चिंतलनार में 76 जवानों के मारे जाने के बाद राम मोहन कमेटी की जो रिपोर्ट आयी है, उससे भी पता चलती है. इसके बाद नारायणपुर में सीआरपीएफ के 27 जवान फिर मारे गये. तो इन दोनों की जो रिपोर्ट आयी है, उसके अनुसार ये जवान अपनी कमी से मारे गये. ये जवान मारे जा रहे है, इसलिए नहीं कि नक्सली हिंसा ज्यादा बढ़ गई है. इनकी गलतफहमी और जो तौर तरीके है, जिससे ये खुद ही मौत के मुंह में जा रहे हैं. उन रिपोर्टों में इसी तरह की बात है. पुलिस से या बेस कैंप से इन्हें जो सपोर्ट मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रही है.

अब जाकर ये कह रहे है कि यूनिफाईड कमांड बनाएंगे. दो-तीन-चार राज्यों को मिलाकर. उसमें भी कई राज्यों ने साफ मना कर दिया है. बिहार ने मना कर दिया, बंगाल ने मना कर दिया. वो अपना स्वतंत्र अभियान चलाएंगे. कहने का मतलब ये कि सरकार के लिए ये सब परिस्थितियां ऐसी हैं कि बड़बोलापन तो चाहे कितना भी कर लें ये और उसके नाम पर हथियारों की खरीद-बिक्री में, सिपाहियों की नियुक्ति में जितना कमीशन खा लें (यह भी एक बड़ा उद्योग-धंधा है) लेकिन वास्तव में इनके बल पर ये नक्सलियों पर काबू पा लेंगे, ऐसा मुझे नहीं दिखता नहीं है.दूसरी तरफ रिपोर्ट आ रही है कि 15-15 हजार सीआरपीएफ के जवान या तो इस्तीफा दे रहे हैं या छुट्टी पर जाने के लिए तैयार बैठे हैं कि हम इस तरह कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए नहीं बने हैं, नहीं चाहिए तुम्हारी नौकरी. रखो अपनी नौकरी तो ये जो असंतोष उभर करके आ रहा है, ये भी इनको अंदर ही अंदर सता रहा है. इनको लग रहा है कि हम एक लड़ाई हारने वाले हैं. जितना-जितना ये बल तेज कर रहे हैं, उतनी-उतनी उनकी संख्या बढ़ती जा रही हैं.
जो रमन सिंह कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की संख्या पांच हजार बताते थे, वो अब दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में उनकी संख्या 50 हजार बता रहे हैं. पहले नक्सलियों के पास जो हथियार होते थे, वो साधारण थे. अब एक से एक अत्याधुनिक हथियार, एके-47 से लेकर राकेट लांचर तक उनके पास हैं. तो ये सब किसकी कृपा से हो रहा है? किनकी बदौलत हो रहा है? इनकी ही बदौलत हो रहा है. इन्हीं के हथियार उनके हाथों में जा रहे हैं. अगर कहीं से आ भी रहे हैं तो उनके पीछे कोई न कोई सरकारी सूत्र भी है, जो उनकी मदद कर रहा है. सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार, सरकार की अपनी ढील ये सब चीजें जिम्मेदार हैं, जो नक्सलियों को ताकत दे रही हैं. फिर सरकार की तरफ से अब जो स्वीकारबोध आया है कि हमें अपनी विकास की नीति में परिवर्तन करना है. अब वो जग रहे हैं कि जो पेसा एक्ट है, प्राविजन ऑव पंचायत एक्सटेंशन टू द शिड्यूल्ड एरिया कानून है, अब उसे लागू करना चाहिए. ताकि आदिवासी नक्सलियों के चंगुल से छूटकर इधर आ जाएं. अब इतने दिनों बाद स्वीकारबोध हुआ है, अब चिट्ठी-पतरी हो रही है. आपस में एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय पूछ रहे हैं. गृहसचिव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को चिट्ठी लिख रहे हैं कि आदिवासियों को वनोपज का अधिकार दे दो, ये दे दो, वो कर दो. इस तरह की जो बातें चल रही है, वह नीचे तक नहीं आ रही हैं. नीचे तक लाने के लिए उन्हें अपना विभाग तो खोलना पड़ेगा. किसी अधिकारी को किसी गांव में तो भेजना पड़ेगा. उसके लिए जरूरी है कि रोज-रोज के जो हमले हैं, उसे शांत किया जाये. विकास का कोई भी काम करने के लिए, जंगल में जाने के लिए जो परिस्थितियां चाहिए, आज उपलब्ध नहीं हैं. आप लगाते रहिये 14 हजार करोड़ रुपया. पहले दिन योजना आयोग ने घोषणा कर दी, फिर दूसरे दिन कहा- अरे, पहले का दिया हुआ पैसा ही खर्च नहीं हुआ है. तो क्यों नहीं हुआ खर्च? क्योंकि किसी की जाने की हिम्मत नहीं है वहां. आपका पैसा पड़ा हुआ है, किसी काम का नहीं है. नक्सलियों की पकड़ तगड़ी होती जा रही है. मैं नहीं चाहता कि उनकी पकड़ तगड़ी हो, पहले से मजबूत हो. उन्हें शिकस्त मिलनी चाहिए. वो उस रास्ते को छोडऩे के लिए मजबूर किये जाने चाहिए, क्योंकि उनका हिंसा का रास्ता भी गलत है. खास तौर पर जब वे किसी नागरिक समाज के व्यक्ति की हत्या कर देते हैं. बस में वे मार देते हैं तो माफी मांग लेते हैं. लेकिन बहुतो को वे यह कहकर मारते है कि वह पुलिस का मुखबिर है. वो चाहे इस लोकतंत्र को कितनी भी गालियां दें लेकिन लोकतंत्र के नाम पर कुछ तो ये करते हैं. भले दिखावा करें, नाटक करें. नक्सलियों के कई बड़े नेता जेलों में बंद है. सरकार ने इनके नेताओं की तो गला रेतकर हत्या नहीं कर दी, जैसा नक्सली कर रहे हैं. इस तरह की हिंसा के सहारे, आतंक और दहशत फैलाकर नक्सली अपने विस्तार की सोच रहे हैं. ये गलत है, उनको इसकी इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.दोनों तरफ से हिंसा बंद होनी चाहिए, बातचीत होनी चाहिए. मैं इसको एकमात्र रास्ता मान रहा हूं. इसलिए मेरी आशावादिता है. ऐसा नहीं है कि सरकार का अचानक हृदय परिवर्तन हो गया हो. मैं उनकी मजबूरी समझ रहा हूं. उधर नक्सलियों को भी ऐसा ही लग रहा है. उनके जो 43 शीर्षस्थ नेता थे, उनमें से मुश्किल से 23 ही लोग रह गए हैं. 20 से ज्यादा मारे गए या जेलों में बंद हैं. उनका हाल भी बुरा चल रहा हैं. उनके नाम पर नक्सलियों का ओढऩा ओढक़र बहुत से गैर नक्सली, गैर माओवादी घूम रहे हैं. अपना रोज का धंधा चला रहे हैं. कहने का मतलब ये है कि नक्सलियों के सामने भारी संकट है. अपने आंदोलन को अगर नक्सली इसी तरह भटकने देंगे तो आगे चलकर के अपने आंदोलन को संभाल पाना मुश्किल होगा. ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की जब घटना हुई तो माओवादी नेताओं ने कहा कि इसमें हमारा हाथ नहीं है. फिर जब पता चला कि इस घटना के पीछे पीसीपीए है तो माओवादी कहने लगे कि वो किसी और संगठन का है. लेकिन है तो माओवादी ग्रुप का ही! माओवादियों के साथ संकट है कि उसे अपने साथ जोड़ें तो संकट है, उसे छोड़ें तो संकट है.

ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की घटना के बाद इनके ऊपर एक बड़ा संकट आ गया है। सीबीआई की जो जांच हो रही है, उसमें अगर इनका नाम आ गया कि ये माओवादी संगठन ही है, दूसरे नाम से, सीपीआई माओवादी के बजाय किसी और नाम से उनका ही जनसंगठन है. ऐसे में माओवादी इस बात से कैसे बचेंगे कि वो केवल माओवादी नहीं है बल्कि आतंकवादी भी है. आतंकवादियों का लेबल इन पर पूरी तरह से लगा नहीं है, जिस दिन लगेगा, उस दिन इस कलंक को धो पाना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा.

• मतलब आप यह कह रहे हैं कि आप जिस शांति वार्ता की पहल कर रहे हैं, वह वार्ता असल में संकट में घिरे हुए दो लोगों के बीच की बातचीत है?

दोनों की मजबूरी है कि रास्ता निकले कुछ। मैं इसके लिए समझता हूं कि इससे बढिय़ा मौका नहीं मिलेगा. दोनों को नजदीक लाना, बातचीत कराना, हिंसा दोनों की तरफ से बंद कराना. बातचीत में तुम लड़ो-झगड़ो, विरोध करो, दस दिन करो, दस महीने करो, सारे मीडिया में आनी चाहिए. तुम एक-दूसरे की पोल खोलो, सब कुछ करो. इससे देश का फायदा होगा. जो बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं, इन दोनों के झगड़े में, आदिवासी समाज के जो बहुत से लोग मारे जा रहे हैं, उनको कम से कम एक राहत मिलेगी. लिंगाराम जैसे लोगों को पुलिस कह देती है कि ये दंतेवाड़ा में अवधेश गौतम के रिश्तेदारों की हत्या का मास्टरमाइंड है. आज़ाद के बाद सीपीआई माओवादी में उसकी नियुक्ति प्रवक्ता के रूप में की गई है. कल्लूरी जैसा एक बदनाम अफसर बिना हस्ताक्षर के एक बयान भेज देता है और प्रेस वाले उसे लपालप छाप देते हैं. पहले पन्ने पर. इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार उसे फ्रंट पेज पर छाप देता है, जो सच्चाई की बहुत दुहाई देता है, बड़े-बड़े गोयनका अवार्ड देता है, राष्ट्रपति के द्वारा पत्रकारिता के लिए अवार्ड दिलवाता है, उसको इस बात का जवाब देना पड़ेगा कि कल्लूरी के बिना हस्ताक्षर के एक बयान को अपने मुख्य पृष्ठ पर कैसे छाप दिया? लिंगाराम को तुमने मास्टरमाइंड छाप दिया? लिंगाराम से मैं मिला हूं. वह एक सीधा-साधा लडक़ा है. वह नक्सलियों से भी परेशान है और सलवा जुडूम से भी. एसपीओ लोगों से भी परेशान है. वह कह रहा है कि मैं सीधा-साधा अपनी गाड़ी से सब्जी बेच लेता था. अब मैं मीडिया की पढ़ाई के लिए दिल्ली में हूं. उसको आपने बता दिया कि वो अवधेश गौतम के रिश्तेदारों की हत्या में शामिल है, मास्टरमाइंड है, किंगपिन है. आज़ाद के बाद वो प्रवक्ता नियुक्त किया गया है. सब कुछ गड्ड-मड्ड, झूठी से झूठी बातें हैं. उसमें अरूंधति राय का नाम भी डाल दिया गया है... विदेश में ट्रेनिंग लेकर आया है, भले ही उसके पास पासपोर्ट न हो. उसने गुजरात में भी ट्रेनिंग ली है. पता नहीं क्या-क्या बकवास... पुलिस का एक अधिकारी, जो ऐसे ही बदनाम है, उसके बयान पर यूं ही ध्यान नहीं देना था लेकिन बिना हस्ताक्षर वाले उसके बयान को इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों ने पहले पन्ने पर छापा. ये ज्यादा बड़ी गैर जिम्मेदारी है. मेरे कहने का मतलब है कि इस तरह के बहुत से निरपराध आदिवासी लडक़े-लड़कियों के साथ रोज ऐसी घटनाएं हो रही हैं. मैं समझता हूं कि हम लोगों को इस तरह की घटनाओं को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए. इसका इलाज होना चाहिए. ताकि बातचीत से ये सब चीजें सामने आए. बातचीत ही एकमात्र हल है. सन् 1962 के युद्ध के बाद चीन ने हमारी 80 हजार वर्गमील जमीन दबा कर रखी है, उसके बावजूद आप रोज के हिसाब से उससे बातचीत कर रहे हैं, उसको अपना दोस्त बता रहे हैं. उससे पीट-पिटाकर और अपनी जमीन दबवा करके, दलाई लामा और तिब्बत को पीछे धकेलकर हम उससे बात कर रहे हैं. बात के दौर चल रहे हैं. पाकिस्तान से चार-चार युद्ध करने के बाद और सब कुछ होने के बाद और कई बार उससे कुटनीतिक तमाचे खाने के बाद भी आप तैयार हैं कि उससे बातचीत करेंगे. बातचीत ही तो कर रहे हैं आप, और क्या करेंगे? तो माओवादियों के साथ बातचीत करने में क्या तकलीफ आ रही है?

• आप बातचीत की शुरूआत करते हैं। चिदंबरम साहब की चिट्ठी आपको आती है, सीपीआई माओवादी के प्रवक्ता आज़ाद का जवाब आता है और ... नागपुर में वरिष्ठ पत्रकार एस.एन.विनोद एक अखबार निकालते हैं-दैनिक 1857. उसके पहले पन्ने पर खबर आती है कि नागपुर से गिरफ्तार किए गए खूंखार नक्सली नेता आज़ाद को आंध्र में मार गिराया गया. इन सब चीजों को आप किस तरह देखते हैं ?

बहुत ही गलत संदेश जा रहा है. मैंने तो इसको अपने जीवन का बहुत बड़ा झटका भी बताया था. मेरी अपनी जो विश्वसनीयता है, मुझे लगता है कि यह संकट में पड़ रही है. क्योंकि मैं मध्यस्थ बनकर एक भूमिका में आया था और मुझे मेरा मन कचोट रहा है. कई-कई रात मैं सो नहीं पाया. ऐसा क्यों हुआ?
सरकार मुझे माध्यम बनाकर बातचीत करा रही है और उस चिट्ठी का जवाब लेकर, मेरे पत्र को लेकर आखिरी दौर की बातचीत की सहमति के लिए आज़ाद दंडकारण्य जाने वाले थे, नागपुर स्टेशन पर उतर करके. पत्रकार हेमचंद पांडेय पिछले दिन शाम को दिल्ली से चला. निजामुद्दीन से फोन करके अपनी पत्नी बबीता पांडेय को कह रहा है कि वह नागपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गया है और कल नागपुर से ट्रेन पकडक़र परसो सुबह सात बजे घर पहुंच जाउंगा. तो जो व्यक्ति नागपुर के लिए रवाना हुआ है, उसकी लाश आज़ाद के साथ आदिलाबाद के जंगल में कैसे मिल गई?इन सब चीजों पर थोड़ी सी भी जांच हो जाए तो सरकार ने जो दावा किया है कि आज़ाद आदिलाबाद के जंगल में मुठभेड़ में मारे गए हैं, इसकी तस्वीर साफ हो जाएगी. मैं तो कह रहा हूं कि सरकार जांच कराए या न कराए, पत्रकारों को इसकी जांच गहराई से करनी चाहिए. ये पोल निकलनी चाहिए, सच्चाई सामने आनी चाहिए. क्यों नहीं आ रही है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं.

• आप कह रहे हैं कि यह फर्जी मुठभेड़ है?

दिखाई पड़ रहा है, लेकिन मैं नहीं कहूंगा उसको. मैं चाहूंगा कि न्यायिक जांच इसको कहे. सच्ची मुठभेड़ है तो बताए और फर्जी मुठभेड़ है तो बताए. और फर्जी है तो कौन जिम्मेवार है इसके लिए. केवल फर्जी मुठभेड़ की जिम्मेवारी पर बात खतम नहीं होगी यहां. इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया को sabotage करने के लिए, जो केंद्र के स्तर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि आजादी के बाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नक्सलवाद से है और उसमें यदि आपने एक सन्यासी को बातचीत करने के लिए आगे किया तो उसमें मैं जानना चाह रहा हूं कि कौन जिम्मेवार है इसके लिए? माओवादियों द्वारा जब 27 सीआरपीएफ के जवानों की हत्या की गई तो मैंने उसकी निंदा की. इससे पहले जब 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या की गई मैंने तब उसकी निंदा की. गला रेतकर या पुलिस का मुखबिर बताकर किसी की हत्या की गई, मैं उसकी भी निंदा करता रहा हूं. नक्सलियों की किसी भी हिंसक गतिविधि को मैं सही नहीं बता रहा. लेकिन आज़ाद की मुठभेड़ में हत्या हुई है तो आज़ाद की हत्या अपने आप में संदिग्ध परिस्थितियों में दिखाई पड़ रही है. जबकि किशनजी का बयान है, जबकि गुडसा उसेंडी का बयान है कि वह स्वामी अग्निवेश की चिट्ठी लेकर आखिरी दौर की बातचीत के लिए दंडकारण्य आ रहे थे. मैं स्वयं इंतजार कर रहा था. जुलाई के तीन,चार या पांच तारीख तक मुझको जवाब मिलता जिसको लेकर मैं 15 या 20 जुलाई को, केंद्र सरकार की ओर से चिदंबरम जी ने मुझे जो चिट्ठी लिखी थी, उसके अनुसार बातचीत शुरू करा देता. तो कौन जिम्मेवार है? आजाद कैसे मार दिया गया 1 तारीख या 2 तारीख की रात को? यह एक सवाल आता है. यह केवल फर्जी या सही मुठभेड़ का सवाल नहीं है, इसमें पूरी शांति प्रक्रिया को किसने ध्वस्त किया है? और यदि ये विश्वास सरकार खो बैठेगी कि किसी को आप बुलाइए थोड़ा नजदीक या उसको झांसा दीजिए कि आओ बेटे, बातचीत करने के लिए, और फिर उसे पकडक़र मार डालो. तो फिर कोई सरकार पर विश्वास कैसे करेगा? हम जैसे लोग तो भुगत लेंगे जो कुछ हमारी जिंदगी में होगा लेकिन सरकार की विश्वसनीयता यदि खत्म हो जाती है तो कहां जाएगी ये?

• आप सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और उसी सरकार से बातचीत की भी उम्मीद कर रहे हैं?

उम्मीद मैं उनकी मजबूरी की वजह से कर रहा हूं। ये उनकी कोई दरियादिली जैसी कोई चीज नहीं है. मैं जानता हूं कि वो अपने हथियारों के बल पर इसका समाधान नहीं कर सकते. जितना करेंगे, उतना ही नक्सलियों को वो बढ़ावा देंगे. जो पिछले दिनों के आंकड़ों से साबित हो रहा है. सलवा जुडूम पैदा करके आपने नक्सलियों को ताकत दी है, नक्सली कमजोर नहीं हुए है. सरकार नक्सलियों को खत्म करने के नाम पर जो-जो काम कर रही है, उससे नक्सलियों को फायदा हो रहा है. तो सरकार आखिर चाहती क्या है?

मैं कहता हूं कि रणनीति के हिसाब से भी और आज की परिस्थिति में बातचीत करना सरकार की मजबूरी है. नक्सलियों के लिए भी मजबूरी मैं मान रहा हूं इसलिए बीच में मैं रहूं या कोई रहे, बातचीत से ही रास्ता निकलेगा, इसलिए मैं उम्मीद रखता हूं.
• नक्सल मुद्दों पर नजर रखने वाले और इस मुद्दे को जानने-समझने वाले कई लोग ऐसा मानते हैं कि नक्सली आपको मोहरा बना रहे हैं।

नक्सलियों ने तो मुझे फोन करके या चिट्ठी लिख के ऐसी बात आज तक नहीं कही. पहली बार यदि किसी ने चिट्ठी लिखी, सीलबंद लिफाफे में मुझे दिया तो भारत के गृहमंत्री चिदंबरम जी ने दिया, जिनसे मेरा कोई व्यक्तिगत संपर्क, परिचय नहीं था. उन्होंने पहली बार मुझे मध्यस्थ बनने की पेशकश की. तो पहल तो उन्होंने ही की है और उनकी दी हुई चिट्ठी को मैंने नक्सलियों को भिजवाया. जिसका जवाब मुझे पूरे सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी की ओर से आज़ाद ने दिया. फिर तीसरी चिट्ठी मैंने 26 जून को लिखी. तो मैं उनका मोहरा कैसे बन सकता हूं? मैं नक्सलियों का सिद्धांतत: विरोधी हूं. आज से नहीं हूं. जब मैं कलकत्ता के सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ाता था और जब नक्सली आंदोलन नक्सलबाड़ी से चल कर कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कालेज तक पहुंच गया था, जब ये चेयरमैन माओ को अपना चेयरमैन बताते थे, लाल किताब को लेकर सब काम किया करते थे, तब से मैं इनका विरोधी रहा हूं. मैं तो हिंसक गतिविधियों से कभी भी सहमत नहीं हो सकता. एक मुर्गी तो क्या एक कीड़ा भी मुझसे जानबूझ कर नहीं मारा जा सकेगा. मैं सिद्धांत रूप से हिंसा को गलत मानता हूं. जो मांस, मुर्गी, अंडा खाते हैं, उनको मैं गलत मानता हूं. मैं पूर्ण रूप से अहिंसक समाज के लिए समर्पित हूं तो नक्सली मुझे कैसे मोहरा बना पाएंगे? मुझे बनाएंगे तो और भारी पड़ेगा उनको.

सरकार मोहरा बना रही है?

सरकार ने कोशिश की कि मुझे चिट्ठी देकर इन परिस्थतियों में कोई रास्ता निकाले. तो मैंने रास्ता निकालकर लगभग उनके नजदीक ला दिया था. अब भी मैं उनसे एक बात कह रहा हूं, मेरी अपनी पूरी प्राणप्रण से चेष्टा रहेगी लेकिन आपने जो मेरे लिए दिक्कत पैदा की है, उसको थोड़ा सा दूर कीजिए. इतना कीजिए कि आज़ाद के मुठभेड़ की न्यायिक जांच करा दीजिए. न्यायिक जांच का आदेश दे दीजिए बस. ताकि मैं माओवादी नेताओं से कह सकूं कि देखो आपका आरोप है कि फर्जी मुठभेड़ है, ये न्यायिक जांच में सामने आ जाएगी. आप भी जांच में मदद करो लेकिन साथ ही साथ आप वहां से शुरू करो, जहां से आज़ाद ने मारे जाने से पहले अपना काम छोड़ा था. ये आज़ाद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. अगर वो सचमुच मेरी चिट्ठी को लेकर के कोई तारीख देने के लिए जा रहे थे तो वो तारीख यदि अब भी मुझे मिलती है तो उसका बहुत बड़ा लाभ होगा.

• आपको ऐसा लगता है कि सरकार उस मामले को लेकर कोई न्यायिक जांच करेगी?

न्यायिक जांच करना उनके लिए जरूरी है, क्योंकि ज्यादातर लोग जो भी मेरे संपर्क में आ रहे हैं, और विपक्ष के तमाम नेताओं से मैं मिला हूं, वो भी कह रहे हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि ये कैसे मुठभेड़ हो गई? पत्रकार की हत्या ने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया। पत्रकार हेमचंद पांडेय का आदिलाबाद के जंगल में मारा जाना भी संदिग्ध है. इस मुठभेड़ में एक भी पुलिसवाला घायल नहीं हुआ. साढ़े तीन घंटे की मुठभेड़ और गोलाबारी हुई जंगल में रात को, तो केवल वे दोनों मारे गए. तीसरा आदमी कोई घायल नहीं हुआ, न इधर से न उधर से. पुलिसवालों को एक छर्रा तक नहीं लगा. ऐसा कैसे हुआ मुठभेड़ में? जब आज़ाद के पास एके-47 दिखाया आपने तो उसकी गोलियां कहां गईं? ऐसा संभव नहीं है कि सीपीआई माओवादी का तीसरे नंबर का नेता अपने गले में एके-47 लटकाकर जंगल में अकेला 12 बजे रात को पत्रकार को इंटरव्यू देता घूम रहा हो और इन्होंने मुठभेड़ में उसे मार दिया. पुलिस के बयान पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा है. सरकटपल्ली गांव के लोग कह रहे हैं कि हमारे गांव में रात को इस तरह की कोई घटना नहीं हुई है. वरना रात को इतनी गोलियां चलती तो गांव वाले जाग जाते, कुछ तो सुनते. अब तक जो कुछ भी जानकारियां मिल रही है, उससे ये लग नहीं रहा कि ये वास्तविक मुठभेड़ हुई है.

• चिदंबरम जी आपसे बातचीत में न्यायिक जांच से इनकार कर चुके हैं.

न्यायिक जांच से इनकार किया भी है लेकिन उन्होंने मुझे इशारे से जरूर कहा कि आप चाहें तो आंध्रप्रदेश सरकार से जांच करा लें. लेकिन मैं आंध्रप्रदेश सरकार के पास क्यों जाऊं? मैं सेंट्रल का मध्यस्थ बनकर बातचीत करा रहा था, तो सेंट्रल की जिम्मेवारी बनती है. इसलिए मैं प्रधानमंत्री से मिला हूं और उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया है कि वे इसे गंभीरता से लेंगे. पूरी संवेदना के साथ मेरी बात उन्होंने सुनी है. मुझे विश्वास है कि प्रधानमंत्री इसमें हस्तक्षेप करेंगे.
• सरकार जैसा चाहती है और नक्सली जैसा चाहते है, उसी के अनुरूप अगर सारी बातचीत हो भी जाए तो अंतत: क्या होगा?

अंतत: यह होगा कि गोलियों पर जो आज दोनों तरफ का भरोसा है, वह समाप्त होकर बातचीत की तरफ, समाधान की तरफ आएगा. सरकार कहेगी कि आप क्यों ऐसा कर रहे हैं? वो कहेंगे कि आपने आदिवासियों के साथ ये-ये जुल्म किए हैं. सरकार कहेगी कि अच्छा आज तक जो हो गया, सो हो गया. अब हम इसे सुधारना चाहते हैं. आदिवासी उसके ऊपर अपनी शर्त लगाएंगे कि खनिज संपदा जो है, उसे आप इस तरह से मत दीजिए. फिर पूरा देश भी इस बहस के अंदर उसमें शामिल होगा. क्योंकि छिटपुट-छिटपुट बहस तो हो रही है लेकिन एक पूरा घनीभूत होकरस एक बहस होगी कि विकास का जो आपने मॉडल बनाया है, उसमें जिनकी जमीन छीनकर तुम विकास कर रहे हो, जिनकी खनिज संपदा का तुम दोहन कर रहे हो, उनका क्या हिस्सा है, उसके अंदर. ये सब बातें आएंगी उसके अंदर. मुझे लगता है कि इससे सकारात्मक परिणाम निकलेंगे.
बातचीत से ही कुछ निकलेगा. अभी तो कुछ नहीं हो रहा है. अंधाधुंध गोलियां दोनों तरफ से चल रही हैं और बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं. नेता जो बैठे हैं, दिल्ली में या रायपुर में, उनका तो घर से कुछ नुकसान नहीं हो रहा है. जनता का पैसा हथियारों में जा रहा है. जनता के गरीब किसान, मजदूर के बेटे फौज में हैं या अर्धसैनिक बलों में हैं, वो मारे जा रहे हैं, तो मर जाओ. नेताओं का तो कुछ बिगड़ नहीं रहा है. उनकी तो सुरक्षा और बढ़ गई. सुना है कि चिदंबरम जी की और गृहसचिव की सुरक्षा एकदम अचानक बढ़ गई. कहीं से उनको सूचना मिली कि नक्सली उनको मारना चाहते हैं. बताइए ! तो ये नेता अपनी-अपनी सुरक्षा बढ़ा रहे हैं जनता के खर्चे पर. टैक्स देने वालों के धन का आज नंगा नाच हो रहा है.

जीडीपी का growth हो रहा है, देश का विकास हो रहा है, देश में जो अरबपति हैं, उनकी संख्या बढ़ रही है...

तो गरीबों की संख्या भी बढ़ रही है. गरीबी की रेखा के नीचे वालों की संख्या भी बढ़ रही है. हर दूसरा बालक या बालिका कुपोषण का शिकार है. हर रोज 7 हजार बच्चे भूख से तड़प कर मर रहे हैं. इस देश के अंदर अनाज गोदामों में पड़ा हुआ है या सुअर खा रहे हैं या चूहे खा रहे हैं, बर्बाद हो रहा है अनाज. भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है. एक-एक अधिकारी के घर से सौ-सौ करोड़, पांच-पांच सौ करोड़ निकल रहे हैं. ये सब चीजें देश को भयावह परिस्थतियों की तरफ ले जा रहे हैं.

• क्या सरकार व नक्सलियों के बीच जो बातचीत होगी, उससे ये भयावह परिस्थितियां बदल जाएंगी?

जरूर। मैं समझता हूं कि इन मुद्दों पर भी बातचीत होगी। बातचीत में केवल और केवल ये नहीं होगा कि तुम्हारे ऊपर से प्रतिबंध हटा देंगे, तुम्हारे साथियों को जेल से बाहर निकाल देंगे, यह इतने तक नहीं रहेगा. पूरे विकास की अवधारणा से लेकर सभी मुद्दों पर बातचीत होगी. मुझे लगता है कि तब भ्रष्टाचार के ऊपर भी बहस होगी. स्विस बैंकों में जो पैसा जमाकर रखा है, भ्रष्ट नेताओं ने, यह भी बहस का मुद्दा होगा. Governance के ऊपर भी सवाल आएगा कि ये जल किसका, ये जमीन किसकी, ये जंगल किसके, मालिक असली मायने में कौन है? उन इलाकों में रहने वाला या इनके वोटों की सौदेबाजी करके जो ऊपर पहुंच गया है, और वो कार्पोरेट जगत से सौदा करके बेच रहा है, इन सब चीजों को ? जो कर्नाटक में हो रहा है, जो मुख्यमंत्री खुद कह रहा है. तो इस तरह के जो माफिया है, माइनिंग माफिया, वो मालिक है इस देश के, देश की संपत्ति के. ये सारी चीजें आएंगी. बातचीत ही एकमात्र रास्ता है. मीडिया का तो मतलब ही है बातचीत. आपके पास कैमरा है, कलम है, बंदूक तो नहीं है आपके पास. उस पर अगर हम ज्यादा विश्वास रखेंगे और बंदूक पर कम रखेंगे तभी हमारा भविष्य बेहतर है. साभार- रविवार.

29 जुलाई 2010

विकास तो चाहिए, पर किस तरह?

  • देवाशीष प्रसून

द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्ति तक साम्राज्यवादी ताक़तों को यह समझ में आ गया था कि अब केवल युद्धों के जरिए उनके साम्राज्य का विस्तार संभव नहीं है। उन्हें ऐसे कुछ तरक़ीब चाहिए थे, जिसके जरिए वे आराम से किसी भी कमज़ोर देश की राजनीति व अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप कर सकें। इसी सिलसिले में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र के फलक पर ’विकास’ को फिर से परिभाषित किया गया। इससे पहले विकास का मतलब हर देश, हर समाज के लिए अपनी जरूरतों व सुविधा के मुताबिक ही तय होता था। पर, संयुक्त राष्ट्र संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश व विश्व व्यापार संगठन जैसे ताकतवर प्रतिष्ठानाओं के उदय के बाद से विकास का मतलब औद्योगिकरण, शहरीकरण और पूँजी के फलने-फूलने के लिए उचित माहौल बनाए रखना ही रह गया। दुनिया भर के पूँजीपतियों की यह गलबहिया दरअसल साम्राज्यवाद के नये रूप को लेकर आगे बढ़ी। इस प्रक्रिया में दुनिया भर में बात तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने की हुई, लेकिन हुआ इससे बिल्कुल उलट।

भारत का ही उदाहरण लें। शुरु से ही विकास के नाम पर गरीबों का अपने ज़मीन व पारंपरिक रोजगारों से विस्थापन हुआ है। जंगलों को हथियाने के लिए बड़े बेरहमी से आदिवासियों को बेदख़ल किया गया जो आज भी मुसलसल जारी है। आँकड़े बताते हैं कि सन ’४७ से सन २००० के बीच सिर्फ़ बाँधों के कारण लगभग चार करोड़ लोग विस्थापित हुए है, अन्य विकास परियोजना के आँकड़े अगर इसमें जोड़ दिए जायें तो विस्थापन का और भयानक चेहरा देखने को मिलेगा। विकास के इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में सरकारों द्वारा बड़े स्तर पर मानवाधिकार उल्लंघन, सैन्यीकरण और संरचनात्मक हिंसा की घटनाओं में लगातार इज़ाफा हुआ है।

औद्योगीकरण, शहरीकरण, बाँध, खनिज उत्खनन और अब सेज़ जैसे पैमानों पर विकास की सीढ़ियों पर नित नए मोकाम पाने वाले हमारे देश में इस विकास के राक्षस ने कितना हाहाकार मचाया है, यह शहर में आराम की ज़िंदगी जी रहे अमीर या मध्यवर्गीय लोगों के कल्पना से परे है, पर देश में अमीरी और ग़रीबी के बीच बढ़ता दायरा इस विभत्स स्थिति की असलियत चीख़-चीख़ कर बयान करता है। बतौर बानगी, देश में बहुसंख्यक लोग आज भी औसतन बीस रूपये प्रतिदिन पर गुज़रबसर कर रहे हैं और दूसरी ओर कुछ अन्य लोगों के बदौलत भारत दुनिया में एक मज़बूत अर्थव्यव्स्था के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा है। अलबत्ता, सरकार अपनी स्वीकार्यता बनाये रखने के लिए महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी सरीखे योजनाएं भी लागू करती हैं। पर, इस तरह की योजनाओं का व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते क्या हश्र हो रहा है, सबको पता है और फिर भी अगर साल भर में सौन दिन का रोज़गार मिल भी जाए तो बाकी दिन क्या मेहनतकश आम जनता पेट बाँध कर रहे? हमारी सरकार विकास को शायद इसी स्वरूप में पाना चाहती है?

देश में विकास में मद्देनज़र ऊर्जा की बहुत अधिक खपत है और विकास के पथ पर बढ़ते हुए ऊर्जा की जरूरतें बढ़ेंगी ही। ऊर्जा के नए श्रोतों में सरकार ने न्यूक्लियर ऊर्जा के काफी उम्मीदें पाल रखी हैं। जबकि कई विकसित देशों ने न्यूक्लियर ऊर्जा के ख़तरों को ध्यान में रखते हुए इनके उत्पादन के लिए प्रयुक्त रियेक्टरों पर लगाम लगा रखा है, वहीं भारत सरकार को अपने यहाँ इन्हीं यम-रूप उपकरणों को स्थापित करने की सनक है। और अब आलम यह है कि न्यूक्लियर क्षति के लिए नागरिक देयता विधेयक पर सार्वजनिक चर्चा किए बिना ही इसे पारित करवाने की कोशिश की गई। इसमें यह प्रावधान था कि भविष्य में बिजली-उत्पादन के लिए लग रहे न्यूक्लियर संयंत्रों में यदि कोई दुर्घटना हो जाए, तो उसको बनाने या चलाने वाली कंपनी के बजाय भारत सरकार क्षतिपूर्ति के लिए ज़िम्मेवार होगी। अनुमान है कि ऐसी किसी भी स्थिति में भारत सरकार को जनता के खजाने से हर बार कम से कम इक्कीस अरब रूपये का खर्च करने पड़ेंगे। विदेशी निगमों को बिना कोई दायित्व सौंपे ही, उनके फलने-फूलने के लिए उचित महौल बनाए रखने के पीछे हमारी सरकार की क्या समझदारी हो सकती है? सरकार के लिए विकास का यही मतलब है क्या?

छत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों – बस्तर, दंतेवाड़ा और बीजापुर में उन्नत गुणवत्ता वाले लौह अयस्क प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है। यह जगह पारंपरिक तौर पर आदिवासियों का बसेरा है और वे इस इलाके में प्रकृति का संरक्षण करते हुए अपना जीवन-यापन करते हैं। इन आदिवासियों का जीवन यहाँ के जंगलों के बिना उनके रोजगार और सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन से विस्थापन जैस होगा। सरकार को विकास के नाम पर यह ज़मीन चाहिए, भले ही, ये आदिवासी जनता कुर्बान क्यों न हो जायें और पर्यावरण संरक्षण की सारी कवायद भाड़ में जाए। इस कारण से जो ज़द्दोजहद है, उसकी परिणति गृहयुद्ध जैसी स्थिति में है। इसमें एक तरफ, आदिवासी लोग जंगल पर अपने अधिकार को बनाये रखने के लिए लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ, सरकार के प्रोत्साहन पर केंद्रीय पुलिस बल और उसके द्वारा समर्थित सलवा जुडूम अपनी नौकरी बजा रहे हैं। सूत्रों से पता चलता है कि यह पूरा खूनी खेल टाटा स्टील और एस्सार स्टील के इशारे पर लौह अयस्क से संपन्न गांवों के अधिग्रहण करने हेतु खेला जा रहा है। बहरहाल, आदिवासियों को उनके आजीविका के साधनों, जीवन का आधार और अविवादित रूप से उनकी अपनी संपत्ति - इन जंगलों से महरूम करने वाले इसी व्यवस्था का एकमात्र उद्देश्य विकास करना है। सवाल यह है कि यह विकास किसका होगा और किसके मूल्य पर होगा?

विकास के इस साम्राज्यवादी मुहिम में उलझे अपने इस कृषिप्रधान राष्ट्र में आज खेती की इतनी बुरी स्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है? विदेशी निगम के हितों को ध्यान में रखकर वैश्विक दैत्याकार प्रतिष्ठानोंके शह पर हुई हरित क्रांति अल्पकालिक ही रही। जय किसान के सारे सरकारी नारे मनोहर कहानियों सेअधिक कुछ नहीं थे। खेती में अपारंपरिक व तथाकथित आधुनिक तकनीकों के प्रवेश ने किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयों सिंचाई, कटाई और दउनी आदि कामों के लिए बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा नियंत्रित उद्योगों के उत्पादों पर निर्भर कर दिया है। हरित क्रांति के आह्वाहन से पहले भारतीय किसान बीज-खाद आदि के लिए सदैव आत्मनिर्भर रहते थे। लेकिन कृषि क्षेत्र में सरकार द्वारा लादे गये आयातित विकास योजनाओं ने किसानों को हर मौसम में नए बीज और खेतीबाड़ी में उपयोगी ज़रूरी चीज़ों के लिए बाज़ार पर आश्रित कर दिया है। बाज़ार पैसे की भाषा जानता है। और किसानों के पास पैसे न हो तो भी सरकार ने किसानों के लिए कर्ज की समुचित व्यवस्था कर रखी है। इस तरह से हमारी कल्याणकारी सरकारों ने आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और संपन्न किसानों को कर्ज के चंगुल में फँसाते हुए ’ऋणं कृत्वा, घृतं पित्वा’ की संस्कृति का वाहक बनाने का लगातार सायास व्यूह रचा है। छोटे-छोटे साहूकारों को किसानों का दुश्मन के रूप में हमेशा से देखा जाते रहा है, पर अब सरकारी साहूकारों के रूप में अवतरित बैंकों ने भी किसानों का पोर-पोर कर्ज मेंडुबाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी है। कर्ज चुकाने की बेवशी से आहत लाखों किसानों के आत्महत्या का सिलसिला जो शुरु हुआ, ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है।

कृषि में विकास का कहर यहाँ थमा नहीं है, हाल में पता चला है कि हरित क्रांति के दूसरे चरण को शुरु करने को लेकर जोर-शोर से सरकारी तैयारियाँ चल रही है। छ्त्तीसगढ़ में धान की कई ऐसी किस्में उपलब्ध हैं, जिनकी गुणवत्ता और उत्पादन हाइब्रिड धान से कहीं अधिक है और कीमत बाज़ार में उपलब्ध हाइब्रिड धान से बहुत ही कम। फिर भी, दूसरी हरित क्रांति की नए मुहिम में कृषि विभाग ने निजी कंपनियों को बीज, खाद और कीटनाशक दवाइयों का ठेका देने का मन बना लिया है। ठेका देने का आशय यह है कि उन्हीं किसानों को राज्य सरकार बीज, खाद या कीटनाशक दवाइयों के लिए सब्सिडी देगी, जो ठेकेदार कंपनियों से ये समान खरीदेंगे, अन्यथा किसी तरह की कोई मदद नहीं मिलेगी। गौरतलब है कि इस तरह से ये निजी कंपनीयां किसानों को अपने द्वारा उत्पादित बीज महंगे दामों पर बेचेगी और एक बड़ी साजिश के तहत किसानों के पास से देशी बीज लुप्त हो जायेंगे। बाद में फिर किसानों को अगर खेतीबाड़ी जारी रखनी होगी तो मज़बूरन इन कंपनियों से बीज वगैरह खरीदने को बाध्य होना पड़ेगा। यह किसानों को खेती की स्वतंत्रता को बाधित करके उन्हें विकल्पहीन बनाने का तरीका है। कुल मिलाकर खेतीबाड़ी को एक पुण्यकर्म से बदल कर अभिशाप में तब्दील करने के लिए सरकार ने कई प्रपंच रचे हैं। जिससे कोफ़्त खाकर लोग आत्मनिर्भर होने के बजाये पूँजीवादी निगमों की नौकरियों को अधिक तवज्जों देने को मज़बूर हो।

विकास के तमाम उद्यमों के वाबज़ूद, हमारा देश पिछले कुछ महीनों से कमरतोड़ महंगाई के तांडव को झेलता आ रहा है। दाल, चावल, खाद्य तेलों और सब्जियों जैसी ज़रूरी खाद्य वस्तुओं के आसमान छूती कीमतों के आगे सरकार हमेशा घुटने टेकती ही दिखी। पेट्रोल व डीज़ल के उत्पाद के बढ़ते दाम से ज़रूरत की अन्य चीज़ों की कीमत महंगे ढुलाई के कारण बढेगी ही और यों बढ़ रही कीमतों से पूरा जनजीवन त्राहिमाम कर रहा है। बेहतर जीवन स्थिति बनाना भर ही सरकार का काम है। असामान्य रूप से बढ़ती कीमतों के लिए एक तरफ अपनी लाचारी दिखाते हुए सरकार दूसरी ओर, यह डींग हाँकने से परहेज़ भी नहीं करते कि देश ने इतना विकास कर लिया है कि भारत की गिनती अब विश्व के अग्रनी देशों में हो रही है। अगर किसी देश की अधिकतर जनता को यह नहीं पता हो कि वह जी-तोड़ मेहनत के बाद वह जितना कमायेगा, उसमें उसका और उसके परिवार का पेट कैसे भर पायेगा, तो इससे ज्यादा अनिश्चितता क्या हो सकती है? बढ़ती महंगाई को एक सामान्य परिघटना के रूप में प्रस्तुत करना सर्वथा अनुचित है। देश की सरकार की नैतिक ज़िम्मेवारी है, कि देश की जनता को अपना जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए वह अनुकूल परिस्थिति बनाए रखे, जिसमें विकासवादी सरकारों को कोई मतलब नहीं दिखता। लोग सोचने को मज़बूर हो रहे हैं कि इस देश में विकास तो रहा है, जोकि बकौल सरकार होना ही चाहिए, लेकिन यह किस तरह और किनके लिए हो रहा है?

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संप्रति: पत्रकार और शोधार्थी
संपर्क-सूत्र: रामायण, बैद ले आउट, सिविल लाइन्स, वर्धा-442001,
दूरभाष: 09555053370

26 जुलाई 2010

संसदीय लोकतंत्र का नैतिक पतन

चन्द्रिका
बिहार विधान सभा में हुए हंगामा न तो पहला है न ही आखिरी बिहार के अलावा भी यदि अन्य राज्यों की एक सूची बनाई जाय तो लम्बी फेहरिस्त बनेंगी. अलबत्ता इस घटना के बाद ६७ सांसदों को निलम्बित कर दिया गया है. इस पूरी घटना को क्या इस रूप में लिया जाना चाहिये कि विपक्ष, नितीश सरकार के द्वारा की गयी ११,४१२ करोड़ की कथित अनियमितता को उजागर करना चाहता था जिसकी प्रतिरोध स्वरूप यह हंगामा किया गया या फिर यह संसदीय राजनीति का क्रमवार नैतिक पतन है. दरअसल यह एक नाटक है जो संसदीय राजनीति में खेला जाना जरूरी हो गया है और तब इसकी अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाती है जब चुनाव नजदीक हों. जिस सी.ए.जी. की रिपोर्ट को लेकर यह हंगामा हुआ वह जुलाई २००९ में ही सदन में प्रस्तुत की गयी थी तब से लेकर अब तक कोई खास विरोध विपक्ष के द्वारा नहीं किया गया. अब जबकि बिहार में चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो ऐसी स्थिति में यह नाटक खेला जाना राजनीतिक परिदृष्य में एक अहम भूमिका अदा करेगा और मीडिया के जरिये इन्हें प्रचार या कुप्रचार मिल सकेगा. यह ऐसा ही मसला है जैसे कुख्याति की भी एक ख्याति होती है और अब तक इसे देश की राजनीति में कई आपराधिक तत्व इस प्रवृत्ति को भुनाते रहे हैं. अपने आपराधिक कुख्यातपन को ख्याति में बदल कर भीड़तंत्र का समर्थन हासिल करने में वे कामयाब हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में मीडिया सर्वसुलभ होती है जिसके जरिये परिदृष्य से वर्षों से गायब एक नेता लोगों के सामने दृष्यमान हो उठता है, वह भी प्रतिरोध करता हुआ, अनियमितताओं के खिलाफ जूझता हुआ, कुमारी ज्योति की तरह जो शारीरिक अक्षमता के बावजूद गमले तोड़े जा रही थी.

कुछ वर्ष पूर्व ही जब बिहार विधान सभा में एक पत्रकार के प्रसाशनिक दमन के बाद पत्रकारों ने सदन से वहिस्कार का फैसला लिया था ऐसी स्थिति में सदन के सदस्यों द्वारा यह कहा गया था कि मीडिया की अनुपस्थिति में शोर सराबे का कोई मतलब नहीं है और उस दिन शोर सराबा स्थगित रहा, तो क्या यह मान लिया जाय कि सदन में किया जाने वाला शोर सराबा मीडिया के लिये किया जाता है ताकि नेताओं और विपक्षि दलों के दिखावटी विरोध लोगों तक मीडिया के जरिये पहुंच सके और लोगों को लगे कि उनके नेता मुद्दों के प्रति कितने जुझारू हैं. निश्चित तौर पर सदन के प्रतिरोध महज दिखावटी ही रह गये है क्योंकि सत्तारूढ़ और विपक्ष दोनों ही इस संरचना में एक पॉलिसी के तहत कार्य कर रहे हैं जहाँ विपक्ष के लिये प्रतिरोध एक अनुष्ठानिक कार्यक्रम बन जाता है.
विधायिका संसदीय राजनीति का एक अहम स्तम्भ है पर इसमे क्रमवार गिरावट देखी जा सकती है राज्य सभा के सभापति के रूप में जब डा. शंकर दयाल शर्मा को रोते हुए यह कहना पड़े कि “लोकतंत्र की हत्या न करें चाहें तो मेरी जान ले लें” इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि सदन के कार्यवाही की स्थितियां किस रूप में विद्रूप होती चली गयी हैं. जबकि वास्तविक स्थिति ये है कि सदन के कार्यवाहियों का जो हिस्सा मीडिया के जरिये प्रस्तुत किया जाता है वह सम्पादित किया हुआ रहता है. जिसमे सदन में हुए अशोभनीय आचरण को पहले ही निकाला जा चुका होता है. आखिर देश की जनता जिन नेताओं को चुनाव कर अपने प्रतिनिधि के तौर पर भेजती है उनके आचरण को ठीक उसी रूप में देखने का हक क्यों नहीं मिल पाता जिस रूप में वे सदन में आचरण करते हैं.

यही नहीं बल्कि सदन में कई बार प्रतिनिधियों के साथ वर्गीय व जातीय आधार पर भेदभाव के मसले भी खुलकर सामने आये और हंगामा भी हुआ पर उन्हें सदन की कार्यवाही से बाहर करार दिया गया है. चाहे वह झारखंड में आदिवासी विधायक करिया मुंडा के हड़िया पीकर सदन में आने का मसला हो या उत्तर प्रदेश में गाजीपुर के विधायक काशीनाथ यादव के बिरहा गाने का. झारखंड में आदिवासी विधायक करिया मुंडा के हड़िया पीकर आने पर सदन के कई सदस्यों द्वारा उनका उपहास किया गया था और मुंडा रोते हुए बोले थे कि जब कोई सदस्य व्हिस्की और रम पीकर आ सकता है तो वे हड़िया पीकर क्यों नहीं आ सकते, उन पर कोई आवाज क्यों नहीं उठाता. इसी तौर पर गाजीपुर के विधायक काशीनाथ यादव ने कुछ वर्ष पूर्व सदन में कहा कि वे अपनी बात बिरहा से शुरू करना चाहते हैं और सदन में हो हल्ला मचने लगा लालजी टंडन ने तो यहाँ तक कहा कि सदन में एक पतुरिया की कमी और रह जायेगी कहिये तो उसे भी पूरी कर दें ऐसी स्थिति में अध्यक्ष ने हस्तक्षेप करते हुए कहा था कि जब लोग सदन में दुष्यंत कुमार, निदा फाजली, गालिब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं तो बिरहा में बात क्यों नहीं रखी जा सकती जबकि यह एक लोक विधा है. ये ऐसी घटनायें हैं जो देश के उस सदन में घटित होती हैं जो समता, समानता के नारे की संरचना निर्मित करता है और अपनी कार्यप्रणाली में असमानता की संस्कृति को बनाये हुए है.

14 जुलाई 2010

मैं माओवादी नहीं हूं, मुझे फंसाया जा रहा है : लिंगाराम

छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से घोषित किये गये माओवादी मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी ने खुद को बेगुनाह बताया है। नम आंखों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कानफ्रेंस में लिंगाराम ने कहा कि वो बेगुनाह हैं और उनका कांग्रेस नेता अवधेश सिंह गौतम के घर पर हुए हमले से कोई लेना-देना नहीं है। लिंगाराम नोएडा के इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके मुताबिक मई के बाद से वो एनसीआर छोड़ कर कहीं नहीं गये।
एक दिन पहले छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लुरी ने दावा किया था कि छह जुलाई को कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले का मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी है। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि कोडोपी के रिश्ते अरुंधती रॉय, मेधा पाटकर, हिमांशु कुमार और नंदिनी सुंदर से है। कल्लुरी के उस दावे के बाद सोमवार को लिंगाराम कोडोपी की यह प्रेस कानफ्रेंस हुई। कोडोपी के साथ मानवाधिकार की आवाज़ बुलंद करने वाले जाने-माने वकील प्रशांत भूषण और सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश थे।
पत्रकारों से बात करते हुए लिंगाराम के आंसू निकल गये। उन्होंने बताया कि उनका माओवादियों से कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस बस उन्हें परेशान कर रही है। उनका उत्पीड़न कर रही है। पिछले साल सितंबर में पुलिस ने उन्हें उनके गांव से बिना बात उठा लिया और 40 दिन तक हिरासत में रखा। पुलिसवाले उन्हें जबरन स्पेशल पुलिस ऑफिसर बनाना चाहते थे। और उन्हें तब छोड़ा गया घरवालों ने बिलासपुर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लिंगाराम के वकील ने कहा कि उन्हें पूछताछ से इनकार नहीं है, लेकिन उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। लिंगाराम ने कहा कि वो माओवादी नहीं है और इस आरोप में पुलिस का उत्पीड़न झेलने की बजाय वो मर जाना पसंद करेंगे।
प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने कहा है कि वो पुलिस के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा करने का मन बना रही हैं। यह पुलिसिया रवैया बेहद अपमानजनक और ख़तरनाक है। इस बीच छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विश्वरंजन ने कहा है कि जांच खुफिया जानकारियों के आधार पर चल रही है और एक मुखबिर ने उन्हें जो सूचना दी, उसी के आधार पर एसएसपी कल्लुरी ने बयान दिया था। उन्होंने कहा कि लिंगाराम की गिरफ्तारी बिना पूछताछ के नहीं होगी। किसी सबूत के आधार पर नहीं होगी।


अरुंधती और मेधा के ख़िलाफ भूमिका बना रही है पुलिस
अगर यह खबर सही है तो छत्तीसगढ़ पुलिस एक बेहद खतरनाक साजिश रच रही है। यह साजिश है मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले लोगों की ईमानदारी और नीयत पर सवाल उठा कर उन्हें फंसाने की। इंडियन एक्सप्रेस की खबर और पीटीआई की तरफ से जारी रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। इस प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि छह जुलाई को बस्तर में कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले की साजिश रचने वाले शख्स का अरुंधती रॉय, मेधा पाटकर और गांधीवादी तरीके में यकीन रखने वाले एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार से रिश्ता है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पुलिस की तरफ से भेजे गये बिना हस्ताक्षर वाली प्रेस रिलीज में दावा किया गया है कि कांग्रेस नेता अवधेश गौतम के घर पर हमले की साजिश लिंगाराम को़डोपी में रची थी। को़डोपी दिल्ली और गुजरात में आतंकी गतिविधियों की ट्रेनिंग ले चुका है। माओवादी नेता चेरुकरी राजकुमार उर्फ आजाद के मारे जाने के बाद को़डोपी को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बना दिया गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने पुलिस के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में बहुत से लिंगाराम हैं और वो नहीं जानती की पुलिस किसकी बात कर रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस के आरोप फर्जी हैं और उनमें कोई दम नहीं है।
यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।
mohalla live se.

28 जून 2010

संरचना में एकल नायकत्व

चन्द्रिका
देश की सभी संसदीय पार्टियों के सामने आज नायकत्व का संकट है. मनमोहन सिंह को जब प्रधानमंत्री बनाया गया तो वे किसी भी रूप में जन लोकप्रिय नेता नहीं थे. लोगों ने देश की जिस पार्टी को अपना समर्थन दिया उसके पास एक ऐसे नेता का आभाव था जिसकी देश में लोकप्रिय छवि हो. हाल के दिनों में कांग्रेस का यह अंतर्विरोध और भी उभर कर सामने आया जब आदिवासी प्रतिरोध के विरोधी गतिविधियों और सैन्य कार्यवाहियों के चलते पी. चिदम्बरम की लोकप्रियता बढ़ने लगी. चाहे वह जिस भी रूप में रही हो. अब तक राजनीति में लोकप्रियता के आधार इसी तौर पर निर्मित होते रहे हैं जिसमे व्यक्ति का चेहरा और नाम लोगों की नजर और जुबान पर चढ़ जाय. राहुल गांधी के अनूठे कारनामे और सनसनी दौरे इसी स्थापना के लिये जारी हैं. लिहाजा कांग्रेस के भीतर एक नये तरीके का अंतर्विरोध बढ़ा. माओवादियों को लेकर दिग्विजय सिंह के जो बयान आये वह चिदम्बरम की रणनीति के खिलाफ थे, पर पॉलिसी के आधार पर कांग्रेस ही नहीं बल्कि देश की सभी पार्टियाँ माओवाद को लेकर एक जैसा ही रुख रखती हैं. इस बयान से कांग्रेस पार्टी लोगों और बुद्धिजीवी तबके में पनप रहे विमोह को एक लोकतांत्रिक और उदार चेहरे के रूप में दिग्विजय सिंह को प्रस्तुत कर कम करना चाहती थी. दरअसल देश में अब तक जो ढांचा निर्मित हुआ है उसमे किसी भी संगठन में व्यक्ति का नायकत्व और उच्चता क्यों उभारी जाती है जबकि इसके साथ ही कोई संरचना अपने में असमान हो जाती है. किसी भी ढांचे में पदों की श्रेष्ठता और निम्नता उसे असमान आधारों पर ला खड़ा करती है. यह असमानता महज देश की संसदीय पार्टियों में ही नहीं बल्कि गैर संसदीय पार्टियों और संगठनों में भी व्याप्त है, जो इस असमानता के खिलाफ लड़ रहे होते हैं.
कोई भी संरचना अपने लिये एक मूल्य का विकास करती है. व्यवस्था के एक ढांचे में रहते हुए वैचारिक तौर पर उससे बाहर की सोच तो पैदा हो जाती है पर व्यव्हारिक तौर पर उसे लागू करना कम सम्भव होता है, जब तक कि कोई नया ढांचा निर्मित न हो जाय. इस देश में जो संरचना विकसित हुई उसने समूह के बजाय व्यक्ति को उभारने का काम किया यानि सामूहिकता के विरोध में व्यक्ति केन्द्रीयता ज्यादा हावी रही, चाहे वह आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, खेल किसी भी क्षेत्र में देखा जा सकता है. व्यक्ति की ब्रांडिंग की जाती रही और उसे सेलीब्रिटी के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा. एक ऐसा मूल्य विकसित हुआ जहाँ लोगों ने समूह, संगठन को तरजीह देने के बजाय व्यक्ति आधारित ब्रांडिंग के लिहाज से समूह व संगठन को चुनने लगे. भाजपा में रहते हुए अटल बिहारी बाजपेयी के साथ लोगों का यही बर्तव था, एक बड़ा तबका एक व्यक्ति के प्रभाव से एक पार्टी को समर्थन करता था.
इस केन्द्रीयता का विकास अचानक नहीं हुआ बल्कि यह धीरे-धीरे समाज के सभी आयामों में विकसित हुई. फिल्मों में सांगठनिक प्रतिरोध के बजाय एक व्यक्ति का नायकत्व, पार्टियों में समूह के बजाय व्यक्ति का उभारा जाना या अन्य विभिन्न सांस्कृतिक विधाओं में एक विधा को श्रेष्ठता प्रदान करना. एक ऐसे निर्माण का दौर चला जहाँ केन्द्रीयता हावी होती गयी. लिहाजा देश में राष्ट्रीय स्तर की पार्टीयों के पास बड़ा जनाधार होने के बावजूद नेतृत्व की कमी उभर कर सामने आयी क्योंकि नायक के अवसान से आये खालीपन को भरने में या नया नायक निर्मित करने में समय लगता है.
इससे संरचना को सहूलियत इस आधार पर हुई कि उस एकल नायकत्व को डिगा पाने में आसानी हो गयी जो समूह में कम सम्भव थी. हर क्षेत्र में केन्द्रीकृत प्रणाली मजबूत होती गयी और एक ही उद्देश्‍य के लिये निर्मित किये गये समूह में स्तरीकरण व्यापक गैरबराबरी के साथ सामने आया. केन्द्रीयता की अवधारणा पर बने मॉडल की यह मजबूत होती प्रणाली थी जिसमे हमेशा एक छोटे वर्ग की ही कब्जेदारी होनी तय है. देश में विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रतिरोध करने वाले जो संगठन थे उनका टूटना भी आसान हो गया. वे इस स्वरूप से अलग कोई ढांचा विकसित नहीं कर पाये. मजदूर संगठन, किसान संगठन अनगिनत समस्याओं के बावजूद संगठित होने में नाकामयाब हुए क्योंकि कोई भी प्रतिरोध एक नायक की मंशा पर निर्भर करने लगा और सत्ता को उनकी खरीद फरोख्त में आसानी हो गयी. लिहाजा देश के परिदृष्य से बड़े और लम्बे संघर्ष गायब होते चले गये.
सत्ता संरचना से बाहर जो प्रतिरोध बचे वे या तो आदिवासियों के या फिर दलितों का एक तबका। जिसने यह मान लिया कि इस संरचना में उन्हें उपयुक्त स्थान मिलना सम्भव नहीं है. देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संगठित आदिवासीयों के प्रतिरोध जो वर्तमान संरचना में विद्रोह के तौर पर आ रहे हैं न चाहते हुए भी यह प्रवृत्ति कम-ओ-बेस उनमे भी दिखायी पड़ती है. यह एक सत्तासीन ढांचे का प्रभाव होता है जहाँ ढांचे के बाहर लोकतांत्रिक और अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करने वाले संगठन अपने स्वरूप में अलोकतांत्रिक हो जाते हैं और इसी स्वरूप में समाहित हो जाते हैं. संगठन और उद्देश्य से हटकर पदों की लोलूपतायें वहाँ भी प्रभावशाली हो जाती हैं वर्ग-संघर्ष करने वाले संगठनों में भी एक ऐसे वर्ग की श्रेष्ठता हावी हो जाती है जहाँ सबको समान अवसर नहीं मिल पाते.

22 जून 2010

''फ्लेम्‍स ऑफ दी स्‍नो'' को सेंसर बोर्ड का प्रमाणन नहीं मिलेगा



बोर्ड ने कहा, माओवाद का प्रचार करती है फिल्‍म
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड ने नेपाल पर बने वृत्तचित्र ''फ्लेम्स ऑफ दि स्नो'' को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र देने से इंकार कर दिया है। बोर्ड का मानना है कि 'यह फिल्म नेपाल के माओवादी आंदोलन की जानकारी देती है और उसकी विचारधारा को न्यायोचित ठहराती है।' बोर्ड की राय में हाल के दिनों में देश के कुछ हिस्सों में फैली माओवादी हिंसा को देखते हुए इस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती। 'ग्रिन्सो' और 'थर्ड वर्ल्ड मीडिया' के बैनर तले बनी 125 मिनट की इस फिल्म के निर्माता नेपाल मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा हैं और इसका निर्देशन किया है आशीष श्रीवास्तव ने। फिल्म की पटकथा भी आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखी है।
बोर्ड के इस फैसले पर हैरानी प्रकट करते हुए पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि इस फिल्म में भारत में चल रहे माओवादी आंदोलन का जिक्र तक नहीं है। इसमें बस निरंकुश राजतंत्र और राणाशाही के खिलाफ नेपाली जनता के संघर्ष को दिखाया गया है। 1770 ई. में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा नेपाल राज्य की स्थापना के साथ राजतंत्र की शुरुआत हुई जिसकी समाप्ति 2008 में गणराज्य की घोषणा के साथ हुई। इन 238 वर्षों के दौरान 105 वर्ष तक राणाशाही का भी दौर था जिसे नेपाल के इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। फिल्म में बताया गया है कि किस प्रकार 1876 में गोरखा जिले के एक युवक लखन थापा ने राणाशाही के अत्याचारों के खिलाफ किसानों को संगठित किया जिसे राणा शासकों ने मृत्युदंड दिया। लखन थापा को नेपाल के प्रथम शहीद के रूप में याद किया जाता है। निरंकुश तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ 'प्रजा परिषद' और 'नेपाली कांग्रेस' के नेतृत्व में चले आंदोलनों का जिक्र करते हुए फिल्म माओवादियों के नेतृत्व में 10 वर्षों तक चले सशस्त्र संघर्ष पर केंद्रित होती है और बताती है कि किस प्रकार इसने ग्रामीण क्षेत्रों में सामंतवाद की जड़ों पर प्रहार करते हुए शहरी क्षेत्रों में जन आंदोलन के जरिए जनता को जागृत किया।
फिल्म राजतंत्र की स्थापना से शुरू हो कर, संविधान सभा के चुनाव, चुनाव में माओवादियों के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित होने, राजतंत्र के अवसान और गणराज्य की घोषणा के साथ समाप्त होती है। सेंसर बोर्ड की आपत्ति को ध्यान में रखें तो ऐसा लगता है कि नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाने की यह अनुमति नहीं देगा। कारण यह कि आज माओवादियों की प्रमुख भूमिका को रेखांकित किए बिना नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाना संभव ही नहीं है। नेपाल में माओवादी पार्टी की मई 2009 तक सरकार थी और इस पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड प्रधनमंत्री की हैसियत से भारत सरकार के निमंत्रण पर भारत की यात्रा पर आए थे। नेपाल की मौजूदा संविधान सभा में माओवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और प्रमुख विपक्षी दल है।
श्री वर्मा अब अपनी इस फिल्म को बोर्ड की पुनरीक्षण समिति के सामने विचारार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।


21 जून 2010

किताबें नहीं, लड़ने की जिद

चन्द्रिका
(तहलका के साहित्य विशेषांक में छपे इस आलेख कों सम्पादक द्वारा इतना संपादित कर दिया गया कि इसका मर्म ही नहीं बचा लिहाजा इसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है. )
किताबें पढ़कर कोई क्रांति नहीं की गयी, पर क्रांतियों के घटित होने में किताबों की भूमिका अहम रही और किताबें क्रांति का दस्तावेज बनी. शब्द जब चलना शुरू किये होंगे, इंसान के ज़ेहन से निकलकर जुबानों तक और जुबानों से निकलकर कई जुबानों तक विस्तार पाते गये होंगे और न जाने कितने वर्षों तक इसी तरह भटकते रहे होंगे. इस प्रक्रिया में जाने कितने शब्द और वाक्य विलीन हो गये होंगे और अपने अस्तित्व को बचाते-बचाते दम तोड़ दिया होगा. दादियों के मुंह की कितनी कहानियां, गर्मी की छुट्टियों में नानियों के कितने किस्से उनके गुजरने के साथ-साथ गुजर गये होंगे. अलाव सेंकते बाबा के मुंह से पुरखों की सुनाई गयी शौर्य गाथायें असहाय और साहस विहीन होकर न जाने किस गाँव में बस गयी कि अब कोई आवाज ही नहीं सुनती. आज अपनी उम्र के साथ वे कितनी जर्जर और बेबस होंगी. हम नाकामयाब रहे उनमे से कितनों को बचाने में जबकि दुनिया की किताबों में उनकी जगह आज भी सूनी सी है कोई रसूल हमजातोव नहीं हुआ जो हिन्दी समाज के दागिस्तान को कह दे.
अलबत्ता कुछ प्रकाशन संस्थान ऐसे हुए जो अब तक के समय और घटनाओं के लेखन को प्रकाशित कर इतिहास के दृष्यों को रंगते रहे, धूमिल होती घटनाओं से धूल झाड़ते रहे. बीता हुआ वह सब, जो हमारे बीच मौजूद हैं या यूं कहें कि किताबों ने जिन्हें बचाये रखा है, हर अगली पीढ़ी उनसे रूबरू हो रही है. हिन्दी समाज के कई ऐसे प्रकाशन हैं जिन्होंने पुस्तकों का प्रकाशन व्यवसाय के लिये नहीं बल्कि बीते हुए समय को संरक्षित कर, दस्तावेजों, गुजरे समय की कथाओं, कविताओं, उपन्यासों, जीवनी, आत्मकथाओं, नाटकों को सजो कर रखा. इन्होंने किताबों को मनोरंजन के साधन के रूप में नहीं बल्कि जीवन जीने के नशे की एक जरूरी खुराक के रूप में पाठकों के बीच में प्रस्तुत किया. यह एक आंकड़ा विहीन तथ्य है कि ये पुस्तकें ऐसी पुस्तकें रही जिनसे कितनों ने दुविधा के क्षण में अपने जीवन को बचाया कि कितने सारे जीवन इन किताबों के रिणी हो गये.
समाज परिवर्तन और संघर्ष के कई तरीके और कई पहलू होते हैं लिहाजा सत्ता व संरचना दोनों के बदलाव के बावजूद जरूरी नहीं कि समाज के अंतर्विरोध खत्म हो जायें जोकि संरचना बदलने के साथ अपेक्षित थे, उनके बदलाव के लिये चेतना का विकास व मनोदशा की दिशा को ही बदलना पड़ेगा. यह बदलाव ज्ञान आधारित उपक्रमों से ही सम्भव है, एक आदमी के अपने भीतर का संघर्ष जाति, सम्प्रदाय, धर्म से लड़ने का, समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समझने का, लोकतंत्र के दायरे को बढ़ाने का, जिनसे सही मायने में पुस्तकें ही मुखातिब करवाती हैं. जब एक अन्यायपूर्ण समाज में खामोशी और चुप्पी जी रही होती है तो ये किताबें ही हैं जो बीज के रूप में इंसान में अन्याय के प्रति प्रतिकार को जिंदा रखती हैं और बदलाव के अंकुर वहीं कहीं से फूटते हैं.
संवाद प्रकाशन इसी अन्याय के प्रतिकार की एक अकेली कोशिश से शुरू की गयी मुहिम है. आलोक श्रीवास्तव एक पत्रकार, कवि, लेखक के साथ संवाद प्रकाशन के एक कर्मठ श्रमिक भी हैं. एक कवि, लेखक को श्रमिक कहते हुए शायद हम सब मे जो महसूसियत होती है वह समाज में कामों के बटवारे की श्रेणीबद्धत्ता को तोड़ती है, यह उस संरचना को भी तोड़ना है जिसमे एक लेखक या पत्रकार अपनी भूमिका के साथ अपना ओहदा तय कर लेता है और उस ओहदे की ऊंचाई भी. जिसे तोड़ते हुए आलोक श्रीवास्तव ने १९९६ में संवाद प्रकाशन की शुरूआत की. संवाद प्रकाशन के पास विचारों की पूजी थी यह आलोक श्रीवास्तव का जुझारुपन था जो २०० के आस-पास दुनिया के तमाम उत्कृष्ठ साहित्य को हिन्दी में अनुवाद के जरिये व हिन्दी की कुछ उकृष्ठ रचनाओं को मूल रूप में लाया जा सका. इन पुस्तकों को लाने के पीछे यह मकसद नहीं था कि जो ज्यादा बिकें उन्हें प्रकाशित किया जाय बल्कि इसके पीछे का मकसद हिन्दी में ऐसे विचारों का बौद्धिकवर्ग पैदा करना जो विचारों और सृजन की दुनिया से जुड़ना चाहता है. संवाद ने एक ऐसा पाठक वर्ग बनाया भी जो हर साल उसकी नयी प्रकाशित होने वाली किताबों का इंतजार करता है. अधिकांस किताबों को पेपर बैक में इसलिये छापा गया ताकि ये पाठकों के लिये सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करायी जा सकें. यह किसी संगठन के बजाय अकेले आंदोलन छेड़ने जैसा था, जिसकी ये मुहिम थी कि देश-दुनिया के श्रेष्ठतम पुस्तकों को लोगों तक पहुंचाया जाय और हिन्दी में वैचारिक व कलात्मक आकर्षण के साथ विभिन्न भाषाओं की किताबों का अनुवाद संवाद के जरिये प्रकाशित हुआ. दरअसल संवाद प्रकाशन के जरिये यह मुहिम किसी समाज के बदलाव के पहले व बदलने की प्रक्रिया में चेतना की ऐसी खुराक है जो वह जमीन तैयार करती है जिस पर परिवर्तनकामी शक्तियों को एक सही दिशा मिल सके. संवाद प्रकाशन के इस मुहिम में बदलाव का कोई उतावलापन जैसा नारा नहीं है. “किताबें जिनसे झांक रहा है एक सपना” ये स्वप्न दिखाती हैं एक मानवीय समाज का. ये एक पाठक को तब संवेदित करती हैं, जब समाज में घट रही हर घटना किसी कहानी से और घटनाओं में शामिल वे लोग किसी पात्र से टकरा जाते हैं और यह सब हमारे अंदर ही घटित होता है. कई ऐसे दार्शनिकों की जीवनी, जिनके दर्शन के साथ जीवन भी हमें जीने और घोर हतासा के बीच जीकर स्व का परित्याग कर दुनिया के जोखिम को उठाने का सबब देते हैं. इजाडोरा की प्रेमकथा, रूसो की आत्म कथा ऐसी किताबें हैं जो एक व्यक्ति के द्वारा अपने किये हुए को कुबूल करने का असीम साहस पैदा कराती हैं जहाँ जीवन संघर्ष की अप्रतिम ऊंचाई मिलती है. संवाद के जरिये विचार दर्शन, उपन्यास, इतिहास व विमर्ष की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित किया गया है जो निश्चित तौर पर हिन्दी समाज की वैचारिक उर्जा को संवेग प्रदान करने वाला है. यह चालीस करोड़ हिन्दी भाषी समाज को एक समृद्ध परम्परा के जरिये ऐसी वैज्ञानिक चेतना की मौलिकता प्रदान कर सकता है जो किसी भी संकीर्णता की सीमा को तोड़ते हुए मानव विकास के आंतर्राष्ट्रीयतावादी परिदृष्य को खोलता है.
फर्नांदो पेसेवा, विस्साव सिम्बोर्सका के साथ दुनिया के कई अन्य महत्वपूर्ण कविताओं का हिन्दी में आना आज के समय में हिन्दी कवियों को एक सीख देगा, जबकि वे घटनाओं की सपाट बयानी को कविता के रूप में रख रहे हैं. इंसान की उन छोटी-छोटी हरकतों को, उनकी मनोदशा को पेसेवा और सिम्बोर्सका की कवितायें एक बुककर की तरह बुनती हैं. इस रूप में संवाद एक प्रकाशन नहीं बल्कि अपनी स्वीकारोक्ति के साथ “एक अभियान, एक आंदोलन है” जो हिन्दी भाषा में बुद्धिजीवी वर्ग के तलास की सम्भावना में है, भविष्य में उन नये बुद्धिजीवियों से संवाद करना और उनको तैयार करना जिनसे नवजागरण की संस्कृति को मजबूत किया जा सके.
हिन्दी समाज में आंदोलनों के स्वर जब धीमे पड़ रहे थे खास तौर से २००० के बाद का समय, उस वक्त इलाहाबाद के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिनमें लाल बहादुर वर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ने इतिहास बोध प्रकाशन की शुरूआत की. कुछ मित्रों ने मिलकर महज़ बीस-तीस हजार रूपये लगाये. ये बाजार की सबसे सस्ती किताबें थी जिनके प्रथम संस्करण साल भर में ही खत्म हो जाते थे इससे इन पुस्तकों की उपयोगिता को समझा जा सकता है. इन पुस्तकों की जरूरत ने ही इन्हें सीमित नहीं रहने दिया और जब इसका दायरा बढ़ने लगा तो सम्न्वय में परेशानियां आने लगी फिर इसका भार साहित्य उपक्रम ने उठा लिया. इलाहाबाद सांस्कृतिक आंदोलन की एक विरासत के रूप में था ऐसे में इस प्रकाशन की शुरुआत निश्चित तौर पर एक छटपटाहट की उपज थी जो बौद्धिक स्तर पर एक जमीन तैयार कर सके या फिर उस जमीन को बचाये रखे जिसके लिये किन्हीं दिनों में इलाहाबाद को जाना जाता था. एक इतिहास का प्रख्यात लेखक लालबहादुर वर्मा अपने कंधे पर उन पुस्तकों को वर्षों ढोता रहा जिनसे उसे भविष्य के बेहतर इतिहास की सम्भावना दिख रही थी. यह लोगों को, बुद्धिजीवियों को संघर्षों के इतिहास का बोध कराने जैसा ही था. इसके तहत तकरीबन २५ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया गया जो देश-दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य में से हैं. ये किताबें जनता की जरूरत और जेब के मुताबिक थी, प्रकाशन ने इतिहास बोध नाम की पत्रिका का भी नियमित प्रकाशन किया जिसने दुनिया के इतिहास को नये रूप में हिन्दी समाज को परिचित कराया. इतने परिश्रम के बावजूद इतिहास बोध प्रकाशन कुछ ही वर्षों तक चल पाया और एक कड़ी के रूप में ४ वर्ष पूर्व साहित्य उपक्रम नाम से इसे चलाया जाने लगा जहाँ से कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन अभी भी जारी है.
जन चेतना, राहुल फाउंडेशन, परिकल्पना जैसे हिन्दी के महत्वपूर्ण प्रकाशन हैं जिन्होंने दो दशक पूर्व प्रगतिशील व जनपक्षधर साहित्य को लोगों तक पहुंचाने के लिये छोटी सी मुहिम से अपनी शुरुआत की. शुरुआत कुछ पुस्तिकाओं के साथ हुई एक समूह था जो आपस में पढ़ने लिखने का काम किया करता था, उसमे एक मित्र के पास कम्प्यूटर था और इसी से कम्पोजिंग की शुरुआत की गयी. परिकल्पना साहित्यिक किताबों के प्रकाशन और राहुल फाउंडेशन राजनैतिक किताबों के प्रकाशन के उद्देश्य से शुरू किये गये. इसके साथ जनचेतना इन पुस्तकों व अन्य समाज की जन पक्षधर साहित्य की पुस्तकों के वितरण का काम करने लगा. बाद में बच्चों के लिये अनुराग ट्रस्ट नाम से भी प्रकाशन की शुरूआत की गयी. धीरे-धीरे इसका विस्तार भी हो गया, एक टीम बनायी गयी जो यह तय करती है कि किन पुस्तकों का प्रकाशन जरूरी है इसके बाद समूह के सदस्यों में इसे टाइपिंग के लिये बांट दिया जाता है फिर आपस में अदल-बदल कर प्रूफ चेक कर लिये जाते हैं. आज के समय में सबसे ज्यादा जिन पुस्तकों को लोग पसंद कर रहे हैं वे भगत सिंह, राहुल सांकृत्यायन, प्रेमचंद, है पर युवा पीढ़ी में मार्क्सवाद की किताबों की मांग बढ़ी है वे चाहते हैं कि सरल रूप में मार्क्सवाद की पुस्तकें उन्हें उपलब्ध कराई जायें, साथ में राजनीतिक पुस्तकों की भी मांग बढ़ी है. बड़े पैमाने पर पहुंचाने की दरकार है पर अपनी सीमित क्षमता के कारण यह काम बहुत कम पूरा हो पा रहा है. हिन्दी समाज के लिये यह एक बहुत जरूरी काम था जो चल रहा है. यह एक वैचारिक परियोजना और सांस्कृतिक मुहिम थी जो झोलों और ठेलों से शुरु हुई थी. इस तरह की जनपक्षधर किताबें प्रकाशित करने व उन्हें लोगों तक पहुंचाने की एक सांगठनिक व सजग पहल शायद हिन्दी समाज में पहली बार हुई. किताबों के साथ जनता का सम्बन्ध इन प्रकाशकों के लिये कई रूप में था मसलन ये मानते थे कि बेहतर ज़िंदगी का रास्ता, बेहतर किताबों से होकर जाता है. किताबों को लेकर इन प्रकाशकों ने कई तरह के नारे दिये और लोगों में किताबों के प्रति रुचि पैदा करने के लिये किताबों के बारे में कवितायें लिखी. इनकी प्रतिबद्धता सपनों के हरकारे और विचारों के डाकिये के रूप में थी. इनके द्वारा प्रकाशित किताबों ने देश में द्वन्दात्मक भौतिकवाद और वैज्ञानिक चिंतन की एक समझ जरूर पैदा की. यह मुहिम इतनी सफल हुई कि इसने न सिर्फ हिन्दी समाज बल्कि पंजाब के सुदूर गाँवों में अपने विचारों को घर की आलमारियों तक पहुंचाया. अंग्रेजी, हिन्दी और पंजाबी में इन प्रकाशनों ने सैकड़ों किताबें प्रकाशित की. एक हिन्दी समाज के वामपंथी कार्यकर्ता के लिये उसकी वैचारिक उर्जा का आधार यही पुस्तकें बनी. प्रकाशन ने अभियान के रूप में दुनियाँ की तमाम बहसों को सरल भाषा में प्रकाशित किया गया. यह एक सुनियोजित मुहिम थी, लिहाजा इसने एक व्यक्ति के निर्माण में उसके बदलते उम्र के साथ वैचारिक खुराक की जरूरत का ख्याल रखते हुए कुछ ऐसी किताबों और बाल साहित्य का प्रकाशन किया जो समाज में वंचित तबके का सवाल बाल मन से उठा सके, नौजवानों के लिये सस्ते दर में भगत सिंह व पीटर क्रोपोटकिन की पुस्तकों का प्रकाशन हिन्दी समाज की जड़ता से मुक्ति के लिये व वैज्ञानिक चिंतन और द्वन्द पैदा करने का एक सपना था. देश के अन्य कई ऐसे प्रकाशन हैं जो किसी के कंधों पर किन्हीं झोलों में और साईकिलों से आज भी चल रहे हैं और दुनिया को बदलने की जिद को अपनी कोशिशों के साथ मजबूत कर रहे हैं.
आम लोगों के लिये
जरूरी हैं वे किताबें
जो उनकी जिंदगी की घुटन
और मुक्ति के स्वप्नों तक
पहुंचाती हैं विचार
जैसे कि बारूद की ढेरी तक
आग की चिंगारी.