21 अगस्त 2010

कश्मीर में जूते चलने के निहितार्थ

दैनिक भास्कर में प्रकाशित आलेख बिना काट-छांट के यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है -मॉडरेटर
दिलीप खान
हाल के वर्षों में जूता फेंकना राजकीय दमनात्मक कार्रवाई के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शित करने के एक नए वैश्विक तरीके के रूप में विकसित हुआ है. इराक में अमरीकी सैनिक आक्रमण और हस्तक्षेप से आहत आकर स्थानीय पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी द्वारा तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूते फेंके जाने को दुनिया भर के लोगों ने टेलीविज़न-सेट पर देखा. यही क़िस्सा भारत के गृहमंत्री पी. चिदंबरम के साथ दुहराया गया और एक बार फिर जूता फेंकने वाला पत्रकार था. अभी कुछ दिन पहले बरमिंघम में आसिफ़ अली ज़रदारी पर भी जूता फेंका गया और इससे पहले चीन में बेन जियाबाओ पर भी जूता उछाला गया. हालिया घटनाक्रम के तहत जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर 15 अगस्त के दिन किसी सस्पेंडड पुलिस अधिकारी ने जूता फेंका. प्रत्येक बार ऐसी घटना के बाद राज्य की तरफ़ से यह कोशिश की जाती है कि इसे लोकप्रिय जनभावना के तहत देखे जाने से टाला जाए. इसके लिए कुछ आसान तर्क भी जुटा लिए जाते हैं कि विरोध का यह छिछला तरीका है और सभ्य समाज में ऐसी हरकत वृहत्तर आबादी का सच नहीं हो सकता, या फिर ऐसी अलोकतांत्रिक और अमर्यादित हरक़त कुछ सनकी दिमाग़ों का सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए की गई कवायद है. लेकिन उमर अब्दुल्ला प्रकरण में फ़ारूख अब्दुल्ला की तत्काल टिप्पणी कि उनका बेटा जूते-वाले ’इलीट समूह’ का हिस्सा बन गया, का संदेश शायद यही है कि महान लोगों के विरोधी हर समाज में पैदा होते हैं और अगर महानता को हासिल करना है तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि विरोधी अनिवार्य तौर पर समाज के भीतर मौजूद हो. इस तरह प्रकारांतर से वे जॉर्ज बुश के इराकी नीतियों को भी सही ठहरा गए और यह बताने का भरसक प्रयत्न भी कर गए कि कश्मीर में सब ठीक-ठाक है.
लेकिन बहुत साफ़ है कि कश्मीर के मौजूदा राजनीतिक हालात में नेशनल कांफ्रेंस को लेकर घाटी के भीतर असंतोष भरा मत बन रहा है. युवाओं का एक बड़ा हिस्सा अलगाववादी दल हुर्रियत के पक्ष में सामने आ रहा है और बेहद निडरता से ’गो इंडिया, गो बैक’ अभियान को साधने की कोशिश कर रहा है. युवाओं का यह तबका बंद, कर्फ्यू, बारूद और पत्थर के साए में बड़ा हुआ है जिसमें उम्र के हिसाब से स्वाभाविक खिलंदड़ापन कम विकसित हुआ है. उन्हें सामान्य आज़ाद जीवन जीने का शीघ्र कोई विकल्प चाहिए. यह विकल्प अगर उमर अब्दुल्ला सरकार नहीं मुहैया करा रही है तो वे अलगाववादी धड़ों के साथ अपने को खड़ा कर लेते हैं. लगभग बीस साल बाद घाटी में इस तरह का दृश्य बन रहा है जब सरकार के विरोध में उग्र और अंतहीन दिखने वाले प्रदर्शन हो रहे है. ख़ास बात यह है कि हुर्रियत की दोनों धड़े यह ज़ोर देकर कह रही है कि युवाओं का यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन है जिसको वे केवल समर्थन दे रही हैं. पिछले एक साल में कश्मीर की राजनीति बेहद उठा-पटक भरे दौर से गुजरी है. शोंपिया में दो युवतियों की बलात्कार के बाद हत्या के मामले पर जांच समितियों की परस्पर-विरोधी रिपोर्ट और सरकार द्वारा उस मामले पर नाटकीय तरीके से लिए गए फैसलों से आंदोलन शुरू हुआ तो वह उमर अब्दुल्ला पर सैक्स स्कैंडल में फंसे होने के विवाद, इस्तीफ़ा से लेकर इस साल के जून में आंदोलनकारी युवकों की भीड़ पर पुलिस द्वारा फ़ेंके गए आंसू बम से एक नौजवान की मौत के बाद यह मौजूदा रूप में सामने आ रहा है.
पिछले एक महीने में इस प्रदर्शन में 58 लोगों की मौत हो चुकी है. सैंकड़ों घायल है. घायलों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल है. बीते सप्ताह सईद फ़ारूख बुखारी नामक एक उन्नीस वर्षीय छात्र का कथित तौर पर पुलिसिया टॉर्चर से मारे जाने के बाद हज़ारों लोग उसके अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए कर्फ्यू को तोड़ कर निकल आए. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने सईद की मौत के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए इस घटना की निंदा की. ऐसी प्रत्येक घटना के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लेकर असंतोष और भड़का है.
इस संवेदनशील घड़ी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब सर्वदलीय़ बैठक बुलाई और उसमें कश्मीर की स्वायत्तता को लेकर प्रस्ताव रखा गया तो कश्मीर के प्रधानमंत्री के तौर पर फ़ारूख अब्दुल्ला का नाम सामने आया. ऐसे में नई दिल्ली में स्वायत्तता की पहलकदमी होना कश्मीरियों के लिए मौज़ूदा आंदोलन के पक्ष में तो रहा लेकिन यह न तो तात्कालीन समस्या का समाधान है और न ही इस बात की कोई गारंटी है कि यह प्रस्ताव संसद में पारित हो ही जाएगा. मीरवाइज उमर फ़ारूख ने भारत सरकार को कश्मीर से सैन्य-बल वापस बुलाने, आफ़्सपा ख़त्म करने और कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच द्वि-पक्षीय मामला न मानते हुए इसमें कश्मीर को शामिल कर त्रि-पक्षीय तरीके से हल किए जाने की अपील करने के साथ-साथ स्थानीय कश्मीरियों की भावना को समझने के लिए ’कश्मीर की दीवारों पर लिखी इबारतो’ को पढ़ने को कहा है. स्थानीय कश्मीरी लोगों ने पिछ्ले चुनाव में सहभागिता के जिस स्तर को दिखाते हुए 60 फ़ीसदी से अधिक मतदान किया और उमर अब्दुल्ला की पार्टी को बहुमत के साथ विधानसभा में लाया उससे उनकी दैनंदिन की समस्याओं का खात्मा कहीं से भी होता नज़र नहीं आया. विरोध में फ़िर जूता फ़ेंकना आसान तरीका तो नज़र आता ही है.
लेखक स्वतंत्र पत्रकार है.
मो.-9561513701, ई-मेल dilipk.media@gmail.com

3 टिप्‍पणियां:

  1. badhiya tippani....

    or aapka nam behtarin hai..

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  2. काठमांडू का उदुंबर का बहुत पुराना है. वहा दो पक्षी बैठे है . एक कोकिल कवि केदारनाथ सिंह और दूसरे काक सम्पादक ओम थानवी . सुबह का समय है . अजित कौर के कार्यक्रम छककर भोजन कर आये है. कोकिल पूछता है अरे तू कौन है. मै हूँ काक. गोयनका के पाठशाला में हूँ समपादक हूँ. अरे काहे का पाठशाला और कहे का संपादक .तुम्हारी ओका क्या है जो तू वहा है.अब काक पूछता है . पर तू कौन है . मै हूँ कवि कविता करता /रखता हूँ . आवारा कही का . कविता मेरे साथ थी और करता तू है हां हां . क्या कह रहे हो . हां सच कह रहा हु . कल की रात कविता (अनामिका ) मेरे साथ थी . कवि का मुह लटक गया .काक रौ में था कह रहा था -मांसल कपाटो के दो पर्तो के बीच जो सुख का व्यूह है उसी में आह मै रात भा काराबध रहा . नहीं २ पर इसमे मेरा कोई दोष नहीं . कविता स्वयं चल कर आयी थी . रे नीच तू कह क्या रहा है. क्षमा करे कवि . भूल हो गयी . दरअसल कविता " स्तन-पकड़ाने-छुड़ाने की लय आदि स्त्री-भाषा" की पुरानी खिलाड़ी है. आपके पकहर हाथ शायद काफी नहीं थे . पर इसे नादानी समझ ले कविवर. नीच कही का मैं 'बाघ' कवि हु . पता नहीं है क्या . तुम्हारा नाश कर दूंगा . नहीं कवि . अब नहीं मै फिर कभी इधर नहीं आउंगा . 'अशोक' वन में 'गगन' की तरफ देखूंगा . वहा एक आचार्य जी भी है .वही ज्ञान मिलेगा.
    वही बगल में शिव का नंदी भी यह सब सुन रहा था . हँकरा 'पी बेटा भैंसे की तरह काम-जल को पी. कविता के मूत्रागार की उपासना कर'. काक-कवि ने पलटकर देखा . कौन है बे . देखा तो लालित्य का सांड था. लालिमायुक्त आँख देख दोनों दूम दबाके भागे.

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  3. अरे किस अनामिका की बात कर रहे हो? वही जो डेल्ही में पढ़ाती है . एक बार मै भी मिला हु उससे . इसी बाघ कवि केदार का ही तो कार्यक्रम था . कवि कोई साहित्य अकादमी का पुरस्कार झटका था तो दावत दी थी (वरना उसके घर तो तो चार एक तरह की ग्लास ही नहीं है ) वही पूरा स्त्री-शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है।पर एक उपन्यासकार ने इसे 'होर ' की संज्ञा दी . अब तो जो अनुभवी होगा वही जानेगा - मैं बपुरा बुडन डरा रहा किनारे बैठि '
    पूरा स्त्री-शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है।- अनामिका जी काशी में कई सांड है जो आपके घाव पर मलहम लगाने के लिए अस्सी पर काशी के नेत्रित्व में तैयार है केवल आवाज दें .

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