12 अगस्त 2010

दिल्ली की गर्मी मे वर्धा का गुनगुनापन

चन्द्रिका
दैनिक भास्कर में छपे संपादित आलेख का मूल।
"नया ज्ञानोदय" का अंक अब पुराना पड़ चुका है और बाजार से उसके वापसी की घोषणा भी हो चुकी है. तमाम विरोधों को बाद इसका बाजार से वापस लौटना, विभूति नारायण राय के दिल्ली से वर्धा लौटने जैसा ही है. बावजूद इसके विभूति नारायण राय की चाहत के अनुसार इस पर बहस जारी है पर यह बहस उनके कुलपति बने रहने या हटाये जाने तक पहुंच गयी है और हिन्दी का बौद्धिक तबका पहली बार इतने खुले और बृहद तौर पर अपनी पक्षधरता और असहमति के साथ सामने आ रहा है. ऐसे में शायद वर्धा की रोमांचक बारिस जो हिन्दी विश्वविद्यालय में राइटर इन रेजिडेंस बनाये जाने के बाद लेखक राजकिशोर को बेहद पसंद आयी थी और उनकी कलम से शब्द अनायास ही निकल पड़े थे (jansatta 9 julay) को थोड़ा विचलित भी कर रही होगी.
कथाकार राकेश मिश्रा जिन्होंने नया ज्ञानोदय के लिये यह साक्षात्कार लिया था उनके लिये यह सुकून और शायद गौरव की बात थी जो हिन्दी समाज को १० वर्षों बाद मिली थी कि हिन्दी साहित्य की इतनी बड़ी ख़बर देश में पहली बार बनी. विभूति नारायण राय के दिल्ली से लौटने के एक घंटे बाद उनके आवास पर विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नारे लगाते हुए पहुंचे वे पानी और बिजली की मांग कर रहे थे साथ में अधिकारियों और कुलपति को गाली दे रहे थे. दूसरे दिन एक छात्र अपनी गाली को इस आधार पर सही ठहरा रहा था कि कुलपति लिखित तौर पर महिला साहित्यकारों को गाली दे सकते हैं तो वह अपनी मूलभूत जरूरतों के लिये गाली या अपमानित करने वाले शब्द क्यों नहीं बोल सकता है. कपिल सिब्बल के कार्रवायी का आश्वासन टेलीविजन पर सुन कर एक छात्र खुशी से उछल पड़ा था. कुछ छात्र और अध्यापक कुलपति के बयान को उचित ठहराने में जुटे थे और अपने बयान ठीक उसी तौर पर बदल रहे थे जैसे कि विभूति नारायण राय, पहले श्ब्दों की व्याख्या, फिर कथाकार प्रेमचंद और काशीनाथ के संदर्भ की प्रस्तुति और बाद में माफी.
हिन्दी विश्वविद्यालय में दखल वेब पत्रिका द्वारा इस मसले पर अध्यापक, कर्मियों और छात्रों की एक संगोष्ठी आयोजित की गयी जिसमे कुलपति ने यह कहकर आने से मना कर दिया कि वे स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में आयेंगे और अपना पक्ष रखेंगे. इस संगोष्ठी के लिये जो सूचनायें लगायी गयी थी उन्हें अधिकारियों के निर्देश पर उखड़वा दिया गया और कार्यक्रम के पूर्व ही होमगार्ड की एक फौज लगा दी गयी बाद में एक वरिष्ठ अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद यह कार्यक्रम सम्पन्न हो सका. स्त्री अध्ययन विभाग ने जो संगोष्ठी रखी थी कुछ घंटे पूर्व कुलपति ने उसमे आने से मना कर दिया. विश्वविद्यालय में मीडिया पर बैन लगा दिया गया जिन पर इस मसले को लेकर बहस चल रही थी. हिन्दी विश्वविद्यालय में अक्सर संगोष्ठियां होती हैं और संगोष्ठीयों में यहाँ का अध्यापक वर्ग एक दूसरे को विद्वान और प्रकांड विद्वान जैसे श्ब्दों से नवाजता रहता है शायद यह विद्वान होने की तुष्टि है जो आपस में एक दूसरे से पा लेते हैं.
विभूतिनारायण राय ने अपने साक्षात्कार में जिस घटना का जिक्र किया है कि उन्होंने छात्राओं को छात्रों के छात्रावास में जाने से मना इसलिये कर दिया कि यहाँ का समाज इसके अनुकूल नहीं है उसका जवाब पंकजविष्ट अपने आलेख में दे चुके हैं पर इस सत्र के शुरुआत में ही एक नियम बनाया गया कि विश्वविद्यालय की छात्रायें शहर में यदि किसी लड़के के साथ रहती हैं तो उन्हें अपने घर से अनुमति पत्र लेकर विश्वविद्यालय को देना होगा. दरअसल ये महज घटनायें नहीं हैं बल्कि एक ऐसे विश्वविद्यालय जिसे हिन्दी देश का बड़ा हिन्दी समाज आशा भरी निगाह से देख रहा है या था उसमें पनप रही संस्कृति है जो शायद खाप पंचायती संस्कृति के ही अनुरूप है जब सर्वोच्च पद पर बैठे किसी व्यक्ति के द्वारा समाज के अनुरूप संस्कृति के निर्माण का तर्क दिया जाता है तो यह तयशुदा हो जाता है कि ऐसे संस्थान समाज को आगे ले जाने वाले कारक के रूप में नहीं बल्कि पीछे ढकेलने के तौर पर कार्य करेंगे.
निश्चित तौर पर पिछले दो वर्षों में विभूतिनारायण राय ने इस विश्वविद्यालय को भवन और ढांचा दिया है पर वहीं अध्यापकों की एक ऐसी मूढ़ फेहरिस्त भी खड़ी हो गयी है जिसके पास उसकी अपनी जुबान नहीं है, और न ही उसके पास व्यापक सोच का कोई दायरा. उसे चुप रहने और सबकुछ सहने का ही सलीका पता है. यह इसलिये भी है क्योंकि उसके पास इससे बेहतर विकल्प नहीं है. अपनी कार्यपद्धति में विभूति नारायण राय शायद हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर कभी रहे भी नहीं बल्कि अकेले उन्होंने विश्वविद्यालय के सभी पदों की जिम्मेदारी अपरोक्ष रूप से ले ली और एक केन्द्रीकृत संरचना स्थापित होती गयी. अकादमिक स्थितियाँ बेसक बदतर होती गयी और यहाँ पर शोध करने वाले कई छात्र जो कि जे.आर.एफ. थे ने हिन्दी विश्वविद्यालय छोड़ अन्य विश्वविद्यालयों में दाखिला ले लिया. जबकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश में शिक्षण संस्थानों की कमी महसूस कर रहा है ऐसे में हिन्दी विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में इस बार एक भी विद्यार्थी ने प्रवेश नही लिया.
लगभग दो वर्ष पूर्व जब विभूतिनारायण राय को हिन्दी विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया था तो उन्होंने अपने प्रथम सम्बोधन में इस बात को कहा था कि हम लोकतंत्र में असहमतियों को जगह देंगे अभी अपने साक्षात्कार के संदर्भ में भी वे यही बात अपने लिये कह रहे थे कि लोकतंत्र में उन्हें पाठक के तौर पर कुछ भी कहने की छूट मिलनी चाहिये. यह बात इटली के महान दार्शनिक वाल्तेयर से मिलती हुई लगती है पर कार्यपद्धति में शायद उनके लिये यह मुश्किल हो रहा है. उनकी ऐसी मंसा भी एक व्यक्ति के तौर पर हो सकती है पर किसी संस्कृति के निर्माण में वहाँ की जमीन को उसके अनुरूप तैयार किया जाना चाहिये. दिल्ली में भाषा, मानसिकता और पद की चर्चा गर्म है जबकि वर्धा में चुप रहने के बीज बो दिये गये हैं और मातहत इस तौर पर कि अपनी जीभ किसी और की जेब में भूल गये हैं या फिर वह जमी ही नहीं. यह एक संस्थान में लोकतंत्र का अवसान है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. काठमांडू का उदुंबर का बहुत पुराना है. वहा दो पक्षी बैठे है . एक कोकिल कवि केदारनाथ सिंह और दूसरे काक सम्पादक ओम थानवी . सुबह का समय है . अजित कौर के कार्यक्रम छककर भोजन कर आये है. कोकिल पूछता है अरे तू कौन है. मै हूँ काक. गोयनका के पाठशाला में हूँ समपादक हूँ. अरे काहे का पाठशाला और कहे का संपादक .तुम्हारी ओका क्या है जो तू वहा है.अब काक पूछता है . पर तू कौन है . मै हूँ कवि कविता करता /रखता हूँ . आवारा कही का . कविता मेरे साथ थी और करता तू है हां हां . क्या कह रहे हो . हां सच कह रहा हु . कल की रात कविता (अनामिका ) मेरे साथ थी . कवि का मुह लटक गया .काक रौ में था कह रहा था -मांसल कपाटो के दो पर्तो के बीच जो सुख का व्यूह है उसी में आह मै रात भा काराबध रहा . नहीं २ पर इसमे मेरा कोई दोष नहीं . कविता स्वयं चल कर आयी थी . रे नीच तू कह क्या रहा है. क्षमा करे कवि . भूल हो गयी . दरअसल कविता " स्तन-पकड़ाने-छुड़ाने की लय आदि स्त्री-भाषा" की पुरानी खिलाड़ी है. आपके पकहर हाथ शायद काफी नहीं थे . पर इसे नादानी समझ ले कविवर. नीच कही का मैं 'बाघ' कवि हु . पता नहीं है क्या . तुम्हारा नाश कर दूंगा . नहीं कवि . अब नहीं मै फिर कभी इधर नहीं आउंगा . 'अशोक' वन में 'गगन' की तरफ देखूंगा . वहा एक आचार्य जी भी है .वही ज्ञान मिलेगा.
    वही बगल में शिव का नंदी भी यह सब सुन रहा था . हँकरा 'पी बेटा भैंसे की तरह काम-जल को पी. कविता के मूत्रागार की उपासना कर'. काक-कवि ने पलटकर देखा . कौन है बे . देखा तो लालित्य का सांड था. लालिमायुक्त आँख देख दोनों दूम दबाके भागे.

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  2. अरे किस अनामिका की बात कर रहे हो? वही जो डेल्ही में पढ़ाती है . एक बार मै भी मिला हु उससे . इसी बाघ कवि केदार का ही तो कार्यक्रम था . कवि कोई साहित्य अकादमी का पुरस्कार झटका था तो दावत दी थी (वरना उसके घर तो तो चार एक तरह की ग्लास ही नहीं है ) वही पूरा स्त्री-शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है।पर एक उपन्यासकार ने इसे 'होर ' की संज्ञा दी . अब तो जो अनुभवी होगा वही जानेगा - मैं बपुरा बुडन डरा रहा किनारे बैठि '
    पूरा स्त्री-शरीर एक दुखता टमकता हुआ घाव है।- अनामिका जी काशी में कई सांड है जो आपके घाव पर मलहम लगाने के लिए अस्सी पर काशी के नेत्रित्व में तैयार है केवल आवाज दें .

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