30 जून 2009

आतंकित होकर आतंकवाद का ठप्पा

हम देशद्रोही हैं और अब आतंकवादी भी, ऎसा कुछ देशप्रेमियों का कहना है. लालगढ़ पर लिखे पिछले दो टिप्पणियों पर कई लोगों की प्रतिक्रियायें मेल व फोन पर आयी, जिनमे कुछ लोगों ने अभद्र शब्दों के साथ हमे यह सर्टिफिकेट दे डाला। इन देश प्रेमियों के देश प्रेम के बारे में हमे नहीं पता कि इनका देश प्रेम क्या है और देश का ये क्या मायने लगाते हैं, जिससे उन्हें प्रेम है और जिसके हम खिलाफ हैं। मसलन देश का अर्थ क्या देश की वह पुलिस है जो लालगढ़ के गाँवों बेलासोल, कुलदहा, कोरमा, अमचोर, महतोपुर, बिमटोला, जम्बोनी आदि में लूट रही है, वहाँ के बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं पर अत्याचार कर रही है या देश वह जमीन का टुकडा़ है जिसे जिंदल को दिया जा रहा है या देश वहाँ के राज्य सरकार की इच्छा है या देश चिदम्बरम मनमोहन के हाँथ का डंडा है या फिर देश वहाँ के वे आदिवासी लोग जिन्हें बेदख़ल किया जा रहा है. देश के इतने सारे खाँचों में हम उस देश के साथ हैं जो वहाँ के लोगों की इच्छा से निर्मित हो शायद एक लोकतांत्रिक देश के मायने यही होंगे. ऎसे में इनकी स्थितियों को लिखना यदि देशद्रोही होना है तो जनलोकतंत्र की व्यवस्था ही देशद्रोही हो जायेगी. इस आधार पर किसी को देशद्रोही या आतंकी साबित करना महज़ चिदम्बरम व मनमोहन सिंह की जुबान होना भर है. दरअसल मीडिया उद्योग ने हमारी मानसिकता का ऎसा निर्माण कर दिया है कि हम सरकारी सोच के हो गये हैं, मसलन सरकार की सभी क्रियायें हमारे लिये लोकतांत्रिक हो गयी हैं. सरकार जिसे आतंकवादी कहती है वह आतंकवादी है, और जिसे देशद्रोही, वह देशद्रोही. हम लोकतंत्र की अवधारणा में रखकर घटनाओं को देखना भी भूल चुके हैं. क्योंकि लोकतंत्र के चौथे खंभे का ढोल पीटती मीडिया सत्ता का चौथा खम्भा बन चुकी है जिस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है कारण कि देश दुनिया की घटनाओं पर हमारी राय मीडिया से ही निर्मित होती है और हम घटनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर न देख पाने में मजबूर हैं. पर हमें मीडिया को समझने के तरीके इज़ाद करने होंगे.
जय हो के नारे के साथ केन्द्र में आयी सरकार ने २२ जून को भारतीय राज्य में माओवादी संगठन को आतंकवादी घोषित कर उन पर प्रतिबंध लगा दिया और लालगढ़ में पुलिस ने कब्जा कर लिया. इस पुलिस कब्ज़ेदारी के साथ गाँवों की तलाशी जारी है. सुरक्षाबल अपने कैम्प जमाकर देश की सुरक्षा में तैनात हैं, यानि देश के एक छोटे से हिस्से की सुरक्षा. जहाँ के अधिकांश लोग असुरक्षित होकर गाँवों से भाग गये हैं पर सुरक्षा जारी है, जंगलों के उन पेडो़ की जो भाग नहीं सकते, जमीन की जो खिसक नहीं सकती, बाकी जितने लोग बचे हैं उनके लिये उतनी बंदूकें सरकार ने भेज दी हैं, पर वे या तो बूढे़ हैं या बच्चे इनके लिये लात, घूंसे और डंडे ही काफी हैं. अब ऎसे में लोकतंत्र की परिभाषा जिसे हम रटा करते हैं वह बदल चुकी है. जिसे हम सबको वर्तमान लोकतंत्र के लिये सुधार लेना चाहिये. यानि जनता पर, पुलिस द्वारा, बंदूकों का शासन लोकतंत्र है. यह महज़ पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है बल्कि कश्मीर, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड, आंध्र, छत्तीसगढ़......बाकी के नाम आप खुद याद करें. क्या देश में फासीवाद तभी आता है जब मुसोलिनी नाम का कोई व्यक्ति पैदा हो या फिर यह बुद्धदेव, मनमोहन, रमन, चिदम्बरम नाम के साथ भी आ सकता है. २२ जून को लालगढ़ की स्थिति जानने के लिये कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों की एक टीम जिसमें अभिनेत्री अपर्णा सेन, सोनाली मित्रा, कौशिक सेन, कवि जय गोस्वामी, बोलन गंगोपाद्याय गये. उन लोगों ने वहाँ की स्थितियों को देखा और वहाँ के लोगों से बातचीत की, लौटने के बाद सरकार द्वारा जारी प्रताड़ना की निंदा करते हुए इसे रोकने की मांग की तो उन पर केस लगा दिये गये. मेल्दा गाँव में संवाद प्रतिदिन पत्र के फोटोग्राफर ने पुलिस द्वारा पीटे जा रहे महिलाओं, बच्चों के फोटो लेने का प्रयास किया तो पुलिस द्वारा उन्हें पीटा गया. २७ जून को 'नेशनल फैक्ट फाइंडिंग' टीम जिसमे फिल्मकार के.एन.पंडित, पद्मा, दामोदर, टिंकू, एम. श्रीनिवास, राजकोशोर व सुसन्तो जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं व लेखकों को जाने से पहले मिदिनापुर पुलिस स्टेशन में गिरफ्तार कर लिया गया. यानि अब खबर वही मिलेगी जो पुलिस बतायेगी. बाकी सब पर प्रतिबंध, इसे हम क्या कहें? महाश्वेता देवी ने कहा है कि यदि ग्राम रक्षा समिति के मुखिया चक्रधर महतो को गिरफ्तार किया गया तो वे मुख्यमंत्री आवास के सामने घरना देंगी. निश्चित तौर पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लालगढ़ के आंदोलन में माओवादी पार्टी भी सम्मलित थी. जिसे माओवादी नेता ''विकास'' ने स्वीकार भी किया, पर वे किस भूमिका में काम कर रहे थे इसे हमे देखने की जरूरत है. जब आदिवासियों से जमीने छीनी जाने लगी, उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा और सालबोनी प्रोजेक्ट को एक नये आधुनिक राष्ट्र की संज्ञा दी जाने लगी. यानि लालगढ़ में एक ऎसा वाशिंगटन उन आदिवासियों की जमीन पर बन रहा था (ये सारी संज्ञायें मीडिया व नेताओं की हैं ) जिन्हें दो जून की रोटी तक नहीं मिलती. ऎसे में देश की एक मात्र पार्टी चाहे उसे आतंकवादी कहा जायें या कुछ और ने वहाँ के लोगों को संगठित करने का कार्य किया. आधुनिक विकास के ढांचे को नकारते हुए लोगों की मूलभूत जरूरतों को मुखरित किया और उन्हें सम्बल पहुचाया. क्या यह उनका देशद्रोह था? माओवादी पार्टी को लेकर तमाम तरह के भ्रामक प्रचार किये गये मसलन विकास विरोधी होना. वे निजीकरण से चल रहे विकास के खिलाफ़ जरूर हैं पर शिक्षा, स्वास्थ, जैसी सुविधाओं के खिलाफ़ नहीं. भले ही शिक्षा प्रणालियां व नीतियाँ अपने आप में समाज विरोधी हों. ऎसा माओवादी नेताओं से रूचिर गर्ग की हुई बातचीत से पता चलता है. माओवादीयों ने आदिवासियों की मूलभूत जरूरतों को लेकर लड़ने में उन्हें सम्बल दिया है व शिक्षा, स्वास्थ को लेकर अपने आधार इलाकों में जमीनी स्तर से विकास का एक ढांचा भी निर्मित किया है. जिससे उनकी पैठ वाकई सागर में मछली की तरह है. ऎसी स्थितियों में महेन्द्र कर्मा के बयान को सभी राज्य अमल करने पर तुले हैं कि वे सागर को ही सोख जायेंगे. ज़ाहिर है सागर को सोखने के बाद मछलियाँ वहाँ नहीं रह सकती तो क्या हम एक ऎसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में जुटे हैं जहाँ आदिवासियों की प्रजाति को खत्म कर दिया जाय. माओवादियों ने अपने कई वक्तव्यों में इस बात को दोहराया है कि आइ.एस.आई., सिमी, जैसे संगठनों के साथ उनके रिश्ते नहीं हैं और वैचारिक आधार पर होना सम्भव भी नहीं है व सरकार का भी कोई बयान इस बात को लेकर नहीं आया है. इसके बावजूद मीडिया समय-समय पर यह प्रोपोगेंडा चलाती रहती है तो क्या सरकार को मीडिया संस्थानों में रा की जिम्मेदारी दे देनी चाहिये? क्योंकि सरकारी इंटेलीजेंस इसे साबित करने में विफल रहा है. दूसरी बात यह कि सरकार की तरफ से माओवाद को एक आर्थिक, सामाजिक समस्या के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है पर आज जब इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है तो इसके क्या मायने लगाये जाने चाहिये? कि आतंकवाद सामाजिक, आर्थिक कारणों की उपज है. फिर देश में उपजे सामाजिक आर्थिक कारणों के आंदोलन यदि आतंकवादी हैं तो असहमति के लिये वह कौन सी जगह है जहाँ हम आप बोल सकते हैं? अब हमें छोड़ना होगामरने के बाद मौन की परम्पराबटोरनी होगी मरने वाले की आख़िरी चीख़इतने सारे लोगों के रोज़ मरने का मौनहमारी उम्र भर की चुप्पी के लिये काफ़ी हैअपने मरने के पहले की आवाज़हमें अभी से ही निकालनी होगी॥ चन्द्रिका

22 जून 2009

लालगढ़: एक छोटे लोकतंत्र का बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा


वे शांति स्थापना के लिये निकले हैं ज़ाहिर है कब्रिस्तान में शोर नहीं होता....
लालगढ़ को अशांत घोषित कर दिया गया है. इस अशांति के मायने क्या हैं? क्या यह कि तकरीबन १८७ गाँवों में संथाली आदिवासी लोगों ने अपनी कमेटियाँ बना ली हैं, वे अपने सुख-दुख का आपस में निपटारा करने का प्रयास कर रहे हैं, गाँव की किसी समस्या का समाधान गाँव में ही कर लेना चाहते हैं. यानि गाँव के लोगों का गाँव के लोगों पर शासन, एक छोटा सा लोकतंत्र आदिवासी समाज का लोकतंत्र. क्योंकि बडा़ लोकतंत्र बडों का हो चुका है इसलिये उन पर नज़र ही नहीं जाती. बडे़ लोकतंत्र का ढांचा बडा़ है, पुलिस है, फौज़ है, कानून की एक मोटी सी किताब भी है जिसमे पूरी अरब भर जनता को नियंत्रित करने के फार्मूले हैं पर फार्मूले वही लगा सकते हैं जो पढे़ लिखे हों. संथाली आदिवासी की स्थिति तो ये है कि रात के थोडे़ से अंधेरे को अपने भूख के साथ सान कर खा जाता है और सो जाता है. ऎसे में एक छोटा लोकतंत्र बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा बन जाता है. क्या मैं इस बडे़ लोकतंत्र को लोकतंत्र कहूँ? दरअसल वहाँ अशांति यही है कि वहाँ पुलिस और सेना नहीं है. और बिना पुलिस और सेना के कहीं शांति कैसे रह सकती है? क्या आप कल्पना करना चाहेंगे उस स्थान की जहाँ पुलिस हो और लोग अपनी समस्यायें खुद हल कर लेते हों. यानि पुलिस के होने का अर्थ है उन सारी चीजों का होना जो पुलिस के होने के साथ मौजूद होती हैं. लालगढ़ में आज की स्थिति पर कुछ भी कहने से पहले हमे उसकी ऎतिहासिकता में उसे देखना होगा, नवम्बर से अब तक दो बातें स्पष्ट रूप से उभर कर आयेंगी एक तो यह कि आदिवासी अपने जंगल की जमीन को किसी भी स्टील प्लांट के लिये देना नहीं चाहते वे नहीं चाहते कि अपनी जमीनों पर बुलोडोजर चलता हुआ वे देखें, पर सरकार ५००० एकड़, सज्जन जिंदल को देने पर तुली है. दूसरी यह कि वे सेना और पुलिस की सुरक्षा भी नहीं चाहते क्योंकि सुरक्षा के मायने अब वे जान चुके हैं और सुरक्षा से उन्हें खतरा है जिसके बाबत उन्होंने सड़कें काट डाली, आने-जाने के रास्ते बंद कर दिये. कई बार अपनी मांगों के साथ धरने पर बैठे जो कुल छोटी-बडी़ मिलाकर १३ मांगे थी, आस-पास के गाँवों को एकता बद्ध कर रैली निकाली. रैली पर गोली चलायी गयी और युवाओं को मार दिया गया जो सभा की या एकता की अगुवाई कर रहे थे. मानों गोलियों से तीन मांगे पूरी की गयी हों. उनकी जायज़ मांगों को देखते हुए सी.पी.एम. के कई कार्यकर्ता उनके साथ जुड़ गये. यह सब कुछ ऎसा चल रहा था मानों राज्य में एक नया राज्य कायम हो गया हो. फरवरी में आदिवासी--गैरआदिवासी एकता समिति बनायी गयी. इसके बनाये जाने के क्या मायने लगाये जायें? कि अब तक आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच कोई एकता ही नहीं थी. शायद हां, शायद नहीं. यह एक शांति अभियान था ठीक वैसा ही जैसा सलवा-जुडुम. आदिवासी युवकों को जान से मारा जाने लगा और आदिवासियों द्वारा इन्हें भी इन्हीं के छीने हथियार से. यानि यह अपने स्वरूप में एक दूसरे को मारने की एकता की समिति बनी. मुर्दों की एकता, मरने के बाद चुप रहने की एकता, प्रतिरोध में खून की एकता. आदिवासियों के भूख और वंचना से उठे आक्रोश की एकता को तोड़ने के लिये उनके साथ हमेशा इसी तरह की एकता बनायी गयी.
लालगढ़ अब अशांत हो चुका था उसे शांत करने की जरूरत थी जिसका अर्थ था पुलिस और फौज को दुबारा तैनात किया जाना. क्योंकि हमारे देश में अशांत को शांत करने का एक मात्र यही तरीका है. यहाँ तक की भूख की आग भी पुलिस की तैनाती से शांत होती है. बूट की आवाज़ों से लोगों के कान सहम जायें और आवाज़ें चुप हो जायें. देश के २८ राज्यों में से २४ राज्य ऎसे ही हैं. लालगढ़ में फौज बुलायी गयी अर्ध सैनिक बल आये, पर घुसने में नाकामयाब रहे लोगों ने प्रतिरोध किया उन पर आंसू गैस छोडी़ गयी. लाठियां बरसायी गयी. पुलिस अंदर पहुंच कर घरों की तलाशी की, औरतों को नंगा करके उनकी तलाशी ली जा रही है. पर वह नहीं मिल रहा है जिसे पुलिस ढूढ़ रही है और जो मिल रहा है उसे देख भी नहीं रही. यह है उनकी भूख जो उनके नंगे होने के बाद भी उनके बदन पर चिपकी रह जाती है. अपनी ज़मीन के छीने जाने के प्रतिरोध का हल है अस्मत का लूटा जाना या मौत के घाट उतार दिये जाना. एक तथाकथित अति सभ्य समाज अपने निर्माण के लिये एक पिछ्डे़ कहे जाने वाले समाज के साथ यह सलूक उस समय होता देख रहा है जब दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र का चुनाव हुए दो माह भी नहीं बीते हैं. २० जून को लालगढ़ में पुलिस कब्जा जमाने के सिलसिले में और आदिवासियों को मारा गया, यह ठीक उस समय हुआ होगा जब आप चाय पी रहे होंगे, किसी दफ्तर की .सी. में बैठे रहे होंगे या जहाँ भी रह कर खबर सुनी हो. क्या थोडी़ सी भी कम्पन शरीर में नहीं हुई. शायद सभ्य समाज का निर्माण यही है संवेदनाओं का मर जाना.
ठीक उसी दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य जी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिलकर यह बताया कि लालगढ़ के लोगों को ममता बनर्जी उनकी पार्टी का सहयोग मिल रहा है जिसमे माओवादी भी शामिल हैं,यह पहली बार नहीं कहा गया था बल्कि नंदीग्राम से सिंगूर तक कई बार कहा गया पर आश्चर्य कि इसी सहयोग करने के या सम्बन्ध होने के आधार पर बिनायक सेन को जेल होती है और तब तक कैद रखे जाते हैं जब तक वे कुछ नहीं करने लायक बचते यानि हृदय रोग की अवस्था में उन्हें छोडा़ जाता है पर ममता बनर्जी को बुद्धदेव जी जेल नहीं भेज सकते क्योंकि ममता बनर्जी बडे़ लोकतंत्र की बडी़ स्तम्भ हैं.
उनके हाथ में बंदूक है, तो यह उनकी वीरता है.
लोगों के हाथ में बंदूक है तो यह उनका जुर्म क्यों?

21 जून 2009

लालगढ़ आरपेशन या आदिवासी आपरेशन

लालगढ़ में संघर्ष चल रहा है बचे रहने का और उजाड़ दिये जाने का. पर लाल गढ़ के संथाली आदिवासियों का उजड़ना महज़ देश के सबसे बडे़ आदिवासी समाज के एक हिस्से का उजड़ना भर नहीं है.बल्कि यह संथाली समाज का अपने उस प्राचीन भूमि से उजाडा़ जाना है जहाँ वह पहली बार आकर बसा था और यहीं से पूरे देश में फैला था. देश में आज भी सबसे बडी़ संख्या संथाली आदिवासियों की है. तथाकथित सभ्य समाज के निर्माण व सालबोनी सेज परियोजना के निर्माण की प्रक्रिया में जुटे लोग जब आज इन्हें इनकी जमीन से विस्थापित करने पर आतुर हैं तो उसके खिलाफ इन आदिवासी महिला पुरूषों का लामबंद होकर विद्रोह करना लाज़मी है.
अपने जंगल और जमीन को छीने जाने के खिलाफ आदिवासियों का यह पहला विद्रोह नहीं है. इसके पहले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा मुंडा , तेभागा, तेलंगाना आदिवासी विद्रोह की एक लंबी सूची है पर ये विद्रोह आदिवासियों द्वारा राज्य सत्ता हथियाने को लेकर कभी नहीं किये गये बल्कि इनका स्वरूप अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने को लेकर ही रहा. पूरे देश में जंगल का एक लम्बा क्षेत्र है जहाँ आदिवासी समाज बिना किसी स्वास्थ, शिक्षा, बिजली के जी या मर रहा है. बारिस के दिनों में बाढ़ व मलेरिया से कितने आदिवासी मर जाते हैं
हर साल लोग भुखमरी का शिकार होते हैं. ऎसे में वह अपने जरूरत की पूर्ति जंगल से ही बिना नुकसान पहुंचाये करता है. इनके सीधेपन का फायदा उठाकर इन्हे खरीदा बेंचा जाता है पर विकास की इस अंधी दौड़ में सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं है बल्कि जंगल इनके लिये उपनिवेश बन चुके हैं जहाँ किसी भी तरह का फरमान जारी करके आदिवासियों को उसे मानने के लिये बाध्य किया जाता है. तथाकथित सभ्य समाज की जरूरतें बढ़ रही हैं और वह जंगलों पर कब्जेदारी कर इन्हें बेदख़ल करना चाहता है. लालगढ़ का सालबोनी प्रोजेक्ट इसी का एक हिस्सा है. जिसमें जंगल की ५००० एकड़ जमीन को लिया जा रहा है जबकि वन प्राधिकरण नियम के तहत भी यह गैर कानूनी है . ५०० एकड़ जमीन जिंदल स्टील कम्पनी के मालिक द्वारा वहाँ के लोगों से औने-पौने दाम पर खरीदी जा चुकी है पर लोगों को इसकी आधी ही कीमत चुकायी जा रही है और आधी कीमत कम्पनी शेयर के रूप में देने की बात कहकर टाल दी गयी है. जबकि ४५०० एकड़ जमीन जिसे सरकार लेने पर तुली है लोग छोड़ना नहीं चाहते जिसको लेकर वहाँ के आदिवासी एक जुट हो गये हैं .अपने जंगल और जमीन को लेकर हुई एक जुटता व प्रतिरोध को ही माओवाद के रूप में या किसी आतंक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. क्योंकि सरकार की दमन नीति व सेना के सशस्त्र कार्यवाहियों से लड़ने के लिये वहाँ के आदिवासी भी हथियार उठा चुके हैं.
दरअसल सरकार द्वारा जंगल के संसाधनों को पूंजीपतियों के हाँथों में सौंपे जाने पर हो रहे किसी भी प्रतिरोध के दमन का यह नायाब तरीका पिछले कई वर्षों से अपनाया जा रहा है कि वह जल, जंगल, जमीन से जुडे़ आदिवासी प्रतिरोध में माओवादियों का हाथ बताकर आदिवासियों या नागरिकों की हत्यायें व प्रताड़ना का लाइसेंस प्राप्त कर लेती है. ऎसी स्थिति में जंगल का एक बडा़ आदिवासी समाज माओवादी बनाया जा रहा है ताकि सरकार जंगल अधिग्रहण के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध का दमन माओवाद के नाम पर आसानी से कर सके. 22 नवम्बर2008को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने २४ परगना में भाषण देते हुए लालगढ़ में माओवादियों के होने की बात इसीलिये ही कही थी ताकि वे केन्द्र से ज्यादा अर्धसैनिक बल व विशेष रकम मांग सकें.
आज जब इस बात का शोर मचाया जा रहा है कि लालगढ़ में माओवादियों का कब्जा हो चुका है तो लालगढ़ में लोगों द्वारा शस्त्र उठाने की पूरी प्रक्रिया पर हमे गौर करना होगा. आदिवासी जंगल की जमीन दिये जाने के खिलाफ थे इसके बावजूद रामविलास पासवान और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 2 नवम्बर 2008 को सालबोनी स्टील प्लांट का उद्घाटन किया जिसके पश्चात इनके काफिले पर हमला हुआ. इस हमले के फलस्वरूप लालगढ़ के आस-पास के तकरीबन ३५ गाँवों में पुलिस द्वारा लोगों को प्रताडि़त किया गया, उन्हें मारा पीटा गया व महिलाओं की आँख तक फोड़ दी गयी,परियोजना के खिलाफ गाँवों को एक जुट करने वाले युवाओं की हत्या तक कर दी गयी और यह सब माओवादियों का ठप्पा लगाकर किया गया. यदि अपने जमीन और जंगल को बचाने के लिये प्रतिरोध करना माओवाद है तो इतिहास का हर आदिवासी विद्रोह ऐसे ही अपने अस्तित्व की सुरक्षा के साथ हुआ है . जिन बिरसा मुंडा और दूसरे लड़ाकों को वर्तमान सरकार नायक के रूप में स्थापित करती है पर फर्क इतना जरूर है कि वह अंग्रेजी व सामंती सत्ता के खिलाफ था और यह वर्तमान लोकतांत्रिक कही जाने वाली व्यवस्था के खिलाफ है .
इतने दमन के बावजूद आदिवासियों ने जो मांग रखी वे बहुत ही सामान्य थी. उनका कहना था कि पुलिस दमन को खत्म किया जाये, लोगों पर जो आरोप लगाये गये हैं वे वापस लिये जायें, जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उन्हे रिहा किया जाय. साथ में उन स्कूल, हास्पिटल व पंचायतों को मुक्त किया जाए जिनमे अर्ध सैनिक बलों ने डेरा डाला हुआ है जो कि कलकत्ता हाई कोर्ट का भी आदेश था. जनदबावो के तहत सरकार ने यह बात मंजूर भी कर ली पर यह लोगों के लिये एक छलावा साबित हुआ. सरकार महज़ उनकी लामबंदी को कम करना चाहती थी. अंततः लोगों ने ७ जनवरी 2009 को सरकार के सामाजिक बहिष्कार यानि क्षेत्र में सरकार की किसी भी संस्था के प्रवेश को वर्जित करने का फैसला लिया, लोगों ने किसी भी तरह के कर व मालगुजारी देने से भी मना कर दिया है. यह सरकार के लिये एक भयावहस्थिति थी जिससे निपटने के लिये सरकार ने छ्त्तीसगढ़ में चल रहे सलवा-जुडुम के तर्ज पर जन प्रतिरोध कमेटी व आदिवासी ओ गैर आदिवासी एकता कमेटी का निर्माण किया गया जिसमें सी.पी.एम. व झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के लोगों को शामिल किया गया है. ये सैकडो़ की संख्या में जाकर गाँवों को लूटते है व लोगों को मारते पीटते हैं .कारणवश लोगों का आक्रोश और भी उभर कर सामने आया है.यद्यपि सी.पी.एम. सरकार इस समस्या का राजनीतिक हल निकालने की बात कहती रही है पर राजनीतिक हल के तौर पर उसने सिर्फ दमन ही किया है ताकि वह लालगढ़ को भेद सके.
लालगढ़ में जारी असंतोष संथाली समाज के वंचना की पीडा़ है जिसमे विकास के नाम पर हर बार उनका उजाडा़ जाना, उनकी जमीनों को पूजीपतियों के हाथ में बेचा जाना, जिसके बाद नदियों का नालों में बदल जाना तय है. क्योंकि जिस स्टील प्लांट को जिंदल यहाँ स्थापित करना चाहते हैं वह एक बडी़ परियोजना है जिसके शुरूआती दौर में ही ३५,००० करोड़ रूपये लगाये जा रहे हैं व २०२० तक एक करॊड़ मैट्रीक टन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है जिससे आस-पास के तीन जिले व सुवर्ण रेखा नदी जो वहाँ के लोगों की जीवन रेखा भी है का प्रदूषित होना तय है. अतः यहाँके लोगों के पास सिवाय विरोध के कोई रास्ता नहीं बचता क्योकि सरकार इनकी उन मांगों को भी लागू नहीं कर पा रही है जो मूलभूत अधिकारों के तहत मिलनी चाहिये जिसमे रोजगार, संथाली भाषा और संस्कृति को बढा़वा दिया जाना, व बेहतर स्वास्थ, शिक्षा, व कृषि की सुविधा जैसी १३ मांगे शामिल हैं . पर इनकी मांगे लाठियों से पूरी की जा रही हैं. ऎसे में एक बडे़ क्षेत्र में विस्तृत संथाली आदिवासियों का एक जुट होकर प्रतिरोध करना दमित की एकता है.

29 मई 2009

मुंबई के झोपड़ पट्टी से एक कहानी

शिरीष खरे, मुंबई से
23 जनवरी 2009 की रात दुनिया के लिये भले एक सामान्य रात रही होगी लेकिन शांतिनगर, मानपूर खूर्द की नूरजहां शेख के लिए नहीं. आखिर इसी रात तो उनके सपनों का कत्ल हुआ था. अपनी सूनी आंखों से खाली जगह को घुरती हुई नूरजहां अभी जहां बैठी हैं, वहां 23 जनवरी से पहले तक 18 गुणा 24 फीट की झोपड़ी थी, जिसमें एक परदा लगा कर कुल दो परिवारों के तेरह लोग रहते थे.
लेकिन एक लोकतांत्रिक देश की याद दिलाने वाले गणतंत्र दिवस के ठीक 3 दिन पहले ही सारे नियम कायदे ताक पर रख कर नूरजहां शेख की बरसों की जमा पूंजी माटी में मिला दी गयी. 26 जनवरी के 3 रोज पहले सरकारी बुलडोजर ने उनकी गृहस्थी को कुचल डाला. अपनी जीवन भर की कमाई को झटके में गंवाने वाली नूरजहां अकेली नहीं थीं. उस रात मानपुर खुर्द की करीब 1800 झुग्गियां उजड़ीं और 5000 लोगों की जमा-पूंजी माटी में मिल गई.अंबेडकरनगर, भीमनगर, बंजारवाड़ा, इंदिरानगर और शांतिनगर अब केवल नाम भर हैं, जहां कल तक जिंदगी सांस लेती थी. अब इन इलाकों में केवल अपने-अपने घरों की यादें भर शेष हैं, जिनके सहारे जाने कितने सपने देखे गये थे. आज हज़ारों की संख्या में लोग खुले आकाश के नीचे अपनी रात गुजार रहे हैं. यह बच्चों की परीक्षाओं के दिन हैं लेकिन शासन ने पानी के पाइप और बिजली के खम्बों तक को उखाड़ डाला. इस तरह आने वाले कल के कई सपनों की बत्तियां अभी से बुझा दी गईं. ताक पर कानूनप्रदेश का कानून कहता है कि 1995 से पहले की झुग्गियां नहीं तोड़ी जाए. अनपढ़ नूरजहां शेख के हाथों में अंग्रेजी का लिखा सरकारी सबूत था. उसे पढ़े-लिखे बाबूओं पर पूरा भरोसा भी था. लेकिन शासन ने बिना बताए ही उसके जैसी हजारों झुग्गियां गिरा दी. नूरजहां की पूरी जिदंगी मामूली जरूरतों को पूरा करने में ही गुजरी है. अपनी उम्र के 50 में से 27 साल उसने मुंबई में ही बिताए. वह अपने शौहर युसुफ शेख के साथ कलकत्ता से यहां आई थी. दोनों 9 सालों तक किराए के मकानों को बदल-बदल कर रहते रहे.नूरजहां अपने शौहर पर इस कदर निर्भर थीं कि उन्हें मकान का किराया तक मालूम नहीं रहता था. 1995 में युसुफ शेख को बंग्लादेशी होने के शक में गिरफ्तार किया गया. जांच के बाद वह भारतीय निकला. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उसके इस बस्ती में रहने का उल्लेख किया. युसुफ शेख जरी कारखाने में काम करते हुए समय के पहले बूढ़ा हुआ और गुजर गया. तब नूरजहां की जिंदगी से किराए का मकान भी छिन गया. कुछ लोग समुद्र की इस दलदली जगह पर बसे थे. 18 साल पहले नूरजहां भी अपने 6 बच्चों के साथ यही आ गईं.
इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं. नूरजहां का पहला बेटा शादी करके अलग हुआ मगर दूसरा उसके साथ है. वह जरी का काम करता है और 1500 रूपए महीने में घर चलाने की भारी जिम्मेदारी निभाता है. उससे छोटी 2 बहिनों ने दसवीं तक पढ़कर छोड़ दिया. आर्थिक तंगी से जूझता नूरजहां का परिवार अब बेहतर कल की उम्मीद भूल बैठा है. मुश्किल भरे दिनउस रोज जब 1 बुलडोजर के साथ 10 कर्मचारी और 20 पुलिस वाले मीना विश्वकर्मा की झुग्गी तोड़ने आए तब उसका पति ओमप्रकाश विश्वकर्मा घर पर नहीं था. उस वक्त मीना सहित बस्ती की सारी औरतों को पार्क की तरफ खदेड़ा दिया गया. मीना ने कागज निकालकर बताना चाहा कि उसकी झुग्गी गैरकानूनी नहीं है. 2008 को दादर कोर्ट ने अपने फैसले में उसे 1994 से यहां का निवासी माना है. लेकिन वहां उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.बसंती जैसे ही मां बनी, वैसे ही बस्ती टूटने लगी. उसके यहां बिस्तर, दरवाजा, अनाज के डब्बे और टीवी को तोड़ा गया. पीछे से पति हुकुम सिंह ने सामान निकाला लेकिन गर्म कपड़े और खिलौने यहां-वहां बिखर गए. अब बहुत सारे बच्चे खिलौने और किताबें ढ़ूढ़ रहे हैं. हुकुम सिंह सालों पहले आगरा से सपनों के शहर मुंबई आया था जहां 2005 में उसने बसंती से प्रेम-विवाह किया. अब जब उनके जीवन में सबसे सुंदर दिन आने थे, उसी समय जीवन के सबसे मुश्किल दिनों ने दरवाजे पर दस्तक दे दी. अब बसंती भी बाकी औरतों की तरह खुले आसमान में सोती हैं. ओस की बूदों से उसके बच्चे की तबीयत नाजुक है. उसे दोपहर की धूप भी सहन नहीं होती. इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं. बस्ती के लोग याद करते हैं कि सरकारी तोड़फोड़ से पहले विधायक यूसुफ अब्राहीम ने इंदिरानगर मस्जिद में खड़े होकर कहा था कि आपकी झुग्गियां सलामत रहेंगी. लेकिन अतिक्रमण दस्ते ने इंदिरानगर की मस्जिद को तो तोड़ा ही बस्ती के कई मंदिरों को भी तोड़ा.किस्से सैकड़ों हैंबस्ती तोड़ने का यह अंदाज नया नही है. पहली बार 1993 में शासन ने करीब 500 झुग्गियां तोड़ने की बात मानी थी. मतलब 1995 के पहले यहां कम-से कम 500 परिवार तो थे ही. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक 1993 से 2008 तक इस बस्ती को 119 बार तोड़ा गया. लेकिन पिछली कार्यवाहियों के मुकाबले इस कार्यवाही से पूरी बस्ती का वजूद हिला गया है.
समुद्र से लगी भीमनगर की जमीन पर बरसों से बिल्डरों की नजर है. लोग बताते हैं कि 1999 के पहले यह जमीन समुद्र में थी जिसे स्थानीय लोगों ने मिट्टी डालकर रहने लायक बनाया. लेकिन 2001 में खालिद नाम के बिल्डर ने दावा किया कि यह जमीन जयसिंह ठक्कर से उसने खरीदी है. वह झुग्गी वालों को यह जमीन बाईज्जत खाली करने की सलाह भी देने लगा. इसी साल उसकी गाड़ी से एक बच्चे की मौत हुई और वह इस केस में उलझ गया. फिर 2008 में बालकृष्ण गावड़े नाम का एक और बिल्डर आया और दावा किया कि जयसिंह ठक्कर के बेटे से उसने यह जमीन खरीदी है. हालांकि मुंबई उपनगर जिला अधिकारी से मिले पत्र में यह जमीन महाराष्ट्र सरकार की संपत्ति के रुप में दर्ज है. ‘समता’ संस्था की संगीता कांबले बताती हैं- “ 1998 में इस बस्ती का रजिस्ट्रेशन हो चुका है. लेकिन वर्ष 2000 का सर्वे महज 2 दिनों में निपटा लिया गया. जबकि इस दौरान यहां के मजदूर काम पर गए थे और कई झुग्गियां खार में फंसे होने के कारण छोड़ दी गईं थीं. उपर से 2005 में आई मुंबई की बाढ़ इन झुग्गियों में रहने वालों के सारे कागजात बहा ले गई. फिर भी यहां के 75 फीसदी लोगों ने साल 2000 के पहले से रहने के सबूत इकट्ठा किए हैं. ऐसे परिवारों को उनकी झोपड़ियों का पट्टा मिलना चाहिए.”कब्जे की होड़“ घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन” ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत जो जानकारियां एकत्र की हैं, उसके अनुसार मुंबई में जगह-जगह बिल्डर और ठेकेदारों का कब्जा है. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी. इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन शहर में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन 80 साल के लिए लीज पर दी गई. ऐसा ही इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसी तरह मुंबई सेन्ट्रल में बन रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. लेकिन यहां की 12.2 मीटर जमीन डीपी मार्ग के लिए है. यह काम झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना के तहत होना है. लेकिन टावर के बहाने गरीबों की करोड़ों रूपए की जमीन घेर ली गई है.
मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, लेकिन शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है.
90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया गया जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन हथियाई गई. आज काम्पलेक्स का कैंपस लाखों वर्ग फिट से अधिक जगह पर फैला हैं. इनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल हैं. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए थी, अब उसे भी छोटे व्यापारियों से छीन लिया गया है.पूरी व्यवस्था कई तरह के विरोधाभासों से भरी हुई है. मानपुर खुर्द जैसी झुग्गियों में रहने वालों को वोट देने का हक तो है लेकिन आवास में रहने का नहीं. मतलब हर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए इनका वोट तो चाहती है लेकिन उसके बदले जीने का मौका नहीं देना चाहती. लोग मानते हैं कि मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, वह मेहनजकश मजदूरों के बिना पूरा नहीं हो सकता. फिर भी शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है. एक अघोषित एजेंडा यह है कि शहर की झोपड़पट्टियों को तोड़कर भव्य मॉल और कॉम्पलेक्स बनाए जाएं. लेकिन सवाल है कि इन इमारतों को बनाने वाले कहां जाए ?

26 मई 2009

जन संघर्षों की जीतः

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ की जेल में बंद नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले डॉ विनायक सेन को सोमवार को ज़मानत दे दी है.
न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू और दीपक वर्मा की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि डॉ सेन को निजी मुचलके पर स्थानीय अदालत से ज़मानत दे दी जाए.
डॉ सेन पिछले दो वर्षों से छत्तीसगढ़ की जेल में बंद हैं. राज्य सरकार का आरोप है कि उन्होंने राज्य में सक्रिय माओवादियों की मदद की है और उनके समर्थक रहे हैं.
पर डॉक्टर बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.
बिनायक सेन की ज़मानत के बारे में जानकारी देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद को बताया, "बिनायक को ज़मानत की ख़बर मानवाधिकारों के लिए लड़ाई कर रहे लोगों के लिए इस मामले में पहली जीत है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिला है जिसे आज ही एक कार्यकर्ता के हाथों रायपुर भेजा जा रहा है. मंगलवार को इस आदेश के आधार पर बिनायक रिहा किए जा सकते हैं."
उनकी बेटी अपराजिता सेन ने बीबीसी को बताया, "मेरे लिए और पूरे परिवार के लिए आज का दिन एक भावुक दिन है. दो वर्षों से बिना किसी अपराध के मेरे पिताजी हिरासत में रहे. अब मेरे परिवार को एकसाथ मिलने का मौका मिला है. मैं जल्द से जल्द उनसे मिलना चाहूंगी."
बिनायक का व्यक्तित्व
पेशे से चिकित्सक डॉ बिनायक सेन छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि लेते रहे हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ में समाजसेवा की शुरुआत सुपरिचित श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ की और श्रमिकों के लिए बनाए गए शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे.
इसके बाद वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए काम करते रहे.
डॉ बिनायक सेन सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार करने के लिए बनी छत्तीसगढ़ सरकार की एक सलाहकार समिति के सदस्य रहे और उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि डॉ सेन के सुझावों के आधार पर सरकार ने ‘मितानिन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरु किया.
इस कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार की जा रहीं हैं.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान को उनके कॉलेज क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर ने भी सराहा और पॉल हैरिसन अवॉर्ड दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जोनाथन मैन सम्मान दिया गया.
डॉ बिनायक सेन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के उपाध्यक्ष भी हैं.
इस संस्था के साथ काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे.
नक्सली आंदोलन और बिनायक
उन्होंने अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े किए और नक्सली आंदोलन के ख़िलाफ़ चल रहे सलमा जुड़ुम की विसंगतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए.
सलवा जुड़ुम के चलते आदिवासियों को हो रही कथित परेशानियों को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही.
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े बस्तर में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम को सरकार स्वस्फ़ूर्त जनांदोलन कहती है जबकि इसके विरोधी इसे सरकारी सहायता से चल रहा कार्यक्रम कहते हैं. इस कार्यक्रम को विपक्षी पार्टी कांग्रेस का भी पूरा समर्थन प्राप्त है.
छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 2005 में जब छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम लागू करने का फ़ैसला किया तो उसका मुखर विरोध करने वालों में डॉ बिनायक सेन भी थे.
उन्होंने आशंका जताई थी कि इस क़ानून की आड़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.
उनकी आशंका सही साबित हुई और इसी क़ानून के तहत उन्हें 14 मई 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया था .
बीबीसी हिन्दी से साभार

11 मई 2009

भारतीय पुलिस और डॉ विनायक सेन के जीवन पर खतरा

यह पत्र डॉ विनायक सेन की पत्नी इलीना सेन द्वारा 22 अप्रैल, 2009 को भेजा गया है।
प्यारे साथियो,

मैं कुछ बेहद पीडाजनक अनुभवों को यहां आपके साथ बांट रही हूं। हमारे पास इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि छत्तीसगढ पुलिस विनायक सेन की स्वास्थ्य की देखभाल की जरूरतों में सक्रिय हस्तक्षेप कर रही है. मैं तथ्यों को आपके सामने रख रही हूं.कई वर्षों से हाइपरटेंसिव के मरीज रहे विनायक रायपुर में एकमात्र कार्डियोलॉजी में डीएम डॉक्टर आशीष मलहोत्रा, जो निजी तौर पर चिकित्सा कर रहे हैं, के यहां कार्डियाक एसेसमेंट टेस्ट के दौरान एंजाइना से ग्रस्त पाये गये. वे 2007 में और उसके बाद अपने डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवाएं ले रहे थे. जेल में 2008 के दिसंबर और इस वर्ष जनवरी-फरवरी में कभी-कभी व्यायाम के बाद उन्हें सीने में और बायें हाथ में झुनझुनी दर्द की शिकायत हुई. उन्होंने जेल अधिकारियों को इसकी सूचना दी और जब इस बारे में कुछ भी ठोस नहीं किया गया (जेल अस्पताल में सुविधाएं नहीं हैं) उन्होंने अदालत को इसकी सूचना दी. उनकी ओर से 17 फरवरी, 2009 को एक आवेदन इस आग्रह के साथ अदालत में दाखिल किया गया कि उन्हें अपनी पसंद की सुविधाओंवाले अस्पताल में-सीएमसी, वेल्लोर को तरजीह देते हुए-इलाज कराने की इजाजत जेल अधिनियम-1894 की धारा 39-ए के तहत दी जाये, जो जेल अधीक्षक को कैदी अथवा उसके परिवार द्वारा बांड भरे जाने और अधीक्षक द्वारा रखी गयी शर्तों की बाध्यता के साथ उन्हें अपनी पसंद के इलाज की अनुमति देने में सक्षम बनाता है. 20 फरवरी, 2009 को जज ( इस मामले को देख रहे 11वें अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश बीएस सलूजा) ने जेल अधिकारियों को विनायक सेन के हृदय की स्थिति के बारे में मेडिकल बोर्ड की राय हासिल करने का आदेश दिया, ताकि विनायक के आवेदन पर सही निर्णय लिया जा सके.विनायक 20 फरवरी, 2009 और 17 मार्च, 2009 के बीच कभी रायपुर जिला अस्पताल ले जाये गये, जहां उन्हें देखनेवाले डॉक्टरों ने इसीजी और इकोकार्डियोग्राफ की सलाह दी.17 मार्च को विनायक ने अदालत से शिकायत की कि उनके इलाज के आग्रह पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है और यह कहते हुए वे थोडे भावुक हो गये कि उन्हें लगता है कि कोर्ट के लिए उनके जीवित रहने या मर जाने का कोई अर्थ नहीं है. जज भी समान रूप से विचलित थे और मैं सबूतों के रखे जाने और आरोपित के वापस जेल ले जाये जाने के बाद उनसे निजी तौर पर मिली ताकि मैं उन्हें समझा सकूं कि जितना रेकार्ड किया गया है, विनायक की स्थिति उससे कहीं अधिक की मांग करती है. जज नरम दिखे और 18 मार्च को विनायक से अदालत में पूछा कि वे रायपुर में किस डॉक्टर से दिखाना चाहेंगे, जो यह तय करेगा कि उन्हें वेल्लोर के लिए भेजे जाने की जरूरत है या नहीं और इस पर विनायक द्वारा डॉ आशीष मलहोत्रा का नाम लिये जाने के बाद उन्होंने जेल अधिकारियों को आदेश दिया कि वे विनायक को डॉ मलहोत्रा को दिखायें ताकि यह जाना जा सके कि उन्हें आगे के इलाज के लिए रेफर करने की जरूरत है या नहीं.विनायक 25 मार्च को डॉ आशीष मलहोत्रा को दिखाये गये. अदालत के 18 मार्च के आदेश के आधार पर जेल अधीक्षक ने पुलिस से आग्रह किया कि वह विनायक को दिखाने ले जाने के लिए सुरक्षा गार्ड मुहैया कराये. इसके बाद सशस्त्र पुलिस बल से भरी एक बस विनायक को डॉ मलहोत्रा से दिखाने सुबह 10 बजे के करीब ले गयी और मुझे डॉ मलहोत्रा के यहां से पुरानी रिर्पोंटों के लिए 10.30 में फोन आया. मैंने ऐसा किया और अधिकतर कंसल्टेशन के दौरान मौजूद रही. जेल अधीक्षक के आग्रहवाले पत्र कि वे सीएमसी, वेल्लोर रेफर किया जाने, इसीजी, इकोकार्डियोग्राफ और ट्रेडमिल टेस्ट की आवश्यकता पर स्पष्ट राय दें, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विनायक को कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) है और उन्हें एंजियोग.्राफी और आगे की जांच के लिए वीएमसी, वेल्लोर रेफर कर दिया ताकि एंजियोप्लास्टी/कोरोनरी आर्टरी बाइपास सर्जरी हो सके. मैंने प्रिस्किप्शन की फोटो प्रति अपने रिकार्ड के लिए रख ली, क्योंकि मुझसे पूरी प्रक्रिया के लिए भुगतान करने को कहा गया.मैं विनायक से 26 मार्च को जेल में मिली और दक्षिण भारत में यात्रा के दौरान सुविधाओं पर बात की. मुझे झटका लगा जब अधीक्षक ने कहा कि विनायक की जांच और इलाज वेल्लोर में नहीं, रायपुर में होगा. किसी गलती को महसूस करते हुए मैंने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन किया कि मुझे जेल और डॉक्टरों के बीच विनायक सेन के इलाज के संदर्भ में हुए पत्राचारों को दिखाय जाये. ये मेरे हाथ में आये अंतिम दस्तावेज हैं.इलाज की कहानी के अंत पर आने से पहले मैं यह बताना चाहूंगी कि जेल ने 31 मार्च को विनायक को रायपुर में एस्कॉटर्स हॉस्पिटल ले जाने की कोशिश की और मेरी पिछली मुलाकात में हुई बातों के अनुसार विनायक ने यह कहते हुए कि, जैसा कि जेल अधीक्षक का भी निर्देश है, वे छत्तीसगढ में कहीं भी इलाज कराने को इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इससे उनका जीवन खतरे में पड जायेगा, लिखित तौर पर वहां जाने से इनकार कर दिया. उनका यह जवाब एक टिप्पणी के साथ 31 मार्च को अदालत में आगे के निर्देश के लिए प्रस्तुत किया गया. अदालत ने लोक अभियोजक को इसे भेजते हुए सात दिनों में जवाब देने को कहा. मेरी जानकारी में अब तक ऐसा कोई जवाब नहीं दाखिल किया गया है. विनायक ने डॉ मलहोत्रा द्वारा लिखी गयी दवा (रींीर्ीिंर ीींरींळ)ि लेना शुरू कर दिया और कुछ लाक्षणिक राहत की सूचना दी.आरटीआइ के नतीजों पर आते हैं. मुझे अब डॉ मलहोत्रा का 25 मार्च का मूल रेफरल लेटर मिला है. लेकिन जेल अधीक्षक के नाम उनके सवाल को उद्धृत करता 26 मार्च का एक दूसरा पत्र भी था, जिसमें उन्होंने राय दी है कि एंजियोग्राफी की सुविधाएं छत्तीसगढ में एस्कॉटर्स, अपोलो, भिलाई मुख्य अस्पताल, रामकृष्णा अस्पताल और दो अन्य जगहों पर है. उन्होंने यह भी लिखा है कि उन्होंने डॉ सेन को वेल्लोर इसलिए रेफर किया क्योंकि पत्र उनसे ऐसा करने के लिए कहता था. इससे जुडे सवाल ये हैं : डॉ मलहोत्रा के पास दूसरी बार पत्र क्यों भेजा गया÷ यदि जेल अधीक्षक ने ऐसा पत्र भेजा तो किसने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया÷ यह पूरी तरह अदालत की अवहेलना है. डॉ मलहोत्रा से कोर्ट ने यह जानना चाहा था कि वेल्लोर भेजे जाने की जरूरत है या नहीं, इस पर अपनी राय जाहिर करें. अदालत ने डॉ मलहोत्रा से छत्तीसगढ में मेडिकल सुविधाओं की व्यापकता के बारे में नहीं पूछा था.डॉ मलहोत्रा बेशक दबाव में थे, जब उन्होंने कहा कि उन्होंने विनायक को वेल्लोर रेफर किया था, क्योंकि पत्र उन्हें ऐसा करने को कहता था. किसी मामले में अपने मरीज के साथ हुए या नहीं हुए उनके संवाद विशेषाधिकार प्राप्त सूचना माने जाते हैं.यदि एक डॉक्टर पब्लिक सेक्टर का नहीं है, इस हद तक डराया जा सकता है, जो एस्कॉटर्स, अपोलो आदि के डॉक्टरों को भी कहा जा सकता है, जो कि मेडिकल कॉलेज में स्थापित निजी मेडिकल संस्थान हैं (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बडे उदाहरण, जिनमें सभी मानव संसाधन सार्वजनिक सेक्टर के होते हैं लेकिन ब्रांड नेम और आगे के लिए रेफरल विकल्प निजी होते हैं).इन हालात में विनायक बिल्कुल सही हैं कि उनका जीवन छत्तीसगढ के किसी सरकारी नियंत्रणवाले अस्पताल में खतरे मे पड सकता है.दरअसल मैं अब चिंतित हूं कि पुलिस/अभियोजक का प्लान ए (विनायक को बदनाम करो और दोषी साबित करो) संकेत दे रहा है कि वे अब प्लान बी (छत्तीसगढ में किसी अस्पताल में इलाज के दौरान किसी से कह कर-जैसे कुछ बूंदों के साथ हवा इंजेक्ट कर के- उनकी हत्या कर दो) लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.मैं सभी साथियों से अपील करना चाहूंगी कि विनायक की शारीरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इस सामग्री का प्रकाशन करें, इसके बारे में लिखें, उच्च न्यायालयों और राजनेताओं से अपील करें. यह बहुत जरूरी है.मैं यह कहते हुए अंत करना चाहती हूं कि जिसकी हम मांग कर रहे हैं, पसंद के अस्पताल में इलाज का-वह भारतीय न्यायिक इतिहास के लिए अनजान नहीं है. दरअसल रायपुर सेंट्रल जेल से ही हत्या के आरोप में जेल में बंद शिवसेना नेता धनंजय सिंह परिहार को सरकारी खर्च पर केइएम अस्पताल, मुंबई, शंकर नेत्रालय, चेन्नई और तीन दूसरे अस्पतालों में 2003 में इलाज के लिए ले जाया गया था. पुलिस विनायक सेन को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बडे खतरे के रूप में चित्रित कर रही है. क्या हम उसे ऐसा करने देने जा रहे हैं÷
इलीना
अंगरेजी से अनुवाद : रेयाज उल हक मूलतः मंथली रिव्यू की वेबसाइट पर

23 अप्रैल 2009

राजनीतिक अंधेरे में नक्सली हिंसा के मायने

चुनाव के पहले चरण में बैलेट पर बुलेट दाग कर नक्सलियों ने अपनी पांच साल पहले की उस सोच को ही मूर्त रुप देना शुरु किया है, जिसे एमसीसी और पीडब्लूजी ने मिलकर पाला था। ठीक पांच साल पहले 2004 में बिहार-झारखंड में सक्रिय माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी और आंध्रप्रदेश से लेकर बस्तर तक में सक्रिय पीपुल्सवार ग्रुप यानी पीडब्ल्युजी एक हुये थे। उस वक्त नक्सली संगठनों के अंदर पीडब्ल्यूजी की पहचान हथियारबंद संघर्ष के लिये मजबूत ट्रेनिंग दस्ते का होना था तो एमसीसी की पहचान प्रभावित इलाकों में लोगो को सामूहिक तौर पर जोड़ कर किसी भी हमले को अंजाम देना था।

लेकिन, 2004 में जब दोनों संगठन एक हुये और सीपीआई माओवादी का गठन किया तो पहला सवाल दोनों के बीच इसी बात को लेकर उठा कि संसदीय राजनीति के चुनाव में माओवादियों की पहल का तरीका इस तरह का होना चाहिये, जिससे आर्म्स स्ट्रगल में बहुसंख्यक लोगों की भागेदारी नजर आये। सांगठनिक तौर पर संघर्ष के नक्सली तरीकों में आम लोगो की गोलबंदी को एमसीसी ने बखूबी अंजाम देना जहानाबाद जेल ब्रेक से ही शुरु किया । जेल ब्रेक को सफल प्रयोग मान कर माओवादियो ने बीते पांच साल में जो भी प्रयोग किये, उसमें आंध्र के नक्सलियों ने अगर उपरी कमान संभाली तो बिहार झारखंड के नक्सलियों ने जमीनी कमान संभाली ।

पहले चरण के मतदान के वक्त माओवादियों की यही रणनीति सामने भी आयी । लेकिन माओवादियों की सोच को सिर्फ चुनावी हिंसा से जोडकर देखना भूल होगी । हकीकत में झारखंड, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र के जिन इलाकों में नक्सली हिंसा हुई हैं, वहां की सामाजिक आर्थिक स्थिति के उपर पहली बार राजनीतिक हालात हावी हुये है। यानी पहले नक्सल प्रभावित इलाको में बहस की गुंजाइश विकास को लेकर होती रही। जिसमें रोजगार से लेकर न्यूनतम जरुरतों का सवाल माओवादी उठाते रहे। नक्सली संगठन पीपुल्सवार ने हमेशा इसी नजरिये को राजनीतिक आधार भी बनाया। जिस वजह से राष्ट्रीय राजनीति में हमेशा नक्सली संघर्ष को सामाजिक-आर्थिक समस्या के ही इर्द-गिर्द रखा गया। लेकिन बीते पांच साल में सीपीआई माओवादी ने सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से इतर राजनीतिक तौर पर ही अपने प्रभावित इलाकों में हर कार्रवाई शुरु की। जिसका असर आंध्र प्रदेश के तेलागंना, महाराष्ट्र के विदर्भ और छत्तीसगढ के बस्तर से लेकर मध्यप्रदेश, उडीसा, झारखंड बिहार और पश्चिमी बंगाल के हर उस मुद्दे में नजर आया जो राजनीतिक दलों को प्रभावित कर रहा था।

तेलांगना में माओवादियों ने शुरु से ही इस प्रचार को आगे बढाया कि वह किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं है। और तेलागंना राष्ट्रवादी पार्टी की राजनीति उनकी सोच से अलग है। इस थ्योरी ने माओवादियो की राजनीतिक जमीन झटके में चन्द्रशेखर से अलग की और वायएसआर रेड्डी को भी चेताया कि वह एनटीआर की बोली अन्ना या बडे भाई वाली ना बोले। वहीं, विदर्भ के चन्द्रपुर और गढ़चिरोली में किसानों की आत्महत्या से लेकर उघोगपतियो के मुनाफे को भी उस राजनीति से जोड़ा, जहां सवाल सामाजिक-आर्थिक आधार पर रखकर पिछड़े आदिवासियों का आंकलन ना हो, बल्कि राजनीतिक दलों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का विद्रूप चेहरा ही उभरे।

इसलिये कांग्रेस और बीजेपी की नीतियों के जरीये उनके नेताओं के लाभ का लेखा-जोखा भी इन इलाको में रखा गया। कुछ उसी तर्ज पर छत्तीसगढ में भी माओवादियों की पहल राजनीतिक तौर पर ही हुई, जिसके एवज में सलमा जुडुम को राज्य सरकार ने खड़ा किया। लेकिन माओवादियों ने सलवा-जुडुम के सामानातंर उस राजनीतिक लाभ को इन इलाकों में उभारना शुरु किया जो प्रकृतिक संपदा को निचोड़ कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ कौडियो के भाव जा रहा है। इसी आधार का असर उडीसा में नाल्को के अधिकारियो पर हमले में नजर आया । जबकि झारखंड और बिहार में सीधे राजनेताओ पर निशाना साध कर माओवादियों ने राजनीतिक संदेश देने की ही पहल को आगे बढाया।

असल में माओवादियों की नयी थ्योरी कहीं ज्यादा राजनीतिक चेतावनी वाली है । खासकर संसदीय राजनीति के उस तंत्र को वह सीधे चेतावनी देने की स्थिति में खुद को लाना चाहती है, जो अभी तक विकास के अंतर्विरोध के मद्देनजर ही पिछड़े इलाकों में सक्रिय माओवादियो का आईना देश को दिखाती रही है । एसइजेड यानी स्पेशल इकनॉमी जोन की अधिकतर योजनाएं उसी रेड कारिडोर में हैं, जहा माओवादी सक्रिय हैं । लेकिन पहली बार एसईजेड का विरोध सामाजिक-आर्थिक तौर पर करने की जगह माओवादियों ने उसे उसी राजनीति से जोड़ा, जिसकी आर्थिक नीतियों को लेकर आम शहरी जनता में भी सवाल उठ रहे हैं। नंदीग्राम और सिंगुर इस मायने में पारदर्शी राजनीति का प्रतीक है । जहां माओवादियो ने वाम राजनीति के सामानातंर उस प्रतिक्रियावादी राजनीति को आगे बढाया, जिसने वामपंथियों को सत्ता के लिये विचारधारा से उतरते देखा। बंगाल में वाममोर्चा का यह बयान दुरस्त है कि ममता के पीछे माओवादियो का राजनीतिक संघर्ष काम कर रहा है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि ममता की राजनीति उसी वाम राजनीति का विकल्प है। हकीकत में पहली बार माओवादी राजनीतिक तौर पर उस सोच को खारिज करना चाहते हैं जिसके जरीये यह सवाल खड़ा होता है कि सत्ता अगर बंदूक की नली से नहीं निकलती तो माओवाद की थ्योरी संसदीय राजनीति में सिवाय हिंसा के क्या मायने रखती है। यह सवाल माओवाद के सामने इसलिये भी बड़ा है क्योकि पहली बार केन्द्र सरकार ने नक्सल हिंसा को आंतकवाद सरीखा माना है। जिसे उन्हीं वामंपथियों ने सही ठहराया है, जो एक दशक पहले तक अतिवाम को भटकाव या बड़े भाई के तर्ज पर देखते थे। लेकिन सरकार की इस पहल को भी माओवादियों ने राजनीतिक तौर पर ही उठाया । जिसका असर नंदीग्राम में दिखा । लेकिन चुनाव में वोटिंग के दौरान नक्सली हिंसा लोकतंत्र के खिलाफ की भाषा मानी जायेगी, यह भी हकीकत है ।

लेकिन, देश की राजनीति का नया सवाल लोकतंत्र के नाम पर राजनीतिक दलों के आम लोगो से गैर सरोकार वाले मुद्दों का उठना भी है और सरोकार के उन मुद्दो को लोकतंत्र का ही नाम लेकर हाशिये पर ढकेल देना भी, जो लोकतंत्र पर ही सवालिया निशान लगाते हैं। मसलन , अपराधियों और बाहुबलियों से कोई राजनीतिक दल नहीं बच पाया है लेकिन इसे मुद्दा नहीं बनने दिया गया। बालीवुड या क्रिकेट खिलाडियों के जरीये राजनीति का गैर राजनीतिक राग हर राजनीतिक दल ने छेड़ा । रोजगार और मंहगाई के निपटने का कोई तरीका किसी दल के पास नहीं है। अगर इन सवालों ने गांव और छोटे शहरो में चुनाव के लोकतंत्र को लेकर वोटरो में सवाल खडे किये हैं तो आंतकवाद के सवाल ने शहरी मतदाताओ के बीच राजनीति को लेकर एक आक्रोष भी पैदा किया है।

यह वही परिस्थितयां हैं, जिसमें पहली बार विकल्प का सवाल खड़ा तो हो रहा है लेकिन बिना किसी रास्ते के विकल्प का सवाल सवाल ही बना रह जा रहा है । इसलिये चुनाव के वक्त नक्सली हिसा ने नक्सल प्रभावित इलाको में कुछ नये सवाल पैदा कर दिये हैं। बिना स्थानीय मदद के चुनाव के वक्त हिंसा कैसे संभव है । स्थानीय वोटरों का यह एहसास खत्म हो चुका है कि वह चुनाव के जरीये लोकतंत्र को जीते हैं। राजनीतिक दलों के उम्मीदवार खलनायक माने जाते हैं। हिंसा का अंदेशा जब सरकार और सुरक्षाकर्मियों को भी था तो भी नक्सली कार्रवाई कर कैसे सुरक्षित निकल गये। राजनीतिक दलों ने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी। और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक को क्यों कहना पडा कि नक्सलियों से निपटने में राज्य सरकारें पूरी तरह विफल रही हैं। और उनसे नक्सल संकट सुलझ भी नही सकता है। असल में माओवादियों के लेकर बड़े सवाल अब शहरी मतदाताओ तक भी पहुंच रहे हैं । क्योंकि जिन राजनीतिक परिस्थियों से वोटर यह जानते समझते हुये गुजर रहा है कि चुनावी लोकतंत्र में उसकी शिरकत सिवाय वोट डालने भर की है। उसमें चुनाव के जरीये सत्ता बनाना या बदलना लोकतंत्र का नही सौदे का हिस्सा है, जो उन्हीं नेताओं के हाथ में है, जिन्हे वह लगातार सवाल उठाता रहा है । यानी चुनावी लोकतंत्र का जो खाका पिछले साठ साल से चला आ रहा है, उसमें राजनीति के जरीये विकल्प के सपनो को संजोना खत्म हो चला है। और माओवाद की नयी राजनीतिक दस्तक चुनावी लोकंतंत्र के टूटे सपने से निकल कर फिर से सत्ता बंदूक की नली से निकलने का अंदेशा जगाना चाह रही है । पुण्य प्रसून vajpeyee

06 मार्च 2009

अंजन गाँव में हुई साम्प्रदायिक झड़प पर तथ्य संकलन के आधार पर तैयार की गयी एक रिपोर्ट:-


घटनायें जब घट चुकी होती हैं हमारे पास बताने के लिये ढेर सारे तथ्य होते हैं, हमारी मुट्ठीयों में संकलित आंकड़े की एक पोटली होती हैं और चेहरे पर विवशता की छाया। जब चीख-चीख कर हम गोधरा की नृशंसता का बयान कर रहे होते हैं ठीक उसी समय हमारे आस-पास पसरी होती है एक भयावह चुप्पी, एक लम्बी चीख को समेटती हुई। महाराष्ट्र राज्य के अमरावती जिले में एक छोटी सी तालुका है अंजन गाँव जिसकी आबादी तकरीबन ५१००० है. ५१००० कम तो नहीं होते प्रेम करने के लिये या नफ़रत करने के लिये. २३ फरवरी को हुई हिन्दू मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच एक झड़प के बाद यहाँ के बयान पेश करने के कई अंदाज़ हो सकते हैं, मसलन पुलिस की दख़लंदाजी ने एक और गोधरा होने से बचाया अंजन गाँव को, या मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना. पर सच्चाई कभी एक नहीं होती, दरअसल जरूरी यह होता है कि आप अपनी आँख के किस कोने से कौन सा चश्मा लगाकर घटनाओं को देख रहे हैं. ५१००० की आबादी वाले इस तालुका में मुसलमानों की आबादी १७००० के आस-पास है, २६००० की संख्या में हिन्दू व तकरीबन ६००० बुद्धिस्ट हैं. ये तीनों समुदाय आपस में घनी बस्तियाँ बनाकर इस तरह से रहते हैं कि लोगों में मनमुटाव हो, एक संप्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से बातचीत करना बंद कर दे पर घरों की दीवारें हैं कि धूप में अपनी छाया एक दूसरे पर लुढ़का ही देती हैं इस बात का फ़िक्र किये बगैर कि जिस दीवार के कंधे पर वे झुक रही हैं उसके घेरे में किसी अन्य सम्प्रदाय के लोग रहते हैं. इस घनी बस्ती में लोगॊं के घर भले ही छोटे हों, लोगों को रहने के लिये ज़मीन भले ही कम हो पर मंदिरों और मस्ज़िदों को विस्तृत इलाके में बनाया गया है शायद इसलिये कि इश्वर-अल्लाह इतने बड़े होते है कि ज़ाहिराना तौर पर उन्हें बडी़ और विस्तृत जगह की जरूरत है. इस तीन कि.मी. के इलाके में ८ मस्जिदें हैं और मंदिरों की संख्या तो गिनी ही नहीं जा सकती क्योंकि मस्ज़िदों का एक ढांचा होता है पर मंदिर कई बार पेड़ होते हैं, पुलिया होती है या इस पठारी क्षेत्र में कोई भी पत्थर जिसे सिंधूर से रंगा गया है वह मंदिर ही है, उसे हनुमान कह दो या काला पत्थर हो तो शिव जी पर यह बात आज तक मेरी समझ में नहीं आयी कि अपना लिंग छूकर जब लोग इतनी गंदगी महसूस करते हैं कि पानी से हाथ तक धोते हैं तो फिर पत्थर के लिंग पर दूध क्यों बहाते हैं? खैर इलाके की राजनीतिक स्थिति यह है कि कभी यहाँ के सांसद शिवसेना के सदस्य प्रकाश भार साकडे़ जी हुआ करते थे. विधायक के रूप में अब भी वही हैं पर पार्टी बदल दी है और अब कांग्रेस में आ गये हैं पता नहीं विचारधारा बदली की नहीं, अगर कांग्रेस की कोई विचारधारा है तो. पर हां इतना जरूर है कि विचार कपडे़ नहीं हैं जिन्हें तुरंत बदला जा सके. इस मामले पर हमने वहाँ के लोगों, पत्रकारों, शिक्षकों आदि से बात-चीत कर वास्तविक स्थिति का पता लगाने का प्रयास किया. २३ फरवरी को जब यह घटना हुई उस दिन हिन्दुओं का त्योहार "शिवरात्रि" था. गाँव के एक २५ वर्षीय युवा गजानन विट्ठलराव कराडे़ (एस.सी.) जो कि पेशे से कारपेंटर हैं व शिव सेना के सदस्य भी, शाम के वक्त गाँव के एस.टी. बस स्टैंड की एक दुकान पर अपनी बाइक से आये और सामने की एक पान गुमटी से जब थोडी़ देर बाद लौटे तो उन्हें वहाँ बाइक दिखायी नहीं दी. थोडी़ देर बाद बाइक स्टैंड पर ही एक दुकान के पीछे खडी़ मिली ऎसी स्थिति में गजानन ने मुस्लिम समुदाय को टारगेट करते हुए कुछ गालियाँ देनी शुरू की जिससे वहाँ खडे़ दो मुस्लिम लड़कों जावेद खाँ और यूनुस से झड़प हो गयी पर आस-पास के लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को सम्हाल लिया. ठीक इसी रात जहाँ पर यह घटना हुई थी वहाँ पर स्थित एक मंदिर में पथराव हुआ. पथराव के कारण मस्ज़िद के सामानों को क्षति पहुची कारणवस अब पूरा मामला सुबह तक काफी संगीन हो गया. अब यह मामला दो व्यक्तियों का न होकर दो सम्प्रदायों का हो गया और इस स्थिति में दोनों सम्प्रदायों के बीच २४ तारीख की सुबह १० बजे के करीब झड़प हो गयी जिसमे लोगों की तरफ से पत्थरबाजी हुई और तलवारें व इस तरह के आपत्ति जनक सामान भी निकाले गये पर वहाँ के तत्कालीन एस.पी. स्टालिन की सक्रियता के कारण किसी के आहत होने की कोई घटना रोकी जा सकी. पत्थरबाजी के कारण कुछ लोग घायल जरूर हुए और कुछ को चॊटें भी आयी. लोगों के मुताबिक कुछ दुकानों में तोड़ फोड़ भी हुई जिसकी थाने में २६००० रूपये के हानि की रपट दर्ज करवायी गयी. स्थिति के भयावह होने के आसार को देखते हुए एस.पी. स्टालिन द्वारा पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू घोषित कर दिया गया और वहाँ के थाना प्रभारी ए.यू. कुरैसी का तबादला कर दिया गया. इसके बावजूद भी ८ दिनों तक पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी रहा जिससे वहाँ के व्यापारी से लेकर आमजन काफी परेशान रहे. इस पूरी घटना के दौरान २ मार्च तक तकरीबन २१२ मुस्लिम व २० हिन्दुओं को धारा १४३, ५०४, ५०६,३२३, ४२६,४३५,२७५,२३६, १४७,१४८, १४९, ३२४, ३०६ व १३५ बाम्बे पुलिस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया. जिनमे से अभी भी अधिकांश लोग अमरावती जेल में बंद हैं जबकि मुख्य आरोपी गजानन विट्ठलराव कराडे़ को शिवसेना के सदस्यों द्वारा जमानत लेने पर रिहा कर दिया गया. परन्तु स्थिति की गम्भीरता का आंकलन इस बात से किया जा सकता है कि वहाँ के मुस्लिम वर्ग के लोग घटना के बारे में कोई भी जानकारी देने से मुकर रहे है. यहाँ तक कि तथ्य संकलन करने गयी टीम के सदस्यों पर कई मुस्लिमों द्वारा यह भी कहा गया कि आप आई.बी. के हो सकते हैं या किसी अन्य संगठन से भी अतः हम आपको जानकारी नहीं दे सकते. जिससे साफ तौर पर पता चलता है कि सरकार से किस तरह का दहसत उनके अंदर है. इसकी एक वज़ह यह भी है कि मुस्लिमों की आबादी आनुपातिक दृष्टि से कम होने के बावजूद भी उनकी गिरफ्तारी भारी संख्या में की गयी है यहाँ तक कि उन मुसलमानों को भी गिरफ्तार किया गया है जो दिशा मैदान के लिये बाहर निकले हुए थे. इस वज़ह से मुस्लिम वर्ग में एक दहसत व खौफ का माहौल बना हुआ है. दूसरी तरफ वहाँ शिव सेना व हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों का भी खौफ बना हुआ है. बात-चीत के दौरान श्री राजेन्द्र बंगले ने हमे बताया कि किसी मुसलमान की यह हिम्मत नहीं है कि वह हमारी गली से सिर ऊपर करके निकल जाय, सब चूहे की तरह जाते हैं. पूरे इलाके का ज़ायज़ा लेने के बाद यह तथ्य सामने आया कि यहाँ पर हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों ने अपने को उस सामान्य अर्थ में नहीं स्थापित किया है जिन अर्थों में आम तौर पर वे कई जगह अपने को स्थापित करती हैं बल्कि यहाँ कई नये तरीके अपनाये गये हैं. मसलन उच्च शिक्षा का संस्थान सारडा कालेज जो उस क्षेत्र का एक नामचीन कालेज है, शिव सेना के द्वारा स्थापित है जिससे वहाँ के युवाओं की नब्ज़ को बेहतर ढंग से पकडा़ जा सके. इस रूप में पूरे हिन्दू समाज में जिस तरह की कट्टर हिन्दू मानसिकता तैयार की गयी है वह अपने में एक भयावह स्थिति है. साथ में हिन्दू संगठनों द्वारा व्यायामशालायें व साखायें भी चलायी जाती हैं. क्षेत्र के अधिकांसतः युवा बेरोजगार हैं और इन संगठनों से जुड़कर किसी तरह की सक्रियता में अपने को व्यस्त रखना चाहते हैं. गौरतलब बात यह भी है कि इन हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों में काम करने वाले अधिकांस युवा ओ.बी.सी. और दलित हैं. पिछले कुछ माह से राजठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) जो कि शिव सेना का ही एक नया रूप है, आसपास के क्षेत्रों में अपना विस्तार किया है. बल्कि यहाँ तक कि पूरे महाराष्ट्र में कुछ संकीर्ण सवालों को उठाकर एक नया हिन्दूवादी संगठन तैयार किया जा रहा है. ऎसी स्थिति में कई मुस्लिमों से बात करते हुए उनके अंदर एक असहाय युक्त रोष जरूर देखने को मिला. तथ्य संकलन के दौरान यह पता चला कि तकरीबन ५० कि. मी. के क्षेत्र में जिसमे अचलपुर, दरियापुर, निज़ामपुर में साम्प्रदायिक बहुलता के आधार पर छोटे बडे़ कट्टरपंथी संगठन खडे़ हो रहे हैं या साम्प्रदायिक मानसिकता का निर्माण हो रहा है. जिसमे बडे़ स्तर पर युवाओं की भागीदारी है इसके पीछे साफ तौर पर जो कारण दिखायी पडा़ वह यह कि बेरोजगार होने की वज़ह से युवाओं की जो उर्जा है उसे साम्प्रदायिक ताकतें आगे आकर अपने तरीके से इश्तेमाल कर रही हैं. आस-पास के जिलों में भी सड़कों के किनारे लगे पोस्टरों व होर्डिंग्स से पता चलता है कि जनमानस में अपने सम्प्रदाय के प्रति आस्था व सर्वोच्चता का पहला पाठ पढा़या किस तरह से पढा़या जा रहा है. रोज-ब-रोज़ बाबाओं की यात्रायें क्षेत्रों में करायी जा रही हैं ताकि लोग सम्प्रदायों में बंटे रहें और जब तक लोग सम्प्रदायों में बंटे रहेंगे साम्प्रदायिकता फैलाने वाली ताकतें किसी न किसी तरीके से इनका इश्तेमाल आसानी से कर ही लेंगी. पूरे तथ्य संकलन के दौरान एक बात साफ तौर पर निकल कर आयी कि अगर इन साम्प्रदायिक ताकतों के चरित्र को लोगों के बीच जल्द से जल्द नहीं खोला गया, भविष्य में इसकी भयावहता से उन्हें नही मुखातिब कराया गया तो यह असम्भव नहीं कि स्थितियाँ बहुत ही विकट होंगी. दूसरे रूप में एक बडे़ तौर पर यह भी कार्य करने की जरूरत है कि लोगों को धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकताओं से उभारा जाये. चूकि धर्म अपने को जितना सहिष्णु कहता है असलियत में वह उतना होता नहीं जिसे अष्टभुजा शुक्ल ने अपने शब्दों में लिखा है. किसी धर्म स्थल के विवाद में तीन हजार लोग बम से दो हजार गोली से एक हजार चाकू से और सौ जलाकर मार डाले जाते हैं चार सौ महिलाओं की इज्जत लूटी जाती है और तीन सौ शिशुओं को बलि का बकरा बनाया जाता है धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ग्यात कीजिये॥

तथ्य संकलन में सहयोगी सदस्य -चन्द्रिका, रजनेश, अनीस, आशीष

03 फ़रवरी 2009

बीते बरस के हाथ एक पत्र:-

हर बरस कुछ इसी तरह बीतता है कि अपने साथ लेकर चला जाता है न जाने कितनी उन चीजों को जिन्हें अभी बचा रहना था दुनिया में और वे बच ही जाती हैं जिन्हें दुनिया से मिटना था. कि पिछला बरस जाते-जाते कितना कुछ तो लेता गया अपने साथ. नये साल की उम्मीदें जार-जार होती दिखती हैं. फिलिस्तीन को होना ही था आबाद पर ऎसा नहीं हो सका. बचे रहना था महमूद दरवेश को कि किया जा सके पानी और बहते लहू में फर्क, पैदा होते ही बच्चों की सांसो में नहीं जाना था बारूद की गंध पर बीते वर्ष की पीठ पर महमूद दरवेश लद कर चले गये और माओं के गर्भ से पैदा होने के पहले बच्चों ने सुने धमाके. क्या बीते बरस से यह शिकायत करूं कि वे जिन्हें तुम लेकर चले गये, दुनिया बदलने के उनके सपने अभी भी आबाद हैं. लोगों का गुस्सा इतना बढ़ गया है कि दुनिया के सबसे बडे़ तानाशाह पर एक अदना सा पत्रकार जूते मार रहा है. वे लोग जिन्हें रोटी नहीं मिल रही है अपने हाँथ का इश्तेमाल बंदूक के लिये करना सीख रहे हैं. गाँधी के नाम पर जो लोग विश्व अहिंसा दिवस मना रहे हैं उनके हाँथों में इराक का कितना खून सना है इसका जिक्र होना ही चाहिये. जेल की सलाखों से बिनायक सेन को निकलना था पर वर्तमान लोकतंत्र का यही तकाज़ा है. वह सब कुछ जिसे धीरे-धीरे दूर होना था वह लोगों के और करीब हो रहा है चाहे वह भूख हो बेरोजगारी या असमानता. मुम्बई में आतंकी हमले हुए जिनमे सैकडो़ लोग मारे गये क्या यह चंद युवावों का जुनून था कि वे आये और कुछ लोगों को मार कर मर गये या दुनिया की तमाम परिस्थितियों से उभरी हुई घटनाओं में यह भी एक घटना थी जिसके कार्य कारण संबंधों पर बात नहीं की जा सकी और करकरे की मौत के बाद अचानक अखबारों से हिन्दूवादी आतंक का एक चेहरा "साध्वी" गायब हो जाता है. हमे यह नहीं पता कि कब पड़ोसी देश से युद्ध शुरू हो जाये पर यह जरूर पता है कि अन्ततः दो देशों के सत्ता की लडा़ई में हम ही मारे जायेंगे. जब दुनिया आर्थिक मंदी की मार झेल रही है इसलिये कि दुनिया का आका अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था में ढह रहा है. उस समय बाराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के जस्न पर ३७० करोण रूपये खर्च किये जा रहे हैं. ऎसे समय में एक बरस का बीत जाना हासिये पर पडी़ सदी के कलेण्डर की उम्र कम होने से ज्यादा और क्या है? हमे सोचने की जरूरत है कि हम एक रास्ता चुने जहाँ से उम्मीदों का नया साल शुरू हो सके.

कविता

पंचटीला और लड़की:-

१।

वह आयेगी

और धर देगीअपनी उदासी

तुम्हारे भीतर

रात गये तुम गाओगे

उसके प्रेम और विछोह के गीत

कैसे जानेगा कोई कि

तुम्हारी कठोरता में

धर दी गयी

हैएक पूरी की पूरी लड़की॥

२-

लड़की तुम नहीं रहोगी

इसके पास

इसकी देह में उतरेगा

हर हमेश

हर दिन

पूरा सप्ताह

उदास होगा पंचटीला

अपने दुख में

थोडा़ सा टूटेगा रोज

दिनों को पूरा करता हुआ॥

३-

वह तुम्हें

उतना भर करेगी प्रेम

जितना भर बचा है उसके पास

उमर ढलने के पहले

लड़की छोड़ देगी तुम्हें

तब किससे पूछोगे तुम

कि कब लौटेगी लड़की॥


गौहर रज़ा पिछले दिनों हमारे वि.वि. में आये और एक काव्य गोष्ठी के दौरान उनके द्वारा सुनायी गयी नज़्म का आज़ाद अंसारी द्वारा रिकार्डिंग हमें उपलब्ध हुआ जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं॥
ये साल भी यारॊं बीत गया

कुछ खून बहा कुछ घर उजडे़

कुछ कटरे जल कर खाक हुए

इक मस्जिद की ईटों की तरह

हर मसला दब कर दफ्न हुआ

जो खा़क उडी़ वो ज़हनों पर

यूं छायी जैसे कुछ भी नहीं

अब कुछ भी नही है करने को

घर बैठो डर के अब के बरस

या जान गवां दो सड़कों पर

घर बैठ के भी क्या हासिल है

न मीर रहा न गा़लिब है

न प्रेम के जिंदा अफसाने

बेदी भी नही मंटो भी नहीं

जो आज की दहसत लिख डालें

मंसूर कहाँ जो ज़हर पिये

गलियों में बहती नफरत का

वो भी तो नही जो तकली से

फिर प्यार के ताने बुन डाले

क्यों दोष धरो पुरखों पर तुम

ख़ुद मीर हो तुम गा़लिब भी हो तुम

तुम प्रेम का जिंदा अफसाना

बेदी भी तुम्ही तुम मंटो हो

तुम आज की दहसत लिख डालो

नानक की नवा चिस्ती की सदा

मंसूर तुम्ही तुम बुल्ले शाह

कह दो कि अनल-हक जिंदा है

कह दो कि अनल-हक कर देगा

इस नुक्ते पर ग़ल नुक्ती है

हर बात यहीं से निकलेगी॥


महाश्वेता देवी भारत की एक मात्र लेखिका है जिन्होंने अपने लेखन कर्म व जीवन कर्म को एक साथ जनवादी तरीके से साधा है हाल में जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में आयी उस दौरान हमारे साथी देवाषीश प्रसून और प्रत्युष प्रशांत ने उनसे बात-चीत की जिसके अंश का हम प्रकाशन यहाँ कर रहे हैं॥


किसी रचनाकार की रचनाशीलता में उसका जीवन संघर्ष कितना मायने रखता है?

आदमी जो देखगा वही लिखेगा उसकी रचना का निर्माण उसके आस-पास के परिवेश से ही आता है इस रूप में किसी रचना कार की रचना शीलता उसके जीवन कर्म पर ही निर्भर करती है । जहाँ वह जीवन जीता है उसके परिवेश पर निर्भर करती है

१०८४ की मां की जो विषय वस्तु है या उस राजनीति को आज किस तौर पर देखती है?

वह जो राजनीति थी उसका समय अभी नहीं रहा उसका समय बीत चुका है । नक्सलवाडी़ की राजनीति को जिन्होंने समर्थन दिया आज वे उसे प्रांत-प्रांत तक बिखेर चुके हैंऔर वह कई प्रांतों में फैल गया है. कोई अच्छा आंदोलन खत्म हो जाय ऎसा नहीं होता उसमे उतार चढा़व आता है पश्चिम बंगाल में जैसे आज उसका प्रभाव कम है पर पूरे देश में एक बडा़ आंदोलन है वह और चल रहा है उसका चलना ही जरूरी है. यह समय की जरूरत है

देश में पनपती ढेर सारी समस्याओं के बीच जब जगह-जगह छोटेछोटे आंदोलन पनप रहे हैं (सेज, मानवाधिकार, बांध) युवाओं की को कहां देखती हैं?

अभी जब हाल में मैं कलकत्ता में थी ठीक आने के पहले उधर जो हुआ था जिसको लेकर केन्द्र सरकार ने एक एक्ट बनाया है जिसके खिलाफ प्रदर्सन भी हुए हैंजिसमे हमने जो बयान दिया है उसमे बोला है ज्यादा से ज्यादा जो मानवाधिकार की लडा़ई लड़ रहे हैं जैसे ए।पी.डी.आर. के आंदोलन ये एक्ट उसके खिलाफ जाता है अतः इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिये इसमे युवा भी हैं कोई आंदोलन खत्म होने की बात नहीं होती है वह अगले आंदोलन को इंस्पायर करता है.

नंदी ग्राम के आंदोलन ने संसदवादी कम्युनिस्ट पार्टी के चरित्र को पूरे देश में उजागर किया आप किस रूप में देखती हैं?

जिस समय तक वह मार्क्स वादी पार्टी थी उसको जो करने को था किया लेकिन उसका दिन खत्म हो गया इसलिये देखो यही पश्चिम बंगाल में जब पंचायती चुनाव हुआ था पंचायत में वोट देने वाला आदमी बहुत पढा़ लिखा तो नहीं है कामन मैन है पर वह सब कुछ समझता है। ये मजदूर किसान हैं ये सब उस पार्टी के खिलाफ हो गये और पार्टी हार गयी ३० साल से सत्ता में रहते हुए उसने न तो रास्ता बनाया न तो पानी दिया न बिजली कुछ नहीं दिया. जब पश्चिम बंगाल में भुखमरी पडी़ सरकार के पास कितना गेहूँ चावल सब था पर लोगों को मरना पडा़

वर्तमान लोकतंत्र में आप सुधार की कितनी गुंजाइश देखती हैं या फिर किसी विकल्प के बारे में सोचती हैं?

ज्यादा सोचना नहीं है न तो सोचने का समय है इसमे सोचने का क्या है आंदोलनों से जुडी़ हुई हूँ और यही है कि लडा़ई करने का है तो करने का है और कुछ नहीं.


युवावों के लिये कोई रास्ता सुझायें या कोई संदेस?

कोई संदेस नहीं देखो समझो और करो मैं कोई रास्ता क्यों बताऊ अपना रास्ता खुद चुनों लोगों की समस्याओं को देखो और उन्हें बिजली पानी सड़क उपलब्ध करवाओ।


श्रद्धांजलि:-

लवलीन

कथाकार लवलीन नहीं रही। इन निर्मम शब्दों के अलावा और क्या युक्ति है कि बयां हो जाय उनका न रहना. तुम्हें कैसे बताया जाय कि तुम्हारे पाठकों, दोस्तों और चाहने वालों ने किस तरह स्वीकार किया होगा तुम्हारा न रहना.कौन तुमसे बताये कि तुम्हारे चले जाने के बाद भी यह दुनियां उसी तरह आबाद है. कई शाम बीत चुकी है और और लोगों की यादों से हर रोज तुम खिसकती जा रही हो.


हेराल्ड पिंटर

काश! हेराल्ड पिंटर के नाटकों की तरह यह भी एक नाटक ही होता कि दुनिया के रगमंच पर हुई एक मौत, मौत न होती और बत्तियँ जलने के साथ वह पात्र उठ खडा़ होता और हम सब तालियाँ बजाते हुए उसका अभिवादन करते। अपने आंसुओं को पोछते हुए दर्शक दीर्घा से बाहर निकलते और कहते कि हेराल्ड पिंटर अभी जिंदा हैं.


नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होने चाहिये:-

कुछ दिन पहले ही हमारे देश के दो बडे़ पूजीपतियों अंबानी और मित्तल के द्वारा देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया गया। जिसे देश के लगभग समाचार पत्रों ने अपने पहले पन्ने पर छापा. यह चुनाव के पूर्व की तैयारी है जिसमे देश की मजदूर जनता के दो बडे़ शोषकों द्वारा एक बडे़ ह्त्यारे को चुना जा रहा है.जिसने २००२ के गुजरात दंगे में जाने कितने मुस्लिमों का नर संहार करवाया और जबकि आज भी गुजरात में उसके शासन काल में मुश्लिम वर्ग दहसत में जी रहा है. ऎसे में चुनाव के पूर्व अम्बानी मित्तल के इस प्रधानमंत्री पद के चुनाव का निहितार्थ क्या हो सकता है? एक तो यह कि आर्थिक मंदी से जूझ रही इस दुनिया में जब रोजगार दिनों दिन कम होते जा रहे है और बेरोजगारी के शिकार युवावों के लिये इस व्यवस्था ने कोई रास्ता नहीं छोडा़ है. वर्तमान मीडिया देश का सबसे बडा़ आदर्श उन्हें खडा़ कर रही है जिनके हाथ में देश की पूजी लूटने का सबसे बडा़ तंत्र है. ऎसे में इनके द्वारा किसी का भी चुना जाना युवाओं में आदर्शों का चुनाव होगा और यह चुनाव नरेन्द्र मोदी के लिये एक पक्षधरता तय करेगा. इसका दूसरा और अहम पक्ष यह भी है कि पूजीपतियों और हिन्दूवादी ताकतों की गठजोड़ को और मजबूत किया जा सके जिसके लिये नरेन्द्र मोदी वाकई में देश के सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं जिसने जन प्रतिरोध के चलते सिंगूर से हारकर भागी टाटा कम्पनी को अपने यहाँ संरक्षण दिया. टाटा की यह हार जनता की एक बडी़ जीत थी जिसे जन संघर्षों के इतिहास में दर्ज किया जायेगा.


आर्थिक मंदी से निपटने का कोई रास्ता नहीं है:-

अचानक से अमरीकी बैंकों का ध्वस्त होना और सरकारी सहायता से उसे संरक्षित करने का प्रयास बिफल ही होता दिख रहा है चूंकि पूजी के इस साम्राज्य में अमेरीका के ढहने से दुनिया के सभी राष्ट्रों पर इसका साफ तौर पर प्रभाव दिख रहा है. एक आंकलन के मुताबिक दुनिया के तकरीबन साढे़ छः करोड़ युवा बेरोजगार हुए हैं. ऎसी स्थिति में भारत के वे क्षेत्र जो निर्यात से जुडे़ हुए हैं उन पर गहरा असर पडा़ है खास तौर से मेडिकल आई.टी. आदि . क्योकि निर्यात के लिये जो डालर आते थे अमरीकी आर्थिक मंदी के कारण वे आना बंद हो गये और उन पैसो को वापस ले लिया गया और अचानक यहाँ के शेयर बाज़ार गिर गये. जिससे हुजेरी जो कि तिरुवंतपुरम में स्थित है टाटा जमशेदपुर जैसी फैक्ट्रीयाँ बंद हो गयी. जिन लोगों ने शेयर बाज़ार में पैसे लगाये थे वे धीरे धीरे वापस लेना शुरू कर दिये और शेयर बाज़ार का हाल बिगड़ता चला गया. अभी हाल में यह फैक्ट सामने निकल कर आया है कि पिछले तीन महीने में ४४ मिलियन डालर का प्रोडक्सन कम कर दिया गया है. ऎसी स्थिति में इस बाज़ार व्यवस्था को ढहता हुआ देखकर कम्पनियों ने अपनी प्लानिंग पर भी रोक लगा दी है जिससे नये रोजगार की संभावना तो खत्म ही दिखती है पर जहाँ से नये रोजगार की सम्भावना खत्म होती दिखती है वहीं से एक नये व्यस्था की सम्भावना खुलती है. क्योंकि आदमी सोचता है इसलिये वह अपने हाथ का बेहतर इश्तेमाल करना जानता है.








18 दिसंबर 2008

धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक तत्व

-स्वामी नित्यानंद


किसी का भी धर्म परिवर्तन अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर करना या कराना निंदनीय है। धर्म परिवर्तन का मुद्दा कंधमाल और बंगलुरू में जारी हिंसा के मद्देनजर फिर विचारणीय हो उठा है। दूसरों के धर्म को दोयम दर्जे का या अपने धर्म से हीन मानना ओछी मानसिकता है। वर्तमान में धर्म परिवर्तन मोक्ष या प्रभु प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं वरन संख्या बल बढ़ाने के उद्देश्य से किया जाता है। संख्या बल बढ़ाने के राजनीतिक निहितार्थ होते हैं और इसका लाभ भी संबंिधत पक्षों को मिलता है। गांधी इन बातों को अच्छी तरह समझते थे इसलिए उन्होंने धर्म-परिवर्तन और पुन: परिवर्तन जैसे प्रयासों की निंदा की थी। सच तो ये है कि धर्म किसी को भी सही मायने में इंसान नहीं बना सका। जिन्हें धार्मिक लोग कहा जाता है वो दरअसल असहिष्णुओं की फौज हैं। आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों में इनकी भरमार देखी जा सकती है। इन संगठनों का मुख्य कार्य है तथ्यों को तोड़-मरोड़कर या गोलमाल भाषा में पेश करना। तथ्य कुछ भी हो संदर्भ से काटकर विद्रूप रूप से परोसना। इसमें इन्हें महारत हासिल है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि वह विकास के मुद्दे पर असफल हो चुकी है। इसका मोदी मॉडल विकास को लेकर कितना प्रासंगिक है यह समय बताएगा। सत्ता के लिए भाजपा के पास ले-देकर एक ही अस्त्रा है और वो है सांप्रदायिक धु्रवीकरण। क्रिश्चियनों और मुस्लिमों पर हमले इसी खेल का हिस्सा हैं।धर्म परिवर्तन बहुआयामी मुद्दा है। ये व्यापक चर्चा का विषय होना चाहिए। जहां भी धर्म परिवर्तन होता है एकांगी नहीं होता। दोनों तरफ से पहल होती है। कुछ लोग एक धर्म से निकलते हैं तो कुछ नए भी उसमें शामिल होते हैं। हिंदुओं में से कुछ लोग धर्म छोड़कर ईसाई या मुस्लिम बन जाते हैं तो उनमें से भी कुछ लोग हिंदू धर्म में शामिल हो जाते हैं। ये सतत प्रक्रिया है जो चलती रहती है। विशेष रूप से हिंदू धर्म की बात की जाए तो ज्यादातर धर्म परिवर्तन निम्न निधZन तबके में होता है। ये वे लोग हैं जो हिंदू धर्म समाज की परििध पर हैं। पहचान के संकट और न्यूनतम सुविधाओं के अभाव में कष्टकर जीवन जीने को मजबूर हैं। इन परिस्थितियों में ये लोग अन्य धर्म प्रचारकों के लपेटे में आ जाते हैं। यहां यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि बलात् धर्म-परिवर्तन संभव नहीं है। धर्म परिवर्तन का प्रत्याशी जब तक स्वयं न चाहे कोई भी जोर जबर्दस्ती से उसका धर्म परिवर्तन नहीं कर सकता। मगर संघ परिवार इन्हीं स्वाभाविक प्रवृत्तियों को तूल देकर बहुसंख्यक हिंदुओं में भय उत्पन्न कर धु्रवीकरण करके उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। यहां विशेष ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि 1947 से पूर्व और पश्चात भी रा.स्व.सं, हिंदू महासभा द्वारा निरंतर कहा जाता रहा है कि पचास वर्ष बाद भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। साठ वर्ष बीत गए। इतिहास और आंकड़े गवाह हैं कि हिंदू भारत में 80 प्रतिशत हैं। जहां तक धर्म परिवर्तन का सवाल है सांप्रदायिक संगठन ये कभी नहीं बतलाते कि इन साठ वषो± में अन्य धमो± से कितने लोग हिंदू धर्म में आए। यह भी कहना प्रासंगिक होगा कि हिंदू धर्म की सतत बड़ाई हांकने वाले मठाधीश हिंदू धर्म में किसी भी प्रकार का सामाजिक विमर्श पेश करने में असफल हैं। सभी संप्रदायों के मठाधीश जातिवादी मानसिकता के प्रेरक और पोषक हैं। चाहे वह ब्रह्म कुमारी मिशन हो, इस्कॉन हो, स्वामी नारायण हो या राधास्वामी या अन्य संप्रदाय। इनके पास अकूत संपत्ति है, विलासितापूर्ण जीवनशैली है। आडंबर और पाखंड है। जिसे धर्म मीमांसा प्रचारित किया जाता है वह दरअसल मिथ्या मीमांसा है। इन मठों और मठाधीशों को हिंदू समाज के वंचित, शोषित तबके से कुछ भी लेना-देना नहीं है, हां इनकी भयंकर उपेक्षा से अलग-थलग पड़े लोग जब अन्य धमो± की ओर रूख करते हैं तो धर्म परिवर्तन का हल्ला मचाने के लिए मठों की थैलियां खुल जाती हैं। जिनका धर्म परिवर्तन हो जाता है उनका हाल-चाल पूछने उक्त संगठनों के गुगेZ कभी उनके पास नहीं जाते। उन कारणों और विपत्तियों को समझने की कभी कोशिश नहीं करते जिसके चलते धर्म परिवर्तन हुआ। उन्हें सांप्रदायिक राजनीति करनी है इसलिए चचो± और मिस्जदों पर हमले कर अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करते रहते हैं। समझदार हिंदू इनके झांसे में नहीं आते पर मूढ़ इनकी मिथ्या अवधारणाओं और प्रचार में उलझ जाते हैं। यह भी विचारणीय है कि क्या अपनी जाति को सुरक्षित कर लेने से धर्म सुरक्षित हो जाता है। सांप्रदायिक संगठन कभी क्यों चाहेंगे कि धर्म परिवर्तन जैसी विकृतियां बंद हो जाएं। इसलिए धर्म परिवर्तन पर वैज्ञानिक विचार जरूरी है। खुले दिल, साफ नीयत और धर्म निरपेक्षता की दृष्टि से सार्वजनिक विचार हो तो समस्या का समाधान आसानी से निकल सकता है। साभार -समयांतर

26 नवंबर 2008

तुम्हारी कहानी कही जानी चाहिये:-

अनुराधा गांधी ने इस दुनिया को विदा कह दिया, उनके दोस्तों के कुछ पत्र जो एक किताब के रूप में अनुराधा को याद करते हुए आये हैं उसका हिन्दी में अनुवाद यहाँ प्रकाशित है


प्रिय अनु,
जेल की सलाखें लगभग एक इंच मोटी हैं........ जिसमे सूर्य की किरणे हर सुबह थिरकते हुए आती हैं. और अभी गर्मी है.....वे तीखी मजबूत ....जोशीली हैं. ठीक उन्हीं दिनों की तरह जब हम विश्वविद्यालय बिल के खिलाफ चल रहे थे. तुम्हें याद है? सूरज की मारक गर्मी थी, और तुम मोर्चे की पूरी लम्बाई में उदित और अस्त होती दिखती थी. यह मेरा पहला मोर्चा था, मुझ पर तुम्हारी पहली छाप- उर्जा की एक पाँच फुट ऊची बंडल, एक छोटी सी कूद के साथ सूर्य पर प्रत्येक नारे से मुट्ठी का प्रहार करती हुई. जब आप आसमान पर प्रहार करने का निश्चय कर लेते हैं तो ऊचाई की बाधा बमुश्किल मायने रखती है.पहली छाप आवश्यक नहीं की स्थायी रहे. किन्तु साल और दशक इस पहली छवि को बहुत धुधले नहीं कर पाते. कुछ सालों बाद मैने तुम्हें एक मीटींग में तथ्यों, आंकडों और विचारों को मशीनगन की गति से रखते हुए सुना. मैने तुम्हारे विचारों को जाना और सीखा कि तुम चिंतन की जानी मानी विजेता हो. मगर मैं तुम्हारी छवि को चिंतकों के दायरे में बिठा नहीं पाता हूँ. संभवतः वह बहुत पानी कम था. कम-अज-कम जब तुमने न केवल दुनिया को व्याख्यायित बल्कि उसे बदलने का निश्चय किया. तब न केवल विचारों को व्याख्यायित और स्पष्ट करना था, उसे विविध और विस्तृत भूमि में लडा़ जाना था. और उस संघर्ष शील बर्ताव का क्या माने जब तुम नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित अपने कमरे में फरवरी की एक शाम मेरे साथ आयी थी. मैं मुंबई की ताजगी के साथ उस कड़कडा़ती ठण्ड से बचने के लिये खिड़कियों को बन्द करना चाह रहा था.......और तुम्हारे पास उस खोजी की वह कथा थी जिसने दक्षिणी ध्रुव के आक्रमण के लिये खुद को अनुकूलित कर लिया था.वर्षों बाद भी क्या इस स्थिति से मदद मिली थी जब अपने कंधे पर रायफल रखे, बस्तर के आडे़ तिरछे जंगलों से गुजरी थी? जरूर मिली होगी, या उस घुटन के दर्द ने तुम्हें उस पहाडी़ को जीतने की इजाजत नहीं दी.लेकिन इन भौतिक अनुकूलन, सांस्कृतिक, जाति विरोधी, महिला, ट्रेड यूनियन, नागरिक स्वतंत्रता, झुग्गियों, विद्यार्थियों तथा अन्य विविध मोर्चे के सतत युद्ध जैसी स्थितियों की दशा कहीं ज्यादा रही होगी.वैसे दिल जीतने में तुम्हें बमुश्किल ही परेशानी होती थी. लड़ते हुए लोग सभी जगहों पर एक जैसे ही होते हैं और तुम उनके संघर्ष के आम मुहाबरों से आसानी से जुड़ गयी होगी. और जहाँ भाषायी बाधा रही होगी वहाँ तुम इसे आसानी से लांघते हुए एक नई भाषायी बोली को अपना लेती होगी. जबकि हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी के अलावे तुम गुजराती गोंदी और यहाँ तक कि तेलगू की अल्पग्य भी थी.और उस दिन इ.पी.डब्ल्यू. में कृष्णा बंदोपाद्यायाय के आख्यान से गुजरते हुए मैं अपने को आश्चर्य चकित होने से नहीं रोक सका कि तुम्हारे आख्यान को कैसे पढा़ जायेगा.तुम्हारे सभी अनुभवों को जो हम सभी पुरूष कामरेडों के बरताव से हुए. लीडर, आर्गनायजर, गुरिल्ला, कमेटी मेम्बर, नीति निर्धारक, एक्टविस्ट बनने के वो सभी अनुभव, खासकर वो सारी परीक्षायें और ट्रायल जो महिला क्रंतिकारी बनने के चयन करने वाली को देना होता है.वस्तुतः मैं केवल बहुत ही परावर्तित और अपरावर्तित रूपों में उन अनुभवों को जान सकता हूँ. जैसे मैं जानता कि श्रेष्ठ कामरेडों की मानक छडी़ से तुम्हारे किसी कार्य की मानक तुलना का मानसिक जोड़ करना हम पुरूष मस्तिस्क के लिये कितना और किसी पुरूष के विवेकी सलाह को फटकार नहीं समझना कितना कठिन है. यह भी कि एक पुरूष का क्रोध महिमा मंडित हो सकता है और स्त्री का क्रोध महज चिड़चिडा़पन, पुरूष के आँसु इतने गम्भीर जबकि स्त्री के ब्लैक मेलिंग से मिलते जुलते. और कैसे किसी महिला को उस पौरूषीय आकांछी रूढ़ धारणा में संभवतः केवल संघर्ष रत होना होता है नकि किसी सांचागत सामर्थ्य में.अनु मैं जानता हूँ कि तुम्हारा हस्तक्षेप पहला होगा जिससे चीजें बदलने लगी. पितृ सत्ता के विरूद्ध सुधारवादी मुहिम पुरुषवादी वर्चस्व के स्तम्भ को अगर धराशायी नहीं कर रहा था (आन्दोलन के अन्दर और बाहर) तो भी नेतृत्व कट के गिर रहे थे. महिला सदस्यों की संख्या में बृद्धि हो रही थी. लेकिन यह भी तुम बेहतर जानोगी कि जब चीजें बदलती हैं तो कुछ ऎसी भी चीजें होती हैं जो यथास्थिति को बरकरार रखना चाहती हैं.और सतत सुधार्वादी लहरों की मांग रखती हैं. वो तुम और तुम्हारी बहनों के उत्कर्ष बिन्दु से कहानी कहने की मांग करती हैं.तुमने चीजों को न केवक अपने अनुभवों से देखा किन्तु उन हजारों कार्यकर्ताओं की दृष्टि से भी देखा, जिनमे तुम्हारा सामना देश के प्रत्येक कोने में हुआ था. तुमने महिलाओं के लिये नीति प्रतिपादन करने में हिस्सेदारी की और उसके कार्यान्वयन के लिये आगे बढी़. तब तुम्हारी कहानी अलग होगी ये वो कहानी है जिसे सुनाया जाना बाकी है.और यही वो था जो मैं तुम्हारे बारे में उस हप्ते लिखना चाहता था. जब अप्रैल के उस हप्ते ई.पी.डब्लू. में कृष्णा अपनी कहानी को सुना रही थी. तुमसे कहने के लिये कि तुम उस कहानी को सुनाने का प्रयास करो जो कृष्णा की कहानी के दशकों पार संवाद कर सकें. एक कहानी जिसे दसियों हजार कहानी कहनी है. आने वाले कल के उन असंख्य लड़के, लड़कियों से कई कृष्णाओं से और कई अनुओं से.लेकिन अनु इससे पहले कि मैं यह आंक पाता कि तुम तक पहुंच संभव है भी या नहीं कि ठीक उसी हप्ते के अखबार से हमे पता चला कि सेरीब्रल मलेरिया तुम्हें शहीद कर चुका है.स्मृतियों के बाढ़ से लहरें उतरती और यकायक आंसुओं को धक्का दे जाती और लगता है कि आँसु का प्रत्येक टुकडा़ कहानी कहने के लिये चीखना चाहता है-जो कहानी तुम्हारी है, उसकी है, हमारी है. एक कहानी जो बगैर नैतिकतावादी हुए सैकडो़ आदर्श/आचार गढे़गी, जो बगैर दाहक हुए लाखों मनों को जला सकती है. उस अनु की कहानी जो किसी दिन कही जायेगी किसी अनु के द्वारा.और अनु, सलाखें लगभग एक इंच मोटी हैं. लेकिन वे अरबों आत्माओं, करोडो़ं मन के लौ के साथ खडे़ रहने के लिये नहीं बने हैं. जैसे हजारों और अब लाखों कार्यकर्ता दृढ़ता से तुम्हारे रास्ते पर चलेंगे, आगे बढे़ंगे और नये क्षितिज मांपेंगे. उनके सामने से सलाखें व अन्य बाधायें उनको बनाये रखने वाले बिखर कर भागेंगे. पूरी दुनिया में और पूरे भारत में भी पुराने तरीके से शासित होने के अस्वीकार घोषणा कर रही गुस्से से उठी जनता की मुट्ठीयों के सामने साम्राज्यवाद और उनके शासक एजेन्ट का संकट निवर्तमान हो जाने को होगा इस प्रकार कि जैसा कि हो सकता है हमने कल्पना भी न की हो. जिस कल का हमने स्वप्न देखा है उसे वे जन्म दे रहे होंगे और हम वहाँ होंगे. तुम्हारा- छोटू, जेल से, मई २००८

24 नवंबर 2008

अनुराधा गांधी को याद करते हुए :-रमालू
स्नेह का एक प्रतीक याद करते हुए आँखें नमनाक हैं. तुम्हारे साथ गुजारे हुए दोस्ती के स्नेही पल अभी भी मेरी मुट्ठी में शेष बचे हैं. ११ अप्रेल को ५४ वर्ष की ही उम्र में दुनिया को तुमने विदा कह दिया.अनुराधा गांधी एक मानवतावादी थी. उनके पिता कुर्ग कर्नाटक से थे जो कम्युनिष्ट पार्टी ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता थे.बाद में वकालत के पेशे के साथ वे बाम्बे आ गये.और अनुराधा की पढा़ई लिखाई बाम्बे में हुई.महाराष्ट्र में नागरिक स्वतंत्रता अधिकार के लिये उसने एक अहम भूमिका अदा की उसने क्रांतिकारी आंदोलन में छ्त्रों के नवजवान भारत सभा में आवाह्ननाट्य मंडल को खडा़ करने में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई. १९७० में आज़ादी के बाद एक नयी पीढी़ नये विचारों के साथ उदित हुई. जिसने इस समाज को पूरी तरह समता पर आधारित बनाना चाहा, अनुराधा उस नौजवान शिक्षित पीढी़ की अगली पंक्ति में थी जो अपने समय के विभिन्न आंदोलनों के साथ खडे़ थे. वह उनमे से एक थी जिन्होंने आराम की जिन्दगी छोड़कर समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना.मेरा परिचय उनसे तब हुआ जब बाम्बे में अपनी उच्च शिक्षा को समाप्त कर वे क्रान्तिकारी आंदोलन का एक हिस्सा बन लेक्चरर के रूप में नागपुर आयी.आंदोलन में सांस्कृतिक गतिविधियों की अहमियत को समझते हुए १९८३ में उन्होंने ए.आई.एल.आर.सी. (आल इंडिया लीग फार रिवोल्यूसनरी कल्चर) को बनाने में एक सक्रिय योगदान दिया.१९९६ तक वे इसकी सेन्ट्रल कमेटी की मेम्बर रही और इस दौरान उन्होंने कई सफल कार्यक्रम का आयोजन करवाया अपनी गतिविधियों को पूरा करने के लिये वह एक सायकिल से चला करती थी. जल्द ही नागपुर छोड़कर वे आदिवासी क्षेत्र में एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में चली गयी.मुझे याद आ रहा है १९८३ में जब ए.आई.एल.आर.सी. द्वारा दिल्ली में पहला कार्यक्रम लिया गया विरसम के कुछ वरिष्ठ सदस्यों (आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी लेखक संघ) ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की तरफदारी की थी यह अनुराधा ही थी जिसने बडी़ स्पष्टता के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के विकास को ऎतिहासिक परिप्रेक्ष में समझाया और बताया कि मातृभाषा किस तरह से मानवसमुदाय के लिये सहज ग्राह्य होती है व उसकी क्या प्रक्रिया होती है. सारे प्रश्नों के जबाब को व्याख्यायित करते हुए उसने सबको संतुस्ट कर दिया.जुलाई १९८५ की बात है जब ७ क्रंतिकारी संगठन के प्रतिनिधि के रूप में मैं, वरवर राव, गदर, संजीव, और डोला किस्ट राजू हैदराबाद से पूरे भारत भ्रमण पर निकले थे.हमारा पहला ठहराव नागपुर था. यह अनुराधा गांधी थी जो नागपुर की एक दलित बस्ती में किराये के मकान में रहती थी और बडी़ गर्म जोशी के साथ हमारा स्वागत किया था.उसके बाद उन्होंने आंध्रप्रदेश में क्रान्तिकारी आंदोलन पर हो रहे दमन के खिलाफ सीता बर्डी के एक हाल में एक सभा आयोजित करवायी थी. जाने माने समाज सुधारक बाबा आम्टे इसमे मुख्य अतिथि के रूप में सम्मलित हुए थे.महाराष्ट्र के क्रांतिकारी आंदोलन को उभारने में अनुराधा गांधी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उन्होंने कई लेखकों संस्कृति कर्मियों छात्रों और युवाओं को संगठित किया इस मायने में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. क्रंतिकारी आंदोलन के अखिल भारतीय स्तर पर सेमिनार आयोजित करने में मुख्यतः उनके सुझाव और चर्चाओं में वे बडे़ स्तर की अवधारणा को पेश करती थी. क्रांतिकारी आंदोलन में राष्ट्रीयता, जातिप्रथा, महिला के सवालों को लेकर व आंदोलन में छात्रों और कामगार वर्ग के संगठन में नयी उर्जा की सहायक भूमिका आदि विषय पर. उनके प्रयास व कार्य क्रांतिकारी महिला आंदोलन के लिये मार्ग दर्शक होते थे.क्रांतिकारी आंदोलन के ढांचे को व्यापक बनाने में भी उनके सुझाव मदद करते थे. उन्होंने अंबेडकर के विचारों पर जाति के मसले को हल करने को लेकर एक नयी अंतर्दृष्टि दी. महाराष्ट्र में उन्होंने एक ऎसी व्यवस्था विकसित की जहाँ महिलायें महिलाओं के लिये एक विशिष्ट सत्र आयोजित करें. समस्याओं को चिन्हित कर खास समस्याओं के लिये रिजोल्यूसन बनायें और व्यवहारिकता के लिये एक मार्ग दर्शक सूत्र बनायें. उन्होंने जीवन साथी के रूप में कोबड गांधी को चुना और खुद को व्यवहारिक रूप से वर्गच्युत किया. वह आदिवासियॊं के साथ जंगलों में घूमती थी. जंगलों में घूमते हुए उन्हें मलेरिया हुआ और ब्रेन तक पहुचने के कारण उनकी मौत हो गयी. वह आपने कार्यों को बडी़ दिल्लगी के साथ करती थी. एक एक बेहतर कल के लिये वह लोगों को संगठित करती थी और यह सब करते हुए उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

14 नवंबर 2008

फिलिस्तीनी जन-संघर्षों के कवि महमूद दरवीस की कविता:-

लिखो कि
मैं एक अरब हूँ
मेरा कार्ड न. ५०,००० है
मेरे आठ बच्चे हैं
नौवा अगली गर्मी में होने जा रहा है
नाराज तो नहीं हो?

लिखो कि
मैं एक अरब हूँ
अपने साथियों के साथ पत्थर तोड़ता हूँ
पत्थर को निचोड़ देता हूँ
रोटी के एक टुकडे़ के लिये
एक किताब के लिये
अपने आठ बच्चों के खातिर
पर मैं भीख नहीं माँगता
और नाक नहीं रगड़ता
तुम्हारी ताबेदारी में
नाराज तो नहीं हो?

लिखो कि
मैं एक अरब हूँ
सिर्फ एक नाम, बगैर किसी अधिकार के
इस उन्माद धरती पर अटल
मेरी जडें गहरी गई हैं
युगों तक
समयातीत हैं वे
मैं हल चलाने वाले
किसान का बेटा हूँ
घास-फूस की झोपडी़ में रहता हूँ
मेरे बाल गहरे काले हैं
आँखें भूरी
माथे पर अरबी पगडी़ पहनता हूँ
हथेकियाँ फटी-फटी है
तेल और अजवाइन से नहाना पसंद करता हूँ

मेहरबानी कर के
सबसे ऊपर लिखो कि
मुझे किसी से नफरत नहीं है
मैं किसी को लूटता नहीं हूँ
लेकिन जब भूखा होता हूँ
अपने लूटने वालों को
नोचकर खा जाता हूँ

खबरदार
मेरी भूख से खबरदार
मेरे क्रोध से खबरदार॥

12 नवंबर 2008

संसद में मैकाले हंस रहा था :-

एक लम्बे अर्से बाद छः से चौदह वर्ष के बच्चों को अनिवर्य रूप से शिक्षा मुहैया करवाने वाले शिक्षा के अधिकार विधेयक को केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने कानूनी रूप से स्वीकृति दे दी है.संविधान के नीतिनिर्देशक तत्व में अनुच्छेद ४५ के तहत यह यह अनिवार्यता दी गयी है नीतिनिर्देशक तत्व की यह एक मात्र धारा थी जिसमे १० वर्ष के समय की बचन बद्धता थी. बचन बद्धता के पचास साल बाद शिक्षा के अधिकार की मंजूरी को कुछ विफल एतिहासिक दावों और भविष्य में प्राथमिक शिक्षा से निर्मित होने वाले समाज के आलोक में देखने की जरूरत है. १९५५ मेम जब प्रायमरी स्कूलों को आरम्भ करने का निर्णय लिया गया था तब से एक सुधारवादी अवधारणा के साथ यह बात सामने आनी शुरू हुई कि प्राथमिक शिक्षा का उत्तरोत्तर विकास होगा. जिसको लेकर समय समय पर कई समितियां बनायी गयी, और कुछ नये तरह के बदलाव भी किये गये. पर इन ५० वर्ष के दौरान प्राथमिक शिक्षा की जो स्थिति रही और वर्तमान में जो है वह एक निराशाजनक ही कही जा सकती है.. प्राथमिक स्कूलों की स्थिति, पाठ्यपुस्तकें, और शिक्षण की प्रक्रिया के साथ ५७.६१ प्रतिशत छात्र आज भी प्राथमिक शिक्षा को बीच में ही छोड़ देते हैं. ऎसे में इस अधिकार को मंजूरी मिलना आम जन जो अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल या महगे शिक्षण संस्थानों की शिक्षा को नहीं खरीद पा रहा है व असमानता की इस खाई में उसका आक्रोश वर्गीय आधार पर बढ़ता जा रहा है कही यह विधेयक उनके सब्र का झुनजुना तो नहीं है. १९८६ मेम नई शिक्षा नीति लागू होने के साथ तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्ण चंद पंत ने शिक्षा स्थायी समिति के सामने यह बयान दिया था कि १९९० तक सभी को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हो जायेगी पर २२ वर्ष बाद आज जो आंकडे़ हमारे सामने हैं वो इन दावों को खोखला ही साबित करते हैं. प्राथमिक शिक्षा को लेकर १९६४ में डा. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में गठित आयोग ने शिक्षा दिये जाने की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि शिक्षा प्रणाली बच्चों को मूल्य युक्त शिक्षा देने के बजाय उसे एक छोटे से अल्प मत के लिये उपलब्ध करा पाती है जो योग्यता से नहीं बल्कि फीस देने की क्षमता से बनता है. समतावादी आदर्श समाज के विपरीत यह एक अलोकतांत्रिक स्थिति है जिससे आम जन के बच्चे निम्न स्तर की शिक्षा पाने या न पाने को मजबूर हैं. जबकि सम्पन्न वर्ग अच्छी शिक्षा खरीदने में समर्थ है. ऎसी स्थिति में शिक्षा की समता के लिये जन शिक्षा को सर्वमान्य प्रणालि की ओर बढ़्ना होगा. बावजूद इसके कि इसका कार्यान्वयन इमानदारी से किया जाता यह पूरी तरह से रद्दी की टोकरी में पडी़ रही.और १९८६ में नई शिक्षा नीति की समीक्षा के लिये राममूर्ति कमेटी गठित की गयी जिसने मूल्य आधारित शिक्षा के नाम पर धर्म और अवैग्यानिक शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. जब इस पर सवाल उठा तो कोर्ट ने धर्म को उदारवादी अवधारणा के रूप में देखने की बात कही. इस लिहाज से पुस्तकों के लेखकों और सत्ता में आसीन विभिन्न विचारधारा की पार्टीयों को अपने मुताबिक इसे व्याख्यायित करने का मौका मिला. और जब भाजपा केन्द्र में आयी या जिन राज्यों में सत्ता सीन हुई अपने विचारों के अनुरूप किताबों का धार्मिकीकरण और साम्प्रदायिकी करण किया. अब बच्चों को ग से गमला की जगह ग से गणेश हो गया. सवाल यह उठता है कि जब प्राथमिक शिक्षा के अधिकार का विधेयक पास हो चुका है तो उसका आम जन को और सम्पूर्णता मेम समाज को क्या लाभ होने जा रहा है. लोग अंगूठा लगाने के बजाय हस्ताक्षर करना सीख जायेंगे और और साक्षरता का प्रतिशत थोडा़ बढ़ जायेगा जिसे सरकारें विकसित होने की प्रक्रिया में एक उपलब्धि के तौर पर गिनायेंगी पर अगूठा लगाने और हस्ताक्षर करने के बीच कोई खास फर्क नहीं दिखता. और सरकारे उस समझ तक आम जन को नहीं जानें देना चाहती जहा वे अपने हक अधिकार को समझ सकें अपने शोषण के विरुद्ध लड़ सकें. अन्ततः यह शिक्षा अधिकार का कानून किनके हितों की पूर्ति करेगा इस बात को समझने की जरूरत है. शिक्षा की अवधारणा मानवीय विकास के पीढी़ गत हस्तांतरण को लेकर होनी चाहिये थी. अपने देश के लोगों सहित विश्व की संचित संस्कृतियों के सर्वोत्तम त्त्वों से बच्चों का परिचय सीखने की उत्सुकता व चाहत जगाना अप्ने ग्यान को वे खुद बढा़यें बच्चों में इस तरह की क्षमता पैदा करना होना चाहिये . पर वर्गीय आधार पर स्कूलों का विभाजन जहाँ जिस वर्ग के पास पब्लिक स्कूल में अपने ब्च्चों को भेजने और महंगी शिक्षा को खरीदने की क्षमता है वह अपने मनमाफिक पाठ्यपुस्तकों को खरीदने के लिये आजाद है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वर्ग के बच्चों को एक ही तरह की पाठ्यपुस्तकें थोप दी गयी हैं. पाठ्यपुस्तकों के सातह जो सबसे बडी़ समस्या दिखती है वह यह कि घटनाओं, व समाज के विकास, इतिहास, को एक कहानी के रूप में चित्रित कर दिया गया है जहाँ बच्चे को यह नही बताया जाता कि यह इतिहास कैसे निकाला गया इसके सही होने के क्या प्रमाण हैं पुस्तकें विवरणों का ढेर बनकर रह गयी हैं जो जिग्यासा को ग्यान की प्रक्रिया नहीं मानती . अतः बच्चों के मनोविग्यान मेम आस्थावादी भावना को विकसित किया जाता है . दूसरी तरफ पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को एक ऎसी संस्कृति में ढाला जाता है जहाँ वे टाइ जूते के साथ साफ सफाई युक्त एक खास तरह की संस्कृति में पलत्व हैं और समाज के यथार्थ से दूर रहते हुए समाज की गरीबी भूख बेरोजगारी अन्याय के संघर्षों को जानने से महरूम रह जाते हैं यह मध्यम वर्ग की मानसिकता को विकसित करने का पहला चरण होता है ऎसे में समान शिक्षा की अवधारणा को लागू करना ही समता की तरफ बढ़ना हो सकता है. शिक्षा का पतन राजनैतिक व सांस्कृतिक पतन है प्राथमिक शिक्षा को सभी के लिये जरूरी है पर यह न तो वर्गीय विभाजन के आधार पर होनी चाहिये न ही थोपी गयी हो बल्कि एक ऎसी व्यवस्था को इजाद करना होगा जहाँ बच्चे ग्यान को खुद से बढा़ने कि क्षमता पैदा कर सकें और आम जन के संघर्षों से जुड़ सकें.